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Questions in this Discourse
प्रेम एक संबंध है; लेकिन प्रेमी का व्यक्तित्व भी चाहिए। और वह व्यक्तित्व यदि उधार है, तो व्यक्तित्व नहीं है। व्यक्तित्व सदा अपना ही होता है, उधार नहीं। जो उधार है, वह व्यक्तित्व ही नहीं है। वह सिर्फ धोखा है। वह चेहरा है, जो हम दूसरों को दिखाने के लिए ओढ़ लिए हैं। उस चेहरे के भीतर कोई भी नहीं है। प्राणवान, निजता लिए हुए, इंडिविजुअलिटी लिए हुए कोई भी नहीं है। जिसे हम साधारणतया व्यक्ति कहते हैं, वह इंडिविजुअल नहीं है, सिर्फ पर्सनैलिटी है। जिसे हम साधारणतया व्यक्ति कहते हैं, वह निजता नहीं है, बल्कि ओढ़े हुए वस्त्रों का समूह है। जैसे प्याज है। प्याज को कोई, छिलकों को उतारता चला जाए, तो ऐसा लगेगा कि अब इस छिलके के बाद प्याज मिलेगी, अब इस छिलके के बाद प्याज मिलेगी! छिलकों को उतारता चला जाए, छिलके ही मिलते हैं, प्याज कभी मिलती नहीं है। ऐसी ही हम भी एक गठरी हैं, जिसमें सब उधार इकट्ठा होता चला गया है। लेकिन अगर इस उधार व्यक्तित्व के पीछे उतरते चले जाएं, तो पीछे शून्य ही हाथ मिलेगा। पीछे आत्मा, निजता न हो, तो जीवन सारा झूठा हो जाता है।
जीवन की गहरी से गहरी चोरी अनुकरण, नकल, अनुसरण है। जब भी कोई व्यक्ति किसी और जैसा बनने की चेष्टा में रत होता है तभी गहरे में चोर हो जाता है। जब भी कोई व्यक्ति किसी और को अपने ऊपर ओढ़ लेता है, तो नकली हो जाता है, असली नहीं रह जाता। ऑथेंटिक, प्रामाणिक निजता उसकी खो जाती है।
इसका यह अर्थ नहीं है कि दूसरों से आई हुई तरंगें हम ग्रहण न करें। इसका यह भी अर्थ नहीं है कि दूसरों से हम संबंधित न हों। दूसरों से हम जरूर ही संबंधित हों, लेकिन ‘स्व’ को बचाते हुए। क्योंकि फिर संबंधित कौन होगा, अगर स्व भी खो गया है? दूसरों से तरंगें आएंगी, उन्हें लेना भी पड़ेगा; लेकिन उन्हें लें जरूर, वे तरंगें ही न बन जाएं। उन्हें लें भी, दें भी; लेकिन उनके पार भी आप बचे रहें; उनसे अछूता भी पीछे कोई खड़ा रहे; उस सारे लेन-देन के बाद भी कोई बच जाए जो लेन-देन के बाहर है।
अंग्रेजी में एक शब्द है--‘एक्सटेसी।’ हमारे पास एक शब्द है--‘समाधि।’ समाधि को जो लोग अंग्रेजी में रूपांतरित करते हैं, वे एक्सटेसी कहेंगे। एक्सटेसी बड़ा अदभुत शब्द है। एक्सटेसी का मतलब है, बाहर खड़े होना, टु स्टैंड आउट साइड। एक्सटेसी का मतलब है, जीवन की सारी धारा में होते हुए भी हर पल बाहर खड़े होना। जीवन में बहते हुए भी--‘जीवन के बाहर भी हमारे भीतर कुछ रह जाए’--वही हमारी निजता है, वही हमारा होना है। अगर हम जीवन में पूरी तरह खो गए और हमारे पास हमारे संबंधों के अतिरिक्त कुछ भी न बचा, तो हमने अपनी आत्मा खो दी है।
आत्मा का और कोई अर्थ नहीं है। आत्मा का अर्थ ही यही है: सब हो, फिर भी भीतर कुछ अछूता, अस्पर्शित, अनटच्ड, बाहर रह जाए। रास्ते पर चल रहे हैं; लेकिन चलते समय में भी कुछ आपके भीतर होना चाहिए, जो नहीं चल रहा है। क्रोध से भरे हैं; लेकिन क्रोध से भरे क्षण में भी कोई आपके भीतर होना चाहिए, जो आपके क्रोध को भी देख रहा है। भोजन कर रहे हैं; भोजन करते समय भी कोई आपके भीतर होना चाहिए, जो भोजन नहीं कर रहा है, बल्कि जो यह भी जान रहा है कि भोजन किया जा रहा है।
अगर प्रतिपल जीवन के अंतरजाल में हम अपने भीतर किसी को बचा पाते हैं, तो वह जो बचा हुआ है, जो शेष है, दि रिमेनिंग, वही हमारी निजता है। उस निजता का जिसके पास अस्तित्व नहीं है, वह आदमी, आदमी कहे जाने का हकदार नहीं रह जाता है। उसके पास कोई आत्मा नहीं है, उसने अपनी आत्मा खो दी है।
हममें से बहुत कम लोगों के पास इस अर्थों में आत्मा है--बहुत कम लोगों के पास। हम वही हैं--छिलकों का जोड़; वस्त्रों का जोड़; उसके पीछे और कुछ भी नहीं है। इसे भी मैं चोरी कहा हूं। यह चोरी है। किसी का धन चुरा लेना बहुत बड़ी चोरी नहीं है, लेकिन किसी का व्यक्तित्व ओढ़ लेना बहुत बड़ी चोरी है। किसी के वस्त्र चुरा लेना बहुत बड़ी चोरी नहीं है, लेकिन किसी जैसे बनने की चेष्टा में अपने को खो देना बहुत बड़ी चोरी है। किसी के मकान पर कब्जा कर लेना उतनी बड़ी चोरी नहीं है--चोरी है, मैं यह नहीं कह रहा हूं, चोरी नहीं है--उतनी बड़ी चोरी नहीं है, जितनी अपनी आत्मा को खोकर किसी आत्मा की छाया बन जाना बड़ी चोरी है।
सुना है मैंने कि एक आदमी की जिंदगी में कुछ देवता नाराज हो गए थे और उन्होंने उसे अभिशाप दे दिया था। वह अभिशाप बड़ा अजीब था। उन्होंने अभिशाप दे दिया कि आज से तेरी छाया खो जाएगी! वह आदमी हंसा। उसने कहा, छाया से मुझे प्रयोजन भी क्या है? अगर मैं बच गया, तो मेरी छाया से क्या कमी पड़ने वाली है? छाया पड़ती है या मेरी नहीं पड़ती है, इसकी मैंने आज तक न चिंता की, न फिकर की। तुम पागल तो नहीं हो गए हो? अगर नाराज ही हो गए हो, तो यह, यह अभिशाप बड़े काम का नहीं मालूम पड़ता। लेकिन देवता हंसे, देवता उस आदमी से ज्यादा जानते थे।
वह आदमी अपने गांव में लौटा हंसता हुआ कि देवता भी पागल हो गए मालूम होते हैं। छाया खोने से मेरा क्या खो जाएगा! लेकिन गांव में आकर उसको पता चला कि देवता पागल नहीं हैं, वही मुश्किल में पड़ गया है। जिस आदमी ने भी देखा कि उसकी छाया नहीं पड़ती है, वह उसे देख कर भागा। पत्नी ने द्वार बंद कर लिया। पिता ने कहा, हट जाओ, मेरी आंख के सामने दुबारा मत आना। तुम भूत हो, प्रेत हो--क्या हो? मित्रों ने दरवाजे बंद कर लिए। और ग्राहक उसकी दुकान पर आने बंद हो गए। रास्ते से निकलता तो लोग अपने मकानों में अपने बच्चों को बुला लेते कि भीतर आ जाओ, वह आदमी निकल रहा है जिसकी छाया नहीं है। उस आदमी का गांव में जीना मुश्किल हो गया।
अंततः गांव के लोगों ने निर्णय किया कि इस आदमी को गांव के बाहर कर दें। यह आदमी खतरनाक है। ऐसा कभी सुना नहीं कि छाया-रहित आदमी हो। और अंततः उस गांव के लोगों ने उस आदमी को बाहर निकाल दिया। तब उस आदमी को पता चला कि छाया खोकर बहुत कुछ खो गया है।
लेकिन उस आदमी को तो हम छोड़ें, हम सिर्फ छाया हैं, आत्मा हमने खो दी है। हमारा कितना खो गया है उसका हिसाब लगाना बहुत मुश्किल है। हम सिर्फ शैडोज हैं, हम सिर्फ छायाएं हैं। उस आदमी की सिर्फ छाया खोई थी, वह इतनी मुश्किल में पड़ गया और हमारी आत्मा भी खो गई है, तो हम कितनी मुश्किल में होंगे? लेकिन चूंकि सभी की खो गई है, इसलिए हमें कोई गांव के बाहर नहीं कर देता है! और छाया खो जाए, तो दूसरे को पता भी चलता है, आत्मा खो जाए, तो सिर्फ स्वयं को पता चल सकता है, किसी दूसरे को पता नहीं चल सकता है। क्योंकि आत्मा कोई बाह्य घटना नहीं है।
इसलिए ‘अचौर्य’ की बात समझते समय एक प्रश्न निरंतर अपने से पूछना चाहिए: कुछ भी मेरे पास है जिसे मैं कह सकूं कि मेरी निजता है? जो मैं जन्म के साथ लाया था? जो मैंने जीवन में नहीं सीखा? कुछ भी मेरे पास है, जो जन्म के पहले भी मेरा था?
यदि ऐसा कुछ भी आपको स्मरण आता हो कि आपके पास है, जो जन्म के पहले भी आपके पास था, तो आप आश्वस्त हो सकते हैं कि आप जब मरेंगे, तब भी आपके पास कुछ बच रहेगा। लेकिन अगर जन्म के बाद ही सब पाया हुआ है, तो मृत्यु उस सबको छीन लेती है। जन्म के पहले का भी अगर आपके पास कुछ है और ऐसा लगता है जो आपने जीवन से नहीं सीखा, जीवन से नहीं लिया, जीवन से नहीं पाया; जिसे लेकर ही आप आए हैं; जो आपका स्वभाव है; तो मृत्यु से डरने का कोई कारण फिर आपके लिए नहीं है। क्योंकि जो आपने जीवन से नहीं पाया, उसे मृत्यु नहीं छीन पाती है।
लेकिन हम सब डरते हैं मरने से। हम डरते हैं इसीलिए--इसलिए नहीं कि मृत्यु दुखदायी है। आज तक किसी ने नहीं कहा कि मृत्यु दुखदायी है--मृत्यु दुखदायी है इसलिए नहीं डरते, बल्कि इसलिए डरते हैं कि जीवन जिसे हम कहते हैं, उसमें हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो मृत्यु से बच कर हमारे पास बच सके। वह सब छीन लिया जाएगा। जो भी हमने दूसरों से पाया है, उसे हम मृत्यु के पार नहीं ले जा सकते हैं। चाहे वह धन हो, चाहे वह यश हो, चाहे वह ज्ञान हो, चाहे वह व्यक्तित्व हो, वह कुछ भी हो; जो हमने दूसरों से पाया है, वह, वह मेरा नहीं है।
तो हम चोर हैं। वह जो दूसरों से हमने इकट्ठा कर लिया है, वही हमारी चोरी है। यह बहुत गहरी चोरी है, जिसे अदालत नहीं पकड़ेगी। यह बहुत गहरी चोरी है, जिसका कानून से कोई संबंध नहीं है। यह चोरी एक और बहुत बड़े कानून से संबंधित है, जिस कानून का नाम धर्म है। यह चोरी भी किसी अदालत में पकड़ी जाती है, लेकिन वह अदालत परमात्मा की अदालत है।
क्या हमारे पास कुछ भी हमारा है? जिसे मैं कह सकूं कि नहीं, सीखा नहीं, अनलर्न्ड; कह सकूं, किसी से लिया हुआ नहीं; कह सकूं कि मैं ही हूं। अगर ऐसा कुछ भी नहीं है, तो हम बहुत जीवन में जिसे जी रहे हैं, वह चोरी का जीवन है। और ऐसा नहीं है। लेकिन एक बार भी यह स्मरण आ जाए कि मेरे पास ऐसी कोई संपदा नहीं जो मेरी हो, मेरे पास ऐसी कोई निजता नहीं जो मेरी हो, तो जीवन में क्रांति शुरू हो जाती है।
इसलिए आप यह मत सोचना कि आपने कौड़ी नहीं चुराई। आप यह मत सोचना कि आपने किसी के घर से सामान नहीं चुराया। उस चोरी से धर्म का क्या लेना-देना है! उस चोरी से तो आदमी का कानून ही निपट लेता है। धर्म को तो किसी और चोरी से प्रयोजन है, जो कानून की पकड़ में नहीं आता; जो अदालतें निर्णय नहीं कर सकती हैं; जो न्यायाधीश की सीमा के बाहर है।
धर्म का उस चोरी से संबंध है, जो प्रभावों की चोरी है, व्यक्तित्वों की चोरी है, चेहरों की चोरी है। और हम सब चुराए हुए जी रहे हैं। हम सब ऐसे जी रहे हैं, जैसे हम कोई और हों। हम हम नहीं हैं। मैं मैं नहीं हूं, किसी और की तरह जी रहा हूं।
इस अर्थ में मैंने कहा था कि ‘अचौर्य’ मनुष्य की आत्मा में निजता की उपलब्धि का मार्ग है, और ‘चोरी’ मनुष्य की आत्मा के खोने की विधि है। यह भाव के तल पर हो सकती है, विचार के तल पर हो सकती है, शरीर के तल पर हो सकती है।
हम चलते तक नहीं अपने जैसे; हम चलना भी दूसरे से सीख लेते हैं! हम विचार भी नहीं करते अपने जैसा; हम विचार भी दूसरों से सीख लेते हैं! हम भाव भी नहीं करते अपने जैसा; हम भाव भी दूसरों से सीख लेते हैं! सुबह आदमी अखबार पढ़ लेता है और फिर दिन भर अखबार में पढ़ी बातों की चर्चा लोगों से करता रहता है! और उसे कभी खयाल नहीं आता कि वह जो बोल रहा है उसमें उसका अपना कुछ भी नहीं है। गीता पढ़ लेता है, फिर जिंदगी भर दोहराए चला जाता है, और कभी नहीं पूछता लौट कर कि मैं जो बोल रहा हूं, उसमें मेरा कुछ भी नहीं!
सब बोलना, सोचना, उठना, बैठना सब सीखा हुआ है। तो ऐसी जिंदगी में आनंद की वर्षा नहीं हो सकती है। ऐसी जिंदगी में अमृत की झलक नहीं मिल सकती है। ऐसा आदमी रूखा मरुस्थल होगा। क्योंकि झरने सदा प्राणों से बहते हैं, जिनमें हरियाली पैदा होती है। और जो उधार झरनों में जीता है, वह उस आदमी की तरह है जो दूसरे के मकानों को गिन कर सोचता है कि मेरे हैं; जो दूसरों की आंखों को गिन कर सोचता है कि मेरी हैं; जो दूसरों के विचारों को गिन कर सोचता है कि मैं विवेकवान हो गया; जो शास्त्रों को संगृहीत करके समझता है कि ज्ञान आ गया है!
ऐसा आदमी इतनी बुनियादी भ्रांति में जीता है कि अपने पूरे जीवन को व्यर्थ गंवा सकता है। हम गंवा देते हैं। लेकिन एक बार यह सवाल हमारे सामने उठ जाए, तो यह सवाल हमारा पीछा करेगा कि मैं चोर तो नहीं हूं? और अगर यह सवाल हमारा पीछा करने लगे, तो हमें घड़ी-घड़ी दिखाई पड़ने लगेगा कि अभी जो मैं हंस रहा था, वह हंसी मैंने किसी और के ओंठों से सीखी है; कि अभी मैं जो रो रहा था, वे आंसू सच्चे न थे; अभी मैंने जो नमस्कार किया, उस नमस्कार में मेरे प्राणों की कोई आहट न थी; कि अभी मैंने जो प्रेम किया, उसमें प्रेम बिलकुल न था, वह मैंने किसी ड्रामा में पढ़ा था; कि अभी मैंने जो बात कही अपने प्रेमी से, वह मेरा किसी फिल्म में सुना हुआ डायलॉग है।
काश! आदमी की जिंदगी में यह सवाल उठ जाए, तो आदमी आज नहीं कल चोरी से मुक्त होने लगता है; उसकी निजता उभरने लगती है; फिर वह अपने ढंग से हंसता है।
और यह दुनिया बहुत सुंदर हो सकती है--यहां अगर लोग हंसते अपने ढंग से हों, रोते अपने ढंग से हों, सोचते अपने ढंग से हों, तो यह दुनिया बहुत प्राणवान और जीवंत हो सकती है।
अभी यह दुनिया जीवंत नहीं, मुर्दों का एक बहुत बड़ा संग्रह है, जहां सब मरे हुए जी रहे हैं। यद्यपि हमें पता नहीं चलता, क्योंकि हमारे चारों तरफ भी हमारे जैसे ही मुर्दे हैं। हमने भी सुबह अखबार पढ़ा है, पड़ोसी ने भी अखबार पढ़ा है; वह भी अखबार से बोल रहा है, हम भी अखबार से बोल रहे हैं। हमने भी कुरान पढ़ी है, उसने भी कुरान पढ़ी है; वह भी कुरान से बोल रहा है, हम भी कुरान से बोल रहे हैं। उसने भी वहीं से सीखा है, जहां से हमने सीखा है। हमारी बातें तालमेल खाती हैं और ऐसा लगता है कि सब ठीक चल रहा है। लेकिन ठीक कुछ भी नहीं चल रहा है।
इतना दुख नहीं हो सकता, अगर जिंदगी ठीक चलती हो। और जो आदमी अपने को पा ले, उस आदमी की जिंदगी में चाहे और कुछ भी न रहे, अपना होना ही इतना काफी होता है कि कुछ भी न हो, तो उसके आनंद को नहीं छीना जा सकता है। उससे सब छीन लिया जाए, लेकिन उसके आनंद को नहीं छीना जा सकता। क्योंकि निजता से बड़ा कोई भी आनंद नहीं है।
जब एक फूल खिलता है अपनी पूर्णता में, तब आनंद की सुगंध चारों ओर बह उठती है। बस, फूल का पूरा खिल जाना ही उसका आनंद है। आदमी की भी निजता का फूल, इंडिविजुअलिटी का फूल, जब पूरा खिल जाता है, तो जीवन आनंद से भर जाता है। फुलफिलमेंट, आप्त हो जाता है, सब भर जाता है। फिर कुछ भी न हो--धन न हो, यश न हो, पद न हो--तो भी सब-कुछ होता है। और यह निजता न हो, तो पद हों बड़े, धन हो बहुत, यश हो काफी, तब भी कुछ नहीं होता, भीतर सब खाली होता है।
आज पश्चिम में एक शब्द की बहुत जोर से चर्चा है। वह शब्द है--‘एंप्टीनेस।’ आज पश्चिम में जितने बड़े विचारक हैं--चाहे सार्त्र हो, चाहे कामू हो, और चाहे मार्सेल हो, और चाहे हाइडेगेर हो--आज पश्चिम के जितने चिंतनशील लोग हैं, वे सब कहते हैं कि हम बड़े रिक्त मालूम हो रहे हैं, हम बिलकुल खाली-खाली हैं। ऐसा लगता है कि हमारे भीतर कुछ भी नहीं है; हम सिर्फ कंटेनर रह गए हैं, कंटेंट बिलकुल नहीं है। हम सिर्फ डिब्बा हैं, जिसके भीतर कुछ भी नहीं बचा है। भीतर सब रिक्त है और खाली है।
पश्चिम में आज रिक्तता की बड़ी जोर से चर्चा है; होनी नहीं चाहिए। क्योंकि आज उनके पास धन है बहुत, जैसा पृथ्वी पर कभी भी नहीं था। उनके पास महल हैं आकाश को छूते हुए, जिन महलों के सामने अशोक और अकबर के महल झोपड़े हो जाते हैं। उनके पास चांद तक पहुंचने की शक्ति है। उनके पास सारी पृथ्वी को घड़ी आधा घड़ी में विनष्ट कर देने का विराट आयोजन है। फिर रिक्तता क्यों है? फिर एंप्टीनेस क्यों है? फिर क्या कारण है कि भीतर सब खाली है?
कारण है। बाहर सब है, भीतर कुछ भी नहीं है; आत्मा नहीं है, निजता नहीं है। सब है, सिर्फ आदमी नहीं है। सब है, चांद पर पहुंचने की ताकत है, अपने तक पहुंचने की सामर्थ्य नहीं है। धन है बहुत, स्वयं का होना बिलकुल नहीं है। महल हैं बहुत बड़े, रहने वाला बहुत छोटा, न के बराबर, शून्य!
चोरी का यह परिणाम है। पश्चिम को अचौर्य सीखना पड़ेगा, तो रिक्तता मिटेगी, तो एंप्टीनेस मिटेगी। मार्सेल को, कामू को, सार्त्र को निजता, इंडिविजुअलिटी को जगाने के नियम सीखने पड़ेंगे, खोजने पड़ेंगे।
सब जब हो जाए, तभी पता चलता है कि मैं नहीं हूं। और तब जो पीड़ा मन को पकड़ लेती है, वह दुनिया की कोई दरिद्रता नहीं पकड़ा सकती। यह जो अचौर्य है, यह निजता को पाने का सूत्र है; और चोरी स्वयं को खोने का सूत्र है।
गौतम बुद्ध चोर नहीं हैं, उनसे ज्यादा अचोर व्यक्ति खोजना मुश्किल है; लेकिन गौतम बुद्ध बुद्ध हैं, बौद्ध नहीं हैं। बुद्ध वह है, जो जागा; बौद्ध वह है, जो जागे हुए के पीछे चलता है।
ऐसे ही, जीसस चोर नहीं हैं, लेकिन जीसस क्राइस्ट हैं। क्राइस्ट का मतलब, जिसने अपने को सूली दे दी और उसे पा लिया, जो स्वयं को मिटाने से उपलब्ध होता है। लेकिन जीसस क्रिश्चियन नहीं हैं। क्रिश्चियन वह है जो सूली पर लटके हुए आदमी के पीछे चलता है। और फर्क बहुत पड़ जाते हैं। जीसस की गर्दन सूली पर लटकती है और ईसाई की गर्दन में छोटा सा क्रॉस लटका रहता है। गर्दनों में क्रॉस नहीं लटकते, क्रॉसों पर गर्दनें लटकती हैं। जीसस सूली पर चढ़ते हैं, वे क्राइस्ट हैं; क्रिश्चियन अपने गले में एक सोने की सूली लटका लेता है! एक तो सोने के क्रॉस नहीं होते, सोने की सूलियां नहीं होतीं; अगर सोने की सूलियां होंगी, तो सिंहासन किस चीज का बनाइएगा? और सूलियां गलों में नहीं लटकाई जातीं, गले सूलियों पर लटकाए जाते हैं। क्रिश्चियन चोर हैं।
मोहम्मद बात और है, मुसलमान बात और है। मोहम्मद दुनिया में हों, यह सुखद है, सुंदर है; मुसलमान दुनिया में हो, यह खतरनाक है। महावीर दुनिया में हों, स्वागत के योग्य हैं; लेकिन जैन दुनिया में हो, खतरनाक है। बुद्ध बात और, सुगंध और; बुद्ध को मानने वाला दुर्गंध है, सुगंध नहीं है। इसके कारण हैं।
पहला कारण तो यह कि जैसे ही किसी व्यक्ति ने यह तय किया कि मैं किसी दूसरे के पीछे चलूंगा, वैसे ही वह अपनी आत्मा को खोने वाला हो जाता है। दूसरे के पीछे चलने का उपाय ही नहीं है। असल में, दूसरे के पीछे चलने का मतलब यह है कि यह आदमी जीवन की वास्तविक यात्रा से बचना चाहता है। जो जिन नहीं होना चाहता, वह जैन हो जाता है। जो बुद्ध नहीं होना चाहता, वह बौद्ध हो जाता है। जो क्राइस्ट होने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, वह क्रिश्चियन हो जाता है। यह समझौता है। क्रिश्चियन होने में कुछ भी नहीं करना पड़ता है। क्राइस्ट होना, जिंदगी को जोखम में डालना है। जैन होने में क्या करना पड़ता है? जिन होना बड़ी तपश्चर्या है। जैन होने में सिर्फ जिनों की पूजा करनी पड़ती है। पूजा खेल है। जिन होने में पूजा नहीं करनी पड़ती, साधना करनी पड़ती है। साधना संकट है; साधना श्रम है; साधना संकल्प है।
असल में, जो व्यक्ति अपनी आत्मा को पाने का श्रम नहीं उठाना चाहता, वह किसी तरह की पूजा करके अपने मन के लिए खेल पैदा कर लेता है। जो व्यक्ति स्वयं को नहीं पाना चाहता, वह किसी दूसरे के पीछे चलने का खेल खेलने लगता है। और दूसरे के पीछे चल कर कोई कभी अपने को पा नहीं सका है। क्योंकि दूसरा सदा बाहर है और मैं कितना ही दूसरे के पीछे चलूं, सारी पृथ्वी घूम आऊं, तो भी मैं भीतर नहीं पहुंच जाऊंगा। अगर मुझे भीतर पहुंचना है, तो बाहर चलना बंद करना पड़ेगा। और अनुगमन सदा बाहर चलना है। अनुगमन में सदा बाहर चलना ही होगा; दूसरा बाहर है, उसके पीछे बाहर ही जाना पड़ेगा।
महावीर किसी के पीछे नहीं जाते, जीसस किसी के पीछे नहीं जाते, कृष्ण किसी के पीछे नहीं जाते। यह बड़े मजे की बात है कि जो लोग किसी के पीछे नहीं गए, उनके पीछे कितने लोग चले जाते हैं! बुद्ध किसी के पीछे नहीं जाते, लेकिन बुद्ध के पीछे बहुत लोग चले जाते हैं। अगर बुद्ध से ही सीखना है, तो कम से कम एक बात तो सीख ही लेनी चाहिए कि किसी के पीछे नहीं जाना है। अगर बुद्ध से ही सीखना है, तो एक बात सीख लेनी चाहिए: किसी के पीछे नहीं जाना है। अगर महावीर से ही कुछ सीखना है, तो एक बात सीख लेनी चाहिए कि किसी की पूजा से कुछ भी होने वाला नहीं है; महावीर किसी की पूजा में नहीं हैं। अगर जीसस से ही कुछ सीखना है, तो एक बात सीख लेनी चाहिए कि परमात्मा को बिना क्रिश्चियन हुए पाया जा सकता है। जीसस तो क्रिश्चियन नहीं थे। अगर मोहम्मद से कुछ सीखना है, तो एक बात पक्की सीख लेनी चाहिए कि परमात्मा का मुसलमान से कुछ लेना-देना नहीं है। मोहम्मद तो मुसलमान नहीं थे। परमात्मा मोहम्मद को भी मिल सकता है, जो मुसलमान नहीं हैं।
जिनके पीछे सारी दुनिया चल रही है, वे किसी के पीछे नहीं चलते हैं। और उनके पीछे हम इसीलिए चल रहे हैं कि हम भी वह पा लें, जो उन्होंने पाया! लेकिन हम देखें तो कि विज्ञान में कहीं भूल हो गई है, गणित में कहीं चूक हो गई है। उन्होंने पाया ही इसलिए कि वे अपने भीतर जाते हैं, और हम पाना चाहते हैं किसी के पीछे जाकर!
पीछे जाना, बाहर जाना है। इसलिए सब तरह के अनुगमन को मैं चोरी कहता हूं! और इस तरह के अनुगमन से संस्कृति पैदा नहीं हुई, संस्कृति के पैदा होने में बाधा पड़ी है। संस्कृति पैदा नहीं हुई, उसके पैदा होने में बाधा पड़ी है। और ये सारे अनुयायी सिवाय लड़ने के इस पृथ्वी पर और कुछ भी नहीं करते रहे हैं। इन सारे अनुयायियों ने पृथ्वी को खून और रक्त से भरने के सिवाय फूलों से नहीं भरा है। और चर्च, और मंदिर, और मस्जिद, और गुरुद्वारे मनुष्य को लड़ाने का उपक्रम बन गए हैं, उपकरण बन गए हैं। आदमी का इतिहास धर्मों के युद्धों से भरा है। इन अनुयायियों ने मोहम्मद और महावीर, कृष्ण और क्राइस्ट को मान कर, कृष्ण और क्राइस्ट बनने की तो कोई घटना नहीं घटाई, लेकिन एक-दूसरे की हत्या करने में बहुत कुशलता दिखाई है।
यह हत्या बहुत तरह की है। कुछ लोग तलवारें लेकर कूद पड़ते हैं, कुछ लोग केवल विचारों की तलवारें चलाते रहते हैं। सिद्धांतों का--जैन मुसलमान का, मुसलमान हिंदू का, हिंदू ईसाई का, ईसाई बौद्ध का--सिद्धांतों का खंडन करते रहते हैं। अगर बहुत जोश आ जाए और सिद्धांतों से लड़ाई-झगड़ा ठीक से न हो सके, तो फिर तलवारें भी खिंच जाती हैं।
आदमी बुद्ध और महावीर और क्राइस्ट के होने की वजह से ज्यादा आनंदित होना चाहिए था, लेकिन इनके होने की वजह से बड़ा उपद्रव हुआ है। बर्ट्रेंड रसल ने कहीं लिखा है कि क्या हर्जा था परमात्मा को कि अगर जीसस को न भेजता? तो कम से कम ईसाई तो न होते। ईसाइयों ने मध्य-युग में सारे यूरोप में लाशें बिछा दीं।
अगर जीसस के लिए बर्ट्रेंड रसल जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को यह प्रार्थना सोचनी पड़े कि परमात्मा को क्या हर्जा था कि जीसस को न भेजता, इस एक आदमी को न भेजने से पृथ्वी ज्यादा शांत हो सकती थी, कम से कम लड़ने वाला ईसाई तो न होता, तो सोचने जैसा है।
जीसस के आने से पृथ्वी बुरी नहीं हुई। जीसस के आने से तो पृथ्वी में सुगंध बढ़ती; जीसस के आने से तो पृथ्वी में गीत फैलता; जीसस के आने से तो पृथ्वी धन्यभागी होती; लेकिन हो नहीं पाई, क्योंकि जीसस आए नहीं कि पीछे क्रिश्चियन आ गया। जीसस जो बनाते हैं, क्रिश्चियन मिटा देता है। जीसस कहते हैं, प्रेम करो पड़ोसी को अपने जैसा, क्रिश्चियन पड़ोसी के लिए तलवार पर धार रखता है। मोहम्मद कहते हैं कि एक ही परमात्मा है और सभी बेटे उसके हैं; लेकिन मुसलमान उसी के बेटों को काटने निकल पड़ता है। हिंदू कहते हैं, सभी कुछ परमात्मा है, फिर भी शूद्र को छूते वक्त--‘सभी कुछ परमात्मा है’--यह वेदांत का खयाल एकदम तिरोहित हो जाता है। बड़े से बड़े ज्ञानी को हो जाता है! मुसलमान के साथ बैठते वक्त सरक कर बैठ जाता है बड़े से बड़ा ज्ञानी, जो कि कहता था कि ब्रह्म सबमें विराजमान है। अचानक पता चलता है कि ब्रह्म मुसलमान में विराजमान होने से डरता है।
जीसस, कृष्ण, क्राइस्ट, महावीर, बुद्ध, कनफ्यूशियस, इन सबके होने से जगत सौभाग्यशाली था। लेकिन इनके पीछे एक बाढ़ आती है उपद्रवियों की, जो संगठन खड़े करते हैं, जो संगठनों को लड़ाते हैं। अनुयायियों के दल खड़े होते हैं और धर्म राजनीति बन जाता है। जैसे ही धर्म अनुयायियों के हाथ में पड़ता है, संगठित होता है, आर्गनाइज्ड हो जाता है, वैसे ही राजनीति बन जाता है। धर्म संगठन नहीं है। धर्म साधना है। अनुयायी संगठन बनाते हैं। फिर साधना एक तरफ, संगठन महत्वपूर्ण हो जाता है। और संगठन के जो बाहर हैं, वे दुश्मन हो जाते हैं। संगठन के भीतर हैं, वे अपने; संगठन के जो बाहर हैं, वे पराए।
और इसलिए हर धर्म आदमी को खंडों में काटता चला जाता है। आज पृथ्वी पर कोई तीन सौ धर्म हैं। आदमी तीन सौ खंडों में कटा हुआ है। धर्म तो जोड़ना चाहिए, धर्म तोड़ने के लिए नहीं है। लेकिन कौन तोड़ता है? महावीर तोड़ते हैं? मोहम्मद तोड़ते हैं? दो में से एक ही बात हो सकती है--या तो महावीर ही तोड़ने वाले हैं, और या फिर जैन तोड़ने वाला है। या तो मोहम्मद ही तोड़ते हैं, या फिर मुसलमान तोड़ता है। या तो जीसस ही उपद्रव हैं, और या फिर क्रिश्चियन उपद्रव है।
मेरी समझ है कि महावीर और जीसस और मोहम्मद उपद्रव नहीं हैं। क्योंकि जिनके अपने जीवन में उपद्रव की शांति हो गई, वे किसी दूसरे के जीवन में उपद्रव नहीं बन सकते हैं; वे दूसरे के जीवन में भी शांति का ही संदेश हैं। लेकिन उनके पीछे आने वाला अनुयायी जब खड़ा हो जाता है...।
और अनुयायी के साथ एक रहस्य है। एक साइंटिफिक सूत्र अनुयायी का समझ लेना चाहिए। और यह बड़ा मजेदार मामला है, अक्सर विपरीत आदमी अनुयायी बनते हैं--अक्सर। अगर महावीर ने सब छोड़ दिया है, तो महावीर के पास वे ही लोग चरणों में आएंगे जिनके पास सब है। क्यों? अगर महावीर उपवासे रहते हैं, तो महावीर के पास भोजनभट्ट इकट्ठे हो जाएंगे! उसका कारण है। अगर महावीर को भोजन की कोई चिंता नहीं है, तो जो आदमी भोजन को चौबीस घंटे सोचता है, वह सबसे पहले प्रभावित होता है। सोचता है कि यह महावीर बड़ा अदभुत आदमी मालूम होता है! मैं तो चौबीस घंटे... रात सपने में भी भोजन करता हूं। और यह आदमी महीनों भोजन नहीं करता! यह महातपस्वी है! वह इसके पैर में पड़ जाता है। महावीर नग्न खड़े हैं, तो जिसको वस्त्रों से बहुत मोह है, और जो शरीर को जरा भी नग्न करने में असमर्थ है, वह महावीर को मानता है कि यह आदमी साधारण नहीं है।
इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जैन धर्म के अनुयायी कपड़ों की दुकानें कर रहे हैं सारे मुल्क में। इसमें महावीर की नग्नता का कुछ न कुछ हाथ है। इसमें जरूर कहीं न कहीं कोई बात है।
इसमें आश्चर्य नहीं है कि ईसाइयों ने सारी दुनिया को तहस-नहस किया, और ईसाइयों ने सारी दुनिया पर साम्राज्य फैलाया। कहां जीसस! जिसने कहा था कि जो तुम्हारे गाल पर एक चांटा मारे, तुम दूसरा गाल उसके सामने कर देना; और जिसने कहा था कि जो तुम्हारा कोट छीन ले, उसे तुम कमीज भी दे देना; और जिसने कहा था, जो तुमसे एक मील तक बोझा ढोने को कहे, तुम दो मील तक चले जाना। इस आदमी को मानने वाले लोग सारी दुनिया पर गुलामी ढा देंगे--ये कोट भी छीन लेंगे, कमीज भी छीन लेंगे; ये दो मील की जगह दो हजार मील लोगों को चला देंगे; ये एक गाल पर भी चांटा मारेंगे और दूसरा गाल भी मोड़ कर उस पर भी चांटा मार देंगे--यह कभी जीसस ने सोचा न होगा। कि जीसस जैसे विनम्र आदमी के पास इस तरह के लोग इकट्ठे हो जाएंगे? लेकिन इकट्ठे हो गए!
असल में, विरोधी आकर्षित करता है। जैसे स्त्री के प्रति पुरुष आकर्षित होता है, पुरुष के प्रति स्त्री आकर्षित होती है। इसी भांति जीवन में सब आकर्षण पोलर हैं, सब आकर्षण विरोधी के, अपोजिट के हैं; सब आकर्षण में दूसरा आकर्षित होता है। त्यागी के पास भोगी इकट्ठे हो जाते हैं। तपस्वियों के पास जो तपश्चर्या बिलकुल नहीं कर सकते, वेचरणों पर सिर रख कर बैठ जाते हैं। परमात्मा के खोजियों के पास संसार को पागल की तरह पकड़े हुए लोगों की भीड़ जमा हो जाती है। और फिर ये ही अनुयायी बनते हैं। इसलिए तत्काल परवर्शन शुरू हो जाता है। तत्काल, जो महावीर ने कहा, जैन उसे विकृत कर डालते हैं। जो जीसस ने कहा, ईसाई उसे नष्ट कर देता है। जो मोहम्मद ने कहा, मुसलमान ही उसे मिटाने वाला बन जाता है। यह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है; लेकिन है। विपरीत आकर्षक है।
इसलिए मैं कहता हूं कि समस्त अनुयायियों को पृथ्वी से विदा हो जाने की जरूरत है। मोहम्मद रहें, बुद्ध रहें, उनकी सुगंध रहे, बीच में अनुयायी न हो। महावीर की चर्चा हो, लेकिन अनुयायी न हो। महावीर की बात लोग सुनें, समझें, पढ़ें, लेकिन कोई इस पागलपन में न पड़े कि कहे कि मैं उनका अनुयायी हूं। समझें, पढ़ें, सोचें, आनंदित हों, प्रसन्न हों, नाचें, लेकिन पकड़ें मत। काफी हो चुका पकड़ना, और उस पकड़ने के बुनियादी सूत्र का खयाल न होने से बड़ी कठिनाई हो गई है।
वह बुनियादी सूत्र है: वह अपोजिट, विरोधी आकर्षक होता है, और हम उसके पास इकट्ठे हो जाते हैं। वह जो इकट्ठा होना है, वह हाथ में तत्काल दुश्मन के चीज चली जाती है। यह जिंदगी में करीब-करीब ऐसा ही नियम है, जैसे पानी में लकड़ी को डालते ही तिरछी हो जाती है--होती नहीं, दिखाई पड़ने लगती है, तत्काल। पानी और हवा के नियम अलग-अलग हैं। जैसे ही लकड़ी हवा में आती है वापस सीधी हो जाती है। पानी में डालो, फिर तिरछी दिखाई पड़ने लगती है। महावीर में जो लकड़ी बिलकुल सीधी है, जैन में बिलकुल तिरछी दिखाई पड़ने लगती है। बुद्ध में जो जीवन सीधा-सरल है, बौद्ध में बिलकुल जटिल और तिरछा हो जाता है। मोहम्मद की जिंदगी में जो प्रेम है, वह मुसलमान की जिंदगी में घृणा बन जाता है। जीसस की जिंदगी में जो समर्पण है, वही जीसस के अनुयायी की जिंदगी में आक्रमण बन जाता है। अब अनुयायियों से सावधान होने के लिए काफी इतिहास प्रामाणिक है।
इसका यह मतलब नहीं कि मैं कोई महावीर का दुश्मन हूं। दुश्मन तो उनके अनुयायी हैं। इसका यह मतलब नहीं कि मैं कोई जीसस का दुश्मन हूं। दुश्मन तो उनके अनुयायी हैं। अगर जीसस को उनकी शुद्धता में बचाना हो, तो अनुयायी के कांच अलग कर देने चाहिए। और किसी आदमी को अनुयायी बनने से कुछ नहीं मिलता। सिर्फ जिसका वह अनुयायी बनता है, उसको भ्रष्ट... उसके सिद्धांतों को, उसके जीवन को विकृत करने के अतिरिक्त वह और कुछ भी नहीं कर पाता है। अपने जीवन को तो ठीक नहीं कर पाता।
मैं अभी एक छोटी सी कहानी पढ़ रहा था।
एक बच्चा अपने पिता से बात कर रहा है। उस बच्चे ने अपनी किताब में से एक कहावत पढ़ कर सुनाई है। जिसमें उसने कहावत में पढ़ा कि इस कहावत में लिखा हुआ है कि आदमी उसके संग से पहचाना जाता है। ए मैन इ़ज नोन बाइ हिज कंपनी, आदमी अपने संग से पहचाना जाता है। तो उस लड़के ने अपने पिता से पूछा कि क्या यह बात सही है? उसके पिता ने कहा: बिलकुल ही सही है। तो उस लड़के ने कहा: अब एक सवाल और पूछना है। एक अच्छा आदमी और एक बुरा आदमी उन दोनों में दोस्ती है। कौन किससे पहचाना जाएगा? बुरा आदमी अच्छे आदमी के साथ है, इसलिए समझना चाहिए कि अच्छा आदमी है? और अच्छा आदमी बुरे आदमी के साथ है, इसलिए समझना चाहिए कि बुरा आदमी है? अब कौन को किससे पहचानें? वह पिता मुश्किल में पड़ गया है!
जीसस पहचाने जा रहे हैं ईसाई के द्वारा, इसलिए जीसस को पहचानना मुश्किल हो गया है। महावीर पहचाने जा रहे हैं जैन के द्वारा, इसलिए महावीर को पहचानना मुश्किल हो गया है। अनुयायी हट जाएं, तो इनके फूल अपनी पूरी खूबसूरती में खिल सकें; इनके दीये अपनी पूरी ज्योति में जल सकें; और एक और मजा हो जाए कि हम सारे जगत की संपत्ति के मालिक हो जाएं।
अभी जो महावीर को मानता है, वह समझता है कि मोहम्मद उसकी संपत्ति नहीं हैं। और जो मोहम्मद को मानता है, वह समझता है, बुद्ध से मुझे क्या लेना-देना, उनसे अपना कोई लेना-देना नहीं है। वह और किसी की बपौती हैं, हमारी नहीं। अगर दुनिया में किसी दिन अनुयायी न रहे, तो सारी दुनिया का हेरिटेज, सारी दुनिया की बपौती, प्रत्येक आदमी की बपौती होगी। उसमें सुकरात भी मेरा होगा, मोहम्मद भी मेरे होंगे, महावीर भी मेरे होंगे। और तब हम ज्यादा संपन्न होंगे। और तब संस्कृति पैदा होगी।
अभी तो संस्कृति पैदा नहीं हो सकी। अभी तो बहुत तरह की विकृतियां हैं और उन विकृतियों को हम अपनी-अपनी संस्कृति कहे चले जाते हैं। मनुष्य की संस्कृति उस दिन पैदा होगी, जिस दिन सारे जगत का सब-कुछ हमारा होगा। सोचें इसे एक और उदाहरण से, तो खयाल में आ जाए।
अगर विज्ञान में भी पच्चीस मत बन जाएं, तो दुनिया में विज्ञान बनेगा कि मिटेगा? अगर न्यूटन को मानने वाले एक गिरोह बना लें; और आइंस्टीन को मानने वाले दूसरा गिरोह बना लें; और न्यूटन के मानने वाले कहें कि यह आइंस्टीन को हम नहीं मान सकते, इसने हमारे गुरु की कुछ बातों के विपरीत बोल दिया है। और मैक्स प्लैंक को मानने वाले तीसरा गिरोह बना लें। और फ्रेड हॉयल को मानने वाले चौथा गिरोह बना लें। और गिरोह बनते चले जाएं। तो अभी दो-तीन सौ वर्ष में पचास जो बड़े वैज्ञानिक हुए, पचास गिरोह हो जाएं, विज्ञान विकसित होगा कि मरेगा?
विज्ञान विकसित हो सका, क्योंकि विज्ञान के कोई गिरोह नहीं हैं। वैज्ञानिकों ने जो भी दिया है, वह सब वैज्ञानिकों की सामूहिक बपौती है। धर्म संस्कृति पैदा नहीं कर पाया, क्योंकि धर्म के गिरोह बन गए हैं। दुनिया में तीन सौ गिरोह हैं, इसलिए धर्म कैसे पैदा हो? अगर ये गिरोह बिखर जाएं...!
महावीर ने भी दिया है, एक कोने से उन्होंने एक दर्शन दिया है सत्य का; बुद्ध ने किसी दूसरे कोने से वह दर्शन दिया है; मोहम्मद ने किसी तीसरे कोने से वह दर्शन दिया है; क्राइस्ट उसी की कोई चौथी खबर ले आए हैं। यह सारी की सारी संपत्ति हमारी है, मनुष्य की है; और अगर यह सारी संपत्ति इकट्ठी हो, और हम सब इसके वसीयतदार हों, तो दुनिया में संस्कृति पैदा होगी। अभी तो संस्कृति नहीं है, सिर्फ खंड-खंड विकृतियां हैं। और अगर यह सारी संपत्ति हमारी हो, तो दुनिया में धार्मिक चित्त पैदा होगा। अभी धार्मिक चित्त नहीं, केवल सांप्रदायिक चित्त है, सेक्टेरियन माइंड है; अभी रिलीजियस माइंड दुनिया में नहीं है।
हां, कभी-कभी कोई एक आदमी धार्मिक पैदा होता है, तो उसके आस-पास तत्काल सांप्रदायिक इकट्ठे हो जाते हैं। और वह आदमी जिंदगी भर में मेहनत करके जो खोज पाता है, उसके आस-पास इकट्ठे लोग थोड़े ही दिन की मेहनत में उस सबको नष्ट करके विकृत कर देते हैं।
महावीर किसी के भी नहीं हैं, और बुद्ध किसी के भी नहीं हैं; या सबके हैं। कोई उनका मालिक नहीं है, कोई दावेदार नहीं है; या फिर सब उनके दावेदार हैं। यह स्थिति बने, तो धर्म भी एक विज्ञान बन जाए। धर्म है भी विज्ञान। मेरी दृष्टि में तो परम विज्ञान है, सुप्रीम साइंस है। लेकिन अब तक बन नहीं पाया है। और धर्म अगर विज्ञान बने, तो जीवन संस्कृत होगा, तो जीवन रिफाइंड होगा, तो जीवन विकसित होगा। अभी तो धर्म विकृति बना पाया। क्योंकि संप्रदाय ही निर्मित होते हैं और कुछ भी निर्मित नहीं होता है।
कौन है जिम्मेवार? अनुयायी जिम्मेवार है। और अनुयायी भी कहीं पहुंच गया होता यह सब उपद्रव करके, तो भी हम कहते। अनुयायी कहीं भी नहीं पहुंच पाता है। अनुयायी कहीं भी नहीं पहुंच पाता है! कभी पहुंचा नहीं, कभी पहुंच भी नहीं सकेगा, क्योंकि वह मौलिक सूत्र ही भूल गया है।
खोजना है स्वयं को, तो चलना होगा भीतर। दूसरे के पीछे जो गया, वह स्वयं को खो सकता है, पा नहीं सकता है।
बालक पैदा हुआ। इस जन्म का नहीं, जन्म-जन्मांतरों का संस्कार लेकर साथ में आया है। मां से उसे प्रेम मिला, वात्सल्य मिला; पिता से उसे ज्ञान मिला, रास्ता मिला, मार्ग मिला; शिक्षक से उसे वाणी समझने को मिली, विचार करने के लिए प्रेरणा मिली; और संसार में जहां-जहां वह घूमा, उसने कई अनुभव प्राप्त किए। वह प्राप्त अनुभव भी क्या चोरी की श्रेणी में आ जाएंगे? और यदि ऐसा हुआ, तो यह व्यक्तित्व कट कर अलग हो जाएगा। वह संस्कार बना कर अपना निजी व्यक्तित्व फिर कैसे पैदा कर पाएगा, जब तक कि दूसरे व्यक्तित्वों से कुछ न कुछ अनुभव ग्रहण न करे? ये दो प्रश्न आपके सामने मैं रख रहा हूं।
मुखौटे का, मास्क का, शायद अर्थ ठीक से समझ में नहीं आ सका। आपके मुंह का नाम मुखौटा नहीं है। जब आप अपने मुंह पर नाटक में एक दूसरा मुंह लगा लेते हैं--समझें, रावण का मुंह लगा लेते हैं--तब वह लगाया हुआ मुंह मुखौटा है। आपका चेहरा मुखौटा नहीं है, लेकिन अपने चेहरे पर जब आप कोई दूसरा नकली चेहरा लगा लेते हैं, जिसकी कोई जड़ें आपके भीतर नहीं होतीं, जिससे आपके प्राणों का कोई भी संबंध नहीं होता, सिर्फ धागे से कान में लटका होता है जो, जिसका हृदय की धड़कन से कोई भी सेतु नहीं होता, तब वह मुखौटा है। मुंह का नाम मुखौटा नहीं है। मुखौटा झूठे मुंह का नाम है, फाल्स फेस का नाम है।
तो पहले तो मुखौटे का ठीक अर्थ समझ लें।
चेहरा मुखौटा नहीं है। लेकिन जरूरी नहीं है कि आप कागज के या प्लास्टिक के बने हुए मुखौटे लगाएं, तब झूठा चेहरा पैदा हो। आप इसी चेहरे पर बहुत से झूठे चेहरे पैदा करने में सफल हो जाते हैं। जैसे कहा, कि किसी आदमी से मेरी घृणा है, और वह मेरे पास आता है, और मैं मुस्कुरा कर उसका स्वागत करता हूं, और भीतर घृणा उबलती है। तब यह मुखौटा है। और यह मुखौटा बड़ा खतरनाक है। यह मुखौटा उपयोगी मालूम होता है। इसकी यूटिलिटी दिखाई पड़ती है। इस भांति मैं उस आदमी को अपनी घृणा बताने से अपने को रोक लेता हूं। लेकिन घृणा इससे मिटती नहीं। और खतरा यही है कि मैं उस आदमी को तो धोखा दूंगा ही, धीरे-धीरे मैं अपने को भी धोखा दे लूंगा। और बार-बार झूठी मुस्कुराहट मेरी घृणा को भीतर दबाती जाएगी। और एक दिन मैं भी भूल जाऊंगा कि मैं उसे घृणा करता हूं। हंसता रहूंगा और भीतर मेरे घृणा छिपी रहेगी।
नहीं, धार्मिक व्यक्ति अगर घृणा अनुभव करता है, तो उसके पास दो ही उपाय हैं: या तो वह घृणा अनुभव न करे तो मुस्कुराए; और अगर घृणा ही अनुभव करनी है, तो कृपा करके मुस्कुराए न, घृणा ही अपने चेहरे से प्रकट कर दे। इसके दो फायदे हैं। यदि वह घृणा अपने चेहरे से प्रकट कर दे, तो घृणा प्रकट करने से जो नुकसान उठाने हैं, वे उठाने पड़ेंगे। वे उठाने की हिम्मत होनी चाहिए। और अगर वह घृणा प्रकट कर दे तो जो नुकसान उठाने पड़ेंगे, और घृणा की जो पीड़ा अनुभव करनी पड़ेगी, वही पीड़ा, वही हानि उसे घृणा को बदलने का कारण बनेगी। अन्यथा वह बदलेगा क्यों? जिंदगी में जो नुकसान होंगे घृणा के, जिंदगी में जो बाधा पड़ेगी घृणा से, वही तो कारण बनेगी उसे इस बात के लिए सोचने के लिए मजबूर करने वाली कि वह अपनी घृणा को बदले। क्योंकि घृणा जीवन को नरक में डाले दे रही है।
लेकिन हम मुस्कुराहट बता कर बाहर स्वर्ग बनाने की कोशिश करते हैं, और भीतर नरक निर्मित होता चला जाता है। फिर उस नरक को हम मिटाएंगे कैसे? जिस नरक की पीड़ा को हम पूरा अनुभव नहीं करते और भीतर छिपा लेते हैं, फिर वह पीड़ा मिटने के बाहर हो जाता है।
और एक और मजे की बात है कि जब भीतर घृणा होती है, तो आपके ओंठों की मुस्कुराहट से आप ही सोचते होंगे कि आपने मुस्कुरा कर दूसरे का स्वागत किया। जब भीतर घृणा होती है, तो ओंठों पर आई हुई मुस्कुराहट बिलकुल जहरीली हो जाती है, और दूसरा उसे अच्छी तरह देख पाता है कि वह मुखौटा है। हंस सकते हैं आप, लेकिन भीतर की घृणा को प्रकट होने से रोकना बहुत मुश्किल है। वह प्रकट हो जाती है। ओंठ से, आंख से, उठने से, बैठने से, वह सब तरह से प्रकट हो जाती है।
इसलिए जो झूठी मुस्कुराहट थी वह सिर्फ दबाने का काम करती है, उससे कुछ कम्युनिकेशन, उससे कोई संदेश नहीं पहुंच पाता। उससे दूसरा प्रसन्न नहीं लौटता है। और कई बार तो वह दूसरा आदमी प्रसन्न ही होगा इस बात से कि आप एक ऑथेंटिक और प्रामाणिक आदमी हैं। अगर आपको क्रोध है किसी पर, तो स्पष्ट कह दें कि मुझे क्रोध है, और मैं क्रोधी आदमी हूं। और क्रोध कर लें, और क्रोध की पीड़ा को भोग लें, और क्रोध के परिणाम झेल लें, तो आज नहीं कल, यह क्रोध की अग्नि ही आपको क्रोध के बाहर ले जाने का कारण बनेगी। अन्यथा भीतर क्रोध होगा, बाहर हंसी होगी; और धीरे-धीरे वह क्रोध भीतर इकट्ठा होकर जलाता रहेगा; और बाहर झूठी हंसी, सूखी हंसी, व्यर्थ हंसी फैलती रहेगी निष्परिणाम, बिना किसी परिणाम के। कोई उस हंसी से प्रसन्न नहीं होगा। कोई उस हंसी से आनंदित नहीं होगा। क्योंकि लोग हंसी से आनंदित नहीं होते। हंसी के पीछे पूरा व्यक्तित्व हंसना चाहिए, तभी वह हंसी किसी दूसरे के हृदय को छू पाती है। हंसी के साथ पूरे प्राण हंसने चाहिए, तभी उस हंसी में जीवन होता है। हंसी के साथ सब रोआं-रोआं हंसना चाहिए, तभी उस हंसी में अमृत का वरदान होता है, अन्यथा नहीं होता है।
यह जो हम मुखौटे लगाते हैं, धार्मिक व्यक्ति इन्हीं मुखौटों को उतारने की बात करता है। और इसलिए अचौर्य का अर्थ: ऐसे मुखौटे छोड़ना है। कठिनाई होगी। तो धर्म तपश्चर्या है। धर्म की तपश्चर्या का मतलब धूप में खड़े होना नहीं है। धर्म की तपश्चर्या का मतलब: जीवन की सब तरह की धूप में खड़े होने की हिम्मत है। जब क्रोध है, तो कहें कि क्रोध है। और जब घृणा है, तो कहें कि घृणा है। कम से कम ईमानदार तो बनें। कम से कम सिंसियर तो हों। कह दें कि ऐसा है। उस पीड़ा को अनुभव करें, जीएं उसे। उस जीने में से गुजरने से ही हाथ जलेंगे। जले हुए हाथ ही कल रोकने का कारण बनते हैं। और जिस आदमी पर आपने क्रोध प्रकट किया और कहा कि क्रोध है, जिस आदमी पर आपने घृणा की और कहा कि घृणा है, कल अगर आप उस आदमी के साथ हंसेंगे और प्रेम करेंगे, तो वह समझेगा कि प्रेम भी है। अन्यथा जिसकी घृणा झूठी है, और जो झूठा हंसता है, और जो झूठा रोता है, उसकी जिंदगी में बाकी सब चीजें भी संदिग्ध हो जाती हैं।
इसलिए अगर कभी किसी बाप ने अपने बेटे पर सच-सच क्रोध नहीं किया, तो ध्यान रखना, बाप की क्षमा भी बेटा कभी ईमानदारी से स्वीकार नहीं कर पाएगा। वह जानता है, बाप बेईमान है; क्षमा भी पता नहीं...। अगर किसी पत्नी ने अपने पति पर कभी क्रोध नहीं किया, क्रोध को दबाया और छिपाया और मुस्कुराई, तो ध्यान रखना, जब वह सच में भी कभी मुस्कुराएगी, तब भी भरोसा बहुत मुश्किल है; क्योंकि वह ऑथेंटिक व्यक्तित्व नहीं है उसके पास। प्रामाणिक व्यक्तित्व नहीं है उसके पास। उसके प्रेम के सच्चे होने की भी संभावना रोज-रोज कम होती जाएगी।
जिसकी घृणा झूठी है, उसका प्रेम सच्चा नहीं हो सकता। जिसका क्रोध झूठा है, उसकी क्षमा सच्ची नहीं हो सकती। जिसकी मुस्कुराहट झूठी है, उसके आंसुओं का क्या भरोसा है? जिंदगी तब सारी की सारी एक झूठ की कहानी हो जाती है।
धर्म इसके खिलाफ बगावत है। धर्म विद्रोह है। धर्म एक रिबेलियन है। धर्म इनसिंसियरिटी के खिलाफ, बेईमानी के खिलाफ एक ईमानदार होने की घोषणा है। वह कहता है, आंसू होंगे, तो रोएंगे; मुस्कुराहट होगी, तो हंसेंगे। और जो आदमी इतना ईमानदार होता है, वह बहुत ज्यादा देर तक घृणा से भरा हुआ नहीं रह सकता। उसके कारण हैं। जो आदमी इतना ईमानदार है, वह बहुत दिन तक क्रोध से भरा हुआ नहीं रह सकता। उसके कारण हैं। क्योंकि ईमानदारी इतनी बड़ी घटना है, सिंसियरिटी इतनी बड़ी घटना है कि ऐसे आदमी की जिंदगी में, बेईमानी जहां समाप्त हो गई हो, जहां बेईमानी इनकार कर दी गई हो, वहां क्रोध और घृणा के कांटे लगने मुश्किल हो जाते हैं। क्योंकि बेईमानी बीज है, जिसमें सब-कुछ लगता है। अगर वह बीज ही टूट गया, तो बाकी चीजें अपने आप गिरनी शुरू हो जाती हैं।
सिंसियरिटी कि आदमी अपने साथ ईमानदार है, बहुत ज्यादा देर तक क्रोध को बर्दाश्त नहीं कर सकती। क्योंकि जो आदमी अपने साथ ईमानदार है, उसे आज नहीं कल यह दिखाई पड़ना शुरू हो जाएगा कि क्रोध अपने ही हाथ से अपने को ही दुख देना है।
बुद्ध ने कहीं मजाक में कहा है कि जब मैं किसी आदमी को क्रोध करते देखता हूं, तो मुझे बड़ी हंसी आती है। क्योंकि वह आदमी दूसरे की भूल के लिए अपने को दंड दे रहा है। वह कहता है, इस आदमी ने गाली दी, इसलिए मैं क्रोध कर रहा हूं। गाली उसने दी है, कसूर उसका है, दंड वह अपने को दे रहा है!
क्योंकि क्रोध भीतर जलाता है। कोई आग इतना नहीं जलाती, और कोई आग चमड़ी के भीतर, हड्डियों के भीतर प्रवेश नहीं करती। लेकिन क्रोध की आग आत्मा तक जला डालती है। भीतर सब जला डालती है। भीतर राख कर देती है।
जब एक आदमी आग में हाथ डालने से हाथ खींच लेता है तो एक आदमी क्रोध की आग में कैसे हाथ डाल पाता है? डाल पाता है इसीलिए, कि उसने कभी पूरी तरह देखा ही नहीं कि वह क्रोध में हाथ डाल रहा है। क्रोध में हाथ डालता है, दिखाता है कि हम फूलों को छू रहे हैं। भीतर घृणा में जलता है, ओंठों पर मुस्कुराहट रखता है। यह मुस्कुराहट भी देखता रहता है, अटका रहता है मुस्कुराहट में, हाथ जल जाते हैं भीतर आग में।
अगर कोई आदमी झूठी मुस्कुराहट न हंसे और अपने प्राणों के सारे रुदन को, पीड़ा को, कष्ट को देखे, तो आज नहीं कल, यह जलती हुई आग उसे दिखाई पड़ जाती है। इस दुनिया में इतना नासमझ कोई भी नहीं है कि जो देख ले क्रोध को, देख ले घृणा को, वह घृणा में रह सके, असंभव है। वह उसके बाहर आ जाता है।
इसलिए जब मैंने कहा कि हम मुखौटे लगा कर चोरी करते हैं, तो मेरा मतलब यह नहीं है, मेरा मतलब यह नहीं है कि आप मुस्कुराते हैं तो मुखौटा है। मुस्कुराते हैं तो मुखौटा तब होगा, जब भीतर कोई मुस्कुराहट नहीं है, मुस्कुराहट सिर्फ ऊपर है। रोते हैं तो मुखौटा होगा, जब आंसू भीतर बिलकुल नहीं हैं और सिर्फ आंखों में आंसू हैं। जब स्वागत करते हैं तब मुखौटा होगा, जब कि प्राण बिलकुल कह रहे हैं कि यह आदमी कहां से आ गया, और कह रहे हैं कि अतिथि देवता हैं, आप आइए, विराजिए! तब अतिथि तो अपमानित होता ही है, देवता भी अपमानित होते हैं।
नहीं, कह दें, जैसा है वैसा ही कह दें। कठिन होगा। वह कठिनाई पैदा होनी ही चाहिए। क्योंकि कठिनाई होगी तो ही मुक्ति होती है। कठिन होगा। घर आए मेहमान से अगर कहें कि बड़े संकट में डाल दिया है, देवता बिलकुल नहीं मालूम पड़ रहे हैं आप। कठिनाई होगी। झूठा चेहरा बचाना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन इस कठिनाई को सहने से आज नहीं कल अतिथि देवता मालूम पड़ सकता है। क्योंकि इतना जो सरल हो जाएगा उसे ही अतिथि देवता मालूम पड़ सकता है। जो इतना कनिंग है कि भीतर कह रहा है कि यह दुष्ट कहां से आ गया, जो इतना चालाक है, भीतर कह रहा है, यह दुष्ट कहां से आ गया और ऊपर से कह रहा है कि आप देवता हैं, विराजिए, घर में आनंद छा गया है! यह इस आदमी को अतिथि देवता कभी भी मालूम नहीं पड़ सकते हैं। यह आदमी अपने साथ इतनी, इतनी चालाकी कर रहा है कि यह चालाकी इसे कुटिल कर देगी, जटिल कर देगी, तिरछा कर देगी। इसका सारा व्यक्तित्व तिरछा होता चला जाएगा।
पूरी जिंदगी हम इस तरह की कुटिलताएं इकट्ठी करते हैं और तब सब झूठा हो जाता है। धार्मिक आदमी इस बात की घोषणा है कि वह जटिलता छोड़ेगा, वह सरल होगा; जैसा है, वैसा ही होगा; जैसा है, वैसा ही दिखलाएगा। तब मुखौटे गिरते हैं। और तब आदमी का असली चेहरा प्रकट होना शुरू होता है।
सबके पास असली चेहरे हैं, लेकिन हमने इतने-इतने मुखौटे उन पर ओढ़े हैं कि हमें खुद भी पता नहीं रह गया कि मेरा असली चेहरा कौन सा है। आईने के सामने भी जब आप खड़े होते हैं, तो सौ में निन्यानबे मौके यह हैं कि आईने में जिसको देख कर आप हंस रहे हैं, वह मुखौटा होगा। आईने में भी हम वही नहीं होते, जो हम हैं; वह दिखलाई पड़ना चाहते हैं अपने को भी, जो हम सोचते हैं कि हम हैं। तो आईने के सामने भी आदमी बन-ठन कर खड़ा हो जाता है!
मैंने सुना है एक औरत के संबंध में कि वह बदशक्ल थी। तो कोई उसके सामने आईना कर दे, तो वह आईना तोड़ देती थी। वह कहती थी, कहां का रद्दी आईना सामने ले आए, शक्ल को बिलकुल खराब किए दे रहा है। आईने तोड़ देती थी, क्योंकि आईने में दिखाई पड़ती थी कि शक्ल बदसूरत है, तो कहती थी, आईना खराब है!
हम भी सब आईने तोड़ना पसंद करेंगे, शक्ल बदलना पसंद नहीं करेंगे। लेकिन आईने तोड़ने से शक्लें नहीं बदलती हैं, और आईने तोड़ने से जिंदगी नहीं बदलती है।
जिसे मैं मुखौटा कह रहा हूं, उससे मेरा प्रयोजन है कि झूठे चेहरे जो हम आरोपित कर लेते हैं अपने पर, न करें। इसका यह भी मतलब नहीं है कि जिंदगी में चेहरे बदलेंगे नहीं। जिंदगी में चेहरा रोज बदलेगा, लेकिन वह आपका ही चेहरा होना चाहिए। जब जिंदगी में अंधेरा छाएगा, तो आंखों में आंसू भी आएंगे; कल एक मित्र मर जाएगा, तो आंसू भी आएंगे। और कल दूर का बिछुड़ा हुआ साथी मिलेगा, तो हृदय में धड़कनें भी उठेंगी खुशी की, और गीत भी निकलेंगे। चेहरा आपका बदलेगा प्रतिपल। बदलना चाहिए। रिस्पांसिव होना चाहिए। लेकिन वह चेहरा आपका होना चाहिए।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि एक ही चेहरा बना कर बैठे रहें। फिर तो पत्थर का चेहरा चाहिए। फिर जिंदगी नहीं चल सकती। फिर तो आपके पास एक चेहरा चाहिए, जो पत्थर का हो...।
मैंने सुना है कि अमरीका के एक बहुत बड़े करोड़पति के पास एक आदमी दान लेने गया था। दान छोटा सा ही मांगा था। लेकिन उस करोड़पति ने कहा कि मैंने एक नियम बना रखा है: मेरी एक आंख नकली है--पत्थर की है, और एक असली है। जो आदमी बता दे कि मेरी कौन सी आंख नकली है, उसी को मैं दान देता हूं। और अब तक कोई बता नहीं पाया है। तुम बताओ।
उस आदमी ने देखा और उसने कहा: आपकी बाईं आंख नकली है।
उस करोड़पति ने कहा: हैरान कर दिया तुमने! कैसे पता चला?
तो उसने कहा: बाईं आंख में थोड़ी दया मालूम पड़ती है। इससे मैंने सोचा, पत्थर की होना चाहिए।
फिर चेहरे सख्त और कठोर नहीं हो सकते। मरे हुए आदमी के हो सकते हैं, जिंदा आदमी के नहीं हो सकते। बच्चे के चेहरे को देखें, जैसे हवा के झोंके बदल रहे हों, ऐसा बदल रहा है। बूढ़े के चेहरे को देखें, पथरीला हो गया है। बूढ़े चेहरे का मतलब ही यह होता है कि अब सब नसें, सब-कुछ तय हो गया, फिक्स्ड हो गया। अब तरलता नहीं है, लिक्विडिटी नहीं है।
नहीं, जब मैं यह कह रहा हूं कि चेहरे मत बदलें, तो मेरा मतलब यह नहीं है कि चेहरे को पत्थर का कर लें। मैं यह कह रहा हूं, नकली चेहरे मत बदलें। आपका असली चेहरा हो, वह तो बदलेगा, प्रतिपल बदलेगा। जब आकाश में चांद निकलेगा, तब वह और होगा; और जब अंधेरी रात होगी, तब और होगा; और जब सुबह फूल खिलेंगे, तब और होगा; और जब सांझ फूल झरेंगे, तब और होगा; और जब रास्ते पर एक भिखारी दिखाई पड़ेगा, तब और होगा। होगा ही। होना ही चाहिए।
जिंदगी सेंसिटिविटी है, जिंदगी संवेदनशीलता है, और चेहरा तरल होना चाहिए; लेकिन होना आपका चाहिए। तरलता आपकी होनी चाहिए। वह बदलाहट तो प्रतिपल होती रहेगी, क्योंकि प्रतिपल जिंदगी में सब बदल रहा है। यहां कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है। यहां सब बदल रहा है। इस बदलते में आप भी बदलेंगे। हवा के झोंके आएंगे तो पत्ता पूरब की तरफ उड़ेगा, हवा के झोंके आएंगे तो पश्चिम की तरफ बढ़ेगा, हवा रुक जाएगी तो पत्ता ठहर जाएगा। जिंदगी ठीक वृक्ष पर लटके हुए पत्ते की तरह है। सब प्रतिपल कंप रहा है। जिंदगी में परिवर्तन के अतिरिक्त और कोई स्थिरता नहीं है। जिंदगी में परिवर्तन ही एकमात्र चीज है, जो परिवर्तित नहीं होती है।
हेराक्लाइटस ने कहा है: ‘यू कैन नॉट स्टेप ट्वाइस इन दि सेम रिवर। एक ही नदी में दुबारा नहीं उतर सकते हो।’
एक ही क्षण में भी दुबारा नहीं उतरा जा सकता है। जिंदगी एक नदी है, इसमें सब बदलता रहेगा। लेकिन वह बदलने वाली चीज आपकी हो, वह चेहरा आपका हो, वह प्रामाणिक हो। आप हों, बदलते रहें। बदलना जिंदगी है। और इस बदलाहट में भी अगर उसका स्मरण रह सके, जो भीतर इस बदलाहट को भी देखता रहता है, तो समाधि उपलब्ध हो जाती है।
चेहरा आपका हो; बदलते हुए चेहरे की धारा में पीछे साक्षी, विटनेस भी हो, जो देखता रहे। वह देखे कि जब चांद निकलता है, तो आंखें हंसती हैं; और जब अंधेरी रात आती है, तो आंखें रोती हैं; और जब फूल मुस्कुराते हैं, तो मन नाचता है; और जब फूल झरते हैं, तो प्राण रोते हैं; और जब प्रियजन मिलते हैं, तो आनंद मालूम होता है; और जब प्रियजन बिछुड़ते हैं, तो दुख मालूम होता है--यह सब देखता रहे पीछे कोई आपके। वह पीछे देखने वाला भी है।
लेकिन चेहरा तो आपका हो, तो वह देखता भी रहे। नकली, प्लास्टिक के चेहरों को वह देखे भी क्या! वे नहीं बदलते। जब नकली चेहरा आप बदलते हैं, तो चेहरा बदलना पड़ता है--एक चेहरा हटा कर दूसरा लगाना पड़ता है। जब आपका चेहरा बदलता है, तो वही चेहरा जिंदगी के नये सरंजाम में, जिंदगी की नई धारा में, नया हो जाता है। चेहरा वही होता है, सिर्फ जिंदगी के नये रिस्पांस, जिंदगी के प्रति नई प्रतिध्वनि, उसे नया कर जाती है। लेकिन भीतर कोई जाग कर देखता रहे, तो धीरे-धीरे बदलता हुआ चेहरा संसार मालूम पड़ने लगता है, और न बदलता हुआ साक्षी ब्रह्म मालूम पड़ने लगता है। तब आप अपने भी पार उठ जाते हैं--बियांड योरसेल्फ--अपने भी पार चले जाते हैं। और जब कोई अपने भी पार चला जाता है, तभी परमात्मा में प्रवेश है।
एक सवाल और पूछ लें।
फिर जो संन्यासी आपको दिखाई पड़ रहे हैं... मैं गैरिक वस्त्र नहीं पहनता हूं। मैंने कोई गले में माला नहीं डाली हुई है। मेरी नकल का कोई कारण नहीं है।
फिर यह भी पूछते हैं आप कि ‘किसी को भी बिना उसकी पात्रता का खयाल किए मैं उसके संन्यास को स्वीकार कर लेता हूं?’
जब परमात्मा ही हम सबको हमारी बिना किसी पात्रता के स्वीकार किए है, तो मैं अस्वीकार करने वाला कौन हो सकता हूं? हम सबकी पात्रता क्या है जीवन में? और संन्यास के लिए एक ही पात्रता है कि आदमी अपनी अपात्रता को पूरी विनम्रता से स्वीकार करता है। इसके अतिरिक्त कोई पात्रता नहीं है। अगर कोई आदमी कहता है, मैं पात्र हूं, मुझे संन्यास दो, तो मैं हाथ जोड़ लूंगा; क्योंकि जो पात्र है उसको संन्यास की कोई जरूरत ही नहीं है। और जिसे यह खयाल है कि मैं पात्र हूं, वह संन्यासी न हो पाएगा। क्योंकि संन्यास विनम्रता का फूल है। वह ह्यूमिलिटी का फूल है। वह विनम्रता में फलता है।
जो आदमी पात्रता के सर्टिफिकेट लेकर परमात्मा के पास जाएगा, शायद उसके लिए दरवाजे नहीं खुलेंगे। लेकिन जो दरवाजे पर अपने आंसू लेकर खड़ा हो जाएगा और कहेगा, मैं अपात्र हूं, मेरी कोई भी तो पात्रता नहीं कि द्वार खुलवाने के लिए कहूं; लेकिन फिर भी प्यास है, आकांक्षा है; फिर भी लगन है, फिर भी भूख है; फिर भी दर्शन की अभीप्सा है; दरवाजे उसके लिए खुलते हैं।
तो मेरे पास कोई आकर अगर कहता है, तो मैं कभी पात्रता नहीं पूछता। क्योंकि जो संन्यासी होना चाहता है, इतनी इच्छा क्या काफी नहीं है? जो संन्यासी होना चाहता है, क्या उसकी प्यास, उसकी प्रार्थना इतनी ही काफी नहीं है? क्या इतनी लगन, अपने को दांव पर लगाने की इतनी हिम्मत काफी नहीं है? और पात्रता क्या होती है? प्यास के अतिरिक्त और प्रार्थना के अतिरिक्त आदमी कर क्या सकता है? अपने को छोड़ने के अतिरिक्त, समर्पण के अतिरिक्त, सरेंडर के अतिरिक्त आदमी कर क्या सकता है? लेकिन समर्पण के लिए भी कोई पात्रता चाहिए होती है?
पात्र समर्पण न कर पाएंगे; क्योंकि वे समझते हैं कि वे अधिकारी हैं। लेकिन जिसे अपनी अपात्रता का पूरा बोध है, वह समर्पण कर पाता है। परमात्मा के द्वार पर जो असहाय हैं, अपात्र हैं, दीन हैं, अयोग्य हैं, लेकिन फिर भी उसकी प्रार्थना से भरे हैं, उनके लिए द्वार सदा ही खुला है। लेकिन जो पात्र हैं, सर्टिफाइड हैं, योग्य हैं, काशी से उपाधियां ले आए हैं, शास्त्रों के ज्ञाता हैं, तपश्चर्या के धनी हैं, उपवासों की फेहरिस्त जिनके पास है कि उन्होंने इतने उपवास किए हैं, ऐसे व्यक्ति अपने अहंकार को ही भर लेते हैं। और अहंकार से बड़ी अपात्रता कुछ भी नहीं है।
सभी पात्र समझने वाले लोग अहंकार से भर जाते हैं। सिर्फ अपने को अपात्र समझने वाले लोग ही निर-अहंकार की यात्रा पर निकल पाते हैं। इसलिए मैं उनसे उनकी पात्रता नहीं पूछ सकता हूं। फिर मैं उनका गुरु नहीं हूं, जो मैं उनसे उनकी पात्रता पूछूं। वे मेरे पास सिर्फ इसलिए आए हैं कि मैं उनका गवाह बन जाऊं।
इस संबंध में दो-तीन बातें और कहूं। शायद कल इस बाबत और भी आपसे बात करूंगा तो साफ हो सकेगी।
संन्यास मेरे लिए व्यक्ति और परमात्मा के बीच सीधे संबंध का नाम है। उसमें कोई बीच में गुरु नहीं हो सकता। संन्यास व्यक्ति का सीधा समर्पण है। उसमें बीच में किसी के मध्यस्थ होने की कोई भी जरूरत नहीं। और परमात्मा चारों तरफ मौजूद है। और एक आदमी उसके लिए समर्पित होना चाहे, तो समर्पित हो सकता है। और फिर अपात्र समर्पण से पात्र बनना शुरू हो जाता है। और फिर अपात्र संकल्प, समर्पण, प्रार्थना से पात्र बनना शुरू हो जाता है।
संन्यासी सिद्ध नहीं है, संन्यासी तो सिर्फ संकल्प का नाम है, कि वह सिद्ध होने की यात्रा पर निकला है। संन्यासी तो सिर्फ यात्रा का प्रारंभ-बिंदु है, अंत नहीं है। वह तो सिर्फ शुभारंभ है। वह तो मील का पहला पत्थर है, मंजिल नहीं है। लेकिन मील के पहले पत्थर पर खड़े आदमी से पूछें, जिसने अभी पहला कदम भी नहीं उठाया, उससे पूछें कि मंजिल पर पहुंच गए हो, तो ही चल सकते हो। तो जो मंजिल पर पहुंच गया है, वह चलेगा क्यों? और जो नहीं पहुंचा है, वह मंजिल कहां से दिखाए कि मैं मंजिल पर पहुंच गया हूं।
पहला कदम तो अपात्रता में ही उठेगा। लेकिन पहला कदम भी कोई उठाता है, यह भी बड़ी पात्रता है; और पहले कदम की भी कोई हिम्मत जुटाता है, यह भी बड़ा संकल्प है।
संन्यास मेरी दृष्टि में बहुत और तरह की बात है। संन्यास मेरी दृष्टि में सिर्फ एक बात का स्मरण है कि मैं अब स्वयं को परमात्मा के लिए समर्पित करता हूं; अब मैं स्वयं को सत्य की खोज के लिए समर्पित करता हूं; अब मैं स्वयं को साहस करता हूं कि धार्मिक चित्त की तरह जीने की चेष्टा करूंगा।
इसलिए उनके गैरिक वस्त्र आपको दिखाई पड़ रहे हैं, वे उनके स्मरण के लिए हैं, रिमेंबरिंग के लिए हैं, कि उनको स्मरण बना रहे कि अब वे वही नहीं हैं, जो कल तक थे। दूसरे भी उन्हें स्मरण दिलाते रहें कि अब वे वही नहीं हैं, जो कल तक थे।
वस्त्रों की बदलाहट से कोई संन्यासी नहीं होता, लेकिन संन्यासी अपने वस्त्र बदल सकता है। गले में माला डाल लेने से कोई संन्यासी नहीं होता, लेकिन संन्यासी गले में माला डाल सकता है; और माला का उपयोग कर सकता है। गले में डली माला उसके जीवन में आए रूपांतरण की निरंतर सूचना है।
आप बाजार जाते हैं, कोई चीज लानी होती है, कपड़े में गांठ बांध लेते हैं। जब भी गांठ याद पड़ती है, खयाल आ जाता है, कोई चीज लाने को आए थे। गांठ चीज नहीं है; और जिसने गांठ बांध ली, वह चीज ले ही आएगा, यह भी पक्का नहीं है। क्योंकि जो चीज भूल सकता है, वह गांठ भी भूल सकता है। लेकिन फिर भी जो चीज भूल सकता है, वह गांठ बांध लेता है; और सौ में नब्बे मौकों पर गांठ की वजह से चीज ले आता है।
ये कपड़े, माला, यह सारा बाहरी परिवर्तन, संन्यास नहीं है। यह सिर्फ गांठ बांधना है कि मैं एक संन्यास की यात्रा पर निकला हूं; उसका स्मरण, उसका सतत स्मरण मेरी चेतना में बना रहे। वह स्मरण सहयोगी है।
इस संबंध में कल और आपसे बात कर सकूंगा। आज के लिए बस।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Are religious identities like Hindu, Jain, Christian, and Buddhist merely borrowed personalities?
According to Osho, labels like Jain, Buddhist, Christian, or Muslim are secondhand, borrowed personalities—easy substitutes for the perilous inner work of becoming a Jina, Buddha, or Christ. Following another turns you outward and erodes your own soul; worship is play, sadhana is risk and resolve. Learn from masters precisely this: don't walk behind anyone. Drop identities, turn within, and realize the truth directly yourself.
In simple terms: Wearing a religion’s label is like wearing a jersey without playing—the real game is to look inside and wake up yourself.
What is the concept of theft in relation to achourya?
According to Osho, achourya (non-stealing) goes beyond property and condemns the subtlest theft: imitation. When we copy, borrow identities, or become another’s shadow, we steal from our own soul. Real non-stealing is to remain a witnessing center while relating—receiving and giving without letting others’ waves replace your own—so individuality stays unborrowed, untouched.
In simple terms: Don’t copy others; stay yourself inside even while sharing life with people.
What is the significance of changing faces in the context of civilization?
According to Osho, the ‘changing faces’ of civilization reveal our bondage to reaction: praise inflates us, insults ignite us, and we become masks shaped by others’ buttons. True civilization begins when we shift from mechanical reaction to conscious response (pratisamvedan), keeping our center intact, meeting abuse with understanding, and reclaiming individuality instead of living as public opinion.
In simple terms: When we let others’ praise or blame change our “face,” we act like machines; choose to pause and respond from your own heart instead.
