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ओशो: साक्षी-भाव क्या है

ओशो: साक्षी-भाव क्या है

देखने वाले बनो — जो हो रहा है उसे होने दो। साक्षी से महत्वपूर्ण कोई सूत्र नहीं। ओशो के अपने शब्दों में।

ओशो की सारी देशना अगर एक शब्द में समेटनी हो, तो वह शब्द है — साक्षी। अष्टावक्र की महागीता पर बोलते हुए वे कहते हैं कि इससे महत्वपूर्ण कोई सूत्र नहीं है: कर्ता छूट जाए और शुद्ध देखना भर बचे, यही ध्यान है, यही ज्ञान है, यही मुक्ति है।

साक्षी कोई साधना करके पानी वाली चीज नहीं — वह हमारा स्वभाव है, जिस पर विचार, भाव और कर्म का सारा भवन खड़ा है। सुख आए तो देखो, दुख आए तो देखो; न भोक्ता बनो, न कर्ता — बस जागकर देखो। नीचे ओशो के हिंदी प्रवचनों से चुने हुए सूत्र दिए गए हैं।

उनके ही शब्दों में

प्रवचनों से

ओशो ने जहां-जहां इस विषय पर बात की — हर अंश पूरे प्रवचन से जुड़ा है। (अंश अंग्रेज़ी अनुवाद में; हिंदी पुस्तकों के लिंक मूल हिंदी प्रवचन खोलते हैं।)

Naye Samaj Ki Khoj · Discourse 16
Hindi · English translation

ओशो, क्या चुनावरहित जागरूकता भी एक तरह का चुनाव है? ऐसा लगता है कि बात अंततः एक विरोधाभास पर आकर ठहर जाती है।

नहीं, चुनावरहित जागरूकता कोई चुनाव नहीं है। चुनावरहित का अर्थ है कि हम कोई चुनाव नहीं करते, हम कोई विकल्प नहीं चुनते; हम बस जाग जाते हैं। उस जागरण में हम निर्णय नहीं करते कि “यह ठीक है, वह गलत है; इसे स्वीकार करना चाहिए, उसे छोड़ देना चाहिए।” हम कोई निर्णय नहीं करते। हम बस देखते हैं—जागे हुए। इस जाग्रत देखने में कोई चुनाव होता ही नहीं। और जब तक चुनाव है, तब तक हम जागरूकता के साथ देख नहीं सकते। “चुनाव के साथ जागरूकता”—ऐसी कोई चीज होती ही नहीं। जागरूकता, अपने-आप में, चुनावरहित है। जागरूकता अपने स्वभाव से ही चुनावरहित है। इसलिए जागरूकता कभी चुनाव के साथ नहीं हो सकती, क्योंकि चुनाव का अर्थ है पक्षपात शुरू हो गया; नींद शुरू हो गई। यहां इतने लोग बैठे हैं: अगर मैं कहूं, “बच्चू-भाई अच्छे आदमी हैं,” तो फिर बच्चू-भाई के संबंध में भी मैं जागरूक नहीं रह सकता, क्योंकि मेरा लगाव शुरू हो गया। और न ही मैं जागरूक रह सकता हूं उसके संबंध में…
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Main Mrityu Sikhata Hun · Discourse 15
1970-08-06 · Bombay · Hindi · English translation

ओशो, क्या “केवल जागरूकता,” मात्र सजगता और तथाता—एक ही हैं?

असल में, जब हम कहते हैं “सिर्फ जागरूकता,” मात्र सजगता, तो उसमें और तथाता में थोड़ा-सा फर्क है। और उसमें और साक्षी में भी थोड़ा-सा फर्क है। “सिर्फ जागरूकता” को साक्षी और तथाता के बीच की कड़ी समझो—जब तुम साक्षीभाव से तथाता में गुजरोगे, तो बीच में यही कड़ी होगी: सिर्फ जागरूकता। साक्षीभाव में यह भाव दृढ़ रहता है कि “मैं हूं और तुम हो।” सिर्फ जागरूकता में केवल “हूं” रह जाता है; “तुम” का भाव भूल गया—सिर्फ होने का भाव। तथाता में केवल होने का भाव ही नहीं होता; मेरा होना और तुम्हारा होना एक ही होना है। क्योंकि जब तक सिर्फ जागरूकता है, जब तक केवल होने का भाव है, तब तक उस होने के भाव के बाहर एक सीमा रहेगी—कुछ ऐसा जो मैं नहीं हूं, जिससे मैं अलग हूं। तथाता में कोई सीमा नहीं है। बस है…
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Mahaveer Meri Drishti Mein · Discourse 10
1969-09-22 · Hindi · English translation

क्या महावीर इसी जागरूकता को पौरुष और क्षत्रिय-धर्म मानते हैं, या कोई और पौरुष भी है?

बस यही। इससे बड़ा कोई पौरुष नहीं। निद्रा तोड़ने से बड़ा कोई पौरुष नहीं।
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Naye Samaj Ki Khoj · Discourse 12
Bombay · Hindi · English translation

ओशो, लेकिन यह बात थोड़ी विरोधाभासी लगती है। अचेतनता में कोई होश नहीं होता—फिर उसे यह कैसे पता चला?

यह हमेशा बाद में पता चलता है, हमेशा बाद में—जब घटना गुजर चुकी होती है। मान लो, तुम क्रोधित हो गए। जब तुम क्रोध में होते हो, तब तुम्हें जरा भी होश नहीं होता। लेकिन जब क्रोध चला जाता है, तब तुम पीछे मुड़कर देखते हो और कहते हो, “अरे, मैंने यह क्या कर दिया! अगर मैं होश में होता, तो मैं ऐसा कभी न करता।” यह बस एक क्षण की बात है, है न? ऐसा नहीं है कि महीने गुजर गए हों। बस एक क्षण!
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Es Dhammo Sanantano · Discourse 8
1975-11-28 · Pune · Hindi · English translation

Osho, you have earlier said, “Live moment to moment, live in the present.” Now you are saying, “Return to the past.” What should we do?

So it is with the mind—there are ruts. The past means endless grooves. However much you understand, your intellect agrees, you make decisions, you resolve—at the moment of resolve you feel something is going to change. But not even an hour passes before your decision breaks. Then only self-condemnation is produced, nothing else. Your saints, your fakirs, your priests and pundits—most of the time they only succeed in producing self-condemnation in you, nothing else. Their words are logically correct. You cannot even say they are wrong; you have to admit they are right. In that admission you take a decision. But against what are you deciding? Inside are grooves carved since who knows when, deep tracks. Walking in them has become a habit. It is easy to walk in them. They will pull you again and again. The meaning of returning into the past is: these grooves must be erased.…
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Main Mrityu Sikhata Hun · Discourse 4
1969-10-29 · Hindi · English translation

A friend has asked, Osho, one can die with awareness, but how can one be born with awareness?

Most fasters spend twenty-four hours repeating, “I am hungry; I have not eaten,” with their minds absorbed in planning tomorrow’s menu. Then the fast is wasted; it is merely a hunger-strike. That is the difference: a hunger-strike means not eating; upavasa means “dwelling nearer and nearer.” Nearer to whom? To oneself. Away from the body, closer to the self. Even the word upavasa carries no implication of starving; it means nearer-dwelling. Thus one could be in upavasa even while eating—if one knows the eating is at a distance and “I am elsewhere.” And one could not be in upavasa even while not eating—if one keeps thinking, “I am hungry; I’m dying of hunger.” Upavasa is a psychological knowing of one’s separateness from hunger. Other sufferings too can be invited voluntarily. A man can even lie on thorns, simply to see that the thorns do not pierce me; they pierce elsewhere,…
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शिक्षा का सार

साक्षी-भाव पर ओशो की दृष्टि

उनके हिंदी प्रवचनों में बार-बार लौटने वाले सूत्र — हर सूत्र के साथ मूल प्रवचन का अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।

साक्षी: सबसे महत्वपूर्ण सूत्र

महागीता के पहले ही प्रवचन में ओशो साक्षी को अध्यात्म का केंद्रीय सूत्र घोषित करते हैं — देह पंचभूतों का खेल है, तुम वह दीया हो जिसके प्रकाश में यह सब दिखाई पड़ता है।

‘साक्षी’ सूत्र है। इससे महत्वपूर्ण सूत्र और कोई भी नहीं। देखने वाले बनो! जो हो रहा है उसे होने दो; उसमें बाधा डालने की जरूरत नहीं। यह देह तो जल है, मिट्टी है, अग्नि है, आकाश है। तुम इसके भीतर तो वह दीये हो जिसमें ये सब जल, अग्नि, मिट्टी, आकाश, वायु प्रकाशित हो रहे हैं। तुम द्रष्टा हो। इस बात को गहन करो।
महागीता, प्रवचन 1 →

साक्षी हमारा स्वभाव है

साक्षी कोई उपलब्धि नहीं जो अर्जित करनी पड़े — ओशो के अनुसार वह हमारी बुनियाद है, जिसके पार जाने का कोई उपाय ही नहीं। साक्षी का साक्षी नहीं हो सकता।

साक्षी हमारा स्वभाव है, क्योंकि उसके पार जाने का कोई उपाय नहीं--कभी कोई नहीं गया; कभी कोई जा भी नहीं सकता। साक्षी का साक्षी होना असंभव है। साक्षी तो बस साक्षी है। उससे पीछे नहीं हटा जा सकता। वहां हमारी बुनियाद आ गयी। साक्षी की बुनियाद पर यह हमारा भवन है भाव का, विचार का, कर्म का।
महागीता, प्रवचन 4 →

सुख हो या दुख — बस देखो

साक्षी-भाव का व्यावहारिक अर्थ ओशो इस तरह खोलते हैं: दुख के साथ 'मैं दुखी' मत कहो, सुख के साथ 'मैं सुखी' मत कहो। तादात्म्य बस एक बचे — मैं द्रष्टा हूं।

शुद्ध साक्षी! सिर्फ देखो! दुख हो दुख को देखो, सुख हो सुख को देखो! दुख के साथ यह मत कहो कि मैं दुख हो गया; सुख के साथ यह मत कहो कि मैं सुख हो गया। दोनों को आने दो, जाने दो। रात आये तो रात देखो, दिन आये तो दिन देखो। रात में मत कहो कि मैं रात हो गया। दिन में मत कहो कि मैं दिन हो गया। रहो अलग-थलग, पार, अतीत, ऊपर, दूर! एक ही बात के साथ तादात्म्य रहे कि मैं द्रष्टा हूं, साक्षी हूं।
महागीता, प्रवचन 2 →

ध्यान विधि है, साक्षी मंजिल

ध्यान और साक्षी का संबंध ओशो एक पंक्ति में साफ कर देते हैं — सारी विधियां साक्षी तक पहुंचने के मार्ग हैं; अष्टावक्र के लिए तो मार्ग और मंजिल एक ही है।

इसलिए जहां तक अष्टावक्र का संबंध है, साक्षी और ध्यान में कोई फर्क नहीं; लेकिन जहां तक और पद्धतियों का संबंध है, साक्षी और ध्यान में फर्क है। ध्यान है विधि, साक्षी है मंजिल।
महागीता, प्रवचन 4 →
संक्षिप्त उत्तर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ओशो के अनुसार साक्षी-भाव क्या है?

साक्षी-भाव का अर्थ है — जो भी घट रहा है, भीतर या बाहर, उसे बिना कर्ता या भोक्ता बने देखना। विचार आएं तो देखो, क्रोध उठे तो देखो, सुख-दुख आएं तो देखो। ओशो के अनुसार यह देखने वाला ही हमारा असली स्वरूप है — देह और मन घटनाएं हैं, साक्षी स्वभाव है।

साक्षी-भाव और ध्यान में क्या अंतर है?

ओशो का सूत्र है — ध्यान विधि है, साक्षी मंजिल। सारी ध्यान-पद्धतियां अंततः साक्षी तक पहुंचाने के उपाय हैं। और अष्टावक्र जैसे सीधे मार्ग में तो दोनों एक ही हैं: शुद्ध देखना ही ध्यान है, उसी में द्रष्टा अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।

जीवन में साक्षी-भाव कैसे साधें?

ओशो कहते हैं कि इसके लिए जीवन बदलना नहीं पड़ता — जहां हो, जो कर रहे हो, वहीं जागकर देखना शुरू करो। भोजन करते, चलते, सुनते — हर कृत्य में देखने वाले को स्मरण रखो। सुख-दुख के साथ तादात्म्य मत बनाओ; धीरे-धीरे समता अपने आप उतरती है, क्योंकि समत्व साक्षी-भाव की छाया है।