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Questions in this Discourse
ओशो, आचरणवादी (बिहेवियरिस्ट) मनस्विदों का खयाल है कि यदि ढंग से आचरण का प्रशिक्षण दिया जाए तो आदमी को बदल कर बेहतर बनाया जा सकता है। कृपया बताएं कि यह खयाल कहां तक सही है।
जैसे कोई व्यक्ति सिगरेट पीता है, नहीं छोड़ पाता है, तो आचरणवादी मनोवैज्ञानिक कहता है कि जब भी वह सिगरेट पीए तभी उसे बिजली का शॉक दिया जाए। जब-जब सिगरेट पीएगा तभी-तभी बिजली का शॉक लगेगा। वह उसके रोएं-रोएं को कंपा देगा। थोड़े दिनों में हाथ में सिगरेट उठाते ही घबड़ाहट और कंपन शुरू हो जाएगा। क्योंकि बिजली का धक्का और धूम्रपान संयुक्त हो जाएंगे। उनका एसोसिएशन हो जाएगा। उसके मन में दोनों बातें जुड़ जाएंगी। सिगरेट पीना असंभव हो जाएगा।
यह बात ठीक है। लेकिन मनुष्य शायद समाज के ज्यादा अनुकूल बनाया जा सके, समाज जैसा चाहता है वैसा मनुष्य से करवाया जा सके, राज्य के हाथ में आचरणवादी मनोवैज्ञानिक बड़ी महत्वपूर्ण शक्ति दे देंगे; जो न हथियारों से मिलती है, न पुलिस अदालतों से मिलती है। मनुष्य और भी पंगु हो जाएगा, श्रेष्ठ नहीं। मनुष्य का आचरण शायद समाज के अनुकूल हो जाए, शायद अपराध कम हों, कारागृह में लोग कम हों; लेकिन संतत्व का आविर्भाव सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।
वह जो श्रेष्ठ मनुष्य है, उसकी श्रेष्ठता कहां है? उसके आचरण में नहीं, उसके बोध में है। उसकी श्रेष्ठता, वह क्या करता है, इसमें नहीं है। वह क्या है, इसमें है।
यह तो मनुष्य का सर्वाधिक पतन हुआ। उसके साथ व्यवहार यंत्र का हो गया। यंत्र कुशल हो सकता है, अकुशल हो सकता है। श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ का कोई सवाल न रहा। तुम्हारा बिजली का पंखा ठीक चलता है, गलत चलता है। ठीक चलने का मतलब है कुशलता से चलता है। गलत चलने का मतलब है कि कुशलता से नहीं चलता, शोरगुल करता है, आवाज करता है, हवा ठीक से नहीं फेंकता। लेकिन बिजली के पंखे को शुभ और अशुभ थोड़े ही कहा जा सकता है; श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ थोड़े ही कहा जा सकता है। तकनीकी दृष्टि से कुशल-अकुशल का भेद हो सकता है।
पावलफ, स्किनर और उनके अनुयायी सारी दुनिया में इस बात की हवा पैदा कर रहे हैं कि धर्म असफल हो गया, आदमी को बदल नहीं पाया। हम आदमी को बदल देंगे।
वे आदमी को बदलेंगे इस भांति, जैसे कोई किसी मरीज को स्वस्थ कर दे मार कर। बीमारी तो मिटे ही मिटे, बीमार भी मिट जाए।
यदि मुझसे पूछते हो तो मैं कहूंगा, आदमी बुरा रहे तो भी ठीक है, अपराध करे तो भी ठीक है; उसके पास कम से कम आत्मा तो है। आज अपराध करता है, कल चाहेगा तो नहीं करेगा। लेकिन जीवन में जो भी परिवर्तन जबरदस्ती आते हैं, वे मनुष्य की आत्मा का हनन, आत्मा को नष्ट करते हैं। जीवन में केवल वे ही परिवर्तन स्वागत-योग्य हैं, जो स्वेच्छा से आते हैं, जो तुम्हारे बोध और समझ का परिणाम होते हैं।
पर मनोवैज्ञानिक जो कह रहे हैं, वह कोई नई बात नहीं है। समाज ने अब तक यही किया है। और तुम्हारे तथाकथित धर्मों ने भी यही किया है। उसे थोड़ा समझना चाहिए।
धर्म कहते हैं, तुम अच्छा करोगे तो स्वर्ग में पुरस्कार होगा; तुम बुरा करोगे तो नरक में दंड पाओगे। यह भी बिजली का धक्का ही है। थोड़ा सूक्ष्म है, पर बहुत भेद नहीं है।
बाप की आज्ञा नहीं मानता बेटा, तो बाप मारता है। मानता है तो मिठाई देता है, पैसे देता है कि जाकर बाजार में कुछ भी खरीदना हो खरीद लो, खिलौने खरीद लाओ। यह भी व्यवहारवादी मनोविज्ञान ही है। क्योंकि जब बेटे ने कुछ अनुकूल नहीं किया, तुमने मारा। मार कर तुमने किसी आचरण के साथ भय का संबंध जोड़ दिया। व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक इसी को और जरा कुशलता से करता है। क्योंकि चांटा कितना गहरा जाएगा? वह कहता है, बिजली का धक्का गहरा जाता है। चांटे से कुछ भी न होगा। लेकिन होता है कुछ।
समाज में भी तुम्हें जो अच्छे और बुरे लोग दिखाई पड़ते हैं उनमें अच्छे और बुरे संस्कार का ही अधिकतर भेद होता है। अच्छे घर में कोई पला है; अहंकार के साथ बात जोड़ दी गई है कि तुम कुलीन हो। तुमने अगर ऐसा व्यवहार किया तो परिवार, प्रतिष्ठा, समाज--तुमने अगर ऐसा व्यवहार किया तो तुम्हारा अहंकार दीन होगा, तुम्हारी प्रतिमा खंडित होगी। और समाज सब भांति दंड देता है गलत करने वाले को--अदालत है, मुकदमे हैं, प्रतिष्ठा है, सब नष्ट हो जाती है।
यह भी व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक का ही खयाल है।
इसलिए मेरा सारा जोर इस बात पर है कि तुम कभी अपने को किसी और के द्वारा जबरदस्ती किसी सांचे में ढाले जाना स्वीकार मत करना। उसी भांति तुम आत्मा को खोते हो। आत्मा का एक ही अर्थ है, तुम्हारी स्वतंत्रता। स्वतंत्रता का एक ही अर्थ है, तुम्हारे बुरे और भले होने की स्वतंत्रता। तुम चाहो तो बुरे हो सको, चाहो तो भले हो सको। यह चाह तुम्हारी ही हो। इस पर कोई बाहरी नियंत्रण न हो। तो ही तुम्हारे भीतर आत्मा का आविर्भाव होता है, विकास होता है।
यह भी हो सकता है कि मनुष्य की जाति को, पूरी पृथ्वी को अपराधों से मुक्त कर दिया जाए। यह भी हो सकता है कि सारे बुरे काम करने वाले लोग जबरदस्ती बदल दिए जाएं। लेकिन उससे लाभ न होगा। पृथ्वी सूनी हो जाएगी। यंत्र दिखाई पड़ेंगे--मानव यंत्र। मनुष्य खो जाएगा। मनुष्य की गरिमा खो जाएगी। वह अच्छी पृथ्वी भी मुर्दा होगी, जीवंत न होगी।
तुम जीवंत हो तुम्हारी भीतरी स्वतंत्रता के कारण, तुम्हारे चुनाव की क्षमता के कारण। तुम बुरे हो तो अपनी मर्जी से हो। तुम भले हो तो अपनी मर्जी से हो। तुम्हारी मर्जी के ऊपर कोई भी मर्जी थोपी जाए, वह तुम्हें नष्ट करेगी।
इसलिए बहुत बड़ा खतरा व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक से पैदा हुआ है। क्योंकि उसने बड़े सूक्ष्म इंतजाम खोज रखे हैं।
स्किनर ने विद्युत के इलेक्ट्रोड बनाए हैं। वे मस्तिष्क के भीतर रखे जा सकते हैं। किसी न किसी दिन कोई चीन, कोई रूस, कोई तानाशाही हुकूमत उनका उपयोग करेगी। यह असंभव है, जब भी कोई चीज ईजाद कर ली जाती है तो उसके उपयोग से बचना बहुत असंभव है। और जब उपयोग इतना ज्यादा लाभदायी हो राज्य के लिए, समाज के लिए। छोटा बच्चा पैदा होगा तभी एक छोटा सा आपरेशन--मां-बाप को पता भी न चलेगा--उस बच्चे के मस्तिष्क में एक छोटा सा इलेक्ट्रोड डाल दिया जाएगा। वह जीवन भर काम करेगा।
उस इलेक्ट्रोड के डाले जाने के बाद, दूर दिल्ली में बैठा हुआ राजनीतिज्ञ तुम्हें संचालित कर सकता है। जैसे रेडियो दिल्ली से संचालित होता है, तुम घर बैठे सुनते हो, ऐसा राजनीतिज्ञ दिल्ली से बैठ कर तुम्हारे मस्तिष्क को संचालित कर सकता है। वह तुमसे कहे कि अच्छे हो जाओ, सिगरेट मत पीओ, शराब मत पीओ; तुम न पी सकोगे। तुम्हें लगेगा, तुम्हारे भीतर की आत्मा तुमसे कह रही है कि सिगरेट मत पीओ, शराब मत पीओ। वह तुमसे कहे कि जाओ, मुसलमानों की हत्या कर दो या हिंदुओं को मार डालो। तो तुम कहोगे, यह अंतरात्मा की आवाज है। और यह आवाज इतनी प्रबल होगी कि तुम इससे लड़ न पाओगे। यह सिर्फ विद्युत यंत्र तुम्हारे भीतर काम कर रहा है। और तुम्हें संचालित किया जा सकता है।
व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक इस पृथ्वी पर इस समय सबसे ज्यादा खतरनाक प्रस्तावना लेकर मौजूद हैं। उन्होंने सब चीजें खोज ली हैं। वे कहते हैं, अब आदमी को बुरा होने की कोई जरूरत नहीं। असल में वे यह कहते हैं, अब आदमी को आदमी होने की कोई जरूरत नहीं। तुम थोड़ा सोचो कि तुम अगर जाकर मंदिर में पूजा कर लोगे क्योंकि तुम्हारे भीतर मस्तिष्क को दिल्ली से संचालित किया गया है और मंदिर में पूजा करने का आदेश मिला है, तुम्हारी पूजा का क्या मूल्य होगा? दो कौड़ी की भी नहीं होगी तुम्हारी पूजा। उससे तो बेहतर था तुमने कभी पूजा न की होती। कम से कम तुम तुम तो थे। अब तुम तुम नहीं हो। अब आत्मा नहीं है, अब दिल्ली तुम्हारी आत्मा है। अब तुम अपने मालिक नहीं हो, अब राज्य तुम्हारा मालिक है। और तुम्हें पता भी न चलेगा।
मनोवैज्ञानिकों ने शामक तत्व खोजे हैं--ट्रैंक्वेलाइजर्स। बहुत सूक्ष्म अब उनकी खोज हो गई है। उनका कहना है, कोई जरूरत नहीं है कि लोग उपद्रव करें, लड़ाई-झगड़ा करें, उनको समझाओ और भाषण दो, व्याख्यान दो, इस सबकी कोई जरूरत नहीं है। वह जो नगर का जलस्रोत है उसमें शामक द्रव्य मिला दो। पूरा गांव पानी तो पीएगा। किसी को पता भी नहीं चलेगा, लेकिन वह शामक द्रव्य तुम्हें भीतर से लड़ने की वृत्ति को शून्य कर देगा। लड़ने का भाव ही न होगा। तुम सुस्त पड़ जाओगे। तुम्हें पता भी न चलेगा। क्रोध पैदा न होगा। क्योंकि क्रोध को रासायनिक रूप से रोका जा सकता है।
या जब राज्य की इच्छा होगी कि अब हिंदुस्तानियों को चीनियों से लड़ाना है; कि चीनियों को रूसियों से लड़ाना है; तब वह तत्व बंद कर देगा और उसका विपरीत तत्व पानी में मिला देगा। तब तुम एकदम खूंखार जंगली जानवर की तरह हो जाओगे। तब तुम पागल की तरह लड़ोगे। अगर तुम्हें लड़ने का मौका न मिलेगा तो तुम खुद की आत्महत्या कर लोगे या घर को आग लगा दोगे। तुम चाहोगे कि कहीं कोई युद्ध हो जाए। तुम एकदम दीवाने हो उठोगे मरने-मारने को।
ये खतरनाक ईजादें हैं। मेरे देखे एटम बम से भी ज्यादा खतरनाक ईजादें हैं। क्योंकि एटम बम तुम्हारे शरीर को ही मार सकता है। ये खोजें तुम्हारी आत्मा को ही नष्ट कर देंगी। आदमी तब यंत्रवत होगा।
नहीं; व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक जो कहते हैं उससे मनुष्य श्रेष्ठ नहीं बनाया जाएगा, उससे मनुष्य मनुष्य ही न रह जाएगा। श्रेष्ठता तो स्वतंत्रता के सोपानों से उपलब्ध होती है। तुम मुझसे अगर परिभाषा पूछो श्रेष्ठता की, तो एक ही परिभाषा मेरे पास है: तुम जितने स्वतंत्र हो उतने श्रेष्ठ हो। तुम अगर परिपूर्ण स्वतंत्र हो तो तुम परम श्रेष्ठ हो। इसलिए हमने परम श्रेष्ठ को मुक्त कहा है। और परम श्रेष्ठता की अवस्था को मोक्ष कहा है।
मोक्ष का अर्थ है, तुम्हारी स्वतंत्रता इतनी आत्यंतिक है कि जगत की कोई भी शक्ति तुम्हारी स्वतंत्रता को रत्ती भर भी छीन नहीं सकती। तुम अपनी आत्मा के पूरे-पूरे मालिक हो गए हो। तुम्हारी मालकियत आखिरी है। इस पर अब कोई दावा नहीं है। लाख उपाय किया जाए, तुम्हें संचालित नहीं किया जा सकता। तुम अपने ही प्रकाश में जीने लगे हो। तुम अपने दीये हो गए हो। कोई दूसरा तुम्हें चलाता नहीं। तुम अपने प्राणों से चलते हो या अपने प्राणों से रुकते हो। तुम्हारी अंतर्वीणा पर किसी और की अंगुलियां नहीं हैं अब। तुम्हारी वीणा से तुम्हारा ही गीत पैदा होता है। तुम्हारे पैर तुम्हारी अपनी ही धुन पर नाचते हैं, किसी सरकार के युद्ध के बाजे पर नहीं, बैंड-बाजे पर नहीं। न किसी समाज के आधार पर। तुम अपनी अंतःप्रज्ञा, अपने बोध, अपने भीतर के प्रकाश से चलते हो।
माना कि वह प्रकाश सूरज जैसा नहीं है, छोटे दीये जैसा है। पर उतना काफी है। चलने के लिए कोई सूरज नहीं चाहिए। चलने के लिए तो छोटा दीया काफी है। चार कदम जमीन दिखाई पड़ जाए, बस इतना काफी है। जब तुम चार कदम चल लोगे, आगे चार कदम जमीन दिखाई पड़ने लगेगी। कोई आदमी एक कदम से ज्यादा एक बार में तो चलता नहीं। एक कदम भी साफ-साफ दिखाई पड़ता रहे तो पर्याप्त है। और एक-एक कदम चल कर हजारों मील की यात्रा पूरी हो जाती है।
बुद्ध का आखिरी वचन इस पृथ्वी पर विदा होते वक्त स्मरण रखने योग्य है। वह वचन है: अप्प दीपो भव! अपने दीये खुद बनो!
तुम्हारी श्रेष्ठता तुम्हारी स्वतंत्रता से आविर्भूत होगी। हां, तुम्हारा आचरण दूसरे संचालित कर सकते हैं। इसलिए मैंने आचरण को नीति से ज्यादा जगह नहीं दी है। अंतस धर्म है; आचरण नीति है। नीति तुम्हें समाज के योग्य बना देती हो, परमात्मा के योग्य नहीं बनाती।
एक और नीति है जो तुम परमात्मा के योग्य बनते हो तब तुम्हारे जीवनमें प्रकट होती है। उस नीति का संगीत और! उस नीति का आनंद और! उस नीति की सुगंध स्वतंत्रता की है।
तो स्वतंत्रता को तुम कसौटी मानो। मोक्ष को लक्ष्य मानो। और इंच-इंच तुम्हें अपनी स्वतंत्रता को बढ़ाते जाना है। एक चेष्टा ध्यान में रखो कि तुम स्वयं ही होने को पैदा हुए हो, किसी और की प्रतिलिपि नहीं। किसी और को मान कर चलने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है। तुम्हारी नियति तुम्हारे भीतर छिपी है। अगर तुम्हें अपनी नियति पानी है तो स्वयं होने की उदघोषणा करते रहना। झुकना मत जबरदस्ती के सामने। गुलाम मत बनना। न किसी को गुलाम बनाना, न किसी के गुलाम बनना। अपनी स्वतंत्रता को बचाना और दूसरे की स्वतंत्रता की रक्षा करना। तो ही तुम्हारे भीतर श्रेष्ठ मनुष्य का जन्म होगा। अन्यथा कोई उपाय नहीं है।
ओशो, आरोपित दिखाऊ नीति से क्या समाज का काम चल जाता है? क्या उसे धर्म से उदभूत नीति की और संतों की आवश्यकता नहीं रहती है?
संत समाज की आवश्यकता नहीं है। समाज संत के बिना मजे से जी लेता है। सच तो यह है, संत के कारण समाज ठीक से नहीं जी पाता। संत एक बेचैनी पैदा करता है। संत दूसरे लोक का स्वप्न तुम्हें दे देता है। संत में तुम मूर्तिमान देख लेते हो अपना भविष्य। तुम व्याकुल हो जाते हो। तुम भी वैसे होने की अभीप्सा से भर जाते हो।
बुद्ध न होते, महावीर न होते, कृष्ण न होते, क्राइस्ट न होते, कबीर, दादू न होते--तुम अपनी दुकान पर मजे में होते। इन्होंने अड़चन पैदा कर दी। इन्होंने तुम्हारे भीतर एक स्वर जगा दिया, जो पूरा होना मुश्किल मालूम होता है। और जिसे बिना पूरा किए तुम्हें चैन भी नहीं मिल सकता। इन्होंने तुम्हें बेचैन किया। इन्होंने एक प्यास उठाई।
तुम भले थे अपने घर। बच्चे थे, पत्नी थी, सब ठीक चलता था। तुम्हें पता ही न था कि और भी होने का कोई ढंग है। तुम अपनी दुकान पर बैठे थे। ग्राहक थे, तिजोड़ी भरती थी। सब ठीक चलता था। सब ठीक ही था। तुम्हें पता ही न था कि तुम कंकड़-पत्थर बीनने में जीवन बिता रहे हो, हीरों के खजाने भी पास हैं।
संत के बिना समाज मजे से चलता है, कोई अड़चन नहीं है। संत के कारण ही अड़चन होती है। यह तो पहली बात समझ लो। क्योंकि संत तुम्हारे बीच अचानक तुम्हें चौंका देता है, जगा देता है। तुम नींद में खोए थे। तुम एक मधुर स्वप्न देखते थे कि तुम सम्राट हो; कि बड़ा तुम्हारा साम्राज्य है; कि स्वर्ण के तुम्हारे महल हैं। और संत तुम्हें बीच में जगा देता है, नींद तोड़ता है, सपना भी टूट जाता है। तुम संत पर नाराज होते हो। तुमने कभी किसी संत को माफ नहीं किया।
हां, संत जब मर जाता है, तुम उसकी पूजा करते हो। वह पूजा भी भुलाने का उपाय है। वह पूजा भी यह कहने का ढंग है कि तुम अलग ही तरह के व्यक्ति हो। अवतार हो। तुम बने ही और ढंग से। हम साधारण दीन-हीन मनुष्य हैं। हम तुम्हारे जैसे नहीं हो सकते। हम तो सिर्फ तुम्हारी पूजा कर सकते हैं। बस इतनी पूजा से ही तुम्हारा आशीर्वाद हो जाए और कुछ हो जाए तो ठीक। ज्यादा हमसे तुम अपेक्षा मत करना।
जिंदा संतों को तुम मारते हो, मुर्दा संतों की तुम मूर्तियां बनाते हो। क्योंकि मुर्दा संत तुम्हारी नींद को नहीं तोड़ते। उनसे तुम्हें कोई बेचैनी नहीं होती। मुर्दा संत तुम्हारी नींद के हिस्से हो जाते हैं। शायद मुर्दा संतों को तुम अपने सपनों में सजावट बना लेते हो। मुर्दा संतों को तुम अपने सपनों में ही एक हिस्सा बना लेते हो। तुम संत होने के भी सपने देखने लगते हो। तुम्हारी पूजा-अर्चना चल पड़ती है, धूप जलने लगती है, दीये जल जाते हैं। मंदिर सजते-संवरते जाते हैं। तुम्हारे जीवन में कभी मंदिर का कोई अवतरण नहीं होता।
लेकिन जिंदा संत तुम्हें चौंकाता है, तुम्हारी नींद को तोड़ता है। उससे तुम नाराज होते हो। तुमने जीसस को सूली दी, तुमने महावीर पर पत्थर फेंके, तुमने सुकरात को जहर पिलाया। और यह तुम्हारा सदा का व्यवहार रहा है। और मैं जानता हूं कि उसका कारण साफ है। कारण यह है कि यही लोग हैं जिन्होंने तुम्हारे जीवन की चैन छीन ली। यही लोग हैं जिन्होंने तुम्हें चौंकाया और एक झलक दिखा दी दूर के लोक की। अब कभी भी, लाख तुम उपाय करो, तुम ठीक से न सो पाओगे। तुम सोओगे और वह धुन बजती रहेगी। कोई दूर की पुकार पुकारती रहेगी। अब तुम्हारी नींद पुरानी जैसी न हो पाएगी। कुछ भी तुम उपाय करो--मारो पत्थर, जहर दो, गोली लगाओ, सूली पर चढ़ा दो--लेकिन तुम भूल न पाओगे। जीसस तुम्हारा पीछा करेंगे। सूली पर लटके हुए पीछा करेंगे। रह-रह कर तुम्हें याद आएगी। तुम्हें बेचैनी होगी।
संत के बिना समाज मजे से जीता है। संत आवश्यक नहीं है। हो भी नहीं सकते आवश्यक; क्योंकि संत की कोई उपयोगिता नहीं है। वह तो जीवन का परम काव्य है। कविता की कोई उपयोगिता है? कविता के बिना जिंदगी नहीं होगी, ऐसा तुम सोचते हो? क्या अड़चन आएगी? न हो कविता तो संसार के किस रास्ते पर कौन सी अड़चन पड़ेगी? कवि खो जाएं संसार से तो दुकान के व्यवहार में, घर के व्यवहार में, गृहस्थी में, संसार में, प्रपंच में कौन सा नुकसान हो जाएगा? कवियों के होने से कौन सी सहायता मिल रही है?
संगीत खो जाए संसार से तो क्या फर्क पड़ेगा नोटों की दुनिया में? संगीत को ढाल कर रुपये तो बनाए भी नहीं जा सकते। रुपये को पिघला कर भी संगीत पैदा नहीं होता।
नहीं; जीवन में कुछ चीजें हैं जो उपयोगी हैं और कुछ चीजें हैं जो गैर-उपयोगी हैं। सार्थकता उनकी भला हो, लेकिन उपयोग कुछ भी नहीं है।
तो संत तो शुद्ध काव्य है, शुद्ध संगीत है। इतना शुद्ध कि उसको उठाने के लिए वीणा की भी जरूरत नहीं है। और इतना शुद्ध काव्य कि उसके लिए शब्द भी आवश्यक नहीं हैं। शून्य में ही उसकी गूंज है। संत तो आखिरी बात है मनुष्य के बाबत, शिखर है गौरीशंकर का। उसका उपयोग क्या है? बाजार में बेचोगे? क्या करोगे गौरीशंकर का? क्या उपयोग है? दूर से दर्शन कर लो। सुंदर है, महिमावान है, उसके हिम से लदे शिखर थोड़ी देर को आंखों को मोह लेते हैं। फिर तुम वापस अपने बाजार में लौट जाते हो। गौरीशंकर न हो, बंबई में कुछ फर्क पड़ेगा? गौरीशंकर के होने से बंबई में क्या फर्क पड़ रहा है? कोई फर्क न पड़ेगा।
संतों के न होने से संसार में कोई फर्क न पड़ेगा। संत की कोई उपयोगिता नहीं। न बेच सकते, न खरीद सकते। न उसके रुपये ढाल सकते। न उससे तोपें बना सकते, न बम के गोले बना सकते। वह न युद्ध के काम का है, न शांति के काम का है। किसी काम का नहीं है।
फिर संत का क्या उपयोग है?
वह एक महिमा है, एक सौंदर्य है, एक संगीत है। उसे देख कर तुम्हारे भीतर सपने जगते हैं। उसे देख कर तुम्हारे भीतर एक अभीप्सा उठती है। उसे देख कर तुम्हारे भीतर छिपा हुआ अंकुर कसमसाता है और तुम्हारे बीज को तोड़ कर बाहर आना चाहता है। उसे देख कर तुम्हारे भीतर पहली दफा यह खयाल उठता है: अगर हड्डी-मांस-मज्जा के बीच इस तरह की घटना घटती है, ऐसा महिमा का रूप प्रकट होता है, तो मैं चूक रहा हूं। सभी कुछ मेरे पास भी है। यह घटना से मैं वंचित रह गया हूं। जीवन को मैं उसके पूरे शिखर पर न ले जा सका। मैं बाजार की गलियों-गलियारों में ही भटकता रहा, मंदिर तक मेरी पहुंच न हो पाई। मैंने बहुत द्वार खटखटाए, लेकिन सब द्वार संसार के थे। मैंने वह द्वार नहीं खटखटाया, जहां ऐसी महिमा का आविर्भाव होता है। कोई उपयोग नहीं है जिसका, लेकिन जिसके बिना पूरा जीवन निरुपयोगी है।
संतत्व का कोई उपयोग नहीं है, लेकिन संतत्व के बिना सारा जीवन गैर-उपयोगी है। संतत्व इस लोक की घटना नहीं है। इस लोक में किसी परा-लोक का अवतरण है। जैसे अंधेरे में एक किरण उतर आए। उस अंधेरे में उस किरण का कोई संबंध नहीं है; विजातीय है, विदेशी है।
संत सदा विदेशी है। वह तुम्हारे देश का कभी भी नहीं है। वह परदेशी है, अजनबी है। वह तुम्हारे बीच होता जरूर है, लेकिन तुम्हारे बीच से नहीं है। इसलिए तुम सदा उसके साथ बेचैनी भी अनुभव करते हो। न वह तुम्हारी भाषा समझता, न तुम उसकी भाषा समझते। न वह तुम्हारे ढंगों को राजी होता, न तुम उसके ढंगों को राजी होते।
लेकिन फिर भी तुम उसके सान्निध्य में अनुभव करते हो--कुछ हुआ है। कुछ हुआ है, जो जब तक तुम्हें न हो जाएगा तब तक तुम्हें बेचैनी पकड़ी रहेगी। कुछ घटना घटी है--अनबूझ है, अज्ञात है। पकड़ में नहीं आती। मुट्ठी बांधते हो, छूट-छूट जाती है। परिभाषा में नहीं बंधती; शब्दों के आंटने में नहीं अंटती। लेकिन कुछ हुआ है। उसका संस्पर्श तुम्हें होता है। तुम्हारे प्राण भीतर पुलकित होते हैं, डांवाडोल होते हैं। ऐसा ही कुछ तुम्हारे जीवन में भी हो, तभी तुम्हारे जीवन की उदासी, तभी तुम्हारे जीवन की ऊब, तभी तुम्हारे जीवन पर जम गई राख झड़ेगी। तुम्हारे भीतर का अंगारा निखरेगा, ज्योतिर्मय का जन्म होगा।
संत आवश्यक नहीं है, क्योंकि उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। वह कोई कमोडिटी नहीं है। अर्थशास्त्र में उसकी कहीं कोई जगह नहीं है। राजनीति में उसके लिए कहीं कोई स्थान नहीं है। बाजार में उसे तुम कहां बिठाओगे? वह जहां जाएगा तुम्हारे संसार में, वहीं अजनबी होगा। उसका तुम कोई भी उपयोग नहीं कर सकते। लेकिन फिर भी, तुम उसे देखते ही तत्क्षण पहचान लोगे कि यही तुम्हारे भीतर भी होना चाहिए, अन्यथा तुम्हारा जीवन व्यर्थ गया।
इसलिए तो संतों के पास जाने से लोग डरते हैं। बुद्धपुरुष गांव से गुजर जाते हैं। तुम अपनी तराजू लिए दुकान पर बैठे रहते हो, कूड़ा-करकट तौलते रहते हो। बुद्धपुरुष तुम्हारे द्वार से निकल जाते हैं। तुम्हें फुरसत नहीं होती, तुम अपने ग्राहक से बात करते रहते हो। बुद्धपुरुष तुम्हारे द्वार पर दस्तक भी दे जाते हैं। तुम कहते हो, आगे बढ़ जाओ, क्योंकि अभी फुरसत नहीं है।
तुम बचे हो। तुम्हारे बचने का कारण भी साफ है। तुम्हें अनजाने ही एक बात का अहसास है कि ऐसे लोगों के पास जाना खतरनाक हो सकता है। खतरनाक है! तुम्हारा अहसास बिलकुल सही है। खतरनाक है, क्योंकि तुम फिर वही न हो सकोगे जो तुम थे। तुम्हारी नींद सदा के लिए छिन जाएगी। तुमने जिसे सुख माना था, वह दुख दिखाई पड़ने लगेगा। और तुमने जिस लोक के संबंध में कभी सोचा भी न था, वही लोक तुम्हारे जीवन का केंद्र बन जाएगा, उसी की तरफ तुम चुंबक की तरह खिंचे हुए चलने लगोगे।
नहीं, समाज संत के बिना मजे से चलता है। कोई जरूरत नहीं है। लेकिन संत के बिना समाज बिलकुल मुर्दा है। हो या न हो, बराबर है। संत के होने में ही तुम्हारा भविष्य पहली दफा झलकता है। जैसे बिजली कौंध जाए अंधेरी रात में और रास्ता तुम्हें आगे तक का दिखाई पड़ जाए। फिर बिजली खो जाती है। अब तुम्हें रास्ता दिखाई नहीं पड़ता, तुम अंधेरे में फिर खड़े हो। लेकिन अब तुम वही नहीं हो जो बिजली कौंधने के पहले थे। रास्ते की झलक मिली है। अब अगर तुम न चल पाओ रास्ते पर तो तुम्हारी अपनी भूल होगी। तुम अपने को क्षमा न कर पाओगे अब। रास्ता है। टटोलने की बात है। थोड़ा खोजने की बात है।
संतत्व इस जगत में परमात्मा की अभिव्यक्ति है।
परमात्मा का क्या उपयोग हो सकता है? तुमने कभी सोचा कि परमात्मा का क्या उपयोग हो सकता है? परमात्मा से ज्यादा निरुपयोगी कोई चीज है संसार में? किसी भी तो काम का नहीं है। लेकिन जो परम उपयोगी है वह निरुपयोगी दिखाई पड़ेगा। क्योंकि उसका उपयोग वस्तुओं के अर्थ में नहीं है; उसका उपयोग आत्मा के अर्थ में है।
ऐसा समझने की कोशिश करो, तुम्हारे जीवन में भी कुछ भीतरी चीजें हैं जिनका कोई उपयोग नहीं है। प्रेम के बिना क्या अड़चन आ जाएगी? प्रेम के कारण ही अड़चन आती है। अगर प्रेम बिलकुल न हो तुम्हारे जीवन में तो तुम जितने कुशल व्यवसायी हो सकोगे, क्या प्रेम के रहते हो सकोगे? कभी ग्राहक पर प्रेम आ जाएगा। कभी जिसकी तुम जेब काट रहे थे उस पर प्रेम आ जाएगा। कभी किसी ऐसे पर प्रेम आ जाएगा, तुम अपने धन को लुटा देना चाहोगे।
नहीं, प्रेम गड़बड़ ही करता है। उससे कुछ हल नहीं होता। कुछ मिलता नहीं है, कुछ खोता है। इसीलिए तो जो होशियार लोग हैं वे प्रेम नहीं करते। जो बहुत कुशल हैं, वस्तुतः संसारी हैं, वे प्रेम से सदा चार कदम दूर रहते हैं। वे ऐसी झंझट में नहीं पड़ते। विवाह कर लेते होंगे, प्रेम नहीं करते। क्योंकि विवाह तो सिक्कों की दुनिया की बात है। वह अर्थशास्त्र का हिस्सा है। वह तो वहीं है जहां बाजार है। इसीलिए तो विवाह करने वाला खुद नहीं सोचता। क्योंकि जवान आदमी है! बाजार के संबंध में अभी बहुत कुशल नहीं है। उसका बाप सोचता है, उसकी मां सोचती है। वे ज्यादा कुशल हैं। बाजार उन्होंने काफी देखा है। संसार देखा है।
अनुभवी जिनको तुम कहते हो--अनुभव का मतलब ही क्या है तुम्हारी दुनिया में? कुछ ठीकरे उन्होंने ज्यादा इकट्ठे कर लिए हैं, तिजोड़ी उनके पास थोड़ी बड़ी है। सपने उन्होंने ज्यादा देर तक देखे हैं, नींद उनकी लंबी है। पचास-साठ साल, सत्तर साल रह चुके हैं। बाजार का रोआं-रोआं परिचित है। वे विवाह तय करते हैं। उसमें भी कहीं भूल-चूक न हो जाए, तो पंडित और ज्योतिषी की भी सलाह ले लेते हैं कि चांद-तारे भी इस धंधे में सहयोगी हैं या नहीं! कहीं चांद-तारे विपरीत तो नहीं हैं! सब बिठा लेते हैं हिसाब। विवाह हिसाब से होता है, गणित से। ज्योतिष गणित है। गणित और हिसाबी आदमी विवाह का इंतजाम करता है।
स्वभावतः बच्चे कैसे यह इंतजाम कर सकते हैं? बच्चों से डर है। बच्चे प्रेम में पड़ सकते हैं।
इसलिए जो बहुत कुशल जातियां हैं, जैसे हिंदू, वे बाल-विवाह करते थे। प्रेम के होने के पहले ही, प्रेम की संभावना के पहले ही विवाह कर दो। दस साल, बारह साल--बहुत! क्योंकि चौदह साल के बाद खतरा शुरू होगा। अगर कहीं एक दफा प्रेम की किरण उतर गई, तो विवाह सदा के लिए फीका हो जाएगा। उसे उतरने ही मत दो। इसके पहले कि असली सिक्के का कोई अनुभव हो, नकली सिक्के को हाथ में रख दो। इसके पहले कि असली सिक्के की आकांक्षा जगे, नकली सिक्के की सांत्वना में डुबा दो। प्रेम को मार ही डालो। प्रेम का कोई उपयोग तो नहीं है।
इसलिए बड़े-बूढ़े प्रेम पर हंसते हैं। वे कहते हैं, करोगे क्या प्रेम का? कुल देखो, धन देखो, दहेज देखो। प्रेम का क्या करोगे? प्रेम से कहीं पेट भरता है? कि प्यासे हो तो प्यास बुझती है? कि भूखे हो तो रोटी मिलती है? प्रेम का क्या करोगे? पागल हो गए हो? समझ से काम लो। विवाह साथ देता है।
प्रेम बिलकुल गैर-जरूरी बात है। उसके बिना मजे से चल जाता है। क्या अड़चन है? करोड़ों-करोड़ों लोग बिना प्रेम के जी रहे हैं। कौन सी अड़चन आ गई है? हां, जिन्होंने प्रेम किया--कोई मजनू, कोई फरिहाद, कोई लैला, कोई शीरी--वे तकलीफ में हैं। उन्होंने समझदारों की न मानी। अपनी नासमझी में उतर गए।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, उन्होंने सब खो दिया हो तो भी उन्होंने कुछ पाया। बाजार बिलकुल लुट गया हो, दुकान बिलकुल नष्ट हो गई हो, दिवाला निकल गया हो, कुछ भी न मिला हो संसार के अर्थों में, लेकिन प्रेम की एक किरण भी मिली, तो प्रार्थना की खबर मिली, तो परमात्मा का इशारा मिला।
गणित सीखने का फायदा है। कविता करने का क्या फायदा है? कवि होकर क्या हो जाएगा? उसे तुम भंजा न सकोगे। गुनगुनाते रहो भला, लेकिन गुनगुनाने से कहीं जीवन चला है! रास्ता चलना है तो रास्ते के हिसाब को मानना पड़ेगा। गणित सीखो, इंजीनियरिंगसीखो, व्यवसाय सीखो। कविता का क्या करोगे? गद्य में जीओ। उसकी जीवन में जरूरत है। पद्य का क्या उपयोग है?
लेकिन जिसने जीवन में पद्य न जाना, उसे परमात्मा की खबर ही न मिलेगी। पुराने प्राचीन शास्त्र सभी पद्य में हैं। इशारा है वह कि परमात्मा का रास्ता गद्य का नहीं है, पद्य का है। उपयोग का नहीं है, आनंद का है।
सुबह तुम घूमने निकलते हो। तब तुम कहां जा रहे हो? कहीं पहुंचना है? कहीं भी नहीं पहुंचना है। वही रास्ता है जिससे तुम रोज दफ्तर जाते हो, सुबह घूमने जाते हो। कभी रात आकाश खुला होता है, तारों से भरा होता है, तब तुम घूमने निकल पड़े हो। एक गीत गुनगुनाते हो, मस्ती से चलते हो। उसी रास्ते से तुम दफ्तर और दुकान भी जाते हो, तब तुम्हारी मस्ती कहां खो जाती है? रास्ता वही, वृक्ष वही, तुम वही; सब कुछ वही है। लेकिन जब तुम दफ्तर जा रहे हो तब रास्ते का काव्य समाप्त हो गया। तब रास्ता गद्य है, पद्य नहीं। तब तुम मतलब से जा रहे हो। तब एक स्वार्थ है। तब एक लक्ष्य है। तब फलाकांक्षा है। तुम कुछ पाने जा रहे हो। तुम्हें इस रास्ते के किनारे खड़े वृक्षों से कोई लेना-देना नहीं है। आकाश में तारे होंगे, होंगे। तुमसे कोई संबंध नहीं है। तुम्हारी नजर रुपयों पर लगी है। तुम दफ्तर की तरफ भागे जा रहे हो।
फिर किसी दिन इसी रास्ते पर तुम हो--तुम भी वही, चांद-तारे वही, वृक्ष वही, सूरज वही, सब वही--लेकिन तुम टहलने निकले हो। तुम कहीं जा नहीं रहे हो। तुम सिर्फ मौज में हो। तुम श्वास लेने का आनंद ले रहे हो। तुम चलने का मजा ले रहे हो। चलने में एक लय है, एक नाच है, एक नृत्य है। तुम नाचते हुए निकले हो। सब कुछ बदल जाता है।
जीवन को देखने के दो ढंग हैं: एक गद्य, एक पद्य। गद्य का उपयोग है। अगर ग्राहक से बात करनी हो तो कविता में मत करना। सीधा-साफ गद्य जरूरी है। लेकिन अगर प्रेमी से बात करनी हो तो गद्य काम आएगा? नहीं आएगा। वहां सीधी-सादी बात की कोई जगह नहीं है। वहां पद्य काम आएगा। जिसमें इशारे तो होते हैं, लेकिन बड़े धुंधले होते हैं; चांद-तारों की तरह होते हैं। जिसमें रोशनी तो होती है, लेकिन ऐसी नहीं होती कि आंखें चौंधिया जाएं। लुभाती है, बुलाती है। साफ भी होता है और रहस्य भी होता है। प्रेम की बात कहनी हो तो कविता में ही कही जा सकती है। लेकिन कविता का कोई उपयोग नहीं है।
तुम्हारे जीवन में अगर उपयोग ही उपयोग है, तो तुम मुर्दा हो। तुम्हारे जीवन में अगर उपयोग के साथ-साथ, समानांतर उसकी भी धारा चल रही है, जिसका उपयोग तो नहीं है, महिमा बहुत है--प्रेम की। कभी तुम घूमने भी जाते हो--बेमतलब। कभी तुम राह पर किसी अजनबी से भी नमस्कार कर लेते हो--अकारण। न इससे नौकरी चाहनी है, न इससे पैसा मांगना है, न इससे कुछ लेना-देना है। इससे कोई पहचान भी नहीं है। पर हाथ जोड़ने का आनंद ही काफी है। अपरिचित के सामने झुकने का मजा काफी है। अजनबी को अपना बना लेने का आनंद काफी है। क्षण भर को अजनबी से अजनबीपन मिट जाए। दो अनजान मिले, झुके, एक-दूसरे में झांके--पर्याप्त है। एक गीत का जन्म हो गया। अगर तुम्हारे जीवन में उपयोग के साथ-साथ अनुपयोगी लेकिन सार्थक, अनुपयोगी लेकिन महिमावान, अनुपयोगी इस जगत की दृष्टि में लेकिन उस परमात्मा की दृष्टि में जिसकी परम सार्थकता है, वह भी चल रहा है, तो मैं तुम्हें संन्यासी कहता हूं।
तुम कहोगे, जब अनुपयोगी इतना महिमावान है, तो फिर हम उपयोगी को छोड़ कर हिमालय क्यों न चले जाएं?
वह पुराने संन्यासियों ने किया था। मैं उस पक्ष में नहीं हूं। क्योंकि मेरा मानना है कि वह जो अनुपयोगी है, उसके सहारे तुम जी न सकोगे। उसके बिना तुम जी सकते हो, तुम्हारे जीवन में काव्य न होगा। उसके सहारे तुम जी न सकोगे। काव्य होगा, लेकिन तुम मर जाओगे।
ऐसा ही समझो कि कविता से कोई पेट तो नहीं भरता। अगर भूखा आदमी कविता करता रहे, कितने दिन करेगा? आज नहीं कल मरेगा। और जब मरेगा तो कविता भी सूख जाएगी। लेकिन ध्यान रखना, पेट भर लेना ही कविता नहीं है। तुम कितना ही पेट भर लो, इससे कविता का कोई जन्म न हो जाएगा। तुम बिलकुल भरे पेट बैठे रहो, तो भी इससे कविता का जन्म न होगा। तुम बैठे रहोगे, बैठे-बैठे मर जाओगे।
रोटी जरूरी है, काफी नहीं है। आवश्यक है, पर्याप्त नहीं है। रोटी चाहिए ताकि कविता का जन्म हो सके। रोटी की भी सार्थकता यही है कि गैर-सार्थक पैदा हो जाए। शरीर चाहिए ताकि आत्मा का अनुभव हो सके। संसार चाहिए ताकि संन्यास का फूल खिल सके। इसलिए मैं हिमालय के पक्ष में नहीं हूं। मैं तुमसे कहता हूं, तुम्हारे इसी जीवन में समानांतर तुम एक और द्वार खोल लो। जैसे रेल की दो पटरियों पर ट्रेन दौड़ती है। दोनों समानांतर चलती हैं। कहीं मिलती नहीं पटरियां। मिल नहीं सकतीं। समानांतर हैं। मिलाने की कोई जरूरत नहीं। तुम्हारे जीवन की दो पटरियां हों--एक गद्य की, एक पद्य की। गद्य बाजार के लिए, गद्य गणित के लिए, गद्य रोटी-रोजी के लिए। पद्य अपने लिए, प्रेम के लिए, प्रार्थना के लिए, परमात्मा के लिए। संसार और परमात्मा दोनों तुम्हारे जीवन में साथ-साथ चलें, तो ही तुम संतुलित हो। मैं कहूंगा, तो ही तुम संयमी हो।
दुनिया में दो तरह के असंयमी हैं। एक, जिन्होंने रोटी को सब समझ लिया। दूसरे, जिन्होंने कविता को सब समझ लिया। वे दोनों असंयमी हैं। वे एक पटरी पर गाड़ी को दौड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। दुर्घटना होती है; यात्रा नहीं होती।
समाज का कामचलाऊ ऊपरी नीति से काम चल जाता है। उसे भीतरी नीति की जरूरत भी नहीं है। समाज को तुम्हारी आत्मा से प्रयोजन भी नहीं है। वह तुम्हारा प्रयोजन होगा, समाज को क्या प्रयोजन? समाज को तुम्हारे व्यवहार से प्रयोजन है।
तुम किसी से मिलने गए, तुम अच्छी तरह से मिले, नमस्कार की, प्रेमपूर्ण बातें कीं, सज्जन का व्यवहार किया, बात खतम हो गई। तुम भीतर सज्जन हो या नहीं, इससे उस आदमी को क्या लेना-देना! समाज के लिए नीति तो ऐसी है जैसे कार में स्प्रिंग लगे होते हैं। स्प्रिंग लगे हों कार में, तो रास्ते के गड्ढों की चोट नहीं पड़ती बैठे हुए यात्री को। स्प्रिंग चोट को सम्हाल लेते हैं। या जैसे ट्रेन के दो डब्बों के बीच में बफर लगे होते हैं। कभी कोई गड़बड़ हो जाए, अचानक इंजन को खड़ा होना पड़े, तो डब्बे टकरा नहीं जाते, एक-दूसरे पर चढ़ नहीं जाते। बीच के बफर धक्के को झेल लेते हैं।
समाज के लिए नीति तो बफर है, स्प्रिंग है। जब दो व्यक्ति मिलते हैं, अगर दोनों नैतिक ढंग से मिलें तो धक्का नहीं लगता। नहीं तो डब्बे टकरा जाएं। तुम अगर गाली देते ही से किसी को नमस्कार करो, तो धक्का लगेगा। गाली तुम्हें भीतर देनी हो, देते रहो। देते ही हो तुम। जिसको भी तुमने नमस्कार किया है, भीतर जरूर गाली दी है। क्योंकि तुम क्षमा कैसे करोगे इस आदमी को? आज ऐसी नौबत आ गई कि नमस्कार करना पड़ा।
मैंने सुना है, एक साधारण सिपाही युद्ध में बड़ी बहादुरी दिखाया और उसको पुरस्कार देने के लिए राज्य ने उसे कैप्टन बना दिया। जो उसका बड़ा सेनापति था, वह भी उससे बड़ा प्रसन्न था उसकी बहादुरी के कारण, उसने उसे अपना बॉडीगार्ड बना लिया। जब वे रास्ते पर चलते तो वह बड़ा सेनापति बड़ा हैरान होता, जब भी कोई सिपाही रास्ते पर मिलता और ठोंक कर सलाम करता, तो वह जो कैप्टन था इसके साथ जो कभी सिपाही रह चुका था, वह मन में कहता: वही तुम्हारे लिए! दि सेम फॉर यू। यह क्या मामला है? बार-बार, जब भी कोई नमस्कार करता, वह धीरे से कहता: दि सेम फॉर यू! वही तुम्हारे लिए। उसने पूछा कि यह मामला क्या है? यह किस तरह की आदत है? यह कौन सा ढंग है? यह बार-बार तुम क्या कहते हो?
उसने कहा, आपको मालूम नहीं। मैं सिपाही रह चुका हूं। ये सब गाली दे रहे हैं। भीतर गाली दे रहे हैं, ऊपर नमस्कार ठोंक रहे हैं। मैं जानता हूं, क्योंकि मैं भी सिपाही रह चुका हूं। तो मैं इनसे कहता हूं, वही तुम्हारे लिए। जो भीतर तुम कह रहे हो, वही! ऊपर की कौन फिक्र करता है?
जिसको भी तुम्हें नमस्कार करनी पड़ती है उसको तुम गाली दोगे ही। मगर गाली से क्या लेना-देना है! बाहर-बाहर तालमेल ठीक बैठ जाता है। बफर काम करते हैं।
नीति उपयोगी है। इसलिए तो दुकानों पर तख्ती लगी है: ऑनेस्टी इज़ दि बेस्ट पॉलिसी। पॉलिसी है वह। उसको तुम ज्यादा मत समझना। ईमानदारी, दुकानदार के लिए राजनैतिक कुशलता है, होशियारी है। उसके आधार पर वह धंधा चलाता है। अगर बेईमानी फैल जाए तो धंधा मुश्किल हो जाए। चोर भी जब आपस में संगठन बनाते हैं तो एक-दूसरे की चोरी नहीं करते। दस डाकू अगर हमला करके जाएं और आपस में एक-दूसरे की चोरी करने लगें तो संगठन नहीं चल सकता। डाकू आपस में ईमानदार होते हैं। ऑनेस्टी इज़ दि बेस्ट पॉलिसी!
दुकानदार भी सब आपस में ईमानदारी रखते हैं, नहीं तो बाजार खराब हो जाए। ग्राहक को लूटो, लेकिन दुकानदारों
को तो मत लूटो। चोर-चोर सगे बंधु होते हैं। वहां भी नीति चलती है। बुरे से बुरे लोगों के बीच भी संबंध बनाने के लिए नीति की जरूरत पड़ती है। दो चोरों को भी अगर संबंध बनाना हो, समाज बनाना हो, तो उन्हें कुछ नियम निर्धारित करने पड़ेंगे। चोरों का भी कोड ऑफ कंडक्ट होता है। उनका भी एक व्यवहार शास्त्र होता है--कैसे व्यवहार करना। चोर भी आपस में झूठ नहीं बोलते। नहीं तो काम ही मुश्किल हो जाएगा।
समाज के लिए नीति का अर्थ तुम्हारी आत्मा से नहीं है, तुम्हारे व्यवहार से है। तुम भीतर गाली देते हो, देते रहो। तुम भीतर छुरा चला रहे हो, चलाते रहो। ऊपर तुम कुशलता से बात करो, मुस्कुराओ, व्यवहार ढंग का करो, बात खतम हो गई। समाज को तुम्हारे ऊपर से लेना-देना है। इसलिए समाज कहता है, तुम सज्जन हो जाओ; धार्मिक होने से हमें कुछ प्रयोजन नहीं है। धार्मिक होना तुम जानो। इस झंझट में हम नहीं पड़ते। तुम नास्तिक हो, भले रहो। ईश्वर को नहीं मानते, मत मानो। सिर्फ व्यवहार-कुशलता चाहिए।
तो धर्म की कोई जरूरत समाज को नहीं है। धर्म वैयक्तिक आवश्यकता है; भीतर की जरूरत है; व्यक्ति की जरूरत है। समाज तो बिना धर्म के चल सकता है। व्यक्ति नहीं चल पाएगा। व्यक्ति लड़खड़ा जाएगा, मर जाएगा, टूट जाएगा।
तो कामचलाऊ नीति, आचरणगत नीति समाज के लिए काफी है। उससे ज्यादा की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर तुम भी उसी पर राजी हो गए तो तुम्हारे भीतर रेगिस्तान रह जाएगा। तुम्हारे भीतर कभी वृक्ष हरे न होंगे। तुम्हारे भीतर कभी फूल न खिलेंगे। तुम्हारे भीतर मरूद्यान की संभावना ही समाप्त हो गई। तुम दूसरों के साथ कितने ही व्यवहार-कुशल हो जाओ, तुम अपने साथ नासमझी में पड़े रहोगे। आत्म-अज्ञान तुम्हारा गहरा रहेगा।
इसलिए मैं कहता हूं, नीति सामाजिक व्यवहार-कुशलता है। धर्म तुम्हारी आत्मा की भूख है।
नास्तिक समाज भी नैतिक होते हैं। रूस भी नैतिक है। शायद धार्मिक समाजों से थोड़ा ज्यादा ही नैतिक है। क्योंकि धर्म की तो कोई बात ही न बची। अब तो नीति पर ही पूरा भरोसा करना पड़ेगा। इसलिए नीति को खूब जोर से ठोंका-पीटा गया है। तो रूस की नैतिकता तुम्हारी नैतिकता से ज्यादा है। लेकिन धर्म का कोई सवाल नहीं है। धर्म तो अफीम का नशा है। नीति की जरूरत है।
मैं तुमसे कह रहा हूं कि नीति की बाहर की जरूरत को तुम्हें पूरा करना हो करना, लेकिन ध्यान रखना, वह बाहर की जरूरत है। वह तुम्हारे भीतर का अंतर्नाद नहीं है। उसी को सब मत समझ कर समाप्त हो जाना। व्यवहार-कुशल रहना; मैं नहीं कहता हूं कि अकारण जाकर लोगों से झगड़ने लगना, कि गलत व्यवहार करने लगना; बिलकुल ठीक व्यवहार करना। रास्ते पर बाएं चलने का नियम हो तो बाएं ही चलना। कोई मतलब नहीं है दाएं चलने से, बीच में चलने से, उपद्रव खड़ा करने से। तुम भी मुसीबत में पड़ोगे। नीति को मानना, लेकिन जानना कि बस सभी नीतियां रास्ते पर बाएं चलने के नियम जैसी हैं। खेल के नियम हैं। इतनी भीड़-भाड़ है, उनको मानना जरूरी है।
लेकिन इतना मत समझ लेना कि तुम नैतिक हो गए तो तुम धार्मिक हो गए। कि तुम रास्ते पर सदा बाएं चलते हो; पुलिसवाला न भी खड़ा हो, लेकिन अगर लाइट कहती है कि रुक जाओ, तो तुम रुके रहते हो; किसी को गाली नहीं देते, किसी को धोखा नहीं देते, सब तरह से अपने को सम्हाल कर रखते हो; इसको ही तुम सब मत समझ लेना। इससे तुम्हारे भीतर की समाधि थोड़े ही जन्मेगी! रास्ते पर बाएं चलने से ध्यान का क्या संबंध है? किसी को गाली न देने से, किसी को चोट न पहुंचाने से तुम्हारे भीतर समाधि कैसे पैदा हो जाएगी?
अगर ऐसा होता, तब तो जो जंगलों में भाग गए, वे लोग ठीक हैं। वे भागे इसीलिए। उन्होंने देखा कि यहां रहेंगे तो झंझट होगी ही। किसी न किसी से टकरा ही जाएंगे। भाग जाओ एकांत में। न होगा कोई दूसरा, न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। जब दूसरा ही न होगा तो अनीति हम कैसे करेंगे? आखिर झूठ भी बोलने के लिए कोई तो चाहिए जिससे झूठ बोलो। धोखा देने के लिए भी कोई तो चाहिए जिसको धोखा दो। धोखा एकांत में किसको दोगे? कोई अपनी ही जेब थोड़े ही काट लोगे। क्या करोगे? इसलिए तो लोग एकांत में भागे। एकांत में भागने का आकर्षण इसलिए आया कि उन्होंने देखा कि यहां रहेंगे तो झंझट कुछ न कुछ होगी ही। भाग जाओ एकांत में। जहां न रास्ते हैं, न रास्तों पर लगे प्रकाश हैं। न रुकना पड़ता है, न बाएं चलना पड़ता है। जहां से चलो वही रास्ता है। जैसे चलो--कोई कहने वाला नहीं।
लेकिन सिर्फ जंगल में भाग जाने से तुम धार्मिक न हो जाओगे। हां, यह बात सच है कि नैतिक होने की जरूरत न रह जाएगी। अनैतिक होने का बोध न होगा। न कोई गाली देगा, न क्रोध आएगा। न कोई प्रलोभन होगा, न कोई वासना जगेगी। लेकिन तुम भीतर तो वही रहोगे जो हो। हजार साल जंगल में रह कर लौटोगे बाजार में, फिर पाओगे कि तुम वही के वही हो।
मैंने सुना है कि एक संन्यासी तीस वर्ष हिमालय में रहा। क्रोध था जीवन में, घृणा थी, ईर्ष्या थी, दंभ था। उन्हीं के कारण भाग गया था। तीस साल किसी का भी पता न चला। न क्रोध आया, न अहंकार का पता चला। अहंकार के लिए भी दूसरे की मौजूदगी जरूरी है। अगर तुम अकेले अपने कमरे में बैठे हो, निरहंकारी होते हो। दूसरा आदमी कमरे में आया, अहंकार उठा। अहंकार भी अकेले में कैसे उठेगा? उसे दूसरों का सहारा चाहिए। अहंकार लंगड़ा है। दूसरों के कंधों की बैसाखी चाहिए। पता ही नहीं चला अहंकार का तीस साल में। उसे लगा, मैं परम शांत हो गया। सब ठीक हो गया। अब मैं उतर सकता हूं। वापस जा सकता हूं।
वह उतर कर आया। हरिद्वार में उतरा। वहां मेला भरा हुआ था। तीस साल जो एकांत में रहा, हिमालय की शांति में रहा, वह अचानक बाजार में आ गया। किसी आदमी का पैर उसके पैर पर पड़ गया। वह भूल गया तीस साल। वे लंबे तीस साल, शांति, मौन, एकांत--सब गया। उसका पैर पड़ते ही उसने उसकी गर्दन पकड़ ली और उसने कहा, समझा क्या है? किसके पैर पर पैर रख रहा है?
जब उसने उसकी गर्दन दबाई तब उसे याद आया कि यह मैं क्या कर रहा हूं! इसी को बचने के लिए तो मैं तीस साल भाग कर हिमालय गया था। ये तो पानी में गए तीस साल। उतरा नहीं बाजार में कि वापस वही का वही हूं।
जंगल में जाने से कुछ भी न होगा। नीति की जरूरत न रह जाएगी, अनीति का पता न चलेगा, लेकिन धर्म थोड़े ही पैदा हो जाएगा! सच तो यह है कि लोगों के बीच रह कर तुम्हें निरंतर अपनी स्थिति का पता चलता रहता है। तुम्हारी साधना के साथ-साथ परीक्षा भी चलती रहती है। तुम कभी धोखे में नहीं पड़ सकते भीड़ में रह कर। क्योंकि भीड़ तुम्हें जताती रहेगी। भीड़ ऐसे मौके देगी कि तुम्हें पता चल जाए कि क्रोध है या नहीं है। नहीं होगा तो ही नहीं होगा। होगा तो भीड़ निकाल ही लेगी। भीड़ बड़ी कुशल है। कोई धक्का मार देगा, कोई पैर पर पैर रख देगा, कोई अकड़ कर देख लेगा, तुम नमस्कार करोगे, कोई जवाब न देगा। कुछ न कुछ हो जाएगा। आदमी न करेंगे कुछ तो कोई दूसरा कर देगा। केले के छिलके पर पैर फिसल जाएगा। केला ही शरारत कर देगा। चारों खाने चित्त गिर जाओगे, लोग हंस देंगे। उसी वक्त तुम्हें साफ हो जाएगा कि स्थिति कहां है। चित्त में पीड़ा उठ आएगी। बदला लेने का भाव उठ आएगा। सबके रास्तों पर केले के छिलके फैला देने की आकांक्षा पैदा हो जाएगी। सबको चारों खाने चित्त करके दिखलाने का विचार, योजना बनने लगेगी।
नहीं, जीवन प्रतिपल साधना और परीक्षा दोनों है। वह अध्ययन भी है और परीक्षण भी। वहां से भागना मत। वहीं रहना। वहां प्रतिपल कसौटी हो रही है--तुम्हारा सोना कितना पक्का, कितना मजबूत, कितना शुद्ध!
और सोने को शुद्ध करना हो तो नीति को काफी मत समझ लेना। नीति केवल दूसरे से संबंध है, धर्म अपने से। नीति दूसरे से संबंध है, धर्म अपने से। नीति दूसरे के साथ व्यवहार है, धर्म अपने से। धर्म है अपने एकांत में होने का ढंग--शांत, प्रफुल्ल, आनंदित, नृत्य करते हुए, अकारण उत्सव मनाते हुए। अपने भीतर अगर तुम निरंतर उत्सव को मना रहे हो, तो तुम धार्मिक हो।
और मैं तुमसे कहता हूं कि जिसके भीतर उत्सव है, उसके बाहर तो नीति अपने आप आ जाएगी। उसे साधनी न पड़ेगी, थोपनी न पड़ेगी। और जिसके भीतर उत्सव नहीं है, उसे नीति थोपनी पड़ेगी। थोपी हुई नीति कागज के फूल हैं। धर्म से आविर्भूत नीति असली फूल हैं।
ओशो, भगवान महावीर और महात्मा गांधी की अहिंसा में फर्क क्या है?
महावीर की अहिंसा धार्मिक है। महावीर के भीतर कुछ घटा है। उससे उनके आचरण में अहिंसा है। गांधी आचरण में कुछ घटा रहे हैं, इस आशा में ताकि भीतर कुछ घट जाए।
गांधी वैसे ईमानदार आदमी थे। और जो भी कर रहे थे वह भला गलत हो, लेकिन उन्होंने किया बड़ी निष्ठा से। उनकी निष्ठा में कोई संदेह नहीं है।
ऐसे ही जैसे कोई आदमी निष्ठापूर्वक रेत में से तेल निकालने की कोशिश कर रहा हो। उसकी निष्ठा में मैं शक नहीं करता। वह बड़े भाव से कर रहा है। बड़ा आयोजन किया है। जीवन लगा दिया है। लेकिन फिर भी मैं क्या कर सकता हूं! मैं यही कहूंगा कि रेत से तेल नहीं निकलता। तुम्हारी निष्ठा ठीक है, लेकिन निष्ठा क्या करेगी? यह तेल निकलेगा नहीं।
नैतिक, निष्ठावान, ईमानदार आदमी हैं। लुई फिशर ने गांधी के संबंध में एक लेख लिखा। और उसमें लिखा कि गांधी एक धार्मिक पुरुष हैं, जिन्होंने पूरे जीवन राजनैतिक होने की चेष्टा की है। गांधी ने तत्क्षण जवाब दिया कि यह बात उलटी है। मैं एक राजनैतिक व्यक्ति हूं, जिसने जीवन भर धार्मिक होने की चेष्टा की है।
उनकी ईमानदारी सौ टका है। इसमें कोई शक-शुबहा नहीं है कि वे कभी भी अपने संबंध में झूठ नहीं बोले हैं। लेकिन इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। वे राजनैतिक व्यक्ति हैं और उन्होंने जीवन भर धार्मिक होने की चेष्टा की है। इसमें मैं इतना और जोड़ देना चाहता हूं कि वह चेष्टा असफल हुई है। वे धार्मिक हो नहीं पाए। वे राजनीतिज्ञ ही विदा हो गए हैं।
फर्क नाजुक है। तो कई बार तो ऐसा लगता है, महावीर की अहिंसा तुम्हें दिखाई ही न पड़ेगी, गांधी की दिखाई पड़ेगी। क्योंकि गांधी की अहिंसा का बड़ा विस्तार है: आंदोलन हैं, क्रांति है, सारे विश्व पर इतिहास पर छाप है। महावीर की कौन सी छाप है? होगा, कोई चींटी न मरी होगी, वे सम्हल कर चले होंगे। चींटी कोई इतिहास लिखती है! कि उन्होंने पानी छान कर पीया होगा, कुछ कीटाणु न मरे होंगे। उन कीटाणुओं ने कोई शोरगुल मचाया? महावीर ने उस्तरे से अपने बाल न बनाए, क्योंकि कहीं कोई जूं पड़ गया हो और उस्तरे में दब कर मर जाए। उन्होंने बाल उखाड़े। वे केश-लुंच करते थे। साल भर में बाल उखाड़ डालते थे। लेकिन क्या अगर कोई जूं बच गया होगा बालों में इस भांति, वह कोई आत्मकथा लिखेगा कि इस महावीर ने हम पर बड़ी अहिंसा की?
महावीर की अहिंसा का कोई इतिहास थोड़े ही है! भीतर की घटना है। जिनके भीतर घटेगी वे ही पहचान सकते हैं। गांधी की अहिंसा तो हजारों साल तक याद रहेगी। उसके प्रमाण हैं। महावीर की अहिंसा का क्या प्रमाण है? इतना ही हम कह सकते हैं कि उन्होंने हिंसा नहीं की। अहिंसा की, ऐसा हम क्या कह सकते हैं?
इसको थोड़ा समझ लें। महावीर के जीवन को अगर हम गौर से देखें तो इतना ही कह सकते हैं कि उन्होंने हिंसा नहीं की। गांधी ने अहिंसा की। गांधी के कृत्य में अहिंसा है। महावीर के होने में अहिंसा है। और होना भीतर है, कृत्य बाहर है।
इसलिए गांधी की अहिंसा बहुत दफे डगमगा जाती है। क्योंकि वह नीति है, या राजनीति है। जीवन भर...जब जर्मनी ने फ्रांस और इंग्लैंड पर हमला किया दूसरे महायुद्ध में, तो गांधी ने पत्र लिखे इंग्लैंड और फ्रांस के नेताओं के नाम कि तुम समर्पण कर दो, हथियार डाल दो। लड़ो मत। देखें, कैसे तुम जीते जाओगे! हिटलर को निमंत्रण कर दो। उससे कहो, आ जाओ। वह रहना चाहे तो रहे तुम्हारी बस्तियों में। गांव खाली कर दो, मकान दे दो।
अहिंसक आदमी की सलाह! इंग्लैंड के नेता सिर्फ हंसे। क्योंकि इस बकवास में कौन भरोसा करे! और उन्होंने ठीक ही किया कि वे हंसे। क्योंकि जब भारत और पाकिस्तान का झगड़ा शुरू हुआ और कश्मीर में उपद्रव हुआ, तो गांधी ने सेनाओं को आशीर्वाद दिया कि जाओ। तब वे भूल गए कि उन्होंने इंग्लैंड को क्या सलाह दी थी हिटलर के समय। तब वे राजी आशीर्वाद देने को सेनाओं को। आकाश में उड़ते भारतीय वायुसेना के विमानों को देख कर वे प्रसन्न हुए। वे बमों से भरे हुए जा रहे हैं। किसी ने पूछा कि क्या आपका आशीर्वाद है इन विमानों के लिए? उन्होंने कहा, पूरा आशीर्वाद है। अगर पाकिस्तान सीधे-सीधे नहीं मानता तो युद्ध के सिवाय और कोई उपाय नहीं है।
हिटलर हमला करे इंग्लैंड पर तो हथियार छोड़ दो। पाकिस्तान हमला करे कश्मीर पर तो हथियारों को आशीर्वाद दो! राजनीति है। यह कोई महावीर की अहिंसा नहीं है। यह कुशल राजनीतिज्ञ की बात है। जब जैसी जरूरत पड़े तब वह अपनी नीति बदल लेगा। जब जैसी जरूरत हो, जिस चीज से लाभ हो।
इस बात से लाभ था भारत को। क्योंकि अंग्रेजों से भगतसिंह की तरह लड़ना तो पागलपन था। भगतसिंह होंगे बड़े शहीद, लेकिन दिमाग खराब। क्योंकि उस तरह कहीं कुछ हो सकता था! हल कुछ भी न था। ऐसे कोई बंदूक चला देने से और बम फेंक देने से धारासभा में कुछ मुल्क आजाद नहीं हो सकता था। आदमी हिम्मतवर थे। अपने को मिटाने को तैयार थे, बस! इससे कोई आजादी नहीं आ सकती थी। गांधी कुशल राजनीतिज्ञ थे। भगतसिंह नासमझ छोकरा; गांधी कुशल बुद्धिमान राजनीतिज्ञ। भगतसिंह ने अपने को मिटा लिया, गांधी ने पूरे मुल्क को बचाया। मगर उसमें कुशलता है राजनीति की। सारा खेल राजनीति का है।
एक बात गांधी को समझ में आ गई कि अंग्रेजों से लड़ कर तो जीतने का कोई उपाय नहीं है। और गांधी को यह भी समझ में आ गया कि अगर कोई भी संभावना कभी जीतने की है तो वह कुछ ऐसी विधि से जीतने की है कि अंग्रेज उसका प्रतिकार न कर पाएं। अहिंसा का कोई प्रतिकार करना अंग्रेजों की समझ के बाहर था। अब अहिंसा का प्रतिकार कैसे करो?
एक ही उपाय था कि गांधी अनशन करें तो वाइसराय भी अनशन करे। उसके लिए बड़ी तैयारी चाहिए। अहिंसा का प्रतिकार कैसे करो? एक आदमी छुरा लेकर लड़ने आए तो तुम बड़ा छुरा लेकर आ जाओ। लेकिन एक आदमी उपवास करे, अब तुम क्या करो? वाइसराय कोई महात्मा नहीं है। उपवास का भी बड़ा अभ्यास करना पड़ता है। गांधी ने चालीस साल अभ्यास किया तब वे कर सकते थे। या इंग्लैंड का बादशाह उपवास करे। तो उपवासों में टक्कर हो। फिर जिसका उपवास टिक जाए ज्यादा लंबा, वह जीत जाए।
ऐसा हुआ, मैंने सुना कि एक शरारती आदमी ने एक सज्जन आदमी के घर के सामने बिस्तर फैला दिया। और उसने कहा कि हम अनशन करते हैं, नहीं तो तुम्हारी लड़की से शादी करो। अहिंसात्मक आंदोलन कर दिया। आदमी घबड़ाया। गांव के लुच्चे-लफंगे, जिनको लोग राजनैतिक कहते हैं, वे सब इकट्ठे हो गए। उन्होंने कहा, यह आदमी ठीक कहता है। इसमें खराबी क्या है? और यह अहिंसात्मक आंदोलन कर रहा है। कुछ बुरा भी नहीं कर रहा है। सर्वोदयी है। यह कहता है, हम मर जाएंगे, या शादी करो। हम अपना जीवन देने को...किसी को डरा-धमका तो रहा नहीं है। किसी को छुरा नहीं बता रहा है। पुलिस भी कुछ नहीं कर सकती। पुलिस भी खड़ी हो गई। पुलिस भी क्या करे? यह किसी को मारने की धमकी दे, छुरा लाए, कुछ करे...यह तो बेचारा यह कह रहा है कि हम मर जाएंगे। सत्याग्रह कर रहे हैं।
दो दिन में तो पूरा गांव उसके पक्ष में हो गया। क्योंकि कोई फिक्र ही नहीं करता कि तुम किसलिए सत्याग्रह कर रहे हो। लोगों ने कहा, बेचारा सात्विक पुरुष है, सज्जन आदमी है! कुछ बुरी बात भी नहीं कह रहा है। शादी किसी से तो करोगे। आखिर इसमें क्या खराबी है? जिद छोड़ो अपनी। अकड़ छोड़ो।
वह आदमी बहुत घबड़ा गया। वह भागा एक पुराने नेता के पास गया। उसने कहा कि हम क्या करें? उन्होंने कहा, कुछ करना नहीं है। तुम एक काम करो, गांव में एक वेश्या है बूढ़ी, कुरूप, उसको देख कर आदमी डरते हैं। उसको तुम लिवा लाओ। दो-चार रुपये लेगी। उसको बिठा दो इस आदमी के खिलाफ कि हम तुझसे विवाह करेंगे, नहीं तो अनशन करेंगे।
वह उस औरत को लिवा लाया। उसने भी बिस्तर लगा दिया। वह आदमी बोला, क्या बात है? उस स्त्री ने कहा कि हम तुमसे विवाह करेंगे। अन्यथा मर जाएंगे।
उसी रात अपना बिस्तर लेकर वह भाग गया। क्योंकि अनशन से अनशन ही हारता है।
अब गांधी को हराना मुश्किल हो गया। ब्रिटिश राजनीतिज्ञों की समझ में ही न आया कि अब करें क्या! यह आदमी मरने को तैयार है। मारने की बात ही नहीं करता। मारने की करता तो ठिकाने लगा देते। यह मरने की बात करता है।
और यह भी ध्यान रखना कि अगर ब्रिटिश लोगों की जगह जर्मन होते, जापानी होते, तो गांधी सफल नहीं हो सकते थे। ब्रिटिश कौम की अपनी एक शालीनता है, अपना संस्कार है। वैसी कौम पृथ्वी पर बहुत कम हैं। एक नीतिमत्ता है। यह बात तो उनको समझ में आ गई कि यह आदमी अपने को ही सताता है, अब इसको मारना क्या! लेकिन अगर हिटलर होता या जापानी होते, तो वे कहते, ठीक है, मजे से मर जाओ। कोई फिक्र ही न करता। पता ही न चलता गांधी कब मर जाते।
लेकिन ब्रिटेन धीरे-धीरे छोड़ दिया। यह बात अशोभन लगी कि जो लोग मरने को तैयार हैं उनको मारा जाए। इसमें गांधी की सफलता जितनी है उतनी ही ब्रिटिश नीतिमत्ता की भी सफलता है। यह पचास-पचास प्रतिशत है। पचास प्रतिशत गांधी का आंदोलन है, पचास प्रतिशत ब्रिटिश जाति की शालीनता है। इसलिए यह आंदोलन सफल हुआ। लेकिन गांधी समझ गए कि लड़ कर कोई उपाय नहीं है। उन्होंने एक नई तरकीब ईजाद कर ली। लेकिन अहिंसा एक राजनैतिक उपाय थी।
इसीलिए चर्चिल के खिलाफ और ब्रिटेन के खिलाफ तो अहिंसा जीत गई, लेकिन जिन्ना के खिलाफ न जीत सकी। लाख उपाय किए गांधी ने, लेकिन जिन्ना को न जीत सके। क्या मामला है? क्योंकि जिन्ना को समझ में है साफ कि ये सब राजनैतिक दांव-पेंच हैं। इसलिए जिन्ना पर इसका कोई परिणाम न पड़ा। न मुसलमानों पर कोई परिणाम पड़ा। पाकिस्तान बंट कर रहा।
न परिणाम पड़ने का कारण है, क्योंकि जिन्ना भलीभांति जानता है कि राजनैतिक दांव-पेंच है यह। इसमें अहिंसा कुछ भी नहीं है। इसमें कोई बड़ा प्रेम नहीं है, यह सिर्फ होशियारी है।
पर गांधी आदमी ईमानदार हैं। उन्होंने जो भी किया, सदा--इससे हित होगा--इस आकांक्षा से किया। पर वह कृत्य से गहरा नहीं है। उनके अस्तित्व में नहीं है अहिंसा। इसको अगर तुम उनका जीवन गौर से देखो तो तुम्हें समझ में आ जाएगा कि उनके अस्तित्व में अहिंसा नहीं है। छोटी-छोटी बात पर वे हिंसक हो उठते थे।
कस्तूरबा ने दूसरों का पाखाना साफ करने से मना कर दिया। तो गांधी इतने नाराज हो गए कि गर्भवती कस्तूरबा को आधी रात घर के बाहर निकाल दिया। दरवाजा बंद करके धक्का देकर बाहर कर दिया। आठ महीने का गर्भ! पाखाना साफ करना पड़ेगा।
पाखाना साफ करना या न करना, किसी और के द्वारा थोपी जाने वाली बात नहीं होनी चाहिए। यह कस्तूरबा का अपना निर्णय होना चाहिए। अगर उसे ठीक नहीं लगता तो गांधी कौन हैं? लेकिन पति, स्वामी! ये सब हिंसा की धारणाएं हैं। और इस पत्नी को बाहर निकाल देना गर्भ की ऐसी अवस्था में जब कि खतरा हो सकता है।
गांधी के बच्चे...गांधी ने चालीस साल की उम्र में ब्रह्मचर्य का नियम ले लिया। तब तक उनके तो कई बच्चे पैदा हो चुके थे। चालीस साल का मतलब आधी उम्र तो जा ही चुकी। चालीस साल की उम्र में ब्रह्मचर्य का व्रत लेना कोई बहुत महत्वपूर्ण बात नहीं है। चालीस साल की उम्र तक अगर किसी ने कामवासना का भोग किया है तो सहज ही ब्रह्मचर्य का निर्णय ले लेगा। कोई मूढ़ ही होगा जो उसके बाद भी ब्रह्मचर्य का निर्णय न ले। यह तो सहज स्वाभाविक होना चाहिए। इस उम्र के अनुभव के बाद उन्होंने निर्णय ले लिया। लेकिन लड़के उनके थे, हरिदास था, वह अठारह साल का है; वे उसको भी कहते हैं कि तू ब्रह्मचर्य का निर्णय ले। कसम खा ब्रह्मचर्य की।
यह हिंसा है। तुम चालीस साल में निर्णय लिए, पांच-सात बच्चों के बाप होने के बाद। तुम इस लड़के को अठारह साल की उम्र में कहते हो कि तू ब्रह्मचर्य का निर्णय ले। यह निर्णय भी कैसे ले? इसे अभी कामवासना का भी पता नहीं है।
यह आग्रह इतना जबरदस्त हो गया--कि तू ब्रह्मचर्य का निर्णय ले--कि हरिदास भाग गया। उसने भाग कर शादी कर ली। जब उसने शादी कर ली तो गांधी ने उसका निष्कासन कर दिया कि अब उससे मेरा कोई संबंध नहीं।
आखिर शादी ऐसा क्या पाप है? गांधी ने खुद की। सारी दुनिया करेगी। लेकिन यह जिद क्या है और जबरदस्ती क्या है? अगर इस व्यक्ति को ब्रह्मचर्य की तरफ नहीं जाना तो तुम कौन हो? सिर्फ बाप होने के कारण! यह हिंसा है। और इस हिंसा ने हरिदास को बरबाद कर दिया। जब गांधी ने इनकार कर दिया, वह असहाय हो गया। न उसके पास पैसा, न भोजन, न रहने का मकान--और शादी कर ली। तो वह उधार लेने लगा यहां-वहां से। वह जुआ खेलने लगा। वह उधारी पर ही जीने लगा। जब उसने काफी उधारी कर ली और अदालत में मुकदमा पहुंचा, तो गांधी ने अखबारों में वक्तव्य दे दिया कि मैं अब उसका पिता नहीं हूं, न वह मेरा बेटा है।
फिर वह शराब पीने लगा। जब उधारी न चुकी तो अब और क्या करे! चोरी करने लगा, शराब पीने लगा। वह बरबाद होता चला गया। वह हालत यहां पहुंच गई कि वह अपना चेहरा दिखाने योग्य किसी को न रहा। क्रोध में वह मुसलमान हो गया। उसने अपना नाम हरिदास से अब्दुल्ला कर लिया।
मरते वक्त, जब गांधी मरे, गांधी की जब मृत्यु हुई, तब हरिदास सम्मिलित हुआ था उस जुलूस में दिल्ली में। लेकिन ऐसा समझा जाता है कि अनुयायियों ने उसे पास नहीं पहुंचने दिया। और ऐसा समझा जाता है--हकदार वही था बड़े बेटे की तरह कि गांधी की चिता में आग देता, लेकिन उसको चिता में आग नहीं दी जाने दी गई।
अब यह हद की बात हो गई। बेहूदी हो गई। चाहे वह शराब पीता हो, चाहे मुसलमान हो, इससे क्या फर्क पड़ता है! बड़ा बेटा वही था। लेकिन गांधी का जीवन भर का विरोध इतना था कि अनुयायियों को भी पता था कि इसको पास नहीं आने देना। लाश के पास भी देखने नहीं आने दिया गया। वह भीड़ में दूर हजारों आदमियों में छिपा हुआ गया। दूर से खड़े होकर उसने बाप को जलते देखा। वह अग्नि नहीं दे सका।
ये सब हिंसाएं हैं। अहिंसक व्यक्ति के ये लक्षण नहीं। और अगर तुम गांधी के पूरे जीवन को गौर से देखोगे तो तुम बहुत चकित हो जाओगे कि छोटे-छोटे मामलों में बहुत हिंसा है, बड़े-बड़े मामलों में बड़ी अहिंसा है।
यह बड़ी सोचने की बात है। बड़े मामले में अहिंसक होना बहुत आसान है। छोटे मामले में अहिंसक होना मुश्किल है। क्योंकि छोटा मामला इतना छोटा होता है कि इसके पहले कि तुम सजग होओ, वह हो गया होता है। बड़े मामले में तो सोच-विचार की सुविधा होती है। ब्रिटिश गवर्नमेंट से लड़ना है, अहिंसा से लड़ सकते हो, योजना बना सकते हो। लेकिन किसी ने तुम्हारे पैर पर पैर रख दिया, वह एक क्षण में हो गई बात। उस वक्त क्रोध आ गया तो आ गया। उसके लिए कोई योजना नहीं बनाई जा सकती। असल में, छोटी बातों से ही पता चलता है कि आदमी अहिंसक है या हिंसक। बड़ी बातों का कोई हिसाब नहीं है। बड़ी बातें व्यर्थ हैं। छोटी बातें ही सार्थक हैं।
गांधी के जीवन को छोटे-छोटे हिसाब से अगर जांचने चलोगे तो बड़े चकित हो जाओगे। बहुत हैरान होओगे। लेकिन वे आदमी ईमानदार थे, इसमें मुझे रत्ती भर संदेह नहीं है। वे तुम्हारे और तथाकथित साधुओं से ज्यादा ईमानदार थे। लेकिन उनकी ईमानदारी भ्रांत दिशा में थी। वे अहिंसक न हो पाए, न हो सकते थे। क्योंकि सारी चेष्टा अहिंसा को एक हथियार की तरह उपयोग करने के लिए थी। उन्होंने अहिंसा का हथियार बनाया। लड़ना तो था। लड़ने में हिंसा छिपी थी। लेकिन लड़ने का और कोई उपाय न था, तो उन्होंने अहिंसा का हथियार बनाया। अहिंसा भी हिंसा में नियोजित हो गई।
महावीर की बात बिलकुल भिन्न है। महावीर की कोई नीति नहीं है, कोई राजनीति नहीं है। महावीर की अहिंसा समाधि से उत्पन्न है। उन्होंने स्वयं को जाना। स्वयं को जान कर पाया कि सबके भीतर वही है, एक ही है। इसलिए अब दूसरे को चोट पहुंचानी अपने को ही चोट पहुंचानी है। कोई पराया न रहा, तो प्रेम का सहज आविर्भाव हुआ। कोई दूसरा न रहा, तो दुख पहुंचाने की बात गिर गई। महावीर की अहिंसा धार्मिक; गांधी की अहिंसा कभी-कभी नैतिक, अधिकतर राजनैतिक है।
ओशो, कल शिविर में ध्यान के प्रयोग करते हुए कुछ क्षणों के लिए परम शांति की अनुभूति हुई। तो क्या वह विशेष विधि मेरे अनुकूल आई? और क्या मैं उसे जारी रखूं?
शांति को कसौटी समझो। जिस विधि से तुम्हें शांति मिले उसमें और गहरे, और गहरे उतरो। शांति शुरुआत है। धीरे-धीरे शांति सघन होगी, आनंद में रूपांतरित होगी।
ओशो, जीवन में अनुभव कर-कर के देखना उचित है या देख-देख कर करना उचित है?
तो अनुभव से गुजरना एक बात है, अनुभव का हो जाना बिलकुल दूसरी बात है। अनुभव हो जाने का मतलब है कि तुमने अनुभव को देखा भर आंख; पहचाना। उस पहचान में ही क्रांति हो जाएगी। फिर तुम क्रोध दुबारा न कर सकोगे। अगर अनुभव से ही गुजरे हो तो क्रोध बार-बार करोगे। अगर अनुभव हो गया देख कर, क्रोध को पहचान कर तुम गुजरे, क्रोध समाप्त हो जाएगा। ऐसा नहीं कि तुम पश्चात्ताप करोगे। नहीं; बस क्रोध गिर जाएगा। पश्चात्ताप भी नहीं होगा।
जो बात ठीक से देख ली, उससे मुक्ति हो जाती है। अनदेखे अनुभव ही पीछा करते हैं। उनको फिर-फिर उनसे गुजरना पड़ता है। अंधेरा ही पीछा करता है, रोशनी पीछा नहीं करती। रोशनी मुक्ति है।
तुम ठीक से किसी भी अनुभव को देख लो। अगर वह अनुभव फिर से दोहरे, तो समझना कि देखने में भूल रह गई। फिर से गौर करना! अगर वह अनुभव फिर न दोहरे, तो समझना कि अब दर्शन पूरा हुआ। दृष्टि उपलब्ध हुई।
दर्शन क्रांति है। और उसके अतिरिक्त और कोई क्रांति नहीं है।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Does experiencing supreme peace during meditation indicate that the method suits me, and should I continue with it?
According to Osho, a felt surge of deep peace is the sure sign that a meditation method suits you; it means there is harmony between you and the technique. Use peace as the touchstone: with whichever method brings peace, continue and go deeper. Peace is only the beginning; sustained practice will densify that peace and naturally flower into bliss.
In simple terms: If a meditation makes you feel truly calm inside, it fits you—keep doing it and that calm will grow into happiness.
Is it better to keep experiencing and then see, or to keep seeing and then do?
According to Osho, begin with seeing—act from watchfulness. Mere experiences only repeat; only what is clearly seen becomes understanding and ends by itself (like anger dropping when recognized as anger). Right seeing liberates; the unseen haunts. If a pattern returns, your seeing was partial—look again. Vision is the true revolution; from clarity, doing is effortless and transforming.
In simple terms: Look carefully first, then act; when you truly see what’s happening inside you, bad habits stop repeating.
What is the difference between the nonviolence of Bhagwan Mahavira and that of Mahatma Gandhi?
According to Osho, Gandhi’s nonviolence is chiefly a moral-political strategy—outer, policy-driven, historically visible, and prone to compromise—whereas Mahavira’s nonviolence is religious: an inner transformation from which harmlessness flows effortlessly. In Gandhi, nonviolence is in action; in Mahavira, it is in being. Gandhi tried to act himself into saintliness; Mahavira’s awakened consciousness made violence impossible, leaving little ‘history’ but total integrity.
In simple terms: Like using manners versus having a kind heart: Gandhi used nonviolence as a tactic; Mahavira became so peaceful inside that hurting anyone simply couldn’t happen.
Can society function with an imposed, showy morality instead of morality arising from religion or the presence of saints?
According to Osho, society can easily run on imposed, decorative morality—and often prefers it—because living saints unsettle comfort by awakening a deeper longing. Saints have no 'utility'; they are poetry and meaning, not management. So yes, showy morality sustains order, but it keeps people asleep; only religion-as-awakening through living insight births authentic morality and true transformation.
In simple terms: Yes—rules and pretend goodness keep things calm, but only the wake-up jolt from real sages makes us truly good inside.
