- Sung by
- Ma Amrit Priya, Sw Dev Geet
- Album
- Dhyan Geeta (ध्यान गीता) (2003)
- Length
- 7:49
हीरा को हीरा कहने से, पत्थर पत्थर रह जाता है।
कंकड़ को कंकड़ कहो अगर, वक़्ता कंकड़ हो जाता है।
इसलिए श्रेष्ठ की प्रिफक करो, मत लघुताओं का जिक्र करो।
अथ श्रेष्ठं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
चंदन, बेला, जूही या कमल, कितने सुरभित, कितने सुन्दर!
पर सुरभि अनूठी, जिसके जीवन में खिलता है शील-कमल।
भीतर-बाहर का भेद नहीं, वह जो बोले है वेद वही।
अथ शीलं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
मनसा, वाचा, कर्मणा कभी, कटुता जीवन में मत लाओ।
सबका मंगल सोचो प्रतिपल, मंगल के गीत सदा गाओ।
सबसे मीठी वाणी बोलो, सबसे प्यारा नाता जोड़ो।
अथ मंगल शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
यदि हृदय प्रेम से भरा, अधर पर कैसे फिर गाली होगी?
मन में कड़वाहट भरी अगर, मीठी कैसे वाणी होगी?
इसलिए न विष का जिक्र करो, बस अमृत की तुम फिक्र करो।
अथ अमृत शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
कहने वाले की बात सुनो, फिर कहो कि क्या तुमने समझा।
जब लगे कि वह सुन रहा प्रेम से, तब ही पक्ष रखो अपना।
पहले समझो, फिर समझाओ, यह सूत्र शील का अपनाओ।
संवादम शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
