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Questions in this Discourse
ओशो, कृष्ण पूर्णावतार कहे जाते हैं, पर सभी सयाने उनके प्रति एकमत क्यों नहीं हैं?
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है।
तुम किसी व्यक्ति को प्रेम करते हो, यह तो एक बात हुई। और तुम किसी व्यक्ति को घृणा करते हो, कोई तुम्हारा दुश्मन है, तो दुश्मन का जो दुश्मन है उससे भी तुम प्रेम जतलाते हो; यह बड़ी दूसरी बात हुई। किसी से प्रेम होना एक बात है, दुश्मन के दुश्मन से प्रेम दिखलाना बिलकुल दूसरी बात है। पहली बात तो धर्म की है, दूसरी राजनीति की है। राजनीति का सूत्र ही यह है कि दुश्मन का दुश्मन अपना मित्र। उससे कोई मैत्री नहीं है, उससे कुल इतना ही संबंध है कि वह दुश्मन का दुश्मन है।
अगर तुम अपने गुरु को प्रेम करते हो, तब तो तुम्हें किसी और गुरु से तुलना करने का कोई सवाल नहीं। लेकिन तुम्हारे जीवन में प्रेम कम महत्वपूर्ण है, घृणा ज्यादा महत्वपूर्ण है। वस्तुतः तुम अपने गुरु को प्रेम कम करते हो, किसी और के गुरु को घृणा ज्यादा करते हो। उस घृणा के विपरीत ही तुम इस व्यक्ति के प्रेम में पड़ते हो। तुमने महावीर को नहीं चाहा है; तुमने कृष्ण को न चाहा होगा, इसलिए तुम महावीर को पकड़े हो; क्योंकि यह दृष्टि विपरीत मालूम होती है। तुमने कृष्ण को भी नहीं चाहा है; तुमने बुद्ध को न चाहा होगा, इसलिए तुम कृष्ण को पकड़े हो; क्योंकि बुद्ध की दृष्टि से कृष्ण विपरीत जाते मालूम पड़ते हैं।
तुम्हारे जीवन की धारा प्रेम से आंदोलित नहीं है, घृणा से आंदोलित है। इसीलिए जब भी तुम्हारे जीवन में घृणा को प्रकट करने का मौका होता है, तब तुम्हारे उत्साह की कमी नहीं होती। अगर कहीं कोई शुभ घटना घटती हो, तो तुम ध्यान ही नहीं देते। कहीं कोई अशुभ घटना घटती हो, तो तुम भीड़ बांध कर वहां खड़े हो जाते हो।
तुम अस्पताल जा रहे हो, पत्नी बीमार पड़ी है, बच्चा भूखा है, दवा लानी है, भोजन कमाना है, लेकिन अगर रास्ते पर दो लोग लड़ रहे हों, तो फिर तुम्हारे पैर नहीं बढ़ते। तुम खड़े होकर देख ही लेना चाहोगे। और अगर ऐसा हो जाए कि शोरगुल तो बहुत मचे, लड़ाई-झगड़ा हो न, गाली-गलौज बहुत हो और लोग बीच-बचाव कर दें, या लोग अलग हटा दें, तो तुम बड़े उदास मन से आगे बढ़ते हो कि कुछ हुआ ही नहीं। मन में बात छूट जाती है, जैसे कुछ होना था--छुरा चलता, खून बहता, तो जीवन में थोड़ी गति आ जाती।
युद्ध के समय इसलिए लोग बहुत ज्यादा ताजे, निखरे मालूम पड़ते हैं। जो कभी ब्रह्ममुहूर्त में नहीं उठते, वे भी ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर अखबार खोजते हैं। जिनके जीवन में कुछ भी नहीं है, वे भी कहीं लाखों लोग मर रहे हैं, मारे जा रहे हैं, इससे आंदोलित हो जाते हैं। हर दस वर्षों में, मनस्विद कहते हैं, पृथ्वी पर एक बड़े युद्ध की जरूरत पड़ जाती है। क्योंकि लोग घृणा से जीते हैं। और अगर घृणा के निकलने का उपाय न हो तो लोगों के जीवन से रस खो जाएगा।
अखबार तुम पढ़ते हो, तुमने कभी खयाल किया, हत्या हो, चोरी हो, किसी की स्त्री भगाई गई हो, कहीं दंगा हो जाए, कहीं दुर्घटना हो जाए--तत्क्षण तुम्हारी रीढ़ झुक जाती है, पढ़ने में आंखें एकाग्र हो जाती हैं। रामनाम पर इतनी एकाग्र नहीं होतीं, जैसे अखबार में हुई दुर्घटना पर। कुछ भी गलत पर मन अटक जाता है।
अखबार में खबर इकट्ठी करने वाले लोग शुभ खबरों को इकट्ठा नहीं करते। क्योंकि उन्हें कौन पढ़ेगा? उनका कोई मूल्य ही नहीं है। अगर कहीं किसी ने किसी गिरते आदमी को सहारा दिया हो, इसको कौन पढ़ेगा? इसमें मतलब भी क्या है? इसमें रस किसको है? किसी ने किसी बीमार के पैर दबाए हों, यह कोई खबर है! इसमें कोई उत्तेजना नहीं है। यह बात फीकी लगती है। अगर कभी आ भी जाए तो किसी कोने में कोई छोटा सा स्थान घेरती है। धर्म के लिए तो अखबार में कोई जगह ही नहीं रह गई है; केवल अधर्म के लिए जगह है। राजनीतिज्ञ होते हैं प्रथम पृष्ठों पर बड़ी सुर्खियों में। क्योंकि उनके आस-पास सब तरह का उपद्रव है। उनके आस-पास सब तरह का गलत चल रहा है।
गलत पर हमारी दृष्टि है, घृणा में हमारा रस है। मित्र में हमें बहुत रुझान नहीं है, शत्रु में है। यह जीवन की बड़ी उलटी दिशा है; जैसे गंगा गंगोत्री की तरफ बहती हो, सागर की तरफ नहीं।
निश्चित ही तुम बहुत दुख पाते हो, बहुत पीड़ा पाते हो इसके कारण। लेकिन यही तुम्हारा ढंग है। तुम कभी मंदिर न जाओगे, लेकिन अगर मस्जिद जलाने का मौका आ जाए तो तुम मस्जिद जलाने जरूर चले जाओगे। तुम कभी मस्जिद प्रार्थना करने न गए होओ, लेकिन अगर कोई कह दे इस्लाम खतरे में है और हिंदुओं की मूर्ति तोड़नी है, तो तुम्हारे जीवन में बड़ा उत्साह आ जाएगा।
मस्जिद जलाने जो गए हैं, तुमने कभी उनको मंदिर में पूजा करते देखा? तुम और ही लोगों को पाओगे मंदिर में पूजा करते। और जो मंदिर में पूजा कर रहा है, वह मस्जिद जलाने जाएगा? अगर उसने पूजा की है तो मस्जिद भी मंदिर हो गया। जिसने मस्जिद में नमाज पढ़ी है, उसके लिए सारा जगत परमात्मा का घर हो गया। अब वह मंदिर की मूर्ति तोड़ने जाएगा? क्योंकि तुम किसी को भी तोड़ो, परमात्मा को ही तोड़ोगे। और तुम कुछ भी करो, परमात्मा के साथ ही करोगे।
लेकिन एक दूसरा आदमी तुम्हें मिलेगा; वह तभी जगता है जब इस्लाम खतरे में होता है। अन्यथा वह सोया रहता है। वह तभी जगता है जब हिंदू धर्म खतरे में होने की आवाज मच जाती है। जब भी खतरा होता है तब उसे रस आता है, क्योंकि अब उपद्रव किया जा सकता है।
तुम्हारे रस बड़े रुग्ण हैं। तुम जब कहते हो, मैं कृष्ण के पक्ष में हूं, तो तुम जरा गौर से सोचना: तुम कृष्ण के पक्ष में हो? क्योंकि पक्ष में होते तो तुम कृष्णमय हो जाते। तुम रूपांतरित हो गए होते। तुम महावीर के विपक्ष में होओगे, बुद्ध के विपक्ष में होओगे, मोहम्मद के विपक्ष में होओगे। क्योंकि इन सबके विपक्ष में होने के लिए किसी के पक्ष में होना जरूरी है, इसलिए तुम कृष्ण के पक्ष में हो! तुम्हारा पक्ष तुम्हारे प्रेम से नहीं आता, तुम्हारे घृणा के जहर से आता है।
इसलिए तो दुनिया में इतने धार्मिक लोग दिखाई पड़ते हैं और धर्म बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता। आदमी ही खोजना मुश्किल है जो धार्मिक न हो। सभी आदमी धार्मिक हैं। कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई ईसाई है। पर धार्मिक कहां है? धार्मिक होना तो एक महाक्रांति है। वह तो जीवन का आमूल रूपांतरण है। वह तो जड़ों से स्वयं को बदल डालना है।
तो मैं तुमसे कहता हूं, सयाने तो सभी एकमत हैं। महावीर कृष्ण के विरोध में नहीं हैं, कृष्ण महावीर के विरोध में नहीं हैं। और अगर कभी तुम्हें ऐसा भी लगता हो कि वे विरोध में मालूम पड़ते हैं, तो पहले तो तुम अपनी बुद्धि को समझने की कोशिश करना। क्योंकि जितना ज्ञान का शिखर ऊपर उठता है, उतनी ही वाणी और शब्दों के अर्थ रूपांतरित हो जाते हैं। शब्द का अर्थ वही होता है जो अर्थ तुम देते हो।
महावीर ने कहा है, आत्मा ही एकमात्र सत्य है। और बुद्ध ने कहा है, आत्मा से असत्य और कुछ भी नहीं। स्वभावतः विरोधी हैं। इसको देखने में आंख की भी जरूरत नहीं, अंधा भी पहचान लेगा; कि एक कहता है, आत्मा ही सत्य है, आत्मा को पा लेना ही सब कुछ है; और एक कहता है, आत्मा ही असत्य है, इससे मुक्त हो जाना ही मुक्ति है।
लेकिन अगर दोनों सयाने हैं, तो दोनों के शब्दों के अर्थ ठीक से समझने पड़ेंगे। महावीर जिसको आत्मा कहते हैं, बुद्ध उसको आत्मा कहते ही नहीं। बुद्ध हमेशा अहंकार को ही आत्मा कहते हैं, आपे के भाव को आत्मा कहते हैं। आत्मा में वह भी अर्थ है। आत्मा का अर्थ है: मैं, आत्मभाव, अत्ता। तो बुद्ध ने जो शब्द प्रयोग किया है--आत्मा, वह अहंकार के लिए ही किया है। क्योंकि अहंकार के मिट जाने पर, बुद्ध कहते हैं, निर्वाण उपलब्ध होगा। तुम तो रहोगे, मैं भाव न रहेगा।
महावीर ने आत्मा का अर्थ अहंकार के अर्थों में नहीं किया। वह अर्थ भी आत्मा में है। महावीर ने अहंकार का अलग उपयोग किया है। महावीर भी कहते हैं, जब अहंकार मिट जाएगा तभी तुम आत्मा को उपलब्ध होओगे।
थोड़ा सा विश्लेषण करो। क्योंकि जब दो सयाने विपरीत बात कहते मालूम पड़ें, तो तुम जल्दी मत करना। कहीं न कहीं उनकी बातों के भीतर एक ही अर्थ छिपा ही होगा। शब्द होंगे अलग; लेकिन सयाने दो मत नहीं हो सकते।
और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि सयाने एक-दूसरे के विरोध में भी खड़े होते हैं। और तब खेल बहुत गहरा है। उसको समझने के लिए बड़ी गहरी समझ चाहिए।
मैंने सुना है, एक गांव में ऐसा हुआ कि दो हलवाइयों में झगड़ा हो गया। खानदानी हलवाई थे। कोई ऐसे आज के ही हलवाई न थे। जन्मों-जन्मों से सिर्फ मिठाई ही बनाई थी। झगड़ा भी हो गया तो भी पत्थर उठा कर फेंकने की तो आदत ही न थी, स्वभाव ही न था, वह तो खून में न थी बात; तो लड्डू उठा-उठा कर एक-दूसरे की तरफ फेंकने लगे--आमने-सामने दुकान थी। सारा गांव इकट्ठा हो गया। और गांव ने बहुत आनंद मनाया, क्योंकि लड्डू बीच में मिले, गिरे, लोगों ने लूटे। लोगों ने हलवाइयों से कहा कि तुम तो रोज ही लड़ो तो अच्छा। ऐसी लड़ाई तो कभी देखी नहीं। यह तो आनंद हो गया। यह तो दीवाली आ गई गांव में। सारा गांव इकट्ठा हो गया।
जब महावीर और बुद्ध में कोई विरोध भी होता है तो दो हलवाइयों की लड़ाई है। पत्थर तो वे फेंक नहीं सकते। अगर पत्थर तुम्हें दिखता हो तो तुम्हारी आंख की ही कोई भ्रांति है। वह तुम्हारी नासमझी होगी। वे लड्डू ही फेंक सकते हैं। मिठास उनका स्वभाव है। मिठास उनके खून में है, उनकी श्वास में है।
लेकिन हो सकता है तुम्हें समझ में न आए। तुम अपनी नासमझी को सयानों पर मत थोपना। तुम सयानों को तभी पहचान पाओगे जब तुम भी सयाने हो जाओगे; और कोई उपाय नहीं है। इसलिए तुम फिक्र छोड़ दो कि सयाने एकमत हैं या नहीं। तुम सयाने हो जाओ; अचानक तुम्हें दिखाई पड़ेगा--वे सभी एकमत हैं।
सयाना होने का अर्थ है, शिखर पर पहुंच जाना। जो रास्ते पहाड़ के चारों तरफ से आते थे, अलग-अलग दिखाई पड़ते थे, वे शिखर पर आकर सब मिल गए हैं। नीचे पहाड़ के खड़े हुए, तलहटी में भटके हुए, अंधेरे में डूबे हुए लोगों को यह मानना असंभव है कि सभी रास्ते शिखर पर पहुंच जाएंगे। क्योंकि कोई रास्ता पूरब की तरफ जा रहा है, कोई पश्चिम की तरफ जा रहा है। दोनों विपरीत मालूम पड़ते हैं; ये एक ही जगह कैसे पहुंच जाएंगे? लेकिन शिखर एक है; सभी रास्ते एक ही जगह पहुंच जाएंगे।
रास्ते भिन्न हो सकते हैं, शब्द भिन्न हो सकते हैं, अभिव्यक्ति अलग-अलग हो सकती है--हो सकती है कहना ठीक नहीं, होगी ही। क्योंकि जब बुद्ध बोलेंगे तो अपने ढंग से बोलेंगे। महावीर बोलेंगे तो अपने ढंग से बोलेंगे। कठिनाई तो तब आती है जब तुम जल्दी से अर्थ कर लेते हो, यह बिना ही सोचे कि तुम्हारी दृष्टि का अभी इतना विस्तार नहीं, इतनी ऊंचाई नहीं, जहां कि विपरीत को तुम मिलता हुआ देख सको।
और तुम पर दया करके भी सयाने एक-दूसरे के विपरीत बोले हैं। और तो कोई कारण नहीं है। तुम पर दया करके भी, तुम्हारे प्रति महाकरुणा से भी एक-दूसरे के विपरीत बोले हैं; एक-दूसरे के विपरीत हैं नहीं। स्थिति ऐसी है कि अगर महावीर तुमसे कहें कि सभी ठीक हैं, जैसा कि महावीर ने कहा भी। इसलिए महावीर को बहुत अनुयायी न मिल सके। महावीर ने बड़ी चेष्टा की कि वे कुछ भी ऐसी बात न कहें जो गलत हो। तो महावीर से तुम पूछो, ईश्वर है? तो महावीर सात उत्तर देते हैं। क्योंकि सयानों ने सात उत्तर दिए हैं अब तक। उन्होंने सभी सयानों के उत्तर दोहराए, क्योंकि किसी सयाने से विरोध न हो जाए। अविरोध की भावना रखी। अहिंसा उनकी धारणा थी, दृष्टि थी, जीवन-दर्शन था। तो जो भी सयानों ने कहा है, सात से ज्यादा कहा नहीं जा सकता। क्योंकि एक वस्तु के संबंध में सात ही वक्तव्य हो सकते हैं; उससे ज्यादा वक्तव्य का उपाय नहीं है। अगर तुम महावीर से पूछो, ईश्वर है? तो महावीर कहते हैं, हैं। यह एक वक्तव्य है। महावीर कहते हैं, यह पूरी बात नहीं है। क्योंकि ऐसे भी सयाने हैं, जो कहते हैं, नहीं है। यह भी एक वक्तव्य है। यह भी ईश्वर के संबंध में है। और ऐसे भी सयाने हैं, जो कहते हैं, है भी और नहीं भी है। यह भी ईश्वर के संबंध में है। और ऐसे भी सयाने हैं, जो कहते हैं, है भी नहीं, नहीं भी नहीं। यह भी ईश्वर के संबंध में है।
ऐसे सात वक्तव्य महावीर देते हैं। तो महावीर का तर्क सप्तभंगी कहलाता है। उन्होंने सारे सयानों के जितने वक्तव्य हो सकते हैं, वे सब संगृहीत कर दिए। और सात से ज्यादा नहीं हो सकते। क्योंकि उनमें सभी स्थितियां आ गईं--होने की, न होने की, दोनों के जोड़ की; दोनों के विरोध की; होने की--दोनों के जोड़ की; होने की--दोनों के तोड़ की; होने की--दोनों के न जोड़ की न तोड़ की। सात स्थितियां, सारा गणित आ गया।
लेकिन महावीर ज्यादा अनुयायी न पा सके। क्योंकि जो आदमी कहे सभी ठीक है, उससे तुम्हारे जीवन में धारणा नहीं बनती। तुम और बिगूचन में पड़ जाते हो। तुम्हारे जीवन में कोई स्पष्ट रूप खड़ा नहीं होता--कि हम मानें क्या? तुम मान्यता खोजने आए हो, धारणा खोजने आए हो। और यह आदमी कहता है, सब ठीक है। मैं जो कहता हूं वह भी ठीक है; मेरे विरोधी जो कहते हैं वह भी ठीक है। तो तुम्हारे सामने सवाल यह है कि तुम चुनो कैसे?
तुम चौराहे पर खड़े हो। तुम पूछते हो, कौन सा रास्ता नदी की तरफ जाता है? महावीर कहते हैं, जो बाएं तरफ जाता है वह भी जाता है, जो दाएं तरफ जाता है वह भी जाता है; जो उत्तर जाता है वह भी, दक्षिण जाता है वह भी; पूरब, पश्चिम, सब रास्ते उसी तरफ जाते हैं।
तुम इस आदमी की न सुनोगे। तुम कहोगे यह आदमी पागल है। तुम किसी आदमी की तलाश में हो जो तुम्हें ठीक-ठीक बता दे कि कौन सा रास्ता नदी की तरफ जाता है। तुम्हें नदी पहुंचना है। यह आदमी होश में नहीं मालूम पड़ता। सभी रास्ते कहीं एक तरफ गए हैं!
हो सकता है नदी पहुंच कर तुम्हें भी पता चले कि वह आदमी पागल न था, ठीक था। लेकिन उसको मान कर तुम चलोगे कैसे? क्योंकि वह चारों रास्ते ठीक कह रहा है। वह तुम्हारे लिए चुनाव का मौका ही नहीं छोड़ रहा है।
तुम कोई आदमी चाहते हो जो तुमसे कहे कि बाएं का रास्ता नदी पहुंचता है; बाकी तीन से सावधान रहना! इस आदमी से तुम्हारे जीवन में कृत्य पैदा होता है। तुम कुछ कर सकते हो; कोई उपाय आता है। कहीं जाने की सुविधा बनती है, चुनाव की सुविधा बनती है। अब तुम सोच सकते हो कि जाना या नहीं जाना! तुम और दो-चार से पूछ सकते हो। लेकिन निर्णय के लिए कुछ आसार दिखाई पड़ने शुरू होते हैं। अंततः तुम भी यही पाओगे कि जिसे तुमने पागल की तरह पाया था वही आदमी सच था। सभी रास्ते जाते थे। लेकिन उस आदमी को मान कर चलना बहुत मुश्किल था। क्योंकि चार रास्तों पर चलोगे कैसे? मंजिल एक हो सकती है, चलने वाला एक है, रास्ते चार हैं, तुम्हें तो चुनना पड़ेगा।
इसलिए महावीर को बहुत अनुयायी नहीं मिले। आज भी भारत में जैनों की संख्या मुश्किल से तीस लाख है। तीस लाख भी कोई संख्या है पच्चीस सौ साल बाद? अगर तीस आदमियों ने भी महावीर की मानी होती तो इतने बच्चे पैदा कर देते वे। यह कोई संख्या नहीं है। तीस जोड़े तीस लाख आदमी पच्चीस सौ साल में पैदा कर देते।
जीसस के मानने वालों की संख्या एक अरब है। इस्लाम को मानने वालों, मोहम्मद के मानने वालों की संख्या अस्सी करोड़ के ऊपर है। कुछ कारण होगा। महावीर जैसा खुद जानते थे वैसा ही कहा। महावीर के भाव में अहिंसा तो है, करुणा नहीं है।
यह जरा मुश्किल होगा तुम्हें समझना; क्योंकि हम तो अहिंसा और करुणा का एक ही अर्थ करते हैं। अहिंसा का अर्थ है: भीतर तो अहिंसा का भाव है, स्वयं तो अहिंसा से भरे हैं, लेकिन दूसरे की तरफ विचार नहीं है--कि मैं जो कह रहा हूं वह बिलकुल ठीक है, जहां तक मेरा संबंध है; लेकिन जो सुन रहा है, उसके जीवन में क्या होगा?
जैसे कृष्णमूर्ति हैं; वे ठीक महावीर जैसे व्यक्ति हैं। अहिंसा तो पूरी है, करुणा बिलकुल नहीं है। वे कह रहे हैं जो ठीक है। जो उन्हें ठीक लगता है, वही कह रहे हैं। उसको रत्ती भर भी बदलते नहीं हैं। लेकिन सुनने वाला जहां खड़ा है, उस पर क्या गुजर रही है, उसके क्या परिणाम होंगे, इसकी उन्हें चिंता नहीं है।
डाक्टर अपने ज्ञान की कम फिक्र करता है, मरीज की ज्यादा फिक्र करता है। वह यह देखता है कि मैं जो कहूंगा, उसका मरीज पर क्या परिणाम होगा। यह भी हो सकता है कि उसे दिखाई पड़ रहा हो कि यह मरीज दो दिन बाद मर जाएगा, यह दो दिन से ज्यादा टिक नहीं सकता। लेकिन वह मुस्कुराता है और कहता है, सब ठीक है और कल तुम उठ आओगे और चलने-फिरने लगोगे। जानता है कि दो दिन से ज्यादा बच नहीं सकता। लेकिन अगर वह सत्य ही सत्य कह दे कि तू दो दिन में मर जाएगा, तो यह अभी मर जाएगा। यह दो दिन भी नहीं बच सकता फिर। और अगर यह दो दिन बच गया, तो और भी संभावना है। और भी सहारा है, दो दिन का मौका है, इसमें चिकित्सा और की जा सकती है, कुछ और उपाय किए जा सकते हैं।
तो एक तो है शुद्ध ज्ञान का वक्तव्य और एक है प्रेम का वक्तव्य। जिन्होंने ज्ञान का वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा, सभी ठीक है। जिन्होंने प्रेम का वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा, यही ठीक है। क्योंकि तुम्हें चलना है। तो उन्होंने कहा, बाएं से जाओगे तो ही पहुंचोगे।
इसलिए जीसस ने बड़े प्रेम से यह कहा है कि जो मेरे साथ न होंगे, वे पहुंच न पाएंगे। यह बात किसी अहंकार से नहीं कही गई है। यह बात बड़े प्रेम से कही गई है कि जो मेरे साथ नहीं हैं, वे नहीं पहुंच पाएंगे। इसका यह मतलब नहीं है कि जो नहीं हैं वे नहीं पहुंचेंगे। इसका कुल मतलब इतना है कि तुम मेरे साथ हो लो। तुम साथ हो सको इसलिए जीसस कह रहे हैं कि जो मेरे साथ नहीं हैं, वे नहीं पहुंचेंगे। इससे तुम उनका हिसाब मत लगाना कि जो साथ नहीं हैं, उन सबका क्या होगा? तुम इससे सिर्फ इतनी ही चिंता करना कि मैं साथ हो लूं।
तुम भयभीत, लोभातुर, अंधेरे में भटके हो। तुम्हें कोई हाथ का सहारा चाहिए, जो बड़ी सुदृढ़ता से कहे कि बचा लूंगा। अगर हाथ कहे: हो सकता है बच भी जाओ; हो सकता है न भी बचो; हो सकता है कोई दूसरा हाथ बचा ले; हो सकता है कोई तीसरा हाथ ठीक हो--ऐसी अगर संदेह की बातें करे बचाने वाला हाथ, तो वह जो डूब रहा है वह कहेगा, इससे अकेले ही डूब जाना बेहतर। और तुम्हारी झंझट कौन सिर पर ले! हम वैसे ही मुसीबत में हैं, उलझन में हैं, चित्त डांवाडोल है, तुम और हमें हिलाने आ गए।
महावीर का सिद्धांत कहलाता है स्यातवाद। महावीर जो भी वक्तव्य देते थे उसमें स्यात लगा देते थे: स्यात ऐसा हो। इससे चलने वाले को गति नहीं मिलती। समझने वाले को समझ मिल सकती है, चलने वाले को गति नहीं मिलती। लेकिन समझने वाले तुम कहां हो? तुम्हें अभी चलना है, तब कहीं तुम समझ के मंदिर तक पहुंच सकोगे।
तो जीसस कहते हैं, जो मेरे साथ चलेगा! सुनिश्चित भाव से कहते हैं। ऐसा नहीं कि स्यात। तुम तो वैसे ही डगमगा रहे थे; और यह सुन कर कि स्यात मेरे साथ चलने से पहुंच जाओ, स्यात न भी पहुंचो। तो ऐसे मार्गदर्शक के साथ कोई भी होना न चाहेगा। सुदृढ़ आवाज चाहिए! ताकि तुम्हारे भीतर का कंपता हुआ भय शांत हो जाए; ताकि तुम्हारे कंपते हुए पैर थिर हो जाएं। पहुंच कर तो तुम भी पाओगे कि यह बात मजाक ही रही। पहुंच कर तो जीसस भी हंसेंगे और कहेंगे कि क्या करूं, मजबूरी थी! तुम्हारे लिए कहना पड़ा। तुम्हें बचाने का और कोई उपाय न था, इसलिए मुझे बचाने वाला बनना पड़ा। अन्यथा कौन किसको बचाता है?
महावीर ने यही कहा है: कौन किसको बचाता है? सब अपने से बचते हैं, अपने से डूबते हैं।
सौ प्रतिशत सत्य है। यह सोना बिलकुल चौबीस कैरेट है, लेकिन इसके गहने नहीं बन सकते। सोने को क्या करोगे, सिर पर ढोओगे? जीसस का सोना चाहे चौबीस कैरेट न हो, मोरारजी गोल्ड हो, तो भी गहने बन सकते हैं। तुम पर ध्यान हो तो गहने बनाने पड़ेंगे। स्वयं पर ध्यान हो तो शुद्ध सोने की बात कही जा सकती है।
तो महावीर ऐसे बोल रहे हैं जैसे शून्य में बोल रहे हों। वे तुमसे नहीं बोल रहे हैं, वे अपने से ही वार्तालाप कर रहे हैं। वह एकालाप है, मोनोलाग है। जीसस तुमसे बोल रहे हैं, मोहम्मद तुमसे बोल रहे हैं। महावीर अपने शिखर से बात कर रहे हैं। जीसस उतर कर खाई में आते हैं।
जीसस ने कहा है, गड़रिए की एक भेड़ खो जाए तो सभी भेड़ों को अंधेरी रात में छोड़ कर गड़रिया अपनी भेड़ खोजने पहाड़ों पर जाता है, अंधेरे में उतरता है। उन सबको छोड़ देता है जो साथ आ गई थीं। उसकी खोज में निकल जाता है जो भटक गई। और जब वह भेड़ भटकी हुई मिल जाती है, तो उसे कंधे पर रख कर लौटता है। ऐसा ही मैं हूं। मैं तुम्हारे अंधेरे में आऊंगा। तुम भटकी हुई भेड़ हो; मैं तुम्हें कंधे पर लाऊंगा।
महावीर ऐसी बात नहीं कह सकते। महावीर कहेंगे, यह क्या बकवास है! कौन किसको लाता है? तुम अपने कारण भटकते हो, अपने कारण आते हो। आत्मा ही कल्याण है और आत्मा ही बंधन है, आत्मा ही मोक्ष है।
बिलकुल ठीक कहते हैं। सौ प्रतिशत सही कहते हैं। लेकिन वह जो भेड़ भटक गई है, उसके हृदय को इससे क्या सहारा मिलेगा? जो भेड़ भटक गई है, उसके प्राणों को कैसे इससे ज्योति और आश्वासन मिलेगा?
इसलिए जीसस की बात अगर बहुत महत्वपूर्ण हो सकी तो तुम यह मत समझना कि वह सिर्फ ईसाई मिशनरियों के कारण है। उसके पीछे कारण है। उसके कारण खुद जीसस हैं। वह वक्तव्य सुनिश्चित है। वह वक्तव्य स्यात का नहीं है। यद्यपि जिस दिन तुम पहुंच जाओगे, उस दिन जीसस के साथ बैठ कर तुम भी हंसोगे और जीसस भी हंसेंगे। वे कहेंगे, क्या करें, मजबूरी थी! तुम सुनते ही न, अगर इस ढंग से न कहा जाता। तुमने सुना ही इसलिए कि इस ढंग से कहा गया। सुन कर तुम पहुंचे; पहुंच कर तुम जान सकते हो अब कि वह बात ठीक न थी; कामचलाऊ थी; हाइपोथेटिकल, परिकल्पना मात्र थी। एक छोटे बच्चे को खिलौना दे दिया था। लेकिन उस खिलौने ने उसे राहत दी। राहत से वह शांत हुआ, शांत होने से समझ बढ़ी, समझ से यात्रा शुरू हुई।
तो कई बार तुम्हें वक्तव्य उनके विरोधी भी मालूम पड़ सकते हैं। वे उनकी करुणा से निकले होंगे। बुद्ध ने बहुत बार महावीर का विरोध किया है; महावीर ने नहीं किया। क्योंकि महावीर का वार्तालाप एकालाप है। वे दूसरे से बोल ही नहीं रहे हैं। वे अपनी शुद्धता से बोल रहे हैं। वह ऐसे है जैसे एकांत में कोयल कूकती हो। कोयल किसी सुनने वाले के लिए नहीं कूक रही है। कोयल कोई तानसेन नहीं है कि दर्शक, श्रोता की चिंता हो। एकांत में भी चलेगा। कोई सुन ले तो सुन ले; यह उसकी मौज। इसके लिए वही जाने। न सुने तो कोई हर्ज नहीं। लेकिन बुद्ध का वक्तव्य एकांत में गूंजती कोयल जैसा नहीं है। बुद्ध का वक्तव्य तानसेन जैसा है। वह तुम्हारे लिए गाया गया है। वह विशेषतः तुम्हारे लिए तैयार किया गया है। तुम ध्यान में हो। क्योंकि बुद्ध कहते हैं, तुम्हारा ही ध्यान न हो, तो तुमसे बोलने का प्रयोजन ही क्या है?
एक बार ऐसा हुआ कि एक गांव में बुद्ध आए, वे बैठ गए, लोग इकट्ठे हो गए, सारा गांव इकट्ठा हो गया, फिर भी चुप हैं। तो किसी ने पूछा कि अब आप शुरू भी करिए। हम सब आ गए। फिर रात उतरी आती है, फिर अंधेरा हो जाएगा।
पर बुद्ध ने कहा, मैं जिसके लिए बोलने आया हूं, वह मौजूद नहीं।
लोगों ने चारों तरफ देखा। गांव के सभी पंडित मौजूद थे, धनी-मानी मौजूद थे, प्रतिष्ठावान मौजूद थे। कोई ऐसा दिखाई न पड़ता था जिसकी कि कोई गणना हो सके जो नहीं है।
उन्होंने कहा कि सब मौजूद हैं। आप किसकी बात कर रहे हैं? कौन मौजूद नहीं है?
बुद्ध ने कहा, मैं आता था रास्ते पर, एक जवान लड़की खेत की तरफ जाती थी। उसने मुझसे कहा कि देखो, रुकना। मैं आती हूं। और उसने इतने भाव से कहा है कि उसके अभाव में मैं न बोल सकूंगा। और ऐसा भाव यहां किसी की भी आंख में नहीं है। ये सब होंगे गणमान्य गांव के, ये सिर्फ आ गए हैं लोकोपचार से कि बुद्ध गांव आए हैं, सुनने जाना पड़ेगा कर्तव्यवश। सभी गणमान्य मौजूद होंगे, हम न मौजूद होंगे, प्रतिष्ठा को धक्का लगेगा। ये भीड़-भाड़ को दिखाने आ गए हैं। लेकिन उस युवती ने मुझसे कहा था, रुकना। वह अभी तक आई नहीं है। मुझे रुकना पड़ेगा।
जब वह युवती आ गई...वह एक चमार स्त्री थी। गांव के गणमान्यों ने तो कभी उसे देखा भी नहीं था कि यह गांव में रहती है। पहली तो बात स्त्री; दूसरी बात चमार; वह भी दीन-हीन, गरीब, फटे कपड़े। लेकिन जैसे ही वह आ गई, बुद्ध ने बोलना शुरू कर दिया।
बुद्ध का गीत तानसेन जैसा है। कोयल के गीत की भी अपनी खूबी है। तानसेन के गीत का भी अपना मजा है। वे तुम्हारे लिए गा रहे हैं।
इसलिए बुद्ध धर्म विराट हो गया। सीमाएं तोड़ कर बहा। ईसाइयत भी उसका मुकाबला नहीं कर सकती, इस्लाम भी मुकाबला नहीं कर सकता। क्योंकि इस्लाम ने तलवार का सहारा लिया धर्म को फैलाने में; जबरदस्ती की। ईसाइयत ने आर्थिक प्रलोभन दिए। गरीब को रोटी दी, भूखे को भोजन दिया, नंगे को कपड़ा दिया, अशिक्षित को शिक्षा दी, बीमार को अस्पताल दिया। इसके सहारे करोड़ों लोग ईसाई बने। लेकिन बुद्ध धर्म ने न तो तलवार का सहारा लिया, न रुपये-रोटी-रोजी का सहारा लिया। बुद्ध धर्म ने तो सीधा एक गीत गाया बुद्ध का। उस गीत में ही खूबी ऐसी थी कि सारा एशिया डूब गया। महावीर टापू की तरह रह गए।
मैं यह नहीं कहता कि टापू नहीं होने चाहिए। कोयल भी जरूरी है। तानसेन ही तानसेन काफी न होंगे। कभी तानसेन से भी मन ऊब जाता है। और कोयल के गीत में बड़ी मिठास है, निसर्ग है। लेकिन कोयल का गीत ही संगीत का आधार नहीं बन सकता। कभी किसी दुपहरी में शांत सुन लिया, ठीक! संगीत की कला का जन्म तो तानसेनों से होगा।
इन दोनों के वक्तव्य अलग-अलग होंगे। क्योंकि बुद्ध तुम्हारे लिए बोलेंगे। महावीर अपने कारण बोलेंगे, बुद्ध तुम्हारे कारण बोलेंगे। महावीर अहिंसक हैं, बुद्ध महा करुणावान हैं। यह दोनों के व्यक्तित्वों का भेद है।
लेकिन जो वे कह रहे हैं, अंतिम घड़ी में तुम पाओगे, वे बिलकुल एक हैं--सबै सयाने एकमत। पर वह अंतिम घड़ी में तुम पाओगे। उसके उदघाटन के लिए तुम्हें भी शिखर पर पहुंच जाना होगा। तब तुम समझ लोगे कि बुद्ध की करुणा थी कि उन्होंने बदले वक्तव्य।
तुम बुद्ध से पूछो, ईश्वर है? वे जवाब नहीं देते। महावीर सात जवाब देते हैं; बुद्ध जवाब नहीं देते। आत्मा है? चुप रह जाते हैं। पुनर्जन्म है? चुप रह जाते हैं। स्वर्ग-नरक हैं? चुप रह जाते हैं। महावीर हरेक प्रश्न का उत्तर सात बार देते हैं। बुद्ध ऐसे प्रश्नों के उत्तर ही नहीं देते। वे कहते हैं, सुनो! मैं एक गांव से गुजरता था। किसी शिकारी का तीर एक आदमी की छाती में चुभ गया था। वह सड़क के किनारे पड़ा था। मैंने उसे कहा कि भाई, तेरे तीर को निकाल लूं।
उसने कहा, रुको! तीर जिसने मारा वह मित्र है या शत्रु? मरने के बाद पुनर्जन्म होता है या नहीं? आत्मा शाश्वत है या नहीं? तीर विषबुझा है या बिन-विषबुझा? पहले इनका उत्तर दे दो।
तो बुद्ध कहते हैं, मैंने उससे कहा, पहले तीर को खींच लेने दे। अन्यथा मैं उत्तर देता रहूंगा और तू सो जाएगा। तू मर जाएगा। अभी यह वक्त दर्शनशास्त्र का नहीं। तीर निकाल लेने दे, फिर मौज से जितनी बकवास तुझे करनी हो करना; और जो पूछना हो पूछना।
बुद्ध कहते, तुम्हारा जीवन मृत्यु के तीर से चुभा है। तुम पूछते हो, पुनर्जन्म है? यह क्षण बीता जाता है। श्वास टूट जाएगी किसी भी पल। तुम पूछते हो, परमात्मा ने बनाया संसार कि अपने आप बना है? इन बातों का कोई सार नहीं है अभी। पहले दुख के तीर को निकल जाने दो, फिर पूछ लेना।
और बुद्ध कहते, जिसका दुख का तीर निकल गया वह पूछता ही नहीं। क्योंकि जो आनंदमग्न हो गया...
तुम कभी सोचे हो, आनंद के संबंध में तुम कभी नहीं पूछते--कहां से आया? तुम भोगते हो। दुख के संबंध में तुम पूछते हो--कहां से आया? अगर तुम प्रसन्नचित्त हो तो तुम यह नहीं पूछते कि प्रसन्नता कहां से आई? लेकिन अगर तुम उदास हो तो तुम जरूर खोजते हो कि उदासी कहां से आई? क्योंकि कारण तो हम उसी का खोजते हैं, जिसे हम मिटाना चाहते हैं। जिसे हम मिटाना नहीं चाहते उसका कारण हम क्यों खोजें? कोई नहीं खोजता कारण।
मृत्यु का कारण हम खोजते हैं; जीवन का कारण कोई नहीं खोजता। तुम शांत हो, स्वीकार करते हो। अशांत हो, चिकित्सक के पास जाते हो। बीमारी है, निदान करवाते हो। स्वास्थ्य का निदान करवाते हो? तुम डाक्टर से जाकर पूछते हो कि ठीक-ठीक बताओ मैं स्वस्थ क्यों हूं? क्या कारण है मेरे स्वास्थ्य का? जब तक मुझे कारण पता न चल जाए और जब तक ठीक से निदान न हो जाए कि मेरा स्वास्थ्य किस प्रकार का है, तब तक मुझे चैन न मिलेगी।
नहीं, तुम पूछते ही नहीं। जब तुम स्वस्थ हो तब तुम भोगते हो। जब तुम अस्वस्थ हो तब तुम पूछते हो निदान, मार्ग, कारण, उपाय। दुख का कारण खोजा जाता है।
तो बुद्ध कहते, तीर निकाल लिया, फिर तुम पूछ लेना। बुद्ध कहते, मैंने बहुतों के तीर निकाले; फिर वे नहीं पूछते।
फिर फुर्सत किसे है? फिर प्रयोजन क्या? फिर आदमी नहीं पूछता कि परमात्मा है या नहीं, क्योंकि आदमी स्वयं ही परमात्मा हो जाता है। उस आनंद-भाव में स्वयं के ही मंदिर की प्रतिमा प्रकट हो गई। अब किस मंदिर में जाना है? फिर आदमी प्रश्न ही नहीं पूछता, क्योंकि जिसके जीवन में आनंद की अहर्निश वर्षा हो रही हो, प्रश्न बह जाते हैं; जैसे बाढ़ में कूड़ा-करकट बह जाता है, किनारे स्वच्छ हो जाते हैं, ऐसा ही चित्त स्वच्छ हो जाता है।
तो यह तो बुद्ध का ढंग है। वे दुख में उत्सुक हैं। बुद्ध एक मनोवैज्ञानिक हैं। उनकी चिंतना तुम्हारे दुख को मिटाने की है।
महावीर एक दार्शनिक हैं। उनकी चिंतना तुम्हारे दुख को मिटाने की नहीं है। उनकी चिंतना सत्य को शुद्धतम प्रकट कर देने की है। जैसा सत्य है वैसा कह देना है। क्या होगा परिणाम, क्या नहीं होगा परिणाम, इससे उन्हें कोई संबंध नहीं है।
सयाने बहुत प्रकार के हैं, लेकिन सब सयानों का मत एक है। सयाने बहुत रंग-रूप के हैं। तुमने अगर उनका वेश देखा तो तुम भटक जाओगे। तुमने अगर उनके शब्द ही सुने, उनके निशब्द में न उतरे, तो तुम भूल जाओगे। वे जो कहते हैं वही तुमने सुना, तुमने उनके प्राणों की धुन न सुनी जो कहने के पीछे बज रही है, तुमने भीतर की अंतर्वीणा न सुनी, तो तुम भटक जाओगे। तुमने अगर अंतर्वीणा सुनी, तो तुम पाओगे कि वीणा के ढंग कोई भी हों, आकार-रूप कोई भी हों, वीणा का स्वर एक है। सभी वीणाओं से वही स्वर उठ रहा है।
आकृति का क्या अर्थ है? कोई मूल्य नहीं। और बुद्ध अपने ढंग से चलेंगे; महावीर अपने ढंग से चलेंगे; कृष्ण अपने ढंग से चलेंगे। उनके ढंग भिन्न हैं, लेकिन उनका मत भिन्न नहीं है।
ऐसा ही समझो कि मैंने अपनी अंगुली उठाई चांद की तरफ; मेरी अंगुली अलग है। महावीर ने अंगुली उठाई चांद की तरफ; निश्चित ही उनकी अंगुली अलग होगी। लंबी होगी, छोटी होगी, बड़ी होगी, सुंदर होगी, न सुंदर होगी। बुद्ध ने उठाई अपनी अंगुली; अंगुली अलग होगी। जिस चांद की तरफ ये हजारों अंगुलियां उठ रही हैं सयानों की, वह चांद एक है।
तुमने अगर अंगुली को पकड़ लिया और अंगुली का विश्लेषण करने लगे और अंगुली काट कर पहुंच गए अस्पताल में और जांच-पड़ताल करने लगे, तो सभी अंगुलियों से अलग-अलग बातें मिलेंगी। किसी की हड्डी लंबी होगी, किसी की छोटी होगी। किसी के खून में बीमारी होगी, किसी के में नहीं होगी। किसी का नाखून छोटा होगा, किसी का बड़ा होगा। किसी की चमड़ी स्वस्थ होगी, अस्वस्थ होगी। वह तुम जो सब निकाल कर कागज पर लिख कर लौट कर आ जाओगे, उससे तुम्हारे शास्त्र बन जाएंगे और चांद का इससे कोई भी संबंध न होगा। जो दिखाया था वह अनदिखा ही रह जाएगा और जिससे दिखाया था उस पर आंखें अटक जाएंगी।
जब कोई चांद को अंगुली दिखाए, तो चांद को देखना, अंगुली को भूल जाना। तब तुम पाओगे: सभी सयाने एकमत। और अगर अंगुलियां देखीं तो तुम बड़ी उलझन में पड़ जाओगे। और तब अंगुली ही चांद और तुम्हारे बीच बाधा बन जाएगी। उसी के कारण तुम फिर चांद को न देख पाओगे। और अगर उस अंगुली को ही अपनी आंखों में रख लिया, तो अंधे हो जाओगे।
यही हुआ है। बुद्धपुरुषों के वचन तुमने अपनी आंखों में रख लिए हैं। कोई कहता है मैं जैन हूं, कोई कहता है हिंदू, कोई कहता बुद्ध, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई। तुमने बुद्धपुरुषों के वचनों को अपनी आंखों में रख लिया है। तुम्हारी आंखें अंधी हो गई हैं।
ये सिक्ख, हिंदू, मुसलमान, जैन, ईसाई अंधों के नाम हैं, आंख वालों के नहीं। नानक आंख वाले हैं; नानक सिक्ख नहीं हैं। महावीर आंख वाले हैं; महावीर जैन नहीं हैं। जीसस को पता ही न था कि ईसाइयत भी कोई चीज होती है। मोहम्मद को खयाल भी नहीं था कि इस्लाम बनेगा। ये तो जिन्होंने अंगुलियां पकड़ीं, शब्द पकड़े, सिद्धांत पकड़े, शास्त्र पकड़े, उनके कृत्य हैं। इस पृथ्वी पर कोई तीन सौ धर्म हैं। अब धर्म भी तीन सौ हो सकते हैं? धर्म तो एक ही हो सकता है। और एक होगा, अनाम होगा। उसका कोई नाम नहीं होगा। ये तीन सौ धर्म तीन सौ अंगुलियां हैं। चांद तो एक है।
कितना ही विरोध मालूम पड़े बुद्धपुरुषों के वचनों में, तुम धोखा मत खाना। वे तुम्हें ठीक लड़ते हुए भी मालूम पड़ें, तो तुम गौर से देखना, लड्डू फेंक रहे होंगे। मिठास ही फेंक सकते हैं।
ओशो, आपने कहा है, गुरु मृत्यु है, ध्यान मृत्यु है, समाधि मृत्यु है। जीवन में जो भी श्रेष्ठतम है उसे मृत्यु ही क्यों कहा गया है?
मृत्यु को देखने के दो ढंग हैं। एक तो ढंग है कि शत्रु की तरह देखो--कि तुमसे बाहर है, तुम्हें मिटाने आती है। और एक ढंग है कि तुम अपने अंतरतम की तरह देखो--कि तुम्हारे भीतर छिपी है, रोज विकसित होती चली जाती है।
मृत्यु बाहर से आती नहीं। वह दृष्टि गलत है। मृत्यु तो तुम जन्म के साथ ही लेकर पैदा होते हो। जैसे बीज में वृक्ष छिपा है, ऐसे ही तुम्हारी मृत्यु तुममें छिपी है। इसलिए मैं तुमसे कहता हूं कि तुम्हारा जीवन भी भिन्न है और तुम्हारी मृत्यु भी। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन अपने ढंग का है; उसकी मृत्यु भी अद्वितीय है। कोई मृत्यु भी सामूहिक घटना नहीं है। मैं मेरे ढंग से मरूंगा। कोई दूसरा व्यक्ति उस ढंग से नहीं मर सकता। क्योंकि मैं मेरे ढंग से जीया। तुम तुम्हारे ढंग से जीए हो, तुम तुम्हारे ढंग से मरोगे। तुम्हारी छाप तुम्हारी मृत्यु पर भी होगी।
कोई रोता मरेगा। कोई चीखता-चिल्लाता मरेगा। कोई बेचैन, अशांत मरेगा। कोई छाती पीटता मरेगा। कोई जबरदस्ती घसीट कर ले जाया जाएगा। कोई शांति से गीत गाता जाएगा। कोई हंसता हुआ विदा होगा। कोई मौन में जाएगा। कोई मृत्यु को ध्यान बना लेगा। किसी के लिए मृत्यु समाधि हो जाएगी। कोई मृत्यु को परमात्मा का द्वार समझते हुए जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु भी उसके जीवन के सार-संचय की खबर होगी। मृत्यु भी विशिष्ट है, वैयक्तिक है। और तुम किस ढंग से रहते हो, उस ढंग से तुम अपनी मृत्यु को भी निर्मित कर रहे हो। क्योंकि मृत्यु तुम्हारे भीतर छिपी है।
मृत्यु तुम्हारे भीतर वैसे ही छिपी है, जैसे तुम्हारी नींद तुम्हारे भीतर से आती है। जागरण तुम्हारे भीतर से आता है। सुबह जब आंख खुलती है, जागरण कहां से आता है--बाहर से? जागरण तुम्हारे भीतर से आता है। रात नींद आती है, नींद कहां से आती है--बाहर से? नींद तुम्हारे भीतर से आती है। जन्म भी तुम्हारे भीतर से आता है, मृत्यु भी तुम्हारे भीतर से आती है। जन्म और मृत्यु ऐसे ही हैं जैसे तुम्हारे दाएं-बाएं हाथ। जन्म और मृत्यु ऐसे ही हैं जैसे पक्षी के दो पंख। जन्म और मृत्यु ऐसे ही हैं जैसी तुम्हारी बाहर-भीतर जाती श्वास। एक से काम न चलेगा। एक पंख के पक्षी को उड़ा कर देखो। श्वास को सिर्फ भीतर ले जाओ और बाहर मत आने दो; करके देखो। एक पैर से चलने की कोशिश करो। तुम पाओगे कि जीवन अधूरा हो जाएगा।
मृत्यु के बिना जीवन एकदम अधूरा हो जाएगा, रूखा हो जाएगा, सूखा हो जाएगा। अगर तुम मर न सको तो तुम्हें पता नहीं है कि तुम कैसी दुविधा में पड़ जाओगे।
मैंने सुनी है एक कहानी कि सिकंदर अपनी सारी विश्व की यात्राओं में मूलतः किसी और ही चीज की खोज में था। ज्ञानी पुरुषों से उसने सुना था कि कहीं पृथ्वी के किसी कोने में एक ऐसा झरना छिपा है जो अमृत का है। उसे जो पी लेता है वह अमर हो जाता है। तो वह सारी खोज कर रहा था, देश जीत रहा था, युद्ध लड़ रहा था, लेकिन साथ ही साथ उसकी असली खोज भी जारी थी कि उस झरने का पता लगा ले।
कहते हैं, अरब का रेगिस्तान पार करते वक्त उसे भनक पड़ी। सूत्र मिलने लगे। उसके पास नक्शे थे। वह कहां छिपा है अमृत, उसके प्रतीक मिलने लगे। उसने अपने समझदारों को चौकन्ना कर दिया। प्रतीक मेल खाते गए, नक्शा ठीक बैठने लगा। अंततः वह दिन आ गया जब वह उस झरने के पास पहुंच गया मरुस्थल में छिपे, जिसको पी लेने से कोई अमरत्व को उपलब्ध हो जाता है। उसके आनंद का कोई पारावार न रहा।
स्वभावतः वह अपने साथ किसी को भी भीतर नहीं ले गया। न केवल यही, बल्कि उसने सख्त मनाही कर दी कि जैसे ही मैं बाहर आऊं, प्रत्येक व्यक्ति यहां से हट जाए, नक्शे जला डाले जाएं, यात्रा के चिह्न पोंछ डाले जाएं। किसी को पता न चल सके। क्योंकि अगर सभी अमृत पा जाएं, सभी अमर हो जाएं, तो मजा ही चला गया। अहंकार का मजा तो अपने लिए पाने में है।
वह भीतर गया। उसके आनंद से हाथ कंपते थे। अंधेरी गुफा थी। वह झुक ही रहा था, झरने में उसने देखा, स्फटिक मणि जैसा स्वच्छ जल। कभी नहीं देखा था। उस जल से ही जीवन की ऊर्जा और आभा प्रकट हो रही थी। जैसे जल न हो, छिपे हुए रत्न हों, मणियां हों। एक अपूर्व सुगंध उठ रही थी। वह हाथ भरने को ही था, अंजुलि भरने को ही था, पानी पी लेता, हाथ उसने डुबा भी दिए थे पानी में, तभी एक आवाज अंधेरे में से आई कि रुक सिकंदर! एक क्षण बात सुन ले!
देखा उसने तो बड़ी मुश्किल से अंधेरे में दिखाई पड़ा--एक कौवा बैठा हुआ है। और उस कौवे ने कहा कि मैं भी इसी गलती में पड़ गया। मैं कोई साधारण कौवा नहीं हूं, कौवों का सम्राट हूं। जो तू कर रहा है वही करके मैं फंस गया हूं। तू भी न उलझ जाए इसलिए सूचना कर देना उचित है।
सिकंदर ने पूछा, क्या मतलब?
कौवे ने कहा, मैं भी इसी की खोज में लगा रहा। आखिर एक दिन खोज लिया; इसका जल भी पी लिया। अब मर नहीं सकता हूं। और अब ऐसी मुश्किल में पड़ गया हूं कि अब करूं क्या! जीवन सूख गया। देख लिया जो देखना था, भोग लिया जो भोगना था, कर लिया जो करना था, पा लिया जो पाना था। अब कुछ पाने को नहीं बचा, कुछ भोगने को नहीं बचा। कोई रस बाकी नहीं है, एक श्वास लेने की इच्छा नहीं है, क्योंकि सब व्यर्थ मालूम हो रहा है। अब मर नहीं सकता हूं। अब सिर पीटता हूं। जहर खाकर देखा, कुछ असर नहीं होता। पहाड़ों से गिर कर देखा, कोई परिणाम नहीं होता, जरा भी खरोंच नहीं लगती। तलवारों पर अपनी गर्दन को घिस कर देखा; तलवार कट जाती है, गर्दन नहीं कटती। अपने प्रियजन सब जा चुके। सदियां बीत गईं। मैं रूखा-सूखा यहीं बैठा हूं। और अब मैं यहां बैठा हूं कि जो भूल मुझसे हो गई, वह किसी और से न हो जाए। मेरी पीड़ा का अंत नहीं है। मृत्यु महासुखदायी है। सिकंदर, अगर तुम्हें कभी पता चल जाए कि कोई ऐसा झरना भी है कि अमृत के बाद भी आदमी मर सकता है, तो मुझे खबर कर देना। मैं तुम्हें रोकता नहीं हूं, सिर्फ सुझाव है। फिर तुम्हारी मर्जी।
कौवा चुप हो गया। कहते हैं, सिकंदर थोड़ी देर खड़ा रहा, सोचता रहा, चुपचाप वापस लौट आया--बिना पीए अमृत को।
कथा बड़ी महत्वपूर्ण है, बड़ी मीठी है। झूठी ही है, पर बड़ा सच छिपा है। तुम थोड़ा सोचो, अगर न मरो, ऐसी कोई व्यवस्था हो जाए; थोड़ा सोचो जरा, थोड़े विस्तार में देखो जीवन को; तुम कौवे की मुसीबत में पड़ जाओगे। और कौवा भूल कर गया, क्योंकि कौवे पक्षियों में सयाने समझे जाते हैं। बड़े समझदार हैं, पंडितगण हैं। मिल गया होगा शास्त्र से कोई सूत्र, लग गए!
सिकंदर वापस लौट आया। तुम भी अगर उस झरने के पास पहुंच जाओ और तुममें अगर थोड़ी भी समझ हो तो तुम वापस लौट आओगे।
टाल्सटाय ने कहा है अपने मरने के कुछ दिनों पहले कि जवानी में तो जीवन ठीक मालूम पड़ता है। क्योंकि आंखें अंधी होती हैं, नशा होता है। होश ही नहीं होता। एक कोई भीतर की गहरी कामतंद्रा घेरे रहती है। जैसे आदमी बेहोशी में शराब पीए चल रहा है; कुछ का कुछ दिखाई पड़ता है। जहां कुछ भी न था वहां सपने बन जाते हैं। जहां कंकड़-पत्थर पड़े थे वहां हीरे-जवाहरात दिखते हैं। जहां भीषण नरक था वहां स्वर्ग की अट्टालिकाएं दिखाई पड़ती हैं। फिर जब होश आता है, जवानी का नशा टूटता है और आदमी के पास थोड़ी समझ आती है, अनुभव आता है, तो जीवन बिलकुल बे-सार मालूम होने लगता है। तब जीवन बिलकुल राख हो जाता है। उस घड़ी अगर तुम मर न सको, तो उस राख को हाथ में ढोना पड़ेगा--अनंत काल तक।
तुम थोड़ा सोचो, मृत्यु न होती तो जगत कैसे अभिशाप से भर जाता! तब तुम्हें समझ में आएगा कि मृत्यु कोई जीवन के विपरीत नहीं है। मृत्यु में ही जीवन का राज छिपा है। वह उसका एक पंख है। जन्म और मृत्यु--वे दोनों ही जीवन के पंख हैं। जीवन दोनों के बीच में छिपा है। दो किनारे हैं नदी के--जन्म और मृत्यु। और जीवन की धार बीच से बहती है।
इसलिए मृत्यु की बड़ी महिमा है--जिन्होंने जाना। जो नहीं जानते हैं वे जीवन की महिमा गाते रहते हैं। जो जानते हैं उन्होंने मृत्यु की महिमा गाई है।
जीवन एक तरह की उत्तेजना है--जिसे तुम जीवन कहते हो। मृत्यु महाशांति है। तुम मृत्यु को इतने दुश्मनी के भाव से क्यों देखते हो? उसका कारण--उसका कारण यह है कि तुम्हें ऐसा लगता है, अभी तो बहुत महत्वाकांक्षाएं अधूरी हैं। अगर मृत्यु आ गई, फिर कब पूरी होंगी? फिर कैसे पूरी होंगी? अभी तो बहुत महल बनाने बाकी हैं। अभी तो बहुत यात्रा पड़ी है। अभी तो किया ही क्या है? करने को बहुत कुछ शेष है। और मृत्यु आ गई तो हम तो अधूरे ही मर जाएंगे।
मृत्यु का भय नहीं है। और जीवन को मृत्यु का भय नहीं है, महत्वाकांक्षा को मृत्यु का भय है। असली जो भय है वह अहंकार को है, महत्वाकांक्षा को है। अगर तुम्हारी कोई महत्वाकांक्षा न हो, कुछ पाने को न हो, कुछ होने को न हो, तुम राजी हो, जो तुम हो वैसे ही से--तृप्त, परितुष्ट--तो क्या मृत्यु में तुम्हें दुश्मन दिखाई पड़ेगा? तब मृत्यु अभी आ जाए तो तुम उतने ही अहोभाव से स्वीकार कर लोगे, जैसे अहोभाव से तुम जीवन को स्वीकार कर रहे हो। जरा भी अंतर न होगा, जरा भी भेद न दिखाई पड़ेगा। तुम सहज ही विश्राम में जाने को तैयार हो जाओगे। तुम कहोगे, वह दौड़-धूप तो जा ही चुकी थी। हम विदा होने को तैयार ही थे। हम किनारे पर प्रतीक्षा ही करते थे, कब नाव आकर लग जाए और हम उस दूसरी यात्रा पर निकल जाएं।
सुकरात को जहर देकर मारा गया। अदालत ने सुकरात से कहा कि अगर तुम एक वचन दे दो कि तुम सत्य का प्रचार नहीं करोगे--जिसको तुम सत्य कहते हो, उसका तुम प्रचार नहीं करोगे, चुप रहोगे--तो यह मृत्यु बचाई जा सकती है। हम तुम्हें माफ कर दे सकते हैं।
सुकरात ने कहा, जीवन को तो मैं देख चुका। सब कोनों से पहचान लिया। पर्त-पर्त उघाड़ ली। और अगर मुझे जीने का मौका दिया जाए, तो मैं एक ही काम के लिए जीना चाहूंगा कि दूसरे लोगों को भी जीवन का सत्य पता चल जाए। और तो अब कोई कारण न रहा। मेरी तरफ से जीवन का काम पूरा हो गया। पकना था, पक चुका। मेरी तरफ से तो मृत्यु में जाने में कोई अड़चन नहीं है। वस्तुतः मैं तो जाना चाहूंगा। क्योंकि जीवन देख लिया, मृत्यु अभी अनदेखी पड़ी है। जीवन तो पहचान लिया, मृत्यु से अभी पहचान नहीं हुई। जीवन तो ज्ञात हो गया, मृत्यु अभी अज्ञात है, रहस्यमय है। उस मंदिर के द्वार भी खोल लेना चाहता हूं। मेरे लिए तो मैं मरना ही चाहूंगा, जानना चाहूंगा--मृत्यु क्या है? यह प्रश्न और हल हो जाए। जीवन क्या है, हल हो चुका। एक द्वार बंद रह गया है; उसे भी खोल लेना चाहता हूं। और अगर मुझे छोड़ दिया जाए जीवित, तो मैं एक ही काम कर सकता हूं--और एक ही काम के लिए जीना चाहूंगा--और वह यह कि जो मैंने देखा है वह दूसरों को दिखाई पड़ जाए। अगर इस शर्त पर आप कहते हैं कि सत्य बोलना बंद कर दूं तो जीवित रह सकता हूं, तो फिर मुझे मृत्यु स्वीकार है।
मृत्यु सुकरात ने स्वीकार कर ली। जब उसे जहर दिया गया, वह जहर पीकर लेट गया। मित्र रोने लगे; शिष्य दहाड़ने लगे पीड़ा में; आंसुओं की धारें बह गईं। सुकरात ने आंख खोलीं और कहा कि यह वक्त रोने का नहीं। मैं चला जाऊं, फिर रो लेना। फिर बहुत समय पड़ा है। ये क्षण बड़े कीमती हैं। कुछ रहस्य की बातें तुम्हें और बता जाऊं। जीवन के संबंध में तुम्हें बहुत बताया, अब मैं मृत्यु में गुजर रहा हूं, धीरे-धीरे प्रवेश हो रहा है। सुनो!
मेरे पैर ठंडे हो गए हैं; पैर मर चुके हैं। जहर का प्रभाव हो गया। मेरी जांघें शून्य होती जा रही हैं। अब मैं पैरों का कोई अनुभव नहीं कर सकता, हिलाना चाहूं तो हिला नहीं सकता। वहां से जीवन विदा हो गया। लेिकन आश्चर्य! मेरे भीतर जीवन में जरा भी कमी नहीं पड़ी है। मैं उतना ही जीवित हूं। जांघें सो गईं, शून्य हो गईं।
सुकरात ने अपने एक शिष्य को कहा, क्रेटो, तू जरा चिउंटी लेकर देख मेरे पैर पर।
उसने चिउंटी ली।
सुकरात ने कहा, मुझे पता नहीं चलता। पैर मुर्दा हो गए। आधा शरीर मर गया। लेकिन मैं तो भीतर अभी भी पूरा का पूरा अनुभव कर रहा हूं! हाथ ढीले पड़ गए। हाथ उठते नहीं। गर्दन लटक गई। आखिरी क्षण में भी, आंख जब बंद होने लगी, तब भी उसने कहा कि मैं तुम्हें एक बात कहे जाता हूं, याद रखना: करीब-करीब सब मर चुका है, आखिरी किनारा रह गया है हाथ में, लेकिन मैं पूरा का पूरा जिंदा हूं, मृत्यु मुझे छू नहीं पाई है।
जिसने जीवन को जान लिया, वह मृत्यु को जानने को उत्सुक होगा। क्योंकि मृत्यु जीवन का दूसरा पहलू है; छिपा हुआ हिस्सा है। चांद की दूसरी बाजू है, जो कभी दिखाई नहीं पड़ती।
गुरु को मैं मृत्यु कहता हूं, क्योंकि वह तुम्हें मरना सिखाएगा। सारा शिक्षण धर्म का, मृत्यु का शिक्षण है। ध्यान को भी मैं मृत्यु कहता हूं, क्योंकि वह विधि है मरने की। समाधि को भी मृत्यु कहता हूं, क्योंकि वह पूर्णाहुति है। गुरु सिखाने वाला है; ध्यान सीखना है; समाधि पानी है। वे तीनों ही मृत्यु हैं। और मृत्यु बड़ा प्यारा शब्द है। जिस दिन भी तुम इसके भय से छूट जाओगे, मुक्त हो जाओगे; जिस क्षण भी तुम्हारी महत्वाकांक्षा तुम्हें डराएगी न; और तुम आंख खोल कर देखोगे, भर आंख मृत्यु में झांकोगे, उस दिन तुम पाओगे--तुमने अपने भीतर ही झांक लिया।
जीवन आधा है। जीवन से ही जिसने अपने को जाना उसने आधा जाना। उसका आत्मज्ञान पूर्ण नहीं है। मृत्यु आधा है। दिन ही जिसने जाना और रात न जानी उसका ज्ञान अधूरा है। दिन सुंदर है माना; सूरज है, प्रकाश है, फूल हैं, पक्षी हैं। पर रात और भी सुंदर है; तारे हैं, चांद है, विराट आकाश है। प्रकाश की तो सीमा भी मालूम पड़ती है, रात के अंधेरे की कोई सीमा नहीं। प्रकाश में तो थोड़ी उत्तेजना भी है, जलन भी है; रात महाशांति है; कोई उत्तेजना नहीं; परम शून्यता है। प्रकाश में तो वस्तुओं के भेद दिखाई पड़ते हैं; प्रकाश में तो आकृतियां समझ में आती हैं। रात्रि निराकार है; सब आकार खो जाते हैं। एक महाशून्य, एक महाविराट रह जाता है।
मृत्यु भी रात जैसी है। जिसने रात का सौंदर्य नहीं देखा; जिसने आंख खोल कर तारों से भरा आकाश नहीं देखा; जिसने अंधेरे को छुआ नहीं, स्पर्श नहीं किया; जो अंधेरे में डूबा और खोया नहीं; वह उथले में जीया, गहरे से उसके संबंध न हो पाए।
तुम अगर मुझसे पूछो तो मैं ऐेसा कहूंगा कि जीवन जिसे तुम कहते हो, वह तो केवल सागर के ऊपर की लहरों का झंझावात है। और जिसे मैं मृत्यु कहता हूं, जिसे उपनिषद मृत्यु कहते हैं, जिसे दादू ने मृत्यु कहा है, वह सागर की गहराई है, जहां लहरें नहीं हैं, जहां सब लहरें खो गईं; जहां आकृतियां समाप्त हो गईं; जहां केवल निराकार है; जहां तरंग भी नहीं उठती; जहां एक विचार भी नहीं उठता; जहां महाशून्य है--न कभी जो खंडित हुआ है, न कभी जो खंडित होगा; जहां अस्तित्व कुंआरा है, जिसमें जरा भी विकृति नहीं।
मृत्यु को मित्र की तरह देखो; तत्क्षण तुम्हारे साथ मृत्यु का नाता बन जाएगा। तुम उस द्वार से भी जीवन को पहचानने में समर्थ हो जाओगे।
अगर तुम पहले से ही डरे हो तो तुमने धारणा बना ली। अगर डर गए तुम और धारणा बना ली तो तुम मृत्यु के पास कैसे जाओगे? वह मंदिर तुम्हारे लिए सदा के लिए बंद रह जाएगा। मरोगे तुम भी--वही तो कबीर कहते हैं, दादू कहते हैं, नानक कहते हैं--मरोगे तुम भी, लेकिन जो मरने के पहले मर जाता है वही मृत्यु को जान पाता है। जो जीते जी मर जाता है, जो जीता भी रहता है और मृत्यु को स्वीकार कर लेता है।
यही तो समाधिस्थ व्यक्ति का लक्षण है। वह जीता भी है, लेकिन महत्वाकांक्षा की लहरें न रहीं, निर्वासना की गहराई आ गई। चलता है, उठता है, बैठता है उसी बड़े नाट्य मंच पर, जिस पर तुम चलते हो, उठते हो, बैठते हो। उसके ऊपर के कृत्य ठीक तुम्हारे जैसे हैं, कोई भेद नहीं। लेकिन उसकी भीतर की गहराई--जिसने मृत्यु को भीतर आत्मसात कर लिया उसका गुणधर्म बदल जाता है।
ओशो, आपने कहा कि चित्त को सभी धारणाओं से शून्य कर लेने पर जो यथार्थ दिखता है, वही सत्य या परमात्मा है। लेकिन शून्य चित्त में यह प्रत्यभिज्ञा, पहचान कैसे होगी कि यह सत्य है?
समझो; राह पर तुम हो, तुम्हें दूर अंधेरे में एक पुलिसवाला खड़ा हुआ दिखाई पड़ता है। पास आते हो, पुलिसवाला नहीं है, भ्रांति हो गई, वृक्ष का ठूंठ है। अब तुम्हें प्रत्यभिज्ञा हो गई। बिलकुल पास आ गए, बिलकुल पहचान लिया कि वृक्ष का ठूंठ है। अब तो कोई संदेह न रहा।
लेकिन थोड़ी दूर पहले जब तुम्हें पुलिसवाला दिखाई पड़ा था तब भी कोई संदेह न था, तब भी निस्संदिग्ध भाव उठा था मन में कि पुलिसवाला है। अब निस्संदिग्ध भाव उठ रहा है कि वृक्ष का ठूंठ है। क्या तुम निश्चित हो सकते हो कि अब जो प्रत्यभिज्ञा हो रही है वह सही हो रही है?
और तभी अलार्म बजा और तुम्हारी नींद खुल गई, और तुमने पाया, वह सपना था। नींद लगी थी, रास्ते पर चले न थे। रास्ता सपने में था। दूर से पुलिसवाला दिखाई पड़ा, पास आकर छूकर देखा, ठूंठ मालूम पड़ा, तभी बेवक्त अलार्म बज गया, नींद खुल गई। सपना था।
क्या तुम अब भी पक्के हो सकते हो कि जाग कर तुमने जो देखा है वह सपना नहीं है? क्या यह नहीं हो सकता कि अलार्म सपने में बजा हो और एक सपना मिटा और दूसरा शुरू हुआ? प्रत्यभिज्ञा के निश्चित होने का क्या प्रमाण है?
तुमने कई बार ऐसा सपना देखा होगा कि तुम जाग गए हो--सपने में। जागने का सपना! सपने के भीतर सपना, सपने के भीतर सपना, सपने के भीतर सपना संभव है। जो बहुत उलझे हुए दिमाग हैं, वे देखते हैं। तुमने नहीं देखा होगा, लेकिन जिनके दिमाग में बहुत ज्यादा उलझाव हैं, वे देखते हैं। ऐसा तुम देख सकते हो कि तुम रात सोए, सपना शुरू हुआ, सपने में तुमने देखा कि तुम जाग गए। तुम फिल्म देखने जा रहे हो जाग कर। तुम एक सिनेमागृह में बैठे फिल्म देख रहे हो। फिल्म में तुमने देखा कि फिल्म का जो प्रधान अभिनेता है वह फिल्म देखने जा रहा है। तुम जा सकते हो। और यह ऐसा चल सकता है।
च्वांगत्सु ने इसीलिए कहा है कि एक रात मैंने सपना देखा कि मैं तितली हो गया; तब से मेरे सब विश्वास ढीले पड़ गए। क्योंकि सुबह मुझे यह शक होने लगा कि अगर रात च्वांगत्सु सपना देख सकता है तितली होने का, तो तितली सोकर सपना देख रही हो कौन जाने कि च्वांगत्सु हो गई! अगर पहला सच हो सकता है कि च्वांगत्सु तितली हो सकता है, तो तितली सपना क्यों नहीं देख सकती च्वांगत्सु होने का? क्या अड़चन है? बात तो एक ही है। च्वांगत्सु तितली हो जाता है, तो तितली च्वांगत्सु हो सकती है। फिर वह कहता है, उस दिन से फिर मेरा कोई भरोसा न रहा।
प्रत्यभिज्ञा--जो घटना घट रही है, अगर उसमें ही उसकी पहचान नहीं है, तो बाहर से तुम पहचान न ला सकोगे। बाहर से लाई पहचान के लिए फिर किसी दूसरी पहचान की जरूरत पड़ेगी। फिर उस पहचान के लिए किसी और पहचान की जरूरत पड़ेगी। और यह सिलसिला अंतहीन है।
नास्तिक के प्रश्नों में अर्थ है। वे बुद्धि के प्रश्न हैं।
लेकिन नास्तिक के सिर में दर्द हो तब तुम उससे कहो, पहले कभी हुआ था? क्योंकि कभी तो पहली दफे हुआ होगा। ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि सदा पहले, सदा पहले, सदा...कभी तो पहली दफा हुआ होगा। जब पहली दफा हुआ था तब तुम कैसे पहचाने कि यह सिरदर्द है? प्रत्यभिज्ञा कैसे हुई? और मान लो कि अब बहुत दफे हो गया है, पहचान भी हो गई है, तुम यह कैसे पक्का मानते हो कि कल्पना नहीं है? नास्तिक लड़ने-झगड़ने को खड़ा हो जाएगा। वह कहेगा, एस्प्रो है? बातचीत की जरूरत नहीं है!
अब सिरदर्द के लिए कोई प्रत्यभिज्ञा चाहिए? सिरदर्द काफी है; उसका होना ही खबर है। और वह पहली दफे भी हो, तब भी पता चलता है। उसके लिए उसके पहले होने की कोई जरूरत नहीं है। कांटा जब पहली दफा गड़े तब भी गड़ता है। समाधि जब पहली दफा होती है तब भी होती है। और समाधि इस जीवन का सबसे बड़ा अनुभव है। वह इतना विराट अनुभव है कि सिरदर्द पर तो शक भी किया जा सकता है--हालांकि सिरदर्द पर भी शक करना मुश्किल है। जब होता है तब पता चलता है कि कैसे शक करो! लाख उपाय करो शक करने के--आंख बंद करो, इधर-उधर समझाओ--कुछ फर्क नहीं पड़ता; वह है। वह खड़ा है वहां मौजूद।
सिरदर्द जैसी छोटी चीज पर भी शक नहीं किया जा सकता। जब वह अनुभव बनती है तो प्रगाढ़ हो जाती है। तो समाधि तो महा घटना है। वह परम आनंद है। वह पूरे परमात्मा का तुम्हारे ऊपर बरस पड़ना है। वह बूंद में सागर का उतरना है। उसके लिए किसी पहचान की जरूरत नहीं। जब होगा, तुम पहचान लोगे। जब होगा, तुम तत्क्षण पहचान लोगे। और इस पहचान के लिए किसी और पहचान से संबंध जोड़ना न पड़ेगा। यह घटना इतनी बड़ी है!
और इस पर संदेह भी पैदा नहीं होता। सिरदर्द पर तो शायद संदेह पैदा किया भी जा सकता है। इस पर संदेह भी पैदा नहीं होता। क्योंकि जब यह घटना घटती है तो संदेह करने वाला मन ऐसे ही खो जाता है जैसे सुबह के सूरज के उगने पर ओस-कण विदा हो जाते हैं, भाप हो जाते हैं, उड़ जाते हैं। संदेह करने की क्षमता ऐसे ही खो जाती है समाधि के अवतरण पर, जैसे अंधेरे में दीया जलते ही अंधेरा खो जाता है। एक क्षण की भी, पल भर की भी देर नहीं लगती। इधर जला दीया, उधर अंधेरा गया--युगपत, एक साथ। ऐसा नहीं है कि पहले दीया जलता है, प्रकाश होता है, फिर अंधेरा थोड़ा लड़खड़ाता है, डगमगाता है, सोचता है--जाऊं कि न जाऊं। ऐसा कुछ भी नहीं होता। बस यहां दीया जला कि तुम पाते हो अंधेरा नहीं है।
तुम कभी दीया लेकर अंधेरे को खोजने गए? अगर तुम दीया लेकर अंधेरे को खोजने जाओगे, कभी न पाओगे। क्योंकि जहां तुम दीया ले जाओगे वहीं अंधेरा नहीं होगा।
ऐसी ही घटना घटती है, जब भीतर महाप्रकाश का उदय होता है, समाधि होती है। महासूर्य जन्मता है। उस प्रगाढ़ ज्योति में, अनंत ज्योति में सब संदेह विसर्जित हो जाते हैं, सब अंधकार खो जाते हैं। उस क्षण दर्पण में जो झलकता है, कोई धारणा नहीं होती। धारणा हो नहीं सकती। क्योंकि जिसे पहले कभी जाना ही नहीं, उसकी धारणा कैसे होगी? कोई विचार नहीं होता। क्योंकि बात ही इतनी अवाक करने वाली होती है कि विचार तुम करोगे क्या?
साधारण स्थितियों में भी अगर अचानक कुछ घट जाए तो विचार मुश्किल हो जाता है। तुम रास्ते पर चले जा रहे हो, अचानक सांप बीच में आ जाए, तत्क्षण विचार बंद हो जाता है। लाख उपाय करते थे ध्यान करने के, नहीं होता था विचार बंद; सांप के देखते ही बंद हो गया। क्षण भर के लिए अवाक हो गए! तो जब महासमाधि घटती है, चित्त दर्पण की तरह हो जाता है। उस समय कोई विचार नहीं होता, कोई धारणा नहीं होती, कोई प्रत्यय नहीं होता। केवल तुम होते हो तुम्हारी परिपूर्ण शुद्धि में। या अगर बुद्ध का वचन उपयोग करना हो तो कहो कि तुम होते ही नहीं, परिपूर्ण शुद्धि होती है। दोनों एक ही बात है। उस समय, जो है, वही सत्य है। किसी प्रत्यभिज्ञा के कारण नहीं। इसलिए सत्य को स्वयंसिद्ध कहा है, सेल्फ इवीडेंट; उसके लिए किसी की गवाही नहीं चाहिए।
योरोप में ईसाइयों का एक छोटा सा संप्रदाय है, क्वेकर। पिछले तीन सौ वर्षों में उन्होंने कई कष्ट सहे, एक छोटी सी जिद के कारण। वह जिद बड़ी मीठी है। मगर अदालतें, कानून, पुलिस, राज्य मीठी बातों को समझने में समर्थ ही नहीं होते। उनके मापदंड बहुत मोटे और स्थूल होते हैं।
सभी अदालतों में नियम है कि व्यक्ति को कसम खानी चाहिए कि मैं जो भी कहूंगा वह सत्य कहूंगा। क्वेकर कहते हैं, हम यह कसम न खाएंगे। क्योंकि इस कसम से ही झूठ शुरू हो गया। क्वेकर यह कहता है कि मैं अदालत में यह कहूं कि मैं जो भी कहूंगा वह सत्य कहूंगा, इसका मतलब मैं अब तक असत्य बोलता रहा? और अगर अब तक असत्य बोलता रहा तो यह एक बात और बोलने में क्या अड़चन है असत्य कि मैं जो भी कहूंगा वह सत्य ही कहूंगा! यह भी असत्य बोल सकता हूं। जब अब तक असत्य बोलता रहा, जीवन भर असत्य ही बोलता रहा, क्योंकि बिना कसम खाए बोला, तब यह एक छोटी सी बात सिर्फ अदालत में खड़े होकर सत्य बोलने का क्या कारण है? तुम कैसे पक्का कर सकते हो कि मैं यह भी असत्य नहीं बोल रहा हूं?
तो क्वेकर कहता है, मैं जो भी बोलूंगा, बोलूंगा। सत्य-असत्य की फिक्र तुम कर लेना। लेकिन मुझसे क्या कसम खिलवाते हो? कसम का तो मतलब हुआ कि परमात्मा के सामने मैं दोषी हुआ। क्योंकि वह मुझसे पूछेगा कि तूने अदालत में कसम खाई थी कि मैं जो भी बोलूंगा सत्य बोलूंगा, तो अदालत के बाहर क्या करता था?
यह बात बड़ी मीठी है, बड़ी प्रीतिकर है। मगर अदालत में इतनी बुद्धि तो हो नहीं सकती। वे कहते हैं, कसम खाओ। क्वेकर कसम नहीं खाते। सजाएं भुगत लीं उन्होंने, कसम नहीं खाई।
मुझे भी लगती है बात तो ठीक ही है। या तो मैं सत्य बोलता हूं, या नहीं बोलता। कसम का क्या मतलब है? सत्य बोलने वाला कसम नहीं खाएगा। झूठ बोलने वाला कसम खाने को हमेशा तैयार है। क्योंकि कसम भी झूठ बोलने की एक तरकीब है। तुम अगर झूठ बोलने वाले आदमी से मिलोगे तो वह हर वचन के बाद कसम खाता है। वह कहता है, कसम तुम्हारी! कसम भगवान की! जो आदमी जितनी कसम खाए, समझ लेना उतना ही झूठा है। नहीं तो कसम की जरूरत क्या है? बात सीधी-सीधी है, दो और दो चार होते हैं, अब इसमें कसम भगवान की क्या? इसमें भगवान को क्यों बीच में लाते हो? भगवान को बाहर छोड़ो।
नहीं, लेकिन तुम जानते हो, तुम काफी नहीं हो। भगवान का सहारा चाहिए, तभी तुम्हारा झूठ सच जैसा मालूम पड़ेगा।
मुल्ला नसरुद्दीन ने बड़ी मुश्किल से कुछ बहुमूल्य कपड़ा दो-तीन वर्षों में धीरे-धीरे करके इकट्ठा किया था कोट बनवाने के लिए। रमजान के दिन करीब आते थे। तो वह दर्जी के पास गया। दर्जी बहुत व्यस्त था, उसने कहा कि बहुत मुश्किल है। मुल्ला ने बहुत मिन्नतें कीं तो उसने कहा, ठीक है, छोड़ जाओ; सात दिन लगेंगे।
मुल्ला ने कहा, बिलकुल पक्का कह रहे हो?
उसने कहा, बिलकुल पक्का कहता हूं। अल्लाह ने चाहा तो सात दिन में पूरा हो जाएगा।
मुल्ला बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने कहा कि न केवल दर्जी ने अपनी ही बात कही, बल्कि अल्लाह का भी नाम लिया। आदमी धार्मिक है।
सात दिन बाद पहुंचा। दर्जी ने कुछ ध्यान ही न दिया। बामुश्किल तो ऊपर नजर उठाई। उसने कहा कि नहीं हो सका। सात दिन और लग जाएंगे।
मुल्ला ने कहा, अरे! मगर झगड़ा करने से फायदा भी क्या? सात दिन तो गए ही। उसने कहा, पक्का है?
उसने कहा, अगर अल्लाह ने चाहा तो सात दिन में पूरे हो जाएंगे।
मुल्ला ने कहा कि चलो ठीक। कभी हो गई होगी भूल-चूक; आदमी धार्मिक है, अल्लाह को भूला नहीं है। तीसरे सप्ताह पहुंचा। वह तो कोई पता ही नहीं था कोट का। जैसे दर्जी सदा से होते हैं, वैसा ही दर्जी था। उसने कहा, बस एक सप्ताह और, अगर अल्लाह ने चाहा...।
मुल्ला ने कहा, अब एक बात सुनो! अगर अल्लाह को बाहर छोड़ दें तो कितने दिन लगेंगे? यह अल्लाह तो झंझट है। सीधी आदमी-आदमी की बात करो। यह बीच में अल्लाह को ले लेते हो; अल्लाह को तो कोई समय की जल्दी नहीं पड़ी है, अनंत काल है। हम मुफ्त में मारे जाएंगे।
कसम खाने वाला आदमी झूठ को सहारे खोज रहा है। सच्चा आदमी कसम नहीं खाता। क्यों खाए? कसम का प्रयोजन क्या है? सच्चा आदमी गवाह भी नहीं जुटाता। झूठे आदमी ही गवाह जुटाते हैं। कानून का सत्य से कुछ लेना-देना नहीं है, गवाह से ज्यादा प्रयोजन है।
मुल्ला पर एक मुकदमा चला था। और जब विरोधी वकील ने पूछा कि जब यह हत्या की गई, तुम कहते हो तुम चश्मदीद गवाह हो, तुमने आंखों से देखा; तुम कितनी दूर खड़े थे?
मुल्ला ने कहा, सत्रह फीट साढ़े तीन इंच।
थोड़ा चौंका वकील भी; अदालत भी थोड़ी जाग गई; ज्यूरी भी सोए थे, उठ गए; मजिस्ट्रेट ने भी चौंक कर देखा कि सत्रह फीट साढ़े तीन इंच! तुम तो इस तरह बता रहे हो जैसे बिलकुल पहले ही से नाप लिया हो।
नसरुद्दीन ने कहा, मुझे पता था, कोई न कोई मूर्ख जरूर पूछेगा। मैं नाप कर, मैं बिलकुल नाप कर आया हूं।
झूठ बोलने वाला पहले से तैयारी करता है, नाप कर चलता है। जब तुम सोचने लगते हो झूठ बोलने की, तभी तुम गवाहियां जुटाने लगते हो, प्रमाण खोजने लगते हो। इसलिए तो जो महाशास्त्र हैं जगत के--उपनिषद, उनमें परमात्मा के लिए एक भी प्रमाण नहीं है। उपनिषद के ऋषि सिर्फ कहते हैं, परमात्मा है। प्रमाण कोई नहीं देते।
पश्चिम में जब पहली दफा उपनिषदों का अनुवाद हुआ, तो वहां के विचारक समझ ही न सके कि ये किस तरह के शास्त्र हैं। क्योंकि प्रमाण कहां है? ये तो सिर्फ वक्तव्य हैं।
ईसाइयत में तो प्रमाण हैं, बड़े शास्त्र लिखे गए हैं, सिद्ध करने की कोशिश की गई है कि परमात्मा क्यों है। उपनिषद सिर्फ कहते हैं, है। क्यों की बात ही नहीं उठाते।
कारण साफ है। जिन्होंने भी परमात्मा के लिए कारण खोजे हैं, वे झूठे लोग हैं; उन्हें परमात्मा का दर्शन नहीं हुआ। अन्यथा दर्शन काफी प्रमाण है; और तो कोई प्रमाण हो भी नहीं सकता। देख लेना ही प्रमाण है। और परमात्मा के लिए प्रमाण तुम खोजोगे कहां? वही है। उसके अतिरिक्त कोई है नहीं। किससे गवाही लोगे?
परमात्मा को अदालत में खड़ा करने का उपाय नहीं है। नहीं तो वह कह दे कि हां, मैं हूं। वह भी उपाय नहीं है। क्योंकि सब अदालतें छोटी पड़ जाएंगी। उसे कहां तुम खड़ा कर पाओगे? वह विराट है। उसके अतिरिक्त कोई नहीं है; कोई गवाही नहीं दे सकता।
उपनिषद चुप हैं। वे सिर्फ वक्तव्य देते हैं। वे सिर्फ इतना कहते हैं, है। जानने का उपाय है, सिद्ध करने का उपाय नहीं है। उसके साथ एक हो जाने का मार्ग है, लेकिन उसके लिए तर्क से प्रमाण देने की कोई व्यवस्था नहीं है। परमात्मा अनुभव है। परमात्मा कोई तार्किक निष्पत्ति नहीं है। वह कोई निष्कर्ष नहीं है तुम्हारे विचार का। इसलिए न तो उसे कोई गलत सिद्ध कर सकता है, न उसे कोई ठीक सिद्ध कर सकता है।
तो परमात्मा को जो सिद्ध करने में लगे हैं कि है, वे भी नासमझ; उनको तुम आस्तिक कहते हो। जो परमात्मा को सिद्ध करने में लगे हैं कि नहीं है, वे नास्तिक; वे भी नासमझ हैं। वे दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों की धारणा एक है कि परमात्मा सिद्ध किया जा सकता है या असिद्ध किया जा सकता है। दोनों मानते हैं कि परमात्मा निष्कर्ष है विचार का। इसलिए मैं कहता हूं, आस्तिक और नास्तिक एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं; उनमें कोई फर्क नहीं है।
धार्मिक व्यक्ति न तो आस्तिक होता है, न नास्तिक। फिर धार्मिक कौन है?
धार्मिक वह है जो कहता है कि परमात्मा अनुभव है; न तो सिद्ध किया जा सकता है, न असिद्ध किया जा सकता है। न तो हम आस्तिक की धारणा पकड़ सकते हैं उसके संबंध में, न नास्तिक की। उसके संबंध में तो हम केवल चुप हो सकते हैं। चुप्पी ही, मौन ही उसके संबंध में एकमात्र उपाय है। और जो जितना मौन होता जाएगा, उतना ही वह प्रकट होता जाता है। मौन होते हो, तुम मिटते हो, वह प्रकट होता है।
दादू कहते हैं, अपने अतिरिक्त कोई बीच में खड़ा नहीं।
तुम मिट जाते हो, शून्य हो जाते हो, मौन हो जाते हो, वह प्रकट हो जाता है। प्यारा तो सदा ही प्रकट है। वह छिपा नहीं है। तुमने अपनी ही नासमझियों में अपने को छिपा लिया है।
ओशो, आप कहते हैं कि हर आकांक्षा के भीतर उसका विपरीत छिपा है। सम्मान की आकांक्षा में अपमान छिपा बैठा है; जीने की आकांक्षा में ही मृत्यु का भय भरा है। ऐसा क्रूर विधि-विधान क्यों है?
जैसे छोटे बच्चों की दृष्टि होती है; टेबल से टकरा गए, नाराज हो जाते हैं टेबल से। अब टेबल उनसे टकराई नहीं है, टेबल अपनी जगह खड़ी है, बिलकुल तटस्थ है। इस बच्चे की तरफ आकर चेष्टा नहीं की है टेबल ने कि टकरा जाए। ये ही चले आ रहे थे बेहोश अवस्था में; टेबल से टकरा गए; होश न था, हाथ में चोट लग गई। अब बच्चा समझता है कि टेबल ने चोट मारी। और बच्चा कोशिश भी करता है टेबल से बदला लेने का। बल्कि बच्चे के लिए उसकी मां को भी दौड़ कर टेबल को मारना पड़ता है, जानते हुए भी कि टेबल का कोई कसूर नहीं है। मगर बच्चा प्रसन्न होता है टेबल को पिटते देख कर कि ठीक हुआ। नाचता है। क्योंकि इस टेबल ने उसे मारा था।
इस बच्चे पर तुम्हें हंसी आती है, लेकिन सारे लोग आमतौर से अस्तित्व के साथ इसी बच्चे की भांति हैं। तुम ही टकराते हो, फिर चोट लग जाती है। चोट लग जाती है तो तुम नाराज होते हो। तुम सोचते हो, अस्तित्व मेरे विरोध में क्यों? इतना क्रूर क्यों?
अस्तित्व न क्रूर है, न अक्रूर। अस्तित्व का कोई पक्षपात ही नहीं है।
एक बात सुनिश्चित रूप से ध्यान में रख लो कि अस्तित्व तुम्हारे साथ वही करता है, जो तुमने अस्तित्व के साथ किया है। इसको ही हमने कर्म का सिद्धांत कहा है। और कुछ नहीं है कर्म का सिद्धांत। सीधी सरल सी बात है। तुम जैसा करते हो अस्तित्व के साथ, वही तुम पर लौट आता है। अगर तुम गीत गाते हो, गीत लौट आते हैं। गालियां देते हो, गालियां लौट आती हैं।
क्रूर नहीं है, पहली बात।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि बड़ा सदय है तुम्हारे प्रति। क्योंकि वह भाषा ही गलत है। क्रूरता, अक्रूरता दोनों ही बातें गलत हैं।
अस्तित्व बिलकुल निष्पक्ष है, कोरा है। वह दर्पण है। तुम जैसा चेहरा उसके पास ले आते हो, वैसा ही चेहरा तुम्हें दिखा देता है। दर्पण पर नाराज मत होना।
मैंने सुना है, एक स्त्री पागल हो गई थी। वह दर्पण में नहीं देखती थी। उसको लाख समझाओ, वह दर्पण से डरती थी। उसे चिकित्सकों के पास लाया गया। उन्होंने पूछा कि तू दर्पण क्यों नहीं देखती? वह दर्पण फोड़ देती थी जहां भी मिल जाए। दिखाई पड़ जाए, वहीं फोड़ देती थी। रास्ते में चलते दुकान पर लगा दर्पण है, वह दौड़ जाती, नष्ट कर देती। वह कई उपद्रव कर चुकी थी।
उसने कहा कि दर्पण? दर्पण में जब भी मैं देखती हूं तो दर्पण मेरे साथ बड़ा कठोर व्यवहार करते हैं। मुझे कुरूप बतलाते हैं, जो कि मैं नहीं हूं।
वह स्त्री कुरूप थी। दर्पण का कोई कसूर न था। उसका चेहरा भयानक था। उसके चेहरे को कोई भी देख कर डर जाता, जुगुप्सा पैदा होती, घृणा उत्पन्न होती, दूर हटने का भाव होता। उसके चेहरे में बड़ी विकर्षित करने की क्षमता थी। लेकिन वह सोचती थी कि दर्पण मेरे साथ कुछ षड्यंत्र कर रहे हैं। दर्पणों ने कुछ साठ-गांठ कर रखी है। जहां भी मैं दर्पण में देखती हूं, वहीं दर्पण मुझे कुरूप दिखलाते हैं। मैं सुंदर हूं।
तुम इस स्त्री को ही पागल मत समझना, ऐसा पागलपन थोड़ी-ज्यादा मात्रा में सबके भीतर है। अगर कोई तुम पर नाराज हो जाता है, तो तुम यह नहीं सोचते कि मेरे भीतर कुछ होगा जिसने उसे नाराज करवा दिया। तुम सोचते हो, यह आदमी गलत है। दर्पण गलत है। कोई अगर तुम्हारे पास नहीं आता, जो भी तुम्हारे पास आता है, दूर हटने लगता है, तो तुम सोचते हो, सारे लोगों ने मेरे खिलाफ कुछ कर रखा है। लेकिन तुम नहीं देखते कि तुममें जरूर कुछ होगा, जो लोगों को दूर हटाता है।
ध्यानी व्यक्ति को यह दर्पण से दुश्मनी छोड़नी चाहिए। बल्कि दर्पण से मैत्री करनी चाहिए, क्योंकि दर्पण खबर देता है। खबर को तुम स्वीकार कर लो तो बदलाहट का उपाय है। तुम सुंदर हो सकते हो। जब सभी तुम्हें गाली देते हैं, तो थोड़ा सोचना कि मामला क्या है? तुम जरूर ऐसे उपाय करते होओगे कि उनको गाली देने को मजबूर कर देते हो। अन्यथा किसको प्रयोजन है कि तुम्हें गाली देता फिरे? अपने-अपने काम लोगों को काफी हैं। अपने ही काम नहीं चुक रहे हैं, तुमको गाली देने कौन आएगा और? निमंत्रण दो तो भी कोई नहीं आएगा। लोग कहेंगे, भई हम अपने काम से जाएं कि तुम्हें गाली दें? तुम देखो करके। मुहल्ले भर को निमंत्रण दे दो कि मैं एक घंटा रोज बाहर बैठूंगा, कृपा करके सब लोग मुझे गाली देने आएं। कोई नहीं आएगा।
तुम जब अपने भीतर रूपांतरित होते हो, तो आस-पास का सारा जगत तुम्हारे संबंध में व्यवहार बदल देता है। जगत तटस्थ है। तुम जैसा चाहते हो, वैसा ही वह हो जाता है। हो सकता है कि तुम्हें खुद ही पता न हो कि तुम क्या कर रहे हो जगत के साथ, जिससे कि दुष्परिणाम हो रहे हैं। लेकिन जगत क्रूर नहीं है; अक्रूर भी नहीं है। जगत शुद्ध, शांत--तुम्हारे संबंध में जगत का कोई भी पक्षपात नहीं है।
फिर जो बात पूछी है, वह समझ लेने की है। तुम जो भी चाहते हो--समझो कि तुम सम्मान चाहते हो। सम्मान चाहने का मतलब ही यह है कि तुम अपने को सम्मानित मानते नहीं; पहली बात। तुम्हारा होना काफी नहीं है। तुम तृप्त नहीं हो। तुम मानते हो, हम कुछ भी नहीं हैं जब तक सम्मान न मिले; जब तक भारत-रत्न की उपाधि न मिल जाए; कि कोई सरकार तुम्हें सर न बना दे; कि कोई तगमा न लगा दे; तब तक तुम दो कौड़ी के हो। ऐसी तुम्हारी मान्यता है। यह जो तुम्हारी मान्यता है कि मैं दो कौड़ी का हूं, इस पर तुम भारत-रत्न का तगमा लगाना चाहते हो--पद्मभूषण! कि कोई कुछ भी शोरगुल मचा दे तुम्हारे चारों तरफ, फूलमालाएं पहना दे, जुलूस निकाल दे; ताकि तुम्हें जो दो कौड़ीपन का भाव हो रहा है कि मैं दो कौड़ी का हूं, ना-कुछ हूं, वह दब जाए।
लेकिन क्या वह दबेगा? वह दो कौड़ी का जो भाव है, वह तो भीतर ही पड़ा रहेगा। किसी ने माला पहना दी, दो कौड़ियों के ऊपर माला पड़ गई। अब तुमको यह फिक्र होगी कि कोई माला न उठा ले। क्योंकि वह माला उठाते ही से दो कौड़ियां दिखाई पड़ेंगी। अब तुम डरोगे कि सारी दुनिया माला छीनने की कोशिश कर रही है।
और स्वभावतः दूसरे भी दो कौड़ी का भाव लिए घूम रहे हैं; वे भी इस चिंता में हैं कि किसी की माला मिल जाए तो ढांक लें। माला के लिए बड़ी प्रतियोगिता है, बड़ा संघर्ष है। कौन राष्ट्रपति हो जाए, कौन प्रधानमंत्री हो जाए, बड़ा संघर्ष है। सिंहासन पर जो बैठ गया वह उतरना नहीं चाहता, क्योंकि उतरते ही से वह फिर दिखाई पड़ जाएगा कि कुछ भी नहीं है। सिंहासन पर बैठ कर जो होने का मजा आया, शब्दों में बल आ गया, आज्ञा देते ही घटनाएं घटने लगीं, वह सिंहासन से उठते ही कोई नहीं सुनेगा। अपना कुत्ता भी पूंछ न हिलाएगा सिंहासन से उतरते ही से। वह भी भौंकेगा। वह भी कहेगा कि जाओ। भूतपूर्व राष्ट्रपति हो! वे वक्त गए। अब हम तुम्हारे लिए थोड़े ही पूंछ हिलाते रहें! दूसरा बैठा है सिंहासन पर।
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन एक सम्राट के घर नौकर था। वह रसोइए का काम करता था। सम्राट उसे बड़ा प्रेम करता था। उसने एक दिन भिंडियां बनाईं। सम्राट ने चखीं, उसे भिंडियां बहुत पसंद आईं। सम्राट के चेहरे पर बड़ी प्रसन्नता आई। उसने नसरुद्दीन से पूछा कि भिंडियों के संबंध में तुम्हारा क्या खयाल है?
नसरुद्दीन ने कहा, मालिक, भिंडियां तो अमृत हैं। और सब सब्जियां तो साधारण हैं, यह तो सिंहासन पर विराजमान है। भिंडी तो बस आखिरी चीज है। इसके ऊपर कहीं कुछ है!
सम्राट प्रसन्न था, तो नसरुद्दीन ने दूसरे दिन भी भिंडी बनाई, तीसरे दिन भी भिंडी बनाई, चौथे दिन भी, पांचवें दिन भी...। सातवें दिन सम्राट ने थाली फेंक दी और कहा, नसरुद्दीन, हर चीज की हद होती है!
नसरुद्दीन ने कहा, मालिक, हद होती है। और भिंडी जैसी सड़ी चीज! जानवर भी नहीं खाते, मालिक। यह तो बिलकुल आखिरी है।
सम्राट ने कहा, अरे! और तू कह रहा था उस दिन कि भिंडी सबसे ऊपर, और सभी सब्जियां इसके सामने कुछ भी नहीं। यह तो कोहिनूर है। और जमाने भर की तारीफ हांक रहा था।
नसरुद्दीन ने कहा, मालिक, हम तुम्हारे नौकर हैं, भिंडी के नहीं। हम तुम्हारे चेहरे की तरफ देखते हैं। भिंडी से हमको क्या लेना-देना!
वह जो कुत्ता है, वह सिंहासन के पास पूंछ हिलाता है।
ऐसा हुआ कि मैं एक भूतपूर्व मंत्री के साथ यात्रा कर रहा था। उनके ही गांव के बाहर, जहां कभी वे सम्राट की तरह पूजे गए थे, एक पुलिसवाले ने रोक दिया चुंगी-चौकी पर। उनको भरोसा न आया। और मुझे साथ देख कर उनको ऐसा लगा कि यह तो अपमानजनक है। मेरी गाड़ी रोकता है, और एक साधारण पुलिसवाला! और जब वह पुलिसवाला पास आया तब तो वे और भी नाराज हो गए, क्योंकि उन्हीं ने उसे नौकरी दिलाई थी वे जब मंत्री थे।
उन्होंने कहा, क्यों रे! देखता नहीं किसकी गाड़ी है?
वह कहने लगा, देख लिया किसकी गाड़ी है। सबकी गाड़ी रुकती हैं।
मंत्री भी थोड़े ढीले पड़ गए, क्योंकि अब कोई ताकत तो है नहीं। दिन गए! अब यह पुलिसवाला उपद्रव कर सकता है। देखादाखी करने लगे, चीजें देखने लगे। कहने लगे, अच्छा भाई!
जब वहां से निकल गए तो उन्होंने मुझे कहा कि हद हो गई! इस आदमी को मैंने ही नौकरी दिलाई।
मैंने कहा, इसीलिए वह आपको अभी तक माफ नहीं कर पाया। किसी को नौकरी दिलाओ, वह तुम्हें कभी माफ न करेगा। वह किसी न किसी दिन बदला लेगा। क्योंकि एक दिन तुम इतने ऊंचे थे कि नौकरी दिलाई। उस दिन पीड़ा तो उसके मन में हुई थी कि तुम्हारे हाथ जोड़ने पड़े, तुम्हारे सामने पूंछ हिलानी पड़ी। इसका बदला वह कभी न कभी लेगा।
लोग कहते हैं, हम तो नेकी करते हैं और लोग हमारे साथ बदी करते हैं।
यह बिलकुल गणित है। जिसके साथ तुमने नेकी की, वह बदी न करेगा तो क्या करेगा? उसको बदला तो लेना ही है। क्योंकि जब भी तुमने नेकी की, तब तुमने इतनी अकड़ से देखा होगा कि देख, तू कीड़ा-मकोड़ा! हमारी कृपा से जी रहा है।
मैंने कहा, याद करो वह दिन, जिस दिन इस आदमी ने आकर तुम्हारे सामने पूंछ हिलाई थी और तुमने इसको नौकरी दिलवाई थी। आज यह ठीक उससे विपरीत करके दिखला रहा है। यह चाहता था कि अब तुम भी जरा पूंछ हिलाओ। सबका वक्त आता है।
जो आदमी, इसीलिए, सिंहासन पर पहुंच जाता है, किसी पद पर, वहां से हटना नहीं चाहता। वह लाख बातें करता है कि राष्ट्र के लिए बहुत जरूरत है। इस पद से हटे कि राष्ट्र डूब जाएगा। और राष्ट्र कभी डूबते नहीं--या डूबे ही हुए हैं, कोई किसी से कुछ फर्क पड़ता नहीं है। लेकिन जो भी पद पर है, वह सोचता है, मेरे हटते ही संसार नष्ट हो जाएगा। इसे बचाना जरूरी है।
किसी को मतलब नहीं है संसार से। प्रत्येक व्यक्ति अपने को पद पर बचाए रखने में उत्सुक है। क्योंकि वह जो दो कौड़ी का भाव है, वह पद के नीचे छिपा है। पद से गए कि वह दो कौड़ी का भाव साथ चलेगा।
मैंने सुना है कि एक युवक धन की खोज में निकला। वह एक राजमहल के बाहर आकर रुका। सुंदर स्वस्थ युवक था। सम्राट सुबह-सुबह अपने घोड़े पर निकला था। उसने इस युवक से पूछा कि कैसे बैठे हो? कुछ काम की तलाश है?
उसने कहा, काम की तलाश में निकला हूं। धन कमाने निकला हूं।
कर क्या सकते हो?
उसने कहा, मैं शिल्पी हूं। मकान बना सकता हूं, भवन बना सकता हूं, मंदिर बना सकता हूं, मूर्तियां गढ़ सकता हूं। स्थापत्य मेरा विषय है।
सम्राट ने कहा, हमें जरूरत है। आ जाओ; महल के भीतर प्रवेश कर जाओ। यह जो दुर्ग है महल के आस-पास, इसके भीतर तुम्हें जो भी भोगना हो भोगो; जो भी खाना हो खाओ; जो भी पीना हो पीओ; जो भी पहनना हो पहनो। किसी चीज की कमी न रहेगी। तुम सम्राट की तरह रहो। लेकिन एक बात ध्यान रखना: जिस दिन भी मैं नाराज हो जाऊंगा, उस दिन जैसे यहां बैठे हो, इन्हीं कपड़ों में, बस इतने ही सामान के साथ दरवाजे से बाहर होना पड़ेगा। जब तक हो, सम्राट की तरह रहो। जाते वक्त ये ही कपड़े, ये ही फटे जूते, यही झोला, और यही सामान। इसको सम्हाल कर रख दो तिजोड़ी में महल की। अभी मजे से सम्राट की तरह रहो।
वह युवक महल में काम करने पर लग गया। सम्राट की तरह रहने लगा, मगर भीतर एक बेचैनी तो बनी ही रही। सब कपड़े थे, कीमती थे, लेकिन जानता था ये मेरे नहीं हैं। हीरे-जवाहरात मिल गए थे पहनने को, लेकिन जानता था ये मेरे नहीं हैं। शानदार घोड़ों पर चढ़ता था, हजारों लोग नमस्कार करते थे। लेकिन जानता था कि किसी भी दिन जरा गड़बड़ हुई कि दरवाजे के बाहर कर दिए जाएंगे। वही पुराना झोला और वही पुराना कपड़ा!
वही तुम्हारे राष्ट्रपतियों की हालत है, तुम्हारे प्रधानमंत्रियों की। जिस दिन भी बाहर हुए--वही पुराना झोला, वही पुराना कपड़ा। इसलिए घबड़ाहट है। और बाहर होने का डर है, क्योंकि दूसरे भीतर घुसने की कोशिश कर रहे हैं। चारों तरफ से कोशिश चल रही है। दुश्मन तो दुश्मन हैं ही; जो अपने हैं, जो बिलकुल बैठे हैं पास सिंहासन के, वे भी हाथ रखे हैं कि कब मौका पड़े कि टांग पकड़ लें। अपने भी पराए; पराए तो पराए। दुश्मन तो दुश्मन; मित्र भी दुश्मन।
इस घबड़ाहट में फिर जीवन बीतता है। इस चिंता में फिर जीवन बीतता है। जब तक माला न मिले, पद न मिले, तब तक दो कौड़ी का भाव सताता है। फिर दो कौड़ी को छिपा लो पद में, तब यह भाव सताने लगता है कि अब यह माला न छिन जाए। और अभी और मालाएं भी पाने को हैं। तो यह माला छिने न; और मालाएं गिरती चली जाएं। और मजा यह है पूरी मूढ़ता का कि अंत में हजारों मालाएं भी तुम्हें छिपा लें, लेकिन तुम जानते ही रहोगे कि वह दो कौड़ी का भाव भीतर पड़ा है। तुम ना-कुछ हो।
आखिर एक दिन वह युवक घबड़ा गया। वर्ष बीत गए। उसने आकर सम्राट से कहा, मैं जाता हूं।
तो सम्राट ने कहा, कोई बात नहीं हुई। तुम्हें जाने का आदेश नहीं दिया गया। कोई तुम्हें कमी है? तुम बोलो!
सम्राट उससे बहुत प्रसन्न था। उसका काम अदभुत था। उसने कहा, काम भी ठीक है, कोई कमी भी नहीं है। लेकिन मैं भलीभांति जानता हूं कि मेरा कुछ भी नहीं है। यहां रुकना ठीक नहीं। अपना कुछ हो, वहीं जाएंगे। मेरा झोला और मेरे कपड़े वापस लौटा दिए जाएं। तुम भला सोचते होओ कि मैं इन महल के वस्त्रों में बड़ा प्रसन्न हूं, लेकिन मैं प्रसन्न नहीं हूं। क्योंकि मैं भीतर तो जानता हूं कि ये मेरे नहीं हैं।
जो अपना नहीं है, उससे कहीं तृप्ति हुई है! जो माला किसी दूसरे ने तुम्हें डाली है, वह तुम्हारी नहीं है। और जो पद किसी वोट से मिला है, वह तुम्हारा नहीं है। जो किसी के सहारे से जीता है, वह छीना जाएगा। जो किसी की कृपा से पाया है, वह आज नहीं कल खो जाएगा। न भी खोए तो भी तुम्हारी सत्ता नहीं है वह; तुम्हारी संपदा नहीं है। तुम्हारी आत्मा नहीं है वहां।
उस युवक ने ठीक किया। उसने कहा कि मैं जाता हूं। मुझे मेरे कपड़े लौटा दो। मैं जो हूं, अब मैं वही खोजूंगा, जो मेरा हो सके।
तो एक तो रास्ता है कि दो कौड़ी का भाव है, इस भाव का त्याग करो और भीतर प्रवेश करो, क्योंकि वहां महामहिम विराजमान है। उससे ऊपर कोई पद नहीं है, उससे ऊपर कोई धन नहीं है। तो एक तो उपाय है धार्मिक व्यक्ति का कि वह दो कौड़ी का भाव क्यों है, इसकी खोज में लगता है। विश्लेषण करता है, ध्यान करता है, चिंतन-मनन करता है, स्वाध्याय करता है। और यह दो कौड़ी का भाव कैसे छूट जाए और मेरे भीतर की परम सत्ता कैसे मुझे उपलब्ध हो जाए, इसकी यात्रा पर जाता है। उसकी भीतरी यात्रा है, अंतर्यात्रा है।
एक दूसरी यात्रा है--बहिर्यात्रा; वह राजनीति की है। और धर्म और राजनीति, दुनिया में दो यात्राएं हैं। और तुम दोनों साथ-साथ न हो सकोगे। इसलिए धार्मिक राजनीतिज्ञ नहीं हो सकता। राजनीतिज्ञ धार्मिक नहीं हो सकता। इसका कोई उपाय नहीं है। जो राजनीति की यात्रा पर चल रहा है, वह यह कोशिश कर रहा है कि दो कौड़ी का भाव है, इसको कैसे छिपा लूं।
छिपा-छिपा कर भी छिपेगा नहीं। सारी दुनिया से छिप जाए, फिर भी तुम्हें पता चलता रहेगा। और जितना छिप जाएगा दुनिया से, उतना ही ज्यादा पता चलेगा। जैसा उस युवक को पता चलने लगा था--ये कपड़े मेरे नहीं हैं, ये महल मेरे नहीं हैं; मेरा तो वही झोला है। उसका और उभार होकर तुम्हें पता चलेगा।
इसलिए धन जब बहुत मिल जाता है लोगों को, तब उनको भीतर की निर्धनता का बोध होता है। और जब बड़े पदों पर पहुंच जाते हैं, तब उन्हें दीनता का पता चलता है। लेकिन तब तक सारा जीवन खो गया व्यर्थ दौड़ में।
और फिर भी बहुत कम हिम्मतवर लोग हैं, जो उन ऊंचाइयों से--झूठी सही--उन ऊंचाइयों से वापस लौटने की कोशिश करते हैं। वह युवक बहुत हिम्मतवर था। उस युवक ने वही किया जो बुद्ध और महावीर ने किया था। महल छोड़े, इसलिए नहीं कि महल अपने थे; महल छोड़े इसलिए कि पहचान लिया कि अपने नहीं हैं और एक दिन झोली लेकर बाहर निकलना पड़ेगा। अच्छा है इसके पहले कि निकाले जाएं, निकल जाना उचित है।
बुद्ध और महावीर ने वही किया, जो उस युवक ने किया। उसने कहा, सम्हालो। अब हम उस खोज में जाते हैं, जो अपना हो सके। आत्मा की खोज में जाने का मतलब है, जो अपनी है उसकी खोज में जाते हैं। जो अपनी है वह दूसरे से नहीं मिलती; वह उधार नहीं है। मेरी आत्मा तुम मुझे नहीं दे सकते। कोई मुझे नहीं दे सकता। उसे मुझे ही आविष्कार करना होता है। हां, सम्मान तुम मुझे दे सकते हो। वह उधार है। उन वस्त्रों के भीतर मेरा दो कौड़ी का भाव छिप सकता है। लेकिन जब तक मेरी आत्मा का उदय न हो, वह दो कौड़ी का भाव मिटेगा नहीं। वह अंधकार का हिस्सा है।
हीनता की स्थिति, हीन-ग्रंथि अज्ञान है। जब तुम आत्मभाव से भरोगे, तभी हीन-ग्रंथि विसर्जित होती है। उसके पहले विसर्जित नहीं होती। और अच्छा है कि उसके पहले विसर्जित नहीं होती। नहीं तो तुम न मालूम कहां कूड़ा-करकट में दब कर बैठ जाते और समाप्त हो जाते!
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
How is truth recognized in the emptiness of consciousness?
According to Osho, in the emptiness of consciousness truth is not recognized but simply is. Recognition belongs to the thinking mind and breeds misperception and infinite regress. In deep meditation the mind becomes a mirror: it reflects without naming or judging. In that choiceless clarity, reality is self-evident, self-luminous; any attempt to 'know it' as an object creates distance, doubt, and delusion.
In simple terms: When your mind is empty like a mirror, you don’t need to recognize truth—it's just there by itself.
Why is the highest in life referred to as death?
According to Osho, the 'highest' is called death because death is the summit and essence of life—your innermost core maturing to completion. It is not an external enemy but the individualized harvest of how you have lived, the other wing of birth, like exhalation to inhalation. Embraced consciously, death becomes meditation and a doorway to the divine; without it, life remains incomplete and barren.
In simple terms: Death is the natural, inside part of life that completes it—like the last page of a story—so if we meet it wisely, it can be peaceful and meaningful.
Why are all the wise not unanimous about Krishna being a complete incarnation?
According to Osho, the wise are unanimous; only followers are divided. True sages see the same truth and don’t argue about Krishna’s completeness. Division springs from disciples’ politics of opposition: they cling to ‘their’ master mainly out of hatred for others, craving conflict and comparison. This reverse current feeds sects, headlines, and wars, not love—so the noise of followers masks the silent agreement of the wise.
In simple terms: Wise people agree about Krishna; it’s the followers who argue because they like taking sides and disliking the other side.
How do you recognize the appearance of God?
According to Osho, God is recognized not by prior knowledge or comparison but by a direct, self-evident happening: when samadhi—the inner light—descends, recognition is instantaneous and doubt ends. Like a first headache or a thorn, its very occurrence is the proof. Thought falls silent, darkness dissolves, and supreme bliss overflows; no belief, measure, or external sign is needed.
In simple terms: You know God is there the moment it happens—like a first headache—so clear that thinking stops and you’re filled with light and peace.
Why is there a law that within every aspiration its opposite is hidden?
According to Osho, opposites hide within aspiration because existence is a neutral mirror: whatever you project returns as its reflection. Desire frames reality; wanting ‘not-cruelty’ makes you interpret neutrality as cruelty. This is karma’s simple law—life echoes your stance. Drop blame, align inwardly, and the mirror changes; transform yourself and the world’s response transforms, dissolving the tug-of-war of opposites.
In simple terms: Life is a mirror: your strong wishes cast opposite shadows, so change yourself instead of blaming the mirror.
