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Questions in this Discourse
इसलिए जिसे विकास करना है, उसे रोज अपने कल को छोड़ कर आगे बढ़ जाना पड़ता है। जो अपने अतीत को मिटाने के लिए राजी नहीं है, वह विकसित होने से इनकार कर रहा है। मैं जो कल था, अगर आज भी वही होऊं, तो मेरा आज व्यर्थ गया। और यदि मुझे आज विकसित होना है, तो मेरे कल के पार जाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। दि पास्ट मस्ट बी ट्रांसेंडेड। वह जो अतीत है, उसे अतिक्रमण करना ही होगा।
अतीत का अतिक्रमण ही विकास है।
मनुष्य का अतीत है, उसकी पशुता; उसका भविष्य है, उसका परमात्मा होना। लेकिन जो पशु को अतिक्रमण न कर पाए, वह परमात्मा के मंदिर में प्रवेश भी नहीं कर सकता है। और जिसे भविष्य को उपलब्ध करना है, उसे रोज अतीत के प्रति मरना होता है--डाइंग टु दि पास्ट। और जो अतीत के प्रति नहीं मर पाता है, वह रुग्ण हो जाता है, वह बीमार हो जाता है। वह रुग्णता वैसी ही है, जैसे एक छोटे बच्चे को पहनाए गए कपड़े--वह बच्चा जवान होकर भी शरीर से उतारने से इनकार कर दे, तो शरीर रुग्ण हो जाएगा! शरीर के विकसित होने के साथ ही साथ कपड़ों की बदलाहट जरूरी है। बच्चे के कपड़े बच्चे के लिए स्वाभाविक, युवा के लिए अस्वाभाविक, पीड़ादायी कारागृह बन जाते हैं। बच्चे की वे रक्षा करते रहे होंगे, जवान के लिए उन कपड़ों से ही अपनी रक्षा करनी जरूरी हो जाती है।
पशुता मनुष्य का अतीत है। हम सभी उस यात्रा से गुजरे हैं जहां हम पशु थे। वैज्ञानिक भी कहते हैं, जो आध्यात्मिक हैं वे भी कहते हैं। डार्विन ने तो अभी-अभी थोड़े ही समय पहले घोषणा की कि मनुष्य पशु से आया है। लेकिन महावीर ने, बुद्ध ने, कृष्ण ने तो हजारों वर्ष पहले यह घोषणा की थी कि मनुष्य की आत्मा पशु से विकसित हुई है। मनुष्य की पिछली कड़ी पशु की थी। और अगली कड़ी पर कदम रखने के पहले उसे पिछली कड़ी को तोड़ देना पड़ेगा।
मनुष्य एक संक्रमण है, एक बीच का सेतु है--जहां से पशु परमात्मा में संक्रमित और रूपांतरित होता है। लेकिन अतीत बहुत वजनी होता है, क्योंकि परिचित होता है। उससे छूटना इतना आसान नहीं है। उससे मुक्त होना इतना आसान नहीं है। क्योंकि ऐसा मालूम होने लगता है कि हमारा अतीत ही हम हैं। लाखों साल बीत गए तब कभी आदमी गुहा-मानव था, पहाड़ों की कंदराओं में था, लेकिन उन पहाड़ों की कंदराओं में जब न आग थी, न रोशनी का कोई उपाय था--रात के अंधकार से जो भय मनुष्य के मन में समा गया, वह आज भी उसका पीछा कर रहा है।
अब, न आज अंधकार में कोई भय है, न अंधकार किसी गुहा के बाहर घिरा है, न अंधकार में जंगली पशु आदमी पर हमला करेंगे। लेकिन अंधकार अभी भी भय का कारण है! लाखों-लाखों वर्ष पहले मनुष्य के मस्तिष्क ने अंधकार से जो भय का संस्कार अर्जित किया था, वह पीछा नहीं छोड़ रहा है, वह पीछे उसके साथ जुड़ा हुआ है। यह उदारहण के लिए मैंने कहा।
हिंसा भी मनुष्य का पशु-जीवन में ग्रहण किया गया संस्कार है। पशु जी नहीं सकता बिना हिंसा के, हम हिंसा के साथ न जी सकेंगे। पशु नहीं जी सकता बिना हिंसा के, आदमी पैदा ही नहीं होता हिंसा के साथ। इसलिए आदमी दस हजार साल से सिवाय लड़ने के और कुछ भी नहीं कर रहा है; जी नहीं रहा है, सिर्फ लड़ रहा है। अगर हम ऐसा कहें कि आदमी सिर्फ लड़ने के लिए ही जी रहा है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।
पिछले तीन हजार वर्षों में पंद्रह हजार युद्ध लड़े गए। और ये युद्ध तो बड़े पैमाने की बात है, चौबीस घंटे भी हम लड़ रहे हैं। चौबीस घंटे में ऐसे क्षण खोजने कठिन हैं, जब हम किसी तरह की लड़ाई में संलग्न न हों। कभी हम शत्रुओं से लड़ रहे हैं। कभी मित्रों से लड़ रहे हैं। कभी हम धन के लिए लड़ रहे हैं। कभी हम यश के लिए लड़ रहे हैं। कभी हम पद के लिए लड़ रहे हैं और हमारी लड़ाई राजनीति बन जाती है। और कभी हम धन के लिए लड़ रहे हैं और हमारी लोलुपता शोषण बन जाती है। और कभी हम अकारण भी लड़ रहे हैं, क्योंकि लड़ने की वह जो आदत है, वह मांग करती है कि लड़ो।
एक आदमी शिकार करने जा रहा है, वह अकारण लड़ रहा है। खेल में लड़ रहा है। अगर कुछ न हो तो हम ऐसे खेल विकसित करेंगे, जिनमें लड़ने की वृत्ति तृप्त हो। हमारे सब खेल लड़ने के मिनिएचर हैं, वह लड़ने के छोटे-छोटे रूप हैं। खेल हमारी लड़ाइयां हैं--व्यर्थ की लड़ाइयां। जहां कोई कारण नहीं है। और जब लड़ने के लिए कोई कारण न मिले, तो हम अकारण लड़ना चाहेंगे। अगर युद्ध पर न लड़ सकें, तो शतरंज की गोटियां बिठा कर युद्ध करना चाहेंगे। शतरंज में भी तलवारें खिच जाती हैं, तो बहुत आश्चर्य नहीं है। शतरंज भी बहुत गहरे में दूसरे को हराने की आकांक्षा और दूसरे से लड़ने का रस है।
हमारे सारे खेल युद्ध के रूप हैं। या तो ऐसा कहें कि हमारे सारे खेल युद्ध के रूप हैं या ऐसा भी कह सकते हैं कि युद्ध भी हमारा सबसे भयंकर खेल है। लेकिन आदमी लड़ रहा है। जिन्हें हम संबंध कहते हैं, रिलेशनशिप कहते हैं, वे भी हमारी लड़ाइयां हैं। पति और पत्नी को अगर कोई मंगल ग्रह का यात्री आकर चौबीस घंटे देखता रहे, तो वह यह न मान सकेगा कि ये दोनों आदमी साथ रहने के लिए राजी हुए हैं। वह इतना ही समझ पाएगा कि ये दोनों आदमी इस बात के लिए राजी हुए हैं कि हम चौबीस घंटे लड़ते रहेंगे। शायद जिसे हम परिवार कहते हैं, वह उन लोगों की संस्था है, जिन्होंने तय किया हुआ है कि लड़ेंगे भी और हटेंगे भी नहीं! दूर भी न होंगे!
जीवन चारों तरफ हिंसा है। यह हिंसा रोग है मनुष्य के लिए। यह हिंसा अब अनिवार्य नहीं है, पशु के लिए रही होगी।
और साथ में स्मरण करें, जैसे ही विकास का नया चरण उठाया जाता है, नई जिम्मेवारियां और नये दायित्वों में भी चरण उठ जाता है। एवरी स्टेप ऑफ इवोल्यूशन इ़ज ए स्टेप इन ग्रेटर रिस्पांसिबिलिटी। वह तो बड़े दायित्व में ले ही जाएगा। जिस दिन से पशु छोड़ कर मनुष्य मनुष्य हुआ है, उसी दिन से अहिंसा उसके दायित्व का हिस्सा हो गई। क्योंकि मनुष्य खिल ही नहीं सकता हिंसा के बीच, वह प्रेम के बीच ही उसका पूरा फूल खिल सकता है।
इसलिए मैंने कहा कि अहिंसा स्वास्थ्य है, हिंसा रोग है। हिंसा से बड़ा शायद और कोई रोग नहीं है।
और हमारे हजार-हजार रोग शायद हिंसा से ही पैदा होते हैं। अगर पागलखाने में जाएं तो सौ पागलों में से निन्यानबे पागल सिर्फ इसलिए पागल हुए मिलेंगे कि साधारण रह कर हिंसा करनी उन्हें असंभव हो गई। हिंसा करने के लिए उन्हें पागल होने की स्वतंत्रता जरूरी थी; इसलिए पागल हो जाना पड़ा। अगर हम अपने मानसिक चिकित्सालयों में और मानसिक चिकित्सकों से पूछें तो पता चलेगा कि वह भीतर इकट्ठी हिंसा जब जोर से एक्सप्लोड हो जाती है, जब उसका विस्फोट होता है, तो मन के सारे तंतु बिखर जाते हैं और आदमी विक्षिप्त और रुग्ण हो जाता है।
ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है जो मानसिक रूप से बीमार न हो। मानसिक रूप से जिन्हें हम नॉर्मल कहते हैं, स्वस्थ कहते हैं, उसका केवल मतलब इतना ही है--उसका मतलब स्वस्थ नहीं है--उसका इतना ही मतलब है कि वह नॉर्मल पागलपन है। उसका कुल मतलब इतना है कि उतने पागल बाकी लोग भी हैं। वह एवरेज पागलपन है। जिसको हम पागल कहते हैं, वह एबनॉर्मल है। वह जरा एवरेज से आगे चला गया है। उसने जरा छलांग लगा ली है। शायद हम नब्बे डिग्री पर उबलते हुए पागल हैं, जिसे हम पागल कहते हैं, वह सौ डिग्री पर भाप बन गया है। हमारे उसके बीच गुण का कोई अंतर नहीं है, मात्रा का ही भेद है।
पागलखाना और पागलखानों के बाहर जो लोग हैं, उनके बीच कदमों का ही फासला है। बड़ी दीवालें हम कितनी ही उठाएं पागलखानों के चारों तरफ, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। हमारे और पागलों के बीच बहुत ही थोड़े से कदमों का फासला है। और वह फासला भी ऐसा नहीं है, जिसकी तरफ हमारी पीठ हो। वह फासला ऐसा है, जिसकी तरफ हमारा मुंह है। और वह फासला भी ऐसा नहीं है कि हम खड़े हों। वह भी फासला ऐसा है कि हम प्रतिपल उसकी तरफ बढ़ रहे हैं और फासले को कम कर रहे हैं।
जो मनुष्य के मन को देखने में समर्थ हैं, वे कहते हैं कि शायद पूरी मनुष्यता धीरे-धीरे एक पागलखाना होती जा रही है। जिन्हें हम शरीर के रोग कहते हैं, वे भी नब्बे प्रतिशत से ज्यादा मन के रोगों से निर्मित होते हैं और शरीर तक फैलते हैं। और मन का बुनियादी रोग हिंसा है।
हिंसा का क्या मतलब है, वह मैं खयाल दे दूं, तो यह रोग खयाल में आ जाए।
हिंसा का मतलब है ऐसा चित्त, जो लड़ने को आतुर है; ऐसा चित्त, जिसका रस लड़ने में है; ऐसा चित्त, जो बिना लड़े बेचैन हो जाएगा; ऐसा चित्त, जो बिना किसी को चोट पहुंचाए, बिना किसी को दुख पहुंचाए सुख अनुभव न कर सकेगा।
स्वभावतः जो चित्त दूसरे को दुख पहुंचाने को आतुर है, या जिस चित्त का दूसरे को दुख पहुंचाना ही एकमात्र सुख बन गया है, ऐसा चित्त सुखी नहीं हो सकता। ऐसा चित्त भीतर गहरे में दुखी होगा।
एक बहुत गहरा नियम है कि हम दूसरे को वही देते हैं जो हमारे पास होता है; अन्यथा हम दे भी नहीं सकते। जब मैं दूसरे को दुख देने को आतुर होता हूं, तो इसका इतना ही अर्थ है कि दुख मेरे भीतर भरा है और उसे मैं किसी पर उलीच देना चाहता हूं। जैसे, बादल जब पानी से भर जाते हैं, तो पानी को छोड़ देते हैं जमीन पर; ऐसे ही, जब हम दुख से भीतर भर जाते हैं, तो हम दूसरों पर दुख फेंकना शुरू कर देते हैं।
जो कांटे हम दूसरों को चुभाना चाहते हैं, उन्हें पहले अपनी आत्मा में जन्माना होता है; उन कांटों को हम लाएंगे कहां से? और जो पीड़ाएं हम दूसरों को देना चाहते हैं, उन्हें जन्म देने की प्रसव-पीड़ा बहुत पहले स्वयं ही झेल लेनी पड़ती है। और जो अंधकार हम दूसरों के घरों तक पहुंचाना चाहते हैं, वह अपने दीये को बुझाए बिना पहुंचाना असंभव है।
अगर मेरा दीया जलता हो और मैं आपके घर अंधकार पहुंचाने जाऊं, तो उलटा हो जाएगा--मेरे साथ आपके घर में रोशनी ही पहुंचेगी, अंधकार नहीं पहुंच सकता है!
जो व्यक्ति हिंसा में उत्सुक है, उसने अपने साथ भी हिंसा कर ली है--वह कर चुका हिंसा। इसलिए एक सूत्र और आपसे कहना चाहूंगा, और वह यह कि हिंसा आत्महिंसा का विकास है। भीतर जब हम अपने साथ हिंसा कर रहे होते हैं, तब वही हिंसा ओवरफ्लो होकर, बाढ़ की तरह फैल कर, किनारे तोड़ कर स्वयं के दूसरों तक पहुंच जाती है। इसलिए हिंसक कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकता, भीतर अस्वस्थ होगा ही। उसके भीतर हॉर्मनी, सामंजस्य, संतुलन, संगीत नहीं हो सकता। उसके भीतर विसंगीत, द्वंद्व, कांफ्लिक्ट, संघर्ष होगा ही। वह अनिवार्यता है। जो दूसरे के साथ हिंसा करना चाहता है, उसे अपने साथ बहुत पहले हिंसा कर ही लेनी पड़ेगी। वह पूर्व तैयारी है।
इसलिए, हिंसा मेरे लिए अंतर्द्वंद्व है। दूसरे पर फैल कर दूसरे को दुख बनती है, अपने भीतर जब उसका बीज अंकुरित होता है और फैलता है, तो स्वयं के लिए द्वंद्व और अंतर-संघर्ष, और अंतर-पीड़ा बनती है। हिंसा अंतर-संघर्ष, अंतर-असामंजस्य, अंतर-विग्रह, अंतर-कलह की स्थिति है। हिंसा दूसरे से बाद में लड़ती है, पहले स्वयं से ही लड़ती और बढ़ती है। प्रत्येक हिंसक व्यक्ति अपने से लड़ रहा है।
और जो अपने से लड़ रहा है, वह स्वस्थ नहीं हो सकता। स्वस्थ का अर्थ ही है, हॉर्मनी। स्वस्थ का अर्थ है, जो अपने भीतर एक समस्वरता को, एकरसता को, एक लयबद्धता को, एक रिदम को उपलब्ध हो गया है।
महावीर या बुद्ध के चेहरों पर जो संगीत की छाप है, वीणा लिए हुए बैठे संगीतज्ञों के चेहरे पर भी जो संगीत की छाप नहीं है, वह महावीर के वीणारहित हाथों में है। वह संगीत किसी वीणा से पैदा होने वाला संगीत नहीं, वह भीतर की आत्मा से फैला हुआ समस्वरता का बाहर तक बिखर जाना है। बुद्ध के चलने में वह जो लयबद्धता है--वह जो बुद्ध के उठने और बैठने में--वह जो बुद्ध की आंखों में एक समस्वरता है, वह समस्वरता किन्हीं कड़ियों के बीच बंधे हुए गीत की नहीं, किन्हीं वाद्यों पर पैदा किए गए स्वरों की नहीं--आत्मा के भीतर से सब द्वंद्व के विसर्जन से उत्पन्न हुई है।
अहिंसा एक अंतर-संगीत है। और जब भीतर प्राण संगीत से भर जाते हैं, तो जीवन स्वास्थ्य से भर जाता है; और जब भीतर प्राण विसंगीत से भर जाते हैं, तो जीवन रुग्णता, डिसी़ज से भर जाता है।
यह अंग्रेजी का शब्द ‘डिसी़ज’ बहुत महत्वपूर्ण है। वह डिस-ईज़ से बना है। जब भीतर विश्राम खो जाता है, ईज़ खो जाती है; जब भीतर सब संतुलन डगमगा जाते हैं, और सब लयें टूट जाती हैं, और काव्य की सब कड़ियां बिखर जाती हैं, और सितार के सब तार टूट जाते हैं, तो जो स्थिति है, वह डिसी़ज है। और जब भीतर कोई चित्त रुग्ण हो जाता है, तो शरीर बहुत दिन तक स्वस्थ नहीं रह सकता है। शरीर छाया की तरह प्राणों का अनुगमन करता है।
इसलिए मैंने कहा कि हिंसा एक रोग है, एक डिसी़ज है; और अहिंसा रोगमुक्ति है, अहिंसा स्वास्थ्य है।
जैसे मैंने कहा, अंग्रेजी का शब्द ‘डिसी़ज’ महत्वपूर्ण है, वैसा हिंदी का शब्द ‘स्वास्थ्य’ महत्वपूर्ण है। पता नहीं, स्वास्थ्य का मतलब हेल्थ नहीं होता, जैसे डिसी़ज का मतलब सिर्फ बीमारी नहीं होता। स्वास्थ्य का मतलब होता है: स्वयं में जो स्थित हो गया है। स्वयं में जो ठहर गया है। स्वयं में जो खड़ा हो गया है। स्वयं में जो लीन और डूब गया है। स्वयं हो गया है जो। जो अपनी स्वयंता को उपलब्ध हो गया है। जहां अब कोई पर नहीं, कोई दूसरा नहीं कि जिससे संघर्ष भी हो सके; कोई भिन्न स्वर नहीं, सब स्वर स्वयं बन गए--ऐसी स्थिति का नाम ‘स्वास्थ्य’ है।
अहिंसा इस अर्थों में स्वास्थ्य है, हिंसा रोग है।
जब आप क्रोध से भरते हैं, तो आपके पास वही खून नहीं रह जाता, जो क्रोध के पहले था। आपका खून पायजंड हो जाता है। आपके खून में वे ग्रंथियां उन जहरों को छोड़ देती हैं, जो आपको लड़ने और मरने का पागलपन दे सकें। इसलिए क्रोध की हालत में आप इतना बड़ा पत्थर उठा सकते हैं, जो आपने अक्रोध की हालत में कभी नहीं उठाया--नहीं उठा सकते थे। क्रोध की स्थिति में आप अपने से ताकतवर आदमी को उठा कर फेंक सकते हैं, जो कि आप शांत स्थिति में कभी सोच भी नहीं सकते। आपके शरीर में केमिकल परिवर्तन हो गए। आपका शरीर वही नहीं है। शरीर ने इकट्ठे किए हुए विष छोड़ दिए खून में। अब आप होश में नहीं हैं।
क्रोध टेम्प्रेरी मैडनेस है। क्रोध अस्थायी पागलपन है। और इसलिए आदमी क्रोध में ऐसे काम कर लेता है, जो उसने स्वयं कभी भी न किए होते। इसलिए क्रोध में आदमियों ने हत्याएं की हैं और पीछे जीवन भर रोए और पछताए हैं। और जिंदगी भर कहा है कि यह मैंने कैसे कर लिया? यह मेरे बावजूद हो गया। यह मैंने नहीं किया। यह कैसे हो गया?
क्रोध में हम सबने वह किया है, जो हमने करना नहीं चाहा था। फिर वह किसने किया है? निश्चित किया हमने है, लेकिन वैसे ही किया है जैसे शराब पीकर कोई कर लेता है। लेकिन यह शराब हमारे खून में भीतरी स्रोतों से आती है, इसलिए पता नहीं चलता; शराब हम ऊपर की बोतलों से ले जाते हैं तो पता चल जाता है, शराब भीतरी स्रोतों से आती है तो पता नहीं चलता।
मनुष्य के शरीर ने लाखों-करोड़ों वर्षों की यात्रा में विष-ग्रंथियां इकट्ठी की हैं जो कि इमरजेंसी के लिए जरूरी रही हैं; जब वह जानवर था, पशु था, तब बहुत जरूरी रही हैं। एक शेर हमला कर दे किसी पर, तो उसके पास दौड़ने की अमानवीय क्षमता तत्काल पैदा होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि वह दौड़ने का अब अभ्यास करेगा, और तब दौड़ना सीखेगा, और तब भाग सकेगा। यह इमरजेंसी है, तत्काल उसके शरीर में उतना पागलपन आ जाना चाहिए कि वह अब होश छोड़ कर भाग सके। क्योंकि अगर होश रखा तो शायद बचना मुश्किल होगा। इसलिए शरीर ने लाखों वर्षों की यात्रा में विष-ग्रंथियां विकसित की हैं, जो कि इमरजेंसी की हालत में खून में तत्काल, ऑटोमैटिकली छूट जाती हैं और आप विक्षिप्त होकर दौड़ सकते हैं।
भय में आदमी कांप रहा है। यह कंपन रासायनिक परिवर्तन है। काम की वृत्ति से पीड़ित हुए आदमी के भीतर अनेक तरह के रासायनिक परिवर्तन हो जाते हैं। अगर जानवरों को काम की, सेक्स की उन्माद-स्थिति में देखें, तो एक अनुभव होगा, जो कुछ मनुष्यों में अभी भी शेष है। उनके शरीर से विभिन्न प्रकार की दुर्गंधें या गंधें निकलनी शुरू हो जाती हैं। असल में, पशु पहचानते ही तब हैं कि उनकी मादा तत्पर है संभोग के लिए, जब एक विशेष गंध उसके शरीर से निकलनी शुरू हो जाती है। संभोग के क्षण में मनुष्य के शरीर से भी, स्त्रियों के शरीर से भी विशेष गंधें निकलनी शुरू हो जाती हैं। उनका शरीर एक रासायनिक परिवर्तन से गुजर रहा है।
मनुष्य के चित्त में जो होता है, तत्काल उसके शरीर की केमिस्ट्री उसका पीछा करती है। जब आप भोजन लेते हैं, तब आपका शरीर उन द्रव्यों को छोड़ देता है, जो भोजन के पचाने के लिए जरूरी हैं। और जब आप हिंसा से भरते हैं, तो शरीर उन द्रव्यों को छोड़ देता है, जो हिंसा करने में सहयोगी हो सकते हैं।
इसलिए हिंसा केवल मानसिक तथ्य नहीं है, बायोकेमिकल तथ्य भी है। लेकिन, रासायनिक तत्व भी है, जब मैं यह कहता हूं, तो मैं यह नहीं कहता हूं कि केवल रासायनिक तत्व है। वैसा कहने वाले रसायनविद भी आज मौजूद हैं, जो कहते हैं कि अब आदमी को अहिंसा की शिक्षा देने की कोई जरूरत नहीं। हम कुछ ग्रंथियों को काट कर अलग कर देते हैं, फिर आदमी हिंसा करने में असमर्थ हो जाएगा! वे ठीक कहते हैं थोड़ी दूर तक; लेकिन वे जो सुझाव दे रहे हैं, वे हिंसा करने से भी खतरनाक सुझाव हैं। यह संभव है कि हम आदमी की कुछ ग्रंथियों को काट दें!
हमने देखा है एक बैल को भी और एक सांड को भी। बैल और सांड में सिर्फ एक ग्रंथि के कट जाने के फर्क के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। लेकिन कहां बैल की दीनता और कहां सांड का गौरव! बैल की आत्मा विकसित नहीं हुई, सिर्फ शरीर दीन हो गया है।
आदमी के शरीर से भी आज नहीं कल वैज्ञानिक उन ग्रंथियों को अलग करने का सुझाव देगा--दे रहा है--दिया जा चुका है; और कोई आश्चर्य नहीं कि चीन और रूस की तानाशाही सरकारें उस सुझाव पर बहुत जल्दी अमल भी शुरू कर दें!
आदमी के शरीर से भी कुछ ग्रंथियां काटी जा सकती हैं, तब वह हिंसा प्रकट नहीं कर सकेगा--लेकिन अहिंसक नहीं हो जाएगा। ये दोनों अलग बातें हैं। तब वह शरीर से सिर्फ दीन हो जाएगा। वह वैसा ही होगा, जैसे एक बूढ़ा आदमी कामवासना से तो पीड़ित होता है, लेकिन काम की दुनिया में प्रवेश करने में असमर्थ हो जाता है।
नहीं, वह आदमी का विकास नहीं होगा। और वैसा आदमी जिस दिन हम पैदा कर लेंगे, वैसा आदमी विद्रोह नहीं करेगा, बगावत नहीं करेगा। गुलामी उसकी आत्मा बन जाएगी। वह नॉन-रिबेलियस हो जाएगा। सरकारें जरूर चाहेंगी कि आदमी को रासायनिक ढंग से गैर-हिंसक बनाया जा सके। बनाया जा सकता है; लेकिन उससे आदमी पशु से भी नीचे गिर जाएगा, आदमी से ऊपर नहीं जा सकता है।
इसलिए यह भी मैं आपसे कहना चाहूंगा इस संदर्भ में, कि आदमी को बहुत जल्दी सारी दुनिया में इसके खिलाफ भी आवाज उठानी पड़ेगी--कि जीव रसायनविद जो सुझाव दे रहे हैं, वे मनुष्य की आत्मा के बहुत विपरीत और खतरनाक हैं। उन सुझावों से ज्यादा बड़ी गुलामी न तो कभी आई थी न कभी आ सकती है।
एक बड़ी केमिकल रिवोल्यूशन, एक रासायनिक क्रांति निकट है। उसके प्राथमिक चरण पर काम होना शुरू हो गया है। मैं कहूंगा कि निश्चित ही हिंसा के लिए शरीर में कुछ तत्व जरूरी हैं। लेकिन उन तत्वों के अलग होने से आदमी की आत्मा अहिंसक नहीं होती, सिर्फ इंपोटेंटली वायलेंट रह जाती है; सिर्फ नपुंसक रूप से हिंसक रह जाती है। हिंसा तो भीतर घुमड़ेगी; आत्मा में डिसी़ज होगी; आत्मा संगीतरहित होगी, लेकिन उस संगीतरहितता को दूसरे तक पहुंचाने के लिए शरीर असमर्थ हो जाएगा। तब दूसरे तक पहुंचने की असमर्थता हो जाएगी। हम यह बल्ब तोड़ दे सकते हैं, लेकिन बल्ब के तोड़ने से उसमें बहने वाली बिजली नहीं टूट जाती, लेकिन दिखाई पड़नी बंद हो जाती है। बल्ब से बिजली प्रकट होती है, बल्ब बिजली नहीं है। ग्रंथियों से शरीर की हिंसा प्रकट होती है, ग्रंथियां हिंसा नहीं हैं।
और दूसरा भी खयाल ले लेना जरूरी है कि जब व्यक्ति के चित्त से हिंसा विदा हो जाती है, तो ये ग्रंथियां जिन्होंने हिंसा को सहयोग दिया था; ये ग्रंथियां जिनके विष और मादक तत्व फैल कर मनुष्य को विक्षिप्त करते रहे थे; इनके संगृहीत स्रोत मनुष्य के जीवन में नई तरह की रासायनिक क्रांति लानी शुरू कर देते हैं।
महावीर के संबंध में कहा जाता है कि उनके पसीने से दुर्गंध नहीं आती थी। यह बात कहानी मालूम होगी। लेकिन बहुत अवैज्ञानिक बात नहीं है। यह संभव है। महावीर के शरीर से सुगंध आती रही हो, न आती रही हो; लेकिन आज नहीं कल मनुष्य के शरीर से सुगंध आ सकती है। क्योंकि जहां से भी दुर्गंध आ सकती है, वहां से सुगंध आ सकती है। सब सुगंधें, दुर्गंधों का रूपांतरण हैं--इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। खाद डाल देते हैं बगीचे में और फूल सुगंधों से भर जाते हैं। और आज हजारों तरह की जो सुगंधें बाजार में बिकती हैं, अगर उनके बनाने के कारखाने में जाएं तो पता चलेगा कि सुगंध, दुर्गंध का रूपांतरण है।
अगर शरीर दुर्गंध फेंक सकता है विशेष स्थितियों में, तो कोई कारण नहीं मालूम होता कि विशेष स्थितियों में सुगंध क्यों न फेंक सकेगा! मैं आपको कहता हूं कि यह महावीर की कथा, कथा नहीं है। शरीर ने सुगंध बहुत बार फेंकी है, आज भी फेंक सकता है। अगर चित्त पूरा रूपांतरित हो जाए और शरीर में इकट्ठे ये जो विषाक्त संग्रह हैं, अगर इनका उपयोग बंद हो जाए; और ये बढ़ते चले जाएं और इनका उपयोग बंद हो जाए, तो एक बड़ी मजे की घटना घटती है, क्वांटिटेटिव चेंज टर्न्स इनटु क्वालिटेटिव चेंज। जैसे ही परिमाण का अंतर पड़ता है, वैसे ही गुण का अंतर शुरू हो जाता है। निन्यान्बे डिग्री तक और सौ डिग्री में कोई फर्क नहीं है, सिर्फ मात्रा का फर्क है। लेकिन निन्यान्बे डिग्री तक पानी पानी होता है, सौ डिग्री पर भाप बन जाता है। फर्क क्वांटिटी का है, लेकिन अंततः क्वालिटी का हो जाता है।
सब क्वालिटेटिव चेंज, सब गुणात्मक परिवर्तन मूलतः मात्रा के परिवर्तन हैं। अगर शरीर में ये जो विषाक्त द्रव्य अब तक दुर्गंध फैलाने का काम करते रहे हैं, यदि एक मात्रा से ज्यादा मात्रा में इकट्ठे हो जाएं, तो रूपांतरित हो जाते हैं और शरीर से सुगंध फैलनी शुरू हो जाती है।
अहिंसा की अपनी सुगंध
है; हिंसा की अपनी दुर्गंध है।
प्रेम की अपनी सुगंध है; काम की अपनी दुर्गंध है।
सत्य की अपनी सुगंध है; असत्य की अपनी दुर्गंध है।
इसलिए मैं बायोकेमिकली आदमी को अहिंसक बनाने के पक्ष में नहीं हूं। आध्यात्मिक अर्थों में मनुष्य अहिंसक बने, तो उसकी बायोलॉजी भी और उसकी बाडी केमिस्ट्री भी रूपांतरित होती है और जिनसे सदा दुर्गंध मिली थी, उनसे सुगंध की सौरभ भी फैलनी शुरू हो जाती है।
एक और बात पूछी है:
हमारे पास भी मन है, लेकिन शायद एकवचन में बोलना ठीक नहीं है। कहना चाहिए, हमारे पास मन हैं--है नहीं। हम पॉली साइकिक हैं, यूनी साइकिक नहीं। हमारे पास एक मन नहीं है, हमारे पास बहु-मन हैं। एक-एक आदमी के पास बहुतेरे मन हैं।
साधारणतः हम सोचते हैं, एक ही मन है हमारे पास, गलत सोचते हैं। अभी तो मनोवैज्ञानिक कहते हैं, जुंग कहता है और दूसरे मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य पॉली साइकिक है, बहुचित्तवान है। लेकिन यह जान कर हैरानी होगी कि महावीर ने बहुचित्तता का पहली बार प्रयोग किया था पच्चीस सौ साल पहले। महावीर ने कहा था, मनुष्य बहुचित्तवान है, पॉली साइकिक है।
एक चित्त नहीं है आदमी के भीतर, बहु-चित्त हैं। इसीलिए तो सांझ आप तय करते हैं कि कल क्रोध नहीं करूंगा और कल क्रोध करते हैं। आप सोचते हैं, मैं कैसा हूं? कल मैंने तय किया! और आज फिर क्रोध करते हैं! फिर पछताते हैं, फिर संध्या क्रोध करते हैं!
आदमी रोज नई-नई भूलें नहीं करता, वही-वही भूलें बार-बार करता है, जिनके लिए हजार बार पछता चुका है, पश्चात्ताप कर चुका है। कारण क्या है? असल में, जो चित्त क्रोध करता है और जो चित्त निर्णय करता है, वे दो चित्त हैं। उन्हें एक-दूसरे की खबर भी नहीं मिलती है। उनके बीच कम्यूनिकेशन भी नहीं है।
जब आप तय करते हैं कि अब मैं क्रोध नहीं करूंगा, तो यह चित का एक खंड है जो तय कर रहा है। समझ लें ‘अ’ तय कर रहा है, और कल सुबह जब उठ कर पत्नी पर टूट पड़ते हैं, तो ‘ब’ क्रोध कर रहा है। ‘ब’ के हटते ही ‘अ’ लौट आता है और पश्चात्ताप करता है कि तय किया था कि क्रोध नहीं करेंगे, फिर क्रोध क्यों किया? फिर सांझ को कोई पैर पर जरा जूता लग जाता है किसी का, ‘ब’ सामने आ जाता है और क्रोध फिर प्रकट करता है, ‘अ’ पीछे हट जाता है। जैसे कि साइकिल के चक्के पर स्पोक ऊपर-नीचे घूमते रहते हैं, ऐसा ही प्रतिपल आपके भीतर चित्तों का परिवर्तन होता रहता है। बहु-चित्त हैं आपके घर में।
गुरजिएफ कहा करता था कि मैंने एक ऐसे घर के संबंध में सुना है, जिसका मालिक कहीं दूर यात्रा पर गया था; बहुत बड़ा भवन था, बहुत नौकर थे। वर्षों बीत गए, मालिक की खबर नहीं मिली। मालिक लौटा भी नहीं, संदेश भी नहीं आया। धीरे-धीरे नौकर यह भूल गए कि कोई मालिक था भी। भूलना भी चाहते हैं नौकर कि कोई मालिक है। तो जल्दी भूल गए! फिर कभी कोई यात्री उस महल के बाहर से निकलता तो कोई नौकर सामने मिल जाता, तो उससे पूछता, कौन है इस भवन का मालिक? तो वह कहता, मैं! लेकिन आस-पास के लोग बड़ी मुश्किल में पड़े, क्योंकि कभी कोई द्वार पर मिलता, कभी कोई द्वार पर, बहुत नौकर थे और हरेक कहता कि मैं! जब भी कोई पूछता, कौन है मालिक इस भवन का? तो आदमी कहता, मैं! जो मिल जाता वही कहता, मैं! सारे लोग बड़े चिंतित हुए कि कितने मालिक हैं इस भवन के?
तब सारे गांव के लोग इकट्ठे हुए और उन्होंने पता लगाया, और सारे घर के नौकर इकट्ठे किए, तो वहां कई मालिक थे। तब बड़ी कठिनाई खड़ी हो गई, वे सब नौकर लड़ने लगे। और उन्होंने कहा, मालिक हैं हम! और जब बात बहुत बढ़ी तब किसी एक बूढ़े नौकर ने कहा कि क्षमा करें, हम व्यर्थ विवाद में पड़े हैं। मालिक घर के बाहर गया है। हम सब नौकर हैं। मालिक लौटा नहीं बहुत दिन हो गए, हम भूल गए। और अब कोई जरूरत भी नहीं रही याद रखने की, शायद वह कभी लौटेगा भी नहीं।
फिर मालिक लौट आया। तो उस घर के पच्चीस मालिक तत्काल विदा हो गए--वे तत्काल नौकर हो गए!
गुरजिएफ कहा करता था, यह आदमी के चित्त की कहानी है।
जब तक भीतर की आत्मा जागती नहीं, तब तक चित्त का एक-एक टुकड़ा, एक-एक नौकर कहता है, मैं हूं मालिक! जब क्रोध करने वाला टुकड़ा सामने होता है, तो वह कहता है, मैं हूं मालिक! और वह मालिक बन जाता है कुछ देर के लिए और पूरा शरीर उसके पीछे चलता है। शरीर को कुछ पता नहीं है। वह मालिक के पीछे चलता है। फिर पश्चात्ताप करने वाला आ जाता है और वह कहता है, मैं हूं मालिक! और तब शरीर रोता है। वही शरीर जिसने तलवार उठा ली थी, वही आंसू बहाता है। उसको कुछ पता नहीं, वह किसी भी मालिक का अनुगमन करता है। जो भी जोर से कहता है, आइ एम दि मास्टर--शरीर तत्काल उसके पीछे खड़ा हो जाता है। वही मन कहता है, ब्रह्मचर्य, तो शरीर कहता है, बड़ी पवित्र बात है, तैयार हूं। दूसरा खंड कहता है, भोग, तो कहता है, बिलकुल राजी हूं। मैं तो मालिक के पीछे चलता हूं।
पॉली साइकिक है आदमी। साइकिक संरचना, उसकी जो मनस की संरचना है, वह कई खंडों की है। मन बहुत खंड में बंटा है। और तब तक बंटा रहेगा जब तक अखंड आत्मा बीच में जाग न जाए। हिंसा इन खंडों की आपस की लड़ाई है; इन नौकरों के अपने सबके दावे कि मैं मालिक हूं। अगर आमने-सामने पड़ जाते हैं तो मन बड़े द्वंद्व में पड़ जाता है। मन चौबीस घंटे लड़ता रहता है कि मालिक कौन है? और ये जो मन के लड़ते हुए खंड हैं, इनकी लड़ाई से जो द्वंद्व और जो पीड़ा और दुख पैदा होता है, वही चित्त आदमी दूसरे से भी लड़ कर निपटाता रहता है।
यह बहुत मजे की बात है कि अक्सर हम अपनी लड़ाई को बाहर प्रोजेक्ट करते हैं, प्रक्षेप करते हैं! आपके भीतर एक चोर है, आप उस चोर से लड़ रहे हैं। आप उसको दबाए हुए हैं कि चोरी न करने देंगे। अगर आपके पड़ोस में चोरी हो जाए और चोर पकड़ लिया जाए, तो आप सबसे ज्यादा उस चोर की पिटाई करेंगे। क्योंकि आप अपने भीतर एक चोर को दबाए हुए हैं, जिसकी पिटाई बहुत बार करनी चाही, लेकिन कर नहीं पाए। अब एक चोर बाहर मिल गया है, तो आपका चोर प्रोजेक्ट हो जाएगा, आप पिटाई करेंगे।
चोर की पिटाई के लिए चोर जरूरी है। कोई साधु चोर की पिटाई नहीं कर सकता; क्योंकि प्रोजेक्शन का उपाय नहीं है। इसलिए जितने चोर हैं, वे चोरों के खिलाफ दिन-रात बातचीत करते रहेंगे; जितने बदमाश हैं, वे बदमाशों की निंदा करते रहेंगे; जितने कामातुर हैं, वे काम की निंदा करते रहेंगे। जो भीतर भरा है, हम उसे बाहर प्रोजेक्ट करते हैं।
बर्ट्रेंड रसल ने कहीं कहा है, कि जब कोई आदमी बहुत जोर से चिल्लाए कि वह जा रहा है चोर, पकड़ो, पकड़ो, चोरी हो गई, बहुत बुरा हो गया, तो पहले उस आदमी को पकड़ लेना; क्योंकि यह आदमी आज नहीं कल चोरी करेगा।
हम अक्सर अपनी बीमारियों को, अपने चित्त के रोगों को दूसरे पर आरोपित कर लेते हैं। इसलिए अक्सर ऐसा होता है कि अगर एक आदमी किसी दूसरे आदमी की निंदा करता हो, तो जिसकी निंदा करता है उसके संबंध में बहुत कुछ नहीं बता पाता, अपने संबंध में बहुत कुछ बता देता है। उसकी निंदा खबर देती है कि वह क्या प्रोजेक्ट कर रहा है। उसके भीतर कोई लड़ाई जारी है, जिस लड़ाई को वह किसी पर रोप देता है। अगर भीतर कोई लड़ाई जारी नहीं रही, तो बाहर रोपने का उपाय बंद हो जाता है। बाहर कोई उपाय नहीं है रोपने का।
मनुष्य का चित्त खंडित है। यह उसकी हिंसा का जन्म है। और मनुष्य का चित्त अहिंसक होने लगे, तो अखंड होगा, एक हो जाएगा। और जब चित्त एक हो जाता है, उसमें भिन्न स्वर नहीं रह जाते हैं, तो मनुष्य के जीवन में जो आनंद का नृत्य शुरू होता है, जो आनंद की बांसुरी बजती है, उसी बांसुरी के रास्ते लोग परमात्मा तक पहुंचे हैं। और किसी रास्ते से न पहुंचे हैं, न पहुंच सकते हैं।
हिंसक चित्त खाई-खड्डे खोजता है, नीचे की तरफ बहता है। अहिंसक चित्त वाष्पीभूत हो जाता है, पर्वत-शिखर खोजने लगता है, आकाश की यात्रा शुरू हो जाती है, ऊपर की उड़ान शुरू हो जाती है, सूर्य की यात्रा पर निकल जाता है, मोक्ष और परमात्मा की दिशा में उन्मुख हो जाता है।
हिंसक-चित्त सदा दूसरे को खोजता है; दूसरा ही खाई है, दि अदर इज़ दि एबिस। अहिंसक-चित्त अपने को खोजता है। स्वयं को खोजना ही ऊंचाई है। क्योंकि दूसरे को जब भी हम खोजेंगे, तभी हम नीचे की तरफ चल पड़े। जब भी हम दूसरे को खोजेंगे, तभी हम नीचे की तरफ चल चुके। क्यों? क्यों मैं कहता हूं कि दूसरा ही खाई है, दूसरा ही अधोगमन है, दूसरा ही नरक है? वह दूसरा ही क्यों नीचे की तरफ ले जाने का मार्ग है? क्यों? जब हम दूसरे को खोजते हैं, तो एक बात तो पक्की हो गई कि अपने साथ कोई आनंद नहीं है, स्वयं के साथ कोई आनंद नहीं है।
आदमी जितना दुखी अपने साथ हो जाता है, उतना दुखी अपने दुश्मन के साथ भी नहीं होता। आदमी जितना अपने से ऊब जाता है, उतना, उतना कितना ही बोरिंग आदमी हो, उसके साथ भी नहीं ऊबता है। आदमी अपने साथ बिलकुल राजी नहीं है, इसका अर्थ क्या है? कोई आदमी खुद को कंपेनियन नहीं बनाना चाहता--बड़े मजे की बात है--और जब कोई दूसरा उसे कंपेनियन नहीं बनाना चाहता, तो बड़ा दुखी होता है। हालांकि वह खुद रिजेक्ट कर चुका है अपने को! वह खुद कह चुका है कि अपने से दोस्ती नहीं चलेगी! आप घंटे भर भी अपने साथ अकेले में बैठने को राजी नहीं होते। अगर दिन भर अकेले में बैठना पड़े, तो घबड़ा जाते हैं कि आत्महत्या कर लेंगे, क्या कर लेंगे। अगर वर्ष भर अकेला रहना पड़े तो जी सकेंगे?
अपने साथ जीना बड़ा कठिन है। क्योंकि अपने साथ केवल वही जी सकता है, जो भीतर आनंद को उपलब्ध है। दूसरे के साथ जीने की आकांक्षा उसी की है, जो भीतर दुख से भरा है। और मैंने कहा कि हिंसा अंतर-दुख है, इसलिए हिंसक चित्त सदा दूसरे को खोजता है--कभी मित्र के नाम से खोजता है, कभी शत्रु के नाम से खोजता है; लेकिन दूसरे को खोजता है। और इसमें भी बहुत देर नहीं लगती कि जो मित्र था वह शत्रु बन जाता है और जो शत्रु था वह मित्र बन जाता है। असल में, किसी को शत्रु बनाना हो तो उसे भी पहले मित्र तो बनाना ही पड़ता है। मित्र बनाए बिना तो शत्रु बनाना बहुत मुश्किल है--सिर्फ संबंधियों को छोड़ कर। क्योंकि संबंधी पहले से ही शत्रु होते हैं! बाकी तो किसी को भी शत्रु बनाना हो, तो उसे पहले मित्र बनाना पड़ता है।
आदमी दूसरे को खोज रहा है, क्योंकि अपने से बचना चाहता है। इसलिए कहता हूं, दूसरा खाई है। जो अपने से बचना चाहता है, वह किसी ऊंची यात्रा पर नहीं निकल सकेगा; क्योंकि जो अपने तक ही पहुंचने को राजी नहीं है, वह किस परमात्मा तक पहुंचने की हिम्मत जुटा सकता है? जो अपने ही शिखर छूने को राजी नहीं है, वह किस अस्तित्व के ऊंचे शिखरों की यात्रा पर निकल सकता है? इसलिए हम दूसरे को खोज रहे हैं। और जब भी हम दूसरे को खोज रहे हैं, तब हमसे हिंसा होगी ही।
एक तो उस आदमी का भी साथ है जो अपने साथ जीता है। वह भी दूसरों के साथ जी सकता है, लेकिन दूसरों की उसे जरूरत नहीं है, दूसरे उसकी नेसेसिटी नहीं हैं, दूसरे उसकी अनिवार्यता नहीं हैं। दूसरे उसके पास हो सकते हैं, उसके आनंद में भागीदार बन सकते हैं, लेकिन वह दूसरों के ऊपर निर्भर नहीं है। वह कोई डिपेंडेंस नहीं है। दूसरे नहीं होंगे, तो भी वह इतने ही आनंद में होगा।
अगर बुद्ध के पास कोई भी न जाए, तो बुद्ध के आनंद में कोई अंतर नहीं पड़ेगा। बुद्ध के पास लाखों लोग जाएं, तो भी कोई अंतर नहीं पड़ेगा। लेकिन हमारे पास एक आदमी एक दिन मुंह फेर ले और न आए, तो बस एकदम हम नरक में उतर जाते हैं। जिस आदमी की इतनी निर्भरता दूसरे पर हो, वह दूसरे के लिए जंजीरें बनाएगा--कहीं दूसरा फिर न जाए, मुड़ न जाए। वह दूसरे को बांधेगा। वह दूसरे के पैरों में बेड़ियां डालेगा--कभी पत्नी बनाएगा; कभी पति बनाएगा; कभी बेटा बनाएगा; कभी बाप बनाएगा, हजार तरह की बेड़ियों में दूसरे को कसेगा। और जब भी कोई किसी को, दूसरे को बेड़ियों में कसेगा, तो हिंसा शुरू हो जाएगी। क्योंकि स्वतंत्र करती है अहिंसा; परतंत्र करती है हिंसा, दूसरे को गुलाम बनाती है।
गुलामियां बहुत तरह की हैं। मीठी गुलामियां भी हैं, जो कि कड़वी गुलामियों से सदा बदतर होती हैं। क्योंकि कड़वी गुलामियों में एक ऑनेस्टी, एक सिंसियरिटी होती है, साफपन होता है! मीठी गुलामियां बड़ी खतरनाक होती हैं, शुगर-कोटेड होती हैं; भीतर जहर ही होता है, ऊपर से शक्कर चढ़ी होती है। हमने हमारे सारे संबंधों में शक्कर चढ़ाई है, भीतर जहर है। जरा सी पर्त हटती है और जहर निकलता है। फिर लीप-पोत कर, पर्त को ठीक करके किसी तरह काम चलाते रहते हैं।
लेकिन हमारा यह दूसरे को खोजना एक बात का पक्का सबूत है कि हम अपने साथ होने के आनंद को नहीं पा रहे हैं। फिर हिंसा शुरू होगी। और जब हम दूसरे को खोजते हैं कि उसके बिना जी न सकेंगे। जिसके बिना हम जी न सकेंगे, उसे हम गुलाम बनाएंगे ही, उसे हम पजेस करेंगे ही, उसकी हम मालकियत करेंगे ही, हम उसके मालिक बनेंगे ही। और जिसके भी हम मालिक बनेंगे, उसको हम मिटाएंगे, उसे हम नष्ट करेंगे। यह मालकियत किसी भी तरह की हो, सब तरह की मालकियत मिटाती है और नष्ट करती है। मालकियत बहुत सटल वायलेंस है, मालकियत बहुत सटल मर्डर है। मालकियत जो है, वह हत्या है किसी की, बहुत धीमे-धीमे। सिकंदर भी गुलाम बना कर मारता है, हिटलर भी गुलाम बना कर मारता है। धर्मगुरु भी किसी को गुलाम बना कर मार डाल सकता है। सब तरह की गुलामियां हैं।
जब भी हम दूसरे को जकड़ लेते हैं, और उसकी गर्दन को पकड़ लेते हैं, और उस पर निर्भर हो जाते हैं, तभी हम उसकी गर्दन में पत्थर की तरह लटक जाते हैं। और यह लटकना नीचे की यात्रा है। इस यात्रा का कोई अंत नहीं है। यह फैलती जाएगी। एक से मन न भरेगा, दूसरा चाहिए, तीसरा चाहिए, हजार चाहिए। राजनीतिज्ञ को लाखों-करोड़ों चाहिए। जब तक वह राष्ट्रपति बन कर सारे मुल्क की गर्दन में न लटक जाए, तब तक उसको तृप्ति नहीं मिल सकती। सबकी गर्दन में उसको लटक जाना चाहिए। सबके लिए वह पत्थर हो जाए बोझीला।
यह जो हमारा चित्त है, जो दूसरे को खोजता है, यह चित्त नीचे की तरफ जा रहा है। इसकी हिंसा बढ़ती चली जाएगी। यह अनेक रूप लेगा। इसके हजार चेहरे होंगे, हजार विधियां होंगी। लेकिन यह दूसरे को दबाएगा, सताएगा, टॉर्चर करेगा।
टॉर्चर करने बड़े अच्छे ढंग हो सकते हैं। बाप अपने बेटे को टॉर्चर कर सकता है, बेटा बाप को कर सकता है; मां अपने बेटे को कर सकती है, बेटा मां को कर सकता है। और मनस-शास्त्री कहते हैं कि आदमियत करती रही है; करती रही है आदमियत, एक-दूसरे को सताती रही है। लेकिन यह हमें खयाल में नहीं आता।
यह तब तक जारी रहेगा, जब तक कि कोई आदमी अपने साथ आनंदित नहीं है, जब तक कोई आदमी अपने साथ होने को राजी नहीं है। जैसे ही कोई आदमी अपने साथ होने को राजी हुआ, उसकी यात्रा दूसरे से हट कर, बाहर से हट कर... क्योंकि दूसरा सदा बाहर है, दि अदर इ़ज आलवेज दि आउटर, दि अदर इ़ज आलवेज दि विदाउट। वह तो बाहर होगा ही। जब तक दूसरे की तरफ खोज जारी रहेगी--वह चाहे पत्नी की हो, चाहे प्रेमिका की, चाहे प्रेमी की और चाहे परमात्मा की--अगर परमात्मा को कोई दूसरे की तरह देख रहा है, तो उसमें हिंसा जारी रहेगी; उसमें हिंसा से मुक्ति नहीं हो सकती।
इसलिए महावीर ने बाहर के परमात्मा को इनकार कर दिया; क्योंकि महावीर को लगा: गॉड इ़ज दि अदर, तो हिंसा का रास्ता बन जाएगा। यह बहुत कम लोग समझ पाए महावीर की इस बात को कि वे ईश्वर को क्यों इनकार कर रहे हैं। नासमझों ने समझा कि शायद नास्तिक हैं। नासमझों ने समझा कि शायद ईश्वर नहीं है, इसलिए।
महावीर ने कहा, कोई परमात्मा नहीं है सिवाय तुम्हारे। और उसका कुल कारण इतना है कि अगर कोई भी परमात्मा है--दूसरे की तरह, तो वह जो हिंसक-चित्त है, वह उस परमात्मा को भी बाहर जाने का और नीचे जाने का रास्ता बना लेगा। महावीर ने कहा, बाहर कोई परमात्मा ही नहीं है। चलो अपनी तरफ, भीतर। वह आत्मा ही परमात्मा है। और जैसे ही कोई भीतर गया, वैसे ही ऊंचाइयों के शिखर शुरू हुए।
भीतर बड़ी ऊंचाइयां हैं, बाहर बड़ी नीचाइयां हैं। भीतर बड़े गौरीशंकर के शिखर हैं, बाहर बड़े प्रशांत महासागर की गहराइयां हैं। बाहर कोई उतरता जाए, तो अतल गहराइयों में गिरता जाएगा, जहां अंधकार होगा, जहां दुख होगा, जहां मृत्यु होगी, जहां पीड़ा होगी, जहां नरक होगा। और कोई भीतर की तरफ बढ़े, स्वयं की तरफ, तो बड़ी ऊंचाइयां होंगी; कैलाश के शिखर होंगे; स्वर्ण-मंदिरों के शिखर होंगे; मुक्ति होगी, मोक्ष होगा, स्वर्ग होगा! वह भीतर की यात्रा है।
जीवन-ऊर्जा जब हिंसा बनती है, तो पतित होती है। और जीवन-ऊर्जा जब अहिंसा बनती है, तो ऊर्ध्वगमन करती है। वह लाइफ-एनर्जी तो एक ही है, जीवन-ऊर्जा तो वही है। कभी बाहर की तरफ जाती है, तो दुख देती है और दुख लाती है; और कभी भीतर की तरफ जाती है, तो सुख देती है और सुख लाती है।
किन्हीं भी क्षणों में, जब भी कभी आपने आनंद को जाना हो, तब आपने पाया होगा, आप एकदम अकेले हैं। किन्हीं भी क्षणों में, जब आनंद की पुलक आप में फैली हो, तब आपने पाया होगा, आप अपने भीतर हैं। किन्हीं भी क्षणों में, जब आनंद की वर्षा की एक बूंद भी आपके भीतर उस अमृत की टपकी हो, तब आपने पाया होगा, कोई नहीं, मैं ही हूं। और सब दुख सदा दूसरे से बंधे हुए पाए होंगे। सब दुख किसी दूसरे से बंधे हुए पाए होंगे। और सब सुख सदा स्वयं...।
हां, ऐसे सुख हैं, जो दूसरे से मिलते हुए मालूम पड़ते हैं, मिलते कभी भी नहीं। ऐसे सुख हैं, जो वहम देते हैं कि दूसरे से मिलेंगे, लेकिन जब मिलते हैं और हाथ मुट्ठी खुलती है, तो पता चलता है कि खोजा था सुख, पाया है दुख। ऐसे सुख हैं, जो बुलाते हैं दूसरे की तरफ से कि आओ, मैं यहां हूं, और जब हम पास पहुंचते हैं, तो पाया जाता है कि बुलाहट सुख की थी, लेकिन धोखा हो गया। जैसे राम स्वर्ण-मृग के पीछे चले गए। और सभी जानते हैं कि स्वर्ण-मृग होते नहीं। कम से कम राम को तो जानना ही चाहिए--स्वर्ण-मृग कहीं होते नहीं!
लेकिन वह कथा मीठी है। कथा अर्थपूर्ण है। हम सभी स्वर्ण-मृग के पीछे चले जाते हैं! सब जानते हैं कि नहीं होते और चले जाते हैं! राम चले गए हैं स्वर्ण-मृग को खोजने को! कौन होगा पागल, जो राजी होगा कि सोने का और हिरण होगा! होगा कैसे? लेकिन राम भी चले जाते हैं! हमारे भीतर का राम भी चला जाता है! और तब अगर आखिर में हम पाते हैं कि कुछ मिलता नहीं! क्योंकि स्वर्ण-मृग के पीछे जाकर कुछ मिल सकता है?
सुख स्वर्ण-मृग है। जब दूसरे से मिलता हुआ मालूम पड़े, तो समझना कि राम चले अब स्वर्ण-मृग को खोजने, और अब सीता की चोरी होकर रहेगी। और जब आप दूसरे के पीछे खोजने चले जाते हैं, तो आपके भीतर की जो अंतरात्मा है--कहिए उसे सीता--उसकी चोरी हो जाती है। हो जाते हैं पतित। फिर लंबा युद्ध है। फिर रावण से संघर्ष है। फिर हत्याएं हैं, फिर खून है। वह एक स्वर्ण-मृग के पीछे जाने से राम की पूरे उपद्रव और हिंसा की दुनिया शुरू हुई। एक स्वर्ण-मृग से यात्रा शुरू हुई उपद्रव की, और फिर जब तक कि पूरी हिंसा नहीं हो गई तब तक वह चली। मेरी दृष्टि में यह एक प्रतीक कथा है, एक पैरेबल है।
हम भी, जब दूसरे में सुख देख कर भागते हैं, तब हम चले स्वर्ण-मृग के पीछे। तब पतन होगा ऊर्जा का। पतन हो गया उसी क्षण, जब हमने माना कि स्वर्ण के मृग होते हैं। पतन हो गया उसी क्षण, जब हमने माना कि दूसरा सुख दे सकेगा। पतन हो गया उसी क्षण, जब हमने माना कि बाहर सुख हो सकता है। और जिंदगी भर का अनुभव है कि बाहर सिवाय दुख के कभी कुछ मिला नहीं। दूसरे से सिवाय दुख के सुख कब पाया है? हां, खयाल में रहा है कि मिलेगा, मिलेगा, मिलेगा; मिला कभी नहीं है। वह सदा भविष्य में लगता है कि मिलेगा। अतीत में लौट कर देखें, कब मिला है? किसने किस दूसरे से सुख पाया है? सच तो यह है कि जिससे जितना सोचा था ज्यादा सुख मिलेगा, उससे उतना ज्यादा दुख मिला।
इसलिए मां-बाप जिस लड़के का विवाह कर देते हैं, वह पत्नी से उतना दुख नहीं पाता, जितना वह लड़का पा लेता है जो प्रेम-विवाह करता है। प्रेम-विवाह के चट्टान से टकराने की संभावना ज्यादा हो गई, क्योंकि सुख की आकांक्षा ज्यादा हो गई। पोथी-पत्री देख कर जिसका विवाह किया गया, उसने कभी सुख की बहुत आकांक्षा ही अभी नहीं बांधी है, इसलिए नाव टकराने के उपाय जरा कम हैं। दुख तो मिलेगा, उसी मात्रा में मिलेगा, जितना पोथी-पत्री से, जन्म-कुंडली देखने से सुख की आशा बंधती होगी, उतना ही मिलेगा। उतना ही दुख मिलता है जीवन में, जितनी सुख की आशा हम बांधते हैं। ज्यादा सुख की आशा बांधने वाले ज्यादा दुख में भर जाते हैं। जो सुख की आशा नहीं बांधता, उसे दुख देने का उपाय नहीं है।
जीवन-ऊर्जा जब दूसरे की तरफ बहती है, तो हिंसक है। और दुख की तरफ बहती है, और नरक की तरफ बहती है। हम सब अपने-अपने नरक खोज रहे हैं। कुछ लोग कभी-कभी पीछे लौट कर स्वर्ग खोज लेते हैं। जीवन-ऊर्जा जब पीछे, अंदर की तरफ यात्रा करती है, तो ऊर्ध्वगामी है। वह एक ही ऊर्जा है।
जगत में शक्तियां भिन्न नहीं हैं, सिर्फ दिशाएं भिन्न हैं। जगत में शक्तियां अलग-अलग नहीं हैं, सिर्फ ऊर्ध्वगमन और अधोगमन के फासले हैं। नीचे उतर रहे हैं मंदिर की सीढ़ियों से, या ऊपर चढ़ रहे हैं मंदिर की सीढ़ियों से? और यह भी हो सकता है कि एक ही सीढ़ी पर आप खड़े हैं और आपका चेहरा नीचे की तरफ है; और दूसरा आपका मित्र भी खड़ा है उसी सीढ़ी पर और चेहरा ऊपर की तरफ है। तो उसी एक ही सीढ़ी पर स्वर्ग और नरक दोनों घटित हो जाएंगे। आपका पड़ोसी, जिसका चेहरा ऊपर की तरफ है, उसी सीढ़ी पर स्वर्ग में होगा। और आपका चेहरा, जिसका नीचे की तरफ है, उसी सीढ़ी पर, दि सेम स्टेप, आप नरक में होंगे।
इसलिए ऐसा कोई नरक और स्वर्ग भौगोलिक अवस्थाएं नहीं हैं, चित्त के रुख किस तरफ देख रहे हैं, इस पर सब निर्भर करता है। किस तरफ देख रहे हैं, इस पर सब निर्भर करता है!
हिंसा अधोगमन है जीवन-ऊर्जा का, अहिंसा ऊर्ध्वगमन है।
धूल-कण हैं, जो पशु की यात्रा पर, मनुष्य की आत्मा पर चिपक गए हैं, जुड़ गए हैं; स्वभाव नहीं है। पशु के लिए स्वभाव है, क्योंकि पशु के लिए कोई चुनाव ही नहीं है। मनुष्य के लिए स्वभाव नहीं है, क्योंकि मनुष्य के लिए चुनाव है।
असल में, मनुष्यता शुरू होती है च्वाइस से, चुनाव से। मनुष्य शुरू होता है निर्णय से, डिसीजन से। मनुष्य शुरू होता है संकल्प से। मनुष्य चौराहे पर खड़ा है, कोई पशु चौराहे पर नहीं खड़ा है। सब पशु वन डाइमेन्शनल रास्ते पर होते हैं; एक ही रास्ता होता है, जिसमें कोई चुनाव नहीं है। मनुष्य चौराहे पर खड़ा है। मनुष्य चाहे तो हिंसक हो सकता है, चाहे तो अहिंसक हो सकता है। यह स्वतंत्रता है उसकी। पशु की यह स्वतंत्रता नहीं है। पशु की यह मजबूरी है कि वह जो हो सकता है, वही है
यह भी समझने जैसा मजा है, पशु वही है, जो हो सकता है। इसलिए पशु के स्वभाव में और पशु के तथ्य में कोई फर्क नहीं होता। पशु के भविष्य में और पशु के अतीत में कोई डिस्टेंस, कोई फासला नहीं होता। पशु के होने में और हो सकने की संभावना में, कोई फर्क नहीं होता। पशु जो हो सकता है, वह है। दैट व्हिच इज़ पॉसिबल, इज़ एक्चुअल। पशु की एक्चुअलिटी और पॉसिबिलिटी में कोई फर्क नहीं है। आदमी, आदमी का मामला एकदम बदल गया। आदमी जो है, उससे भिन्न हो सकता है। आदमी की एक्चुअलिटी, उसकी पॉसिबिलिटी नहीं है। जो आदमी वास्तविक आज है, कल उससे और कुछ हो सकता है।
इसलिए किसी कुत्ते से हम नहीं कह सकते कि तुम कुछ कम कुत्ते हो; लेकिन आदमी से कह सकते हैं कि तुम कुछ कम आदमी मालूम पड़ते हो। किसी कुत्ते से हम कहेंगे कि तुम कुछ कम कुत्ते हो, तो बिलकुल एब्सर्ड स्टेटमेंट होगा। इसका कोई मतलब नहीं होगा। सब कुत्ते बराबर कुत्ते होते हैं। कमजोर हो सकते हैं, ताकतवर हो सकते हैं--कुत्तेपन में कोई फर्क नहीं होगा। बीमार हो सकते हैं, स्वस्थ हो सकते हैं--कुत्तेपन में कोई फर्क नहीं होगा।
लेकिन आदमियत की मात्राओं में फर्क है। किसी कृष्ण को हम नहीं कह सकते कि तुममें और हिटलर में आदमियत का कोई फर्क नहीं है। किसी बुद्ध को हम नहीं कह सकते कि तुममें और रावण में आदमियत का कोई फर्क नहीं है।
नहीं, किसी से कहना पड़ता है कि आदमियत बहुत कम मालूम पड़ती है। किसी से कहना पड़ता है, आदमियत इतनी ज्यादा है कि ‘भगवान’ शब्द खोजना पड़ता है। जिन-जिन के लिए हमने भगवान शब्द खोजा, उसका कुल मतलब इतना है कि आदमियत इतनी ज्यादा थी कि आदमी कहना काफी नहीं मालूम पड़ा, ना काफी मालूम पड़ा।
आदमी जो है, वही सब-कुछ नहीं है, बहुत-कुछ हो सकता है। आदमी जो है, उसमें उसका अतीत, पशु की यात्रा जुड़ी है, वह उसकी हिंसा है। आदमी जो हो सकता है, वह उसकी अहिंसा है। आदमी का स्वभाव वह है, जो वह अपनी पूर्णता में प्रकट हो, तब होगा। आदमी का तथ्य वह है, जो उसने अपनी यात्रा में अब तक अर्जित किया है।
इसलिए मैं कहता हूं, हिंसा अर्जित है, अहिंसा स्वभाव है। इसलिए हिंसा छोड़ी जा सकती है; अहिंसा सिर्फ पाई जा सकती है, छोड़ी नहीं जा सकती। यह फर्क भी समझ लेना जरूरी है। हिंसा छोड़ी जा सकती है, अहिंसा पाई जा सकती है। और अहिंसा अगर पा ली जाए, तो छोड़ना असंभव है। और आदमी कितना ही हिंसक हो जाए, छोड़ना सदा संभव है; क्योंकि वह स्वभाव नहीं है।
प्रत्येक पापी का भविष्य है; और प्रत्येक पापी का भविष्य एक संत का भविष्य है। प्रत्येक पापी का भविष्य एक संत का भविष्य है! हम प्रत्येक पापी से सार्थक रूप से कह सकते हैं कि तुम भविष्य के संत हो। प्रत्येक संत का एक अतीत है; और प्रत्येक संत का अतीत पापी का अतीत है। और हम प्रत्येक संत से सार्थक रूप से कह सकते हैं कि तुम अतीत के पापी हो। लेकिन संत का फिर आगे कोई भविष्य नहीं है।
संत का अर्थ है, जो पूर्ण स्वभाव को उपलब्ध हो गया; जो वही हो गया है, जो हो सकता था। फूल पूरा खिल गया। कली का भविष्य है। कली चाहे तो कली भी रह सकती है और चाहे तो फूल भी बन सकती है। लेकिन फूल फिर लौट कर कली नहीं बन सकता। चाहे, तो भी। फूल फिर फूल हो गया। तो जब हम कली से कहते हैं कि फूल होना तेरा स्वभाव है, तो उसका यह मतलब नहीं है कि तथ्य, हम फैक्ट की बात कह रहे हैं; हम संभावना की, पोटेंशियलिटी की बात कह रहे हैं। हम कली से कहते हैं कि तेरा फूल होना स्वभाव है; अर्थात तू फूल होना चाहे तो हो सकती है।
लेकिन अगर कोई कली, कली ही बनी रहे, और वह कहे, तथ्य तो यही है कि मैं कली हूं। तो मैं कली ही रहूंगी; क्योंकि कली होना मेरा स्वभाव है, क्योंकि मैं कली हूं! आदमी अगर कहे कि हिंसा मेरा स्वभाव है, तो वह ऐसी ही बात कह रहा है, जैसी यह भ्रांत कली कह रही है।
आदमी का स्वभाव नहीं है हिंसा, उसके अतीत का अर्जन है, उसके अतीत के संस्कार हैं। हिंसा आदमी की कंडीशनिंग है, जो कि पशु से निकलते वक्त अनिवार्य थी। जैसे कि कोई काजल की कोठरी से निकले और काजल उसके शरीर पर लग जाए, उसके कपड़ों पर लग जाए, जो कि अनिवार्य था। पशु क्षम्य है। अनिवार्य है हिंसा उसके जीवन में होनी। आदमी क्षमा नहीं किया जा सकता। हिंसा अब उसकी पसंद है, अब अनिवार्य नहीं। अब वह चुन रहा है, इसलिए हिंसा है।
अगर कली जिद कर ले कली रहने की, तो रह सकती है। लेकिन, लेकिन यह उसकी अनिवार्यता नहीं; यह उसकी नियति, उसकी डेस्टिनी नहीं है। यह उसका अपना ही भ्रांत निर्णय है। और तब इसकी जिम्मेवार वह स्वयं ही होगी। और किसी परमात्मा के समक्ष पहुंच कर वह यह न कह सकेगी कि मुझे कली ही क्यों रखा? क्योंकि कली के भीतर फूल होने की संभावना परमात्मा ने पूरी दे दी थी। वह फूल हो सकती थी। कली होने की जिम्मेवारी हमारी होगी।
हिंसा, पशु के लिए अनिवार्यता, हमारे लिए जिम्मेवारी है; पशु के लिए तथ्य, हमारे लिए सिर्फ ऐतिहासिक याददाश्त है; पशु का वर्तमान, हमारा अतीत है। चुनाव सामने है। आदमी अहिंसक होने का निर्णय भी ले सकता है और हिंसक होने का भी निर्णय ले सकता है।
इसलिए जब कोई आदमी हिंसक होने का निर्णय लेता है, तो कोई पशु उसका मुकाबला नहीं कर सकता। असल में, कोई पशु इतना हिंसक नहीं हो सकता, जितना आदमी हो सकता है। क्योंकि पशु सहज ही हिंसक है; और आदमी हिंसक आयोजना से होता है। इसलिए हम चंगीज खां, और तैमूर, और नादिर, और हिटलर, और माओ, और स्टैलिन जैसे हिंसक पशुओं में नहीं खोज कर ला सकते। स्टैलिन के पैरेलल, या चंगीज के समानांतर, अगर हम पशुओं के इतिहास से पूछें कि कोई एकाध पशु हुआ, जो हमारे चंगीज खां के मुकाबले हो? तो पशु कहेंगे, हम बहुत दरिद्र हैं। इस मामले में हमारे पास कोई याददाश्त नहीं है।
एक बड़े मजे की बात है कि कोई भी जानवर सजातीय के प्रति हिंसक नहीं होता, सिवाय आदमी को छोड़ कर! कोई जानवर अपनी जाति के जानवर को नहीं मारता, हिंसा नहीं करता। इतनी पहचान पशु की हिंसा में भी है। सिर्फ आदमी अकेला जानवर है, जो आदमी को मारता है।
यह भी बड़े मजे की बात है कि हिंदुस्तानी भेड़िए को भी अगर पाकिस्तानी भेड़िए के पास छोड़ दिया जाए, तो नहीं मारेगा। लेकिन हिंदुस्तानी आदमी को पाकिस्तानी आदमी के पास छोड़ना जोखिम से भरा काम है!
भाषाशास्त्री कहते हैं कि शायद भाषा ने गड़बड़ की है। हो सकता है। जो लिंगविस्ट हैं, उनका बड़ा खयाल सही मालूम होता है। वे यह कहते हैं, चूंकि दोनों भेड़िए भाषा नहीं बोलते--न पाकिस्तानी भेड़िया उर्दू बोलता है, न हिंदुस्तानी भेड़िया हिंदी बोलता है--इसलिए दोनों पहचान नहीं पाते कि फॉरेनर हैं! और कोई कारण नहीं। लेकिन आदमी एक जिले से दूसरे जिले में फॉरेनर हो जाता है। गुजराती मराठी के लिए फॉरेनर है। हिंदी बोलने वाला तमिल बोलने वाले के लिए फॉरेनर है। अगर यही सच है, जो भाषाशास्त्री कहते हैं--और मुझे लगता है इसमें सच्चाई है--तो क्या ऐसा न करना पड़े किसी दिन कि आदमी को मौन हो जाना पड़े, तभी आदमी हो सके। शायद मौन हुए बिना इस पृथ्वी पर आदमियत पैदा होना कठिन हो।
लेकिन यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है, कोई पशु अपनी जाति के पशु पर हमला न करे, आदमी करे! और कोई पशु अकारण कभी नहीं मारता--यह भी मजे की बात है--सिर्फ आदमी को छोड़ कर। अकारण नहीं मारता। अगर कभी मारता भी है, तो उसकी जरूरत होती है। भूख होती है, तो मारता है। रक्षा करनी होती है, तो मारता है। आदमी बेजरूरत मारता है! कोई जरूरत नहीं होती है, तब भी मारता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि मारना होता है, इसलिए जरूरत पैदा करता है! बिना मारे नहीं रह सकता, तो जरूरत पैदा कर लेता है। कभी वियतनाम में जरूरत पैदा करता है, कभी कोरिया में जरूरत पैदा करता है, कभी कश्मीर में जरूरत पैदा करता है।
कोई जरूरी बात नहीं है। न कोई कश्मीर में, न किसी वियतनाम में, न किसी कंबोडिया में। कहीं कोई जरूरत नहीं है। लेकिन आदमी जरूरत पैदा करता है, क्योंकि बिना जरूरत मारेगा, तो जरा ठीक न लगेगा!
आदमी रेशनल है सिर्फ एक अर्थों में कि वह अपनी बेवकूफियों को भी रेशनलाइज करता है, और किसी अर्थ में रेशनल नहीं है। अरस्तू ने जरूर कहा था कि आदमी एक बुद्धिमान प्राणी है, लेकिन आदमी का अब तक का इतिहास सिद्ध नहीं करता। अरस्तू को इतिहास ने गलत सिद्ध किया है। आदमी सिर्फ बुद्धिमानी एक बात में दिखाता है कि अपनी बेवकूफियों को बुद्धिमानी सिद्ध करने की कोशिश करता है। मारता है, तो भी रेशनलाइज कर लेता है। वह कहता है, मारना ही पड़ेगा, क्योंकि यह मुसलमान है! मारना ही पड़ेगा, क्योंकि यह हिंदू है! मारना ही पड़ेगा, यह हिंदुस्तानी नहीं, पाकिस्तानी है! जैसे कि किसी का पाकिस्तानी होना मरने के लिए काफी कारण है! काफी, काफी हो गई बात कि एक आदमी मुसलमान है, मारो! आदमी कारण खोजता है कि मारना पड़ेगा। यह आदमी पूंजीपति है, मारना पड़ेगा; यह आदमी कम्युनिस्ट है, मारना पड़ेगा! पुराने कारण जरा पिट जाते हैं, बासे हो जाते हैं, तो नये कारण खोजता चला जाता है। नये कारण ईजाद कर लेता है कि अब चलो, पुराना कारण बेकार हुआ, वह खेल बंद करो, नया खेल खेलो! अभी तक बहुत मारे हिंदू-मुसलमान, चलो अब हिंदू-जैन में हो जाए! हिंदू-जैन का न चले तो चलो गरीब-अमीर में हो जाए। आदमी मारना चाहता है, तो कारण खोज लेता है। पशु बिना कारण कभी नहीं मारते।
मैं यह कह रहा हूं कि अगर हम आदमी की हिंसा को समझें, तो हम पाएंगे कि अगर आदमी हिंसक होता है, तो यह उसका चुनाव है। और इसलिए आदमी इतना हिंसक हो सकता है, जितना कोई पशु नहीं हो सकता। क्योंकि पशु का हिंसक होना सिर्फ स्वभाव है--वह उसका चुनाव नहीं है--इसलिए नादिरशाह उसमें पैदा नहीं हो सकता। इसलिए उसमें महावीर भी पैदा नहीं हो सकते। क्योंकि अहिंसा का भी उसे कोई चुनाव नहीं है। आदमी को अहिंसा का भी चुनाव है।
हमने अगर नादिरशाह और स्टैलिन और माओ की खाइयां देखी हैं, तो हमने महावीर, कृष्ण और क्राइस्ट की ऊंचाइयां भी देखी हैं। वे दोनों हमारी संभावनाएं हैं। खाइयां, हमारे अतीत का स्मरण है; ऊंचाइयां, हमारे भविष्य की आकांक्षाएं हैं।
शेष और प्रश्न होंगे तो कल।
मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उससे बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Is violence a nature-given fact or a man-made concept?
According to Osho, violence is a fact of nature at the animal level, but for humans it is acquired—like dust from our evolutionary past—not our true nature. Humanity begins with choice: we can drop violence and grow into nonviolence, which is our essential potential. Violence is optional and discardable; nonviolence is attainable and, once realized, inseparable from our fulfilled humanity.
In simple terms: Violence is like road dust from our animal past, but as humans we can choose to brush it off and be gentle.
How does the condition of life-energy differ in states of violence and nonviolence?
According to Osho, life-energy in violence condenses and rushes downward like water seeking pits—driven by inner sorrow, dependence, and obsession with 'the other,' it enslaves and harms. In nonviolence, the same energy vaporizes and ascends—self-rooted, joyous, and independent, it seeks inner heights, liberates oneself and others, and orients the being toward freedom and the divine.
In simple terms: Violence makes your energy heavy and needy, pulling you down; nonviolence makes it light and happy by itself, lifting you up.
What does it mean to call violence a disease from the standpoint of psychic anatomy?
According to Osho, calling violence a disease in psychic anatomy means the mind has fractured into competing parts; no unified, aware center governs, so shifting fragments seize control—now anger, then repentance—without communication. Violence is this disintegration. Nonviolence is mental health: reintegration of the many minds under the awakened inner master, restoring wholeness and coherence.
In simple terms: Violence happens when your inside is split into many bosses fighting; healing is when the real boss—awareness—returns and unites them.
