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Questions in this Discourse
आपने कल ऐसा आदेश क्यों दिया कि संबोधि-दिवस के नृत्य में केवल संन्यासी ही भाग लेंगे? औरों को भाग लेने से क्यों रोक दिया?
तो धीरे-धीरे तो मैं उनके लिए ही रहूंगा, जो डूबे हैं। डूबोगे तो ही मेरे साथ चल सकोगे। भीड़-भाड़ में मुझे रस नहीं है। मैं कोई राजनेता नहीं हूं कि भीड़-भाड़ में मेरी उत्सुकता हो। मेरी उत्सुकता उन थोड़े से लोगों में है जो सच में ही खोजने को तत्पर हैं। और कुछ दांव पर लगाने की भी हिम्मत रखते हैं।
संन्यासी का क्या अर्थ होता है? जिसने कुछ दांव पर लगाया। तुम दांव पर तो कुछ भी नहीं लगाना चाहते हो, पाना तुम सब चाहते हो। ऐसी होशियारी से काम न चलेगा।
तो धीरे-धीरे और तरह से भी संन्यासी में ही मैं उत्सुक रह जाऊंगा। क्योंकि संन्यासी का अर्थ इतना है कि वह मेरे साथ डूबने को तैयार है। ले जाऊं अंधेरे में तो अंधेरे में जाने को तैयार है। संन्यासी का अर्थ है, उसे मुझ पर भरोसा आया।
गैर-संन्यासी संन्यासियों की तरंग में थोड़ी सी बाधा डालता है। इसलिए नाचने से मना कर दिया। गैर-संन्यासी नाचते हुए संन्यासियों के बीच में उनकी भाव-समाधि में बाधा बनता है। क्योंकि वह तो उतना खुला नहीं, वह तो बंद है। जो संन्यास लेने की हिम्मत नहीं कर सका, वह नाच भी सकेगा? और जो नाच सकता है, उसे संन्यास लेने में अड़चन क्या होगी? ये दोनों ही पागलपन के काम हैं।
तो इसके पीछे एक सरणी है। अब मैं चाहूंगा कि यहां एक तरंग हो। इस तरंग में जो लोग जीने को राजी हैं, वे ही उसमें डूबें। जो नहीं हैं राजी, उनके लिए बोलता रहूंगा, ताकि आज नहीं कल वे राजी हो जाएं। तो बोलने के लिए मैं तैयार हूं गैर-संन्यासी से भी। लेकिन धीरे-धीरे जो गहरे तल की बातें हैं, जो भीतर घटती हैं, उनके लिए संन्यासी के अतिरिक्त दूसरे के लिए उपाय नहीं होगा।
मुझे फर्क करने ही होंगे। नहीं तो तुम्हें तो कुछ लाभ नहीं होता है, संन्यासी को नुकसान होता है। तुम सोचते हो, पूछने वाले ने इसीलिए पूछा है कि जैसे उसको कुछ हानि हुई। उसको कुछ हानि नहीं होने वाली। तुम्हारे पास कुछ है नहीं, हानि क्या होगी! तकलीफ तुम्हें सिर्फ यही हुई होगी कि कोई बात ऐसी थी जिसमें तुम्हें प्रवेश का अधिकार न मिला। तुम्हारे अहंकार को चोट लगी होगी। इस अहंकार को लेकर तुम सम्मिलित भी हो जाते तो तुम्हारे कारण केवल एक व्याघात पैदा होता। तुम बेसुरे होते। तुम उन पागलों की भीड़ में समझदार होते। तुम एक पत्थर की तरह होते उस धारा में। तुम्हारे कारण धारा को बहने में सहायता न मिलती, बाधा पड़ती।
तुम्हारा कुछ नहीं खोया है। हां, अगर तुम सम्मिलित होते तो जो संन्यासी नाच रहे थे, उनका कुछ खो जाता। नाचकर वे मेरे साथ किसी गहरी छंदोबद्धता में गिर रहे थे। उसका तुम्हें पता भी नहीं है। इसलिए जिनको हुआ, वही जानते हैं। जिनको नहीं हुआ, उनको तो बाहर से ऐसा लगा कि संन्यासियों को नाचने मिला, हमें नाचने न मिला। तुम्हारे नाचने की आकांक्षा बलवती नहीं है, अन्यथा तुम संन्यासी होने की हिम्मत करोगे, तुम कहोगे कि ठीक है, अगर नाचना है तो यह शर्त भी स्वीकार करेंगे। अगर तुमने कुछ खोया है, तो तुम संन्यास की हिम्मत जुटाओगे। क्योंकि तुम दुबारा वैसा न खोना चाहोगे।
लेकिन नहीं, तुम्हें कुछ अड़चन दूसरी है। तुम्हारी अड़चन यह है कि तुम्हारे साथ कुछ पक्षपात किया गया। तुम्हारे अहंकार को कुछ बाधा पड़ी है। तुम्हें क्यों न नाचने दिया गया! तुम्हारी पात्रता में कौन सी कमी है! कमी है। साहस की कमी है। हिम्मत की कमी है। तुम सत्य को मुफ्त पाना चाहते हो। तुम सत्य को वैसे ही पाना चाहते हो जैसे तुम हो। तुम कुछ भी बदलने को तैयार नहीं हो। तुम दो कदम बढ़ने को तैयार नहीं हो। और मैं तुमसे कहता हूं, कि तुम एक कदम चलो तो परमात्मा हजार कदम तुम्हारी तरफ चलता है। लेकिन तुम एक कदम भी चलने को राजी नहीं हो। हालत तो और भी उलटी है। हालत तो ऐसी है कि परमात्मा अगर तुम्हारी तरफ चले तो तुम पीछे हट जाओगे।
एक मजिस्ट्रेट के सामने एक आदमी को पकड़कर लाया गया। क्योंकि वह कार चला रहा था और कोई साठ-सत्तर मील की रफ्तार से जा रहा था, जहां कि बीस मील की रफ्तार से जाने की ही आज्ञा थी, उससे ऊपर नहीं। उस आदमी ने कहा कि सिपाही गलत कह रहा है, ज्यादा से ज्यादा मैं पैंतीस-चालीस की रफ्तार से जा रहा था। मजिस्ट्रेट ने कहा, वह भी ज्यादा है, दुगुनी तो वह भी है। दंड तो उसमें भी होगा, क्योंकि बीस की आज्ञा है, तुम चालीस से जा रहे थे।
लेकिन उसकी बगल में जो दूसरा आदमी बैठा था कार में, उसने कहा कि क्षमा करिए, जहां तक मैं समझता हूं, रफ्तार बीस-पच्चीस से ज्यादा नहीं थी। और उसकी पत्नी ने, जो पीछे बैठी थी, उसने कहा कि मैं भलीभांति जानती हूं कि मेरे पति दस-पंद्रह से ज्यादा की रफ्तार से चलाते ही नहीं।
इसके पहले कि चौथा आदमी जो कि पीछे की सीट पर बैठा था, वह बोले, मजिस्ट्रेट ने कहा, रुको। कहीं ऐसा न हो कि तुम यह कहने लगो कि यह आदमी गाड़ी को पीछे की तरफ ले जा रहा था। अब रुक जाओ, बस! क्योंकि तुम धीरे-धीरे पैंतालीस, चालीस, पच्चीस, पंद्रह पर आ गए, अब कहीं ऐसा न करना कि तुम पीछे गाड़ी को ले जा रहे थे, यह कहने लगो।
परमात्मा तुम्हारी तरफ आए, तो तुमने कभी पूछा है, तुम कहीं गाड़ी को पीछे की तरफ तो न ले जाने लगोगे? तुम हिम्मत से खड़े रहोगे अपनी जगह पर? तुम अपने हाथ आलिंगन के लिए फैलाओगे? क्योंकि मैं जानता हूं, इसलिए ऐसा कह रहा हूं। बहुतों को मैं जानता हूं जिनके पास मैं गया हूं और वे पीछे हट गए हैं। इसलिए कह रहा हूं।
तो अब कृपा करके मुझे उन पर काम करने दो जो पीछे नहीं हटेंगे, जिनका मुझे भरोसा है। और अगर मैं जाऊंगा उनकी तरफ, दो कदम बढ़कर स्वागत करेंगे। केवल उनमें ही प्रवेश हो सकेगा।
कल जो घटा है, एक तो बाहर से दिखायी पड़ने वाली घटना है कि मैं आंख बंद किए यहां बैठा हूं और लोग नाच रहे हैं। इतना तो कोई भी देख लेगा। इतना देखने के लिए तो कुछ भी आंख चाहिए नहीं। अंधा भी अंदाज लगा लेगा, अनुमान कर लेगा। छोटा बच्चा भी देख लेगा। इसके लिए कोई बहुत बुद्धिमानी की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर तुम्हारे पास थोड़ी भीतर की आंख हो तो तुम कुछ और देखोगे कि कुछ और घट रहा है। मैं एक तरंग में अपने को ले जा रहा हूं और मेरी तरंग के साथ कुछ लोग धीरे-धीरे डुबकी ले रहे हैं। उसमें मैं बाधा नहीं डालना चाहता।
इसलिए गैर-संन्यासी को अब धीरे-धीरे हक कम होते चले जाएंगे। जैसे-जैसे मेरे पास संन्यासियों की संख्या बड़ी होती जाएगी वैसे-वैसे गैर-संन्यासी के लिए हक कम होते जाएंगे। इसके पहले कि तुम्हारे हक बिलकुल खो जाएं, तुम जल्दी करो!
जीवन में व्रत का क्या मूल्य है?
तुमने देखा, झूठे आदमी ज्यादा कसमें खाते हैं। हर बात में कसम खाने को तैयार रहते हैं। झूठा आदमी कसम के सहारे चलता है। वह अपनी झूठ को कसम के सहारे सच बताना चाहता है।
पश्चिम में ईसाइयों का एक छोटा सा रहस्यवादी संप्रदाय है, क्वेकर। वे अदालत में भी कसम खाने को राजी नहीं होते। सैकड़ों बार तो उनको इसीलिए सजा भोगनी पड़ी है, क्योंकि अदालत में वह कसम खानी ही पड़ेगी बाइबिल हाथ में लेकर कि मैं सच बोलूंगा। लेकिन क्वेकर्स का कहना भी बड़ा सही है, वे कहते हैं कि मैं सच बोलूंगा, यह भी कोई कसम खाने की बात है! और अगर मैं झूठ बोलने वाला हूं तो कसम भी झूठी खा लूंगा। यह बात ही फिजूल है, यह बात ही मूढ़तापूर्ण है। एक झूठे आदमी से कहो कि यह हाथ में लेकर कुरान या बाइबिल या गीता कसम खा लो कि सच बोलोगे। अब अगर वह आदमी सच में झूठा है, तो वह कसम खा लेगा कि लाओ, कसम खा लेता हूं। झूठ बोलने वाले आदमी को झूठी कसम खाने में कौन सी बाधा है! और सच बोलने वाला आदमी जरूर कहेगा कि मैं कसम क्यों खाऊं, क्योंकि मैं जो बोलता हूं वह सच ही है। कसम खाने का तो मतलब होगा कि बिना कसम खाए जो बोलता हूं, वह झूठ है।
इसलिए क्वेकर कसम नहीं खाते। वे कहते हैं, कसम खाने का तो मतलब ही यह हुआ कि बिना कसम खायी गयी बात झूठ है। हम सच ही बोलते हैं, कसम और गैर-कसम का कोई सवाल नहीं है!
व्रत का अर्थ होता है, कसम। व्रत का अर्थ होता है, समाज के सामने कसम। तुम गए मंदिर में, साधु-संन्यासी के पास, मुनि महाराज के पास, समाज की भीड़ में तुमने कसम खा ली। यह कसम तुम भीड़ में खाते हो। क्यों? क्योंकि तुम्हें अपने पर तो भरोसा नहीं है। तुम जानते तो हो कि अगर सबके सामने कसम खा ली कि अब धूम्रपान न करेंगे, तो अब प्रतिष्ठा का सवाल हो गया। अब अगर समाज में कहीं कोई धूम्रपान करता हुआ पकड़ लेगा, तो बेइज्जती होगी। तो तुमने धूम्रपान के खिलाफ अहंकार को खड़ा कर दिया। कसम का क्या मतलब है?
कसम का मतलब यह हुआ कि अब अहंकार को चोट लगेगी। लोग कहेंगे, अरे, तुमने तो कसम खा ली थी धूम्रपान न करने की, अब कर रहे हो! शर्म नहीं आती! मुनि महाराज के पास किस मुंह को लेकर जाओगे? मंदिर में कैसे प्रवेश करोगे? बाजार में कैसे निकलोगे? प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी। कसम का मतलब यह है कि अब सबसे कह दिए कि आज से मैं सिगरेट नहीं पीऊंगा, कि धूम्रपान नहीं करूंगा। अब सारे लोग तुम्हारे पहरेदार हो गए, यह मतलब है कसम का। अब जो भी देखेगा छोटे से लेकर बड़े तक, वह कहेगा, अरे भाई! क्या कर रहे हो! कल तक कोई भी नहीं कह सकता था, क्योंकि तुम अपने मालिक थे। तुमने मालकियत इनके हाथ में दे दी। कल तक हो सकता था पत्नी से बचाकर पी लेते थे, पिता से बचाकर पी लेते थे, अब तुमको सबसे बचाकर पीना होगा, यह बहुत कठिन मामला है! कहां पीओगे? कैसे बचाओगे?
कसम का अर्थ है, भीतर तो बोध नहीं है, भीतर से तो तुम धूम्रपान छोड़ना चाहते नहीं। अगर भीतर से छोड़ना चाहते तो किसी के गवाही की क्या जरूरत थी; छोड़ दिया होता, बात खतम हो गयी। तुम्हें समझ में आ गयी बात कि धूम्रपान व्यर्थ है, बात समाप्त हो गयी। उसी क्षण समाप्त हो गयी, बचा क्या छोड़ने को? धूम्रपान में छोड़ने जैसा है क्या? पहले तो पीने की मूढ़ता की, अब छोड़ने की मूढ़ता कर रहे हो। पहले पीकर सोचते थे कुछ बड़ा काम कर रहे हो...।
अक्सर ऐसा होता है। सिगरेट पीते वक्त लोग बड़े अकड़कर बैठ जाते हैं, जैसे कोई बड़ा काम कर रहे हैं। छोटे बच्चे भी जल्दी बड़े होना चाहते हैं कि बड़े हो जाएं तो सिगरेट पीएं। छोटे बच्चे भी बैठकर सिगरेट पीना चाहते हैं, क्योंकि सिगरेट पीने के साथ बड़प्पन का भाव जुड़ा है। ऐसा लगता है, कुछ खास हो गए।
मैं एक गांव में रहता था। सुबह घूमने गया था, तो देखा एक छोटा सा बच्चा एक दो आने की मूंछ लगाए सिगरेट पी रहा है, एक झाड़ के नीचे। मुझे देखकर वह छिपने लगा। मैं उसके पीछे भागा तो वह अपने घर में घुस गया। मैं उसके पीछे उसके घर में गया। वह एक पोस्ट-मास्टर का लड़का था। वह घबड़ा गया। उसने जल्दी से अपनी मूंछ छिपा ली, सिगरेट फेंक दी, उसका बाप आया कि क्यों आप मेरे लड़के के पीछे लगे हैं! उसको क्यों डरा दिए? मैंने कहा, डरा मैंने नहीं दिया, मैं पूछने आया हूं उससे कुछ। आपका लड़का गजब का है, जरा उसे बाहर लाएं।
वह लड़का बाहर डरता हुआ आया। मैंने पूछा कि तू यह क्या कर रहा था? बस मुझे तेरे से सिर्फ पूछना है, तुझे यह नहीं कहना है कि तू गलत कर रहा है, तू कर क्या रहा था? यह मूंछ लगाकर सिगरेट पीना? तब मैंने गौर से उसके बाप का चेहरा देखा, वैसी मूंछ बाप की है। बाप भी थोड़ा शर्माया। उसने कहा, यह करता है। यह कभी-कभी करता है। यह एक दो आने की मूंछ खरीद लाया है और इसने बिलकुल काटकर मेरे जैसी बना ली है। और सिगरेट मेरी पी जाता है!
मगर जब बाप की अकड़ देखता होगा तो उसको भी होता होगा कि अकड़ जाएं। छोटे-छोटे बच्चे सिगरेट पीकर सिर्फ ऐसा काम कर रहे हैं जिसमें प्रतिष्ठा है। सिगरेट में कुछ प्रतिष्ठा है।
तो जब तुम पीते हो तब अकड़कर पीते थे, अब तुमने छोड़ दिया! एक तो काम ही मूढ़तापूर्ण था। मैं पाप नहीं कह रहा हूं, ध्यान रखना, मूढ़तापूर्ण। मैं सिगरेट पीने वाले को पापी नहीं कहता, क्योंकि पापी कहना तो बड़ा सम्मान हो गया कि बड़ा काम कर रहे हैं, चलो पाप ही सही, मगर कुछ कर तो रहे हैं! कुछ ऐसा काम कर रहे हैं कि परमात्मा को भी इनका हिसाब रखना पड़ेगा। पाप का मतलब होता है, उस ऊपर की खाते-बही में तुम्हारा नाम लिखा जाएगा कि फलां सज्जन सिगरेट पीते हैं, दिन में इतनी पीते हैं! कुछ विशेष कर रहे हैं। पाप तो विशिष्ट हो गया। मैं सिर्फ कहता हूं, मूढ़ता। परमात्मा की खाते-बही में कहीं भी नहीं लिखा होगा कि तुमने कितनी सिगरेट पी हैं, कि नहीं पी हैं। कि कौन से मार्के की सिगरेट पीते थे! अगर परमात्मा ऐसा करता हो तो तुमसे भी गया-बीता है। ये भी कोई हिसाब रखने की बातें हैं! तुम मूढ़ता करो और परमात्मा हिसाब रखे!
नहीं, मैं सिर्फ कहता हूं, मूढ़ता। एक तरह की मूर्च्छा। जिसको बुद्ध ने प्रमाद कहा है। एक तरह का प्रमाद। प्रमाद शब्द में मूर्च्छा और अहंकार, दोनों का भाव है। इसलिए तो हम अहंकारी को भी कहते हैं, बड़ा प्रमादी। मूर्च्छित को भी कहते हैं प्रमादी। प्रमाद शब्द बड़ा बहुमूल्य है, उसमें मूर्च्छा और अहंकार, दोनों का जोड़ है। मूर्च्छित अहंकार, या अहंकारी मूर्च्छा।
तो एक तो सिगरेट पीकर तुम प्रमाद कर रहे थे। उतने से तुम्हारा मन न माना, अब मंदिर में जाकर तुम छोड़ आए। तुम्हारे मुनि भी तुमसे गए-बीते हैं जो बड़े प्रसन्न होते हैं--तुमने धूम्रपान छोड़ दिया। जैसे दुनिया का बड़ा कल्याण हुआ जा रहा है। तुम करते ही कुल इतना थे कि धुआं भीतर ले जाते थे, बाहर निकालते थे। तुम्हारे धुआं बाहर-भीतर निकालने से न दुनिया का अकल्याण हो रहा था, न कल्याण हो जाएगा बंद कर देने से। धुआं बाहर-भीतर निकालने से क्या कल्याण-अकल्याण का संबंध! हां, तुम इतना ही बता रहे थे कि तुम बुद्धू हो।
लेकिन, अब ये मुनि महाराज कहते हैं, तुमने बड़ा काम किया कि व्रत ले लिया, कसम खा ली। धन्यभागी हो तुम! तुम्हारे जीवन में पुण्य की शुरुआत हुई।
पहली तो बात धुआं पीना और बाहर निकालना पाप न था; फिर धुआं निकालना, ले जाना छोड़ना पुण्य नहीं हो सकता। तुमने भी पुण्य की कैसी बचकानी बातें बना रखी हैं। जो लोग सिगरेट नहीं पी रहे हैं, वे सोच रहे हैं कि खाते-बही में बड़ा पुण्य लिखा जा रहा होगा कि देखो, यह आदमी सिगरेट नहीं पीता, यह आदमी पान नहीं खाता, यह आदमी तंबाकू नहीं खाता, यह आदमी यह नहीं करता, यह आदमी वह नहीं करता, तुम जरा सोचो तो तुम्हारे कितने पुण्य चल रहे हैं। जो-जो तुम नहीं करते, वह सब पुण्य है। तुम वेश्या के घर नहीं जाते, शराब नहीं पीते, पान नहीं खाते, सिगरेट नहीं पीते, ताश नहीं खेलते, पुण्य ही पुण्य कर रहे हो तुम! अब और क्या कमी है तुम्हारे जीवन में? महात्मा हो तुम! जरा देखो भी तो कि कितने पुण्य कर रहे हो! जो-जो तुम नहीं कर रहे हो, उसको गिन लो।
जिस दिन तुम सिगरेट पीना छोड़ देते हो, उस दिन तुमने कोई पुण्य किया? तुमने सिर्फ अपने पर थोड़ी अनुकंपा की जरूर, मगर पुण्य इत्यादि कुछ भी नहीं। तुम थोड़े समझदार हुए जरूर, मगर पुण्य इत्यादि कुछ भी नहीं।
कल हमने बुद्ध के भिक्षु की बात कही जो झाडू लगाया करता था। अब क्या तुम सोचते हो, झाडू लगाना छोड़ देने से पुण्य हुआ? कि भगवान कहेगा कि धन्यभागी! तेरा बड़ा सौभाग्य कि तूने झाडू लगाना छोड़ दिया! इसकी कहीं पुण्य में गिनती होगी!
अगर तुम गौर से समझो तो इस जमीन पर पाप के नाम से तुमने जो किया है, वह नासमझी है। और पुण्य के नाम से उस नासमझी को मिटाते हो। पुण्य क्या है? चोरी की, चोरी कर-करके धन इकट्ठा कर लिया, फिर दान करके पुण्य कर दिया। पहले धनी होने का मजा ले लिया, फिर पुण्यात्मा, दानी होने का मजा ले लिया। और दोनों निर्भर हैं धन पर। और धन का कोई मूल्य ही नहीं है। धन दो कौड़ी का है। मिट्टी है। पहले मिट्टी इकट्ठी करके मजा ले लिया, तब अखबारों में खबर छप गयी कि देखो, कितनी मिट्टी इकट्ठी कर ली इस आदमी ने। और फिर मिट्टी दान करके मजा ले लिया। फिर अखबारों में खबर छप गयी कि यह आदमी पुण्यात्मा हो गया।
व्रत बेईमानी है। समझदार के जीवन में क्रांति होती है, व्रत नहीं होते।
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी मायके गयी थी। उसने अपनी एक प्रेयसी को घर आने का निमंत्रण दिया। पत्नी बाहर गयी हो तो कौन ऐसा अवसर चूके! इसलिए पत्नियां मायके जाने की धमकी देती हैं, जाती-करती नहीं। जाने की कहो तो नाराज हो जाती हैं। मगर जाना पड़ा था। कुछ जरूरी काम आ गया होगा। तो गयी भी तो भी कसम दिलवा गयी। कसम दिलवा गयी कि मुल्ला, एक बात की कसम खा लो कि किसी और स्त्री के साथ बाहर मत जाना। जाते ही मुल्ला ने फोन किया अपनी प्रेयसी को, कहा कि आ जाओ, पत्नी मायके गयी है और महीने-पंद्रह दिन अब कोई झंझट नहीं है।
प्रेयसी चाहती थी कि मुल्ला उसके घर आए। लेकिन मुल्ला जिद्द पर अड़ा रहा सो अड़ा रहा। आखिर प्रेयसी ने खीझकर पूछा, नसरुद्दीन, मामला क्या है? मैं ही तुम्हारे घर आऊं ऐसी जिद्द क्यों? तुम मेरे घर क्यों नहीं आ सकते?
मुल्ला ने कहा, कारण है। कारण यह है कि मैंने अपनी पत्नी को आश्वासन दिया है कि जब तक वह मायके में है, मैं किसी स्त्री के साथ बाहर नहीं जाऊंगा। और कोरा आश्वासन नहीं, उसने कुरान हाथ में रखवाकर कसम दिलवा दी। सो बाहर तो मैं जा नहीं सकता, अब तुम ही आ जाओ। भीतर आने की तो कोई बात ही नहीं है कसम में कि बाहर की स्त्री को भीतर नहीं आने दूंगा। मैं किसी स्त्री के साथ बाहर नहीं जाऊंगा।
सब कसमें ऐसी हैं। झूठ हैं। तुम खाना भी नहीं चाहते थे, खानी पड़ी है। तुमने प्रतिष्ठा और अहंकार के आधार पर खा ली होगी। अब पत्नी अगर कहे कि किसी स्त्री के साथ बाहर न जाओगे, कसम खाओ। अगर तुम न खाओ तो झंझट! उसका मतलब कि तुम जाने का विचार किए बैठे हो। न खाओ तो साफ हो गयी बात कि तुम विचार ही किए बैठे हो। कि तुम राह ही देख रहे हो कि कब पत्नी जाए। इसलिए कसम तो खानी ही पड़ेगी। फिर कसम में से कोई तरकीब निकालनी पड़ेगी। तो लोग कसमों में से तरकीब निकालते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन ने शराब छोड़दी थी। लेकिन एक दिन एक मित्र ने देखा कि वह पी रहा है। तो उसने पूछा, अरे, मैंने तो सुना था तुमने छोड़ दी! उसने कहा, खरीदनी छोड़ दी। जाकर कसम खा ली, पत्नी बहुत पीछे पड़ी थी, तो कसम खा ली कि अब शराब कभी खरीदकर न पीऊंगा। कोई पिला दे तो बात और।
मैंने तो यहां तक सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन का एक मित्र मरा तो मरते वक्त--दोनों साथ-साथ शराब पीते रहे जिंदगीभर; जब भी दोनों जाते तो दो गिलासों में शराब आती थी--मरते वक्त उसके मित्र ने कहा, मुल्ला, अब तुम अकेले ही शराब पीओगे, मेरी याद करोगे या नहीं? मुल्ला ने कहा, याद जरूर करूंगा। तो मित्र ने कहा, इस तरह से याद करना कि मैं तो चला जाऊंगा, मैं तो मर रहा हूं, कोई उम्मीद नहीं डाक्टर कहते हैं, तुम इतना करना, कि जब भी तुम शराब पीओ तो जैसे हम सदा दो गिलास का आर्डर देते थे, दो का ही आर्डर देना। दोनों गिलास तुम पी लेना--एक तुम्हारे लिए, एक मेरे लिए। इससे मेरी आत्मा को बड़ी शांति रहेगी। मुल्ला ने कहा, अरे, यह भी कोई बात! जरूर करूंगा। इससे अच्छा और क्या? मुल्ला तो ऐसा प्रसन्न हो गया कि अच्छा ही हुआ कि मित्र मर रहा है।
मित्र तो मर गए, मुल्ला दो गिलास बुलाकर पीने लगा। जब भी कोई पूछता कि दो गिलास क्यों, अकेले तो तुम हो, तो वह कहता--एक मित्र के लिए। मित्र तो मर चुका है। सारे गांव में खबर हो गयी कि वह दो गिलास बुलाकर पीता है। जहां भी जाए, वह दो गिलास बुलाकर पीए। फिर एक दिन शराबघर में आया और एक ही गिलास का आर्डर दिया। तो शराबघर के मालिक ने कहा, नसरुद्दीन, बात क्या है, क्या मित्र को भूल गए? नहीं, उसने कहा, यह बात नहीं, डाक्टर ने कहा है कि नसरुद्दीन शराब पीना छोड़ दो। तो मेरा गिलास तो छोड़ना पड़ रहा है। मित्र की तरफ तो जो वफादारी है सो निभानी ही पड़ेगी।
आदमी ऐसा बेईमान है। तुम्हारे व्रत, तुम्हारे नियम, सब कानूनी बातें हैं। अगर तुम्हारा बोध उनके साथ नहीं है तो तुम कोई न कोई तरकीब निकाल लोगे। आदमी बड़ा कुशल है। दूसरों को धोखा देने में तो है ही, खुद को धोखा देने में भी बड़ा कुशल है। तुम कोई न कोई मार्ग खोज लोगे। इसलिए मैं व्रत के पक्ष में नहीं हूं। मैं बोध के पक्ष में हूं। मैं कहता हूं, समझने की कोशिश करो। समझदारी ही तुम्हारा व्रत बन जाएगी। व्रत को अलग से मत लो।
अगर तुम्हें समझ में आ गया कि शराब पीना व्यर्थ है, तो यही समझ काफी होनी चाहिए। इसी समझ के आधार पर शराब छूट जानी चाहिए। अगर इस समझ से ही न छूटती हो तो अभी मत छोड़ना। क्योंकि व्रत लेकर तुम कोई न कोई बेईमानी करोगे। फिर व्रत ही क्यों लेना। जब समझ के अनुकूल ही नहीं है अभी बात तो समझ के प्रतिकूल व्रत क्यों लेना!
समझ के प्रतिकूल लिया गया व्रत तुम्हारे भीतर द्वंद्व पैदा करेगा, कानफ्लिक्ट पैदा करेगा, संघर्ष पैदा करेगा। तुम दो हिस्सों में बंट जाओगे। एक हिस्सा पीना चाहेगा, एक हिस्सा कहेगा कि कैसे हो सकता है, सबके सामने व्रत ले लिया है! तो तुम्हारे भीतर तनाव पैदा होगा, अशांति पैदा होगी, चिंता पैदा होगी, बेचैनी पैदा होगी।
और धर्म से बेचैनी पैदा नहीं होती, धर्म से चैन आता है। धर्म से अशांति पैदा नहीं होती, धर्म से शांति उतरती है। तो जिस धर्म से भी अशांति पैदा हो, जानना कि वह धर्म नहीं है।
मैंने सुना है--
जीवन के महक भरे स्वप्न कहां बोऊं मैं
आधे में मृत्यु और आधे में धर्म है
सुनना ध्यानपूर्वक!
जीवन के महक भरे स्वप्न कहां बोऊं मैं
आधे में मृत्यु और आधे में धर्म है
कोई भी काम नहीं ऐसा जो
पुण्य हो न पाप हो,
जिसको मैं करूं सहज भाव से
जिस पर बस मेरी ही मेरी छाप हो
मन की सुन लेता तो आत्मा धिक्कारती
स्वयं तो अमर है पर मुझे रोज मारती
बाहर से धैर्यवान भीतर से डरा हुआ
सदा भूल जाता हूं जीवन का एकमात्र
सत्य तो रक्त और मांस और चर्म है
आधे में मृत्यु और आधे में धर्म है
झूठा आश्वासन है मेरी स्वाधीनता
मेरा हर अहंकार मुखरित कर देता है
मेरी ही दीनता
मैं भी कुछ ऐसे स्वच्छंद हूं
जैसे हो सील भरी लकड़ी में आग
जैसे हो तर्कशील मन में अनुराग
मैं कोई राजनयिक बंदी हूं
यूं सब सुविधाएं हैं,
सिर्फ नजरबंद हूं,
मुक्ति का करूं अभिनय कैसे जब
चिंतन है बिका हुआ
अनुबंधित कर्म है
आधे में मृत्यु और आधे में धर्म है
फूलों पर मुहर लगी मृत्यु की
फल सारे मृत्यु की नजर में हैं
कैसे ये फल चखूं
कैसे ये फूल मेज पर रखूं
धर्म नहीं, धर्म के प्रचारों से डरता हूं
मृत्यु नहीं, मृत्यु के विचारों से डरता हूं
रूप और रस और गंध कैसे भोगूं जब
संयम ही सारे उपदेशों का मर्म है
आधे में मृत्यु और आधे में धर्म है
जीवन के महक भरे स्वप्न कहां बोऊं मैं
तुम देखे? इधर मृत्यु डरा रही, इधर धर्म डरा रहा। इधर मृत्यु कहती है, गए। इधर मृत्यु कहती है, जल्दी करो, भोग लो। और इधर धर्म कहता है, भूलकर भोगना मत, नहीं तो जलाए जाओगे नर्क की लपटों में। कीड़े-मकोड़े बनोगे। भटकोगे ही योनियों और योनियों में। महादुख होगा परिणाम। जरा सा भोग महादुख में ले जाएगा। ये क्षणभंगुर सुख की आशा अनंत-अनंतकालीन नर्क में डाल देगी। इधर मौत है, वह कहती है, देर क्या कर रहे, यह जवानी हाथ से चली जा रही है, पी लो, पिला लो, मौज कर लो। फिर दुबारा कोई आना नहीं है। मौत सब छीन लेगी। यह घड़ीभर के लिए जो जीवन मिला है, इसे ऐसा ही न गुजर जाने दो।
आधे में मृत्यु और आधे में धर्म है
और आदमी इन दोनों के बीच में कटा हुआ खड़ा है। इधर मृत्यु खींचती है, उधर महात्मा। तुम्हारी बड़ी दुर्गति है।
तुमने इस सत्य को समझा या नहीं? तुम्हारी बड़ी दुर्गति है! अगर मृत्यु को मानो तो मृत्यु कहती है, भोग लो, खोओ मत क्षण, कल का कुछ पता नहीं, कौन जाने कल हो, न हो। तो जो करना है, कर लो। और इधर महात्मा कहता है, सोच-विचारकर करना। ऐसा मत कर लेना कुछ कि कल बिगड़ जाए आज के पीछे। कल का खयाल रखकर करना। मौत के बाद का ध्यान रखना। बीज तो अभी बोओगे, फल कौन काटेगा? ऐसा आदमी दोनों के बीच में खड़ा है। न घर का न घाट का। धोबी का गधा।
तुमने उस गधे की बात सुनी? ईसप की कथा है। एक गधे को बीच में खड़ा कर दिया उसके मालिक ने और दोनों तरफ घास के दो पूले रख दिए। गधा भूखा है। लेकिन इस पूले की तरफ देखता है तो उस पूले की याद आती है। उस पूले की तरफ देखता है तो इस पूले की याद आती है। ऐसा बीच में ही खड़ा-खड़ा मर गया। चुनाव ही न हो पाया। निर्णय ही न हो पाया किस तरफ जाऊं, यह ठीक कि यह ठीक! ऐसे द्वंद्व में प्राण निकल गए।
तुम जरा देखना, एक तरफ महात्मा खड़े, एक तरफ मौत खड़ी। मौत कहती, जल्दी करो, भोगो। महात्मा कहता है, ठहरो, भोगना भर नहीं। नहीं तो सदा भुगतोगे। भोगा कि भुगते। फिर मत कहना। तो भोगने जाओ तो महात्मा खड़ा है, न भोगो तो मौत खड़ी है।
आधे में मृत्यु और आधे में धर्म है
जीवन के महक भरे स्वप्न कहां बोऊं मैं
नहीं, लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, यह जो धर्म है, यह वास्तविक धर्म नहीं है। यह व्रत वाला धर्म है।
वास्तविक धर्म तो तुम्हें नर्क से भयभीत नहीं करता। वास्तविक धर्म तो भयभीत ही नहीं करता। वास्तविक धर्म तो जीवन के आनंद को तुम कैसे परिपूर्णता से भोगो, उसके सूत्र देता है। वास्तविक धर्म तुम्हें संसार के भोग से मुक्त नहीं करता है, संसार में ही कैसे परमात्मा का भोग भी संभव हो सकता है, इस दिशा में गतिशील करता है। वास्तविक धर्म तुम्हारे जीवन में द्वंद्व पैदा नहीं करता। वास्तविक धर्म कहता है, तुम्हारा यह जो जीवन है, उस जीवन की सीढ़ी है। इसमें विरोध नहीं है। दुकान मंदिर की सीढ़ी है। और धन ध्यान की सीढ़ी है। और शरीर आत्मा का द्वार है। और यह संसार परमात्मा का संसार है। इसे कुछ ढंग से जीओ, इसे कुछ बोध से जीओ, तो तुम इसी सुख में स्वर्ग को खोज लोगे। और खयाल रखना, अगर तुम इस सुख में स्वर्ग को नहीं खोज सकते तो स्वर्ग फिर कहीं भी नहीं है।
मैं तुमसे जिस धर्म की बात कर रहा हूं, वह व्रत वाला धर्म नहीं है, बोध वाला धर्म है। मैं तुम्हें कहीं से भी तोड़ना नहीं चाहता हूं। मैं तुम्हें परमात्मा से जरूर जोड़ना चाहता हूं, लेकिन तुम्हें कहीं से तोड़ना नहीं चाहता हूं। मैं तुम्हें, तुम जहां हो, उस जगह का ठीक-ठीक उपयोग कर लेना सिखाना चाहता हूं।
एक मित्र मेरे पास आए, बहुत दिन से उन्हें सिगरेट पीने की आदत है। वे कहने लगे, कैसे छोडूं? मैंने कहा, तुम छोड़ तो रहे हो तीस साल से, अभी भी अकल नहीं आयी कि तीस साल छोड़ने-छोड़ने में बिताए। न पी पाए, न छोड़ पाए। छोड़ो पंचायत! तो उन्होंने कहा, फिर पीता ही रहूं? बड़े उदास हो गए--तीस साल से पी ही रहे हैं--जैसे कि मैं कुछ कसूर कर रहा हूं। यानी वे मुझ पर ही कुछ नाराज मालूम पड़े। कि आप और ऐसी बात कह रहे हैं! क्योंकि महात्मा से तो बात ऐसी होनी चाहिए कि छोड़ो, इसी वक्त छोड़ दो, कसम खा लो कि अब कभी न पीएंगे। अरे, अपना बल खोजो, आत्मबल जगाओ, यह क्या बात है! सिगरेट से हारे जा रहे हो? आत्मवान बनो, संकल्प पैदा करो, यह क्या बात है! महात्मा से वे ऐसे ही सुनते रहे होंगे। महात्माओं के पास जाते भी हैं।
ऐसे ही लोग तो जाते हैं महात्माओं के पास--किसी को सिगरेट छोड़नी है, किसी को तमाखू छोड़नी है। यह भी अजीब धंधा है। कोई लोग तमाखू बेचने का धंधा कर रहे हैं, कुछ लोग तमाखू छुड़वाने का धंधा कर रहे हैं। मगर धंधा वही है। धंधे में कोई बहुत भेद नहीं है। ये एक ही दुकान में साझीदार मालूम पड़ते हैं।
मैंने उनसे कहा कि देखो, एक काम करो तुम, एक छोटा सा काम करो। यह धूम्रपान को तुम मंत्र बना लो। जब धुआं भीतर ले जाओ तो कहो, ॐ। और जब धुआं बाहर लाओ तो कहो, ॐ। वे बोले, क्या मामला! मैंने कहा, यह माला बन जाएगी, ओंकार का नाद करो। थोड़े हंसे भी! कहा, आप भी क्या बात कह रहे हैं! कहां ॐ और कहां धूम्रपान, इसको कहां जोड़ रहे हैं! मैंने कहा, तुमने मेरी किताब नहीं पढ़ी--संभोग से समाधि की ओर। मैं कुछ भी जोड़ देता हूं। तुम फिकर न करो। तुम ओंकार का पाठ तो शुरू करो, फिर देखेंगे।
पंद्रह दिन बाद मेरे पास आए, वे कहने लगे, बड़ा गजब हो गया है! पंद्रह दिन से ओंकार का पाठ कर रहा हूं, सिगरेट तो धीरे-धीरे गौण हुई जा रही है, ओंकार का पाठ गहन हुआ जा रहा है। अब तो कभी-कभी सिगरेट पीने का खयाल उठता है तो सिगरेट न पीकर ओंकार का पाठ ही कर लेता हूं। और ऐसा मजा आता है जैसा सिगरेट में कभी नहीं आया था! मैंने कहा, वह तुम्हारी मर्जी, मैंने तुमसे छोड़ने को नहीं कहा है।
अगर सिगरेट को भी आधार बनाया जा सके तो क्यों न बना लो? अगर देह भी द्वार बनती हो तो क्यों न बना लो? अगर संबंध, नाते, रिश्ते भी उस परम की तरफ ले जाने के लिए सहारा बनते हों तो क्यों न बना लो? अगर परिवार को बिना छोड़े परमात्मा खोजा जा सकता हो, तो क्या यह उचित न होगा, ज्यादा मानवीय, ज्यादा धार्मिक, ज्यादा कारुणिक?
नहीं, मैं तुम्हें तोड़ना नहीं चाहता कहीं से। इसलिए व्रत के मैं पक्ष में नहीं हूं। क्योंकि व्रत तो प्रक्रिया है जबर्दस्ती आरोपण की। मैं बोध के पक्ष में हूं।
मैं कवि हूं। क्या सत्य को पाने के लिए अब संन्यासी भी होना आवश्यक है?
इसलिए इस देश में हमने कवियों के लिए दो नाम दिए हैं--ऋषि और कवि। दोनों का एक ही अर्थ होता है। लेकिन दोनों का बड़ा गहन भेद भी है।
ऋषि हम उसे कहते हैं, जिसे सत्य मिला और जिसने सत्य को गीत में गाया। जिसने सत्य पाया और सत्य को ऋचा बनाया, गीत बनाया, उसको हम ऋषि कहते हैं। उपनिषद जिसने लिखे, वेद के मंत्र जिसने लिखे। कबीर और नानक और दादू और मीरा और सहजो और दया, ये सब ऋषि हैं। इनको तुम कवि कहकर ही भ्रांति में मत पड़ जाना। क्योंकि कवि तो हजारों हैं, लेकिन वे नानक नहीं हैं, और न कबीर हैं। और यह भी हो सकता है कि वे नानक से बेहतर कवि हों और कबीर से बेहतर कवि हों, क्योंकि कविता एक अलग बात है। नानक कोई बहुत बड़े कवि थोड़े ही हैं! अगर कविता को ही खोजने जाओ तो नानक और कबीर में कोई बहुत बड़ी कविता थोड़े ही है! कविता के कारण उनका गौरव भी नहीं है। गौरव तो किसी और बात से है। जो उन्होंने देखा है, उसको उन्होंने काव्य में ढाला है। उसको गाकर कहा है।
साधारण कवि ने देखा तो कुछ भी नहीं है, ज्यादा से ज्यादा सपने देखे हैं--यह भी हो सकता है कि शराब पीकर देखे हों कि गांजा पीकर देखे हों। इसलिए अक्सर कवि को तुम पाओगे शराब पीते, गांजा पीते, इस तरह के काम करते। किसी कवि की कविता अच्छी लग जाए तो भूलकर कवि से मिलने मत जाना, नहीं तो बड़ा सदमा पहुंचता है। कविता तो ऐसी ऊंची थी और कवि को देखा तो वे नाली में पड़े हैं! कि चायघर में बैठे गालियां बक रहे हैं! कवि को देखने जाना ही मत। अगर कविता पसंद पड़े तो भूलकर मत जाना, नहीं तो कविता तक में अरुचि हो जाएगी।
हां, ऋषि की बात और है। अगर ऋषि की पंक्ति पसंद पड़ जाए और ऋषि उपलब्ध हो तो छोड़ना मत। क्योंकि पंक्ति में क्या रखा है! पंक्ति तो कुछ भी नहीं है। जब तुम ऋषि को देखोगे तब तुम्हें पूरा दर्शन होगा। पंक्ति तो जैसे एक किरण थी छोटी। एक नमूना था। जरा सा स्वाद दिया था पंक्ति ने तो। ऋषि के पास जाओगे तो पूरा सागर लहलहाता मिलेगा।
कवि तो कविता में खतम हो गया। कवि को पाओगे तो रिक्त, कोरा पाओगे। ऋषि कविता में खतम नहीं हो गया है। कविता तो ऐसी ही है जैसे ऋषि के भीतर तो आनंद उछल रहा था, कुछ बूंदें कविता बन गयीं।
तुम कहते हो, ‘मैं कवि हूं।’
अच्छा है कवि हो, लेकिन ऋषि न बनना चाहोगे? तुम्हारे काव्य के साथ संन्यास जुड़ जाए तो तुम ऋषि हो जाओ। तुम्हारे काव्य के साथ ध्यान जुड़ जाए तो तुम ऋषि हो जाओ। कवि होने पर मत रुक जाना। कवि कोई बहुत बड़ा गुण नहीं है।
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन ने एक युवती से विवाह का प्रस्ताव किया। प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। तो उसने खुशी में डुबकी लेकर पूछा, क्या तुम्हारे माता-पिता को पता है कि मैं कवि हूं, शायर? युवती ने कहा, नहीं अभी तक नहीं। मैंने उनसे चोरी के अपराध में तुम्हारी जेल-यात्रा के संबंध में जरूर बताया है। यह भी कि तुम्हें जुआ खेलने की आदत है, और यह भी कि शराब की लत है। लेकिन तुम कवि भी हो, यह मैंने नहीं कहा; सोचा सभी बातें एक साथ बताना ठीक नहीं। धीरे-धीरे बताएंगे।
कवि होना अनिवार्यरूपेण गुण नहीं है। अक्सर तो तुम कविता करते उन लोगों को पाओगे जो जीवन में असफल हो गए हैं। जो कुछ और न कर सके वे कवि हो गए। फिर जो कवि भी नहीं हो सकते, वे आलोचक हो जाते हैं। वह और गयी-बीती दशा है। कवि होने का अर्थ ही इतना है कि तुम कृत्य में नहीं उतार पाए, तो अब कल्पनाओं में उतार रहे हो। जिनके जीवन में प्रेम नहीं घटा, वे प्रेम की कविताएं लिख रहे हैं। ऐसे मन को समझा रहे हैं, बुझा रहे हैं। यह सांत्वना है।
इसलिए कवियों की कविताओं से तुम प्रेम की कोई धारणा मत बना लेना, क्योंकि उनको प्रेम का कुछ पता ही नहीं है। प्रेम का जिनको पता है, वे शायद कविताएं लिखेंगे भी नहीं। अक्सर ऐसा होता है कि जिनके जीवन में प्रेम का कोई अनुभव नहीं घटता, वे किसी तरह के सपने पैदा करके परिपूरक निर्मित करते हैं। सपने का उपयोग ही यही है।
तुम दिन में भूखे सोए, किसी दिन तुमने उपवास किया, तो रात तुम सपना देखोगे कि भोजन कर रहे हो, राजा के घर मेहमान हो, बड़ा स्वादिष्ट भोजन है, सभी तरह के मिष्ठान्न हैं। ये भूखे आदमी ही इस तरह के सपने देखते हैं। उपवास करने वाले, व्रत इत्यादि ले लिया, कि पर्यूषण आ गए, ऐसा कुछ मौका आ गया, तो रात में सपने आते हैं। जब तुम भरे पेट सोते हो तो रात कभी भोजन के सपने नहीं आते।
गरीब आदमी सपने देखता है, सम्राट हो गया है। सम्राट नहीं देखता ऐसे सपने। झोपड़े वाला सपने देखता है, महल में हो गया। महल वाला ये सपने नहीं देखता। तुम तो चकित होओगे, अक्सर महल वाला देखता है कि संन्यासी हो गया, भिक्षु हो गया। अक्सर धन वाला देखता है सपने कि कब इस धन से छुटकारा होगा, कब इस फंदे से बाहर निकलेंगे। कब हो जाएंगे मस्त फकीर। न कुछ फिकर, न कुछ लेन-देन। सपने विपरीत होते हैं, यह मैं कह रहा हूं। जिस चीज की कमी होती है, सपने के द्वारा उसकी हम पूर्ति करते हैं।
कविता एक तरह का सपना है। जो तुम्हारे जीवन में कम है, उसकी तुम सुंदर-सुंदर पंक्तियां रचकर अपने को समझाते हो कि चलो, कविता कर ली। ऐसे मन बहलता है। काव्य कोई जीवन का बड़ा गहरा अनुभव नहीं है। अगर जीवन का गहरा अनुभव करना है तो ऋषि बनो। कवि और ऋषि का फर्क है: कवि का अर्थ है, सपने देखने वाला आदमी; ऋषि का अर्थ है, सत्य देखने वाला आदमी। सपने देखकर तुम जो गीत गुनगुनाओगे, उनमें सपनों ही की तो गंध होगी। सत्य देखकर तुम जो गीत गुनगुनाओगे उनमें सत्य की गंध होगी। सपनों में गंध कहां, दुर्गंध ही होती है। गंध तो सत्य की ही होती है।
इसलिए मैं तुमसे कहूंगा, कवि हो, सुंदर। और थोड़े आगे बढ़ो, यह कोई मंजिल नहीं आ गयी। यहां रुकने से कुछ होगा नहीं, थोड़े आगे चलो। ऋषि बनो। तब तुम्हारे भीतर से एक नए ढंग के काव्य का अवतरण होगा। तब तुम्हारी गीत की कड़ियां तुम्हारी न होंगी, परमात्मा की होंगी। तब तुम बांस की पोंगरी हो जाओगे। गीत उसका होगा, ओंठ उसके होंगे, तुम वेणु बन जाओगे। तब भी बांसुरी बजेगी, लेकिन स्वर परमात्मा का होगा। तब बड़ी अनूठी बांसुरी बजती है।
अभी तुम्हीं तो बजाओगे, तुम्हारे पास है क्या? तुम डालोगे क्या बांसुरी में? तुम्हारी संपदा क्या है? तुम्हारे भीतर है क्या? हुआ क्या है? कुछ भी तो नहीं हुआ है। तुम वैसे ही साधारण आदमी हो जैसे दूसरा कोई साधारण आदमी है। तुम्हें परमात्मा की झलक कहां मिली! तो तुम कहोगे क्या कविता में?
तुम्हारे पास डालने को कुछ भी नहीं है। तो तुम्हारी कविता कोरी-कोरी होगी, सूनी-सूनी होगी, मुर्दा-मुर्दा होगी। शब्दों का अंबार लगा दोगे तुम, लेकिन शब्दों के पीछे जब तक सत्य न हो तब तक बेबुनियाद है भवन। तब तक तुम कागज की नावें जितनी चाहो तैरा लो, लेकिन इनसे भवसागर पार न होगा।
सिक्ख होने की वजह से मैं नानक से प्रभावित हूं। आपकी वाणी और दर्शन से भी प्रभावित हूं। कृपया बताएं कि कौन सा मार्ग अपनाऊं?
अगर तुमने नानक को चाहा है, तो तुम नानक को ही मुझमें देख लोगे। अगर तुमने मुझे चाहा है, तो तुम मुझको ही नानक में देख लोगे, भेद कहां है?
यहां एक अपूर्व घटना घट रही है। यहां जीसस को चाहने वाले लोग हैं, उन्होंने जीसस को मुझमें देख लिया। उन्होंने मुझको भी चाहा उनके प्रेम के कारण। उनका प्रेम सेतु बन गया और मैं और जीसस एक हो गए। यहां कबीर को चाहने वाले लोग हैं। यहां महावीर को चाहने वाले लोग हैं। यहां बुद्ध को चाहने वाले लोग हैं। यहां जरथुस्त्र को चाहने वाले लोग हैं। मोहम्मद को चाहने वाले लोग हैं। यहां सारे धर्मों के लोग हैं। पृथ्वी पर तुम्हें ऐसी कोई दूसरी जगह न मिलेगी, जहां सारे धर्मों के लोग हों। और यहां कोई सर्व-धर्म-समन्वय का पाठ नहीं पढ़ाया जा रहा है, मजा यह है। यहां मैं कह ही नहीं रहा कि सब धर्म एक हैं। सब धर्म बड़े अलग-अलग हैं, बड़े भिन्न-भिन्न हैं, बड़े विशिष्ट हैं।
तो फिर जोड़ क्या है? जोड़, नानक को प्रेम करने वाला जब मेरे प्रेम में पड़ जाता है, तो उसका प्रेम ही मेरे और नानक के बीच सेतु हो जाता है। फिर वह नानक की वाणी को कुछ इस ढंग से समझेगा, कुछ इस रंग से समझेगा कि वह मेरी वाणी हो जाएगी। वह मेरी वाणी को कुछ इस ढंग और रंग से समझेगा कि मेरी वाणी में उसे नानक का स्वर सुनायी पड़ने लगेगा। प्रेम ने भेद कभी जाना नहीं, प्रेम तो अभेद जानता है।
तुम इस चिंता में ही मत पड़ो। यहां कोई विरोध है ही नहीं। यहां कुछ भेद है ही नहीं। तुम अगर मेरे प्रेम में डूबे तो नानक नाराज न होंगे, इतना आश्वासन मैं तुम्हें देता हूं। और तुम अगर नानक के प्रेम में बने रहे, तो मैं नाराज नहीं हूं, इतना आश्वासन तुम्हें देता हूं। सच तो यह है, अगर तुम गौर से देखोगे तो तुम्हें बात समझ में आ जाएगी। तुमने नानक को प्रेम किया और तुम मुझे भी प्रेम कर सके, उसी प्रेम में यह खबर मिल गयी कि जो मैं कह रहा हूं वह नानक से भिन्न नहीं है, अभिन्न है। अन्य नहीं है, अनन्य है। इसीलिए तो तुम मेरे प्रेम में सरक आए। और मेरे प्रेम में बहुत तरह के लोग सरक आए हैं। तरह-तरह के लोग। जिनके जीवन में एक-दूसरे से मिलने की कभी कोई संभावना नहीं थी।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What is the value of vows in life?
According to Osho, vows have no intrinsic value; only awareness transforms. A vow signals inner unconsciousness and outsources discipline to social pressure and ego-prestige. Liars lean on oaths; the truthful need none. Real change arises when you see clearly—then the habit drops without witnesses, promises, or struggle. Handing your authority to public pledges breeds hypocrisy; reclaim it through alertness.
In simple terms: Don’t rely on promises to others; look clearly inside, and what’s false will fall away by itself.
Why are only sannyasins allowed to participate in the dance on Sambodhi Day?
According to Osho, only sannyasins may dance on Sambodhi Day because the work requires a single, trusting wave of energy; those not initiated remain closed or ego-bound and disrupt the ecstatic cadence. A sannyasin has staked something, opened the heart, and is ready to dive with the master—even into darkness—so the boundary protects the depth and coherence of the inner work.
In simple terms: Only people who’ve truly said yes in their hearts can join the dance, or else the shared flow breaks.
