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Questions in this Discourse
ओशो, छान्दोग्य उपनिषद में एक सूत्र इस प्रकार है: न पश्यतो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुखतां सर्वं ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति। अर्थात ज्ञानी न मृत्यु को देखता है, न रोग को और न दुख को; वह सबको आत्मरूप देखता है। और सब कुछ प्राप्त कर लेता है। आप तो गवाह हैं, क्या सच ही बुद्धपुरुष को मृत्यु, रोग और दुख में भी आत्मरूप ही दिखाई पड़ता है? इस सूत्र पर हमें दिशा-बोध देने की कृपा करें।
अहंकार चूंकि असत्य है, इसलिए मृत्यु भी असत्य है। अगर मैं नहीं हूं, तो कौन मरेगा? कैसे मरेगा? मरने के लिए होना जरूरी है।
इसलिए बुद्ध ने समाधि की परम दशा को निर्वाण कहा है।
निर्वाण शब्द का अर्थ बड़ा प्यारा है। अनूठा भी, अकल्पनीय भी। निर्वाण का अर्थ होता है: दीये का बुझ जाना। साधारणतः तो सूझ-बूझ में नहीं आएगा कि दीये का बुझ जाना या दीये का जल जाना? क्योंकि साधारणतः हम सोचते हैं कि उस परम दशा में दीया जल जाएगा। और बुद्ध कहते हैं: उस परम दशा में दीया बुझ जाएगा! निर्वाण का शाब्दिक अर्थ होता है: दीये का बुझ जाना; दीये का अंत। यहां दीये से अर्थ है: तुम्हारे अहंकार की टिमटिमाती लौ और धुआं। तेल चुक जाएगा, दीया बुझ जाएगा। जब तक तेल है, तब तक जलता रहेगा। जब तक बाती है, तब तक धोखा बना रहेगा। मगर क्षणभंगुर है। क्योंकि तेल चुकेगा ही, उसकी सीमा है। और बाती जलेगी, उसकी भी सीमा है। और बाती और तेल पर जो निर्भर है, वह कितनी देर टिकने वाला है? जो क्षणभंगुर पर निर्भर है, वह स्वयं भी क्षणभंगुर ही होगा। इसलिए बुद्ध कहते हैं: दीये का बुझ जाना।
लेकिन यह एक हिस्सा है। यह पहला पहलू है। यह यात्रा का आधा अंग है। जिस दिन तुम्हारे मैं का दीया बुझ जाता है, तो ऐसा नहीं कि अंधकार हो जाता है। उलटी ही घटना घटती है। उस घटना को समझने के लिए रवींद्रनाथ ठाकुर के जीवन में उल्लिखित यह संस्मरण उपयोगी होगा--
वे अक्सर ही पद्मा नदी पर अपने बजरे में रहने चले जाते थे। छोटा सा बजरा था। और पद्मा की शांत, किसी एकांत स्थली पर वे बजरे को टिका रखते थे। उनका श्रेष्ठतम काव्य उस बजरे पर ही पैदा हुआ है। एक रात ऐसा हुआ--पूर्णिमा की रात थी, आकाश पूरे चांद की रोशनी से भरा था, पृथ्वी भी जगमगाती थी, पत्ते-पत्ते पर रौनक थी, पद्मा की लहर-लहर पर चांदी थी, और वे अपने बजरे के छोटे से झोपड़े में द्वार-दरवाजे बंद किए एक मिट्टी का दीया जलाए हुए पश्र्चिम के एक बहुत बड़े विचारक सौंदर्य-शास्त्री क्रोशे की किताब पढ़ रहे थे सौंदर्य के ऊपर, कि सौंदर्य क्या है? सौंदर्य झर रहा था बाहर, बरस रहा था, कण-कण पर नाच रहा था; आकाश में था, पृथ्वी में था, झील में था, वृक्षों पर था; दूर कोई कोयल कूकती थी अमराई में, लेकिन वे इस सबसे बेखबर अपनी किताब में आंखें गड़ाए--क्योंकि दीये की रोशनी बहुत ज्यादा न थी; और रवींद्रनाथ बूढ़े भी हो गए थे, आंखों को बहुत सूझता भी न था--किसी तरह पढ़ने की कोशिश कर रहे थे क्रोशे को। और क्रोशे विचार कर रहा था कि सौंदर्य क्या है।...जैसे कि सौंदर्य पर विचार किया जा सकता है! सौंदर्य अनुभूति है, विचार क्या खाक करोगे! विचार करके तो तुम सौंदर्य को पाओगे नहीं। जितना विश्लेषण करोगे, उतना ही खो जाएगा। जितना मुट्ठी बांधोगे, उतना ही पाओगे हाथ खाली हैं।
विश्लेषण करके किसने कब सौंदर्य जाना है? प्रश्न उठाया तुमने कि सौंदर्य क्या है, कि समझ लेना कि तुम्हें सौंदर्य का कभी भी पता न चलेगा। सौंदर्य जीया जाता है, अनुभव किया जाता है। हां, गाओ; नाचो; वीणा बजाओ; फूल के साथ एकात्म हो जाओ; या चांद-तारों के लोक में खो जाओ; इस विस्मृति में शायद थोड़ी बूंदा-बांदी हो जाए, थोड़े भीग जाओ, आर्द्र हो जाओ! शायद तुम्हारे भीतर सौंदर्य की थोड़ी सी झलक, थोड़ी सी पुलक उठे! शायद तुम्हारे रोओं में थोड़ा सा कंपन हो, हलन-चलन हो! शायद तुम्हारा हृदय बजे, निनादित हो! कोई झरना शायद भीतर फूटे! मगर विचार से नहीं, निर्विचार से। मन से नहीं, मौन से।...
क्रोशे की किताब पढ़ते-पढ़ते आधी रात हो गई। सौंदर्य क्या है, यह तो कुछ में समझ आया नहीं--रवींद्रनाथ जैसे व्यक्ति को, जिसे कि सौंदर्य की बहुत सी अनुभूतियां थीं, उसे भी समझ में न आया। वरन उलटी बात हुई जितना क्रोशे को पढ़ा उतना ही जो पहले भी समझ में आता था कि सौंदर्य क्या है, वह भी अस्त-व्यस्त हो गया; उस पर भी संदेह उठ खड़े हुए।...विचार संदेहों को जन्म देता है। निर्विचार अनुभूति को। समाधि में समाधान है। विचार में तो समस्याएं ही समस्याएं हैं।...थक कर--आंखें भी थक गईं--उन्होंने दीये को फूंक कर बुझा दिया और किताब बंद की। और तब, उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है--थोड़े से शब्द, लेकिन अति महत्वपूर्ण; हीरे-जवाहरातों से भी तौलो तो वजनी--लिखा है कि जैसे ही मैंने दीया बुझाया और किताब बंद की, मैं चकित हो गया, क्षण भर को भरोसा न आया, अवाक रह गया, ठिठक गया, रंध्र-रंध्र से, दरवाजे की संध से, खिड़की की संध से चांद का प्रकाश भीतर चला आया। चांद भीतर नाचने लगा। यह मेरा छोटा सा दीया, इसकी टिमटिमाती यह धुंधली सी रोशनी, यह धुएं से भरी रोशनी--जो बहुत रोशनी न थी--यह पीली सी रुग्ण, बीमार, ज्वरग्रस्त रोशनी चांद की, उज्ज्वल चांद की अपूर्व छटा को बाहर अटकाए हुई थी, भीतर न आने देती थी! इधर दीया बुझा, उधर चांद भीतर आया। दीये का बुझना आधा हिस्सा और चांद का भीतर आ जाना दूसरा हिस्सा।
फिर उन्होंने द्वार खोल दिए। जब रंध्र-रंध्र से इतना आ रहा है, तो द्वार खोल दिए, खिड़कियां खोल दीं। क्षण में जैसे क्रांति हो गई। एक जादू! वे बाहर निकल आए। जब भीतर इतना है तो बाहर कितना न होगा! और बाहर अपूर्व छटा थी। ऐसी सुंदर रात, ऐसी प्यारी रात, ऐसे सन्नाटे से भरी रात; दूर कोयल की कुहू-कुहू और पद्मा की लहरों पर तैरती हुई चांद की चांदी, मन ठहर गया। मन को गति न रही। जैसे समाधि लग गई। कितना समय बीता, कुछ याद ही न रहा। जैसे समय मिट गया। जैसे घड़ी ठहर गई।
और तब उन्होंने लिखा है कि जो मैं शास्त्र में खोज रहा था, वह बाहर बरस रहा था। मैं शास्त्र में अटका था, सो उसे नहीं देख पा रहा था जो मौजूद था। मैं शब्दों में उलझा था और सत्य द्वार पर दस्तक दे रहा था। लेकिन मुझे फुरसत कहां थी? मैं होश में कहां था? मैं तो ऊहापोह में पड़ा था। उस धीमी सी दस्तक को सुने तो कौन सुने? उस चांद की गुफ्तगू को सुने तो कौन सुने? वह चांद तो पुकार रहा था, निमंत्रण दे रहा था, कि खोलो द्वार, खोलो खिड़कियां, कि मैं आया हूं अतिथि की तरह, लो मुझे भीतर। मगर भीतर तो हजार-हजार विचार दौड़ रहे थे। उस शोरगुल में कहां कोयल; उस शोरगुल में कहां चांद, कहां नदी! और फिर वह दीये की टिमटिमाती पीली सी, ज्वरग्रस्त रोशनी अटकाए थी चांद को। दीया बुझा--दीया निर्वाण को उपलब्ध हुआ। और चांद भीतर चला आया। और चांद भीतर आया तो रवींद्रनाथ बाहर आ गए।
ठीक बुद्ध ने इसी अर्थों में निर्वाण कहा है। अहंकार का टिमटिमाता दीया बुझ जाए, तो यह सारा आकाश तुम्हारा है। ये सारे चांद-तारे तुम्हारे हैं। तुम नहीं हो तो सब तुम्हारा है।
इस विरोधाभास को ठीक से समझ लेना, क्योंकि इसमें ही सारे धर्म का राज, सारी अनुभूतियों का निचोड़ है। जैसे कोई हजार-हजार गुलाब के फूलों को निचोड़ कर इत्र बनाए, ऐसा इसमें सारा निचोड़ है रहस्यवादियों का, ऋषियों का।
छांदोग्य का यह सूत्र गहरा है। बहुत गहरा है। अहंकार मिट जाए, तुम न रहो, तो सब तुम्हारा है। तुम न रहे, तो कुछ पराया न रहा। यह मैं ही है जो तू को खड़ा कर देता है। यह मैं ही है जो विभाजित कर देता है। यह मैं का विभाजन गिर गया, यह रेखा हट गई, तो आंगन मिट कर आकाश हो जाता है। आंगन के चारों तरफ तुमने जो दीवाल खींच रखी है, उसे गिरा दो, तो तुम्हारा आंगन आकाश है।
न पश्यतो मृत्युं...
ज्ञानी को मृत्यु दिखाई ही नहीं पड़ती। ज्ञानी मृत्यु को जानता ही नहीं। ज्ञानी मरता ही नहीं। क्योंकि जो चीज मर सकती थी, उसे ज्ञानी ने पहले ही मर जाने दिया। अहंकार मर सकता था। जो नहीं था, वही मर सकता था, जो है, वह तो सदा है। जो है, वह नहीं नहीं होता, और जो नहीं है, तुम लाख उपाय करो, वह है नहीं होता। हां, थोड़ी-बहुत देर को अपने को भरमा सकते हो, धोखे में डाल दे सकते हो, आत्मवंचना कर सकते हो, मगर कितनी देर करोगे? आज नहीं कल, कल नहीं परसों, इस जनम में नहीं अगले जनम में, कभी न कभी इस सत्य को जानना ही होगा कि अहंकार ही है जो मृत्यु को लाता है। झूठ ही मरता है। सत्य तो अमृत है। झूठ ही हारता है। सत्य तो सदा जीतता है। सत्यमेव जयते। झूठ ही डरता है। सत्य तो हर चुनौती को स्वीकार कर लेता है। सत्य को भय क्या?
सुकरात मर रहा था। उसे जहर देकर मारा जा रहा था। कसूर क्या था? कसूर यह था उसका कि वह सत्य की बातें करने लगा था। और सत्य की बातें झूठों के सौदागर पसंद नहीं करते। और यहां झूठों के सौदागर बहुत हैं। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजे झूठों के सौदागरों से भरे पड़े हैं। मगर उनकी झूठें पुरानी हैं। इतनी पुरानी हैं कि उनकी बड़ी साख हो गई है। यहां तो पुराने का बड़ा मूल्य है! जितना सड़ा-गला हो, उतना मूल्यवान समझा जाता है! जितना मुर्दा हो, अस्थिपंजर रह गया हो, उतना ही बहुमूल्य है! और सुकरात सत्य की बातें करने लगा। पंडित, पुरोहित, राजनेता सभी खिन्न हो उठे।
सुकरात को सजा दी गई जहर से मार डालने की। सुकरात के एक शिष्य क्रेटो ने उससे मरने के पहले पूछा...वह वार्तालाप अनूठा है!...क्रेटो ने पूछा, आप हमें यह तो बता दें कि मरने के बाद हम आपका अंतिम-संस्कार कैसे करें? इस संबंध में आपने कभी कोई संकेत नहीं दिया। आप चाहेंगे कि हम आपको गड़ाएं, जलाएं, नदी में बहाएं? पारसियों की तरह आपकी देह को पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दें? कि पूर्वी लोगों की तरह अग्नि-संस्कार करें? या पश्र्चिम की प्रचलित धारा के अनुसार आपको मिट्टी में दबाएं? या कुछ जातियों के रिवाज के अनुसार आपको सागर में विसर्जित कर दें? हम क्या करें?
सुकरात हंसने लगा। और उसने कहा: पागलो, वे सोचते हैं कि मुझे मार रहे हैं और तुम सोचते हो कि तुम मुझे गड़ाओगे, कि तुम मुझे जलाओगे! दुश्मन सोचता है मुझे मार रहा है और दोस्त विचार कर रहे हैं कि मर जाने के बाद गड़ाना है कि जलाना है, मगर तुम दोनों का भरोसा मौत में है। तुम दोनों मौत को मानते हो, और मैं मौत को नहीं मानता हूं मुझे मौत दिखाई नहीं पड़ती। और, क्रेटो, मैं तुझसे कहता हूं कि मुझे मारने वाले और मुझे गड़ाने वाले, तुम दोनों के बाद भी मैं जिंदा रहूंगा। तुम्हारी याद ही सिर्फ इसलिए की जाएगी कि किसी तरह तुम एक जिंदा आदमी से संबंधित थे।?
और बात सच है। क्रेटो को किसने याद रखा होता? यह नाम सिर्फ इसलिए याद है, आज पच्चीस सौ साल बाद भी इस नाम को मैं तुम्हारे सामने उल्लिखित कर रहा हूं, सिर्फ इस कारण कि क्रेटो सुकरात से संयुक्त हो गया था, तो क्रेटो का नाम तक पच्चीस सौ साल जी गया। जब तक सुकरात का जीएगा, क्रेटो का भी जीएगा। और सुकरात ने यह कहा था उससे कि तुम सब मरोगे, फिर भी मैं रहूंगा। क्योंकि जो मेरे भीतर मर सकता था, कभी का मर चुका है। इसीलिए तो मृत्यु को मैं इतना आनंद से अंगीकार कर रहा हूं।
अदालत ने पूछा भी था--अदालत को दया भी आई थी; न्यायाधीश थोड़ा अपराध भी अनुभव किया होगा, चूंकि सुकरात जैसे प्यारे आदमी को जहर देकर मार डालना अन्याय तो था! मगर न्यायाधीश भी क्या करे, जूरियों का बड़ा वर्ग मारने के पक्ष में था। एथेंस मारने के पक्ष में था। धनपति, राजनेता, धर्मगुरु, सब मारने के पक्ष में थे। और न्यायाधीश उनके विपरीत नहीं जा सकता था। जाता तो उसकी खुद की मौत होती, वह खुद मुश्किल में पड़ता। फिर भी उसने बचाने का उपाय किया था। उसने सुकरात से कहा था, तुम अगर एथेंस का नगर छोड़ कर चले जाओ और फिर वचन दो कि कभी एथेंस नहीं आओगे, तो--बड़ी दुनिया है, तुम्हें जहां रहना हो रहो--मैं तुम्हें मरने की सजा से बचा सकता हूं।
सुकरात ने कहा: क्या तुम सोचते हो तुम मुझे मरने से बचा सकोगे? आज नहीं मरूंगा तो कल मरूंगा, कल नहीं मरूंगा तो परसों मरूंगा, एथेंस में नहीं मरूंगा तो कहीं और मरूंगा; जब मरना ही है तो क्या आपा-धापी! फिर क्यों छोड़ कर एथेंस जाऊं? एथेंस छोड़ कर जाने का मतलब तो यह होगा कि मैं अभी भी भरोसा करता था अपने अहंकार में: जितनी देर बचा लूं! क्या फर्क पड़ता है! मौत निश्र्चित है; कब आएगी, कुछ भेद नहीं पड़ता। तुम चिंता न करो। और तुम अपराध-भाव अनुभव न करो। तुम सजा दो। मैं कहीं जाने वाला नहीं हूं। मरने के बाद भी कहीं जाने वाला नहीं हूं। मरने के बाद भी यहीं रहूंगा।
यही रमण महर्षि ने कहा था मरते समय। एक शिष्य ने पूछा कि क्या आपसे पूछूं कि मरने के बाद आप कहां होंगे? रमण ने कहा: यहीं होऊंगा। और कहां होऊंगा? मरने के पहले यहां हूं, जन्म के पहले यहां था, मरने के बाद भी यहीं होऊंगा। जाना कहां है? आना कहां है?...इसको कहते हैं आवागमन से छुटकारा! इस बोध का नाम है आवागमन से छुटकारा! कि न कुछ मरता है, न कुछ जन्मता है, तुम्हारा जो वास्तविक स्वरूप है वह शाश्र्वत है। नित्य है। समयातीत है। सदा से है और सदा रहेगा। और जैसा है वैसा ही है। हां, तुमने कुछ झूठे घर-घुले रेत के अपने आसपास बना लिए होंगे, तो वे जरूर गिरेंगे। वे ही मरते हैं।
न्यायाधीश ने फिर भी चेष्टा की कि ठीक, तुम्हें एथेंस में रहना है तो एथेंस में रहो, लेकिन इतना वचन दे दो कि अब तुम सत्य की जो बातें करते रहे, न करोगे। तो भी मैं तुम्हें छोड़ दे सकता हूं। क्योंकि लोगों को तुमसे एतराज नहीं है, तुम्हारी बातों से एतराज है। अगर तुम भरोसा दिला दो, तो हमें तुम्हारे भरोसे पर भरोसा है। हम मान सकते हैं कि तुम कहोगे तो अपने वचन को पूरा करोगे। तुम वचनबद्ध व्यक्ति हो। तुम्हारे दुश्मन भी यह मानते हैं। तुम इतना कह दो कि अब तुम जिन बातों को सत्य कहते हो, उनको नहीं कहोगे। तुम चुप रहो। तुम शिक्षण देना बंद कर दो।
सुकरात ने कहा: फिर जीने का सार क्या? मैं तो जी ही इसलिए रहा हूं--मेरा काम तो पूरा हो चुका; मेरा काम तो कभी का पूरा हो चुका; जिस दिन मैंने जान लिया है अपने को उसी दिन मेरा काम पूरा हो चुका; अब तो मैं इसलिए जी रहा हूं कि कुछ और लोगों को जगा सकूं। मैं तो जाग गया, जो लोग अभी भी सोए हैं और सपनों में खोए हैं, उनको झकझोर सकूं और जगा सकूं। और मैं जानता हूं कि किसी की नींद तुम तोड़ोगे तो वह नाराज होता है! वह प्यारा सपना देख रहा हो सकता है, सुंदर सपना देख रहा हो--और तुम उसे झकझोर के जगा देते हो! पीड़ा होती है। वह नहीं चाहता जागना। इसलिए मैं कुछ एतराज नहीं करता हूं लोगों पर कि क्यों मुझे मार डालना चाहते हैं। वे भी ठीक हैं। मगर मैं अपने काम को बंद नहीं करूंगा। सत्य तो मेरा जीवन है। मैं बोलूंगा तो सत्य, चुप रहूंगा तो सत्य, उठूंगा तो सत्य, बैठूंगा तो सत्य। यह वचन मैं नहीं दे सकता हूं। अगर सत्य ही बोलना बंद करना है तो जहर पी लेने में हर्ज क्या है।
न्यायाधीश ने दो विकल्प दिए थे, दोनों सुकरात ने छोड़ दिए। छोड़ सका सुकरात यह विकल्प इसीलिए कि भीतर अमृत को जान लिया है। जिसने अहंकार, छोड़ा, उसने अमृत को जाना।
यह सूत्र ठीक कहता है: न पश्यतो मृत्युं। ज्ञानी को मृत्यु है ही नहीं, दिखाई ही नहीं पड़ती, अनुभव में ही नहीं आती। मरते क्षण में भी ज्ञानी को मृत्यु नहीं दिखाई पड़ती। उसे तो स्वयं का शाश्र्वत जीवन ही दिखाई पड़ता रहता है। उसे तो भीतर का चैतन्य ही दिखाई पड़ता रहता है। देखता है कि देह जा रही है, मगर देह मेरी थी कब? देखता है कि मन जा रहा है, लेकिन मन मेरा था कब? देखता है कि श्वास बंद हुई जा रही है, लेकिन मैं श्वास था कब? देखता है जल्दी ही यह घर उजड़ जाएगा, मगर मैं घर तो था ही नहीं। मैं तो मेहमान था, अतिथि था। और घर तो घर भी न था, सराय थी।...
बहुत अदभुत सूफी फकीर हुआ, इब्राहिम। वह सम्राट था बल्ख और बुखारा का। एक रात अपने बिस्तर पर सोया था। और जैसे कि सम्राटों की रात होती है, उसकी भी रात थी, करवट बदलने वाली रात। सो नहीं पा रहा था। परेशान हो रहा था। करवट बदल रहा था। नींद का कोई पता न था, दूर-दूर तक कोई पता न था। कोई संभावना भी न थी। पैरों की कोई आहट भी न थी। और तभी उसने देखा उसके छप्पर पर कोई चल रहा है। सोचा, निश्र्चित कोई चोर है। या कोई हत्यारा है। चिल्लाया: कौन है? ऊपर से आवाज आई: परेशान होने की कोई जरूरत नहीं। न मैं कोई चोर हूं, न मैं कोई हत्यारा हूं। और आवाज कुछ ऐसी बुलंद थी, आवाज में कुछ ऐसी बुलंदगी थी, कुछ ऐसा बल था, इब्राहिम ठिठक रहा! तो पूछा, फिर तू कौन है? तो आवाज आई कि मेरा ऊंट खो गया है, मैं उसे खोज रहा हूं। इब्राहिम ने कहा: तू पागल है! ऊंट कहीं छप्परों पर खोजे जाते हैं? और वह आदमी खिलखिला कर हंसा, उसने कहा: हां, मैं पागल हूं; और तू समझदार है! तू आनंद खोज रहा है राजसिंहासनों पर; तो क्या कसूर है मेरा अगर मैं ऊंट खोजूं छप्परों पर? नींद तक मिल नहीं रही है तुझे और आनंद की तलाश कर रहा है! पागल मैं या पागल तू? बात ऐसी साफ थी, बात ऐसी धार वाली थी, कि इब्राहिम उठ कर बैठ गया। पहरेदारों को बुलाया और कहा कि इस आदमी को खोजो! यह आदमी कोई साधारण आदमी नहीं है। असल में जिस आदमी की मैं तलाश में था, उस तरह का आदमी है। जो मुझे जगा सकता है, उस तरह का आदमी है। जो मुझे होश दे सकता है। क्या बात इसने कही है!
मगर वह आदमी नहीं पकड़ा जा सका। उसका कुछ पता ही न चला।
दूसरे दिन इब्राहिम जब अपने दरबार में बैठा था और दरबार भरा था तो फिर उसे वही आवाज सुनाई पड़ी। इस बार दरवाजे पर। द्वारपाल के साथ वही आदमी विवाद कर रहा था। विवाद का वही ढंग था, जो रात इब्राहिम के साथ था। वही बुलंदगी, वही बल, वही कटार की धार। शब्द नहीं, अंगारे। और फिर भी फूलों से प्यारे। वह आदमी कह रहा था पहरेदार से कि मुझे ठहरने दो इस सराय में, इस धर्मशाला में। और पहरेदार कह रहा था कि अपने शब्द वापस ले लो, यह कोई सराय नहीं, यह कोई धर्मशाला नहीं, यह सम्राट का निजी महल है, निजी निवास है। वह आदमी खिलखिला कर हंसा। वह हंसी वही थी, रात की। इब्राहिम उसे भूल नहीं सकता था। जिंदगी भर नहीं भूल सकता था और अभी तो बात बड़ी ताजा थी। अभी तो रात ही यह हंसी सुनी थी। और वह आदमी फिर खिलखिलाया और उसने कहा कि मैं तुझसे कहता हूं कि यह सराय है, मुझे भीतर जाने दे। मैं सराय के उस आदमी से मिलना चाहता हूं जिसको यह भ्रांति है कि यह उसका मकान है, निवास है। यह कौन है इब्राहिम? इब्राहिम ने फौरन आदमी भेजा और पहरेदार से कहा रोको मत, उसे भीतर आने दो।
वह आदमी भीतर आया।
इब्राहिम ने कहा: मालूम होता है तुम्हारा दिमाग खराब है, यह मेरा निजी घर है और तुम इसे सराय कह रहे हो, धर्मशाला कह रहे हो! तुम्हें डर भी नहीं कि सम्राट के महल को धर्मशाला कहोगे तो सजा पाओगे! वह आदमी कहने लगा, धर्मशाला है इसलिए धर्मशाला कह रहा हूं। कैसा सम्राट? किसका निवास? मैं पहले भी आया था, तब मैंने इस सिंहासन पर एक दूसरे आदमी को देखा था; तुम इस पर कब बैठ गए? इब्राहिम ने कहा: वह मेरे पिता थे। और उसने कहा कि मैं उसके भी पहले आया था और तब मैंने एक तीसरे आदमी को बैठे देखा था। वह कौन था? इब्राहिम ने कहा: वे मेरे पिता के पिता थे। और वह आदमी कहने लगा फिर भी तुम इसे अपना मकान कह रहे हो! मैं फिर आऊंगा और तुम्हें नहीं पाऊंगा। मैं कहता हूं यह धर्मशाला है, यहां कई लोग ठहरे और आए और गए। यह सराय है। मुझे भी ठहर जाने दो! तुम भी ठहरे हो, मुझे भी ठहर जाने दो!
इब्राहिम उसके चरणों में गिर पड़ा, और उसने कहा कि तुम इस सराय में ठहरो, मैं चला! मगर तुमने मेरा जीवन धन्य कर दिया! नहीं तो मैं इसी सराय में बरबाद हो जाता।
फिर इब्राहिम बड़ा प्रसिद्ध सूफी फकीर हो गया। वह बल्ख के बाहर ही, अपनी राजधानी के बाहर ही झोपड़ा बना कर रहता था। और अक्सर उसके झोपड़े पर उपद्रव हो जाता था। क्योंकि उसका झोपड़ा एक चौराहे पर था, और वहां से राहगीर आते तो वे पूछते कि बस्ती का रास्ता कौन सा? तो वह बता देता कि बाएं जाना; खयाल रखना, बाएं जाना; दाएं मत जाना, अगर दाएं गए तो मरघट पहुंच जाओगे; बाएं गए तो बस्ती। वे बेचारे बाएं जाते, और दो-चार मील चलने के बाद मरघट पहुंच जाते। वे लौट कर गुस्से में आते, कि तुम आदमी पागल हो या क्या हो? इतना जोर देकर तुमने कहा बाएं जाना, बस्ती बाएं है, और दाएं मत जाना, दाएं मरघट है--और हमने पाया कि बाएं मरघट है! इब्राहिम कहता, तो फिर हमारी--तुम्हारी भाषा में भेद है। क्योंकि मरघट में जो लोग बस गए हैं वे उखड़ते नहीं वहां से, इसलिए उसको मैं बस्ती कहता हूं। और जिसको तुम बस्ती कहते हो, उसको मरघट कहता हूं, क्योंकि वहां जो भी बसे हैं, वे आज मरे, कल मरे, परसों मरे। वहां मौत आने ही वाली है। वहां सब कतार बांधे खड़े हैं मरने को। क्यू लगा है। जिसका नंबर आ जाए, वह मरता जाता है। उसको मैं मरघट कहता हूं। और जिसको तुम मरघट कहते हो, उसको मैं बस्ती कहता हूं; क्योंकि वहां जो बस गया, उसको तुमने कभी उजड़ते देखा! फिर उसे तुमने कभी घर बदलते देखा!
यह शरीर एक सराय है, यह मन एक सराय है, जिसने ऐसा जान लिया, जिसने ध्यान में ऐसा अनुभव कर लिया, जिसकी यह प्रतीति गहरी हो गई कि मैं शरीर नहीं हूं, मैं मन नहीं हूं, उसकी फिर कोई मृत्यु नहीं है। मैं गवाह हूं। तुम ठीक कहते सहजानंद, कि भगवान आप तो गवाह हैं, क्या सच ही बुद्धपुरुष को मृत्यु, रोग और दुख में भी आत्मरूप ही दिखाई पड़ता है? और कोई उपाय ही नहीं है। बुद्धपुरुष का अर्थ होता है: ‘मैं’ मिट गया, ‘मैं’ के साथ मिट गया सारा अंधकार, ‘मैं’ के साथ मिट गई सारी विक्षिप्तता, ‘मैं’ के साथ मिट गई सारी मूर्च्छा, निद्रा, तंद्रा, होश आया! और होश में क्या पाया कि मैं साक्षी हूं। सिर्फ साक्षी। सिर्फ द्रष्टा। शरीर को देख रहा हूं; जीवन को देख रहा हूं, मृत्यु को भी देखूंगा, लेकिन मेरा न तो जीवन है, न मेरी मृत्यु है। मैं दोनों के पार हूं। इस अतिक्रमण का नाम ही बुद्धत्व है।
जहां और भी हैं चांद-तारों के पार
आसमां और भी हैं...
अभी इश्क के इम्तहां और भी हैं
ये आखिरी इम्तहान है। इसके पार फिर कोई इम्तहान नहीं है। शरीर के साथ जुड़े हो, तो अभी संसार में हो। मन के साथ जुड़े हो, तो अभी विक्षिप्त हो। शरीर और मन से अपने को पृथक जाना, पृथक जानते ही अहंकार टूट जाता है। अहंकार है तादात्म्य शरीर और मन के साथ। निर-अहंकारिता है तादात्म्य का टूट जाना। टूटने की प्रक्रिया बड़ी सीधी है। साक्षीभाव। सिर्फ देखो। बीमारी आए तो बीमारी देखो। और स्वास्थ्य आए तो स्वास्थ्य देखो। जब भूख लगे तो भूख देखो। और जब पेट भर जाए तो तृप्ति देखो। जब प्यास लगे तो प्यास देखो। और जब कंठ प्यास से मुक्त हो जाए तो उस मुक्ति को देखो। मगर तुम दोनों हालत में देखने वाले हो। न तुम प्यास हो, न तुम प्यास की तृप्ति हो। न तुम भूख हो, न तुम भोजन के बाद हुई तृप्ति हो। तुम हर हाल में सिर्फ साक्षी हो। क्रोध आए तो क्रोध को देखो, और करुणा आए तो करुणा को देखो। काम उठे तो काम को देखो, और ब्रह्मचर्य जगे तो ब्रह्मचर्य को देखो। ब्रह्मचारी मत हो जाना! कामी ब्रह्मचारी हो जाते हैं। मतलब एक तादात्म्य छूटा, दूसरा पकड़ा। भोगी योगी हो जाते हैं। एक तादात्म्य छूटा, दूसरा पकड़ा। एक जेल से निकले नहीं कि वे दूसरे में तत्क्षण प्रविष्ट हो जाते हैं।
मैं अपने संन्यासी को कहता हूं: न तुम योगी, न तुम भोगी, तुम सिर्फ साक्षी।
न पश्यतो मृत्युं। फिर मृत्यु दिखाई नहीं पड़ती। पश्यति न रोगं नोत दुखतां। फिर न रोग दिखाई पड़ते हैं, न दुख दिखाई पड़ते हैं। नहीं, ऐसा नहीं है कि रोग नहीं आते। इस भ्रांति में मत पड़ जाना कि रोग नहीं आते। रामकृष्ण कैंसर से मरे। रमण महर्षि भी कैंसर से मरे। महावीर की मृत्यु छह महीने की लंबी पेचिश की बीमारी से हुई। बुद्ध, विषाक्त भोजन के कारण मरे। विषाक्त भोजन ने उनके सारे शरीर को रुग्ण कर दिया। लेकिन इन सूत्रों को न समझ पाने के कारण--और कैसे समझोगे जब तक ध्यान में न उतरोगे?--जैनों ने कहानियां गढ़ीं कि महावीर को बीमारी नहीं हुई; कहीं तीर्थंकर को बीमारी होती है!
तीर्थंकर को भी बीमारी होती है। दिखाई नहीं पड़ती बीमारी; मैं बीमार हूं ऐसी प्रतीति नहीं होती, बीमारी तो होती है। अगर बीमारी न होती तो तीर्थंकर मरते कैसे? तीर्थंकर भी बूढ़े होते हैं।--तुम लाख छिपाने की कोशिश करो! तुमने किसी तीर्थंकर की बूढ़ी प्रतिमा नहीं देखी होगी। सब प्रतिमाएं जवान हैं। महावीर अस्सी साल के हो कर मरे। अस्सी साल के हुए तो बूढ़े हो गए थे। लेकिन मंदिरों में जाकर तुम देखोगे तो यूं लगता है कि वे हमेशा जवान हैं। चौबीस ही तीर्थंकर जवान हैं। इनमें से कुछ की उम्र तो बहुत लंबी है। अगर शास्त्रों की मान कर चलो, तो हजारों वर्ष की है। ये तो ऐसे जराजीर्ण हो गए होंगे जिसका हिसाब नहीं! सत्तर वर्ष में तो आदमी की गति हो जाती है, दुर्गति हो जाती है, हजारों साल में तो सभी कुछ सूख गया होगा, अस्थिपंजर रह गए होंगे। लेकिन हम झूठों के आदी हैं। हम कहते हैं: तीर्थंकर को बीमारी नहीं होती। कहना चाहिए कि तीर्थंकर जानता है कि बीमारी मुझे नहीं है। यह और बात। यही छान्दोग्य का सूत्र कह रहा है--
न पश्यतो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुखतां्
ध्यान रखना, सवाल है: उसे ऐसा प्रतीत नहीं होता कि यह बीमारी मैं हूं, या मैं बीमार हूं। बीमारी तो आती है; जैसे तुम्हें आती है, उसे भी आती है। अरे, जब भूख आती है, प्यास आती है; जवानी आती है, बुढ़ापा आता है, तो बीमारी न आएगी? बीमारी भी आएगी, बुढ़ापा भी आएगा और मृत्यु भी आएगी। मगर, तीर्थंकर को जरा भी प्रभावित नहीं करती। तीर्थंकर अछूता रह जाता है, अस्पर्शित रह जाता है। यह तो बात समझ में आने की है। लेकिन यह बात मूढ़तापूर्ण हो जाती है जब तुम कहने लगते हो: बीमारी ही नहीं आती है। फिर तुम्हें न मालूम क्या-क्या कहानियां गढ़नी पड़ती हैं--झूठी कहानियां! एक झूठ को बचाने के लिए हजार झूठ गढ़ने पड़ते हैं।
तो यह कहानी गढ़नी पड़ी है जैनों को। क्योंकि यह बात को झुठलाएं कैसे कि छह महीने महावीर पेचिश की बीमारी से परेशान रहे? अब इस बात को छिपाएं कैसे? छह महीने उनको दस्त ही लगते रहे। इसी में उनकी मृत्यु हुई। तो कहानी गढ़नी पड़ी।
कहानी यह गढ़ी कि गोशालक ने उनके ऊपर तेजोलेश्या छोड़ी। गोशालक ने जादू किया--काला जादू। जैनशास्त्रों में उसका नाम तेजोलेश्या। उसने अपना सारा क्रोध, अपनी क्रोधाग्नि उनके ऊपर फेंक दी। और करुणावश वह उस क्रोधाग्नि को पचा गए। क्योंकि अगर वापस भेजें, तो गोशालक मर जाएगा। गोशालक न मरे, इसलिए वे पी गए उस तेजोलेश्या को, उस काले जादू को। स्वभावतः जब काला जादू पीया, तो पेट खराब हो गया।
अब क्या कहानी गढ़नी पड़ी! सीधी-सादी बात है कि पेट की बीमारी थी। इसमें बेचारे गोशालक को फंसाते हो, इसमें तेजोलेश्या की कहानी गढ़ते हो, इसमें करुणा दिखलाते हो--और तुम कहते हो तीर्थंकर सर्वशक्तिशाली होता है, तो तेजोलेश्या को पचा गया तो पूरा ही पचा जाना था फिर क्या पेट खराब करना था! पचा ही जाता पूरा! फिर पेट कैसे खराब हुआ? पचा नहीं पाया। नहीं तो पेट खराब नहीं होना था। पची नहीं तेजोलेश्या।
झूठों से झूठ दबाए नहीं जा सकते।
बुद्ध के संबंध में यही उपद्रव खड़ा हुआ। उनको जो भोजन दिया गया,...एक गरीब ने उनको निमंत्रित किया और भोजन दिया, भोजन विषाक्त था।...अब बुद्ध विषाक्त भोजन किए, तो कहानी गढ़नी पड़ी। क्योंकि बौद्धों की धारणा कि बुद्ध तो त्रिकालज्ञ होते हैं, वे तीनों काल जानते हैं, उनको इतना ही नहीं दिखाई पड़ा कि यह भोजन जो है विषाक्त है, इसको मैं न लूं! अब कैसे इसको छिपाएं? तो छिपाना पड़ता है। छिपाने के लिए बड़ी तरकीबें खोज ली जाती हैं। कि कहीं इसको दुख न हो, अगर मैं कहूं कि यह भोजन विषाक्त है तो इस बेचारे ने मुझे निमंत्रित किया, इसको कहीं दुख न हो, इस कारण बिना कहे विषाक्त भोजन ले लिया। लेकिन कहो या न कहो, आखिर विषाक्त भोजन का परिणाम तो हुआ ही! और परिणाम हुआ तो उस आदमी को भी पता चला ही!
क्या मतलब इसका?
मगर वह त्रिकालज्ञ होते हैं, इस धारणा को बचाए रखने के लिए यह झूठी कहानी गढ़नी पड़ी। कि दयावश। कि कहीं इसे दुख न हो, इसलिए चुपचाप भोजन कर लिया--जहर पी गए। और सर्वशक्तिमान होते हैं। तो फिर जब जहर पी गए थे तो विषाक्त नहीं होना था शरीर। लेकिन शरीर तो शरीर के नियम से चलता है। फिर चाहे बुद्धों का शरीर हो और चाहे बुद्धुओं का शरीर हो, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। शरीर के अपने नियम हैं। शरीर का अपना गणित है। शरीर प्रकृति का हिस्सा है। और प्रकृति कोई अपवाद नहीं करती। तो जो परिणाम होना था, वह हुआ। मृत्यु उससे फलित हुई।
मृत्यु भी होती है, बीमारी भी होती है, बुढ़ापा भी होता है। फिर भी जो साक्षीभाव को उपलब्ध हो गया है, वह सिर्फ देखता रहता है, उसका कहीं भी ऐसा ताल-मेल नहीं बैठ जाता कि मैं बीमार हूं। यह बात उठती नहीं, यह बात जुड़ती नहीं उसके भीतर। इसलिए बीमारी के बीच भी वह परम स्वस्थ होता है। बीमारी परिधि पर होती है, केंद्र पर स्वास्थ्य होता है। और वही स्वस्थ शब्द का अर्थ भी है: स्वयं में स्थित। बीमारी चारों तरफ रही आए, मगर वह अपने स्वयं में स्थित होता है; वह अपने स्वयं के केंद्र पर थिर होता है; वहां कुछ हिलता नहीं, डुलता नहीं; ज्यूं था त्यूं ठहराया, वह वहीं ठहरा होता है। मौत भी आती है, वह भी परिधि पर आती है। और केंद्र पर तो वही चिन्मय ज्योति, वही अमृत झरता रहता है।
मैं इसका गवाह हूं।
इसलिए जो मैं सूत्र की व्याख्या कर रहा हूं, वह कोई शाब्दिक व्याख्या नहीं है। मुझे किसी शास्त्र में कोई रस नहीं है। किसी शास्त्र का समर्थन करना चाहिए, ऐसा आग्रह नहीं है। जब तक मेरी बात से, मेरे अनुभव से किसी चीज का तालमेल न हो, मैं समर्थन नहीं करता हूं। इस सूत्र का मैं पूर्ण समर्थन करता हूं। बुद्धत्व में मृत्यु का कोई अनुभव नहीं है। न रोग का, न दुख का। सब घटता है, बाहर से सब दिखाई पड़ता है,...
रामकृष्ण को गले का कैंसर था। आखिरी-आखिरी दिनों में कुछ सप्ताह तक तो भोजन भी नहीं ले सकते थे। पानी भी पीना अंतिम दिनों में बंद हो गया था। गला बिलकुल अवरुद्ध हो गया था। गला क्या था, घाव हो गया था सिर्फ। उसमें से पानी पीना भी महापीड़ादायी था। और बिना पानी के जीना भी महापीड़ादायी था। विवेकानंद ने रामकृष्ण से कहा कि अगर आप एक बार भी मां काली को कह दें, तो सब अभी ठीक हो जाए। आप कह क्यों नहीं देते? आप क्यों व्यर्थ का दुख झेल रहे हैं? और रामकृष्ण मुस्कुराते। क्योंकि बाहर से तो यही दिखाई पड़ रहा है कि महादुख है, मगर विवेकानंद को भीतर का कुछ भी पता नहीं है। रामकृष्ण को भीतर कोई दुख नहीं है। दुख विवेकानंद और रामकृष्ण के बीच में है। विवेकानंद बाहर हैं दुख के, रामकृष्ण भी बाहर हैं। रामकृष्ण भीतर की तरफ बाहर हैं--और विवेकानंद बाहर की तरफ बाहर हैं--दोनों को दुख दिखाई पड़ रहा है, दोनों साक्षी हैं। मगर विवेकानंद को स्वभावतः अनुभव होता है कि इतनी पीड़ा है, पानी भी नहीं पी सकते, गर्मी के दिन हैं, प्यास से लोग मरे जा रहे हैं और इनको एक घूंट भी पानी पिलाना मुश्किल है--यह कैसा महाकष्ट! ऐसे परमहंस को यह कैसा महाकष्ट!!
इससे विवेकानंद केवल इतनी खबर देते हैं कि अभी उनको साक्षी का अनुभव नहीं हुआ। उनका प्रश्न एक साधारण व्यक्ति का प्रश्न है, जिसको साक्षी का कोई अनुभव नहीं हुआ। यह किसी बुद्धपुरुष का प्रश्न नहीं है--हो नहीं सकता। क्योंकि अगर विवेकानंद को साक्षी का अनुभव हुआ होता, तो यह बात उठती ही नहीं।
लेकिन जब रोज-रोज विवेकानंद कहने लगे, तो रामकृष्ण सीधे-सादे आदमी थे, चोट भी करते थे तो बहुत परोक्ष करते थे, सीधी नहीं करते थे, उन्होंने कहा, ठीक है, तू इतना परेशान हो रहा है, तो आज मैं आंख बंद करके काली से कहे देता हूं। आंख बंद की, और फिर आंख खोल कर कहा कि मैंने कहा, मगर काली ने क्या कहा, मालूम?...अब यह सिर्फ विवेकानंद को समझाने के लिए है। क्योंकि कहां काली! और क्या कहना काली से! साक्षी को जो उपलब्ध हो गया है, उसके लिए काली इत्यादि सब खेल हैं, बच्चों के खेल हैं, खिलौने हैं। यह सब खिलौने हैं। चाहे तुम हनुमान के मंदिर में पूजा करो और चाहे गणेशजी की मूर्ति बना कर पूजा करो और चाहे काली की मूर्ति बनाओ, ये सब खिलौने हैं नासमझों के लिए। और नासमझों के ही द्वारा निर्मित हो रहे हैं। और नासमझ ही इनके पीछे बड़ा शोरगुल मचाए फिरते हैं। यह कुछ ज्ञानियों की बातें नहीं हैं!...
पर रामकृष्ण तो उस भाषा में बोले जो विवेकानंद की समझ में आए। कहा कि मैंने कहा, तू नहीं माना तो मैंने कहा काली को; और तुझे पता है, काली ने मुझे बहुत डांटा! विवेकानंद ने कहा, डांटा? कहा कि हां, बहुत डांटा और कहा कि ज्ञानी होकर ऐसी अज्ञानपूर्ण बातें करता है! और काली एकदम नाराज हो गई, और कहने लगी कि चुप, कभी दुबारा इस तरह की बात मत करना! अगर एक कंठ से जल जाना बंद हो गया, तो इतने सारे कंठ उपलब्ध हैं, ये भी तो तेरे ही कंठ हैं, इनसे ही जल पी! इस कंठ से तो बहुत काम ले लिया, अब कब तक इसी पर अटका रहेगा? सारे कंठ तेरे हैं। यह विवेकानंद का ही कंठ है, यह भी तेरा है, जब प्यास लगे, इसी कंठ से पी लिए। तो रामकृष्ण ने विवेकानंद से कहा, जब मुझे प्यास लगे, तू पानी पी लिया कर। अब तो सब कंठ मेरे हैं। काली ने देख तेरी बात मैंने क्या कही, मुझे बहुत डांटा! इस तरह की बातें अब दुबारा मत कहना! तेरी बात मान कर मैंने कहा और झंझट में मैं पड़ा।
मैं जानता हूं कि यह पूरी की पूरी रामकृष्ण बात सिर्फ विवेकानंद को समझा रहे हैं। न तो काली से उन्होंने कहा है, न कह सकते हैं, न कहने की कोई बात है। न कहने को कोई काली है कहीं। यह सिर्फ ऐसा है जैसे हम छोटे बच्चों को किताब जब पढ़ाना शुरू करते हैं तो कहते हैं: आ आम का, ग गणेश का। और अब थोड़ी बता बदल गई है, अब कहते हैं: ग गधे का। क्योंकि राज्य जो है हमारा, वह सेक्युलर है, वह धर्मनिरपेक्ष है, इसमें गणेश को लाओ तो धर्म आ जाए, तो ग गधे का। गधा बिलकुल ही निरपेक्ष प्राणी है। न हिंदू, न मुसलमान, न ईसाई, न जैन। गधा तो बिलकुल ही पार जा चुका। परमहंस है। उसको कुछ लेना-देना नहीं मंदिर से, मस्जिद से। कभी देखो तो मस्जिद के सामने बैठा है, कभी देखो तो मंदिर के सामने बैठा है। उसको सब बराबर। तुम उस पर कुरान लादो तो इनकार नहीं, और गीता लादो तो इनकार नहीं। उसको तो ढोना है। वह ढो देगा। वह जरा चिंता नहीं करता कि तुमने किसको उसके ऊपर लाद दिया है!
तो अब बच्चों को पढ़ाया जाता है: ग गधे का; आ आम का। ताकि बच्चे को आ और ग समझ में आने शुरू हो जाएं। लेकिन जिंदगी भर जब भी ग पढ़ो, पहले कहो ग गधे का और फिर ग पढ़ो, तब तो पढ़ना ही मुश्किल हो जाए। एक शब्द को पढ़ने में कितनी देर लग जाए! उसमें ग आ जाए तो गधे का, और आ आ जाए तो आम का--और तब आम और गधों में इतने खो जाओगे!...और ब बंदर का और हा हाथी का, पूरा जंगल ही खड़ा हो जाएगा! वह जो शब्द था, उसका तो पता ही नहीं चलेगा, यह जंगली जानवरों में ही खो जाओगे।
वह ग गधे का पहली कक्षा में ठीक। फिर गधे को भूल जाना है, ग को याद रखना है। फिर ग किसी का नहीं, न गधे का, न गणेश का, ग सिर्फ ग है। जिस दिन तुम्हारा ग गधे और गणेश से मुक्त हो जाता है, उस दिन तुम समझना कि तुम सीख गए ग। जब तक वह ग गधे और गणेश से बंधा रहे, तब तक तुमने सीखा नहीं। और अगर हमेशा के लिए बंध जाए, तो तुम पागल हो।
काली है और हनुमान हैं, यह सब पाठ पढ़ाने के लिए ठीक है। मगर लोग इन्हीं के सामने बंधे बैठे हैं। कुछ लोग जो जिंदगी भर हनुमान चालीसा ही पढ़ रहे हैं। इनकी जिंदगी व्यर्थ गई! निरर्थक गई!
जीवन की सार्थकता साक्षीभाव में है।
रामकृष्ण ने वही कहा कि मुझे कोई पीड़ा नहीं हो रही है, तू पी लेना पानी, काम चल जाएगा। मैंने पीया कि तूने पीया, सब बराबर है।
सर्वं ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति
सर्वश इति।
वह सबको आत्मरूप देखता है। जैसे ‘मैं’ गया, सब आत्मरूप हो जाते हैं। और सब कुछ प्राप्त कर लेता है। मैं क्या गंवाया, सब संपत्ति मिल गई। ‘मैं’ के साथ विपत्ति ही विपत्ति है; दुख ही दुख है, नरक ही नरक है। तुमने मैं से कभी कोई सुख पाया? तुमने अहंकार से कभी कोई आनंद पाया? मगर अहंकार को भरने के लिए ही दौड़े चले जा रहे हो। इससे बड़ी मूढ़ता इस संसार में दूसरी नहीं है।
अहंकार की मूढ़ता को देखो। अहंकार से मुक्त हो जाओ। और मुक्त होना कठिन नहीं। सिर्फ छोटी सी प्रक्रिया है, छोटी सी कुंजी,...कुंजी तो हमेशा छोटी होती है। ताले कितने ही बड़े हों, कुंजियां तो छोटी होती हैं। जरा सा राज होता है कुंजी का और ताला खुल जाता है। कुंजी न हो तो ताला खुलना मुश्किल हो जाता है। हथौड़ी से तोड़ो तो शायद और भी मुश्किल हो जाए। फिर शायद कुंजी भी मिल जाए तो काम न आए। और तुम्हारे ताले ऐसी ही हालत में हो गए हैं। हथौड़ियां तो तुमने बहुत मारी हैं, कुंजियों की तलाश नहीं की। इसलिए अब जब कुंजी भी मिल जाती है, तो बड़ी देर लगती है, मुश्किल होती है। यह मुश्किल तुम्हारे ताले के साथ किए गए दुर्व्यवहार के कारण है। अन्यथा कुंजी सीधी-साफ है।
कुंजी इतनी ही है कि चलते समय जाग कर चलो, देख कर चलो, कि जो चल रहा है वह शरीर है, मैं अचल हूं। मैं सिर्फ देख रहा हूं कि शरीर चल रहा है। यह बायां पैर उठा, यह दायां पैर उठा; यह मैं बाएं मुड़ा, यह दाएं मुड़ा...ऐसा कुछ शब्द दोहराने की जरूरत नहीं है, सिर्फ देखते रहो! जैसे कोई किसी और को चलते हुए देख रहा हो। और जब विचार भीतर चलें--जो कि प्रतिपल चल रहे हैं--तो देखते रहो कि विचार चल रहे हैं। लड़ो मत, पकड़ो मत। यह अच्छा विचार है, इसको छाती से मत लगा लो; और यह बुरा विचार है, इसको धक्के देकर निकालने मत लगो; नहीं तो झगड़े में पड़ गए। साक्षी गया, कर्ता हो गए। कर्ता हुए कि अहंकार आया। लड़ना मत, झगड़ना मत, विचार को देखना, सिर्फ देखना। कुछ करना ही नहीं है, सिर्फ देखना है। बैठ कर घड़ी भर, जब सुविधा मिल जाए, देखते रहना, विचारों का सिलसिला लगा है। जैसे कोई रास्ते के किनारे बैठ जाए और रास्ते पर चलते हुए लोगों को देखे; नदी के किनारे बैठ जाए, नदी की धार को बहते हुए देखे, ऐसे ही मन की धार को भी देखना।
और मत सोचना कि मेरा मन। क्योंकि मेरा मन है, तो आग्रह आ जाते हैं। कि अच्छे-अच्छे विचार आएं, सुंदर-सुंदर विचार आएं; फूल लगें, कांटे न लग जाएं; कोई बुरा विचार न आ जाए; बस, फिर तुम मुश्किल में पड़े! तुमने मेरा माना कि अहंकार जगना शुरू हो गया। तुम्हारा कुछ भी नहीं है। क्या लेना-देना है! देखते रहना है। जैसे फिल्म पर तुम कुछ आग्रह नहीं रखते, पर्दे पर फिल्म चलती है, तुम देख रहे हो, यूं देखते रहना है।
और तुम चकित होओगे, शरीर को देखते-देखते शरीर से छुटकारा हो जाता है; मन को देखते-देखते मन से छुटकारा हो जाता है। रफ्ता-रफ्ता, आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हारे भीतर एक नई चीज पैदा होने लगती है, एक नया सूत्र जन्मता है: साक्षी का। सिर्फ द्रष्टा का। और वही द्रष्टा जिस दिन अपनी पराकाष्ठा को पहुंचता है, संबोधि बन जाती है, समाधि बन जाती है। उस दिन दूर रह गए बहुत शरीर और मन, और दूर रह गए शरीर और मन के खेल, उस दिन तुम अपनी परम सत्ता में विराजमान हो जाते हो। वहीं परम आनंद है, परम जीवन है।
ओशो, मुझे आपकी बातें बहुत रसपूर्ण लगती हैं। लेकिन मैं रंग-मंच का अभिनेता होने के नाते अभिनय कला की गहराई में जाना चाहता हूं। इसलिए संन्यास के लिए मेरी अभी तैयारी नहीं है। और न ही मैं केवल एक गैरिक रंग में सीमित होना चाहता हूं। मैं रंग-बिरंगे वस्त्रों में रुचि रखता हूं, क्योंकि जीवन भी तो रंग-बिरंगा है, इंद्रधनुषी है। क्या मैं बिना आपका संन्यासी हुए समय-समय पर आपके दर्शन को आ सकता हूं?
बुद्ध ने तो संन्यास के लिए जो शब्द उपयोग किया है, दीक्षा के लिए, वह शब्द ही ऐसा है कि उसका अर्थ होता है: नदी में उतरना--स्रोतापन्न--स्रोत में उतर जाना। दीक्षा को बुद्ध ने कहा है: स्रोतापन्न। जो व्यक्ति नदी में उतर आता है। मगर उतने से ही काम नहीं होता। नदी में भी उतर कर तुम खड़े रहो, तो भी प्यासे ही रहोगे। इसलिए तो कहते हैं, घोड़े को नदी तक ले जाया जा सकता है, मगर पानी पीने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। क्या करोगे तुम? तुम नदी में उतर कर खड़े हो गए, तो भी नदी तुम्हारे कंठ तक नहीं पहुंच जाएगी। तुम्हें अंजुलि बनानी पड़ेगी हाथों की, तुम्हें झुकना पड़ेगा, तुम्हें नदी से पानी अपने हाथों में भरना पड़ेगा, तुम्हें पानी को अपने कंठ तक ले जाना पड़ेगा, तब प्यास बुझेगी।
संन्यास कुछ और नहीं है, सिर्फ तुम्हारे झुकने का एक आयोजन है। कोई गैरिक वस्त्रों से थोड़े ही संन्यासी होता है, यह तो केवल तुम्हारे झुकने की एक सूचना है। अगर तुम मेरी बात मान कर कपड़े भी नहीं बदल सकते, तो क्या खाक और बदलोगे!
तुम कहते हो: ‘मेरी रुचि तो रंग-बिरंगे वस्त्रों में है!’
अगर तुम्हारी रुचि मेरे साथ जुड़ कर इतना भी बदलने को राजी न हो, तो फिर और दूसरी बातों में तो बहुत अड़चन आ जाएगी। फिर आगे तो और बड़े मामले उठेंगे, जहां और बहुत सी बदलाहटें करनी होंगी। यह कपड़े से तो सिर्फ शुरुआत है, तुम्हारी अंगुली पकड़ना है और कुछ भी नहीं। और अंगुली हाथ में आ गई तो पहुंचा भी आ जाएगा। मगर तुम अंगुली ही न पकड़ने दो, तो पहुंचा हाथ में नहीं आ सकेगा।
और यह तुमसे किसने कहा कि जीवन रंग-बिरंगा है? अभी तुमने जीवन जाना कहां! जीवन को ही जान लो, फिर संन्यास की कोई आवश्यकता नहीं है। जीवन को जानने की ही विधि तो संन्यास है। और मेरी बातें तुम्हें रसभरी लग रही हैं, इसीलिए लग रही हैं कि अभी तुमने जीवन नहीं जाना है। इसीलिए तो जीवन के संबंध में जो मैं कह रहा हूं, वह तुम्हें रस भरा लग रहा है। अगर जीवन को ही जान लोगे, तो बातों में फिर क्या रखा है!
कबीर और फरीद मिले, दो दिन साथ रहे, दोनों चुप रहे, बोले ही नहीं। और जब फरीद के शिष्यों ने पूछा, और कबीर के शिष्यों ने कबीर से पूछा, कि आप बोले क्यों नहीं? दोनों चुप क्यों रहे? हम बड़े आतुर थे सुनने को। तो फरीद ने कहा: हम बोलते क्या? जो मैं जानता हूं, उसे वे भी जानते हैं। जिस जीवन को मैंने चखा, उसको उन्होंने भी चखा। अब कहना क्या है? कबीर से पूछा, कबीर ने कहा: क्या, तुम पागल हो? क्या बोल कर मैं सिद्ध करता कि मैं अज्ञानी हूं? तुम्हारे सामने बोलता हूं, क्योंकि तुमने जीवन को नहीं जाना, इसलिए जीवन की तुम्हें कुछ खबर देनी है, मगर फरीद से क्या बोलना है? हम तो दोनों एक ही तट पर बैठे हैं। हम तो दोनों एक ही जगह हैं। बोलने को क्या बचा है?
अभी तुमने जीवन जाना नहीं। और अगर तुम जीवन जानोगे तो तुम चकित होओगे कि जीवन का रंग शुभ्र है, सफेद है, रंग-बिरंगा नहीं है। यह तो जीवन जब खंडित होता है तो रंग-बिरंगा होता है। जैसे सूरज की किरण तो सफेद होती है, सूरज की किरण को जब हम कांच के टुकड़े--प्रिज्म--में से गुजारते हैं, तो वह सात रंगों में टूट जाती है। ऐसे ही इंद्रधनुष बनता है। इंद्रधनुष हमेशा नहीं बनता। तुमने खयाल किया, इंद्रधनुष बनने के लिए खास परिस्थिति चाहिए। वह परिस्थिति यूं होनी चाहिए--
वर्षा के दिन हों। ताकि हवाओं में जल के छोटे-छोटे कण तैर रहे हों। फिर आकाश में बदलियां न हों सूरज निकला हो। या कम से कम बदलियों के बीच से सूरज झांक रहा हो। ताकि सूरज की किरणें हवा में लटकी हुई छोटी-छोटी बूंदों को पार कर सकें। वे बूंदें प्रिज्म का काम करती हैं। उन बूंदों से जैसे ही सूरज की किरण पार होती है, सात टुकड़ों में टूट जाती है। इस तरह इंद्रधनुष बनता है। इंद्रधनुष होता नहीं तुम अगर जाओगे वहां तो कुछ भी न पाओगे। अगर मुट्ठी बांधोगे तो सिर्फ हाथ गीला हो जाएगा और कुछ भी नहीं। कोई रंग हाथ न लगेगा।
जीवन इंद्रधनुष नहीं है, जीवन तो शुभ्र किरण है। इसलिए महावीर ने ध्यान की परम अवस्था को शुक्ल ध्यान कहा है। शुभ्र। वहां सब सफेद हो जाता है। वहां कोई रंग नहीं बचता।
ध्यान रखना, सफेद कोई रंग नहीं है। सफेद सब रंगों का स्रोत है और सब रंगों का अंत भी। प्रारंभ भी और समाप्ति भी। आदि भी और अंत भी। सफेद पहले है और सफेद बाद में--और बीच में सब रंगों का झमेला है। तुम जब कहते हो, मेरी रंगों में रुचि है, तो उसका अर्थ है कि झमेले में रुचि है। अभी इंद्रधनुष में रुचि है, मतलब अभी झूठ में रुचि है। अभी झूठ प्यारे लगते हैं। इंद्रधनुष बिलकुल झूठी चीज है। किरण सत्य है। इंद्रधनुष तो किरण का टूट जाना है, विकृत हो जाना है, खंडित हो जाना है। जिस दिन तुम जीवन को जानोगे, उस दिन तो तुम पाओगे कि जीवन शुक्ल है, सफेद है, शुभ्र है। कोई रंग नहीं है। सारे रंग खो जाते हैं।
और तुम कहते हो कि ‘मैं रंगमंच का अभिनेता होने के नाते अभिनय कला की गहराई में जाना चाहता हूं। इसलिए संन्यास के लिए मेरी अभी तैयारी नहीं है।’
तो तुमने मेरी बात बिलकुल भी नहीं समझी। मैं तो कह ही यह रहा हूं कि संन्यास का अर्थ है: अभिनय की कला। अगर तुम्हें सच में अभिनेता होना है, तो संन्यासी के अतिरिक्त तुम कहां अभिनय सीखोगे? यह जो मैंने अभी तुमसे बात कही, छांदोग्य के सूत्र पर, इसका अर्थ साफ है कि जीवन को अभिनय की तरह देखो। तुम साक्षी रहो। जीवन के साथ तादात्म्य न कर लो। जैसे रामलीला में कोई राम बना, तो राम नहीं बन जाता। जानता है कि यह तो सिर्फ अभिनय कर रहा हूं, मैं तो वही हूं जो हूं। कोई धनुषबाण लेकर आ गया हूं, तो कोई राम नहीं हो गया हूं! कि पीछे सीता मैया चल रही हैं और उनके पीछे लक्ष्मण जी चल रहे हैं तो मैं कोई राम हो गया! वह जानता है कि न सीता मैया सीता मैया हैं...जहां तक तो मैया होंगी ही नहीं, कोई भैया होंगे! मूंछें-वूंछें मुड़ा कर और रंग-रोगन करके खड़ा कर दिया होगा। भलीभांति जानता है कि यह भैया हैं, कोई सीता मैया नहीं हैं।
एक आदमी राम बना। उसके मित्रों ने उससे पूछा बाद में कि और सब तो ठीक है, लेकिन एक बात तो बताओ यार कि रामचंद्र जी और सीता मैया के बीच कोई शारीरिक संबंध हुए थे कि नहीं? क्योंकि रामलीला में उसका कोई उल्लेख ही नहीं आता। यह तो पता चलता है कि गर्भवती हो गईं। मगर गर्भवती होने के पहले क्या हुआ, इसका तो कुछ पता ही नहीं चलता। कब गर्भवती हो गईं? उस आदमी ने कहा: भाई, मुझे पता नहीं है कि असली राम ने सीता मैया के साथ कोई शारीरिक संबंध किए थे कि नहीं, वह तो मुझे पता नहीं, मगर मैंने किए हैं, यह मैं तुम्हें बताए देता हूं! कि वे जो सीता मैया बनी हैं, गर्भवती हुई कि नहीं, मुझे पता नहीं, वह भगवान जाने--राम ही जानें--मगर मैंने नहीं छोड़ा। अब रामचंद्रजी ने छोड़ा कि नहीं, वह वे समझें!
राम तुम बने, तो राम नहीं हो गए हो। सिर्फ अभिनय कर रहे हो। अभिनय का अर्थ ही है कि तुम्हें साक्षी रहना है। और वही तो संन्यास है। संन्यासी इस पूरे जगत को अपनी मंच बना लेता है। यह पूरा जगत उसके लिए लीला हो जाती है। उठता है, बैठता है, काम करता है, लेकिन अब उसे किसी भी काम में तादात्म्य नहीं है। वह किसी काम में अपने को जोड़ नहीं लेता। भीतर अलग-थलग बना रहता है।
और यही तो अभिनय की आधारशिला है कि तुम भीतर अलग-थलग बने रहो। प्रेम दिखलाओ, क्रोध दिखलाओ, दुख दिखलाओ, और भीतर अलग-थलग बने रहो।
मेरे गांव में रामलीला होती थी, तो मुझे रामलीला देखने में बहुत उत्सुकता नहीं थी, मुझे उत्सुकता रहती थी परदे के पीछे क्या हो रहा है? क्योंकि मेरी हमेशा से उत्सुकता परदे के पीछे क्या होता है, उसी में है। परदे के बाहर तो सब ठीक है। तो मैं परदे के पीछे। वह जो गांव के मैनेजर थे रामलीला के, वे कहें कि तू भी अजीब है! सारा गांव बाहर बैठा है और तुझे क्या पड़ी है कि तू परदे के पीछे बैठता है आकर! मैंने कहा: मुझे यहीं देखना है। आपको कोई एतराज है? उन्होंने कहा: मुझे कोई एतराज नहीं है, बैठ, तू देख! तो मैं बैठा रहता एक कोने में, देखता रहता। वहां मैंने जो-जो गजब दृश्य देखे, वह जो परदे के सामने बैठे थे, उन्होंने देखे ही नहीं, वे चूक ही गए! वहां मैंने देखा कि सीता मैया बीड़ी पी रही है! अरे, मैंने कहा, गजब हो गया!! सीता मैया और बीड़ी पी रही हैं! मैंने वहां देखा कि रामचंद्र जी हनुमान जी को चाय पिला रहे हैं। हद हो गई! मैंने वहां देखा कि रामचंद्र जी और रावण एक ही प्लेट से भजिया खा रहे हैं!
असली चीज मैंने देखी।
वह जो परदे पर चलता है, वह कुछ और ही है। वहां धनुषबाण खिंचे हैं और एकदम युद्ध चल रहा है और कोई कल्पना कर सकता है कि रामचंद्र जी और रावण जी एक ही प्लेट में भजिया खा रहे हैं! पहले तो भजिया खाएं रामचंद्र जी, यही कल्पना नहीं आती! रामचंद्र जी और भजिया का क्या संबंध? भीतर तो वे फिर भी जानते होंगे परदे में जाकर, मंच पर जाकर कि यह सिर्फ एक अभिनय है।
संन्यासी पूरे जीवन को अभिनय बना लेता है। इसलिए संन्यास से बड़ी कोई अभिनय की कला सीखने का उपाय नहीं हो सकता। अगर, नितिन चौधरी, सच में ही तुम रंगमंच के अभिनेता होना चाहते हो, तो, तो तुम्हें संन्यासी हो ही जाना चाहिए। तो मैं तुम्हें रंगमंच का ही अभिनेता नहीं, जीवन के सारे मंच का अभिनेता बना दूंगा। इसीलिए तो मैं अपने संन्यासी को नहीं कहता कि तू जंगल भाग जा। जरूरत नहीं है भागने की। अभिनय है यह सब, तो भागना कहां है? भागने की जरूरत क्या है? जो भागता है, वह तो गंभीरता से ले रहा है। वह तो समझ रहा है कि यहां रहूंगा तो फंस जाऊंगा। अगर यहां रुका तो अटक जाऊंगा। अभी उसे साक्षीभाव नहीं जन्मा है, नहीं तो जंगल किसलिए जाएगा? जंगल सिर्फ मूढ़ जाते हैं। जिनको बोध नहीं है, वे जाते हैं। त्याग केवल बुद्धू करते हैं। एक तो भोग का चक्कर था, फिर त्याग का चक्कर शुरू होता है। और त्याग का चक्कर और भी बड़ा चक्कर है। उसमें जो पड़ा, वह बिलकुल घनचक्कर हो जाता है। भोग ही काफी चकरा देता है, कुछ बचा होता है थोड़ा-बहुत तो वह योग चकरा देता है।
मेरे संन्यासी को भोगी से त्यागी नहीं होना है। अगर वह त्यागी है, तो भी उसे साक्षी होना है। अगर वह भोगी है, तो भी उसे साक्षी होना है। वह कहीं से भी आए, किसी दिशा से, उसे एक ही काम करना है: साक्षी होना है। चाहे वह दुकान करता हो, चाहे दफ्तर में काम करता हो, चाहे गरीब हो, चाहे अमीर हो, चाहे अभिनेता हो, चाहे वेश्या हो, चाहे महात्मा हो, कुछ भेद नहीं पड़ता, संन्यास की प्रक्रिया एक है। वेश्या के लिए अलग और संतों-महंतों के लिए अलग, ऐसा नहीं है, प्रक्रिया एक है। इसलिए मैं कहता हूं कि वेश्या वेश्या रहते हुए भी परम मोक्ष को उपलब्ध हो सकती है। सिर्फ साक्षीभाव।
और क्या अड़चन है!
मैं तो ऐसा अनुभव करता हूं कि शायद वेश्या पत्नी से जल्दी साक्षी भाव को उपलब्ध हो सकती है। क्योंकि पत्नी को तो आग्रह होता है पति पर कि ‘मेरा।’ वेश्या को तो क्या आग्रह हो सकता है! कोई उसका नहीं। ये पति रोज बदल जाते हैं। वहां कोई पति ही नहीं है। तो ‘मेरे’ का सवाल नहीं है। मैं तो कहता हूं कि वेश्या को कोई अड़चन नहीं है मोक्ष पाने में। शायद सुविधा है।
अभिनेता को भी सुविधा है--ज्यादा सुविधा है बजाय तुम्हारे संतों-महात्माओं के। क्योंकि संत-महात्मा तो बड़े अकड़ जाते हैं, बड़े जकड़ जाते हैं। किसी ने मुंहपट्टी बांध ली, तुम उससे कहो कि मुंहपट्टी छोड़ दो, तब तुम्हें पता चलेगा कि इसने संसार छोड़ा कि नहीं?...कहता है संसार छोड़ दिया, मुंहपट्टी छोड़ नहीं सकता; क्या खाक संसार छोड़ा होगा, मुंहपट्टी नहीं छोड़ सकता! एक चार इंच का टुकड़ा बांधे हुए है मुंह पर, उसको छोड़ नहीं सकता। और संसार छोड़ आया! गजब का त्याग है!!
मैंने आचार्य तुलसी से यही कहा कि आप मुंहपट्टी छोड़ दो, मैं समझ लूंगा कि आप त्यागी हैं। उन्होंने कहा, क्या कहा? मुंहपट्टी कैसे छोड़ी जा सकती है! अरे, मैं तेरापंथी साधु हूं, सात सौ साधुओं का आचार्य हूं, मुंहपट्टी कैसे छोड़ सकता हूं! मैंने कहा, अगर मुंहपट्टी नहीं छोड़ सकते, तो क्या छोड़ा होगा? अभी मुंहपट्टी के प्रति भी साक्षीभाव नहीं है, तो इतने विराट संसार के प्रति क्या साक्षीभाव होगा!
मेरे देखे अभिनेता ज्यादा कुशलता से संन्यासी हो सकता है। क्यों? क्योंकि उसका अभिनय रोज बदल जाता है। कभी राम बनता है, कभी रावण बनता है। जब जैसी जरूरत हो जाती है। कभी तो एक ही साथ एक ही नाटक में दो-दो, तीन-तीन काम भी करने पड़ते हैं। जैसी जरूरत पड़ जाए। कभी कोई अभिनेता बीमार पड़ जाता है तो उसका भी काम उसको कर देना पड़ता है। और नाटक तो रोज बदलते रहते हैं। आज इस नाटक में काम कर रहा है, परसों दूसरे नाटक में काम कर रहा है। कभी कालिदास के नाटक में है, कभी भवभूति के नाटक में है, कभी बाणभट्ट के नाटक में है। नाटक बदलते रहते हैं। तो किसी से तादात्म्य नहीं हो पाता। जो आदमी जिंदगी भर एक ही दुकान पर बैठा रहा, स्वभावतः तादात्म्य हो जाएगा। लेकिन रोज दुकान बदलती रहे, तो कैसे तादात्म्य होगा? कभी सराफे की दुकान पर बैठ गए, कभी कपड़े की दुकान पर बैठ गए, कभी मिठाइयों की दुकान पर बैठ गए, तो वह क्या समझेगा अपने को? मैं मिठाईवाला हूं, सराफ हूं, क्या समझेगा? पकड़ने की सुविधा ही नहीं मिलेगी; धार बहती ही रही, रोज चीजें बदलती ही रहीं, इस बदलाहट की दुनिया में वह कैसे कुछ पकड़ेगा?
अभिनेता किसी और दूसरे धंधे की बजाय ज्यादा कुशल संन्यासी हो सकता है। और इससे उलटा भी सच है--स्वभावतः कि संन्यासी जितना कुशल अभिनेता हो सकता है उतना कोई दूसरा नहीं हो सकता है। क्योंकि उसने तो जीवन को ही अभिनय बना लिया, उसका तो तादात्म्य कहीं भी नहीं है। अब मंच में और जीवन में उसे कुछ फर्क ही नहीं है। उसकी अभिनय की कला बड़ी सहज और स्वाभाविक हो जाएगी। कृत्रिम नहीं होगी। और वही तो महान कलाकार का लक्षण है कि कला स्वाभाविक हो, सहज हो, स्वस्फूर्त हो।
नितिन चौधरी, अगर सच में ही तुम गहराई में जाना चाहते हो अभिनय कला की, तो मैं तुम्हें वह गहराई सिखा सकता हूं। कोई और तुम्हें सिखा भी नहीं सकेगा; क्योंकि या तो यहां भोगी हैं और या यहां त्यागी हैं। मैं दोनों नहीं हूं। मेरे लिए दोनों अभिनय हैं। कुछ भेद नहीं पड़ता। तुम किस तरह का अभिनय करते हो, संत-महंत बने हो, चोर-लुटेरे बने हो, कुछ फर्क नहीं पड़ता। तुम जो भी कर रहे हो, इतना भर ध्यान रहे कि मैं सिर्फ द्रष्टा हूं। मगर भूल जाता है, भूल-भूल जाता है। जरा सी कोई घटना घटती है और हम भूल जाते हैं।
ऐसा हुआ।
एक नाटक हो रहा था और बंगाल के बहुत बड़े विद्वान ईश्र्वरचंद्र विद्यासागर प्रमुख अतिथि थे नाटक देखने के लिए। मगर सज्जन आदमी थे, सच्चरित्र आदमी थे, बड़ी नीति का उनको आग्रह था। नाटक में ऐसी घटना आती है कि एक लफंगा...बिना लफंगों के तो कोई कहानी होती ही नहीं; अच्छे आदमियों की जिंदगी में कहानी क्या खाक होती है; कहानी के लिए बुरा आदमी चाहिए; बुरे आदमी की जिंदगी में कुछ होता है बताने लायक, कहने लायक; उसमें कुछ रस जगाने की क्षमता होती है। तुम अच्छे आदमी की जिंदगी पर कोई कहानी बनाओ, चलेगी ही नहीं। कोई देखने ही नहीं आएगा कि वहां है ही क्या! एक महात्मा जी बैठे हैं, तंबूरा बजाते रहते हैं, कभी उपवास कर लेते हैं, अंखियां हरिदर्शन की प्यासी गाते रहते हैं! कब तक? जनता थोड़ी देर में कहेगी, भई, कुछ और भी होने दो! अंखियां हरिदर्शन की प्यासी, वह तो समझे, मगर हमारी अंखियां भी प्यासी हैं! कुछ और भी दिखलाओ! कुछ नाटक-चेटक होने दो, यह क्या कर रहे हो! यह तंबूरा कब तक बजेगा? पिटाई हो जाएगी संत-महात्मा की। जनता निकाल बाहर कर देगी कि हटो यहां से, भागो! अगर यही तुमको करना है, तो नाटक किसलिए कर रहे हो?
नाटक में तो कुछ बुरा आदमी चाहिए। बुरे आदमी की जिंदगी में कहानी होती है, कहानी में मोड़ होते हैं, अचंभे होते हैं, चमत्कार होते हैं।...
तो एक लफंगा एक स्त्री के पीछे पड़ा हुआ है, हाथ धो कर पड़ा हुआ है।...जब कोई पड़ता है तो हाथ धोकर पड़ता है! अरे, फिर पीछे क्या हाथ धोने, पहले ही हाथ धो लिए! इसीलिए तो कहते हैं: हाथ धोकर पड़ना!...ईश्र्वरचंद्र को बड़ा गुस्सा आने लगा। नैतिक आदमी, उनको बड़ा कष्ट होने लगा। वह बड़े बेचैन हो गए, पसीना-पसीना हो गए। और वह आदमी तो इस तरह सता रहा है उस स्त्री को! और एक ऐसी अवस्था आई कि स्त्री एक जंगल से गुजर रही है और उस आदमी ने उसको जंगल में पकड़ लिया। बस, फिर ईश्र्वरचंद्र ने आव देखा न ताव, उछल कर चढ़ गए मंच पर, निकाल लिया जूता, लगे पीटने उस अभिनेता को! जनता तो और भी हैरान हो गई। नाटक देखने आई थी गगर इतना गजब का नाटक हो जाएगा, यह नहीं सोचा था। यह तो नाटक में एक नया नाटक हो गया। एक दफा तो लोगों की श्वासें बंद हो गईं, आंखें अटकी रह गईं, जो सो गए थे वे भी जग गए कि हो क्या रहा है, कि दर्शक भी भाग ले रहे हैं! और साधारण भाग नहीं ले रहे, जूते चला रहे हैं! और ईश्र्वरचंद्र विद्यासागर! जिनसे आशा ही नहीं हो सकती थी कि ये जूता चलाएंगे!
मगर उस अभिनेता ने गजब किया। उसने वह जूता उनके हाथ से ले लिया और अपने सिर लगा लिया। उसने मारा जूता ठीक से! पानी-पानी कर दिया उसने विद्यासागर को! और उसने जनता के सामने घोषणा की कि आप परेशान न हों, यह मेरे लिए बड़े से बड़ा पुरस्कार है। यह इस बात की सूचना है कि विद्यासागर भूल गए कि मैं केवल अभिनय कर रहा हूं। और यही तो अभिनेता के लिए सौभाग्य है कि जनता भूल जाए कि वह अभिनय कर रहा है। जनता को ऐसा लगने लगे कि जो हो रहा है, वह सच हो रहा है। और जनता को ही नहीं, ईश्र्वरचंद्र विद्यासागर जैसे आदमी को लगा, यह जूता मैं वापस नहीं दूंगा, यह मेरा प्रमाणपत्र है। इसको मैं सम्हाल कर रखूंगा। इससे बड़ा प्रमाणपत्र मुझे जीवन में दूसरा नहीं मिला।
जरा सोचो कि ईश्र्वरचंद्र विद्यासागर पर क्या गुजरी होगी! ठंडा पसीना छूट गया होगा। बैठ गए कुटे-पिटे जाकर अपने सोफा पर। मारे जूते, मगर खा गए जूते। ये ईश्र्वरचंद्र विद्यासागर सिर्फ पंडित हैं। इनसे तो कहीं ज्यादा संन्यस्त वह अभिनेता था। उसने जूते की मार को भी अभिनय के ढंग से लिया। वहां भी साक्षीभाव रखा। उसने उस दुर्घटना को भी एक प्रीतिकर रूप दे दिया। उसने उसमें भी कष्ट नहीं माना। सम्मान समझा। बात को ऐसा मोड़ दे दिया! ईश्र्वरचंद्र विद्यासागर तादात्म्य में पड़ गए। वे भूल ही गए कि नाटक है।
नितिन चौधरी, अगर सच में ही अभिनय कला की गहराई में उतरना है, तो संन्यास तुम्हें वे कुंजियां दे देगा जो किसी और तरह से उपलब्ध नहीं हो सकती। क्योंकि संन्यास कुछ है ही नहीं, जीवन को अभिनय के ढंग से जीने की कला।
और तुम कहते हो: ‘मैं गैरिक वस्त्र में सीमित नहीं होना चाहता हूं’।
तुम्हें पता नहीं। बिना अनुभव के कह रहे हो। गैरिक वस्त्रों में तुम मेरे संन्यासियों को सीमित देखते हो? तुम मेरे संन्यासियों से ज्यादा स्वतंत्र व्यक्ति पृथ्वी पर कहीं पा सकते हो! तुम्हारे रंग-बिरंगे वस्त्र सीमा हैं। यूं कहो कि अपनी सीमा से नहीं छूटना चाहते। मेरा संन्यासी तो बिलकुल मुक्त है। गैरिक वस्त्र तो सिर्फ उसकी उदघोषणा है कि वह मेरा संन्यासी है, और कुछ भी नहीं। इस बात की उदघोषणा है कि वह मेरे साथ जुड़ने को राजी है, बस और कुछ भी नहीं। उसके प्रेम की घोषणा है। और तुम जितना मेरे संन्यासी को रंग-बिरंगा पाओगे, उतना तुम अपने को नहीं पाओगे। तुम्हारा रंग-बिरंगापन कपड़ों तक ही रह जाएगा। मेरे संन्यासी के कपड़े तो एक रंग के हैं, लेकिन उसकी आत्मा बहुत आयामों में फैल गई है।
मैं तो जीवन के सारे आयाम को स्वीकार करता हूं। मैं निषेधात्मक नहीं हूं। मैं किसी चीज का विरोध नहीं करता। जीवन को जितने आयाम मिलें, उतनी समृद्धि होती है। जितने तुम सृजनात्मक हो जाओ, उतनी जीवन में समृद्धि होती है, उतने जीवन में भीतर के खजाने खुलते हैं। लेकिन यह तुम मत सोचना कि रंग-बिरंगे कपड़े पहनने से तुम्हारे जीवन में वैविध्य हो जाएगा। तुम तो मुझे याद दिलाते हो सरदार विचित्तर सिंह की! और तुम दिल्ली में रहते हो, सो सरदारों के बहुत करीब ही समझो। लोग कहते हैं, दिल्ली दूर नहीं है, वह कोई सरदार ने ही कहा होगा। और सब जगह से तो दूर है, बस, पंजाब से दूर नहीं है।
सरदार विचित्तर सिंह सूट बनवाने दर्जी के पास गए और दर्जी से बोले, ऐसा करो, एक टांग तो ढीली बनाना और एक बिलकुल चुस्त! दर्जी ने कहा कि बहुत कपड़े सीते-सीते जिंदगी बीत गई; मैं ही नहीं, मेरे बाप भी यही करते थे, उनके बाप भी यही करते थे, पीढ़ियों से हम यही धंधा कर रहे हैं, मगर आप गजब के ग्राहक आए! अरे, कोई आता है कि ढीला बनाओ, समझ में आता है। कोई आता है कि चुस्त बनाओ! मगर तुमने तो गजब कर दिया सरदार विचित्तर सिंह! हो तुम विचित्तर आदमी! यह कौन सा फैशन कि एक मोहरी ढीली और एक मोहरी बिलकुल चुस्त! विचित्तर सिंह ने कहा: तुम समझे नहीं; मैं विविधता में विश्र्वास करता हूं। अरे, क्या एक फैशन करना! जब दो फैशन एक साथ हो सकती हैं, तो एक टांग पर एक फैशन, दूसरी टांग पर दूसरी फैशन।
नितिन चौधरी, जरा सावधान! इस तरह रंग-बिरंगे हो गए, तो फिर नाटकों में मसखरे का काम ही मिलेगा। सरकस में जोकर हो जाओगे! और दिल्ली में बहुत तरह के मसखरे इकट्ठे हैं, जरा सावधान रहना!
जीवन को अगर जानना है, तो किसी ऐसे व्यक्ति से संबंध जोड़ना होगा जिसने जाना है। अगर दीया बुझा है, तो किसी ऐसे दीये के पास आना होगा उसे जो जला है।
संन्यास का कुछ और अर्थ नहीं है। मेरे पास होने की घोषणा। मेरे और तुम्हारे बीच कोई व्यवधान नहीं है, इसकी घोषणा। मेरे तुम्हारे बीच कोई तर्क नहीं है, कोई शब्द नहीं है, कोई विवाद नहीं है, इसकी घोषणा। और जिस दिन मैं देखूंगा कि तुम्हें गैरिक वस्त्रों की कोई जरूरत न रही, उस दिन मैं तुम्हें मुक्त कर दूंगा गैरिक वस्त्रों से भी। कोई गैरिक वस्त्रों से थोड़े ही संन्यास बंधा हुआ है!
लेकिन मुझे कोई न कोई प्रतीक तो चुनना था। और गैरिक मैंने जान कर चुना है। जान कर चुना है इसलिए कि गैरिक वस्त्र गलत आदमियों के हाथ में कोई पांच हजार साल से रहा है। उसको उनके हाथ से छुड़ाना है। यह प्यारा रंग जीवन के निषेध का प्रतीक बन गया। और यह जीवन का रंग है, यह वसंत का रंग है। इसलिए इसका दूसरा नाम बासंती रंग है। वसंत, जब सारे फूल खिल जाते हैं। यह वसंत का रंग न मालूम कैसे गलत लोगों के हाथ में पड़ गया, जो फूलों के दुश्मन हैं, जो कांटों को प्यार करते हैं, जो कांटों की शय्या बिछा कर उस पर सोते हैं, जो कांटों के लिए लालायित हैं, जो अपने को सताते हैं हर तरह से, जो अपने को परेशान करते हैं हर तरह
से, जो हिंसा से भरे हैं। हालांकि दूसरे की हिंसा करने में खतरा है। क्योंकि दूसरा भी जवाब देगा। वे अपनी ही हिंसा करते हैं। उसमें कोई जवाब भी नहीं कर सकता, उसमें कोई रक्षा भी नहीं कर सकता। यह आत्महिंसक लोगों का प्रतीक हो गया। यह पाखंडियों का प्रतीक हो गया। जो कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं। इस प्यारे रंग को, वसंत के रंग को उनके हाथ से छुड़ा लेना है। इसलिए मैंने इस रंग को चुना। अन्यथा मैं कोई भी रंग चुन सकता था। कोई भी रंग घोषणा बन सकता था।
लेकिन इसके पीछे कारण है। एक पुरानी परंपरा को पूरी तरह खंडित कर देना है। और उस परंपरा के भीतर घुस कर ही यह काम किया जा सकता है। यह विस्फोट, यह बम परंपरा के भीतर ही घुस कर रखा जा सकता है। यह सड़ी-गली जो धर्म की अब तक की व्यवस्था रही है, इसको भीतर से ही तोड़ देना है, ताकि एक नये धर्म का आविर्भाव हो सके--नई तरह की धार्मिकता का आविर्भाव हो सके। इसलिए मैंने गैरिक को चुना है।
लेकिन जिस दिन मैं समझूंगा काम पूरा हो गया, उस दिन कह दूंगा: अब तुम्हारी मर्जी!
और तुम जरा सोचो, नितिन चौधरी, अगर मैं सतरंगे कपड़े चुन लेता, कि सात तरह की पट्टियों वाले कपड़े पहनो, तो भी तुम राजी न होते। तुम कहते कि और मखौल उड़ेगी। लोग क्या कहेंगे! कि तुम्हें क्या हो गया? अभी तो इतना ही कहेंगे कि चलो, संन्यासी हो गए; फिर तो समझते कि बिलकुल पागल हो गए!
मगर मैं खयाल रखूंगा, अगर कभी बदलाहट करने के मेरे इरादे हुए, तो मुझे तुम्हारी बात जंची, बहुत रसभरी मालूम पड़ी, सतरंगे चुन लूंगा। मगर जरा देर है अभी।
और तुम कहते हो: भगवान, क्या मैं बिना आपका संन्यासी हुए समय-समय पर आपके दर्शन को आ सकता हूं?
सुनने को आ सकते हो; मिलने को नहीं आ सकते। क्योंकि मिलने की तो शर्त ही तुम पूरी नहीं कर रहे हो। सुनने के लिए तो कोई अड़चन नहीं है, जब आना चाहो, आओ। लेकिन मिलना हो, तो शर्त पूरी करनी पड़ेगी। उसके लिए तो फिर झुकना होगा। उसके लिए तो फिर मेरे साथ राजी होना होगा। फिर मेरे साथ तालमेल बिठाना होगा। मेरे छंद में गाना होगा। मेरे नृत्य में सम्मिलित होना होगा। तो ही संभव हो सकता है दर्शन। दर्शन बड़ी बात है! सुन लेने में तो क्या है? दर्शन तो एक आत्मिक संस्पर्श है।
ओशो, नये कम्यून को पंजाब में स्थापित करने के बारे में आपका क्या विचार है?
सरदार विचित्तर सिंह और प्यारा सिंह खूब पीकर लौट रहे थे। तभी प्यारा सिंह नाली में गिर पड़े। विचित्तर सिंह ने उन्हें उठाते हुए कहा: उठ यार, उठ, तेरा कसूर नहीं है, ये साले नगरपालिका वाले रात को नालियां उठा कर सड़क पर बीच में रख देते हैं।
सरदार विचित्तर सिंह की प्रेमिका ने उनसे कहा, क्या तुम शादी के बाद भी मुझे इतना ही प्यार करोगे? विचित्तर सिंह ने कहा: अवश्य, अरे निश्र्चय! सच बात तो यह है कि मैं शादीशुदा औरतों पर जान छिड़कता हूं।
सरदार विचित्तर सिंह अपने मित्र प्यारा सिंह के साथ पहली बार बंबई आए और एक होटल में गए। वे जिस टेबल पर बैठे थे, वहां एक गिलास उलटी रखी थी। विचित्तर सिंह के मित्र प्यारा सिंह ने कहा, हद हो गई, इस गिलास का तो मुंह ही नहीं है! विचित्तर सिंह ने गिलास उठाया, पलट कर देखा और और भी अधिक आश्र्चर्य से बोले, गजब है, कमाल है, इस गिलास में पेंदी भी नहीं है! ऐसे-ऐसे प्यारे लोग! सुरेंद्र, पंजाब भी चलना ही होगा!
एक दर्जी ग्राहकों के कपड़े लेकर भाग गया। सारे ग्राहक इकट्ठे हुए और अपनी-अपनी दुख-कथा रोने लगे। मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा: वह बदमाश मेरा कोट ले गया। ढब्बूजी बोले, साला मेरा नया-नया पेंट ले गया। मैंने तो बस बटन लगाने के लिए ही उसे दिया था। चंदूलाल ने अपनी चांद पर हाथ फेर कर कहा: मैंने अपनी पीढ़ियों से चली आ रही परंपरागत टोपी उसे दी थी, थोड़ी सी रफू करने के लिए, मैं तो लुट गया, हाय! सरदार विचित्तर सिंह ने अपनी मूंछों को मरोड़ते हुए कहा: हरामजादा मिल भर जाए, उसे मैं जिंदा नहीं छोडूंगा, मेरा तो उसने सत्यानाश कर दिया। दोस्तों ने पूछा, आपका क्या ले गया? सरदार जी बोले, वह मेरा नाप ले गया। अब मैं कपड़े किससे बनवाऊं? और कैसे बनवाऊं?
सरदार विचित्तर सिंह अहमदाबाद गए। एक पतली और एक चौड़ी टांग वाली पेंट, खूबसूरत कोट और नई चमकदार जूतियां पहने नशे में धुत वे अहमदाबाद की सड़कों पर भ्रमण करते रहे; कई जगह गिरे, ठोकरें खाईं और अंततः एक जगह बिलकुल बेहोश होकर चारों खाने चित गिर पड़े। एक गुजराती भाई आया और अकेले में इस मदहोश आदमी को पाकर उसके महंगे जूते और कोट उतार कर ले गया और अपने फटे-पुराने जूते विचित्तर सिंह को पहना गया। घंटे भर बाद जब थोड़ा होश आया, तो देखा कि एक बिलकुल सामने खड़ी कार पों-पों, पों-पों कर रही है। कार के ड्राइवर श्री अहमक अहमदाबादी ने खिड़की में से झांक कर कहा, ओ सरदार के बच्चे, रास्ते से हट जा! जानता नहीं मैं कौन हूं? तेरी टांगों पर से कार चढ़ा दूंगा। विचित्तर सिंह ने एक नजर अपने पैरों पर डाली और जवाब दिया, चढ़ा दे, चढ़ा दे, यहां डर किसको पड़ा है; अरे, ये मेरी टांगें ही नहीं हैं। मेरी टांगें तो नई जूतियों वाली थीं।
सरदार विचित्तर सिंह साइकिल पर तेजी से भागे जा रहे थे। पीछे कैरियर पर एक स्त्री बैठी हुई थी। अचानक हवा के तेज झोंके में स्त्री के हाथ से रूमाल छूट कर गिर गया। एक दूसरे सरदारजी यह देख रहे थे, चिल्ला कर बोले ओय् सरदार तेरी बीबी का रूमाल उड़ गया! साइकिल रोक! इस पर सरदार विचित्तर सिंह ने क्रोध भरी निगाहों से पीछे मुड़ कर देखा और जवाब दिया, ऐ जरा सोच-समझ कर जबान खोला कर! शर्म नहीं आती, बदतमीज, इसको मेरी बीबी कहता है! अरे, होगी तेरी बीबी, हरामजादे, मेरी तो भैंण लगती है!
ऐसे-ऐसे प्यारे लोग! पंजाब पुकार रहा है। सुरेंद्र, चलना तो जरूर है।
दस साल की उम्र में ही विचित्तर सिंह घर से भाग निकले। उसकी दादी उसे बहुत प्यार करती थी। बीस साल की उम्र में अचानक एक दिन घर लौट आए। घर के अन्य लोग तो खुश थे, मगर दादी की खुशी का ठिकाना न था। रात हुई, सब सोने चले। घर में दो ही कमरे थे। एक में विचित्तर सिंह के पिता थाउजैंडा सिंह और उनकी पत्नी सोते और एक में विचित्तर सिंह की दादी।...थाउजैंडा सिंह का असली नाम तो हजारा सिंह था, मगर जब से वे इंग्लैंड होकर लौटे, उन्होंने अपना नाम थाउजैंडा सिंह कर लिया था।...दादी ने कहा कि लड़के को तो मैं अपने साथ सुलाऊंगी। थोड़ी देर बाद विचित्तर सिंह ने दादी को प्यार करना प्रारंभ किया। दादी ने सोचा कि बहुत दिनों बाद आया है, प्यार उमड़ रहा होगा। मगर विचित्तर सिंह तो बढ़ता ही गया। आखिर जब वह हद से बढ़ने लगा, तो दादी चिल्लाई, अरे-अरे, यह क्या कर रहा है! मगर विचित्तर सिंह तो दादी की छाती पर बैठ गया। तभी चिल्लाहट सुन कर थाउजैंडा सिंह कमरे में घुसे। सारी बात पलक झपकते ही वे समझ गए और क्रोध से दहाड़े--अरे हरामजादे! विचित्तर सिंह ने खिड़की से छलांग लगाई और भाग निकले। उसी रात से पिता कमर में कृपाण लटकाए आगबबूला हुए लड़के को तलाशते फिरते रहे।
बहुत दिनों बाद उन्होंने उसे शहर में हाकी का मैच देखते हुए धर दबोचा। और लगे शुद्ध पंजाबी में लड़के की ऐसी-तैसी करने! भीड़ इकट्ठी हो गई। लोगों ने बहुत पूछा कि बात क्या, मगर थाउजैंडा सिंह तो गालियां देते ही जा रहे थे और कृपाण निकाले हुए थे। तभी विचित्तर सिंह लपक कर एक ऊंचे स्थान पर खड़े होकर बोले, भाइयो और बहनो, इंसाफ करो! मैं बताता हूं कि बात क्या है। मेरा कसूर कुल इतना है कि मैं एक बार इनकी मां पर चढ़ बैठा। जब कि ये सज्जन पिछले पच्चीस सालों से मेरी मां पर चढ़ रहे हैं। आप ही बताओ कि किसको सजा मिलनी चाहिए?
ऐसे-ऐसे अदभुत लोग!
मगर कृपाणें खिंचेंगी। बोले सो निहाल, सत श्री अकाल। चलेंगे पंजाब भी, इस पूरे देश को ही बिगाड़ना है। एक कोने से शुरू कर रहे हैं--कच्छ से--फिर धीरे-धीरे बिगाड़ते चलेंगे। सभी को बचाना जरूरी है।...सुरेंद्र हैं पंजाब से। सरदार थे, अब हो गए हैं संन्यासी। सो स्वभावतः उनके मन में इच्छा उठती होगी कि अब पंजाब का भी छुटकारा किसी तरह करवाना चाहिए।...मामला तो कठिन होगा, लेकिन कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं। मामला तो हमेशा कठिन है।
कठिनाई तो स्वाभाविक है। मेरे काम में कठिनाई तो सुनिश्र्चित ही है।
दिल में...
दिल में इक चीज बड़ी बेसबहा मांगी है
हुश्र्ने-मगरूर की फितरत से वफा मांगी है
मस्लहत है...
मस्लहत है, कि तवज्जो है कि या साजिश है
इक दुश्मन ने मेरे हक में दुआ मांगी है
दिल में एक चीज बड़ी बेसबहा मांगी है
हुश्र्ने-मगरूर की फितरत से वफा मांगी है
मस्लहत है, कि तवज्जो है कि या साजिश है
इक दुश्मन ने मेरे हक में दुआ मांगी है
हसीना ने जहांने किसको चाहें, किसको ठुकराए
हर इक सूरत कलेजे से लगा लेने के काबिल है
हजारों दिल मसलकर पांव से ठुकराके वो बोले:
लो पहचानो: तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है
जल नहीं उठते जहीरों को न जाने क्या हुआ...
जल नहीं उठते जहीरों को न जाने क्या हुआ
फिर वही चीखें अमीरों को न जाने क्या हुआ
फिर वही चीखें अमीरों को न जाने क्या हुआ...
खैर मकतब हो रहा है हर नये सैयाद का
खैर मकतब हो रहा है हर नये सैयाद का
अहले गुलशन के जमीरों को न जाने क्या हुआ
अहले गुलशन के जमीरों को न जाने क्या हुआ...
जब कूचए कातिल में हम लाए गए होंगे...
जब कूचए कातिल में हम लाए गए होंगे
परदे भी दरीचों के सरकाए गए होंगे
जब शीशमहल कोई तामीर हुआ होगा...
जब शीशमहल कोई तामीर हुआ होगा
दीवारों में दीवाने चुनवाए गए होंगे
जब शीशमहल कोई तामीर हुआ होगा...
दीवारों में दीवाने चुनवाए गए होंगे
जब इशरते-शाही को कुछ ठेस लगी होगी...
जब इशरते-शाही को कुछ ठेस लगी होगी
सूली पर कई सरमद लटकाए गए होंगे
जब इशरते-शाही को कुछ ठेस लगी होगी...
सूली पर कई सरमद लटकाए गए होंगे
तो यारो:
यारो किसी कातिल से कभी प्यार न मांगो...
यारो किसी कातिल से कभी प्यार न मांगो
खुद अपने कलेजे-लिए तलवार न मांगो
गिर जाओगे तुम अपने मसीहा की नजर से
मर कर भी इलाजे दिले-बीमार न मांगो
खुद अपने कलेजे-लिए तलवार न मांगो
तो यारो:
यारो किसी कातिल से कभी प्यार न मांगो
उस चीज का क्या जिक्र जो मुमकिन ही नहीं है...
उस चीज का क्या जिक्र जो मुमकिन ही नहीं है
सहरा में कभी सायाए-दीवार न मांगो...
सहरा में कभी सायाए-दीवार न मांगो
खुद अपने कलेजे-लिए तलवार न मांगो
तो यारो:
यारो किसी कातिल से कभी प्यार न मांगो
खुल जाएगा इस तरह निगाहों का भरम भी...
खुल जाएगा इस तरह निगाहों का भरम भी
कांटों से कभी फूल की महकार न मांगो
कांटों से कभी फूल की महकार न मांगो...
खुद अपने कलेजे-लिए तलवार न मांगो
तो यारो:
यारो किसी कातिल से कभी प्यार न मांगो
सच बात पै मिलता है सदा जहर का प्याला...
सच बात पै मिलता है सदा जहर का प्याला
जीना है तो फिर जुर्रते-इजहार न मांगो
जीना है तो फिर जुर्रते-इजहार न मांगो
खुद अपने कलेजे-लिए तलवार न मांगो
तो यारो:
यारो किसी कातिल से कभी प्यार न मांगो
ये भी है गनीमत जो मिले कोई खरीदार...
ये भी है गनीमत जो मिले कोई खरीदार
मिट जाओ मगर कीमतें-ईसार न मांगो
मिट जाओ मगर कीमतें-ईसार न मांगो...
खुद अपने कलेजे-लिए तलवार न मांगो
तो यारो:
यारो किसी कातिल से कभी प्यार न मांगो
उभरेगा न धड़कन से कभी अब कोई नग्मा...
उभरेगा न धड़कन से कभी अब कोई नग्मा
टूटी हुई पाजेब से झनकार न मांगो
टूटी हुई पाजेब से झनकार न मांगो...
तो यारो:
यारो किसी कातिल से कभी प्यार न मांगो
मेरा काम तो मुश्किल है। क्योंकि मैं टूटी हुई पाजेब से झनकार मांग रहा हूं। पांच हजार साल से यह पाजेब टूटती ही चली गई है। कुछ बचा नहीं है। इस देश से ज्यादा रिक्त, आत्महीन इस पृथ्वी पर आज कोई भी नहीं! बाईस सौ वर्ष की लंबी गुलामी, और पांच हजार वर्ष की दकियानूसी--पाजेब बुरी तरह टूट गई है! मगर मैं उसी से झनकार मांग रहा हूं। कोशिश तो करनी है! आशा तो रखनी है!
उभरेगा न धड़कन से कभी अब कोई नग्मा
टूटी हुई पाजेब से झनकार न मांगो
लेकिन मैं आशा नहीं छोड़ता हूं। मुझे तो लगता है, अभी भी नग्मा उठ सकता। है। अभी भी धड़कन वापस लौट सकती है। अभी भी टूटी पाजेब से झनकार उठ सकती है। कठिन तो बहुत है।
ये भी है गनीमत जो मिले कोई खरीदार...
आज सत्य को लेने कौन राजी है! आज सत्य को खरीदने कौन राजी है!
ये भी है गनीमत जो मिले कोई खरीदार
मिट जाओ मगर कीमतें-ईसार न मांगो
मैं मिटने को तैयार हूं। मेरे साथ जो मिटने को तैयार हैं, वे ही मेरे संन्यासी हैं खरीदार को खोजना तो है! खोजा जा सकता है। मैं निराशा में भरोसा नहीं करता।
सच बात पै मिलता है सदा जहर का प्याला...
सच बात पै मिलता है सदा जहर का प्याला
जीना है तो फिर जुर्रते-इजहार न मांगो
जहर का प्याला तो संभव है। मिलेगा! मगर सत्य के लिए जहर का प्याला भी पी लेना सौभाग्य है! वे धन्यभागी हैं, जिन्होंने सत्य के लिए जहर का प्याला पी लिया है!
उस चीज का क्या जिक्र जो मुमकिन ही नहीं है
सहरा में कभी सायाए-दीवार न मांगो
मगर मैं वही कर रहा हूं। मैं अंधविश्र्वासियों से, पाखंडियों से, धर्म के झूठे ठेकेदारों से यही आशा कर रहा हूं जैसे कोई सहरा में दीवार खोज रहा हो कि उसकी छाया में बैठ सके।
सहरा में कभी सायाए-दीवार न मांगो
उस चीज का क्या जिक्र जो मुमकिन ही नहीं है
लेकिन मैंने अभी ऐसा नहीं माना कि वह चीज मुमकिन नहीं। अभी भी मुमकिन है। इस राष्ट्र की आत्मा पर कितनी ही राख जम गई हो, मगर कहीं अंगारा अभी भी मौजूद है। राख झड़ा देने की जरूरत है--अंगारा फिर प्रकट हो सकता है! और छोटी सी चिनगारी भी हो तो पूरे जंगल में आग लगा दे सकती है। यह जंगल में आग लगाने का उपाय ही है मेरा संन्यास। ये वस्त्र वसंत के ही प्रतीक नहीं हैं, आग के भी प्रतीक हैं। ये अग्नि के भी प्रतीक हैं, ये आग्नेय हैं।
जब शीशमहल कोई तामीर हुआ होगा
दीवारों में दीवाने चुनवाए गए होंगे
तैयारी करनी जरूरी है। दीवाना होना है, दीवानगी का मजा लेना है, तो दीवारों में चुने जाने की तैयारी चाहिए।
जब इशरते-शाही को कुछ ठेस लगी होगी
और जब भी स्थापित स्वार्थों को कोई ठेस लगती है--
जब इशरते-शाही को कुछ ठेस लगी होगी
सूली पर कई सरमद लटकाए गए होंगे।
तैयारी रखनी है, सरमद होने की...गरदन कट सकती है! संन्यास एक अभियान है, एक अभीप्सा है इस देश को--और इस देश को ही नहीं, इस देश के माध्यम से सारे जगत को पुनरुज्जीवन देने की। कच्छ भी हमारा है, कैलिफोर्निया भी हमारा है; पंजाब भी हमारा है, और पाकिस्तान भी हमारा है--सारी पृथ्वी हमारी है। इसलिए, सुरेंद्र, जगाना तो सबको है! मगर मुझे कहीं एक जगह तो बैठना होगा लेकिन वहीं से किरणें फैलाई जा सकती हैं। सूरज को हर घर पर जाने की जरूरत भी नहीं है।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What is the significance of establishing a new commune in Punjab?
According to Osho, founding a commune in Punjab is desirable and inevitable—its people are vibrant and dear, and they too must be saved—but it must follow consolidation in Kutch. Punjab’s fervor could draw kirpans; readiness and grounding first ensure safety and deeper transformation. Save Kutch first, then channel Punjab’s exuberant heart into meditation, love, and awakening.
In simple terms: We’ll help Punjab too, but only after we firmly build Kutch so the work is safe and can truly help people.
What does the sutra from the Chandogya Upanishad say about the knower's perception of death, disease, and sorrow?
According to Osho, the Chandogya Upanishad declares that for the true knower, where the ego has dissolved, death, disease, and sorrow have no reality. Only the 'I' dies; what is false collapses like a house of cards. When the ego-lamp is extinguished (nirvana), the moonlight of the real enters; in egoless awareness, suffering and mortality are seen as dreams, not your being.
In simple terms: If you stop clinging to the idea of 'me,' death, disease, and sorrow lose their grip; they don’t touch who you really are.
How can I deepen my understanding and practice of acting?
According to Osho, deepen acting by stopping spectatorhood: don’t just “look at” rasa—drink it. Step into the river (commitment), bow the ego through tangible changes, and practice until you taste life directly. Move from rainbow-like techniques to the pure white of presence—silence, total involvement, surrender—so authenticity flows on its own, and the role lives you more than you “perform” it.
In simple terms: Jump in and practice wholeheartedly—make small real commitments, drop ego and overthinking, and be so present that truth acts through you.
