- Sung by
- Ma Amrit Priya, Sw Dev Geet
- Album
- Dhyan Geeta (ध्यान गीता) (2003)
- Length
- 8:38
मंदिर-मस्जिद में सीस झुका, तुम जिसको सजदा करते हो।
भीतर पुकारता कब से वह, आवाज नहीं क्यों सुनते हो?
है नाम बिना निस्तार नहीं, प्रियतम बिन होता प्यार नहीं।
अथ अनहद शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
सबके भीतर प्रभु बैठ स्वयं, है चला रहा सबकी मशीन।
आश्चर्य सभी हैं देख रहे, फिर भी न कोई करता यकीन।
यह अंधों का है गाँव अरे, हम कहाँ दिखाएं राम अरे?
अथ रामं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
धुंधली हो गई नजर हो तो, ऐनक अपनी कुछ साफ करो।
सब आँखों से वह झाँक रहा, हर हाथ उसी का हाथ अहो।
वह दिग-दिगंत से गाता है, सुन लो यदि सुनना आता है।
अथ श्रवणं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
गंगा तट पर सब खड़े हुए पर पूछ रहे हैं गंग कहाँ?
है नामपट्ट पर नजर टिकी, कोई लिख दे है गंग यहाँ।
तुम जहाँ कहो मैं वहीं लिखूं, पर किस भाषा में हरि लिखूं?
अथ नादं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
भीतर भी वही गूंजता है, बाहर भी वही गूंजता है।
अनहद में है वह निराकार, कोयल बन वही कूंजता है।
है ओंकार का ख्याल जिसे, क्या कर पाएगा काल उसे।
अथ नादं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
