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ओशो: संबोधि क्या है

ओशो: संबोधि क्या है

संपदा तो एक है — संबोधि, जागरण। बुद्ध का संकल्प और खाली घड़े में उतरता आकाश, ओशो के अपने शब्दों में।

संबोधि — बुद्धत्व, जागरण, परम ज्ञान — ओशो के लिए कोई पारलौकिक चमत्कार नहीं, चेतना की परिपूर्ण जागृति है। शब्द की जड़ भी वे खोलकर दिखाते हैं: समाधि, संबोधि, संबुद्ध — सब 'सम' धातु से निकले हैं; भीतर का संतुलन ही सब कुछ है। और इस जागरण को वे एकमात्र संपदा कहते हैं — बाकी सब इकट्ठा किया हुआ मौत छीन लेगी।

बुद्ध की प्रसिद्ध प्रतिज्ञा — 'बिना सम्यक-संबोधि प्राप्त किए नहीं उठूंगा' — से लेकर खाली घड़े में उतरते आकाश तक, ओशो संबोधि को हर कोण से छूते हैं। नीचे उनके हिंदी प्रवचनों से चुने हुए अंश दिए गए हैं, हर अंश के साथ पूरे प्रवचन की कड़ी।

उनके ही शब्दों में

प्रवचनों से

ओशो ने जहां-जहां इस विषय पर बात की — हर अंश पूरे प्रवचन से जुड़ा है। (अंश अंग्रेज़ी अनुवाद में; हिंदी पुस्तकों के लिंक मूल हिंदी प्रवचन खोलते हैं।)

From Death To Deathlessness · Discourse 3
1985-08-04 · Rajneeshmandir · English

प्रिय ओशो, यदि किसी संबुद्ध पुरुष का मस्तिष्क किसी साधारण आदमी में प्रत्यारोपित कर दिया जाए, तो क्या वह संबुद्ध पुरुष की तरह व्यवहार करने लगेगा? क्या उसे संबोधि का अनुभव होगा?

नहीं, क्योंकि मस्तिष्क का प्रबुद्धता से कोई लेना-देना नहीं है। यदि तुम किसी प्रबुद्ध व्यक्ति का मस्तिष्क किसी अप्रबुद्ध व्यक्ति के शरीर में रख दो, तो वह प्रबुद्ध व्यक्ति की तरह व्यवहार नहीं करेगा। वह बस उसी तरह व्यवहार करेगा, जैसे वह अब तक करता रहा था। शायद कुछ दिनों तक वह थोड़ी कठिनाई में रहेगा, लेकिन जल्दी ही वह समायोजित हो जाएगा। मस्तिष्क को आत्मा के अनुसार समायोजित होना पड़ता है, इसका उलटा नहीं।
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प्रिय ओशो, क्या संबोधि ही वह एकमात्र मार्ग है जिससे कोई शिष्या अपने गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता सचमुच व्यक्त कर सकती है?

मनीषा, शिष्य के भीतर गुरु के प्रति जो कृतज्ञता है, उसे व्यक्त करने के लिए ज्ञानोदय भी पर्याप्त नहीं है। कोई उपाय ही नहीं है। शिष्य की कृतज्ञता अनकही ही रह जाती है। यह उन रहस्यों में से एक है जिन्हें अनुभव किया जा सकता है, लेकिन समझाया नहीं जा सकता। तुम्हें यह अजीब लगेगा जब मैं कहता हूं कि शिष्य जितना ज्ञानोदय के निकट आता है, उसके लिए कृतज्ञता व्यक्त करना उतना ही कठिन होता जाता है—क्योंकि अब वह एक ऐसे बिंदु पर पहुंच रहा है जिसे उसने पहले कभी जाना ही नहीं था। वह पूरे रास्ते कृतज्ञ रहा है, लेकिन ज्ञानोदय, अपने ही खिलने का अनुभव, इतना अधिक है कि बस संभाला नहीं जाता। तुम केवल आंसू बहा सकते हो, या नृत्य कर सकते हो—लेकिन सब असमर्थ है; वह केवल तुम्हारा भाव दिखाता है, कृतज्ञता नहीं। कृतज्ञता की गहराई और महानता ऐसी है कि कोई शब्द उसे व्यक्त नहीं कर सकता, कोई अनुभव उसे व्यक्त नहीं कर सकता। लेकिन एक अर्थ में,…
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Ancient Music In The Pines · Discourse 8
1976-02-28 · Buddha Hall · English

क्या किसी राजनीतिज्ञ का संबुद्ध होना संभव है?

राजनीतिज्ञ बाहर की दुनिया से संबंधित है; वह बहिर्मुखी है। धार्मिक व्यक्ति अंतर्मुखी है। उसका संबंध वस्तुओं से नहीं है, संसार से नहीं है, परिस्थितियों से नहीं है; उसका संबंध अपनी चेतना की गुणवत्ता से है। धार्मिक व्यक्ति यह खोजने की कोशिश कर रहा है कि कैसे परिपूर्ण हुआ जाए; राजनीतिज्ञ संसार को यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह कोई है। वह परिपूर्ण न भी हो, लेकिन वह दिखावा करता है कि वह परिपूर्ण है; उसने दिखावे को चुना है, पाखंड को चुना है। वह बस चाहता है कि सारा संसार जाने कि वह कोई विशेष है, असाधारण है, बहुत सुखी है। भीतर गहरे में वह शायद एक नरक ढो रहा हो, लेकिन वह मानता है कि यदि वह सबको धोखा दे सके, तो वह स्वयं को भी धोखा दे सकेगा। वह सपना कभी पूरा नहीं होता। तुम झूठी मुस्कान मुस्कुराकर सबको धोखा दे सकते हो, लेकिन स्वयं को कैसे धोखा दोगे? भीतर गहरे में तुम जानते हो कि सब कुछ…
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The Path Of The Mystic · Discourse 29
1986-05-18 · Punta Del Este, Uruguay · English

प्रिय ओशो, यदि संबोधि का विचार मन का अपने ही साथ किया गया अंतिम मज़ाक है, तो आख़िरी हँसी किसकी होती है?

तुम जितने अधिक दुखी होते हो, उतनी ही अधिक तुम्हें हँसने की चीजें मिल जाती हैं। यह कोई संयोग नहीं है कि दुनिया में सबसे अच्छे चुटकुले यहूदियों के पास हैं, क्योंकि उन्होंने सबसे अधिक कष्ट झेले हैं। उस दुर्भाग्यपूर्ण क्षण से, जब मूसा उन्हें मिस्र से बाहर ले गया, आज तक वे दुख ही दुख झेलते रहे हैं—अलग-अलग देशों में, अलग-अलग जातियों के बीच, अलग-अलग ढंगों से। उन्होंने इतना कष्ट झेला है कि उन्हें कुछ आविष्कार करना ही पड़ा, ताकि कम-से-कम एक क्षण के लिए वे दुख को भूल सकें। उन्होंने सबसे अच्छे चुटकुले रचे हैं। मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ कि भारत में हमारे पास कोई चुटकुले नहीं हैं। भारत में लोग जो भी चुटकुले इस्तेमाल करते हैं, वे उधार लिए हुए हैं; कोई भी भारतीय मूल का नहीं है, सब दूसरे देशों से आए हैं। एक भी चुटकुला मैं नहीं खोज पाया जो प्रामाणिक रूप से भारतीय हो—क्योंकि भारत का अतीत बहुत शांत, मौन रहा है। बस…
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The Discipline Of Transcendence Vol 2 · Discourse 10
1976-09-09 · Buddha Hall · English

क्या कोई संबोधि या अ-मन की अवस्था में संसार में रह सकता है और काम कर सकता है? क्या एक संबुद्ध व्यक्ति संसार में आत्मनिर्भर होता है?

एक ही क्षण में वे जीसस नहीं रहे, वे क्राइस्ट हो गए। एक ही क्षण में वे मनुष्य नहीं रहे, वे महामानव हो गए। फासला बहुत छोटा है। इसीलिए बुद्ध कहते हैं, ‘एक इंच से चूक जाओ, या एक क्षण से चूक जाओ, और तुम लाखों मील दूर फेंक दिए जाते हो।’ इन दो वाक्यों के बीच बस एक इंच का अंतर था—बहुत फासला नहीं था, शायद एक सांस भर। लेकिन जब वे परमात्मा के विरुद्ध चिल्लाए, तब वे बिलकुल साधारण थे—मानवीय, कमजोर। बस एक क्षण बाद वे राज़ी हो गए; फिर कोई समस्या न रही। यदि परमात्मा चाहता है कि यह इसी तरह घटे, तो इसे इसी तरह घटना है। उन्होंने स्वीकार कर लिया। एक मुस्कान अवश्य उनके चेहरे पर आई होगी, और केवल चेहरे पर ही नहीं, उनके हृदय में भी। उस क्षण वे अवश्य विस्तृत हो गए होंगे। अब कुछ भी न था…
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The Path Of Love · Discourse 4
1976-12-24 · Buddha Hall · English
प्रश्न: क्या सांता क्लॉज़ संबुद्ध है? अगर वह नहीं है, तो फिर कौन होगा? संबोधि तो मौज है। वह कोई गंभीर बात नहीं है। सांता क्लॉज़ एक बुद्ध है, एक क्राइस्ट है। सांता क्लॉज़ हास्य है, और संबोधि हास्यपूर्ण है। इसमें कुछ भी गंभीर नहीं है: यह आनंद है, यह मौज है, यह उल्लास है।
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शिक्षा का सार

संबोधि पर ओशो की दृष्टि

धम्मपद पर ओशो की प्रवचनमाला 'एस धम्मो सनंतनो' से चुने हुए सूत्र — हर सूत्र के साथ मूल प्रवचन का अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।

बुद्ध का संकल्प: सम्यक-संबोधि

जिस रात बुद्ध ने मृत्यु, बुढ़ापा और दुख देखा, उसी रात सब छोड़ दिया — और जो कसम खाई, ओशो कहते हैं, वह समझने जैसी है।

बुद्ध ने ऐसा नहीं किया। जिस दिन देखा कि मृत्यु है, जिस दिन देखा कि बुढ़ापा है, जिस दिन देखा कि जीवन में दुख है, उसी रात छोड़ दिया सब। उस रात छोड़ने के बाद बुद्ध ने जो कसम खायी, वह समझने जैसी है! बुद्ध ने कहा, चाहे मेरा चमड़ा, नसें, हड्डी ही क्यों न शेष रह जाएं; चाहे शरीर, मांस, रक्त क्यों न सूख जाए, किंतु बिना सम्यक-संबोधि को प्राप्त किए नहीं रहूंगा।
एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन 63 →

एकमात्र संपदा: जागरण

संबोधि क्यों सब दांव पर लगाने योग्य है? ओशो बुद्ध के संकल्प का अर्थ खोलते हैं — जहां मौत सब छीन लेगी, वहां सोए रहना ही एकमात्र मूर्खता है।

क्योंकि उसके बिना रहने का कोई अर्थ नहीं है। सम्यक-संबोधि एकमात्र संपदा है। सम्यक-संबोधि का अर्थ है, बिना जागे नहीं रहूंगा। सोया-सोया अब नहीं रहूंगा, सब दांव पर लगा दूंगा, लेकिन अब नींद में रहने का कोई भी कारण नहीं है। जहां मौत है, वहां जो सो रहे, वे गाफिल हैं और नासमझ हैं। जहां मौत सब छीन लेगी, वहां जो इकट्ठा कर रहे, वे पागल हैं और विक्षिप्त हैं।
एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन 63 →

खाली घड़े में उतरता आकाश

संबोधि का क्षण कैसा है? ओशो का उत्तर काव्य में है — घड़ा खाली हो जाए, तो उसी शून्य में पार से कुछ अलौकिक उतरने लगता है।

और जिस दिन घड़ा खाली हो जाएगा, उसी दिन तुम पाओगे, उसी खाली घड़े में उतरने लगा कुछ अलौकिक। उतरने लगा कोई पार से। आने लगी दूर की आवाज। बरसने लगे मेघ। उसी क्षण आकाश पृथ्वी से मिलता है; उसी क्षण परमात्मा आत्मा से। वही क्षण संबोधि का क्षण है।
एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन 21 →

बंधन का पूर्ण अनुभव ही द्वार है

संबोधि किसी पलायन से नहीं आती। ओशो का व्यावहारिक सूत्र: अपने सबसे मजबूत बंधन को पहचानो — क्रोध, काम या लोभ — और उसी पर होश का प्रयोग करो।

तुम अपने मूल बंधन को ठीक से पहचान लो, उसी पर तुम ठीक से प्रयोग करते जाओ। देर न लगेगी। जल्दी ही, बिना पछताए, तुम पार हो जाओगे। लेकिन पार होने का रास्ता इन रोगों का पूर्ण अनुभव है। पूर्ण अनुभव में तुम जागते हो। संबोधि घटित होती है। सम्यक-ज्ञान होता है।
एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन 43 →
संक्षिप्त उत्तर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ओशो के अनुसार संबोधि क्या है?

संबोधि चेतना का परिपूर्ण जागरण है — नींद जैसी मूर्च्छा से उठकर अपने स्वभाव में प्रतिष्ठित हो जाना। ओशो शब्द की जड़ भी दिखाते हैं: समाधि, संबोधि, संबुद्ध सब 'सम' धातु से बने हैं — भीतर का सम, संतुलन, ही संबोधि है। वह पाना नहीं है, जागना है; इसीलिए वे उसे एकमात्र संपदा कहते हैं।

संबोधि और समाधि में क्या संबंध है?

ओशो के अनुसार दोनों एक ही अनुभव के दो नाम हैं — बुद्ध की भाषा में संबोधि, योग की भाषा में समाधि। अर्हत निर्विकार होता है सम्यक संबोधि से, ठीक-ठीक समाधि से। जहां ध्यान अपनी पूर्णता पर पहुंचता है और भीतर के सारे शत्रु — काम, क्रोध, लोभ, मोह — विसर्जित हो जाते हैं, वहीं संबोधि है।

क्या संबोधि हर व्यक्ति को संभव है?

हां — ओशो के लिए बुद्धत्व किसी विशेष व्यक्ति का विशेषाधिकार नहीं, हर चेतना की अंतिम संभावना है। मार्ग भी उन्होंने व्यावहारिक बताया: अपने सबसे गहरे बंधन को पहचानो और उस पर होश का प्रयोग करो; बंधन का पूर्ण अनुभव ही जागरण का द्वार बनता है। शर्त एक ही है — बुद्ध जैसा संकल्प।