- Sung by
- Ma Amrit Priya, Sw Dev Geet
- Album
- Dhyan Geeta (ध्यान गीता) (2003)
- Length
- 7:15
कितना आपाधापी धन का, पद, मान, कामिनी, कंचन का।
यह दौड़ कहाँ ले जाएगी, क्या सार यही है जीवन का?
छोड़ो असार अब ध्यान करो, जीवन का कुछ सम्मान करो।
अथ ध्यानं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
जैसे किसान टूटी छप्पर, वर्षा के भय से छाता है।
वैसे ही राग रोकने को, साधक भी ध्यान लगाता है।
जिसके जीवन में ध्यान घटा, उसका दुख-दारूण, राग कटा।
वीतरागं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
घर-घर में चर्चित काम यहाँ, मंदिर में बंदी राम यहाँ।
मूर्च्छा का आसव पी-पीकर, कुछ लेते हरि का नाम यहाँ।
छोड़ो प्रमाद अब ध्यान करो, कुछ भीतर अनुसंधान करो।
ओंकारं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
जो भी करता है सतत ध्यान, ऊर्जा हो जाती उर्ध्वमान।
भर जाती है गागर उसकी, बन जाती है किस्मत उसकी।
छोड़ो आलस अब ध्यान करो, प्रज्ञाजल से स्नान करो।
अथ प्रज्ञा शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
अाँखों के पीछे शून्य गगन में, अपनी साँसें स्वाहा कर।
दुख, शोक, ताप की आहुति दे, तू अभी आह से आहा कर।
सुमिरन से बढ़कर कर्म नहीं, साक्षी से बढ़कर धर्म नहीं।
अथ सुमिरन शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
