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Questions in this Discourse
ओशो, तुम बसे नहीं इनमें आकर, ये गान बहुत रोए। कब तक बरसेगी ज्योति बार कर मुझको? निकलेगा रथ किस रोज पार कर मुझको? किस रोज लिए प्रज्वलित बाण आओगे? खींचते हृदय पर रेख निकल जाओगे? किस रोज तुम्हारी आग सीस पर लूंगा? बाणों के आगे प्राण खोल धर दूंगा? यह सोच विरह में अकुला कर, ये गान बहुत रोए। तुम बसे नहीं इनमें आकर, ये गान बहुत रोए।
इसलिए हमारी प्रार्थनाएं उसे बुलाने की व्यर्थ चली जाती हैं।
वह आया हुआ है और हम बुलाते हैं। वह द्वार पर खड़ा है और हम दूर तलाशते हैं। वह निकट से भी निकट है और हमारी आंखें चांद-तारों में उलझी हैं। मनुष्य चूकता है, इसलिए नहीं कि परमात्मा दूर है, इसलिए नहीं कि परमात्मा छिपा है, बल्कि इसलिए कि परमात्मा इतना प्रकट है, इतना निकट है, इतना उघड़ा है कि हम उसे पहचान नहीं पाते। जैसे मछली सागर की सागर को न पहचान पाए। वहीं जन्मी, वहीं बड़ी हुई, वहीं जीयी, वहीं खेली-कूदी, जीवन का सारा जाल रचाया--सागर तो सदा था। मछली को सागर की याद तभी आती है जब मछुवा उसे पकड़ लेता है और फेंक देता है रेत पर। सागर से टूटती है, तो सागर की याद आती है।
लेकिन मनुष्य तो परमात्मा से टूट ही नहीं सकता। ऐसा कोई तट नहीं है, जहां तुम्हें फेंका जा सके। क्योंकि जहां भी है, जो भी है, परमात्मा ही है। परमात्मा से भिन्न होने का उपाय नहीं है। यही सबसे बड़ी अड़चन है। काश, हम उससे भिन्न हो सकते, तो क्षण में हम उससे जुड़ने के लिए तैयार हो जाते। क्योंकि भिन्न होते ही तड़फते। मछली की तरह तड़फते। हम अभिन्न हैं। हम हैं ही नहीं, वही है। हम उसकी ही श्वासें हैं, हम उसकी ही धड़कन हैं, हम उसकी ही लहरें हैं।
इसलिए प्रार्थना न करो कि परमात्मा कब आएगा। कुछ दूसरी तरफ से कोशिश करनी होगी। परमात्मा आया हुआ है, हमने आंखें बंद कर रखी हैं। शिवानंद, आंखें खोलो! परमात्मा आया हुआ है, हम पीठ किए खड़े हैं।
शिवानंद, जिस तरफ पीठ किए हो, उस तरफ मुंह करो! परमात्मा आया हुआ है, उसने अपनी वीणा छेड़ी हुई है--सदा से छेड़ी हुई है; उसका संगीत सनातन है। शिवानंद, अपने कान खोलो! सुनो! शांत हो, मौन हो, शून्य हो। और तब तुम्हें यह कहने की जरूरत न रह जाएगी--कि कब आएगा परमात्मा? कब उसका रथ आएगा? कब उसका बाण मेरे प्राणों को छेद कर निकल जाएगा?
प्रतिपल बाण साधे खड़ा है। मगर तुम हो ही नहीं! तुम ऐसे भागे हो, तुम ऐसे चंचल हो, कि लक्ष्य-भेद किया नहीं जा सकता। लक्ष्य तो थिर हो, तो तीर बेध सकता है। तुम थिर ही नहीं हो। तुम तो प्रतिपल बदले जा रहे हो। तुम तो पानी की धार हो। एक क्षण को भी थिर होकर बैठ जाओ, और उसका तीर तुम्हारे हृदय को पार करके निकल जाएगा।
और ऐसा मैं किसी सिद्धांत के कारण नहीं कहता हूं। सिद्धांतों में मुझे कोई रस नहीं है। ऐसा मैं अपने अनुभव से कहता हूं। तुम्हारे ही जैसे बहुत दिन तक मैंने भी प्रार्थना की है। और सब प्रार्थनाएं व्यर्थ गईं। क्योंकि प्रार्थना तो कर रहा था परमात्मा से, और पीठ भी किए था उसकी तरफ। सूर्य-नमस्कार भी कर रहा था, और सूर्य की तरफ आंखें बंद भी किए था।
कैसे होगी प्रार्थना पूरी? फिर रोओगे न तो और क्या करोगे? तुम्हारे गीत बस तुम्हारे आंसुओं में ही प्रकट होंगे। तुम्हारा सारा प्राण एक उदासी, एक गहन निराशा, एक हताशा से भर जाएगा। तुम्हारे जीवन की पूरी कथा विषादपूर्ण हो जाएगी। तुम्हारी कथा एक व्यथा हो जाएगी। अनुभव से कहता हूं। जो तुम कर रहे हो, वही मैंने किया है।
लेकिन जब बार-बार प्रार्थना हारती गई, और बार-बार अर्घ्य चढ़ाया और उसके चरणों तक न पहुंचा, और बार-बार अर्चना की और शून्य में खो गई, तो एक बात स्मरण में आनी शुरू हुई: कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैं उसकी तरफ पीठ किए हूं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैं इतना भागा-भागा हूं कि उसका बाण अगर आए भी तो मुझे बेध न पाएगा। मुझे थिर होना होगा। थिरता ही ध्यान है। और मुझे शांत होना होगा। शांत होना ही उसकी तरफ उन्मुख होना है। और मुझे शून्य होना होगा। क्योंकि शून्य के अतिरिक्त न कोई प्रार्थना है, न कोई पूजा है, न कोई अर्चना है।
जो मेरा अनुभव मैं कहता,
अनुभव वह केवल मेरा है
ऐसी बात नहीं है!
जीवन के सागर से
अनुभव के बादल
उठते रहते हैं,
छा जाते निस्सीम गगन में,
जीवन-रस बरसा देते हैं
गिरि-शिखरों पर
चट्टानों पर
खेतों में, खलिहानों में
मरु खंडों पर
नदियों-नालों में
अनुभव के बादल अनगिन हैं
भूरे पीत-गुलाबी बादल
श्वेत-श्याम रतनारे बादल
नारंगी कजरारे बादल
हंसते बादल
रोते बादल
अट्टहास भी करते बादल
भोले-भाले शिशु से बादल
दानव से नख वाले बादल
इंद्रधनुष इनमें खिलते हैं
वज्र कभी इनसे गिरते हैं!
अनुभव के बादल अनगिन पर
मात्र एक जीवन का सागर
जिसकी गहराई को कोई
अब तक नाप नहीं पाया है,
देश-काल भी जिसकी सीमा
अब तक जान नहीं पाए हैं,
वह अगाध है,
वह असीम है,
जिसको कहते क्षितिज
हमारे ही वीक्षण की
वह सीमा है!
उसका कोई क्षितिज नहीं है!
अनुभव के बादल अनगिन पर
सब उठते जीवन-सागर से
इसीलिए तो
जो मेरा अनुभव, मैं कहता
अनुभव वह केवल मेरा है
ऐसी बात नहीं है!
जो मैं कह रहा हूं, मेरा अनुभव है! लेकिन मेरा ही है, ऐसी बात नहीं है। जो भी जागे, सबका वही अनुभव है। जिन्होंने भी आंख खोलीं, सबका वही अनुभव है। अनुभवी एकमत हैं। सबै सयाने एकमत! और विवाद अगर कहीं है तो पंडितों में है। जिनकी प्रज्ञा जग गई है, उनमें कोई विवाद नहीं है। सिद्धांतों और शास्त्रों का ऊहापोह है तो शास्त्रियों में है। वे शास्त्रों का भी शस्त्र की तरह उपयोग करते हैं। लड़ने के नये-नये बहाने हैं। अहंकार की प्रतिष्ठा के नये-नये उपाय। लेकिन बुद्धों में, सिद्धों में कोई विवाद नहीं है। विवाद असंभव है। हो ही नहीं सकता। अनुभव तो एक है।
और अनुभव जिसका है, वह एक ही सागर है। सारे बादल एक ही सागर से उठते हैं। फिर वे भूरे हों कि पीले हों कि सतरंगे हों, इससे अंतर नहीं पड़ता। सारे बादल एक ही सागर से उठते हैं। लेकिन वे बादल चट्टानों पर भी बरसते हैं, पहाड़ों पर भी बरसते हैं, खेत-खलिहानों में भी बरसते हैं--और तब अंतर पड़ जाता है। पत्थर पर वे ही बादल बरसते हैं, मगर दूब नहीं ऊगती। चट्टानों पर वे ही बादल बरसते हैं, मगर चट्टानें खाली की खाली रह जाती हैं। आर्द्र नहीं हो पातीं। गीली नहीं हो पातीं। रससिक्त नहीं हो पातीं। वे ही बादल झीलों में भर जाएंगे। झीलें चूंकि खाली थीं, शून्य थीं, इसलिए वे ही बादल झीलों पर जब बरसेंगे, तो झीलें भर जाएंगी। और पहाड़ चूंकि पहले से ही भरे हैं, इसलिए वे ही बादल पहाड़ों पर भी बरसेंगे लेकिन पहाड़ खाली के खाली रह जाएंगे।
अहंकार है तो तुम खाली के खाली रह जाओगे। अहंकार को जाने दो, झील की नाईं हो जाओ, बादल तो बरस ही रहे हैं, भरने में देर न लगेगी।
और इतना स्मरण रखना: वह आ भी जाएगा, उसका रथ तुम्हारे प्राणों को पार करके निकल भी जाएगा, उसका बाण तुम्हें बेध भी देगा, तुम उसे अनुभव भी कर लोगे, फिर भी तुम उसे जान न पाओगे। उसे जानने का कोई भी उपाय नहीं है। उसे जीया जा सकता, जाना नहीं जा सकता।
जिसकी गहराई को कोई
अब तक नाप नहीं पाया है,
देश-काल भी जिसकी सीमा
अब तक जान नहीं पाए हैं,
वह अगाध है,
वह असीम है,
जिसको कहते क्षितिज
हमारे ही वीक्षण की
वह सीमा है!
उसका कोई क्षितिज नहीं है!
उसकी कोई सीमा नहीं है--न समय में, न क्षेत्र में। इसलिए हम उसे जान-जान कर भी जान नहीं पाते। जितना जानते हैं, उतना ही रहस्यपूर्ण होता चला जाता है।
तुम्हारी प्रार्थना शुभ है। पर प्रार्थना के अनुकूल तुम्हें स्वयं भी होना होगा। तुम्हारी पूजा शुभ है। लेकिन जो दीये तुमने जलाए हैं पूजा के थाल में, वे तुम्हारी आत्मा के दीये नहीं हैं। तुम जो फूल चढ़ाने ले आए हो परमात्मा के चरणों में, वे तुम्हारी आत्मा के फूल नहीं हैं, वे तुम्हारी चेतना के फूल नहीं हैं। तोड़ लाए हो किन्हीं वृक्षों से--गुलाब है और चंपा है और चमेली है--और उनके फूल चढ़ा दिए हैं तुमने पत्थर की एक मूर्ति पर।
सब झूठा है। पत्थर की मूर्ति झूठी--आदमी की बनाई हुई। फूल उधार--किन्हीं वृक्षों से ले आए। ज्योति भी अपनी नहीं। प्रार्थना-पूजा भी बासी। कोई गायत्री दोहरा रहा है, कोई कुरान की आयत पढ़ रहा है, कोई नमोकार-मंत्र का उच्चारण कर रहा है। प्रार्थना भी अपनी नहीं, भाव भी अपने नहीं, इतने उधार--परमात्मा पत्थर का, फूल वृक्षों के, पूजा उधार, प्रार्थना बासी, दीया भी अपने चैतन्य का नहीं--फिर कैसे होगा?
कुछ तो प्रामाणिक लाओ!
आज बता दे दीप मुझे प्रिय,
मैं तुझ सी बन जाऊं कैसे?
तेरे तल में अंधियारा है,
फिर भी तू अंधियारा हरता।
सांस-सांस पर धूम्र रूप में
तू प्रतिपल निज व्यथा उगलता।
देख रही हूं तेरी लौ में,
तेरा आकुल हृदय मचलता।
पर तम को हरने में ही तो,
है यह तेरा जीवन जलता।
जगती को जीवन देकर भी,
मैं प्रकाश कर पाऊं कैसे?
आज बता दे दीप मुझे प्रिय,
मैं तुझ सी बन जाऊं कैसे?
आता है परवाना उड़ कर,
लेकिन वह भी जल ही जाता।
तेरे प्राणों की ज्वाला में,
पागल अपना तन झुलसाता।
उसका यह बलिदान न तेरी,
गति में कुछ बाधा पहुंचाता।
धन्य-धन्य है जीवन तेरा,
अविरत गति से जलता जाता।
क्षणभंगुर यह जीवन-दीपक,
इसको सफल बनाऊं कैसे?
आज बता दे दीप मुझे प्रिय,
मैं तुझ सी बन जाऊं कैसे?
दीये बनो! शिवानंद, दीये बनो! भीतर का दीया जलाओ। उसे ही मैं ध्यान कह रहा हूं। भीतर का दीया जलाओ। उसे ही मैं प्रेम कह रहा हूं। फूल खिलाओ चेतना के, करुणा के, आनंद के, अहोभाव के, कृतज्ञता के। इन फूलों को चढ़ाओ। और पत्थर की मूर्तियों को तलाश करने जाने की जरूरत नहीं है। वह सब तरफ मौजूद है। सब दिशाओं में भरा है। जिस दिशा में झुकोगे, उसी के चरण हैं। जिस चरण में झुकोगे, उसी के चरण हैं। और प्रार्थना अपनी उठने दो! कम से कम प्रार्थना तो निज की हो। तुतलाती ही हो, तो भी चलेगा। तुतलाती प्रार्थनाएं भी पहुंच जाएंगी और गायत्री के शुद्धतम मंत्र भी नहीं पहुंचेंगे। यह प्रश्न मंत्रों का नहीं है, ध्वनियों का नहीं है, मात्राओं का नहीं है, व्याकरण, भाषा का नहीं है, यह प्रश्न तो प्रीति का है।
छोटे से बच्चे को देखा है जब पहली दफे तुतलाता है? तो मां कितनी आनंदित हो जाती है! यही बच्चा एक दिन विश्वविद्यालय से लौटेगा पीएच.डी. लेकर, बड़ी सुंदर भाषा बोलेगा, अलंकृत, मगर मां फिर वैसी प्रसन्न कभी नहीं होगी! इसकी पीएच.डी. की उपाधि भी अब कुछ अर्थ न रखेगी। वह जो पहली बार यह तुतलाया था--कुछ बोला नहीं था, ऐसे ही आवाज की थी...मम्-मम्... लेकिन मां आनंदित हो गई थी। उस पहली आवाज में निसर्ग था, स्वभाव था। अब शिक्षा है, संस्कार है--मगर सब उधार है। वह पहली आवाज इसके प्राणों से उठी थी।
ऐसी ही आवाज परमात्मा तक पहुंचती है, खयाल रखना!
अपनी कहो। और कुछ कहने को न बने तो रोओ! आंसू तो अपने हैं! आंसुओं के साथ कम से कम एक अच्छी बात है कि आंसुओं की कोई गायत्री नहीं, कोई कुरान नहीं। तुम किसी और के आंसू नहीं गिरा सकते। अपने ही आंसू। वे पहुंच जाएंगे। वे उसके चरणों को पखार देंगे।
और इतना फिर दोहरा दूं: वह आया हुआ है, तुम भागे हुए हो। सवाल उसके आने का नहीं है, सवाल तुम्हारे खड़े हो जाने का, ठहर जाने का है।
ओशो, आपने कहीं कहा है कि मनुष्य की सुख की खोज ही बताती है कि मनुष्य दुखी है। क्या मनुष्य दुख लेकर ही जन्म लेता है? उसका यह बुनियादी दुख क्या है? और क्या इस दुख का निरसन भी है?
तुमने भूगोल में पढ़ा होगा, यूरोप में मृत सागर है। मृत सागर की खूबी यही है, उसमें इतना लवण इकट्ठा हो गया है कि उसमें मछली भी जी नहीं सकती। उसमें कोई प्राणी नहीं जीता। इस लिहाज से वह मृत है। और उसकी दूसरी खूबी यह है, उसमें तुम किसी आदमी को डुबाना भी चाहो तो डुबा नहीं सकते। आदमी के वजन से ज्यादा वजन पानी का हो गया है।
ठीक वही स्थिति मां के पेट में होती है। इसलिए जब गर्भवती होती है कोई स्त्री, तो नमक खाने में उसका रस बहुत बढ़ जाता है, नमकीन चीजें उसे प्रीतिकर लगने लगती हैं। क्योंकि पेट सारा नमक मांगता है--और नमक, और नमक। मां के पेट में बच्चा तैरता है। तापमान बिलकुल एक रहता है, नौ महीने तक, थिर, तापमान में जरा सा अंतर नहीं होता। तापमान बड़ा सुखद होता है, और एक सा थिर रहता है तो बड़ा शांतिदायी होता है। और मां के पेट में कोई आवाजें नहीं पहुंचतीं। सिर्फ आधुनिक आवाजों को छोड़ कर--जैसे जेट हवाई जहाज की आवाज पहुंचती है। वह खतरनाक है। वैज्ञानिक इस पर चिंतन करते हैं कि वह बच्चों को नुकसान पहुंचाएगी। वह बच्चों को विकृत करेगी। साधारणतः प्राकृतिक रूप से कोई आवाज मां के पेट तक नहीं पहुंचती। सन्नाटा है। अपूर्व शांति है।
नौ महीने बच्चा इस शून्य में, इस ध्यान में, इस सुविधा में, इस सुरक्षा में, इस स्वाभाविकता में जीता है, उसे सुख का अनुभव होता है। हालांकि उसे पता नहीं चलता कि यह सुख है। सुख का पता तो तब चलेगा जब दुख का पता चलेगा। सुख की याद तो पीछे आएगी। मगर पता चले या न चले, बड़ी सुखद दशा है।
फिर नौ महीने के बाद एक उपद्रव घटता है। जिस घर में नौ महीने बच्चा रहा है, वहां से अचानक उखाड़ा जाता है और दुख की शुरुआत होती है। जन्म दुख है। नौ महीने जिस सुविधा में रहा है, वहां से बच्चे को टूटता पड़ता है। और एक अज्ञात, अनजान जगत में प्रवेश करना होता है; जहां हर चीज चोट पहुंचाती मालूम पड़ती है।
अभी पश्चिम में कुछ वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं, उन्होंने जो शोधें की हैं वे महत्वपूर्ण हैं। वे कहते हैं, अस्पतालों में जहां बच्चों का जन्म होता है, इतना तेज प्रकाश जला कर रखा जाता है कि हमें खयाल ही नहीं है कि हम बच्चों की आंखों को खराब कर देते हैं। बच्चे नौ महीने शांत अंधकार में रहे हैं, जहां रोशनी की किरण भी नहीं थी। उनकी आंखों के तंतु बहुत कोमल हैं। और अस्पताल में जहां वे पैदा होते हैं, वहां ट्यूबलाइट जल रहे हैं। भयंकर रोशनी है। बच्चों के कोमल तंतुओं वाली आंखें इस भयंकर रोशनी से भारी आघात पाती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनिया में इतने चश्मों की जरूरत न हो, इतने लोगों की आंखें खराब न हों, अगर बच्चों को हम थोड़े सौम्य प्रकाश में पैदा होने की सुविधा दे सकें। बहुत सौम्य प्रकाश चाहिए। इतना सौम्य कि बच्चे को मां के गर्भ के अंधेरे में और इस प्रकाश में ज्यादा अंतर न मालूम पड़े। अंतर धीरे-धीरे पड़ना चाहिए, क्रमशः पड़ना चाहिए, ताकि आघात न हो।
बच्चा पैदा हुआ नहीं कि हमने तत्क्षण उसकी नाल काटी। हम झटके देते हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं, यह नाल का काटा जाना, तत्क्षण, जीवन भर के लिए घाव हो जाता है। यह मनुष्य की चेतना में घाव हो जाता है। क्योंकि इसी नाल से बच्चा श्वास लेता था, यही उसके प्राण का आधार थी, यही उसका अस्तित्व था। इसे तुम झटके से तोड़ देते हो। अभी बच्चे ने स्वयं श्वास लेनी शुरू भी नहीं की है और तुम झटके से उसकी नाल काट देते हो।
नये आविष्कार यह कह रहे हैं कि पहले बच्चे को श्वास लेना सीखने दो। जब बच्चा पूरी तरह श्वास लेने लगे--जरा रुको, जल्दी क्या है--फिर नाल काटना। रूपांतरण हो जाने दो। बच्चे को मां से श्वास लेने की जगह स्वयं श्वास लेने की क्षमता अर्जित कर लेने दो। जरा रुको क्षण भर, पांच मिनट, दस मिनट, पंद्रह मिनट ज्यादा से ज्यादा। पांच से पंद्रह मिनट के बीच रुकने की जरूरत है। तो बच्चे को कम चोट लगेगी। खुद श्वास लेने लगेगा तो कम चोट लगेगी।
और बच्चा अगर श्वास नहीं लेता तो डाक्टर उसकी टांगों को पकड़ कर शीर्षासन करवा देता है, उलटा लटका कर उसकी पीठ को थपथपा देता है जोर से, ताकि घबड़ाहट में उसकी श्वास शुरू हो जाए। यह कोई जिंदगी को शुरू करने की व्यवस्था हुई? यह तो हिंसात्मक व्यवहार हुआ।
फिर बच्चे को लपेट दिया जाता है कपड़ों में। अभी उसकी त्वचा बहुत कोमल है, कितना ही कोमल कपड़ा तुम लपेटो, उसकी त्वचा को अभी कष्टपूर्ण मालूम होता है। नये शोधकर्ता कहते हैं कि बच्चे को पहले पानी के टब में रखना चाहिए, उसी तापमान पर जिस तापमान में मां के पेट में था। और पानी के टब में वही अनुपात होना चाहिए रासायनिक रूप से जो मां के पेट में नमकों का था, ताकि बच्चा पानी में तैर सके। और धीरे-धीरे रूपांतरण करो! दुनिया में कम दुख होगा।
फिर सारा शिक्षण अस्वाभाविक है। हम बच्चे के स्वभाव को स्वीकार नहीं करते। हम उसके ऊपर आदर्श थोपते हैं। हम बच्चे को मौका नहीं देते कि वह वैसा जी ले जैसा जीने को पैदा हुआ है। हम उसके चारों तरफ ढांचे, चरित्र, नियम, मर्यादाएं बांधते हैं। हम लक्ष्मण-रेखाएं खींचते हैं। हम बच्चे को विकृत करते हैं, अप्राकृतिक करते हैं। फिर दुख घना होता जाता है।
दुख की परिभाषा मेरे हिसाब में: अस्वाभाविक हो जाने का नाम दुख है। स्वाभाविक होने का नाम सुख है। जब भी हम स्वभाव के अनुकूल होते हैं, तब सुख होता है।
तुम खुद ही अपने जीवन में थोड़ी जांच करना। जब भी तुम स्वभाव के अनुकूल होते हो, तब एक सुखद आभा तुम्हें घेर लेती है। और जब भी तुम स्वभाव के प्रतिकूल होते हो, तब एक दुख, पीड़ा, एक घाव, तुम्हारी आत्मा में एक नासूर बन जाता है। और हमारी पूरी जीवन-प्रक्रिया जिसको हम शिक्षण कहते हैं, जिसको हम बच्चे को संस्कार देना कहते हैं...
अजीब-अजीब संस्कार हैं! अजीब-अजीब मूढ़तापूर्ण संस्कार हैं! जैसे यहूदी बच्चा पैदा हुआ, या मुसलमान बच्चा पैदा हुआ, तो ‘खतना’ करो। जननेंद्रिय सर्वाधिक संवेदनशील इंद्रिय है। बच्चा पैदा हुआ और यहूदी पहला काम यह करेंगे कि उसकी जननेंद्रिय की चमड़ी को काट दो। तुम उसे ऐसी चोट पहुंचा रहे हो, जिसको शायद वह जिंदगी भर कभी नहीं भर पाएगा। मगर मूढ़तापूर्ण धारणाएं हैं, कि ‘खतना’ करने से ही वह यहूदी होगा, नहीं तो वह यहूदी नहीं रह जाएगा। इस तरह के न मालूम कितने रीति-रिवाज हैं जो हम बच्चों पर थोपते हैं। अगर उन सबका आंकलन किया जाए, तो पता चलेगा कि आदमी की छाती पर यह हिमालय जैसा दुख क्यों बैठ गया है।
फिर जो भी बच्चा करना चाहता है, वही हम गलत बताते हैं। अगर वह बाहर खेलना चाहता है, तो गलत। सर्दी पकड़ जाएगी। अगर धूप में खेलना चाहता है, तो गलत। अगर झाड़ों पर चढ़ना चाहता है, तो गलत। अगर नदियों में तैरना चाहता है, तो गलत। अगर पहाड़ों पर जाना चाहता है, तो गलत। गलतियों का अंबार है। बच्चा जो भी करना चाहता है, गलत! और जो हम करवाना चाहते हैं, वह बच्चे की समझ में नहीं आता--कि क्यों करे? उसके स्वभाव में उसके लिए कोई जगह नहीं है।
एक मां अपने बच्चे को पालक की भाजी खिला रही थी। वह रो रहा है और वह उसको पालक की भाजी खिला रही है। क्योंकि पालक की भाजी स्वास्थ्यप्रद है। और बच्चा रोता हुआ कह रहा है कि जब मैं आइसक्रीम खाता हूं तो तू मुझे रोकती है, और जब पालक की भाजी मैं खाना नहीं चाहता तो मुझे खिलाती है! तो उसकी मां ने कहा कि पालक की भाजी में विटामिन होते हैं। तो उस बच्चे ने कहा कि यह किस तरह का ईश्वर है जिसने पालक की भाजी में विटामिन रखे और आइसक्रीम में विटामिन नहीं!
जो भी बच्चे को प्रीतिकर है, उसमें कुछ गलती है। और जो भी हम उस पर थोपना चाहते हैं, वह बच्चे को प्रीतिकर नहीं है। इस द्वंद्व में, इस फांसी में जीवन का सारा सुख छिन जाता है। और धीरे-धीरे हम एक ऐसे मनुष्य को पैदा करते हैं, जो अत्यंत दुख से भरा हुआ मालूम पड़ता है, जो दुख ही दुख मालूम पड़ता है।
फिर जब यह आदमी हम पैदा कर लेते हैं दुखी, तो यह आदमी पूछता है कि इतना दुख क्यों है? तो इसके लिए हमें व्याख्याएं देनी पड़ती हैं। तो हमारे पंडित हैं, पुरोहित हैं, वे इसकी व्याख्याएं खोजते हैं। कोई कहता है, तुमने पिछले जन्म में पाप किए थे, उनकी वजह से तुम दुख भोग रहे हो।
नितांत व्यर्थता की बात है। यह पिछले जन्मों के पापों का परिणाम नहीं है जो तुम दुख भोग रहे हो, यह इसी जन्म का तुम्हारे ऊपर किए गए पापों का परिणाम है। तुम्हारे ऊपर जो ज्यादतियां की गई हैं, उनका परिणाम है जो तुम दुख भोग रहे हो। लेकिन व्याख्या तो देनी पड़ेगी। और व्याख्या जंच जाती है, कि पिछले जन्मों के दुख का परिणाम भोग रहा हूं। पिछले जन्मों में पाप किए, उनका यह फल है। तो एक आश्वासन मिल गया कि ठीक है, तो दुखी रहना पड़ेगा। अब एक ही आशा है: इस जन्म में पाप न करना; तो अगले जन्म में सुख मिलेंगे।
मगर किसी को भी सुख मिलता दिखाई नहीं पड़ता। और तुम सभी पिछले जन्म में सोचते रहे होओगे कि अगले जन्म में सुख मिलेंगे। यह अगला जन्म है! इसमें भी सुख नहीं मिल रहा है। और अगले जन्म में भी सुख नहीं मिलेगा। क्योंकि जीवन की पूरी व्यवस्था अवैज्ञानिक है, अप्राकृतिक है। जीवन की पूरी अब तक की, अब तक आदमी को जैसा निर्मित करने का उपाय किया गया है, वह इतना झूठा है, इतना कृत्रिम है कि उससे सुख पैदा नहीं हो सकता। यह तुम्हारे पिछले जन्मों के पापों का फल नहीं है।
कोई कहते हैं कि इसलिए तुम्हें दुख मिल रहा है क्योंकि अदम ने...अब अदम ने कब किया था पाप! और कोई खास पाप न किया था, ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया था। क्योंकि परमात्मा ने मना किया था कि मत खाना, आज्ञा का उल्लंघन किया था। अदम ने तो आज्ञा का उल्लंघन किया था हजारों साल पहले, फल तुम भोग रहे हो!
ऐसी-ऐसी मूढ़तापूर्ण बातें लोगों को समझाई गई हैं। लेकिन सचाई नहीं कही जाती। क्योंकि सचाई कही जाए तो हमें क्रांति करनी पड़े आज। अब अदम ने पाप किया था, हम क्या कर सकते हैं? झेलना पड़ेगा। पिछले जन्म में पाप किया था, अब क्या करोगे? अब पिछले जन्म में तो लौटा नहीं जा सकता, इसलिए झेलना पड़ेगा।
तुम्हारे पंडित-पुरोहित, तुम्हारे राजनेता एक साजिश में हैं। वह साजिश यह है कि तुम्हें दुख झेलने के लिए राजी किया जाए। तुम्हें दुख झेलने के लिए इस तरह राजी किया जाए कि तुम्हें पता ही न चले कि तुम राजी कर लिए गए हो। तुम्हारे दुख पर मलहम-पट्टी कर दी जाए और यह सत्य तुमसे छिपा लिया जाए कि दुख निर्मित किया जा रहा है। तुम्हारी समाज की व्यवस्था, तुम्हारे सोचने के ढंग, तुम्हारे आदर्श, तुम्हारे मूल्य, सब दुख पैदा कर रहे हैं। मगर अगर यह बात कही जाए तो फिर इन सारे मूल्यों को बदलना होगा। और उन मूल्यों के साथ लोगों के न्यस्त स्वार्थ जुड़े हैं। सच तो यह है, आदमी दुखी रहे, इसमें बहुत लोगों का स्वार्थ है। कोई नहीं चाहता आदमी सुखी हो।
मैंने सुना है, एक रात एक शराबघर में बहुत उत्सव रहा। एक आदमी अपने साथियों को लेकर आया था, खूब पीना-पिलाना चला--देर तक, आधी रात तक। शराबघर का मालिक, दुकानदार बड़ा खुश था। जब ये मेहमान जाने लगे तो उसने अपनी पत्नी से कहा, ऐसे मेहमान रोज आते रहें तो हमारे भाग्य में भी चार चांद जुड़ जाएं। जाते हुए मेहमान ने सुन लिया। उसने कहा, हम तो रोज आएं, प्रार्थना किया करो कि हमारा धंधा ठीक से चलता रहे। हमारा धंधा ठीक चले, हम तो रोज आएं! प्रार्थना करना हमारे लिए। तो उसने कहा, जरूर प्रार्थना करेंगे। लेकिन तभी उसने पूछा, क्या मैं यह पूछ सकता हूं कि आपका धंधा क्या है? उसने कहा, यह तुम न पूछो तो अच्छा, नहीं तो प्रार्थना करना जरा मुश्किल होगा। तो और उत्सुक हुआ वह शराब का दुकानदार। उसने कहा, तब तो बताओ ही, यह धंधा कौन सा है तुम्हारा? तो उसने कहा, मैं धंधा करता हूं मरघट पर लकड़ी बेचने का। लोग मरें ज्यादा, तो मेरी लकड़ी बिकती है। लकड़ी बिके तो हम तो रोज आएं। तुम जरा प्रार्थना करते रहना कि हमारा धंधा ठीक से चलता रहे।
अब बड़ी मुश्किल हो गई। किसी का धंधा है मरघट पर लकड़ी बेचना, तो उसकी प्रार्थना एक ही है कि हे प्रभु, आज कोई मरे! वह मरने पर ही जी रहा है।
यह समाज, अगर तुम गौर से देखो इसको चारों तरफ, तो तुम चकित हो जाओगे--तुम्हारे दुख पर जी रहा है। इस समाज में जो लोग सिर पर सवार हो गए हैं, धन और पद और सब दृष्टियों से जिन्होंने शक्ति अर्जित कर ली है, वे तुम्हारे दुख पर जी रहे हैं। तुम दुखी हो, इसलिए उनके हाथ में शक्ति है। अगर तुम सुखी हो जाओ, उनके हाथ से शक्ति छिन जाए।
समझो कि एक समाज सुखी हो गया, कल्पना करो कि एक समाज बिलकुल सुखी है। हर आदमी मस्त है अपनी मस्ती में। और राजनेता कहते हैं कि हमें युद्ध करना है; हमें पड़ोसी से युद्ध लड़ना है। कोई युद्ध पर जाने को तैयार होगा? लोग कहेंगे, हमें प्रयोजन? हम क्यों लड़ें? जिंदगी हमारी इतनी आनंदपूर्ण है, इसे हम क्यों गंवाएं? लेकिन राजनेता कहेगा, झंडा ऊंचा रहे हमारा! वे कहेंगे, तुम रखो अपना झंडा ऊंचा, हमारी जिंदगी तुम्हारे झंडे ऊंचे से बहुत ऊंची है। ये तो दो कौड़ी के लोग हैं जो झंडा ऊंचा रहे हमारा, इसके लिए मरने को तैयार हो जाते हैं। जिनकी जिंदगी में कुछ है ही नहीं। नहीं तो झंडों में है क्या?
लेकिन झंडों पर लोग मर जाते हैं। ऐसे मूढ़ हो, झंडों पर मर जाते हो! कि किसी ने झंडा नीचा कर दिया कि बस! जीवन रहे कि जाए! कपड़े के टुकड़े तुमने झंडे बना लिए हैं, डंडों में पोकर खड़े हो गए हो, और इनके लिए लड़ रहे हो? जरूर तुम्हारी विक्षिप्तता और तुम्हारा दुख बहुत घना होगा।
मैंने सुना है, एडोल्फ हिटलर से मिलने इंग्लैंड का एक बहुत बड़ा राजनीतिज्ञ गया था--युद्ध के पहले, दूसरे महायुद्ध के पहले। और एडोल्फ हिटलर उसे प्रभावित करना चाहता था, चौंकाना चाहता था, धमकाना चाहता था। वह उसका ढंग था। वे सातवीं मंजिल पर खड़े हैं मकान की, छत पर खड़े हैं। और एडोल्फ हिटलर ने कहा कि देखो, मुझसे झंझट मत लो! क्योंकि मेरे पास ऐसे सैनिक हैं कि जो सारी दुनिया को जीत लेंगे। मेरे सैनिकों का मुकाबला कोई भी नहीं कर सकता। और तभी अचानक, अंग्रेज राजनीतिज्ञ को चौंकाते हुए, उसने अपने पास खड़े एक सैनिक से कहा, छलांग लगा जा! सातवीं मंजिल से वह आदमी एकदम छलांग लगा गया। अंग्रेज राजनीतिज्ञ तो भौचक्का रह गया! क्योंकि कोई आदमी मरने को ऐसा, इतनी आतुरता दिखाए! थोड़ा झिझकता, थोड़ा पूछता कि किसलिए? क्यों? मगर वह छलांग ही लगा गया! उसको प्रभावित देख कर हिटलर ने और एक दांव मारना चाहा, दूसरे सैनिक से कहा कि तू भी छलांग लगा जा! दूसरा भी छलांग लगा गया! तब तो अंग्रेज राजनीतिज्ञ थरथरा गया। उसको थरथराया देख कर हिटलर ने तीसरे से कहा, तू भी छलांग लगा जा! तब तक तो अंग्रेज राजनीतिज्ञ झपटा, उस आदमी को पकड़ा और कहा कि तुम पागल हो गए हो? इस तरह मरा जाता है? तुम्हें जीने में कोई रस नहीं है? उस आदमी ने कहा, छोड़ो मेरा हाथ! तुम इसको जिंदगी कहते हो? जो हम जी रहे हैं, तुम इसको जिंदगी कहते हो? इस आदमी के साथ जीने की बजाय मर जाना बेहतर है।
यहां लोग इतना मरने को उत्सुक हैं, क्योंकि जिंदगी बेकार है। कोई भी मरने को उत्सुक है। किसी भी बहाने। इसलाम खतरे में है--चले कुछ मूढ़ मरने को! हिंदू धर्म खतरे में है--चले कुछ मूढ़ मरने को! कोई भी बहाना चाहिए।
मरने की ऐसी आतुरता क्या बताती है? एक ही बात बताती है कि तुम्हारे जीवन में रस नहीं है, तुम्हें जीवन का अनुभव नहीं है। जीवन इतना बहुमूल्य है, परमात्मा की ऐसी अपूर्व भेंट, ऐसा प्रसाद, और तुम ऐसे गंवाने को तैयार हो जाते हो--झंडा झुक गया, कि इरछा-तिरछा हो गया, कि बस मरे! कि जरा सी जमीन का टुकड़ा किसी ने ले लिया कि मरे!
जमीन किसकी है? और ये राष्ट्रों की सीमाएं, और इन सीमाओं पर मरने की ऐसी तैयारी, और मरने वालों की इतनी प्रशंसा और इतना सम्मान और महावीर चक्र!...कम से कम महावीर को तो बदनाम न करो! चक्र तुम्हें देना हो दो। घनचक्करों को महावीर चक्र दे रहे हो! जिनमें बुद्धि भी नहीं है नाममात्र को।
लेकिन यह सारा का सारा इंतजाम, यह सारा व्यवस्था का जो जाल है, यह जमा ही इस बात पर है कि आदमी दुखी है। आदमी दुखी है तो चीजें बिकती हैं।
तुम देखते हो? कारों के विज्ञापन देखते हो? कपड़ों के विज्ञापन देखते हो? सिगरेटों के विज्ञापन देखते हो? जरा विज्ञापनों को गौर से देखो। हर विज्ञापन यह कह रहा है कि आदमी दुखी है और उसका शोषण करने के लिए विज्ञापन है। कि जब तक तुम्हारे घर में दो कारें न होंगी, तब तक सुख नहीं हो सकता--अमरीका के पत्रों में ऐसे विज्ञापन होते हैं--जब तक तुम्हारे गैरेज में दो कारें नहीं हैं, तब तक कोई सुखी नहीं हो सकता। अब दुखी आदमी सोचता है कि चलो, यही सही! शायद ऐसे ही सुख मिल जाए! दो कारें हो जाती हैं, सुख नहीं मिलता। तब तक विज्ञापन और आ जाते हैं, वे कहते हैं, अब एक नाव भी चाहिए, पहाड़ पर एक मकान भी चाहिए, तब सुख होगा--ऐसे सुख कुछ आसान है! सुख के विज्ञापन बढ़ते जाते हैं।
सारे विज्ञापन इतना ही कह रहे हैं कि आदमी दुखी है। और आदमी दुखी है तो उसे चीजें बेची जा सकती हैं। व्यर्थ की चीजें बेची जा सकती हैं जिनकी कोई जरूरत नहीं है। लेकिन इस आशा में आदमी खरीदने को तत्पर रहता है कि शायद सुख मिल जाए। शायद ऐसे मिल जाए। शायद वैसे मिल जाए। शायद ये कपड़े पहनने से स्त्रियां मोहित होने लगें। देखते हैं कपड़ों के विज्ञापन? कि इस कपड़े को पहनने वाला आदमी हजारों में अलग ही दिखाई पड़ता है। सारी स्त्रियां चौंक कर उसकी तरफ देखती हैं। आशा बंधती है कि शायद...मेरी तरफ तो कोई स्त्री चौंक कर नहीं देखती, और मैं अगर किसी की तरफ चौंक कर देखूं तो एकदम पुलिसवाले को बुलाती है, शायद इस कपड़े के पहनने से... खूबसूरत सूरत मिल्स के कपड़े...शायद स्त्रियां देखने लगें चौंक कर! शायद इंद्र अप्सराएं भेजने लगे!
तुम्हें आशाओं पर जिलाया जा रहा है।
सिगरेटों के विज्ञापन होते हैं कि इस सिगरेट को पीने में ही प्रतिष्ठा है। प्रतिष्ठा? सिगरेट को पीने में? और सिगरेटें हैं, उनकी कीमतें इतनी ज्यादा हैं कि बहुत ही कम लोग पी सकते हैं। वह सिगरेट तुम्हारे हाथ में है तो प्रतिष्ठा है। जिसके हाथ में यह सिगरेट है, उसके चेहरे पर सफलता की शान है।
और हर तरह के उपाय खोजे जाते हैं।
एक आदमी सौ साल का हो गया था। पत्रकार उससे मिलने गए। उन्होंने पूछा कि तुम्हारे सौ साल के होने का राज क्या है?
उसने कहा, जरा दो दिन रुकना पड़ेगा। अभी राज नहीं बता सकता, दो दिन बाद बताऊंगा।
उन्होंने कहा, यह बड़ी हैरानी की बात है! तुम सौ साल जी भी चुके, क्या राज का तुम्हें पता नहीं है? दो दिन में खोजबीन करोगे?
उसने कहा कि नहीं, राज का तो सब पता है, मगर दो दिन बाद बताऊंगा। क्योंकि अभी मेरा कई विज्ञापन कंपनियों से सौदा चल रहा है। जिससे तय हो जाएगा! ओवॅलटीन पीने से सौ साल जीया, कि बॉर्नविटा, कि पारले के बिस्कुट...अभी कई कंपनियों से मेरा चल रहा है। जरा तय हो जाने दो। दो दिन के बाद ही पक्का कह सकता हूं कि किस कारण से मैं सौ साल जीया।
आदमी दुखी है, उसका शोषण किया जा सकता है। सुखी आदमी का शोषण नहीं किया जा सकता।
मेरे हिसाब में सुखी आदमी बगावती होता है। सुखी आदमी एक क्रांति है। उसका तुम कैसे शोषण करोगे? तुम उसे धोखा न दे सकोगे। वह इतना आनंदित है, वह अपने चैन की बांसुरी बजा रहा है कि वह तुम्हारी संगीन लेकर लड़ने को नहीं जाएगा। वह इतनी चैन की बांसुरी बजा रहा है कि वह राजनीति के दांव-पेंचों में नहीं पड़ेगा। उसे दिल्ली में कोई रस नहीं होगा। कोई लाख कहे कि दिल्ली पास है; कोई लाख कहे कि दिल्ली अब पहुंचे, तब पहुंचे; वह जाएगा ही नहीं दिल्ली। वह कोई पागल हो गया है जो दिल्ली जाए! वह अपने छोटे से साधारण जीवन में ऐसे असाधारण सुख को अनुभव कर रहा है कि क्यों चिंता करेगा कि प्रधानमंत्री बने? यह तो दुखी लोगों की दौड़ है। कि क्यों राष्ट्रपति बने? यह तो दुखी लोगों की दौड़ है। यह तो दुखी आदमी की चेष्टा है कि शायद राष्ट्रपति हो जाऊं, तो सुख मिले। मिलता नहीं, लेकिन तब तक तो बहुत देर हो गई होती है। तब तक तो पूंछ कट ही गई होती है। फिर कहने में भी कोई सार नहीं होता।
मैंने सुना है, एक फकीर ने एक गांव में आकर घोषणा कर दी कि जिसको भी ईश्वर के दर्शन करने हों, उसे नाक कटानी पड़ेगी। और बात लोगों को जंची। क्योंकि कई लोग कई तरह से कोशिश कर रहे थे और ईश्वर के दर्शन नहीं हो रहे थे। फिर बात और भी जंची, क्योंकि फकीर की नाक कटी हुई थी। और बात असल यह थी कि फकीर किसी दूसरी स्त्री के प्रेम में पड़ गया था किसी गांव में और उसके पति ने उसकी नाक काट दी थी। अब वह अपनी नाक बचाने के लिए, कटी हुए नाक बचाने के लिए यह तरकीब खोज लिया था। वह यह कहता था कि नाक क्या कटी कि परदा गिरा गया! नाक के कटते ही एकदम परमात्मा के दर्शन हो गए!
अब परमात्मा के दर्शन तो बहुत लोगों को करने हैं। क्योंकि इतने लोग दुखी हैं, इतने पीड़ित हैं, इतने परेशान हैं कि अब कुछ और नहीं मिला जीवन में तो कम से कम परमात्मा ही मिल जाए! कुछ लोग आने लगे, सत्संग करने लगे फकीर का। और फकीर तो एक ही बात कहता था कि भई, और कुछ भी करो, कुछ होगा नहीं। मुझे देखो! अरे, इतना सा त्याग नहीं कर सकते?
आखिर एक हिम्मतवर आदमी ने...हिम्मतवर कहो या बुद्धू कहो। अक्सर एक ही तरह के लोग हिम्मतवर होते हैं, वे ही बुद्धू होते हैं, वे ही हिम्मतवर होते हैं। अक्सर बुद्धू दुस्साहसी होते हैं। एक बुद्धू खड़ा हो गया, उसने कहा कि ठीक है जी। बहुत से बहुत नाक ही कटेगी, और क्या! वैसे ही जिंदगी कटी जा रही है। मगर यह भी करके देखे लें। एक दांव सही।
एकांत में लेकर फकीर ने उसकी नाक काट दी। नाक तो कट गई, ईश्वर वगैरह कुछ दिखाई नहीं पड़ा। उसने कहा, ईश्वर दिखाई नहीं पड़ रहा।
उसने कहा, अब तू चुप रह! क्या मुझको दिखाई पड़ रहा है तू समझता है? मेरी कट गई, मैं अपनी बचा रहा हूं, अब तेरी कट गई, तू अपनी बचा। अगर किसी से कहा कि नाक कट गई और ईश्वर नहीं दिखा, तो लोग तुझे बुद्धू समझेंगे। लोग हंसेंगे। अब तो सार इसी में है बेटा, कि तू भी एकदम मस्त हो जा! और एकदम डोल! और जो भी मिले उससे कह कि भैया गजब! इतना सरल साधन! सहज-योग! नाक क्या कटी, एकदम द्वार खुल गए!
उस आदमी ने भी सोचा और उसने कहा कि बात यही ठीक है। गांव में एकदम नाचता हुआ पहुंचा, ढोल बजाता हुआ। लोगों ने पूछा, क्या हुआ? उसने कहा, ईश्वर के दर्शन हो गए।
फिर और लोग भी आने लगे। और सबके साथ यही होने लगा। उस गांव में नाक-कटों की एक भीड़ इकट्ठी हो गई। सम्राट तक खबर पहुंची। सम्राट भी हैं तो उतने ही दुखी जितना कोई और। सम्राट ने अपने वजीर से कहा कि अगर नाक ही कटने से परमात्मा का दर्शन होता है, तो जिंदगी है ही कितने दिन की? ऐसे भी मैं बूढ़ा हो गया। दो-चार साल जीऊंगा ज्यादा से ज्यादा, शायद इतना भी न जीऊं। परमात्मा के दर्शन तो कर ही लेने चाहिए। अब जरा सी नाक के पीछे क्या परमात्मा के दर्शन से वंचित रहना? और इतनों को हुआ है, तो गलत तो हो ही नहीं सकता।
लोगों का तर्क है यह कि भीड़ को हो जाए तो गलत नहीं हो सकता है। और सचाई यह है कि अक्सर भीड़ गलत होती है। सौ में निन्यानबे मौकों पर गलत होती है। भीड़ और सही, जरा मुश्किल बात है। सत्य तो कभी एकाध के पास होता है, भीड़ के पास सत्य नहीं होता।
वजीर ने कहा कि जरा तुम रुको, मुझे जरा पता लगा लेने दो, ठीक-ठीक पता लगा लेने दो। वजीर ने बहुत पता लगाया, कई लोगों को पूछा। लेकिन जिससे पूछे वही एकदम, आनंद-आंसू बहने लगें, और डोलने लगे, और कहे कि दर्शन हो गए! वजीर को भरोसा न आए। बेईमान वजीर, आसानी से भरोसा भी कैसे आए! जिंदगी भर बेईमानी की, सबको धोखा दिया, तो ही तो वजीर हुआ। नाक कटने से ईश्वर का उसको कोई संबंध न दिखाई पड़े, कोई गणित भी न दिखाई पड़े, तर्क भी न दिखाई पड़े। राजा तो बिलकुल राजी ही होने के करीब था। उसने कहा, बस एक दिन और मुझे समय दे दो। उसने चार-पांच नाक-कटों को पकड़वाया, कठघरे में अंदर बंद करवाया और उनकी अच्छी पिटाई करवाई। जब उनकी खूब पिटाई करवाई और कहा कि सच-सच बोलो, नहीं तो और पीटे जाओगे, तो उन्होंने कहा, अब आप जब ज्यादा पिटाई कर रहे हैं तो फिर सच बोलना ही पड़ेगा। सच यह है कि कोई ईश्वर वगैरह का दर्शन हुआ नहीं है। लेकिन अब हम करें भी क्या? नाक तो कट ही गई! अब अपनी आत्मरक्षा के लिए यही कहना उचित है।
लोग सोचते हैं कि राष्ट्रपति होने से या प्रधानमंत्री होने से सुख मिल जाएगा। जब तक हो पाते हैं तब तक नाक कट जाती है। फिर प्रधानमंत्री होकर यह कहें कि नहीं मिला सुख, तो लोग और कहेंगे कि बुद्धू! हम पहले ही कहते थे कि इसमें कोई सार नहीं। तो फिर तो चेहरा बनाए रखना पड़ता है। तो अपनी पहन ली शेरवानी इत्यादि, अचकन वगैरह डाट ली, चले! फिर एक चेहरा बनाए रखना पड़ता है--कि नहीं, सब मिल गया! जो पाना था, मिल गया।
यह सारा जगत दुखी है। इस दुख के कारण राजनीति पैदा हो रही है। इस दुख के कारण अनेक तरह के थोथे धंधे चल रहे हैं। इस दुख के कारण हजारों लोगों के न्यस्त स्वार्थ पूरे हो रहे हैं। इस दुख के कारण मंदिरों में भीड़ है, मस्जिदों में भीड़ है, गिरजे-गुरुद्वारों में भीड़ है। मनुष्य दुखी है, तो पंडित-पुजारी के पास जाता है। तुम जब सुख में होते हो, परमात्मा को याद करते हो? सुख में याद भी आती है परमात्मा की? दुख में आती है। तब एक बात पक्की है कि अगर किन्हीं लोगों को परमात्मा के नाम पर धंधा करना है, तो तुम्हें दुखी रहना अत्यंत आवश्यक है; तुम्हें दुखी रखना आवश्यक है।
मनुष्य अब तक बहुत गहरे षड्यंत्र का शिकार है।
तुम पूछते हो, आनंद मैत्रेय: ‘आपने कहीं कहा है कि मनुष्य की सुख की खोज बताती है कि मनुष्य दुखी है।’
निश्चित ही। सुख की खोज दो बातें बताती है। एक, कि मनुष्य दुखी है। और दो, कि मनुष्य कहीं किसी अंतस्तल में जानता है कि सुख क्या है। मनुष्य ने किसी अनजान क्षण में सुख का अनुभव किया है। भूल गया हो, अचेतन में दब गया हो, लेकिन मां के गर्भ में बच्चे ने जाना है कि सुख क्या है। आज भी उसका झरना धीरे-धीरे कहीं भीतर बहता है। अंतर्गर्भ में कहीं आज भी उसे उस सुखद स्मृति की सुवास आती है। आज भी वह दीया बिलकुल बुझ नहीं गया है।
तो दो बातें तय हैं, कि एक तो मनुष्य को किसी अचेतन में अनुभव है कि सुख क्या है। नहीं तो जिसका हमें अनुभव न हो, उसकी हम खोज नहीं कर सकते। जिस आदमी ने गुलाब का फूल देखा ही न हो, वह एकदम गुलाब के फूल की खोज करने लगे, क्या तुम सोचते हो यह संभव है? जिसने हीरा न देखा हो, जिसने हीरे के संबंध में जाना न हो, वह हीरे की खोज पर निकल जाए, यह कैसे संभव है? मनुष्य ने जरूर हीरा जाना है, गुलाब का फूल कभी खिला है। उसके नासापुट अभी भी किसी सुगंध को याद करते हैं। उसके अंतर्तम में अभी भी कहीं कोई स्मृति विराजमान है--भूल गई, हजार-हजार धूल में जम गई, हजार-हजार बातों की भीड़ में खो गई--मगर है, मगर कहीं है। कहीं झरना अब भी झरता है। तो एक तो प्रत्येक मनुष्य को सुख का कहीं अचेतन में अनुभव है। और दूसरा, जीवन बड़ा दुख है। जीवन बिलकुल उससे विपरीत है। और इसीलिए सुख की तलाश है।
सुख की तलाश ही धर्म है। सुख की तलाश ही परमात्मा की तलाश है। तुम नाम कुछ भी दे दो। आनंद कहो, मोक्ष कहो, महासुख कहो, परमात्मा कहो, निर्वाण कहो, कुछ भेद नहीं पड़ता। आदमी एक ऐसी अवस्था की खोज कर रहा है जहां दुख न हो, जहां दुख का कांटा न हो, जहां दुख जरा भी साले न। और यह खोज स्वाभाविक है।
लेकिन इस खोज में बाधा डालने वाले लोग हैं। क्योंकि वे चाहते हैं, तुम खोजते ही रहो, खोज न पाओ। खोजते रहो तो उनका धंधा चले। खोज ही लो तो उनका धंधा समाप्त हो जाए।
एक डाक्टर बूढ़ा हो गया। उसका बेटा मेडिकल कालेज से डाक्टर होकर घर आ गया। बाप ने कहा कि अब तू सम्हाल काम को, मैं बहुत थक गया हूं, एक महीने भर के लिए पहाड़ पर विश्राम कर आऊं।
बाप तो पहाड़ पर विश्राम करने गया। महीने भर बाद जब लौटा तो बेटा स्टेशन उसका स्वागत करने आया, बाप के चरण छुए और कहा, पिताजी, आप जान कर प्रसन्न होंगे कि जिस बूढ़ी स्त्री को आप तीस साल में ठीक नहीं कर पाए, उसको मैंने ठीक कर दिया।
बाप ने माथा ठोंक लिया। बाप ने कहा, नालायक, कमबख्त, उस स्त्री को मैं ही तो ठीक होने नहीं दे रहा था। नहीं तो तू पढ़ता कैसे, डाक्टर कैसे होता? यह उसी की कृपा है! और उसी के आधार पर तेरा छोटा भाई डाक्टर हो रहा है। और उसी के आधार पर तेरी छोटी बहन भी डाक्टर होने वाली है। तूने यह क्या किया? तूने तो सब बर्बाद ही कर दिया, धंधा ही बर्बाद कर दिया। उसी ब़ूढी स्त्री को बचा कर तो मैं सारा धंधा चला रहा था।
वह धनपति थी। खयाल रखना, गरीब आदमी बीमार हो तो जल्दी ठीक हो जाता है। अमीर बीमार हो तो देर लगती है। लगनी ही चाहिए। जितने अमीर होओगे, उतनी ज्यादा देर लगेगी। क्योंकि आखिर चिकित्सक को भी जीना है, तुम्हीं को तो नहीं जीना है!
चीन में पुराना नियम था, अदभुत नियम था। और कभी दुनिया अच्छी होगी तो वह नियम सारी दुनिया में लागू होगा। चीन का नियम था कि मरीज चिकित्सक को इलाज के पैसे नहीं देता था, बीमारी ठीक करने के पैसे नहीं देता था। फिर? स्वस्थ रहने के पैसे देता था। हर साल मरीज ने बांध रखे थे कि इतने रुपये मैं दे दूंगा, अगर साल भर स्वस्थ रहा। अगर बीमार पड़ गया तो काट लूंगा।
यह बहुत अजीब लगेगा नियम। लेकिन यह नियम बड़ा सार्थक है, बड़ा महत्वपूर्ण है। यह नियम जरूर लाओत्से की छाया में पला होगा। यह नियम लाओत्से के कारण ही पैदा हुआ होगा। लाओत्से का कहना है कि चिकित्सक का नियम यही होना चाहिए कि वह मरीज को स्वस्थ रखे और स्वस्थ रखने के पैसे पाए। अगर मरीज बीमार हो जाए, पैसे कट जाएं। तो ही चिकित्सक लोगों को स्वस्थ रखने में उत्सुक रहेगा। नहीं तो उलटी बात हो जाएगी।
अभी तो दुनिया में उलटी बात है। चिकित्सक राह देखता है। जैसे कभी मलेरिया फैल जाता है, तो डाक्टर उसको कहते हैं: सीजन आ गया। बड़े मजे की बात है! सीजन? लोग मर रहे हैं और उनका सीजन आ गया! फ्लू फैल गया, और डाक्टरों के चित्त देखो, कैसे मग्न, प्रसन्न!
मुल्ला नसरुद्दीन के घर उसके डाक्टर ने कई दफा आदमी भेजा कि तुम अपने बेटे का बिल नहीं चुका रहे हो। तुम्हारे बेटे को चेचक की बीमारी हुई थी और मैं इतनी बार आया, इतनी दवा की। जब नौकर को सुना ही नहीं उसने और बार-बार लौटा दिया, तो डाक्टर एक दिन खुद ही गया। और मुल्ला से कहा कि नसरुद्दीन, चुकाते हो बिल कि नहीं?
नसरुद्दीन ने कहा, बिल मुझसे मांगते हो? चुकाओ तुम! क्योंकि मेरे लड़के ने ही चेचक पूरे स्कूल में फैलाई। तुमने जो कमाई की, उसमें नब्बे प्रतिशत मेरा है। मेरे बेटे की ही करतूत है। और तुम मुझसे बिल मांगते हो? शर्म नहीं आती! तुम्हें धन्यवाद देना चाहिए।
चिकित्सक अगर बीमारी पर जीएगा, तो खतरा है। और पुरोहित तुम्हारे दुख पर जी रहा है, यही खतरा है।
मैं चाहता हूं, मनुष्य सुखी हो। लेकिन मनुष्य सुखी होगा तो पुरोहित-पंडित-मौलवी विदा हो जाएंगे। इनकी क्या जरूरत रह जाएगी? अगर मनुष्य सुखी होगा, तो मंदिर-मस्जिदों में घंटे बजने और पूजाएं बंद हो जाएंगी। इनका कोई प्रयोजन न रह जाएगा। अगर मनुष्य सुखी होगा तो बुद्धू राजनेता तुम्हारी अगुवाई न कर सकेंगे। क्योंकि सुख के साथ ही साथ प्रतिभा का जन्म होता है। दुख में प्रतिभा क्षीण हो जाती है। सुख में प्रतिभा निखर आती है। मनुष्य सुखी होगा तो राष्ट्र विदा हो जाएंगे। क्योंकि राष्ट्रों ने सिवाय युद्धों के और दुखों के कुछ भी नहीं दिया। मनुष्य सुखी होगा तो हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन विदा हो जाएंगे। क्योंकि इन सब मतभेदों ने आदमी को लड़ाया, काटा, हिंसा की, खून-खराबा किया। इससे सुख नहीं आया, इससे जमीन नरक बनी। मनुष्य सुखी होगा तो न हिंदू होगा, न मुसलमान होगा, न भारतीय होगा, न चीनी होगा। मनुष्य सुखी होगा तो सिर्फ सुखी होगा। और तब परमात्मा की तरफ एक नई ही प्रार्थना उठेगी--धन्यवाद की!
अभी तो तुम्हारी प्रार्थनाएं मांग की हैं। हे प्रभु, यह दे दो, वह दे दो! बस मांगे ही चले जाते हो। और जब तक मांग है तब तक प्रार्थना झूठी है। फिर एक और तरह की प्रार्थना होगी कि हे प्रभु, तूने इतना दिया! एक गहन कृतज्ञता, एक गहन आभार। और जब प्रार्थना में आभार होता है तो प्रार्थना का सौंदर्य ही अनूठा होता है। फिर प्रार्थना में प्रसाद होता है। फिर प्रार्थना में पंख होते हैं, आकाश में उड़ने की क्षमता होती है।
मैं जरूर मनुष्य को सुखी देखना चाहता हूं। इसीलिए मुझसे राजनेता नाराज हैं। मुझसे पंडित-पुरोहित-मौलवी नाराज हैं। इससे मुझसे वे सारे लोग नाराज हैं जिनके न्यस्त स्वार्थों पर चोट पहुंच सकती है। इससे मुझसे वे सारे लोग नाराज हैं जो लोगों को नाक काटना सिखा रहे हैं। मैं लोगों से कह रहा हूं, कुछ काटने की जरूरत नहीं है--नाक ही नहीं, कुछ भी काटने की जरूरत नहीं है। क्रोध भी काटने की जरूरत नहीं है, काम भी काटने की जरूरत नहीं है; रूपांतरण करना है, काटना नहीं है। नाक काटो कि क्रोध काटो, काम काटो; जो भी तुम काटोगे, तुम अधूरे हो जाओगे, अपंग हो जाओगे। तुम कुरूप हो जाओगे। तुम्हें परमात्मा ने सर्वांग-पूर्ण बनाया है, सुंदर बनाया है। तुम्हें सब दिया है जो जरूरी है। हां लेकिन, जो तुम्हें दिया है, उसमें और-और परिष्कार हो सकते हैं, अनंत परिष्कार हो सकते हैं। तुम्हें वीणा दे दी है, अब गीत तुम कैसा गाओगे, यह तुम पर निर्भर है।
क्या तुम सोचते हो, कोई आदमी को वीणा बजाना न आता हो और अंट-शंट वीणा बजाए, तो तुम उससे कहोगे कि वीणा को आग लगा दो?
यही तुम्हारे धर्मगुरु तुमसे कहते रहे हैं। तुम्हें, क्रोध का क्या करें, यह नहीं आता। कामवासना का कैसे रूपांतरण करें, यह समझ में नहीं आता। तुम्हारे पंडित-पुरोहित कहते हैं: काट डालो, फेंक दो! कामवासना बचनी ही नहीं चाहिए, जला डालो।
लेकिन जिसके जीवन में
कामवासना जल गई, उसके जीवन में एक तरह का रूखापन-सूखापन आ जाता है। उसमें फिर हरियाली नहीं रह जाती। रसधार नहीं बहती। फिर वह एक ऐसी नदी है जिसमें धार तो रही ही नहीं, बस रेत ही रेत रह गई है। जिस दिन तुम अपने क्रोध को काट डालोगे, उसी दिन तुममें करुणा पैदा होने की संभावना समाप्त हो जाएगी। क्योंकि क्रोध ही करुणा के लिए खाद बनता है। माली बनो, नाक काटने से कुछ भी न होगा। कलाकार बनो, गुणी बनो, रसायनविद बनो। और ये सब रासायनिक ऊर्जाएं हैं। क्रोध को अगर ठीक-ठीक समझा जाए, क्रोध के साथ अगर ध्यान जोड़ दिया जाए, क्रोध + ध्यान और करुणा का जन्म हो जाता है। काम के साथ अगर ध्यान जोड़ दिया जाए, तो ब्रह्मचर्य का जन्म हो जाता है। काम + ध्यान = ब्रह्मचर्य।
कुछ काटना नहीं है, रूपांतरित करना है।
धर्म कला है। जीवन-निषेध नहीं, जीवन-विधेय है।
और अगर हम बच्चों को बचपन से ही स्वाभाविक रखने में सफल हो पाएं, अगर हम उनको सहज और नैसर्गिक होने में सहारा दे पाएं, तो सम्यक शिक्षा होगी। क्योंकि शिक्षा का एक ही लक्ष्य हो सकता है कि मनुष्य सुखी कैसे हो। शिक्षा का और कोई लक्ष्य नहीं हो सकता। शिक्षा का एक ही लक्ष्य हो सकता है: सच्चिदानंद की उपलब्धि कैसे हो?
लेकिन तुम्हारे स्कूल गणित सिखाते हैं, भूगोल सिखाते हैं, और न मालूम क्या-क्या सिखाते हैं। हिंदू-मुसलमान के युद्ध सिखाते हैं; ईसाई-मुसलमानों के जेहाद सिखाते हैं; जहर सिखाते हैं। तुम्हारा अतीत छोटे-छोटे बच्चों के कोमल मस्तिष्कों में भर दिया जाता है। ठूंस-ठूंस कर भर दिया जाता है। और बच्चे असहाय हैं। न तो भाग सकते हैं, न बच सकते हैं। उनको लोभ दिया जाता है कि जो भी तुम्हें पिलाया जा रहा है, अगर ठीक-ठीक पीया और फिर परीक्षा की कापी पर ठीक-ठीक वमन कर दिया, उलटी कर दी बिलकुल वैसी जैसी तुमने ली थी, बिना पचाए, तो तुम्हें बड़े पुरस्कार मिलेंगे। और अगर असफल हो गए, अगर हार गए, अगर अनुत्तीर्ण हो गए, तो बड़े कष्ट पाओगे, अपमान पाओगे। लेकिन न उन्हें प्रेम सिखाया जा रहा है, न उन्हें ध्यान सिखाया जा रहा है।
और जहां प्रेम और ध्यान सिखाया जा रहा हो, सरकार मानने को भी राजी नहीं है कि वह स्थान शिक्षा का स्थल हो सकता है।
कल ही सरकारी कागजात मुझे मिले हैं, कि इस आश्रम को वे शिक्षा का स्थान नहीं मान सकते। उनकी शिक्षा की धारणा यह है कि औरंगजेब के संबंध में लोगों को पढ़ाओ, कि शिवाजी महाराज के संबंध में लोगों को समझाओ! मैं जो यहां कर रहा हूं, वह उन्हें शिक्षा नहीं मालूम होती। और सचाई यह है कि जिसको वे शिक्षा कहते हैं, वह शिक्षा नहीं है; शिक्षा के नाम पर धोखा है। उनकी शिक्षा से मनुष्य पैदा नहीं होता। उनकी शिक्षा से मशीनें पैदा होती हैं।
मैं यहां ध्यान सिखा रहा हूं, प्रेम सिखा रहा हूं, उत्सव सिखा रहा हूं; होली सिखा रहा हूं, दीवाली सिखा रहा हूं। यह शिक्षा नहीं है! उत्सव से उन्हें क्या लेना-देना? आनंद से उन्हें क्या लेना-देना? ईश्वर-साक्षात्कार से उन्हें क्या लेना-देना? वे इस बात को मानने को राजी नहीं हैं कि इस स्थल को विश्वविद्यालय कहा जाए। सारे विश्व से लोग यहां आए हुए हैं। भारत के किसी विश्वविद्यालय में इतने देशों के लोग नहीं हैं जितने यहां हैं। यह विश्वविद्यालय नहीं है!
सारे विश्व के लिए जो विद्यालय हो, वह विश्वविद्यालय है।
लेकिन उनके अपने हिसाब हैं। वे कहते हैं कि यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन जब तक स्वीकार न करे, तब तक आप विश्वविद्यालय शब्द का प्रयोग भी करेंगे तो यह अपराध है।
कानूनविद कभी-कभी बहुत अंधे हो सकते हैं। लकीर के फकीर होते हैं। आंख खोल कर देख नहीं सकते कि ऐसा कोई देश नहीं है जहां के लोग यहां न आ गए हों। कुछ सीखने आए हैं; कुछ सीख रहे हैं। जीवन की कला सीख रहे हैं। जीवन के रूपांतरण का विज्ञान सीख रहे हैं। यह विश्वविद्यालय नहीं है! क्योंकि कानून के हिसाब से विश्वविद्यालय शब्द का उपयोग भी तभी किया जा सकता है, जब सरकार इसको स्वीकृति दे। शब्दों पर भी सरकारी मोहर चाहिए! शब्दों का भी पेटेंट हो गया है! शब्दों की भी अब हमारी मालकियत नहीं है!
मुझे कुछ रस भी नहीं है इसको विश्वविद्यालय कहने में। सच तो यह है कि तुम्हारे जैसे विश्वविद्यालय हैं, उनको देख कर इसको विश्वविद्यालय कहना ही नहीं चाहिए। क्योंकि तुम्हारे कचरा विश्वविद्यालयों के साथ मैं इसको एक ही श्रेणी में नहीं रखना चाहता। मैं खुद ही नहीं पसंद करूंगा कि यह विश्वविद्यालय कहा जाए। लेकिन सचाई यह है कि यह विश्वविद्यालय है और तुम्हारे विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय नहीं हैं।
लेकिन उनकी अपनी धारणा है। शिक्षा का उनका बड़ा अजीब अर्थ है। शिक्षा का अर्थ है: जो थोप दिया जाए ऊपर से।
मेरा शिक्षा का अर्थ है: जो तुम्हारे भीतर दबा है, जो तुम्हारा स्वभाव है, उसे उभारा जाए। ऊपर से न थोपा जाए, जगाया जाए। वास्तविक शिक्षण तुम्हारी सोई हुई आत्मा को जगाने की प्रक्रिया है। जानकारी नहीं है शिक्षण। जानकारी के अंबार लगा देने से भी कोई शिक्षित नहीं होता। पठित हो जाएगा, शिक्षित नहीं होता। लेकिन तुम्हारे भीतर का जो सोया हुआ परमात्मा है, अगर जरा भी जग जाए, जरा भी करवट ले ले, तो शायद तुम पठित न होओ, लेकिन शिक्षित तुम होओगे। हो सकता है तुम्हारी जानकारी ज्यादा न हो, न के बराबर हो, लेकिन तुम्हारा ज्ञान अपूर्व होगा; तुम्हारे भीतर ज्ञान की एक ज्योति होगी, एक आभा होगी! और ऐसी आभा, जो न केवल तुम्हें बदलेगी, बल्कि औरों को भी बदलेगी।
मनुष्य सुखी हो सकता है। मनुष्य सुखी होने को पैदा हुआ है। लेकिन हम उसे सुखी नहीं होने दे रहे हैं। मनुष्य स्वभावतः सुख में जन्मा है। लेकिन जन्मते ही हमने उसे दुख देने शुरू कर दिए हैं। और हमने इतनी सदियों से दुख दिए हैं कि अब हम यह भूल ही गए हैं कि दुख देने के लिए जिम्मेवार हम हैं। अच्छे-अच्छे नामों पर भी हम मनुष्य को विकृत कर रहे हैं। सुंदर-सुंदर नामों की आड़ में हम मनुष्य को जीने नहीं दे रहे हैं; पंगु कर रहे हैं। हमने मनुष्य को लंगड़ा कर दिया है, बहरा कर दिया है, अंधा कर दिया है। फिर से उसकी आंख खोली जानी चाहिए। फिर से उसके कान सक्रिय होने चाहिए। फिर उसका हृदय धड़कना चाहिए।
यह हो सकता है। क्योंकि यह हमारी स्वाभाविक क्षमता है। यह न हो पाए तो दुर्भाग्य; यह हो तो कुछ विशिष्ट बात नहीं। वृक्ष फूल तक पहुंच जाएं, यह स्वाभाविक है; न पहुंचें फूल तक तो कुछ बीच में बाधा पड़ गई। हर वृक्ष फूल तक पहुंच जाता है। पक्षी आनंदित हैं, पशु आनंदित हैं--एक आदमी को छोड़ कर। और आदमी सर्वाधिक आनंदित हो सकता है। पशु और पक्षी और पौधे क्या आदमी के साथ होड़ करेंगे!
मगर अभी हालत उलटी हो गई है। अभी गुलाब के पास खड़े होओगे, तो तुम उदास दिखते हो, गुलाब ज्यादा प्रसन्न दिखता है। अभी मोर को नाचते देखोगे, तो तुम्हारे भीतर ईर्ष्या पैदा होती है। मोर को तुम्हें देख कर ईर्ष्या पैदा नहीं होती, दया आती होगी कि बेचारा आदमी!
होना उलटा था। मनुष्य जीवन का चरम उत्कर्ष है, चैतन्य का सबसे ऊंचा शिखर है, परमात्मा की सबसे बड़ी कृति है। मगर न्यस्त स्वार्थ, स्थापित स्वार्थ, समाज के ठेकेदार, धर्मगुरु और राजनेता, इन सबके हाथ आदमी की गर्दन ऐसी दबाई गई है कि आदमी फांसी पर लटका हुआ है, आदमी सूली पर लटका हुआ है। आदमी जिसे सिंहासन पर होना था, सूली पर लटका है।
मैं उसे सिंहासन पर बिठाना चाहता हूं। और मजा यह है कि मैं जिस आदमी को सिंहासन पर बिठाना चाहता हूं, वही आदमी मेरा विरोध करेगा। क्योंकि वह सूली का आदी हो गया है। मैं जिस आदमी के सम्मान के गीत गा रहा हूं, वे ही आदमी मुझे गालियां दे रहे हैं।
बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा है कि तुम जब लोगों को समझाने जाओगे तो एक बात सदा खयाल रखना: तुम उनके हित में समझाओगे, मगर वे तुम्हारे साथ बहुत दुर्व्यवहार करेंगे। क्योंकि तुम्हारा देखना एक ऊंचाई से है; तुम पर्वत के शिखर से देखोगे; और वे अंधेरी खाइयों में जी रहे हैं, वे तुम्हें समझ न पाएंगे।
पूर्णकाश्यप नाम का भिक्षु जा रहा है बुद्ध के विचार को फैलाने। बुद्ध ने कहा, तू कहां जाएगा?
उसने कहा, मैं सूखा प्रांत नाम का प्रदेश है बिहार में, वहां जाऊंगा। क्योंकि वहां अब तक कोई भिक्षु आपका संदेश लेकर नहीं गया।
बुद्ध ने कहा, तू वहां न जा, पूर्ण! तू रुक, मेरी मान। इतनी मेरी मान। वहां मत जा! वहां के लोग अच्छे नहीं हैं। इसीलिए तो अब तक कोई भिक्षु वहां गया नहीं। वहां के लोग बहुत दुष्ट हैं, महादुष्ट हैं। सताने में मजा लेते हैं। अकारण सताते हैं। तो तू मुश्किल में पड़ेगा।
लेकिन पूर्ण ने कहा, इसीलिए तो मैं जाना चाहता हूं। आखिर किसी को तो जाना चाहिए वहां! क्या उनको ऐसे ही छोड़ देना है?
उसका तर्क तो वजनी था। क्या उन्हें ऐसे ही छोड़ देना है? क्या उन पर करुणा नहीं करनी है?
तो बुद्ध ने कहा, ठीक है, तू जिद्द करता है तो जा। लेकिन तीन प्रश्नों के उत्तर दे दे। पहला प्रश्न, अगर वे तुझे गालियां देंगे तो तुझे क्या होगा?
तो पूर्ण ने कहा, मुझे क्या होगा? यही होगा कि लोग भले हैं; सिर्फ गालियां देते हैं, मारते नहीं; मार भी तो सकते थे।
बुद्ध ने कहा, दूसरा प्रश्न, अगर वे मारें, मारने ही लगें, फिर तुझे क्या होगा?
पूर्ण ने कहा कि मैं समझूंगा कि लोग भले हैं, मारते ही हैं, मार ही नहीं डालते; मार भी तो डाल सकते थे।
बुद्ध ने कहा, तीसरा प्रश्न, बस तीसरा और आखिरी। अगर वे तुझे मारने ही लगें, मार ही डालने लगें, तो मरते-मरते तुझे क्या होगा?
तो पूर्ण ने कहा, मुझे होगा कि कितने भले लोग हैं, मुझे उस जीवन से छुटकारा दिला दिया जिसमें कोई भूल-चूक हो सकती थी। मैं धन्यवाद देता मर जाऊंगा।
बुद्ध ने कहा, फिर तू जा सकता है, फिर तू कहीं भी जा सकता है। फिर तू तैयार हो गया।
लोग ऐसे ही अदभुत हैं। उनके हित की बात कही जाए, तो भी उन्हें रुचिकर न लगेगी। क्योंकि सदियों-सदियों से उन्होंने जिसे हित समझा है, यह बात उसके विपरीत पड़ेगी। उनकी फांसी को वे फांसी नहीं समझते, गलहार समझते हैं। जंजीरों को जंजीरें नहीं समझते, आभूषण समझते हैं। बेड़ियों को बेड़ी नहीं समझते, पायल समझते हैं, कि घुंघरू समझते हैं। और जब तुम उनके घुंघरू तोड़ोगे-- जो उनको घुंघरू मालूम पड़ते हैं, तुमको बेड़ी मालूम पड़ते हैं--तो वे नाराज होंगे।
मुझसे लोग नाराज हैं। मेरा कसूर सिर्फ एक है--कि मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि तुम दुखी क्यों हो। किसी पिछले जन्मों के कारण नहीं, किसी भाग्य के कारण नहीं, सिर्फ एक अंधी वर्तमान व्यवस्था के कारण। और जिम्मेवार तुम हो। क्योंकि तुम उस अंधी व्यवस्था को सहारा दे रहे हो। तुम अपना हाथ भी अलग नहीं करते।
इस अंधी व्यवस्था से अपने हाथ को अलग कर लेने का नाम संन्यास है। मेरी संन्यास की वही धारणा है। संन्यासी मैं उसे कहता हूं जो इस अंधी, शोषण की, दुख लाने वाली, पीड़ादायी, नरक निर्मित करने वाली व्यवस्था है, उससे अपना सहयोग तोड़ लेता है। वह कहता है, मैं इसमें सहयोगी नहीं हूं। जो कहता है, मैं अब सुख से जीऊंगा और नाक कटाने की मेरी तैयारी नहीं है--मैं कुछ भी कटाऊंगा नहीं, मुझे जो भी परमात्मा ने दिया है उस सबका उपयोग करूंगा और उस सबके भीतर से उसकी तलाश करूंगा जो छिपा है। मैं अपनी वीणा के तारों को तोडूंगा नहीं। अगर उनसे बेसुरा राग उठ रहा है, तो मैं राग उठाना सीखूंगा, तो मैं वीणा बजाना सीखूंगा।
वीणा बजाना सीखो, तुम्हारे भीतर सुख के सागर लहरा सकते हैं!
ओशो, आप कुछ करें! आदमी रोज-रोज पापों की गर्त में डूबा जा रहा है। आदमी ऐसा बुरा तो कभी न था, जैसा आज है। आदमी को आखिर हो क्या गया है?
मैं निराशावादी नहीं हूं। और मैं आज के आदमी का विरोधी नहीं हूं।
जितने पीछे लौटो, आदमी उतना अंधा था। जितने पीछे लौटो, उतना अंधविश्वासी था। जो मैं तुमसे आज कह रहा हूं, अगर दो हजार साल पहले कहता, तो तुमने कभी की मुझे सूली लगा दी होती। आखिर तुमने जीसस को सूली लगाई ही थी! और जीसस ने जो कहा था वह उतना खतरनाक नहीं है जो मैं कह रहा हूं। और तुमने सुकरात को जहर पिलाया ही था! और सुकरात ने जो कहा था वह उतना खतरनाक बिलकुल नहीं है जो मैं तुमसे कह रहा हूं।
आदमी पहले से बुरा नहीं हो गया है, निरंजन! हां, इतना जरूर हुआ है कि पुराने ढांचे ढीले पड़ गए हैं। पुरानी आज्ञाकारिता ढीली पड़ गई है। पुराने बंधन ढीले पड़ गए हैं। तो तुम्हें शक पैदा होता है कि आदमी बुरा हो गया है। आदमी बुरा नहीं हो गया है। आदमी थोड़ा ज्यादा स्वतंत्र हो गया है जरूर। और यह अच्छा लक्षण है! क्योंकि स्वतंत्रता शुभ है। आदमी आज उतने ही अंधे हिसाब से पंडित-पुरोहितों के पीछे नहीं चलता, जैसे पहले चलता था। इससे पंडित-पुरोहित चिल्लाते हैं कि बिगड़ गया आदमी। लेकिन मेरे देखे ऐसा नहीं है। मैं तो जितना पीछे लौट कर देखता हूं, आदमी को उतना बुरा पाता हूं। और यही स्वाभाविक भी है। क्योंकि विकास का क्रम चल रहा है। हम बहुत धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं, माना, जल्दी बढ़ना चाहिए, थोड़ी त्वरा होनी चाहिए, मगर हम बढ़ रहे हैं।
आज से दो हजार साल पहले युद्धों को धर्मयुद्ध कहा जाता था। आज कोई युद्ध धर्मयुद्ध नहीं कहा जा सकता--कोई युद्ध। धर्म के नाम पर लड़ा हुआ युद्ध भी आज अधर्म-युद्ध कहा जाएगा। यह आदमी की चैतन्य की बढ़ती हुई क्षमता का सबूत है। आज हर युद्ध का विरोध है।
आज आश्चर्य की घटना घटती है कि अगर अमरीका वियतनाम में बम गिराता है, तो अमरीकी युवक ही उसका विरोध करते हैं। ऐसा कभी नहीं हुआ था दुनिया में। क्योंकि अगर हिंदुस्तान पाकिस्तान पर बम गिराए और हिंदुस्तान में कोई विरोध करे, तो तुम उसको गद्दार कहोगे। अभी हिंदुस्तान पिछड़ा है। अमरीका के युवकों ने, वियतनाम में बम गिराए जाएं, इसका विरोध किया। और फिर भी दुनिया ने उनको गद्दार नहीं कहा। उनको शांतिवादी कहा, शांतिप्रिय कहा। युवकों ने युद्ध में जाने से इनकार किया, सजाएं भुगतीं, जेलों में गए। अभी हिंदुस्तान इन अर्थों में बहुत पिछड़ा हुआ है। अगर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का युद्ध हो और हिंदुस्तान में हजारों युवक यह कह दें कि हम युद्ध में नहीं जाएंगे, क्योंकि युद्ध अमानवीय है, तो तुम सोचते हो क्या होगा? तुम उनको गद्दार कहोगे। तुम उनका सम्मान न कर सकोगे। तुम यह सोच ही न सकोगे, यह कैसी बात हुई! क्योंकि तुम अभी भी हजार साल पीछे जी रहे हो। तुम अभी भी पुरानी भाषाओं में सोचते हो--युद्ध, धर्मयुद्ध, राष्ट्र, राष्ट्रीयता।
ये सब पिटी-पिटाई बातें हो गईं। इनका कोई भविष्य नहीं है। सारी पृथ्वी एक है, इसका भाव उठ रहा है। और आने वाली पच्चीस वर्षों की यात्रा बड़ी अनूठी होने वाली है। यह सारी पृथ्वी एक होकर रहेगी। ये सब राष्ट्रों की सीमाएं बेहूदी हैं। इनके होने की अब कोई जरूरत नहीं है। आदमी आदमी एक है। फिर काला हो, कि गोरा हो, कि पीला हो, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। ये ऊपर के भेद हैं, भीतर के भेद नहीं।
लेकिन जरा तुम पुराने दिन की बातें सोचो!
राम का तुम कितना सम्मान करते हो! राम को तुमने अवतार कहा है। लेकिन जरा विचार करो, अगर आज की भाषा से सोचो, तो क्या राम को तुम अवतार कह सकोगे?
अयोध्या में एक ब्राह्मण का बेटा मर गया। मरा अयोध्या में। ब्राह्मण बहुत नाराज हुआ। बाप के सामने बेटा मर जाए! उसने राम के पास दुहाई की। और कारण तुम जानते हो ब्राह्मणों ने क्या खोजा? कारण ब्राह्मणों ने यह खोजा कि हजारों मील दूर एक शूद्र चोरी से वेद-पाठ सुन लिया है, उसके कारण अयोध्या में इस ब्राह्मण का बेटा मर गया है। तो राम ने उस शूद्र के कानों में शीशा पिघलवा कर भरवा दिया; क्योंकि उसने वेद सुन लिया था। ऐसे राम को तुम आज अवतार कह सकोगे?
मुझसे बहुत लोग कहते हैं कि आप कृष्ण पर बोले, बुद्ध पर बोले, महावीर पर बोले, जीसस पर बोले; आप राम पर क्यों नहीं बोलते हैं?
कुछ अड़चनें हैं जिनके कारण मैं राम पर नहीं बोलता हूं। अब मैं इस घटना का क्या करूंगा अगर बोलूं तो? इस घटना को कैसे...? बहुत तरह से सोचता हूं कि किसी तरह से इस घटना को लीपा-पोता जा सके--राम को मैं भी बचाना चाहूं--मगर यह बहुत मुश्किल है! राम का व्यवहार अमानवीय है। लेकिन उन दिनों यह बात ठीक थी। उन दिनों शूद्र को कोई मनुष्य थोड़े ही मानता था।
राम सीता को जीत कर लौटे हैं। और राम का उदाहरण ले रहा हूं, क्योंकि राम मर्यादा पुरुषोत्तम! श्रेष्ठतम पुरुष के जब ये व्यवहार हैं तो और दूसरों का तो क्या कहना? इसलिए राम का उदाहरण ले रहा हूं। श्रेष्ठतम का उदाहरण लेना चाहिए। क्योंकि निकृष्टतम तो निकृष्टतम हैं ही। लेकिन जब श्रेष्ठतम ऐसा व्यवहार करे, तो फिर निकृष्ट का तो तुम खुद ही हिसाब लगा लेना।
राम युद्ध जीत लिए हैं, सीता को अशोक-वाटिका से लाया गया है, और राम ने जो शब्द कहे सीता से, वे अभद्र हैं, अशोभन हैं। वाल्मीकि में राम ने कहा है सीता को कि तू यह मत सोचना कि मैं तेरे लिए युद्ध लड़ा। तेरे होने न होने से क्या फर्क पड़ता है? मैं तो युद्ध लड़ा हूं कुल की प्रतिष्ठा के लिए।
कुल की प्रतिष्ठा! प्रेम का सम्मान नहीं, कुल का अहंकार! सीता के प्रति कोई सदभाव या कोई प्रेम नहीं। और फिर सीता से चाहा: अग्नि-परीक्षा दो।
कोई पूछता नहीं कि रामजी, आप भी इतने दिन अकेले रहे; कौन जाने किसी स्त्री इत्यादि से संबंध हो गया हो। तो आप दोनों ही परीक्षा क्यों नहीं देते हैं? सीता ही परीक्षा दे, वह स्त्री जाति का अपमान है। और राम की कोई परीक्षा नहीं? राम को भी इतनी ईमानदारी बरतनी चाहिए थी कि दोनों आग से गुजरते। लेकिन सीता को आग से गुजारा जाता है। क्योंकि पुरुष तो ठीक है ही। और पुरुष तो पुरुष है। उसकी महिमा तो अपार है। स्त्री की परीक्षा होनी चाहिए। स्त्री विश्वास योग्य नहीं है। यह फिर अपमान हुआ। और अपमान पर अपमान होते चले गए।
और बाद में, अंततः अग्नि-परीक्षा भी ले ली और फिर भी सीता का परित्याग कर दिया, क्योंकि एक धोबी ने कह दिया अपनी पत्नी को, कि मैं कोई राम नहीं हूं कि तू रात भर घर के बाहर रहे और तुझे फिर मैं घर के भीतर ले लूं!
अगर ऐसा ही था तो स्वयं भी चले जाते वन। लेकिन पद को तो नहीं छोड़ा, पत्नी को छोड़ दिया। पद पत्नी से बड़ा है। पद प्रेम से बड़ा है। राज्य नहीं छोड़ा! छोड़ देते कि ठीक है, अगर लोगों को संदेह है तो मैं भी जाता हूं। लेकिन गर्भिणी स्त्री को छुड़वा दिया जंगल में। परीक्षा ले ली थी उसकी। फिर तो यह अन्याय हुआ।
मगर स्त्री के साथ अन्याय होता ही रहा, शूद्र के साथ अन्याय होता ही रहा। और अब भी हो रहा है। भारत में अब भी शूद्र जिंदा जलाए जाते हैं, उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार किया जाता है, उनके बच्चों की हत्याएं की जाती हैं, उनके मकानों में आग लगाई जाती है--आज भी।
भारत पिछड़ा हुआ है। भारत समसामयिक नहीं है।
लेकिन अगर तुम पूछते हो कि आदमी रोज-रोज पापों के गर्त में क्यों डूबा जा रहा है, तो तुम गलत पूछते हो। जहां तक आदमी का संबंध है, पूरी आदमियत का संबंध है, आदमी ऊपर उठ रहा है। आदमी के संबंध में निराश होने का कोई कारण नहीं है। आदमी की चेतना विकसित हो रही है, निखर रही है, सुंदर हो रही है। आज शूद्र जलाया जाता है तो तुम्हारे मन में भी कचोट लगती है। आज अगर शूद्र की स्त्रियों के साथ बलात्कार किया जाता है, तो तुमको भी अड़चन होती है। ये शुभ लक्षण हैं।
तो मैं ऐसा नहीं मानता कि आदमी पाप की गर्त में गिर गया है। मैं ऐसा भी नहीं मानता कि आदमी को क्या हो गया है! आदमी जो कुछ भी है, वह हजारों साल तुम्हारी परंपराओं ने जैसा उसे बनाया है, वैसा है। लेकिन उसमें कुछ-कुछ नई किरण फूटनी शुरू हो गई है। मैं आदमी के भविष्य के प्रति बहुत ही आशान्वित हूं। कठिनाइयां हैं, अंधेरे हैं, मुसीबतें हैं, लेकिन ये सब मुसीबतें पार की जा सकती हैं, ये सारी कठिनाइयां तोड़ी जा सकती हैं। सच तो यह है, ये सारी कठिनाइयां सीढ़ियां बन सकती हैं और ये सारी मुसीबतें निखार ला सकती हैं।
तलखियां जैसे फिजाओं में घुली जाती हैं,
जुलमतें हैं कि उमड़ती ही चली आती हैं,
आशियानों के करीं बिजलियां लहराती हैं,
जिंदगी एक अटल कोहे-गिरां है लेकिन,
जिससे बेदाद के शैतान भी टकराते हैं,
आग और खून के तूफान भी टकराते हैं,
मुंह की खाते हैं, पछड़ जाते हैं, जक पाते हैं,
बागे-आलम पे हुए कितने खिजां के यलगार
जिंदगानी पे कई मौत ने छापे मारे।
कभी यूनां से कभी रोम से तूफान उठे,
वादी-ए-नील से उबला कभी खूनी सैलाब,
आग भड़की कभी आतिशकदे-फारस से
जिंदगी शोलों में तप-तप के निखरती ही गई,
जितनी ताराज हुई, और संवरती ही गई।
जिंदगी शोलों में तप-तप के निखरती ही गई,
जिंदगी निखरती ही रही है, सारी आगें जलती रही हैं, शोले बरसते रहे हैं।
जिंदगी शोलों में तप-तप के निखरती ही गई,
जितनी ताराज हुई, और संवरती ही गई।
जितनी ध्वस्त हुई, उतनी और संवरती ही गई।
मैं निराशावादी नहीं हूं। अतीत की व्यर्थता की अगर मैं तुमसे बात कहता हूं तो सिर्फ इसीलिए ताकि तुम उसके ऊपर उठ सको, ताकि तुम उसमें दबे न रह जाओ।
जिंदगी शोलों में तप-तप के निखरती ही गई,
जितनी ताराज हुई, और संवरती ही गई।
मैं तो देखता हूं एक नया सूरज, एक नई सुबह, एक नया मनुष्य, एक नई पृथ्वी--वह रोज निखरती आ रही है। अगर हम थोड़े सजग हो जाएं तो यह और जल्दी हो जाए, यह रात जल्दी कट जाए, यह प्रभात जल्दी हो जाए।
ध्यान के दीयों को जलाओ और प्रेम के गीतों को गाओ। प्रेम के गीत और ध्यान के दीये, जो सुबह आज तक आदमी के जीवन में नहीं हुई, उसे पैदा कर सकते हैं। और आदमी बहुत तड़प लिया है, नरक में बहुत जी लिया है। समय है कि अब हम स्वर्ग को पृथ्वी पर उतार लें। स्वर्ग उतर सकता है।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What has happened to the human condition in modern times?
According to Osho, modern humanity hasn’t decayed—it has awakened. Compared to the past, people are more conscious, less superstitious, and freer from priests, dogmas, and ‘holy’ justifications for violence. The loosening of old structures may look like decline, but it signals growth: rising individual awareness, moral sensitivity, and a dawning sense of global oneness—early blossoms foretelling an approaching spring in human evolution.
In simple terms: People today are waking up, questioning old rules, and caring more about everyone as one family.
Is man born with suffering and what is his basic suffering?
According to Osho, man is not born with suffering in the womb; he is bathed in effortless well-being there. Suffering begins at birth, in the abrupt rupture from that silent, floating bliss—the shock of light, breath, and severed umbilical union. Our basic suffering is separation from original ease; life thereafter is an unconscious longing to re-find that lost harmony.
In simple terms: We start in a safe, quiet bliss in the womb, and when that safety is suddenly broken at birth, pain begins and we keep longing for that lost comfort.
