✓ already translated: opens instantly. A new translation takes about a minute and is then saved for everyone.
Questions in this Discourse
ओशो, शरीर में कुछ सूक्ष्म शरीर जैसा भी है या नहीं?
विदाउट एनी कांशसनेस?
हां, विदाउट एनी कांशसनेस। कभी कोई एक्सीडेंट में, कभी कोई बहुत गहरे आघात में, कई बार अनायास यह घटना घट जाती है। प्रयास से भी घट सकती है, और रास्ते भी हैं उस प्रयोग को कर लेने के।
यानी यह शरीर है, इसके भीतर एक और शरीर है, और उस शरीर के भीतर जिसे हम आत्मा कहें, वह है।
यू डिस्क्राइव योर एक्सपीरिएंस। यू हैव दैट एक्सपीरिएंस ऑफ हैविंग दि सोल? नॉट ओनली ईथरिक बॉडी, बट बियांड ईथरिक बॉडी। यू हैव दैट एक्सपीरिएंस?
कुछ स्वप्न तो ईथरिक जर्नी होती है आपकी। बॉडी बाहर ही चली गई होती है। ये सबके सब आकस्मिक भी हो सकते हैं, या थोड़े से प्रयास से हो सकते हैं। इसमें कोई बड़े प्रयास की भी जरूरत नहीं है। सिर्फ उन बिंदुओं को जानने की जरूरत है जहां से यह बॉडी और ईथरिक बॉडी जुड़ी हुई है। उन्हीं बिंदुओं का नाम चक्र है। इसलिए चक्र इस बॉडी के हिस्से नहीं हैं। सिर्फ कांटेक्ट फील्ड्स हैं। इस बॉडी और उस बॉडी के बीच जहां कांटेक्ट हो रहा है, उन स्थानों का नाम चक्र है।
यू मीन टु से दैट अवर फिजिकल बॉडी एंड ईथरिक बॉडी, कांटेक्ट बिट्वीन दीज टू बॉडीज आर चक्रास। देयर लाइज दि कांशसनेस ऑफ दि सोल।
जस्ट देयर इ़ज ए फील्ड ऑफ कांटेक्ट।
ये जो चार या पांच या सात जो कांटेक्ट फील्ड्स हैं, ये सब अगर आपस में जुड़ जाएं, यानी इनको जोड़ने वाली जो मैग्नेटिक फोर्स है, वह आपस में भी जुड़ जाए, तो कुंडलिनी का अनुभव हो जाता है। कुंडलिनी के अनुभव का कुल मतलब यह है कि यह जो अलग-अलग कांटेक्ट हो रहा है, इनके कांटेक्ट होती जगह पर जो शक्ति इकट्ठी हो गई है, पांचों में, सातों में, वह अगर जुड़ जाए। और उसके जोड़ने के मेथड्स हैं। और इन पांचों के कांटेक्ट को या सातों के कांटेक्ट को अलग करने के उपाय भी हैं। तो इन उपायों के द्वारा बहुत आसानी से दोनों शरीर अलग हो सकते हैं। अलग होते ही, इतना तो तय हो जाता है कि इस शरीर के मरने से ही सब-कुछ नहीं मर जाता है।
इ़ज इट जस्ट पॉसिबल फॉर सम पीपुल, हू हैव बीन ट्राइंग टु सेपरेट दीज टू बॉडीज, दैट देन दीज टू बॉडीज कैन नॉट बी यूनाइटेड?
और जो जान कर शरीर को अलग करता है, इस शरीर से उस शरीर को बहुत जान कर अलग करता है, उसे तो बहुत कठिनाई नहीं है। क्योंकि वह जिस माध्यम से अलग होता है, उसी के विपरीत माध्यम से जुड़ जाता है। लेकिन जब आकस्मिक कभी हो जाता है...जैसे मेरा जो अनुभव है वह आकस्मिक ही है। और तब एक...
बट ऑफ्टरवर्ड्स डेलिब्रेटली...
इन आर्डर टु हैव स्प्रिचुअल एक्सपीरिएंस, इ़ज इट नेसेसरी टु सेपरेट दीज टू बॉडीज?
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
हां, कुछ तथ्य इतने साफ हो जाते हैं उस अनुभव से कि काम करने में बहुत...
फियर ऑफ डेथ हैज गॉन।
डू यू एक्सेप्ट दि थइरी ऑफ रि-इनकारनेशन?
सम पीपुल बिलीव दैट देयर इ़ज लाइफ ऑफ्टर डेथ। देन मैन कम्स बैक एज मैन ऑर इवॉल्वस् इन ए हायर मैन ऑर देयर इ़ज ए पॉसिबिलिटी ऑफ गोइंग बैक टु...
नॉट पॉसिबल दैट ए परसन मे बिकम डॉग...?
हाउ इट इ़ज एक्सेप्टेबल दैट मैन कम्स बैक ए़ज ए ह्यूमन बीइंग?
इस शरीर में रहते हुए आपके एस्ट्रल माइंड ने, जो भी डिजायर्स नहीं पूरी कर पाया है, अनफुलफिल्ड रह गई हैं, अननोन रह गई हैं, वे डिजायर्स उसका पीछा करती रहेंगी। मरते वक्त--गहरी नींद से ज्यादा नहीं कोई अर्थ है मरने का--मरते क्षण में वे सारी डिजायर्स, जो इस माइंड ने चाही थीं और पूरी नहीं हो पाईं, वे उसके साथ खड़ी हो जाएंगी। जैसे रात सोते वक्त दिन भर में जो चाहा था, नहीं हो पाया, वह आपके साथ खड़ा हो जाता है। और वे जो डिजायर्स हैं, वे फिर इस माइंड को, मनुष्य की बॉडी को पकड़ाने की चेष्टा करेंगी। क्योंकि वे डिजायर्स मनुष्य की बॉडी में ही पूरी हो सकती हैं।
थइरी ऑफ हेल एंड हेवन...
हां, मैं बात करूंगा।
हां-हां, मैं समझा। तो अगर मनुष्य-जीवन में कुछ अतृप्त वासनाएं और तृष्णाएं रह गई हों, तो चेतना वापस मनुष्य-जीवन पर लौटती रहेगी। जब तक कि उन वासनाओं से छुटकारा न हो जाए, उनसे मुक्ति न हो जाए, तब तक वह वापस लौटती रहेगी। माइंड हमेशा वहीं लौट जाता है जहां डिजायर है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
बहुत दिन तक रहेगी। रहेगी। और उसका कारण, उसका कारण सिर्फ इतना ही है कि रिलिजियस एक्सपीरिएंस जो भी हैं, जो भी हैं, उनको जब तक साइंटिफिक एक्सपेरिमेंटेशन सिद्ध नहीं करेगा तब तक कांफ्लिक्ट जारी रहेगी। फिर रिलिजियस एक्सपीरिएंस एक बात है और रिलिजियस इंटरप्रिटेशन बिलकुल दूसरी बात है।
मुझे एक अनुभव हुआ। उस अनुभव की मैं क्या व्याख्या करता हूं, वह गलत हो सकती है। और कल साइंस से सिद्ध हो सकता है कि वह व्याख्या गलत थी। और व्याख्या के गलत होते से ही मेरा अनुभव भी गलत हो जाएगा। लेकिन व्याख्या बिलकुल और बात है।
एक और बात: एक आदमी इस कमरे में आया है, उसे एअरकंडीशंड का कोई पता नहीं है। वह इस कमरे में आया। बाहर सब गर्म था। दूसरा कमरा गर्म था। इस कमरे में आया, यह कमरा ठंडा था। उसके अनुभव में कोई झूठ नहीं है। क्योंकि उसने इस कमरे को ठंडा पाया। लेकिन उसे एअरकंडीशन का कोई पता नहीं है, और वह आदमी इसको एक चमत्कार मान कर जाता है। वह उसकी व्याख्या है। वह एक चमत्कार मानता है कि वहां एक साधु ठहरा हुआ है, कमरा इसलिए ठंडा है।
यह इंटरप्रिटेशन है।
हां, इंटरप्रिटेशन है यह। लेकिन कमरे के ठंडे होने में उसकी कोई गलती नहीं है। और कल अगर वह गलत सिद्ध होगा और वैज्ञानिक उसको गलत सिद्ध करेगा कि किसी साधु के ठहरने से कोई कमरा ठंडा नहीं हो सकता, तो वह आदमी गलत सिद्ध हो जाएगा। और गलत सिद्ध होते से ही उसके सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी, क्योंकि उसका अनुभव है कि कमरा ठंडा था।
थइरी ऑफ रि-इनकारनेशन ऑल्सो मे बी पार्ट ऑफ इंटरप्रिटेशन?
एक्सपीरिएंस इ़ज दि सेम?
हां, उनका एक्सपीरिएंस बिलकुल एक है। बौद्धों का अनुभव बिलकुल वही है जो जैनों का है, या हिंदुओं का है। लेकिन बौद्ध आत्मा को मानने को तैयार नहीं हैं। और अनुभव में जरा भी फर्क नहीं है।
अब जैसे मेरा कहना है, जैसे बाइबिल की बात है, कि बाइबिल कहती है कि पृथ्वी ही सेंटर है सारे यूनिवर्स का। और मैं मानता हूं कि यह किसी गहरे अनुभव की बात है, यह झूठ नहीं है। अभी भी। यानी अभी यह तीन सौ साल में तो...
इंटरपोलेशन बाय ह़िज फॉलोअर्स।
न, न, न। जरा भी नहीं। जरा भी नहीं। इंटरपोलेशन नहीं कर रहा हूं।
न, यह मैं नहीं कह रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि यह जो बात है, यह बात कोई और ही अर्थ रखती है। यह बात यह अर्थ नहीं रखती है कि सूरज और चांद और तारे सब इसका चक्कर लगा रहे हैं, यह अर्थपूर्ण नहीं है। यह बात बहुत मैटाफिजिकल है और कुछ और ही अर्थ रखती है। जहां तक जीवन का संबंध है, अर्थ सेंटर है। जहां तक जीवन का संबंध है, वहां अर्थ सेंटर है।
देयर इ़ज नो लाइफ ऑन दि अदर प्लेनेट्स।
एनिमल्स ऑल्सो हैव सोल।
हां, एनिमल्स की तो सोल है ही। इस जमीन की, चांद की। तो जो लोग जीवन की इस दिशा में बहुत गहरे काम किए हैं, उनका यह अनुभव है कि अर्थ की अपनी सोल है। सब प्लेनेट्स की अपनी सोल है। और सोल की दृष्टि से, उस लिविंग एनटायटी की दृष्टि से अर्थ सेंटर है, और सूरज और चांद सब उसके आस-पास रिवॉल्व हो रहे हैं।
इसका कांटेक्ट नहीं है?
हां, इसका कोई कांटेक्ट ही नहीं है। लेकिन यह जो खयाल है, इसका जो इंटरप्रिटेशन होने वाला था, वह यही होने वाला था, कि यह पृथ्वी का सूरज चक्कर लगा रहा है। और जब गैलीलियो ने यह खोज की कि यह तो बात झूठ है, सूरज का चक्कर तो पृथ्वी ही लगा रही है, तो इन दोनों बातों में कांफ्लिक्ट खड़ी हो गई और धर्म का जो व्याख्याकार था वह एकदम हार गया। हार गया, क्योंकि यहां तो फैक्ट सामने थे, तुम्हारे पास तो कोई फैक्ट थे नहीं।
डाइमेन्शंस आर डिफरेंट।
जैसे कि हाइड्रोजन एंड ऑक्सीजन मेक टु वाटर, एंड वाटर हैज डिफरेंट क्वालिटीज फ्रॉम हाइड्रोजन एंड ऑक्सीजन। इन ए सेंस ह्यूमन बॉडी इ़ज देयर, देन इट हैज डीकंपोज्ड, एंड नथिंग इ़ज लेफ्ट।
अब जैसे कि मैं अगर कहूं कि मुझे कोई एक अनुभव हुआ। जैसे समझ लें कि एक आदमी को किसी से प्रेम हो गया है, और वह कहता है कि मुझे प्रेम का अनुभव हो रहा है। और अगर फिजियोलॉजिस्ट कहे कि कहां तुम्हें प्रेम का अनुभव हो रहा है? हम तुम्हारे पूरे शरीर को काट-पीट कर जांच कर लें, तो हम तुम्हारे पूरे शरीर में कहीं नहीं पाते हैं कि कहीं भी तुम्हें प्रेम का अनुभव हो रहा है। न तुम्हारे हृदय को कुछ पता चलता है, न तुम्हारे फेफड़े को कुछ पता चलता है, न कहीं पता चलता है।
साइकोलॉजी में भी नहीं?
मेरी बात आप नहीं समझे! फिजियोलॉजी की बात मैं कह रहा हूं। फिजियोलॉजी--अगर आप कहें कि मुझे प्रेम अनुभव हो रहा है और मेरे भीतर कुछ घटना घट रही है, जो कल तक जब तक मुझे प्रेम नहीं हुआ था, नहीं घटी थी। तो फिजियोलॉजी अगर आपकी जांच-पड़ताल करे, तो आप सिद्ध नहीं कर सकते कि आपको कोई प्रेम का अनुभव हो रहा है। क्योंकि वह कहेगी, जब तुम्हें प्रेम का अनुभव नहीं हो रहा था, तब जितने तत्व तुम्हारे शरीर में थे और जिस तरह का तुम्हारे शरीर का स्ट्रक्चर था, ठीक स्ट्रक्चर वही का वही है, तत्व वही के वही हैं। प्रेम के अनुभव से तुम्हारे शरीर में जब प्रेम नहीं हो रहा था, तो कोई फर्क नहीं पड़ा हुआ है। इसलिए कोई नई चीज तुम्हारे शरीर में हो रही है, यह हम नहीं मान सकते। मेरा आप मतलब समझ रहे हैं न?
सिचुएशन हो, मीडियम हो।
हां, मीडियम हो, सिचुएशन हो। हॉरमोन एक सिचुएशन पैदा कर रहे हों, जो कि हॉरमोन के हट जाने पर न हो।
लाइक एनर्जी।
हां, लाइक एनर्जी। तो कठिनाई क्या है कि साइंटिफिक जो मेथड हैं अब तक, वे जो भी मैटीरियल है, उसको पकड़ लेते हैं। ठीक भी है। लेकिन जो भी इम्मैटीरियल है, वह पकड़ के बाहर छूट जाता है। वह किसी अनुभव में आता है, तो आज अनुभव कांफ्लिक्ट में पड़ेगा।
इधर अब एक नई लैंग्वेज मैथेमेटिक्स की प्रकट हो रही है, विकसित हो रही है। सौ, दो सौ, चार सौ वर्षों में जब मैथेमेटिक्स एक लैंग्वेज बन जाएगी, पूरी लैंग्वेज बन जाएगी, तो एक सुविधा होगी कि जो लोग रिलीजस एक्सपीरिएंस की बात करें, वे फिर गणित की भाषा में कर सकें, फिजिक्स की भाषा में कर सकें, साइकोलॉजी की भाषा में कर सकें। आज साइकोलॉजी की भाषा में कुछ कहना संभव हो गया है। लेकिन साइकोलॉजी की कोई भाषा नहीं थी आज से दो सौ साल पहले।
तो मैं जो कह रहा हूं वह यह है कि अनुभव एक बात है, व्याख्या बिलकुल दूसरी बात है। हम चारों आदमी एक ही जगह जाएं और चार व्याख्याएं लेकर लौट सकते हैं, और एक ही अनुभव हुआ हो।
देयर आर थइरी़ज दैट सोल एक्झिस्ट्स ऑर नॉट, अबाउट रि-इनकारनेशन। दे आर ऑल्सो इंटरप्रिटेशंस? ईवन दि एक्झिस्टेंस ऑफ दि सोल...?
बट आइ थिंक दे आर डिसक्राइबिंग दि कैरेक्टरस्टिक्स ऑफ दि सोल। बट दि प्रॉब्लम इ़ज व्हेदर सोल इ़ज देयर ऑर नॉट?
सोल मे चेंज कांस्टेंटली।
बट व्हेदर सोल इ़ज देयर ऑर नॉट?
यह स्टैटिक भी हो सकती है न?
बिका़ज दि सोल इ़ज डाइनैमिक।
बिका़ज इट इ़ज लिविंग एनटायटी...
एक्झिस्टेंस हैज गॉन।
हां, एक्झिस्टेंस हैज गॉन।
ये सारी की सारी हिंदू व्याख्याएं हैं बौद्ध की। बुद्ध का जो कहना है, बुद्ध का तो कहना यह है, और इन अर्थों में बुद्ध का कहना बड़ा साइंटिफिक है । और आने वाले साइंटिफिक एज में बुद्ध का इंटरप्रिटेशन बहुत अपील करने वाला है, और अपील कर रहा है।
दिस इ़ज वेरी डिसअपॉइंटिंग।
दि बेस ऑफ रिलीजन हैज गॉन।
दैट इ़ज आल्सो दि मार्क्सिज्म...
मैंने तो अभी मार्क्स और बुद्ध पर एक लेक्चर दिया, तो भारी उपद्रव हुआ। एक लेक्चर दिया...
कहां?
बुद्धिज्म इ़ज ए एसेटिक व्यू ऑफ लाइफ।
हिज व्यूज अबाउट मैरिज एंड हिज मिडिल पॉथ, हिज एसेटिक लाइफ। बट मार्क्सिज्म बिलीव्स दैट इग्नोर दि मैरिज एंड मॉरेलिटी...
जहां तक बुद्ध का व्यक्तित्व है, वह एसेटिक नहीं है; बिलकुल एंटी-एसेटिक है। लेकिन भारत का पूरा व्यक्तित्व एसेटिक है। और बुद्ध के पीछे जो लोग इकट्ठे हो रहे हैं, वे सब एसेटिक परंपराओं से आ रहे हैं। और बुद्ध की जो व्याख्या और शास्त्र-निर्माण करने वाले हैं, वे सब ब्राह्मण हैं। अब यह बड़े मजे की बात है। महावीर और बुद्ध का सब शास्त्र-निर्माण ब्राह्मणों ने किया है। और महावीर और बुद्ध दोनों ब्राह्मण-विरोधी हैं। लेकिन इनकी जो भी शिष्य-परंपरा है, वे सब ब्राह्मण हैं। और इसलिए अनिवार्यरूपेण गड़बड़ हो जाने वाली है। क्योंकि वह कोई आपका थोड़े ही सवाल है, पूरा माइंड आता है ब्राह्मण का पीछे से साथ में। बुद्ध की शक्ल देखें, यह आदमी एसेटिक नहीं मालूम पड़ता। और बुद्ध की पूरी की पूरी जो धारणा है--वह एक धारा में गए थे तपश्र्चर्या की--लेकिन वापस लौट आए।
बट देन ही लेफ्ट ह़िज वाइफ एंड चाइल्ड...
एक आदमी स्त्री को इसलिए छोड़ सकता है कि स्त्री सुखद थी और वह सुख नहीं लेना चाहता है, तब तो एसेटिक है। और एक आदमी इसलिए स्त्री छोड़ देता है कि सुख ले लिया गया है और अब कोई सुख नहीं है, तब वह कोई एसेटिक नहीं है। यह हालत उलटी भी हो सकती है--कि एक आदमी स्त्री से इतना परेशान है, इतना दुख भोग रहा है कि छोड़ दे, तो एसेटिक नहीं है, हेडोनिस्ट है। यानी स्त्री छोड़ देने से कुछ तय नहीं होता न! एक स्त्री से मैं इतना परेशान हो सकता हूं कि छोड़ने में ही मुझे सुख मालूम पड़े।
पर दुनिया समझेगी कि...
बट मैनी फॉलोअर्स डिड नॉट यूज टु मैरि, दे आर अगेंस्ट दि मैरिज।
और मेरी अपनी मान्यता यह है कि अभी तो शादी सुख नहीं है। अभी तो शादी सुख नहीं है। अभी तो शादी निश्र्चित दुख रही है। और दुख है। हां, एक दुनिया बनानी चाहिए हमें जहां शादी भी सुख हो। लेकिन वहां शादी का हमें पूरा रूपांतरण कर देना पड़े, पूरी शादी बदल देनी पड़े। वह फ्रेंडशिप से ज्यादा नहीं रह जाएगी, तो ही सुख हो सकती है। और जिस दिन सेक्स फन से ज्यादा नहीं होगा, तब तक सुख नहीं हो सकता।
दैट मीन्स यू एक्सेप्ट दि व्यू ऑफ बर्ट्रेंड रसल अबाउट मैरिज?
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Could the theory of reincarnation be an interpretation?
According to Osho, yes—the theory of reincarnation is largely an interpretation layered on a common spiritual experience. Different traditions translate the same inner reality through their own lenses: Hindus and Jains affirm rebirth and a soul, Buddhists speak of continuity without a fixed soul, while Christians and Muslims reject reincarnation. Hence, doctrines vary; direct experience matters more than beliefs.
In simple terms: People may feel the same deep truth, but religions tell different stories about it—so look within and see for yourself.
What happens when a person returns as a human being?
According to Osho, when a person returns as a human being, it is the astral mind’s unfinished desires that pull it back into a human body. At death—like deep sleep—whatever couldn’t be completed stands present, and upon re-entry those cravings seek conditions to fulfill themselves, shaping the new life’s initial impulses, tendencies, and circumstances.
In simple terms: Your leftover wishes chase you back into a human body so you can try to finish them.
Are the chakras the points of contact between the physical body and the etheric body, where the consciousness of the soul resides?
According to Osho, chakras are not physical organs or seats of the soul’s consciousness but subtle contact fields where the physical and etheric bodies meet; yoga calls these centers chakras, and the linking, dynamic field is kundalini. In ordinary people there are about five such touch-points. They cannot be found anatomically; they are experiential energy junctions coordinating interaction rather than housing consciousness.
In simple terms: Chakras are invisible meeting spots between your body and its energy body, linked by kundalini—they’re not places where a soul sits and you can’t see them like organs.
What happens when some people try to separate their two bodies and cannot reunite them?
According to Osho, while separating the subtle and gross bodies is generally safe, there is real danger if the physical body is weak or damaged: once contact is withdrawn, parts may begin to disintegrate, making reunion difficult or impossible. Hence Hatha Yoga disciplines the body to prevent disorder, and deliberate, skillful separation enables easy rejoining—whereas accidental separations are riskier.
In simple terms: If your body isn’t strong, pulling your “energy body” out can make the body start falling apart, so getting back in may fail—so do it carefully and on purpose.
Is there something like a subtle body within the body?
According to Osho, yes: a subtler consciousness exists that can separate from the physical body. The only way to know it is while alive, through the direct experience of being outside the body. This out-of-body awareness arises spontaneously for many—often during grave illness or injury—and at death it happens anyway, though then we cannot observe or report it.
In simple terms: There’s a part of you that can step out of your body and still be aware, and people sometimes feel this during serious illness or accidents.
What is the nature of the soul and the concept of reincarnation?
According to Osho, what we call ‘soul’ isn’t a fixed entity but a flowing process—a stream of moment-to-moment flames, like a lamp whose light keeps renewing. Continuity exists without an identical self: each moment is progeny of the previous. Reincarnation, then, is the ongoing flow taking new forms, not the migration of a permanent person; remembrance is not required for continuity.
In simple terms: There isn’t a tiny unchanging “me” that jumps bodies; there’s just a river of change that keeps going and taking new shapes.
Is it necessary to separate the two bodies to have a spiritual experience?
According to Osho, separating the ‘two bodies’—gross and subtle—is neither necessary nor particularly valuable for spiritual realization. Authentic insight arises from clear awareness here and now, not from esoteric body-splitting techniques. While such experiments may reveal certain facts, they are peripheral. Prioritize meditation, watchfulness, and direct understanding over sensational experiences or metaphysical detours.
In simple terms: You don’t need to split your bodies to grow spiritually; just be aware and present.
Does the soul exist?
According to Osho, the question “Does the soul exist?” is wrongly framed: like a flame, there is a real continuity but no fixed, unchanging entity. What we call ‘soul’ is a living process—ever-renewed, moment-to-moment—rather than a solid substance. Recognizing this dissolves rigid identities and aligns us with the fluid, impermanent nature of consciousness and life.
In simple terms: You are like a candle flame—real and continuous, but staying alive by changing every moment, not by being a hard, unchanging thing.
