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Questions in this Discourse
ओशो, यह श्लोक मुंडकोपनिषद का है: सत्यं एव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्ति ऋषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्र सत्सस्य परमं निधानम्।। अर्थात सत्य की जय होती है, असत्य की नहीं। जिस मार्ग से आप्तकाम ऋषिगण जाते हैं और जहां उस सत्य का परम निधान है, ऐसा देवों का वह मार्ग हमारे लिए सत्य के द्वारा ही खुलता है। क्या सत्य साध्य और साधन दोनों है? हमें दिशा-बोध देने की अनुकंपा करें!
राजनीति का जगत अर्थात बहिर्यात्रा। वहां बेईमानी जीतती है, असत्य जीतता है, पाखंड जीतता है, चालबाजी जीतती है, कपट जीतता है। और फिर जो जीतता है, वह सत्य मालूम होता है। वहां सरलता हारती है। वहां सत्य पराजित होता है। वहां ईमानदारी की कोई गति नहीं है। वहां सीधा, साफ-सुथरा होना हारने के लिए पर्याप्त कारण है। वहां धोखेबाज, उनकी गति है।
यह सूत्र अंतर्यात्रा का सूत्र है। लेकिन राजनीतिज्ञ भी इसका उपयोग करते हैं। भारत ने तो अपना राष्ट्रीय घोषणापत्र ही इस सूत्र को बना लिया है: सत्यमेव जयते। सत्य की सदा विजय होती है। मगर जिसके पास भी आंखें हैं, वह देख सकता है। क्या तुम सोचते हो स्टैलिन सत्य था, इसलिए हिटलर से जीत गया? दोनों एक-दूसरे से बढ़ कर असत्य थे। हिटलर इसलिए नहीं हारा कि असत्य था और चर्चिल, रूजवेल्ट और स्टैलिन इसलिए नहीं जीते कि सत्य थे। इसलिए जीते कि ये सारे असत्य इकट्ठे हो गए थे एक असत्य के खिलाफ। एक असत्य कमजोर पड़ गया इन सारे असत्यों के मुकाबले। असत्य ही जीता।
एडोल्फ हिटलर जीत सकता था। तो सारा इतिहास और ढंग से लिखा जाता यही इतिहासविद जो अभी उसकी निंदा में लिख रहे हैं, उसकी प्रशंसा में लिखते।
इतिहास तुम्हारा सरासर झूठ है। इतिहास का कोई संबंध तथ्यों से नहीं है। इतिहास का संबंध है लिखने वालों से। और लिखने वाले उसकी खुशामद में लिखते हैं जो जीता है। हारे को तो पूछता कौन? डूबते सूरज को तो कौन नमस्कार करता है? ऊगते सूर्यों को नमस्कार किया जाता है। अंग्रेजों ने एक ढंग का इतिहास लिखा था और जब हिंदुओं ने इतिहास लिखना शुरू किया, उन्होंने दूसरे ढंग का इतिहास लिखा। मुसलमान तीसरे ढंग का इतिहास लिखेंगे।
पश्र्चिम का एक बहुत बड़ा इतिहासज्ञ एडमंड बर्क मनुष्य-जाति का इतिहास लिख रहा था--पूरी मनुष्य-जाति का। उसने कोई बीस वर्ष अपने जीवन के इस महान कार्य में संलग्न किए थे। और उसकी किताब करीब होने को आ रही थी, बस आखिरी अध्याय लिख रहा था और एक दिन यूं घटना घटी कि उसने अपनी बीस साल की मेहनत को आग लगा दी। बात ऐसी हुई, उसके घर के पिछवाड़े ही एक हत्या हो गई। दो आदमियों में झगड़ा हुआ और एक आदमी मार डाला गया--उसको गोली मार दी गई। यह गोली कोई रात के अंधेरे में एकांत में नहीं मारी गई थी। भरी दोपहरी में, भीड़ खड़ी थी। सारा मोहल्ला इकट्ठा था, सैकड़ों लोग मौजूद थे जब यह झगड़ा हुआ। जब एडमंड बर्क को गोली की आवाज सुनाई पड़ी, वह भागा हुआ पहुंचा। वहां भीड़ इकट्ठी थी, आदमी मरने के करीब था--लहूलुहान था--जिसने मारा था, वह भी मौजूद था। उसने अलग-अलग लोगों से पूछा, क्या हुआ? और जितने मुंह उतनी बातें। घर के पिछवाड़े हत्या हुई, अभी मरने वाला मरा भी नहीं है--मर रहा है--अभी मारने वाला भाग भी नहीं गया है--मौजूद है--चश्मदीद गवाह मौजूद हैं--एक नहीं, अनेक--सबने देखा है, लेकिन सबकी व्याख्या अलग है। जो मरने वाले के पक्षपाती हैं, वे कुछ और कह रहे हैं। जो मारने वाले के पक्षपाती हैं, वे कुछ और कह रहे हैं। जो तटस्थ हैं, वे कुछ और कह रहे हैं। एडमंड बर्क ने बहुत कोशिश की जानने की कि तथ्य क्या है, नहीं जान पाया। लौट कर उसने अपने बीस वर्षों का जो श्रम था उसमें आग लगा दी। उसने कहा, जब मैं अपने घर के पिछवाड़े अभी-अभी घटी ताजी घटना को तय नहीं कर पाता कि तथ्य क्या है, और मैं मनुष्य-जाति का इतिहास लिखने चला हूं! कि पांच हजार वर्ष पहले क्या हुआ? मैंने ये बीस वर्ष व्यर्थ ही गंवाए! मैं पानी पर लकीरें खींचता रहा।
इतिहास कौन लिखता है; कौन लिखवाता है? और फिर सदियों तक जो बात लिख गई, उसे हम दोहराते चले जाते हैं।
राजनीति बहिर्यात्रा है। राजनीति का अर्थ है: दूसरे पर विजय पाना। और जहां दूसरे पर विजय पाना है, वहां सत्य का क्या प्रयोजन! सत्य का कोई उपयोग भी नहीं किया जा सकता दूसरे पर विजय पाने के लिए। यह बात ही गलत है। दूसरे पर विजय पाने की आकांक्षा ही गलत है। इसके लिए सत्य का साधन की तरह उपयोग नहीं किया जा सकता। सत्य और दूसरे पर विजय पाना, इन दोनों के बीच क्या संबंध हो सकता है! हां, अंतर्यात्रा के जगत में यह सूत्र जरूर सत्य है। वहां सत्य ही जीतता है। सत्य ही जीत सकता है। वहां असत्य की हार सुनिश्र्चित है। वहां असत्य को हारना ही होगा। अंतर-जगत में असत्य वह है, जो है ही नहीं। जो है ही नहीं, वह जीतेगा कैसे? मगर वह जीत और है। वह आत्म-विजय है। अपने पर विजय है। और अपने पर विजय में किसको धोखा देना है? और क्या सार है धोखा देने का? खुद को ही धोखा देने से मिलेगा भी क्या? और धोखा देना भी चाहोगे तो कैसे दोगे? तुम तो जानते ही रहोगे कि धोखा दे रहे हो।
तो इस भेद को खयाल में ले लेना। इस सूत्र की व्याख्या तो बहुत बार की गई, क्योंकि प्यारा सूत्र है, मगर यह बुनियादी भेद कभी साफ नहीं किया गया कि यह सूत्र बाहर के जगत में लागू नहीं होता। वहां सब तरह की तिकड़म, चालबाजी, पाखंड, मुखौटे उपयोगी हैं। वहां सत्य तुम्हें हरा देगा। वहां तुम सत्य बोले कि गए। राजनीति में कहीं सत्य चल सकता है। राजनीति में तो चाणक्य का शास्त्र चलता है, मुंडकोपनिषद नहीं चलते। राजनीति में तो मैक्यावेली चलता है, बुद्ध और महावीर की वहां कोई गति नहीं है। फिर चाणक्य हों कि मैक्यावेली, इनकी आधारशिला एक है; धोखा देने की कुशलता। हां, जरूर सत्य को तो नहीं जीताया जा सकता बाहर के जगत में, लेकिन असत्य को भी जिताना हो तो सत्य की तरह प्रतिपादित करना होता है। असत्य को भी चलाना हो तो सत्य का रंग-रोगन करना होता है। सत्य की कम से कम झूठी प्रतीति खड़ी करनी पड़ती है। क्योंकि लोग सत्य से प्रभावित होते हैं। फिर सत्य हो या न हो, यह और बात है। भ्रम काफी है। झूठ को भी यूं सजाना होता है कि वह सच जैसा मालूम पड़े। कम से कम मालूम पड़े। जैसे खेत में हम पशु-पक्षियों को डराने के लिए एक झूठा आदमी बना कर खड़ा कर देते हैं; एक डंडे पर हंडी रख देते हैं, दूसरा डंडा बांध कर हाथ बना देते हैं, फिर कुर्ता पहना दो और गांधी टोपी लगा दो; चाहो चूड़ीदार पाजामा--और मोरार जी देसाई तैयार! और चाहिए क्या? पशु-पक्षियों को भगाने के काम में कम से कम आ ही जाएंगे। और तो किसी काम के हैं भी नहीं!
खलील जिब्रान की एक प्रसिद्ध कथा है, कि मैं निकलता था एक खेत के करीब से और मैंने वहां एक धोखे के आदमी को खड़ा देखा। वर्षा हो, धूप हो, सर्दी हो, यह बेचारा सतत पहरी की तरह खड़ा रहता। न थकता, न ऊबता, न बैठता, न सुस्ताता, न लेटता। अथक इसकी साधना है। महायोगी है। तो मैंने पूछा कि कभी थक नहीं जाते हो? कि भाई, कभी सुस्ताते भी नहीं! कि मैं पूछता हूं, ऊबते नहीं हो? यही जगह, वही काम रोज सुबह-शाम, दिन और रात, कभी तो ऊब पैदा हो जाती होगी? वह खेत में खड़ा झूठा आदमी हंसने लगा और उसने कहा कि पशु-पक्षियों को भगाने में ऐसा मजा आता है, डराने में ऐसा मजा आता है, कि ऊब का सवाल कहां उठता है?
दूसरों को डराने का एक मजा है! राजनीति, वही मजा है। दूसरों पर हावी होने का एक मजा है! इससे तुम राजनीतिज्ञ को देखो, हमेशा प्रफुल्लित मालूम होता है। हजार उपद्रवों के बीच, झंझटों के बीच ताजा लगता है। राजनीतिज्ञ लंबे जीते हैं। किसी और कारण से नहीं, दूसरों को डराने का मजा, धमकाने का मजा! मरना ही नहीं चाहते। जीते ही रहना चाहते हैं। छोड़ते नहीं बनता यह मजा! जैसे ही कोई राजनीतिज्ञ पद से उतरता है कि बस, जीवन-ऊर्जा क्षीण होने लगती है। जब तक पद पर होता है, तब तक जीवन-ऊर्जा बड़ी अभिव्यक्त होती है। ये सब झूठे आदमी हैं, खेत के आदमी हैं। अब खेत में डराने के लिए कोई असली आदमी थोड़े ही खड़ा करना जरूरी है। लेकिन असली आदमी का धोखा होना चाहिए। पशु-पक्षियों को ऐसा लगना चाहिए कि है असली। तो गांधी टोपी, खादी का कुर्ता, शेरवानी, चमचमाते जूते--इतना पर्याप्त है।
राजनीति में सत्य नहीं जीता, कभी नहीं जीता। कभी जीतेगा भी नहीं। जिस दिन राजनीति में सत्य जीतने लगेगा, उस दिन राजनीति राजनीति न रह जाएगी उस दिन नीति हो जाएगी। सिर्फ नीति, शुद्ध नीति। उस दिन जगत से राजनीति विदा हो जाएगी। उस दिन धर्म ही होगा। लेकिन तब राजनीति की व्याख्या और होगी, उसकी गुणवत्ता और होगी--उसमें भगवत्ता होगी। आशा करना करीब-करीब दुराशा है; ऐसा हो नहीं पाएगा।
लेकिन भीतर के जगत में यह सूत्र बिलकुल सत्य है, सौ प्रतिशत--
सत्यं एव जयते नानृतम्
सत्य जीतता है, असत्य नहीं।
असत्य का अर्थ समझ लो। जो नहीं है। जैसे अंधेरा। अब दीया जलाओगे तो क्या अंधेरा जीत सकता है? कितना ही पुराना हो, सदियों पुराना हो, तो भी यह नहीं कह सकता दीये से कि छोकरे, तू तो अभी-अभी जला, अभी घड़ी भी नहीं हुई तुझे और इतनी अकड़ दिखला रहा है! और हम सदियों से यहां हैं, यूं हम मिट जाएंगे क्या? इतनी पुरानी हमारी परंपरा, इस घर में हमारा अड्डा पुराना और तू अभी-अभी आया, मेहमान की तरह, और यूं इतरा रहा है! अभी तुझे बुझा कर रख देंगे! नहीं, अंधेरा एक छोटे से दीये को भी नहीं बुझा सकता। क्योंकि अंधेरा है नहीं, असत्य है।
असत्य शब्द का अर्थ है: जो नहीं है, जिसका अस्तित्व नहीं है; जो सिर्फ प्रतीत होता है; जो वस्तुतः अभाव है, अनुपस्थिति है। प्रकाश के अभाव का नाम अंधकार है। और सत्य के अभाव का नाम असत्य है। तो जैसे ही प्रकाश आया, फिर अभाव कैसे रह जाएगा?...मैं जब तक नहीं आया था, यह कुर्सी खाली थी। अब मैं इस कुर्सी पर आ गया, अब यह कुर्सी खाली नहीं है। मैं इस कुर्सी पर बैठा हूं, तो यह कुर्सी खाली कैसे हो सकती है? यह दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं। वह जो खालीपन था, वह सिर्फ अभाव था। ऐसा अंधकार है। ऐसा असत्य है। दीया जला कि--अंधकार मिटता है ऐसा कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि जब हम कहते हैं मिटता है, तो यह भ्रांति होती है कि रहा होगा। यह भाषा की मजबूरी है। मिटता कहना ठीक नहीं है। युक्तियुक्त नहीं है। सत्य के अनुकूल नहीं है। क्योंकि मिटती तो वह चीज है जो रही हो। और अंधकार तो था ही नहीं, तो मिटेगा कैसे? जो नहीं था, वह मिट नहीं सकता। यह कहना कि अंधकार चला गया, भी ठीक नहीं है। क्योंकि जो था ही नहीं वह जाएगा चल कर कहां? क्या उसके पैर हो सकते हैं? तुम दरवाजे पर खड़े हो जाओ, भीतर कोई दीया जलाए, क्या तुम सोचते हो अंधेरा दरवाजे से भागता हुआ दिखाई पड़ेगा? तुम द्वार-दरवाजे बंद कर दो, रंध्र-रंध्र बंद कर दो, जरा सी संध न छोड़ो, जब दीया जलाओगे तो अंधकार कहां से भागेगा, कहां जाएगा भाग कर? संध भी तो नहीं है जाने को।
तो अंधकार कहीं जाता नहीं। है ही नहीं तो जाएगा कैसे? मिटता नहीं। है ही नहीं तो मिटेगा कैसे? फिर क्या हो जाता है? प्रकाश की अनुपस्थिति थी, प्रकाश आ गया, अनुपस्थित समाप्त हो गई। उपस्थिति अनुपस्थिति को पोंछ डाली।
बस, ऐसा ही सत्य और असत्य का संबंध है। असत्य अर्थात जो नहीं है। सत्य आ जाए, तो असत्य तत्क्षण तिरोहित हो जाता है।
सत्य कैसे आ जाए, इसलिए महत्वपूर्ण सवाल यह है। दीया कैसे जले, महत्वपूर्ण सवाल यह है।
इस सूत्र से गलती हो सकती है, वह गलती होती रही है, तुमसे न हो जाए, इसलिए सावधान करना चाहता हूं। लोग सोचते हैं, सत्य को शास्त्रों से सीखा जा सकता है। यह यूं हुआ जैसे कि कोई दीये की तस्वीर बना ले और अंधेरे में ले जाए और दीये की तस्वीर रख दे। क्या तुम सोचते हो दीये की तस्वीर से अंधेरा मिटेगा? शास्त्रों में सिर्फ दीये की तस्वीरें हैं। दीये की तस्वीरों से अंधकार नहीं मिटेगा। या कोई दीये की खूब चर्चा करने लगे, गुणगान करने लगे, दीये की स्तुति में गीत गुनगुनाए, तो भी अंधकार नहीं मिटेगा। दीया ही लाना होगा। ज्योति ही जलानी होगी।
इस सूत्र से यह भ्रांति भी पैदा होती है कि चूंकि असत्य जीतता नहीं, इसलिए असत्य को निकाल बाहर करो। असत्य को त्यागो यह वैसा ही हुआ जैसे कोई अंधकार को त्यागने की बात करे। कैसे त्यागोगे अंधकार को? धक्के देकर निकालोगे अंधकार को? लड़ोगे अंधकार से? संघर्ष करोगे? क्योंकि यह विजय शब्द खतरनाक है। इससे ऐसा लगता है, लड़ना पड़ेगा, घूंसेबाजी होगी, पहलवानी होगी। दांव-पेंच लगेंगे, तलवारें चलेंगी, कृपाणें उठेंगी--बोले सो निहाल, सत श्री अकाल--कुछ उपद्रव होने वाला है; कि या-अली--या बजरंगबली, कुछ न कुछ--लंगोट कस कर और जूझ पड़ना है! कि दंड-बैठक लगाने होंगे! कि हाथ-पैर मजबूत करने होंगे! अंधकार से लड़ना जो है! असत्य से लड़ना जो है!
यह सब पागलपन की बातें हैं।
मगर इन बातों का बड़ा आकर्षण है। लोग असत्य से लड़ रहे हैं। अनाचरण से लड़ रहे हैं, दुराचरण से लड़ रहे हैं, बुराइयों से लड़ रहे हैं, अनीति से लड़ रहे हैं, दुश्र्चरित्रता से लड़ रहे हैं। लड़ कर खुद ही टूट जाएंगे और कुछ भी नहीं होगा। लड़ने में खुद ही आत्मघात कर लेंगे, अपनी ही शक्ति को व्यर्थ व्यय कर देंगे। यह सवाल लड़ाई का नहीं है। अंधकार के साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता। न तो तुम लड़ सकते हो, न तलवार से उसे काट सकते हो, न फौजें ला कर उसे हटा सकते हो। जो नहीं है, उसके साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता। हां, अगर उसके साथ कुछ करना हो, तो प्रत्यक्ष मार्ग नहीं है, परोक्ष मार्ग है। अंधकार के साथ कुछ करना हो तो प्रकाश के साथ कुछ करो। अगर चाहते हो अंधकार हटे, तो प्रकाश जलाओ। और अगर चाहते हो अंधकार रहे, तो प्रकाश बुझाओ। करना होगा प्रकाश के साथ। क्योंकि जो है, उसी के साथ कुछ किया जा सकता है।
इसलिए मेरा जोर आचरण पर नहीं है, मेरा जोर ध्यान पर है। ध्यान है प्रक्रिया स्वयं के भीतर प्रकाश को जला लेने की। ध्यान है प्रक्रिया स्वयं के भीतर सत्य को आमंत्रित कर लेने की। सत्य में उत्सुक हो गए तो शास्त्रों में उलझ जाओगे। ध्यान में उत्सुक होना। नहीं तो तस्वीरों में पड़े रह जाओगे। और तस्वीरें काम नहीं आती। दीये की चर्चा से कुछ नहीं होता, दीया चाहिए।
सत्यं एव जयते नानृतम्।
निश्र्चय ही सत्य जीतता है, असत्य नहीं। मगर सत्य लाओगे कहां से? ध्यान के अतिरिक्त न कभी सत्य आया है, न आ सकता है। शास्त्र से नहीं आता, सिद्धांतों से नहीं आता, सिर्फ अपने भीतर परम मौन, पूर्ण शून्यता में उतरता है। निर्विचार अवस्था में सत्य का बोध होता है। लेकिन लोग अजीब हैं! लोग सत्य के संबंध में विचार करने में लगे हैं कि सत्य क्या है! यूं वे दर्शनशास्त्र में भटक जाते हैं।
इसी जगह से दर्शन और धर्म का रास्ता अलग होता है। दर्शनशास्त्र सोचने लगता है: सत्य क्या है, सत्य को कैसे पाएं, सत्य की रूप-रेखा क्या है, व्याख्या क्या है, परिभाषा क्या है, सत्य है या नहीं? और धर्म ध्यान की यात्रा पर निकल जाता है। निर्विचार की यात्रा पर। और दर्शनशास्त्र कहीं भी नहीं पहुंचा, किसी निष्पत्ति पर नहीं।
दर्शनशास्त्र से ज्यादा असफल पृथ्वी पर कोई प्रयोग नहीं हुआ है। और कितनी प्रतिभाएं डूब गईं इस प्रयोग में! कितने अदभुत लोग नष्ट हो गए! और ध्यानियों के पास भी बैठ कर लोग दर्शन की यात्रा पर निकल जाते हैं। सुकरात ध्यानी है, लेकिन उसका शिष्य प्लेटो भटक गया। बैठा सुकरात के पास, सुना सुकरात को, लेकिन सुन-सुन कर सोचने-विचारने में लग गया। और जब सुकरात के पास बैठ कर प्लेटो भटक गया, तो प्लेटो का शिष्य अरस्तू तो और भी भटक गया! बात ही गड़बड़ हो गई। अगर सुकरात और अरस्तू का मिलन हो जाए तो दोनों को एक-दूसरे की बात ही समझ में न आएगी। जमीन-आसमान का फर्क हो गया।
और यह करीब-करीब पृथ्वी के हर देश में हुआ है, हर परंपरा में हुआ है।
बुद्ध के मरते ही उनके संघ में बत्तीस दार्शनिकों के संप्रदाय पैदा हो गए। लोग चल पड़े सोचने की दुनिया में अलग-अलग। और सोचने में विवाद है। सोचने में कोई निष्कर्ष तो मिलता नहीं, लेकिन भारी आपाधापी, ऊहापोह मच जाता है। अंधे सोचने लगते हैं हाथी के संबंध में।
पांच अंधों की कहानी तुमने सुनी ही है पंचतंत्र में, कि गए थे अंधे हाथी को देखने। जिसने कान छुआ, उसने कहा कि हाथी सूप की भांति है। और जिसने पैर छुआ था, उसने कहा,...अंधा क्या समझेगा और,...उसने सोचा, हाथी खंभे की भांति है, स्तंभ की भांति है। और पांचों अंधों ने अलग-अलग वक्तव्य दिए। उनमें भारी विवाद मच गया। अंधे अक्सर दार्शनिक होते हैं। दार्शनिक अक्सर अंधे होते हैं। इनमें कुछ बहुत भेद नहीं होता। अंधे ही दार्शनिक हो सकते हैं। जिनके पास आंख नहीं है, वे ही सोचते हैं प्रकाश क्या है? नहीं तो सोचेंगे क्यों? जिसके पास आंख है, वह देखता है, सोचेगा क्यों?
खयाल रखना, दार्शनिक और द्रष्टा में बड़ा भेद है। यह सूत्र द्रष्टा के लिए है, दार्शनिक के लिए नहीं। सोचने मत बैठ जाना कि सत्य क्या है। निर्विचार होना है। सोचने से मुक्त होना है। वही भूमिका है। जब तुम परिपूर्ण शून्य होते हो, तुम मंदिर हो जाते हो। तुम तीर्थ बन जाते हो। सत्य अपने से अवतरित होता है, उतरता है। क्योंकि जब तुम शून्य होते हो, तुम्हारे द्वार-दरवाजे सब खुले होते हैं--अस्तित्व तुम्हारे भीतर प्रवेश कर सकता है।
सत्यं एव जयते नानृतम्।
सत्य जीतता है, असत्य नहीं।
सत्येन पन्था विततो देवनानः।
और यह सत्य का जो पंथ है, यही है देवयान, यही है दिव्यमार्ग। विचार का नहीं, शास्त्र का नहीं, दिव्यता का।
सत्येन पन्था विततो देवयानः।
सत्य मार्ग है। वही देवयान है।
दो यानों को समझ लो। एक को कहा है परंपरा में: पितृयान और दूसरे को कहा है: देवयान। यान का अर्थ होता है: नाव। पितृयान का अर्थ होता है: हमारे बुजुर्ग, हमारे बापदादे जो करते रहे, वही हम करें। पितृयान यानी परंपरा। जिसमें सदियों से लोग चलते रहे, उन्हीं लकीरों पर हम भी फकीर बने रहें। और देवयान का अर्थ होता है: क्रांति। परंपरा से मुक्ति। अपनी दिव्यता की खोज। औरों के पीछे न चलना। उदघोषणा। बगावत। विद्रोह।
मैं तुम्हें देवयान दे रहा हूं। संन्यास का अर्थ है: देवयान। तुम हिंदू नहीं हो, मुसलमान नहीं हो, ईसाई नहीं हो, जैन नहीं हो, बौद्ध नहीं हो, तुम सिर्फ धार्मिक हो।
मैं अपने संन्यासी को चाहता हूं वह सारे विशेषणों से मुक्त हो जाए। क्योंकि वह सब पितृयान है। तुम्हारे पिता हिंदू थे, इसलिए तुम हिंदू हो। और तो तुम्हारे हिंदू होने का कोई कारण नहीं है। अगर बचपन से ही तुम्हें मुसलमान घर में बड़ा किया गया होता, तुम मुसलमान होते। चाहे हिंदू घर में ही पैदा हुए होते, लेकिन अगर मुसलमान मां-बाप ने बड़ा किया होता, तो मस्जिद जाते, मंदिर नहीं; कुरान पढ़ते, गीता नहीं; जरूरत पड़ जाती तो मंदिर को आग लगाते, और मस्जिद को बचाने के लिए प्राण दे देते।
यह तुम नहीं हो, यह तुम्हारे भीतर से सड़ा-गला अतीत बोल रहा है।
जो व्यक्ति अपने को हिंदू या मुसलमान या ईसाई या जैन कहता है, वह अपने व्यक्तित्व को नकार रहा है, अपनी आत्मा को इनकार कर रहा है। वह कह रहा है: मेरा कोई मूल्य नहीं है; कब्रों का मूल्य है, मुर्दों का मूल्य है।
देवयान का अर्थ होता है: अपनी दिव्यता की अनुभूति और घोषणा; परंपरा से मुक्ति; अतीत से मुक्ति और वर्तमान में जीने की कला। ‘सत्येन पन्था विततो देवयानः।’ यह जो सत्य का मार्ग है, यह देवयान है; यह बगावत का रास्ता है; यह विद्रोह है। यह पितृयान नहीं है। तुम यह नहीं कह सकते कि मेरे पिता मानते थे, इसलिए मैं मानता हूं। नहीं, तुम्हें जानना होगा। जानना पहले। और जिसने जान लिया उसे मानने की जरूरत ही नहीं आती। और जिसने माना, उसके जीवन में जानने का सौभाग्य कभी पैदा नहीं होता। जिसने माना, वह तो मर ही गया। जिस दिन माना, उसी दिन मर गया। क्योंकि उसी दिन खोज समाप्त हो गई, अन्वेषण बंद हो गया। मानने का अर्थ ही होता है कि अब क्या करना है, मैंने तो मान लिया। और तुम्हें यही सिखाया गया है कि मानो, विश्र्वास करो। और इस भांति सारी पृथ्वी पर थोथे धार्मिक लोग पैदा किए गए हैं। विश्र्वासी हैं, मगर धार्मिक नहीं।
विश्र्वास थोथा ही होगा। जो तुम्हारा अपना अनुभव नहीं है, वह कैसे सत्य हो सकता है? मैं कहूं, वह मेरा अनुभव है, तुम उसे दोहराओ, तुम्हारे लिए असत्य हो गया। जिस दिन तुम भी जानोगे, अपनी निजता में, उस दिन तुम्हारे लिए सत्य होगा। और स्वयं का सत्य ही मुक्त करता है। दूसरों के सत्य बंधन बन जाते हैं, जंजीरें बन जाते हैं।
इसलिए मेरा कोई संन्यासी मेरा अनुयायी नहीं है। मेरा संगी है, मेरा साथी है, लेकिन मेरा अनुयायी नहीं है। मैं कोई सिद्धांत दे भी नहीं रहा। तुम चाहो भी मेरा अनुगमन करना तो न कर सकोगे। मैं तुम्हें सिर्फ इशारे दे रहा हूं। इशारे अंतर्यात्रा के। मैं तुम्हें कुछ सिद्धांत नहीं दे रहा कि तुम पकड़ लो और मान लो। मैं तुमसे सारे सिद्धांत छीन रहा हूं। यह देवयान की प्रक्रिया है।
सत्येन पंथा विततो देवयानः।
येनाक्रमन्ति ऋषयो ह्याप्तकामा
इस सत्य-मार्ग से जो जाते हैं, वे हैं आप्तकाम। जिसने सत्य को जाना, उसकी कामना मर जाती है। कामना बाहर कुछ पाने की दौड़ है। कामना राजनीति है। कामना का अर्थ है: धन मिले, पद मिले, प्रतिष्ठा मिले, यश मिले। कामना का अर्थ है: दूसरों पर मैं हावी हो जाऊं; दूसरों के सिरों पर बैठ जाऊं। आप्तकाम का अर्थ है: जिसने देख ली मूढ़ता इस दौड़ की; जो इस दौड़ से मुक्त हो गया; जिसकी भ्रांति टूट गई, जिसको यह बात समझ में आ गई कि मैं अपना मालिक नहीं हूं, किसी और का मालिक कैसे हो सकूंगा? यह असंभव है। अपना ही मालिक हो जाऊं, इतना ही काफी है। काफी से ज्यादा है। क्योंकि जो अपना मालिक हुआ, उसके जीवन में भीतर के खजानों के द्वार खुल जाते हैं। इस सत्य-मार्ग से जो जाते हैं, वे ही आप्तकाम हैं। वे ही ऋषि हैं, वे ही द्रष्टा हैं।
ऋषि शब्द बड़ा प्यारा है। दुनिया की किसी भाषा में ऐसा शब्द नहीं। ऋषि का यूं तो अर्थ होता है: कवि। लेकिन, एक गुणात्मक भेद है कवि और ऋषि में। दुनिया की सभी भाषाओं में कवि के लिए शब्द हैं, लेकिन ऋषि के लिए नहीं।
कारण हैं।
हमने इस देश में कोई पांच हजार वर्षों से निरंतर भीतर की शोध की है। जैसे आज पश्र्चिम विज्ञान के शिखर पर है, ऐसे हमने धर्म के शिखर पर पहुंचने का सतत अभियान किया है। जरूर कोई सारा पश्र्चिम वैज्ञानिक नहीं है, लेकिन विज्ञान की एक खूबी है; अगर एक व्यक्ति ने बिजली खोज ली और बिजली का बल्ब बना लिया--जैसे एडीसन ने--तो एक दफा बिजली का बल्ब बन गया और बिजली खोज ली गई, तो सभी उसके हकदार हो जाते हैं। फिर घर-घर में बिजली जलती है। फिर ऐसा नहीं है कि एडीसन के घर में ही बिजली जलेगी। एक दफा बात जान ली गई, तो बाहर के जगत की सारी बातें एक बार जान ली गईं तो सबकी हो जाती हैं।
इससे विज्ञान में एक भ्रांति बड़े स्वाभाविक रूप से पैदा हो जाती है, वैज्ञानिक तो थोड़े ही होते हैं--कोई एडीसन, कोई आइंस्टीन, कोई रदरफोर्ड, थोड़े से वैज्ञानिक--लेकिन एक वैज्ञानिक जो भी खोजता है, जैसे एडीसन ने एक हजार आविष्कार किए, लेकिन वे सारे आविष्कार सबके हो गए।
धर्म के संबंध में एक अड़चन है। धर्म भी थोड़े लोगों ने ही अनुभव किया--बुद्ध ने, महावीर ने, कृष्ण ने, पतंजलि ने, गोरख ने, नानक ने, कबीर ने, मीरा ने, थोड़े से लोगों ने--मगर धर्म के साथ एक अड़चन है, जो अनुभव करता है, बस उसके ही भीतर ज्योति जगती है। इसको हर घर में नहीं जलाया जा सकता। बुद्ध ने जाना तो बुद्ध मुक्त होते हैं। मीरा ने पाया, तो मीरा नाचती है मग्न होकर; पद घुंघरू बांध मीरा नाची रे! मगर तुम कैसे पद में घुंघरू बांधोगे? और तुम कैसे नाचोगे? तुमने तो पाया नहीं। और तुम नाचे तो नकल करोगे। तुम नकलची हो जाओगे। तुम कार्बनकापी हो जाओगे। और इस दुनिया में इससे बड़ा कोई पाप नहीं है: कार्बन कापी हो जाना। अपनी मौलिकता को भूल जाना जघन्य अपराध है, आत्मघात है।
थोड़े से लोगों ने धर्म के शिखर को छुआ। लेकिन जिन्होंने धर्म के शिखर को छुआ, उन्होंने हमारी भाषा पर भी छाप छोड़ दी। हमारी भाषा को उन्होंने नया श्र्ृंगार दे दिया। हमारी भाषा को नये अर्थ, नई अभिव्यंजनाएं दे दीं। जैसे ऋषि शब्द दिया।
कवि का अर्थ होता है: जिसके पास बाहर की आंखें हैं, जो बाहर के सौंदर्य को देखने में समर्थ है, जिसके पास बाहर के सौंदर्य को अनुभव करने की संवेदनशीलता है। सूर्योदय के सौंदर्य को देखता है, सूर्यास्त के सौंदर्य को देखता है; पक्षियों के गीत, फूलों के रंग, रात तारों से भरा हुआ आकाश, किसी की आंखों का सौंदर्य, किसी के चेहरे का सौंदर्य, लेकिन उसकी आंख बाहर के सौंदर्य को देखती है, वह कवि। वह इस सौंदर्य के गीत गाता है। लेकिन यह सौंदर्य कुछ भी नहीं है उस सौंदर्य के मुकाबले जो भीतर है। जिसकी भीतर की आंख खुल जाती है--प्रतीकात्मक रूप से हमने उसको तृतीय नेत्र कहा है। यह भी थोड़ा सोचने जैसा है। बाहर देखने वाली दो आंखें हैं और भीतर देखने वाली एक आंख है।
क्यों?
क्योंकि बाहर देखने का जो ढंग है वह द्वंद्व का है, द्वैत का है। वह हर चीज को दो में तोड़ देने का है। और भीतर जो देखने का ढंग है, वह हर चीज को एक में जोड़ देने का है। बाहर विश्लेषण है और भीतर संश्लेषण।
विज्ञान विश्लेषण है, क्योंकि वह बाहर की आंख है। और धर्म संश्लेषण है, क्योंकि वह भीतर की आंख है। वहां दो आंखें मिल कर एक आंख हो जाती है। वहां एक ही दृष्टि रह जाती है। वहां कोई द्वैत नहीं बचता। इसलिए हमने उसे तीसरा नेत्र कहा है। वह भीतर की आंख है। और जिसे भीतर का सौंदर्य दिखाई पड़ता है, वह ऋषि।
लेकिन भीतर का सौंदर्य तो तब दिखाई पड़ेगा जब भीतर का दीया जले। बाहर का सौंदर्य दिखाई पड़ता है, क्योंकि बाहर रोशनी है। रात के अंधेरे में तो फूलों के रंग दिखाई नहीं पड़ते! दिन के प्रकाश में फूलों के रंग दिखाई पड़ते हैं। रात में इंद्रधनुष दिखाई नहीं पड़ता--बन ही नहीं सकता, दिखाई कैसे पड़ेगा! उसके लिए सूरज तो चाहिए ही चाहिए। हां, दिन की रोशनी में कभी इंद्रधनुष बनता है। सारे रंग! अपूर्व सौंदर्य के साथ पृथ्वी और आकाश को जोड़ देता है, सेतु बन जाता है। तुम्हारे कमरे में कितनी ही सुंदर तस्वीरें टंगी हों, बड़े से बड़े चित्रकारों की--पिकासो की, डाली की, वॉनगाग की--मगर रात के अंधेरे में तुम उन्हें देख न पाओगे। रोशनी चाहिए। सुबह जब सूरज ऊगेगा और खिड़कियों से किरणें झांकेंगी तब तुम अचानक चकित होओगे कि कितनी अदभुत कलात्मक कृतियां कमरे में मौजूद हैं। हो सकता है बुद्ध की मूर्ति रखी हो। किसी अदभुत मूर्तिकार का सृजन हो! हो सकता है माइकल एंजिलो की जीसस की प्रतिमा रखी हो! मगर रात के अंधेरे में कैसे देखोगे?
भीतर अंधेरा है, इसलिए भीतर के सौंदर्य का तुम्हें पता नहीं। भीतर भी फूल खिलते हैं। हमने कहा कि भीतर सहस्रदल कमल खिलता है। बाहर के फूलों में क्या रखा है। क्षण भर को होते हैं; अभी हैं, अभी नहीं; आ भी नहीं पाते कि जाने की तैयारी शुरू हो जाती है; झूले में और अरथी में बहुत भेद नहीं होता; सुबह खिला फूल, सांझ मर जाता है; सुबह झूले में था, सांझ अरथी बंध जाती है, राम नाम सत्य हो जाता है; सुबह किस शान से उठा था, किस गरिमा और गौरव से, किस दंभ से घोषणा की थी और सांझ पंखुड़ियां बिखर गई हैं। कैसी हताशा है! मिट्टी में गिर गया है! सुबह सोचा भी न होगा कि यह अंत होगा, कि यूं खाक में पड़ जाना होगा!
बाहर का सौंदर्य क्षणभंगुर है, पानी में बने बबूले जैसा है। कवि उसी सौंदर्य की चर्चा करता है। ऋषि उस सौंदर्य की चर्चा करता है, जो शाश्र्वत है। जिसे एक बार जाना तो सदा के लिए जाना। वही सौंदर्य तृप्ति दे सकता है। कवि भी गीत गाता है। लेकिन कवि के गीत भी क्षणभंगुर की ही छाया होते हैं। ऋषि भी गीत गाता है। लेकिन ऋषि के गीत शाश्र्वत की अनुगूंज होते हैं, अनाहत का नाद होते हैं।
सूफी फकीर स्त्री हुई राबिया। उसके घर मेहमान था हसन। सुबह हुई, हसन बाहर गया, सूरज ऊगता था, पक्षी गीत गाते थे, दूर अमराई से कोई कोयल कूकती थी, बड़ी प्यारी सुबह थी, अभी ओस की बूंदें घास पर जमी थीं, मोतियों जैसी चमकती थीं, फूलों की गंध हवा को भर रही थी, उसने आवाज दी राबिया को कि राबिया, तू भीतर झोपड़े में बैठी क्या कर रही है? बाहर आ, परमात्मा ने एक बहुत सुंदर सुबह को जन्म दिया है, इसे देखने से चूकना उचित नहीं। तू जल्दी बाहर आ! राबिया खिलखिला कर हंसी और उसने कहा, हसन, कब तक बाहर के सौंदर्य में उलझे रहोगे? मैं तुमसे कहती हूं, भीतर आओ! क्योंकि जिसने उस बाहर की सुबह को बनाया है, मैं उसे देख रही हूं। तुम सिर्फ चित्र देख रहे हो, मैं चित्रकार को देख रही हूं। तुम्हीं भीतर आ जाओ! सुनो मेरी, मानो मेरी, तुम्हीं भीतर आ जाओ!
हसन ने यह न सोचा था कि बात यूं हो जाएगी। मगर ऋषियों के हाथ में कंकड़ भी पड़ जाएं तो हीरे हो जाते हैं। हसन ने तो यूं ही कहा था कि राबिया, बाहर आ! सोचा भी न था कि इसमें कुछ आध्यात्मिक संदेश राबिया दे देगी। मगर राबिया जैसे अनुभूति से भरे व्यक्तियों के जीवन में तुम कुछ भी कहो, वे उसमें से कुछ न कुछ शाश्र्वत का इशारा खोज लेंगे।
कल कृष्णतीर्थ ने मुझसे पूछा था कि आप जब उत्तर देते हैं किसी के प्रश्न का तो प्रश्नकर्ता महत्वपूर्ण होता है या प्रश्न महत्वपूर्ण होता है?
कृष्णतीर्थ, न तो प्रश्न महत्वपूर्ण होता है, न प्रश्नकर्ता होता है, महत्वपूर्ण तो हमेशा उत्तर देने वाला होता है, उत्तर होता है। उत्तर से भी ज्यादा उत्तर देने वाला होता है। अब हसन ने क्या पूछा था? हसन ने यह बात ही न की थी, हसन तो कुछ और ही पूछ रहा था, साधारण सी बात कर रहा था। राबिया ने क्या मोड़ दे दिया! हालात बदल दिए! हसन को चौंका दिया! हसन के प्रश्न में तो कुछ भी न था, तुमसे अगर यह बात किसी ने कही होती तो तुम यह उत्तर नहीं दे सकते थे जो राबिया ने दिया। और अगर राबिया का उत्तर सुन कर देते भी तो झूठा होता। और जहां झूठ है, वहां बल नहीं होता। लचर-पचर तुमने कहा होता, हकलाते हुए कहा होता। तुम्हारी बात में प्राण न होते, श्र्वास न होती। लेकिन राबिया ने जिस ढंग से बात कही, हसन को भीतर खिंच कर आ जाना पड़ा। पड़ी रह गई सुबह बाहर। पड़े रह गए फूल और कोयल की पुकार। और पड़ा रह गया सूरज और ओस की चमकती हुई बूंदें--सब पड़ा रह गया।
हसन भीतर आया और हसन ने कहा: राबिया, यह तूने क्या कहा! राबिया ने कहा: जो कहना उचित था वही मैंने कहा। कब तक उलझे रहोगे, हसन? बहुत दिन हो गए मुझे देखते, तुम बाहर ही उलझे हुए हो। माना कि बाहर सुंदर है जगत, मगर बनाने वाले को देखो; उस मूलस्रोत्र को देखो जहां से यह सारा सौंदर्य निकलता है, यह सौंदर्य उसके सामने कुछ भी नहीं है, बूंद भी नहीं है! जब सागर भीतर मौजूद है, तो क्यों बूंदों में अटके हो?
और हसन के जीवन में यह घटना क्रांति की हो गई। उस दिन से हसन की आंखें बंद हो गईं। अब तक हसन एक कवि था, अब उसके जीवन में ऋषि की यात्रा शुरू हुई।
ऋषि का अर्थ है: जो बाहर विजय करनी है, इस बात की मूढ़ता को पहचान लिया और अंतर्विजय के लिए निकल पड़ा है। और ऋषि का अर्थ है: जिसने भीतर के सौंदर्य को देखा है और उसे गाया है। वह भी कवि है, लेकिन आंख वाला; अंधा नहीं। भीतर की आंख वाला। वह भी कवि है, लेकिन उसके भीतर दीया जल रहा है। और इसलिए उसके प्रत्येक शब्द में ज्योति है। उसके शब्द-शब्द में आग है। उसके शब्द-शब्द आग्नेय हैं। और जिनके भीतर थोड़ी भी क्षमता है जागने की, वे उसके शब्दों को सुन कर जाग ही जाएंगे।
येनाक्रमंति ऋषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत्र सत्यस्य परमं निधानम्।।
जहां सत्य है, वहीं परम द्वार है। और एक बार तुमने अपने सत्य को जाना कि परमात्मा दूर नहीं, निकट से भी निकट है। एक बार तुमने अपने सत्य को जाना कि उसी सत्य के केंद्र पर विराजमान तुम परमात्मा को पाओगे। सत्य परमात्मा का द्वार है। और जिसने परमात्मा को जाना, वही विजयी है। उसको हमने जिन कहा है। जैन दो कौड़ी के हैं, लेकिन जिन! महावीर को हमने जिन कहा। महावीर जैन नहीं हैं, खयाल रखना, कोई भूल कर यह दावा न करे कि महावीर जैन हैं; महावीर जिन हैं।
जिन का अर्थ है: जिसने जीता, जिसने जाना। और जैन कौन है? जैन वह है, जिसने जीते हुए लोगों के शब्द तोतों की तरह रट लिए हैं, जो उनको दोहरा रहा है यंत्रवत, लेकिन उन शब्दों पर उसके हस्ताक्षर नहीं हैं, उन शब्दों पर उसके प्राणों की कोई छाप नहीं है। वे शब्द उधार हैं, बासे हैं, झूठे हैं। और गंदे हो गए हैं, क्योंकि हजारों ओंठों से चल चुके हैं।
सहजानंद, यह सूत्र तो प्यारा है। मगर इतनी सारी बातों को खयाल में रखना तो ही तुम इस सूत्र में छिपे अमृत का स्वाद ले पाओगे। सोचने-विचारने में मत पड़ जाना। जागो! भीतर का दीया जलाओ! ध्यान की थोड़ी सी ज्योति पर्याप्त है।
ओशो, क्या मैं बिना संन्यास के आपका शिष्य नहीं हो सकता हूं?
मुमुक्षा क्या है?
कुतूहल बचकानी चीज है, छोटे-छोटे बच्चों में होता है, पूछे ही चले जाते हैं। ऐसा क्यों है, वैसा क्यों है? खोपड़ी खा जाते हैं। जिसके पीछे पड़ जाएं, उसकी मुसीबत खड़ी कर देते हैं। क्योंकि एक प्रश्न खतम नहीं होता कि वे दूसरा प्रश्न खड़ा कर देते हैं। उनको सुनने की कोई बहुत इच्छा भी नहीं होती कि प्रश्न का तुम उत्तर दो, वे तुम्हारे उत्तर को सुनते भी नहीं, उनको मजा पूछने का होता है। वह पूछे ही चले जाते हैं। तुमने क्या उत्तर दिया, इससे भी प्रयोजन नहीं है। तुमने दिया या नहीं, इससे भी प्रयोजन नहीं है। तुम जब उत्तर दे रहे हो तब वे दूसरा प्रश्न तैयार कर रहे हैं। फुरसत किसको है तुम्हारे उत्तर सुनने की? कुतूहल बचकानी चीज है।
जिज्ञासा व्यक्ति को विद्यार्थी बनाती है। विद्यार्थी का मतलब यह है, मैं अपने को बदलने को राजी नहीं हूं, लेकिन हां, कुछ ज्ञान की बातें अगर मिल जाएं तो जरूर संगृहीत कर लूंगा, संजो कर रख लूंगा अपनी मंजूषा में। वक्त पड़े शायद काम आएं। और अपने काम न आईं तो कोई हर्ज नहीं, दूसरों को सलाह देने के काम आएंगी। इस तरह पंडित पैदा होता है। पंडित विद्यार्थी का चरम निष्कर्ष है।
मुमुक्षा का अर्थ है: जानकारी से क्या करूंगा? जीवन चाहिए! अनुभव चाहिए! नहीं जानना चाहता हूं परमात्मा के संबंध में, परमात्मा को ही पीना चाहता हूं। बिना पीए यह नहीं हो सकता है। और पीने के लिए, नदी बह रही हो और तुम प्यासे अगर खड़े रहो तट पर तो भी प्यास नहीं बुझेगी। तुम नदी के तट पर खड़े हो कर सोच-विचार करते रहो कि पानी कैसे बनता है, इसका रासायनिक फार्मूला क्या है--एच टू ओ--तो भी प्यास नहीं बुझेगी। तुम्हें नदी में उतरना पड़ेगा। उतर जाने से भी प्यास नहीं बुझेगी, तुम्हें दोनों हाथों को बांध कर अंजुली बनानी होगी। अंजुली बना लेने से भी प्यास नहीं बुझेगी, तुम्हें फिर झुकना होगा ताकि तुम अपनी अंजुली में नदी के जल को भर सको। बिना झुके तुम अंजुली को भर न पाओगे। और झुकोगे तो पी सकोगे। और पीओगे तो तृप्ति है।
संन्यास का कुछ और अर्थ नहीं है। झुकना! समर्पण! अंजुली बांधना! प्रेम से पीने की तैयारी!
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन...
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
जब तक उलझे न कांटों से दामन
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
अज्मते आशियाना बनाए
बर्क को दोस्त समझूं या दुश्मन
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
हुस्न यूं है परीशां-परीशां...
हुस्न यूं है परीशां-परीशां
लुट गया हो कोई जैसे रहजन
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
जब तक उलझे न कांटों से दामन
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
इक-ब-इक सामने आना-जाना...
इक-ब-इक...
इक-ब-इक सामने आना-जाना
रुक न जाए कहीं दिल की धड़कन
रुक न जाए कहीं दिल की धड़कन...
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
जब तक उलझे न कांटों से दामन
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
गुल तो क्या खार तक चुन लिए हैं...
गुल तो क्या...
गुल तो क्या खार तक चुन लिए हैं
फिर भी खाली है गुलचीं का दामन
फिर भी खाली है गुलचीं का दामन...
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
जब तक उलझे न कांटों से दामन
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
ऐ फना...
ऐ फना इश्क में मिट के तूने...
ऐ फना इश्क में मिट के तूने
कर दिया हुस्न का नाम रोशन...
ऐ फना इश्क में मिट के तूने
कर दिया हुस्न का नाम रोशन
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
जब तक उलझे न कांटों से दामन
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन...
कोई समझेगा क्या...
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
जब तक उलझे न कांटों से दामन
कोई समझेगा क्या राजे-गुलशन
यह राज समझ में न आएगा। तुम बचना चाहते हो, नारायणदास तिवारी, कि कहीं कांटे न चुभ जाएं। कहीं दामन में कुछ कांटे न चुभ जाएं। मगर बिना कांटे चुभे कुछ समझ में आने वाला नहीं। उतना साहस तो करना ही होगा। मिटने की तैयारी है संन्यास।
ऐ फना इश्क में मिट के तूने
कर दिया हुस्न का नाम रोशन
संन्यास मृत्यु है अहंकार की। और जहां अहंकार मरा, वहां एक नये जन्म की शुरुआत है, एक नये जीवन का प्रारंभ है। संन्यास है द्विज बनने की प्रक्रिया, दुबारा जन्म लेने की प्रक्रिया।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Can one be a disciple without taking sannyas?
According to Osho, no—you can be a student without sannyas, but not a disciple. A disciple drops mere curiosity and inquisitiveness and embraces mumuksha: a burning thirst to experience, not just know. Sannyas means bowing, surrendering, cupping the hands to drink the Divine, and risking the thorns of transformation. Without this courageous self-effacement, discipleship remains impossible.
In simple terms: You can collect ideas without sannyas, but to truly learn you must surrender and bravely live the truth, not just talk about it.
What is the significance of the verse 'Only truth is victorious, not untruth' from the Mundaka Upanishad?
According to Osho, this Upanishadic verse is a compass for the inner journey, not a slogan for outer success. In the spiritual realm, truth alone 'wins' because it is what is; untruth, being non-being, cannot endure. Politics reverses this—power masquerades as truth. The sutra therefore directs seekers toward sincerity, simplicity, and self-knowing rather than conquest, reputation, or historical validation.
In simple terms: It means truth wins only inside you by being real, while outer victories can be lies wearing crowns.
