✓ already translated: opens instantly. A new translation takes about a minute and is then saved for everyone.
Questions in this Discourse
ओशो, जब भी मैं आपसे कोई प्रश्न पूछती हूं, तो मुझे लगता है मेरी गर्दन आपकी तलवार के नीचे आ गई। इस प्रश्न के प्रसंग में भी मेरा वही भाव है। ऐसा क्यों है?
जहां भय न लगे और प्रश्न पूछने में मजा आए, वहां समझना कि जीवन का रूपांतरण नहीं होगा। ऐसा ही होता है, पंडित-पुरोहितों के पास तुम्हारा प्रश्न पूछना तुम्हारे अहंकार को भरता है। तुम्हारा प्रश्न तुम्हारे ज्ञान को बताता है। तुम्हारा प्रश्न तुम्हारी जिज्ञासा, तुम्हारी खोज, तुम्हारे अध्यात्म की तलाश की खबर लाता है। रस आता है पूछने में। और हर उत्तर जो पंडित-पुरोहित से तुम्हें मिलता है, तुम्हें तोड़ने वाला नहीं हो सकता, क्योंकि पंडित-पुरोहित तुम्हें तोड़ने का साहस नहीं कर सकता। तुम पर जीता है। तुम्हारा गुलाम है। तुम उसके मालिक हो। उसे तुम्हारे अहंकार को सजाना होगा। उसे सांत्वना देनी ही होगी। वह मलहम-पट्टी करेगा। वह तुम्हारे घावों को फूलों में छिपाएगा। उसके हाथ में तलवार नहीं हो सकती। उसके द्वार पर तुम्हारा स्वागत है। और जो पूछता है, उसका स्वागत उससे ज्यादा है जो नहीं पूछता है। क्योंकि जो पूछता है वह उसे मौका देता है उसके ज्ञान के प्रदर्शन का। पारस्परिक अहंकार की परिपूर्ति होती है।
पूछने वाले को मजा आता है कि लोग जानें कि मैं जानने वाला हूं--लोग जानना दिखाने के लिए पूछते हैं। ऊंचे-ऊंचे प्रश्न पूछते हैं, जिनका उनके जीवन से कोई संबंध नहीं है। परमात्मा है या नहीं? स्वर्ग है या नहीं? कितने नरक हैं? कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत और बड़ी गंभीर और गहरी बातें पूछते हैं, जिनसे उनके जीवन का कुछ लेना-देना नहीं है। जिनका कोई उपयोग भी नहीं है। लफ्फाजी है। लेकिन तात्विक उड़ान! अध्यात्म, परमार्थ, इनकी बातें पूछने से औरों को, सुनने वालों को लगता है कि हां, कोई पहुंचा हुआ आदमी है, ज्ञानी है। देखो, इसकी जिज्ञासा! देखो, इसकी उड़ान! देखो, इसके पंख कितनी ऊंचाइयां छू रहे हैं! और पंडित-पुरोहित को सुविधा मिल जाती है कि तुम्हारे प्रश्न के बहाने उसने जो इकट्ठा किया है शास्त्रों से, उसका प्रदर्शन कर ले।
यहां हालत बिलकुल उलटी है। तुम्हारा प्रश्न तुम्हारे अज्ञान की घोषणा करता है, ज्ञान की नहीं। क्योंकि जो ज्ञान से पूछता है वह तो पूछता ही नहीं, उसके प्रश्नों के तो मैं उत्तर ही नहीं देता। क्या तुम सोचते हो सारे प्रश्नों के मैं उत्तर देता हूं? ज्ञान से पूछे गए प्रश्नों को तो तत्क्षण कचरे की टोकरी में डाल देता हूं, उनको तो दुबारा देखता भी नहीं। क्योंकि अगर तुम्हें पता ही है, तो फिर मेरे उत्तर की कोई जरूरत नहीं है। जो उस जगह से पूछता है जहां घोषणा कर रहा है कि मुझे मालूम है, जो शास्त्र का उल्लेख देकर पूछता है, जो उद्धरण देता है, और जो कहता है मुझे मालूम है, आपकी राय भी जाननी है। यहां कोई रायें नहीं दी जा रही हैं; यहां कोई मंतव्य नहीं दिए जा रहे हैं, न कोई प्रमाण-पत्र दिए जा रहे हैं। उसका प्रश्न तो मैं फेंक ही देता हूं। उसका तो कोई दो कौड़ी का मूल्य नहीं है। उसके ही प्रश्न का उत्तर दूसरी जगह मिलता, पंडितों-पुरोहितों के पास उसके ही प्रश्न का उत्तर मिलता। मैं तो केवल उन प्रश्नों के उत्तर देता हूं जो अज्ञान की घड़ी में पूछे गए हैं।
तो पहले तो अज्ञान की घड़ी में पूछने से घबड़ाहट होती है कि यह मेरा अज्ञान प्रकट हुआ, कि मुझे इतना भी मालूम नहीं है; दीनता प्रकट होती है। और फिर तुम्हारी दीनता पर मेरा जो उत्तर आएगा, वह निश्चित ही तलवार की तरह आने वाला है। क्योंकि अगर मैं तुम्हारी गर्दन न काटूं, तो तुम्हारे किसी काम का नहीं हूं। तुम्हारा सिर तुम्हारे धड़ से अलग न हो जाए तो तुम परमात्मा का दर्शन कर न पाओगे। सिर गिरे तो परमात्मा का दर्शन हो। यह सिर की अकड़ में ही तो परमात्मा खो गया है।
तो घबड़ाहट, शीला, स्वाभाविक है। कोई भी प्रश्न पूछो, डर तो लगेगा कि अब पता नहीं मैं क्या कहूंगा? फिर मेरा उत्तर कोई सुनिश्चित उत्तर होता तो भी आश्वासन तुम खोज सकते थे कि कल भी मैंने ऐसा कहा था, परसों भी मैंने ऐसा कहा था, आज भी ऐसा ही कहूंगा। मेरे उत्तर के संबंध में कोई भविष्यवाणी नहीं हो सकती।
कल ही तुमने देखा है, समाधि ने पूछा था ब्रह्म वेदांत के संबंध में कुछ महीनों पहले; मैंने एक उत्तर दिया था। विजय भारती ने भी कल वैसा ही प्रश्न पूछा, इसी आशा में पूछा होगा कि जैसे मैंने समाधि के प्रश्न के उत्तर में कहा था कि ब्रह्म वेदांत भ्रांति में पड़ गए हैं, लौट आना चाहिए भ्रांति से उन्हें, और लोगों को न भरमाएं, अभी वह घड़ी नहीं आई है, अभी सिद्धि की घड़ी नहीं आई है। सोचा होगा विजय भारती ने कि यह अच्छा मौका है, ऐसा ही प्रश्न मैं भी पूछ लूं। पूछा ओम प्रकाश के संबंध में, मुश्किल में पड़ गया! उसकी गर्दन पर तलवार गिरी! अगर थोड़ी भी समझ होगी, तो अब दुबारा ऐसा प्रश्न नहीं पूछेगा। लेकिन पूछा इसी आशा में था कि जैसा मैंने उत्तर पहले दिया है, वैसा ही उत्तर दूंगा। मेरे उत्तर बंधे हुए नहीं हैं। मेरे पास कोई तैयार उत्तर नहीं हैं। तुम्हारा प्रश्न ही मेरे भीतर उत्तर को जन्माता है। और तुम्हारे प्रश्न से ज्यादा तुम्हारी मनोदशा मेरे उत्तर को निर्माण करती है। कल जो कहा था, आज न कहूंगा; आज जो कह रहा हूं, कल का कुछ भरोसा नहीं है। इसलिए भय और भी लगता है।
अगर यह भी साफ हो कि यही मेरा उत्तर होगा, तो भी तुम निश्चिंत हो जाओ। मैं तुम्हें निश्चिंत छोड़ नहीं सकता। तुम्हारी निश्चिंतता तो तभी आएगी जब तुम्हारे भीतर से अस्मिता का सारा भाव चला जाएगा--फिर कोई भय न लगेगा मेरी तलवार से। क्योंकि मेरी तलवार तुम्हारी आत्मा को नहीं काट सकती। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः! याद करो कृष्ण का वचन--उस आत्मा को न तो शस्त्र छेद सकते हैं और न ही आग जला सकती है। मेरी तलवार तुम्हारी आत्मा को नहीं काट सकती। मेरी तलवार केवल तुम्हारे अहंकार को काट सकती है। क्योंकि अहंकार झूठ है, क्योंकि अहंकार निर्जीव है, कट सकता है, गिर सकता है, जल सकता है; गिरना ही चाहिए, कटना ही चाहिए, जलना ही चाहिए। जितनी जल्दी जल जाए उतना अच्छा है।
तो भय स्वाभाविक है। पर इस स्वाभाविक भय के ऊपर चलो अब। सच तो यह है, जिस दिन से शीला तूने संन्यास लिया उसी दिन से तलवार तेरी गर्दन पर लटकी है, पूछ कि न पूछ! अब पूछने में क्या भय? तलवार तो लटकी ही है। जो नहीं भी पूछते हैं, उनकी गर्दन पर भी गिरेगी। वे इस निश्चिंतता में नहीं रह सकते कि न कुछ पूछा है, न कोई खतरा है। संन्यास का अर्थ ही होता है कि तुमने गर्दन मेरे सामने रख दी--तुमने प्रार्थना की मुझसे कि अब उठाओ तलवार और मेरी गर्दन काटो। संन्यास का और अर्थ क्या होता है? संन्यास का इतना ही अर्थ है कि मैं झुकता हूं, कि मैं प्रार्थना करता हूं कि मेरे अहंकार को जला दो, कि मेरे किए यह अहंकार न छूटेगा, मेरे किए तो और बढ़ता है, मैं जो भी करता हूं उससे बढ़ता है; प्रार्थना करता हूं तो प्रार्थना सजावट हो जाती है अहंकार की, पूजा करता हूं तो अहंकार को और पर लग जाते हैं, शास्त्र पढ़ता हूं तो अहंकार ज्ञानी हो जाता है, व्रत-नियम साधता हूं तो अहंकार तपस्वी हो जाता है, पुण्य करता हूं तो पुण्यात्मा होकर बैठ जाता है, जो भी करता हूं उससे बढ़ता है, सघन होता है, मजबूत होता है। मेरे किए इससे छुटकारा नहीं होगा।
नहीं हो सकता तुम्हारे किए। तुम अपने अहंकार को न काट पाओगे। तुम्हारे और तुम्हारे अहंकार के बीच फासला इतना कम है कि तलवार उठा न सकोगे और खतरा यही है कि तुम सोचोगे कि तुम अहंकार काट रहे हो, लेकिन तलवार अहंकार के हाथ में ही होगी। वह कुछ और काटेगा। और आखिर में तुम पाओगे कि वह खुद तो बच गया है, कुछ और कूड़ा-करकट काट दिया है। इसलिए तो तथाकथित महात्मा, साधु-संत, साधारण आदमी से भी ज्यादा अहंकारग्रस्त हो जाते हैं। उनका अहंकार और सघन हो जाता है। देखो, साधुओं के चेहरों पर जैसी अहंकार की प्रतिमा दिखाई पड़ेगी, वैसी साधारणजनों के चेहरे पर नहीं दिखाई पड़ती! साधारणजन को तो लगता है--मैं पापी, क्या है मेरे पास अहंकार करने को! महात्मा को लगता है--मैं पुण्यात्मा, मेरे पास कुछ है; मैंने कुछ कमाया, मेरे पास कमाई है।
तुमने संन्यास लिया, उसी दिन तुमने गर्दन मेरे सामने रख दी। अब मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं ठीक क्षण की। पूछो, न पूछो, ठीक क्षण आने पर तलवार तुम्हारी गर्दन पर गिरेगी। वही तुम्हारे सौभाग्य का क्षण भी होगा। उसी मिटने में तो पाना है। उसी न हो जाने में तो हो जाना है। संन्यासी होने के बाद ज्यादा देर बच नहीं सकते।
अपना दामन सम्हाल कर रखिए
जिंदगी रक्स है शरारों का
यहां तो अंगारे नाच रहे हैं। सम्हाल कर भी रखोगे दामन तो कब तक दामन सम्हाल कर रखोगे--अंगारे दामन में गिरने ही वाले हैं। चल ही पड़े हैं। और तुम संन्यासी हुए तो तुमने खुद अंगारों के लिए दामन फैलाया है। इस गर्दन को गिर ही जाने दो।
दरिया में तलातुम बरपा है किश्ती का फसाना क्या मानी?
गरदाब से जब लड़ना है तुम्हें तिनके का सहारा क्या मानी?
यह नौहए किश्ती बंद करो खुद मौजे तूफां बन जाओ
पैरों के तले साहिल होगा साहिल की तमन्ना क्या मानी?
किनारों की आकांक्षा ही मत करो। यहां तो तुम्हें जो मैं कला दे रहा हूं, वह तूफान को ही किनारा बना लेने की कला है।
दरिया में तलातुम बरपा है...
और तूफान बड़ा है, जिंदगी तूफान है।
दरिया में तलातुम बरपा है किश्ती का फसाना क्या मानी?
ये छोटी-मोटी किश्तियां लेकर तुम चलोगे, ये बचेंगी थोड़े ही; ये डूब ही जाएंगी। तुम्हारे मंत्र की किश्तियां, तुम्हारे यंत्र की किश्तियां, तुम्हारे योग-विधि-विधानों की किश्तियां, ये छोटी-छोटी किश्तियां काम न आएंगी, दरिया तूफान में है, यह भयंकर अंधड़ में है। ये तुम्हारी सब नावें कागज की नावें हैं; खिलौने हैं, नावें नहीं हैं, ये तो डूबेंगी। और जितना तुम बचाने की कोशिश करोगे, उतनी ही कठिनाई में पड़ोगे।
दरिया में तलातुम बरपा है किश्ती का फसाना क्या मानी?
गरदाब से जब लड़ना है तुम्हें तिनके का सहारा क्या मानी?
और जब इस भयंकर तूफान से लड़ना है, तब छोटे-छोटे तिनको का सहारा लेने से क्या होगा? और तुम्हारा अहंकार तो तिनके से भी ज्यादा झूठा है। तिनका भी नहीं है, सिर्फ खयाल है। सिर्फ एक विचार है, एक सपना है जो तुमने नींद में देखा है।
यह नौहए-किश्ती बंद करो खुद मौजे तूफां बन जाओ
अब छोड़ो यह फिकर किश्तियों की, अब तो तूफान के साथ एक हो जाओ, मौजे तूफां बन जाओ। अब तो तूफान के साथ तारतम्य जोड़ लो। यही संन्यास है। अब बचने की चेष्टा ही छोड़ो। अब तुम मिटने के साथ ही दोस्ती कर लो। अब तो जीवन का आग्रह छोड़ो, अब तो मौत का आलिंगन कर लो।
यह नौहए-किश्ती बंद करो खुद मौजे तूफां बन जाओ
पैरों के तले साहिल होगा साहिल की तमन्ना क्या मानी?
तूफान को ही साहिल बना लेंगे। तूफान की ही नाव बना लेंगे। मौत को ही अमृत का द्वार बना लेंगे। यह गर्दन गिरेगी, इसी में तुम्हारा उठना है।
तो घबड़ाहट स्वाभाविक है। लेकिन स्वाभाविक घबड़ाहट के पार चलना है। स्वाभाविक होने से ही कोई बात सच नहीं हो जाती। स्वभाव के पार और भी स्वभाव है। यह बिलकुल ही नीचे तल का स्वभाव है, जहां हमें भय पकड़े रहता है--मिट जाने का भय। मिटना तो है ही। ऐसे मिटे कि वैसे मिटे। बचना तो होना नहीं है। बचा तो यहां कोई भी नहीं है। यहां सिकंदर भी मिट जाते हैं, दीन-दरिद्र भी मिटते हैं, सम्राट भी। मिटना तो यहां है ही। गर्दन तो गिरेगी ही। तलवार गिरे या न गिरे तो भी गर्दन गिरेगी। तो फिर मिटने का भी उपयोग कर लेना चाहिए।
मरते सभी हैं, जो मरने का उपयोग कर लेता है वही अमृत को उपलब्ध हो जाता है। क्या है मरने का उपयोग? जो स्वेच्छा से मर जाता है। संन्यास स्वेच्छा से मृत्यु का वरण है। यह तैयारी है कि जब मौत आनी ही है, आती ही है, तो मैं स्वयं झुके जाता हूं; मौत को इतना कष्ट भी न दूंगा, मैं खुद मरने को राजी हूं। इसी मरने के राजीपन में तुम्हारे भीतर क्रांति घट जाती है, तुम मृत्यु के पार हो जाते हो। फिर कौन मरने वाला बचा--जो मरने को ही राजी हो गए तो मरेगा कौन अब? जिसने मृत्यु को भी स्वीकार कर लिया, वह इसी स्वीकार में अमृत हो गया। अमृत तो था ही, इस स्वीकार में उसे अमृत का बोध हो गया।
दमाग सोख्ता सा, दिल पै गर्द सी क्या है?
यह जिंदगी का तमस्खर है, जिंदगी क्या है?
यह तो जिंदगी का सिर्फ उपहास है जिसे हम जिंदगी कह रहे हैं, यह तो जिंदगी का सिर्फ ढोंग है जिसे हम जिंदगी कह रहे हैं, यह तो जिंदगी का सिर्फ एक सपना है।
दमाग सोख्ता सा दिल पै गर्द सी क्या है?
यह जिंदगी का तमस्खर है, जिंदगी क्या है?
कदम बढ़ा कि नई मंजिलें बुलाती हैं
यह बेहिसी, यह थकन, यह शिकस्तगी क्या है?
न देख चश्मे-हिकारत से खुश्क कांटों को
गुलों से पूछ मआले शगुफ्तगी क्या है
कांटों को देख कर मत रुक जाना; पूछना हो जिंदगी का राज, फूलों से पूछना। मरने वालों से मत पूछना, पूछना हो राज तो उनसे पूछना जिन्हें अमृत का कुछ अनुभव हुआ है। जिंदगी का राज पूछना हो तो हंसते हुए फूल से पूछना। उसे पता है मौत के बीच हंसने की कला। चारों तरफ मौत घिरी है और फूल है मुस्कुराए चला जाता है। चारों तरफ मौत घिरी है और दीया है कि जला चले जा रहा है। चारों तरफ मौत तो सबके घिरी है--तुम्हारे, मेरे, बुद्ध के, कृष्ण के, क्राइस्ट के; लेकिन तुम मौत से घबड़ा रहे हो और बुद्ध मौत से नहीं घबड़ा रहे हैं, इतना ही फर्क है। तुम्हारी घबड़ाहट में तुम मौत से दबे जा रहे हो। बुद्ध निर्भय होकर मृत्यु को देख रहे हैं--जो होना है होना है, जैसा होना है वैसा होना है, जैसा हो वैसा हो, ज्यों का त्यों ठहराया। बस इसी क्षण तुम्हारे भीतर एक स्वर पैदा होता है जो शाश्वत का है, एक किरण उतरती है जो परमात्मा की है।
कदम बढ़ा कि नई मंजिलें बुलाती हैं
यह बेहिसी, यह थकन, यह शिकस्तगी क्या है?
यह अकर्मण्यता, यह थकान, यह पराजय क्या है?
न देख चश्मे-हिकारत से खुश्क कांटों को
कांटों को मत गिनती करो, मौत का हिसाब मत लगाओ।
गुलों से पूछ मआले शगुफ्तगी क्या है
हंसने का राज क्या है? हंसने का एक ही राज है--मौत का स्वीकार। संन्यासी ही हंस सकता है। तुम्हें पता है क्यों इस देश ने संन्यास के लिए गैरिक वस्त्र चुने? वह अग्नि का रंग है, लपटों का रंग है। प्राचीन समय में जब किसी को संन्यास देते थे, तो उसे चिता बना कर उस पर लिटाते थे। फिर चिता में आग लगाते थे और घोषणा करते थे कि तू अब तक जो था, समाप्त हो गया। तेरी तरह तू मर गया। अब उठ और एक नये जीवन में उठ! जलती चिता से संन्यासी उठता था, फिर उसे नया नाम देते थे, और गैरिक वस्त्र देते थे ताकि याद रखना अग्नि को, लपटों को, मृत्यु को; स्मरण रखना कि जो भी मरणधर्मा है वह तू नहीं है; स्मरण रखना कि जो भी मरेगा, वह तू नहीं है।
तो शीला, घबड़ा मत! रख गर्दन सामने। गिरने दे तलवार। जो कटेगा, वह तू नहीं है।
सिकंदर जब भारत से वापस लौटता था तो उसे याद आई--जब यात्रा पर आया था भारत की तरफ तो उसके गुरु अफलातून ने उससे कहा था, जब भारत से लौटो, और बहुत सी चीजें तुम लूट कर लाओगे, बन सके तो एक संन्यासी भी ले आना। संन्यास भारत की गरिमा है। वह भारत का गौरव है। वह भारत की देन है दुनिया को। तो अफलातून ने ठीक ही कहा था कि तू सब-कुछ तो लाएगा लूट कर--धन-दौलत, हीरे-जवाहरात--मेरे लिए इतना खयाल रखना, एक संन्यासी ले आना। क्योंकि मैं जानना चाहता हूं, संन्यास क्या है? सब लूट-पाट कर जब सिकंदर जा रहा था और पंजाब की आखिरी बस्तियां छोड़ रहा था, तब उसे याद आया कि वह भूल ही गया संन्यासी को ले जाना। तो उसने खबर की गांव में कि कोई संन्यासी है? लोगों ने कहा: हां, एक संन्यासी है। वह नदी के किनारे नग्न वर्षों से जीता है। सिकंदर ने अपने दो आदमी भेजे और कहा: संन्यासी को कहो कि घोड़े पर सवार होकर हमारे साथ हो जाए। और कह देना, अगर आज्ञा न मानी तो यह नंगी तलवार है, गर्दन इसी वक्त काट कर गिरा दी जाएगी।
वे नंगी तलवारें लिए हुए सैनिक गए। जो संन्यासी वहां खड़ा था--नग्न, मस्त, सुबह की रोशनी में... सूरज से बातें करता होगा, आकाश में उड़ता होगा, अनंत से जुड़ा था, मस्त था, मौज में था, रक्स में था, नाच में था--थोड़ी देर तो वे दोनों सैनिक तलवारें नंगी हाथ में लिए चुपचाप खड़े रहे; ऐसा दृश्य उन्होंने देखा नहीं था! ऐसी मस्ती उन्होंने देखी नहीं थी! मतवाले देखे थे, मगर ऐसा मतवाला नहीं देखा था! और संन्यासी को तो जैसे पता ही नहीं चला कि वे दो नंगी तलवारें लिए आदमी खड़े हैं किसलिए? आखिर उन्होंने ही कहा कि भई, देखते नहीं, हम बड़ी देर से खड़े हैं, सिकंदर की आज्ञा है, महान सिकंदर की आज्ञा है कि घोड़े पर सवार हो जाओ और हमारे साथ यूनान चलो। सब तरह की सुविधा रहेगी, सब तरह का इंतजाम रहेगा, तुम शाही मेहमान रहोगे। और यह भी खबर है साथ में कि अगर जाने से इनकार किया, तो ये नंगी तलवारें तुम्हारी गर्दन अभी गिरा देंगी।
वह संन्यासी ऐसा खिलखिला कर हंसा कि नंगी तलवारें लिए सैनिकों के दिल धड़क गए होंगे। उस संन्यासी ने कहा: सिकंदर को कहो कि फिर उसे संन्यासियों से बात करने की तमीज नहीं है। उसे संन्यासियों के साथ चर्चा करने का कुछ पता नहीं है। उस नासमझ को ही ले आओ ताकि वह भी देख ले--जब एक संन्यासी की गर्दन काटी जाती है तो क्या होता है? रही आने-जाने की बात, वर्षों हो गए तब से मैंने आना-जाना छोड़ दिया। ठहर गया हूं। वह ऊंची बातें कह रहा था जिसकी सिपाहियों को तो कुछ समझ में ही नहीं आया होगा, क्या कह रहा है। आना-जाना छोड़ चुका हूं, उसने कहा, ठहर गया हूं। वह तो संन्यासी की परिभाषा कर रहा था, जो कृष्ण ने की है--स्थितप्रज्ञ, जिसकी प्रज्ञा ठहर गई है, जो न अब आता न जाता... रज्जब ने कहा न--जो आए जाए सो माया... जो न आता, न जाता, जो सदा ठहरा है, सदा स्थिर है, उस थिरता का नाम ही संन्यास है। तो उसने कहा: मैं तो अब कहां आता-जाता, वर्षों हो गए ठहर गया, अब कैसा आना, कैसा जाना! कैसा भारत, कैसा यूनान! व्यर्थ की बातें यहां न करो। रही गर्दन काटने की बात, तुम्हें काटना हो तुम काट लो, सिकंदर को काटना हो सिकंदर काट ले, जहां तक मेरा संबंध है, मैं तो यह गर्दन बहुत पहले काट ही चुका। इस गर्दन का मुझसे कुछ लेना-देना नहीं।
सिपाहियों की हिम्मत न पड़ी काटने की। यह आदमी कुछ अनूठा था। उन्होंने बहुत आदमी देखे थे, या तो आदमी होता है तलवार उसके सामने करो तो वह अपनी तलवार निकाल लेता है, लड़ने-जूझने को तैयार हो जाता है; या एक आदमी होता है कि तलवार दिखाओ तो वह भाग खड़ा होता है, पीठ दिखा देता है। न इसने पीठ दिखाई, न इसने तलवार निकाली, यह तीसरे ही तरह का आदमी था, जो खिलखिला कर हंसा! इन सैनिकों ने बहुत युद्ध देखे थे, बहुत लोग मारे थे, मारे गए थे, खुद मौत का सामना किया था, मृत्यु के अनुभव से निरंतर गुजरे थे, मगर ऐसा आदमी नहीं देखा था। उन्होंने सोचा, बेहतर है हम सिकंदर को पहले खबर कर दें।
एक तो वहीं रुका रहा कि संन्यासी पर नजर रखे, दूसरा भागा सिकंदर को गया, उसने कहा कि आदमी देखने जैसा है! अफलातून ने, तुम्हारे गुरु ने जो कहा संन्यासी ले आना, ठीक ही कहा। हमने बहुत आदमी देखे, मगर यह आदमी कुछ और तरह का आदमी है। यह आदमियों जैसा आदमी नहीं है। यह मौत की बात सुन कर हंसा--ऐसा हंसा कि भरोसा न आए! या तो यह पागल है, या यह किसी ऐसी अवस्था में है ऊंचाई की जहां हमारी कोई पहुंच नहीं है। आप खुद ही चलो। काटना हो आप खुद ही काट लो। और वह कहता है--गर्दन तो मैं पहले ही कटा चुका।
सिकंदर खुद गया। सिकंदर ने लिखा है कि जिंदगी में मैं दो बार अपने को छोटा अनुभव किया हूं। एक बार डायोजनीज से मिला था, तब--वह भी एक नंगा फकीर था यूनान का--और एक बार दंडामि, इस हिंदू संन्यासी से मिला, तब; दो बार मुझे लगा कि मैं ना-कुछ हूं। बाकि बड़े सम्राट देखे, दुनिया के बड़े ख्यातिनाम लोग देखे, उनके सामने मैं सदा बड़ा था। मेरे मुकाबले वे कुछ भी न थे। मगर इन दो फकीरों ने--दोनों नंगे फकीर थे मुझे एकदम झेंप से भर दिया।
दंडामि के सामने खड़े होकर सिकंदर ने कहा कि चलना होगा, अन्यथा यह तलवार है और मैं कठोर आदमी हूं, जैसा कहता हूं, वैसा करता हूं, यह गर्दन अभी कट जाएगी, यह सिर अभी गिर जाएगा। पता है दंडामि ने क्या कहा? दंडामि ने कहा: गिराओ, गिराओ, सिर को गिरा दो; मैं भी उसे गिरते देखूंगा, तुम भी उसे गिरते देखोगे। और अब तुम करोगे क्या, जो काम मेरा गुरु पहले ही कर चुका है! अब तो यह सिर ऐसा ही अटका है, जुड़ा नहीं है। यह तो कटा हुआ सिर है, कटे हुए को क्या काटते हो, मगर काटो! तुम भी देखोगे गिरते, मैं भी देखूंगा गिरते। सिकंदर की तलवार कहते हैं म्यान में वापिस चली गई। इस आदमी की रौनक, इस आदमी की आभा देख कर हतप्रभ होकर वापस लौट गया। जाते वक्त उस संन्यासी ने कहा: और ध्यान रखना, जो संन्यासी तुम्हारे साथ जाने को राजी हो जाए, वह ले जाने-योग्य नहीं है। वह संन्यासी नहीं है। जो संन्यासी है, उसका अब कैसा आना, कैसा जाना! ज्यूं का त्यूं ठहराया!
तो शीला! कट ही जाने दो गर्दन। गर्दन कट जाए तो झंझट मिटे। फिर भय भी मिट जाएगा। जब कट ही गई, तो कटने को कुछ और बचा नहीं। जब तक है, तब तक भय है। भय के ऊपर उठो।
ओशो, आप आंख खोलने के लिए कहते हैं, मगर आंखें खोलने में इतना भय क्यों लगता है?
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन ने एक रात सपना देखा कि कोई देवदूत प्रकट हुआ है--फरिश्ता--और कह रहा है: ले ले, यह निन्यानबे रुपये हैं ले ले! मुल्ला ने कहा: निन्यानबे! जैसा कि आदमी का मन होता है; कोई भी, तुम भी होते तो तुम कहते यह भी खूब रही, निन्यानबे क्या, जब देते ही हो तो कम से कम सौ दो। कुछ अड़चन मालूम होती है निन्यानबे के साथ। ‘निन्यानबे का चक्कर,’ कहानी तुमने सुनी है न। कुछ अड़चन होती है। निन्यानबे! तो मन सोचता है कि एक और हो। पूरा तो हो जाए! अधूरे में कुछ अड़चन होती है। तो, सपने में भी गणित नहीं टूटता आदमी का। मुल्ला ने कहा: जब देते ही हो, भाई, तो कम से कम सौ दो! बंधा नोट दो! यह क्या निन्यानबे! इस पर जिद्द होने लगी, फरिश्ता कहने लगा--लेना हो निन्यानबे ले लो; और मुल्ला कहने लगा कि लेंगे तो सौ लेंगे, अब एक के लिए यह क्या बात कर रहे हो! जब इतने दिलदार हो, जब इतने दूर से आए, तो एक रुपट्टी के लिए क्या कंजूसी दिखा रहे हो! इसी झगड़े में नींद खुल गई। आंख खुली तो न फरिश्ता था, न निन्यानबे रुपये थे। मुल्ला बहुत घबड़ाया। जल्दी से आंख बंद करके बोला: भाई, चलो निन्यानबे ही दे दो! मगर वहां अब कोई भी न था। चलो अट्ठानबे दे दो, जितने देना हो दे दो, कुछ तो दे दो! मगर वहां अब कोई भी न था।
इसलिए आंख खोलने में डर लगता है। कहीं सपना टूट न जाए। तुम निन्यानबे को सौ करने में लगे हो। सपने का यही अर्थ होता है--निन्यानबे को सौ करने में जो लगा है वह सपने में है। और निन्यानबे सौ नहीं होते हैं। निन्यानबे कभी सौ नहीं होते। निन्यानबे निन्यानबे ही रहते हैं। तुम्हें मैं कहानी कह दूं, तो खयाल में आ जाए।
एक सम्राट की मालिश करने वाला नाई रोज-रोज आता है, सुबह घंटे-दो घंटे सम्राट की मालिश करता है; पुरानी कहानी है, उसे एक रुपया रोज मालिश का मिलता। उन दिनों एक रुपया बहुत था। खुद खाता है, पड़ोस के लोगों को खिलाता है, मस्त है! सम्राट भी उसकी मस्ती से ईर्ष्या करता है। और कोई काम नहीं, दो घंटे मालिश कर लिए, फिर दिन भर मुक्त है, फिर बांसुरी बजाता है। वहीं सम्राट के सामने रहता है, उसकी बांसुरी की आवाज सम्राट को भी कभी-कभी सुनाई पड़ जाती। उसके घर से हमेशा हंसी के फव्वारे छूटते रहते--मित्र इकट्ठे होते हैं, भांग छनती है, गीत उठते हैं, ढोलक पर ताल पड़ती है, बांसुरी बजती है। फिर दूसरे दिन सुबह आकर दो घंटे मेहनत कर जाता है और फिर निश्चिंत हो जाता है। सम्राट ने अपने वजीर से कहा कि मेरे पास सब है, मगर मैं इतना निश्चिंत नहीं। न मैं बांसुरी बजा सकता हूं--फुर्सत कहां--न मैं हंस सकता हूं इस जैसा। इसके पास कुछ भी नहीं है। वजीर ने कहा: यही तो झंझट है, इसके पास कुछ भी नहीं है! यह अभी चक्कर में नहीं पड़ा। आप घबड़ाएं न, आपकी ईर्ष्या मैं मिटा दूंगा, मैं इसको कल चक्कर में डाले देता हूं।
रात में वह गया और निन्यानबे रुपये एक थैली में रख कर उस गरीब के घर में फेंक आया। सुबह उसने आंख खोली, निन्यानबे रुपये, गिनती की एकदम, निन्यानबे! बस सौ का चक्कर शुरू हुआ। उसने कहा: आज जो रुपया मिले, आज रबड़ी नहीं खरीदनी, आज भांग नहीं छनेगी, एक ही दिन की तो बात है, एक रुपया बच जाएगा, सौ हो जाएंगे, सौ पूरे हो जाएंगे। यह आदमी का मन कुछ अजीब पागल है, निन्यानबे से पता नहीं क्यों राजी नहीं होता! सौ पूरे हो जाएं! उस दिन न तो बांसुरी बजी, न मृदंग पर ताल पड़ी, न मित्र आए, न हंसी के फव्वारे छूटे--भूखा-प्यासा आदमी, क्या हंसी का फव्वारा छूटे! वह कल की राह देख रहा है। यह एक रुपया, यह तो मिला है तो सौ कर लिए।
सम्राट ने वजीर से कहा: क्या किया भाई, हद्द कर दी! आज कहां गया नाई, क्या हो गया उसको? वजीर ने कहा: अब कभी हंसी न उठेगी और अब कभी बांसुरी न बजेगी, आप फिकर न करें। आप जल्दी ही देखेंगे इसकी हालत खस्ता होती जाएगी। और उसकी हालत खस्ता होती चली गई। क्योंकि जब सौ हो गए, तो फिकर उसको लगी कि ऐसे अगर बढ़ते चले जाएं तो दो सौ हो सकते हैं। सौ तो हो ही गए, आधे तो हो ही गए, अब दो सौ में देर कितनी है! तो रोज अगर बचाऊं! तो रूखी-सूखी खाने लगा, दोस्तियां छोड़ दीं--इसीलिए तो धनपति दोस्ती नहीं करते। गरीब की दुनिया में दोस्ती होती है, गरीब की दुनिया में, अमीर की दुनिया में कहां दोस्ती! अमीर की दुनिया में सिर्फ व्यावसायिक नाते-रिश्ते होते हैं, व्यावसायिक संबंध होते हैं, दोस्ती नहीं होती, मित्रता नहीं होती, क्योंकि कौन खर्चा ले, कौन झंझट ले! अमीर देने में डरता है, है उसके पास मगर देने में डरता है। गरीब के पास कुछ नहीं है, इसलिए देने में डरता ही नहीं--वैसे ही कुछ नहीं है, अब और क्या ले जाओगे! इतना है, यह भी ले लो तो कुछ हर्जा नहीं--क्या खोता है!
मगर अब इसके पास सौ रुपये थे और मुसीबत हो गई! और दिन में दो-चार बार जाकर टटोल कर अपने रुपये देख लेता था और डर भी पैदा होने लगा कि कोई चोर को पता चल जाए, घर में इतने आदमियों का आना-जाना ठीक नहीं है। आना-जाना लोगों का बंद करवा दिया। खुद भी यहां-वहां जाना बंद कर दिया, क्योंकि घर से बाहर जाए--अकेला ही आदमी था--कोई चोर घुस जाए, कुछ हो जाए, कोई ले जाए! रात भी सोता था तो वह निश्चिंतता न रही। चिंताएं आएं। रात में एकाध-दो दफे उठ कर जाकर देख ले कि सब ठीक-ठाक है? सूखने लगा। पंद्रह दिन में ही उसकी हालत खराब थी। सम्राट ने पूछा कि भाई, तुझे हुआ क्या है? कहां गई तेरी रौनक? कहां गया तेरा रस, तेरी मस्ती? यह वजीर ने क्या किया तेरे साथ? उस आदमी ने कहा: वजीर ने! वह आदमी खिलखिला कर हंसने लगा, उसने कहा, अब मैं समझा। तो यह वजीर की शरारत है! वह मुझे मार ही डालता, अच्छा बता दिया आपने! मुझे निन्यानबे के चक्कर में डाल दिया।
निन्यानबे का चक्कर है एक। वही सपना है।
तुम पूछते हो: ‘आप आंख खोलने के लिए कहते हैं, मगर आंख खोलने में इतना भय क्यों लगता है?’
इसीलिए कि आंख बंद है तो तुम्हारा सपना सच मालूम होता है। तुम आंख खोल कर देखोगे तो जिसके प्रेम में मरे जा रहे थे, पाओगे वहां कुछ भी नहीं है--हड्डी-मांस-मज्जा है। आंख खोल कर देखोगे तो जिस पद के लिए दीवाने हुए थे, वहां कुछ भी नहीं है। ऊंची कुर्सियों पर बैठ जाने का रस छोटे-छोटे बच्चों जैसा है, जो कूड़े-कचरे के ढेर पर चढ़ जाते हैं और चिल्ला कर कहते हैं कि मैं सबसे ऊंचा हूं। दिल्ली में वही कूड़े-कचरे के ढेरों पर चढ़े हुए लोग चिल्लाते रहते हैं कि मैं सबसे ऊंचा हूं। तुमने देखा न, छोटा बच्चा कभी तुम्हारे पास ही आकर कुर्सी के हत्थे पर चढ़ कर खड़ा हो जाता है और कहता है--पिताजी, मैं आपसे बड़ा हूं। तुम हंस कर रह जाते हो, तुम जानते हो बचकाना है। अभी बच्चा है, इसे कुछ पता नहीं। ये कोई बड़े होने के ढंग नहीं हैं। लेकिन कोई राष्ट्रपति हो गया, कोई प्रधानमंत्री हो गया, तुम सोचते हो कुछ भेद हो गया? कुर्सी पर चढ़ गया। अब वह कह रहा है--मैं बड़ा हूं। और उसे पक्का भरोसा आने लगता है कि मैं बड़ा हूं, क्योंकि कुर्सी को लोग नमस्कार करते हैं। वह सोचता है नमस्कार मुझे हो रही है।
एक रथ के सामने एक गधा चल रहा था। रथ में बैठे सम्राट को लोग झुक-झुक कर नमस्कार कर रहे थे, गधा बहुत अकड़ गया। गधा जोर-जोर से रेंकने लगा। सम्राट ने कहा: इस गधे को क्या हुआ? सम्राट के वजीर ने कहा: यह लोगों की नमस्कार इसके दिमाग को खराब किए दे रही है। यह आगे-आगे चल रहा है, इसको आपका कुछ पता नहीं है, इसके पीछे रथ आ रहा है इसका पता नहीं है, और पता भी हो तो शायद यही सोच रहा हो कि मेरे पीछे रथ चलते हैं, और मेरे आगे लोग नमस्कार करते हैं--सम्राट मेरे पीछे चलते हैं और लोग झुक-झुक कर मुझे नमस्कार करते हैं, इस गधे का दिमाग फिरा जा रहा है। एक तो गधा और फिर दिमाग फिरा, इसकी हालत खराब हुई जा रही है, यह पगला जाएगा।
राजधानियों में तुम इसी तरह के लोग पाओगे। कुर्सी को लोग नमस्कार कर रहे हैं। कुर्सी से हटते ही कोई नमस्कार करने नहीं आता। तुमने देखा न कुर्सी पर आदमी बैठता है, लोग कहते हैं--जिंदाबाद। कुर्सी से उतरा कि मुर्दाबाद। असली बात--कुर्सी जिंदाबाद। तो जो कुर्सी पर है--वह भी जिंदाबाद हो जाता है। कुर्सी पर बैठे आदमी की लोग झुक-झुक कर स्तुतियां करते हैं। खुशामद करते हैं। उसके अहंकार को फुलाते हैं। कुर्सी से उतरा नहीं आदमी कि फिर कोई पूछता नहीं। इसीलिए तो जो कुर्सी पर एक बार चढ़ जाता है, वह उतरता नहीं। लाख उपाय करता है चढ़ा ही रहे। क्योंकि उसे भी शक तो होता ही है कि कहीं उतर गया कुर्सी से, पता नहीं फिर क्या मेरी हालत हो! लोग चाहते हैं कि कुर्सी पर ही रहते-रहते मर जाएं।
सपना तुम पद का देख रहो हो, आंख खोलोगे तो वहां कुछ भी न पाओगे। सपना तुम धन का देख रहो हो, आंख खोलोगे हाथ में राख पाओगे। इसलिए डर तो स्वाभाविक है। आंख खोलने से सपने टूट जाएंगे, एक बात। और फिर सच दिखाई पड़ेगा, वह और भी खतरनाक है--कि पता नहीं कैसा हो सच! अनुकूल पड़े न पड़े! और सच ने कोई कसम थोड़े ही खाई है कि तुमसे अनुकूल पड़ेगा। सच तुम्हारे अनुकूल पड़ता ही नहीं। तुम्हीं को सच के अनुकूल पड़ना पड़ता है। और यही अड़चन है। झूठ की एक खूबी है कि वह तुम्हारे अनुकूल होता है।
इसको सूत्र की तरह समझो, इसे खूब गहरा पकड़ लो। झूठ की यह खूबी है--इसीलिए तो झूठ इतना सफल है दुनिया में--वह हमेशा तुम्हारे अनुकूल होता है। वह कहता है--तुम जैसे, वैसा मैं। मैं सदा तुम्हारे साथ हूं। तुम लाल तो मैं लाल, तुम पीले तो मैं पीला; तुम दिन को रात कहो तो मैं दिन को रात कहता; तुम रात को दिन कहो तो मैं रात को दिन कहता। मैं तो तुम्हारा अनुगामी हूं, मैं तो तुम्हारा दास। झूठ के साथ एक सुविधा है कि वह सदा तुम्हारे अनुकूल होता है। सत्य के साथ असुविधा है--तुम्हें सत्य के अनुकूल होना पड़ता है। अगर रात है तो रात है, तुम लाख चिल्लाओ कि दिन है, सत्य नहीं कहेगा कि यह दिन है।
सत्य के अनुकूल तुम्हें होना पड़ेगा, तो तुम्हें अपने बहुत से अंग काटने होंगे। तुमने झूठ की दुनिया में रह-रह कर जो अंग अपने बना लिए हैं, एक अपनी तस्वीर बनाई है। एक अपनी प्रतिमा निर्मित की है, वह सारी प्रतिमा खंडित होगी, फिर नये सिरे से शुरू करना पड़ेगा, फिर बारहखड़ी, फिर अ ब स से शुरू करना पड़ेगा। पुराना कुछ काम नहीं आएगा। अब तक जो सोचा था अपना परिचय है, वह काम नहीं आएगा। अब अपना नया परिचय खोजना होगा।
और सत्य के अनुकूल होने में अड़चनें आएंगी। अड़चनें इसलिए आएंगी कि बाकी सारे लोग झूठ के अनुकूल हैं। तुम एकदम अजनबी हो जाओगे। तुम भरी दुनिया में अकेले हो जाओगे। मित्र किनारा काटने लगेंगे--क्योंकि कौन झंझट लेना चाहता है--अपने पराए हो जाएंगे। सब तरफ तुम अड़चन पाओगे, सब तरफ तुम अनुभव करोगे कि तुम्हारे बीच और लोगों के बीच फासला बढ़ता जा रहा है। तुम जितने सत्य के करीब आओगे, उतने लोगों से दूर होते जाओगे। तुमने सुना है कि संन्यासी समाज को छोड़ कर भाग जाते थे, मैं कहता हूं भागना मत समाज को छोड़ कर, लेकिन एक बात तो होने वाली है, समाज में रहोगे तो भी तुम समाज के न रह जाओगे। समाज और तुम्हारे बीच एक अंतराल हो जाएगा, एक खाई पड़ जाएगी। तुम सत्य के अनुकूल होने की चेष्टा में लगोगे और समाज अभी झूठ में जी रहा है--समाज का अभी निन्यानबे का फेर जारी है--कैसे मेल बैठे? कैसे तालमेल हो? विसंगति हो जाएगी। और जीना तो इन्हीं लोगों के साथ है।
तो बड़ी कला सीखनी पड़ेगी कि जब तुम्हारे भीतर सब बदल गया हो, तब उनके साथ कैसे जीना जिनके भीतर कुछ भी नहीं बदला है। ऐसा ही समझो कि पागलखाने में एक आदमी जीए जो पागल नहीं है। उसकी अड़चन समझो। उसे बड़ी व्यवस्था रखनी पड़ेगी। उसे कम से कम इतना दिखावा जारी रखना पड़ेगा कि मैं भी भाई पागल हूं, तुम्हारे जैसा ही हूं। भीतर एक हो जाएगा और बाहर एक अभिनय करना होगा। ठीक संन्यासी सम्यकरूपेण अभिनय की कला में कुशल हो जाते हैं। अभिनय का मतलब, नाहक दूसरों को क्यों दुख देना? जो सोए हैं और जो अभी सोए रहने का निर्णय किए हैं, उनकी नींद अकारण नहीं तोड़ देनी है। किसी को यह हक नहीं है। उन्हें सोने दो। जब उनका समय पकेगा तब वे जागेंगे। उनके झूठों को भी नाहक उनकी मर्जी के विपरीत उन्हें दिखलाओ मत, अन्यथा वे नाराज हो जाएंगे, अन्यथा वे तुमसे बदला लेंगे, प्रतिशोध लेंगे।
ये बड़ी कठिनाइयां हैं। पहले तो अपने सपने गए, जो-जो सुंदर था वह गया, और फिर आया सत्य, और सत्य के साथ फिर अपने को बदलना पड़ेगा।
एक खुद्दार आदमी का जमीर
वक्त से कब शिकस्त खाता है
यह दिया हादसों की आंधी में
और शिद्दत से जगमगाता है
बड़ी हिम्मत चाहिए। बड़ी स्वतंत्रता चाहिए। बड़ा साहस चाहिए।
एक खुद्दार आदमी का जमीर
बड़ा मजबूत अंतःकरण चाहिए। एक केंद्रित चेतना चाहिए। एक श्रद्धा चाहिए स्वयं के अस्तित्व पर।
एक खुद्दार आदमी का जमीर
वक्त से कब शिकस्त खाता है
तभी तुम जीत सकोगे, नहीं तो समय तुम्हें हरा देगा।
यह दीया हादसों की आंधी में
अगर भीतर श्रद्धा का बल हो, आत्मबल हो, तो फिर यह दीया आंधियों से बुझता नहीं। ‘यह दीया हादसों की आंधी में’--आपदाओं की आंधी में--‘और शिद्दत से जगमगाता है’--और तेजी से जगमगाता है। तुम डरते हो कि पता नहीं यह दीया बुझ न जाए। नहीं, हिम्मत जुड़ाओ; जागो, खोलो आंख, जाने दो सपनों को--सपने हों तो भी किसी काम के नहीं; जितनी देर सपनों में रहे, उतना समय व्यर्थ गया, झूठी कल्पनाजाल से कुछ हित होने का नहीं है--जागो! और सत्य के साथ अड़चनें आएंगी, कठिनाइयां आएंगी, चुनौतियां आएंगी, मगर घबड़ाओ मत--
यह दीया हादसों की आंधी में
और शिद्दत से जगमगाता है
और नई रौनक आएगी। धार आएगी तुम्हारे दीये पर। सब आंधियां उपद्रव की तुम्हें और निखारेंगी, तुम और जगमगाओगे।
शमअ की लौ में उभर आई हैं जुल्मत की रगें
बदले लेने पै हैं आमादा पतंगों की कतार
कितने अल्हड़ यह सिपाही हैं, कि डरते ही नहीं
मरते जाते हैं मगर हैं, कि चले आते हैं
जम के मैदां से कदम उनके उखड़ते ही नहीं
जिंदगी के नये अंदाज बता जाते हैं
आग को आग समझते नहीं, हटते ही नहीं
अपनी लाशों से बना देते हैं, शोले का मजार
ताकि वो नस्लें जो कल आएंगी महफूज रहें
पतंगों से सीखो! सत्य का खोजी पतंगा है। रोशनी की तलाश में चला है। मौत घटेगी रोशनी के मार्ग पर।
शमअ की लौ में उभर आई हैं जुल्मत की रगें
बदले लेने पै हैं आमादा पतंगों की कतार
देखा है पतंगों को मरते शमा पर? दीये के पास ऐसा कुछ नहीं हो जाता कि एक पतंगा मर गया, तो दूसरा पतंगा रुक जाए। कतार चली आती है।
बदले लेने पै हैं आमादा पतंगों की कतार
कितने अल्हड़ यह सिपाही हैं, कि डरते ही नहीं
मरते जाते हैं मगर हैं, कि चले आते हैं
जम के मैदां से कदम उनके उखड़ते ही नहीं
आग को आग समझते नहीं, हटते ही नहीं
ऐसी ही साहस की क्षमता चाहिए, ऐसे ही जमना पड़ेगा, ऐसे ही लड़ना पड़ेगा। संन्यास का अर्थ है: रोशनी की तलाश में पतंगे की तरह अपने को गंवाने की हिम्मत। यह सौदा महंगा सौदा है। यह जुआरियों का सौदा है। तुम आंख खोलने से डरते हो? सभी डरते हैं। इससे आत्मनिंदा मत लेना। लेकिन डर कर रुकने की जरूरत नहीं है। चुनौती बनाओ इसे। आंख खोलो। जैसा है उसे वैसा ही देखो, तो ही तुम्हारे जीवन में आनंद की वर्षा हो सकती है। सत्य के अतिरिक्त न कभी आनंद फला है, न फल सकता है।
ओशो, इस सृष्टि में अनेक प्राणी प्रकृति के अनुसार सहज जीवन बिता रहे हैं, लेकिन मानव-जाति निकृष्ट जीवन बीता रही है। मनुष्य जीवन सहज जीवन की ओर मुड़ेगा या नहीं? हमारा कर्तव्य क्या है?
मनुष्य का महत्वपूर्ण लक्षण उसकी स्वतंत्रता है। मनुष्य हकदार है चुनने का अपनी जीवन-व्यवस्था को। एक कुत्ता कुत्ते की तरह पैदा होता है और कुत्ते की तरह ही मरता है। एक गुलाब का पौधा गुलाब की तरह पैदा होता है और गुलाब की तरह ही मरता है। कोई क्रांति नहीं घटती जीवन में। जीवन वैसे का ही वैसा, ढांचे में बंधा होता है। एक परतंत्रता है। शांति तो जरूर है, लेकिन गुलामी की शांति है। स्वाभाविकता भी जरूर है; कपट नहीं, पाखंड नहीं, गुलाब बस गुलाब है, चंपा होने का कभी धोखा नहीं देता और न कमल होने का आयोजन करता है, जो है, जैसा है, राजी है। पर यह स्वतंत्रता नहीं है। गुलाब गुलाब होने को बंधा है।
आदमी की खूबी क्या है? आदमी का लक्षण क्या है? इस सारी प्रकृति में आदमी अकेला ही है जिसके यह क्षमता के भीतर है कि जो चाहे हो जाए। चाहे तो गुलाब जैसा सुंदर, और चाहे तो बबूल का झाड़ हो जाए। चाहे तो कांटे ही कांटे उगा ले और चाहे तो फूल ही फूल हो जाए। चाहे तो घास ही रह जाए और चाहे तो कमल हो जाए। यह आदमी की खूबी है। आदमी स्वतंत्र है, तरल है, मुक्त है। आदमी के पास आत्मा है, आदमी चुनाव कर सकता है। अधिक लोग गलत चुनाव करते हैं, इससे चुनावे करने की क्षमता की निंदा नहीं होती। कुछ थोड़े से लोग ही ठीक को चुनते हैं। क्योंकि ठीक को चुनना कुछ कठिन मालूम होता है।
नीचे उतरना सदा आसान है। जैसे पहाड़ से कोई उतरता हो। इसलिए आदमी नीचे की तरफ उतरने में आसानी पाता है। वृत्तियां नीचे की तरफ उतरना है, विवेक ऊपर की तरफ चढ़ना है। बेहोशी नीचे की तरफ उतरना है, होश ऊपर की तरफ चढ़ना है। पहाड़ पर चढ़ने में अड़चन तो होती है, पसीना तो आता है, हाथ-पैर थक जाते हैं, शरीर टूटता है, मगर जो शिखर पर पहुंचते हैं वे ही शिखर पर होने का आनंद जानते हैं। नीचे उतरना सुगम है, लेकिन पहुंचोगे आंधियों की घाटी में। ऊपर चढ़ना कठिन है, लेकिन सूरज से मुलाकात होगी, बादलों से आलिंगन होगा, मुक्त और निर्मल आकाश उपलब्ध होगा। महंगा तो है, लेकिन परिणाम अदभुत है।
आदमी जैसा होना चाहिए वैसा पैदा नहीं हुआ है। आदमी को स्वतंत्रता है वैसा होने की। या चाहे, न होना हो तो न होने की। इसलिए एक क्षण में भी कभी-कभी क्रांति हो जाती है। नीचे जाता हुआ आदमी कभी एक क्षण में पुकार सुन लेता है ऊपर जाते किसी आदमी की, या पहाड़ की चोटी से, शिखर से आते हुए किसी बुद्धपुरुष की वाणी उसके कान में पड़ जाती है, एक क्षण में क्रांति हो जाती है। क्योंकि मामला इतना ही है। कुछ ऐसा नहीं है कि नीचे जाने के लिए हम बंधे हैं, हमने चुना है इसलिए नीचे जा रहे हैं। जिस क्षण तय कर लेंगे कि अब नीचे नहीं जाना है, कोई दुनिया की ताकत हमें नीचे नहीं ले जा सकती।
तुमने पूछा कि ‘इस सृष्टि में अनेक प्राणी हैं जो प्रकृति के अनुसार सहज जीवन बिता रहे हैं, लेकिन मानव-जाति निकृष्ट जीवन बिता रही है।’
क्योंकि मनुष्य-जाति स्वतंत्र है। और वे प्राणी स्वतंत्र नहीं हैं। सुकरात का प्रसिद्ध वचन है कि मैं संतुष्ट सुअर होने के बजाय असंतुष्ट सुकरात होना पसंद करूंगा। ठीक है, संतुष्ट सुअर आखिर सुअर है। असंतुष्ट सुकरात आखिर सुकरात है। सिर्फ संतोष में ही तो सब-कुछ नहीं है। संतोष सचेत होना चाहिए, तब कुछ है।
शांति अनिवार्य हो, उसका कोई मूल्य नहीं है। जब शांति अनिवार्य नहीं है, स्वेच्छा से है, चुनी हुई है, तब उसका मूल्य है। तुम्हें गीत मजबूरी में गाना पड़े--कोयल ऐसे ही तो गाती है, मजबूरी में; इसलिए कोयल कभी बैजू बावरा हो पाएगी, यह मत सोचना। कभी नहीं हो पाएगी। मजबूरी है, यंत्रवत है, गाना ही पड़ता है। फिर कोयल वही गीत गाती रही है, करोड़ों-करोड़ों वर्षों से, कहीं कोई विकास नहीं होता, आदमी अकेला विकासमान है। देखते हो, करोड़ वर्ष पहले भी कोयल यही गीत गाती थी, यही धुन, यही सुर, यही रंग, यही राग, अब भी वही गाती है, आगे भी वही गाएगी, यह पुनरुक्ति है। आदमी अपने गीत को बदलता है, अपने तरन्नुम को बदलता है। आदमी ऊंचाइयों की तलाश करता है। हालांकि यह भी सच है कि ऊंचाइयों की तलाश की स्वतंत्रता के कारण आदमियों को नीचे गिर जाने की भी सुविधा है। तो कोई आदमी बुद्ध हो जाता है, कोई आदमी एडोल्फ हिटलर हो जाता है। मगर मैं तुमसे कहूंगा, एडोल्फ हिटलर जिस क्षण चाहे उस क्षण बुद्ध हो सकता है। कोई रुकावट नहीं है। अपना ही निर्णय है। निजी निर्णय है। इस निजी निर्णय को जगाओ।
सहज तो होना है, लेकिन सहज होना है सचेत होकर, अनिवार्यरूपेण नहीं। स्वतंत्रता का फल होना चाहिए सहजता। बुद्ध भी सहज हैं, लेकिन यह सहजता और है। यह सहजता वही नहीं जो गुलाब के फूल की है। यह मजबूरी नहीं है, यह बंधन नहीं है। गुलाब का फूल तो बंधा है, जंजीरों में बंधा है। जरा गौर से देखना, कितना ही सुंदर हो लेकिन हाथ पर जंजीरें हैं। कुछ और नहीं हो सकता। सब तरफ से सीमित है। बुद्ध अपने निर्णय से खिले हैं। जो भी फूल पैदा हुआ है बुद्ध में, वह खुद का ही निर्णय, खुद का ही श्रम, खुद की ही साधना का परिणाम है। अपूर्व आनंद है वहां!
पूछा तुमने: ‘मनुष्य सहज जीवन की ओर मुड़ेगा या नहीं?’
तुम मनुष्य की फिकर छोड़ो। तुम अपनी फिकर लो। मनुष्य का तो कौन निर्णय करे? स्वतंत्रता तो अनिर्णीत ही रहेगी, निर्णय नहीं हो सकता। हां, तुम चाहो तो अपने लिए निर्णय ले सकते हो। मैं अपने लिए निर्णय लिया हूं, तुम अपने लिए निर्णय ले सकते हो। प्रत्येक व्यक्ति को निजी निर्णय करना है और निज घोषणा करनी है। तुम मनुष्य की फिकर छोड़ो; मनुष्य यानी कौन? तुम्हें मनुष्य कहीं मिलेगा? मनुष्य कहीं नहीं मिलेगा। कहीं अ मिलेगा, कहीं ब मिलेगा, कहीं स मिलेगा, मनुष्य कहीं नहीं मिलेगा। कहीं राम मिलेंगे, कहीं रहीम मिलेंगे, मनुष्य कहीं नहीं मिलेगा। मनुष्य होते ही नहीं। मनुष्य तो केवल एक शाब्दिक सिद्धांत है। तो तुम जब पूछते हो कभी मनुष्य स्वतंत्र होगा कि नहीं, तो तुम गलत बात पूछते हो। तुम तो इस तरह की बात पूछ रहे हो कि कभी ऐसी मजबूरी आ जाएगी मनुष्य पर कि वह असहज न हो सके। वह तो मनुष्य की हत्या होगी। वह तो मनुष्य की सारी गरिमा खो जाएगी। नहीं, मनुष्य को हक सदा रहेगा कि वह चाहे तो तैमूरलंग हो, चाहे तो दादू हो जाए, चाहे तो प्रेम के आकाश में उठे और चाहे तो घृणा के पाताल में खो जाए।
मनुष्य एक सीढ़ी है। और सीढ़ी हमेशा दो दिशाओं में होती है--नीचे की तरफ भी होती है, ऊपर की तरफ भी होती है। वही सीढ़ी जिससे तुम नीचे जाते हो, उसी से तुम ऊपर जाते हो। अब तुम अगर यह कहो कि क्या कभी ऐसी भी सीढ़ी होगी जो सिर्फ ऊपर ही जाए, तो तुम गलत बात पूछ रहे हो। जो सीढ़ी सिर्फ ऊपर ही जाती है, वही सीढ़ी नहीं है! सीढ़ी को दोनों तरफ जाना होता है--ऊपर भी, नीचे भी। हां तुम्हारी मर्जी है, तुम चाहो ऊपर चढ़ो, तुम चाहो नीचे जाओ। इसलिए धर्म व्यक्ति का मूल्य मानता है, समाज का कोई मूल्य नहीं मानता। धर्म वैयक्तिक है, सामाजिक नहीं।
और यह आकस्मिक नहीं है कि जो लोग समाज का बहुत मूल्य मानते हैं, वे सभी धर्म के विपरीत हैं। कम्युनिस्ट, फॉसिस्ट, सोशलिस्ट और उस तरह के मार्के के सारे लोग धर्म के विपरीत हैं। होंगे ही, क्योंकि बुनियादी भेद है। वे मनुष्य को समाज की तरह स्वीकार करते हैं, वे व्यक्ति की कोई गरिमा नहीं मानते। और इसलिए वे सभी स्वतंत्रता के विपरीत हैं, विरोधी हैं। अगर रूस में स्वतंत्रता मर गई है और चीन में मर गई है, तो यह कोई दुर्घटना नहीं है, यह साम्यवाद का सहज परिणाम है। साम्यवाद व्यक्ति को मानता ही नहीं। साम्यवाद कहता है--समाज की नियति होती है, व्यक्ति की कोई नियति नहीं होती। व्यक्ति होता ही नहीं। व्यक्ति तो केवल समाज का एक अंग है। अंगमात्र।
धर्म की देशना और है। धर्म का मानना है--व्यक्ति आधार है। समाज तो व्यक्तियों के जोड़ का नाम है। समाज के पास कोई आत्मा नहीं है। समाज तो निर्जीव शब्द है, कोरा शब्द है। ऐसा ही जैसे जब तुम कहते हो--जंगल। जंगल कहीं देखा? जाओ, खोजो, जंगल कभी नहीं मिलेगा, मिलेंगे वृक्ष। वृक्ष होते हैं, जंगल नहीं होता, बहुत वृक्ष साथ होते हैं तो उसका नाम--जंगल। यहां तुम बैठे हो इतने लोग--पांच सौ मित्र यहां बैठे हैं--एक समूह यहां बैठा है। तुम सोचते हो सच में कोई समूह यहां बैठा है? यहां पांच सौ व्यक्ति बैठे हैं, समूह इत्यादि का कोई अर्थ नहीं होता। तुम तुम हो, तुम्हारा पड़ोसी पड़ोसी है। यहां पांच सौ जीवंत चेतनाएं बैठी हैं, यहां पांच सौ दीये जल रहे हैं--अलग-अलग, अपनी-अपनी रोशनी से, अपने-अपने ढंग से। और मनुष्य का यह अनिवार्य लक्षण है कि वह जो चाहे हो सकता है--निम्न से निम्नतम और श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम।
यह बात सच है कि मनुष्य अगर गिरे तो पशुओं से बहुत नीचे गिर जाता है और मनुष्य अगर उठे तो देवताओं से बहुत ऊपर उठ जाता है। देवता भी बंधे हैं, जैसे पशु बंधे हैं। इसलिए भारत के मनीषियों ने एक अपूर्व बात कही है कि अगर देवताओं को भी मोक्ष चाहिए हो तो पहले मनुष्य होना पड़ेगा। मनुष्य दोराहा है। पशुओं को मुक्त होना हो तो मनुष्य होना पड़ेगा और देवताओं को मुक्त होना हो तो मनुष्य होना पड़ेगा। क्यों? क्योंकि देवता तो बड़े ऊपर गए हुए हैं? ऊपर तो गए हुए हैं, लेकिन देवता शुभ करने को मजबूर हैं। वहां स्वतंत्रता नहीं है। वहां सुख अनिवार्य है। वहां रोशनी जबर्दस्ती है, उनका चुनाव नहीं है। उन्हें चौराहे पर लौटना पड़ेगा, जहां से सब रास्ते खुलते हैं।
आदमी चौराहा है, जहां से सब रास्ते खुलते हैं। इसलिए आदमी अगर नीचे गिरे तो कोई पशु उसका मुकाबला नहीं कर सकता। जंगली से जंगली जानवर भी आदमी का मुकाबला नहीं कर सकते। कोई जंगली जानवर जब भरे-पेट हो तो किसी को मारता नहीं। भूखा हो तो मारता है! आदमी बड़ा अजीब है। जब भरे-पेट होता है तब शिकार को निकलता है। कोई पशु अपनी ही जाति के प्राणियों को नहीं मारता--कोई सिंह सिंह को नहीं मारता, कोई कुत्ता किसी कुत्ते को नहीं मारता है--अकेला आदमी है जो आदमी को मारता है। और खूब मारता है। और बड़े आयोजन से मारता है। और बड़े झंडे इत्यादि उठा कर और बड़े दर्शनशास्त्र खड़े करके मारता है। और इस ढंग से मारता है कि लगे कि कोई बड़ा काम कर रहा है। हो रहा है कुल मारा जाना, लेकिन ऊंचे-ऊंचे नाम--कभी धर्म की आड़, कभी राजनीति की आड़, कभी देश की आड़, कभी स्वतंत्रता की आड़; कभी लोकतंत्र, कभी समाजवाद, न मालूम कैसे-कैसे शब्द, ऊंचे-ऊंचे शब्द, और आकर पीछे गौर से अगर देखो तो आदमी आदमी को मारने में लगा हुआ है। शांति की बातें करता है, युद्ध की तैयारी करता है। कहता है--शांति होगी कैसे अगर युद्ध के अस्त्र-शस्त्र पास में नहीं होंगे।
आदमी का पूरा इतिहास युद्धों का इतिहास है। पशु-पक्षी तो कभी मार लेते हैं जब उन्हें भूख लगी होती है। आदमी का मारना जघन्य है, अपराधपूर्ण है, पाप है। आदमी पशुओं से नीचे गिरता है, लेकिन देवताओं से ऊपर भी उठ जाता है। ये कथाएं व्यर्थ ही नहीं हैं कि जब बुद्ध को ज्ञान उत्पन्न हुआ तो देवता स्वर्ग से उतरे और उन्होंने फूल बरसाए। ऐसा वस्तुतः हुआ कि नहीं, यह सवाल नहीं है, ये कोई ऐतिहासिक घटनाएं नहीं है, ये तो प्रतीक कथाएं हैं। ये यह कह रही हैं कि जब कोई आदमी बुद्धत्व को उपलब्ध होता है, तो देवता छोटे पड़ जाते हैं। बस उनका काम फूल बरसाने का रह जाता है। बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध हुए तो देवता उनके चरणों में आकर झुके। उनके चरणों की धूल सिर पर चढ़ाई। बुद्धत्व देवत्व से ऊपर है। आदमी की सहजता जबर्दस्ती आने वाली बात नहीं है। आदमी सदा मुक्त रहेगा। इसलिए यह तो मत पूछो कि मनुष्य कभी सहज जीवन की ओर मुड़ेगा कि नहीं? एक-एक व्यक्ति अपना-अपना निर्णय ले सकता है।
और फिर तुमने पूछा है: ‘हमारा कर्तव्य क्या है?’
कर्तव्य ही तो असहज कर देता है। कर्तव्य का मतलब ही यह होता है... कोई पशु ने कभी पूछा है हमारा कर्तव्य क्या है? पशुओं को जो होता है हो रहा है, कर्तव्य का कोई सवाल नहीं। आदमी पूछता है हमारा कर्तव्य क्या है? उसी कर्तव्य में स्वतंत्रता छिपी है। हम क्या करें? क्योंकि आदमी दोनों काम कर सकता है--बुरा भी और अच्छा भी। मेरा जोर इस पर नहीं है कि तुम अच्छा काम करो, क्योंकि यह होता है, अक्सर हुआ है कि अच्छा काम करने में भी तुम मूर्च्छित रहे आते हो। तो तुम्हारा अच्छा काम भी यंत्रवत हो जाता है। मेरा जोर कर्तव्य पर नहीं है, मेरा जोर बोध पर है। तुम जो भी करो, बोधपूर्वक करो। वही एकमात्र कर्तव्य है। बुरा भी करो तो बोधपूर्वक करो। और तुम चकित हो जाओगे कि बुरा हो ही नहीं सकेगा। चोरी करने जाओ, बोधपूर्वक जाओ; ऐसे जाओ जैसे विपस्सना ध्यान कर रहे हो; और तुम चोरी नहीं कर पाओगे। तो मैं तुमसे यह नहीं कहता कि चोरी मत करो--क्योंकि एक तरफ से चोरी रोको, आदमी दूसरी तरफ से करता है। इधर से रोको, उधर से करता है; आदमी नई तरकीबें निकाल लेता है। आदमी तरकीबें निकालने में कुशल है, कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है, कि चोरी हो सकती हो और चोरी पकड़ी न जाए और चोरी चोरी न मालूम पड़े।
एक तरफ से चोरी रोको, दूसरी तरफ से शुरू हो जाती है। आदमी को कहो यह काम बुरा है, तो वह वह काम बंद कर देता है, मगर उसके भीतर की चेतना तो नहीं बदली, वही का वही आदमी है, कहीं और करेगा। देखा तुमने, महावीर ने कहा कि खेती-बाड़ी में हिंसा है। तो जैनियों ने खेती-बाड़ी बंद कर दी। लेकिन इससे क्या तुम सोचते हो जैन हिंसक नहीं रहे? खेती-बाड़ी की हिंसा नहीं रही, मगर उनकी हिंसा दुकान पर शुरू हो गई। बाजार में बैठ गए, वही हिंसा और शायद ज्यादा बढ़ गई। क्योंकि अब एक उनको आड़ भी मिल गई धर्म की।
तुम्हें पता है कि जैन धर्म के मानने वाले सभी व्यवसायी क्यों हैं? वह इसीलिए कि कृषि का तो उपाय नहीं रहा। अगर तुम खेत बनाओगे, पौधे काटोगे, तो हिंसा होगी। मगर काटने की वृत्ति तो थी, तो दुकान पर बैठ कर आदमियों को काटने लगे। बचाव इतना आसान नहीं है। इधर से रोको, उधर शुरू हो जाता है। एक तरफ से बीमारी को रोको, दूसरी तरफ से प्रकट हो जाती है। दबाने से काम नहीं चलेगा। तुम मुझसे कर्तव्य मत पूछो। मैं तुम्हें यह नहीं कहता कि तुम ऐसा करो, वैसा करो, क्योंकि मजबूरी हो जाएगी, जबर्दस्ती थोप लोगे। मैं तुमसे कहता हूं: जो भी करो होशपूर्वक करो।
ऐसा हुआ कि एक बौद्ध भिक्षु रास्ते से गुजरता था और एक वेश्या ने उसके जाकर चरणों में सिर रख दिया और कहा: मेरा निवेदन है कि इस वर्ष चतुर्मास, वर्षाकाल मेरे घर में बिताएं। और भी भिक्षु साथ थे। यह भिक्षु अति सुंदर था, वेश्या मोहित हो गई थी। उसने सम्राट देखे थे, मगर ऐसा प्यारा भिक्षु नहीं देखा था। ऐसा आदमी ही नहीं देखा था। यह शान ही कुछ और थी! अक्सर ऐसा हो जाता है। संन्यास एक तरह की गरिमा देता है, एक तरह का सौंदर्य देता है, एक तरह की दीप्ति जो साधारणतः नहीं पाई जाती, एक प्रसाद। वेश्या पहचान गई सौंदर्य को--सौंदर्य की उसकी परख थी। सौंदर्य ही उसका व्यवसाय था। इस सुंदरतम आदमी को देख कर वह नहीं रोक सकी अपने को। उसने चरणों में सिर रख दिया और उसने कहा कि मैं हटूंगी नहीं। मुझे आश्वासन दो कि इस वर्ष चार माह वर्षा के तुम मेरे यहां बिताओगे। वर्षा सर पर थी, आषाढ़ के पहले बादल घिरने शुरू हो गए थे--और भिक्षुओं का नियम है कि वे चार महीने वर्षा के कहीं एक जगह रुक जाएं। उसने कहा--मैं कल भगवान को पूछ कर उत्तर दे दूंगा।
दूसरे भिक्षु जो खड़े देख रहे थे, ईर्ष्या से जल गए। वेश्या अपूर्व सुंदरी थी। दूर-दूर तक ख्यातिलब्ध थी। बड़े सम्राट उसके द्वार पर खड़े रहते थे। ईर्ष्या जग गई। वासना भी जगी, ईर्ष्या भी जगी, और उनके पैर नहीं छुए, और उनको निमंत्रण नहीं दिया, इस आदमी के प्रति जलन भी उठी--यह सब इकट्ठा हो गया और साथ में धर्म की आड़ भी मिली। वह सामने जाकर बुद्ध को कहा कि वेश्या ने निवेदन किया और इस भिक्षु ने इनकार नहीं किया। यह कर्तव्य से च्युत हो गया। इसे साफ कहना चाहिए था कि मैं वेश्या के घर में नहीं ठहर सकता। क्योंकि आपने तो स्त्री तक को छूने के लिए मना किया है और इसने वेश्या को भी पैर छूने दिए। इसे निष्कासित किया जाए। इसे संघ से बाहर किया जाए।
बुद्ध हंसे, और बुद्ध ने कहा: इसने कहा क्या? तो उन्होंने कहा: इसने इतना ही कहा कि मैं भगवान से पूछ कर कल उत्तर दूंगा। बुद्ध ने उस भिक्षु को खड़ा किया, उस भिक्षु को देखा एक क्षण और कहा कि तुझे आज्ञा है, तू चार महीने वेश्या के घर रुक सकता है। उस भिक्षु ने सिर झुकाया और कहा: मेरे लिए कोई कर्तव्य, निर्देश? बुद्ध ने कहा: बस होश रखना।
और चार महीने अपूर्व होश के थे!
चार महीने बाद जब भिक्षु वापस लौटा तो उसके साथ वेश्या भी वापस आई। भिक्षु तो अदभुत रूप से रूपांतरित हो गया था, क्योंकि उसे बहुत होश रखना पड़ा, चौबीस घंटे होश रखना पड़ा, इससे ज्यादा और होश की कोई जगह ही नहीं हो सकती थी। प्रतिपल उत्तेजना थी, प्रतिपल आकर्षण था। चार महीने उसे जाग कर ही रहना पड़ा था। जरा झपकी खाता, जरा सपने में पड़ जाता तो सदा के लिए चूक जाता। उसका बढ़ता हुआ होश, उसकी बढ़ती हुई दीप्ति, उस वेश्या को भी रूपांतरित कर गई। उस वेश्या ने बुद्ध के चरणों में अपना सारा धन रख दिया और कहा कि मुझे दीक्षा दें। मैं तो सोचती थी कि आपके भिक्षु को बदल लूंगी, लेकिन आपके भिक्षु ने मुझे बदल लिया। मैं तो सोचती थी कि आपका भिक्षु आज नहीं कल गिरेगा मेरे चरणों में, लेकिन मुझे उसके चरणों में गिर जाना पड़ा। इतना होश से भरा हुआ आदमी मैंने नहीं देखा है। जो श्वास भी लेता था तो होश से ले रहा था। जिसकी हर क्रिया होशपूर्ण थी।
मैं भी तुमसे यही कहता हूं--अगर तुम्हें सहज जीवन की ओर जाना है, होश से जीओ। और अगर तुम चाहते हो और लोग भी सहज जीवन की तरफ जाएं, तो तुम होश से जीओ, ताकि तुम्हारे होश की गंध उनको भी लगे, तुम्हारे होश की झलक उन पर भी पड़े। जागरूक होकर जीओ। कर्तव्य को विस्तार में मत पूछो, मैं तुमसे नहीं कहूंगा कि पानी छान कर पीओ--क्योंकि पानी छान कर पीने वाले लोग खून बिना छाने पी गए हैं--मैं तुमसे नहीं कहूंगा छोटी-छोटी बातें कि इनका तुम विस्तार सम्हालो, क्योंकि वे छोटी-छोटी बातें तो बहुत हैं, उनका कितना विस्तार सम्हालोगे, और हर विस्तार में कुछ बातें छूट जाएंगी। शास्त्रों में सब कर्तव्य गिनाए गए हैं, लेकिन कितने गिनाओगे, ऐसी परिस्थिति आ जाती है कि शास्त्र में कोई कर्तव्य नहीं गिनाया हुआ है।
जीसस ने अपने एक शिष्य से कहा कि अगर कोई तुझे मारे तो उसे क्षमा कर देना। उसने पूछा: कितनी बार? अब क्या उत्तर दोगे? एक बार मारे... शिष्य भी ठीक पूछ रहा है कि कोई सीमा होगी, हर चीज की हद्द होती है... एक बार मारे, कर देंगे क्षमा; कितनी बार मारे तब तक क्षमा करनी है? जीसस ने कहा: सात बार। उसने कहा: ठीक! लेकिन उसने जिस ढंग से ठीक कहा उसका मतलब था कि आठवीं बार देख लेंगे! उसके ठीक कहने में ऐसा ढंग था, कि ठीक है तो फिर देख लेंगे आठवीं बार! और सौ सुनार की एक लोहार की, एक बार में ही ऐसा मजा चखा देंगे कि छठी का दूध याद आ जाए; कि सात बार में जो किया वह एक ही बार में निबटा दूंगा! उसकी आंख में ढंग यह था। जीसस ने कहा: नहीं भाई, सतहत्तर बार। मगर तुम कितना करोगे, अठहत्तर बार! आदमी को अगर विस्तार में बताने चलो तो अड़चन है।
मैंने सुना है, एक ईसाई फकीर को एक आदमी ने चांटा मारा। नास्तिक था चांटा मारने वाला, और साथ में बाइबिल लेकर आया था, और किताब खोल कर बताई कि देखो लिखा है इसमें कि जो तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारे, दूसरा उसके सामने कर देना। उस फकीर ने कहा: मुझे पता है, किताब लाने की कोई जरूरत नहीं थी, यह रहा मेरा दूसरा गाल! उस आदमी ने उस दूसरे गाल पर और करारा चांटा मारा। बस वह फकीर फिर उस पर टूट पड़ा, उसकी ऐसी मरम्मत की, वह बहुत चिल्लाया--भई, यह क्या कर रहे हो, जीसस की तो याद करो! उन्होंने कहा: इसके आगे जीसस ने कुछ भी नहीं कहा है। एक गाल पर चांटा मारो, दूसरा कर देना; अब तीसरा तो कोई गाल है नहीं, इसके आगे हम स्वतंत्र हैं।
विस्तार की बातें काम नहीं आतीं। क्योंकि एक सीमा आ जाती है विस्तार की, उसके आगे तुम स्वतंत्र होते हो। यही तुम देखते न रोज, सरकार कितने कानून बनाती है! जितने कानून बनाती है, उतनी ही बेईमानी बढ़ती है। क्योंकि कानून का मतलब होता है, विस्तार में तुम्हें रोकती है कि यह भी मत करना, यह भी मत करना, वह भी मत करना--मगर कितना करोगे? सब बताने के बाद कुछ तो बाकी रह जाता है, जिंदगी बहुत बड़ी है! आदमी वह करके दिखा देता है कि लो, यह हम करके दिखाए देते हैं! जब वह आदमी करके दिखा देता है, तब सरकार को फिर कानून बनाना पड़ता है कि यह मत करना। तुमने देखा, सरकारी ढंग की दस्तावेज इस तरह की होती है, पढ़ने में ही नहीं आती! उसमें इतनी तरकीबें होती हैं, सब तरह की तरकीबें, रोकने के लिए तरकीबें होती हैं--ऐसा मत करना, वैसा मत करना, उसमें कई नियम, उप-नियम, धाराएं, उप-धाराएं, मगर फिर भी जो आदमी को करना है वह कर लेता है। दुनिया में कोई पाप रुका नहीं है; कानून बढ़ते गए हैं, अपराध बढ़ते गए हैं। कानून के बढ़ने से सिर्फ वकील को लाभ होता है, अपराध नहीं रुकते हैं। कानून जब ज्यादा हो जाता है, तो अपराधी को भी अपने विशेषज्ञ रखने पड़ते हैं जो खोज-बीन करते रहें--वे ही वकील हैं। जो खोज-बीन करते हैं अपराधी की तरफ से कि तू इस तरह से कर ले, कि यह रही तरकीब, अभी इस पर नियम नहीं बना है, इसके पहले निबटा ले। नियम बढ़ते जाते हैं, बेईमानी बढ़ती चली जाती है।
विस्तार में मुझसे मत पूछो कि हम क्या करें? कर्तव्य की पूछो ही मत? मेरा सूत्र सीधा-साफ है एक--होश से जीओ। उस होश से जीने में सब आ जाएगा। अगर जीसस ने कहा होता--जब तुम्हें कोई चांटा मारे तब होश से जीना, तो इस फकीर को उपाय नहीं था बचने का। अगर जीसस ने कहा होता कि कोई तुम्हारा अपमान करे तो होशपूर्वक क्षमा कर देना--सात और सतहत्तर बार का सवाल नहीं है, आदमी बहुत जटिल और बहुत चालाक है, सिर्फ इतना ही कि होशपूर्वक क्षमा कर देना।
होश से जीओ, एक दीया जला कर जीओ। ये विस्तार की बातों के कारण ही धर्म विकृत हुए हैं। इतने विकृत हो गए हैं, नियम ही नियम रह गए हैं। अगर उनको पालते रहो, तो तुम्हारी बुद्धिमत्ता के विकसित होने का समय ही नहीं आता। अगर नियमों को ही पालते रहो तो तुम करीब-करीब एक कारागृह के कैदी हो जाते हो। तुम देखो तुम्हारे साधुओं को, कारागृह के कैदी हो जाते हैं! चले हैं स्वतंत्रता को लेने, चले हैं मोक्ष की खोज में, हो गए हैं कारागृह के कैदी। एक-एक छोटी बात का हिसाब चल रहा है, चौबीस घंटे उसी में लग जाते हैं।
एक जैन मुनि ने मुझसे कहा कि आप कहते हैं ध्यान करो; फुर्सत कहां है? नियम-व्यवस्था से, मर्याद
ा से चलने में फुर्सत कहां है? यही दुकानदार कहता है कि फुर्सत कहां? यही मुनि कहता है कि फुर्सत कहां? तो बड़े मजे की बात हो गई।
दुकानदार तो क्षमा किया जा सकता है कि कहता है--भई, फुर्सत कहां है, कब ध्यान करें? लेकिन मुनि भी कह रहा है कि फुर्सत कहां। इतने नियम! इतना विस्तार है नियमों का! धर्म को नियम से मुक्त करने की जरूरत है। बस एक ही सीधा सूत्र होना चाहिए।
ऐ ‘शाद!’ रहबरों के रवैय्ये को देख कर
आना पड़ा है राहजनों की पनाह में
ये जो मार्ग-दर्शक हैं, ये नियम देने वाले लोग हैं, इनसे लोग इतने पीड़ित हो गए हैं कि अब तो लुटेरों की शरण में जाना भी ठीक मालूम पड़ता है।
क्या कहूं दिल पै क्या गुजरती है
तेरे कूचे से जब गुजरता हूं
रहजनों का तो कोई खौफ नहीं
रहबरों से मगर मैं डरता हूं
‘शाद’ अपने लहू की सुर्खी से
आर्जुओं में रंग भरता हूं
रहजनों का तो कोई खौफ नहीं
लुटेरों का तो कुछ खौफ नहीं है। तुमको लुटेरों ने नहीं लूटा है।
रहबरों से मगर मैं डरता हूं
मगर वह जो मार्ग-दर्शक हैं, नेता हैं, जो तैयार बैठे हैं तुम्हें नियम देने को--ऐसा करो, वैसा करो, ऐसा न करना, वैसा न करना--उनसे सावधान रहना! उन्होंने ही तुम्हारे कारागृह निर्मित किए हैं। मैं तुम्हें चरित्र नहीं देता, मैं तुम्हें केवल बोध देता हूं। मैं तुम्हें आचरण नहीं देता, मैं केवल अंतःकरण की जागृति देता हूं। जो भी करो, वेश्या के घर भी ठहरना पड़े तो घबड़ाने की कोई जरूरत नहीं है, ठहर जाना, होश कायम रखना। यह श्रेष्ठतम धर्म है।
बुद्ध का एक भिक्षु यात्रा पर जा रहा था। उसने पूछा: मेरे लिए कोई आदेश? बहुत निम्न वृत्ति का भिक्षु रहा होगा, क्योंकि बुद्ध ने जो आदेश दिया वह बुद्ध-जैसा नहीं है। अभी तुमने कहानी सुनी न, वेश्या के घर जाते भिक्षु को कहा--होश रखना। यह बुद्ध जैसा आदेश है। इस युवक ने पूछा कि मैं यात्रा पर जा रहा हूं, मेरे लिए कोई निर्देश? मार्ग के लिए कोई सूचनाएं--क्या करूं, क्या न करूं। बुद्ध ने कहा: स्त्रियों को छूना मत। देखना मत। राह पर स्त्री दिखाई पड़ जाए, आंख नीची कर लेना। उस भिक्षु ने पूछा: लेकिन कभी ऐसा भी हो सकता है कि स्त्री को देखना ही पड़ जाए; मजबूरी हो; तो उस हालत में क्या करना? तो बुद्ध ने कहा: छूना मत। उस भिक्षु ने पूछा और यह भी हो सकता है कि किसी मजबूरी में छूना पड़ जाए। समझ लो कि एक स्त्री गिर पड़ी--पैर फिसल गया--और मैं पीछे हूं, क्या उसको हाथ का सहारा न दूं? तो बुद्ध ने कहा: अगर छूना ही पड़े तो छू लेना, मगर होश रखना। देखना मत, पहले कहा। फिर अगर मजबूरी आ जाए तो कहा कि ठीक है, देख लेना। फिर कहा: छूना मत। मजबूरी आ जाए तो कहा छू लेना। फिर आखिरी सूत्र दिया कि होश रखना। उस आदमी ने कहा कि और अगर ऐसी मजबूरी आ जाए कि होश न रख सकूं, तो बुद्ध ने कहा फिर जाने की जरूरत ही नहीं। ऐसी मजबूरी आनी ही नहीं चाहिए। फिर तो तू सिर्फ रास्ते खोज रहा है। फिर मजबूरियों के बहाने खोज रहा है। निम्नवृत्ति का आदमी रहा होगा।
अक्सर ऐसा हो जाता है कि तुम्हारे धर्म के नियम निम्न से निम्न वृत्ति को ध्यान में रख कर बनाने पड़ते हैं। इसी कारण बड़े छोटे होते हैं, ओछे होते हैं, संकीर्ण होते हैं। और इसी कारण श्रेष्ठ व्यक्तियों को कोई भी धर्म अपने भीतर नहीं समा पाते। बुद्ध पैदा हुए, हिंदू उन्हें अपने भीतर न समा पाए। क्योंकि वे जीएंगे ऊपर से और धर्म के नियम बने हैं आखिरी आदमी के लिए, निम्नतम के लिए--इसमें बड़ा फासला हो गया। यहूदी जीसस को न समा पाए। मुसलमान मंसूर को न समा पाए। धर्म की तथाकथित व्यवस्था अंतिम आदमी को देख कर बनी है, निकृष्टतम आदमी को देख कर बनी है। और धर्म का अनुभव श्रेष्ठतम के लिए है। तो जब भी श्रेष्ठतम आदमी पैदा होगा, तब परंपरागत धर्म उसके विपरीत हो जाएगा।
मैं तुम्हें कोई कर्तव्य नहीं देता। इतना ही कहता हूं: जागो, जाग कर जीओ। जागरण न छूटे, होश न खोए। हाथ में होश का धागा बना रहे। फिर सब सध जाएगा। इस एक के साधने से सब सध जाता है। इस एक के खो जाने से सब खो जाता है।
ओशो, मैं आदमी को प्रेम करता हूं। लेकिन परमात्मा से मेरा कोई लगाव है, इसका मुझे पता नहीं। क्या मैं पाप के रास्ते पर हूं?
बता दो आबिदाने-बे-अमल को
खुदा उकता चुका है बंदगी से
खुदा से क्या मोहब्बत कर सकेगा
जिसे नफरत है उसके आदमी से
और तुम्हारे तथाकथित धर्मों ने तुम्हें अब तक आदमी से नफरत सिखाई है। इसी के कारण पृथ्वी पर धर्म की बातें बहुत होती हैं, बहुत धर्म भी हैं और धर्म बिलकुल नहीं है। यह बंदगी हो चुकी व्यर्थ। यह बंदगी काम नहीं आई। और परमात्मा भी इस बंदगी से बहुत थक चुका है। तुम आदमी को ही प्रेम करो। मैं तुमसे कहता हूं: तुम ठीक रास्ते पर हो। हालांकि तुम्हारे धर्मगुरु कहेंगे--तुम गलत रास्ते पर हो। आदमी को प्रेम? परमात्मा को प्रेम करो। और परमात्मा का तुम्हें पता नहीं, कैसे प्रेम करोगे? लेकिन अगर परमात्मा के बनाए हुए से तुम्हारा प्रेम हो जाए, तो कितनी देर परमात्मा से दूर रहोगे? अगर तुम्हारे प्राणों में संगीत से प्रेम हो जाए, तो उसी संगीत के रास्ते पर खोजते-खोजते तुम संगीत के स्रोत तक पहुंच जाओगे, संगीत को जन्म देने वाले के पास पहुंच जाओगे। अगर फूल से प्रेम हो, तो कितनी देर तुम रुके रहोगे, कभी न कभी वे अंगुलियां तुम्हें कहीं न कहीं मिल जाएंगी जिन्होंने फूलों में रंग भरा है। सूरज से प्रेम हो तो इन्हीं किरणों में तुम कभी और छिपी हुई किरणों को भी खोज लोगे।
आदमी इस जगत में सर्वश्रेष्ठ फूल है। क्योंकि स्वतंत्रता का फूल है। खूब करो आदमी को प्रेम। और परमात्मा की बात ही मत उठाओ। एक दिन तुम अचानक पाओगे कि आदमी के प्रेम में ही परमात्मा में खो गया है और मिल भी गया। आदमी खो गया और मिल भी गया। यह खोना और मिलना एक साथ घट जाता है। यह विरोधाभास एक साथ घटता है।
हमको मारा तेरी इनायत ने
सबको तेरे अताब ने मारा
डर रहा था गुनाह से लेकिन
आदमी को सबाब ने मारा
आदमी को तथाकथित पुण्यों ने मारा है, पाप ने नहीं। तुम पाप-पुण्य की पुरानी परिभाषा पर मत अटके रहो। मैं तुम्हें नई परिभाषा देता हूं, नई दृष्टि देता हूं। प्रेम पुण्य है। अ-प्रेम पाप है। तुम प्रेम करो। जिससे कर सको उससे करो। इतना ही खयाल रखो कि प्रेम कहीं रुके न, अटके न, धारा बहती रहे; गंगा कहीं ठहरे न, तो सागर तक पहुंच जाएगी। बस प्रेम का बांध मत बनाना कहीं। पत्नी से प्रेम करो, खूब करो, पति से, बच्चों से, मां से, पिता से, मित्रों से, मगर यह मत सोचना कि बस प्रेम यहीं समाप्त हो गया। बांध मत बनाना। पत्नी से प्रेम करो, पति से प्रेम करो, बेटे से प्रेम करो, मां से प्रेम करो, मित्र से प्रेम करो और प्रेम को बहने दो, हर प्रेम-पात्र के भीतर से और आगे जाने दो, और तुम पाओगे सभी प्रेम-पात्रों में वही एक प्रेम-पात्र छिपा है। सभी आंखों में उसी की चमक है। सभी चेहरों पर उसी का रंग है। सभी सौंदर्य में वही प्रकट हो रहा है, उसी की अभिव्यक्ति है।
फूल-सा रंगो-बू नहीं लेकिन
फूल-से बढ़ के नर्म तीनत है
इसको नफरत से पायमाल न कर
घास भी गुलिस्तां की जीनत है
फूल ही नहीं हैं परमात्मा के, घास भी उसकी है।
फूल-सा रंगो-बू नहीं लेकिन
माना कि घास में फूल जैसा रंग नहीं, सुगंध नहीं...
फूल से बढ़ के नर्म तीनत है
लेकिन इसका स्वभाव फूल से भी ज्यादा कोमल है। परमात्मा घास में कोमलता की तरह प्रकट हुआ है, बस आंख चाहिए।
इसको नफरत से पायमाल न कर
इसे नष्ट मत कर देना यह समझ कर कि यह घास है, इसमें क्या होगा।
घास भी गुलिस्तां की जीनत है
वह भी बगिया की शोभा है, रौनक है। यहां क्षुद्र से क्षुद्र में विराट छिपा है। यहां क्षुद्र है ही नहीं। क्षुद्र हमारी नासमझी के कारण है। जैसे-जैसे समझ गहरी होगी, वैसे-वैसे विराट प्रकट होगा।
छलक रही है मएनाब तिश्नगी के लिए
संवर रही है तेरी बज्म बरहमी के लिए
नहीं-नहीं हमें अब तेरी जुस्तजू भी नहीं
तुझे भी भूल गए हम तेरी खुशी के लिए
जहाने-नौ का तसव्वुर हयाते-नौ का खयाल
बड़े फरेब किए तुमने बंदगी के लिए
कहां के इश्को-मोहब्बत, किधर के हिज्रो विसाल
अभी तो लोग तरसते हैं जिंदगी के लिए
जो जुल्मतों में हवीदा हो कल्बे-इंसां से
जियानवाज वह शोला है तीरगी के लिए
न मंजिलों की तमन्ना, न रहगुजर की तलाश
न जाने किस पै भरोसा है, रहबरी के लिए
तेरे जहान की हर दिलकशी सलामत है
मेरी निगाह भटकती है आदमी के लिए
आदमी को खोजो और प्रेम करो। आदमी की खोज में ही तुम धीरे-धीरे उसकी झलकें पाने लगोगे। दुनिया अधार्मिक हो गई, क्योंकि हमें सिखाया गया--दुनिया को प्रेम मत करना, आदमी को प्रेम मत करना। प्रेम का द्वार बंद हो गया। परमात्मा तक पहुंचने का सेतु टूट गया। मैं तुमसे कहता हूं--खूब करो प्रेम। बस प्रेम का बांध न आए। प्रेम बहता जाए। हर पात्र से ऊपर निकल जाए, आगे निकल जाए; हर पात्र से छलक जाए। यही प्रार्थना है, प्रेम का सदा बहते रहना प्रार्थना है। और बहता प्रेम परमात्मा को निश्चित पा लेता है। इसलिए घबड़ाओ मत और यह मत सोचो कि तुमने कोई पाप किया है। यह मत सोचो कि तुमसे कुछ भूल हो रही है, कि तुम धार्मिक नहीं हो। अक्सर ऐसा हो जाता है कि तथाकथित धार्मिक धार्मिक नहीं होते, सिर्फ दिखाई पड़ते हैं। और इससे उलटी बात भी सच है। जो लोग अधार्मिक मालूम होते हैं, अक्सर अधार्मिक नहीं होते।
मैंने एक छोटी सी कहानी सुनी है।
यूरोप का एक बहुत बड़ा ईसाई पुरोहित प्रवचन देने चर्च में गया था। वह बोला तो उसने कहा कि जो लोग पुण्य करते हैं, वे स्वर्ग में प्रवेश पाएंगे, और जो पाप करते हैं, वे नरक में। और फिर उसने यह भी कहा: जो परमात्मा को याद करते हैं, वे स्वर्ग में प्रवेश पाएंगे, जो परमात्मा को भूल जाते हैं, वे नरक में। एक आदमी उठ कर खड़ा हो गया। उसने कहा: आपने मुझे मुश्किल में डाल दिया। मेरे लिए एक सवाल उठ गया। पुरोहित ने सोचा भी नहीं था यह सवाल। जब उठा तब उसे समझ में आया। सवाल जरूर जटिल है।
उस आदमी ने पूछा कि मैं यह पूछना चाहता हूं, आपने कहा जो पुण्य करते हैं वे स्वर्ग में जाएंगे, और जो प्रभु को स्मरण करते हैं वे स्वर्ग में जाएंगे। और जो पाप करते हैं और जो प्रभु को स्मरण नहीं करते, वे नरक जाएंगे। मेरा सवाल यह है कि जो पुण्य करते हैं और प्रभु को स्मरण नहीं करते हैं, वे कहां जाएंगे? और जो प्रभु का स्मरण करते हैं और पाप करते हैं, वे कहां जाएंगे? वह पादरी भी भौचक्का रह गया। उसे कुछ सूझा नहीं। एकदम सिर उसका घूम गया। क्योंकि अड़चन खड़ी हो गई। अगर वह यह कहे कि जो लोग पुण्य करते हैं और प्रभु को स्मरण नहीं करते, वे भी स्वर्ग जाएंगे, तो सीधा सवाल है--फिर प्रभु को स्मरण करने की जरूरत क्या है? और जो लोग प्रभु का स्मरण करते हैं और पाप करते हैं और उन्हें नरक जाना पड़ता है, तो फिर सवाल यह है कि प्रभु के स्मरण से फायदा क्या हुआ? नरक तो गए ही! तो पाप और पुण्य काफी हैं! फिर प्रभु को बीच में लेने की जरूरत क्या है? यही तो कारण था कि जैन और बौद्ध, दो धर्मों ने प्रभु को बीच में नहीं लिया, परमात्मा को बीच में नहीं लिया, उन्होंने पाप और पुण्य के सिद्धांत से काम चला लिया। जो बुरा करता है, वह दुख पाएगा; जो भला करता है, वह सुख पाएगा; बात खतम हो गई; बीच में परमात्मा को लेने की जरूरत नहीं मानी? क्योंकि परमात्मा को लेने से जटिलता बढ़ेगी। यही सवाल उठेगा।
उस पुरोहित ने कहा: मुझे क्षमा करें, मैंने इस तरह कभी सोचा नहीं। मुझे सात दिन का मौका दें, अगले रविवार मैं इसका उत्तर दूंगा। सात दिन वह सो भी नहीं सका, बहुत सिर मारा--आदमी भी ईमानदार रहा होगा, नहीं तो पुरोहित चालबाज होते हैं, कुछ भी उत्तर निकाल लाता; ईमानदार था, उसको यह प्रश्न तीर की तरह चुभने लगा। और यह प्रश्न था महत्वपूर्ण। सातवें दिन वह सुबह जल्दी ही भोर में चर्च पहुंच गया, अभी तक उत्तर नहीं आया है, सोचा कि जाकर चर्च में ही बैठ जाऊं, प्रभु से परमात्मा से प्रार्थना करूं कि तुम्हीं बताओ, अब मैं क्या उत्तर दूं? वह आदमी आता होगा और सारे गांव में खबर फैल गई है, सारा गांव आ रहा है। मैं जो भी उत्तर सोचता हूं, गलत मालूम होता है। इन दोनों के बीच कैसे तालमेल बिठाऊं? हाथ जोड़ कर प्रभु की प्रार्थना में झुका। जल्दी उठ आया था, रात सोया भी नहीं था, वहां सिर झुकाए हुए वेदी के सामने उसे झपकी आ गई और उसने एक सपना देखा। सपने में उसने वही देखा जो सात दिन से उसके प्राणों को मथ रहा था।
उसने देखा कि वह एक ट्रेन में सवार है। उसने पूछा: भई यह ट्रेन कहां जा रही है? लोगों ने कहा: स्वर्ग जा रही है। उसने कहा: यह अच्छा ही हुआ, वहीं चल कर देख लूं कि हालत क्या है? वह स्वर्ग पहुंचा, उसे बड़ी हैरानी हुई। उसने किताबों में जो वर्णन देखे थे स्वर्ग के, बड़े रंगीन थे, बड़े सुवासपूर्ण थे, और स्वर्ग बिलकुल उजड़ा सा मालूम पड़ रहा था। वीरान सा मालूम पड़ता था। खंडहर मालूम पड़ता था। धूल-धवांस जमी थी। उसने पूछा: यह मामला क्या है? ऐसी शक्ल तो नरक की होनी चाहिए। कहीं कुछ भूल-चूक तो नहीं। उतरा, लेकिन स्वर्ग ही था, भूल-चूक नहीं थी। उसने पूछा कि मैं यह जानना चाहता हूं--यहां कुछ लोग हैं? जैसे बुद्ध। क्योंकि बुद्ध ने पुण्य तो किया, प्रभु को स्मरण नहीं किया। सुकरात। पुण्य तो किया, लेकिन प्रभु को स्मरण नहीं किया। यहां बुद्ध और सुकरात जैसे लोग हैं? उन्होंने कहा: भई, नाम नहीं सुना कभी। बुद्ध और सुकरात का हमें कुछ पता नहीं है।
भाग-दौड़ कर उसने पता लगाया कि नरक भी कोई ट्रेन जाती है कि नहीं? एक ट्रेन नरक जा रही थी, तैयार ही खड़ी थी, वह सवार हो गया।
नरक पहुंचा। बड़ा हैरान हुआ। वहां बड़ी ताजगी थी, बड़ी रौनक थी, बड़ा रंग था, बड़ी सुंगध थी; उसे तो भरोसा ही नहीं आया कि यह हो क्या रहा है, सब उलटा हुआ जा रहा है; यह नरक है? उतर कर उसने पूछा कि यहां सुकरात और बुद्ध जैसे लोग हैं? उन्होंने कहा: हैं। उनके ही आने के कारण तो नरक की यह रंगत आई है। यह जो सुगंध देख रहे हो, यह जो सुवास देख रहे हो, यहां जो चारों तरफ महोत्सव देख रहे हो, इसी तरह के लोगों के आने की वजह से तो यह रंगत आई है!
तभी उसकी नींद खुल गई। लोग आने शुरू हो गए थे। उसने खड़े होकर मंच पर कहा कि मैं तो उत्तर नहीं जानता, लेकिन यह सपना कहे देता हूं। इस सपने से इतना सार मैंने निकाला कि जहां भले लोग हैं वहां स्वर्ग है और जहां भले लोग नहीं हैं वहां नरक है। यह बात गलत है कि पुण्य करने वाले लोग स्वर्ग जाते हैं, पुण्य करने वाले लोग जहां जाते हैं वहां स्वर्ग बन जाता है। यह बात गलत है कि पाप करने वाले लोग नरक जाते हैं। पाप करने वाले लोग स्वर्ग भी चले जाएं तो भी जहां जाते हैं वहां नरक बन जाता है।
तुम औपचारिक धर्म में मत उलझ जाना--मंदिर हो आए, मस्जिद हो आए, प्रार्थना कर ली, पाठ कर लिया। नहीं, धर्म तो एक ही है--वह प्रेम है। और धर्म के इस अनुभव को, प्रेम को जगाने का उपाय एक ही है--वह होश है।
इन दो शब्दों में, इन दो कदमों में धर्म की पूरी यात्रा हो जाती है। इतना ही फासला है संसार में और मोक्ष में। बस दो कदम का फासला है। एक कदम का नाम प्रेम, एक कदम का नाम ध्यान। ये दो कदम तुम उठा लो। बस ये दो कदम उठ जाएं--भीतर ध्यान हो, बाहर की तरफ बहता हुआ प्रेम हो; भीतर गहरा होता हुआ ध्यान हो, बाहर बंटता हुआ प्रेम हो; ध्यान बन जाए तुम्हारी जड़ और प्रेम बन जाए तुम्हारा फूल--खिल जाएं।
आदमी को प्रेम करो, प्रकृति को प्रेम करो, चांद-तारों को प्रेम करो--प्रेम करो! और सब प्रेम उसी परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जाता है। कहीं भी प्रेम की अंजलि चढ़ाओ, कहीं भी प्रेम के फूल चढ़ाओ, वे उसी के चरणों में पहुंच जाते हैं। प्रेम से गाए गए गीत ही केवल प्रार्थनाएं हैं और ऐसी प्रार्थनाएं ही केवल सुनी जाती हैं।
तुम भूलो परमात्मा को--परमात्मा से कुछ लेना-देना नहीं है, शब्दों के जाल में मत पड़ो। प्रेम परमात्मा है। और ध्यान आंख है, जो उस परमात्मा को देख सकती है। तो दो बातें तुम्हें कहता हूं--प्रेम करो, ध्यान करो। प्रेम होने दो, ध्यान होने दो। और अंततः एक ऐसी घड़ी आती है जब ध्यान और प्रेम में कोई अंतर नहीं रह जाता। ध्यान प्रेमपूर्ण हो जाता है, प्रेम ध्यानपूर्ण हो जाता है। पहुंच गए तुम मंजिल पर। आ गया असली घर, जिसकी तलाश थी।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Am I on the path of sin if I love people but don't feel a connection to God?
According to Osho, you are not sinning—you are virtuous. If God is unknown, begin with loving human beings; in the depths of real love, the divine reveals itself. God is hidden in consciousness, not in stones or rituals. Let love flow without stopping at any one person, and you’ll discover the same Beloved shining through all.
In simple terms: Loving people is the right path; keep loving more widely, and you’ll naturally meet God in them.
What is the truth if the dream is false?
According to Osho, when dreams—waking or sleeping—are recognized as false, the only truth is the seer: the witnessing consciousness within, Govind, the Self. Turn from the seen to the witness; free yourself from cravings that make you a beggar. In contentment, the inner Master is revealed and entanglement ends. Recognize the onlooker, and you discover the real, unchanging truth.
In simple terms: The real you is the quiet watcher inside; stop chasing things and look within to find the truth.
Why does it feel frightening to open our eyes to awareness?
According to Osho, opening our eyes to awareness is frightening because it ends the sweet dreams and hopeful arithmetic of the mind: the endless attempt to turn ninety-nine into a hundred. Awareness shatters comforting illusions of becoming. We fear losing our hopes, ambitions, and the pleasurable chase that keeps us occupied, even though it never completes.
In simple terms: Because waking up shows our nice dreams and 'one more rupee' hopes aren't real, and that feels scary.
Why do I feel a sense of fear when asking questions?
According to Osho, fear arises when you ask a real question because true inquiry exposes your not-knowing and threatens the ego. His answers don’t soothe but cut, shattering the head-mind so the inner answer, already hidden in the question, can surface. Where questioning feels safe or flattering, it only feeds ego. The trembling you feel signals genuine transformation, not information, is about to happen.
In simple terms: You feel scared because honest questions show you don’t know and may crack your ego, letting the real answer inside you appear.
Will human life turn toward spontaneity, and what is our duty?
According to Osho, human life will not automatically turn toward spontaneity; animals have mechanical naturalness, but man’s gift is freedom. Our task is to transform freedom into conscious spontaneity by choosing awareness over instinct, ascent over descent. In a single decisive moment we can reverse direction: stop going downhill and grow into Buddha-like clarity, peace, and responsibility.
In simple terms: People don’t become peaceful by default; you choose, right now, to stop what pulls you down and be awake and kind.
