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ओशो: मृत्यु क्या है

ओशो: मृत्यु क्या है

मृत्यु सबसे बड़ा असत्य है — जो जीवन को जान लेता है, उसके लिए मौत घटती ही नहीं। ओशो के अपने शब्दों में।

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मृत्यु से मनुष्य जितना डरता है, उतना किसी और चीज से नहीं। लेकिन ओशो इस भय को ही उलट देते हैं — उनकी प्रवचनमाला का नाम ही है 'मैं मृत्यु सिखाता हूं'। उनके अनुसार मृत्यु कोई घटना नहीं जो कभी घटती हो; वह हमारे अज्ञान की छाया है। जिसने जीवन को जाना, उसके लिए मृत्यु शब्द ही अर्थहीन हो जाता है।

ओशो के लिए ध्यान और मृत्यु एक ही द्वार के दो नाम हैं — ध्यान स्वेच्छा से मृत्यु में प्रवेश है। नीचे उनके हिंदी प्रवचनों से चुने हुए सूत्र दिए गए हैं, हर सूत्र के साथ मूल अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।

उनके ही शब्दों में

प्रवचनों से

ओशो ने जहां-जहां इस विषय पर बात की — हर अंश पूरे प्रवचन से जुड़ा है। हिंदी पुस्तकों के लिंक मूल हिंदी प्रवचन खोलते हैं।

प्रश्न: ओशो, क्या मनुष्य मृत्यु के सामने भी हंस सकता है? नरेंद्र, यह निर्भर करता है। ऐसे लोग हैं जो तब भी नहीं हंस सकते जब जीवन उन पर अपना सारा आनंद बरसा रहा हो; वे गंभीर, नीरस, मृत बने रहते हैं। फूल उन पर बरसते चले जाते हैं; वे उन फूलों की ओर देखते भी नहीं, वे कृतज्ञता महसूस नहीं करते। वे कृतज्ञता की भाषा पूरी तरह भूल चुके हैं। वे हंसना भूल चुके हैं। लेकिन जो मनुष्य सजग और जागरूक है, जो सही अर्थों में मनुष्य है—समग्र, केंद्रित, जड़ें जमाए हुए—वह मृत्यु के सामने भी हंसेगा। मंसूर हंसा था जब उसे मारा जा रहा था। वह इतनी जोर से हंसा कि जो लोग उसे मार रहे थे, वे अपनी जिज्ञासा रोक न सके। उन्होंने पूछा, “मंसूर, बात क्या है? तुम पागल हो गए हो या क्या? तुम हंस क्यों रहे हो?” उसने कहा, “मैं इसलिए हंस रहा हूं क्योंकि तुम किसी और को मार रहे हो।”

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

ओशो, क्या व्यक्ति की मृत्यु पहले से निश्चित होती है, या वह आकस्मिक होती है—जैसे किसी दुर्घटना में?

दोनों बातें सच हैं। एक अर्थ में मृत्यु निश्चित है—वैसे ही निश्चित, जैसे बाजार से खरीदी हुई घड़ी गारंटी के साथ आती है: वह दस साल चलेगी। लेकिन यदि तुम घड़ी का ठीक से उपयोग करो और उसकी अच्छी देखभाल करो, तो वह बीस साल भी चल सकती है। उसे इधर-उधर पटक दो, तोड़ दो, तो शायद पांच दिन भी न चले। मनुष्य का शरीर एक यंत्र है। आत्मा नहीं मरती; केवल शरीर मरता है, और शरीर बिलकुल यांत्रिक है। जब बच्चा पैदा होता है, तो माता-पिता से मिले बीज-कोषों से बने शरीर में एक निश्चित आंतरिक क्षमता होती है—वह कितने समय तक चल सकता है। उतने समय तक वह टिक सकता है। लेकिन बहुत देखभाल और सही नियम-संयम से वह एक सौ पच्चीस साल तक जा सकता है; खराब देखभाल से वह पचहत्तर में भी समाप्त हो सकता है। इसलिए आयु शरीर की है; आत्मा की कोई आयु नहीं है। इसलिए आयु का प्रश्न नहीं है…
ओशो के मूल हिंदी शब्द · Osho's original Hindi

प्रश्न: ओशो, मौत जो है वह आदमी की निश्चित होती है पहले से या अकस्मात यानी एक्सीडेंट से?

दोनों ही बातें हैं। एक अर्थ में तो निश्चित होती है मौत। इस अर्थ में निश्चित होती है जिस अर्थ में बाजार से घड़ी खरीदें तो गारंटी होती है, दस साल चलेगी। लेकिन घड़ी को चलाएं, कम चलाएं, व्यवस्था से चलाएं तो बीस साल भी चल सकती है। पटक दें, तोड़ डालें तो पांच दिन भी न चले। तो आदमी का शरीर तो एक यंत्र है। आत्मा की तो कोई मौत होती नहीं। और शरीर बिलकुल यंत्र है। शरीर की ही मौत होती है। जब एक बच्चा पैदा होता है तो मां-बाप से जो भी वीर्यकण उसे मिले हैं, उन वीर्यकणों से बना हुआ शरीर कितना चलेगा, उसकी इनर कैपेसिटी होती है। उतना चल सकता है। …

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

ओशो, द्वारका शिविर में आपने कहा कि ध्यान और समाधि मृत्यु की अवस्था में स्वेच्छा से, सजग होकर प्रवेश करना है, जिसके द्वारा मृत्यु का भ्रम मिट जाता है। तब प्रश्न उठता है कि मृत्यु का भ्रम किसे होता है? क्या वह शरीर को होता है या चेतना को? क्योंकि शरीर तो केवल एक उपकरण है, उसे भ्रमपूर्ण बोध नहीं हो सकता; और चेतना के भ्रमित होने का कोई कारण नहीं है। तो फिर इस भ्रम की घटना का कारण और आधार क्या है?

उन्होंने खबर भेजी। वह बहुत नाराज़ होकर आई। उसने कहा, “यह इसकी वही पुरानी आदत है। बूढ़ा हो गया, लेकिन छोड़ी नहीं। मरते समय भी उपद्रव करेगा।” वह एक लाठी लेकर आई, उसे ज़मीन पर पटका और बोली, “बंद करो यह शैतानी! मरना ही है तो ठीक से मरो!” वह आदमी हंसा, नीचे उतरा और बोला, “मैं तो ज़रा खेल रहा था—देखना चाहता था कि ये लोग क्या करते हैं। अब मैं ठीक से मरूंगा, रीति-रिवाज के अनुसार।” फिर वह लेट गया और मर गया। उसकी बहन जाते-जाते बोली, “ठीक है, अब क्रिया-कर्म पूरा करो। हर चीज़ का एक सही ढंग होता है; ठीक से काम करो।” मृत्यु के बारे में हमारा भ्रम एक सामाजिक भ्रम है। उसे तोड़ा जा सकता है। उसे तोड़ने की विधियां हैं, व्यवस्थाएं हैं। और अगर कोई दूसरा तुम्हारे लिए उसे न भी तोड़े, तो जिसने थोड़ा-सा भी ध्यान किया है, वह मृत्यु के क्षण में उसे स्वयं तोड़ लेगा। किसी बाहरी सहायता की ज़रूरत नहीं है।
ओशो के मूल हिंदी शब्द · Osho's original Hindi

ओशो, द्वारका शिविर में आपने कहा है कि ध्यान व समाधि स्वेच्छा से सचेतन मृत्यु की स्थिति में प्रवेश है, जिससे मृत्यु का भ्रम विसर्जित हो जाता है। तो प्रश्न उठता है कि मृत्यु का भ्रम किसको होता है? शरीर को होता है या चेतना को होता है? शरीर चूंकि उपकरण-मात्र है, इसलिए शरीर को भ्रमरूपी बोध नहीं हो सकता है; और चेतना के भ्रमित होने का कोई कारण नहीं है। फिर भ्रम की घटना का कारण, आधार क्या है?

… तो वह लेटकर मर गया। और उसकी बहन चली गई कि अब ठीक है, उसको निपटा दो। फिर उसने लौटकर नहीं देखा पीछे। उसने कहा, ठीक है, अब निपटा दो। हर चीज का एक ढंग होता है, उसकी बहन ने कहा, ढंग से काम करो। जो भी काम करना है, व्यवस्था से करो। हमारी मृत्यु का भ्रम हमारी सामाजिक भ्रांति है। इसे तोड़ा जा सकता है। इसे तोड़ने की विधि और व्यवस्था है। और अगर कोई भी न तोड़ रहा हो तो मरते वक्त प्रत्येक व्यक्ति, जिसने थोड़ा-बहुत भी ध्यान साधा है, वह खुद ही तोड़ लेता है। कोई जरूरत नहीं रहती है। …

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

Jeevan Ki Khoj · Discourse 3Question 6 1965-12-30 Bombay Hindi

ओशो, जीवन के प्रति जागे रहने के लिए क्या मृत्यु का भय आवश्यक है?

मैंने मृत्यु से डरने की बात नहीं की, क्योंकि मृत्यु का भय आखिर होता ही क्या है? यह जानना जरूरी है कि मृत्यु है। जो यह नहीं जानता, वही डरता है। डरने का अर्थ है कि हम यह धारणा ढोते हैं कि किसी दिन हम मर जाएंगे—कि जिसे अभी हम जीवन समझे बैठे हैं, वह हमसे छीन लिया जाएगा। भय यही है कि मृत्यु हमारा जीवन छीन न ले। यही भय है। लेकिन अगर तुम्हें यह दिखाई पड़ जाए कि तुम पहले से ही मरे हुए हो, तो डरने को क्या है? अगर तुम्हें यह दिखाई पड़ जाए कि तुम रोज मर रहे हो, कि तुम्हारा बहुत कुछ पहले ही मर चुका है, तो डरने को क्या है? जब तक जिसे तुम जीवन समझते हो वह तुम्हें जीवन जैसा दिखाई देता है, मृत्यु का भय दिखाई पड़ता है। और अगर यही चीज मृत्यु के रूप में दिखाई पड़ने लगे, तो मृत्यु का कैसा भय…
ओशो के मूल हिंदी शब्द · Osho's original Hindi

पूछा है इस संबंध कि ओशो, जीवन की जागृति रखने के लिए क्या मृत्यु का डर जरूरी है?

मैंने डर नहीं कहा मृत्यु का, क्योंकि मृत्यु से डर का मतलब ही क्या है? मृत्यु है, यह जानना जरूरी है। जो इसे नहीं जानता वही डरता है। डरने का अर्थ यह होता है कि हमेें यह खयाल है कि हम किसी दिन मर जाएंगे। अभी जिसे हम जीवन समझ रहे हैं, वह छीन लिया जाएगा। तो डर इस बात का होता है कि जो हमारा जीवन है वह कहीं मृत्यु छीन न ले। डर इस बात का होता है। लेकिन अगर आपको पता चल जाए कि आप मरे ही हुए हैं, तो डर किस बात का होगा? अगर आपको पता चल जाए कि आप मर ही रहे हैं रोज, मर ही चुके हैं काफी, तो डर किस बात का होगा? …

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

ओशो, मृत्यु में भी जागे रहने के लिए—या ध्यान में सचेत मृत्यु को सफलतापूर्वक घटित करने के लिए—एक साधक को शरीर-तंत्र, श्वास-तंत्र, श्वास की अवस्था, प्राण की अवस्था, ब्रह्मचर्य, संकल्प-शक्ति आदि के संबंध में कैसी तैयारियां करनी चाहिए? कृपया इस पर विस्तार से प्रकाश डालें।

लेकिन सिनेमा हॉल में भी, जहां आसान है क्योंकि सब छायाएं ही हैं, हम साक्षी नहीं रह पाते। बाहर निकलने वालों के रूमाल अगर हम जांचें, तो पता चलेगा कि कितने रोए। हम सब जानते हैं कि परदे पर कुछ भी नहीं है—सिर्फ प्रकाश और छाया है। फिर भी वहां सब कुछ “घटता” है, और हम सहभागी हो जाते हैं। यह भूल मत करना कि फिल्म देखते समय तुम केवल दर्शक होते हो—तुम सहभागी हो जाते हो। कोई तुम्हें अच्छा लगता है, कोई तुम्हें विकर्षित करता है; तुम तादात्म्य कर लेते हो। अगर हम एक फिल्म के भी साक्षी नहीं हो सकते, तो जीवन में कैसे साक्षी होंगे? जीवन भी फिल्म से बहुत अधिक नहीं है। गहराई में, जैसे परदे पर किरणों का खेल है, वैसे ही जीवन विद्युत-कणों का खेल है। यदि तुम शरीर को या दीवार को उसके अंतिम घटक तक ले जाओ, तो केवल विद्युत-कण ही मिलते हैं। परदे और इसमें बहुत बड़ा अंतर नहीं है—वहां द्वि-आयामी, यहां त्रि-आयामी.…

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

ओशो, किसी व्यक्ति के मर जाने के बाद हर कोई उसकी प्रशंसा क्यों करता है—वे भी, जिन्होंने जीवन भर उसकी निंदा की? इसका राज़ क्या है?

तुम पूछते हो, “लोग किसी व्यक्ति के मर जाने के बाद उसकी प्रशंसा क्यों करते हैं?” करनी ही पड़ती है। इसीलिए विवाहों में लोग आशीर्वाद और बधाइयां देते हैं। बुजुर्ग आशीर्वाद भेजते हैं, हमउम्र शुभकामनाएं भेजते हैं—क्योंकि बेचारा आदमी मरा ही समझो! खत्म! अंत आ गया। कहते हैं, चींटी जब मरने को होती है तो उसके पंख निकल आते हैं—तो विवाह के पंख निकल आए; चींटी अपने अंत के करीब है! अब आगे कोई भविष्य नहीं। आगे सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा। इसलिए सारी बधाइयां और आशीर्वाद अभी दे दो। अंतिम विदाई दे दो: “भाई, अब आगे तुम्हारा और परमात्मा का मामला है!” इसीलिए तुम महात्माओं और संतों का इतना सम्मान करते हो—बेचारे मरे हुए हैं! पहले से ही मरे हुए! चलते-फिरते मुर्दे! उनका सम्मान न करो तो और करोगे क्या? उनके साथ करने को और कुछ बचा ही नहीं। अगर वे जीवित होते, तो संबंध रखने के और भी ढंग होते। अब तुम बस इतना ही कर सकते हो कि जितनी श्रद्धा दिखा सको, दिखा दो…
ओशो के मूल हिंदी शब्द · Osho's original Hindi

दूसरा प्रश्न: ओशो, व्यक्ति के मर जाने पर क्यों सभी लोग उसकी प्रशंसा करते हैं? वे भी जो कि जीवन में जीवन भर उसकी निंदा करते रहे! इसका राज क्या है?

तुम पूछ रहे हो कि ‘व्यक्ति के मर जाने पर क्यों सभी लोग उसकी प्रशंसा करते हैं?’ करनी पड़ती है। इसीलिए तो विवाह के अवसर पर लोग शुभकामना करते हैं, आशीर्वाद देते हैं बड़े-बूढ़े हूए तो, समसामायिक हुए तो बधाइयां देते हैं, क्योंकि यह आदमी मर रहा है बेचारा! खतम! इति आ गई इनकी। जैसे कहते हैं न, जब चींटी मरने को होती है तो उसको पंख ऊग आते हैं--इनका विवाह होने लगा, अब चींटी मरने के करीब आई! अब आगे से इनका कोई भविष्य नहीं है। अब सब अंधकारपूर्ण है। अब कर लो जितनी भी बधाइयां वगैरह करनी हैं और जितनी भी शुभकामनाएं करनी हैं। अब इनको आखिरी विदाई दे दो कि भैया, आगे तुम जानो और भगवान जाने! इसीलिए तो तुम महात्माओं की, संतों की इतनी आवभगत करते हो--मर गए बेचारे! मरे-मराए लोग! चलती-फिरती लाशें! अब इनका सम्मान न करो तो क्या करो और! अब और करने योग्य कुछ बचा भी नहीं। …

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

शिक्षा का सार

मृत्यु पर ओशो की दृष्टि

उनके हिंदी प्रवचनों में बार-बार लौटने वाले सूत्र — हर सूत्र के साथ मूल प्रवचन का अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।

मृत्यु सबसे बड़ा असत्य है

ओशो की पहली ही चोट हमारी बुनियादी मान्यता पर है: मृत्यु को हम जीवन का सबसे बड़ा सत्य मानते हैं, जबकि वह घटती ही नहीं। जो जीवन से अपरिचित है, वही मृत्यु को सत्य मान लेता है।

जीवन क्या है, मनुष्य इसे भी नहीं जानता है। और जीवन को ही हम न जान सकें, तो मृत्यु को जानने की तो कोई संभावना शेष नहीं रहती। जीवन ही अपरिचित और अज्ञात हो, तो मृत्यु परिचित और ज्ञात नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि चूंकि हमें जीवन का पता नहीं, इसलिए ही मृत्यु घटित होती प्रतीत होती है। जो जीवन को जानते हैं, उनके लिए मृत्यु एक असंभव शब्द है, जो न कभी घटा, न घटता है, न घट सकता है।
मैं मृत्यु सिखाता हूं, प्रवचन 1, Para 1 →

ध्यान: स्वेच्छा से मृत्यु में प्रवेश

मृत्यु को जानने के लिए मरने तक रुकना जरूरी नहीं। ओशो के अनुसार ध्यान और समाधि उसी घटना का स्वेच्छा से किया गया प्रयोग हैं — शरीर और आत्मा का भेद अभी और यहीं अनुभव कर लेना।

हां, अभी एक उपाय है। अभी हम स्वेच्छा से मृत्यु में प्रवेश का प्रयोग कर सकते हैं। और मैं आपसे कहना चाहता हूं: ध्यान या समाधि और कुछ भी नहीं है, ध्यान और समाधि स्वेच्छा से मृत्यु के अनुभव में प्रवेश है। जो शरीर के छूटने पर एक दिन अपने आप घटित होगी घटना, वह हम अभी भी अपनी स्वेच्छा से शरीर को भीतर छोड़कर हट जा सकते हैं और जान सकते हैं कि मृत्यु हो गई, मृत्यु गुजर गई।
मैं मृत्यु सिखाता हूं, प्रवचन 3, Para 1 →

मृत्यु पर विजय का अर्थ

मृत्यु को जीतना किसी शत्रु से लड़ना नहीं है। ओशो कहते हैं — जीत का अर्थ केवल इतना है कि हम जान लें कि मृत्यु है ही नहीं; छाया से लड़ा नहीं जाता, सिर्फ देखा जाता है।

पहली बात तो यह समझ लेना जरूरी है कि मृत्यु पर विजय मिल सकती है, इसका यह अर्थ नहीं है कि मृत्यु है और हम उसे जीत लेंगे। मृत्यु पर विजय मिल सकती है, इसका इतना ही अर्थ है कि मृत्यु नहीं है, ऐसा हम जान लेंगे। मृत्यु का न होना जान लेना ही मृत्यु पर विजय है। मृत्यु कोई है नहीं जिसे जीत लेना है।
मैं मृत्यु सिखाता हूं, प्रवचन 6, Question 1 →

मृत्यु के भय ने हमारा संसार गढ़ा है

ओशो की दृष्टि में हमारा धन, पद, परिवार — यहां तक कि हमारे मंदिर और प्रार्थनाएं भी — मृत्यु के भय की ही रचनाएं हैं। भय से जन्मा धर्म धर्म नहीं है।

मृत्यु के भय ने समाज बनाया है, राष्ट्र बनाए हैं, परिवार बनाए हैं, मित्र इकट्ठे किए हैं। मृत्यु के भय ने धन इकट्ठे करने की दौड़ दी है, मृत्यु के भय ने पदों की आकांक्षा दी है, और सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि मृत्यु के भय ने ही हमारे भगवान और हमारे मंदिर भी खड़े कर दिए हैं।
मैं मृत्यु सिखाता हूं, प्रवचन 3, Para 1 →
संक्षिप्त उत्तर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ओशो के अनुसार मृत्यु क्या है?

ओशो के अनुसार मृत्यु कोई वास्तविक घटना नहीं, बल्कि हमारे अज्ञान से पैदा हुआ भ्रम है। जो जीवन को नहीं जानता, उसे ही मृत्यु सत्य प्रतीत होती है। उनके शब्दों में मृत्यु केवल वाहन बदलने जैसी है — शरीर छूटता है, चेतना यात्रा जारी रखती है।

क्या मृत्यु के भय से मुक्त हुआ जा सकता है?

हां — लेकिन दोहराने या मान लेने से नहीं। ओशो कहते हैं कि 'आत्मा अमर है' सिर्फ दोहराते रहना भय का ही एक रूप है। भय तभी गिरता है जब मृत्यु का साक्षात्कार हो जाए, और वह साक्षात्कार ध्यान में संभव है, जहां शरीर और चेतना का भेद प्रत्यक्ष अनुभव बनता है।

ओशो 'मैं मृत्यु सिखाता हूं' क्यों कहते हैं?

क्योंकि उनके लिए मृत्यु को जानना ही जीवन को जानने का द्वार है। जो मृत्यु से भागता है, वह जीवन से भी वंचित रह जाता है। ओशो सिखाते हैं कि ध्यान के द्वारा स्वेच्छा से मृत्यु में उतरा जा सकता है — और जो एक बार उतर कर देख लेता है, वह जान लेता है कि जो मरता है वह मैं नहीं हूं।