क्रोध पर ओशो की दृष्टि दोहरी भूल से बचाती है — न दमन, न अभिव्यक्ति का अंधा समर्थन। उनके अनुसार क्रोध पहले स्वयं को जलाता है, फिर दूसरे तक पहुंचता है; और जो आदमी हर गाली पर भड़क उठता है, वह मनुष्य नहीं, यंत्र है जिसकी बटन कोई भी दबा सकता है।
ओशो का मार्ग है साक्षी-भाव: क्रोध को दबाओ मत, लड़ो मत — देखो। बुद्ध और महावीर की देशनाओं पर बोलते हुए वे बार-बार यही सूत्र देते हैं कि क्रोध की ऊर्जा ही, देखे जाने पर, करुणा में रूपांतरित हो जाती है। नीचे उनके हिंदी प्रवचनों से चुने हुए अंश दिए गए हैं।
क्रोध पर ओशो की दृष्टि
उनके हिंदी प्रवचनों में बार-बार लौटने वाले सूत्र — हर सूत्र के साथ मूल प्रवचन का अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।
क्रोध से क्रोध नहीं मिटता
धम्मपद के सूत्र 'एस धम्मो सनंतनो' की व्याख्या में ओशो बुद्ध का सनातन नियम दोहराते हैं — वैर से वैर मिटाने की कोशिश अपने हाथों नर्क रचना है।
यही सनातन धर्म है। शत्रुता से शत्रुता समाप्त नहीं होती। क्रोध से क्रोध समाप्त नहीं होता। वैर से वैर नहीं मिटता। और जितना वैर बढ़ता जाता है, उतना तुम अपने चारों तरफ अपने हाथों नर्क निर्मित करते चले जाते हो।एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन 1 →
क्रोध पहले स्वयं को जलाता है
क्रोध का पहला घाव क्रोधी को ही लगता है। ओशो कहते हैं — दूसरे को दुख देने की योजना बनाते ही हमने अपना विनाश शुरू कर दिया।
अगर बहुत गौर से देखा जाए, तो जब तुम दूसरे को दुख देना चाहते हो, तब तुमने अपने को दुख देना शुरू कर ही दिया। तुम दुखी होने शुरू हो ही गए। तुम क्रोधित हो, किसी पर क्रोध करके उसे नष्ट करना चाहते हो; उसे तुम करोगे या नहीं, यह दूसरी बात है, लेकिन तुमने अपने को नष्ट करना शुरू कर दिया।एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन 1 →
यंत्र मत बनो — मालिक बनो
जिसकी क्रोध की बटन कोई भी दबा दे, वह मशीन है। ओशो के लिए क्रोध पर मालकियत ही प्रतिक्रिया और क्रिया का भेद है — और यही मनुष्य होने की परिभाषा है।
मनुष्य होने का इतना ही अर्थ है कि कोई तुम्हारी क्रोध की बटन दबाए चला जाए, लेकिन तुम कहते हो नहीं करना है, तो बटन दबती रहती है, वह आदमी थक जाता है, लेकिन तुम क्रोध नहीं करते। तुम कहते हो मैं अपना मालिक हूं। जब करना चाहूंगा करूंगा, जब न करना चाहूंगा नहीं करूंगा। प्रतिक्रिया और क्रिया में यही फर्क है। प्रतिक्रिया में दूसरा मालिक है, तुम नहीं। और क्रिया में तुम मालिक हो, दूसरा नहीं।एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन 6 →
क्रोध आता है, आप क्रोधी नहीं होते
महावीर-वाणी पर बोलते हुए ओशो साक्षी का सूत्र देते हैं: क्रोध एक घटना है जो चित्त में घटती है — देखने वाला उससे सदा अलग है। यही भेद मुक्ति का द्वार है।
और सच यही है कि आप देखते हैं, आप कभी क्रोधी होते नहीं। वह भ्रांति है कि आप क्रोधी होते हैं। आप सदा देखने वाले बने रहते हैं। जब पेट में भूख लगती है तब आप भूख नहीं हो जाते, आप सिर्फ जानने वाले होते हैं कि भूख लगी है। जब पैर में कांटा गड़ता है तो आप दर्द नहीं हो जाते, तब आप जानते हैं कि पैर में दर्द हो रहा है, ऐसा मैं जानता हूं।महावीर-वाणी, प्रवचन 12 →
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ओशो क्रोध से लड़ने को नहीं कहते — वे कहते हैं कि क्रोध की फिक्र छोड़ो, ध्यान करो। क्रोध मन की मूर्च्छा में घटता है; जैसे-जैसे साक्षी-भाव सधता है, क्रोध की जड़ ही कट जाती है। दमन से क्रोध भीतर अंगारे की तरह सुलगता रहता है और बहाना मिलते ही फूट पड़ता है।
नहीं। ओशो के अनुसार दबाया हुआ क्रोध नष्ट नहीं होता, संस्कार बनकर गहरा होता जाता है — राख के नीचे दबा अंगारा, जिसे किसी की एक फूंक फिर भड़का देती है। उनका मार्ग तीसरा है: न दमन, न अंधी अभिव्यक्ति — क्रोध को पूरे होश से देखना, जिससे उसकी ऊर्जा रूपांतरित हो सके।
ओशो कहते हैं — करुणा से ही क्रोध मिटता है, जैसे प्रेम से वैर। क्रोध वही ऊर्जा है जो रूपांतरित होकर करुणा बनती है; इसीलिए वे क्रोध को शत्रु नहीं, कच्चा हीरा कहते हैं। बुद्ध के जीवन-प्रसंगों से वे दिखाते हैं कि जिसके भीतर क्रोध शेष नहीं, उस पर थूका भी जाए तो भी करुणा ही उठती है।