- Sung by
- Ma Amrit Priya, Sw Dev Geet
- Album
- Dhyan Geeta (ध्यान गीता) (2003)
- Length
- 9:04
घर से बाहर सब निकल पड़े, कुछ मंदिर, कुछ मयखाने में।
धन के पीछे कुछ लोग लगे, कुछ पागल कुर्सी पाने में।
अब कौन भला समझाये इन्हें, घर का हीरा दिखलाए इन्हें।
अथ गेहं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
क्या होगा तीरथ जाने से, क्या होगा यज्ञ कराने से?
शास्त्रों को पढ़कर क्या होगा, क्या होगा गंग नहाने से?
मूरत, मस्जिद, देवालय में, क्या रखा कहो हिमालय में?
आत्मानं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
चुकता जाता है तेल, और जलती जाती तन की बाती।
रह जाती तब भी रात बहुत, जिन्दगी न खुद को पढ़ पाती।
इसके पहले कि दीप बुझे, खुद की किताब पढ़ ले पगले।
स्वाध्यायं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
जीवन को दाँव लगाने का, यदि नहीं हृदय में साहस है।
यदि नहीं ब्रह्म की प्यास जगी, विषयों में ही केवल रस है।
मृत्यु के क्षण पछताओगे, अतृप्त विदा हो जाओगे।
जागरणं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
माना तुमने भूगोल पढ़ा, माना तुमने इतिहास पढ़ा।
पर अपने जीवन में लिखा जो, क्या तुमने वह पाठ पढ़ा?
यदि नहीं तो फिर कुछ शरमाओ, कुछ गीत जिंदगी के गाओ।
स्वाध्यायं शरणं गच्छामि, भज ओशो शरणं गच्छामि।।
