- Sung by
- Ma Amrit Priya, Sw Dev Geet
- Album
- Dhyan Geeta (ध्यान गीता) (2003)
- Length
- 7:49
कुछ लोग जमा हैं मंदिर में, कुछ लोग जमा मयखाने में।
कुछ उलझ गए हैं पूजा में, कुछ उलझ गए पैमाने में।
मंदिर जाओ या मयखाना, जीवन रह जाता अनजाना।
अथ बोधं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
यदि देह, इंद्रियाँ, प्राण, हृदय, मन, अहंकार खुद को माना।
यदि नहीं बोध, चैतन्य रूप में खुद को अब तक है जाना।
तो मानुष तन में आए क्यों, जननी को कष्ट दिलाए क्यों?
जागरणं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
कुछ त्यागों में कुछ भोगों में, कुछ उलझ गए हठ योगों में।
कुछ अतिशय औषधि का सेवन कर उलझ गए बहु रोगों में।
पांडित्य सरीखा रोग नहीं, साक्षीत्व सरीखा योग नहीं।
अथ साक्षी शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
यदि बोध तुम्हारा हो गहरा, घर भी आश्रम हो सकता है।
कुछ मूढ़ इकट्ठे हो जाएं, तीरथ मरघट हो सकता है।
यदि समझ विदा हो जाती है, गंगा गंदी हो जाती है।
अथ प्रज्ञा शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
हो बोध मात्र तेरा परिचय, हो काम एक रहना अकाम।
प्रार्थना एक-‘प्रभु धन्यवाद’, कहना-सुनना बस राम-राम।
कोई तेरा तादात्म्य नहीं, कुछ रूप नहीं, कुछ नाम नहीं।
अथ बोधं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
