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Questions in this Discourse
कोई व्यक्ति आपके पास किस तरह आए, किस तरह बैठे, सांस की गति कैसी रखे, आंखें खुली रखे या बंद? कभी लगता है कि आपकी ओर से आने वाली अदृश्य तरंगों को ग्रहण करने में कोई बाधा आ जाती है और वे तरंगें बाहर ही रह जाती हैं। उन्हें ग्रहण करने के योग्य कोई स्वयं को कैसे बनाए? कृपापूर्वक इस संबंध में हमें उपदेश दें।
पूछा है समाधि ने। प्रश्न महत्वपूर्ण है। सभी के काम का है।
मुझे तो ऐसे सुनना जैसे कोई पक्षियों के गीत को सुनता है--लेने को कुछ भी नहीं है। तब मिलेगा बहुत। तब अपरंपार मिलेगा। तब तुम भर जाओगे। लेने आए, खाली हाथ लौट जाओगे।
तुम्हारी तकलीफ भी मैं समझता हूं। क्योंकि जब मिलता है, तो लेने का मन पैदा होता है--और लेने का मन पैदा होता है। तुम्हारी अड़चन मुझे साफ है। ऐसा मत सोचना कि तुम्हारी अड़चन मेरे खयाल में नहीं है। जहां मिलता है, वहां मन होता है और ले लें। और लेने के कारण जो मिलने वाला था वह तो मिलेगा नहीं, जो मिलता था वह भी चूक जाएगा। तो सबसे बड़ी बात है, लोभ को छोड़कर आना।
मेरे साथ आनंदित होओ, मेरे उत्सव में सम्मिलित होओ, लेकिन उत्सव से कुछ लेने का भाव मन में रखो ही मत। लेने की भावना से ही संसार पैदा हो जाता है। वही तो वासना है। और वासना दुष्पूर है।
पहली बात, यहां ऐसे बैठो, खाली, न कुछ लेना, न कुछ देना। सुबह का सूरज निकला है, खाली तुमने उसके दर्शन किए, रात चांद ऊगा है, तुमने आंखें उठाकर आकाश में उसके सौंदर्य को देखा, लेना क्या है, ले क्या लोगे, लेने की वृत्ति की गुंजाइश कहां है? पक्षी गीत गा रहे, या कि जलप्रपात की मर्मर ध्वनि, या कि नदी की कलकल ध्वनि सुनायी पड़ रही है, लेने को क्या है? डूबने को कुछ है, लेने को कुछ भी नहीं है। ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर तुम मुट्ठी बांध लो। मुट्ठी बांधी कि चूके। मुट्ठी खुली रहे तो भर जाएगी।
धीरे-धीरे इस बात की तरफ अपने को राजी करो। तो यहां ऐसे बैठो--खाली, रिक्त, भविष्य की कोई चिंता नहीं, विचार नहीं; जो यहां घट रहा है, मेरी मौजूदगी में, सम्मिलित हो जाओ। तुम्हारी मौजूदगी और मेरी मौजूदगी मिल जाए, तो तरंगें प्रविष्ट हो जाएंगी। वे तुम्हारे अंतरतम तक को नचा देंगी। उल्लास पैदा होगा, अपूर्व प्रतीतियां होंगी।
मगर, जब मैं कह रहा हूं अपूर्व प्रतीतियां होंगी, तो सावधान! तुम्हारा मन कहीं यह न कहने लगे कि यही तो हम चाहते हैं। अपूर्व प्रतीतियां चाहिए। अनूठे अनुभव चाहिए। इसी के लिए तो आए हैं। फिर तुम चूके। यह बड़ी दुविधा की बात है। जीसस ने कहा है, जो बचाएगा, खो देगा; जो खो देगा, बचा लेगा। पहली बात।
दूसरी बात, यहां जब तुम बैठो तो शिथिल बैठो, शिथिलगात। तने हुए नहीं, अकड़े हुए नहीं। कहीं जा तो रहे नहीं हम, दौड़ने की तो कोई जरूरत नहीं है, इसलिए तैयार होने का कोई कारण नहीं है। शांत बैठें, शिथिल बैठें, डूब रहें, डुबकी लगा लें। विश्राम में बैठो।
आश्रम का अर्थ ही यही है कि जहां जाकर तुम विश्राम से बैठ सको। जहां व्यवसाय नहीं है, जहां आपाधापी नहीं है। यहां तुमसे मैं कुछ करने को नहीं कह रहा हूं कि तुम कुछ करो। सारी शिक्षा न करने की है, अक्रिया की है। करते तो तुम बहुत हो, कर-करके तो चूके हो। कर-करके तो सब नष्ट किया। जन्मों-जन्मों से कर रहे हो। यहां घड़ीभर जब मेरे पास होते हो तब कुछ मत करो। जैसे छोटे बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, ऐसे तुम बैठ जाओ। ये जो शब्द मैं तुमसे बोल रहा हूं, खिलौने हैं। इनसे खेल लो। भूल जाओ आगा-पीछा, शिथिलगात, हल्के, तने हुए नहीं। विद्यार्थी की तरह मत बैठो यहां, सीखने को यहां क्या है? यहां तो कुछ अनसीखा करना है, कुछ भूलना है। यहां कुछ विस्मरण करना है, याद नहीं करना है।
तो एक तो याद करने का ढंग होता है, तब आदमी तना बैठता है कि कोई बात चूक न जाए। यहां तो तुम बिलकुल शांत बैठो--हल्के, शिथिल, विश्राम में। एक विराम की दशा हो मन की। फिर उस विराम की दशा में आंखें खुली रहें तो ठीक, बंद हो जाएं तो ठीक। तुम कौन बीच में आंखें खोलने वाले या बंद करने वाले? तुमने अगर खोलकर रखीं तो तनाव हो जाएगा, तुमने अगर बंद कर लीं तो तनाव हो जाएगा। तुमने कुछ भी किया तो तनाव आ जाता है। कर्ता आया कि तनाव आया। आंखें बंद हो जाएं सुनते-सुनते कभी, तो बंद हो जाने दो। यहां तक भी कि कभी-कभी सुनते अगर झपकी लग जाए, तो लग जाने दो। क्योंकि अगर वही उपयोगी है तो वही होगा। कभी-कभी विश्राम की ऐसी दशा आ सकती है कि तुम तंद्रा में खो गए। लेकिन जो तुम होश में जागकर न पा सकते, वह तंद्रा में मिल जाएगा। शायद तुम्हारी नींद में ज्यादा सरलता से तरंगें प्रवेश कर जाएं, क्योंकि तुम द्वार पर पहरेदार की तरह बैठे न होओगे।
इसलिए तुम अपनी तरफ से नियंत्रण मत करो। आंख खुली तो ठीक, आंख बंद हो गयी तो ठीक, झपकी भी लग गयी तो भी ठीक। मैं तो बरस रहा हूं, तुम्हें झपकी भी लग गयी, कोई हर्जा नहीं। तुम और साधु-संन्यासियों के पास जाओगे तो वे कहेंगे कि झपकी, कभी भूलकर नहीं! जागे रहना, आंखें खुली रखना।
यहां मैं कुछ तुम्हें और ही सिखा रहा हूं। वह भिन्न है। यहां मैं तुम्हें विश्राम सिखा रहा हूं। अक्सर ऐसा हो जाएगा कि तना हुआ मन जब तुम ढीला छोड़ दोगे, तो कभी-कभी आंख भी बंद हो जाएगी। कभी-कभी आंख बंद करके जागे भी रहोगे, कभी-कभी आंख बंद करके सो भी जाओगे, कोई हर्जा नहीं। स्नान तुम्हारा तब भी होगा। कभी आंख खुल जाए तो ठीक, बंद हो जाए तो ठीक। सहज होने दो। स्व-स्फुरणा से चलने दो जीवन की धारा को।
एक घंटा, डेढ़ घंटा जब तुम मेरे पास हो, तब तो कम से कम तुम ऐसे सरल हो जाओ जैसा कि प्रकृति चाहती है कि तुम होओ। वृक्षों की भांति। हवा आयी तो वृक्ष को बाएं झुका गयी तो वृक्ष बाएं झुक जाता है, वह यह तो नहीं कहता कि मैं नहीं झुकूंगा। हवा आयी, दाएं झुका गयी, तो दाएं झुक जाता है। कुछ पत्ते गिर गए हवा के झोंके में तो गिर जाते हैं, वृक्ष रोक तो नहीं देता। ऐसे ही तुम हो जाओ। इधर झुकाऊं इधर झुक जाओ, उधर झुकाऊं उधर झुक जाओ।
यह तो शरीर की बात हुई, ऐसी ही स्थिति मन की भी हो।
जब मैं कुछ बोल रहा हूं, तो तुम भीतर यह मत सोचो कि ठीक कि गलत। यहां ठीक और गलत का हिसाब किसको है! तुम्हें कोई निर्णायक बनाकर बिठाया भी नहीं है, तुम कोई मेरी परीक्षा लेने आए भी नहीं। परीक्षा लेने आए तो तुम आए ही नहीं। तो तुम न आते तो अच्छा था, तुम नाहक अपना समय खराब कर रहे हो। और एक जगह रोक रखी है जहां कोई और होता तो शायद ज्यादा डूबता। ऐसा अनाचार न करो। यहां जो मैं कह रहा हूं, यह ठीक है या गलत है, इसके हिसाब में ही मत पड़ो। न तो यह ठीक है, न यह गलत है।
असल में जो मैं कह रहा हूं, वह तो प्रयोजन ही नहीं है। कहना तो सिर्फ बहाना है, ताकि तुम्हारा मन इस बहाने में उलझ जाए और मन इतना उलझ जाए कि तुम्हारे हृदय से मेरा सीधा मिलन होने लगे। जब मन बिलकुल उलझा होता है, तल्लीन होता है, तो हृदय के द्वार खुल जाते हैं। जब मन तल्लीन नहीं होता तो हृदय के द्वार पर खड़ा रहता है, संगीन लिए पहरेदार की तरह। वह हर कुछ भीतर नहीं जाने देता। वह डरा हुआ है। मन तो बहुत भयभीत है। हृदय बहुत साहसी है, मन बहुत कायर है। तो मन एक-एक चीज को जांचकर भीतर जाने देता है--कौन अपना, कौन अपना नहीं; कौन हमारे शास्त्र से बात मेल खाती है, कौन मेल नहीं खाती है; कौन सा सत्य जो हम अब तक मानते रहे हैं, उसके अनुकूल पड़ता है कि प्रतिकूल पड़ता है; मन तो ऐसे ही हिसाब-किताब लगाता रहता है। मन बड़ा हिसाबी-किताबी है।
अगर तुम इस हिसाब-किताब में पड़े तो समय तुमने व्यर्थ ही गंवा दिया। यह सत्संग है, यहां कोई चर्चा ही नहीं चल रही है--चर्चा तो ऊपर-ऊपर है। कुछ लोग हैं जो चर्चा सुनने आए हैं। ठीक है, वे चर्चा सुनकर चले जाएंगे। उन्होंने कचरा बटोरा। वे व्यर्थ को सम्हालकर ले गए। कुछ और हैं जो सत्संग को आए हैं। उन्हें इससे कुछ लेना-देना नहीं है कि मैं जो कह रहा हूं वह ठीक है कि गलत है, सुन रहे हैं। अगर तुम इतने निर्विचार से सुन सको, निष्पक्ष होकर सुन सको, निर्णायक न बनो, तो अचानक तुम पाओगे, जो सच है वह दिखायी पड़ता है कि सच है। जो सच नहीं है, वह दिखायी पड़ता है कि सच नहीं है। यह इतना स्पष्ट हो जाता है उस उजली दशा में, मन की उस उजियारी दशा में, जहां तुम विचार नहीं कर रहे, विचार का धुआं नहीं है, वहां यह बात इतनी साफ हो जाती है--सत्य सीधा दिखायी पड़ जाता है कि सत्य है, तुम्हें सोचना नहीं पड़ता कि है सत्य या नहीं। तुम सोचोगे भी कैसे? तुम्हें सत्य का कुछ पता है? तुम किस आधार पर सोचोगे?
मेरे पास जो लोग सोचते बैठे रहते हैं, वे चूक जाते हैं। कई दफा तो ऐसा हो जाता है कि वर्षों हो गए उन्हें मुझे सुनते, लेकिन वे चूकते चले जाते हैं, वे सोच रहे हैं। उन्होंने छोड़ा नहीं है मेरे साथ अपने को। उन्होंने मेरा हाथ हाथ में नहीं लिया है। कुछ तो ऐसे हैं कि संन्यास भी ले लिया है, तो भी मेरे हाथ में उनका हाथ नहीं है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि उनका हाथ तुम्हें मेरे हाथ में दिखायी पड़ता होगा, लेकिन उन्होंने अपना हाथ मेरे हाथ में छोड़ा नहीं है। अगर मौका उनको लगे कि कुछ गलत बात हो रही है तो अपना हाथ तत्क्षण खींच लेते हैं। मेरे हाथ में छोड़ा नहीं है, गलत और सही सब के संगी-साथी नहीं हैं, चुन-चुनकर, जो उन्हें ठीक लगता है। इसका मतलब हुआ, शिष्यत्व अभी पैदा नहीं हुआ। विद्यार्थी हैं, शिष्य नहीं हैं। सो ऐसे लोग तो चूकते चले जाएंगे।
तो समाधि को मैं कहूंगा कि इस भांति सुन कि तुझे कुछ निर्णय करने की जरूरत ही नहीं है। जहां निर्णय नहीं करना है, वहां चित्त शांत हो जाता है, द्वंद्व बंद हो जाता है। उस निर्द्वंद्व दशा में जो सत्य है सत्य जैसा दिखायी पड़ता है, जो असत्य है असत्य जैसा दिखायी पड़ता है, तुम्हें कुछ सोच-विचार नहीं करना पड़ता। वह दर्शन है। और जहां दर्शन है, वहीं क्रांति है।
शिथिलगात, बिना किसी लोभ के, बिना निर्णायक बने सुन सको तो समर्पण में सुना। और तब तुम्हारे जीवन में एक बड़े चकित कर देने वाले सत्य का अवतरण होगा कि सोच-विचार कर-करके जब इतना समय गंवाया तब सत्य दिखायी नहीं पड़ता था, अब बिना किसी बात को गंवाए, बिना किसी ऊर्जा को गंवाए सत्य दिखायी पड़ता है। आंख चाहिए सत्य को देखने के लिए। और आंख तभी होती है, जब तुम निर्मल हो।
तो हिंदू की तरह मत सुनो, मुसलमान की तरह मत सुनो, सिख की तरह मत सुनो, सिर्फ सुनो। और धीरे-धीरे तुम्हें यह भी दिखायी पड़ने लगेगा कि जो मैं कह रहा हूं, वह तो प्रयोजन नहीं है, प्रयोजन कुछ और है, कहना तो बहाना है। और जिस दिन तुम्हें मेरा प्रयोजन दिखायी पड़ने लगेगा--कुछ और, एक आदान-प्रदान है, ऊर्जा का ऊर्जा से, हृदय का हृदय से। जिस दिन उस आदान-प्रदान का सेतु तुम्हें स्पष्ट हो जाएगा, उस दिन तुम हंसोगे कि नाहक जो हम सुनते थे उसमें हमने इतना समय गंवाया; ठीक कि गलत, ऐसा क्यों कहा, वैसा क्यों कहा, वह तो प्रयोजन ही नहीं था।
छोटे बच्चों की किताबें देखीं, छोटे बच्चों की किताबों में रंगीन तस्वीरें रखनी पड़ती हैं, बड़ी-बड़ी तस्वीरें रखनी पड़ती हैं। आम, तो पूरा पृष्ठ आम की तस्वीर से भरना पड़ता है। क्योंकि बच्चा अभी आम की तस्वीर समझ सकता है, आम शब्द को तो अभी देर है समझने में। तस्वीर के बहाने आम को समझेगा। फिर जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होने लगेगा, आम की तस्वीर छोटी होने लगती है। फिर जैसे ही बच्चा बड़ा हो गया, पढ़ने में कुशल हो गया, आम की तस्वीर विदा हो गयी। पहले पढ़ता था, आ आम का, अब आम को छोड़ देगा, अब सीधा आ पढ़ लेगा; अब आ आम का है, ऐसा कहने की कोई जरूरत नहीं रही।
शब्द से बोलता हूं, क्योंकि तुम अभी छोटे बच्चों की भांति हो। अगर तुम प्रौढ़ हो गए, ध्यान में उतर गए, तो तुमसे निःशब्द बोलने लगूंगा। यहां दो तरह के लोग बैठे हैं। जो थोड़े ध्यान में गए हैं, उन्हें मेरे शब्दों को सुनने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ रही है। वे मुझे सुन रहे हैं, वे मेरे निःशब्द को सुन रहे हैं। उनसे मेरा नाता मौन का है। इसलिए तुम कभी-कभी चौंकोगे भी कि कोई इतना भावविभोर हो गया है, तुम उसके पास ही बैठे थे, तुम्हें कुछ भी न हुआ, बात क्या है! तुम कभी चौंकोगे कि कोई रो रहा है, आंख से आंसू बहे जा रहे हैं, और तुम्हारी आंख तो जरा भी गीली नहीं हुई। तुम्हें यह भी समझ में नहीं आता कि ऐसी तो कोई बात कही भी नहीं थी जिससे आंख गीली हो जाए!
असल में अलग-अलग बात चल रही है। उससे कुछ और बात चल रही है, तुमसे कुछ और बात चल रही है। तुमसे जो बात चल रही है उसमें आंखें गीली होतीं ही नहीं। उससे जो बात चल रही है, उसमें आंखें गीली होती हैं--उससे हार्दिक लेन-देन चल रहा है।
झेन संप्रदाय को जन्म देने वाले बोधिधर्म का प्रसिद्ध वचन है कि एक तो शास्त्र से दी जाती है बात, शब्द से दी जाती है; और एक ऐसी बात है जो शब्दातीत है, शास्त्रातीत है--असली वही है। एक तो ऐसी बात है जो कहकर कही जाती है और एक ऐसी बात है जो अनकहे कही जाती है।
अनकहा भी यहां घट रहा है। जब तक तुम उसे न सुन लो, तब तक मुझे सुना, इस तरह की भ्रांति अपने मन में लाना ही मत। तब तक तुम आम की तस्वीर देखते रहे, आम शब्द का पढ़ना तुम्हें न आया।
ये तो बहाने हैं। इसलिए रोज बोले चला जाता हूं। क्योंकि जो बोलना ही समझ सकते हैं, अभी उनसे बोलना ही पड़ेगा। धीरे-धीरे तुममें से जिनकी थोड़ी गहराई बढ़ती जाती है, वे चुपचाप अपने में लीन होते जाते हैं। उनको रस इस बात में है कि वे मेरी मौजूदगी में यहां बैठ लेते हैं। सुना, नहीं सुना, महत्वपूर्ण नहीं है। तब खूब सत्संग होगा।
और जब तुम सब तैयार हो जाओगे, तो मैं बोलना बंद कर दूंगा, तब मैं यहां चुपचाप आकर बैठ जाऊंगा और तुम डोलोगे, तुम नाचोगे। उसी की प्रतीक्षा है।
बोलना मुझे भी कष्टपूर्ण है। बोलने में मुझे कुछ रस नहीं है। क्योंकि जो मैं कहना चाहता हूं, वह कहा नहीं जा सकता; और जो मुझे कहना पड़ता है, वह मैं कभी कहना नहीं चाहता था। लेकिन प्रतीक्षा करता हूं कि धीरे-धीरे एक बड़ी जमात तैयार हो जाए। क्योंकि अगर अभी मैं बोलना बंद कर दूं तो थोड़े से ही लोगों के काम का रह जाऊंगा--बहुत थोड़े से लोगों के काम का--तो पहले जमात तो तैयार कर लूं जो कि अनबोले को समझ सकेगी। यह उसकी तैयारी चल रही है। जिस दिन पाऊंगा कि अब काफी लोग हो गए जो कि बिना बोले समझ सकते हैं, उसी दिन मैं चुप हो जाऊंगा। उसके पहले समझने की तैयारी कर लो, अन्यथा फिर तुम्हारे लिए कोई उपाय न रह जाएगा। जिस दिन मैं चुप हुआ, हुआ। उसके पहले तुम सीख लो चुप्पी को समझने का राज। तब तक जितना इस शब्द की तस्वीर का उपयोग कर सकते हो, कर लो, फिर मुझसे मत कहना कि आप तो चुप बैठ गए, हमें तो चुप्पी कुछ समझ में नहीं आती।
तुम सौभाग्यशाली हो, क्योंकि कुछ लोग तब आएंगे जब मैं चुप होकर बैठ जाऊंगा। तब उनको सिखाने को कुछ भी न होगा। तब अगर वे बैठ गए और सीख लिया तो सीख लिया! अभी तो मैं हाथ पकड़वा-पकड़वाकर लिखा रहा हूं। अभी हाथ पकड़-पकड़कर चला रहा हूं। तुम सौभाग्यशाली हो! इस सौभाग्य का पूरा उपयोग कर लेना उचित है।
आपकी बातों में कभी-कभी राजनीति की गंध क्यों मालूम होती है?
धर्म शब्द सुनकर तुम्हारे भीतर कुछ नहीं होता। परमात्मा शब्द सुनकर तुम्हारे भीतर कोई लहर पैदा नहीं होती। राजनीति शब्द सुनकर ही तुम्हारे भीतर तरंगें आ जाती हैं। उसमें तुम्हारा रस है। राजनीति शब्द सुनकर ही तुम तालियां पीटने लगते हो, उसमें तुम्हारा रस है। तुम उसे समझ पाते हो। वह तुम्हारी बुद्धि के भीतर है। वह तुम्हारी समझ के भीतर है। फिर उसकी तुम व्याख्या भी कर लेते हो। क्योंकि यह तो तुम मानोगे कि शायद धार्मिक तुम नहीं होओ, लेकिन राजनीति तो तुम भी काफी बघारते हो, काफी जानते हो, काफी बात करते हो--अखबार तो तुम भी पढ़ते ही हो न! चौबीस घंटे बात तो करते ही हो न! उसमें तो तुम बड़े कुशल हो। तो एक शब्द भी सुना कि तुम्हारे भीतर जल्दी से एक यात्रा शुरू हो जाती है। वह यात्रा तुम्हारी ही है, तुम उसे मुझ पर मत आरोपित करना।
कभी-कभी मैं जानकर राजनीति शब्द का और कभी-कभी जानकर राजनीति के संबंध में कुछ वक्तव्य भी दे देता हूं।
एक पागल आदमी एक पागलखाने के बाहर खिड़की के ऊपर बैठा हाथ में मछली पकड़ने की बंसी लिए है। आटा लगाकर कांटे में खिड़की से लटकाए हुए बैठा था। मुल्ला नसरुद्दीन वहां से निकला तो उसने मजाक में पूछा कि कितनी मछलियां पकड़ीं? उसने कहा, तुम्हें मिलाकर ग्यारह। मुल्ला ने पूछा, मतलब? उसने कहा, दस और पूछ चुके हैं। उस पागल ने कहा कि तुम भी भीतर क्यों नहीं आ जाते? यहां कहां मछली? तो मुल्ला ने कहा, फिर बैठे क्यों हो यह बंसी लिए हुए? तुमको पकड़ने के लिए, देख रहा हूं कितने नासमझ यहां से निकलते हैं!
कभी-कभी मैं चोट कर देता हूं। तत्क्षण मेरे हाथ में पकड़ में आ जाती हैं मछलियां कि किन-किन को चोट लगी? कौन-कौन बौखला गए? पत्र आने लगते हैं, प्रश्न आने लगते हैं कि आपने बहुत ऐसा कर दिया, ठीक नहीं किया।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर कव्वालियों का प्रोग्राम था। बड़े-बड़े नामी कव्वाल आए हुए थे। मेहमान कव्वालियों से झूम रहे थे। ऐसे में जब एक कव्वाल ने यह पंक्ति पढ़ी--खुदा जाने पर्दे में क्या हो रहा है, हर तरफ से वाह-वाह का शोर उठा। और बार-बार कव्वाल ने इस पंक्ति को दोहराया--खुदा जाने पर्दे में क्या हो रहा है, खुदा जाने पर्दे में क्या हो रहा है। मुल्ला नसरुद्दीन, जिसके घर यह आयोजन हो रहा था, बड़े गुस्से में भर गया--खुदा जाने पर्दे में क्या हो रहा है!--यह बदतमीज कव्वाल, इसको इतनी भी समझ नहीं है कि मैंने ही बुलाया और मेरी ही फजीहत करवा रहा है कि खुदा जाने पर्दे में क्या हो रहा है!
आखिर एक सीमा थी। और जब लोग फिर कहने लगे कि वाह-वाह, फिर से हो जाए, तो वह उठकर खड़ा हो गया। उसने कहा, ठहर, एक सीमा होती है बर्दाश्त की और शिष्टाचार की भी एक जरूरत है, एक आवश्यकता है। और जल्दी से मुल्ला उठा और उसने पर्दा उठाकर कहा कि देखिए, कव्वाल साहब! कोई हसरत न रह जाए कि पर्दे में क्या हो रहा है! पर्दे में कुछ नहीं हो रहा है, देख लीजिए, मेरी पत्नी छालियां कुतर रही है।
अपनी-अपनी समझ है। मुल्ला समझा कि शायद मेरी पत्नी के संबंध में कुछ कह रहा है कि पर्दे के भीतर पता नहीं क्या हो रहा है!
तुम्हारी समझ तुम्हारे जीवन में व्याख्याएं बनाती है। तुम मेरे पास भी हो, लेकिन मेरे पास हो थोड़े ही। तुम मुझे भी नहीं समझ पाते। मेरे पास वर्षों रहकर भी तुम यह नहीं समझ पाते कि मुझे राजनीति से क्या लेना-देना हो सकता है! लेकिन तुमने हाथ मेरे हाथ में तो छोड़ा नहीं है। तुम तो बैठे हो वहां सजग होकर कि कोई मौका मिल जाए, कोई बात जो तुम्हारी पकड़ में आ जाती हो आ जाए, तो तुम जल्दी से उस पर छलांग ले लेते हो। लाख तुमसे कहूं--ध्यान करो, तब तुम नहीं पूछते कि आप ध्यान की इतनी बातें क्यों करते हैं? कि आपकी बातों से ध्यान की गंध आती है! एक दफा भी आदमी ने नहीं पूछा अब तक कि आपकी बातों से ध्यान की गंध आती है। आएगी कहां, तुम्हारे भीतर हो तो ही आएगी न! लेकिन कभी इस दो-चार साल में कभी एकाध दफा राजनीति पर मैं कुछ कह देता हूं, कि तत्क्षण...आज न-मालूम कितने प्रश्न आ गए हैं।
स्वामी विष्णु चैतन्य भी पूछ लिए हैं, कि आपका मन राजनीति के प्रति पक्षपात से भरा हुआ है, पूर्वाग्रह से भरा हुआ है।
न तो पूर्वाग्रह का मतलब तुम्हें पता है, न तुम्हें अपने पूर्वाग्रहों का बोध है। एक बात तुमसे कहना चाहूंगा कि अगर तुम्हें मुझमें राजनीति की गंध आती हो, तो जितनी जल्दी यहां से भाग सको, भाग जाओ। क्योंकि राजनीति की जहां भी गंध आए, वहां रुकना मत। खतरनाक है यह बात। भाग ही जाओ। स्वामी विष्णु चैतन्य, जितनी जल्दी भाग सको यहां से भाग जाओ। क्योंकि जहां राजनीति की गंध है, वहां खतरा है। कहीं लग न जाए तुम्हें राजनीति की गंध। कहीं यह रोग तुम्हें पकड़ न जाए।
अपने को खोजने की थोड़ी कोशिश करो। कहां से यह गंध आ रही है? इतनी बार तुम्हें कहा हूं कि अपने को बीच में लाकर मुझे मत सुनो। मगर जब मैं धर्म की बात करता हूं तो तुम कभी ऐसे सवाल नहीं पूछते, क्योंकि वे तुम्हारी समझ में नहीं आते, वे तुम्हारे सिर के ऊपर से निकल जाते हैं। तुम्हारी समझ में वही बात आती है जो आ सकती है। तब तुम जल्दी से पकड़ लेते हो। और तुम्हारे भीतर बड़ा ऊहापोह मच जाता है कि अरे!
तुम्हें यह तो कभी खयाल में ही नहीं आता कि तुम किस तरह के शिष्य हो, तुम्हें यह तो कभी खयाल ही नहीं आता कि तुम्हारा शिष्यत्व अभी है ही नहीं, लेकिन तुम्हें यह खयाल जरूर आ जाता है कि यह गुरु तो राजनीति में पड़ा है! गुरु कैसा होना चाहिए, इसका तो तुम्हें पूरा-पूरा हिसाब है। शिष्य कैसा होना चाहिए, इसका तुम्हें कोई हिसाब नहीं है।
और तुम ध्यान रखना, मैं इस तरह की बातें कहता रहता हूं और कहता रहूंगा। यह मेरी महत्वपूर्ण विधियों में से एक विधि रही है। जब मैं कुछ लोगों से छुटकारा पाना चाहता हूं तो मैं कुछ उपाय करता हूं।
जब मेरे पास गांधीवादियों की एक जमात इकट्ठी हो गयी और मुझे लगा कि वह तो किसी मतलब की नहीं है, तो मैं गांधी की आलोचना किया। गांधी से मुझे कुछ लेना-देना नहीं था, मगर गांधी की आलोचना करते ही से नब्बे प्रतिशत गांधीवादी हट गए। जो दस प्रतिशत बचे, वे सच में ही काम के आदमी थे। उनका लगाव मुझसे था। मेरी सदा तलाश चल रही है कि जिसका लगाव मुझसे है, मैं उसी पर मेहनत करना चाहता हूं। बाकी पर मैं मेहनत नहीं करना चाहता।
जब गांधीवादी हट गए तो मैंने उनकी फिकर छोड़ दी। जब मैं गांधीवादी के विपरीत बोल रहा था और गांधी की आलोचना कर रहा था, स्वभावतः समाजवादी और कम्युनिस्ट, सब मेरे पास आ गए। उनको लगा, यह आदमी ठीक है। तब मैं समाजवाद के खिलाफ बोला, जब मैंने देखा कि बहुत समाजवादी इकट्ठे हो गए और उनकी मुझे कोई जरूरत नहीं है। समाजवाद के खिलाफ बोला, समाजवादी भाग गए। उनमें से कोई दस प्रतिशत बच रहे। जो बच रहे, वे मेरे थे। जो भाग गए, वे मेरे थे ही नहीं, उनकी भीड़ मैं इकट्ठी भी क्यों रखूं? वे आज नहीं कल भाग ही जाने वाले थे। वे किसी और ही कारण से आए थे। उनका कारण था कि मैं गांधी के खिलाफ बोला, उन्हें मुझमें कोई रस न था।
मेरी निरंतर चेष्टा है कि मैं उन पर ही मेहनत करूं, जिनको मुझमें रस है। मैं उन थोड़े से लोगों को दे देना चाहता हूं जो दिया जा सकता है। लेकिन यह उन्हीं को दिया जा सकता है, यह वसीयत उन्हीं की हो सकती है, जो पूरे-पूरे मेरे साथ हैं, जो सौ प्रतिशत मेरे साथ हैं। जो नरक भी मेरे साथ जाने को तैयार हैं, वही मेरे साथ स्वर्ग जाने के हकदार होंगे। जो बीच में खड़े हो गए और कहने लगे कि आप तो नर्क चले, हम नहीं जाते, तो इनको मैं स्वर्ग भी ले जाने वाला साथ नहीं हूं, ये मेरे साथ स्वर्ग भी जाने के हकदार नहीं हैं।
तो कभी मैं ऐसी बातें भी कहूंगा--कहता ही रहूंगा--कभी-कभी छांटने के लिए उपयोगी हैं। उन बातों में मुझे कुछ रस नहीं है। यह तो तुम बहुत बाद में समझ पाओगे--अगर कभी समझ पाए सौभाग्य से--कि मैं कभी कौन सी बात कहता हूं, क्यों कहता हूं? तुम अगर अपनी व्याख्याएं बीच में न लाओ तो बहुत आसानी होगी, तुम ज्यादा ढंग से समझ पाओगे। पूर्वाग्रह तुम्हारे हैं। पक्षपात तुम्हारे हैं। राजनीति तुम्हारे भीतर पड़ी है।
संन्यास-जीवन पर सांसारिक आकांक्षाओं और उससे उत्पन्न सफलताओं और असफलताओं का क्या प्रभाव होता है?
तुम्हारा प्रश्न है कि संसार की सफलताओं, असफलताओं, आकांक्षाओं और उनसे उत्पन्न उलझनों का संन्यास के ऊपर क्या प्रभाव होता है?
तुम संन्यास का अर्थ ही न समझे, संन्यास की व्याख्या ही न समझे। संन्यास की तो व्याख्या ही यही है कि अब कोई आकांक्षा न रही। इसका यह अर्थ नहीं है कि संन्यासी कुछ भी न करेगा। प्रभु जो करवाएगा, करेगा। लेकिन अपनी आकांक्षा से न करेगा, उसकी मर्जी से करेगा। फिर उसको जिताना हो तो जिता दे और हराना हो तो हरा दे। जीत भी उसकी और हार भी उसकी। सफलता भी उसकी, असफलता भी उसकी।
संन्यासी अपने को बीच से हटा लेता है, निमित्त मात्र हो जाता है। वह कहता है, जो तुम्हें करवाना हो, जैसा गीत मेरी बांसुरी से गाना हो, गा लो। मैं तो पोली बांस की पोंगरी हूं। तुम्हें सुंदर गीत गाना हो, सुंदर गीत गा लो। तुम्हें असुंदर गीत गाना हो, असुंदर गीत गा लो। मुझे क्या लेना-देना! मेरा काम इतना है कि तुम जो गाओ, उसे हो जाने दूं, उसे प्रविष्ट हो जाने दूं। जगत में तुम्हें मुझसे जो काम लेना हो, ले लो। ऐसी भावदशा को मैं संन्यास कहता हूं।
इसलिए संन्यासी करेगा तो बहुत, उससे होगा तो बहुत, लेकिन कर्ताभाव उसमें नहीं है। कर्ता तो एक ही है--परमात्मा। हमसे जो भी होता है, वही कर रहा है। और जब ऐसी भावदशा, तो उलझन कैसी? उलझन तो तब पैदा होती है, जब मुझे लगता है, मैं कर रहा हूं--जीतूंगा कि हारूंगा, पाऊंगा कि खोऊंगा; कहीं ऐसा करूं तो चूक न जाऊं, वैसा करूं तो कोई भूल न हो जाए! चिंता, उलझन तो इसलिए पैदा होती है कि मैंने कर्तृत्व का भाव अपने ऊपर लिया है।
कर्ता परमात्मा है तो मेरी क्या चिंता! किया, रात सो गए, सुबह उठे, फिर किया, रात फिर सो गए। संन्यासी के स्वप्न भी विदा हो जाते हैं। हो जाने चाहिए। क्योंकि चिंता कुछ है ही नहीं, जो करवाता है, कर लेते हैं। झोपड़ी में रखता है, झोपड़ी में रह लेते हैं। महल में रखता है तो महल में रह लेते हैं। सिंहासन पर बिठा देगा तो सिंहासन पर बैठ जाते हैं। उतार देगा तो उतर जाते हैं। न अपनी मर्जी से आए, न अपनी मर्जी से जाते हैं। ऐसी भावदशा को मैं संन्यास कहता हूं।
नहीं कर सकता पथभ्रष्ट आत्मदीप चिनगारी को
महकते चंदन का मादक स्पर्श
फिर कितनी ही मादक आकांक्षाएं तुम्हें चारों तरफ बवंडर बनाकर घेरे रहें, और कितनी ही उलझनें तुम्हारे चारों तरफ खड़ी रहें, तुम उनके बाहर ही होते हो। भीतर होकर भी बाहर होते हो। संसार में होकर भी संसार में न होना संन्यास है।
नहीं गंदला पाती प्रतिबिंबों की भीड़
दर्पण का पानी
कितने लोग निकल जाते हैं दर्पण के सामने से, इससे कुछ दर्पण का पानी थोड़े ही गंदला हो जाता है! ऐसा संन्यासी है, दर्पण की भांति जीता है। सफलता आयी, असफलता आयी, सुख आया, दुख आया, सम्मान, अपमान, सब गुजर जाता है। और संन्यासी के दर्पण का पानी स्वच्छ का स्वच्छ, जैसा का तैसा। कबीर ने कहा, जस का तस। जैसा था, ठीक वैसा। जरा भी फर्क नहीं पड़ता। भीड़ नहीं थी तब वैसा था, भीड़ चली गयी तब वैसा है। खाली का खाली।
धूप ही चांदनी है
बदल दिए हैं माध्यम ने गुणधर्म
तुमने कभी खयाल किया, रात जिसको तुम चांदनी कहते हो, कितनी शीतल, कैसी मादक! लेकिन है वही धूप का रूप, जिसको तुम भरी दोपहरी में धूप कहते हो और बाहर निकलने में डरते हो और धूप के नीचे खड़े होने में जलते हो, वही है चांदनी भी। फर्क कुछ भी नहीं है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि चांद सूरज की रोशनी को पीता और रात उंडेल लेता।
धूप ही चांदनी है
बदल दिए हैं माध्यम ने गुणधर्म
चांद से प्रतिफलित होकर धूप ही जब रात को आती है, तो शीतल हो जाती है। वही जलाती है, वही घाव भर देती है। यही वासनाएं, यही आकांक्षाएं, यही चिंताएं, ध्यान के माध्यम से इनका गुणधर्म बदल जाता है।
तुम्हारे लिए सफलता तुम्हारी है, इसलिए परेशान हो रहे हो। ध्यानी को तो पता चलता है, मैं हूं ही नहीं, खालीपन हूं एक, सफलता किसकी, असफलता किसकी! सफलता होती है और बेचैन नहीं कर पाती। असफलता होती है और बेचैन नहीं कर पाती। न तो सफलता उन्मत्त कर देती है कि पागल बना दे, कि मैं देखो सफल हो गया। और न असफलता पागल करती है कि देखो मैं हार गया, अभिशाप से भर गया। हार-जीत दोनों आते हैं और गुजर जाते हैं।
धूप ही चांदनी है
बदल दिए हैं माध्यम ने गुणधर्म
थोड़ा सा फर्क पड़ा है संसारी और संन्यासी में। संसारी यानी बिना ध्यान का व्यक्ति, और संन्यासी: संसारी+ध्यान। बस इतना फर्क पड़ा है, थोड़ा ध्यान जुड़ गया। इसलिए तो ध्यान पर मेरा इतना जोर है। और किसी चीज पर जोर नहीं है। तुमसे और तो कुछ करने को कहा भी नहीं है। घर छोड़ो, दुकान छोड़ो, बाजार छोड़ो, कुछ भी नहीं कहा है। क्योंकि मैं जानता हूं, अगर ध्यान आ जाए, उतना गुणधर्म तुम्हारा बदल जाए, उतना माध्यम नया हो जाए, सब बदल जाएगा--दुकान पर बैठे-बैठे तुम मंदिर में हो जाओगे। और अभी तो तुम मंदिर में भी बैठ जाओ जाकर तो भी दुकान ही चलती है।
तो इसे खयाल रखो, संन्यास का अर्थ है: अप्रभावित होने की कला। अछूते रहने की कला। क्वांरे रहने की कला।
कबीर ने कहा है--खूब जतन से ओढ़ी रे चदरिया, वह जतन संन्यास है। ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं रे चदरिया। जैसा जीवन मिला था, उसे वैसा का वैसा रख दिया--ऐसे जतन से ओढ़ा। जतन शब्द बड़ा प्यारा है। होशपूर्वक ओढ़ा, बोधपूर्वक ओढ़ा। मूर्च्छा में नहीं जीए, जागकर जीए।
संन्यास क्या वे ही लोग लेते हैं जिन्हें जीवन की व्यर्थता का बोध हो गया?
तुम भी खूब अदभुत प्रश्न पूछ रहे हो, ‘संन्यास क्या वे ही लोग लेते हैं जिन्हें जीवन की व्यर्थता का बोध हो गया है?’
जिनको अभी जीवन में आशा है, वे तो लेंगे क्यों! यह तो सीधी-सीधी बात है।
एक कारीगर बड़ी देर से घंटाघर की घड़ी की मरम्मत कर रहा था। जब वह घड़ी ठीक कर चुका, तो पसीने से लथपथ सीढ़ी से नीचे उतरा। मुल्ला नसरुद्दीन, जो बड़ी देर से राह पर खड़ा-खड़ा इस आदमी को देख रहा था, पूछा उस आदमी से, क्यों भाई, क्या घड़ी खराब हो गयी थी? यह सुनकर कारीगर झुंझला उठा, मगर बड़ी शांति से बोला, जी नहीं, असल में मेरी आंखें कमजोर हैं इसलिए वक्त देखने के लिए ऊपर चढ़ा था।
अब सीधी-सादी बात है। एक आदमी घंटाघर की घड़ी घंटेभर से देख रहा है, कुछ कर रहा है, अब इसमें पूछना क्या है? कि क्यों भाई, घड़ी क्या बिगड़ गयी थी? उसने ठीक ही जवाब दिया कि नहीं, जरा आंखें खराब हो गयी हैं, सो सीढ़ी लगाकर घंटेभर से देखने की कोशिश कर रहा था कि कितने बजे हैं।
संन्यास का अर्थ ही इतना है कि जहां हमें कल तक आशा थी, वहां आशा न रही। यह एक रूपांतरण है। जहां-जहां हमने सोचा था सुख है, वहां सुख नहीं है। धन में सोचा, पद में सोचा, प्रतिष्ठा में सोचा, मोह में, मद-मत्सर में सोचा, नहीं है। नहीं है, तब भी तो एक जीवन होगा। संसार में सुख नहीं है, तब एक नए जीवन की शुरुआत होती है--सुख भीतर है, सुख स्वयं में है, सुख आंतरिक संपदा है, स्वभाव है।
कृपापूर्वक समझाएं कि ज्ञान मिलने पर आनंद मिलता है या आनंद मिलने से ज्ञान मिलता है?
एक गांव में मैं मेहमान था। गांव के दो बूढ़े रात मुझे मिलने आए, दोनों पड़ोसी। और उन्होंने कहा, हम आपकी बड़ी प्रतीक्षा कर रहे थे। आप आ गए, सो अच्छा हुआ, एक प्रश्न का हल कर दें, तीस साल से हम झगड़ रहे हैं। उनमें एक जैन था और एक हिंदू। और हम झगड़ रहे हैं इस पर कि ईश्वर ने दुनिया बनायी या नहीं बनायी? अब जैन कहता है कि नहीं बनायी, ईश्वर है ही नहीं, बनाने वाला कोई है ही नहीं, सृष्टि सदा से चलती रही। और हिंदू कहता, ऐसा कैसे हो सकता है कि बिना बनाए कोई चीज हो जाए! ऐसा कहीं होता है! घड़ी है तो घड़ी बनाने वाला है। और घड़ा है तो घड़ा बनाने वाला है। बनाने वाला तो होना ही चाहिए। और हिंदू कहता है कि ईश्वर ने बनायी। चाहे ईश्वर दिखायी न पड़े, लेकिन कर्ता का स्पष्ट लक्षण है। सब जगह छाप है। और हम तीस साल से झगड़ रहे हैं, इसका कोई हल नहीं होता।
मैंने उनसे पूछा कि समझ लो कि इसका हल हो जाए, फिर क्या करोगे? समझ लो कि यह बात पक्की हो गयी कि ईश्वर ने बनाया है, फिर तुम क्या करने वाले हो? उन्होंने कहा, करने को क्या है? या यह तय हो जाए कि ईश्वर ने नहीं बनाया है, तो क्या करोगे? तुम्हारे जीवन में इससे कौन सी क्रांति होगी? जिस बात से कोई क्रांति होने वाली नहीं है, उस पर समय क्यों खराब करते हो? इस तरह की फिजूल की बातें खुजली को खुजलाने जैसी हैं। नाहक समय खराब होता है, और दर्द और बढ़ जाएगा--वह जो मिठास लगती है थोड़ा सा खुजलाने में, वह महंगी है। सौदा महंगा है।
बुद्ध के पास जब भी कोई आता और प्रश्न पूछता तो वह पहली बात यही पूछते, इस प्रश्न के उत्तर से तुझे क्या होगा, यह तू पहले बता! नहीं तो मेरा समय खराब न कर और अपना समय खराब न कर। इस प्रश्न के उत्तर से तुझे क्या होगा? क्या मोक्ष मिलेगा, आनंद मिलेगा, मुक्ति मिलेगी, दुख से छुटकारा होगा, दुख-निरोध होगा, इस प्रश्न के उत्तर से तुझे क्या होगा?
अगर कोई कहता कि नहीं, सिर्फ कुतूहलवश पूछते हैं, कि ईश्वर के कितने हाथ हैं, हजार हाथ हैं? अब नौ सौ निन्यानबे हों तो तुम्हारा क्या बिगड़ता है! और एक हजार एक हुए तो तुम्हारा क्या जाता है! कितने चेहरे हैं, तीन हैं कि नहीं; कितने रूप हैं, लोग न मालूम कितनी व्यर्थ की बातों में समय खराब कर रहे हैं! और ऐसे ही नहीं खराब कर रहे हैं, उसके पीछे कुछ कारण हैं।
इन व्यर्थ की बातों में उलझकर वे सार्थक से बचते रहे हैं। यह सार्थक से पलायन है। यह सुविधा है तुम्हारी। तुम व्यर्थ की बातों में उलझा लेते हो अपने को और सोचते हो कि बड़ी महत्वपूर्ण चिंतना में लगे हो। और पूरे समय जब तुम इस व्यर्थ की बात में समय खो रहे हो, महत्वपूर्ण पड़ा है किनारे पर, जिसका तुमने ध्यान किया होता तो जीवन में क्रांति घट जाती।
अब पूछते हो, ‘समझाएं कृपापूर्वक कि ज्ञान मिलने पर आनंद मिलता है, या आनंद मिलने से ज्ञान मिलता है?’
ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अब तुम अगर मुझसे पूछो कि सिक्के का सीधा पहलू पहले मिलता है कि उलटा पहलू पहले मिलता है? पहले का और पीछे का सवाल ही नहीं उठता, दोनों पहलू साथ ही तुम्हारे हाथ में आते हैं।
अगर मैं तुमको एक रुपया दूंगा तो ऐसा थोड़े ही है कि पहले एक पहलू दूंगा और फिर दूसरा पहलू दूंगा! ज्यादा से ज्यादा इतना हो सकता है कि एक पहलू ऊपर हो, एक पहलू नीचे हो, इतना हो सकता है। कि सीधा सिक्का ऊपर से दिखायी पड़ता हो, पीठ पीछे की तरफ हो, यह हो सकता है। मगर तुम्हारी हथेली में तो दोनों साथ ही साथ पड़ेंगे न!
और इतना ही फर्क है। भक्त पहले आनंद को पाता है, फिर उसे ज्ञान का पता चलता है। आनंद का पहलू ऊपर होता है भक्त के लिए और ज्ञान का पहलू नीचे। और ज्ञानी के लिए ज्ञान का पहलू ऊपर होता है, आनंद का पहलू नीचे। तो ज्ञानी पहले ज्ञान पाता है। ज्ञानी पहले ध्यान में जाता है, तब एक दिन अचानक पाता है कि अरे, ध्यान तो मिला ही मिला, इसके ही उलटे में आनंद भी मिल गया है। और भक्त पहले आनंद में रसलीन होता है, डूबता है मस्ती में, एक दिन अचानक पाता है आश्चर्य से चकित होकर कि मैं तो आनंद में डूब रहा था, डुबकी लगाते-लगाते यह ज्ञान मेरे हाथ कहां से आ गया! दोनों चौंकते हैं।
ज्ञान और आनंद अलग-अलग नहीं हैं।
मैं अब तक शास्त्रों में उलझा रहा, अब आपकी बात जंचती है कि शास्त्रों में कुछ भी नहीं है। संन्यास के लिए सोच-विचार करता हूं, दो साल ऐसे ही बीत गए। लेकिन सोचता हूं कि जब तक सौ फीसदी मन राजी न हो जाए, तब तक संन्यास लेना ठीक भी नहीं है। आप क्या कहते हैं?
मुल्ला नसरुद्दीन अपने मित्र से आधे घंटे से फोन पर बात कर रहा था। पत्नी मेज पर खाना लिए इंतजार कर रही थी। जब बहुत देर हो गयी तो परेशान होकर बोली, बस भी करो, बहुत हो गयी, बहुत बात हो गयी! मुल्ला नसरुद्दीन ने माउथपीस पर हाथ रखते हुए कहा, डिस्टर्ब मत कर, बाधा मत डाल, पता है कितने विद्वान आदमी से बात कर रहा हूं--जिनकी आधी जिंदगी शोध करते हुए बीती। तो उसकी पत्नी ने चिल्लाकर कहा, तो क्या बाकी आधी जिंदगी फोन पर बात करते रहने का इरादा है? वह आधी ही खराब हुई, अब आधी तो और खराब न करो। और भोजन ठंडा हो जाएगा। आधी जिंदगी अगर फोन करने का इरादा है।
संन्यास का भाव ही कहीं ठंडा न हो जाए! भोजन कहीं ठंडा न हो जाए। जब भाव गर्म हो, तब छलांग लेनी चाहिए। क्योंकि गर्म भोजन ही पचता है। ठंडा भोजन जहर हो जाता है। और ठंडा ही नहीं यह तो बहुत बासा हो जाएगा, दो साल तो तुम्हें हो ही गए सोचते। अब क्या इरादा है, कब तक सोचोगे? सोचना क्या है?
तुम्हारी तकलीफ मेरे खयाल में है, तुम सोच रहे हो कि जब पूरा मन राजी हो जाएगा सौ प्रतिशत, तब लेंगे। लेकिन जिंदगी में तुमने कभी पाया कि मन किसी भी चीज के लिए सौ प्रतिशत राजी होता हो? किसी भी चीज के लिए। यह मन का ढंग ही नहीं है। यह मन का स्वभाव ही नहीं है कि वह सौ प्रतिशत राजी हो जाए। अगर मन सौ प्रतिशत राजी हो जाए तो मन तो अद्वैत हो गया फिर।
मन का तो स्वभाव द्वैत है, दुई। मन तो हर चीज में दो भाव पैदा करता है, करूं न करूं; यहां जाऊं, वहां जाऊं; ऐसा करूं, वैसा करूं? मन तो एक साथ ही विपरीत बातें सोचता है। मन कभी भी द्वंद्व के बाहर तो होता ही नहीं। तुम तो सौ प्रतिशत की आशा कर रहे हो, जो बुद्धों को नहीं हुआ, वह तुम सोच रहे हो तुम कर लोगे! वह कभी हुआ ही नहीं, वह हो ही नहीं सकता। मन का स्वभाव चीजों को दो में तोड़ देने का है, द्वैत में तोड़ देने का है।
इसलिए तुमने कभी कोई छोटी-मोटी बात भी करके देखी जिसमें मन सौ प्रतिशत राजी हो? यह साड़ी पहनूं कि यह, और मन इसमें ही झंझट में पड़ जाता है। इस सिनेमा को देखने जाऊं या उस सिनेमा को, मन उसमें ही द्वंद्व में पड़ जाता है। इस स्त्री से विवाह करूं कि उस स्त्री से, और मन उसी में द्वंद्व में पड़ जाता है।
द्वंद्व तो मन की आदत है। द्वंद्व के द्वारा ही तो मन जीता है। द्वंद्व तो मन का भोजन है, उसकी पुष्टि है। इसीलिए तो मन से जीने वाला आदमी कभी निर्द्वंद्व नहीं हो पाता। कुछ भी करो, पछतावा रहता है। इस स्त्री से शादी करो तो पछतावा है, क्योंकि पीछे मन में सोच आने लगता है कि दूसरी से कर लिया होता तो अच्छा होता, यह कहां उपद्रव में पड़ गए! दूसरी से करते तो भी यही होता, यही पश्चात्ताप। मन की मानकर तो जो भी करोगे, पश्चात्ताप होगा। क्योंकि मन का आधा हिस्सा तो इनकार ही कर रहा था कि करो मत, ऐसा करो मत। जब कर लोगे तो वह आधा हिस्सा बदला लेगा, वह कहेगा--अब कहो, फंसे! पहले ही समझाया था, मान लेते तो अच्छा था, न माना, अब भुगतो!
दुबारा इस मन की मानकर देख लेना, और तुम पाओगे कि यह भी भुगतवा देता है। और दुनिया इसी तरह चलती है, दुनिया में इसी तरह हिसाब चलता है। दुनिया में इसी तरह आदमी एक से ऊब जाता है, दूसरे को पकड़ लेता है, दूसरे से ऊब जाता है, इसको पकड़ लेता है। ऐसा बदलता रहता है, लेकिन एक सत्य को नहीं देख पाता कि यह मन सदा द्वंद्व में है। इसलिए द्वंद्व के कारण कभी भी शांति तो हो न सकेगी। सौ प्रतिशत तो मन कभी होता नहीं।
तो मैं तुमसे इतना ही कह देना चाहता हूं कि अगर इक्यावन प्रतिशत मन संन्यास लेना चाहता है तो ले लो। इक्यावन प्रतिशत, मैं कहता हूं, अगर मन लेना चाहता हो तो ले लो। क्योंकि कब यह जो इक्यावन प्रतिशत है यह गिरकर उनचास प्रतिशत हो जाए, कहा नहीं जा सकता। रोज बदलती है मन की हवा। यह तो बाजार-भाव है। आज अच्छी बात लगी मेरी कोई, मन हो गया संन्यास ले लें, आज किसी संन्यासी को मगनभाव देखा, मन हुआ संन्यास ले लें। कल किसी संन्यासी को उदास देखा, मन हो गया छोड़ो भी, कहां की झंझट में पड़े थे! यह आदमी संन्यासी होकर भी उदास है, तो हमको भी क्या मिलने वाला है!
मन तो ऐसे बदलता रहता है। यह मन में जो मात्राएं हैं, ये ठहरी हुई कभी नहीं रहतीं। ये मन की जो मात्राएं हैं, बड़ी राजनीतिक हैं, ये तो पार्लियामेंट के सदस्य समझो। किस पार्टी में कब चले जाएंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता। बाबू जी अभी यहां, बाबू जी अभी गये! बहुत कठिन है। यह तो डांवाडोल होता ही रहता है। यह पार्टी बदलने की आदत मन की बड़ी प्राचीन है।
तो जब शुभ करने का मन आए तो कर लेना। बुद्धपुरुष कहते रहे हैं सदा से कि जब शुभ करने का मन हो तो देर मत करना, और जब अशुभ करने का मन हो तो जरा देर करना। हम उलटा करते रहे हैं सदा से। जब शुभ करने का मन होता है, हम बैठकर विचार करते हैं, और जब अशुभ करने का मन होता है तब हम एक क्षण विचार नहीं करते, तत्क्षण करते हैं। तुमने कभी सोचा कि जब क्रोध करने का विचार उठता है, जब सौ प्रतिशत क्रोध होगा तब करेंगे। नहीं, इतनी कहां फुरसत! अभी किसी ने गाली दी है, अभी क्रोध न करोगे, तो कल तक तो ठंडा हो जाएगा, फिर क्या मतलब! ताजा-ताजा हो गया तो हो गया।
बुद्धपुरुष कहते हैं, बुरे को करना हो तो थोड़ा रुक जाना, सोच लेना, क्योंकि अगर सोचने के लिए रुके तो बुरा कभी तुमसे होगा नहीं। तुम भले के साथ यह तरकीब लगाते हो। दान करना हो तो तुम कहते हो, जरा सोच तो लें, घर जाकर पत्नी-बच्चों से बात कर लें और रात जरा सो जाएं मन में विचार रखकर, सुबह सोचकर फिर ठीक से...सुबह तक तुम बदल जाओगे। दान करना हो तो कर देना। गाली देना हो तो जरा रुक जाना, पत्नी-बच्चों से पूछ लेना, रात सो जाना, सुबह प्रार्थना करके फिर विचार कर लेना, फिर न माने मन तो कर लेना, गाली दे देना। लेकिन तुम सदा पाओगे, अगर जरा रुक गए तो जिस चीज में रुक गए वही रुक जाती है--भले में, या बुरे में।
संन्यास में अगर रुके तो रुक गए। तो इतनी ही जांच-पड़ताल कर लो--यह मैं नहीं कहता हूं कि तुम्हारा तीस प्रतिशत मन कहता हो, संन्यास ले लो; और सत्तर प्रतिशत कहता हो कि न लो, तो मैं नहीं कहता कि लो। क्योंकि फिर यह सत्तर प्रतिशत तो अभी से विरोध में खड़ा है, खतरे तो आने ही वाले हैं। सत्तर प्रतिशत मन कहता हो कि संन्यास ले लो, तो भी झंझटें आएंगी, लेने के बाद आएंगी, क्योंकि वह तीस प्रतिशत बदला लेगा। लेकिन उससे सुलझा जा सकता है। लेकिन अगर तीस प्रतिशत मन कहता है, ले लो; और सत्तर कहता है, मत लो; तो मत लेना, कभी मत लेना, ऐसी भूल कभी मत करना। क्योंकि इतनी छोटी अल्पमतीय मात्रा से टिक न पाओगे, यह बह जाएगी।
तो इतना ही सोच लो--सौ प्रतिशत की प्रतीक्षा मत करो--इक्यावन प्रतिशत अगर मन कहता है, तो ले लो। और एक बात और खयाल में रख लेना, जब इक्यावन प्रतिशत मन कहता है संन्यास लो और उनचास प्रतिशत मन कहता है मत लो, तो अगर तुम रुके तो तुम उनचास प्रतिशत की मानकर रुक रहे हो। तो तुम अल्पमत की मानकर रुक रहे हो। और अल्पमत की मानकर रुक जाना घातक है। सौभाग्य से ऐसा क्षण आता है कि शुभ करने की प्रबल आकांक्षा पैदा होती है। कभी-कभी ऐसी ऊंचाई होती है।
तो अगर सच में ही भाव उठा--सौ प्रतिशत नहीं कह रहा हूं--सच में ही भाव उठा, भीतर एक आंदोलन चल रहा है, तो उसे ठंडा मत करो।
खयाल रहे, शुभ करके पछताना अच्छा--कम से कम शुभ हुआ तो। अशुभ न करके पछताना अच्छा--कम से कम अशुभ टला तो। किसी ने राह पर गाली दी और तुमने गाली का उत्तर गाली से न दिया, पीछे तुम पछताए कि दे दिया होता उत्तर तो अच्छा था--यह बेहतर। अशुभ न करके पछताना बेहतर। तुमने किसी को दान दे दिया, फिर पीछे पछताए। शुभ करके पछताना बेहतर। हो तो गया।
ऐसे ही अभ्यास बढ़ते-बढ़ते, बढ़ते-बढ़ते, शुभ की मात्रा तुम्हारे भीतर घनी होती जाएगी। इसको रत्ती-रत्ती उठाना पड़ता है। क्योंकि जन्मों-जन्मों से अशुभ का अभ्यास है। अशुभ की तो बड़ी पुरानी परंपरा है और शुभ की कोई परंपरा नहीं है। शुभ तो नयी कोंपल है और अशुभ तो पुराना पत्थर है। शुभ को जिताना है, तो सारी ऊर्जा जिस प्रकार से बन सके, शुभ की तरफ बहने दो, जब बन सके तब बहने दो, जितना जल शुभ की धारा में पड़ सके पड़ने दो, और अशुभ से जितने बच सको बचो। एक दिन क्रांति घट जाती है--तुम्हारे जीवन की अधिक धारा शुभ की तरफ बहने लगती है।
यही तो बुद्ध ने कहा, बुरे को जागकर देखना, करना मत, भले को जागकर देखना और करना और चित्त को रोज-रोज शुद्ध करते जाना।
आपने कहा कि गुलाब के सिंहासन पर अब नागफनी विराजमान हो गयी है। ऐसा क्यों हुआ?
गुलाब से ऊब गए लोग, नागफनी को रख लिया। अब नागफनी से ऊब जाएंगे और गुलाब को रख लेंगे। इसलिए तो दुनिया के बड़े-बड़े देशों में दो राजनैतिक पार्टियां होती हैं। हो ही जाती हैं अंततः दो राजनैतिक पार्टियां--ज्यादा देर तक ज्यादा पार्टियां टिक नहीं सकती हैं--क्योंकि दो के साथ मन का खेल सुविधा से चलता है। एक से ऊब गए, पांच साल एक को ताकत में रख लिया, उससे ऊब गए, दूसरी पार्टी आ गयी ताकत में। पांच साल में वह तुम्हें उबा देगी, फिर पहली पार्टी आ गयी ताकत में। आदमी ऊबता रहता है, बदलता रहता है।
इस ऊब को समझना।
एक लड़का अपने कुत्ते का इलाज कराने पशु-चिकित्सालय ले गया। डाक्टर ने नाम पूछा, तो उसने जवाब दिया--टोनी। कुत्ते का नहीं, डाक्टर ने कहा, तुम्हारा नाम पूछ रहा हूं। अपना ही बता रहा हूं, डाक्टर साहब, कुत्ते का नाम तो मुन्ना है।
बदल गयी दुनिया। पहले बच्चों का नाम मुन्ना हुआ करता था, अब बच्चे टोनी हो गए। पहले कुत्ते का नाम टोनी हुआ करता था, अब कुत्ते मुन्नालाल हो गए। बदलाहट होती रहती है। आदमी का मन ऐसा करता रहता है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक नवाब के घर नौकर था। नवाब का बहुत चहेता था। एक दिन नवाब के साथ भोजन करने बैठा था--अक्सर नवाब के साथ भोजन करता। भिंडी बनी थी। तो नवाब ने पूछा कि मुल्ला, भिंडी के संबंध में क्या कहते हो, बहुत बढ़िया बनी है और मुझे बहुत पसंद है। मुल्ला ने कहा, अजी साहब, भिंडी का क्या कहना! शास्त्रों में इसका तो ऐसा वर्णन है, वनस्पति-शास्त्र इसकी प्रशंसा से भरा पड़ा है! भिंडी तो जैसे आप नवाबों में नवाब, ऐसे भिंडी सब्जियों में सब्जी। यह तो सिरमौर है, शिरोमणि।
रसोइए ने भी सुन लिया कि जब ऐसी शिरोमणि है तो उसने दूसरे दिन भी भिंडी बना दी। तीसरे दिन भी भिंडी बना दी। चौथे दिन भी भिंडी बना दी। पांचवें दिन तो नवाब चिल्लाया कि तेरा दिमाग खराब हो गया है? क्या मुझे मार डालेगा? भिंडी, भिंडी, भिंडी। मुल्ला तुम क्या कहते हो? मुल्ला ने कहा, साहब, जहर है भिंडी। यह तो आदमी को मारने का उपाय है। यह रसोइया आपकी जान लेना चाहता है, और मेरी भी ले लेगा आपके साथ।
नवाब ने कहा, अरे नसरुद्दीन, पहले तो तुम कहते थे यह भिंडी सिरमौर है, सब्जियों में सब्जी, जैसे नवाबों में नवाब, अब तुम एकदम जहर कहने लगे! मुल्ला ने कहा, हुजूर, मैं आपका नौकर हूं, भिंडी का नौकर नहीं। मैं आपकी सेवा करता हूं, कोई भिंडी से मुझे क्या लेना-देना! अरे, आपने कहा ठीक, तो हमने कहा ठीक। हम तो जी हुजूर हैं! जो हुकुम! अब आप जब नाराज हो गए तो हम नाराज हो गए।
पांच दिन भिंडी खाओगे तो ऊब जाओगे। बदलाहट चाहिए। मन बदलाहट मांगता है, क्योंकि मन बदलाहट है। शाश्वत चेतना है। जो चैतन्य से जुड़ेगा, वह धीरे-धीरे शाश्वत से जुड़ जाएगा। इसलिए मैंने तुमसे कहा, गुरु तक को बदलने का मन होने लगता है। दो-चार साल एक गुरु के पास, तुम देखते हो, लोग बदलते रहते हैं गुरु।
यहां मेरे पास लोग आते रहते हैं, जो लोग आते हैं, अक्सर ऐसे ही होते हैं--कोई महर्षि महेश योगी के पास रहा, कोई कृष्णमूर्ति के पास रहा, कोई प्रभुपाद के पास रहा, कोई कहीं, कोई कहीं, और कुछ तो ऐसे आते हैं जो सभी के पास रह चुके हैं। उनको मैं जानता हूं कि वे यात्री हैं, वे यहां भी कुछ दिन रहेंगे और अपना फिर कहीं चले जाएंगे। उन पर कुछ ज्यादा भरोसा करने का सवाल नहीं है। वे चले जा रहे हैं एक जगह से दूसरी जगह!
एक और संबंध है, जो मन का नहीं। अगर तुम्हारा प्रेम मन का है, तो तुम पत्नियां बदलोगे, पति बदलोगे--वही तो पश्चिम में हो रहा है। अगर तुम्हारा प्रेम हार्दिक है, आत्मिक है, तो बदलाहट का कोई सवाल ही नहीं है। अगर तुम्हारी श्रद्धा भी मन की है तो बदलोगे--आज यह गुरु कल वह गुरु। लेकिन अगर श्रद्धा हार्दिक है, आत्मिक है, तो बात खतम हो गयी।
मन की इस प्रक्रिया को समझना। मन के साथ कुछ भी चीज ज्यादा देर नहीं ठहर सकती है। और अगर तुम किसी भी चीज के साथ ज्यादा देर ठहर जाओ, तो लाभ होगा, क्योंकि मन गिरेगा। अगर तुम किसी चीज के साथ ज्यादा देर ठहर जाओ तो मन का गिरना निश्चित है। क्योंकि मन पहले पूरी कोशिश करेगा कि हटो, हटो, बदलो, कहीं और चलो, कुछ और देखो, अब यहीं-यहीं क्या रखा है? अगर तुम रुके ही रहे, रुके ही रहे, रुके ही रहे, तब मन थककर गिर जाएगा। और जहां मन गिर जाता है, वहां समाधि है।
इसलिए सभी धर्मों ने इस तरह की प्रक्रियाएं खोजी हैं जिनसे मन थक जाए। संन्यासी देखते हैं? आपको मैंने कहा कि गेरुवा वस्त्र। मुझसे लोग पूछते हैं कि आपको और रंगों से कोई एतराज है?
एतराज मुझे किसी रंग से नहीं है, लेकिन कोई एक रंग चुनना ही था, ताकि एक रंग तुम्हारे मन को थका डाले। ऊबोगे तुम--रोज-रोज गेरुवा, रोज-रोज गेरुवा! तो उसमें से भी लोग तरकीब निकाल लेते हैं--गेरुवे में भी कई रंग तो होते ही हैं--तो वे तरकीब निकाल लेते हैं, थोड़ा फीका, थोड़ा गहरा, थोड़ा ऐसा, थोड़ा वैसा, थोड़ा ज्यादा लाल, थोड़ा कम लाल, वे तरकीब निकाल लेते हैं। फिर साड़ियां इकट्ठी हो जाती हैं। उसमें से तरकीब निकाल ली कि यह ठीक है, कोई बात नहीं, कभी यह पहन लेंगे, कभी ऐसा पहन लेंगे।
तरकीब असल में यह है कि वस्त्र को अगर तुमने एक ही रंग स्वीकार कर लिया, तो धीरे-धीरे वस्त्र की चाह ही भूल जाएगी, वस्त्र का खयाल ही मिट जाएगा। जिनको ऐसा हुआ है, उन्होंने मुझसे आकर कहा भी है कि एक आश्चर्य की बात घटी है कि बाजार हम पहले जाते थे--खासकर स्त्रियों को--कि पहले हम बाजार जाते थे तो हर दुकान पर कौन सी साड़ी नयी, एकदम दिखायी पड़ती थी, अब नहीं दिखायी पड़ती। अब गुजर जाते हैं, कपड़े की दुकान ही नहीं दिखायी पड़ती! लेना-देना क्या है, जब अपना एक ही कपड़ा है तो बात खतम हो गयी।
अगर कपड़ा एक ही रंग का पहना...जैनों ने, बौद्धों ने, हिंदुओं ने, सूफियों ने, ईसाइयों ने, सभी ने एक रंग चुन लिया था अपने फकीरों के लिए, क्योंकि उस एक रंग के कारण मन की जो रंग-रंग बदलने की आदत है, उसको तोड़ने में सहायता मिलती है। फिर सभी ने एक ढंग चुन लिया था अपने संन्यासी के लिए कि सुबह पांच बजे उठना, फिर रोज पांच बजे उठना। तो धीरे-धीरे पांच कि छह कि सात, ऐसा कोई विकल्प ही नहीं रहा। धीरे-धीरे एक घड़ी आती है कि विकल्प रह ही नहीं जाता, चुपचाप सहज उठ आते पांच बजे, सोच-विचार का कोई उपाय न रहा। रोज रात इतने बजे सो जाना, तो उतने बजे सो जाते। धीरे-धीरे विकल्प मिट जाता है। एक निश्चित भोजन करना है, वह भोजन कर लेते, शरीर की पूर्ति हो गयी, मन को खिलवाड़ का मौका न रहा। भोजन, वस्त्र, निद्रा, उठना, बैठना, चलना, धीरे-धीरे सब एक सीमा में, मर्यादा में आ जाता है।
इस मर्यादा को ध्यान रखना, यह शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है। जब सब चीजें एक सीमा में और मर्यादा में आ जाती हैं तो मन को उछल-कूद करने की जगह नहीं रह जाती--मर्यादा सिकुड़ती जाती है, सिकुड़ती जाती है और एक दिन मर्यादा मन की फांसी बन जाती है। मर्यादा कस जाती मन के ऊपर और मन मर जाता है। और मन के मरते ही तुम्हारे भीतर जो जागता है, वही तुम हो--तत्वमसि--वही तुम्हारा स्वभाव है।
तुम पूछते हो, ‘गुलाब के सिंहासन पर अब नागफनी विराजमान हो गयी, ऐसा क्यों हुआ?’
आदमी के मन के कारण, तुम्हारे मन के कारण। फिर नागफनी उतरेगी, सदा नहीं विराजी रहेगी; फिर गुलाब आएगा, देर-अबेर। तुम फैशन देखते हो, ऐसे ही चलता रोज। एक चीज फैशन में थी, फिर एकदम चली जाती। दो-चार-दस साल बाद फिर वापस। दो-चार-दस साल के लिए बिलकुल फैशन के बाहर हो जाती है। जो उसका उपयोग करे, वह समझ में आता है कि दकियानूस। देखा, कुछ दिन पहले स्त्रियां नथनी पहनती थीं, वह चली गयी फैशन के बाहर। फिर जो नथनी पहने, वह दकियानूस, गंवार, गांव की, अकल नहीं, आधुनिकता का कुछ पता नहीं। फिर नथनी लौटने लगी। अब नाक भी नहीं छिदी है तो ऊपर से जबरदस्ती नथनी चिपकाए हुए हैं। वह फिर फैशन में आने लगी। कान नंगे हो गए थे, फिर चीजें लटकने लगीं, वही चीजें--लाओगे भी कहां से बार-बार।
अगर तुम आदमी का पूरा इतिहास देखो तो आदमी उन्हीं बातों को हजारों बार कर चुका है। बार-बार नया लाओगे भी कहां से!
इस देश की बड़ी पुरानी कहावत है कि सूरज के तले कुछ भी नया नहीं। हो भी नहीं सकता। सब फैशन हो चुके हैं। आदमी जो आज कर रहा है, सब कर चुका है। बहुत बार कर चुका है। फिर भूल जाता है। दस-पांच साल में विस्मरण हो जाता है, फिर फैशन वापस आ गयी। फिर लगती है नयी। नयी कुछ भी नहीं है। फिर खो जाएगी, फिर लौट आएगी। ऐसा चलता रहता।
इसे खयाल में लेना और इससे सावधान होना। इस तरह आदमी का मनोरंजन होता रहता है। जीवन-क्रांति तो नहीं होती, मनोरंजन होता है।
मुल्ला नसरुद्दीन को रात में नींद न आने की बीमारी थी। तंग आकर डाक्टर के पास पहुंचा। डाक्टर ने सोच-समझकर नुस्खा लिखा--कहा कि जिस रात नींद न आ रही हो, तो आप हर घंटे के बाद शराब का एक पैग पी लें। हालांकि यह कोई इलाज नहीं, इससे आप सो भी नहीं सकेंगे, लेकिन कम से कम आपका जागना मनोरंजन में बदल जाएगा।
यह जिंदगी दुखभरी है। कपड़े बदलो, कार बदलो, मकान बदलो, पत्नी, पति बदलो, बदलते रहो, इससे कुछ होगा नहीं। इससे कुछ आनंद न मिलेगा। लेकिन कम से कम यह जो उदासी है, थोड़े मनोरंजन में बदल जाएगी, थोड़ी पुलक रहेगी। एक कार से दूसरी कार घर लाने के बीच थोड़ी सी पुलक रहती है, घंटे-दो घंटे, दिन-दो दिन पुलक-पुलक मालूम होती है, फिर ठंडी हो जाती है। फिर बदल लेना।
अमरीका में लोग हर वर्ष कार बदल लेते हैं। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि पिछले वर्ष की कार ज्यादा मजबूत थी, वह बेचकर और कमजोर कार ले आते हैं। मगर फिर भी बदल लेते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है, तुमने देखा होगा कि एक आदमी अपनी नौकरानी के प्रेम में पड़ गया--सुंदर पत्नी है, सारा पड़ोस उसकी पत्नी के लिए दीवाना है और वे अपनी नौकरानी के पीछे दीवाने हो गए हैं। और तुम सिर ठोंक लेते हो कि इस आदमी को हुआ क्या है, एक साधारण सी नौकरानी, काली-कलूटी, उसके पीछे पागल हुआ जा रहा है। इसकी पत्नी इतनी सुंदर, इसको हुआ क्या है!
तुमको समझ में नहीं आ रहा--भिंडी, भिंडी, भिंडी...क्या करोगे! वह बदशकल औरत भी सुंदर दिखायी पड़ने लगती है। भिंडी, भिंडी, भिंडी...करेला तक आदमी खाने को राजी हो जाता है कि चलो कम से कम बदलाहट तो होगी!
इस मन से थोड़े सावधान होना। यह मन तुम्हें भटकाता रहा है। और मन अपना शिकंजा तुम पर छोड़ता नहीं, क्योंकि तुम इसकी बदलाहटों को मान लेते हो। यह कहता है कि अच्छा ठीक, यह स्त्री नहीं जंच रही है अब, तो कोई स्त्रियां दुनिया में कम हैं। दुनिया पड़ी है, तू क्यों परेशान हो रहा है! यह स्त्री पहले ही से गड़बड़ थी, मैंने पहले ही कहा था--आधा मन तो पहले ही से कह रहा था--और मैंने पहले ही कहा था। इसलिए मन को एक बड़ी सुविधाहै कि मैंने पहले ही कहा था, वह हमेशा कह सकता है। और अब तो सिद्ध हो गया, अब बदल ले। लोग धंधा बदल लेते हैं, काम बदल लेते हैं, गांव बदल लेते हैं, बदलते चले जाते हैं। इस तरह मनोरंजन होता रहता है और जीवन नष्ट होता चला जाता है।
मनोरंजन से सावधान! मनोरंजन घातक है। मनोरंजन नहीं करना है, मनोघात करना है। मनोनाश करना है। मन को जड़मूल से उखाड़ देना है। तो ही तुम आनंद को उपलब्ध हो सकोगे।
भीतर है अंध कुआं
बाहर है सिर्फ धुआं
रमे कहां मेरा मन
दूरागत ध्वनियों की
गूंज सुनी जाती है
निशि के रीतेपन में
अनदेखे सपनों की
छायाएं पड़ती हैं
झीलों के दर्पण में
झूठे यह सभी वहम
जर्जर संपूर्ण अहम्
भ्रमे कहां मेरा मन
धुंधलायी सड़कों पर
कुम्हलाए चेहरे हैं
शाम की उदासी है
घिरती अंधियारी के
धूल भरे जूड़े में
गुथा फूल बासी है
दृश्य सभी उजड़े हैं
रंग सभी उखड़े हैं
जमे कहां मेरा मन
अंजुरी में भरे हुए
पूजा के पानी-सा
समय बहा जा रहा
मुझे कुछ कहना था
नहीं कहा जा रहा
दीवारें-छतें ढहीं
बुनियादें कांप रहीं
थमे कहां मेरा मन
मन थमता ही नहीं। असल में मन की दीवारें कांपती ही रहती हैं। मन कंपन का नाम है। जो तुम्हारे भीतर कंप रहा है, वही मन है। और जो तुम्हारे भीतर अकंप है, वही आत्मा है। इसलिए सारा योग, सारे धर्म, सारी ध्यान की विधियां एक ही बात कहती हैं--अकंप हो जाओ, कंपो मत। लहरों को शांत करो, लहराओ मत, लहर-शून्य हो जाओ। और यह मन तो रोज नयी लहरें उठाता है। पढ़ लिया अखबार में एक विज्ञापन और दीवाने हो गए कि अब यह खरीदना ही पड़ेगा। अब बिना खरीदे नहीं रहा जा सकता। देख ली किसी के पास कोई चीज, तुम्हें भी खरीदनी पड़ेगी। ऐसे तुम अपने को छितराए चले जाते हो। समेटो।
न नागफनी से कुछ मिलने को है, न गुलाब से कुछ मिलने को है। नागफनी नागफनी है, गुलाब गुलाब है। किसी को सिंहासन पर रखने की कोई जरूरत नहीं, नागफनी को अपनी जगह रहने दो, गुलाब को अपनी जगह रहने दो। तुम्हारा सिंहासन खाली हो, तो खाली सिंहासन पर परमात्मा आ जाए। रिक्त सिंहासन, शून्य सिंहासन परमात्मा के लिए आने का द्वार बन जाता है। शून्य सिंहासन, कुछ मत बिठाओ तुम्हारे सिंहासन पर, तो परमात्मा बैठेगा। नागफनी बिठा लो कि गुलाब, कुछ फर्क नहीं पड़ता। नागफनी-गुलाब की साजिश है। जब गुलाब ऊपर होता है, नागफनी उसका विरोध करती है। जब नागफनी ऊपर हो जाती है, गुलाब उसका विरोध करेगा। उन दोनों की साजिश है। उन दोनों ने आपस में बंटवारा किया है।
मैंने सुना, एक रात एक आदमी को दो आदमियों ने आकर नमस्कार किया। अंधेरी रात थी, रास्ता सन्नाटा था, दोनों आदमियों ने एकदम झुककर नमस्कार किया और कहा, महानुभाव, क्या आपके पास एक पैसे का सिक्का होगा? उस आदमी ने कहा कि इस अंधेरी रात में और एक पैसे के सिक्के का क्या करना है? उन्होंने कहा, नहीं, कुछ जरा सा काम है। असल में हम दोनों में झगड़ा हो रहा है, वह कुछ तय करना है। उसने पूछा, तय क्या करना है? तो उन्होंने कहा, मामला यह है कि कौन तुम्हारी घड़ी रखेगा और कौन तुम्हारा पाकेट रखेगा, इस पर हम लोगों को तय करना है, तो सिक्का पास में नहीं है। तो सिक्के को हम फेंककर उलट-पुलटकर लेंगे, अभी तय हो जाएगा। सिक्का दो।
इसी को लूटना है! यही तय करना है कि कौन इसका मनीबैग रखेगा और कौन इसकी घड़ी रखेगा। अब यह तय नहीं हो पा रहा, इसी से सिक्का मांग रहे हैं! मगर यही चल रहा है। नागफनी समझा रही है गुलाब के खिलाफ, गुलाब समझा रहा नागफनी के खिलाफ, तुम्हीं को। दोनों का इरादा तुम्हारी छाती पर बैठने का है। दोनों के बीच साजिश है। झगड़ा यही है कि कौन तुम्हारा मालिक हो। और कोई झगड़ा नहीं है, और तो दोस्ती है।
जिस दिन तुम यह समझोगे कि सारा झगड़ा संसार में एक ही चल रहा है कि कौन तुम्हारा मालिक हो, उस दिन तुम सारी मालकियत के बीच से बाहर हट जाओगे। इसमें तुम्हारा कोई भी हित नहीं है। धन तुम्हारी मालकियत करे कि पद तुम्हारी मालकियत करे, कि कौन तुम्हारी छाती पर बैठे, इससे क्या फर्क पड़ता है, तुम तो दबे ही रहोगे। तुम जिस दिन किसी को छाती पर नहीं बिठाते, न हिंदू को, न मुसलमान को, न वेद को, न कुरान को, न बाइबिल को, तुम सब उतारकर रख देते हो, तुम कहते हो, मैं सूना रहूंगा। उस सूने में ही उतरता है पूर्ण।
कभी-कभी मेरे दिल में यह खयाल आता है, जैसे आपको बनाया गया हो मेरे लिए आप अब से पहले सितारों में बस रहे थे कहीं, आपको जमीं पर बुलाया गया हो मेरे लिए
‘कभी-कभी मेरे दिल में यह खयाल आता है,
जैसे आपको बनाया गया हो मेरे लिए’
खयाल भर में मत उलझे रहना, खयाल धोखा दे जाएगा। तो फिर मैं जो कह रहा हूं, उसको जीवन में उतार लो, तो मैं जिस तरफ इशारा कर रहा हूं, उस तरफ चल पड़ो, तो प्रमाण होगा, तो सबूत होगा। अपनी कविता के लिए तुम्हें प्रमाण जुटाने होंगे। तुम्हें सबूत देना होगा।
‘आप अब से पहले सितारों में बस रहे थे कहीं,
आपको जमीं पर बुलाया गया हो मेरे लिए’
मैं तो यहीं था, लेकिन कुछ मेरे भीतर आया है जो सितारों में बस रहा था, वह तुम्हारे भीतर भी आ सकता है। तुम भी माध्यम बन सकते हो उसके। बनना ही चाहिए, तो ही प्रफुल्लता होगी, तो ही तुम्हारे जीवन में उत्सव होगा, संगीत होगा, नृत्य होगा। जो सितारों में बसा है, वह तुम्हारे प्राणों के लिए ही है, उतरने को आतुर है, तुम जगह खाली करो, तुम जरा अहंकार को हटाओ, तुम द्वार खोलो।
ऐसा अगर लगा है, सच में लगा है, कविता ही नहीं, तो फिर मेरी सुनो। सुनो ही नहीं, गुनो भी।
धरा पुकारने लगी
गगन पुकारने लगा--
उठो मनुष्य,
चेतना का स्वन पुकारने लगा!
नए दिवस के आदि में
निशा का अंत हो गया
हंसी विभा
समस्त सृष्टि में वसंत हो गया
गली-गली खिले सुमन
यहां चमन, वहां चमन
फबन धरा की देख लो
गगन पुकारने लगा--
उठो मनुष्य,
चेतना का स्वन पुकारने लगा!
हरे-भरे सुरंग भरे
असंख्य स्वप्न को जुटा
पड़े रहे हो सेज पर
अमोल जिंदगी लुटा
स्वप्न तो नहीं स्वजन
कुव्यंग व्यंग का छलन
लुटे गए बहुत
उठो, सृजन पुकारने लगा--
उठो मनुष्य,
चेतना का स्वन पुकारने लगा!
कि दागदार जिंदगी की
मांग अब संवर रही
अभी उठेगी पालकी
कि ढोलकी उभर रही
पायलों का रुनुन-झुनुन--
पिया मिलन, पिया मिलन
उठो बरात देख लो
सगुन पुकारने लगा
धरा पुकारने लगी
गगन पुकारने लगा--
उठो मनुष्य,
चेतना का स्वन पुकारने लगा!
तो सुनो, गुनो, मेरी पुकार सुनो, तो ही प्रमाण होगा कि मैं तुम्हारे लिए हूं। कहने से नहीं कुछ होगा, कुछ करना होगा। कृत्य से सबूत जुटाना होगा, साक्षी बनना होगा। अन्यथा कविताएं कभी-कभी खूब झुठला जाती हैं। अच्छे-अच्छे गीत कभी-कभी बहुत भुला जाते हैं। अच्छे-अच्छे शब्दों का जाल कभी-कभी सपने बनकर तुम्हें खूब भटका देता है। प्रीतिकर है तुमने जो कहा, मगर और भी प्र्रीतिकर हो जाएगा अगर तुम वैसा कर भी सको।
उठो!
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Does bliss come from knowledge, or does knowledge come from bliss?
According to Osho, the question of which comes first is futile; bliss and knowledge are inseparable, two sides of the same coin. Depending on your path, devotion reveals bliss first and knowledge follows; inquiry/meditation reveals knowledge first and bliss follows. Seek the essential: transformative experience, not speculative debate.
In simple terms: Bliss and knowing arrive together; whether you start with love or with meditation, the other naturally appears.
What effect do worldly ambitions have on the life of sannyas?
According to Osho, worldly ambitions have no hold on a true sannyasin: sannyas is equanimity beyond success and failure, joy and sorrow. The sannyasin drops personal doership and becomes a hollow reed for the Divine; victories and defeats are His. Ambition’s entanglements dissolve, like reflections that cannot muddy a mirror. Through meditation, the same energies transform, leaving one in the world yet untouched by it.
In simple terms: Ambitions don’t shake a sannyasin because they stop saying “I do” and peacefully let the Divine work through them, whatever happens.
Is sannyas taken only by those who have become aware of the futility of life?
According to Osho, sannyas is embraced only by those who have seen through the futility of worldly pursuits—recognizing that running, accumulating, status and attachments yield hollowness. When outer hopes collapse, a transformation happens: one turns from seeking in the world to discovering the source of joy within. Sannyas means this insight and the commitment to live from inner wealth, one’s very nature.
In simple terms: Yes—when you see that chasing things outside won’t make you happy, you start looking inside; that turn is sannyas.
What happens when the mind agrees to take sannyas?
According to Osho, if you wait for the mind to agree to sannyas, it will never happen. The mind’s nature is conflict and duality; it never agrees one hundred percent and keeps shifting like politics or market prices. Act while the inner feeling is hot; even a fifty‑one percent yes is enough—otherwise hesitation turns the opportunity cold and poisoned.
In simple terms: Don’t wait for perfect certainty—jump when you mostly feel yes, before the moment goes cold.
Why do some talks carry the smell of politics?
According to Osho, talks only smell of politics because that odor already lives in the listener. We hear what our conditioning craves and project our inner assumptions onto words. He sometimes mentions politics deliberately to reveal where attachment and prejudice hide. The invitation is to drop projections, trust the process, and return to meditation and awareness rather than reactive interpretation.
In simple terms: If you smell politics in a talk, it’s because your own mind is full of it—you notice what you already carry.
What does the symbolism of the rose and cactus represent?
According to Osho, the rose and the cactus symbolize the mind’s restless swing between opposites—trading one fashion for another out of boredom and hunger for sensation. We tire of the rose, install the cactus, then reverse. This oscillation drives political alternation, changing partners or gurus. Only heartful steadiness dissolves mind’s fickleness, revealing timeless consciousness.
In simple terms: It means our mind gets bored and keeps swapping the rose for the cactus, but if we stop chasing new things and stick with one, the mind calms and peace appears.
