- Sung by
- Ma Amrit Priya, Sw Dev Geet
- Album
- Dhyan Geeta (ध्यान गीता) (2003)
- Length
- 7:08
संसारी हो या साधक हो, फल की आकांक्षा बाधक है;
उद्देश्य कर्म का पूरा हो, यह तो न सदा आवश्यक है।
जो हुआ, मील का है पत्थर, योगी बढ़ता आगे पथ पर।
अथ योगं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
कुछ होता है अनुकूल यहाँ, कुछ होता है प्रतिकूल यहाँ;
हम व्यर्थ पात से कंपते हैं, कुछ फूल यहाँ, कुछ शूल यहाँ।
लहरों को बनने-मिटने दो, भीतर चैतन्य न कंपने दो।
निष्कंपं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
जब भी तुम ठोकर खाते हो, प्रतिशोध छलककर आता है;
पर नहीं शिकायत हो मन में, तब ही जानना तथाता है।
जिसके दिल में न शिकायत है, वह दिल कुरान की आयत है।
अशिकायत शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
जो रहता अपनी मस्ती में, जिन्दगी बोध की गीता है;
निष्काम और निरअहंकार, जो धन्यवाद में जीता है।
वह बोधिसत्व है, वंदित है, उसका बुद्धत्व सुनिश्चित है।
संबोधिं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
अब गाओ गीत तथाता के, पांवों में घुंघरु बंधने दो;
नाचो हे नटनागर नटवर, बांसुरी शून्य की बजने दो।
स्वीकार भरा यदि जीवन है, हर गाँव-नगर वृन्दावन है।
कृष्णत्वं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
