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Questions in this Discourse
ओशो, आपसे समाधि कैसे चुराएं?
राजपाल! काश यह हो सकता, तो शुभ होता, सुंदर होता। यह हो सकता, तो मेरा पूरा सहयोग होता। लेकिन समाधि चुराई नहीं जा सकती। समाधि तो जगानी होती है। समाधि बाहर से नहीं आती। नहीं तो कोई उपाय खोज लेते चुराने का, खरीदने का। कोई रास्ता बन जाता फिर। कोई विधि-विधान निर्मित हो जाता। लेकिन समाधि बाहर से आती ही नहीं, समाधि बाहर की घटना नहीं है। समाधि कोई वस्तु नहीं है। किन्हीं तिजोड़ियों में बंद नहीं है, अन्यथा तिजोड़ियां टूट जातीं। किन्हीं कठघरों में होती, सेंध लगा लेते। जमीनों में गड़ा खजाना होता, पता लगा लेते। समाधि तो तुम्हारी अंतर्दशा है, तुम हो, तुम्हारा होने का ही नाम है। एक है तुम्हारा होना सोया-सोया और एक है तुम्हारा होना जागा-जागा। उस जागे-जागे होने का नाम समाधि है।
लेकिन तुम्हारा प्रश्न प्यारा है! तुम्हारे मन में यह भाव उठा, यह भी शुभ है, सुंदर है। तुम्हारे भाव से मुझे एतराज नहीं है।
फिर चुराने की तो जरूरत तब उठती है जब समाधि छिपाई जा रही हो। समाधि तो छिपाए छिपती ही नहीं! यह तो सुबह का ऊगा सूरज जैसा है। इसे कैसे छिपाओगे?
जब भी किसी व्यक्ति के जीवन में समाधि घटती है, तो उसकी किरणें विस्तीर्ण होनी शुरू हो जाती हैं। भीतर दीया जला, बाहर रोशनी हुई, यह एक साथ, युगपत हो जाती है बात। और भी मजा है कि जिसे समाधि फलित होती है, वह बांटना चाहता है--बांट नहीं पाता, यह उसकी मजबूरी है। वह देना चाहता है--लेने वाले नहीं मिलते, यह उसकी मजबूरी है। लेने वाले भी मिल जाएं तो ले नहीं सकते, क्योंकि समाधि हस्तांतरणीय नहीं है।
बुद्धों की पीड़ा क्या है?
यही कि जिसे तुम चाह रहे हो, वह उनके पास है--और अकूत, अपार, अथाह। ऐसा नहीं कि देने से चुक जाएगा, बल्कि ऐसा कि देने से और बढ़ जाएगा। बांटना चाहते हैं, दोनों हाथ उलीचना चाहते हैं। मगर फिर भी यह नहीं हो सकता। बुद्ध लाख-लाख चिल्लाते हैं, लाख-लाख उपाय करते हैं, फिर भी किसी को समाधि दी नहीं जा सकती। हां, समाधि कोई लेना चाहे तो ले सकता है। और लेने की घटना बाहर से नहीं घटती। लेने की घटना तुम्हारे भीतर ही घटती है।
फिर बाहर के बुद्ध का प्रयोजन क्या होता है?
बाहर के बुद्ध के प्रयोजन से समाधि नहीं मिलती, प्यास मिलती है, समाधि की अभीप्सा मिलती है, आकांक्षा मिलती है। समाधि को पाने का एक दीवानापन मिलता है। एक ऐसी विक्षिप्त दौड़ पकड़ लेती है कि जब तक समाधि न मिल जाए तब तक रुक न सकोगे। समाधिस्थ पुरुष के पास बैठ कर समाधि नहीं मिलती, नहीं मिल सकती; लेकिन समाधि घट सकती है, इसका आश्वासन मिलता है, इसकी आस्था मिलती है, इसकी श्रद्धा उमगती है। और वही सबसे बड़ी क्रांति है।
सदगुरु के पास श्रद्धा का जन्म हो जाए--और किसी तरह श्रद्धा का जन्म होता भी नहीं। कोई बीज अंकुरित हो गया है। पास में पड़े हुए बीज को भरोसा आ जाता है कि कल तक यह बीज भी मेरे जैसा बीज था, आज अंकुरित हो गया, आज इसमें पल्लव निकल आए, आज इसमें से हरियाली का जन्म हो रहा है। वह जो बीज पास में पड़ा है, उसके भीतर भी कोई कसमसाने लगेगा। कोई जागने को आतुर हो जाएगा। कोई लहर उसके प्राणों में दौड़ जाएगी। उसके मुर्दा से पड़े प्राणों में पहली दफा सांसें चलेंगी, हृदय धड़केगा। यह हो सकता है! एक बीज को हो सकता है तो मुझे क्यों नहीं? और फिर जब वह देखेगा कि पास के बीज में न केवल हरियाली आई है बल्कि फूल भी खिल गए, सुगंध भी उड़ने लगी, तो कैसे अपने को रोक पाएगा?
अपने को न रोक पाने का नाम श्रद्धा है। विवश हो जाएगा। बंधा किन्हीं अदृश्य चुंबकीय तारों में, खिंचा चल पड़ेगा किसी अनजान अगम पथ पर, जिस पर कभी चला नहीं। किन्हीं ऐसे प्रदेशों में प्रवेश करने लगेगा, जिनका न कोई नक्शा है, न कोई मार्गदर्शिका है। लेकिन वह जो पास में पड़ा बीज फूलों तक पहुंच गया, वह जो पास में पड़ा बीज चांद-तारों से बातें करने लगा, वह जो पास में पड़ा बीज बादलों के साथ छेड़खान करने लगा, अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अब तुम्हारे भीतर भी एक श्रद्धा उमगेगी कि जो किसी एक को हुआ है, वह मेरे भीतर भी हो सकता है।
पश्चिम के बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जुंग ने एक नया शब्द गढ़ा। वह शब्द महत्वपूर्ण है। सदगुरु और सत्संग को समझने के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है।
विज्ञान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धांत है: कार्य-कारण का सिद्धांत, कॉज़ेलिटी का सिद्धांत। सौ डिग्री तक पानी को गरम करो, फिर पानी भाप बनेगा ही बनेगा। इससे अन्यथा नहीं हो सकता। फिर चाहे पानी तिब्बत में गरम करो, चाहे रूस में गरम करो, चाहे भारत में, कुछ भेद न पड़ेगा। नियम सार्वलौकिक है, सार्वभौम है। चाहे पांच हजार साल पहले कोई पानी गरम करे, चाहे कोई आज, चाहे कोई पांच हजार साल बाद, पानी सौ डिग्री पर भाप बन जाएगा। पानी यह नहीं कह सकता कि आज मेरा मन भाप बनने का नहीं है। पानी के लिए कोई स्वतंत्रता नहीं है। पानी यह नहीं कह सकता कि आज मैं बीमार, कि आज दिल जरा नाराज, कि आज देखें कौन मुझे भाप बनाता है, कि आज तुम्हारे सारे उपाय तोड़ कर रख दूंगा--जलाते रहो ईंधन, मगर मैं मौज में नहीं हूं! या कभी पानी खुश है, और कहे कि क्या फिक्र सौ डिग्री तक जाने की, नब्बे डिग्री पर बन जाऊंगा, अस्सी पर बन जाऊंगा। आज दिल तुम पर निछावर है, आज गीत गुनगुना रहा है मेरा प्राण, आज पचास डिग्री पर ही बन जाऊंगा। नहीं, ऐसी कोई स्वतंत्रता नहीं है। पानी परतंत्र है।
विज्ञान परतंत्रता की ही खोज में लगा है। कहां-कहां परतंत्रता है, वहीं-वहीं विज्ञान सफल होता है। और जहां स्वतंत्रता है, वहीं असफल हो जाता है। क्योंकि स्वतंत्रता का फिर नियम कैसे बने? कभी पानी भाप बने सौ डिग्री पर, कभी एक सौ दस डिग्री पर, एक सौ पचास डिग्री पर, कभी बने ही न, कभी दस डिग्री पर बन जाए, कभी ठंडा ही उड़ने लगे आकाश में, गरमी की जरूरत ही न पड़े--फिर नियम कैसे बनेगा? और नियम नहीं तो विज्ञान नहीं। नियम बनता है परतंत्रता का। और सबसे बड़ी परतंत्रता के नियम का नाम है: कार्य-कारण का सिद्धांत।
इसलिए विज्ञान उन-उन चीजों से वंचित रह जाता है, जिनका स्वभाव ही स्वतंत्रता है। इसलिए विज्ञान परमात्मा को नहीं मान सकता। क्योंकि परमात्मा यानी परम स्वातंत्र्य। इसलिए तो हमने उसे मोक्ष कहा है। विज्ञान आत्मा को नहीं मान सकता। क्योंकि आत्मा का अर्थ है: निर्णय की क्षमता तुम्हारे भीतर है। आज चाहो तो प्रेम करो और कल चाहो तो न करो। अभी-अभी क्रोध से भरे थे, अभी करुणा से भर जाओ। वही घटना एक को दुखी कर देती है, दूसरे को सुखी कर देती है। नियम कैसे बने? वही घटना आज तुम्हें सुखी करती है, कल दुखी कर देती है। नियम कैसे बने? सब वैसा का वैसा है, लेकिन तुम भिन्न-भिन्न ढंग से व्यवहार करते हो।
आकाश में चांद निकला है, पूर्णिमा की रात है, चांदी बरसती है। आकाश के चांद को देख कर एक आदमी उदास हो जाता है, क्योंकि उसकी प्रेयसी दूर है; और एक आदमी नाच उठता है, अपना इकतारा उठा लेता है, कि अपनी बांसुरी बजाने लगता है, उसकी प्रेयसी पास है। चांद वही, चांदनी वही, सब कुछ वही; एक गीत गाता है, एक की आंखें आंसुओं से भर जाती हैं।
और फिर उलझन पर उलझनें हैं। कभी आंखें आंसुओं से भर जाती हैं दुख में और कभी आंखें आंसुओं से भर जाती हैं सुख में। करो भी तो क्या करो!
इसलिए आत्मा को विज्ञान स्वीकार नहीं कर सकता। प्रेम को विज्ञान स्वीकार नहीं कर सकता। अनायास किसी क्षण तुम्हारे भीतर किसी के प्रति प्रेम पैदा होता है। और जैसे अनायास पैदा होता है, वैसे ही एक दिन अनायास विदा हो जाता है। न तो आते समय प्रमाणपत्र देता कि क्यों, न जाते समय प्रमाणपत्र देता कि क्यों। न आते समय खबर देता कि कारण, न जाते समय खबर देता कि कारण। कब आ जाए, कब चला जाए! आकस्मिक है। भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। हमारी मुट्ठी में नहीं है। किसी अज्ञात से आता है और किसी अज्ञात में लीन हो जाता है। हवा का झोंका आया और गया। तो प्रेम विज्ञान स्वीकार नहीं कर सकता।
लेकिन प्रेम, प्रार्थना, परमात्मा, आत्मा, यही तो जीवन की सुगंधें हैं। और यही इनकार हो गईं, तो फिर बचा क्या? कंकड़-पत्थर बचे। गंदगी बची। दुर्गंधें बचीं। क्षुद्रता बची। कीचड़ बची, कमल तो खो गए।
कार्ल गुस्ताव जुंग ने कॉज़ेलिटी, कार्य-कारण के सिद्धांत के समक्ष एक नया सिद्धांत खोजा, उसे नाम दिया: सिनक्रॉनिसिटी। समस्वरता का सिद्धांत। इस सिद्धांत को समझो, क्योंकि यह सत्संग का सार है। इसे समझे तो समाधि चुराने की बात नहीं सोचनी पड़ेगी।
समस्वरता का सिद्धांत।
तुमने देखा कि मृदंग बजी, लोगों के पैर नृत्य करने लगे और तुम्हारे पैरों में भी कोई थिरकन होने लगी। मृदंग के बजने से तुम्हारे पैरों में थिरकन होनी ही चाहिए, ऐसा कोई कार्य-कारण का सिद्धांत नहीं है। हो भी सकती है, न भी हो। ऐसे भी लोग हैं जिनके पैरों में थिरकन नहीं होगी। ऐसे भी लोग हैं जो मृदंग पर थाप पड़ते देख कर सोचेंगे: कहां का शोरगुल!
दो आदमी एक रास्ते से गुजरते थे। सांझ का वक्त, भरा बाजार, बस बंद होने-होने को; लोग अपना पसारा समेटते हैं, बड़ा शोरगुल मचा है! और पास के ही चर्च की घंटियां बजने लगीं। पुरानी घंटियां, प्रीतिकर, मधुर उनकी आवाज। उन दो आदमियों में से एक ने कहा, सुनते हो, कितना मधुर रव है! कैसी प्रीतिकर ध्वनि है! इस चर्च की घंटियों का मुकाबला नहीं।
पहले आदमी ने कहा, क्या कहते हो, मुझे कुछ सुनाई नहीं पड़ता।
दूसरे आदमी ने फिर जोर से कहा।
लेकिन उसने कहा कि देखते हो बाजार में शोरगुल है, घोड़े हिनहिना रहे हैं, गाड़ियां बांधी जा रही हैं, बैल पीटे जा रहे हैं, सामान लादा जा रहा है, शोरगुल मचा है, जल्दी-जल्दी है, सांझ हुई जाती है, सूरज ढला जाता है, लोगों को जाना है, पसारा इकट्ठा किया जा रहा है--इस शोरगुल में तुम कौन सी बात की प्रशंसा कर रहे हो, मेरी कुछ समझ में नहीं आती। और सबसे ऊपर, यह दुष्ट, चर्च का पादरी घंटियां बजा रहा है! सो और भी सुनाई नहीं पड़ता कि तुम क्या कह रहे हो।
अब तो कहने की कोई जरूरत भी न थी। वह मधुर रव, एक को मधुर रव था, उसके प्राणों में कोई सोए गीतों को सुगबुगा गया; उसके प्राणों में कोई सोई स्मृतियों को सहला गया; उसके भीतर आया एक मलहम की तरह, उसके घावों को भर गया; प्रीतिकर था। जैसे प्यार से किसी ने हाथ तुम्हारे सिर पर रखा हो, कि किसी ने बड़े स्वागत से तुम्हें गले से लगा लिया हो, ऐसा वह स्वर था। उसके भीतर भनक पड़ी, प्रतिध्वनि हुई, समस्वर हुआ। और दूसरे आदमी को--यह दुष्ट पादरी नाहक घंटियां बजा रहा है! वैसे ही शोरगुल है, वैसे ही कुछ सुनाई नहीं पड़ता और इस मूढ़ को अभी घंटियां बजाने की सूझी! दूसरे के भीतर कुछ भी न हुआ।
और तभी किसी आदमी का एक रुपया खनखना कर गिरा रास्ते पर। भीड़ इकट्ठी हो गई। वह आदमी भी जिसको चर्च की घंटियों में कोई मधुर स्वर नहीं सुनाई पड़ा था, वह भी भागा। उसके साथी ने कहा, कहां जाते हो?
उसने कहा, सुनते नहीं? किसी का रुपया गिरा--खनाखन, अभी गिरा!
उसने कहा, और इतना शोरगुल मचा है, घोड़े हिनहिना रहे हैं, और गाड़ियां, बैल बांधे जा रहे हैं, और लोग चिल्ला रहे हैं, और सामान बांधा जा रहा है, और लोग जाने की जल्दी में हैं--और वह दुष्ट पादरी चर्च की घंटियां बजा रहा है--और तुम्हें एक रुपये के गिरने की आवाज सुनाई पड़ गई!
लोग भिन्न-भिन्न हैं। जिसकी रुपये पर नजर है, उसे हजार शोरगुल में भी रुपया गिरे तो सुनाई पड़ जाएगा। जिसकी रुपये पर पकड़ है, उसे सिर्फ रुपये में ही संगीत सुनाई पड़ता है, और कहीं संगीत सुनाई नहीं पड़ता। अपनी दृष्टि।
फ्रेड्रिक नीत्शे ने लिखा है कि मेरे जीवन में जो सर्वाधिक सुंदर दृश्य मैंने देखा है, वह फूलों का नहीं है, न चांद-तारों का है, न आकाश में उड़ते हुए पक्षियों का है, मैंने जो सबसे सुंदर चित्र अपने जीवन में देखा है वह है: रास्ते से गुजरते हुए सैनिकों की एक टुकड़ी का। उनकी संगीनें सूरज में चमक रही थीं। उन संगीनों की चमक मुझे भूलती नहीं। उनके बूटों की समस्वर आवाज मेरे चित्त में सदा के लिए स्थायी बस गई है।
लोग भिन्न-भिन्न हैं। फ्रेड्रिक नीत्शे को झीलों में सौंदर्य नहीं दिखा, कमलों में सौंदर्य नहीं दिखा, तारों में सौंदर्य नहीं दिखा; दिखा सिपाहियों की नंगी संगीनों में, उन पर चमकती हुई सूरज की किरणों में, उनके बूटों की समस्वर आवाज में। लोग भिन्न-भिन्न हैं।
लेकिन एक बात तय है कि तुम्हारे भीतर जिस बात के लिए द्वार होता है, उससे समस्वरता पैदा हो जाती है। कोई बांसुरी को सुन कर एकदम भीतर गीत से भर जाता है। बाहर की बांसुरी भीतर के गीत को पैदा करने का कारण नहीं है। अगर कारण होती तो सभी के भीतर पैदा होता।
इसलिए सिनक्रॉनिसिटी का सिद्धांत महत्वपूर्ण है। मनुष्य स्वतंत्र है, कार्य-कारण में आबद्ध नहीं है, लेकिन फिर भी उस पर एक नियम काम करता है--जो उसकी स्वतंत्रता को बाधा नहीं डालता--वह है: समस्वरता का नियम।
गीत को सुन कर तुम्हारे भीतर गीत जन्म सकता है। और किसी सदगुरु को देख कर तुम्हारे भीतर सोया सदगुरु जग सकता है। समाधिस्थ किसी व्यक्ति के पास बैठ कर तुम्हारे भीतर समाधि में अंकुर निकल सकते हैं। चुराने की जरूरत ही नहीं है।
चुराने की जरूरत तो तब हो, जब तुम्हारे पास समाधि हो न। समाधि तुम्हारी निजी संपदा है; तुम्हारा स्वभाव है। तुम उसे लेकर आए हो। भूल गए हो, पर खजाना तुम्हारे भीतर पड़ा है। हां, बाहर किसी को देख लोगे कि इसने अपना खजाना खोज लिया, तो तुम भी अपने भीतर टटोलने लगोगे। समाधि को चुराने बाहर नहीं जाना है, अपने भीतर खोदना है। समाधि को उघाड़ना है।
पर भाव अच्छा है। चुराने की बात उठी, तो तुम्हारे पैरों में थिरकन आने लगी। चुराने की बात उठी, तो तुम्हारे भीतर समस्वरता की पहली चोट पड़ी, पहला आघात हुआ।
फिर हवाएं हंसी सी बहने लगी हैं,
बात कुछ कहने लगी हैं।
गुनगुनाती सुबह के गुनगुने साए,
अनगिनत खग मुक्त पंखों पर बिछाए,
उड़ रहे हैं, जमी पेड़ों, बीच काली
दूरियां दीवार सी ढहने लगी हैं।
स्पंदनों से भर उठी है भूमि नहाई,
छू दिया किसने नदी फिर थरथराई,
खोखली आवाज से बजती दिशाएं,
गंध से भर मौन अब रहने लगी हैं।
चलो जी लें धूप की तन्मय घड़ी हो,
कौन जाने रात फिर कितनी बड़ी हो,
यही मौसम है सफर के लिए, राहें,
नये सर्जन की व्यथा सहने लगी हैं।
तुम्हारे भीतर कुछ होने लगा, कुछ अंकुर टूटने-टूटने को है।
स्पंदनों से भर उठी है भूमि नहाई,
छू दिया किसने नदी फिर थरथराई,
हां, तुम्हारे भीतर कुछ थरथराया है। तुम छू दिए गए हो, तुम स्पर्शित हुए हो, तुम्हारे भीतर कुछ गतिमान हो गया है।
खोखली आवाज से बजती दिशाएं,
गंध से भर मौन अब रहने लगी हैं।
मौन की आकांक्षा उठी है। तभी तो समाधि को चुराने का भाव उठा। भाव तो सुंदर है। मगर यह हो नहीं सकता। भाव सुंदर है, चुराने की जरूरत भी नहीं है, जगाने की जरूरत है।
चलो जी लें धूप की तन्मय घड़ी हो,
कौन जाने रात फिर कितनी बड़ी हो,
चूकना मत इस घड़ी को। क्योंकि बहुत बार अवसर पास आते-आते दूर निकल जाता है। कई बार सत्संग बैठते-बैठते-बैठते छिटक जाता है। कई बार तार पर हाथ पड़ा, पड़ा; कि संगीत उठा, उठा--और चूक जाता है।
चलो जी लें धूप की तन्मय घड़ी हो,
कौन जाने रात फिर कितनी बड़ी हो,
यही मौसम है सफर के लिए, राहें,
नये सर्जन की व्यथा सहने लगी हैं।
द्वार खुला है, रास्ता सामने है, तुम्हारे भीतर आकांक्षा भी जगी है। चलो! पर खोजना है भीतर। खोदना है भीतर।
और अच्छा ही है कि बाहर से समाधि नहीं मिलती। अगर बाहर से मिलती तो बाहर से छीनी भी जा सकती थी। कोई दे देता और कोई छीन लेता।
रामकृष्ण और विवेकानंद के जीवन में एक उल्लेख है। रामकृष्ण के आश्रम में कालू नाम का एक बहुत भोला-भाला आदमी था। सीधा-सरल भक्त। विवेकानंद उसकी बहुत मजाक उड़ाया करते थे। विवेकानंद ठीक उलटे आदमी थे कालू से। तर्क, विचार, इस सब पर उनकी बड़ी श्रद्धा थी। नास्तिक से आस्तिक हुए थे। और जब भी कोई नास्तिक से आस्तिक होता है, तो उसकी आस्तिकता में भी नास्तिकता की धार कायम रहती है। जाती नहीं।
इस जिंदगी में कुछ भी तुम जो रहे हो, खोता नहीं। किसी न किसी तरह तुम्हारी नई स्थिति में रूपांतरित हो जाता है, आत्मसात हो जाता है। जिंदगी में कुछ भी गंवाया नहीं जाता। सब काम आ जाता है। अतीत खाद बन जाता है भविष्य के लिए। फूल में खाद मिलेगा भी नहीं, मगर है।
विवेकानंद की नास्तिकता खाद बन गई थी आस्तिकता के फूल के लिए। रामकृष्ण के पास समस्वर हो उठे थे, लेकिन पुरानी आदतें थीं, सोच-विचार के पुराने ढंग थे, ढांचे थे, वे एकदम नहीं चले गए थे। कालू की वे बहुत मजाक उड़ाया करते थे। और बात मजाक उड़ाने जैसी थी भी। क्योंकि कालू ने अपनी कोठरी में इतने देवी-देवता इकट्ठे कर रखे थे कि उसका दिन भर पूजा में निकल जाता था, शाम होते-होते भोजन कर पाता था। जो मिल जाए। कहीं गणेश जी मिल गए, उनको ले आया; कहीं हनुमान जी मिल गए, उनको ले आया; कहीं काली माई मिल गईं, उनको ले आया; शंकरजीयों की तो कोई कमी ही नहीं थी उसके कमरे में। खुद रहने की भी जगह नहीं बची थी उसको। उन्हीं देवी-देवताओं के बीच किसी तरह कोठरी में सिकुड़ कर सो रहता था। और सबकी पूजा करनी, और निष्ठा से पूजा करनी! ऐसी भी नहीं कि जल्दी, कि गए और घंटी बजा दी सबके ऊपर और पांच मिनट में निपटा कर बाहर आ गए। वह कोई नौकर नहीं था। वह कोई पुरोहित नहीं था जिसको तुम नौकरी पर रख लेते हो, जो पांच मिनट में सब निपटा कर गया। और भी उसको पूजाएं करनी हैं। और भी घरों में और भी मंदिर हैं। वह तो लगता सुबह तीन बजे से उठ कर, स्नान करके, तो एक-एक मूर्ति को स्नान करवाना, सजाना, भोजन लगाना, भोग लगाना--सांझ हो जाती।
विवेकानंद ने कई दफे कहा कि तूने यह क्या मचा रखा है! अरे, एक की पूजा कर ले, काफी है। अद्वैतवादी थे। एक पर्याप्त। मगर वह कहे कि किसको छोडूं? ये सब प्यारे हैं। ये गणेश जी देखो, अब इनको छोडूंगा तो दिल में दुख होगा। और ये बेचारे, फिर इनकी कोई पूजा करे न करे! ये भी उदास रहेंगे। यहां देखो कैसे प्रसन्न रहते हैं! अब ये शंकर जी बैठे हैं। अब इनको मैं छोडूं भी तो कहां छोडूं? दूं तो किसको दूं? पक्का क्या है कि इनकी चिंता की जाएगी? जैसे मां अपने बेटे की चिंता करे, ऐसी वह चिंता करता था। बीमार भी होता तो भी वह अपनी पूजा जारी रखता।
पहली दफा विवेकानंद को जब ध्यान का थोड़ा सा अनुभव हुआ, निर्विचार की थोड़ी सी झलक मिली, तो उनको जो पहली बात याद आई वह यह याद आई कि इस निर्विचार की अवस्था में अगर मैं तीव्रता से यह विचार भेजूं कालू की तरफ कि कालू, बांध पोटली में अपने सब देवी-देवताओं को और डाल दे गंगा में, तो जरूर यह विचार संक्रमित हो जाएगा। रुकने का एक दफा मन भी हुआ, कि ऐसा करना ठीक नहीं है। पर दूसरी तरफ से यह भी बात थी कि ठीक ही तो है, क्योंकि है तो एक ही, इतनी पूजा-पत्री करनी क्यों? इस बेचारे का समय खराब होता है, भोला-भाला आदमी, छुटकारा हो जाएगा। दया-भाव से उन्होंने यह विचार संप्रेषित किया। एकाग्रचित्त होकर कहा: कालू, बांध पोटली में सबको और डाल गंगा में!
कालू सीधा-सादा आदमी था। सीधे-सादे आदमी जल्दी संप्रेषित हो जाते हैं। उसने बांधी पोटली, सब देवी-देवता इकट्ठे कर लिए, बांध कर जा ही रहा था कि रामकृष्ण अपने कमरे से बाहर आए और उन्होंने कहा, रुक! कहां जा रहा है?
उसने कहा कि एक विचार उठा, बड़ी तीव्रता से विचार उठा कि मैं भी क्या पड़ा हुआ हूं इस पूजा-पत्री में! कब तक पड़ा रहूंगा? एक ही है! तो अब एक की ही पूजा करूंगा। मैं भी अद्वैतवादी हो गया! तो इन सबको ले जाकर गंगा में डुबा देता हूं। अब तो किसी को देने से भी क्या फायदा? अपनी मुसीबत और दूसरे को देना! फिर वह मुसीबत में पड़ेगा। गंगा जी सम्हालें!
रामकृष्ण ने कहा, तू रुक! यह विचार तेरा नहीं है। तेरे चेहरे पर इस विचार की कोई छाप नहीं। तेरी आंख में इस विचार का कोई सहज भाव नहीं। यह विचार जबरदस्ती तेरे ऊपर थोपा गया है। तू रुक, मैं अभी कहानी पूरी खोलता हूं।
वे गए, विवेकानंद का दरवाजा खटखटाया, विवेकानंद बाहर आए--थोड़े डरे थे, थोड़े घबड़ाए भी--और विवेकानंद से कहा, यह उचित नहीं है। तूने दुरुपयोग किया। एक सुंदर क्षण मिला था तुझे निर्विचार का, उसका तूने ऐसा उपयोग किया! तो अब मैं तेरी कुंजी अपने पास रखे लेता हूं। अब तुझे निर्विचार तभी उपलब्ध होगा जब तू उसका दुरुपयोग न कर सकेगा। तब तक के लिए कुंजी मेरे हाथ रही।
और जान कर तुम चकित होओगे कि विवेकानंद जीवन भर कोशिश करके भी फिर उस अवस्था को नहीं पा सके। मरने के तीन दिन पहले ही उनको वह अवस्था वापस मिली।
अब सवाल यह है कि यह जो अवस्था थी विवेकानंद की, यह समाधि थी? अगर समाधि थी, तो विवेकानंद यह नहीं कर सकते थे जो उन्होंने किया--पहली बात। कालू के साथ ऐसा दुर्व्यवहार नहीं कर सकते थे। समाधिस्थ व्यक्ति विराट हो जाता है। सभी उसके भीतर समाविष्ट हो जाते हैं--ज्ञान भी, और कर्म भी, और भक्ति भी। सब धर्म, सब पंथ उसके अपने हो जाते हैं। मंदिर भी, मस्जिद भी, गुरुद्वारा भी। उसे कुछ भेदभाव नहीं रह जाते। उसे अद्वैत और द्वैत के बीच भी कोई भेदभाव नहीं रह जाता। उसके भीतर ऐसा अद्वैत फलित होता है कि द्वैत और अद्वैत भी एक हो जाता है।
तो विवेकानंद को जो घटा, वह समाधि नहीं थी। एकाग्रता थी, कनसनट्रेशन था। ध्यान भी नहीं था। ध्यान में निर्विचारता होती है। एकाग्रता में सारे विचार एक जगह, एक बिंदु पर केंद्रित हो जाते हैं। वह एकाग्रता थी। एकाग्रता में इस तरह की संभावना है कि तुम दूसरे पर अपना विचार प्रक्षेपित कर दो। और एकाग्रता कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। एकाग्रता बाहर से दी जा सकती है। समाधि बाहर से नहीं दी जा सकती। और इसीलिए रामकृष्ण समर्थ हो सके कि एकाग्रता की कुंजी रख ली उन्होंने अपने हाथ में। बाहर से जो दिया जा सकता है, वह बाहर से रोका भी जा सकता है। यह सिद्धांत शाश्वत है: जो बाहर से दिया जाए, बाहर से छीना जा सकता है।
अगर विवेकानंद को वस्तुतः समाधि घटी होती तो उन्होंने जो कालू के साथ दुर्व्यवहार किया, वह संभव ही नहीं था। दूसरी बात, रामकृष्ण चाहते भी तो भी उसकी कुंजी रख नहीं सकते थे। जो भीतर घट गया था, उसकी कुंजी रामकृष्ण के पास नहीं हो सकती थी।
एकाग्रता मन की बात है। मन बाहर से निर्मित है। समाधि आत्मा का अनुभव है। आत्मा बाहर से निर्मित नहीं है। मन तो बाहर से आता है। तुम्हारे पास जो मन है, वह बाहर से आया है। इसलिए हिंदू के पास एक तरह का मन है, मुसलमान के पास दूसरे तरह का मन है। क्योंकि मुसलमान को एक दूसरे तरह का संस्कार मिला है और हिंदू को और तरह का संस्कार मिला है। जैन के पास तीसरे तरह का मन है। कम्युनिस्ट के पास चौथे तरह का मन है। इस दुनिया में जितने लोग हैं, उतने मन हैं। क्योंकि अलग-अलग संस्कार, अलग-अलग परंपराएं, रीति-रिवाज, सभ्यताएं, संस्कृतियां--ये तुम्हें अलग-अलग मन देती हैं। ये एक जैसे मन नहीं हैं।
स्टैलिन लाखों लोगों को काट सका। क्यों? क्योंकि कम्युनिज्म ने उसे एक मन दिया जो कहता है कि आदमी के भीतर कोई आत्मा ही नहीं है; आदमी यंत्र है। चेतना यंत्र का ही एक प्रतिफलन है। इसलिए मारने में कोई हर्जा नहीं है। यह एक तरह का मन है। कहते हैं, करीब-करीब एक करोड़ आदमियों की हत्या स्टैलिन के द्वारा हुई रूस में। इतना विराट हत्या का आयोजन--और इस आदमी को जरा भी बेचैनी न हुई। सिद्धांत जो उसके मन में बैठा था, वह यह था कि आदमी में आत्मा तो है ही नहीं, इसलिए मारने में हर्ज क्या है?
तुमसे अगर कोई कहे, इस घड़ी को पटक कर तोड़ दो, तो क्या तुम यह कहोगे कि इसमें हत्या होगी, हिंसा होगी; घड़ी मर जाएगी, फिर मुझे पाप लगेगा? तुम कहोगे कि ठीक है, अगर गिरा कर तोड़ना है तो तोड़े देता हूं। घड़ी में कोई आत्मा तो है नहीं। आदमी घड़ी जैसा है कम्युनिज्म की दृष्टि में। इसलिए स्टैलिन एक करोड़ लोगों की हत्या कर सका।
महावीर पैर फूंक-फूंक कर रखते हैं कि कहीं कोई चींटी न दब जाए। रात एक ही करवट सोते हैं कि कहीं करवट बदलने में, कोई चींटी इत्यादि आ गई हो करवट के पीछे, दब न जाए। अंधेरे में चलते नहीं कि कोई कीड़ा-मकोड़ा दब न जाए। क्यों? एक दूसरा भाव है, कि आत्मा है शरीर के भीतर, चाहे शरीर चींटी का ही क्यों न हो। फिर शरीर हाथी का हो कि चींटी का, कोई फर्क नहीं पड़ता, दोनों के भीतर एक जीवनधारा है। उस जीवनधारा को हानि नहीं पहुंचनी चाहिए। जीवन का एक सम्मान है। यह एक और तरह का मन है।
दुनिया में मन तो बाहर से पैदा होते हैं। तुम्हें सिखाया जाता है, वही तुम्हारा मन बन जाता है। मन सिखावन है, शिक्षण है, संस्कार है। एकाग्रता मन की घटना है। स्कूलों में एकाग्रता सिखाई जाती है। प्राइमरी स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक एकाग्रता पर जोर है। चित्त को एकाग्र करो।
चित्त को एकाग्र करने से शक्ति आती है। ऐसे ही जैसे कि तुम सूरज की किरणों को एकाग्र कर लो तो आग पैदा हो जाए। और शक्ति के लोग उपासक हैं। सभी शक्ति चाहते हैं। क्योंकि सभी शक्तिशाली होना चाहते हैं।
ध्यान बड़ी और बात है। ध्यान एकाग्रता नहीं है। ध्यान तो एकाग्रता से बिलकुल उलटी अवस्था है। एकाग्रता चंचलता के विपरीत है। चंचल चित्त में एक विचार आया, दूसरा आया, तीसरा आया, चौथा आया--भागदौड़ मची रहती है, आपाधापी चलती रहती है। एकाग्रता चंचलता के विपरीत है। एक ही विचार पर टिक कर रह गए। और ध्यान? ध्यान निर्विचार है। न वहां अनेक विचार हैं और न एक विचार है। वहां विचार है ही नहीं। न वहां चंचलता है, न एकाग्रता। और ध्यान समाधि का द्वार है।
अगर समाधि फली होती विवेकानंद को, तो चाबी रामकृष्ण रखना भी चाहते तो नहीं रख सकते थे। रखने की जरूरत भी न होती। क्योंकि समाधि ने कभी किसी की हानि तो की ही नहीं। समाधि से हानि हो ही नहीं सकती। हां, एकाग्रचित्त वाला व्यक्ति हानि कर सकता है। ज्यादा हानि कर सकता है चंचलचित्त वाले व्यक्ति की बजाय। क्योंकि चंचलचित्त वाले व्यक्ति के पास शक्ति नहीं होती हानि करने की। एकाग्रचित्त वाले व्यक्ति के पास बड़ी शक्ति होती है हानि करने की। वह दूसरों के विचारों को प्रभावित कर सकता है।
एडोल्फ हिटलर ने इसी तरह इस मनुष्य-जाति की इतनी हानि की। बहुत एकाग्रचित्त व्यक्ति था। जब बोलने खड़ा होता था, तो उसकी एकाग्रचित्तता ऐसी थी कि लोग सम्मोहित हो जाते थे। झूठी से झूठी बातें, जो किसी बुद्धू को भी समझ में आ जाएं कि बिलकुल झूठी हैं, वे भी लोगों को सच मालूम होती थीं। उसकी एकाग्रता का बल था। एकजुट, सारे प्राण एक बिंदु पर केंद्रित थे। वह जो भी कहता था, उसमें बल हो जाता था। उसने बड़े से बड़े झूठ बोले--दुनिया में कभी किसी आदमी ने इतने बड़े झूठ नहीं बोले। ऐसे झूठ जिनमें कोई संगति नहीं।
अब जैसे कि कोई तुमसे कहे कि भारत दरिद्र क्यों है? और उत्त्ार दे, चूंकि भारत में कई लोग साइकिलों पर चलते हैं। तुम हंसोगे न! तुम कहोगे, पागल हो गए हो? साइकिल पर चलने से भारत के दरिद्र होने का क्या नाता है? कोई हिसाब नहीं, कोई गणित नहीं, कोई संगति नहीं। मगर ऐसे ही उत्तर एडोल्फ हिटलर ने दिए। जर्मनी का पतन क्यों हुआ? क्योंकि यहूदी!
अब यहूदियों से जर्मनी के पतन का कोई लेना-देना नहीं है। सच तो यह है, यहूदियों ने जर्मनी को बहुत समृद्ध किया। जर्मनी ने इस सदी को तीन महापुरुष दिए हैं, तीनों यहूदी थे। कार्ल मार्क्स, सिगमंड फ्रायड, अलबर्ट आइंस्टीन। इस सदी को जिन तीन लोगों ने समृद्ध किया है, वे तीनों लोग जर्मन थे और तीनों यहूदी थे। यहूदी तो जर्मनी का गौरव थे।
लेकिन एडोल्फ हिटलर ने लोगों को समझाया। पहले तो लोग हंसते थे, उसके अपने मित्र ही हंसते थे, यह क्या पागलपन की बात है? इसमें कोई संबंध ही नहीं है। लेकिन एडोल्फ हिटलर का एक सिद्धांत था कि झूठ को अगर बार-बार दोहराया जाए तो वह सच हो जाता है। उसने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि झूठ और सच में इतना ही भेद है। ऐसे झूठ जो बहुत बार दोहराए गए हैं, सच हो जाते हैं। बस दोहराए चले जाओ। वह दोहराए चला गया। चार-पांच साल के भीतर उसने लोगों को मनवा लिया कि यहूदी ही सब उपद्रव के कारण हैं।
और तब उसने दूसरी बात शुरू की कि अगर हम यहूदियों का सफाया कर दें, बिलकुल सफाया कर दें, तो जर्मन मुक्त हो जाएंगे इस पाप से, इस कोढ़ से; और जर्मन सारी दुनिया के सम्राट हो जाएंगे और एक हजार साल तक जर्मन प्रभुत्व को कोई आंच भी नहीं आएगी। इसके लिए भी लोग राजी हो गए। और जर्मनी, तुम समझना कि मूढ़ों का देश नहीं है। सब सर्वाधिक सुसंस्कृत लोगों का देश है। प्रोफेसरों का देश है। शोधकर्ताओं का देश है। इतना शोधकर्ताओं का, चिंतकों का, विचारकों का, बुद्धिजीवियों का देश एडोल्फ हिटलर के चक्कर में कैसे आ गया? और इस आदमी के पास ऐसी कोई बुद्धिमत्ता नहीं थी। न ही इसके पास कोई ऐसे महान विचार थे। मगर एक बात थी इस आदमी के पास। एकाग्रता थी। जो कहता था, प्राणपण से, पूरे प्राण को समाहित करके कहता था। उसका परिणाम होता है। जब भी कोई आदमी संपूर्ण एकाग्रचित्त होकर कुछ कहेगा, तो जरूर तुम प्रभावित होओगे। अगर न भी कहे और एकाग्रता गहरी हो, तो बिना कहे भी तुम को प्रभावित कर सकता है।
तुम जरा कभी प्रयोग करके देखना। रास्ते पर चलते हुए तुम्हारे सामने कोई चला जा रहा है। अपने मन को बिलकुल एकाग्र कर लेना उसकी चेंथी पर। और जब चित्त बिलकुल एकाग्र होने लगे तो उससे कहना कि लौट, पीछे देख! और तुम चकित हो जाओगे, वह आदमी एकदम लौट कर पीछे देखेगा। तुमने जोर से कहा नहीं, यह सिर्फ तुमने मन में सोचा। यह बहुत छोटा प्रयोग है, इसे कोई भी कर सकता है। यह सम्मोहन का बहुत जाहिर प्रयोग है। उसे लौट कर देखना ही पड़ेगा। वह भी चौंकेगा, तुम भी चौंकोगे। देखने का कोई कारण नहीं था--तुमने आवाज नहीं की, तुमने कहा नहीं जोर से। लेकिन तुमने चित्त एकाग्र किया। उसकी चेंथी पर चित्त एकाग्र करना। क्योंकि चेंथी पर एक केंद्र है, जहां से एकाग्रता प्रवेश करती है। जहां से कुंजियां चलाई जा सकती हैं।
रामकृष्ण ने जो कुंजी रख ली, वह एकाग्रता की थी। रामकृष्ण को मानने वाले लोगों ने लिखा है जगह-जगह कि वह समाधि की थी। वह बात गलत है। उन्हें समाधि का कोई पता नहीं है। समाधि की कोई कुंजी न रख सकता है और न कोई दे सकता है। समाधि तो सिनक्रॉनिसिटी है। समाधि तो समस्वरता है। रामकृष्ण समाधि में बैठे हैं, जो भी राजी हो, पास बैठे, उठे, आंदोलित हो, उस हवा को पीए, उस गंध में नहाए, उस आयाम में थोड़ा-थोड़ा सरके, रामकृष्ण के सहारे सरके, उनसे श्रद्धा ले, उनसे थोड़ा सा रस ले, उनको देख कर अपनी संभावना को पहचाने, उनको देख कर अपने भविष्य की थोड़ी झलक पाए--और क्रांति घटनी शुरू हो जाती है। समाधि चुरानी नहीं पड़ती।
और जिस दिन तुम यह समझ लोगे कि समाधि तुम्हारे भीतर है, सत्संग में फलित होती है। सत्संग कारण नहीं है समाधि का; सत्संग केवल किसी नर्तक के पास पहुंच जाना है, ताकि तुम्हारे पैरों में सोया हुआ नर्तन झकझोरे लेने लगे। और एक बार तुम किसी सत्संग में झूमने लगो, मस्त होने लगो, डोलने लगो, तो तुम चकित हो जाओगे, हैरान हो जाओगे, विस्मय-विमुग्ध हो जाओगे, भरोसा न कर सकोगे--इतना तुम्हारे भीतर पड़ा था? और जिस दिन तुम्हारे भीतर समाधि उठती है, उस दिन परमात्मा तुम पर बरसना शुरू हो जाता है। अमृत बरसता है। समाधि तुम्हारे भीतर द्वार खोल देती है, हजार-हजार सूरज निकल आते हैं--अमी झरत, बिगसत कंवल! और इधर अमृत झरा और तुम्हारे भीतर सहस्र दलों वाला कमल खिला।
ओ निठुर तुमने दिया यह नेह का वरदान?
हुलसे आज आकुल प्राण!
उन मृदुल प्रियतम चरण पर
अश्रु-भीने युग नयन धर
हो गया कृतकृत्य जीवन
थाम कर हिय आह क्षण भर,
एक त्रुटि वह युग बनी, युग बन गया क्षणमान!
पीतम आज हुलसे प्राण!
सुघड़ सांचे में ढले हो,
प्राण! तुम कितने भले हो,
चिर निराश्रित विकल हिय को,
यों सहारा दे चले हो!
सिहर उट्ठा यह पड़ा था, जो निरा म्रियमाण!
पीतम आज हुलसे प्राण!
विकट मेरी दूर मंजिल,
राह बंधुर, निपट पंकिल,
है सहारा अगम मग में
तव चरण नख ज्योति झिल-मिल,
मिल गई यौवन निशा में ज्योतिमय मुसकान,
पीतम आज हुलसे प्राण!
आ गए तुम यों झिझकते
विरत जीवन में हिचकते,
अब बने रहना सदा यों,
हैं दिवस बीते सिसकते,
दीन की कुटिया करेगी कौन सा सम्मान?
पीतम आज हुलसे प्राण!
शाक्त मैं तुम शक्ति मेरी,
भक्त मैं तुम भक्ति मेरी,
नेहयोगी मैं, सजन तुम,
प्रेममय अनुरक्ति मेरी,
गीत कर्ता मैं बने तुम मन प्रफुल्लित गान!
पीतम आज हुलसे प्राण!
तुम्हारे भीतर द्वार खुले समाधि का, कि प्यारा उतरे! प्यारा द्वार पर ही खड़ा है। मगर द्वार है कि बंद। बंद, सदियों से बंद, जन्मों से बंद। इतने दिनों से, इतने लंबे युगों से बंद कि तुम भूल ही गए हो कि तुम्हारे भीतर द्वार है।
मेरे पास बैठ कर तुम्हें द्वार की याद आ जाए, बस। समाधि, राजपाल, चुरानी न होगी। समाधि के तो तुम मालिक हो ही। समाधि तो तुम्हारा स्वभाव है।
ओशो, मैं तो परमात्मा की याद बहुत करता हूं, लेकिन मन में प्रश्न उठता है कि परमात्मा भी कभी मेरी याद करता है या नहीं?
सामान्य मानवीय प्रेम में यह स्वाभाविक है, तुम जिसे प्रेम करते हो, मन में उठता है सवाल कि वह भी तुम्हें प्रेम करता है या नहीं?
लेकिन मानवीय प्रेम और भक्ति में इतना ही भेद है।
भक्त तो कहता है: मेरा प्रेम स्वीकार हो जाए, उतना बहुत। उसकी तरफ से मुझे प्रेम मिले, ऐसी मेरी पात्रता कहां? मिले, तो मैं चकित होऊंगा। मिले, तो सिर-आंखों लेऊंगा। न मिले, तो मेरे मन में कहीं भी शिकायत न होगी। न मिले तो जानूंगा कि मैं योग्य कहां था! मेरा प्रेम स्वीकार हुआ, यह भी क्या कम है! तो भी मैं बड़भागी हूं। मेरी प्रार्थना उन चरणों तक पहुंच सकी, इतना बहुत है।
लेकिन, तुम्हारी मानवीय आकांक्षा भी समझ में आती है। हम मनुष्य हैं, मनुष्य होकर ही हमें धीरे-धीरे मनुष्य का अतिक्रमण भी करना है। तो उठ आती हैं इस तरह की इच्छाएं। और अच्छा है कि ऐसी इच्छाओं को तुम पूछ लो। क्योंकि पूछो तो समझ में आए। समझ में आए तो शायद धीरे-धीरे छूटे भी।
चांदनी छतों चढ़ी पछताय
कांस बन की
मुसकाय जी।
देह कंचन की माटी पोत
भरे-घर
रोटी सेंकी-गंध
नदी में दीपक ननद सिराय
भाग अपने
खाली अनुबंध,
चांदनी गहरे जल उतराय
फांस मन की
मुसकाय जी।
हथेली-भर गोबर का रंग
आंख-भर
इंद्रधनुष की डोर
डहकती रही सगुनिया प्यास
रात भर
हंसता रहा अंजोर,
चांदनी जरे-जोग डस जाए
सांस फन की
मुसकाय जी।
साधारण प्रेम के जगत में तो जरूर शर्तें उठती हैं, ईर्ष्याएं उठती हैं। किसी दूसरे का प्रीतम आ गया और तुम्हारा न आया, तो जलन उठती है। किसी दूसरे के प्रीतम की पाती आ गई और तुम्हारे प्यारे की पाती न आई, तो डाह उठती है।
देह कंचन की माटी पोत
भरे-घर
रोटी सेंकी-गंध
नदी में दीपक ननद सिराय
भाग अपने
खाली अनुबंध,
...मेरे भाग्य खाली हैं, खाली ही रहेंगे क्या?...
चांदनी गहरे जल उतराय
फांस मन की
मुसकाय जी।
और चांद आ गया और चांदनी आ गई और हृदय में फांस लगी है।
हथेली-भर गोबर का रंग
आंख-भर
इंद्रधनुष की डोर
डहकती रही सगुनिया प्यास
रात भर
हंसता रहा अंजोर,
चांदनी जरे-जोग डस जाए
सांस फन की
मुसकाय जी।
बहुत जलन, बहुत ईर्ष्या, स्वाभाविक है मनुष्य के जीवन में। लेकिन भक्ति के जगत में प्रेम को थोड़ा निखारना होगा। प्रेम की धूल थोड़ी झाड़नी होगी। प्रेम को थोड़ा स्नान कराओ। मत यह पूछो।
तुम पूछते हो: ‘मैं तो परमात्मा की याद बहुत करता हूं, लेकिन मन में प्रश्न उठता है कि परमात्मा भी कभी मेरी याद करता है या नहीं?’
तुम्हें परमात्मा की याद करनी पड़ती है, क्योंकि तुम उसे भूल गए हो; उसे नहीं करनी पड़ती, क्योंकि वह कभी भूला नहीं है! परमात्मा तुम्हें भूल जाए तो तुम जी सकोगे एक क्षण? वह भूला कि सांस की डोर कटी। वह भूला कि हृदय की धड़कन बंद हुई। वह भूला कि तुम हो ही नहीं सकते। तुम हो तभी तक, जब तक वह तुम्हें याद किए जा रहा है। उसकी याद में ही तुम्हारा जीवन है। और तुम अनंत काल से हो। और तुम अनंत काल तक रहोगे। तुम शाश्वत हो।
देहें आती और जाती हैं, मन बनते और बिगड़ते हैं। तुम न तो आते, न जाते। तुम सदा हो। तुम सदा-सदैव हो। तुम उसकी स्मृति में ही हो। तुम्हें भूलने का कोई उपाय ही नहीं है।
हां, तुम उसे भूल सकते हो।
बच्चा गया खेलने, खिलौनों में उलझ जाए, नदी के किनारे बैठ कर रेत के घर-घूले बनाने लगे, मां को भूल जाए, मां नहीं भूलती। मां तो रात जब सो जाती, आकाश में बादल गरजते हों, बिजली कौंधती हो, उसे सुनाई नहीं पड़ती, लेकिन उसका छोटा सा बच्चा अगर जरा कुनमुनाए, तो उसे सुनाई पड़ जाता है! मां नहीं भूलती।
परमात्मा से अर्थ क्या है? परमात्मा से अर्थ है: इस अस्तित्व का जो हृदय है। इस अस्तित्व की जो धड़कन है। इस सारे अस्तित्व का जो प्राण है, केंद्र है, आत्मा है। हम उसकी किरणें हैं। सूरज हमें भूल कैसे जाए? भूल जाए तो हम समाप्त हो गए। उसके भूलने में हमारा अंत है। हम भूल सकते हैं, हम पीठ कर ले सकते हैं परमात्मा की तरफ। बच्चे खेल में उलझ जाते हैं तो भूल जाते हैं। मां पुकारती है तो क्रोध आता है; क्योंकि खेल को खराब किए दे रही है।
परमात्मा तुम्हें नहीं भूला है, तुम्हीं उसे भूले हो। तुम उसे याद कर लो और तत्क्षण तुम्हें समझ में आ जाएगा कि उसने तो तुम्हें सदा ही याद रखा था। भूल एकतरफा है।
मगर, मन में इस तरह के सवाल उठ आने स्वाभाविक हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम्हारे मन में यह सवाल उठा तो तुमने कोई अपराध किया, कि तुमने कोई पाप किया। नवनीत, स्वाभाविक है!
याद तुम्हारी प्रतिपल नूतन, मेरी याद तुम्हें आ जाए!
रेख-खचित है राह तुम्हारी, कौन पार जा व्यथा सुनाए!
बंधे सभी हैं जटिल नियम में,
मन के साथी-सहचर सारे;
सतत भ्रमण कर दूर-दूर तक,
थके कल्पना के हरकारे;
सीमा लांघ न कोई पाया, जो संदेश तुम्हें दे आए!
याद तुम्हारी प्रतिपल नूतन, मेरी याद तुम्हें आ जाए!
व्यस्त खोज में विविध रूप से,
किंतु विफल सब हैं बंधन में;
चपल चित्त चिंतन आतुर हो,
उड़-उड़ कर फंसता उलझन में;
चतुर कपोत न बन पाया, जो थान ढूंढ़ पाती पहुंचाए!
याद तुम्हारी प्रतिपल नूतन, मेरी याद तुम्हें आ जाए!
भाव-पुजापा अमित संजोए
मन तल्लीन हुआ अर्चन में;
सांस-सांस हो रही समर्पण,
हृदय-स्पंदन-रत वंदन में;
प्राण-पहरुआ तन में तन्मय, बाहर जाने से घबराए!
याद तुम्हारी प्रतिपल नूतन, मेरी याद तुम्हें आ जाए!
स्वर, लय, ताल लुटाती रसना,
स्वत्व गंवाती प्रीति रीति में;
व्यथा-कहानी कह जाती है,
अस्फुट अनगढ़ सरल गीत में;
संभव है संगीत मौन हो, तेरी वीणा से टकराए!
याद तुम्हारी प्रतिपल नूतन, मेरी याद तुम्हें आ जाए!
मन है मनुष्य का, भाव उठता है कि मैं तो तुम्हें पुकारता, कभी तुम भी मुझे पुकारते हो? मैं तो तुम्हें याद करता, कभी तुम भी मुझे याद करते हो? क्या ऐसी भी मेरी धन्यता होगी कभी कि तुम मुझे याद करो?
परमात्मा याद कर ही रहा है। और तुम्हारी धन्यता भी एक दिन होगी, जिस दिन तुम सुन पाओगे कि वह तुम्हें पुकारता है। इतना पुकारता है जितना तुमने उसे कभी पुकारा ही नहीं। तुम्हारी सब पूजा-अर्चना फीकी पड़ जाएगी, जिस दिन तुम जानोगे उसने जो सम्मान तुम्हें दिया, उसने जो सत्कार तुम्हें दिया। उस दिन तुमने जो पुकारा था और सोचते थे कि बड़ी साधना की और तपश्चर्या की और भक्ति की और पूजा की, आंखें झुक जाएंगी शर्म से। क्योंकि तुम्हारा पुकारना कोई पुकारना न था। उसने तुम्हें हजार-हजार कंठों से पुकारा है। पक्षियों के कंठों से पुकारा है, वृक्षों के फूलों से पुकारा है, चांद-तारों की रोशनी से पुकारा है, नदी के कलकल नाद से पुकारा है, सागर की तरंगों से पुकारा है, बादलों की गड़गड़ाहट से पुकारा है--उसने तुम्हें इतने कंठों से पुकारा है, इतने रूपों में पुकारा है, पुकारा ही पुकारा है--कि तुम जिस दिन समझ पाओगे, उस दिन आंखें न उठा सकोगे ऊपर।
तुमने किया ही क्या था? कभी पत्थर की एक मूर्ति के सामने बैठ कर एक दीया जला दिया था। कभी पत्थर की मूर्ति पर दो फूल चढ़ा दिए थे। न फूल तुम्हारे थे, वे तो चढ़े ही थे वृक्षों पर, उसी के चरणों में चढ़े थे। तुमने तोड़ कर और उनकी हत्या कर दी थी और सोचा था कि अर्चना की है। और तुमने दीया जला दिया था। दीये तो सभी उसी के हैं। रोशनी सब उसकी है। तुम्हारा उसमें क्या था? जिस दिन जानोगे, उस दिन समझोगे कि तेरी ही चीजें तुझे ही चढ़ाते रहे--कैसे नासमझ थे! अगर तुम अपने को भी चढ़ा दो तो भी तुम कुछ नहीं कर रहे हो, क्योंकि तुम भी उसके हो।
लेकिन इस आकांक्षा से धीरे-धीरे ऊपर उठो। हम पुकार लें, इतना ही बहुत। हम पुकारने योग्य हो जाएं, इतना ही बहुत। हमारे प्राणों में थोड़ा-थोड़ा स्पंदन होने लगे, थोड़ी वीणा झंकृत होने लगे, इतना ही बहुत। और मैं तुमसे थोथी पूजा करने को नहीं कह रहा हूं। न तो तुमसे कह रहा हूं कि क्रियाकांड में पड़ो। हार्दिक भावना चाहिए। कहीं भी झुक गए प्रीति से, तो मंदिर है। किसी वृक्ष के पास झुक गए, तो तीर्थ है। किसी भी पत्थर पर सिर टेक दिया पूजा के भाव से, तो मूर्ति बन गई।
मूर्तियां मूर्तिकार नहीं बनाते। और जो मूर्तिकार बनाते हैं, वे मूर्तियां मंदिरों में स्थापित नहीं करनी चाहिए, उन्हें रखना चाहिए म्यूजियम घरों में। वे चित्रकला के नमूने हैं। मूर्तिकला के नमूने हैं। मनुष्य की कुशलता के नमूने हैं।
लेकिन भक्त जरूर मूर्ति का निर्माण करता है। भक्त भगवान का निर्माण करता है। भक्त जहां भाव से झुक जाता है, वहां मूर्ति निर्मित हो जाती है।
मैं एक घर में मेहमान था। वे मुसलमान हैं, बड़े मूर्तिकार हैं। जैन उनसे मूर्तियां बनवाते हैं महावीर की, और बौद्ध उनसे मूर्तियां बनवाते हैं बुद्ध की, और हिंदू उनसे मूर्तियां बनवाते हैं कृष्ण की और राम की--और वे मुसलमान हैं। मैंने उनसे पूछा कि मुसलमान होकर तुम मूर्तियां बनाते हो, तुम्हारा भाव तो हो ही नहीं सकता! तुम्हारे पास भक्त का तो भाव हो नहीं सकता। तुम तो मूर्तिभंजक।
उन्होंने कहा, बात तो ठीक है। यह तो धंधा है! इससे भाव का कोई लेना-देना नहीं।
अब जरा सोचो! जिस आदमी ने धंधे के लिए मूर्ति बनाई, भला तकनीकी रूप से वह कितना ही कुशल हो, जिसने धंधे के लिए मूर्ति बना दी कृष्ण की, जिसमें भाव जरा भी नहीं है कृष्ण के प्रति--तुम जो चाहो बनवा लो; चाहे कृष्ण की मूर्ति बनवा लो तो वह वैसे ही बना देगा, चाहे हिटलर की बनवा लो तो वैसे ही बना देगा, चाहे चंगीज खान की बनवा लो तो वैसे ही बना देगा; उसे कोई अंतर नहीं; तकनीक है उसके पास, कला है। वह मूर्तिकार है। लेकिन उसके पास भक्त का भाव नहीं है। क्या इसकी मूर्ति में कोई अर्थ हो सकता है?
फिर ये मूर्तियां बड़े-बड़े मंदिरों में प्रतिष्ठित हो गईं। फिर इन मूर्तियों की पूजा चल रही है।
यह तो सिर्फ थोथा आयोजन हुआ। भले हैं गांव के लोग कि किसी भी पत्थर को, जिससे प्रेम हो गया, उसी पत्थर को पोत दिया सिंदूर से, चढ़ा दिए फूल, झुका लिया सिर। न कोई तकनीक है, न कोई मूर्ति है, न कोई मूर्तिकार है--लेकिन भक्त है तो भगवान है।
मैं तुमसे किसी क्रियाकांड में पड़ने को नहीं कहता। मैं तुमसे यह भी नहीं कहता कि तुम बंधी-बंधाई प्रार्थनाएं करो। क्योंकि उनका कोई मूल्य नहीं है। सीखी-सिखाई प्रार्थनाएं करो, बस वे तो तोतों जैसी हैं। उनका कोई भी मूल्य नहीं है। तोते को तुम गाली देना सिखा दो तो वह गाली देता है। तोते को तुम राम-राम कहना सिखा दो तो वह राम-राम कहता है। तोता बिलकुल निष्पक्ष है। उसकी निष्पक्षता का खयाल रखना। न राम-राम कहने में उसे कुछ पक्षपात है, न गाली देने में कोई पक्षपात है।
एक स्त्री तोते को खरीदने गई। कई तोते देखे दुकान पर, लेकिन एक तोता बहुत पसंद आया। लेकिन दुकानदार ने कहा, इसको आप न खरीदें। स्त्री बड़ी धार्मिक थी। चर्च जाती, चर्च के पादरी को निमंत्रित करती। अविवाहित रही थी। धर्म के लिए उसने सब कुछ अपना लगा दिया था। दुकानदार को पता था। उसने कहा कि यह आप न खरीदो। यह तोता जरा गलत संग में रहा है। यह एक वेश्या के घर रहा है। इसे एक वेश्या के घर से खरीदा गया है। तो यह जरा गालियां बकता है। और भद्दी गालियां बकता है। आपको यह न जंचेगा।
मगर तोता बड़ा प्यारा था। और स्त्री के मन भा गया। उसने कहा, हम सिखा लेंगे। ले आई घर तोते को। दुकानदार ठीक ही कहता था। हर बात ही वह गाली से शुरू करता था। तो पहले ही रविवार को जब पादरी आया तो वह स्त्री थोड़ी घबड़ाई। उसने जल्दी से उस पर एक कंबल ढांक दिया तोते पर, कि कहीं पादरी को देख कर कुछ न कुछ कह न दे! यह नियमित हो गया व्यवहार कि जब भी पादरी आता रविवार को, वह जल्दी उस पर कंबल ढांक देती।
एक दिन ऐसा हुआ कि रविवार को पादरी आया और फिर सोमवार को कोई काम आ गया तो फिर आया। आता हर रविवार को था हमेशा, उस दिन सोमवार को पहली दफे आया। स्त्री ने जल्दी से घबड़ाहट में तोते पर कंबल डाला। तोते ने कहा, ऐसी की तैसी इस पादरी की! इस बार एक ही दिन में सप्ताह पूरा हो गया?
इतना बिना कहे तोता नहीं रह सका। पादरी ने सुना तो पादरी ने कहा, यह तो, यह तोता किस तरह का है? ऐसी की तैसी पादरी की! मेरे पास भी तोता है, वह बड़ा भक्त तोता है। इस तोते को दे दो, दोनों को साथ रखेंगे कुछ दिन तो यह भी भक्त हो जाएगा।
ले गया पादरी। दोनों को एक ही पिंजरे में रख दिया। और जब पांच-सात दिन बाद महिला पता लगाने पहुंची कि हालत क्या है, तो पादरी बड़ा बेचैन था। पादरी बोला कि मैं बड़ा बेचैन हूं। तेरे तोते ने तो गालियां देनी बंद कर दीं, मगर मेरा तोता जो कि प्रार्थना करता था, उसने प्रार्थना भी बंद कर दी। दोनों चुप हो गए हैं। यह कुछ समझ में नहीं आती बात! तो दोनों तोते मुस्कुराए। तो पूछा उन्होंने कि भई, क्या बात क्या है? तो राज खुला! कि पादरी का तोता तो नर था और वह जो तोता महिला का था, वह मादा था। तो उस पादरी के तोते ने कहा कि हम प्रार्थना इसीलिए करते थे कि कोई मादा मिल जाए। अब किसलिए प्रार्थना करें? और मादा तोते ने कहा, मैं गालियां इसीलिए देती थी कि जिंदगी यूं ही जा रही है, कोई नर मिल जाए। अब नर मिल गया तो मैं गाली क्यों दूं? अब हम दोनों मजे में हैं। तुम दोनों भाड़ में जाओ!
तोते को चाहे तुम राम-राम सिखा दो और चाहे गालियां सिखा दो, कंठ से गहरी बात नहीं जाएगी। तोता तोता है। और अक्सर तुम्हारी प्रार्थनाएं तोतों जैसी हैं। सीख ली हैं। सिखा दी गई हैं। मैं सिखाई गई प्रार्थनाओं के लिए नहीं कह रहा हूं। कम से कम इतना तो परमात्मा के साथ प्रेम प्रकट करो कि अपनी प्रार्थना अपनी हो, निज हो! कम से कम उधार शब्द तो उसके सामने मत दोहराओ! चले गायत्री दोहराने लगे! अपना ही गीत गाओ न! गायत्री किसी का अपना गीत रहा होगा, तब सुंदर था। जिसके हृदय से उठा होगा, तब उसमें परम भगवत्ता थी। जिसने पहली बार गुनगुनाया होगा, जो पहला उदगाता था, गायत्री जिसके भीतर जन्मी होगी, उस गरिमा का निर्वचन नहीं हो सकता। मगर गायत्री तुम्हारी नहीं है। तुम बैठे गायत्री जप रहे हो! यह सब तोतारटंत है।
तुम्हारी गायत्री प्रतीक्षा कर रही है तुम्हारे भीतर। तुम अपना गीत गाओ! चाहे कितनी ही तुतलाहट क्यों न हो तुम्हारे गीत में, चाहे मात्राएं ठीक न बैठें और चाहे छंद न बंधे और चाहे सुंदर काव्य न हो, फिकर मत करना। परमात्मा को न छंद की फिक्र है, न व्याकरण की, न भाषा की। परमात्मा को अगर कोई फिक्र है तो सिर्फ एक बात की--तुम्हारे प्रेम की। प्रेमपूर्ण आह्वान की। जैसे तुम्हारे हृदय में उठे।
फिर रोज-रोज की आदत मत बनाओ--कि कल जो प्रार्थना की थी वही आज करेंगे, वही कल भी करेंगे। यह भी क्या बात हुई! क्या तुम रोज परमात्मा से उस क्षण में सहजता से दो बातें नहीं कर सकते हो? जो उस क्षण में भाव हो। न हो कोई भाव तो चुप रह सकते हो। चुप्पी भी प्रार्थना हो जाएगी! कुछ कहने को न हो तो यही निवेदन कर देना कि कुछ कहने को नहीं है, तुझे कुछ कहना हो तो तू कह। हम सिर झुका कर बैठ कर सुनेंगे।
और ध्यान रखना, प्रार्थना का पहला कदम है: तुम्हारा परमात्मा से बोलना; और दूसरा कदम है: तुम्हारा सुनना और परमात्मा का बोलना। जब तक तुम्हीं बोलते जाओगे, तब तक असली प्रार्थना आई नहीं अभी। अधूरी-अधूरी है। सुनोगे कब? वास्तविक प्रार्थना कहना कम, सुनना ज्यादा है। वह जबान की बात कम और कान की क्षमता ज्यादा है। ग्राहकता ज्यादा है।
तो कभी चुप रह जाना। और कभी गीत गाना। और कभी दो बात कर लेना। और बातें सरल हों, सीधी-सादी हों, शास्त्रीय न हों, सैद्धांतिक न हों, भोली-भाली हों। जितनी भोली-भाली हों, उतनी ही दूर तक जाएंगी। और जितनी हृदय से उमगेंगी, उतनी ही उसके चरणों में स्वीकार हो जाएंगी।
रही उसकी याद करने की बात, वह तुम्हें सदा से याद कर रहा है।
ओशो, मैंने संसार के सब सुख-दुख को अनुभव कर देखा है। शादी के भी मीठे और कड़वे अनुभव किए हैं। संसार की सब चालबाजियों से गुजरा हूं। अभी आपके कहे ‘ग्रुप’ करके मेरा हृदय बिलकुल आपके प्रति खुल गया है। दिल होता है आपमें पूरा डूब जाऊं और आपके साथ आकाश में उडूं और बहारों में फूल और आनंद बरसाऊं। मुझे अपना लो! आपकी अनुकंपा अपार है! बहुत धन्यवाद!
मुझे अपनाने में तो अड़चन क्या? मेरा तो सीधा उसूल है कि परमात्मा जब तुम्हें अपना रहा है, तो मैं कोई और ज्यादा योग्यता तुमसे नहीं मांग सकता। जब परमात्मा ने तुम्हें जीवन दिया है, और उसने तुम्हें पात्र माना है, तो मैं कोई और परीक्षाएं तुम्हारे लिए तय नहीं कर सकता, जो तुम पार करो तब मैं तुम्हें अपनाऊंगा। परमात्मा तुम्हें जिलाए है, यह काफी है। यह तुम्हारी योग्यता हो गई, पात्रता हो गई।
फिर मैं कौन हूं जो तुम्हें इनकार करूं? मैं तो स्वीकार ही करूंगा। क्योंकि उसी स्वीकार में से एक संभावना का द्वार खुलता है कि किसी दिन तुम मुझे स्वीकार कर सको। अड़चन तो वहां है। जब मैं तुम्हें स्वीकार करता हूं, तो मुझे तो कुछ भी खोना नहीं पड़ता। लेकिन तुम जब मुझे स्वीकार करोगे, तुम्हें कुछ खोना पड़ेगा। अहंकार खोना पड़ेगा। वहीं अड़चन आ जाती है। वहीं गांठ है।
शुभ भाव उठा है आज तुम्हें। ऐसे भी काफी देर हो गई, योगानंद, तुम्हें संन्यासी हुए काफी दिन हो गए! मगर मैं भी प्रतीक्षा करता हूं। ठीक घड़ी जब आए, सम्यक घड़ी जब आए। मैं भी देख रहा हूं कि तुम सब तरह के सुख-दुख के अनुभव से गुजर रहे हो। मेरे ही सामने तुम्हारी शादी हुई और मेरे सामने ही तुम्हारी शादी टूट भी गई। तुम तरह-तरह की चालबाजियों में कुशल हो--होशियार आदमी हो। और इस दुनिया में होशियार आदमी को सिवाय चालबाज होने के और कुछ सूझता ही नहीं! यहां जितना होशियार आदमी होता है, उतना ही चालबाज हो जाता है। यहां होशियार रहना और सीधा-सादा रहना बड़ी अपूर्व घटना है। पढ़ा-लिखा आदमी बेईमान हो ही जाता है। गैर पढ़े-लिखे बेईमान नहीं होते, इसमें कोई गुणवत्ता नहीं है। गुणवत्ता तो तब है जब पढ़ा-लिखा आदमी और बेईमान न हो। सुशिक्षित आदमी और सीधा-सादा हो, तो कोई गुणवत्ता है। अशिक्षित तो सीधा-सादा होता है। अशिक्षित होने के कारण सीधा-सादा होता है, और कोई खूबी नहीं है।
मैं कोई गांव के लोगों की प्रशंसा नहीं कर रहा हूं। मैं कोई ग्रामीण जीवन का पक्षपाती भी नहीं हूं। जैसा कि तुम्हारे देश में बहुत साधु-संत हैं, वे प्रशंसा करते हैं कि अहा, गांव के लोग कितने भोले-भाले! भोले-भाले नहीं हैं, सिर्फ उनको चालबाजी का अवसर नहीं मिला। अवसर का न मिलना कोई गुणवत्ता नहीं है।
एक आदमी ने इश्तहार निकाला अखबारों में कि मैं एक बड़ा पुरस्कार देना चाहता हूं--दस हजार डालर--उस आदमी को जो अपने चरित्र का ठीक-ठीक प्रमाण दे दे। बहुत पत्र आए, चरित्रों के प्रमाण सहित पत्र आए, लेकिन एक पत्र उसने चुना जो कि सर्वाधिक चरित्रवान आदमी मालूम होता था। उस पत्र के लेखक ने लिखा था--पत्र को पढ़ते ही उसका हृदय गदगद हो गया--उसने लिखा था कि न मैं सिगरेट पीता, न शराब, न चाय, न काफी, न कोको; पर-स्त्रियों की तो बात दूर, अपनी स्त्री से भी दूर रहता हूं; न मेरा किसी से मोह है, न आसक्ति है; एकांत मेरा जीवन है; एक छोटी सी कोठरी में चौबीस घंटे निवास करता हूं; समय पर भोजन लेता हूं, रूखा-सूखा; जो मिल जाए उससे राजी हूं, संतुष्ट हूं; कोई शिकायत नहीं है; सुबह पांच बजे ब्रह्ममुहूर्त में उठता हूं; सांझ सूरज के ढलते ही सो जाता हूं, ऐसा प्राकृतिक मेरा जीवन है। उसकी चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते तो उसे लगा कि यह आदमी दस हजार डालर ले जाएगा। वह तो आखिरी, पुनश्च करके उसने लिखा था कि मगर और तीन महीने की बात है--जरा जेल से मुझे छूटने दो!
अब जेल में रह कर अगर तुम पर-स्त्रियों से दूर और अपनी स्त्री से भी दूर; और जेल में रह कर जो मिल जाए उसी में संतुष्ट, तो इसका कोई अर्थ नहीं है, कोई मूल्य नहीं है।
और कुछ लोग इसी तरह अपने चरित्र को निर्मित किए हुए हैं। उनका चरित्र भी एक सूक्ष्म अदृश्य कारागृह के भीतर है। चाहे उनकी जंजीरें तुम्हें दिखाई न पड़ती हों, मगर उनके हाथों में जंजीरें हैं--प्रतिष्ठा की, सम्मान की, समादर की। चाहे उनके आस-पास की कालकोठरी तुम्हें दिखाई न पड़ती हो, लेकिन वह आस-पास उनके कालकोठरी है--चरित्र की, समाज की, समाज के भय की। नरक का भय, स्वर्ग का लोभ, इन सबने उन्हें कारागृह में डाल दिया है। उनके चरित्र का कोई मूल्य नहीं है, मेरी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं है। मैं तो उसी व्यक्ति को चरित्रवान कहता हूं, जिसे अवसर है, समग्र अवसर है, सुविधा है, और फिर भी जो उस सुविधा का उपयोग नहीं करता। किसी बाह्य कारण से नहीं, बल्कि एक आंतरिक बोध से।
मैं चाहता था कि तुम सुख-दुख देखो। मैं चाहता था कि तुम चालबाजियों से भी गुजरो। पढ़े-लिखे योग्य व्यक्ति हो, विचारशील व्यक्ति हो। मैं गांव के ग्रामीण भोले-भाले आदमी को कोई मूल्य नहीं देता। उसका भोला-भालापन सिर्फ अवसर की कमी है। और गांव का भोला-भाला आदमी जैसे ही शहर आता है, तुम चकित हो जाओगे, वह शहर वालों के भी कान काटने लगता है।
मैं विश्वविद्यालय में विद्यार्थी था तो गांव से, दूर गांव से, एक आदमी दूध बेचने आया करता था विश्वविद्यालय के छात्रावास में। वह इतना सीधा-सादा अच्छा आदमी था कि लोग उसको संत जी कहते थे। नाम किसी को उसका पता भी नहीं था, लेकिन संत जी करके वह प्रसिद्ध हो गया था। फिर धीरे-धीरे उसकी ख्याति बढ़ी। फिर वह विश्वविद्यालय के पास ही आ गया, वहीं उसने अपनी गौशाला खोल ली, भैंसें ले आया; धीरे-धीरे उसका दूध पानी ज्यादा और दूध कम। लोग उससे पूछते, संत जी, क्या आपने भी वही काम शुरू कर दिया? क्या आप भी दूध में पानी मिलाने लगे? वह कहता, कसम परमात्मा की! कसम मेरे बेटे की! उसका बेटा दूध लेकर उसके साथ ही आता था, उसके सिर पर हाथ रख कर कहता: कसम मेरे बेटे की, अगर कभी भी मैंने दूध में पानी मिलाया हो! और दूध बिलकुल पानी! मैंने एक दिन उससे पूछा एकांत में कि संत जी, किसी को कहूंगा नहीं, तुम भी गजब कर रहे हो! यह कसम तुम खाते कैसे हो?
उसने कहा, अब आपसे क्या छिपाना--उससे धीरे-धीरे दोस्ती हो गई थी--आपसे क्या छिपाना! किसी को कहना मत। कसम खा लेता हूं, क्योंकि मैं दूध में कभी पानी नहीं मिलाता, मैं हमेशा पानी में दूध मिलता हूं।
अब? गांव का आदमी, मौका मिल जाए तो शहर के लोगों के कान काटने लगता है। गांव के भोले-भालेपन का कोई मूल्य नहीं है। भोला-भालापन तो तब मूल्यवान है जब तुम्हें सारी सुविधा है चालबाजियां करने की और तुम न करो। तब मजा और है।
दुनिया में जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ती है, वैसे ही चालबाजी बढ़ती जाती है। तो जरूर शिक्षा में कहीं कोई भूल है, कोई बुनियादी भूल है। यहां बुद्धू तो भोले-भाले हैं, और जिनको बुद्धिमान होना चाहिए, वे सब चालबाज हैं। यह दुनिया दोहरे दुख उठा रही है। भोले-भाले हैं, वे बुद्धू हैं। उनके बुद्धूपन की वजह से पीड़ा हो रही है। क्योंकि बुद्धू करेंगे क्या? वे जो भी करेंगे उससे बुद्धूपन होने वाला है। जो बुद्धिमान हैं, वे चालबाज हैं। वे जेबकतरे हो गए हैं। वे हरेक की गर्दन काटने पर तैयार हैं। वे येन-केन-प्रकारेण कुछ भी करके पद, प्रतिष्ठा, सफलता, धन, महत्वाकांक्षा पूरी करना चाहते हैं। तो एक तरफ बुद्धू भोले-भाले और एक तरफ बुद्धिमान चालबाज, इन दोनों पाटों के बीच दुनिया पिस रही है।
ऐसे लोग चाहिए जो बुद्धिमान हों और भोले-भाले हों। मगर इसके लिए तो पकना पड़ता।
तो योगानंद, मैं प्रतीक्षा करता था। तुम्हारी चालबाजियां चुक जाएंगी। क्योंकि तुम निश्चित ही विचारशील व्यक्ति हो। विचारशील व्यक्ति शुरू-शुरू में कितनी ही चालबाजियां करे, जल्दी ही उसे समझ में आ जाता है कि चालबाजियों से कुछ मिलने वाला नहीं है। और जो जितना ज्यादा बुद्धिमान है, उतनी जल्दी उसे समझ में आ जाता है, उतनी त्वरा से समझ में आ जाता है कि चालबाजियों से कुछ मिलने वाला नहीं है। और जो मिलेगा वह कूड़ा-करकट है। इकट्ठा कर लोगे कचरा और मर जाओगे। जिंदगी गंवा दोगे और जो इकट्ठा किया वह यहीं पड़ा रह जाएगा। सब ठाठ पड़ा रह जाएगा।
तो मैं देखता था साक्षीभाव से कि तुम क्या कर रहे हो। तुम जो भी कर रहे हो, सब मुझे पता। तुम्हारी चालबाजियां पता, तुम्हारी बेईमानियां पता, तुम्हारी धोखेधड़ियां पता। लेकिन यह भरोसा मेरा कभी नहीं टूटता कि अगर तुम जरा भी समझदार हो--और कौन है जिसके भीतर कम से कम इतनी समझदारी न हो कि एक न एक दिन देख लेगा सचाई को? सभी के भीतर इतनी ज्योति तो परमात्मा रख ही देता है! इतनी बिना ज्योति के तो परमात्मा किसी को जगत में भेजता ही नहीं। ध्यान करने से वही ज्योति निखर आती है। यहां तुमने थैरेपी ग्रुप्स में प्रवेश किया, उसमें भी वही ज्योति निखर आती है। ज्योति तो तुम्हारी है, कचरा-कूड़ा हटाना है। दर्पण तुम्हारा है, धूल जम गई है, उसे पोंछ देना है।
तो अच्छा हुआ कि अब तुम कहते हो: ‘आपके प्रति हृदय खुल गया है। दिल होता है आपमें पूरा डूब जाऊं और आपके साथ आकाश में उडूं और बहारों में फूल और आनंद बरसाऊं।’
यह सब हो सकता है। यह हम सबकी आंतरिक क्षमता है। यह होना ही चाहिए। आकाश में न उड़े और मर गए, तो व्यर्थ जीए। फूल न बने और मर गए, तो व्यर्थ जीए। दीये न बने और मर गए, तो जीए ही नहीं। लाश थी, चलती रही, ढोते रहे बोझ; जन्म से लेकर मृत्यु तक एक लंबे मरण का ही सिलसिला रहा, जीवन का कोई सिलसिला न रहा।
यह भाव सुंदर है। मगर सम्हालना। क्योंकि ऐसे भाव आते हैं और छिटक जाते हैं। पुरानी आदतें मजबूत होती हैं। पहाड़ों जैसी। उनका लंबा इतिहास होता है। अच्छे भाव तो सबके भीतर उठते हैं। ऐसा तो आदमी खोजना मुश्किल है जिसके भीतर अच्छे भाव न उठते हों। कभी-कभी तो हर आदमी संत हो जाता है। मगर वह संतत्व ज्यादा देर टिकता नहीं। क्योंकि पुरानी आदतें फिर खींच लेती हैं। पुराने न्यस्त स्वार्थ फिर वापस खींच लेते हैं।
जब संतत्व का कोई भाव उठे तो थोड़ी दृढ़ता चाहिए। आंधियां आएंगी, तूफान आएंगे, दीये को सम्हालना।
बुझ न जाए दीपक यह तेरा
देख हवा का झोंका आया!
कितने दिन तू बीहड़ पथ पर
अंधकार में फिरा भटकता,
कभी उलझता वल्लरियों में
पाषाणों में कभी अटकता!
कितने दिन विह्वल विनती में
बिता दिए थे तूने अपलक,
कितने तप के फलस्वरूप
पाया राही यह अनुपम दीपक!
दे प्रकाश तुझको औरों को
इसीलिए गुण-युक्त इसे कर,
मानस का ले स्नेह, प्राण की
चिर ज्वाला से इसे जलाया!
बुझ न जाए दीपक यह तेरा
देख हवा का झोंका आया!
हवा के झोंके आएंगे। और सच तो यह है, जब दीये जलते हैं तो हवा के झोंके और भी आते हैं। आते तो पहले भी थे, लेकिन पहले पता नहीं चलता था। जब दीया जलेगा तो पता चलता है--दीये की लौ कंपती है। दीया ही न जलता हो तो हवा क्या अंधड़ आते रहें, कोई फिकर नहीं! तुम्हारे पास बुझने को ही कुछ नहीं है।
इस जगत में जिस व्यक्ति के पास ध्यान नहीं है, उसको एक लाभ है, उसके पास खोने को कुछ नहीं है। और जिस व्यक्ति के पास ध्यान है, उसके लिए एक खतरा है, उसके पास खोने को कुछ है। और जितनी ध्यान की संपदा बढ़ेगी, उतना ही खतरा बढ़ता जाता है। और मन अपनी पूरी ताकत लगाता है, क्योंकि ध्यान का बढ़ना मन की मृत्यु है। कौन मरना चाहता है? मन अपनी सुरक्षा के सब आयोजन करेगा। हजार तरह से समझाएगा--कि किस झंझट में पड़ गए हो? शांत बैठोगे तो मन कहेगा, ऐसे बैठने से क्या होगा? क्या बुद्धू बने बैठे हो! अरे, कुछ करो! उठो! इतनी देर में तो कुछ कमा लेते! कुछ मजा कर लेते! कुछ नहीं था, सिनेमा हो आते, क्लब-घर पहुंच जाते। दुनिया राग-रंग में मजा कर रही है, तुम यहां बैठे आंख बंद किए। बुद्धू बने हो?
बुद्ध शब्द से ही बुद्धू बना है, खयाल रखना। क्योंकि बुद्ध ने आंखें बंद कर लीं, राज-पाट छोड़ दिया। तो लोग कहने लगे, हो गया बुद्धू। तब से वह शब्द निर्मित हुआ है। शब्द बड़ा कीमती है। बुद्ध से आया है। अब भी लोग कहते हैं, अगर तुम ध्यान करने बैठोगे, घर के ही लोग कहने लगेंगे, क्या बुद्धूपन में पड़े हो? समय कहां है? कुछ काम करो, कुछ धाम करो।
इन्हीं लोगों ने इस तरह की कहावतें गढ़ रखी हैं--कि खाली मन शैतान का घर; कि शैतान का कारखाना। बात बिलकुल उलटी है। जब खाली मन होता है, तब तुम परमात्मा के मंदिर होते हो, शैतान का कारखाना नहीं। चलता मन शैतान का कारखाना। कारखाना तो चलता ही होना चाहिए, तभी हो सकता है! खटर-पटर होती रहे, शोरगुल मचता रहे, तो ही कारखाना हो सकता है। कारखाना और सूने मन में कैसे होगा? शून्य का कहीं कोई कारखाना हुआ है? शून्य में तो मंदिर होता है। जब तुम शून्य बैठोगे, मन कहेगा, कुछ करो! हजार-हजार बातें उठाएगा, हजार वासनाएं उठाएगा, पुरानी यादें दिलाएगा, पुराने मीठे सपनों को खूब बड़ा-बड़ा करके बताएगा। मन बड़ा चालबाज है। अतिशयोक्तियां करेगा। कि देखो, उस स्त्री के साथ थे तो कितना आनंद पाया था। हालांकि पाया कुछ भी नहीं था जब साथ थे। मगर अब मन ऐसी झूठी-झूठी स्मृतियां खड़ी करेगा।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि आज तक दुनिया में एक भी सच्ची आत्मकथा नहीं लिखी गई है।
मैंने भी बहुत सोचा और मैं पाता हूं कि शायद सच्ची आत्मकथा लिखी ही नहीं जा सकती। उसका कारण है। क्योंकि कब तुम आत्मकथा लिखोगे? बाद में लिखोगे न! बाद में चीजें रोज तुम्हारी दृष्टि में बदलती जाती हैं। उनके अर्थ बदलते जाते हैं। क्योंकि नये-नये अनुभव तुम्हारे अर्थ निकालने की क्षमता को बदलते जाते हैं। तुम अगर आज पचास साल के हो और तुम लिखते हो कि जब मैं पांच साल का था तो यह घटना घटी। लेकिन यह पैंतालीस साल के अनुभव के बाद तुम लिख रहे हो। पैंतालीस साल के अनुभव ने तुम्हें दृष्टि दी देखने की, सोचने की, विचारने की; एक रंग दिया, एक ढंग दिया, एक शैली दी; उस सबका प्रभाव उस घटना पर पड़ेगा! अब वह घटना वही नहीं है जो तुम सोचते हो। उस घटना में तुमने बहुत रूपांतर कर लिए--बहुत जोड़ दिया होगा, बहुत घटा लिया होगा। अच्छा-अच्छा गप, कडुवा-कडुवा थू। उसमें जो-जो कड़वा होगा, वह थूक दिया होगा। तुम्हें पता भी नहीं चला होगा कब थूक चुके। अब तुम उसको बड़े सुंदर रूप दोगे।
इसीलिए अक्सर बूढ़े लोग याद करते हैं कि बचपन बड़ा सुंदर था। बच्चों से पूछो! बच्चे जल्दी से बड़े होना चाहते हैं। किसी भी बच्चे से पूछ लो कि तू सदा बच्चा रहना चाहता है? वह एकदम नाराज हो जाएगा। वह कहेगा, ऐसे ही मुसीबत झेल रहे हैं, किसी तरह समय काट रहे हैं।
बच्चे को कोई सुख नहीं है, बच्चे को दुख ही दुख है। उसके दुखों की तुम्हें याद भी नहीं है अब। कड़वा-कड़वा थू! सुख क्या थे? अब तुम सुख कल्पना कर रहे हो कि तितलियों के पीछे दौड़ना, सूरज की रोशनी, बगीचे में खेलना, नदियों में तैरना, वे प्यारे दिन, स्वतंत्रता, न कोई उत्तरदायित्व, न कोई रोटी-रोजी कमाने की फिक्र, न कोई पत्नी-बच्चों की चिंता, न कोई भविष्य का भय, कुछ भी न था, कैसा आनंद था! लेकिन बच्चे से पूछो! बच्चे की जान निकली जा रही है--होमवर्क करना है। होमवर्क उसके लिए इतना पीड़ादायी है जितना कि कोई काम तुम्हें कभी भी नहीं होगा। बच्चे की जान निकली जा रही है कि कल फिर स्कूल जाना है। वही स्कूल। वे ही लंबे चेहरों वाले शिक्षक। वे ही जेलखाने जैसी दीवालें। वही ब्लैक-बोर्ड। वही पांच-छह घंटे सख्त बेंचों पर बैठे रहना। ऊलजलूल की बातें सुननी, सीखनी, याद करनी--जिनमें बच्चे को कुछ भी सार नहीं दिखाई पड़ता, कि दो और दो चार होते हैं। तो होते होंगे, बच्चे को मतलब क्या है दो और दो के चार होने से! करना क्या है! और बाहर कोयल की आवाज आ रही है, और जा नहीं सकता। और बाहर मोर नाच रहा है, लेकिन खिड़की से देख भी नहीं सकता। और बगल का लड़का ताश की गड्डी लिए खीसे में बैठा है, और अभी छिड़ जाए, मगर नहीं! सामने ही लड़की बैठी है, इसकी चोटी लटक रही है, इसको एक झटका मार दे, मगर नहीं! उसके कष्ट तो देखो!
और यह शिक्षक लिए डंडा खड़ा है। और हर क्षण मारने को उतारू। हर बात में मारने को उतारू। और ऊलजलूल बातें सिखाई जा रही हैं--टिम्बकटू कहां है? क्या मतलब बच्चे को! कि हेनरी पंचम ने कब राज्य किया? इन सब बातों में उसे कोई तुक नहीं मालूम होता, कोई संगति नहीं मालूम होती। लेकिन मजबूरी है, क्योंकि वह छोटा है, कमजोर है। मां-बाप धक्का दे देते हैं--स्कूल जाओ! उनका छुटकारा हुआ। उनके लिए स्कूल एक छुटकारा है। झंझट टली। उधर शिक्षक के लिए धंधा है। उसको नौकरी लेनी है। उसको कोई प्रयोजन नहीं है इनसे। उसका कुल काम इतना है कि डंडे के बल इनको चुपचाप पांच-सात घंटे बिठाए रखे। उसको कुछ मतलब नहीं है, जो सिखाया है ऊपर से वह इनको सिखला दे। न उसे उसमें बहुत अर्थ है। मगर उसे लेना-देना क्या है?
सौ बातों में से निन्यानबे प्रतिशत बातें व्यर्थ सिखाई जा रही हैं, जो न सिखाई जाएं तो चलेगा। स्कूल-कालेज से निकलते ही तुम सब भूल जाते हो जो सिखाया गया। निकलने की बात दूर, सच तो यह है कि जैसे ही परीक्षा के भवन से बच्चा बाहर हुआ कि वह सब भूल-भाल जाता है कि परीक्षा में क्या हुआ। उठाई उसने अपनी गिल्ली और डंडा और चला! और तुम सोचते हो: सुख।
यहां छोटे-छोटे बच्चे हैं स्कूल में, उनके अनुभव मेरे पास आते हैं। जरा बड़ा बच्चा हुआ, छोटे बच्चे की गर्दन दबाता है। उसका फाउंटेन पेन छीन लेता है। उसकी साइकिल ले लेता है। उसको धमकाता है कि कल पैसे भी लाना वह मुझको देना। गिरोह हैं बच्चों के। सब गुंडागर्दी जो बाहर हो रही है, छोटे पैमाने पर स्कूल में भी होगी। क्योंकि वे बच्चे सब तुम्हारे ही तो बच्चे हैं। और वृक्ष तो फलों से पहचाने जाते हैं। जो हरकतें तुम कर रहे हो जरा बड़े पैमाने पर, जो तुम दिल्ली में कर रहे हो, वे अपने स्कूल में कर रहे हैं। वहां भी गुंडे हैं, दादा हैं; वहां भी उनके गिरोह हैं; छोटे बच्चों की जान निकली जाती है।
एक महिला ने मुझे आकर कहा कि क्या करूं, मेरा बच्चा सबसे छोटा है स्कूल में! उसकी पिटाई भी होती है, उसका सामान भी छीन लिया जाता है। उसको पैसे भी देती हूं खर्च के लिए, वह तो दूसरे ले लेते हैं। वह तो पगार बंधी हुई है। वह जाकर बांट देता है। अगर न बांटे, तो बस उसकी मुसीबत! और अभी कुछ दिन से वह कल्पना की बातें करने लगा है बच्चों से--कि मेरे पिताजी आएंगे, घबड़ाओ मत, वे साइकिल लाएंगे, हवाई जहाज लाएंगे, मोटर लाएंगे; मैं तुमको मोटर दूंगा, हवाई जहाज दूंगा। तो उस महिला ने मुझे आकर कहा कि करना क्या है? वह तो पगला जाएगा। न उसके पिता आने वाले हैं; और आएं भी तो कोई मोटर, हवाई जहाज लाने वाले नहीं हैं। मगर वह बच्चों को समझा रहा है कि भैया, मुझे मारो भर मत! उनको आश्वासन दे रहा है।
तुम जरा बच्चों की तकलीफें बच्चों से पूछो। तब तुम कभी ऐसा न कह सकोगे कि बचपन बड़ा स्वर्ग था। लेकिन बुढ़ापे में यह सब भूल जाएगा। बस तुम कुछ एक काल्पनिक बचपन खड़ा कर लोगे। उस काल्पनिक बचपन की तुम खूब प्रशंसा करोगे, खूब गीत गाओगे।
अतीत का हम निरंतर ही रूपांतरण करते रहते हैं। इसलिए कोई आत्मकथा सच नहीं होती। कोई आत्मकथा लिख ही नहीं सकता। क्योंकि जब तक लिखेगा, तब तक काफी समय गुजर जाएगा और हर चीज बदल जाएगी।
मन याद दिलाएगा, योगानंद, कि कैसा सुख, जब उस आदमी को धोखा दिया था तो कैसा मजा आया था! लोगों को धोखा देने में मजा आता है। क्योंकि अपना अहंकार सिद्ध होता है--कि देखो, एक आदमी को और बुद्धू बनाया। तो हम इससे श्रेष्ठ हैं। कि जब उस स्त्री से संबंध हुआ था, तो कैसी स्वर्गीय कल्पनाएं और सपने खिले थे! अनुभव कुछ और ही रहा हो, अनुभव कुछ और ही है, आदमी अदभुत है अपने को धोखा देने में। फिर-फिर वही भूलें करने का मन होने लगता है।
कितनी बार तुमने कसम खा ली है कि क्रोध न करेंगे। लेकिन फिर क्रोध! और जब एक स्त्री से तुम ऊब जाते हो तो कितनी कसम खाते हो कि बस, अब समाप्त हो गया मामला, अब किसी स्त्री से कोई नाता नहीं बनाना है; चुक गई बात, खतम हो गई! बड़ा वैराग्य उदय होता है! स्त्री से संबंध हो और वैराग्य उदय न हो, ऐसा होता ही नहीं। स्त्रियों को भी बड़ा वैराग्य उदय होता है। लेकिन दो-चार दिन में ही बात भूल जाती है।
पत्नी को जरा मायके भेज दो और दो-चार दिन बाद ही याद आने लगेगी। हजार तरह से याद आने लगेगी। वे सब कष्ट भूल जाएंगे जो उसने दिए हैं और वे सब सुख--जो उसने कभी नहीं दिए--कल्पना में पंख मारने लगेंगे। छोटी-छोटी बातें याद आने लगेंगी। अकेलापन अखरेगा। रात अकेले सोना--चाहे कितनी ही उम्र क्यों न हो गई हो, डर तो लगता ही है!
बड़ा मजेदार है यह दुनिया का हिसाब! पत्नी अकेली नहीं सो सकती, क्योंकि डरती है। पति अकेला नहीं सो सकता, क्योंकि वह भी डरता है। दो डरपोक साथ-साथ सोते हैं और निश्चिंत सोते हैं!
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी ने एक रात मुल्ला को जगाया और कहा, मुल्ला, सुनते हो? मुझे मालूम होता है कि नीचे चोर घुसे हैं। मुल्ला, जागे हो?
मुल्ला ने कहा कि नहीं; न तो मैं जागा हूं और न मुझे कुछ सुनाई पड़ता है।
लोग अकेले नहीं रह सकते। अकेलापन काटने लगता है, दूसरे की याद आने लगती है। फिर छोटी-छोटी सुविधाएं, कि बाथरूम में जाते थे तो टॉवल टंगा मिलता था, अब खुद ही टांगना पड़ता है। ऐसे जब पत्नी थी तो बाथरूम में जाकर कुछ पत्नी के होने से सुख नहीं मिलता था--इधर साड़ी पड़ी है, उधर टुथपेस्ट पड़ा है, उधर कुछ पड़ा है, उधर बच्चों के गंदे कपड़े इकट्ठे हैं--और जी ऐसा होता था: कब यहां से निकल भागें! लेकिन अब पत्नी घर में नहीं है, तो वे सब बातें याद नहीं आतीं।
मन की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। सुख को सम्हाल कर रखता है, बढ़ा-चढ़ा कर रखता है, दुख को घटाता है, छोटा करता है, भुलाता है। इसी तरह तो आदमी जी रहा है, नहीं तो जीना असंभव हो जाए। इस तरकीब के कारण ही तो तुम दुख झेलते जाते हो और सुख की आशा करते चले जाते हो।
तो मन, योगानंद, बहुत सी बातें याद दिलाएगा। हवा के झोंके आएंगे, दीये को बुझाना चाहेंगे--सजग रहना! शुभ भाव उठाहै। मैंने तो तुम्हें अपनाया है, अब तुम्हारे भीतर भी एक प्राणों में पुकार उठी है कि तुम अपना लिए जाओ। अब असली संन्यास घटने के करीब है।
संन्यास दो होते हैं। एक संन्यास तो औपचारिक है, जो तुम लेते हो। वह औपचारिक है। वह केवल एक मुद्रा है, शुरुआत है--क ख ग। फिर दूसरा संन्यास तब घटता है जब तुम्हारा हृदय मेरे प्रति खुलता है। पहला संन्यास तो अक्सर तुम्हारी बुद्धि मुझसे राजी हो जाती है, इसलिए। मेरी बात तुम्हें तर्कपूर्ण मालूम पड़ती है, मेरी बात तुम्हें अर्थपूर्ण मालूम पड़ती है, तुम संन्यास ले लेते हो। फिर दूसरा संन्यास तब घटता है, जब मेरी बात से कोई प्रयोजन ही नहीं रह जाता, जब मैं तुम्हें अर्थपूर्ण मालूम पड़ता हूं! जब मेरी मौजूदगी तुम्हें रसपूर्ण मालूम पड़ती है! जब मेरी समाधि तुम्हें छूने लगती है!
वैसी घड़ी आ गई।
दूसरा संन्यास ही वस्तुतः प्रवेश है। दूसरी दीक्षा ही वस्तुतः प्रवेश है। पहली दीक्षा औपचारिक है, बाह्य है। दूसरी दीक्षा आंतरिक है, भीतरी है; उसके लिए कोई बाहरी आयोजन नहीं करना होता।
भूल मत जाना! जो ज्योति जगी है, उसे किसी अंधड़ की चपेट में मत आ जाने देना! करीब हो बहुत जीवन-स्रोत के!
अरे जीवन के विह्वल स्रोत
तुझे क्या पथ का भी कुछ ज्ञान?
कुसुम-कंटकमय तेरा मार्ग
तुझे कुछ सुख-दुख का भी ध्यान?
बिछाता कोमल कुंतल-राशि
बुझाता सब पथिकों की प्यास,
बढ़ा चल, दूर नहीं सुख-द्वार
अटल उर में ले यह विश्वास!
बढ़ा चल पथ पर तू अविराम
बढ़ा चल प्रतिपल गाता गीत,
एक दिन मिल जाएगा सिंधु
विकल उर का युग-युग का मीत!
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Does God ever remember me?
According to Osho, God never needs to 'remember' you—He has never forgotten you. Your very breath and being are sustained in His remembrance; if He forgot, you would not exist. The mature stance is devotion without demand: remember the Divine because you have strayed, not to bargain for reciprocation. Trust that you are eternally held, and let prayer be grateful, unconditional love.
In simple terms: You’re alive because the Divine already holds you; your work is to remember Him without asking for payback.
What happens when living in the energy field of a master?
According to Osho, dwelling in a master’s energy field begins like the first flower before spring—an announcement of the transformation to come. With readiness and trust, your connection deepens; waves of bliss, wonder, and heart-born awareness arise, leaving the mind dumbfounded. Miracles unfold gradually. Protect these beyond-mind experiences by sharing only with fellow seekers, whose understanding nourishes and stabilizes the inner flowering.
In simple terms: Being near a master is like seeing the first flower before spring—stay close and patient, and your heart quietly blooms while your busy mind softens.
