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Questions in this Discourse
ओशो, यह श्लोक भी मुंडकोपनिषद में है: वेदांत विज्ञान सुनिश्र्चितार्थाः संन्यास योगाद् यतयः शुद्ध-सत्वाः। ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे।। अर्थात वेदांत और विज्ञान (प्रकृति का ज्ञान) इनके द्वारा जिन्होंने अच्छी तरह अर्थ का निश्र्चय कर लिया है और साथ ही संन्यास और योग के द्वारा जो शुद्ध स्वत्व वाले हो गए हैं, वे प्रयत्नवान ब्रह्मपरायण लोग मरने पर ब्रह्मलोक में पहुंच कर मुक्त हो जाते हैं। हमें इस सूत्र को समझाने की अनुकंपा करें।
विज्ञापन की सारी कला ही इस बात पर आधारित है: दोहराए जाओ। फिर चाहे हेमामालिनी का सौंदर्य हो और चाहे परवीन बॉबी का, सबका राज लक्स टायलेट साबुन में है। दोहराए जाओ--अखबारों में, फिल्मों में, रेडियो पर, टेलीविजन पर--और धीरे-धीरे लोग मानने लगेंगे। और एक अचेतन छाप पड़ जाती है। और फिर तुम जब बाजार में साबुन खरीदने जाओगे और दुकानदार पूछेगा, कौन सा साबुन? तो तुम सोचते हो कि तुम लक्स टायलेट खरीद रहे हो! तुमसे खरीदवाया जा रहा है। वह जो तुमने पढ़ा है बार-बार! तुम कहते हो, लक्स टायलेट दे दो। तुम यही सोचते हो, यही मानते हो कि तुमने खरीदा, मगर तुम भ्रांति में हो। पुनरुक्ति ने तुम्हें सम्मोहित कर दिया।
नये-नये जब पहली दफा विद्युत के विज्ञापन बने तो वे थिर होते थे। फिर वैज्ञानिकों ने कहा कि थिर का वह परिणाम नहीं होता। जैसे लक्स टायलेट लिखा हो बिजली के अक्षरों में और थिर रहें अक्षर, तो आदमी एक ही बार पढ़ेगा। लेकिन अक्षर जलें, बुझें, जलें, बुझें, तो जितनी बार जलेंगे, बुझेंगे, उतनी बार पढ़ने को मजबूर होना पड़ेगा। तुम चाहे कार में ही क्यों न बैठ कर गुजर रहे होओ, जितनी देर तुम्हें बोर्ड के पास से गुजरने में लगेगी, उतनी देर में कम से कम दस-पंद्रह दफा अक्षर जलेंगे, बुझेंगे, उतनी बार पुनरुक्ति हो गई। उतनी पुनरुक्ति तुम्हारे भीतर बैठ गई।
इस तरह के बहुमूल्य सूत्र भी कूड़ा-कचरा हो गए हैं, क्योंकि उनके जो अर्थ किए गए! एक-दो दिन की पुनरुक्ति नहीं है, हजारों वर्षों की पुनरुक्ति है। इसलिए तुम्हें मेरे साथ एक-एक शब्द को पुनः समझना होगा।
वेदांत। इसका अर्थ किया गया है सदा से: वेदों की पराकाष्ठा, जो कि नितांत झूठ है। क्योंकि उपनिषद वेदों की पराकाष्ठा नहीं हैं, वेदों से बगावत हैं, विद्रोह हैं। उपनिषद यानी वेदांत। लेकिन इस झूठ को इतना दोहराया गया कि उपनिषदों में वेदों की पराकाष्ठा है; जैसे फूलों की गंध होती है ऐसे वेदों के वृक्षों पर उपनिषद के फूल लगे हैं, इन फूलों में जो गंध उठ रही है, उसकी जड़ें वेदों में हैं। यह बात सच नहीं है। वेदांत का अर्थ होता है: जहां वेद समाप्त हो गए, जहां वेदों का अंत हो गया। उसके बाद जो यात्रा है, उसके बाद जो आयाम है, शास्त्रों के पार, वेदों के पार, शब्दों के पार, सिद्धांतों के पार, वह वेदांत है।
वेद बहुत लौकिक हैं। कहीं भूले-चूके कोई सूत्र आ जाता है जो प्यारा है, निन्यानबे प्रतिशत तो कचरा है। उपनिषद उस कचरे की पराकाष्ठा नहीं हैं। उपनिषदों में वेदों का स्पष्ट विरोध है। कृष्ण ने भी गीता में वेदों का स्पष्ट विरोध किया है। लेकिन विरोध करने का ढंग और फिर उस ढंग पर की गई लीपा-पोती, सदियों-सदियों में पंडितों के चढ़ाए गए रंग, तुम्हें झूठ को मानने को मजबूर कर दिए हैं। तुम्हारे अचेतन में झूठ बैठ गया है। कृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है कि वेद लौकिक हैं, सांसारिक हैं। जो सांसारिक बुद्धि के लोग हैं, उनके लिए हैं। और जिन्हें अध्यात्म की खोज करनी है, उन्हें वेदों के पार जाना होगा।
यही बात महावीर ने कही। लेकिन बहुत साफ ढंग से कही। कृष्ण की बात को लीपा-पोता गया था। महावीर के समय तक आते-आते, बुद्ध के समय तक आते-आते समाधिस्थ व्यक्ति सजग हो गए थे कि पंडितों ने क्या दुर्व्यवहार किया है। अब दुबारा वैसा दुर्व्यवहार न हो सके, इसलिए महावीर और बुद्ध ने वेदों का स्पष्ट विरोध किया, सतत विरोध किया। परिणाम यह हुआ कि बुद्ध और महावीर को हिंदू समाज स्वीकार न कर सका, पचा न सका, इनकार कर दिया। उनको भी पचा लिया होता, अगर उन्होंने भी जरा सा अवसर दिया होता अपने शब्दों को तोड़े-मरोड़े जाने का, तो उनको भी पचा लिया होता लेकिन वे सजग थे कि जो कृष्ण के साथ हुआ, जो उपनिषद के ऋषियों के साथ हुआ, उनके साथ न हो जाए। उनकी सजगता का यह परिणाम था कि उन पर वेद नहीं थोपे जा सके। नहीं थोपे जा सके तो हिंदुओं के पास एक ही उपाय था कि बुद्ध और महावीर की निंदा करें, उनको उखाड़ फेंकें।
बुद्ध को तो बिलकुल उखाड़ फेंका भारत से। भारत में उनकी कोई रूपरेखा न बची, कोई नामलेवा न बचा। महावीर को इस बुरी तरह से नहीं उखाड़ा और उसका भी कारण था, क्योंकि महावीर की बात बहुत लोगों तक पहुंच नहीं सकती थी। महावीर की बात इतनी दार्शनिक थी कि बहुत थोड़े से लोगों तक पहुंच सकती थी--उनसे कुछ डर न था। पहुंच-पहुंच कर भी क्या होगा? बहुत थोड़े से लोग ही उसको समझ पाएंगे। बुद्ध की बात बड़ी सीधी थी, साफ थी। वह करोड़ों लोगों तक पहुंच सकती थी। उसमें खतरा था।
वेदांत का अर्थ तुम समझ लो, वेदों की पराकाष्ठा नहीं, वेदांत का अर्थ सीधा है: जहां वेदों का अंत हो जाता है। वेदों की जहां मृत्यु हो जाती है। वेदों की राख से जो उठता है, वह वेदांत है। वेदों की पराकाष्ठा नहीं है, वेदों से बगावत, विद्रोह।
और होगी भी यह बगावत, क्योंकि वेद हैं क्या? अगर तुम वेदों के पन्ने उलटाओ--कहीं से भी खोल लो वेद को--तो तुम चकित होओगे कि क्यों इन शब्दों को, इन सूत्रों को धर्म का नाम दिया गया है। साधारण आकांक्षाएं हैं। कोई मांग रहा है: फसल ज्यादा हो जाए; कोई मांग रहा है इंद्र से कि वर्षा ज्यादा हो जाए; कोई मांग रहा है धन-धान्य; कोई मांग रहा है--उसके गऊओं के थनों में दूध ही दूध भर जाए। और इतना ही नहीं, उसके दुश्मन की गऊओं के थन बिलकुल सूख जाएं। मेरे खेत में वर्षा हो, इतना ही नहीं, पड़ोसी के खेत में वर्षा हो ही न। यह भी, इसको अध्यात्म कहोगे? यह तो बड़ी निम्न वृत्तियां हुईं। मेरे शत्रुओं को नष्ट कर दे, हे इंद्र देवता, उन पर बिजली गिरा दे, उनको राख कर दे। इसको अध्यात्म और धर्म कहोगे? यह तो मनुष्य की सामान्य ईर्ष्याएं, शत्रुताएं, हिंसाएं, वैमनस्य, उसके ही प्रतीक हैं। जरूर कहीं-कहीं वेद में कोई सूत्र आ जाता है जो बड़ा प्यारा है। लेकिन सौ में एक बार। निन्यानबे बार तो कचरा ही हाथ लगेगा। और उस कचरे में वे हीरे भी खो गए।
उपनिषद हीरे ही हीरे हैं। वहां कचरा नहीं है।
उपनिषद शब्द भी बड़ा प्यारा है। उसे समझो तो वेदांत भी समझ में आ जाएगा। उपनिषद का अर्थ होता है: गुरु के पास बैठना। उपनिषद। पास बैठना। बस, इतना ही अर्थ है उपनिषद का। गुरु के पास मौन होकर बैठना; जिसने जाना है, उसके पास शून्य होकर बैठना। और उस बैठने में ही हृदय से हृदय आंदोलित हो जाते हैं। उस बैठने में ही सत्संग फल जाता है। जो नहीं कहा जा सकता, वह कहा जाता है। जो नहीं सुना जा सकता, वह सुना जाता है। हृदय की वीणा बज उठती है। जिसने जाना है, उसकी वीणा बज रही है। जिसने नहीं जाना है, वह अगर पास सरक आए तो उसके तारों में भी टंकार हो जाती है।
संगीतज्ञों का यह अनुभव है, अगर एक ही कमरे में--खाली कमरे में--सिर्फ दो वीणाएं रखी जाएं, द्वार-दरवाजे बंद हों और एक वीणा पर वीणावादक तार छेड़ दे, संगीत उठा दे, तो दूसरी वीणा जो कोने में रखी है, जिसको उसने छुआ भी नहीं, उस वीणा के तार भी झंकृत होने लगते हैं, एक वीणा बजती है तो हवाओं में आंदोलन हो जाता है, हवाओं में संगीत-लहरी फैल जाती है, स्पंदन हो जाता है। वह स्पंदन जिस वीणा को छुआ भी नहीं है, उसके भीतर भी सोए संगीत में हलचल मचा देता है। उसके तार भी जैसे नींद से जाग आते हैं, जैसे सुबह हो गई।
आज से डेढ़ सौ वर्ष पहले एक वैज्ञानिक ने पहली दफा इस सिद्धांत को खोजा। वह इसे कोई नाम न दे सका। फिर अभी कुछ वर्षों पहले, कोई चालीस वर्ष पहले कार्ल गुस्ताव जुंग नाम के बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक ने इसे नाम दिया: सिन्क्रानिसिटी। जिस वैज्ञानिक ने पहली दफा यह खोज की थी, वह एक पुराने किले में मेहमान था, एक राजा के घर मेहमान था। और जिस कमरे में वह था, दो घड़ियां उस कमरे में एक ही दीवाल पर लटकी हुई थीं। पुराने ढब की घड़ियां। मगर वह हैरान हुआ यह बात जान कर कि उनका पेंडुलम एक साथ घूमता है। मिनट और सेकेंड भी भिन्न नहीं। सेकेंड सेकेंड वे एक साथ चलतीं। इन दो घड़ियों के बीच उसे कुछ ऐसा तालमेल दिखाई पड़ा--वैज्ञानिक था, सोच में पड़ गया! कि इस तरह की दो घड़ियां उसने देखी नहीं जिनमें सेकेंड का भी फर्क न हो। तो उसने एक काम किया, कि यह संयोग हो सकता है, उसने एक घड़ी बंद कर दी रात को। और दूसरे दिन सुबह शुरू की और दोनों के बीच कोई तीन-चार मिनट का फासला रखा। चौबीस घंटे पूरे होते-होते दोनों घड़ियां फिर साथ-साथ डोल रही थीं। बराबर, सेकेंड-सेकेंड करीब आ गए थे, पेंडुलम फिर साथ-साथ लयबद्ध हो गए थे। तब तो वह चमत्कृत हो गया। राज क्या है? आया था दिन-दो दिन के लिए, लेकिन सप्ताहों रुका--जब तक राज न खोज लिया।
राज यह था कि वह जिस दीवाल पर लटकी थी, उस पर कान लगा-लगा कर वह सुनता रहा कि क्या हो रहा है, तब उसे समझ में आया कि एक घड़ी की टिक-टिक, जो बड़ी घड़ी थी उसकी टिक-टिक दीवाल के द्वारा दूसरी घड़ी के पेंडुलम को भी संचालित कर रही है, उसमें एक लयबद्धता पैदा कर रही है। और बड़ी घड़ी इतनी बलशाली है कि छोटी घड़ी करे भी तो क्या करे! वह छोटी घड़ी सहज ही उसके साथ लयबद्ध हो जाती है।
उसने इसको सिर्फ लयबद्धता कहा था। लेकिन जुंग ने इसे पूरा वैज्ञानिक आधार दिया और सिन्क्रानिसिटी कहा; और सिर्फ घड़ियों के लिए नहीं, जीवन के समस्त आयामों में इस लयबद्धता के सिद्धांत को स्वीकार किया।
रहस्यवादी तो इस सिद्धांत से हजारों वर्षों से परिचित हैं। सत्संग का यही राज है, सिन्क्रानिसिटी। सदगुरु यूं समझो कि बड़ी घड़ी, कि बड़ा सितार। शिष्य यूं समझो कि छोटी घड़ी, छोटा सितार। और शिष्य अगर राजी हो, श्रद्धा से भरा हो और बड़े सितार के पास सिर्फ बैठ रहे, कुछ न करे, तो भी उसके तार झंकृत हो जाएंगे।
उपनिषद का अर्थ है: लयबद्धता। उप का अर्थ होता है: पास, निषद का अर्थ होता है: बैठना। यही उपासना का अर्थ है। उप आसन। पास बैठना। यही उपवास का अर्थ है: पास बैठना। मगर कैसे अर्थ विकृत हो गए! उपवास का अर्थ हो गया: अनशन। भूखे मरना। उपवास का अर्थ होता है: पास वास करना। इतने निकट हो जाना गुरु के--हां, कभी-कभी यह होगा कि गुरु की निकटता में ऐसा पेट भर जाएगा कि शायद भूख की याद भी न आए। इसी कारण अनशन की विकृति पैदा हुई। गुरु के आनंद में डूब कर अगर भोजन की याद न आए, तो उपवास; और जबरदस्ती भोजन न किया जाए, तो अनशन। अनशन हिंसा है, उपवास प्रेम है। उनमें जमीन-आसमान का भेद है।
इधर सोहन बैठी है, उससे पूछो। मैं उससे पूछता था जब उसके घर मेहमान होता था, पूना आता था, कि तू मुझे खिलाती है--और मेरे कारण न मालूम कितने मेहमान दिन भर उसके घर आते, उन सबको खिलाती है, और तू कुछ खाती-पीती दिखाई नहीं पड़ती! तो वह मुझसे कहने लगी, जब आप यहां होते हैं, मुझे भूख ही नहीं लगती। मैं खुद ही चकित हूं कि भूख कहां खो जाती है? मैं इतनी भरी-भरी हो जाती हूं कि भीतर जगह ही नहीं रहती।
प्रेम भोजन से भी बड़ा भोजन है। और जरूर भरता है, बहुत भर देता है। शायद भोजन की याद भी न आए। इस कारण एक गलत अर्थ हो गया उपवास का: अनशन।
उपासना का अर्थ है: पास बैठना। उसका भी गलत अर्थ हो गया। अब तुम मूर्ति की आराधना कर रहे हो। थाली सजाई हुई है, आरती बनाई हुई है, दीये जलाए हुए हैं, धूप जलाई हुई है और इसको तुम उपासना कह रहे हो। नहीं, उपासना तो केवल सदगुरु के पास बैठना होता है। और उसके पास बैठना ही आरती है, आराधना है। उसके पास बैठना ही तुम्हारे भीतर के दीये का जलना है। उसके पास बैठते ही तुम्हारे भीतर धूप जल उठती है, सुगंध उठने लगती है।
वेदांत पैदा हुआ उपनिषदों में; गुरु-शिष्यों के अंतरंग सान्निध्य में।
वेदांत का अर्थ है: जहां शब्द नहीं हैं; जहां शास्त्र नहीं, सिद्धांत नहीं, जहां वेदों का तो अंत हो गया, जहां सब शास्त्र बहुत पीछे छोड़ दिए गए--मन ही पीछे छोड़ दिया गया! मन में ही शास्त्र हो सकते हैं; मन के पार तो शास्त्र नहीं हो सकते। वेदांत है मन के पार उड़ान; अ-मनी दशा। वेदांत है: ध्यान, समाधि।
तो पहले तो वेदांत का अर्थ ठीक से समझ लो, नहीं तो भूल हो जाएगी। फिर मेरा अर्थ पकड़ में नहीं आएगा।
दूसरा शब्द है: विज्ञान। तुमने, सहजानंद, विज्ञान का अर्थ किया: प्रकृति का ज्ञान। क्योंकि अब हम साइंस के अर्थों में विज्ञान शब्द का प्रयोग करते हैं। यह हमारी नई बात है। हमारे पास साइंस के लिए कोई शब्द न था, हमने विज्ञान शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया। मगर तुम उपनिषदों पर इस अर्थ को मत थोपो! उपनिषदों में तो विज्ञान का बहुत सीधा अर्थ है, वह है: विशेष ज्ञान। विज्ञान यानी विशेष ज्ञान। ज्ञान वह है जो दूसरों से मिलता है और विशेष ज्ञान वह है जो अपने भीतर ही आविर्भूत होता है। उसका कोई साइंस से लेना-देना नहीं है। विज्ञान का अर्थ प्रकृति का ज्ञान नहीं है। विज्ञान का अर्थ है: विशेष; उधार नहीं निज का। वही उसकी विशिष्टता है, उसकी अद्धितीयता है।
वेदांत और विज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलू हुए। वेदांत है: शास्त्र के पार जाना--वह है मार्ग--और विज्ञान है उपलब्धि; विशेष ज्ञान की प्रतीति, अनुभूति, साक्षात्कार। विश्र्वास नहीं, अपना अनुभव। और तभी जीवन का सुनिश्र्चित अर्थ पता चलता है।
अब इस वचन को तुम समझो--
वेदांत विज्ञान सुनिश्र्चितार्थाः
जिसने वेदांत के साधन से विज्ञान को उपलब्ध किया है, उसे जीवन का अर्थ और अभिप्राय पता चलता है। उसके बिना जीवन का अर्थ पता नहीं चलता है। मगर इस पर कितना कचरा थोपा गया है! ऐसी ही घटना और शब्दों के साथ भी हुई।
संन्यास योगाद् यतयः शुद्ध-सत्वाः।
संन्यास का अर्थ पकड़ गया, जड़ हो गया; संसार को छोड़ दे जो, वह संन्यासी। तो फिर जनक संन्यासी नहीं हैं। लेकिन जनक से ज्यादा किसने जाना? और अगर जनक संसार में रह कर जान सकते हैं, तो संन्यास फिर अपरिहार्य न रहा। और संन्यास निश्र्चित ही अपरिहार्य है, अनिवार्य है। संन्यास के बिना कोई भी नहीं जान सकता। तो हमें संन्यास को कुछ पुनः आविष्कार करना होगा इसके छिप गए अर्थ को।
संन्यास का अर्थ संसार को छोड़ देना नहीं है। संन्यास का अर्थ है: असार, व्यर्थ जो हम पकड़े हुए हैं, उसका छूट जाना--छोड़ना नहीं, छूट जाना। भेद स्पष्ट कर लेना। वहीं भूल हो गई है। जैसे महावीर से तो साम्राज्य छूटा, लेकिन देखने वालों ने समझा कि छोड़ा। देखने वालों का भी कसूर नहीं, देखने वालों की अपनी मुसीबत है। देखने वालों की यह तकलीफ है कि वे तो पकड़े हुए हैं धन को, वे कैसे मानें कि धन अपने से छूट जाता है। उनका अपने जीवन का--एक जीवन का नहीं, अनंत जीवन का--अनुभव यह है कि वे तो और-और पकड़ना चाहते हैं। तो जब वे देखते हैं कि कोई व्यक्ति छोड़ कर चला गया, तो स्वभावतः वे सोचते हैं, धन्य है, कैसा त्याग किया! कैसा महात्यागी! छोड़ दिया! हमसे तो छूटती नहीं एक कौड़ी और इसने हीरे-जवाहरात छोड़ दिए! हमसे नहीं छूटता कुछ भी और इसने सब छोड़ दिया, साम्राज्य छोड़ दिया! लेकिन यह दर्शकों की दृष्टि है, यह महावीर की अंतरंग दृष्टि नहीं है। महावीर से पूछो। महावीर ने छोड़ा नहीं है, छूटा है।
और भेद तो बहुत बड़ा है।
छोड़ने का मतलब ही यह होता है: अभी लगाव कायम था, अभी आसक्ति बनी थी, जबरदस्ती करनी पड़ी है, जैसे कोई कच्चे फल को तोड़ता है। कच्चे फल को तोड़ना पड़ता है, पका फल अपने से गिर जाता है। और जब पक कर कोई फल गिरता है, तो न तो वृक्ष को कोई घाव लगता, न कोई पीड़ा होती, सिर्फ वृक्ष निर्भार होता है। और जब पका फल गिरता है तो पके फल को भी कोई पीड़ा नहीं होती। क्योंकि पक गया, अब पीड़ा का कोई सवाल नहीं था। अब यह गिरना बिलकुल नैसर्गिक है, स्वाभाविक है, आवश्यक है, प्रकृति के अनुकूल है। एस धम्मो सनंतनो। यही धर्म है। लेकिन जब कोई कच्चे फल को तोड़ता है, तो तोड़ना पड़ता है। फल को भी चोट लगती है, क्योंकि फल अभी कच्चा है, अभी पका ही नहीं, तुमने उसे उसके पूरे जीवन को विकसित होने का अवसर न दिया; जैसे किसी ने कली को तोड़ लिया, फूल भी न होने दिया। तो निश्र्चित ही तुमने हिंसा की। और कच्चे फल को तुम जब तोड़ते हो, वृक्ष को भी पीड़ा होती है।
एक ज्योतिषी के जीवन में उल्लेख है, अकबर ने उसे बुलाया था, बड़ी उसकी ख्याति सुनी थी। बहुत दिन से ख्याति सुन रहा था, लेकिन बुलाने में डरता भी था। यूं अकबर ने देश के सारे-सारे रत्न इकट्ठे कर लिए थे--तानसेन था वहां, इस देश का बड़े से बड़ा संगीतज्ञ, उन दिनों का ही नहीं, सारे-सारे दिनों का; बीरबल था वहां; और तरह-तरह के रत्न थे, नौ रत्न थे--इस ज्योतिषी के लिए भी बहुत खबरें आई थीं कि इसे भी अपने दरबार में बुला लो। लेकिन एक खतरा था कि ज्योतिषी बहुत मुंहफट है। दो और दो चार, तो दो और दो चार ही कहता है। मगर बात इतनी आती रही, आती रही कि अकबर उत्सुक होता गया, आखिर उसने कहा कि क्या कहेगा आखिर, बुला ही लो! एक दफा तो देखें कि वह क्या, किस तरह का आदमी है!
ज्योतिषी आया। अकबर ने पूछा कि कुछ मेरे संबंध में कहें। ज्योतिषी ने हाथ देखा और कहा कि पहले तुम मरोगे, फिर तुम्हारे बेटे मरेंगे, फिर उनके बेटे मरेंगे। अकबर ने कहा: यह भी कोई बात हुई। लोग तो ठीक ही कहते थे। कुछ और तुम्हें नहीं सूझता? मैं मरूंगा, मेरे बेटे मरेंगे, उनके बेटे मरेंगे--यही कहने तुम इतनी दूर आए! और मेरे दरबार में और भी ज्योतिषी हैं, किसी ने कभी यह नहीं कहा। उसने कहा, वे ज्योतिषी भी यही कह रहे होंगे, सिर्फ लीपपोत कर कहते होंगे। लेकिन मैं सच कह रहा हूं। और न केवल मैं यह कह रहा हूं, यह भविष्यवाणी है, यह मेरा आशीर्वाद भी कि पहले तुम मरो, फिर बेटे मरें, फिर उनके बेटे मरें। क्योंकि यही प्रकृति का नियम है। बेटे तुम्हारे बाद मरें, तुमसे पहले न मर जाएं। नहीं तो कच्चे होंगे। तुम पहले मरो। बेटे पहले मर जाएं तो दुर्घटना। बाप पहले मरे तो काई दुर्घटना नहीं है। मैं इतना ही कह रहा हूं: बाप का मरना पहले बेटों से बिलकुल ही स्वाभाविक है; तब तक बेटे बाप हो जाएंगे, फिर वे मरेंगे, फिर उनके बेटे मरेंगे--ऐसा मरते ही रहेंगे। मैं तो सीधी-सीधी बात कह रहा हूं।
अकबर को चोट तो लगी, क्योंकि कोई ज्योतिषी को हाथ नहीं दिखाता कि सिर्फ वह मृत्यु की ही बात करे, मगर ज्योतिषी ने कही, यही एकमात्र सुनिश्र्चित चीज है। बाकी तो सब चीजें अनिश्र्चित हैं। हो भी सकती हैं, न भी हों, मगर यह पक्का ही होगा। और मैं पक्के की ही बात करने का आदी हूं। कच्चे की मैं बात नहीं करता जो होना ही है, वही मैं कहता हूं।
पका फल जब गिरता है तो दुर्घटना नहीं है। लेकिन कच्चे फल जो वृक्ष से लटके हुए हैं, पके फल को गिरते देख कर सोचते होंगे, अहा, कैसा अदभुत फल है! हम तो छोड़ना नहीं चाहते, पकड़ना चाहते हैं--और रस पी लें, और रस पी लें; और दो दिन जी लें, अभी-अभी तो आए हैं, अभी क्या टूटना; और क्या अदभुत त्यागी है यह फल भी कि चल दिया, मार दी लात वृक्ष को! यह कच्चे फलों की प्रतीति है। और कच्चे फल क्या खाक कहेंगे पके फलों के संबंध में!
रामकृष्ण के पास एक आदमी आया। बहुत से रुपये लाया था एक थैली में भर कर। रामकृष्ण के चरणों पर चढ़ाने लगा। रामकृष्ण ने कहा कि क्यों, किसलिए? तो उसने कहा: आप महात्यागी हैं; और हम किसी तरह तो आपका सम्मान करें! रामकृष्ण ने कहा: शब्द वापस ले लो! मैं महाभोगी। महात्यागी तुम हो! कैसी उलटी बातें करते हो, रामकृष्ण ने कहा: मुझ भोगी को त्यागी कहते! और तुम हो त्यागी और अपने को भोगी कहते; क्या विनम्रता है तुम्हारी भी! वह आदमी तो बहुत चौंका। उसने कहा, आप क्या कह रहे हैं? परमहंसदेव, आप होश में हैं? आप और भोगी! और मैं और त्यागी! रामकृष्ण ने कहा: मैं बिलकुल ठीक कह रहा हूं। क्योंकि मैंने व्यर्थ को छोड़ दिया और सार्थक को भोग रहा हूं। और तुम व्यर्थ को पकड़े हो और सार्थक को त्यागा हुआ है। किसको भोगी कहें? किसको त्यागी कहें?
रामकृष्ण जैसे लोग शब्दों को आत्मा देते हैं, अर्थ देते हैं, क्योंकि ये कोई पंडित नहीं हैं।
मैं भी मानता हूं कि संन्यास परम भोग है। और जिनको तुम भोगी कहते हो, वे सच में समझो तो तुम्हारे अर्थों में संन्यासी हैं। कंकड़-पत्थर तो उन्होंने छाती से लगा रखे हैं, हीरे-जवाहरात छोड़ दिए हैं। हीरे-जवाहरात छोड़ने की उनकी तैयारी है, लेकिन कंकड़-पत्थर छोड़ने की नहीं। कागज के नोटों पर बैठे हुए हैं फन मार कर। लोग कहते हैं, मर जाते हैं इस तरह के लोग तो सांप हो जाते हैं; क्या खाक मर कर होंगे, वे अभी ही सांप हैं। जरा उनके नोट पर नजर तो करो, ऐसा फुफकारेंगे! कागज के नोटों पर मरे जा रहे हैं! और जीवन की परम निधि भीतर पड़ी है, उस तरफ आंख भी नहीं उठती। दौड़ रहे हैं बाहर, पद और प्रतिष्ठा में।
तो इन सारे पागलों के बीच जब कोई महावीर या बुद्ध जैसा व्यक्ति पैदा होता है, तो उसके संबंध में गलत धारणा बनेगी ही। महावीर और बुद्ध को ये कहेंगे: कैसा महान त्याग किया! लेकिन महावीर और बुद्ध से पूछो। महावीर-बुद्ध रामकृष्ण से राजी होंगे, मुझसे राजी होंगे।
संन्यास का अर्थ है: जो व्यर्थ है, जो असार है, उसका छूट जाना। संसार का छूट जाना नहीं, क्योंकि संसार न तो व्यर्थ है, न असार है। संसार तो दोनों है। संन्यासी इस ढंग से रहता है, इस कला से रहता है कि सार को भोगता है, असार को छोड़ देता है। और भोगी इस मूढ़ता से रहता है कि असार को तो पकड़ लेता है, सार से चूक जाता है। संन्यास संसार के छोड़ने का नाम नहीं, सार और असार के विवेक का नाम है। सार सार की तरह दिखाई पड़े, असार असार की तरह।
यह फिर एक पहलू हुआ।
संन्यास योगाद् यतयः शुद्ध-सत्वाः।
और इसका दूसरा पहलू है: योग। संन्यास का अर्थ हुआ: असार का छूट जाना; योग का अर्थ हुआ: सार से जुड़ जाना। योग का अर्थ होता है: जुड़ना। असार से छूटना और सार से जुड़ना, यह दो पहलू हुए। संन्यास नकारात्मक है। कचरे को छोड़ दिया, खाली कर लिया अपने को कचरे से--विचारों से, वासनाओं से, इच्छाओं से--और जैसे ही तुम खाली हुए कि परमात्मा से जुड़े। जैसे ही तुम खाली हुए कि तुम मिटे और परमात्मा ही बचा। उस परम मिलन का नाम योग है। योग का मतलब शीर्षासन नहीं है। योग का मतलब पद्मासन नहीं है। योग का मतलब कोई शारीरिक सर्कस नहीं है। कि शरीर को तोड़ रहे हो, मरोड़ रहे हो, उलटा-सीधा कर रहे हो। योग का अर्थ है: जोड़, मिलन, परम मिलन। योग परम घटना है जीवन की, जहां बूंद सागर से मिल जाती है और मिल कर सागर हो जाती है। संन्यास पहलू का एक हिस्सा और योग पहलू का दूसरा हिस्सा। संन्यास नकारात्मक, योग विधायक। जैसे वेदांत नकारात्मक--शब्द को छोड़ो, शास्त्र को छोड़ो, सिद्धांत को छोड़ो--और विज्ञान विधायक--ताकि तुम उस विशेष अनुभूति, उस विशेष ज्ञान को उपलब्ध हो जाओ जो जीवन को धन्य कर देती है। ऐसे व्यक्ति शुद्ध होता है, शुद्ध सत्व को उपलब्ध होता है।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले
मगर हम तो जब पंडित की व्याख्या में पड़ जाते हैं तो पंडित तो जो भी व्याख्या करेगा वह गलत होगी। क्योंकि उसे तो अनुभव नहीं है। वह क्या व्याख्या करेगा?
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले
मृत्यु के बाद ऐसा व्यक्ति ब्रह्मलोक में प्रवेश करता है।
परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे।।
और वहां पहुंच कर, ब्रह्मलोक में पहुंच कर--मरने के बाद--वह सर्वरूपेण मुक्त हो जाता है।
यह व्याख्या एकदम ही भ्रांत है। अगर तुम्हें मेरे पहले दो वचनों की व्याख्या समझ में आई हो, तो फिर अर्थ बदलना होगा।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले
ब्रह्मलोक कोई भौगोलिक स्थान नहीं है कहीं। ब्रह्मलोक है तुम्हारे भीतर उस अनुभूति का नाम जब बूंद सागर में मिल कर सागर हो जाती है; वेदांत से विज्ञान, संन्यास से योग, और इन सबको एक शब्द में कहा जा सकता है: ब्रह्मसाक्षात्कार, ब्रह्मानुभूति, ब्रह्मलोक में प्रवेश। इसको तुम भूगोल मत समझना कि कहीं ऊपर सात आकाशों के पार कोई ब्रह्मलोक है। तुम्हारे भीतर ब्रह्मलोक है। तुम्हारा अंतर्तम अभी भी ब्रह्मलोक में ही स्थापित है। तुम बाहर कितने ही भागो-दौड़ो, लेकिन तुम अभी भी उसी कील पर ठहरे हुए हो। तुमने गाड़ी को चलते देखा है? चाक चलता है, कील ठहरी रहती है। कील है ब्रह्मलोक। और चाक है तुम्हारा मन। चाक तो चलता चला जाता है, लेकिन कील सदा ठहरी रहती है। ऐसे ही तुम्हारे भीतर एक कील है जो सदा ठहरी हुई है, जो कभी नहीं चलती, जो शाश्र्वत है, नित्य है। और मन का चाक घूमता रहता है, घूमता रहता है। जिस दिन मन का चाक भी रुक जाता है, उस क्षण तत्क्षण तुम उस कील को देखने में समर्थ हो जाते हो जो कभी हिली नहीं, डुली नहीं, कभी बदली नहीं, बदल सकती नहीं।
और मृत्यु के बाद यह घटना नहीं घटती, जीवन में ही घटती है। लेकिन जीवन में भी मरने की एक कला है। जहां अहंकार मिट गया, वहां मृत्यु घट गई। अहंकार की मृत्यु पर घटती है यह बात। शरीर की मृत्यु से इसका कोई संबंध नहीं है। क्योंकि शरीर मर भी जाए और अहंकार बना रहे तो तुम फिर दूसरा शरीर ग्रहण करोगे। और अहंकार मिट जाए, शरीर बना रहे, शरीर से क्या लेना-देना है! जब अहंकार मिट गया तो तुम शरीर से मुक्त हो गए--शरीर में रहते हुए भी मुक्त हो गए। इसलिए हमने जनक को विदेह कहा है। देह में रहते हुए, संसार में रहते हुए विमुक्त कहा है।
यह मृत्यु की धारणा कि मरने के बाद ब्रह्ममिलन होगा, बड़ी खतरनाक है। क्योंकि इससे हमें उस परम क्रांति को स्थगित करने के लिए सुविधा मिल जाती है कि अब जो होना है वह तो मृत्यु के बाद होना है, तो जल्दी क्या! बुढ़ापे में साध लेंगे। मरते वक्त साध लेंगे। मरणशय्या पर साध लेंगे। और कोई मौत खबर देकर तो आती नहीं, पूर्व सूचना तो देती नहीं कि अब मैं आ रही हूं, अचानक आ जाती है, सो साधने का अवसर ही नहीं आता। जिंदगी भर सोचते रहे कि स्मरण करना है प्रभु का, खुद तो नहीं कर पाए, फिर लोग अरथी बांध कर उठाते हैं और राम-नाम सत्य बोलते हैं। जो इनको बोलना था, वह दूसरे बोल रहे हैं। दूसरे भी इनके लिए बोल रहे हैं, अपने लिए नहीं बोल रहे हैं। अपने लिए तो वे प्रतीक्षा करेंगे दूसरों की कि भैया, हम तुम्हारे लिए बोल दिए, अब कोई हमारे लिए बोल देना!
मैं जबलपुर बहुत वर्षों तक रहा। मेरे पड़ोस में एक सज्जन थे, जो हर एक की अरथी में सम्मिलित होते थे। मैंने उनसे पूछा कि बात क्या है, कोई भी मरे...! इतने तुम्हारे दोस्त लोग और प्रियजन मुझे दिखाई नहीं पड़ते। कभी मैं देखता नहीं तुम्हारे घर कोई भोजन करने आया हो, कि तुम किसी के घर भोजन करने गए हो, लेकिन हर अरथी में तुम जरूर सम्मिलित होते हो। शादी-विवाह का निमंत्रण तुम्हें मिले न मिले, मगर अरथी में तुम जरूर सम्मिलित होते हो। तो उन्होंने कहा: ऐसा है कि मरना तो मुझको भी पड़ेगा, तो सबकी अरथियों में सम्मिलित होता रहूंगा तो मेरी अरथी में भी लोग सम्मिलित होंगे। क्या तुम मुझे चाहते हो कुत्ते की मौत मरूं, कि मैं मरूं और कोई सम्मिलित भी न हो। उनके कोई बच्चे नहीं थे, शादी उन्होंने की नहीं थी, सो वे बड़े भयभीत थे इस बात से कि मर जाऊं तो कम से कम मरघट तो पहुंचाने वाले लोग होने चाहिए। मैंने कहा: तुम मर ही गए तो अब मरघट पहुंचे कि नहीं, इससे क्या फर्क पड़ता है! और चार आदमी गए मरघट पहुंचाने कि चार हजार आदमी गए, इससे भी क्या फर्क पड़ता है! तुम तो गए ही! मगर वे बोले कि नहीं, फर्क पड़ता है। कोई तो राम-नाम दोहराने वाला हो। अरे, कोई तो मरते वक्त कान में कम से कम गायत्री मंत्र पढ़ दे।
जिंदगी भर टालते रहते हैं, मरते वक्त लोग मुंह में गंगाजल डालते हैं, कान में गीता सुनाते हैं। वह आदमी मर रहा है, कुछ तो शर्म खाओ, कुछ तो संकोच करो! इस मरते आदमी का अपमान तो न करो! अरे, जिसने जिंदगी भर यह काम नहीं किया, मरते वक्त तो न करवाओ! जो जिंदगी भर बचा, उसको अब तो भ्रष्ट न करो! और यह क्या खाक सुनेगा; जो जब जिंदा था तब नहीं सुना, अब यह मरते समय सुनेगा! अब यह होश में है! इसको कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है, यह तो डूब रहा है। यूं समझो जैसे कोई पानी में डूब रहा हो और तुम घाट पर खड़े हुए ‘राम-नाम सत्य’ की हुंकार मचा रहे हो, गायत्री-मंत्र पढ़ रहे हो, कि भैया डूब जा, सुन ले, आखिरी वक्त सुन ले, काम पड़ेगा!
इस तरह की सूत्रों की व्याख्या ने यह परिणाम हाथ में ला दिया कि मरने के लिए हम टालने लगे। संन्यास यानी बुढ़ापे में पचहत्तर साल के बाद! अब आमतौर से पचहत्तर साल के बाद कितने लोग जिंदा रहते हैं? सत्तर स्वाभाविक उम्र है। पचहत्तर साल के बाद जिंदा कौन रहता है! दो-चार-दस आदमी जिंदा रह जाते होंगे। मगर जो पचहत्तर साल तक संन्यास न लेने का अभ्यास जिसने किया है, वह क्या पचहत्तर साल की आदत को इतनी आसानी से छोड़ देगा!
हर चीज का अभ्यास मजबूत होता चला जाता है।
एक मित्र मेरे शराब पीते हैं। उनकी पत्नी तीस साल से उनके पीछे पड़ी है कि शराब छोड़ो। वह मेरे पास भी बार-बार आकर कहती है कि आपकी ये मानते हैं, आप अगर एक दफा कह दो, ये जरूर छोड़ेंगे! मगर आप चुप बैठे हो, आप कहते ही नहीं! मैंने कहा: तू तीस साल से कह रही है, कुछ परिणाम न हुआ, तू मेरे शब्द भी खराब क्यों करवाना चाहती है; व्यर्थ जाएंगे। उसने कहा कि नहीं जाएंगे, आप कह दो। वे भी कहते हैं कि अगर भगवान कह दें तो मैं छोड़ दूंगा; क्योंकि उनको पक्का भरोसा है कि आप कहोगे ही नहीं। आप एक दफा कह दो, देख तो लें, एक यह भी प्रयोग हो ले!
मैंने उससे कहा: तो एक काम कर, तू तीस साल से कह रही है कि शराब छोड़ दो। उसने कहा: हां। तो मैंने कहा: पहले तू यह कर कि तू यह कहना छोड़ दे--सात दिन के लिए सिर्फ। अगर सात दिन तूने यह बात नहीं उठाई अपने पति से, तो आठवें दिन मैं तेरे पति से कहूंगा। उसने कहा: राजी। अरे, यह कोई कठिन बात है। सात ही दिन की बात है न, आठवें दिन आप कहोगे? आठवें दिन बिलकुल पक्का है; सात दिन तू कहना ही मत, बात ही मत उठाना।
और पति को बुला कर मैंने कहा कि यह वायदा हुआ है। यह सात दिन का सौदा हुआ है। सात दिन में अगर यह एक बार भी वचन तोड़ दे, तुम फौरन मुझे खबर करना। और नोट करते जाना कितनी दफे वचन तोड़ा। उनकी पत्नी बोली कि अरे, सात दिन का सवाल है, सम्हाल लूंगी। मगर जिस ढंग से वह कह रही थी, सम्हाल लूंगी, और उसके चेहरे पर पसीना दिखाई पड़ रहा था, मैंने कहा कि तू देख, सोच-समझ कर बात कर! अरे, उसने कहा: मेरा क्या बिगड़ता है, नहीं कहूंगी! फायदा भी क्या है, तीस साल तो कह कर देख लिया, चलो सात दिन का ही तो सवाल है! कुल सात दिन की ही तो बात है।
मगर वह तीसरे दिन मेरे पास आ गई। उसने कहा कि न मैं सो सकती, न मैं खाना खा सकती, मेरा सब गड़बड़ हो गया है, बिना कहे मैं नहीं रह सकती! मैं तो कहूंगी! मैंने कहा: अब तू जरा सोच; जो आदमी तीस साल से शराब पी रहा है, उसको तू छुड़वाने की कोशिश कर रही है और तूने तो शराब पी ही नहीं, सिर्फ शराब छुड़वाने का अभ्यास तुझे हो गया है--हालांकि फायदा भी कुछ नहीं हुआ है तीस साल में; उस अनुभव से भी तुझे कुछ सीख नहीं आई; और मैंने कुछ ज्यादा मांग न की थी, सिर्फ सात दिन की--और तू चाहती है कि तेरा पति जिंदगी भर के लिए शराब छोड़ दे! अब जरा होश की बात कर! तेरा तो कुल इतना ही,...तेरा क्या जाता है? तू कोई शराब तो पीती नहीं! तेरे कोई शरीर में तो शराब घुस नहीं गई है! तेरे शरीर की कोई जरूरत तो हो नहीं गई है! तू तो सिर्फ कहती है, बकवास ही करती है--और तीस साल का अनुभव यह है कि उससे कुछ फायदा भी नहीं है। फिर भी तू सात दिन चुप नहीं रहती। तू कहती है कि मैं सो भी नहीं सकती। बस, मुझे एक ही धुन सवार रहती है और मैं डरी रहती हूं कहीं निकल न जाए मुंह से। खाना खाने बैठते हैं ये, तो मैं अपने को सम्हाले! इतना तनाव मुझसे नहीं सहा जाता। मैं तो कहूंगी! मैंने कहा: तू कहेगी तो तू कह! लेकिन फिर इतना पक्का समझ ले कि जब तू कहना नहीं छोड़ सकती, तो यह बिचारा शराब कैसे छोड़ेगा! और इसीलिए तो मैं नहीं कह रहा हूं।
आदमी हर चीज का अभ्यासी हो जाता है। पचहत्तर साल तक जिसने टाला है, पचहत्तर साल तक जिसने टालने का अभ्यास किया है, तुम सोचते हो पचहत्तर साल के बाद एकदम से वह संन्यस्त हो जाएगा? वह पचहत्तर जन्मों तक टालेगा। मगर इन सूत्रों ने भ्रांति दे दी--इनके अर्थों ने, व्याख्याओं ने--कि मरने के बाद ब्रह्मलोक उपलब्ध होता है। जिंदगी में तो कुछ होने वाला नहीं है। जब जिंदगी में कुछ होने वाला नहीं है, तो क्यों व्यर्थ परेशान होओ! अरे, अभी तो खा लो, पी लो, मजा कर लो, यह चार दिन की चांदनी है, फिर देखेंगे, निपट लेंगे बाद में! और कोई हम अकेले थोड़े ही हैं, इतने लोग हैं, जो सब पर गुजरेगी वह हम पर भी गुजरेगी। और हम से भी बड़े-बड़े पापी पड़े हैं। अगर कतार भी लगेगी, क्यू भी लगेगा कयामत के दिन निर्णय का, तो हमारा नंबर तो न मालूम कब आएगा!
मुल्ला नसरुद्दीन अपने मौलवी से पूछ रहा था कि बिलकुल सच बताओ, कयामत के दिन में निर्णय हो जाएगा? उसने कहा: बिलकुल हो जाएगा! नसरुद्दीन ने पूछा, कयामत के दिन में घंटे कितने होंगे? मौलवी ने कहा: चौबीस ही घंटे होते हैं दिन में तो! चौबीस घंटे में निर्णय हो जाएगा--मुल्ला ने कहा। वह बड़ा प्रफुल्लित हुआ जा रहा था। मौलवी ने पूछा, तुम इतने प्रफुल्लित किसलिए हो रहे हो? अरे, निर्णय होगा! और मुल्ला ने कहा कि जितने लोग जमीन पर पैदा हुए हैं अब तक, वे सब मौजूद होंगे? क्योंकि सभी को--मुसलमानों में तो यही हिसाब है: कयामत के दिन एक दफा निर्णय होने वाला है। चौबीस घंटे में सबका। अरबों-खरबों लोग। और मुल्ला ने कहा: एक बात और, स्त्रियां भी मौजूद रहेंगी? और वह प्रसन्न होता जा रहा! मौलवी पूछने लगा कि तुम इतने क्यों प्रसन्न हो? उसने कहा: मैं इसलिए प्रसन्न हो रहा हूं कि अगर इतनी स्त्रियां मौजूद रहीं तो ऐसा शोरगुल मचने वाला है कि क्या खाक निर्णय होगा! कौन निर्णय करेगा! कौन सुनेगा! अरे, कौन किसकी सुनेगा! इतनी स्त्रियां, अरबों-खरबों, क्या चर्चा छिड़ेगी!! और जन्मों-जन्मों के बाद मिली हुई सहेलियां और क्या-क्या नहीं घट चुका होगा इस बीच! कितने फैशन बदल गए होंगे, कितनी साड़ियां...उसने कहा, फिर मुझे फिकर ही नहीं है! यही मुझे डर था। और इतने आदमी, और मुझ गरीब की कौन पूछ होगी वहां! वहां बड़े-बड़े पापी होंगे, अपना तो नंबर शायद ही लगे! और भीड़-भाड़ में अपन कहीं छिप कर खड़े रहेंगे। चौबीस ही घंटे का मामला है।
ये भ्रांतियां आदमी को स्थगित करने के लिए सुविधा बना देती हैं।
मैं तुमसे कहना चाहता हूं, इस सूत्र का मृत्यु से कोई संबंध नहीं है। इस सूत्र का अहंकार की मृत्यु से संबंध है--और वही असली मृत्यु है। शरीर की मृत्यु तो कोई मृत्यु नहीं, फिर आ जाओगे। हां, अहंकार मरा, तो मर गए। फिर लौटना नहीं है। वही निर्वाण है।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले।
परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे।।
और जो अहंकार में मर गया, जिसने अहंकार को मर जाने दिया, वह सब भांति मुक्त हो गया, क्योंकि सारी बीमारियां अहंकार की हैं, सारे बंधन अहंकार के हैं। यह कारागृह तुम्हारे अहंकार का है, जिसमें तुम बंद हो। कोई तुम्हें रोक नहीं रहा है, अभी तुम चाहो तो इसी क्षण कारागृह के बाहर आ सकते हो। न कोई पहरे पर है, न कोई जेलर है, न कोई चौकीदार है, न दरवाजे पर कोई ताला है। यह कारागृह तुम्हारा निर्माण किया हुआ है। और तुम जिस क्षण चाहो, इससे छलांग लगा कर बाहर आ सकते हो।
एक छोटा बच्चा, मकान बन रहा था किसी का तो ईंटों का ढेर लगा था, रेत का ढेर लगा था, वह उसी रेत के ढेर में खेल रहा था। खेलते-खेलते उसने अपने चारों तरफ ईंटें जमानी शुरू कर दीं। खेल ही खेल में बीच में बैठ गया रेत में, उसने ईंटें जमानी शुरू कर दीं--ईंट के ऊपर ईंट रखता गया। जब ईंटें उसके गले तक आ गईं तब उसको समझ में आया कि अब निकलूंगा कैसे? एकदम घबड़ाहट में चिल्लाया कि बचाओ मुझे, मैं तो बिलकुल बंद हो गया! मैं तो कैदी हो गया, बचाओ, मुझे! घबड़ाहट उसकी स्वाभाविक थी। ईंटें गले तक आ गईं, अब निकलूंगा कैसे? मगर एक बात भूल गया कि ईंटें मैंने ही जमाई हैं, जिस तरह जमाई हैं, उससे उलटा चल पडूं, अलग कर दूं। एक-एक ईंट को हटा दूं।
बुद्ध एक दिन सुबह-सुबह प्रवचन देने आए और हाथ में एक रूमाल ले कर आए। लोग बहुत चकित थे, क्योंकि वे कभी कुछ ले कर आते न थे, हाथ में रूमाल आज क्यों था? रेशमी रूमाल था, और बैठ कर इसके पहले कि प्रवचन दें, उन्होंने, रूमाल पर एक गांठ के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, चौथी, पांचवीं--पांच गांठें लगाईं। लोग बिलकुल देखते रहे टकटकी बांध के कि क्या हो रहा है? क्या कर रहे हैं वे? क्या आज कोई जादू का खेल दिखाने वाले हैं?और पांचों गांठें लगाने के बाद बुद्ध ने पूछा कि भिक्षुओं, मैं एक प्रश्न पूछता हूं। अभी-अभी तुमने देखा था, यह रूमाल बिना गांठों के था, अब गांठों से भर गया। क्या यह रूमाल वही है जो बिना गांठों का था या दूसरा है? उनके शिष्य आनंद ने कहा कि भगवान, आप हमें व्यर्थ की झंझट में डाल रहे हैं। क्योंकि अगर हम कहें यह रूमाल वही है, तो आप कहेंगे, उसमें गांठें नहीं थीं, इसमें गांठें हैं। अगर हम कहें यह रूमाल दूसरा है, तो आप कहेंगे, यह वही है। अरे, गांठों से क्या फर्क पड़ता है, रूमाल तो बिलकुल वही का वही है। यह रूमाल एक अर्थ में वही है जो आप लाए थे, क्योंकि कोई बुनियादी फर्क नहीं पड़ा है और दूसरे अर्थ में वही नहीं है, क्योंकि सांयोगिक फर्क पड़ गया है, इसमें पांच गांठें लग गई हैं।
बुद्ध ने कहा, तुममें और मुझमें बस, इतना ही फर्क है। सांयोगिक। मैं गांठ-रहित रूमाल हूं और तुममें गांठें लग गई हैं--और लगाने वाले तुम हो। फिर बुद्ध ने कहा, दूसरा प्रश्न मुझे यह पूछना है कि मैं यह गांठें खोलना चाहता हूं, जैसे कि तुम सब अपनी-अपनी गांठें खोलना चाहते हो।...गांठ शब्द प्यारा है। बुद्ध ने तो जो शब्द प्रयोग किया, ग्रंथि था। वह और भी प्यारा शब्द है। इसलिए हमने बुद्ध को, महावीर को निर्ग्रंथ कहा है। जिनकी ग्रंथियां टूट गईं, जिनकी गांठें खुल गईं। और है ही क्या? सबसे बड़ी गांठ यह अहंकार की है। यह सबसे बड़ी ग्रंथि है। तो बुद्ध ने कहा, मुझे यह गांठें खोलनी हैं, जैसे कि तुम सब मेरे पास इकट्ठे हुए हो गांठें खोलने के लिए, तो मैं कैसे खोलूं? और बुद्ध ने उस रूमाल के दोनों छोर पकड़ कर खींचना शुरू किया।
आनंद ने कहा कि भगवान, आप क्या कर रहे हैं? इस तरह तो गांठें और बंध जाएंगी। आप रूमाल खींच रहे हैं, गांठें छोटी होती जा रही हैं, खोलना मुश्किल हो जाएगा। खींचने से नहीं खुल सकती हैं गांठें। रूमाल को ढीला छोड़िए, खींचिए मत।
बुद्ध ने कहा: यह दूसरी बात भी तुम समझ लो कि जो भी खींचेगा, उसकी गांठें और बंध जाएंगी। ढीला छोड़ना होगा। विराम चाहिए, विश्राम चाहिए, तनाव नहीं। और तुम्हारे तथाकथित धार्मिक लोग बड़े तनावग्रस्त हो जाते हैं। गांठें खोलने के लिए ऐसे दीवाने हो जाते हैं कि ये खींचते ही चले जाते हैं रूमाल। कोई उपवास कर रहा है, कोई सिर के बल खड़ा है, कोई धूनी रमाए हुए है, ये क्या हैं? ये गांठें खींच रहे हैं। ये खींचते ही चले जा रहे हैं। इनका अहंकार और मजबूत होता जा रहा है--सूक्ष्म जरूर हो रहा है; पहले मोटा दिखाई पड़ता था, क्योंकि गांठ पोली थी, अब खिंच गई है तो छोटा हो गया है, दिखाई भी नहीं पड़ता--गांठ इतनी छोटी हो सकती है कि दिखाई भी न पड़े। और वही खतरा है, कि जब गांठ दिखाई न पड़े तो बहुत मुश्किल हो जाती है। उसका खोलना मुश्किल हो जाता है। खोलोगे भी कैसे?
तो बुद्ध ने कहा: मैं क्या करूं, आनंद, तुम्हीं कहो! तो आनंद ने कहा: पहली तो बात यह है कि आप रूमाल को ढीला छोड़ दें, इसी वक्त ढीला छोड़ दें। जितना आप खींचेंगे उतना मुश्किल हो जाएगा। दूसरी बात, इसके पहले कि हम सोचें कैसे गांठें खोली जाएं, मैं आपसे पूछना चाहता हूं: आपने कैसे गांठें बांधी? क्योंकि जब तक हम यह न जानें कि कैसे गांठें बांधीं, तब तक कैसे खुलेंगी, यह नहीं जाना जा सकता।
कैसे गांठें बांधीं, बस इतना ही तो सारा सार है। तुमने कैसे गांठ बांध ली है, इसको समझ लो, तो खोलने में कुछ देर नहीं। तुमने कैसे ईंटें रख कर अपने चारों तरफ कारागृह बना लिया है? पैदा होते से ही जो पहली गांठ समाज, परिवार, शिक्षा, धर्म, राज्य व्यक्ति पर बांधना शुरू कर देते हैं, वह अहंकार की गांठ है। हम बच्चे को कहने लगते हैं: प्रथम आना स्कूल में, गोल्ड मेडल लाना, प्रतियोगिता में जीतना, हारना कभी नहीं, टूट जाना मगर झुकना नहीं, कुल-मर्यादा की प्रतिष्ठा! हम अहंकार थोप रहे हैं। हम उसको गांठ बांध रहे हैं। फिर हम उससे कहते हैं। आगे बढ़ो! महत्वाकांक्षी बनो! धन कमाओ! यश कमाओ! पद-प्रतिष्ठा लाओ! तुम जैसा चमकता हुआ कोई भी न हो! तुम सबको मात कर दो, सबको फीका कर दो! और सब भी यही करने में लगे हैं। ऐसे राजनीति पैदा होती है।
राजनीति अहंकार के संघर्ष का नाम है। और धर्म अहंकार का विसर्जन है। किस तरह तुम पर गांठ बंधी है, जरा उसे ठीक से देख लो, खोलने में कोई कठिनाई न होगी। महत्वाकांक्षा ने गांठ बांधी है। और महत्वाकांक्षा में क्या रखा है! धन भी पा लिया, पद भी पा लिया, तो क्या होगा! सब पड़ा रह जाएगा--जब बांध चलेगा बंजारा, सब ठाठ पड़ा रह जाएगा। तुम बड़े पद पर भी पहुंच गए तो क्या होगा? होना क्या है? क्या पा लोगे? पाकर भी क्या पा लोगे? सिकंदर ने क्या पा लिया? तुम क्या पा लोगे? लेकिन हमें होश ही नहीं, दौड़े जा रहे हैं। और भी बेहोश लोग दौड़ रहे हैं, हम भी उन्हीं के साथ दौड़े जा रहे हैं। रुको, थोड़ा विश्राम, थोड़ा बैठ जाओ किनारे पर, थोड़े हलके हो लो, थोड़े शांत हो कर देखो--यह गांठ कैसे बंध रही है? प्रतिस्पर्धा कि कोई दूसरा आगे न निकल जाए। ईर्ष्या, जलन, ये सब गांठ को बांध रहे हैं। बस, यह अहंकार की गांठ न बंधे, यह अहंकार की गांठ तुम खोल लो कि मृत्यु हो गई। और ऐसे जो मरता है, वह द्विज हो जाता है। उसका दूसरा जन्म हो गया। शरीर तो वही रहा, लेकिन मौत भी हो गई, जन्म भी हो गया। इसी मृत्यु की चर्चा है इस सूत्र में।
और जिसने अहंकार को मर जाने दिया, वह ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है। अहंकार के अतिरिक्त और कोई बाधा ही नहीं है। यह मैं अलग हूं अस्तित्व से, यही मुझे रोक रहा है। मैं एक हूं अस्तित्व के साथ, बस इतना बोध, फिर न कोई संघर्ष है, न कोई तनाव है, न कोई विषाद है, न कोई हार है, न कोई असफलता है; फिर बूंद सागर में एक हो गई, उसकी अलग कोई यात्रा ही न रही। और जहां सागर के साथ मिलन है, वहीं ब्रह्मलोक है। और वह सागर तुम्हारे भीतर लहरा रहा है। मगर तुम गांठ बांधे बाहर खड़े हो। तुम अपने भीतर नहीं जाते हो।
यह सूत्र प्यारा है। मगर अर्थ मेरी दृष्टि से समझना। अब तक जो इसकी व्याख्याएं की गई हैं। बुनियादी रूप से गलत हैं।
ओशो, मैं संन्यास तो लेना चाहता हूं, लेकिन अभी बस आधा ही तैयार हूं। अर्थात संन्यास की तो तैयारी है, किंतु गैरिक वस्त्रों और माला पहनने की नहीं। क्या आप मुझे संन्यास देंगे?
एक चूहा अपने बिल से निकला और एक धूप सेंकते हाथी के पैरों पर उछलने-कूदने लगा हाथी को थोड़ा शक हुआ कि कोई प्राणी पैरों पर सरसराहट कर रहा है। हाथी ने चौंक कर पूछा, ऐ नन्हे-मुन्ने प्राणी, आपकी तारीफ?
जितनी की जाए उतनी थोड़ी, चूहे ने छाती फुला कर जवाब दिया।
क्या, वीरसिंह, तुम भी बातें कर रहे हो! तुम्हारी तो जितनी तारीफ की जाए उतनी थोड़ी! आधा-आधा संन्यास!
चंदूलाल को कुंवारा देख कर उनके मित्र ढब्बू जी ने उनसे कहा, क्यों यार, तुम्हारा विवाह कब होगा?
बस, समझ लो आधा तो हो ही गया, चंदूलाल ने बताया।
आधा विवाह! वह कैसे? ढब्बू जी ने आश्र्चर्य से पूछा।
आधा विवाह ऐसे कि मैं तो राजी हो गया हूं विवाह के लिए, लेकिन कोई लड़की राजी नहीं है।
मगर विवाह में तो समझ में आता है कि आधा-आधा भी हो सकता है, ठीक तुम राजी हो लेकिन लड़की राजी नहीं, संन्यास में तो सिर्फ तुम्हीं को राजी होना है, और किसको राजी होना है! अगर यह भी आधा-आधा होगा, तो फिर तो इस जगत में कोई चीज पूरी हो ही नहीं सकती।
वीरसिंह, पंजाबी तो नहीं हो? नहीं तो संत महाराज का सत्संग करो!
कंपनी कमांडर ने हवलदार सरदार विचित्तरसिंह को बुलाया और कहा, जाओ, कंपनी में ऐलान कर दो कि आज सूर्य को ग्रहण लगेगा; बरसा हुई तो सभा हाल में होगी नहीं तो बाहर होगी। विचित्तर सिंह ने कुछ सुना, कुछ नहीं सुना--फिफ्टी-फिफ्टी, आधा-आधा--कुछ समझा, कुछ नहीं समझा। स्वभावतः, सरदार से यही अपेक्षा! उसने बाहर जाकर ऐलान कर दिया, कमांडर साहब के हुक्म से आज सूर्य को ग्रहण लगेगा। बरसा हुई तो हाल में लगेगा, नहीं तो बाहर लगेगा।
वीरसिंह, कुछ समझो! कुछ का कुछ न समझो। संन्यास बोध की एक अवस्था है; जागरण की एक अवस्था है। ये वस्त्र तो केवल प्रतीक हैं। लेकिन यह वस्त्र यात्रा का प्रारंभ जरूर करवा देते हैं। क्यों? क्योंकि जैसे ही तुम घोषणा कर देते हो संन्यास की, वैसे ही तुम अपने भीतर अपने बाहर एक उत्तरदायित्व से भर जाते हो। तुम्हारी घोषणा संन्यास की तुम्हें एक उत्तरदायित्व दे देती है, कि अब इस बोध को निभाना है; अब इस बोध को जीना है, अब इस बोध के विपरीत जाना हीनता होगी, दीनता होगी, इस बोध से नीचे गिरना अपनी ही आंखों में नीचे गिरना हो जाएगा। और मैं कुछ तुमसे ज्यादा आग्रह करता नहीं संन्यास के लिए। बुनियादी आग्रह तो ध्यान का है। लेकिन जो व्यक्ति वस्त्र भी बदलने को राजी न हो, वह अपनी आत्मा को क्या खाक बदलेगा! और लोग कुछ भी बदलने को राजी नहीं हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन से उसकी प्रेयसी ने पूछा, अगर मैं तुमसे विवाह करने के लिए राजी हो जाऊं तो सिगरेट पीना छोड़ दोगे?
मुल्ला ने कहा: हां।
और शराब?
मुल्ला ने कहा: हां, वह भी।
और दोस्तों के बीच गई रात तक गप्पें हांकने की आदत?
मुल्ला ने कहा: हां-हां, वह भी।
लेकिन सबसे पहले क्या छोड़ना पसंद करोगे?
मुल्ला ने कहा: विवाह करने का इरादा।
इतना छोड़ना पड़े तो इस झंझट में ही कौन पड़े!
सो मैं तुमसे ज्यादा छोड़ने को भी नहीं कहता। मैं तो सिर्फ ध्यान के लिए कहता हूं। क्योंकि मैं जानता हूं, ध्यान आया तो शेष अपने से छूट जाता है। मगर वस्त्र की घोषणा उपयोगी है। यह तुम्हें जगाए रखेगी। तुम बाजार जाते हो, कोई समान खरीदने, अपने कुरते में एक गांठ लगा लेते हो, वह गांठ तुम्हें याद दिलाती रहती है कि सामान खरीदना है। बस, ये कपड़े तो ऐसे ही हैं--एक गांठ। जहां जाओगे वहीं लोग पूछेंगे, आप संन्यासी हैं? जहां जाओगे वहीं लोग गौर से देखेंगे। पुनः-पुनः याद दिलाते रहेंगे। सतत स्मृति बनी रहेगी। रसरी आवत जात है, सिल पर पड़त निसान! रस्सी भी आती रहे, जाती रहे, तो पत्थर पर निशान पड़ जाता है। करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। यह तो सिर्फ एक स्मृति का अभ्यास है। यह तो स्मरण की एक प्रक्रिया है। एक छोटी सी विधि, उपाय।
लेकिन, वीरसिंह, कहीं कायरता छिपी है भीतर। डरे हो। किसी को पता न चले। लोग मुझसे पूछते हैं कि चलो हम गैरिक वस्त्र पहन लेंगे, मगर माला! अगर हम भीतर रखें छिपा कर तो चलेगा? तो माला का प्रयोजन ही क्या, जब भीतर ही छिपानी है, तो न ही पहनी तो ही चल जाएगा। छिपाना क्या है?
मेरे साथ जुड़ना भी घबड़ाहट पैदा करता है। और उस जुड़ने का उपयोग है। चुनौती है वह। वह तुम्हारे भीतर दबी हुई जो भी साहस की संभावना हो, उसके लिए चुनौती है। मेरे साथ जुड़ने का अर्थ एक खतरे में पड़ना है। और गैरिक वस्त्र, वे कहते हैं, चलो पहन लेंगे, लेकिन माला में खतरा है। क्योंकि गैरिक वस्त्र अकेले तुम पहने रहो, तो लोग समझेंगे कि अरे, बड़ी साधु वृत्ति का आदमी है, महात्मा है; पैर भी पड़ेंगे। मेरी माला देखी कि धर्मशाला में भी न ठहरने देंगे। मंदिर में भी न घुसने देंगे। कि उठो-उठो भैया, कहीं और जाओ, आगे बढ़ो! कि इस तरफ कृपा-दृष्टि रखना, इधर मत आना। कि कौन झंझट में पड़े तुम्हें ठहरा कर और!
अपनी कायरता को पहचानो!
मुल्ला नसरुद्दीन कह रहा था, कल रात सर्कस में खूब भगदड़ मची। एक शेर पिंजरे से निकल भागा।
मैंने पूछा: फिर क्या हुआ?
उसने कहा: प्रत्येक व्यक्ति भाग खड़ा हुआ, केवल मुझे छोड़ कर।
मैंने कहा: नसरुद्दीन, मैं कभी नहीं सोचता था कि तुम इतने बहादुर! तुम नहीं भागे?
उसने कहा: बिलकुल नहीं भागा। मैं तो तुरंत शेर के खाली पिंजरे में जा कूदा और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। देखते हो बहादुरी! इससे ज्यादा सुरक्षित और स्थान ही नहीं था अब कोई। शेर बाहर था, सो वह भीतर कूद गए और भीतर से दरवाजा बंद कर लिया। अब कोई शेर दरवाजे थोड़े ही खोलना जानते हैं! अरे मैं तो निश्र्चित बैठ गया, भगदड़ मची है, भागते रहे कायर जमाने भर के! मगर मैं शान से बैठा रहा! और लोग भी मान गए कि है भई आदमी!
संन्यास तो, वीरसिंह, प्रेम का मामला है, पागलों का मामला है; दीवानगी है। यूं नहीं चलेगा। प्रेमी ऐसा नहीं पूछते। प्रेम कहीं आधा-आधा होता है! मेरे पास बैठोगे आधे-आधे? कैसे बैठोगे आधे-आधे? तो शरीर यहां रहेगा, मन कहीं और रहेगा--यही आधा-आधा होना हो सकता है और क्या होगा? और मन यहां न रहा तो शरीर का यहां क्या करूंगा? यहां कोई लाशें इकट्ठी करनी हैं। यह कोई मरघट है! यह मयकदा है, मरघट नहीं।
मरघट तो बहुत हैं। इस देश में मरघट ही मरघट हैं। जहां जाओ वहीं मिल जाएंगे। मुर्दा आश्रमों की कोई कमी है! वीरसिंह, वहीं किसी मुर्दा आश्रम में कूद पड़ो और भीतर से ताला लगा कर बैठ जाओ! उससे ज्यादा सुरक्षित और कोई जगह नहीं है।
यह जगह सुरक्षा की नहीं है। यह तो खतरे की है। यह तो चुनाव की है। यह तो चुनौती की है। यहां तो सतत जागरूकता रखनी पड़ेगी। और यह तो दीवानों के लिए है। यह प्रेम के बिना नहीं हो सकता। और प्रेम कभी आधा नहीं होता, आंशिक नहीं होता; या तो होता है या नहीं होता है।
कोई ले जाता है उस तक तो कबा आती है...
कोई ले जाता है उस तक तो कबा आती है
खुद से जाने में मुझे आप हया आती है
खुद से जाने में मुझे आप हया आती है...
तो मजबूर करके मेरे दिल को यार ले चलो...
तो मजबूर करके मेरे दिल को यार ले चलो
उसकी...
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो...
शायद ये मेरा वहम हो, मेरा खयाल हो...
शायद ये मेरा वहम हो, मेरा खयाल हो
फिर मेरे बाद उसे भी मलाल हो
फिर मेरे बाद उसे भी मलाल हो...
पछता रहा है अब मुझे दर से उठाके वो...
पछता रहा है अब मुझे दर से उठाके वो
अब बैठा है मेरी राह में...
अब बैठा है मेरी राह में आंखें बिछाके वो
बैठा है मेरी राह में आंखें बिछाके वो...
उसने भी तो किया था मुझे प्यार ले चलो...
उसकी...
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो
अब उस गली में कोई न आएगा मेरे बाद...
अब उस गली में कोई न आएगा मेरे बाद
उस दर पर खून कौन बहाएगा मेरे बाद
अब उस गली में कोई न आएगा मेरे बाद...
उस दर पै खून कौन बहाएगा मेरे बाद
मैंने तो संग-ओ-इश्क से टकराके अपना सर...
मैंने तो संग-ओ-इश्क से टकराके अपना सर
और गुलनार कर दिए थे लहू से वो पांव तर
और गुलनार कर दिए थे लहू से वो पांव तर...
फिर मुंतजिर है वो दरो-दीवार ले चलो...
फिर मुंतजिर है वो दरो-दीवार ले चलो
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो
वो जिसने मेरे सीने को...
वो जिसने मेरे सीने को जख्मों से भर दिया
छुड़वा के अपना दर मुझे दर-दर का कर दिया
वो जिसने मेरे सीने को जख्मों से भर दिया...
छुड़वा के अपना दर मुझे दर-दर का कर दिया
माना कि उसके जुल्म-ओ-सितम से हूं निमजां...
माना कि उसके जुल्म-ओ-सितम से हूं निमजां
फिर भी मैं सख्तजां हूं...
फिर भी मैं सख्तजां हूं पहुंच जाऊंगा वहां
सौ बार जाऊंगा मुझे सौ बार ले चलो
सौ बार जाऊंगा मुझे सौ बार ले चलो...
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो...
दीवाना कह कर लोगों ने हर बात टाल दी...
दीवाना कह कर लोगों ने...
दीवाना कह कर लोगों ने हर बात टाल दी
और दुनिया ने मेरे पांवों में जंजीर डाल दी
और दुनिया ने मेरे पांवों में जंजीर डाल दी...
चाहो जो तुम तो मेरा मुकद्दर सम्हाल दो...
चाहो जो तुम तो मेरा मुकद्दर सम्हाल दो
अरे यारो ये मेरे पांवों से बेड़ी उतार दो...
यारो ये मेरे पांवों से ब़ेडी उतार दो...
अरे या खेंचते हुए सरे बाजार ले चलो
या खेंचते हुए सरे बाजार ले चलो...
उसकी...
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो
उसकी गली को तो जानता पहचानता हूं मैं...
उसकी गली को तो जानता पहचानता हूं मैं
वो मेरी कत्लगाह है ये मानता हूं मैं
वो मेरी कत्लगाह है ये मानता हूं मैं...
उसकी गली में मौत मुकद्दर की बात है...
उसकी गली में मौत मुकद्दर की बात है
शायद ये मौत अहले-वफा की हयात है
मैं खुद भी मांगता हूं तलबगार ले चलो
मैं खुद भी मांगता हूं तलबगार ले चलो...
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो
उसकी गली में मौत मुकद्दर की बात है...
शायद ये मौत अहले-वफा की हयात है
मैं खुद ही मांगता हूं तलबगार ले चलो
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो
दीवानगी चाहिए। पागलपन चाहिए। प्रेम चाहिए। यह आधा-आधा नहीं हो सकता। यह तो पूरा ही हो सकता है। और यहां तो उन्हीं लोगों के लिए निमंत्रण है, जो मिटने को राजी हैं, जो जीते-जी मरने को राजी हैं। क्योंकि तभी, तुम्हारे अहंकार की राख पर ही तुम्हारी आत्मा का कमल खिलेगा।
यदि प्रेम जग रहा है, वीरसिंह, तो कंजूसी न करो, हिसाब न लगाओ! कुछ तो जिंदगी में कर लो बेहिसाब! एक बात तो जिंदगी में कर लो बिना तर्क के, बिना सोच-विचार के! क्योंकि वही बात नाव बनेगी। सोचने-विचारने वाले इसी तट पर अटके रह जाते हैं। ये तो हिम्मतवर हैं कुछ, जो उस किनारे को छू लेते हैं। जो कूद पड़ते हैं अज्ञात में।
आधे-आधे का मतलब? आधे-आधे का मतलब कि दुनिया से छिपाए रखूंगा। मगर यह बात छिपाने की नहीं है। सूरज निकलेगा तो कैसे छिपेगा? अरे, दीया जलेगा तो कैसे छिपेगा, सूरज तो बहुत दूर की बात है! जरा सा दीया भी जलेगा तो नहीं छिपाया जा सकता है। और यह भी खयाल रखना, अगर दीया जले और तुम उसे छिपा दो, तो दीया मर जाएगा। दीये को अगर तुमने ढांक दिया, यह देख कर कि कहीं कोई हवा का झोंका न बुझा दे, कि अंधड़ उठ रहा है, झंझावात आ रहा है, कहीं दीया बुझ न जाए, और तुमने उस पर बर्तन ढांक दिया, तो शायद झंझावात में तो दिया न बुझता, लेकिन बर्तन ढांकते ही बुझ जाएगा। क्योंकि दीये को भी श्र्वास लेनी पड़ती है। वह भी जलता है आक्सीजन से। उसको भी हवा मिलती रहनी चाहिए।
और जब कोई दीया बुझ जाता है हवा में, तो इसी बात का सबूत देता है: कमजोर था। क्योंकि यही हवा जंगल में लगी आग को हजार गुना कर देती है और यही हवा कमजोर दीये को बुझा जाती है। हवा का कोई कसूर नहीं है, तुम्हारे भीतर कितना बल है! अगर टिमटिमाता सा है, तो कोई भी झोंका बुझा देगा। और अगर जंगल में लगी आग जैसा है, तो आएं तूफान, आएं आंधियां, तुम्हारी आग और भी प्रज्वलित होगी, और भी निखरेगी।
और अगर आधा भी तुम्हारा मुझसे लगाव बन गया है तो तुम मुश्किल में पड़ोगे। तुम झंझट में पड़ोगे। घर जाकर रोओगे। फिर तुम्हें बहुत याद आएगी। फिर तुम कहोगे: उसी गली में...। फिर तुम कहोगे:
कोई ले जाता है उस तक तो कबा आती है
खुद से जाने में मुझे आप हया आती है
तो मजबूर करके मेरे दिल को यार ले चलो
उसकी गली में फिर मुझे इक बार ले चलो
भागो मत, नहीं तो पछताओगे। डरो मत, नहीं तो पछताओगे। अपराध अनुभव होगा।
तेरी बातें ही सुनाने आए
तेरी बातें ही...
तेरी बातें ही सुनाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
दोस्त भी...
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं...
फूल खिलते हैं...
फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं
तेरे आने के जमाने आए
तेरे आने के...
तेरे आने के जमाने आए
तेरी ही बातें सुनाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए...
इश्क तन्हा है...
इश्क तन्हा है सरे मंजिले गम...
इश्क तन्हा है सरे मंजिले गम
कौन ये बोझ उठाने आए
कौन ये बोझ उठाने आए...
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
तेरी बातें ही सुनाने आए...
तेरी बातें ही...
तेरी बातें ही सुनाने आए
अजनबी दोस्त हमें देखके हम...
अजनबी दोस्त...
अजनबी दोस्त हमें देखके हम
तुझे कुछ याद दिलाने आए
तुझे कुछ याद दिलाने आए...
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
तेरी बातें ही सुनाने आए
अब तो रोने से भी दिल दुखता है...
अब तो रोने से भी...
अब तो रोने से भी दिल दुखता है
शायद अब होश ठिकाने आए
शायद अब होश ठिकाने आए...
तेरी बातें ही सुनाने आए
तेरी बातें ही...
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
दोस्त भी...
सोरहो मौत के पहलू में फराज...
सोरहो मौत के...
सोरहो मौत के पहलू में फराज
नींद किस वख्त न जाने आए
किस वख्त न जाने आए...
न जाने आए...
नींद किस वख्त न जाने आए...
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
तेरी बातें ही सुनाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
लौट तो जा सकते हो, मगर हर बात दिल को दुखाएगी। सुबह सूरज निकलेगा और पूरब में गैरिक रंग फैल जाएगा--और तुम्हें याद आएगी! टेसू के फूल खिलेंगे--और तुम्हें याद आएगी! गुलाब का फूल हवा में नाचेगा--और तुम्हें याद आएगी! बाहर के दीये जलेंगे--और तुम्हें याद आएगी! आकाश चांद-तारों से भरेगा--और तुम्हें याद आएगी! क्योंकि यह सब तुम्हारा भी हो सकता है, तुम्हारा भी हो सकता था।
तेरी बातें ही सुनाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं
तेरे आने के जमाने आए
दोस्त भी दिल...
इश्क तन्हा है सरे मंजिले गम
कौन यह बोझ उठाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
तेरी ही बातें सुनाने आए
अजनबी दोस्त हमें देखके हम
कुछ तुझे याद दिलाने आए
दोस्त भी दिल...
अब तो रोने से भी दिल दुखता है
शायद अब होश ठिकाने आए
तेरी बातें ही सुनाने आए
दोस्त भी दिल...
सोरहो मौत के पहलू में फराज
नींद किस वख्त न जाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
तेरी बातें ही सुनाने आए
दोस्त भी दिल...
ऐसे भाग मत जाना!! हां, सौ प्रतिशत संन्यास न लेना हो, तो बिलकुल ठीक। लेकिन पचास प्रतिशत का मामला बहुत खतरनाक है। अगर पचास प्रतिशत भी बात मन को पकड़ ली है, तो तुम तड़फोगे--यूं जैसे मछली तड़पे रेत पर पड़ कर। यहां तो सागर है गैरिक संन्यासियों का, यहां तो डूब कर एक मस्ती आएगी, एक रस बहेगा, लेकिन लौट कर रेत में पड़ जाओगे। अपने साथ सागर ले जा सकते हो। इसलिए तो तुम्हें गैरिक वस्त्र दे देता हूं कि तुम इस विराट सागर के हिस्से हो गए, फिर तुम जहां भी रहो, इस सागर के ही हिस्से हो। गैरिक वस्त्र तुम्हारे और मेरे बीच सेतु बन जाते हैं। गैरिक वस्त्र तुम्हारे और मेरे बीच उपनिषद की घटना है। फिर तुम हजारों मील दूर भी बैठो तो मेरे पास बैठे हो। और यहां जो संन्यासी नहीं है, पास भी बैठा हो तो भी दूर ही बैठा है।
पर तुम्हारी मर्जी! मैं आग्रह नहीं करता कि संन्यास लो, सिर्फ स्मरण दिला रहा हूं। स्मरण दिलाने से ज्यादा मेरी कोई चेष्टा नहीं है। मैं कोई आदेश नहीं देता। मैं कौन हूं जो आदेश दूं! सिर्फ सुझाव दे देता हूं। और जिनके हृदय उर्वर हैं, उनमें वे सुझाव बीज बन जाते हैं। फिर बसंत की प्रतीक्षा करनी। बसंत आता है, अपने से आता है--और जीवन फूलों से भर जाता है!
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
How can I prepare for taking sannyas?
According to Osho, prepare for sannyas by dropping half-measures and choosing total readiness: sannyas is an inner awakening supported by outer symbols. Begin with meditation—the sole essential—because with true meditation the rest falls away by itself. Publicly declaring sannyas through ochre clothes or a mala functions like a knot-in-the-garment, creating responsibility and continuous remembrance, helping you live your awakening consistently in daily life.
In simple terms: Be fully ready inside, start meditating, and use the robe or mala as a reminder so you don’t forget to live like a sannyasin.
What is the significance of sannyas in relation to enlightenment?
According to Osho, sannyas is a skillful means—not an absolute requirement for enlightenment. Truth must be tailored to the seeker: for some, sannyas serves as a catalytic commitment that shatters secondhand beliefs and starts authentic inquiry; for others, it’s unnecessary. Devices differ, the work is one: move beyond beliefs into silent awareness, where realization flowers and all labels drop.
In simple terms: Sannyas is like training wheels—useful for some to start moving toward silence, but not needed to reach the goal.
