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Questions in this Discourse
संपन्नता वीतरागता का आधार है। संपन्न हुए बिना कभी कोई नहीं जान पाता कि संपन्नता व्यर्थ है। धन पाए बिना कभी कोई नहीं जान पाता कि धन से कुछ भी नहीं मिलता है। धन की जो सबसे बड़ी देन है, वह धन नहीं है। धन की सबसे बड़ी देन, धन के भ्रम का टूट जाना है, डिसइल्यूजनमेंट है। धन न मिले, तो धन की व्यर्थता का कभी भी पता नहीं चलता है। विपन्न, दीन, दरिद्र, धन से मुक्त होने में बड़ी कठिनाई पाएगा। जो है ही नहीं, उससे मुक्त हुआ भी कैसे जा सकता है? मुक्त होने के लिए होना भी चाहिए। और जो हमें मिल जाता है, केवल हम उससे मुक्त हो सकते हैं।
इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि संपन्न समाज ही धार्मिक हो पाता है, और यह भी कि संपन्नता ही व्यक्ति को धन के ऊपर, अतिक्रमण में ले जाती है।
लेकिन पिछली अपरिग्रह की चर्चा में जब मैंने यह कहा कि थोड़ी चीजें कम बांधती हैं, ज्यादा चीजें ज्यादा बांध लेती हैं, तो हो सकता है--जैसा प्रश्न में पूछा गया--अनेक मित्रों को लगा हो कि इन दोनों में कोई विरोधाभास है। विरोधाभास नहीं है। कम गुलामी से छूटना बहुत मुश्किल है, ज्यादा गुलामी से ही छूटना संभव हो पाता है। जंजीरें बहुत कम हों, तो आदमी सह लेता है; जंजीरें बहुत ज्यादा हों, तो बगावत हो जाती है। और गरीब आदमी की जंजीरें भी इतनी कम हैं कि उन्हें तोड़ने का खयाल भी पैदा नहीं होता है। अमीर आदमी की जंजीरें भी बढ़ जाती हैं, तोड़ने का ख्याल भी पैदा होता है।
इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है। वस्तुओं के बढ़ जाने पर ही पता चलता है कि मैंने व्यर्थ का बोझ इकट्ठा कर लिया है। और ऐसा बोझ, जो मैंने सोचा था, मुझे मुक्ति देगा; मुक्ति उससे नहीं मिली, सिर्फ मैं दब गया हूं। ऐसा बोझ, जिससे मैंने सोचा था कि कोई उड़ान भर सकूंगा; उड़ान नहीं हुई, केवल मेरे पैर चलने में असमर्थ हो गए।
अधिक गुलामी स्वतंत्रता के निकट पहुंचा देती है। और जैसे सुबह होने के पहले अंधेरा बढ़ जाता है, ऐसे ही स्वतंत्रता की संभावना के पहले दासता बढ़ जाती है। संपन्न व्यक्ति गहरी गुलामी में है, इसलिए गुलामी का बोध भी होता है। छोटी-मोटी गुलामी के लिए हम एडजेस्ट हो जाते हैं, समायोजित हो जाते हैं। छोटी-मोटी गुलामी को हम पी जाते हैं और सह लेते हैं। जितनी बड़ी गुलामी हो, उतना ही सहना मुश्किल होता चला जाता है। और छोटी गुलामी को हम इस आशा में भी सह लेते हैं कि शायद कल गुलामी कम हो जाए।
तो गरीब के पास भी कुछ है, लेकिन उसे छोड़ने का खयाल पैदा नहीं होता; क्योंकि उसकी जिंदगी में तो जो नहीं है, उसको पाने की दौड़ जारी रहती है। अमीर आदमी के पास वह सब हो जाता है जिसे पाने की दौड़ थी, और अब पाने को कुछ भी नहीं रह जाता, और फिर भी वह पाता है कि पाया कुछ भी नहीं गया है। पाने को कुछ शेष नहीं रहा, और पाया कुछ भी नहीं गया है, बाहर सब इकट्ठा हो गया और भीतर पूरी रिक्तता खड़ी है। ये क्षण ही संपन्न आदमी के जीवन में आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत है। यह उसकी पहली किरण है।
लेकिन मैं ऐसा नहीं कहता हूं कि सभी संपन्न आदमी इस क्रांति को उपलब्ध हो जाते हैं। अधिकतर संपन्न आदमी सिर्फ आधार बना कर ही रह जाते हैं। जीवन में क्रांति का भवन कभी निर्मित नहीं हो पाता है। लेकिन उसके भी कारण हैं। और ऐसा भी नहीं है कि गरीब आदमी कभी आध्यात्मिक नहीं हो पाता है। गरीब आदमी भी आध्यात्मिक हो जाता है। लेकिन उसके भी कारण हैं।
पहली बात तो यह ठीक से स्मरण में ले लेनी चाहिए कि अनुभव के अतिरिक्त और कोई ज्ञान नहीं है। अनुभव ही ज्ञान है। धन का अनुभव ही धन से मुक्ति लाता है। और अगर एक व्यक्ति इस जीवन में गरीबी में भी आध्यात्मिक हो गया है, तो उसके किसी न किसी जन्म की यात्रा में धन के अनुभव का कारण मौजूद होगा ही। अन्यथा अनुभव के बिना ज्ञान नहीं है। धन के अनुभव के बिना कोई धन से मुक्त नहीं हो सकता है। जिसे हमने जाना नहीं, वह व्यर्थ है, इसे भी हम कैसे जान सकेंगे? जिस दुख को हमने पाया नहीं, वह छोड़ने योग्य है, इस निष्कर्ष पर भी हम कैसे पहुंच सकेंगे? जो अपरिचित है, वह शत्रु है, इसकी पहचान की भी तो कोई संभावना नहीं है।
शत्रु को भी पहचानना हो, तो परिचित हो जाना जरूरी है। और गलत को भी जानना हो, तो गलत से गुजरना पड़ता है। और राह के गड्ढे उन्हीं को पता होते हैं, जो राह के गड्ढों में गिरते हैं और भटकते हैं। इसके अतिरिक्त जीवन में कोई उपाय भी नहीं है।
हां, यह हो सकता है कि जिसे हम जीवन कहते हैं, वह बहुत छोटा है। जीवन की यात्रा बहुत लंबी है। और एक आदमी अपने पिछले जन्मों में धन के अनुभव से इतना सेचुरेट, इतना पूरा हो चुका हो कि इस जन्म में गरीबी से भी अध्यात्म में छलांग संभव हो जाए। अन्यथा और कोई कारण नहीं हो सकता। और अगर इस जन्म में भी कोई आदमी धन को पूरी तरह पाकर फिर भी दीन और दरिद्र बना रहता है, धन को पूरी तरह पाकर भी धन से मुक्त नहीं होता, और मैं कहना चाहूंगा कि जो धन से मुक्त होता है, उसी ने धन को पूरी तरह पाया है, इसका प्रमाण देता है।
धनी वही है, जो धन को छोड़ पाता है। अगर नहीं छोड़ पाता है, तो उसके भीतर दीन और दरिद्र बैठा हुआ है। अगर इस जन्म में कोई पूरे धन को पाकर भी धर्म की प्यास को जगाने में असमर्थ है, तो इसका एक ही अर्थ है कि उसके बहुत पिछले जन्म इतनी दीनता और दरिद्रता में कटे हैं कि इतना धन भी उसकी दीनता के अनुभव को नहीं काट पा रहा है। उसके भीतर की दरिद्रता खड़ी ही रह गई है। वह अभी भी भीतर दरिद्र है। धन का अनुभव नया है। इस अनुभव का ज्ञान नहीं बन पाया।
बहुत बार अनुभव गुजरे तो ज्ञान बनता है। ज्ञान बहुत से अनुभवों का सार-संक्षिप्त है। ज्ञान बहुत से अनुभव के फूलों का इत्र है। इस आदमी के लिए धन का अनुभव पहला है। अभी धन का अनुभव उसका ज्ञान नहीं बन पाया है। जैसे ही धन का अनुभव ज्ञान बनता है, वैसे ही व्यक्ति धन से मुक्त होने लगता है।
मेरी बात दोनों एक ही अर्थ रखती हैं, उनमें कोई, कोई विरोध नहीं है।
ऐसे ही मैं निरंतर कहता हूं कि जिसने शास्त्र नहीं जाने, वह कभी शास्त्र से मुक्त न हो सकेगा। जिसने शास्त्रों को जाना, वह शास्त्रों से मुक्त हो जाता है।
ऐसे ही मैं कहता हूं, जिसने क्रोध नहीं जाना, वह क्रोध से मुक्त न हो सकेगा। लेकिन जिसने क्रोध की पूरी पीड़ा और अग्नि जानी है, वह क्रोध से मुक्त हो जाता है।
ऐसे ही मैं कहता हूं कि जिसने काम नहीं जाना, वासना नहीं जानी, वह कभी कामवासना से मुक्त न हो सकेगा। जो कामवासना को जानता है, वह उसकी परिधि के बाहर हो जाता है।
अनुभव मुक्ति है, क्योंकि अनुभव ज्ञान है। धन का अनुभव भी धन के बाहर ले जाता है।
व्यक्ति तृप्त नहीं होता गहरे अनुभव से, गहरे अनुभव से मुक्त होता है। तृप्त हो जाए, तब तो मुक्ति की कोई जरूरत ही नहीं है। तृप्त नहीं होता है--यही तो मुक्ति में ले जाने का कारण बनता है। हजार बार दौड़ चुका है एक ही गोल घेरे में--पाता है, वहीं-वहीं दौड़ता है, वहीं-वहीं दौड़ता है, कोल्हू के बैल की तरह दौड़ता है, और तृप्ति नहीं होती।
यह अनुभव ही वृत्ति का गहरा अनुभव है कि दौड़ता हूं बहुत, खोजता हूं बहुत, पा भी लेता हूं, फिर भी खाली हाथ रह जाता हूं। और एक बार नहीं, अनेक बार इस अनुभव की गहराई में जो उतर जाता है, ऐसा नहीं है कि उसकी वृत्ति तृप्त हो जाती है, बल्कि ऐसा कि वह दौड़ना बंद करके खड़ा हो जाता है। क्योंकि वह कहता है कि बहुत दौड़ चुका इसी राह पर, वहीं-वहीं वर्तुलाकार दौड़ रहा हूं, कहीं पहुंचता नहीं हूं, कहीं कभी पहुंचा नहीं हूं। यह अनुभव की गहराई है। अगर उसे लगता है कि दो कदम और दौड़ लूं, तो शायद पहुंच जाऊं, तो समझिए कि अभी अनुभव इतना गहरा नहीं हुआ कि दौड़ने से मुक्ति हो जाए। अगर वह कहे कि एक चक्कर और लगा लूं, शायद अब तक नहीं मिला, अब मिल जाए, तो समझना कि अभी भी अनुभव पूरा नहीं हुआ।
अनुभव के पूरे होने का अर्थ, वृत्ति का तृप्त हो जाना नहीं। अनुभव के पूरे होने का अर्थ, दौड़ का तृप्त हो जाना है। अब दौड़ नहीं रही। जाना बहुत बार, दौड़े बहुत बार, पहुंचे कहीं भी नहीं। अब वह आदमी खड़ा हो गया है। अब आप उससे कितना ही कहें कि एक कदम पर सोने की खदान है, तो वह कहता है, मैंने हजार कदम चल कर देख लिया, सोने की खदान सिर्फ दिखाई पड़ती है, है नहीं। आप कितना ही कहें कि जरा आगे बढ़ो और सब मिल जाएगा जो चाहा, तो वह आदमी कहता है, जो-जो मैंने चाहा, वह-वह मैंने कभी नहीं पाया। अब मैं इतना जान गया हूं कि चाहना, पाने का मार्ग नहीं है।
यह, यह अनुभव की गहराई है। वह यह कहता है कि मैं दौड़ा और मंजिल नहीं मिली। आप कहें कि जरा तेजी से दौड़ो तो मंजिल मिल सकती है, वह आदमी कहता है, मैंने बहुत तेजी से भी दौड़ कर देखा, मैंने हांफ कर देख लिया, मैं पसीने-पसीने हो गया हूं; जन्मों से दौड़ रहा हूं; एक बात जान पाया हूं कि मंजिल दौड़ कर नहीं मिलती। अब मैं खड़े होकर मंजिल पाने की कोशिश और कर लेता हूं।
चाह से मुक्ति, चाह की तृप्ति नहीं है। चाह से मुक्ति, चाह का टोटल, चाह का संपूर्ण रूप से व्यर्थ हो जाना है। संपूर्ण रूप से व्यर्थ हो जाना, मैं कह रहा हूं। अगर आंशिक रूप से चाह व्यर्थ हुई है, तो नई चाह पकड़ लेगी। संपूर्ण रूप से चाह व्यर्थ हो गई है, तो फिर चाह नहीं पकड़ सकेगी।
ऐसी जो चित्त की दशा है--जहां चाह ही व्यर्थ हो गई है--यह फ्रस्ट्रेशन की दशा नहीं है, यह अतृप्ति की दशा नहीं है। क्योंकि जहां फ्रस्ट्रेशन है, वहां अभी चाह व्यर्थ है, यह पता नहीं चला। फ्रस्ट्रेशन का मतलब है, विषाद का मतलब है, एक चाह पूरी करनी चाही थी, वह पूरी नहीं हुई; लेकिन आशा मन में अभी है कि वह पूरी हो सकती थी। सफल मैंने होना चाहा था, असफल हुआ; लेकिन आशा मन में है कि और कुछ उपाय किए जाते, तो सफल हो सकता था।
वही आदमी विषाद को, चित्त के दुख को, फ्रस्ट्रेशन को उपलब्ध होता है, जिसकी आशा नहीं मरती सिर्फ असफलता आती है। लेकिन जिसकी असफलता ही नहीं, आशा भी मर जाती है, वह अब विषाद को उपलब्ध नहीं होता। वह अचाह को, डिजायरलेसनेस को उपलब्ध हो जाता है। वह खड़ा हो जाता है। वह कहता है, दौड़ना व्यर्थ है। दौड़ कर बहुत खोजा, अब खड़े होकर पा लें।
और मजे की बात है कि जो दौड़ कर कभी नहीं मिला, वह खड़े होते ही मिल जाता है। क्योंकि जिसे हम खोज रहे हैं, वह हमारे भीतर है; क्योंकि जिसे हम खोज रहे हैं, वह हमारे साथ है; क्योंकि जिसे हम खोज रहे हैं, वह हमें सदा से ही मिला हुआ है।
इसलिए जितना दौड़ते हैं, उतना ही उससे चूक जाते हैं, जो मिला हुआ है।
अपने घर में देखने के लिए बाहर दौड़ना बंद करना पड़ेगा। अपने भीतर देखने के लिए बाहर की यात्रा छोड़नी पड़ेगी। जो निकट है, उसे देखने के लिए दूर से आंख लौटानी पड़ेगी। जो हाथ में है, उसे खोजने के लिए, दूसरे की मुट्ठियों को खोलना बंद करना पड़ेगा।
अनुभव की गहराई, वासना की तृप्ति का नाम नहीं है। अगर वासना ही तृप्त हो सकती, तब तो महावीर नासमझ हैं। अगर वासना तृप्त हो सकती, तो बुद्ध पागल हैं। अगर वासना तृप्त हो सकती, तो जीसस की मनस-चिकित्सा होनी चाहिए, साइकोएनालिसिस होनी चाहिए। वासना तृप्त नहीं हो सकती है। बुद्ध ने कहा है, कामना दुष्पूर है। वह कभी पूरी नहीं हो सकती। लेकिन यह अनुभव वासना के बाहर ले जाता है। और जो वासना से नहीं मिला था वह निर्वासना में मिल जाता है।
अनुभव की पूर्णता--वृत्ति की, वासना की पूर्ण विफलता का नाम है। और तब अपरिग्रह का फूल खिलता है। जिसकी वृत्तियां गिर गईं, जिसकी चाहें गिर गईं, उसके भीतर अपरिग्रह का फूल खिलता है। तब वह दौड़ता नहीं, ठहर जाता है, खड़ा हो जाता है। तब मंजिल दूर नहीं होती, पैरों के नीचे हो जाती है। तब पाने को कुछ बाहर नहीं होता, पाने वाला ही अपने पाने का अंतिम, अपनी दौड़ का अंतिम लक्ष्य बन जाता है। पाने वाला ही, खोजने वाला ही ‘खोज’ हो जाता है। दि सीकर बिकम्स दि सीकिंग, दि सीकर बिकम्स दि सॉट।
वह जो भीतर खोज रहा है, वह पाता है कि मैं अपने को ही खोज रहा था। लेकिन शायद दर्पणों में खोज रहा था। बहुत दर्पणों में खोजा, नहीं मिला। अब वह दर्पणों को छोड़ कर अपने को देखता है; और पाता है कि दर्पण में मैं कभी मिल भी न सकता था। क्योंकि दर्पण में सिर्फ रिफ्लेक्शन था, दर्पण में मैं ही प्रतिबिंबित हो रहा था; दर्पण में कोई था नहीं सिर्फ भ्रम था एक--एक वर्चुअल स्पेस का। एक झूठे आकाश का भ्रम था। दर्पण में जो दिखाई पड़ा था, वह कहीं था नहीं--दर्पण में कहीं भी न था। और अगर था, तो दर्पण के बाहर था। लेकिन दर्पण में कोई खोजने निकल पड़ा है...!
हम सब दर्पण में खोज रहे हैं--जब तक हम वासना में खोज रहे हैं। जिस दिन बहुत दर्पणों को तोड़ कर, और सिर को तोड़ कर, दर्पणों से टकरा कर, लहूलुहान होकर, एक दिन आदमी दर्पण की तरफ पीठ फेर कर खड़ा हो जाता है, और कहता है: दर्पणों में बहुत खोज चुका, अब दर्पणों में नहीं खोजूंगा, उसी दिन उसे पता चलता है कि जिसे वह खोज रहा था, वह उसका ही प्रतिबिंब था।
वासनाओं के दर्पण में हमने अपने ही चेहरे पकड़े हुए हैं। वासनाओं के दर्पण में हम अपने को ही खोज रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को खोज रहा है। लेकिन वहां खोज रहा है, जहां प्रतिफलन है, रिफ्लेक्शन है। वहां नहीं, जहां सत्य है। सत्य यहां है--खोज रहा है वहां। सत्य अभी है--खोज रहा है कभी। सत्य प्रतिपल है--खोज रहा है भविष्य में। सत्य भीतर है--खोज रहा है बाहर। इस प्रतीति का हो जाना अनुभव की गहराई है।
वासनाएं वृत्ताकार हैं, वे कभी पूरी नहीं होतीं; लेकिन दौड़ने वाला दौड़-दौड़ कर अनुभव को उपलब्ध हो जाता है; और खड़ा हो जाता है। वृत्त को छोड़ देता है। वृत्ताकार, सर्कुलर, वासनाओं से हट कर खड़ा हो जाता है।
और जिस दिन कोई व्यक्ति अचाह में, डिजायरलेसनेस में खड़ा हो जाता है, उस दिन उसको पाने को कुछ शेष नहीं रह जाता। वह सभी कुछ पा लेता है।
अगर दस गुलाम मेरे पास हैं, तो मैं दस गुलामों का मालिक हूं; लेकिन मेरी मालकियत दस गुलामों के होने पर निर्भर है। अगर ये दस गुलाम खो जाएं, तो मेरी मालकियत भी खो जाएगी, इनके साथ ही खो जाएगी। उस मालकियत की कुंजी मेरे पास नहीं है, इन दस गुलामों के पास है। ये दस गुलाम बहुत गहरे में मेरे मालिक हो गए हैं, क्योंकि इनके बिना मैं मालिक न हो सकूंगा। और जिनके बिना हम मालिक न हो सकें, उनके हम मालिक कैसे हो सकते हैं? जिनके बिना हमारी मालकियत गिर जाएगी, जाने-अनजाने उनके हम गुलाम हो गए! हम उनसे बंध गए!
और मजे की बात यह है कि गुलाम तो मुक्त भी होना चाहेगा; क्योंकि गुलामी में कोई रहना नहीं चाहता। इसलिए अगर मालिक मर जाए, तो गुलाम प्रसन्न होंगे; लेकिन अगर गुलाम मर जाएं, तो मालिक रोएगा। अब हमें सोचना चाहिए कि गुलाम इन दोनों में कौन था? जो रोता है, या जो हंसते हैं?
मालकियत की आकांक्षा गुलाम बना देती है। सिर्फ वही आदमी इस दुनिया में मालिक है, जो किसी का मालिक नहीं होना चाहता है। सिर्फ वही आदमी मालिक हो सकता है, जिसने किसी को गुलाम नहीं बनाया है; क्योंकि उसकी मालकियत को खत्म नहीं किया जा सकता। उसकी मालकियत स्वतंत्र है। और मालकियत अगर स्वतंत्र न हो तो मालकियत कैसे हो सकती है?
वस्तुएं भी हमारी छाती पर बैठ जाती हैं। वस्तुएं भी हमारे ऊपर हो जाती हैं। दि पजेसर बिकम्स दि पजेस्ड। वह जो वस्तुओं को सम्हाले हुए है, वह धीरे-धीरे भूल ही जाता है कि वस्तुएं उसकी सेवा के लिए थीं। और उसने कब वस्तुओं की सेवा करनी शुरू कर दी, इसका उसे पता भी नहीं चलता!
नहीं चलेगा पता। नहीं चलेगा इसलिए कि वस्तुएं इस आदमी के पास नहीं आई हैं, यह आदमी वस्तुओं के पास गया है। गुलाम ही जाते हैं, मालिक कभी नहीं जाते। आप जिसके पास जाएंगे, मालकियत उसी को मिल जाएगी।
वस्तुएं आपके पास कभी नहीं आतीं, आप वस्तुओं के पास जाते हैं। आदमी वस्तुओं को खोजता है, वस्तुएं आदमी को नहीं खोजती हैं। तो जिसे आप खोजते हैं, जिसके लिए आप श्रम उठाते हैं, जिसके लिए आप कष्ट झेलते हैं, जिसे आप बामुश्किल से पा पाते हैं, अगर उसे आप छाती पर रख कर सम्हाल लें, और उसके नीचे दब जाएं, तो बहुत आश्चर्य नहीं; क्योंकि सदा डर है कि वह खो न जाए!
मैंने सुना है कि रयोकान नाम के एक झेन फकीर के घर एक रात चोर घुस गया। रयोकान उस चोर के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और उसने कहा: माफ करो, बड़ी गलत जगह आ गए। लेकिन आठ-दस मील की यात्रा करके आए हो और इस गरीब के झोपड़े में तो कुछ भी नहीं है! बस, यह कंबल है एक, यह तुम ले जाओ।
उसने चोर को वह कंबल दे दिया। रयोकान नंगा हो गया; क्योंकि उसके पास सिर्फ कंबल ही था, और ठंडी रात थी। उस चोर ने बहुत कहा कि आप यह क्या कह रहे हैं! आपके पास कुछ भी नहीं है, फिर भी आप यह कंबल दे रहे हैं!
तो रयोकान ने कहा कि याद रखना! आज तू एक मालिक के घर में घुस गया है। अब तक तू गुलामों के घर में घुसा था। वे कोई भी तुझे एक चीज न दे सकते थे। जिनको तू सोचता है, जिनके पास बहुत है, वे तुझे एक चीज न दे सकते थे। लेकिन अब तू याद रखना कि ऐसे मालिक भी हैं, जिनके पास कुछ नहीं है। असल में, वे मालिक इसीलिए हैं कि उनके पास कुछ नहीं है। यह कंबल तू ले जा।
वह चोर कंबल लेकर चला गया। जैसे आज चांद निकला है, ऐसा ही उस रात भी चांद था। रयोकान अपने दरवाजे पर बैठ गया। सर्द रात! चांद की किरणें! ठंडी हवाएं! वह कंपने लगा।
अगर वह एक गुलाम आदमी रहा होता, तो उसने कहा होता कि बहुत बुरा हुआ कि कंबल चोरी चला गया, या कंबल मैंने दे दिया। लेकिन वह एक मालिक था। उसके मन में उस लगती हुई सर्दी को देख कर यह खयाल नहीं आया कि कंबल चला गया तो बहुत बुरा हुआ।
उसने एक गीत लिखा उस रात। उसने लिखा कि काश, यह चांद भी मैं चोर को भेंट कर सकता! बेचारा चोर, चोरी के चक्कर में है। चांद ऊपर है, इसे देख भी नहीं पा रहा है!
उस रात उसने एक गीत लिखा, काश, आज मैं चांद भी चोर को भेंट कर सकता...! बेचारा चोर...! चोरी के चक्कर में चांद को देख ही नहीं पा रहा है!
यह एक मालिक की बात है।
आप कंबल को ओढ़े हुए दिखाई पड़ते हैं, इस भूल में मत पड़ना। अक्सर कंबल ही आपको ओढ़े रहता है। अक्सर आप हीरे-जवाहरात गले में पहने हुए दिखाई पड़ते हैं, इस भूल में मत रहना। अक्सर हीरे-जवाहरात आपके गले को पहने रहते हैं। आप बड़े मकानों में रहते हैं, इस भूल में मत रहना कि आप बड़े मकानों में रहते हैं। मकान आपस में चर्चा करते हैं, तो वे कहते हैं कि मैं किस आदमी के भीतर रह रहा हूं! मकान के भीतर आप रहते हों, यह संभव नहीं है; मकान इतना भीतर आपके रहता है कि आप मकान के भीतर कैसे रह सकते हैं!
दि पजेसर बिकम्स दि पजेस्ड। वह जो वस्तुओं का मालिक है, वस्तुओं का गुलाम हो जाता है। लेकिन इसमें वस्तुओं का कोई कसूर है, ऐसा मत समझ लेना। वस्तुओं का कोई हाथ ही नहीं है, यह बिलकुल एकतरफा लेन-देन है। यह आप ही हैं, जो गुलाम बन जाते हैं। यह आपकी ही दृष्टि और सोचने का ढंग है, जो गुलामी ले आता है। वस्तुओं का इसमें कोई भी हाथ नहीं है। वस्तुएं किसी को क्या गुलाम बनाएंगी? वस्तुओं को तो पता ही नहीं चलता कि किस आदमी को मालिक होने का भ्रम था और किस आदमी को गुलाम होने का भ्रम था। हम ही, आदमी ही अपनी दृष्टियों से घिरता और बंधता है। हाथ में पड़ी हुई जंजीरों के बीच भी कोई आदमी मुक्त हो सकता है, और सोने के आभूषणों में बैठा हुआ आदमी भी कारागृह में हो सकता है।
जिंदगी बड़ी अदभुत है। और आदमी से ज्यादा इरछी-तिरछी चाल चलने वाला कोई भी प्राणी नहीं है। वह अजीब काम करता रहता है। वह गुलामियों के नाम बदल कर मालकियत रख लेता है! जंजीरों के नाम आभूषण रख लेता है! और कारागृह के भीतर भी हो, तो दीवालों को इतना सजा लेता है कि मालूम पड़ता है अपने घर में बैठा है!
हम सब अपने-अपने कारागृह की दीवालों को सजाए हुए बैठे हैं। हमने उन्हें बड़े अच्छे नाम दिए हैं। अच्छे नामों में हम खो गए हैं। लेकिन सत्यों को नाम देकर बदला नहीं जा सकता। सत्य सत्य है। और धर्म की शुरुआत सत्यों को उनकी सच्चाई में जानने से शुरू होती है।
‘अपरिग्रह’ धर्म का बुनियादी तत्व है। अपरिग्रह का अर्थ है: इस सत्य को जान लेना कि जब तक मेरे मन में वस्तुओं की चाह है, तब तक मैं वस्तुओं का मालिक नहीं हो सकता हूं। जब तक मैं वस्तुओं को चाहता हूं, तब तक मैं वस्तुओं की गुलामी में रहूंगा ही। मैं उसी दिन वस्तुओं का मालिक हो सकता हूं, जिस दिन वस्तुओं की चाह मेरे भीतर से चली गई।
सुना है मैंने, सुना होगा आपने भी, एक संन्यासी एक राजमहल में एक रात आया था। उसके गुरु ने उसे भेजा है कि वह जाए और उस सम्राट के दरबार में जाकर ज्ञान सीख आए। गुरु परेशान हो गया, नहीं सिखा सका। तो उस संन्यासी ने कहा है कि आपके आश्रम में नहीं सीख सका, तपश्चर्या की दुनिया में, तो सम्राट के महल में कैसे सीख सकूंगा?
लेकिन उस गुरु ने कहा: बात मत करो, जाओ! वहीं पूछना।
जब वह दरबार में पहुंचा है, तो शराब के प्याले ढल रहे हैं और वेश्याएं नाच रही हैं! उसने कहा, मैं भी पागल कहां फंस गया हूं! उस गुरु ने भी खूब मजाक की! दिखता है छुटकारा पाना चाहता है मुझसे! लेकिन रात अब लौटना तो उचित भी नहीं। और उस सम्राट ने बहुत आवभगत की और उसने कहा: आज रात तो रुक ही जाओ।
उसने कहा: लेकिन अब रुकना बेकार है।
तो सम्राट ने कहा: कल सुबह स्नान करके, भोजन करके वापस लौट जाना।
रात भर उस संन्यासी को नींद न आ सकी। सोचा, कैसा पागलपन है। जहां शराब ढाली जा रही हो, और जहां वेश्याएं नाचती हों, और जहां धन ही धन चारों तरफ बरसा हो, वहां इस भोग-विलास में कहां ज्ञान मिलेगा? और ब्रह्मज्ञान का मैं खोजी, आज की रात मैंने व्यर्थ गंवाई! सुबह उठा। और सम्राट उसे कहा कि चलें, हम महल के पीछे नदी में स्नान कर आएं।
वे स्नान करने गए हैं। वे स्नान कर रहे हैं और तभी जोर की आवाजें गूंजने लगीं: महल में आग लग गई है! नदी के तट से ही... महल में उठी लपटें आकाश में दौड़ रही हैं।
सम्राट ने संन्यासी को कहा: देखते हैं?
संन्यासी भागा! उसने कहा कि क्या खाक देखते हैं? मेरे कपड़े घाट पर रखे हैं, कहीं आग न लग जाए!
लेकिन घाट पर पहुंचते-पहुंचते उसे खयाल आया, सम्राट के महल में आग लगी है और वह अब भी पानी में खड़ा है, और मेरी लंगोटी घाट पर रखी है, उसे बचाने के लिए मैं दौड़ पड़ा हूं! अभी वहां आग भी नहीं लगी है! लग सकती है, महल की आग बढ़ जाए और घाट तक आ जाए।
वह वापस लौट कर, खड़े हुए हंसते सम्राट के चरणों में गिर पड़ा। उसने कहा कि मैं समझ नहीं पा रहा, आपके महल में आग लग गई है और आप यहीं खड़े हैं?
सम्राट ने कहा: उस महल को अगर मैंने कभी अपना समझा होता, तो खड़ा नहीं रह सकता था। महल महल है, मैं मैं हूं। मेरा महल कैसे हो सकता है? मैं नहीं था, तब भी महल था; मैं नहीं रहूंगा, तब भी महल होगा। मेरा कैसे हो सकता है? लंगोटी थी आपकी, महल मेरा नहीं है!
नहीं, सवाल वस्तुओं का नहीं है कि वस्तुएं किसी को पकड़ लेती हैं। सवाल आदमी के रुख, आदमी के ढंग, एटीट्यूड, उसके सोचने की विधि और जीवन की व्यवस्था का है। वह कैसे जी रहा है, इस पर सब निर्भर करता है। अगर वह वस्तुओं की चाह से भरा है, तो इससे फर्क नहीं पड़ता है कि वह वस्तु महल है या लंगोटी। अगर वह वस्तुओं की चाह से नहीं भरा है, तो फिर कोई फर्क नहीं पड़ता कि पास में लंगोटी है या महल।
आदमी ही अपने ही कारणों से गुलाम होता है; और आदमी ही इन्हीं कारणों को तोड़ कर मुक्त भी हो जाता है।
लेकिन हमें दिखाई पड़ता है, उन्होंने महल छोड़ा; हमें दिखाई पड़ता है, हीरे-जवाहरात छोड़े; हमें दिखाई पड़ता है, धन-दौलत छोड़ी! यह हमें दिखाई पड़ता है। महावीर ने तो कंकड़-पत्थरों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं छोड़ा है। हीरे-जवाहरात हमें दिखाई पड़ते हैं। महावीर को हीरे-जवाहरात में कंकड़-पत्थर दिखाई पड़ गए हैं।
ऐसे हीरे-जवाहरात में कंकड़-पत्थरों के अतिरिक्त कुछ है भी नहीं! हां, जिन्होंने महावीर की कथा लिखी है, उन्होंने लिखा है कि इतने हीरे, इतने जवाहरात, इतने माणिक, इतने मोती छोड़े। अगर कोई महावीर से पूछे, तो वे कहेंगे, बड़े पागल हो, कंकड़-पत्थरों के भी अलग-अलग नाम रख लिए हैं? हां, अगर महावीर ने कंकड़-पत्थर छोड़े होते, तो हम भी न कहते कि कंकड़-पत्थर छोड़ रहे हैं! हम सबने छोड़े हैं।
सभी बच्चे कंकड़-पत्थर इकट्ठे करते हैं। और फिर एक दिन बच्चे नहीं रह जाते और कंकड़-पत्थर छोड़ देते हैं। लेकिन किसी बच्चे की जिंदगी में हम नहीं लिखते कि इस बच्चे ने कंकड़-पत्थर छोड़े; क्योंकि हम जानते हैं, वे कंकड़-पत्थर हैं। जिस दिन हम जानेंगे कि महावीर ने कंकड़-पत्थर छोड़े, उस दिन हम न कहेंगे कि उन्होंने कुछ छोड़ा।
नहीं, आश्चर्य यह नहीं है कि महावीर ने क्यों छोड़ा? आश्चर्य यह है कि दूसरे क्यों नहीं छोड़ पाते हैं! महावीर से कोई पूछेगा, तो वे नहीं कहेंगे कि मैंने कुछ त्यागा; क्योंकि त्यागी तो वह चीज जाती है, जिसमें कोई मूल्य हो। महावीर कहेंगे कि मैंने कुछ भी नहीं त्यागा; क्योंकि जिसमें कोई मूल्य ही नहीं था, उसके त्याग की बात करनी ही व्यर्थ है।
आप रोज अपने घर के बाहर कचरा फेंक देते हैं तो अखबार में खबर नहीं छपाते कि आज इतना कचरा त्यागा। महावीर के लिए जो कचरा हो गया है, उसे त्यागने का हक तो उन्हें देना चाहिए न! कि इतना भी हक उन्हें देने को हम राजी नहीं हैं?
हां, हमें दिक्कत है, क्योंकि हमें वह कचरा नहीं दिखाई पड़ रहा। एक बच्चे से कंकड़-पत्थर छीनें, तब आपको पता चल जाएगा। वह रात भर रो सकता है, सपने में चीख सकता है। उसकी सारी संपत्ति छीन ली गई, जो नदी के किनारे से वह इकट्ठी कर लाया था! आप कहेंगे, पागल है तू! क्योंकि कंकड़-पत्थर ही थे। आपको लगते होंगे कंकड़-पत्थर, बच्चे को सब रंगीन पत्थर हीरे-मोतियों से ज्यादा कीमती लगते हैं।
असल में, बच्चे की चेतना के तल और आपकी चेतना के तल में जो फर्क है, वही कठिनाई है। आपको पत्थर दिखाई पड़ रहे हैं, बच्चे को बहुमूल्य दिखाई पड़ रहे हैं। आप फेंकने का आग्रह करते हैं, बच्चा बचाने का आग्रह करता है। महावीर और हमारे बीच भी वही बच्चे और प्रौढ़ वाला फासला है। फिर और एक नई चेतना है जो महावीर को मिली है, जहां इस जगत में जो भी हमें दिखाई पड़ता है, वह उसका सारा मूल्य खो गया है, वह निर्मूल्य हो गया है।
महावीर कुछ छोड़ते नहीं हैं, चीजें छूट जाती हैं। जो व्यर्थ हो गई हैं, उन्हें ढोना असंभव है। महावीर छोड़ कर जाते नहीं हैं। जाते हैं, चीजें छूट जाती हैं। जो व्यर्थ हो गया है उसे साथ ढोना संभव नहीं है।
महावीर के बड़े भाई घर रह गए हैं। महावीर के बड़े भाई दुखी हैं कि उनके छोटे भाई ने भूल की। हीरे-जवाहरात, धन-दौलत, यश, सुख-सुविधा छोड़ कर चला गया है। इन दोनों के बीच प्रौढ़ और बच्चे के मन का फासला है। महावीर के बड़े भाई दुखी हैं कि दुख उठाने जा रहा है यह! और महावीर तो दुख उठाने नहीं जा रहे हैं, महावीर तो इतने आनंद से भर गए हैं कि अब दुख का कोई उपाय ही नहीं रह गया है।
लेकिन पूछा जा सकता है कि वे वहीं घर भी तो रह सकते थे? जैसा मैंने अभी उस सम्राट की बात कही, जो महल में था, लेकिन महल जिसमें नहीं था। महावीर वहां भी रह सकते थे, लेकिन व्यक्ति-व्यक्ति के टाइप और प्रकार की बात है।
महावीर नहीं रह सकते थे, कृष्ण रह सकते हैं। जनक रह सकते हैं, बुद्ध नहीं रह सकते थे। यह व्यक्तियों की बात है; और व्यक्ति परम स्वतंत्रता है। और नियम एक-दूसरे पर नहीं थोपे जा सकते। महावीर के लिए जो संभव था, वह संभव हुआ। महावीर के भीतर जो फूल खिल सकता था, वह खिला। लेकिन यह फूल खिलने के भी अपने आनंद हैं। महल में, महल के न होकर रहने का अपना आनंद है। महल के बाहर, वृक्ष के नीचे रहने का अपना आनंद है। और दोनों की कोई तुलना नहीं हो सकती, कंपेरिजन नहीं हो सकता। व्यक्तियों पर निर्भर करेगा।
महावीर जब सब छोड़ कर चले गए...और वृक्षों के नीचे...और भिक्षापात्र लेकर गांव-गांव भटकने में कौन सा आनंद होगा? इस बात को थोड़ा समझ लेना जरूरी है, क्योंकि अपरिग्रह के तत्व में यह बड़ी कीमती और बड़ी गहरी बात है।
महावीर की समझ ऐसी है कि जब श्वास मैं नहीं लेता, और जन्म मैं नहीं लेता--जन्म अपने से आता है, श्वास अपने से आती है, मृत्यु अपने से आती है--तो जीवन की व्यवस्था भी मैं अपने ऊपर क्यों लूं? उसे भी परमात्मा पर छोड़ देते हैं। वही करे व्यवस्था। यह परम आस्तिकता का लक्षण है। यह परम आस्तिकता है, व्यवस्था भी क्यों...!
कल सुबह होगी, सूरज निकलेगा; नहीं निकलेगा, तो हमने क्या व्यवस्था की है? कल अगर सुबह सूरज नहीं निकला और रात उसने रेजिगनेशन भेज दिया, इस्तीफा दे दिया, या कल सुबह हड़ताल पर चला गया, स्ट्राइक पर चला गया और कल सुबह नहीं निकला, तो हमारे पास क्या उपाय है, हम क्या करेंगे? और कल हवाओं से अगर ऑक्सीजन विदा हो जाए, और कल अगर जिंदगी असंभव हो जाए, तो हम क्या करेंगे? हमने क्या सुरक्षा की है? क्या व्यवस्था की है? कल अगर पृथ्वी ठंडी हो जाए, या कल अगर पृथ्वी टूट जाए और बिखर जाए--अनेक पृथ्वियां बिखर चुकी हैं, अनेक बिखर रही हैं; अनेक सूरज ठंडे हो चुके हैं, अनेक ठंडे हो रहे हैं--कल अगर यह हो जाए, तो हमने क्या व्यवस्था की है?
महावीर कहते हैं कि इतने बड़े कॉस्मास में, इतने अनंत ब्रह्मांड में, जहां हमारे हाथ में कुछ भी व्यवस्था नहीं है, वहां यह महावीर नाम का आदमी अपने आस-पास एक घर की व्यवस्था भी करे, इस नास्तिकता में पड़ने का क्या अर्थ है? महावीर कहते हैं, यह व्यवस्था भी... जब इतनी अव्यवस्था भी झेलनी पड़ सकती है, तो इतनी सी अव्यवस्था और जोड़ देते हैं। इतनी कॉस्मिक अव्यवस्था में, इतनी ब्रह्मांड की असुरक्षा में, मैं बैंक-बैलेंस रख कर भी क्या व्यवस्था कर पाऊंगा?
तो महावीर कहते हैं, यह व्यर्थ का बोझ मैं छोड़ देता हूं। अब मैं छोड़ देता हूं। जहां से श्वास आती है, जहां से कल की सुबह आएगी, जहां से आज का सूरज आया था, और जहां से आज का चांद आया है, और जहां से कल सुबह जड़ों को रस मिलेगा, और जहां से कल वृक्षों में फूल खिलेंगे, और जहां से पक्षी गीत गाएंगे, वहीं से अगर इस परम सत्ता की कोई आकांक्षा इस शरीर को भी जिंदा रखने की है, तो वह रख लेगी; और नहीं रखने की है, तो महावीर की अपनी अब कोई इच्छा शेष नहीं रह गई है।
यह महावीर की इस बात की घोषणा है इस सबको छोड़ कर जाना कि अब मैं अपने लिए नहीं जी रहा हूं। अगर परमात्मा जिलाना चाहता है, तो वह जाने। अब मैं अपनी तरफ से नहीं जी रहा हूं।
इसलिए महावीर की जिंदगी में एक छोटा सा नियम था, जो मैं आपसे कहूं, जो बड़ा अदभुत है। शायद दुनिया के किसी संन्यासी ने वैसे नियम का उपयोग नहीं किया है। सच तो यह है कि महावीर जैसा संन्यासी खोजना बहुत मुश्किल है। महावीर का एक नियम था कि सुबह भीख मांगने निकलते थे, तो वे अपने मन में सुबह के ध्यान में सोच लेते थे कि आज इस शर्त पर भीख मिलेगी तो स्वीकार करूंगा, नहीं तो नहीं करूंगा!
अब भिखारी कभी शर्त नहीं लगाते। भिखारियों की कोई कंडिशंस हो सकती हैं? भिखारी बेशर्त मांगता है। और महावीर शर्त लगा कर मांगते हैं, क्योंकि वे कोई भिखारी नहीं हैं। और शर्त भी ऐसी कि दूसरे आदमी को बताई भी नहीं गई है कि वह इंतजाम न कर ले। शर्त सिर्फ उन्हीं को पता है।
जैसे, वह सुबह शर्त लेकर निकले अपने दिमाग में कि अगर आज एक स्त्री काले कपड़े पहने हुए, एक आंख वाली मुझे भिक्षा देगी, तो मैं ले लूंगा, अन्यथा नहीं लूंगा।
अब इस गांव का उन्हें कुछ भी पता नहीं है, रात ही इस गांव में आकर वे ठहरे हैं। अब एक आंख वाली गोरी स्त्री, काले कपड़े पहने हुए, उनको भिक्षा देगी, तो वे स्वीकार कर लेंगे, अन्यथा वे गांव में घूम कर वापस लौट आएंगे। वे कहेंगे, परमात्मा की मर्जी नहीं, तो जाने दो। क्योंकि अपनी अब कोई मर्जी जीवन की नहीं है--न मरने की कोई मर्जी है, न जीने की कोई मर्जी है। अपनी तरफ से, वह जो जिजीविषा है, वह जो लस्ट फॉर लाइफ है, वह अब नहीं है। अब परमात्मा की मर्जी हो तो रखे, मर्जी हो तो उठा ले।
एक बार ऐसा हुआ कि महावीर महीनों तक गांव में जाते रहे और भिक्षा न मिल सकी, क्योंकि उन्होंने एक शर्त ले ली। अब वह शर्त तो बताई नहीं जाती थी, नहीं तो कोई इंतजाम हो जाता। गांव बहुत से उपाय करता, लेकिन वह शर्त पूरी न होती। अब बड़ा मुश्किल कि महावीर के मन में क्या है। महावीर ने एक शर्त ले ली कि एक राजकुमारी, जो जंजीरों में बंद हो, जिसका एक पैर मकान के भीतर हो और एक मकान के बाहर हो, जिसकी आंखों में आंसू हों और ओंठ पर मुस्कुराहट हो, अगर वह भिक्षा देगी, तो ले लेंगे।
तो फिर महीनों नहीं मिली। नहीं मिली, तो रोज गांव से आनंदित जाते और आनंदित वापस लौट आते। सारा गांव दुखी और पीड़ित, और सारा गांव रो रहा है, गांव भर में भोजन मुश्किल हो गया है। लोग हाथ-पैर जोड़ते हैं और कहते हैं कि स्वीकार करें। लेकिन महावीर कहते हैं, उसकी मर्जी।
लेकिन यह भी हो गया। एक दिन यह भी हो गया। कारागृह में बंद एक राजकुमारी ने भिक्षा दी। आंखों में आंसू थे उसकी, अपने कारागृह में होने के लिए। ओंठों पर मुस्कुराहट थी, क्योंकि महावीर ने उसकी भिक्षा स्वीकार कर ली। हंस रही थी। महावीर उसके द्वार पर रुक गए। आंख में आंसू थे, ओंठ पर मुस्कुराहट थी, एक पैर जंजीरों से बंधा हुआ पीछे था, एक बाहर निकाल पाई थी, क्योंकि एक ही पैर खुला था। ले ली, वापस लौट गए। लेकिन इस भिक्षा के लिए परमात्मा कभी उनको जिम्मेवार नहीं ठहरा सकेगा। अगर कोई जिम्मेवार होगा, तो परमात्मा ही होगा।
यह, यह परम सत्ता में समर्पण है। यह संन्यास का... यह संन्यास की परम अंतिम अवस्था है--जहां व्यक्ति एक श्वास भी अपनी तरफ से नहीं लेता। इसलिए महावीर कह सकते हैं कि मेरे कर्मों का अब कोई फल मेरे लिए नहीं है; और मेरे कर्मों का कोई परिणाम अब मुझसे नहीं बंधा है। अब मैं कुछ कर ही नहीं रहा हूं। अब जो हो रहा है, हो रहा है। करना मेरे हाथ में नहीं है। कर मैं नहीं रहा हूं। अब मेरी कोई इच्छा नहीं है।
लेकिन महावीर का यह अपना व्यक्तित्व है। और हमसे भूल हो जाती है, जब हम दो व्यक्तियों की तुलना करने लगते हैं। अगर हम जनक और महावीर की तुलना करें, तो कठिनाई हो जाएगी। जनक का अपना आनंद है। महावीर कहते हैं, परमात्मा को रखना होगा, तो रख लेगा किसी भी हाल में। जनक कहते हैं, परमात्मा ने महल दिया, तो मैं छोड़ने वाला कौन हूं? जनक कहते हैं, परमात्मा ने राज्य दिया, तो मैं छोड़ने की झंझट में भी क्यों पडूं?
कौन ठीक है, कौन गलत है? दोनों का अपना ढंग है परमात्मा को देखने का। दोनों ही ठीक हैं। हजार तरह के लोग हैं। जीसस अपनी तरह के आदमी हैं, बुद्ध अपनी तरह के, महावीर अपनी तरह के, कृष्ण अपनी तरह के। हमने जब भी उनकी तुलना की है, तब भूल हो जाती है। क्योंकि तुलना में हम किसी एक आदमी की तरफ झुक जाते हैं, जिसकी तरफ हमारे व्यक्तित्व का टाइप झुकता है। और तब हम दूसरे को गलत देखने लगते हैं।
नहीं, कोई कारण नहीं है। इस पृथ्वी पर लाख तरह के व्यक्तित्व खिल गए हैं, लाख तरह के व्यक्तित्वों के खिलने की संभावना है। तुलना की कोई भी जरूरत नहीं है। लेकिन गहरे में अगर देखें, तो बात एक ही है। जनक महल में हैं, क्योंकि वे कहते हैं कि जब परमात्मा ने महल दिया, तो मैं क्यों छोडूं? महावीर जंगल में हैं; लेकिन बात एक ही है। वे कहते हैं कि अगर उसको रखना है, तो जंगल में भी महल की तरह रख लेगा। मैं क्यों फिकर करूं? दोनों एक ही बात कहते हैं; लेकिन दोनों के व्यक्तित्वों के ढंग अलग हैं। वह एक बात भी इन दो व्यक्तियों में अलग-अलग गीत बन जाती है। वह एक ही बात भी इन दोनों व्यक्तियों में अलग-अलग स्वर ले लेती है। वह एक ही बात इन दोनों व्यक्तियों में अलग-अलग अर्थ बन जाती है। लेकिन वह बात एक ही है।
वह परमात्मा पर समर्पण की बात है। यह हमें खयाल में आ जाए, तो तुलना बंद कर देनी चाहिए। यह हमारे खयाल में आ जाए, तो प्रत्येक को, वह जैसा है वैसा ही, उसकी पूर्णता में समझ लेने की कोशिश कर लेनी चाहिए, बिना कंपेरीजन के। और तब एक दिन हम समझ पाएंगे कि हजार फूल हों, लेकिन सौंदर्य एक है; और हजार ढंग के दीये हों, लेकिन ज्योति एक है; और हजार ढंग के सागर हों, लेकिन सभी सागरों का पानी एक सा खारा है। जिस दिन यह दिखाई पड़ना शुरू होता है, उस दिन व्यक्ति विदा हो जाते हैं और वह जो मौलिक आधारभूत सत्य है, उसका दर्शन हो जाता है।
एक छोटी सी कहानी से मैं समझाने की कोशिश करूं।
एक गांव है, और उस गांव में एक बहुत बड़ा धनपति है, और जैसे कि धनपति होते हैं, वैसा ही धनपति है--कंजूस। एक पैसा उससे छूट नहीं पाता है। गांव में एक मंदिर बन रहा है। गांव हजार बार उस धनपति के द्वार पर गया है... और अब तो भिखारी भी नये गांव में आते हैं, तो पुराने भिखारी उनसे कह देते हैं, उस दरवाजे पर मत जाना! कभी उस घर से किसी को कुछ नहीं मिला है!
लेकिन गांव में एक नया मंदिर बन रहा है। गांव के गरीब से गरीब आदमी ने भी कुछ न कुछ दिया है; तो गांव के लोगों ने सोचा कि एक फेहरिस्त बना लें। गरीब से गरीब आदमी ने भी कुछ दिया है--किसी ने हजार दिया है, किसी ने दस हजार दिए हैं; किसी ने पांच दिए हैं, किसी ने रुपया दिया है। लेकिन ऐसा एक भी आदमी गांव में नहीं बचा, जिसने कुछ भी न दिया हो।
हम यह फेहरिस्त लेकर चलें। और गांव के सौ-पचास खास आदमी उस करोड़पति के द्वार पर गए। सोचा उन्होंने कि आज तो हम कुछ लेकर ही लौटेंगे; क्योंकि क्या वह प्रभावित न होगा इस बात से? न प्रभावित हो, तो कम से कम संकोच भी तो भर जाता है आदमी में!
जब वे फेहरिस्त सुनाने लगे कि किसने दस हजार दिए हैं; जिसकी कुछ भी हैसियत नहीं है, उसने दस हजार दिए हैं! जो बिलकुल ही दीन-हीन है, उसने भी हजार दिए हैं! जो रोज ही रोटी कमाता है, उसने भी पांच रुपये दिए हैं! जब वे फेहरिस्त सुनाने लगे और अमीर की तरफ बीच-बीच में देखते जाते कि क्या परिणाम हो रहा है! वह अमीर बड़ा उत्सुक होता जाता और बड़ा प्रभावित दिखाई दिया। तब तो उन लोगों ने सोचा कि लगता है काम बन जाएगा। फिर पूरी फेहरिस्त सुनाने के बाद... वह अमीर तो एकदम खड़ा हो गया! उसने कहा: मैं बहुत प्रभावित हो गया हूं! तब उन्होंने सोचा कि आज हम निष्फल नहीं लौटेंगे। तब उन्होंने कहा कि फिर आप भी कुछ दें! जब आप प्रभावित हो गए हैं!
तो उस अमीर आदमी ने कहा कि तुम मेरे प्रभावित होने का मतलब गलत समझे। मैं इसलिए प्रभावित हो गया हूं कि कल से मैं भी गांव में दान मांगना शुरू करने की योजना बनाऊंगा! जिस गांव में सब लोग देने को राजी हों, उसमें दान न मांगना बड़ी गलती है। मैं बहुत प्रभावित हो गया हूं!
आदमी ऐसे ही प्रभावित होता रहा है। महावीर महल छोड़ कर सड़क पर आ गए। होना तो यह चाहिए था कि जिनके पास महल थे, उन्हें पता चलना चाहिए था कि वे जरूर किसी व्यर्थ दौड़ में लगे हैं। क्योंकि जिसके पास महल था, वह छोड़ कर सड़क पर खड़ा हो गया है।
नहीं, यह नहीं हुआ। हुआ यह कि जो झोपड़ों में थे, उन्होंने सोचा कि जब महल वाला ही छोड़ कर आ रहा है, तब हमें, हमें अपने झोपड़े को महल बनाने की कोशिश क्यों करनी चाहिए? और गरीब अगर अपनी गरीबी में राजी हो जाए, तो कभी भी उस स्थिति को उपलब्ध नहीं हो पाता, जो धन के अनुभव के बाद मिलती है। वह गरीब ही रह जाता है।
महावीर को भिक्षा मांगते देख कर सम्राटों को शर्म आनी चाहिए थी; सोचना चाहिए था कि जो आदमी सम्राट होकर कुछ न पा सका, वह भिक्षा मांग कर कुछ पा रहा है! नहीं, सम्राटों ने यह नहीं सोचा; भिखारियों ने यह सोचा कि हम बड़े गौरववान हैं। क्योंकि देखो! महलों में नहीं मिला, अब भीख मांगने आए। हम तो पहले से ही भीख मांग रहे हैं। हम पर परमात्मा की कुछ ज्यादा ही कृपा है।
आदमी... आदमी ऐसा सोचता है। और इसलिए इस बात में सच्चाई है कि भारत की दीनता के बचने में महावीर से प्रभावित लोगों का हाथ है--महावीर का नहीं है। महावीर से प्रभावित लोगों का हाथ है! भारत की दीनता में, भारत की अवैज्ञानिकता में, भारत की अप्रगति में बुद्ध और महावीर से प्रभावित लोगों का हाथ है--बुद्ध और महावीर का नहीं।
लेकिन बड़ी कठिनाई है! महावीर पर दोष कैसे थोपा जा सकता है? आग है, घर में चूल्हा भी जला देती है और रात अंधेरे में रोशनी भी कर देती है। और फिर किसी के मकान में आग लगानी हो, तो भी काम में आ जाती है। जिसने आग को खोजा था, उस आविष्कारक को कैसे दोष दिया जा सकता है?
एटम बम है, जिन वैज्ञानिकों ने बनाया, उनको हिरोशिमा के लिए दोषी ठहराया जा सकता है? नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि अणु की ऊर्जा से तो खेत में फसल भी आ सकती है हजार गुनी। अणु की ऊर्जा से सारी दुनिया के यंत्र चल सकते हैं; आदमी काम से मुक्त हो सकता है। अणु की ऊर्जा से दीनता, दरिद्रता मिट सकती है, सदा के लिए। अणु की ऊर्जा से आदमी की उम्र लंबी हो सकती है। अणु की ऊर्जा से आदमी की संघातक बीमारियां समाप्त हो सकती हैं।
लेकिन आदमी ने यह कुछ भी नहीं किया! आदमी भूखे मर रहे हैं, खेत में फसल न बढ़ी। आदमी कैंसर से मर रहे हैं, कैंसर का इलाज अणु की ऊर्जा से न खोजा गया। असमय में बच्चे मर जाते हैं, उनके बचाने की कोई संभावना अणु की ऊर्जा से न खोजी गई। अणु गिराया गया हिरोशिमा पर, कि लाख आदमी राख हो जाएं। क्या किया जा सकता है!
कहावत है अरब में एक कि जब भी कोई नया आविष्कार होता है, तो शैतान सबसे पहले उस पर कब्जा कर लेता है। महावीर का बड़ा आविष्कार है, शैतान ने सबसे पहले कब्जा कर लिया। आइंस्टीन का बड़ा आविष्कार है, शैतान ने सबसे पहले कब्जा कर लिया।
दो ही रास्ते हैं: या तो ये आविष्कार न किए जाएं; शैतान के डर से दुनिया में अच्छी चीजें न बनाई जाएं; गलत प्रभाव की वजह से दान न मांगा जाए; गलत प्रभाव की वजह से कोई अच्छा काम न हो--क्योंकि गलत प्रभाव पड़ सकते हैं। तो भी तो बुरा परिणाम होगा। क्योंकि जो अच्छा न हो पाए, तो भी तो बुरा ही शेष रह जाएगा।
इसलिए खतरे मोल लेने पड़ते हैं। आदमी गलत लेता है, लेने दें। जो ठीक है, उसे किए ही जाना होगा। आज नहीं कल, आदमी अपनी गलती को, अपने दुख और पीड़ा को समझेगा। और समझेगा कि उसने जिससे स्वर्ग बन सकता था, उससे उसने नरक बना लिया है।
महावीर गरीबी के समर्थक नहीं हैं, महावीर सिर्फ अमीरी की व्यर्थता के उदघोषक हैं। लेकिन ये दो बड़ी अलग बातें हैं।
और दूसरी बात पूछी है साथ में।
मैं नहीं कहता कि महावीर के अनुयायी बनें। मैं नहीं कहता, जीसस के अनुयायी बनें। महावीर को समझ लें, इतना काफी है, और छोड़ दें; जीसस को समझ लें, इतना काफी है, और छोड़ दें। बनें तो सदा आप आप ही बनें, महावीर बनने का आपके लिए कोई उपाय नहीं है; जीसस बनने का कोई उपाय नहीं है।
इसका मतलब यह नहीं है कि जीसस जिस ऊंचाई पर पहुंचे, आप न पहुंच सकेंगे। आप भी पहुंच सकेंगे; लेकिन आप ही होकर पहुंच सकते हैं, जीसस की नकल करके नहीं पहुंच सकते।
अनुकरण नकल है। और ध्यान रहे, कार्बनकॉपी जो आदमी बनने की कोशिश करता है, वह मूल-कॉपी की स्पष्टता नहीं पा सकेगा। और फिर हिंदुस्तानी कार्बन हो तब तो और भी मुश्किल है! फिर तो कुछ समझ में भी आ जाए, तो भी मुश्किल है कि पीछे क्या है। और फिर सेकेंड कॉपी हो, तब भी ठीक है! महावीर को मरे पच्चीस सौ साल हो गए, पच्चीस सौ साल में हजारों कॉपियों के बाद आप खड़े हैं! लाखों कॉपियां गुजर चुकीं, उस कार्बन पर बहुत कॉपियां हो चुकीं! अब कुछ भी समझ में नहीं आता। लेकिन समझे चले जा रहे हैं, अनुकरण किए चले जा रहे हैं!
अनुयायी कभी भी धार्मिक नहीं होता है। असल में, अनुयायी यह कह रहा है कि मैं अपने होने की जिम्मेवारी छोड़ना चाहता हूं। मैं किसी के पीछे चलना चाहता हूं। मैं अंधा होने के लिए तैयार हूं। मैं किसी का हाथ पकड़ कर चलूंगा। मुझे कोई कहीं पहुंचा दे। मैं अपने चलने की जिम्मेवारी से इनकार करता हूं।
जिस आदमी ने अपने पैरों से इनकार किया, और जिस आदमी ने अपनी आंखों से इनकार किया, और जिस आदमी ने अपने विवेक पर जिम्मेवारी लेने से इनकार किया, वह आदमी कभी भी विकसित नहीं हो सकता है। उसने अविकास के सारे उपकरण चुन लिए।
लेकिन सदा हमें यही समझाया जाता रहा है कि किसी का अनुकरण करो, किसी जैसे बनो। यह बड़ी खतरनाक शिक्षा है। दुनिया में कोई कभी ‘किसी जैसा’ नहीं बन सकता है। आज तक बना नहीं, उदाहरण नहीं है। महावीर के पीछे बहुत लोग चले, लेकिन कौन महावीर बन सका है? ऐसा नहीं कि चलने वालों ने कुछ कम कोशिश की है। यह, यह दोष नहीं थोपा जा सकता। बड़ी कोशिश की है। कई बार तो ऐसा लगता है कि महावीर के पीछे चलने वालों ने महावीर से भी ज्यादा कोशिश की है। सच तो यह है कि महावीर को महावीर होने में कोई कोशिश नहीं करनी पड़ती। वह स्पांटेनियस है। प्रत्येक को स्वयं होने में कभी बहुत कोशिश नहीं करनी पड़ती, दूसरा होने में ही कोशिश करनी पड़ती है। एफर्ट जो है, कोशिश जो है, वह दूसरा होने में ही करनी पड़ती है।
राम की सीता चोरी चली गई है, तो राम को रोने में कोशिश नहीं करनी पड़ी। लेकिन रामलीला में जो राम होता है, उसको करनी पड़ती है, आंसू तो आते नहीं। हो सकता है स्टेज के पीछे से पानी लगा कर आता हो! हो सकता है हाथ में मिर्च लगाए रखता हो! जब सीता खोती हो तो जल्दी आंख मीड़ने लगता हो और आंसू आ जाते हों! क्योंकि इतना आसान नहीं है रामलीला में आंसू आ जाना। आंसू लाने पड़ते हैं। क्या राम को भी ऐसा उपाय करना पड़ा होगा? नहीं, राम के लिए जो है वह स्पांटेनियस है, वह सहज है। राम की अंतर-अवस्था है।
महावीर का त्याग, महावीर की नग्नता, महावीर के लिए सहजता है। अब दूसरा आदमी नग्न होने की व्यवस्था से नग्न हो सकता है। लेकिन उसकी नग्नता सर्कस की नग्नता होगी, संन्यासी की नग्नता नहीं हो सकती। वह सिर्फ उधार, बॉरोड, दूसरे का थोपा हुआ होगा। वह ज्यादा से ज्यादा महावीर का ऐक्ट कर सकता है। महावीर नहीं हो सकता।
जीसस, या बुद्ध, या कृष्ण, या राम, उनके पीछे चलने वाले लोग अभिनय कर रहे हैं। उन्होंने ऑथेंटिक, प्रामाणिक आत्मा को इनकार कर दिया है।
एक बात ध्यान रखनी जरूरी है, परमात्मा ने प्रत्येक को स्वयं के होने का हक दिया है। और जो आदमी अपने इस हक को छोड़ता है, वह परमात्मा की सबसे बड़ी देन को छोड़ता है। ऐसा आदमी नास्तिक है। ऐसा आदमी यह कह रहा है कि तुमने हम पर बहुत बड़ी जिम्मेवारी दे दी। हम इस योग्य न थे। हमें तो किसी के पीछे चला दो। हम इंजन नहीं हो सकते, हम तो सिर्फ डिब्बे होने लायक हैं, जो इंजन के पीछे लगा रहे और उसकी शंटिंग इधर से उधर होती रहे। तो वह अपनी जिंदगी गुजार लेगा।
नहीं, प्रत्येक आदमी स्वयं होने को पैदा हुआ है--बेजोड़, यूनीक। उस जैसा कोई आदमी पृथ्वी पर न पहले हुआ है और न पीछे होगा। परमात्मा कोई मिडियाकर क्रिएटर नहीं है। कोई बहुत मध्यमवर्गीय, साधारण कोटि का स्रष्टा नहीं है कि उसको एक ही आदमी को फिर दुबारा पैदा करे। वह रोज नये आदमी को पैदा कर लेता है!
मैंने सुनी है एक कहानी। मैंने सुना है कि पिकासो का एक चित्र किसी आदमी ने खरीदा--कोई दस लाख रुपये में। पिकासो की पत्नी से उसने पूछा कि यह चित्र प्रामाणिक तो है न? ऑथेंटिक तो है न? पिकासो का ही है न?
पिकासो की पत्नी ने कहा कि बिलकुल निश्चिंत आप खरीद लें; क्योंकि यह चित्र मेरे सामने ही पिकासो ने बनाया है।
चित्र खरीद लिया गया। वह आदमी पिकासो को यह खबर देने गया। उसने कहा कि मैंने दस लाख रुपये में आपका एक चित्र खरीदा है। वह चित्र भी ले गया। पिकासो ने उस चित्र को देखा और उसने कहा कि नहीं, यह असली नहीं है, ऑथेंटिक नहीं है।
वह आदमी तो होश खो दिया। दस लाख रुपये गंवाए, और खुद पिकासो ने कह दिया कि नहीं, यह प्रामाणिक नहीं है! पर उस आदमी ने कहा: आप कैसी बात कर रहे हैं? आपकी पत्नी ने गवाही दी है कि यह चित्र उसके सामने बना है।
उसकी पत्नी मौजूद थी। उसने कहा: आप कैसी बात कर रहे हैं? भूल गए हैं क्या? यह चित्र आपने बनाया है। मैं मौजूद थी।
पिकासो ने कहा: मैंने बनाया जरूर, लेकिन यह ऑथेंटिक नहीं है।
तब तो और मुश्किल हो गई। अगर पिकासो ने ही बनाया है, तो फिर प्रामाणिक क्यों नहीं है? तब तो उस खरीददार ने कहा: आप मजाक तो नहीं कर रहे हैं?
पिकासो ने कहा: मैं मजाक नहीं कर रहा हूं। यह चित्र बनाया तो मैंने ही है, लेकिन यह चित्र मैं एक दफा पहले और बना चुका हूं। अब यह सिर्फ उसकी कॉपी है। और यह कॉपी कोई दूसरा करे तो भी प्रामाणिक नहीं है, मैं खुद करूं तो भी प्रामाणिक नहीं है। यह कॉपी है, यह ओरिजिनल नहीं है। यह खयाल मैं एक दफा प्रकट कर चुका हूं।
लेकिन परमात्मा जो खयाल एक दफे प्रकट कर चुका, दुबारा करता ही नहीं। बुद्ध एक दफा पैदा कर दिए, बात खत्म हो गई। महावीर एक दफा पैदा किए, बात खत्म हो गई। इस पृथ्वी पर खोजने से एक कंकड़ भी आप दूसरे कंकड़ जैसा न खोज पाएंगे, आदमी तो बहुत बड़ी बात है। एक झाड़ पर एक पत्ता तोड़ लें तो उसी झाड़ पर दूसरा पत्ता वैसा न खोज पाएंगे, आदमी तो बहुत बड़ी बात है; आदमी तो बहुत ही जटिल चेतना का विकास है।
यहां प्रत्येक आदमी एक शिखर है। और किसी आदमी को यह हक नहीं कि वह किसी का अनुसरण करे। इसका यह मतलब नहीं है कि वह महावीर को समझे न! सच तो यह है कि अनुयायी नहीं समझता कभी भी, अनुयायी को समझने की जरूरत ही नहीं होती। असल में, जिसको पीछा करना है, वह समझने से बचने के लिए भी पीछा करता है। समझने की झंझट में वह नहीं पड़ता। समझना तो उसे पड़ेगा, जिसे किसी का पीछा नहीं करना है। पीछा तो अपना करना है। लेकिन दूसरों ने भी अनुभव लिए हैं। दूसरों की जिंदगी में भी संगीत प्रकटा है। दूसरों ने भी छुआ है जीवन का तार। और दूसरों ने भी जलाए हैं दीये ज्ञान के, प्रज्ञा के। और दूसरों की जिंदगी में भी सुवास उठी है आत्मा की। और दूसरों की जिंदगी में भी नृत्य घटा है परमात्मा का। उनको वह समझने जा रहा है।
इसलिए नहीं कि उनका वह अनुकरण करेगा, बल्कि इसलिए कि शायद इन सब विकसित फूलों को देख कर उसकी कली भी प्यास से भर जाए और फूल बनने को आतुर हो जाए। शायद इसलिए कि सुनते हुए दूसरी वीणाओं को उसकी वीणा के तार भी झनझना उठें और उसकी वीणा भी गीत गाने को आतुर हो उठे। शायद इसलिए कि दूसरे के पैरों में बंधे हुए घूंघर की आवाज उसके पैरों के सोए घूंघर को भी चुनौती बन जाए, वह भी नाच सके।
लेकिन किसी के अनुकरण के लिए समझने की जरूरत नहीं है। अनुकरण के लिए समझने की जरूरत ही नहीं है। आंख पर पट्टी बांधिए और चल पड़िए। अनुकरण के लिए अंधा होना बड़ी से बड़ी योग्यता, क्वालिफिकेशन है। समझ बड़ी और बात है।
अपने लिए जिंदगी को अगर सच्चाई में ले जाना हो, स्वयं को अगर विकसित करना हो, तो भूल कर किसी के अनुयायी मत बनना। और न भूल कर किसी को अनुयायी बनाना। दोनों ही खतरनाक बातें हैं। समझना दूसरों को, और अगर जिंदगी में कभी आपका भी फूल खिल जाए, तो रख देना बाजार में बीच सड़क पर कि दूसरे उसे देख लें। शायद उनकी कली को भी चुनौती मिल जाए।
लेकिन उनकी कली जब खिलेगी, तो वह फूल उनके जैसा होगा, आप जैसा नहीं होगा। और उनकी वीणा जब बजेगी, तो वह संगीत उन जैसा होगा, आप जैसा नहीं होगा।
प्रत्येक व्यक्ति को परमात्मा के द्वार पर अपने ही प्राणों का नैवेद्य लेकर पहुंचना होता है। और प्रत्येक व्यक्ति को परमात्मा के द्वार पर अपनी ही आत्मा को लेकर पहुंचना होता है। उधार आत्माएं लेकर परमात्मा के द्वार पर कभी कोई प्रविष्ट हुआ हो, ऐसी खबर सदियों में कभी भी नहीं सुनी गई है। वहां तो पूछा ही जाएगा कि प्रामाणिक है? ऑथेंटिक है? अपने को ही लेकर आए हो? किसी और का चेहरा लगा कर तो नहीं आ गए?
उस दरवाजे पर धोखा न दिया जा सकेगा। हो सकता है इस पृथ्वी पर धोखा भी हो जाए। हो सकता है इस पृथ्वी पर नंगा खड़ा हुआ कोई आदमी ठीक महावीर जैसा दिखाई पड़ने लगे। हो सकता है इस पृथ्वी पर कोई पीत-वस्त्र पहने हुए व्यक्ति ठीक बुद्ध जैसा दिखाई पड़ने लगे। हो सकता है इस पृथ्वी पर धोखा हो जाए। लेकिन परमात्मा के सामने सब वस्त्र गिर जाएंगे, और परमात्मा के सामने सब खोलें उघड़ जाएंगी। और परमात्मा के सामने सब नग्न खड़ा हो जाएगा, और परमात्मा के दर्पण में जब अपनी पूरी नग्नता दिखाई पड़ेगी, तो वहां सिवाए उसके कोई भी नहीं मिलेगा, जो आप थे। वहां वह नहीं मिलेगा जो आपने ओढ़ा; वह नहीं मिलेगा जो आपने सम्हाला; वह नहीं मिलेगा जो आपने अभ्यास किया; वहां तो वही दर्शेगा, जो आप हैं। उस दिन बड़ा दुख होगा, बड़ी पीड़ा होगी कि कितने जन्म व्यर्थ ही नकल में गंवा दिए, नाटक में गंवा दिए।
जिंदगी दूसरे का अनुसरण नहीं, जिंदगी स्वयं का उदघाटन है। जिंदगी दूसरे जैसे होने की प्रक्रिया नहीं, स्वयं जैसे होने का आयोजन है। और जो इस स्वयं होने की चुनौती को स्वीकार करता है, वह महावीर का अनुयायी नहीं बनेगा, लेकिन वहीं पहुंच सकता है, उसी ऊंचाई पर, जहां महावीर पहुंचे हैं; पहुंच सकता है वहीं, जहां जीसस पहुंचे हैं; पहुंच सकता है वहीं, जहां बुद्ध की समाधि उन्हें ले गई है। उसी निर्वाण में, उसी मोक्ष में, उसी स्वर्ग में, उसी प्रभु के राज्य में प्रत्येक का प्रवेश हो सकता है।
लेकिन फिर से दोहराता हूं अंतिम बात: परमात्मा की वेदी पर अपने ही प्राणों के खिले फूल का नैवेद्य चढ़ाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।
आज के लिए इतना ही। शेष फिर कल।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What happens when we loosen our grip on money?
According to Osho, loosening your grip on money ends the madness of hoarding, breaks the endless dissatisfaction, and restores freedom, peace, and the possibility of God. Money becomes a means, not your master; needs are more easily and intelligently met, generosity flows, and you become truly rich. Clinging makes you inwardly poor and unable even to use what you have.
In simple terms: When you stop clutching money like a toy, you feel calm and can actually use it wisely instead of it using you.
What is the relationship between material prosperity and spiritual growth?
According to Osho, material prosperity is the necessary foundation for authentic spirituality—but a foundation alone never makes a house. By fully experiencing wealth, one discovers its futility; great possession intensifies bondage until awareness and renunciation arise. Poverty’s few chains keep people chasing, while abundance exposes emptiness and invites inner revolt. Yet prosperity guarantees nothing; realization requires conscious insight, whether in this life or through past-life experience.
In simple terms: Having plenty helps you realize that plenty isn’t enough, which can push you to grow on the inside.
What is the reason objects hypnotize and possess their owner?
According to Osho, objects hypnotize and possess us because the very desire to own and master them makes our identity and security depend on them. Since we go to things (they don’t come to us), we make them our masters; attachment, effort, and fear of loss rivet our attention to them. Thus the possessor forgets freedom and becomes the possessed.
In simple terms: When you chase and cling to things, they end up controlling you, so you serve the stuff you thought you owned.
What is the significance of inner wealth in relation to non-possession?
According to Osho, non-possession is not a heroic renunciation but a natural shedding that happens when inner wealth—awareness and bliss—flowers. To Mahavira, jewels had become mere pebbles; value drained away as consciousness ripened. When you are inwardly full, things fall off by themselves; you don’t leave them, they are left behind. Thus non-possession expresses freedom, not loss, and varies by individual temperament—some stay in palaces unattached, others simply walk away.
In simple terms: When you feel rich inside, outer things stop mattering, so you drop them naturally instead of forcing yourself to give them up.
