✓ already translated: opens instantly. A new translation takes about a minute and is then saved for everyone.
Questions in this Discourse
ओशो, हरमन हेस की प्रसिद्ध पुस्तक सिद्धार्थ में एक पात्र है वासुदेव। वासुदेव प्रमुख पात्र सिद्धार्थ से कहता है: मैंने नदी से सीखा है, तुम भी नदी से सीखो। नदी सब सिखा देती है। वासुदेव का नदी से सीखने का क्या आशय है--कृपा करके हमें कहिए।
एक ही नदी में दुबारा उतरने का उपाय नहीं है। क्योंकि जब तुम दुबारा उतरोगे, तब तक बहुत पानी बह चुका होगा। ऐसा हेराक्लतु ने कहा। बुद्ध एक कदम और आगे गए।
बुद्ध ने कहा: एक ही नदी में दुबारा उतरने का उपाय नहीं है, क्योंकि नदी का बहुत पानी बह चुका होगा और तुम्हारा भी बहुत पानी बह चुका होगा। जब तुम दुबारा उतरने आओगे, तब न तो नदी वह है, जो पहले थी; न तुम वह हो, जो पहले थे। प्रतिपल सब बह रहा है।
वासुदेव इसी सत्य को कह रहा है। वासुदेव एक मांझी है। वह नदी में लोगों को इस पार से उस पार उतारने का काम करता है। वर्षों से यही काम करता है। नदी के साथ ही रहा है। जब कोई नहीं होता, तो एकांत में नदी के किनारे बैठा होता है। जब कोई आ जाता है, तो उसे नदी पार करा देता है।
उसने नदी के सब रूप-रंग देखे हैं। वर्षा में नदी का तूफानी रूप देखा है, जब भयंकर बाढ़ आती है और नदी फैलकर सागर जैसी हो जाती है। और उसने गर्मी में इसी नदी की सूखी हुई देह भी देखी है, जैसे तन्वंगी--जरा सी धार रह जाती है!
उसने इस नदी में बहुत भाव-भंगिमाएं देखी हैं--प्रवाह की, गति की, गत्यात्मकता की। शांत इस नदी के किनारे बैठकर उसने नदी की मरमर ध्वनि सुनी है। नदी के प्रवाह को देखकर उसने पाया कि जीवन बहा जा रहा है। जीवन की क्षणभंगुरता समझी है। नदी में उठते-बनते-मिटते बबूलों को देखकर उसने अपने को भी एक बबूला समझा है। यहां सभी बनता है, सभी मिट जाता है। यहां कुछ भी थिर नहीं है।
ऐसे नदी के सत्संग में धीरे-धीरे उसे बोध हुआ है। उस बात को वासुदेव कहता है सिद्धार्थ से--कि नहीं किसी गुरु के पास जाने की जरूरत है; और न कोई शास्त्र पढ़ने की। मैं तो इस नदी के पास रह-रहकर ही जान गया, सीख गया, समझ गया।
कुछ बातों का प्रतीक नदी है। पहला तो--बहाव।
जीवन के अधिकतम दुख इसीलिए हैं कि तुमने जीवन को नदी की तरह नहीं देखा है। मेरा आशय है कि तुम्हारे जीवन में जो भी है, तुम उसे पकड़ रखना चाहते हो। और यहां कोई भी चीज पकड़कर नहीं रखी जा सकती। यहां कोई चीज रुकती नहीं, ठहरती नहीं। तुम हारोगे। तुम विषाद से भरोगे। विफलता तुम्हारे जीवन का अंग हो जाएगी।
और तुमने हर चीज पकड़नी चाही है। जो भी आया, तुमने उसे पकड़ रखना चाहा है। तुम्हारे घर एक बेटा पैदा हुआ और तुमने पकड़ रखना चाहा है। लेकिन यह बेटा जाएगा। यह बड़ी दुनिया पड़ी है; इसे बहुत खोज करनी है; इसे बहुत दूर की यात्राएं करनी हैं। तुमने अगर इसे पकड़ा, तो तुम दुख पाओगे। तुम्हें छोड़ने की तैयारी होनी चाहिए। जैसे एक दिन बच्चा मां का गर्भ छोड़ देता है, ऐसे ही एक दिन बच्चा मां की छाया भी छोड़ देगा। जाएगा दूर--स्वयं की खोज में लगेगा। और स्वयं होने के लिए माता-पिता को छोड़ना ही पड़ेगा। लेकिन अगर मां-बाप पकड़ रखना चाहें, तो कष्ट खड़ा होगा; उनके लिए भी कष्ट खड़ा होगा, बेटे के लिए भी कष्ट खड़ा होगा।
तुम्हारा किसी से प्रेम हुआ, तुम जल्दी से पकड़ रखना चाहते हो। प्रेम को हम कितनी जल्दी विवाह बनाने में लग जाते हैं! प्रेम हुआ नहीं कि हम विवाह की सोचने लगते हैं।
प्रेम तो धारा है, बहाव है। विवाह व्यवस्था है, ठहराव है। प्रेम तो प्राकृतिक है, विवाह सामाजिक है। प्रेम परमात्मा का है, विवाह आदमी की निर्मित व्यवस्था है। प्रेम अपूर्व रहस्य है, विवाह व्यवस्था है; कुछ भी अपूर्व नहीं है वहां। और जहां विवाह भारी हुआ, प्रेम मर जाएगा। क्योंकि विवाह ठहराने की कोशिश है उसको, जो कभी नहीं ठहरता।
और यही हम हर चीज में कर रहे हैं। एक सुख आया कि हमने मुट्ठी बांधी और हमने कहा, अब कभी जाना मत। सुख के पक्षी को बंद कर लिया मुट्ठी में। उसी बंद करने में सुख का पक्षी मर जाता है।
जो आया है, वह जाएगा।
तो वासुदेव कह रहा है: इस नदी से मैंने सीखा कि कुछ भी थिर नहीं है। सब बह रहा है। पकड़ो मत। जकड़ो मत।
यही तो संदेश है सारे बुद्धों का--परिग्रह नहीं। अपरिग्रह का अर्थ इतना ही है कि चीजें आती हैं, जाती हैं; तुम पकड़ो मत। जब हों, तब प्रफुल्लित रहो। जब चली जाएं, तब भी प्रफुल्लित रहो।
तुमने जहां पकड़ना शुरू किया, जहां तुमने नदी की धार रोकी और बांध बनाया, वहीं गंदगी, वहीं सड़ांध पैदा हो जाती है। नदी का सरोवर बन जाना नर्क है। और हम सब सरोवर बन जाते हैं। हम बड़े भयभीत हैं परिवर्तन से।
जवान बूढ़ा नहीं होना चाहता। यह उसकी आकांक्षा पूरी नहीं हो सकती, इसलिए दुखी होगा। दुख जिंदगी नहीं लाती, दुख तुम्हारी आकांक्षा लाती है। जवान बूढ़ा नहीं होना चाहता। जो जीवित है, वह मरना नहीं चाहता। यह कैसे होगा?
जो जन्मा है, मरेगा भी। जो जवान है, बूढ़ा भी होगा। इस सत्य को देखो, समझो, और इस सत्य के साथ राजी हो जाओ; पकड़ो मत। जब जवानी बुढ़ापा बनने लगे, सहज भाव से बूढ़े हो जाओ। जब जिंदगी मौत में ढलने लगे, सहज भाव से मौत में उतर जाओ। यही जीवन का प्रवाह है।
जो आए, उसे अंगीकार कर लो। जो जाए, उसे अलविदा। ऐसा आदमी दुखी नहीं होगा। कैसे दुखी होगा? उसने दुख का मूल सूत्र ही तोड़ दिया। उसने दुख के आधार जला दिए। उसने जड़ काट दी।
जब प्रेम आए, तो नाचो। और जब प्रेम चला जाए, तो रोओ मत। जो आया था, वह जाएगा ही। फूल सुबह खिला था, सांझ मुर्झाएगा ही। और अगर तुमने चाहा कि फूल कभी न मुर्झाए, तो फिर प्लास्टिक के फूल खरीदोगे; फिर असली फूल तुम्हारे जीवन में नहीं रह जाएंगे। फिर जाओ, बाजार से प्लास्टिक के फूल खरीद लो; फिर वे कभी न मरेंगे, क्योंकि वे पैदा ही नहीं हुए। वे कभी न मरेंगे, क्योंकि वे जिंदा ही नहीं हैं।
तो नदी में बहता हुआ जल और तुम्हारी बोतल में बंद जल में उतना ही फासला है, जितना असली फूल और नकली फूल में है। असली फूल की खूबी क्या है? खूबी यही है कि वह प्रतिपल बह रहा है। सुबह जो फूल खिला था, वह सांझ तक बह गया।
बुद्ध ने कहा है: सब सतत प्रवाह है। यहां विश्राम नहीं है। यहां विराम नहीं है।
आधुनिक विज्ञान इस बात से राजी है। पश्चिम के बहुत बड़े विचारक एडिंग्टन ने लिखा है कि दुनिया की भाषाओं में एक शब्द बिलकुल झूठा है, वह शब्द है--रेस्ट। ऐसी कोई चीज होती ही नहीं। विराम होता ही नहीं। विश्राम होता ही नहीं। सब चीजें चल रही हैं, प्रतिपल चल रही हैं।
तुम सोचते हो, जब आदमी मर गया, तो सब ठहर गया! कुछ भी नहीं ठहरा। तब भी प्रवाह हो रहा है।
तुम्हें पता है! आदमी के मर जाने के बाद भी दाढ़ी और बाल बढ़ते रहते हैं, नाखून बढ़ते रहते हैं! तुम्हें पता है! आदमी मर जाता है, तो आदमी मर गया होगा, लेकिन उसके भीतर हजारों-लाखों जंतु हैं, वे सब गतिमान हैं।
आदमी मर गया; तुमने उसकी लाश जाकर दबा दी मिट्टी में; लेकिन अभी प्रवाह चल रहा है। हड्डियां गलेंगी; वर्षों लगेंगे। मिट्टी फिर मिट्टी बनेगी। हर चीज फिर वापस अपने स्रोत में गिरेगी। प्रवाह जारी है।
और जो आज तुम्हारी हड्डी है, वह कल किसी और की हड्डी बनेगी। और आज जो तुम्हारे भीतर खून की तरह बह रहा है, कल किसी और के भीतर खून की तरह बहेगा। जो अभी वृक्षों में हरा है, कल तुम्हारा खून होगा। आज तुममें जो खून है, कल वृक्षों की जड़ों में खाद बनेगा।
सब चल रहा है, कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है। एक चीज दूसरे में बदलती जाती है; रूपांतरण होता है। न तो कोई चीज कभी पैदा होती है, न कोई चीज कभी वस्तुतः समाप्त होती है। यात्रा है। न कोई प्रारंभ है, न कोई अंत है।
नदी कहां प्रारंभ होती है--बता सकते हो? कहोगे हां, बता सकते हैं। गंगोत्री में गंगा शुरू होती है।
गंगोत्री में शुरू नहीं होती। आकाश में बादल घिरते हैं, उनसे जल बरसता है, तो गंगोत्री में जल आता है। गंगोत्री से कैसे शुरू होगी?
तो शायद तुम कहो कि बादलों में शुरू होती है। बादलों में शुरू नहीं होती। क्योंकि समुद्र से जब तक बादल न उठें, जब तक समुद्र से भाप न उठे, और सूरज की किरणों पर पानी चढ़कर आकाश में न जाए, तब तक बादल रिक्त हैं। बादलों में क्या रखा है? बादल हैं ही क्या अगर समुद्र का सहारा न हो?
तो समुद्र में गंगा शुरू होती है? लेकिन समुद्र में तो गंगा आकर गिरती है। वर्तुलाकार है।
कहां शुरू होती है? समुद्र गंगा से बनता है--गंगाओं से बनता है। फिर बादल बनते हैं। फिर बादलों से गंगोत्रियां बनती हैं। गंगोत्रियों से गंगा बनती है। गंगा से सागर बनते हैं। सागर से बादल बनते हैं--ऐसा वर्तुल है।
इसलिए हमने संसार को संसार कहा। संसार शब्द का अर्थ होता है: चाक, द ह्वील। वह जो भारत के राष्ट्रीय झंडे पर चक्र है, वह बुद्ध-प्रतीक है। वह बुद्ध ने ही सब से पहले उस प्रतीक की चर्चा शुरू की थी। वह अशोक के स्तंभ से लिया गया है।
जैसे चाक गाड़ी का घूमता रहता है, घूमता रहता है--ऐसा ही जीवन चलता जाता है, चलता जाता है; न कहीं शुरू हुआ है, न कहीं अंत होगा।
इसलिए बुद्ध कहते हैं: किसी ने जगत को बनाया नहीं; कोई स्रष्टा नहीं है। अनादि है यह। जैसे नदी की धार। सदा से है यह और सदा रहेगा। लेकिन सदा से है, और सदा रहेगा, फिर भी एक क्षण को कोई चीज थिर नहीं है, सब बदलाहट है। सिर्फ परिवर्तन को छोड़कर सब चीजें परिवर्तित हो रही हैं।
तो नदी में पहले तो बहाव, परिवर्तन, यात्रा--इसका बोध है। और अगर यह बात समझ में आ जाए कि सब चीजें बह रही हैं, तो मुट्ठी खुल गयी, तो वीतरागता फल गयी। फिर तुम पकड़ोगे नहीं।
जो धन तुम्हारे पास आया है, वह इसीलिए आया है कि किसी के पास से चला गया है। और तुम्हारे पास भी ज्यादा देर नहीं रह सकता, क्योंकि किसी और के पास उसे जाना है। अंग्रेजी में जो शब्द है धन के लिए--करेंसी, वह बिलकुल ठीक है; वह करेंट से बना है, जैसे धार नदी की। एक हाथ से दूसरे हाथ में धन बहता रहता है--यही उसकी करेंसी है।
लेकिन तुमने धन को पकड़ लिया, गड्ढा खोदकर घर में हंडे में बंद करके दबा दिया। वह धन धन न रहा, मिट्टी हो गया। धन तो तभी तक धन है, जब एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता रहे।
इसलिए कंजूस धन को मार डालता है। उसके हाथ में धन मिट्टी हो जाता है। उसका कोई अर्थ ही नहीं रहा। तुमने अपनी तिजोड़ी में कंकड़-पत्थर भरकर रख लिए, कि नोट भरकर रख लिए--क्या फर्क है? जब तक तिजोड़ी से नोट चले नहीं, एक हाथ से दूसरे हाथ में न जाए, तब तक वह धन है ही नहीं।
इसलिए भारत में जितना धन है, उतना धन नहीं है। और अमरीका में जितना धन है, उससे हजार गुना धन है। क्योंकि पैसा चलता है, सरकता है। सिर्फ अमरीकन जानता है धन को हजार गुना करने का उपाय, इसलिए धनी है।
मुझ से लोग आकर पूछते हैं, विशेषकर जो अमरीका से आते हैं, वे मुझसे पूछते हैं कि भारत गरीब क्यों है? क्योंकि भारत मूढ़ है। गरीबी मौलिक नहीं है; मूढ़ता मौलिक है। मूल में मूढ़ता है। यहां धन को पकड़ने की आदत है; यहां धन को जीने की आदत नहीं है। यहां हर चीज को पकड़ने की आदत है। यहां जो मिल जाए, उस पर कब्जा कर लो, मुट्ठी बंद कर लो! सम्हालकर बैठ जाओ।
अमरीका उछालता है; जो है, उसका उपयोग कर लो। असल में अमरीका, जो नहीं है, उसका भी उपयोग करता है। अभी कार खरीद लेगा और दस साल पैसे चुकाएगा। अभी हैं ही नहीं पैसे। दस साल में पैसे होंगे। कमाएगा, तब चुकाएगा। इंस्टालमेंट पर खरीद लेगा। इंस्टालमेंट पर खरीदने का मतलब है: तुम्हारे पास जो धन अभी नहीं है, वह तुमने खर्च कर दिया।
यहां भारत में जो धन तुम्हारे पास है, उसको भी तुम खर्च नहीं करते। अभी कल तुमने पढ़ा न, बुद्ध की इस कथा में कि वह आदमी मर गया--नगर श्रेष्ठी--अपुत्रक। और जब मर गया, तो उसके घर से सात दिन तक बैलगाड़ियों में भरकर धन ढोया गया। और वह खुद न तो कभी खाया ठीक से, न कभी पीया ठीक से। उसने कपड़े नहीं पहने ठीक से। जराजीर्ण कपड़े पहनता रहा। वह पुराने टूटे-फूटे रथों पर चलता रहा। रूखा-सूखा खाता रहा। वह शुद्ध भारतीय था!
यही भारतीय भारत की गरीबी के पीछे कारण है।
चीजों को बहने दो। चीजों को चलने दो, गतिमान होने दो। संसार को भी जीने का ढंग वही है, जो परमात्मा को जीने का ढंग है। पकड़ो मत।
लेकिन कभी-कभी तुम पकड़ना भी छोड़ देते हो, तब भी पकड़ नहीं छूटती। क्योंकि तुम्हारी जड़ता बड़ी गहरी है। एक आदमी कहता है: ठीक है। नहीं पकड़ेंगे। तो धन छोड़कर जंगल भाग जाता है। अब वह त्याग को पकड़ लेता है! पहले धन को पकड़ा था, अब त्याग को पकड़ लिया!
तुम्हें इस तरह के साधु-संतों का पता होगा, जो धन नहीं छूते। यह मूढ़ता सिर के बल खड़ी हो गयी! पहले सिर्फ धन ही धन इनका प्राण था; अब धन छूने से घबड़ाते हैं, जैसे धन में कोई सांप-बिच्छू है। मध्य में नहीं टिकते।
मध्य में टिकने का मतलब है: धन को आने दो, जाने दो। रोको भर मत। आए भी, जाए भी। यात्रा जारी रहे।
तो या तो प्रेम करते हैं लोग, और विवाह में रूपांतरित कर लेते हैं। या फिर इतने घबड़ा जाते हैं, कहते हैं कि हम संन्यासी हुए जाते हैं। हम इस प्रेम की झंझट में न पड़ेंगे। इसमें झंझट है। हम संन्यासी हैं। हम ब्रह्मचर्य धारण कर लेते हैं। हम किसी से कभी कोई प्रेम ही न करेंगे।
मगर हर हालत में तुम जड़ रहते हो। या तो विवाह बनकर जड़ या ब्रह्मचारी बनकर जड़। लेकिन प्रेम आए और जाए, बहे--उससे तुम घबड़ाते हो। उससे तुम्हारे प्राण संकट में पड़ जाते हैं।
वासुदेव यही कह रहा है। वह कह रहा है: अपरिग्रह का सूत्र यही है कि चीजें आतीं, जातीं। तुम बीच में अड़ो मत। जब आएं, तो आ जाने दो। जब चली जाएं, तब चली जाने दो। न तो खींचो आने के लिए। न धकाओ जाने के लिए।
नदी अपने से ही बह रही है, इसको धकाने इत्यादि की कोई जरूरत नहीं है। जो नदी पर मुट्ठी बांधेगा, उसकी मुट्ठी खाली रह जाएगी। जल पी लो, स्नान कर लो, मुट्ठी मत बांधो।
और दूसरी बात: नदी अनजाने सागर की खोज कर रही है--अनजाने। नदी को कुछ पता नहीं, कहां जा रही है? क्यों जा रही है? मगर टटोल रही है सागर को। विराट की खोज में निकली है। कोई नक्शा भी पास नहीं है। कोई शास्त्र भी पास नहीं है। कोई वेद, कुरान, बाइबिल भी पास नहीं है। अनंत की खोज पर चली है बिना नक्शों के। कोई गुरु नहीं। किसी की अनुगामी नहीं। टटोल रही है अपने से। और पहुंच जाती है।
सभी नदियां पहुंच जाती हैं--यह तुमने देखा! छोटी नदियां पहुंच जाती हैं। बड़ी नदियां पहुंच जाती हैं। नदी-नाले सब पहुंच जाते हैं। सब सागर पहुंच जाते हैं। अगर अपनी सामर्थ्य से नहीं पहुंच सकते, तो छोटे नाले बड़े नालों में गिर जाते हैं। बड़े नाले नदियों में गिर जाते हैं। नदियां बड़ी नदियों में गिर जाती हैं। मगर सागर तक सब पहुंच जाते हैं।
वासुदेव यह कह रहा है: अगर तुम खोजते ही रहो, तो परमात्मा तक पहुंच जाओगे। और नक्शों की कोई जरूरत नहीं है। हिंदू, मुसलमान, ईसाई--नक्शों की कोई जरूरत नहीं है। खोज की त्वरा चाहिए। खोज की तीव्रता चाहिए। खोज की सघनता चाहिए। नक्शे नहीं काम आते; खोज की सघनता काम आती है।
इस भेद को समझ लेना। नदी को नक्शा पकड़ा दो, इससे कुछ अर्थ नहीं होगा। सिर्फ नदी में जलधार होना चाहिए, ऊर्जा होनी चाहिए। बस, पर्याप्त है। उसी ऊर्जा के बल नदी खोजती है।
जिन्होंने सत्य को पाया है, उन्होंने भी नक्शों के सहारे नहीं पाया है। क्योंकि इस परिवर्तनशील जगत में नक्शे बन ही नहीं सकते। तुम जिस जगत का नक्शा बनाते हो, जब तक नक्शा बनता है, तब तक जगत बदल जाता है। यहां नक्शे हो नहीं सकते। जीवन परिवर्तन है, तो नक्शे होंगे कैसे?
मैंने सुना है: एक गांव में एक शराबी ने एक मिठाई की दुकान से लड्डू खरीदे। रुपया दिया। आठ आने उसे वापस मिलने थे। लेकिन दुकानदार ने कहा: क्षमा करें; मेरे पास फुटकर नहीं हैं। कल सुबह आ जाना!
शराबी शराब में था, उसने सोचा कि यह तो झंझट की बात है। सुबह बदल जाए! तख्ती बदल ले। अपना नाम बदल ले। शराबी को हजार तरह की कुशंकाएं उठने लगीं--कि आठ आने मेरे गए। उसने सोचा कि कोई ऐसा निशान मुझे बना लेना चाहिए कि यह बदल न सके। उसने चारों तरफ देखा। देखा एक सांड बैठा है। सामने ही बैठा है दुकान के। उसने कहा: ठीक है। जहां सांड बैठा है...!
सुबह जब आया वापस...सांड का कोई पक्का थोड़े ही है कि वह मिठाई की दुकान के सामने ही बैठा रहेगा। सांड कोई आदमियों जैसे थोड़े ही हैं कि जहां बैठ गए, बैठ गए। सांड तो मुक्त हैं। इसलिए तो शिवजी ने उन्हें चुना है। वे चले गए थे। वे बैठे थे एक नाई की दुकान के सामने!
वह आदमी तो एकदम घुस गया नाई की दुकान में। और गरदन पकड़ ली नाई की। और कहा: हद्द हो गयी! आठ आने के पीछे तख्ती बदल ली? धंधा बदल लिया? जात बदल ली? आठ आने के पीछे! मगर तुम मुझे धोखा न दे सकोगे। वह सांड बैठा है!
तुम्हारे जिंदगी के नक्शे बस, सब ऐसे ही हैं। जिंदगी रोज बदल जाती है, तुम्हारे नक्शे पीछे पड़ जाते हैं; उनका कोई अर्थ नहीं है। तुम्हारे शास्त्र सब ऐसे हैं, क्योंकि जब बनते हैं, तब जिंदगी एक होती है। जब तक बन पाते हैं, तब तक जिंदगी दूसरी हो जाती है।
अब आज तुम वेद को बैठे पढ़ते रहो, या आज तुम बैठकर गीता को पढ़ते रहो। जिंदगी बहुत बदल गयी; गंगा में बहुत जल बह गया है।
इसीलिए मैं जब बुद्ध की व्याख्या करता हूं, तो तुम खयाल कर लेना। मुझे बुद्ध की उतनी चिंता नहीं है। क्योंकि ढाई हजार साल में जिंदगी बहुत बदल गयी। मुझे तुम्हारी चिंता है। मैं जब बुद्ध की व्याख्या करता हूं, तो मुझे बुद्ध की उतनी फिकर नहीं है। मेरी निष्ठा बुद्ध के प्रति उतनी नहीं है, जितनी आज के इस क्षण के प्रति है। इस क्षण के अनुकूल नक्शे को बदलता हूं।
तुम्हारे और व्याख्याकार जो हैं, नक्शे के प्रति उनकी निष्ठा भारी है। वे कहते हैं: जिंदगी जाए भाड़ में। समय की धारा का कुछ भी हो। हम तो पक्का जो किताब में लिखा है, उसी को मानते हैं। चाहे किताब अब बिलकुल ही गलत हो गयी हो!
सभी सत्य सामयिक होते हैं। और जो शाश्वत सत्य है, उसको शब्द में कहने का कोई उपाय नहीं है। उसे कभी किसी ने कहा नहीं। जो कहा गया है, वह सामयिक है। और सभी सत्य, जब सामयिक होते हैं, तो समय के बदलने पर बदल जाने चाहिए।
सत्य तुम्हारे बदलते नहीं; पत्थरों की तरह जड़ हैं। और जिंदगी फूलों की तरह बह रही है। उनमें कभी तालमेल नहीं रह जाता है।
तो तुम्हारे तथाकथित सत्य ही तुम्हारे सत्य तक पहुंचने में बाधा बन जाते हैं। तुम्हारे शास्त्र ही अवरोध हो जाते हैं। अतीत की अंध-भक्ति जितना मनुष्य को भटकाती है, उतना और कोई चीज नहीं भटकाती है।
नदी की तरह रहो। नक्शों को ले चलने की कोई जरूरत नहीं है। और जब नदियां तक पहुंच जाती हैं सागर तक, तो तुम क्यों न पहुंच पाओगे? तुम भी चैतन्य की धारा हो। तुम चैतन्य का सागर खोजने निकले हो। इस जगत में नदियों तक को मिल जाता है मार्ग, तो तुम्हारी चैतन्य-धारा को न मिलेगा? कुछ तो भरोसा करो। इस भरोसे का नाम श्रद्धा है।
श्रद्धा का मतलब यह नहीं होता कि मैं छाती ठोंककर कहता हूं कि मुझे ईश्वर में भरोसा है। कि मुझे कुरान में भरोसा है। कि जो कहेगा कुरान गलत है, उसकी गरदन काट दूंगा; या अपनी जान दे दूंगा या उसकी जान ले लूंगा। श्रद्धा का यह मतलब नहीं होता। ये तो सब मूढ़ताओं के नाम हैं।
श्रद्धा का इतना ही अर्थ होता है कि जिस जीवन ने मुझे जन्म दिया है, जिस जीवन से मैं आया हूं, वह मुझे सम्हाले है। और अगर मैं ठीक-ठीक तीव्रता से खोज करता रहूं, तो मूल-स्रोत को जरूर पा लूंगा।
श्रद्धा का अर्थ विश्वास नहीं होता। श्रद्धा का अर्थ किसी सिद्धांत में भरोसा नहीं होता। श्रद्धा का अर्थ होता है: अस्तित्व की जो विराटता तुम्हें घेरे खड़ी है बाहर और भीतर, इसमें तुम्हें भरोसा है। तुम्हें अपने पर भरोसा है और अस्तित्व पर भरोसा है। भटकाव कितना ही हो, पहुंचना हो जाएगा।
नदी कितना भटकती है! आड़ा-टेढ़ा रास्ता लेती है। कितना भटकती है! कभी-कभी सागर से दूर चली जाती है, फिर पास आ जाती है। लेकिन भटक-भटक कर भी पहुंच जाती है।
और फिर नदी की तीसरी बात है, जो वासुदेव कहना चाहता है, वह है: नदी का सर्व स्वीकार भाव। पुण्यात्मा स्नान कर ले, तो नदी को स्वीकार है। पापी स्नान कर ले, तो नदी को स्वीकार है। गंदा नाला गिर जाए, तो नदी को स्वीकार है। शुद्ध गंगा की धारा गिर जाए, तो नदी को स्वीकार है। नदी भेद नहीं करती। जिंदा आदमी नदी में आ जाए, तो ठीक। मुर्दा लाश कोई डाल दे, तो ठीक। नदी सब स्वीकार कर लेती है। उसका परम स्वीकार है।
जब बाढ़ आती है और नदी विराट हो जाती है, तब भी नाचती-गाती चलती है। जब सब सूख जाता है और गर्मी की आग बरसने लगती है, तब भी नदी को स्वीकार है। वह सूख गयी देह भी उतनी ही स्वीकार है। सूरज निकले तो, और बादल घिरें तो--सब नदी को स्वीकार है। नदी की स्वीकारिता परम है।
इसको बुद्ध ने तथाता कहा है। सब स्वीकार। जो हो, ठीक। जैसा हो, ठीक। जीवन जहां ले जाए, वही मंजिल। ऐसा जिसके मन में स्वीकार है, उसके जीवन में असंतोष विदा हो जाएगा। उसके जीवन में दुख के बादल फिर नहीं घिरेंगे। उसने तो दुख के बादलों को भी सुख के बादलों में बदलने की कला सीख ली।
जिसको सब स्वीकार है, उसे तुम नर्क नहीं भेज सकते। क्योंकि उसको नर्क भी स्वीकार होगा। और जिसको नर्क स्वीकार है, उसने नर्क को स्वर्ग में बदल लिया। और जिसको स्वीकृति की कला नहीं आती, उसे तुम स्वर्ग भी भेज दो, तो शिकायत खोज लेगा। स्वर्ग में भी नर्क बना लेगा।
और अंतिम बात: नदी, तुमने देखा होगा, कभी-कभी जीते आदमी को डुबा देती है और मार डालती है। लेकिन मुर्दे को तैरा देती है, ऊपर आ जाता है मुर्दा। बुद्ध की विचार-सरणी से इसका भी बड़ा मेल है।
तुमने देखा यह मजा कि जिंदा आदमी, जो बचना चाहता है, वह कभी-कभी डूब जाता है। और मुर्दा, जिसको बचने की कोई आकांक्षा ही नहीं है--मुर्दा ही हो गया, आकांक्षा कहां--वह तैर जाता है। जिंदा आदमी नदी की तलहटी में बैठ जाता है। मुर्दा आदमी सतह पर आ जाता है!
मुर्दे को कुछ कला आती है, जो जिंदा आदमी को नहीं आती है। मुर्दे को समर्पण है। मुर्दा बचने की आकांक्षा नहीं करता, इसलिए नदी भी उसे बचाती है।
जो बचने की आकांक्षा नहीं करता, अस्तित्व उसे बचाता है। जो संघर्ष नहीं करता, अस्तित्व उसको विजय देता है। और जो अस्तित्व से लड़ने लगता है, उसको तोड़ डालता है।
तुम प्रकृति से लड़ोगे, तो हारोगे। तुम प्रकृति के साथ हो जाओ। तुम प्रकृति को साथ ले लो। तुम्हारे और प्रकृति के बीच एक सरगम पैदा हो जाए, संगीत पैदा हो जाए, तो तुम्हारी जीत निश्चित है। तुम तभी जीतोगे, जब प्रकृति के साथ होओगे। क्योंकि प्रकृति ही जीत सकती है, तुम नहीं जीत सकते। तुम हारोगे, अगर प्रकृति के विपरीत लड़ोगे। क्योंकि तुम कैसे जीतोगे? अंश कैसे जीत सकता है पूर्ण से? अंश कैसे जीत सकता है अंशी से?
तो नदी में बचने का उपाय यही है कि तुम छोड़ दो अपने को। तुम संघर्ष न करो। तुम नदी पर भरोसा कर लो और छोड़ दो अपने को--समर्पण!
ऐसे कुछ सूत्र वासुदेव नदी के किनारे बैठ-बैठ सीखा है। ऐसे ही कुछ सूत्र बुद्ध ने जीवन की नदी के किनारे बैठ-बैठ सीखे हैं। सीखना आना चाहिए, तो कहीं भी सीखना हो सकता है। और सीखना न आता हो, तो बुद्धों के पास बैठकर भी तुम बुद्धू ही रह जाओगे।
इसलिए वासुदेव कहता है: क्या खोजना गुरु को। जहां हो, वहां गुरु है। वृक्षों से सीख लो। पक्षियों से सीख लो। चांद-तारों से सीख लो। नदी-पहाड़ों से सीख लो। जिसे सीखना है, उसे चारों तरफ से शिक्षा मिल रही है। और जिसे नहीं सीखना है, जो आंख बंद किए है, और कान बंद किए बैठा है, वह बुद्धों का सत्संग भी करता रहे, तो कुछ भी न होगा। वहां से भी खाली हाथ गया, खाली हाथ लौट आएगा।
असली बात है: तुम्हारी सीखने की क्षमता, कुशलता।
क्या है सीखने की कुशलता का मूल आधार? एक ही आधार है और वह है--विनम्रता, वह है--झुकना, वह है--खुला होना।
जहां सीखना हो, वहां अपने द्वार-दरवाजे खोल देना। वहां पक्षपात से भरे हुए मत जाना। वहां सिद्धांतों से लदे हुए मत जाना। वहां जानकार की तरह मत जाना, नहीं तो नहीं जान पाओगे। जो जानकार की तरह गया, जानने से वंचित रह जाएगा।
वहां तो जाना निर्बोध, अज्ञानी की भांति। वहां तो उस भाव दशा में जाना, जो कहती है: मुझे क्या पता है! वहां खुले जाना, तो बहुत कुछ सीख पाओगे। और तब बुद्धों से ही नहीं, किन्हीं से भी सीख सकते हो।
साधारणजनों का जीवन भी गहन किताबों की तरह है। एक साधारण से आदमी की जिंदगी खोल लो--वेद खोल लिया। और वेद तो पुराना पड़ गया, और यह आदमी अभी ताजा है, नया है। अभी यहां जीवन की रसधार बहती है।
एक साधारण से मनुष्य के जीवन को समझ लो, तुमने सारे शास्त्र समझ लिए। और दूसरे की क्या फिकर करनी। तुम अपने ही जीवन के निरीक्षक बन जाओ, साक्षी बन जाओ, तो तुम्हें वहीं से सारा का सारा मिल जाएगा, जो पाने योग्य है। निश्चित मिल जाएगा। और जो पाने योग्य नहीं है, उसकी कोई जरूरत ही नहीं।
ओशो, मैं न दुख सह पाता हूं, न सुख। हर बात से भयभीत हूं। मृत्यु से तो हूं ही, जीवन से भी भयभीत हूं। मेरे लिए क्या मार्ग है?
अधिकतर लोग यही सोचते हैं कि दुख नहीं सह पाते हैं। सुख के लिए तो वे हाथ फैलाए खड़े हैं, भिक्षापात्र लिए खड़े हैं। लेकिन सच यही है कि न लोग दुख सह पाते हैं, न लोग सुख सह पाते हैं। क्योंकि सुख भी उत्तेजना है, दुख भी उत्तेजना है। दोनों तोड़ते हैं। और अक्सर ऐसा होता है कि सुख इतना ज्यादा तोड़ता है, जितना दुख ने कभी नहीं तोड़ा।
एक कहानी है: एक आदमी हर महीने एक रुपए की लाटरी का टिकट खरीद लेता था, आदत थी। गरीब आदमी था, दर्जी था। न तो कभी सोचा था कि मिलने वाली है, न कभी आशा बांधी थी। न कभी सपने देखे थे। वर्षों से खरीदता था। वर्षों बीत भी गए थे। न कभी मिली, न मिलने वाली थी। इतना भाग्यशाली अपने को सोचता भी नहीं था कि लाटरी मिल जाए।
लेकिन एक दिन लाटरी मिल गयी। बड़ी कार आकर सामने खड़ी हुई। नोटों के बंडल उतारे गए। दस लाख रुपए उसे मिल गए थे। वह तो भरोसा ही नहीं कर पाया। उसकी आंखें तो एकदम देखने में असमर्थ हो गयीं। सब धुंधलका छा गया। चक्कर आने लगा। दस लाख रुपए! दस रुपए इकट्ठे उस दर्जी को मुश्किल से मिले थे कभी।
दस लाख रुपए! छाती जोर से धड़कने लगी। खून तेजी से बहने लगा। सदा ठीक से सो पाया था, उस रात नहीं सो पाया। उधेड़बुन! उधेड़बुन! क्या करूं क्या न करूं? दस लाख रुपए का करूं क्या?
दूसरे दिन उसने जाकर अपनी दुकान में ताला लगा दिया और चाबी कुएं में फेंक दी--कि अब जरूरत क्या है! बात खतम हो गयी। अब क्या दर्जी रहना है! कारें खरीद लीं। शराब खरीद ली। बड़ा मकान खरीद लिया। वेश्याओं के घर बैठकों में सम्मिलित होने लगा। अब करना क्या है और!
सदा स्वस्थ रहा था। सालभर में बिलकुल जरा-जीर्ण हो गया। सालभर बाद जो उसे देखते, पहचान भी न पाते। वे कहते: यह तुम्हारी क्या हालत हो गयी!
अब शराब, और वेश्याएं, और नाच, और गान, और आधी-आधी रात तक भटकना, और आधे-आधे दुपहर तक सोना। और कुछ भी खाना, कुछ भी पीना! वह तो सोच रहा था, बड़ा सुख ले रहे हैं। लेकिन सालभर में उसकी हालत बिलकुल खस्ता हो गयी। सालभर में वे दस लाख फूंक डाले। दस लाख उसने फूंक डाले, दस लाख ने उसे फूंक डाला।
गरीब था, तब कभी इस तरह के उपद्रव जिंदगी में आए भी नहीं। उपद्रव के लिए भी सुविधा चाहिए न! उपद्रव भी सभी की क्षमता तो नहीं।
गरीब एक तरह के दुख झेलता है, अमीर दूसरे तरह के दुख झेलता है। गरीब दुख झेलता है: पैसे न होने के। अमीर दुख झेलता है: पैसे होने के। दुख दोनों झेलते हैं! और अगर तुम गौर से देखो, और ठीक से निरीक्षण करो, निष्पक्ष भाव से, तो तुम गरीब से अमीर को ज्यादा दुखी पाओगे।
गरीब को तो आशा भी रहती है; अमीर को आशा भी नहीं है--कि इस झंझट के बाहर कभी हो पाएगा।
चिंताओं के जाल। सालभर बाद जब सब बरबाद हो गया और वह आदमी थका-मांदा खड़ा रह गया। वेश्याओं के जो द्वार-दरवाजे सदा उसके लिए खुले थे, बंद हो गए। मित्र साथ घूमते थे, भीड़ लगी रहती थी, वे सब विदा हो गए। अब तो सिर्फ वे ही लोग उसका पीछा करते, जिनका वह कर्जदार हो गया था। दस लाख तो गए थे, और दो-चार लाख का कर्ज ऊपर छोड़ गए थे।
उसने आत्महत्या करने का विचार किया। लेकिन वह भी हिम्मत नहीं जुटा पाया। डरा। कुएं में उतरा। सोचा था, मर जाऊं। लेकिन चाबी खोजकर बाहर निकल आया। फिर अपनी दुकान खोल ली। फिर अपने कपड़े सीने लगा। अब और कष्ट हो गया, भयंकर कष्ट हो गया। क्योंकि एक बार धन जान लिया, अब निर्धनता और भी भारी छाती में चुभने लगी।
मगर पुरानी आदत! वह एक रुपए की टिकट हर महीने फिर भी खरीदता रहा। और भगवान से रोज प्रार्थना भी करता था: हे प्रभु, अब दुबारा मत दिलवाना। ऐसा आदमी है--द्वंद्वग्रस्त! टिकट भी खरीदता था और भगवान से प्रार्थना भी करता था कि प्रभु! जो हुआ, एक दफे बहुत हो गया। अब दुबारा नहीं। अब स्वास्थ्य भी थोड़ा ठीक होता जा रहा है; दुकान भी फिर चलने लगी है; काम भी सब व्यवस्थित हुआ जा रहा है। बच गया। बचा लिया तुमने। अगर एकाध साल और वे रुपए टिक जाते, तो मैं मारा गया था। एक साल में कम से कम बीस साल बूढ़ा हो गया हूं। कभी अब दुबारा मत दिलवाना।
लेकिन आदमी ऐसा ही है। एक तरफ कहता, दुबारा मत दिलवाना, और हर महीने टिकट भी खरीद लेता। और यह भी सोचता, अब कोई दुबारा थोड़े ही मिलनी है। इस तरह के संयोग, तो एक बार भी आ जाए, तो बहुत।
मगर संयोग की बात: एक साल बाद फिर लाटरी मिल गयी। जब दुख आते हैं, तो छप्पर फोड़कर आते हैं। जब भगवान देता है, तो छप्पर फाड़कर देता है न!
उसने तो छाती पीट ली। जब फिर कार आकर रुकी वही, और फिर नोटों के बंडल उतरने लगे, उसने कहा: हे प्रभु फिर! अब फिर मुझे उसी झंझट में पड़ना पड़ेगा?
मगर वह पड़ा उसी झंझट में। उसने फिर चाबी फेंकी कुएं में। दुबारा चाबी निकालने का मौका नहीं आया। क्योंकि दुबारा बचा नहीं; मर ही गया। अगर निकाल लेता दुबारा चाबी, और फिर दुकान खोलता, तो भी लाटरी की टिकट खरीदता। और अब और भी जोर से प्रार्थना करता कि हे प्रभु! अब नहीं!
आदमी ऐसा द्वंद्वग्रस्त है! ऐसा अपने में खंड-खंड है।
तुम्हें शुभ हुआ, यह बात समझ में आयी कि न दुख को झेल पाते हो, न सुख को। यह महत्वपूर्ण है। अधिक लोगों की भ्रांति यही है कि दुख को नहीं झेल पाते।
सुख को नहीं झेल पाते--यह तो बात ही अजीब लगती है। सुख तो हम चाहते हैं। लेकिन सुख को भी नहीं झेला जा सकता, क्योंकि सुख और दुख ऊपर ही ऊपर अलग-अलग दिखायी पड़ते हैं, भीतर बिलकुल एक हैं। साठ-गांठ है। षड्यंत्र है दोनों का।
सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और जो आदमी दुख से मुक्त होना चाहता है, और सुख को पकड़ना चाहता है, वह कभी दुख से मुक्त नहीं होगा। क्योंकि सिक्के का एक पहलू बचाओगे, तो दूसरा भी बचेगा। और जो आदमी चाहता है कि मैं दुख से मुक्त हो जाऊं, उसे जान लेना चाहिए, उसे सुख से भी मुक्त हो जाना पड़ेगा। वह पूरा सिक्का ही फेंकना होगा।
सुख और दुख मन की उत्तेजनाओं के नाम हैं। जिस उत्तेजना में तुम्हें प्रीतिकरता लगती है, जिसे तुम पसंद करते हो, उसको सुख कहते हो। और जिस उत्तेजना में तुम्हें अप्रीतिकरता लगती है, उसको तुम दुख कहते हो।
तुमने कभी खयाल किया--कि जिसको तुमने आज सुख कहा है, उसको ही चार दिन बाद तुम दुख कहने लगे! जो एक दिन सुख की तरह लगा था, चार दिन के बाद दुख की तरह लग सकता है। जिस स्त्री को तुमने सोचा था कि यह मिल जाए, तो सब मिल गया, फिर कुछ और नहीं चाहिए। उसके मिलते ही तुम सोचने लगते हो कि इससे छुटकारा हो जाए, तो सब मिल गया। और कुछ नहीं चाहिए। हे प्रभु! अब इससे मुझे बचा लो।
यह वही स्त्री है, जिसकी तुमने मांग की थी!
तुम जो सोचते हो आज सुखकर है, वही कभी दुखकर क्यों हो जाता है? दूसरा पहलू आज नहीं कल उभरेगा। जिसको तुमने सुंदर माना है, उसकी कुरूपता के भी अंग हैं। आज सुंदर चेहरा देखकर तुम उसके संबंध में बड़े आनंदित हो रहे हो। कल उसके कुरूप अंग भी प्रगट होंगे।
और अक्सर ऐसा होता है; जितने सुंदर व्यक्ति, उतने ही कुरूप भीतर दबी हुई वासनाएं, घृणाएं, कुंठाएं, क्रोध, ईर्ष्याएं पड़ी होती हैं। अक्सर ऐसा हो जाता है कि कुरूप व्यक्ति के भीतर एक तरह का सौंदर्य होता है और सुंदर व्यक्ति के भीतर एक तरह की कुरूपता होती है। यह होना ही चाहिए। क्योंकि दोनों एक-दूसरे के हिस्से हैं। सौंदर्य और कुरूपता भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सफलता-असफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। गरीबी-अमीरी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
तुमने कभी-कभी खयाल किया कि गरीबी में एक तरह की अमीरी होती है! और तुमने खयाल किया कि अमीरी में एक तरह की गरीबी होती है! यह तुम्हें दिखायी पड़ जाए जीवन का उलझाव, तो बड़ा सुलझाव हो जाएगा।
तुमने देखा गरीब को मस्ती से चलते? उसकी अमीरी देखी? तुमने अमीर को देखा बोझ से दबे हुए, चिंतारत? न ठीक से सो सकता। न ठीक से खा सकता। न ठीक से जी सकता! तुमने उसकी गरीबी देखी?
मैं तुम्हें यह कहना चाहता हूं कि जहां अमीरी है, वहां गरीबी होगी। जहां गरीबी है, वहां अमीरी होगी।
यह अकारण नहीं है कि बुद्ध और महावीर ने राजमहल छोड़ दिया और फकीर हो गए। उनको एक राज समझ में आ गया होगा। उनको गरीब की अमीरी दिखायी पड़ गयी होगी। उनको यह बात दिखायी पड़ गयी होगी कि जितना कम होता है, उतनी निश्चिंतता होती है। और निश्चिंतता से बड़ी और क्या अमीरी है! उनको यह दिखायी पड़ गया होगा कि जितना ज्यादा होता है, उतना भय होता है खोने का। जितना ज्यादा होता है, उतनी सुरक्षा खतरे में होती है।
अमीर सोए तो कैसे सोए? और गरीब अनिद्रा को कैसे वरण करे? काहे के लिए वरण करे? कोई कारण नहीं है अमीर को सोने का। जागने के सब कारण हैं, तो रात जागता रहता है। हजार चिंताएं खड़ी रहती हैं उसे घेरे।
गरीब को कोई चिंता नहीं है। जो मिला था दिन में, वह खा-पीकर समाप्त हो गया। अब कल की कल देखेंगे।
जीसस ने कहा है अपने शिष्यों से: देखते हो खेत में खिले लिली के फूलों को! सम्राट सोलोमन भी अपने परम सौंदर्य में इतना सुंदर न था। और ये लिली के फूल न तो मेहनत करते, और न कल की चिंता करते।
यह वचन ठीक वैसा ही है, जैसा मलूक का वचन है:
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सब के दाता राम।।
तुमने कभी किसी गरीब में ऐसा दास मलूका देखा? अगर नहीं देखा, तो तुमने अभी गरीब नहीं देखा। फिर तुम्हें कोई न कोई छोटा-मोटा मध्यवर्गीय अमीर ही मिला होगा।
वस्तुतः गरीब आदमी, जिसके पास कुछ भी नहीं है, स्वभावतः निश्चिंत होगा। न बीते की फिकर, न आने की फिकर। आज काफी है। उसमें तुम एक तरह के फूल को खिलता देखोगे--निश्चिंतता का फूल। उसकी अपरिग्रहता में, उसके पास कुछ न होने में, उसकी मस्ती का राज है।
जैसे-जैसे अमीर अमीर होता जाता है, वैसे-वैसे स्वभावतः जाल बढ़ते हैं, समस्याएं बढ़ती हैं। इतना सम्हालूं, इतना करूं। यह कैसा होगा? वह कैसे होगा? इतना टैक्स बढ़ा जाता है! सरकार न ले जाए! चोर न ले जाएं! कम्युनिज्म न आ जाए! न मालूम कितने-कितने चिंताओं के जाल खड़े होते हैं। और इन सब के बीच अकेला फंसा होता है। जैसे मकड़ी अपने ही बुने जाले में फंस जाए।
यही तो बुद्ध ने कहा: जैसे मकड़ी अपने ही बुने जाले में फंस जाए, ऐसा अमीर फंस जाता है।
तुम्हें एक बड़ा सत्य दिखलायी पड़ा है। तुम इसका उपयोग करो।
तुम्हें दिखलायी पड़ा है कि ‘न मैं दुख सह पाता हूं, न सुख।’ इस बात को गहरे उतरने दो।
‘हर बात से भयभीत हूं।’
यहां हर बात व्यर्थ है, भयभीत होने में कुछ आश्चर्यजनक नहीं, कुछ आश्चर्य नहीं। यहां हर चीज मृत्यु से भरी है। समझो इस भय को। यहां हर आदमी कंप रहा है। इस कंपन को देखो। लेकिन इस कंपन में अगर तुम्हें यह बात समझ में आ जाए कि कंपन स्वाभाविक है, तो भय विसर्जित हो जाएगा।
भय इसलिए हो रहा है कि तुम नहीं चाहते कि कंपन हो। भय इसलिए हो रहा है कि मौत आ रही है पास, नहीं आनी चाहिए। पैर डगमगाने लगे, मैं बूढ़ा होने लगा, और यह नहीं होना चाहिए। नहीं होना चाहिए--इस आकांक्षा से भय हो रहा है।
अगर मृत्यु को स्वीकार कर लो...। और न करोगे स्वीकार, तो भी करोगे क्या? मौत होनी ही है। जो होना है--होना ही है। तुम्हारे बचने से कुछ न होगा, भागने से कुछ न होगा।
तुमने कथा सुनी है सूफियों की!
एक सम्राट का बड़ा प्यारा नौकर बाजार गया और बाजार में उसे...। भीड़ में खड़ा था, तमाशा देख रहा था। कोई मदारी डमरू बजा रहा था कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा, तो उसने पीछे लौटकर देखा। लौटकर देखा तो ठगा रह गया; मौत खड़ी थी! वह तो इतना घबड़ा गया! उसने पूछा कि किसलिए आप मेरे कंधे पर हाथ रखे हैं! तो मृत्यु ने कहा: भई, इसलिए कि आज सांझ तुझे मरना है। मैं तुझे सूचना देने आयी हूं।
वह तो भागा अपने सम्राट के पास। गरीब आदमी, कंप गया! तो उसने सोचा: सम्राट के पास तो सब है, कुछ सुरक्षा हो जाएगी। सम्राट से जाकर कहा कि घबड़ा गया हूं। रास्ते पर मुझे मौत मिल गयी। उसने कंधे पर हाथ रखा और कहा: आज शाम मर जाएगा। मैं क्या करूं?
सम्राट ने कहा: मैं और क्या कर सकता हूं! इतना ही कर सकता हूं कि मेरे पास जो सबसे तेज घोड़ा है, तू ले ले। और भाग जा। जितनी दूर निकल सके, निकल जा। यह जगह ठीक नहीं। इस गांव में तेरा रुकना आज सांझ, ठीक नहीं। मौत यहां घूम रही है। तेरी मौत करीब है, तू यहां से भाग जा।
और तो क्या आदमी करे! आदमी जिंदगीभर भागता है, और क्या करता है? अनेक-अनेक ढंगों से भागता है। जहां खतरा हो, वहां से भाग जाओ! संसार में खतरा है, हिमालय चले जाओ! बाजार में खतरा है, मंदिर में चले जाओ। जहां खतरा है--भागो। भगोड़ेपन के सिवाय और कोई रास्ता भी तो नहीं दिखता।
स्वभावतः, यह तर्क सीधा था कि मौत आसपास है, तू दूर निकल जा। उसके पास बड़ा तेज घोड़ा था सम्राट का और यह उसका प्यारा सेवक था। उसने अपना तेज घोड़ा दिया और कहा: तू फिकर मत करना। रुकना ही मत आज तो। जब सूरज ढले तब...। जितनी दूर--सैकड़ों मील दूर निकल जा।
वह भागा। उस दिन वह भोजन के लिए भी नहीं रुका। जल पीने के लिए भी नहीं रुका। मौत आती है, तो कहां जल, कहां भोजन! कहां भूख, कहां प्यास! भागता ही रहा।
घोड़ा भी बड़ा अदभुत था, सैकड़ों मील दूर ले गया। दूसरी राजधानी में पहुंच गया--दमिश्क। जब पहुंच गया दूसरी राजधानी में, दूसरे राज्य में, तब निश्चिंत हुआ। सूरज भी ढल रहा था। उसने जाकर एक बगीचे में घोड़े को बांधा वृक्ष से और घोड़े की खूब पीठ थपथपायी। उसके कंधे पर सिर रखकर खड़ा हो गया। उसे बहुत धन्यवाद दिया कि तू अदभुत घोड़ा है; सैकड़ों मील दूर ले आया दिनभर में! थका भी नहीं; रुका भी नहीं! तेरी जितनी कृपा मानूं, उतनी कम।
और तभी उसने देखा कि फिर कोई हाथ उसके कंधे पर पड़ा। वही हाथ, जो सुबह बाजार में पड़ा था। वह घबड़ा गया। उसने पीछे लौटकर देखा, मौत खड़ी थी!
और मौत ने कहा: धन्यवाद तो मुझे भी देना चाहिए तेरे घोड़े को, क्योंकि तेरी मौत होनी थी दमिश्क में और मैं डरी थी कि दमिश्क तक तू पहुंच पाएगा कि नहीं। मगर घोड़ा तेज है और ठीक समय पर ले आया; अभी सूरज ढल ही रहा है। सुबह भी इसी वजह से मैं तेरे कंधे पर हाथ रखी थी कि मैं बड़ी हैरान थी कि अब होगा कैसे यह! दमिश्क तू पहुंचेगा कैसे! और मौत वहां होनी है। मैं निश्चिंत नहीं थी; चिंता से भरी थी। मगर घोड़ा तेरा तेज है। घोड़ा तुझे समय के पहले ठीक जगह पर ले आया!
कहां जाओगे? कहीं भागो, दमिश्क पहुंच जाओगे। जहां मौत होनी है, वहां पहुंच जाओगे। गरीब भी पहुंच जाते, अमीर भी पहुंच जाते। पैदल चलते, वे भी पहुंच जाते; घोड़ों पर जाते, वे भी पहुंच जाते। हवाई जहाजों में उड़ते, वे भी पहुंच जाते।
मौत तो होनी ही है, फिर भय क्या! भय में आकांक्षा है कहीं कि न हो। सब की हो, मेरी न हो कम से कम! मुझे अपवाद बना लिया जाए। मैं बच जाऊं--तो भय है। भय को समझो।
मौत के कारण भय नहीं है। तुम्हारा जीवन अमर हो जाए--इस भाव के कारण भय है। और यहां कोई चीज थिर नहीं। नदी की धार है। सब बह रहा है। जन्म हुआ, मृत्यु भी होगी। आज जो मिला है, कल छीन भी लिया जाएगा। यहां सब अमानत है; तुम्हारा यहां कुछ भी नहीं है। इस सत्य को देखोगे, तो भय अपने आप विसर्जित हो जाएगा।
‘मृत्यु से तो भयभीत हूं ही, जीवन से भी भयभीत हूं। मेरे लिए क्या मार्ग है?’
भय जब ठीक से समझा जाएगा, तो तुम ऐसा न पाओगे कि लोग मौत से ही भयभीत हैं। जो मौत से भयभीत हैं, वे जीवन से भी भयभीत होंगे ही। क्यों? क्योंकि यह जीवन ही तो है, जो मौत लाता है।
मौत आती कहां से है? मौत जीवन के कंधे पर चढ़कर आती है। इसलिए जो आदमी मौत से भयभीत है, वह जीवन से भी भयभीत रहेगा। वह जी भी नहीं सकता ठीक से, क्योंकि वह जानता है कि जीवन से ज्यादा दोस्ती करनी ठीक नहीं, यह मौत में ले जाएगा। इस घोड़े पर सवारी ठीक नहीं, यह गड्ढे में गिराएगा। और मौत सदा जीवन के ही द्वार से आती है। इसलिए लोग जीवन से भी डरे हुए हैं।
कौन जी रहा है? घसिट रहे हैं लोग! कुनकुने-कुनकुने जी रहे हैं। जी कौन रहा है? दिल भरकर नहीं जी पाते, क्योंकि हर बार जब दिल भरकर जीने लगते हो, तभी लगता है कि मौत करीब आयी। जहां दिल भरकर जीने की चेष्टा की, वहीं खतरा है। और खतरा एक ही है--मौत का। इसलिए तो लोग दुकानदार हो गए हैं, लोग सौदागर हो गए हैं। लोग कौड़ियां इकट्ठी करते रहते हैं। दांव नहीं लगाते कभी। और तुम्हारा जीवन, बिना दांव के, जीवन ही नहीं है।
जुआरी ही जानता है कि जीवन क्या है। दांव जो लगा सकता है, वही जानता है कि जीवन क्या है। क्योंकि जीवन के फूल खतरे में खिलते हैं। जब मौत बिलकुल करीब होती है, तब जीवन के फूल खिलते हैं।
इसीलिए खतरे में एक तरह का आकर्षण होता है--तुमने खयाल किया। खतरे में एक तरह का आकर्षण तुमने कभी अपने भीतर अनुभव किया? अगर तुम कार चलाते हो, तो जब तुम्हारी कार अस्सी मील प्रतिघंटे से ऊपर जाने लगती है, तब एक तरह की पुलक आती है। छाती फूलती। अच्छा लगता। खतरा भी बढ़ता जाता। अब नब्बे हो गयी, पंचानबे हो गयी, सौ मील की रफ्तार हो गयी। और हिंदुस्तान के रास्ते! और कार सौ मील की रफ्तार पर! और कार भी बिरला की एम्बेसेडर! जिसमें सब चीजें बजती हैं, सिर्फ हार्न नहीं बजता! खतरा! प्राण कंपने लगेंगे। लेकिन एक पुलक भी होगी, रोमांच भी होगा, संवेग भी होगा। तुम जीवंत मालूम पड़ोगे, जैसे धूल झड़ गयी!
लोग पहाड़ पर चढ़ने जाते हैं, खतरा मोल लेते हैं। कोई कारण नहीं था! अपने घर मजे से रहते। लेकिन पहाड़ चढ़ने चले! पहाड़ से गिरेंगे, तो मरेंगे। जितनी ऊंचाई पर पढ़ते हैं, उतने ही रस-विभोर हो जाते हैं। क्योंकि उतनी ही मौत करीब होती है।
जब जीवन के मौत बहुत करीब होती है, तब जीवन में एक तरह की ताजगी होती है, यौवन होता है। इसलिए जो लोग ठीक-ठीक जीवंत हैं, वे खतरे की तलाश करते हैं।
फ्रेडरिक नीत्शे ने कहा है: जीना हो तो एक ही उपाय है--खतरे में जीयो, लिव डेंजरसली।
तुमने ठीक पहचाना कि मौत से डर लगता है और जीवन से भी डर लगता है। क्योंकि जब भी जलती है मशाल जीवन की, तभी मौत चारों तरफ करीब मालूम पड़ती है। इसलिए लोग जवानी में ही बूढ़े हो जाते हैं, जीते ही नहीं। हजार तरह की सुरक्षाएं, और हजार तरह के भय, और हजार तरह की व्यवस्था करके मुर्दा हो जाते हैं!
सावधान रहना। जीवन तो जाएगा, इसलिए जी लो। जीवन तो जाएगा, इसलिए जीवन को परख लो, पहचान लो। जीवन तो जाएगा, रुकेगा नहीं। तुमने न भी जीया, तो भी जा रहा है। इसे भूलना मत।
तुमने न भी जीया जीवन, तो भी मौत आ रही है। तुम्हारी मौत, लेकिन व्यर्थ की मौत होगी। जी लो, और मौत को आने दो। जी लो पूरा जीवन को। निचोड़ लो जीवन का पूरा रस। और तब तुम चकित हो जाओगे। तब तुम मौत का रस भी निचोड़ने में समर्थ हो जाओगे। जो ठीक से जीवन को जी लिया है परिपूर्णता में, वह मौत को भी परिपूर्णता में जीता है। कहां भय है! वह जीवन के रहस्यों को तो जान ही लेता है, वह मौत के रहस्यों को भी जान लेता है।
सुकरात को जब जहर दिया गया, तो वह बड़ा प्रफुल्लित था। उसके शिष्य बहुत दुखी और पीड़ित थे, रो रहे थे। और उसने कहा: चुप हो जाओ। मैं मर जाऊं, उसके बाद रो लेना। यह कोई घड़ी है रोने की!
एक शिष्य ने पूछा कि आपकी मौत आ रही है और आप इतने प्रफुल्लित मालूम होते हैं! ऐसा हमने प्रफुल्लित आपको कभी देखा नहीं! सुकरात ने कहा: जीवन तो मैंने जीया और जान लिया। अब एक नयी चीज जानने का मौका मिल रहा है; मौत आ रही है। जीवन के रहस्यों से तो मैं परिचित हुआ, अब मौत भी पर्दा उठाएगी, मौत का भी घूंघट उठेगा। अब मैं नए सत्य में प्रवेश कर रहा हूं। जीवन जाना-माना है; मौत को भी जानने का मौका करीब आ रहा है। क्यों न मैं प्रफुल्लित होऊं! क्यों न मैं आनंदित होऊं!
जो आदमी बाहर जहर तैयार कर रहा था, सुकरात उठ-उठकर बाहर जाता, उससे पूछता: भई, बड़ी देर लग रही है! कब तक तैयार करोगे?
अब वह जहर तैयार करने वाला जल्लाद, उसको भी दया आने लगी और उसने कहा: तुम आदमी कैसे हो? मैं देर लगा रहा हूं कि तुम थोड़ी देर और जी लो। तुम्हें जल्दी क्या पड़ी है? तुम मुझसे ज्यादा जल्दी में हो! और मैं देर लगा रहा हूं कि तुम जैसा प्यारा आदमी थोड़ी देर और जी ले। थोड़ी देर और श्वास ले ले। तुम बार-बार पूछने क्यों आ रहे हो!
सुकरात छोटे बच्चे की तरह है। जैसे छोटा बच्चा पूछता है। हर चीज को पूछता है! पूछता है: मैं मरूंगा? और उससे कहो कि हां! तो वह कहता है: कब मरूंगा? आज? कल? कब होगी यह बात?
यह बूढ़ा सुकरात अभी छोटे बच्चे की तरह ताजा है। इसके दर्पण पर धूल जमी ही नहीं। यह बूढ़ा हुआ ही नहीं। शरीर बूढ़ा हो गया है, मगर इसके प्राण युवा हैं। यह मौत को भी जान ही लगा। इसनेजीवन को भी जाना, यह मौत को भी जान लेगा।
और जिसने जीवन और मृत्यु दोनों को जान लिया, उसने परमात्मा को जान लिया। ये दो द्वार हैं परमात्मा के। जीवन में परमात्मा है, मृत्यु में परमात्मा है। जीवन परमात्मा का दिन है, मृत्यु परमात्मा की रात है। जिसने दिन ही दिन जाना और रात न जानी, उसका जानना अधूरा है। रात के अपने मजे हैं। अपना विश्राम है। रात की अपनी शालीनता है। रात की अपनी गहराई, गहनता है।
रात का गहन अंधकार जैसी शांति लाता है, वैसा सूरज का प्रकाश नहीं ला सकता। सूरज के प्रकाश में चीजें उथली हो जाती हैं। रात के अंधकार में गहन हो जाती हैं, गहराई पा जाती हैं।
और फिर दिनभर का थका-मांदा आदमी जैसे रात सो जाना चाहता है, ताकि फिर कल सुबह उठ सके, ताकि कल फिर सुबह सूरज का स्वागत कर सके। ऐसा ही जीवन का थका-मांदा आदमी मृत्यु में सो जाना चाहता है। जो ठीक से जीया, वह ठीक से मरेगा। सम्यक जीवन सम्यक मृत्यु को लाता है।
डरो मत। डरने से क्या सार है! डरे तो जीवन से भी चूके, मौत से भी चूकोगे। जीवन भी ऐसे ही जीए, न के बराबर। और ऐसे ही मर भी जाओगे, खाली के खाली!
लेकिन तुम्हें कुछ दिखायी पड़ना शुरू हुआ है, उसका उपयोग कर लो।
इतना दर्द न दो मुझको।
इतना प्यार न दो मुझको।
ये पुरवैया-सा जीवन
ये पूजा-सा उजला तन
ये सावन के मेघ नयन
इतनी खुशियां इतना गम
कैसे झेल सकेगा मन?
इतना प्यार न दो मुझको।
इतना दर्द न दो मुझको।
आशाएं बनजारिन हैं
पीड़ाएं मनिहारिन हैं
इच्छाएं पनिहारिन हैं
जो कुछ मिला वही क्या कम?
बहुरुपिया-सा मौसम
इतना प्यार न दो मुझको।
इतना दर्द न दो मुझको।
सरसों से पियराए दिन
अमुवां से गदराए छिन
सांसें पग धरती गिन-गिन
ऊबड़-खाबड़ रस्ते हैं
केवल सपने सस्ते हैं
इतना प्यार न दो मुझको।
इतना दर्द न दो मुझको।
न तो आदमी प्यार सह पाता, न पीड़ा सह पाता। दोनों से मुक्त हो जाना जरूरी है। और दोनों से मुक्त हो जाने का उपाय क्या है?
जो आए, उसे जीयो। जो आए, उसे परिपूर्णता से जीयो। पीड़ा आए, तो पीड़ा को। प्यार आए, तो प्यार को। सुबह हो तो सुबह, और सांझ हो तो सांझ। जो आए, उसे परिपूर्णता से जीयो; अधूरे-अधूरे नहीं, बे-मन से नहीं।
तुम थोड़ा चौंकोगे। क्योंकि तुम कहते हो: सुख तो हम पूरे मन से जीना चाहते हैं, मगर मिलता नहीं। और दुख कौन पूरे मन से जीना चाहेगा! क्यों जीना चाहेगा? और मिलता बहुत!
तुम जरा दुख को भी पूरे मन से जीने की कोशिश करो। क्या मतलब है मेरे कहने का?
तुम्हारे सिर में दर्द है, मान लो, उदाहरण के लिए। साधारण चिंता यही होती है कि कैसे मिटे? न मिटे, तो कम से कम भूल जाए। चलो, एस्प्रो ले लो, कि एनासिन ले लो। मिटे न, तो भूल ही जाए।
तुमने कभी एक प्रयोग किया: शांत बैठ जाओ, स्वीकार कर लो कि सिर में दर्द है आज। अंगीकार कर लो। तनाव छोड़ दो। सिर के दर्द के प्रति दुर्भाव छोड़ दो। मिट जाए--यह धारणा छोड़ दो। है--स्वीकार कर लो। विश्राम में हो जाओ और शांति से सिरदर्द को देखो: क्या है? तुम चकित हो जाओगे। जैसे-जैसे स्वीकार बढ़ेगा, वैसे-वैसे दर्द कम हो जाएगा।
यह करके देखो। यह तो प्रयोगात्मक है। यह तो योग की सामान्य प्रक्रियाएं हैं। यह असली योग है। शरीर का व्यायाम, और उलटे-सीधे खड़े होना--नकली योग है। उसका कोई मूल्य नहीं है।
चकित होकर रह जाओगे, विस्मय से भर जाओगे। जैसे-जैसे स्वीकार बढ़ेगा, दर्द कम होता जाएगा। स्वीकृति की मात्रा बढ़ती है, दर्द की मात्रा कम होती है। और जब तुम शांत भाव से देखोगे, साक्षी बन जाओगे, तो तुम पाओगे कि दर्द की मात्रा भी कम हो रही है, दर्द का क्षेत्र भी कम हो रहा है।
पहले लगता था, पूरे सिर में है। अब लगता है कि बस, एक कोने में है। और जागो। और अंगीकार करो। और साक्षी बनो। और तुम पाओगे कि अब एक कोने में भी नहीं है। जैसे सुई चुभती हो, ऐसे एक छोटे से स्थल पर केंद्रित है।
और जागो, और स्वीकार करो। यह सुई के बराबर जो दर्द रह गया है, यह यही कह रहा है कि अभी सुई के बराबर अस्वीकार रह गया है। यह यही कह रहा है कि अभी सुई के बराबर इनकार रह गया है। यह यही कह रहा है कि अभी सुई के बराबर साक्षीभाव का अभाव रह गया है। बस, इतना ही; और कुछ नहीं।
और तब तुम अचानक पाओगे: वह घड़ी आ जाती है, जब अचानक दर्द खो जाता है। फिर लौट आता है, फिर खो जाता है। फिर लौट आता है, फिर खो जाता है। इसका मतलब?
इसका मतलब यह हुआ कि जब तुम्हारा स्वीकारभाव खो जाता है, तब दर्द लौट आता है। जब तुम्हारा स्वीकारभाव लौट आता है, दर्द खो जाता है। दोनों साथ नहीं हो सकते। जैसे दीया ले आओ कमरे में, तो फिर अंधेरा खो जाता है। और दीया बुझा दो, तो अंधेरा आ जाता है। ऐसा साक्षीभाव का दीया जलता हो, तो दर्द खो जाता है। सब पीड़ा खो जाती है। सब भय खो जाता है। सब चिंता खो जाती है।
और तब तुम्हारे हाथ में कुंजी लगी जा रही है। फिर तुम उसका उपयोग करना चाहो, तो करो; न करना चाहो, तो न करो। पर कुंजी तुम्हारे हाथ लगी जा रही है।
अगर परिपूर्ण रूप से कोई साक्षी हो जाए, तो सब दर्द खो जाते हैं। और परिपूर्ण रूप से कोई असाक्षी हो जाए, तो जीवन नर्क है और जीवन में दर्द ही दर्द है।
मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि साक्षीभाव हो जाने से सुख हो जाएगा। मैं इतना ही कह रहा हूं कि दुख भी खो जाएंगे, और सुख भी खो जाएंगे। क्योंकि सुख भी दुख के ही रूप हैं।
फिर बचती है--परिपूर्ण शांति। उस शांति का नाम ही आनंद है। भाषाकोश में तो आनंद का अर्थ लिखा है: महासुख। वह गलत है। आनंद का भाषाकोश से क्या लेना-देना! भाषाकोश लिखने वालों को आनंद का क्या पता?
आनंद महासुख नहीं है। आनंद दुख और सुख दोनों का अभाव है। कोई उत्तेजना नहीं रह गयी--न सुखद, न दुखद; न प्रीतिकर, न अप्रीतिकर। उत्तेजना ही गयी। आनंद है अनुत्तेजित स्थिति। सब तरह का बुखार गया। सब तरफ शीतल हो गया। उस शीतल दशा को ही मोक्ष कहा है।
जब यह दशा तुम्हारी सामान्य दशा हो जाए, तो तुम यहां पृथ्वी पर रहते ही मोक्ष में विराजमान हो गए।
यहीं है नर्क। यहीं है स्वर्ग। यहीं है मोक्ष। और जो यहां मुक्त हो जाता है, वही मृत्यु के बाद भी मुक्त रहेगा। जो यहां बंधा है, वह मृत्यु के बाद फिर वापस लौट आएगा। वह इस चाक से बंधा है। यह चाक घूमता ही जा रहा है।
तुम पूछते हो: ‘मेरे लिए क्या मार्ग है?’
साक्षी। और तुम्हारे लिए ही नहीं, सब के लिए। मार्ग एक है। चलने वाले अनेक होंगे, मगर मार्ग एक है।
ओशो, मुझे आपसे बहुत प्रेम है, फिर भी मुझे परमात्मा को जानने की प्यास क्यों नहीं है? प्रभु, मुझे भी पुकार लो। मैं कब तक भटकती रहूंगी?
परमात्मा को कभी देखा नहीं, प्रेम हो तो कैसे हो? परमात्मा से मुलाकात नहीं, प्रेम हो तो कैसे हो? परमात्मा है या नहीं, यह भी पक्का नहीं, तो प्रेम हो तो कैसे हो?
परमात्मा से तो प्रेम ऐसे ही है, जैसे कोई अंधा आदमी अंधेरे में तीर चला रहा है और सोच रहा है--शिकार कर लेगा!
तुम परमात्मा से प्रेम कैसे कर सको--मैं यह अपेक्षा भी नहीं करता। मेरी अपेक्षा कुछ और है।
जीसस ने कहा है, परमात्मा प्रेम है। मैं तुमसे कहता हूं, प्रेम परमात्मा है। तुम प्रेम करो; परमात्मा को छोड़ो अभी। जैसे-जैसे तुम्हारा प्रेम सघन होगा, वैसे-वैसे तुम्हें परमात्मा की प्रतीति होनी शुरू होगी। प्रेम की सघनता में तुम्हें परमात्मा के दर्शन और झलकें मिलेंगी।
अब तुम उलटी बात मांग रहे हो। तुम मांग रहे हो कि पहले मुझे परमात्मा से प्रेम करना है। और परमात्मा का पता नहीं है। हो कैसे? इन वृक्षों से हो सकता है। फूलों से हो सकता है। चांद-तारों से हो सकता है। मनुष्यों से हो सकता है। जिनका बोध तुम्हें हो रहा है, उनसे हो सकता है। परमात्मा से कैसे हो?
और जो कहते हैं, उनको परमात्मा से प्रेम है, उनको अभी पता नहीं है कि वे क्या कह रहे हैं। धोखा ही दे रहे हैं। सौ में निन्यानबे आदमी, जो कहते हैं, उनको परमात्मा से प्रेम है, उनको कुछ पता नहीं है।
सच तो यह है कि परमात्मा से तो दूर, परमात्मा के नाम पर उन्होंने आदमियों से भी प्रेम करना बंद कर दिया है। यह तरकीब मिल गयी उनको--कि हमको तो परमात्मा से प्रेम है। आदमियों से क्या करना! उन्होंने तो यह तरकीब बना ली--कि आदमियों से प्रेम छोड़ना पड़ेगा, तब परमात्मा से प्रेम होगा।
परम भक्त रामानुज के पास एक आदमी आया। और उसने कहा कि मुझे परमात्मा को पाने का मार्ग बता दें। मैं परमात्मा को पाने के लिए दीवाना हूं। मुझे परमात्मा चाहिए ही चाहिए। मैं सब दांव पर लगाने को तैयार हूं।
रामानुज ने उस आदमी को देखा और कहा कि मैं तुमसे कुछ प्रश्न पूछूं? तुमने कभी किसी को प्रेम किया? उस आदमी ने कहा: आप फिजूल की बातें न पूछें। मैं इस तरह की झंझटों में पड़ा ही नहीं। मैंने कभी किसी को प्रेम नहीं किया। मुझे तो परमात्मा से प्रेम है। मुझे तो आप परमात्मा का रास्ता बता दें। मैं सब दांव पर लगाने को तैयार हूं।
रामानुज की आंखें गीली हो गयीं। उन्होंने कहा: मैं तुझसे फिर एक बार पूछता हूं। जरा खोजबीन कर अपने मन में। कभी तो किसी को किया होगा--मां को, पिता को, भाई को, बहन को, किसी स्त्री को, किसी मित्र को--किसी को भी प्रेम तूने कभी नहीं किया? उसने कहा: मैं इन झंझटों में, संसार की झंझटों में मैं पड़ता ही नहीं। यह सब असार है। कौन किसकी माता? कौन किसका पिता? कौन किसका भाई? कौन किसकी पत्नी? यह सब असार है, यह सब माया है। आप जैसे संत पुरुष और ये कहां की बातें पूछ रहे हैं! मुझे तो परमात्मा से प्रेम है।
रामानुज का वचन बड़ा महत्वपूर्ण है। रामानुज ने कहा: फिर मैं तुझे साथ न दे सकूंगा। सहारा न दे सकूंगा। मैं असहाय हूं। तूने किसी को प्रेम किया होता, तो प्रेम से ही परमात्मा का रास्ता निकल सकता था। तूने किसी से प्रेम ही नहीं किया, तो तूने रास्ता ही तोड़ दिया।
तुम परमात्मा को छोड़ ही दो। अब तुम्हारा परमात्मा से प्रेम नहीं है और परमात्मा की प्यास नहीं, तो अब कोई प्यास तो पैदा नहीं की जा सकती। और अगर पैदा की जाए, तो झूठी होगी, कृत्रिम होगी।
अब जैसे किसी आदमी को प्यास नहीं लगी है। अब क्या करो? समझाओ उसको कि लगाओ प्यास! शास्त्रों के उल्लेख दो कि प्यास बड़ी ऊंची चीज है, लगनी चाहिए! उसका कंठ सूखा नहीं है। उसको प्यास लगी नहीं है, तो क्या करोगे! कितनी ही चीख-पुकार मचाओ...।
अगर ज्यादा जोर-जबर्दस्ती करोगे उस पर, और नर्क का डर दिखलाओगे कि अगर प्यास नहीं लगी तो नर्क में सड़ोगे, और अगर प्यास लगी तो स्वर्ग में सुख भोगोगे, तो वह आदमी सोचेगा: चलो, लगाओ प्यास!
लगाओ प्यास का क्या मतलब होगा? वह झूठ ही कहने लगेगा कि हां, मुझे प्यास लगी है। बड़ी प्यास लगी है। मेरा कंठ जल रहा है! और वह जानता है कि न कंठ जल रहा है, न प्यास लगी है।
ऐसे ही मंदिरों में लोग खड़े हैं हाथ जोड़े--कि हे प्रभु, दर्शन दो। कंठ-मंठ में कहीं कोई आग नहीं लगी है। फिर कहते हैं: हमारी प्रार्थनाएं सुनी नहीं जातीं। प्यास ही झूठी है। और इसका जिम्मा किस पर है? ये तुम्हारे साधु-संत जो तुम्हें समझाते हैं कि परमात्मा की प्यास जगाओ, उन पर जिम्मा है।
प्यास कहीं जगायी जाती है? फिर क्या उपाय है? उपाय यही है कि जिस बात की प्यास है, उसी से शुरू करो।
अगर तुम्हें मुझसे प्रेम है, तो चलो, यही सही। इसी प्रेम में पूरे डूबो। इस डुबकी से ही शायद और बड़े प्रेम की प्यास लगे। अनुभव चाहिए न! तुम्हें एक बूंद की प्यास है, सागर की प्यास नहीं है। मैं कहता हूं: एक बूंद ही पीयो। शायद एक बूंद से जो तृप्ति मिले...। बूंद तो है, कोई महातृप्ति नहीं मिलेगी। लेकिन कुछ तृप्ति मिलेगी। कंठ शीतल होगा। रस जगेगा। सोचोगे: दो बूंद मिल जाएं, तो अच्छा। दस बूंद मिल जाएं, तो अच्छा!
प्रेम के अनुभव से ही आदमी परमात्मा के अनुभव तक जाता है। परमात्मा परम प्रेम है। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है। परमात्मा प्रेम की आत्यंतिक संभावना है, आखिरी मंजिल है। तुम प्रेम तो करो। तुम किसी को भी प्रेम करो।
इसलिए मैं तुमसे कहता हूं कि कहीं भागना मत संसार को छोड़कर। क्योंकि संसार छोड़कर भागे कि तुम दरवाजा ही छोड़कर भाग गए मंदिर का। फिर तुम लाख सिर पटको कहीं भी, और कोई दरवाजा नहीं है। यह संसार दरवाजा है। यहीं से परमात्मा के मंदिर का प्रवेश है।
तुम प्रेम करो: पत्नी को, बच्चों को, मित्रों को। और परिपूर्णता से करो, कंजूसी से नहीं।
लोग बड़े कृपण हैं। लोग ऐसे कृपण हैं कि कहना कठिन है! कल देखा न, बुद्ध की इस कथा में: एक कंजूस मरा, सात दिन तक बैलगाड़ियों में धन ढोया गया। और दूसरा कंजूस उसका धन ढोता रहा! और उस दूसरे कंजूस को यह बात तो दिखायी पड़ी कि यह आदमी धन इकट्ठा कर-करके मर गया और कुछ न पाया। मगर यह ढो रहा है उसी के धन को! यह भी कल मरेगा, कोई और इसके धन को ढोएगा। और यह आदमी बुद्ध के पास आया कि यह बेचारा कंजूस! जिंदगीभर...। आपके इतने पास था भगवान, दान नहीं किया! धर्म-श्रवण नहीं किया! आपके दर्शन को नहीं आया कभी! यह कैसा कंजूस! और सात दिन यह राजा उसका धन ढोता रहा राजमहल में। सात दिन यह भी बुद्ध के पास नहीं आया। आता था पहले रोज; पर सात दिन भूल गया।
जब धन मिल रहा हो, तो धर्म को कौन याद रखता है!
मुल्ला नसरुद्दीन एक टैक्सी में अपना बटुवा भूल आया। टैक्सी ड्राइवर कोई सतयुगी होगा, सीधा-सादा आदमी, उसने अखबार में खबर निकलवा दी कि मुझे एक बटुवा मिला है, दस हजार रुपए उसमें हैं। जिसके हों, वह ठीक-ठीक ब्यौरा देकर मुझसे ले जाए।
मुल्ला नसरुद्दीन गया। उसने सब ब्यौरा दिया। जांच-पड़ताल ब्यौरे की बिलकुल ठीक थी। तो उस आदमी ने बटुवा दे दिया। मुल्ला नसरुद्दीन ने जल्दी से बटुवा खोला, रुपए गिने। एक बार गिने, दो बार गिने, तीन बार गिने। वह आदमी थोड़ा चिंतित होने लगा। गरीब टैक्सी ड्राइवर। उसने कहा कि नसरुद्दीन, क्या रुपए कम हैं? आप तीन बार गिन चुके!
नसरुद्दीन ने कहा: नहीं, इतने दिन तुम्हारे पास रहे, इसका ब्याज कहां है?
ऐसे लोग हैं! ऐसी अकृतज्ञता है! धन्यवाद की तो बात दूर, इसका ब्याज कहां है!
ऐसी एक कहानी और मुल्ला नसरुद्दीन के संबंध में मैंने सुनी है। उसका छोटा बेटा नदी में नहाने गया और नदी में डुबकी खा गया। कोई आदमी दौड़ा, उसने उसके बेटे को बचाया। मुल्ला नसरुद्दीन के घर ले गया। बेटे को जाकर घर पहुंचाया और कहा कि यह डूबता था, बामुश्किल बचा पाया। सम्हालिए अपने बच्चे को।
मुल्ला ने अपने बेटे को गौर से देखा। और कहा: वह तो ठीक है। बेटा तो ठीक है, लंगोटी कहां है? वह जो लंगोटी पहने था, वह नदी में कहीं बह गयी।
अब जैसे इस आदमी का कसूर है कि लंगोटी कहां! बेटा बचा, इसकी खुशी नहीं; लंगोटी के जाने का दुख है।
आदमी कृपण है--सब आयामों में। प्रेम में भी बड़ा कृपण है। लोग प्रेम भी ऐसा करते हैं कि कहीं ज्यादा न हो जाए! कि कहीं ऐसा न हो कि मैं ज्यादा प्रेम कर दूं! कहीं खो न जाए मेरी संपदा! और प्रेम ऐसी संपदा है कि जितना बांटो, उतनी बढ़ती है। जितना करो, उतना तुम्हारा हृदय प्रेमपूर्ण हो जाता है। जितना उड़ो प्रेम के आकाश में, उतने ही तुम्हारे पंख बड़े और सशक्त हो जाते हैं। जितना बढ़ो प्रेम के आकाश में, उतनी ही तुम्हारी जड़ें जमीन में गहरी चली जाती हैं और जीवन के स्रोतों से तुम्हारा संबंध हो जाता है।
लेकिन प्रेम में बड़ी कंजूसी है। और अक्सर लोग इस प्रेम की कंजूसी को परमात्मा के नाम में छिपा लेते हैं।
मेरा अपना अनुभव यही है। सैकड़ों साधु-संन्यासियों को मैं जानता हूं। मेरा अपना अनुभव यही है कि वे आदमी को प्रेम नहीं कर सके, और इसलिए परमात्मा के प्रेम की बातें कर रहे हैं। वे कंजूस हैं, कृपण हैं।
जैन मंदिरों में जो जैन मुनि बैठे हैं, उनमें से बहुतों को मैं जानता हूं। हिंदू संन्यासियों को जानता हूं। तुम्हारे बड़े प्रसिद्ध मुनि और संन्यासियों को जानता हूं। और सब के भीतर देखकर मुझे जो दिखायी पड़ा है, वह इतना है कि वे आदमी को प्रेम नहीं कर सके। आदमी को प्रेम करने की क्षमता उनमें नहीं थी। इसलिए परमात्मा का नाम आड़ बन गया। इस आड़ में वे खड़े हैं। अब प्रेम नहीं कर सकते, इसका दंश भी नहीं है! प्रेम कर ही नहीं सकते, क्योंकि संसार को कैसे प्रेम करें? लोगों को कैसे प्रेम करें? हम तो परमात्मा को प्रेम करते हैं!
और तुमने देखा, ये परमात्मा को प्रेम करने वाले लोग बड़े खतरनाक साबित हुए हैं। जरा सावधान रहना। जो आदमी कहे कि मैं मनुष्यता को प्रेम करता हूं, उससे जरा बचना; वह खतरनाक आदमी है। मनुष्य को जो प्रेम करता है, वह भला आदमी है। मनुष्यता कहां है, जिसको तुम प्रेम करोगे?
जो आदमी कहता है: मैं मनुष्यता को प्रेम करता हूं, यह हत्यारा हो जाएगा। जोसेफ स्टैलिन ने एक करोड़ आदमी रूस में मार डाले। मनुष्यता को प्रेम! मनुष्य मार डाले एक करोड़, मनुष्यता के प्रेम में! मारना ही पड़ेगा। मनुष्यता को बचाना है, तो मनुष्यों को मारना पड़ेगा।
माओ-त्से-तुंग भी मनुष्यता को प्रेम करते हैं! लाखों लोग जेलों में डाले गए और मारे गए। और हिटलर भी मनुष्य के भविष्य को प्रेम करता था। सुंदर भविष्य चाहता था। महामानव पैदा हो, सुपरमैन पैदा हो, इसकी आकांक्षा से रत था। तो इस कूड़ा-कचरे को उसने साफ कर दिया, आदमी मार डाले!
ईसाई, मुसलमान, हिंदू, जैन--सब लड़ते रहे हैं एक-दूसरे से। और सब कहते हैं कि परमात्मा की तलाश कर रहे हैं! क्या मामला है? कहीं कुछ भूल हो गयी है। कहीं कुछ बुनियादी चूक हो गयी है।
आदमी को प्रेम करो। परमात्मा सिद्धांत है, आदमी वस्तुतः है। आदमी वास्तविकता है। मनुष्य को प्रेम करो, मनुष्यता को नहीं। मनुष्य को प्रेम करो, प्रजातंत्र को नहीं। मनुष्य को प्रेम करो, समाजवाद को नहीं।
ये खतरनाक शब्द हैं: समाजवाद, प्रजातंत्र, मनुष्यता, परमात्मा। इनकी आड़ में कठोर हृदय छिप जाते हैं। जैसे कोई फूलों की आड़ में पत्थर को रख दे। ये कारीगिरियां हैं, आदमी की चालाकियां हैं; ये कुशलताएं हैं, ये कूटनीतियां हैं।
तो मैं तुमसे यह नहीं कहूंगा कि तुम परमात्मा को पाने की प्यास पैदा करो। यह बात इतनी मूढ़ता की है कि मैं नहीं कह सकता। कोई प्यास कैसे पैदा कर सकता है? लगे, तो लगे। न लगे, तो प्यास कहीं पैदा होती है?
हां, प्यास लग जाए, तो पानी खोजा जा सकता है। लेकिन पानी भी सामने हो और प्यास न लगी हो, तो प्यास नहीं लग सकती। पानी देखकर भी प्यास नहीं लग सकती। और लगेगी, तो झूठी होगी। और झूठी प्यास से परमात्मा का कभी संबंध नहीं होता।
तुम्हें झूठी प्यासें पैदा करने की आदत हो गयी है। बच्चा घर में पैदा होता है। मां कहती है: मुझे प्रेम कर। मैं तेरी मां हूं। मां होने से बच्चे में प्रेम पैदा होना चाहिए, ऐसी कोई अनिवार्यता तो नहीं है। बच्चा क्या करे? वह मां पर निर्भर है: दूध इससे मिलता, सेवा इससे मिलती। और मां प्रसन्न रहे, तो उसका बचाव है। मां नाराज हो जाए, तो उसका बचाव नहीं है।
तो बच्चा एक झूठ पैदा कर लेता है। वह मां को देखकर मुस्कुराता है। यह राजनीति की शुरुआत है। यह बच्चा राजनीतिज्ञ हो रहा है। यह आज नहीं कल मगरूरजीभाई देसाई हो जाएगा! यह चल पड़ा दिल्ली की तरफ। इसने यात्रा शुरू कर दी। अब चाहे अस्सी साल लगें पहुंचने में, मगर यह चल पड़ा।
यह मां को देखकर हंसता है। यह झूठी हंसी इसके ओंठ पर आती है। क्योंकि यह जानता है कि मां से दूध मिलता है। अगर हंसूं तो वह जल्दी पास आ जाती है, पुलककर पास आ जाती है। हंसूं, तो जल्दी से स्तन मुंह में दे देती है। हंसूं, तो छाती से लगा लेती है।
यह बच्चा जानता ही नहीं कि प्रेम क्या है। लेकिन मां इसको कोशिश कर रही है कि प्रेम पैदा हो जाए।
फिर पिता कहता है कि मैं तुम्हारा पिता हूं, मुझे प्रेम करो। ये तुम्हारे भाई हैं, इनको प्रेम करो। यह तुम्हारी बहन है, इसको प्रेम करो। ये तुम्हारे फलां हैं, ये तुम्हारे ढिकां है--इनको प्रेम करो। जैसे कि प्रेम कोई सीखने की बात है! और बच्चा सीखता चला जाता है कि ठीक है। जब सभी कह रहे हैं, तो करना ही पड़ेगा!
करेगा क्या वह? वह सिर्फ ऊपर से धोखा देगा। पाखंड पैदा हुआ। इस पाखंड के कारण फिर असली प्रेम पैदा ही नहीं होगा। जो नकली में पड़ गया, उसका असली रुक जाता है।
इसलिए दुनिया में प्रेम की इतनी बकवास है और प्रेम बिलकुल नहीं है। बातचीत खूब है। सब बात कर रहे हैं प्रेम ही प्रेम की। और सभी प्रेमी हैं। और प्रेम कहीं दिखायी नहीं पड़ता! दिखायी पड़ता है: शुद्ध अप्रेम। कारण क्या होगा?
असली फूल खिल नहीं पाया। उसके पहले नकली फूल हमने पौधे पर लटका दिया। असली फूल की जगह ही रोक ली। असली फूल के लिए स्थान न रहा खिलने का। और एक दफा नकली फूल खिलाने की आदत आ गयी, तो फिर कौन असली की झंझट ले। असली के साथ थोड़ी झंझट भी है। नकली सुविधापूर्ण है। बाजार में बिकता है। चेष्टा करने से हो जाता है।
यह जो चेष्टित प्रेम है--झूठा है।
तो मैं तुमसे यह न कहूंगा कि परमात्मा को प्रेम करो। तुम बच्चों को भी यही झूठ सिखा रहे हो। ले गए मंदिर में उनको--कि ये परमात्मा बैठे हैं। बच्चा देखता है कि यहां कोई परमात्मा वगैरह नहीं है। इधर-उधर भी देखता है। एक मूर्ति रखी है पत्थर की। क्योंकि बच्चे को तुम धोखा नहीं दे सकते। बच्चे की आंखें अभी साफ-शुद्ध हैं। अभी धोखा देर है।
बच्चा कहता भी है कि पिताजी! भगवान! ये भगवान? इनको तो अभी मैं धक्का दे दूं तो लुढ़क जाएं! और वह देखो, वह चूहा चढ़ रहा है इनके ऊपर। वे जो लड्डू चढ़े हैं, तो चूहा भी आ गया है। ये तो चूहे से भी अपनी रक्षा नहीं कर सकते! और आप कहते हैं कि ये जगत के रक्षक हैं! ये कैसे रक्षक? ये कैसे भगवान?
लेकिन बाप कहता है: चुप रह! जब तू बड़ा होगा, तब जानेगा। अभी झुक, अभी नमस्कार कर।
यह बच्चा जब इन भगवान को नमस्कार करता है, तो असल में भगवान को नमस्कार नहीं कर रहा है। यह सिर्फ बाप की जबर्दस्ती को नमस्कार कर रहा है। यह बाप ताकतवर है। और जिसकी लाठी, उसकी भैंस! यह झुक रहा है भगवान को। लेकिन वस्तुतः इसको भगवान से क्या लेना-देना है! यह इधर-उधर आंख उठाकर भी देख रहा है।
मेरे पास लोग ले आते हैं अपने बच्चों को। जबर्दस्ती उनको झुकाते हैं--कि छुओ पैर--गरदन पकड़कर! कुछ ही दिन पहले एक महिला अपने बच्चे को लेकर आयी। उसकी गरदन को पकड़कर झुका रही है! वह बेचारा गर्दन उठा रहा है। उसको झुकना नहीं है।
यह तुम क्या कर रहे हो! यह खतरनाक बात सिखा रहे हो। इसके जीवन में फिर असली झुकना कभी नहीं होगा। यह तभी झुकेगा, जब कोई गरदन पकड़ लेगा। फिर इसकी पत्नी इसको झुकाएगी--गरदन पकड़कर। फिर इसके दफ्तर का मालिक इसको झुकाएगा--गरदन पकड़कर। फिर पुलिस वाला झुकाएगा--गरदन पकड़कर। मजिस्ट्रेट झुकाएगा।
जो भी इसकी गरदन पकड़ेगा, वहीं झुकेगा। और जिसकी गरदन यह पकड़ सकेगा, यह उसको झुकाएगा। बस, यह खेल चलेगा। जिससे यह कमजोर होगा, उसका चांटा खाएगा। और जो इससे कमजोर होगा, उसको चांटा मारेगा। जिंदगी इसकी खराब हो जाएगी।
और जब मुझे सुनने वाले लोग ऐसा करते हैं, तो औरों का क्या कहना!
मंदिर में झुका दिया जबर्दस्ती बेटे को और कहा: जब बड़े हो जाओगे, तब समझ में आएगा। जैसे कि उनको समझ में है, पिता को समझ में है! उनको भी कुछ समझ में नहीं आया है।
लेकिन उनके पिता उनको झुका गए थे। और कह गए थे: जब बड़े हो जाओगे, तब समझ में आ जाएगा। अब किसी से कहें कि कुछ समझ में नहीं आया, तो बेइज्जती होती है। अब अपनी पोल-पट्टी खोलने से क्या फायदा! अपनी तो कट ही गयी! अपनी पूंछ तो कट ही गयी!
एक आदमी की तुमने कहानी सुनी न! उसकी नाक कट गयी थी। असल में एक औरत के प्रेम में था। और उसके पति ने पकड़ लिया और उसने उसकी नाक काट दी। अब वह आदमी बड़ी मुश्किल में पड़ा। अब यह कटी हुई नाक लेकर कहां जाए!
वह संन्यासी हो गया, उसने गैरिक वस्त्र पहन लिए। वह एक झाड़ के नीचे बैठ गया। बिलकुल बुद्ध होकर बैठ गया। गांव के लोग बड़े हैरान हुए। वह पति भी बड़ा हैरान हुआ जिसने उसकी नाक काटी थी। वह भी जरा...! कि मामला क्या हुआ! एकदम से क्रांति हो गयी इसके जीवन में!
लोग पूछने आने लगे--कि भई! हुआ क्या? उसने कहा कि बड़ा गजब हो गया! इस आदमी की बड़ी कृपा है, इसने मेरी नाक काट दी। लेकिन नाक काटते ही मुझे परमात्मा का दर्शन हो गया! यह नाक ही बाधा थी। नाक क्या गयी, एकदम चक्षु खुल गए, तीसरा-नेत्र खुल गया! मुझे भी भरोसा नहीं आता, मगर हो गया। मेरा जीवन बदल दिया इस आदमी ने।
अब कई को इच्छा होने लगी, खुजलाहट होने लगी--कि यह तो सस्ता है मामला। अगर नाक काटने से परमात्मा मिलता हो, तो कितने लोग न कटवा लेंगे!
ऐसे ही तो नाक कटवा रहे हैं लोग! कोई उपवास करके नाक कटवा रहा है। कोई सिर के बल खड़ा है। कोई कांटों पर लेटा हुआ है। कोई पूजा कर रहा है। कोई प्रार्थना में लगा है। क्योंकि परमात्मा ऐसे मिलेगा, ऐसे मिलेगा! लोगों ने क्या नहीं कटवाया है परमात्मा को पाने के लिए!
दो-चार ने नाक कटवा ली उससे। उसका काम ही यह हो गया। वह अपने उस्तरे पर धार रखता रहता। यही उसका भजन-कीर्तन! दो-तीन--जिनकी उसने नाक काट दी--उनको ले जाता झाड़ के पीछे, नाक काट देता। और कहता: दिखा परमात्मा? वे देखते। वे कहते कि दिखा तो नहीं! वह कहता: अब तुम्हारी तो कट ही गयी। अब अगर तुम कहो कि नहीं दिखा, तो लोग तुमको बुद्धू समझेंगे। अब जो हुआ, सो हुआ। अब तो तुम यही कहो--इसी में सार है--कि यह नाक क्या कटी, एकदम तीसरा-नेत्र खुल गया!
तो जिनकी कट गयी, वे भी कहते कि तीसरा-नेत्र...! उसके शिष्य भी बढ़ने लगे। शिष्यों की भीड़ लगने लगी। और जब शिष्य बढ़ने लगे, तो और लोगों पर भी परिणाम हुआ कि जरूर कुछ मामला होना चाहिए। एक आदमी गलत हो, इतने लोग तो गलत नहीं हो सकते।
बात यहां तक पहुंची कि खुद राजा भी...! मामला यहां तक पहुंचा। राजा के कान में भी जब खबर पहुंची, तो वह भी सोचने लगा कि अगर ईश्वर के दर्शन ऐसे हो रहे हैं, तो मुझे भी कर लेने चाहिए। नाक में क्या रखा है! गयी, तो गयी! जब इतनों की चली गयी...। और जब उसने सुना कि जिस आदमी ने इसकी नाक काटी थी, वह भी इसका शिष्य हो गया और उसने भी कटवा ली, तो फिर राजा से भी न रहा गया--कि अब मामला रुकने जैसा नहीं है। और वह भी कहने लगा कि भई! होता है दर्शन तो।
राजा खुद आया। वजीर जरा होशियार था। जब राजा राजी हो गया और वह आदमी छुरे पर धार रखने लगा, तो वजीर ने कहा: आप जरा दो-चार दिन रुक जाएं। मुझे जरा ठीक से पता लगा लेने दें। राजा ने कहा: अब और क्या पता लगाना! देखते नहीं, इतने लोगों की नाक कट गयी! और सब कह रहे हैं कि दर्शन हो रहा है। सब कैसे प्रसन्न मालूम हो रहे हैं! ऐसी प्रसन्नता, ऐसा आनंद! सब डोल रहे हैं। कह रहे हैं कि बड़ा मजा आया। जब इतने रस-विभोर लोग बैठे हैं--अब सोचना क्या?
वजीर ने कहा: आप दो-चार दिन रुक जाएं। दो-चार दिन में हर्जा भी क्या है! दो-चार दिन के बाद मजा ले लेना।
उसने दो-तीन नककटों को पकड़ा। उनकी अच्छी पिटाई करवायी। और उनसे कहा कि तुम सच-सच कहो। जब उनकी ज्यादा पिटाई होने लगी, तो उन्होंने कहा: अब हम आपसे क्या छिपाएं! मगर हमारी तो कट ही गयी। और उस आदमी ने बड़ा धोखा किया। उस आदमी ने पहले तो काट दी, और फिर कहा: भई! अगर अब न दिखेगा, तो लोग तुम पर हंसेंगे। हमने भी सोचा कि अब अपनी कट गयी, अपनी बचाने का यही उपाय है।
तुम्हारे पिता जब तुम छोटे हो, तुमसे कह रहे हैं कि जब तुम बड़े हो जाओगे, तुमको पता चल जाएगा। यही उनके पिता ने कहा था। न उनको पता चला है, न तुमको पता चलेगा।
पत्थरों की मूर्तियों के सामने झुकने से क्या पता चलना है! पता चलने का उपाय ही बंद हो गया। मुर्दा शास्त्रों की पूजा करने से क्या पता चलना है? मूढ़ता है।
मैं पंजाब में एक घर में ठहरता था। सुबह उठकर मैं निकला, आंगन की तरफ जा रहा था स्नान करने। जिस कमरे से गुजरा, वहां उन्होंने गुरु-ग्रंथ-साहब रख छोड़े हैं। मैं तो जरा चौंका। गुरु-ग्रंथ-साहब के सामने ही एक भरा लोटा रखा है और दतौन रखी है। मैंने पूछा: भई, यह दतौन, यह लोटा किसलिए? तो वह गुरु-ग्रंथ-साहब के लिए सुबह दतौन करने के लिए रखा है।
गुरु-ग्रंथ-साहब! न कोई साहब हैं। चलो, कोई कृष्ण की मूर्ति के सामने दतौन रख दे, तो समझ में भी आता कि चलो, कुछ तो, कम से कम मूर्ति है। अब यह तो सिर्फ किताब है! मगर मूढ़ता का कोई अंत नहीं है! गुरु-ग्रंथ-साहब दतौन कर रहे हैं!
मैंने कहा: कुछ तो दया खाओ! गुरु-ग्रंथ पर कुछ तो दया खाओ। तुम्हारे साथ गुरु-ग्रंथ को तो न डुबाओ! तुम्हीं दतौन कर लो यही बहुत है।
मगर यह चल रहा है। और तुम भी जब बड़े हो जाओगे, तो तुम भी अपने बेटे को उन्हीं मूर्तियों के सामने झुका जाओगे, उन्हीं मूढ़ताओं में दबा जाओगे। और कह जाओगे कि जब बड़े हो जाओगे, तुमको भी पता चलेगा। लेकिन तब तक नाक कट जाती है। फिर कौन किससे कहे?
नाक-कटे लोग मंदिरों में पूजा कर रहे--मुनि हैं, संन्यासी हैं--और दूसरों की नाक काटने के लिए छुरों पर धार रख रहे हैं।
मैं तुमसे यह न कहूंगा कि तुम परमात्मा को प्रेम करो। कैसे करोगे? जिसे जाना नहीं, जिसे पहचाना नहीं, जिससे कभी कोई मिलन नहीं हुआ, जिसके हाथ में हाथ नहीं पड़ा, उसको तुम कैसे प्रेम करोगे? और प्रेम की प्यास तो कैसे हो पैदा?
तो मैं तो तुमसे यह कहता हूं: जहां तुम्हारा प्रेम हो जाए, जिससे तुम्हारा प्रेम हो जाए, कंजूसी मत करना। उस प्रेम में पूरे के पूरे न्योछावर हो जाना। उस न्योछावर होने से ही तुम्हें और प्यास जगेगी।
मनुष्य को जिसने ठीक से प्रेम किया, वह आज नहीं कल परमात्मा के प्रेम में निकल ही पड़ेगा। कि जब मनुष्य के प्रेम में इतना रस मिला, क्षणभंगुर के प्रेम में इतना रस मिला, तो शाश्व
त के प्रेम में कितना रस न मिलेगा!
और जो मनुष्य में ठीक से गहरे उतरेगा, वह पाएगा कि मनुष्य ऊपर से क्षणभंगुर है, भीतर तो शाश्वत है। हैं तो सभी परमात्मा के रूप, जरा खुदाई गहरी करनी पड़ेगी।
मनुष्य में प्रेम अगर तुम्हारा लग जाए...। मनुष्य को तो छोड़ो, वृक्ष से भी अगर तुम ठीक से प्रेम करो, तो वृक्ष में भी तुम्हारी गहराई बढ़ेगी और तुम एक दिन पाओगे: वृक्ष में भी वैसी ही आत्मा विराजमान है, वैसा ही परमात्मा विराजमान है।
प्रेम की गहराई तुम्हें सभी जगह परमात्मा से मिला देगी।
परमात्मा शब्द को जाने दो। प्रेम शब्द पर्याप्त है। प्रेम से ही परमात्मा आता है। तो मैं कहता हूं: प्रेम प्रार्थना बनेगी। और प्रार्थना परमात्मा बन जाती है।
ओशो, मैं किस बात की प्रतीक्षा कर रहा हूं, वह मुझे भी पता नहीं है। इतना ही ज्ञात है कि प्रतीक्षा है। लेकिन कभी कुछ घटता भी नहीं। और मैं बहुत अकेला हूं। मैं क्या करूं?
राह देखने का इतना ही अर्थ है कि कुछ कमी मालूम हो रही है। कुछ कम है। कुछ होना चाहिए था, जो नहीं है। कुछ जगह खाली है। राह देखने का इतना ही अर्थ है कि मुझे जहां होना चाहिए, जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं हूं।
तुम किसी और की राह नहीं देख रहे हो, अपने ही प्रस्फुटित होने की राह देख रहे हो। तुम्हारा फूल खिल जाए, इसकी ही राह देख रहे हो। यह घटना कहीं बाहर से नहीं घटने वाली है। कोई आने वाला नहीं है। अगर किसी और की राह देखते रहे, तो राह ही देखते रहोगे। न कभी कोई आया है, न कभी कोई आएगा।
तुम्हें कुछ होना है; कोई आना नहीं है। आने को कोई है ही नहीं। तुम्हें कुछ होना है। इस भेद को समझ लेना। क्योंकि इस भेद से ही सारा फर्क पड़ जाएगा।
अगर तुम राह देखते हो, तो करने की तो कोई जरूरत नहीं है। बैठे हैं अपने दरवाजे पर, राह देख रहे हैं! कुछ करोगे नहीं, तो कुछ होगा नहीं। राह देखना निष्क्रिय दशा है। राह देखने वाला आदमी धीरे-धीरे, धीरे-धीरे बिलकुल निष्क्रिय हो जाएगा। राह देखने में आलस्य घना हो जाएगा।
राह देखने की बात नहीं है। इसलिए परम ज्ञानियों ने ऐसा नहीं कहा कि परमात्मा बाहर है। उन्होंने कहा: परमात्मा भीतर है।
राह देखने से क्या होगा? राह देखने पर तो जो बाहर है, वह आता है। खुदाई करनी है अपने भीतर। अपने भीतर की सीढ़ियां उतरनी हैं। अपने भीतर के कुएं में जाना है, जल वहां है। निष्क्रिय होने से नहीं होगा। राह पर आंखें अटकाए रखने से नहीं होगा। जितने जल्दी तुम आंख बंद कर लो...। क्योंकि आंख खोलकर बाहर अगर देखते रहे, देखते रहे, तो कुछ भी न मिलेगा। बाहर कुछ है नहीं। जो मिलना है, भीतर है। संपदा भीतर है।
आंख बंद करो, और फिर राह देखो। आंख बंद करो, और फिर देखो। आंख बंद करो और अपने को पहचानने में लगो। आंख बंद करो, और अपने ही भीतर के अंधेरे में टटोलो।
शुरू में बहुत घबड़ाहट भी होगी, क्योंकि अंधेरा ही अंधेरा मालूम होगा। कभी गए भी नहीं हो भीतर, इसलिए भीतर अड़चन भी लगेगी। टकराओगे भी बहुत। लेकिन धीरे-धीरे टकराहट भी कम हो जाएगी, राह भी बनेगी, अंधेरा भी...। आंखें राजी हो जाएंगी, तो अंधेरे में भी थोड़ा-थोड़ा दिखायी पड़ने लगेगा।
तुमने देखा न, चोर जो रात को चोरियां करते हैं, वे तुम्हारे घर में अंधेरे में इतनी सुविधा से चल लेते हैं, जितना तुम रोशनी में भी नहीं चलते। तुम रोशनी में भी कभी दरवाजे से टकरा जाते, कभी टेबल से टकरा जाते। कभी यह गिर जाता, कभी वह गिर जाता। और चोर रात को दूसरे के घर में आता है और रास्ता बना लेता है अंधेरे में। बिजली भी नहीं जला सकता है, टार्च भी नहीं जला सकता है। और घर भी दूसरे का है। शायद कभी आया भी न हो। यह पहली दफा आना हुआ हो, इस घर में। फिर भी रास्ता बना लेता है! और तुम्हारी तिजोड़ी तक भी पहुंच जाता है। तिजोड़ी भी खोल लेता है। रुपए भी नदारद कर देता है। तुम भी अंधेरे में अपनी तिजोड़ी खोलना चाहो, और तुम्हें पता है कि कहां है, तो भी शायद तिजोड़ी तक न पहुंच पाओ। मामला क्या है?
चोर का अभ्यास हो गया है अंधेरे में देखने का। अंधेरे में अभ्यास करना पड़ता है देखने का।
जब तुम भरी दुपहरी में घर लौटते हो तेज रोशनी से, तो तुम्हें घर में अंधेरा मालूम पड़ता है। लेकिन थोड़ी देर बैठ गए, सुस्ता लिए, फिर आंखें सध जाती हैं; फिर रोशनी दिखायी पड़ने लगती है।
कभी रात में बैठकर देखो अंधेरे में। धीरे-धीरे आंखें सध जाएंगी। आंख का फोकस ठीक बैठ जाएगा, तो अंधेरे में भी थोड़ी-थोड़ी दिखावन शुरू हो जाएगी।
भीतर पहले अंधेरा मिलेगा, क्योंकि तुम जन्मों से भीतर नहीं गए हो। इसलिए भीतर, आंख देखने में असमर्थ हो गयी हैं। जैसे कोई बहुत वर्षों से न चला हो, और पैर लंगड़ा गए हों। फिर चले, तो ठीक से न चल पाए, लड़खड़ाए। लेकिन चलता रहे, तो पैरों में फिर गति आ जाए, फिर खून बहे, फिर मांस-पेशियां सबल हो जाएं। ऐसी ही आंखों की बात है।
प्रतीक्षा मत करो। बाहर से कोई न कभी आया, न आएगा। बाहर की प्रतीक्षा बड़े धोखे में डाल देती है।
प्रिय आएंगे।
मन रहा पुलक
दृग-युग अपलक
मृदु-स्मृतियों के
जलते दीपक
सूनी गोधूली-बेला में--
मैं बैठी पंथ निहारूं अलि
प्रिय आएंगे।
तम भरा गगन
धूमिल आंगन
प्रति पल भर-भर
आते लोचन।
जीवन की सांद्र तमिस्रा में--
मैं नित नव ज्योति जलाऊं अलि
प्रिय आएंगे।
झरता झर-झर
वन का निर्झर
मेरे पथ की
प्रति दिशा मुखर
अंतर की टूटी वीणा के--
मैं नीरव तार सजाऊं अलि
प्रिय आएंगे।
और जो प्रिय इस तरह आते हैं, वे बहुत प्रिय सिद्ध नहीं होते। वे प्रियतम सिद्ध नहीं होते। वासनाओं-तृष्णाओं का जाल ही सिद्ध होता है। जिसकी वस्तुतः राह है, जिस प्रियतम की राह है, वह बाहर के रास्तों से नहीं आता, वह दृश्य की तरह नहीं आता। वह तुम्हारे भीतर द्रष्टा होकर बैठा है। वह तुम्हारे भीतर पहले दिन से ही बैठा है। वही तुम्हारे भीतर धड़कता है। वही तुम्हारी सांस, वही तुम्हारी धड़कन है। वस्तुतः तुम वही हो, जिसकी तुम राह देख रहे हो।
लेकिन तुम भीतर जाते नहीं--और मिलन होता नहीं। फिर बाहर की राह देखते-देखते एक न एक दिन अनुभव में आएगा कि न कोई आया, न कोई आता। निराशा सघन हो जाएगी।
अब न कोई साथ मेरे।
सुन रही हूं मैं तिमिर की
सिसकियों में वह कहानी
व्योम भी ढुलका दिया करता
जिसे कर याद पानी
नैश मेरे नीड़ में लेते न पंछी अब बसेरे!
अब न कोई साथ मेरे।
दूर तक जा-जा कि सहसा
लौट आता मन यहीं फिर
आ रहे सुनसान पथ पर
मेघ झंझा के सघन घिर
सो रहे हैं छांह नभ की स्वप्न तेरे ओ चितेरे!
अब न कोई साथ मेरे।
है करुण इतिहास मत पूछो,
अरे बुझती शमा का
चांदनी का सुख, न अंतर
जानता काली अमा का
रात के आंसू उषा का हास चुन लेता सबेरे!
अब न कोई साथ मेरे।
आज नहीं कल, जो बाहर की तरफ आंख लगाए बैठा रहा, अनुभव करेगा: अकेला छूट गया। अकेला रहा, अकेला रह गया।
भीतर चलो। अपने में उतरो। और वहां तुम पाओगे उसे, जिसकी तलाश है।
पूछा तुमने: ‘मैं किस बात की प्रतीक्षा कर रहा हूं, वह मुझे भी पता नहीं है। इतना ही ज्ञात है कि प्रतीक्षा है। लेकिन कभी कुछ घटता नहीं!’
तुम बाहर देख रहे हो, वहीं तुम्हारी अड़चन है। इस दृष्टि को भीतर लौटाना जरूरी है।
आंखें बंद करके देखना शुरू करो। और तुम्हें सावधान कर दूं: पहले अंधेरा ही अंधेरा मिलेगा। और पहले धुआं ही धुआं आंखों में भरेगा। लेकिन सतत अगर तुम भीतर देखते रहे, तो धुआं भी छंट जाएगा, अंधेरा भी कट जाएगा। और एक दिन तुम पाओगे: एक अपूर्व प्रभा, एक अपूर्व आभा!
एक ऐसा दीया जलता हुआ पाओगे--बिन बाती बिन तेल। फिर जो कभी नहीं बुझता। उसे परमात्मा कहो, उसे आत्मा कहो, सत्य कहो, जो तुम नाम देना चाहो दो। लेकिन वही है--अनाम--जिसकी तलाश हो रही है।
बाहर बहुत खोज चुके, अब भीतर आओ।
राबिया--एक मुसलमान फकीर--अपने घर में बैठी है, झोपड़े में। और उसके घर एक हसन नाम का फकीर आकर ठहरा है। वह उठा। सुबह का सूरज निकल रहा है। सुंदर है सुबह। पक्षी कलरव कर रहे हैं। वृक्षों से सूरज की किरणें उतर रही हैं। आकाश में शुभ्र बादल तैर रहे हैं। सुबह बड़ी शांत है, और ताजी है, और बड़ी प्यारी, और बड़ी सुंदर है।
और हसन ने जोर से पुकारा: राबिया! तू भीतर बैठी क्या करती है! बाहर देख, परमात्मा ने कितनी प्यारी सुबह को जन्म दिया है!
उसने तो ऐसे ही कहा था। राबिया को बाहर बुलाना चाहा था। लेकिन राबिया ने जो उत्तर दिया, वह कुछ शाश्वत उत्तरों में से एक उत्तर बन गया। ऐसे ही उत्तरों से शास्त्र बनते हैं।
राबिया ने कहा: हसन! तुम भी पागल हुए! तुम भीतर आओ बजाय मुझे बाहर बुलाने के। मुझे पता है कि बाहर की सुबह बड़ी प्यारी है। परमात्मा की बनायी हुई हर चीज प्यारी है। लेकिन भीतर मैं बनाने वाले को देख रही हूं। भीतर आओ। सृष्टि सुंदर है, लेकिन स्रष्टा के मुकाबले क्या!
हसन ने तो ऐसे ही बात कही थी कि बाहर आ राबिया! सोचा होगा: पुकार लूं, झोपड़े के बाहर आ जाए। लेकिन राबिया ने उस अवसर पर जो वक्तव्य दिया, वह महावाक्य है।
उसने कहा: हसन, बाहर की सुबह प्यारी है--सच। मैंने भी देखी है। लेकिन मैं उस प्यारे को देख रही हूं, जिसने उस सुबह को बनाया, जिसने सब सुबह बनायी। आओ, उस चितेरे को देखो। तुम भीतर आओ।
यही मैं तुमसे कहता हूं।
बाहर की प्रतीक्षा हो चुकी बहुत। आंख बंद करो। आंख बंद करने से आंख खुलती है। आंख खुली रखने से आंख बंद रह जाती है।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What should I do when I feel like I am waiting and nothing happens?
According to Osho, when you feel stuck in waiting, recognize you’re longing for your own inner flowering, not for someone or something to arrive from outside. Waiting breeds passivity. Close your eyes, turn within, and actively explore the inner darkness through awareness. With patient practice, an inner path appears, vision grows, and the treasure—your being—unfolds. Do not wait; become.
In simple terms: Stop looking outside and gently practice awareness inside yourself; as you keep looking within, the way becomes clear.
Why do I have no thirst to know God?
According to Osho, you lack thirst for God because 'God' is an abstract idea you haven't encountered; authentic longing can't be manufactured. Drop the word and begin with real, tangible love—for people, nature, a master. By plunging totally into genuine love, glimpses of the divine arise on their own, and true thirst naturally awakens, deepens, and guides you.
In simple terms: You don’t feel like knowing God because it’s just a word to you—start by truly loving someone or life, and the real desire for the bigger mystery will grow by itself.
