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Questions in this Discourse
नकारात्मक मन से, आलोचक दृष्टि से और अहंकार से कैसे छुटकारा होगा? बुद्धि जलकर राख कब होगी? ये दुखदायी हैं, तो भी उनसे लगाव क्यों बना है?
तो पहली तो बात यह समझ लो कि अगर नकारात्मक से ही छुटकारा पाना है, तो कभी छुटकारा न होगा। मन से ही छुटकारा पाने की बात सोचो। मन यानी नकारात्मक-विधायक, दोनों।
हम जीवन भर ऐसी चेष्टाएं करते हैं और असफल होते हैं। असफल होते हैं तो सोचते हैं, हमारी चेष्टा शायद समग्र मन से न हुई, पूरे संकल्प से न हुई, शायद हमने अधूरा-अधूरा किया, कुछ भूल-चूक रह गयी।
नहीं, भूल-चूक कारण नहीं है। जो तुम करने चले हो, वह हो ही नहीं सकता। उसके होने की ही संभावना नहीं है। वह स्वभाव के नियम के अनुकूल नहीं है, इसलिए नहीं होता।
इसलिए इसके पहले कि कुछ करो, ठीक से देख लेना कि जो तुम करने जा रहे हो, वह जगत-धर्म के अनुकूल है? वह जगत-सत्य के अनुकूल है? जैसे एक आदमी दुख से छुटकारा पाना चाहता है और सुख से तो छुटकारा नहीं पाना चाहता, तो कभी भी सफल नहीं होगा। सुख-दुख साथ-साथ जुड़े हैं। दुख गया तो सुख गया। सुख बचा तो दुख बचा।
तुम्हारी उलझन और दुविधा यही है कि तुम एक को बचा लेना चाहते हो, दूसरे को हटाते। यही तो सभी लोग जन्मों-जन्मों करते रहे हैं। सफलता बच जाए, असफलता चली जाए। सम्मान बच जाए, अपमान चला जाए। विजय हाथ रहे, हार कभी न लगे। जीवन तो बचे और मौत समाप्त हो जाए। यह नहीं हो सकता। यह असंभव है। जीवन और मृत्यु साथ-साथ हैं। जिसने जीवन को चुना, उसने अनजाने मृत्यु के गले में भी वरमाला डाल दी। ऐसा ही विधायक और नकारात्मक मन है।
विधायक मन का अर्थ होता है, हां; और नकारात्मक मन का अर्थ होता है, नहीं। हां और नहीं को अलग कैसे करोगे? और अगर नहीं बिलकुल समाप्त हो जाए तो हां में अर्थ क्या बचेगा? हां में जो अर्थ आता है, वह नहीं से ही आता है।
इसलिए मैं कहता हूं, तुम अगर आस्तिक हो, तो नास्तिक भी होओगे ही। चाहे नास्तिकता भीतर दबा ली हो। नास्तिकता के ऊपर बैठ गए होओ, उसे बिलकुल भुला दिया हो, अचेतन के अंधेरे में डाल दिया हो, मगर, अगर तुम आस्तिक हो तो तुम नास्तिक भी रहोगे ही। अगर तुम नास्तिक हो, तो कहीं तुम्हारी आस्तिकता भी पड़ी ही है; जानो न जानो, पहचानो न पहचानो। आस्तिक और नास्तिक साथ-साथ ही होते हैं।
इसलिए धार्मिक व्यक्ति को मैं कहता हूं, जो आस्तिक और नास्तिक दोनों से मुक्त हो गया। धार्मिक व्यक्ति को मैं आस्तिक नहीं कहता, और धार्मिक व्यक्ति को विधायक नहीं कहता, धार्मिक व्यक्ति को कहता हूं, द्वंद्व के पार।
तो पहली बात, पूछते हो, ‘नकारात्मक मन से कैसे छुटकारा होगा?’
मन से छुटकारे की बात सोचो। नकारात्मक मन से छुटकारे की बात सोचो ही मत, अन्यथा कभी न होगा। और जब मन से छुटकारे की बात उठती है तो उसमें विधायक मन सम्मिलित है उतने ही अनुपात में, जितने अनुपात में नकारात्मक मन सम्मिलित है। वे दोनों ही मन के ही पहलू हैं। हां कहो तो मन से आती है, न कहो तो मन से आती है।
इसीलिए तो परम सत्य को कहा नहीं जा सकता; कैसे कहो? या तो हां कहो, या न कहो। हां कहो तो नहीं आ जाती है, नहीं कहो तो हां आ जाती है। इसलिए परम सत्य को केवल मौन से कहा जा सकता है, शून्य से कहा जा सकता है। जहां शून्य है, वहां मन नहीं। ऐसा समझो, जहां हां और नहीं दोनों गिर गए, वहां जो बचता है उसी का नाम शून्य है।
बुद्ध का मार्ग तो शून्य का मार्ग है। इसे समझना। इसे हम समझ नहीं पाए, इस देश में बुद्ध को ठीक से समझा नहीं गया। ऐसा लगा कि शून्य तो नकारात्मक है। गलत हो गयी, भूल हो गयी बात। शून्य तो केवल इस बात की सूचना है कि हां और न दोनों गए।
बुद्ध बार-बार कहते हैं कि लोग कहते हैं कि मैं ईश्वर को मानता हूं; कुछ लोग हैं, जो कहते हैं, मैं ईश्वर को नहीं मानता; कुछ लोग हैं, जो कहते हैं, मैं आत्मा को मानता हूं; कुछ लोग हैं, जो कहते हैं, मैं आत्मा को नहीं मानता; लेकिन मैं मान्यताओं के पार हूं। न मैं कहता हूं ऐसा है, न मैं कहता हूं वैसा है। मैं कुछ कहता ही नहीं। मैंने मान्यता ही छोड़ दी है। मैंने मन ही छोड़ दिया है। मैं शून्यभाव में ठहरा हूं।
इस शून्य का अर्थ तुम नकारात्मक मत ले लेना। इस शून्य का इतना ही अर्थ है, द्वंद्व जा चुका, विभाजन गिर चुका। दो बचे ही नहीं, चुनाव का सवाल कहां है? और जहां चुनाव को कुछ भी नहीं बचा, वहीं है सत्य। सत्य तुम्हारा चुनना नहीं है। जब तुम्हारे चुनने की सारी आदत गिर गयी, तब जो शेष रह जाता है वही सत्य है।
मैं समझता हूं, तुम कांटों से मुक्त होना चाहते हो, फूलों को बचाना चाहते हो। और सारे बुद्धपुरुषों की शिक्षा यही है कि अगर कांटों से मुक्त होना हो, तो फूलों को भी विदा दे दो। यहीं अड़चन है।
हमारी कठिनाई यही है। मन के सिक्के को हाथ में रखे हैं, एक हिस्सा प्रीतिकर मालूम होता है कि इसे बचा लें, एक हिस्सा अप्रीतिकर मालूम होता है। तो न छोड़ पाते हैं, न बचा पाते हैं। दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम। ऐसे बीच में अटक जाते हैं। ऐसे बड़ा तनाव और चिंता पैदा होती है। ऐसे बहुत खिंचे-खिंचे हो जाते हैं। ऐसे बड़ी बेचैनी पैदा होती है और जीवन एक रोग जैसा मालूम होने लगता है।
दूसरी बात पूछी है, ‘आलोचक दृष्टि से और अहंकार से कैसे छुटकारा होगा?’
मन कभी भी आलोचक दृष्टि से मुक्त नहीं हो सकता। क्योंकि मन का मतलब ही यही है कि वह हर चीज में चुनाव करता है। मन यानी चुनाव करने की क्षमता। इसीलिए तो कृष्णमूर्ति बार-बार एक बात पर जोर देते हैं--च्वाइसलेसनेस, चुनावरहितता, चुनो मत। मन कहता है, चुनो। जब तुम चुनोगे तो आलोचक बुद्धि तो आ ही जाएगी। नहीं तो चुनोगे कैसे? जब चुनोगे तब यह तो कहोगे न कि यह ठीक है और यह गलत है। गलत को गलत कहोगे तभी तो ठीक को ठीक कह सकोगे। बुरे को बुरा कहोगे तभी तो अच्छे को अच्छा कह सकोगे। पापी को पापी कहोगे तभी तो महात्मा को महात्मा कह सकोगे; नहीं तो कैसे कहोगे! रावण की निंदा न करोगे तो राम की प्रशंसा कैसे करोगे? तो आलोचना तो आ ही जाएगी। आलोचक दृष्टि भी आ जाएगी। चुनाव आया कि आलोचक आया। आलोचक को अगर खोना हो तो चुनाव को ही खोना पड़े।
इसलिए परम ज्ञानियों ने कहा है, अच्छे-बुरे में भी भेद मत करना। पापी और पुण्यात्मा में भी भेद मत करना। साधु-असाधु में भी भेद मत करना। अभेद में जीना। इंच भर का भेद और सारे भेद आ जाते हैं। जरा सा भेद और सारे भेद प्रवेश कर जाते हैं। भेद ही मत करना। जो जैसा है वैसा है, तुम चिंता न करना, तो आलोचक दृष्टि अपने आप विदा हो जाएगी।
जब मन चुनता ही नहीं, जब चुनाव ही नहीं होता, तो कुछ इकट्ठा भी नहीं होता। तब आदमी खाली का खाली जीता है, शून्यवत जीता है। स्लेट कोरी की कोरी रहती है, उस पर कुछ लिखावट नहीं होती। और जब तुम्हारे भीतर का कागज कोरा होता है, तो अहंकार निर्मित नहीं होता। कुछ लिखा कागज पर भीतर कि अहंकार बना। कुछ भी लिखा कि अहंकार बना।
एक झेन फकीर के पास उसका शिष्य आया और उसने कहा कि आप वर्षों से प्रतीक्षा करते थे, वह बात घट गयी। आप कहते थे, शून्य होकर आ, आज मैं शून्य होकर आया हूं। उसके गुरु ने कहा, शून्य को भी बाहर फेंककर आ। क्योंकि इतना भी अगर तेरे मन पर लिखा है कि आज शून्य होकर आ गया, तो अभी शून्य नहीं हुआ।
इसलिए बौद्धों ने शून्यता के अठारह भेद किए हैं। तुम चकित होओगे, शून्यता के अठारह भेद! अठारह प्रकार की शून्यता कही है। और जो आखिरी शून्यता है, जिसको उन्होंने महाशून्यता कहा है, उसमें शून्य का भी त्याग है, शून्य का भी विसर्जन है। फिर यह भी बोध नहीं रहता कि मैं शून्य हो गया हूं, कि मुझे समाधि लग गयी है, कि मैं सत्य को उपलब्ध हो गया हूं, यह लिखावट भी नहीं रह जाती। जहां चेतना का कागज बिलकुल कोरा हो जाता है, वहीं बन गया वेद, वहीं बन गया कुरान, वहीं बन गयी बाइबिल, वही से परमात्मा बोलने लगता है। उस शून्य में जो प्रस्फुटित होता है, उस शून्य से जो बहता है निर्झर, वही शाश्वत सत्य है।
तो यह सब जुड़ा है, नकारात्मक मन, आलोचक दृष्टि और अहंकार, एक ही प्रक्रिया के भिन्न-भिन्न रूप हैं।
इसे समझो। खयाल रखना, समझ तभी पैदा होती है जब तुम कभी किसी तरह के लोभ को बीच में नहीं आने देते। जब मुझे तुम सुन रहे हो, तो खयाल करना, कहीं लोभ तो बीच में आ नहीं रहा है? कहीं तुम यह तो नहीं सोचने लगे कि ऐसा हमें हो जाए; कब हो जाए, कैसे हो, जल्दी हो जाए, यह जीवन कहीं ऐसे ही न चूक जाए? यह बात होनी ही चाहिए। ऐसा लोभ अगर पैदा होता हो तो तुम जो भी सुनोगे, विकृत हो जाएगा। तुम कुछ का कुछ अर्थ कर लोगे।
सुनते समय लोभ करना ही मत। सुनते समय तो सिर्फ सुनना, शुद्ध सुनना। श्रवणमात्रेण। बस सुनते ही रहना। उसी सुनने में से एक स्फुरणा जगेगी और तुम अचानक देखोगे कि उस स्फुरणा में बुद्धि है ही नहीं। तो तुम यह नहीं पूछोगे कि बुद्धि राख कैसे हो? अगर तुमने मुझे ठीक से सुना, तो ऐसे क्षण आएंगे तुम्हारे अंतस्तल पर, ऐसी घड़ियां आएंगी, जब तुम अचानक चौंककर पाओगे कि बुद्धि है ही नहीं, राख क्या करना है! बुद्धि तो लोभ के साथ आती है।
इसीलिए तो हम बच्चे में लोभ जगाते हैं, क्योंकि अगर उसकी बुद्धि पैदा करनी है तो लोभ जगाना पड़ेगा। उससे हम कहते हैं, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, लोभ जगा रहे हैं; खेलोगे कूदोगे होगे खराब, लोभ जगा रहे हैं। नवाब बनाने का भाव पैदा कर रहे हैं। बच्चा स्कूल जाता है तो हम उसके पीछे पड़ते हैं कि प्रथम आना, पिछड़ मत जाना, बदनामी मत करवा देना हमारी; हमारे बेटे हो--किसके बेटे हो! किस कुल से आते हो, इसका खयाल रखना। कुछ बुरा मत करना। कुछ ऐसा मत करना जिससे अपमान हो जाए। सम्मान मिले, पद-प्रतिष्ठा मिले, वंश का गौरव बढ़े, ऐसा लोभ हम जगाते हैं। ऐसे लोभ के चक्कर में पड़-पड़ कर ही धीरे-धीरे बच्चे को बुद्धि पैदा होती है। बुद्धि का मतलब है, लोभ को पूरा करने की कुशलता। इसीलिए तो जो अपने जीवन में कुछ नहीं कर पाता उसको हम बुद्धू कहते हैं। हम कहते हैं, इसमें कुछ बुद्धि नहीं है।
लाओत्सू ने कहा है कि और सबके पास तो बुद्धि मालूम होती है, मैं एक बुद्धू हूं। औैर सबके पास तो बड़ी प्रखर प्रतिभा मालूम होती है, लेकिन मेरे पास कोई प्रतिभा नहीं है।
यह मजाक में ही कहा है, यह खूब गहरा व्यंग किया है लाओत्सु ने। यह कहकर इतना ही कहा है कि तुम जिसे बुद्धि कह रहे हो, वह कुछ भी नहीं है लोभ के सिवाय। मैं तो बुद्धि को खोकर असली चीज पाया हूं। अब तुम्हारे भीतर सवाल उठता है, यह बुद्धि कैसे खो दें? रोज मैं तुम्हें समझाता हूं कि बुद्धि को खो दो, लोभ उठता है कि बुद्धि को खो दें, भाव उठता है।
चूक हो रही है कहीं। जब मैं कहता हूं बुद्धि को खो दो, तो मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम्हारे किसी प्रयास से बुद्धि खोएगी। मैं इतना ही कह रहा हूं कि अगर तुमने ठीक से सुना, शांत, मौन में सुना, बिना लोभ के सुना, तो अचानक तुम पाओगे ऐसे क्षण तुम्हारे ऊपर फैलते हुए जहां बुद्धि नहीं होती, जहां विचार नहीं होता, जहां परम सन्नाटा होता है। उस सन्नाटे में तुम्हें पहली दफे स्वाद मिलेगा बुद्धि की शून्यता का। उसी स्वाद में फिर तुम धीरे-धीरे ज्यादा डूबने लगोगे, स्वाद से ही तो डूबोगे! फिर और स्वाद लेने लगोगे। कभी मुझे सुनते ऐसा होगा, फिर कभी-कभी घर शांत कमरे में बैठे कुछ न करते हुए भी ऐसा हो जाएगा।
कल एक युवक आया। उसने कहा, बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं। बैठता हूं तो एकदम खाली हो जाता हूं। घबड़ा रहा है कि अब क्या होगा? पश्चिम वापस लौटना है, घर वापस जाना है, तो और भी घबड़ाहट है कि अगर घर के लोगों ने ऐसा देखा कि खाली हो गया, तो वे समझेंगे कि पागल हो गया। उसकी घबड़ाहट तुम समझ सकते हो। पूछते हो, बुद्धि राख कब होगी? उसकी राख होने के करीब आयी तो वह सम्हाल रहा है, वह घबड़ा रहा है!
मैंने उससे पूछा कि घबड़ाहट क्या है, तुझे अच्छा नहीं लग रहा? उसने कहा, अच्छा तो बहुत लगता है, लेकिन और हजार बातों का सवाल उठता है--घर-द्वार, मां-बाप, काम-धंधा। फिर यह भी खयाल उठता है कि यह क्या हो रहा है? ऐसा तो कभी हुआ नहीं था। और जब बिलकुल शांति हो जाती है तो एक बेचैनी मालूम होती है। ऐसा तो कभी हुआ नहीं था, यह मुझे हो क्या रहा है? कहीं मेरा मस्तिष्क तो खराब नहीं हो रहा?
जब पहली दफा बुद्धि-अतीत क्षण तुममें उतरेंगे, तो तुम्हें भी ऐसा ही लगेगा कि कहीं मस्तिष्क तो खराब नहीं हो रहा? क्योंकि अब तक तो हजार उलझनों में उलझे थे, अचानक सब उलझनें छूट जाती हैं। बैठे तो बैठे रह गए, चुप हुए तो चुप रह गए, भीतर एकदम सन्नाटा हो गया। छुरी की धार की तरह लगेगा सन्नाटा, काटता चला जाएगा भीतर के केंद्र तक, आर-पार छेद देगा, घबड़ाहट होगी।
मगर अगर तुम्हें यहां सुनते-सुनते सत्संग में कभी ऐसे छोटे से क्षण आ गए, तो ये क्षण बड़े होने लगेंगे। क्योंकि इनका स्वाद ही ऐसा है। लोभ से बड़े न होंगे, स्वाद से बड़े होंगे। भेद को समझ लेना।
लोभ का मतलब है, स्वाद तो मिला नहीं, कोई और कहता था कि मैंने खूब स्वाद पाया है, उसकी बात सुनकर लोभ पैदा हुआ। और स्वाद का मतलब है, जिसको ऐसा हुआ है, उसके पास बैठकर उसके सत्संग में थोड़ा सा रस लूटा। लोभ और स्वाद का भेद खयाल रखना। जैसे मैं मिठाई की बात करूं और तुम्हारे मन में लोभ पैदा हो कि मिठाई हम खाएं। यह एक बात हुई। मेरे पास बैठकर तुम मिठाई का स्वाद ले लो, यह बात बड़ी और हुई।
अगर तुम्हें यहां बैठ-बैठकर स्वाद मिल गया--इसीलिए रोज बोल रहा हूं। कुछ समझाने को है, ऐसा नहीं। समझाने को क्या है? समझने को क्या है? न समझाने को कुछ है, न समझने को कुछ है। यहां रोज-रोज बोल रहा हूं, ताकि तुम्हें एक मौका रहे कि तुम मेरे पास बैठकर थोड़ी देर को डुबकी लगा लो। फिर यह डुबकी का स्वाद आ गया तो कभी-कभी घर शांत बैठे-बैठे डुबकी लग जाएगी। तुम्हारे बावजूद डुबकी लग जाएगी। तुम शायद लगाने के लिए सोच भी नहीं रहे थे, बैठे-बैठे लग जाएगी। कभी संगीत को सुनते वक्त लग जाएगी। कभी चांद-तारों को देखते वक्त लग जाएगी। कभी एक बच्चे की किलकारी सुनकर लग जाएगी। कभी गुलाब के खिले फूल को देखकर लग जाएगी।
फिर यह लगने लगेगी और-और घटनाओं में। फिर धीरे-धीरे तो ऐसी घटनाओं में लगने लगेगी, जब तुमने सोचा भी नहीं होगा कभी कि इसमें लग सकती है। चाय की चुस्की लेते हुए लग जाएगी। स्नान करते वक्त लग जाएगी। रात बिस्तर पर लेटे-लेटे लग जाएगी। सुबह आंखें खुल गयी हैं, बिस्तर पर पड़े-पड़े लग जाएगी। फिर तो अकारण लगने लगेगी।
स्वाद जब आने लगा तो बढ़ेगा। फिर तुम ऐसा न पूछोगे कि बुद्धि जलकर राख कब होगी? यह बुद्धि जलकर राख होने की जरूरत ही नहीं है, यह तो राख है ही। तो राख को ही तुम अंगारा समझे बैठे हो, इसको कुछ राख करना नहीं है। तुम्हारे हाथ में असली स्वाद आ जाए तो यह दिखायी पड़ने लगेगी कि राख है।
तुमने एक पत्थर के टुकड़े को हीरा समझ रखा है, अब तुम मुझसे यह पूछते हो कि यह पत्थर का टुकड़ा कब होगा? यह पत्थर का टुकड़ा है। इसको पत्थर का टुकड़ा होना नहीं है। अगर यह हीरा ही होता तो पत्थर का टुकड़ा बनाने की जरूरत ही क्या थी, यह तो बहुमूल्य है, इसको बचाने का सवाल था। यह राख है। हां, तुम्हें असली हीरे का पता चल जाए तो उसकी तुलना में तत्क्षण यह पत्थर हो जाएगा। तत्क्षण! फिर देर न लगेगी। फिर सोच-विचार भी न करना पड़ेगा। असली हीरा दिखा कि यह पत्थर तो पत्थर था ही, असली हीरे की मौजूदगी में साफ-साफ झलक जाएगा कि पत्थर है।
तो मैं तुम्हें बुद्धि को राख करने के लिए नहीं कह रहा हूं, बुद्धि तो राख है; कूड़ा-कचरा है, दूसरों से उधार लिया हुआ है। अपना जो नहीं, वह सब कचरा है। तुम्हारे पास अपना कुछ स्वाद हो जाए।
अब तुम पूछते हो, यह स्वाद कैसे हो?
यहां रोज तुम बैठते हो, इस बैठने में ही स्वाद को जगाना। यह बैठक साधारण बैठक न रहे। यह दरबार है, यह बैठक नहीं; यहां से तुम सम्राट होकर जा सकते हो। यहां जो घट रहा है, वह ऊपर-ऊपर जो सुनायी पड़ता है वही नहीं है, कुछ भीतर के तार जुड़ रहे हैं।
तुम मुझे ऐसे सुनो, जिसमें लोभ न हो। डुबकी लगाकर सुनो। और यह खयाल ही छोड़ दो कि सुनने के बाद फिर कुछ करना है, यह बात ही जाने दो। मैं तुमसे बार-बार कहता हूं कि यह सुनने मात्र से भी हो सकता है। क्योंकि यह हुआ ही हुआ है। इसे पाना नहीं है। जिस दिशा में मैं इशारे कर रहा हूं, वह दिशा तुम्हारे भीतर मौजूद है। जिस मालकियत की मैं बात कर रहा हूं, उसका आयोजन नहीं करना है, उसका निर्माण नहीं करना है, एक झीना सा पर्दा पड़ा है, उस पर्दे को हटा देना है।
और मैं कहता हूं, तुम मुझे मौका दो तो मैं हटा दूं। तुम्हें इतना भी कष्ट करने की जरूरत नहीं। मैं हटा दूं। तुम जरा मुझे पास आने दो! बड़ा झीना पर्दा है। हटाने में जरा देर न लगेगी। पर्दा हटते ही तुम पाओगे, जिसकी तुम तलाश करते थे, वह तुम्हारे भीतर मौजूद है।
जैसे, जब तुम आलोचना करते हो तब तुम्हें मजा आता होगा। अपनी बुद्धि के पैनेपन से मजा आता होगा कि देखो, कैसी धार की तरह बुद्धि! जब तुम किसी का खंडन करते होओगे, तो तुम्हें मजा आता होगा कि देखो, मैं ज्यादा बुद्धिमान, तुम कम बुद्धिमान। जब तुम अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते होओगे किसी के सामने, तो रस आता होगा कि देखो, तुम कुछ भी नहीं जानते, मैं कितना जानता! मैं कहां, तुम कहां! इसमें जरूर कहीं रस आ रहा होगा। बिना रस के तो तुम यह कर नहीं सकते। बिना रस के तो कोई लगाव होता नहीं है। दुख भी पा रहे हो...अब समझना, कैसा है मामला!
दुख कब मिलता है? जब तुम्हारी बुद्धि हारती है तब दुख मिलता है। और जब जीतती है तब सुख मिलता है। जब कोई तुम्हें तर्क में पराजित कर देता है तो दुख मिलता है। जब तुम तर्क में जीत जाते हो तो सुख मिलता है। तब तो तुम बड़े झंझट में पड़े हो। क्योंकि यही बुद्धि सुख दिलाती, यही दुख दिलाती; यही नाव डुबाती, यही किनारे लगाती मालूम पड़ती, तो इसको छोड़ो कैसे! जब हार के क्षण होते हैं तब तुम छोड़ना चाहते हो, जब जीत के क्षण होते हैं तब तुम पकड़ रखना चाहते हो। और यह तो रोज होता रहेगा। यह हार और जीत तो घड़ी के पेंडुलम की तरह घूमती रहती है। प्रतिपल हार और जीत हो रही है। हार और जीत दो पंख हैं। दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
इसे देखो। बुद्धि में दुख मिल रहा है, इसका मतलब है कि बुद्धि में अभी सुख भी मिल रहा होगा। सुनो मेरी बात--एक घड़ी ऐसी आती है जब बुद्धि दुख भी नहीं दे सकती है, क्योंकि सुख ही नहीं देती तो दुख कैसे देगी? जब बुद्धि दुख भी नहीं दे सकती तभी समझना कि लगाव छूटा। अब दुख भी देने को क्या है! जिससे सुख मिलता, उससे दुख मिलता। जिससे दुख मिलता, उससे सुख जरूर मिलता होगा। जिस दिन तुम पाओगे कि बुद्धि दुख भी नहीं दे पाती, उसी दिन बात खतम हो गयी, उस दिन सुख भी गया।
तुमने खयाल किया, कभी ऐसे आदमी ने तुम्हें दुख दिया जिससे तुम्हें सुख न मिलता हो? इसीलिए तो अपने जो करीब होते हैं वे ही दुख देते हैं, दूर के लोग तो दुख नहीं देते। इसलिए पत्नी दुख देती है, पति दुख देता है, बेटा दुख देता है, मां दुख देती, पिता दुख देता, मित्र दुख देते, दूर जो हैं वे तो दुख नहीं देते। जो जितने पास है उतना ज्यादा दुख देता है। क्यों? क्योंकि जो जितना पास है, उससे उतना सुख मिलता है। मिलता या नहीं मिलता, कम से कम आभास तो होता है। जिससे आभास हो गया, उससे दुख मिलता है। तुम्हारी पत्नी तुम्हें बिना देखे निकल जाए, तो दुख होगा। कोई एक अजनबी औरत तुम्हें बिना देखे निकल जाए तो कोई दुख नहीं होता। तुम्हारा बेटा तुम्हें सम्मान न दे तो दुख होता है, किसी और का बेटा तुम्हें सम्मान न दे तो कोई दुख नहीं होता, कोई कारण नहीं है दुख का।
खयाल करना, जिससे सुख की आशा है, उसी से दुख है।
मेरी बात समझो, बुद्धि दुख भी क्या देगी! बुद्धि में है क्या दुख देने को! थोथे विचारों की भीड़ है, दुख क्या होगा? नपुंसक विचारों की भीड़ है, दुख क्या होगा? आते-जाते विचार की लहरें हैं, दुख क्य
ा होगा? तुम बुद्धि को न तो दुख देने वाली, न सुख देने वाली, ऐसा जानो। दोनों नहीं है। तब तुम पाओगे कि तुम्हारी दूरी बढ़ने लगी। एक दिन तुम पाओगे, तुम्हारी उपेक्षा सघन हो गयी।
बुद्ध ने उपेक्षा शब्द का बहुत उपयोग किया है। उपेक्षा का अर्थ होता है, न दुख मिलता है, न सुख मिलता है। न कुछ लेना, न कुछ देना। ऐसे भाव में थिर हो जाने का नाम उपेक्षा है। उपेक्षा बड़ा महत्वपूर्ण शब्द है। जिससे कोई भी अपेक्षा न रही, ऐसी दशा का नाम उपेक्षा है। जिससे कुछ भी मिलेगा नहीं, ऐसा भाव थिर हो गया।
ऐसी उपेक्षा में जो जीने लगता है, उसको फिर कोई चीज सुख-दुख नहीं देती। सफलता आती है, द्वार-दरवाजा ठकठकाकर चली जाती है; असफलता आती है, द्वार-दरवाजा ठकठकाकर चली जाती है; सम्मान आता है, फूलों की वर्षा हो जाती है, अपमान आता है, कांटे बरस जाते हैं, वह बैठा रहता है, वह साक्षीभाव से बैठा रहता है। वह दोनों को एक ही भांति देखता रहता है। उसकी दृष्टि सम होती है।
बुद्धपुरुषों का बुद्धत्व के बाद दुबारा जन्म क्यों नहीं होता है?
परमात्मा घर है--सत्य कहो, निर्वाण कहो, मोक्ष कहो--संसार विद्यालय है। वहां हम भेजे जाते हैं, ताकि हम परख लें, निरख लें, कस लें कसौटी पर अपने को सुख-दुख की आंच में, सब तरह के कड़वे-मीठे अनुभव से गुजर लें और वीतरागता को उपलब्ध हो जाएं। सब गंवा दें, सब तरफ से भटक जाएं, दूर-दूर अंधेरों में, अंधेरी खाइयों-खड्डों में सरकें, सत्य से जितनी दूरी संभव हो सके निकल जाएं और फिर बोध से वापस लौटें।
बच्चा भी शांत होता, निर्दोष होता; संत भी शांत होता, निर्दोष होता। लेकिन संत की निर्दोषता में बड़ा मूल्य है, बच्चे की निर्दोषता में कोई खास मूल्य नहीं है। यह निर्दोषता जो बच्चे की है, मुफ्त है, कमायी हुई नहीं है। यह आज है, कल चली जाएगी। जीवन इसे छीन लेगा। संत की जो निर्दोषता है, इसे अब कोई भी नहीं छीन सकता। जो-जो घटनाएं छिन सकती थीं, उनसे तो गुजर चुका संत। इसलिए परमात्मा को खोना, परमात्मा को ठीक से जानने के लिए अनिवार्य है। इसलिए हम भेजे जाते हैं।
बुद्धपुरुष को तो भेजने की कोई जरूरत नहीं, जब फल पक जाता है तो फिर डाली से लटका नहीं रहता, फिर क्या लटकेगा! किसलिए? वृक्ष से लटका था पकने के लिए। धूप आयी, सर्दी आयी, वर्षा आयी, फल पक गया, अब वृक्ष से क्यों लटका रहेगा! कच्चे फल लटके रहते हैं। बुद्ध यानी पका हुआ फल।
छोड़ देती है डाल
रस भरे फल का हाथ
किसी और कसैले फल को
मीठा बनाने के लिए
छोड़ ही देना पड़ेगा। वृक्ष छोड़ देगा पके फल को, अब क्या जरूरत रही! फल पक गया, पूरा हो गया, पूर्णता आ गयी। बुद्धत्व का अर्थ है, जो पूर्ण हो गया। दुबारा लौटने का कोई कारण नहीं।
हमारे मन में सवाल उठता है कभी-कभी, क्योंकि हमें लगता है, जीवन बड़ा मूल्यवान है। यह तो बड़ी उलटी बात हुई कि बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति को फिर जीवन नहीं मिलता। हमें लगता है, जीवन बहुत मूल्यवान है। बुद्धत्व को जो उपलब्ध है, उसे तो पता चल गया और बड़े जीवन का, और विराट जीवन का।
ऐसा ही समझो कि तुम शराबघर जाते थे रोज, फिर एक दिन भक्तिरस लग गया, फिर मंदिर में नाचने लगे, डोलने लगे, फिर प्रभु की शराब पी ली, अब शराबघर नहीं जाते। शराबी सोचते होंगे कि बात क्या हो गयी! ऐसी मादक शराब को छोड़कर यह आदमी कहां चला गया? अब आता क्यों नहीं?
इसे बड़ी शराब मिल गयी, अब यह आए क्यों? इसे असली शराब मिल गयी, अब यह नकली के पास आए क्यों? इसे ऐसी शराब मिल गयी जिसको पीकर फिर होश में आना ही नहीं पड़ता। और इसे एक ऐसी शराब मिल गयी जिसमें बेहोशी भी होश है। अब यह इस क्षुद्र सी शराब को पीने क्यों आए?
बुद्धत्व को पाया व्यक्ति परम सागर में डूब गया। जिसकी तुम तलाश करते थे, जिस आनंद की, वह उसे मिल गया, अब वह यहां क्यों आए? यह जीवन तो कच्चे फलों के लिए है, ताकि वे पक जाएं, परिपक्व हो जाएं। इस जीवन के सुख-दुख, इस जीवन की पीड़ाएं, इस जीवन के आनंद, जो कुछ भी है, वह हमें थपेड़े मारने के लिए है, चोटें मारने के लिए है।
देखा, कुम्हार घड़ा बनाता है, घड़े को चोटें मारता है। एक हाथ भीतर रखता है, एक हाथ बाहर रखता, चाक पर घड़ा घूमता और वह चोटें मारता! फिर जब घड़ा बनकर तैयार होगा, चोटें बंद कर देता है; फिर घड़े को आग में डाल देता है। फिर जब घड़ा पक गया, तो न चोट की जरूरत है, न आग में डालने की जरूरत है।
संसार में चोटें हैं और आग में डाला जाना है। जब तुम पक जाओगे, तब प्रभु का परम रस तुममें भरेगा। तुम पात्र बन जाओगे, तुम घड़े बन जाओगे, फिर कोई जरूरत न रह जाएगी।
मनुष्यों में जो प्रथम बुद्ध हुए होंगे, वे किस मार्ग से गए होंगे? उनका गुरु कौन था?
यह अस्तित्व शाश्वत है, सनातन है। यह सदा से है और सदा रहेगा। न यहां कोई प्रथम है, न यहां कोई अंतिम है। हमारी बुद्धि की सीमा है, हम इस शाश्वत को नहीं देख पाते। हम कितना ही खींचें इस शाश्वत को, हमें फिर भी लगता है, कहीं तो, कभी तो कुछ शुरू हुआ होगा। हम कितना ही पीछे जाएं, कितना ही पीछे जाएं, हमें लगता है कि फिर भी किसी दिन तो ऐसा हुआ होगा कि सब शुरू हुआ। बिना शुरू हुए सब कैसे हो गया! हमें यह बात असंभव लगती है कि सब सदा से है।
और इसके कारण हम एक दूसरी असंभव बात को मान लेते हैं कि एक दिन कुछ भी न था और फिर सब हो गया! दूसरी बात ज्यादा असंभव है। पहली बात उतनी असंभव नहीं है। क्योंकि जो आज है, वह कल भी हो सकता है, परसों भी हो सकता है। जीवन, अस्तित्व सदा से है। कभी हुआ नहीं, इसका कोई प्रारंभ नहीं है और न इसका कोई अंत है। यह एक सतत धारा है। इस सातत्य को समझो, तो फिर तुम्हें यह सवाल नहीं उठेगा कि पहला बुद्ध जब हुआ होगा। पहला बुद्ध होगा कैसे! ऐसा हो ही कैसे सकता है! सोचो, यह तो बात बड़ी दुर्घटना की होगी।
अगर कोई पहला बुद्ध हुआ--समझो कि दस हजार साल पहले पहला बुद्ध हुआ--तो उसके पहले सारा अस्तित्व बुद्धत्व से हीन रहा? उसके पहले कभी कोई बुद्ध नहीं हुआ? अनंत-अनंत काल तक अस्तित्व में कोई फूल न खिला? यह तो बड़ी बेरौनक बात होगी। इसलिए बुद्ध कहते हैं, अनंत बुद्ध मुझसे पहले हुए हैं, अनंत बुद्ध मेरे बाद होंगे, बुद्ध होते ही रहे हैं।
अस्तित्व कभी भी बुद्धत्व से खाली नहीं हुआ। सारी बदलाहट, यह बड़ी धारा, यह बड़ा क्रम, हमें लगता है कभी-कभी कि ऐसा पहले शायद न हुआ हो। सोचो, जब कोई व्यक्ति पहली दफा प्रेम में पड़ता है तो उसे लगता है, ऐसा तो कभी भी नहीं हुआ था, ऐसा प्रेम! लेकिन क्या तुम सोचते हो यह पहली घड़ी होगी? अनंत-अनंत लोगों ने प्रेम किया है और सबने ऐसा ही अनुभव किया है कि ऐसा कभी न हुआ होगा। फिर भी प्रेम सदा होता रहा है। जैसे प्रेम सदा होता रहा है, वैसे ध्यान भी सदा होता रहा है। इस जगत में कुछ भी नया नहीं है। कुछ भी नया हो नहीं सकता। नए का तो अर्थ ही यह होगा कि अनंत-अनंत काल तक न हुआ, फिर आज हो गया। तो ये अनंत काल व्यर्थ ही गए--बांझ! कुछ पैदा न हुआ!
बुद्ध ने या महावीर ने इस सत्य की खूब चर्चा की है। इस सत्य को बांटा है। अलग-अलग पहलुओं से समझाने की कोशिश की है। एक पहलू समझने जैसा है, कि जगत का अस्तित्व वर्तुलाकार है। जैसे गाड़ी का चाक घूमता है। तुम एक वर्तुल बनाओ और एक रेखा खींचो। तो रेखा में तो प्रारंभ होता है और अंत होता है। तुम बता सकते हो कि यहां रेखा शुरू हुई, यहां अंत हो गयी। लेकिन वर्तुल को तुम कैसे बताओगे, कहां रेखा शुरू हुई, कहां अंत हो गयी? वर्तुल तो बस है। न कोई प्रारंभ है न कोई अंत। अस्तित्व वर्तुलाकार है।
भारत के राष्ट्रीय ध्वज पर जो चाक बना है, वह बौद्धों का है। और वह चाक अस्तित्व का प्रतीक है। जैसे चाक घूमता, चक्र घूमता, ऐसा वर्तुलाकार है अस्तित्व। फिर-फिर वही आरे ऊपर आ जाते हैं। जैनों ने कहा है कि प्रत्येक कल्प में चौबीस तीर्थंकर होते हैं, जैसे कि एक गाड़ी के चके में चौबीस आरे हों। फिर कल्प होगा, फिर चौबीस तीर्थंकर होंगे, फिर कल्प होगा, फिर चौबीस तीर्थंकर होंगे। और ऐसे अनंत कल्प हुए और अनंत कल्प होते रहेंगे, गाड़ी का चाक घूमता रहेगा।
पूरब और पश्चिम में समय की धारणा में यही भेद है। पश्चिम की समय की धारणा एक रेखा जैसी जाती है। पूरब की समय की धारणा वर्तुलाकार है। और पूरब की समय की धारणा ज्यादा सत्य के अनुकूल है, क्योंकि रेखाएं होती ही नहीं। तुमने कोई भी चीज रेखा में देखी है?
बच्चा हुआ, जवान हुआ, बूढ़ा हुआ। आया था तब बिना दांत के आया था, बूढ़ा जब हो गया तो फिर बिना दांत के हो गया। एक वर्तुलाकार प्रक्रिया है। बूढ़े फिर बच्चों जैसे जिद्दी हो जाते हैं, फिर बच्चों जैसे निर्दोष हो जाते हैं, फिर बच्चों जैसे झगड़ालू हो जाते हैं, फिर बच्चों जैसा ही उनका ढंग हो जाता है, व्यवहार हो जाता है।
ऐसे ही मौसम घूमते हैं--गर्मी आयी, फिर वर्षा आयी, फिर शीत आयी, फिर गर्मी आ गयी। ऐसे ही चांद-तारे घूमते हैं। ऐसे ही पृथ्वी घूमती है। ऐसा ही सूरज घूमता है। यह सारा अस्तित्व वर्तुल में घूम रहा है।
तो पूरब कहता है, समय भी वर्तुलाकार ही होगा, रेखाबद्ध नहीं हो सकता। इसलिए पूरब ने इतिहास नहीं लिखा। क्योंकि इतिहास का मतलब तो तभी होता है जब घटना एक बार घटती हो और बार-बार न घटती हो। तब तो इतिहास लिखने का कोई मतलब होता है, क्योंकि प्रत्येक घटना अनूठी है। फिर दुबारा तो होगी नहीं, हो गयी तो हो गयी, इसलिए लिख रखने जैसी है। अगर बार-बार होनी है तो लिख रखने जैसी क्या है! फिर होगी, फिर होगी, होती ही रही है। इसलिए पूरब ने इतिहास नहीं लिखा, पूरब ने पुराण लिखा। पुराण बड़ी अलग बात है।
इसलिए पश्चिम और पूरब की समझ में बड़े भेद हैं। जब पश्चिम का कोई व्यक्ति राम की कथा पढ़ता है, तो वह पूछता है कि यह ऐतिहासिक है या नहीं? ऐसा हुआ या नहीं? हमारे पास इसका उत्तर नहीं है। क्योंकि हमें इतिहास में रस ही नहीं है। हमारा तो यह कहना है कि जब भी अनंत-अनंत काल में राम हुए हैं, तो उन सबकी कथा का यह सार है।
इस फर्क को समझना।
एक तो है एक आदमी एक स्त्री के प्रेम में पड़ा और हमने उसका ब्यौरा लिखा। कैसे प्रेम में पड़ा, कहां प्रेम में पड़ा, रास्ते में मिल गए, कि बस में मिल गए, कि ट्रेन में मिलना हो गया, हमने उसका ब्यौरा लिखा। एक-एक बात लिखी, कौन घड़ी, कौन ठिकाने, किस तिथि में मिलना हुआ, कब विवाह किया, कब इनको बच्चा पैदा हुआ, यह सब ब्यौरा लिखा। यह तो इतिहास है।
फिर हमने जितने लोग अब तक प्रेम में पड़े, उन सबके प्रेम का जो सारभूत है, जो प्रेम का निचोड़ है, वह लिखा। वह पुराण है। उसमें किसी एक व्यक्ति का ब्यौरा नहीं है। उसमें सारे व्यक्तियों के प्रेम का सार-निचोड़ है। कहां मिले, यह सवाल अब महत्वपूर्ण नहीं है। मिले, यह बात जरूर सच है। क्योंकि बिना मिले कैसे प्रेम होगा? प्रेम हुआ, यह बात सच है, तो प्रेम का मौलिक अंश क्या है, मूलभूत क्या है, वह हमने लिखा।
राम की कथा कोई ऐसी कथा नहीं है कि इस कल्प में हुई; बहुत बार हुई। उस हर बार होने से जो हमने सार-निचोड़ लिया, वह लिखा। इसी तरह जीसस का जो जीवन है, वह ऐतिहासिक है, उसमें तथ्यों पर जोर है। महावीर का जो जीवन है, वह ऐतिहासिक नहीं है। और बुद्ध का जो जीवन है, वह भी ऐतिहासिक नहीं है।
इतिहास दो कौड़ी का है, क्योंकि हमारी पकड़ बहुत गहरी है। हम यह कहते हैं कि जब भी जितने बुद्ध हुए, उन सबका जो सार-निचोड़ है, वह हमने फिर गौतम बुद्ध में पढ़ लिया, फिर हमने गौतम बुद्ध के नाम से लिख दिया। फिर आगे कोई बुद्ध होगा, गौतम बुद्ध तब तक भूल जा चुके होंगे, बिछड़ गए होंगे इतिहास के पुराने रास्तों पर, भूल चुके होंगे, फिर नया बुद्ध सारे बुद्धों में जो होता है, उसको फिर से पुनरुज्जीवित कर देगा। लेकिन कथा वही है। नाम बदल जाते हैं, रंग-ढंग बदल जाते हैं, लेकिन कथा वही है। गीत वही है, धुन वही है, टेक वही है।
इसलिए सारी बातें बुद्ध के जीवन में जो लिखी हैं, तुम ऐसा मत सोचना कि वे सच हैं। सच ऐतिहासिक अर्थों में नहीं हैं। कई बातें ऐसी हैं जो दूसरे बुद्धों के जीवन में घटी होंगी। और कई बातें ऐसी हैं जो आने वाले बुद्धों के जीवन में घटेंगी। बुद्ध के जीवन में हमने सबका सार रख दिया है। निचोड़ है।
गुलाब का एक फूल है, यह इतिहास! और हमने बहुत से फूलों का इत्र निकाल लिया, यह पुराण। उस इत्र में सभी गुलाबों की गंध आ गयी। मगर अब तुम यह न कह सकोगे, किस गुलाब से बना यह इत्र, अब मुश्किल है, अब बताना बिलकुल मुश्किल है। जो तुम्हारी बगिया में खिला था, उस गुलाब से? या जो पड़ोसी की बगिया में खिला था, उस गुलाब से, कि पीले गुलाब से, कि लाल गुलाब से, कि सफेद गुलाब से? अब यह बताना बहुत मुश्किल है। अब तो यह इत्र सबका सार-निचोड़ है।
हमने इत्र लिखा, पश्चिम गुलाबों की रूपरेखा लिखता है, एक-एक गुलाब का हिसाब रखता है। हम कहते हैं, एक-एक गुलाब का हिसाब रखने से सार भी क्या है। सब गुलाब अपनी मूलभूत सत्ता में समान होते हैं, इसलिए हमारे सत्य सार्वलौकिक हैं, सार्वभौम हैं, शाश्वत हैं।
प्रश्न है कि ‘किस मार्ग से गए होंगे वे? उनका गुरु कौन था?’
उनके पहले इतना ही समय हो चुका था जितना हमारे पहले हुआ है, क्योंकि समय अनंत है। इसमें हिसाब नहीं लगाया जा सकता है।
मैंने सुना है, एक म्यूजियम में म्यूजियम का गाइड एक यात्रियों के दल को चीजें दिखा रहा था। फिर उसने एक अस्थिपंजर बताया और कहा कि यह एक करोड़ तीन साल सात दिन पुराना है। यात्री भी थोड़े चौंके! एक करोड़ तीन साल सात दिन पुराना! उन्होंने कहा, एक करोड़ तो ठीक, मगर यह तीन साल और सात दिन! इतना हिसाब रखा है! उसने कहा, हां! तो कैसे पता चला यह तीन साल और सात दिन का? तो उसने कहा, ऐसे पता चला कि आज से तीन साल सात दिन पहले इस म्यूजियम का जो डायरेक्टर है, उसने मुझसे कहा था कि यह एक करोड़ वर्ष पुराना है। तो अब मैं उसमें जोड़ता जाता हूं, क्योंकि अब तीन साल सात दिन बीत चुके।
अतीत अनंत है। तुम क्या सोचते हो कि हम बुद्ध के पच्चीस सौ साल बाद हुए--पच्चीस सौ साल बाद--तो क्या तुम सोचते हो, अतीत की अनंतता में धन पच्चीस सौ साल जुड़ गए? अतीत की अनंतता में क्या जोड़ोगे, क्या घटाओगे? अनंत अतीत की दृष्टि से तो कुछ भी नहीं बीता है, पच्चीस सौ साल कुछ भी नहीं बीते, बीता ही नहीं कुछ! अनंत में कुछ जोड़ो तो बढ़ता नहीं और घटाओ तो घटता नहीं। उपनिषद का वचन तुम्हें याद है न, पूर्ण में पूर्ण को जोड़ दो तो पूर्ण बड़ा नहीं होता, और पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लो तो पूर्ण छोटा नहीं होता। पूर्ण का अर्थ ही यह होता है, उसमें जोड़ा नहीं जा सकता और घटाया नहीं जा सकता। कितना ही जोड़ते चले जाओ।
अनंत का खयाल करो, हमसे पहले अनंत काल बीत चुका है। अनंत का अर्थ ही होता है कि जिसका कभी कोई प्रारंभ नहीं था। अब उसमें पच्चीस सौ साल जुड़ने से कोई फर्क थोड़े ही पड़ता है। जितना काल हमसे पहले बीता है, उतना ही काल बुद्ध के समय में भी बीत चुका था। उतना ही! और हमारे बाद भी पच्चीस सौ साल बाद जब कोई आएगा, और चर्चा करेगा, तब भी उतना ही काल बीता है, कुछ फर्क नहीं पड़ा है।
इसलिए किस मार्ग से गए होंगे उनके पहले जो बुद्ध गए थे? अनंत-अनंत बुद्ध! स्वभावतः उसी मार्ग में से उन्होंने अपना मार्ग चुना होगा। उनके पहले जो अनंत दीपस्तंभ हुए थे, उन्हीं की रोशनी में उन्होंने अपनी खोज की होगी।
यहां कोई पहला नहीं है और यहां कोई अंतिम नहीं है। हम सब संयुक्त हैं।
तुम ऐसा सोचो, तुम अपने पिता से पैदा हुए, तुम्हारे पिता अपने पिता से पैदा हुए होंगे, पिता के पिता और किसी से पैदा हुए होंगे, तुमने कभी ऐसा सोचा कि पहला आदमी किससे पैदा हुआ होगा? वैसे ही यह भी प्रश्न है, पहला आदमी किससे पैदा हुआ होगा? पहला आदमी हो ही नहीं सकता। क्योंकि जब भी कोई आदमी पैदा होगा, पिता की जरूरत पड़ेगी, मां की जरूरत पड़ेगी। किसी से पैदा होगा। पहला आदमी हो ही नहीं सकता। और न अंतिम आदमी हो सकता है। क्योंकि जो है, वह रहेगा, मिटता नहीं। जो है, था और रहेगा।
इसका तुम्हें बोध आ जाए, यह विस्तार का तुम्हें थोड़ा स्मरण आ जाए।
यह कठिन है स्मरण करना, क्योंकि हमारी बुद्धि की बड़ी सीमा है, कितना ही खींचो-तानो, हम कहते हैं, कोई तो हुआ होगा पहले! हमारा मन पूछे ही चला जाता है, कोई तो हुआ होगा पहले! कभी तो अंत होगा!
इसे और तरह से देखो। हम कहते हैं, जगत असीम है। सोचो, चलते जाओ, चलते जाओ, चलते जाओ, प्रकाश की गति से चलो--प्रकाश बड़ी तीव्र से तीव्र गति है, एक लाख छियासी हजार मील प्रति सेकेंड--प्रकाश की गति से तुम्हारा हवाई जहाज चला जा रहा है, या और भी बड़ी गति खोज लो। क्या तुम कभी ऐसी घड़ी में आओगे जहां तुम जगत की सीमा पर पहुंच जाओ?
समझना, इस पर दार्शनिक बहुत चिंतन करते रहे हैं कि ऐसी कोई जगह आएगी जहां तख्ती लगी हो कि यहां समाप्त हो गया संसार, अब आगे मत जाना नहीं तो गिर पड़ोगे? मगर अगर आगे गिर पड़ने को भी जगह है, तो अभी संसार बाकी है। अगर सीमा भी खींची जा सकती है कि यहां संसार समाप्त हो गया, तो सीमा तो बनती ही दो से है, तो यहां से कोई और चीज शुरू हो गयी। हर अंत शुरुआत है। हर द्वार कहीं खुलता है, कहीं बंद होता है।
अगर तुम एक ऐसी जगह पहुंच गए--ठीक है, यहां होता है ऐसा कि तुम पहुंच गए, महाराष्ट्र खतम, गुजरात शुरू, यह यहां हो जाता है। लेकिन गुजरात तो होना चाहिए, नहीं तो महाराष्ट्र खतम कैसे होगा? महाराष्ट्र खतम हो जाता है, गुजरात शुरू हो जाता है; हिंदुस्तान खतम हो जाता है, पाकिस्तान शुरू हो जाता है। जहां कुछ खतम होता है, वहां तत्क्षण कुछ शुरू हो जाता है। अगर यह विश्व कहीं खतम होता हो और एक रेखा आ जाती हो, जहां तख्ती लगी है, चुंगी-चौकी बनी है कि बस, आगे मत बढ़ना, यहां संसार खतम! तो उसका मतलब है, आगे कुछ तो होगा।
नहीं, ऐसी चुंगी-चौकी पर तुम कभी न पहुंचोगे। ऐसी कोई चुंगी-चौकी है ही नहीं। हो ही नहीं सकती। होना ही असंभव है। क्योंकि जहां भी रेखा खींचनी हो, रेखा दो के बीच खिंचती है। और अगर दूसरा मौजूद है तो अभी अंत नहीं आया। तो रेखा खिंच ही नहीं सकती। रेखा असंभव है। जब हम कहते हैं, जगत असीम है, तो हम कहते हैं, आकाश असीम है। और जब हम कहते हैं, जगत अनंत है, तो हम कहते हैं, समय, काल की धारा अनंत है।
समय और आकाश दोनों अनंत हैं। यहां न कभी कोई प्रथम हुआ और न कोई अंतिम होगा।
आपके चरणों में सिर रखकर अपना प्रेम प्रगट करना मेरा ध्येय था, जिसके कारण मुझे संन्यास लेने में अड़चन नहीं हुई। कृपया बताएं कि गुरु की क्या जिम्मेवारी है? मुझे कैसे भरोसा आए कि मुझे गुरु प्राप्त हो गया? मैं आपसे चकित हूं!
अपनी बात तो तुमने नहीं पूछी, तुम फिकर कर रहे हो कि गुरु की क्या जिम्मेवारी है! जैसे तुम्हारा काम तो अब पूरा हो गया; क्योंकि चरणों में सिर रख दिया, बात खतम हो गयी। हालांकि चरणों में सिर अभी रखा नहीं, नहीं तो जिम्मेवारी पूछते नहीं। जब चरणों में सिर रख ही दिया तो अब बचा क्या! अब बात खतम हो गयी। अब जो मर्जी सो करो। अब जैसा लगे, करो। यह गर्दन काटनी हो तो काट दो। अब कोई बात न रही पूछने की।
लेकिन तुमने चरणों में सिर रखकर जैसे गुरु पर अनुकंपा की, कि अब बोलो! कि हम तो कर दिए जो करना था, अब आपकी तरफ से क्या होगा? क्योंकि हमने तो सिर रख दिया!
सिर में है क्या? सिर काटकर बेचने जाओगे, कितने में बिकेगा?
ऐसा हुआ, कि अकबर के पास फरीद कभी-कभी आता था, अकबर फरीद के पास भी कभी-कभी जाता था। फरीद अनूठा फकीर था। जब अकबर फरीद के पास जाता या फरीद अकबर के पास आता तो अकबर सिर झुकाकर उसके चरणों में प्रणाम करता था। अकबर के वजीरों को बात न जंचती थी, उनको बड़ा अखरता था कि बादशाह और किसी फकीर के चरणों में सिर झुकाए! आखिर उनसे न रहा गया और उन्होंने कहा, यह शोभा नहीं देता कि आप अपना सिर झुकाएं फकीर के कदमों में। इसकी कोई जरूरत नहीं है, साधारण आदमी जैसा आदमी, आपने समझा क्या है! आप क्यों इतना अपने को विनम्र कर लेते हैं? तो अकबर ने कहा, तुम एक काम करो, इसका उत्तर तुम्हें शीघ्र ही दूंगा, अभी रुको।
कोई महीने-पंद्रह दिन बाद एक आदमी को फांसी हुई, अकबर ने उसकी गर्दन कटवा ली और अपने वजीरों को कहा कि इसको बाजार में जाकर बेच आओ। सुंदर आदमी था, सुंदर चेहरा था, आंखें बड़ी प्यारी थीं। साफ-सुथरा करके सोने की थाली में रखकर वजीर उसको बाजार में बेचने गए। जिसकी दुकान पर गए, उसी ने कहा कि हटो, हटो, बाहर निकलो! तुम्हारा दिमाग खराब हुआ है? इसको करेंगे क्या लेकर? आदमी का सिर किस काम आता है, उन्होंने कहा! अगर हाथी का सिर होता तो कुछ काम भी आ जाए। हिरन का सिर हो तो कुछ सजावट के काम आ जाए। इसको हम करेंगे क्या! यह बदबू आएगी और गंदगी होगी, हटो! कोई आदमी दो पैसा देने को तैयार नहीं हुआ। वजीर बड़े हैरान हुए।
लौटकर आए, अकबर से कहा, कि दुखी हैं हम, लेकिन कोई आदमी दो पैसा देने को तैयार नहीं, उलटे लोग नाराज होते हैं। जिसके पास हम गए उन्होंने कहा कि तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, इसको करेंगे क्या?
तो अकबर ने कहा कि यह तुम्हारे लिए मेरा उत्तर था। आदमी के सिर की कीमत क्या है! दो पैसे में भी कोई लेने को तैयार नहीं है। तुम सोचते हो, मेरा सिर काटकर किसी दिन तुम बेचने जाओगे तो कोई खरीदेगा! तो जिसकी दो कौड़ी कीमत नहीं है, उसको अगर मैंने किसी फकीर के चरणों में झुका दिया, तुम्हें अड़चन क्या है? जिसका कोई मूल्य ही नहीं है!
इसका नाम झुकाना है। सिर में मूल्य नहीं है, इसको जानना ही सिर का झुकाना है। तुमने झुकाया होगा सिर, लेकिन यही सोचकर कि बड़ा गजब कर रहे हैं! बड़ी अनूठी घटना तुम कर रहे हो! कि देखो सिर झुका रहे हो! तुम्हारे मन में यह खयाल है कि सिर का कोई बड़ा मूल्य है। मैं जानता हूं कि तुमने बड़ी अड़चन से झुकाया होगा, बहुत दिन सोचा होगा, विचारा होगा। लेकिन तुम्हारे सोच-विचार से कुछ सिर में मूल्य नहीं आ जाता। सिर झुकाने का अर्थ यह है कि तुमने यह कहा कि सिर में तो कुछ भी नहीं है, अब सिर के आगे कुछ यात्रा हो जाए। सिर में तो कुछ नहीं पाया, अब सिर के पार जाने की अभीप्सा प्रगट की।
इसीलिए पूरब में हम सिर झुकाते हैं गुरु के चरणों में जाकर। हम यह कहते हैं कि सिर से तो कुछ मिला नहीं, सिर की तो दौड़-धूप खूब कर लिए हैं, सिर की तो माराधापी खूब कर ली है, इससे कुछ मिला नहीं। पीड़ा पायी, असंतोष पाया, अतृप्ति पायी, ज्वरग्रस्त रहे, दुख-स्वप्न देखे, सिर से तो कुछ मिला नहीं, यह तो आपके पैरों में रख देते हैं यह सिर, अब कुछ ऐसा बताएं कि सिर के ऊपर कैसे जाएं? सिर का कोई मूल्य नहीं है, यही घोषणा सिर झुकाने में है।
तुम पूछते हो कि मैंने तो अपना सिर आपके चरणों में रख दिया, अब? बताएं कि गुरु की जिम्मेवारी क्या है?
तुम सोचते हो, तुम्हारा काम खतम हो गया। तुम्हारा काम शुरू हुआ। सिर में तो कुछ था नहीं, कचरा तुमने चढ़ा दिया पैरों पर, अब भूल जाओ सिर को। अगर नहीं भूले और याद रखा तो चढ़ाया ही नहीं। और अब पूछो कि शिष्य की जिम्मेवारी क्या है? अब मैं क्या करूं? यह तो कोई करने जैसी बात न थी, यह तो सिर्फ शुरुआत है करने की। यह कोई बहुत बड़ा काम नहीं हो गया। इससे कुछ क्रांति नहीं हो जाएगी। अब क्या करूं? व्यर्थ तो छोड़ दिया, अब सार्थक को कैसे तलाशूं? यह पूछो।
लेकिन तुम पूछते हो, ‘गुरु की जिम्मेवारी क्या है?’
तुम्हारा मतलब यह है कि हमारी तरफ का काम तो हमने कर दिया है, अब आप, अब आप बताएं आपकी जिम्मेवारी क्या है?
यह बात ही शिष्य न होने का लक्षण है। मेरी जिम्मेवारी मैं समझता हूं। तुम उसे समझ भी न सकोगे अभी। अभी तुम शिष्य भी नहीं हुए, तो तुम गुरु की जिम्मेवारी तो कैसे समझ सकोगे? गुरु की जिम्मेवारी तो तभी समझ में आएगी जब तुम शिष्यत्व की गहराई में इतने उतर जाओगे कि तुम्हारे भीतर ही गुरु का जन्म होने लगेगा, तब तुम गुरु की जिम्मेवारी समझ सकोगे। अभी तो तुम्हें आंख चाहिए, अभी तो तुम्हें विनम्रता चाहिए, सरलता चाहिए, ध्यान चाहिए, प्रेम चाहिए, भक्ति चाहिए, अभी तो तुम्हें बहुत कुछ करना है। यह तो सिर्फ घोषणा हुई तुम्हारी, तुमने शपथ ली कि हम झुक गए, अब हम करने को तैयार हैं; अब जो कहेंगे, हम करेंगे।
लेकिन प्रश्न महत्वपूर्ण है। क्योंकि अधिक लोगों का यही भाव होता है कि हम तो कर दिए जो करने योग्य था, अब जो करना हो आप करें। मैं करूंगा, लेकिन मेरे अकेले किए कुछ भी न होगा, क्योंकि तुम्हारी स्वतंत्रता परम है। तुम अगर साथ दोगे तो ही होगा। मैं तो करूंगा, लेकिन अगर तुमने विरोध किया तो कुछ भी न हो सकेगा। तुमने अगर द्वार-दरवाजे बंद रखे, तो यह सूरज की किरण बाहर ही खड़ी रहेगी और भीतर न आ सकेगी। सूरज की किरण जोर-जबरदस्ती से भीतर आ भी नहीं सकती। तुम्हें सहयोग देना होगा, द्वार-दरवाजे खोलना होगा।
अब तुम पूछते हो, ‘मुझे कैसे भरोसा आए कि मुझे गुरु प्राप्त हो गया?’
यह तुम्हें भरोसे का सवाल ही नहीं है। तुम्हें तो इतना ही भरोसा लाना है कि तुम शिष्य हो गए, बस, इतना ही भरोसा आ जाए तो बात समाप्त हो गयी। तुम्हारा काम तुम पूरा कर दो। इतनी बात तुम्हारी तुम पूरी कर दो कि तुम शिष्य हो गए, तुम्हारे शिष्य होने में ही भरोसा आ जाएगा कि गुरु मिल गया। और कोई उपाय नहीं है। मैं और कोई प्रमाण नहीं जुटा सकता। जो भी प्रमाण जुटाऊंगा, वे व्यर्थ होंगे। उनसे कैसे भरोसा आएगा? मैं लाख कहूं कि तुम्हें मिल गया, इससे कैसे भरोसा आएगा?
तुम शिष्य बनोगे, उसी शिष्य बनने में कुछ रसधार बहेगी, कुछ प्राणों में गुनगुनाहट उठेगी, कुछ मस्ती जगेगी, उसी मस्ती में प्रमाण मिलेगा कि गुरु मिल गया, अब अकेला नहीं हूं। तुम अपने अकेलेपन में भी एकांत में जब मौन बैठोगे तब तुम पाओगे कि कोई मौजूद है। तुम अपने भीतर भी झांकोगे तो पाओगे कोई मौजूद है। तुम्हारा हाथ किसी के हाथ में है। चलते, उठते, बैठते जैसे-जैसे तुम शिष्य बनते जाओगे, वैसे-वैसे तुम्हें लगता जाएगा कि गुरु साथ है। एक घड़ी ऐसी आती है कि तुम तो विसर्जित ही हो जाते हो, तुम्हारे भीतर गुरु ही विराजमान हो जाता है।
अभी तो सिर झुकाया है, अभी हृदय में विराजमान करना होगा। और उसी के साथ प्रमाण मिलेगा।
शिष्य का ऐसा भाव होता है--स्वामी योग प्रीतम ने एक गीत लिखा है--
जब तुम अपना माधुर्य लुटाते हो मुझ पर
मेरे प्राणों के नीलकमल खिल जाते हैं।
तेरी स्वरलहरी का आलिंगन पाते ही
हृद्वीणा हौले से झंकृत हो जाती है
तेरी मस्ती की धुन बजने लगती मुझमें
मेरे तन-मन की पंखुड़ियां खुल जाती हैं
छिड़ जाता कैसा राग तुम्हारे कंठों से
अंतस आंगन में कोटि दीप जल जाते हैं
जब तुम अपना माधुर्य लुटाते हो मुझ पर
मेरे प्राणों के नीलकमल खिल जाते हैं।
जाने कैसा जादू है तेरी चितवन में
मन के सब खिड़की-दरवाजे खुल जाते हैं
मन का सारा काठिन्य पिघल जाता पल में
जन्मों-जन्मों के पाप-शाप धुल जाते हैं
जब तुम निज करुणाजल बरसाते हो मुझ पर
मेरे भीतर शत-शत झरने बह जाते हैं
जब तुम अपना माधुर्य लुटाते हो मुझ पर
मेरे प्राणों के नीलकमल खिल जाते हैं।
तेरे भीतर से बरस रहा है प्रेमामृत
जो प्यासे चातक पी जाते हैं महाभाग
तू एक छबीला फूल जगत की बगिया का
वे धन्य भ्रमर जो लूट रहे तेरा पराग
जब तुम अपना आशीष लुटाते हो मुझ पर
मेरे नभ में सौ-सौ सूरज उग आते हैं
जब तुम अपना माधुर्य लुटाते हो मुझ पर
मेरे प्राणों के नीलकमल खिल जाते हैं।
शिष्य का भाव ऐसा है। वह तो आंखें खोलकर जैसे चातक चंद्रमा को निहारे, ऐसा गुरु को निहारता है। प्रमाण नहीं पूछता। तुम्हारी आंख ही धीरे-धीरे प्रमाण देने लगेगी। जैसे-जैसे तुम्हारी आंख खुलेगी और रोशनी तुम्हारे भीतर उतरेगी वैसे-वैसे प्रमाण मिलेगा। वह तो अपने हृदय को खोलकर बैठ जाता है। वह तो अपनी सब साज-सुरक्षा छोड़ देता है। वह तो अपने हृदय पर से सब द्वारपाल हटा देता है। वह तो कहता है, आओ, जब भी आओ, दिन-रात, सोते-जागते, मेरा हृदय खुला पाओगे। धीरे-धीरे गुरु की पगध्वनि हृदय के पास सुनायी पड़ने लगती है।
सुंदर है। चकित हो, यह शुभ है। लेकिन इतने से ही काम नहीं होगा। चकित होना अच्छी शुरुआत है, तुम आश्चर्य से भर गए हो। लेकिन यह आश्चर्यभाव जल्दी ही खो जाएगा, अगर आगे न बढ़े। आश्चर्यभाव तो ऐसा ही है जैसे हम कार को चलाना शुरू करते हैं, तो बैटरी से कार शुरू होती है। मगर बैटरी से चलती नहीं। शुरू हो गयी, फिर तो इंजिन से चलती है, फिर तो पेट्रोल से चलती है। चकित-भाव तो कार में बैटरी की भांति है। यात्रा शुरू हो जाती है इससे, लेकिन तुम इसी के सहारे रहे तो ज्यादा देर नहीं चल पाएगी।
शायद उसी चकित-भाव में तुमने आकर सिर भी झुका दिया है। तुम्हारे सिर झुकाने में समर्पण मालूम नहीं होता, चकित-भाव मालूम होता है। कभी-कभी आदमी भौचक्केपन में कुछ कर जाता है, लेकिन वह कुछ बहुत दूरगामी पाथेय नहीं बन सकता। कुछ और गहराई में झुकना पड़ेगा।
नहीं जो झुका कर किसी देहरी पर
झुका द्वार तेरे, तुम्हारी शरण में
न पाया कहीं तृप्ति का एक कण भी
यहां जल कहां, आग का हर कुआं है
तने इंद्रधनुष हैं, मगर वायवी सब
यहां आर्द्र बादल कहां, सब धुआं है
चखे फल यहां के, सभी तिक्त कटु हैं
मिला शांति मधुरस तुम्हारे स्मरण में
जहां से चखो, क्षारमय जग समंदर
यहां खूब निर्झर, मगर सब जहर के
किरणजाल मोहक, मगर सब छलावा
यहां विषबुझे दंश हैं हर लहर के
नहीं छांव शीतल, जगत यह मरुस्थल
गिरा हार-थक कर तुम्हारे चरण में
नहीं जो झुका कर किसी देहरी पर
झुका द्वार तेरे, तुम्हारी शरण में
चलो झुका, कहीं झुका! इतने पर ही मत रुके रह जाना। झुकना तो शुरुआत है, मिटने की। मिटे बिना न चलेगा। और तुमने झुकते से ही मिटने के खिलाफ आयोजन शुरू कर दिया।
तुम पूछते हो, कैसे भरोसा आए कि मुझे गुरु प्राप्त हो गया है? तुम पूछते हो कि गुरु के कर्तव्य क्या हैं? गुरु की जिम्मेवारी क्या है?
तुम गुरु का हिसाब रखने लगे। तुमने गलत बात पहले से ही उठा ली। फिर मेरे साथ ज्यादा देर न चल सकोगे, यह मैं तुम्हें कह दूं। मेरा हिसाब जिसने रखा, वह ज्यादा देर मेरे साथ चला नहीं। वह ज्यादा देर चल ही नहीं सकता, क्योंकि वह बहुत होशियार है, चालाक है। वह रत्ती-रत्ती हिसाब लगाकर चलता है। मेरे साथ जुआरियों की दोस्ती है। जो हिसाब-किताब रखता ही नहीं। जिन्होंने एक दफे दांव पर लगा दिया तो फिर लौटकर देखा नहीं। फिर उन्होंने कहा कि अब ठीक, अब तुम जो करो सो ठीक, अब तुम जो कहो सो ठीक। तुमने अगर अपनी बुद्धि बचायी तो सिर उठ-उठ जाएगा, बार-बार चरण चूक-चूक जाएंगे।
तो यह तो बात ही भूल जाओ। मेरे कर्तव्य का मुझे पता है, मेरी जिम्मेवारी मुझे मालूम है। तुम्हें मालूम होने से कुछ लाभ भी न होगा। तुम अपना कर्तव्य पूछो, तुम अपनी जिम्मेवारी पूछो।
तुम्हारी जिम्मेवारी अब यह है कि जो सिर झुका है, उसे काट ही डालना है। तुम्हारी जिम्मेवारी यह है कि अभी झुके हो, अब बिलकुल मिट जाना है। मिटकर ही तुम हो सकोगे, खोकर ही तुम पा सकोगे। तुम जाओ तो ही परमात्मा आ सकता है।
यद्यपि मैं सिख परिवार से आया हूं तो भी पच्चीस वर्षों तक मेरा विश्वास ईसाइयत में रहा। लेकिन आपकी पुस्तकें पढ़ने के बाद मुझे लगा कि यह तो बड़ी जीवंत बात है और मेरे लिए ईसाइयत का प्रभाव समाप्त हो गया। आप पर पूरा ईमान आ गया है, लेकिन मन अभी भी अशांत है। देर रात तक आपका साहित्य पढ़ता हूं तो ही कहीं नींद आती है। कृपाकर मेरा मार्गदर्शन करें।
तुम्हारा तर्क मैं समझा, तुम्हारा तर्क शायद यह है कि वह श्रद्धा ईसाइयत पर थी, यह श्रद्धा आप पर है। यह तो फर्क हुआ। लेकिन तुम तो वही के वही हो। ईसा पर श्रद्धा हो, कि बुद्ध पर, कि महावीर पर, इससे अंतर नहीं पड़ता। असली अंतर तो श्रद्धा किसकी है, उसमें रूपांतरण हो तो ही पड़ता है।
अब तुम सिख परिवार में पैदा हुए तो नानक पर श्रद्धा रही होगी बचपन में। वह गयी, ईसा पर आ गयी। मुझे पढ़ा, वह भी चली गयी। कल कुछ और पढ़ लोगे, कल किसी और को सुन लोगे, यह भी चली जाएगी। तुम्हारी श्रद्धा को परखो। तुम्हारी श्रद्धा श्रद्धा नहीं है।
अब फर्क समझना।
जिसने सच में ही नानक पर श्रद्धा की है, वह मुझे सुनकर नानक पर श्रद्धा नहीं छोड़ता, मुझ पर श्रद्धा आ जाती है और नानक पर श्रद्धा बढ़ जाती है। जिसको सच में ही ईसा पर श्रद्धा रही, वह मुझे सुनकर ईसा पर श्रद्धा नहीं छोड़ता, मुझ पर श्रद्धा आ जाती है, ईसा पर श्रद्धा और गहरी हो जाती है। क्योंकि मैं जो कह रहा हूं वह कुछ ईसा और नानक के विपरीत तो नहीं। मैं जो कह रहा हूं, वह वही है जो उन्होंने कहा है। और निश्चित ही, जीसस ने जो कहा है वह दो हजार साल पुरानी भाषा में कहा है, उससे तुम्हारा तालमेल उतना नहीं बैठ सकता है जितना मुझसे बैठ सकता है, क्योंकि मैं तुम्हारी भाषा में बोल रहा हूं।
नानक ने कहा--वह पांच सौ साल पुरानी भाषा है। पांच सौ साल लंबा फासला है। नानक में और मुझमें ठीक पांच सौ साल का फासला है। पांच सौ साल छोटा फासला नहीं है। सब भाषा बदल गयी है। सत्य को कहने का ढंग बदल गया है। सत्य को समझने की प्रक्रिया बदल गयी है। लोग बदले, लोगों का मन बदला, वातावरण बदला है।
इस सारी बदलाहट में, मैं तुमसे जो कह रहा हूं, वह तुम्हारे मन के ज्यादा अनुकूल पड़ेगा, यह स्वाभाविक है। क्योंकि मैं तुम्हारी भाषा बोल रहा हूं। नानक उनकी भाषा में बोले जिनसे बोलते थे। जीसस उनकी भाषा में बोले जिनसे बोलते थे। मैं तुमसे बोल रहा हूं। मैं बीसवीं सदी से बोल रहा हूं। मैं अत्याधुनिक मन से बोल रहा हूं। स्वभावतः तुम्हें मेरी बात ज्यादा ठीक से पकड़ में आ जाएगी।
लेकिन अगर तुम्हें मेरी बात पकड़ में आ गयी, तो तुम्हें नानक की बात भी पकड़ में आ जाएगी। तुम अहोभाव से भर जाओगे कि नानक पर श्रद्धा तो थी, लेकिन अभी तक ठीक-ठीक साफ-साफ नहीं हुआ था, अब साफ हो गयी बात। महावीर की बात तुम्हें ठीक से पकड़ में आ जाएगी, बुद्ध की बात ठीक से पकड़ में आ जाएगी। इसीलिए तो बुद्ध, नानक, महावीर, कृष्ण, क्राइस्ट पर बोल रहा हूं। क्योंकि मैं तुम्हारी श्रद्धा खंडित करने को नहीं हूं, तुम्हारी श्रद्धा को मजबूत करने को हूं।
अगर मैं कभी किसी के विपरीत बोलता हूं तो सिर्फ इसीलिए कि वे धार्मिक व्यक्ति नहीं हैं, लोगों ने भ्रांति से उन्हें धार्मिक समझा है। तो ही। अगर मैं जानता हूं कि कोई व्यक्ति धार्मिक है तो मैं एक शब्द भी उसके विपरीत नहीं बोलता। हां, अगर किसी अधार्मिक व्यक्ति को किन्हीं भूल-भ्रांतियों के कारण धार्मिक समझ लिया गया है तो मैं जरूर कठोरता से खंडन करता हूं। जरूर कठोरता से खंडन करता हूं, क्योंकि वह खतरनाक बात है।
जैसे कभी पीछे किसी ने पूछा महर्षि दयानंद के संबंध में, तो मैंने कहा कि नहीं, मैं महर्षि दयानंद के पक्ष में एक शब्द नहीं बोल सकता। मेरे लिए वे वैसे ही महात्मा हैं जैसे महात्मा गांधी। दोनों सामाजिक, राजनैतिक आंदोलनकारी हैं, धर्म बहाना है।
लेकिन नानक या कबीर या कृष्ण या जरथुस्त्र या मोहम्मद या ईसा, उन्होंने जो कहा है, वही मैं कह रहा हूं। उससे अन्यथा कहने को कुछ है नहीं। सत्य एक है। जिन्होंने जाना है, उसी एक सत्य को कहा है, भिन्न-भिन्न ढंग से कहा होगा, लेकिन एक ही सत्य को कहा है।
वेद कहते हैं, उस एक सत्य को ही ज्ञानियों ने अलग-अलग ढंग से कहा है।
तो पहली तो बात यह है कि तुम अपनी श्रद्धा परखो, तुम्हारी श्रद्धा में कहीं भूल-चूक है। नानक पर उठ गयी, ईसा पर जम गयी, मुझ पर जम गयी! मैं तुम्हारी श्रद्धा से खुश नहीं हूं। साधारणतः तुम यही सोच रहे होओगे कि तुम्हारा प्रश्न सुनकर मैं प्रसन्न होऊंगा कि चलो कितना अच्छा हुआ कि एक आदमी जीसस से टूटा और मेरा हुआ। इतनी जल्दी कोई मेरा नहीं हो सकता! जो जीसस का न हुआ, वह मेरा कैसे हो सकेगा? और अगर तुम मेरे हो गए हो, तो तुम्हारे पास आंख आएगी जिससे तुम जीसस को पहचान पाओगे और पहली दफे जीसस के हो पाओगे। और वही आंख तुम्हें नानक का भी बना देगी।
लेकिन तुमने श्रद्धा का अर्थ, मालूम होता है, कुछ तार्किक निष्पत्तियां मान रखा है--जो बात तुम्हारे तर्क को जंच जाती है। फिर तुम चूकोगे। क्योंकि धर्म तर्क की बात ही नहीं है।
मैं जरूर तर्क का उपयोग करता हूं, मैं तर्क पर सवारी करता हूं। इसलिए कभी-कभी तार्किकों को मेरी बात बहुत जंच जाती है। लेकिन वे भ्रांति में न रहें, जल्दी ही उनको चौंका दूंगा। देर-अबेर नहीं लगेगी, ज्यादा देर नहीं लगेगी कि मैं कोई ऐसी बात कहूंगा जो कि तर्क के बिलकुल बाहर होगी, विपरीत होगी।
तो तुम्हें मेरी बातें ठीक लग गयी होंगी, क्योंकि मैं जो कह रहा हूं वह तर्कयुक्त है। लेकिन तर्क का मैं उपयोग कर रहा हूं साधन की तरह, ले जाना है तर्क के पार। जीसस ने तर्क का उपयोग नहीं किया। जीसस तो कह दिए जो कहना है। मैं तर्क का भी उपयोग कर रहा हूं। क्योंकि यह सदी बिना तर्क की भाषा के और कोई भाषा समझ नहीं सकती। लेकिन ले जाना तो तर्क के पार है। तो जल्दी ही तुम अड़चन में पड़ जाओगे।
इसलिए मैं तुमसे कहता हूं, अपनी श्रद्धा पर फिर पुनर्विचार करो। तुम्हारी श्रद्धा भ्रांत रही है, गड़बड़ रही है। तुम्हारी श्रद्धा तर्क पर आधारित रही है। इसीलिए ईसाइयत से तुम प्रभावित हो गए होओगे, क्योंकि ईसाइयत काफी तर्क जुटाती है। ईसा ने तो कुछ तर्क नहीं दिए, लेकिन ईसाइयत काफी तर्क जुटाती है। क्योंकि ईसाइयत तो पश्चिम से आती है, पश्चिम तो तर्क की दुनिया है। तो ईसाइयत को अगर अपने पैर पर खड़े रहना है तो उसे तर्क जुटाने पड़ते हैं। तो ईसाइयत जंच गयी होगी।
लेकिन मेरे वश में पश्चिम का तर्क ही नहीं है, पूरब का तर्क भी है। और मेरे वश में तर्कातीत भी है। इसलिए फिर मेरा तर्क तुम्हें जंच गया होगा। क्योंकि मेरे तर्क में पश्चिम के सारे तर्क में जो-जो कुशलता है वह तो है ही, पूरब के तर्क की जो-जो मधुरिमा है वह भी है। और तर्कातीत जो अनुभव है, उसका रंग भी है। इसलिए तुम्हें जंच गयी होगी बात।
लेकिन अब मौका आ गया है कि तुम अपनी श्रद्धा को ठीक पहचान लो। और यह अब तक की इस सड़ी-गली श्रद्धा को तुम फेंको। इसीलिए अड़चन भी आ रही है।
अब तुम कहते हो कि ‘आप पर पूरा ईमान आ गया है।’
क्या ईसाइयत पर पूरा ईमान नहीं था? पच्चीस साल था। तो पूरे ईमान का क्या भरोसा? अभी पूरा है, अभी खिसक जाएगा। यह तुम्हारी आदत है। तुम जिस पर भी ईमान ले आते हो, मान लेते हो पूरा हो गया। फिर उतर जाएगा तो पूरा ही उतर जाएगा। और तब तुम्हारी अड़चन साफ है।
तुम कहते हो, ‘मन अभी भी अशांत है।’
अब ईमान आने से थोड़े ही मन शांत होता है! नहीं तो मन कभी का शांत हो गया होता। सिख घर में पैदा हुए थे, सिख-धर्म पर ईमान रहा होगा, उससे मन शांत न हुआ। फिर ईसाइयत पच्चीस साल, लंबा वक्त है, उससे मन शांत न हुआ। मेरे साथ तो शायद दो-चार महीने की दोस्ती होगी, इससे कैसे मन शांत हो जाएगा! एक बात तो समझो कि भरोसा कर लेने से मन शांत नहीं हो जाता। मन शांत करने के लिए मन की अशांति के कारण तोड़ डालने पड़ेंगे।
तुम्हें एक डाक्टर पर भरोसा आ गया, इससे थोड़े ही इलाज हो जाएगा। डाक्टर पर भरोसा आ गया, यह सहयोगी बात है, अब डाक्टर का प्रिस्क्रिप्शन लेकर भी तो काम शुरू करोगे न! कि तुमने इतना कह दिया कि आ गया डाक्टर पर भरोसा, लेकिन अभी भी बीमारी दूर नहीं हो रही है, बात क्या है? और ईमान पूरा आ गया। ईमान आ गया इससे लाभ होगा, लेकिन इतना काफी नहीं है, पर्याप्त नहीं है। दवा भी लेनी होगी; औषधि भी लेनी होगी और पथ्य भी स्वीकार करना होगा। कुछ बातें छोड़नी होंगी, कुछ बातें पकड़नी होंगी, रूपांतर करने होंगे।
इसके पहले कि यह श्रद्धा भी खो जाए, कुछ करो। इस श्रद्धा का उपयोग कर लो। जो हुआ अतीत में हुआ, जितने दिन बेकार गए गए, अब बेकार मत जाने दो। अब इस श्रद्धा के प्रभाव में कुछ कर गुजरो ताकि मन की व्यवस्था बदल जाए।
तुम अशांत हो, उसका अर्थ है, मन में अशांति के कारण होंगे। तुमने कभी ध्यान किया? बिना ध्यान के शांति न आएगी। तुमने कभी पूजा की, भक्ति की? बिना पूजा-भक्ति के शांति न आएगी। तुमने कभी प्रेम किया? बिना प्रेम के शांति न आएगी। और तुमने कभी विश्लेषण किया कि तुम्हारे मन की अशांति का मूल कारण क्या है? क्यों रात तुम सो नहीं पाते? तुम्हारा मन दौड़ता होगा--और धन कमा लूं और बड़े पद पर पहुंच जाऊं, यह कर गुजरूं, वह कर गुजरूं। तुम्हारा मन दौड़ता रहता होगा, इसलिए तुम सो नहीं पाते।
तो मन की दौड़ की जो महत्वाकांक्षाएं हैं, उनको विदा करो। धन पाकर क्या होगा! पद पाकर क्या होगा! मौत आती है, मौत की पगध्वनि सुनो। वह धन भी छीन लेगी, पद भी छीन लेगी। जागो और मन की व्यवस्था बदलो।
अब अगर तुम मेरे प्रभाव में आ गए हो तो मेरी सुनो भी। उसके अनुसार थोड़ा करो भी। ध्यान करो, नाचो, गाओ, गुनगुनाओ; थोड़ा मस्ती में डूबो। अचानक तुम पाओगे--अशांति गयी। और जब अशांति जा चुकी होगी, तब तुम्हें जो श्रद्धा आएगी वह असली श्रद्धा होगी। क्योंकि जिसके द्वारा अशांति चली गयी हो, फिर उसको छोड़ना असंभव हो जाएगा। और जिसके द्वारा सुख का थोड़ा सा स्वाद आ जाएगा, उसको फिर कैसे छोड़ सकोगे?
तुम्हें ईसा से कुछ भी सुख का स्वाद नहीं आ पाया, क्योंकि तुमने ईसा की मानकर कभी कुछ किया नहीं। बाइबिल पढ़ते रहे होओगे। तो बाइबिल पढ़ने से क्या होगा! यह तो ऐसा ही है जैसे कोई पाकशास्त्र की किताब बैठा पढ़ रहा है, पढ़ रहा है, पढ़ रहा है! और भूख लगी है और मरा जा रहा है, और चिल्लाता है कि क्या करूं, पाकशास्त्र की किताब पढ़ रहा हूं, फिर भी भूख नहीं मिटती।
तो बाइबिल तुम पढ़ते रहे होओगे। लेकिन इससे कुछ नहीं हुआ। अब तुम मेरी किताबों का मत वैसा ही उपयोग करने लगना जैसा बाइबिल का किया था।
अब तुम कह रहे हो, ‘जब रात नींद नहीं आती तो आपका साहित्य पढ़ता हूं तो कहीं नींद आती है।’
तो तुम साहित्य का उपयोग इस तरह कर रहे हो? नींद लाने की दवा की तरह? साहित्य का उपयोग करो जीवन को बदलने के लिए, जीवन को क्रांति देने के लिए।
अच्छा हुआ, क्योंकि नानक तो अब हैं नहीं, तुम अगर उन पर श्रद्धा भी रखते तो बहुत कुछ होने वाला नहीं था। ईसा तो अब हैं नहीं, तुम उन पर श्रद्धा भी रखते तो बहुत कुछ होने वाला नहीं था। तुम्हारा सौभाग्य है कि तुम किसी जीवित आदमी के करीब आ गए हो। संयोग है। इस सौभाग्य के क्षण का ठीक उपयोग कर लो। तो फिर शायद श्रद्धा को और कहीं जाने की जरूरत न रहेगी।
यही श्रद्धा तुम्हारा अंतिम पड़ाव बन जाए, ऐसा आशीष देता हूं।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Why don’t the enlightened ones take birth again after enlightenment?
According to Osho, enlightened ones don’t take birth again because birth is a school for ripening the soul. Through pleasure and pain we mature; once realization ripens—like a fruit letting go of the branch—there’s no further cause to return. Having dissolved into the greater Life, the ‘real wine,’ they are complete vessels; existence no longer needs to test or shape them.
In simple terms: Life is like school; once you’ve fully learned and grown, you graduate and don’t have to come back.
Who were the first Buddhas among human beings?
According to Osho, there were no “first” Buddhas—time is beginningless, so enlightened ones have arisen without a starting point and will continue without an end. Asking for the first is meaningless, like seeking the first human. Innumerable Buddhas discovered their own ways within an infinite continuum; we are all interconnected in this timeless flowering of awakening.
In simple terms: There was never a first Buddha—wise, awakened people have always been here, just like there’s no first parent because every child has parents.
Were there buddhas before and after Buddha?
According to Osho, Buddhahood is a timeless state of awakened consciousness, not a person. Gautam became a Buddha, but many buddhas existed before him and many after; he himself acknowledged earlier ones. ‘Buddha’ simply means one in whom awareness has fully dawned. The Zen question—sweeping before or after Buddha—points beyond chronology to the present quality of awareness.
In simple terms: Buddha just means fully awake; people were awake before and after Gautam, and what matters is being aware right now.
What is the responsibility of the Master?
According to Osho, a Master's responsibility is the Master's alone; it is not the disciple's concern. Real discipleship is to drop the 'head' (the ego-mind), trust, and focus on one's own work: surrender, receptivity, and practice. When surrender is authentic, bargaining ends and transformation begins; questions about the Master's duties simply disappear.
In simple terms: Don't worry about what the teacher should do; your job is to let go of your stubborn head, trust, and do the practice.
What does it mean for the intellect to burn to ashes?
According to Osho, the ‘intellect burning to ashes’ is not an act you perform; it’s the natural disappearance of thought when greed and goal-seeking subside. Intellect is the machinery of desire; in pure, greedy-less listening and silent awareness, a spontaneous clarity arises and thinking is absent. You taste the emptiness of intellect—nothing remains to destroy, only stillness, presence, and direct knowing.
In simple terms: When you stop wanting anything and just listen quietly, your busy thinking goes away by itself.
How can one be free of the negative mind, the critical eye, and the ego?
According to Osho, you cannot drop the negative mind while preserving the positive; they are two sides of one coin. Freedom comes by going beyond mind itself—beyond all yes/no, gain/loss, theist/atheist—into silence and inner emptiness (shunya). In that choiceless awareness, the critical eye and ego—both mind-structures—dissolve, and what remains is a nondual clarity that doesn't need affirmation or denial.
In simple terms: Don’t try to keep “good” thoughts and throw away “bad” ones; rest in quiet awareness until all taking-sides stops and the judging “me” fades.
What path did the first Buddhas among human beings follow, and who was their master?
According to Osho, speaking of a “first” Buddha is mistaken: existence is beginningless, and Buddhas have always flowered. Meditation and awareness are the timeless path recurring in every cycle. Therefore the so‑called first among humans had no outer guru; their master was the eternal law of existence—the Dharma itself—guiding awakening from within.
In simple terms: There was no first Buddha; people always awaken through meditation, learning from life itself inside them.
