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Questions in this Discourse
निर्विचार और आलस्य में कुछ फर्क है?
निर्विचारपना है, समझो लेटा हआ हूं। कुछ ऐसा विचार नहीं करता हूं, और फिर वह कितनी देर तक...समझो पूरा चौबीस घंटा मैं कर सकता हूं।
...और उसमें कोई फर्क नहीं रह जाता है?
वह इसलिए कि काम में अगर हम बहुत व्यस्त हैं तो विचार को छोड़ना कठिन होगा शुरू में। विचार छोड़ना ही कठिन हैं। फिर काम में और व्यस्त हैं। और काम के कारण ही हममें विचार चलते हैं तो छोड़ना कठिन होगा। इसलिए शुरुआत में आधा घंटा निष्क्रिय ध्यान करना चाहिए। कोई क्रिया नहीं कर रहे हैं। चुपचाप पड़े हुए हैं। और सिर्फ विचार को शून्य करने का भाव कर रहे हैं। सिर्फ विचार को शून्य में ले जाने का भाव कर रहे हैं।
जब आधा घंटा निष्क्रिय ध्यान आ जाए, निष्क्रिय शून्यता आ जाए, फिर सक्रिय ध्यान करना चाहिए। फिर क्रिया कर रहे हैं और साथ में चित्त शून्य रहे, इसका उपाय भी कर रहे हैं। चल रहे हैं सड़क पर, चल भी रहे हैं और चित्त शून्य रहे—इसका भी भाव कर रहे हैं। खाना खा रहे हैं, खाना भी खा रहे हैं, और चित्त शून्य रहे—इसका भी भाव कर रहे हैं। फिर धीरे-धीरे वह जो निष्क्रियता में उपलब्ध हुआ, उसका उपयोग सक्रियता में करना होता है। और जब वह सक्रिय रूप से भी पूरा हो जाए तब जानना चाहिए कि वह स्थिर हो गया। जब वह चौबीस घंटे सतत बना रहे—उठते-बैठते, सोते-जागते वह स्थिति बनी रहे, बनी रहे—तब जानना चाहिए कि वह सक्रिय ध्यान उपलब्ध हो गया। और जब सक्रिय ध्यान उपलब्ध हो जाए तो जीवन में अदभुत आनंद का अनुभव होगा।
ओशो, आप जो बोलते हो कि जागरूकपना अगर है तो उन दोनों का समन्वय कैसे स्थित करेंगे?
एक विचार आया मन में, कोई स्मृति आई, हम देखने वाले नहीं रह जाते। उसी विचार और उस प्रवाह के हिस्से हो जाते हैं। यह मूर्च्छा है। और इसके विपरीत जागरूकता है कि हम उसके हिस्से नहीं हो रहे। विचार आ रहा है, हम ऐसे ही देख रहे हैं जैसे कि हम फिल्म पर, हम पर्दे पर फिल्म देखते हैं। हम चुपचाप देख रहे हैं। हम कोई उसके साथ आइडेंटिटी नहीं कर रहे अपनी। अपने को जोड़ नहीं रहे। हम खड़े हैं, और हम देख रहे हैं।
थोड़े दिन के अभ्यास से यह खड़ा होना आसान हो जाएगा। अभी तो एकदम से दिक्कत होती है। क्योंकि क्षण भर हम खड़े रहेंगे, फिर हमको एकदम होश आएगा कि अरे हम तो उसी में ही संलग्न हो गए। तो निरंतर इसका उपयोग करने से, आधा घंटा रोज, कुछ ही दिनों में आधे घंटे में तो स्पष्ट रूप से आप जागरूक रह पाएंगे। और जब आधा घंटा में जागरूक रह पा सकते हैं तो फिर उसका विकसित प्रयोग ही है। धीरे-धीरे क्रियाओं में भी, और संक्रियाओं में भी जागरूकता आ जाए।
गांधी जी के पास शुरू-शुरू विनोबा जी गए थे। तो विनोबा जी में अपनी एक बात है कि वह किसी भी काम को परिपूर्ण कुशलता से करना उनको हर एक बात में अक्सर ध्यान रहता है। जो भी काम करना है, उसकी पूरी कुशलता पानी है। जब उन्होंने चरखा कातना शुरू किया तो उन्होंने इतनी अच्छी पोनी बनाई कि गांधी जी दंग रह गए। और उन्होंने कहा कि इससे अच्छी पोनी बनाने वाला हमारे पास कोई आदमी नहीं है। फिर उन्होंने चर्खे में भी इतने सुधार किए कि गांधी जी दंग रह गए। फिर वह सूत भी इतना महीन कातने लगे कि गांधी जी ने कहा कि यह सूत कातने का आचार्य है। यह सब होने के बावजूद भी जब विनोबा जी ने एक दिन गांधी जी से पूछा कि मैंने सबसे अच्छी व्यवस्था कर ली। चरखा मेरा आपसे बेहतर हो गया है, मेरी पोनी आपसे अच्छी हो गई है, मेरी कातने में कुशलता आ गई है लेकिन मेरा धागा टूट-टूट जाता है। और आपका धागा खराब पोनी में भी नहीं टूटता?
गांधी जी ने कहा: उसका संबंध चरखे से नहीं, उसका संबंध चित्त से है। तुम स्मरण रखना, जब तुम मूर्च्छित हो जाआगे, तभी धागा टूट जाएगा। तुम धागे को चला रहे हो, चित्त कहीं और चला गया, धागा टूट जाएगा। गांधी जी ने कहा: मैं अमूर्च्छित कातता हूं। जब कात रहा हूं तो चित्त में कुछ और विचार ही नहीं है। बस कातने की क्रिया भर के प्रति जागरूकता रह गई है, और कात रहा हूं। न चित्त कुछ सोच रहा है; न विचार कर रहा है; न कोई स्मृति आ रही है; न कोई और भविष्य की कल्पना बन रही है—बस चरखे के उस कतते धागे के अतिरिक्त मेरे चित्त में इस समय कुछ भी नहीं है। सिर्फ धागा कत रहा है, और मैं हूं; धागा नीचे जा रहा है, और मैं हूं; धागा ऊपर जा रहा है, और मैं हूं। मैं केवल एक देखने वाला मात्र रह गया हूं। और धागे की क्रिया चल रही है। क्रिया है और भीतर जागरूकता है, इसलिए धागा नहीं टूटता। गांधी जी बाद में इसलिए अपने चरखा कातने को प्रार्थना कहने लगे। ध्यान कहने लगे। वह कहने लगे मेरा ध्यान तो चरखा कातने में ही हो जाता है।
अगर बुद्ध या महावीर को समझें तो हम हैरान हो जाएंगे। इनके चौबीस घंटे की क्रियाएं ध्यान में थीं। वे जो भी कर रहे हैं, वे ध्यान में हैं। क्रिया कर रहे हैं। चित्त परिपूर्ण शांत है और जागरूक है। हमारा जीवन इस तरह के ध्यान के बिलकुल विपरीत है। हम चौबीस घंटे मूर्च्छा की तलाश कर रहे हैं। चौबीस घंटे हम किसी तरह का इनटाक्सिकेंट खोज रहे हैं। चाहे सिनेमा में खोजते हों; चाहे गीत सुनते हों, वहां खोजते हों; चाहे ग्रंथ पढ़ते हों, वहां खोजते हों; चाहे मंदिर में जाकर भजन-कीर्तन करते हों, वहां खोजते हों—हम चौबीस घंटे यह खोज रहे हैं कि किसी तरह मैं अपने को भूल जाऊं। और हम इसी को सुख भी कहते हैं।
जहां-जहां हम अपने को भूल जाते हैं, हम कहते हैं: बड़ा सुख आया। असल में हमें अपना खुद का स्मरण बहुत दुखद है। और हमारा होना, हमारा एक्झिस्टेंस ही दुख है। तो हम उसे पच्चीस वर्षों से खोज रहे हैं, वे रास्ते फिर चाहे कोई भी हों। जहां-जहां हमको थोड़ी देर को तल्लीनता आ जाती है, हम अपने को भूल जाते हैं। वहीं हमको सुख मालूम होता है। ध्यान का मार्ग बिलकुल विपरीत है। ध्यान का कहना है कि जहां-जहां हमें तल्लीनता है, वहीं-वहीं हम मूर्च्छित हैं। किसी में तल्लीन नहीं होना है। जागरूक—समस्त के प्रति जागरूक होना है।
अगर जो कार्य करते समय तल्लीन हो?
और जागरूकता बिलकुल दूसरी चीज है। जागरूकता आर्थिक चित्त सब जगह समानरूपेण उपस्थित है। चित्त किसी एक केंद्र्र पर जाग कर सब तरफ नहीं सो गया है। चित्त केवल जाग रहा है, चाहे कोई भी केंद्र हो। तल्लीनता का हम इसलिए मूल्य मानते हैं जीवन में कि हमारी गैर-तल्लीनता कार्य में अकुशलता बन जाती है। जैसे एक आदमी कोई काम कर रहा है और चित्त उसका और कहीं लगा हुआ है। इसको हम कहते हैं, यह तल्लीन नहीं है। असल में यह और कहीं तल्लीन है। अगर हम ठीक से समझें, इसको यह नहीं कहना चाहिए कि यह तल्लीन नहीं है। असल में यह अन्य किसी जगह पर तल्लीन है। तल्लीन तो यह है, यहां तल्लीन नहीं है। इसलिए हम कहते हैं, काम में तल्लीन हो जाओ।
तो एक तो यह आदमी है कि काम कुछ कर रहा है, और तल्लीन कहीं और है। दूसरा आदमी वह है कि जहां जो काम कर रहा है, और वहीं तल्लीन है—वह और शेष जगह अनुपस्थित है। और तीसरा आदमी वह है: जो केवल जागरूक है और काम कर रहा है। वह तल्लीन कहीं भी नहीं है। ऐसा आदमी जो किसी काम में तल्लीन नहीं है, केवल जागरूक है—स्वयं में तल्लीन होगा। मेरी बात समझ रहे हैं न? अगर वह कहीं भी तल्लीन नहीं है और सिर्फ जागरूक है जगत के प्रति, तो वह स्वयं में तल्लीन होगा। और स्वयं में तल्लीनता आनंद है। पर में तल्लीनता सुख है; और स्वयं में तल्लीनता आनंद है।
पर में तल्लीनता से हम स्वयं को भूल जाते हैं। और समस्त पर के प्रति तल्लीनता टूट जाए, पर के प्रति केवल अवेयरनेस रह जाए, केवल होश मात्र रह जाए तो उस स्थिति में वह जो तल्लीन होने की हमारी क्षमता है—क्षमता हम में जरूर है। वह जो तल्लीन होने की क्षमता है, वह कहीं और में तल्लीन अगर हमने नहीं होने दिया तो वह क्षमता स्वयं में तल्लीन हो जाएगी। वह व्यक्ति स्वस्थ होगा, वह स्व में स्थित होगा। वह अपने में खड़ा हो जाएगा। वह कहीं और नहीं डूबा हुआ है, वह स्वयं में डूब जाएगा। ऐसा व्यक्ति समस्त कार्य करेगा। क्योंकि वह जागरूक तो है, मूर्च्छित नहीं है। और उसकी क्रियाएं सब कुशल होंगी। क्योंकि वह किसी भी कार्य को परिपूर्ण जागरूकता से करेगा।
लेकिन साथ-साथ एक अदभुत बात होगी। वह प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक क्रिया को करते हुए भी अपने से चित नहीं होगा। अपने से डिगेगा नहीं। अपने में खड़ा रहेगा, सुस्थिर होगा। ऐसे व्यक्ति को गीता ने स्थितप्रज्ञ कहा है। जिसकी प्रज्ञा बिलकुल स्थिर...और यह शब्द बड़ा बढ़िया उन्होंने चुना है। जिसकी प्रज्ञा अपने में बिलकुल ठहर गई है, जिसका ज्ञान बिलकुल अपने में ठहर गया।
तो ज्ञान हमारे स्वयं में ठहर जाए, उसके लिए शून्यता का और जागरूकता का प्रयोग। शून्यता और जागरूकता में बड़े भेद नहीं हैं। जागरूकता प्रक्रिया है, परिणाम शून्यता है। जागरूक होने का हम प्रयोग करेंगे, परिणाम में शून्यता उपलब्ध होगी। पहले वह निष्क्रिय होगी, फिर उसे सक्रिय करना होगा।
और जब वह अखंड चौबीस घंटे हो जाए तो ऐसा आदमी संन्यासी है। वह कहां रहता है, इससे मेरे लिए कोई संबंध नहीं। वह कैसे रहता है, इससे कोई संबंध नहीं।
इसकी शुरुआत करना आधा घंटा, तो कौन सा टाइम अच्छा है?
इसके लिए कोई भी स्थिति अच्छी है? बैठने की या आराम की स्थिति अच्छी है?
इनके लिए कोई अध्ययन, कुछ...?
...समझो, कोई विचार आया, ऐसी कोई दिक्कत आई, फिर आप हो तो आपको पूछ लूंगा, आप नहीं हो तो कुछ...?
निर्विचार रहना?
फिर आए विचार, उसे हटा देना?
हटाएंगे कैसे आप? हमको यही कठिनाई है, जो इस जगत में सारे लोगों को दिक्कत है, निर्विचार होना समझ में आ जाता है। पर वह हमको भाव यह लगता है कि निर्विचार का मतलब: हटा देना। हटाइएगा कैसे? हटाना नहीं है, जागरूक होना है। विचार आया उसको देखना, उसके द्रष्टा-मात्र रह जाना। आने दें, हटाने का भाव ही छोड़ें। हटाना भी उसमें उलझ जाना है। न हटाना है, न कुछ...।
वह पानी पीने योग्य नहीं है, ऐसा मान कर वह वापस लौट आया। उसने बुद्ध को कहा कि वह पानी तो पीने योग्य नहीं, मैं वापस पीछे जाता हूं। बुद्ध ने कहा: इस दुपहरी में पीछे मत जाओ, तुम उसी पानी को ले आओ। बुद्ध की बात भी नहीं टाल सका, फिर वहीं गया। लेकिन वहां उसका फिर साहस नहीं हुआ कि इस पानी को मैं कैसे ले जाऊं। और उनके लिए यह पानी पीने को कैसे दूं? और फिर वापस लौटा। मुश्किल यह थी कि वह उसी रास्ते के बीच में तो वह रुके थे। वह फिर वापस लौटा। उसने कहा क्षमा करें, वह पानी लाने का साहस मेरा नहीं है। बुद्ध ने कहा: तू मान, उसी पानी को ले आ। वह बड़े अचंभे में पड़ गया। वह जानता था कि फिर मुझे वापस लौटना, तो बहुत आग्रह किया। लेकिन बुद्ध ने कहा कि लाना हो तो उसी को ला, अन्यथा मत ला। उसे मजबूर वहीं जाना पड़ा।
वहां जाकर वह देख कर हैरान हुआ। वे पत्ते तो बह गए थे और कचरा नीचे बैठ गया था। वह पानी को भर कर लाया, वह बड़ा हैरान हुआ। उसने जाकर बुद्ध को कहा कि बड़ा अदभुत अनुभव हुआ । वे पत्ते तो सब बह गए, कचरा नीचे बैठ गया और पानी तो बिलकुल निर्मल हो गया। बुद्ध ने कहा: मन का शांत करने का सूत्र भी यही है। तुम किनारे बैठ जाओ और जो विचार बहते हैं, बहने दो; जो विचार बैठ जाएं, बैठ जाने दो; तुम बिलकुल किनारे बैठे रहो, तुम छेड़-छाड़ मत करो। और अगर तुम किनारे बैठ कर केवल देख सकते तो तुम थोड़ी देर में पाओगे कि सब पत्ते बह गए, और सब कचरा नीचे बैठ गया। और अगर तुम कूद पड़े धारा में उसको शांत करने के लिए, फिर वे शांत होने को नहीं। और दबे हुए उखड़ आएंगे, और पत्ते बैठे हुए उभर आएंगे। शांत होना मुश्किल हो जाएगा।
चित्त के प्रति तटस्थ जागरूक होने का प्रयोग तब सार्थक है, कुछ करना नहीं है। लेकिन हमारे सारे उपदेश सुन-सुन कर हमको ऐसा लगता है कि कुछ करना है। वह ‘कुछ करना’ घातक हो जाता है। कुछ करना नहीं है। वह करने का भ्रम ही हमारा असली भ्रम है। असल में हम केवल द्रष्टा मात्र हैं। इसलिए हम केवल देख सकते हैं। और अगर हम केवल देखने का उपयोग कर लें थोड़ा सा, हम अचानक पाएंगे कि चित्त तो गया, बह गया। पर वह हम हटाने में लग जाते हैं। हटाने में फिर कुछ रास्ता नहीं बनता। हटाने में आप उलझ जाते हैं।
और जितनी आप जोर से हाथ मारते हैं, उतनी जोर से उलझ जाते हैं। और तब फिर आप पच्चीस एक्सप्लेनेशंस खोज लेते हैं—कि अपने पुराने पाप कर्म होंगे, फलां होगा, ढिकां होगा। इससे नहीं हो रहा है अभी कुछ, उदय नहीं है कर्म का इसलिए—ये सब पच्चीस बातें खोज लेते हैं। तो यह सिर्फ उस नासमझी को—जो आप कर रहे हैं, छिपाने के उपाय से ज्यादा नहीं है। यह कोई एक्सप्लेनेशंस माने के नहीं हैं।
नहीं, घड़ी को सुधारना न जानता हो और कोई आदमी सुधारने बैठ जाए और बिगड़ जाए तो सोचने लगे कि पुराने कर्मों का फल है। क्योंकि यह घड़ी तो बिगड़ती चली जाती है। और हम क्या... अभी कर्मों का उदय नहीं कि घड़ी ठीक हो। और कुल बात इतनी है कि वह उस टेक्नीक को नहीं समझ रहा जिससे यह घड़ी ठीक होगी। ध्यान बिलकुल टेक्नीक की बात है। कुछ करने की बात नहीं, समझ लेने की बात है। देखें थोड़े दिन प्रयोग करके। अधैर्य हमारा, हमारा इतना ज्यादा है कि हम प्रयोग ही नहीं कर पाते, बस यही गड़बड़ हो जाती है।
मैं आपकी बातें पहली बार सुन रहा हूं।
ओशो, प्राणायाम भी कोई कहता है इसमें कुछ सहायक है?
प्राणायाम स्वास्थ्य में सहायक होगा। स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होगा। पर वह भी बहुत सोच-समझ कर करने जैसा है, नहीं तो अस्वास्थ्य लाने में भी उपयोगी हो जाता है। जीवन और शरीर के बाबत तो मेरी धारणा यह है कि उसको बहुत सहज, निसर्गतः जीने देना चाहिए। जितना सहज उसको निसर्गतः जीने दें, जितना उसमें कुछ उलटा-सीधा न करें, उतना अच्छा है। प्राणायाम का उतना मूल्य नहीं है, जितना स्वच्छ वायु का शरीर में पहुंच जाने का मूल्य है। वह कभी घंटे भर के लिए खाली स्वच्छ स्थान में बैठ कर धीमे से थोड़ी गहरी श्वास ले लें, तो शरीर को लाभ पहुंचेगा। और श्वास की जो रिदम है, वह मन के शांत करने में सहयोगी हो जाती है।
असल में सब रिदम शांति लाती है। किसी तरह की रिदम हो, किसी तरह की गतिबद्धता हो, वह शांति लाती है। वहां, बर्मा में या कुछ और मुल्कों में तो ध्यान के लिए अनिवार्य मानते हैं श्वास में रिदम पैदा करना। यदि आधे घंटे को बैठ जाएं और श्वास के आने-जाने को देखते रहें। श्वास भीतर गई तो स्मरणपूर्वक भीतर जाने दें, बाहर गई तो स्मरणपूर्वक बाहर जाने दें। फिर भीतर गई तो स्मरणपूर्वक... वह जागरूक का प्रयोग करें। तो उसमें दोहरे फायदे होंगे। श्वास थोड़ी देर में रिदम पकड़ लेगी। रिदम का परिणाम स्वास्थ्य पर अच्छा होगा।
और दूसरा वह जो मैं जागरूकता कह रहा हूं, वह श्वास के माध्यम से जागरूकता विकसित होने लगेगी। और वह जागरूकता जो श्वास के संबंध में विकसित हो गई, उसी जागरूकता का प्रयोग मन के संबंध में, विचार के संबंध में किया जा सकता है। और सच तो यह है कि अगर आप स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक हो जाएं तो भी चित्त में विचार-शून्य हो जाएंगे। श्वास और विचार बंधे हुए हैं। अगर पांच मिनट बैठ कर आप श्वास को देखते रहें, श्वास-प्रश्वास को, आप अचानक पाएंगे: मन शून्य हो गया।
असल में किसी भी चीज के प्रति जागरूकता का प्रयोग करें तो चित्त शून्य हो जाएगा। अगर इस हाथ को यहां से यहां तक ले जाएं, और होश से देखते रहें, और आप पाएंगे कि चित्त शून्य हो गया। अगर आप रास्ते पर चलें और कदम-कदम पर जागरूकता रखें—बायां पैर उठा, और नीचे गया; दायां पैर उठा, और नीचे गया—पूरा होश रखें, तो आप एक पांच मिनट बाद पाएंगे कि आप चल रहे हैं और चित्त शून्य हो गया। जहां भी जागरूकता का प्रयोग कर लें, वहीं चित्त शून्य हो जाता है।
मूर्च्छा चित्त है, और जागरूकता चित्त-शून्यता है। सहयोगी किसी बात को न मानें। नहीं तो धीरे-धीरे धर्म के जो अदभुत परिणाम हो गए हैं जगत में, वे सहयोगी बातें बताने की वजह से हो गए हैं। और तब धीरे-धीरे ऐसा होता है कि वे सहयोगी बातें हमारे लिए इतनी महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
तो मैंने बिलकुल नियमित रूप से उनकी बात करनी बंद कर दी। थोड़ा बहुत सहयोग जरूर मिल सकता है, बाकी मैं उसकी बात बंद किया है। नहीं तो लोग मुझसे पूछते हैं कि आहार कौन सा सहयोगी होगा? कपड़े कौन से सहयोगी होंगे? यह कौन सा...जरूर कुछ सहयोग हो सकता है। लेकिन अगर उनकी बातें इतनी की गई हैं, कि कुछ लोग हैं जो जिंदगी भर आहार ठीक करने में व्यय कर देते हैं। यानी कुछ लोगों ने जिंदगी भर कपड़े कैसे पहनने हैं, इसमें ही व्यय कर देते हैं।
अब जैसे जैन, यहां इन्होंने...अब तक पच्चीस सौ वर्ष आहार ठीक करने में व्यय किए।...ढाई हजार वर्षों का इनका इतिहास आहार-शुद्धि का इतिहास है। उससे आत्मा-वात्मा का कोई संबंध नहीं रहा। वह एक बहुत गौण बिन्दु था जिससे थोड़ा सहयोग मिल सकता था। लेकिन वह इतना ज्यादा आउट ऑफ प्रोपोरशन महत्वपूर्ण हो गया, कि वह किसने बनाया? और कैसे बनाया? और किसने छुआ? और किसने नहीं छुआ? वह इतनी महत्वपूर्ण बात हो गई कि हमारा साधु करीब-करीब अपने जीवन का अधिकतम हिस्सा खाने की शोध में व्यय करता है, आत्मा की शोध में नहीं। वह सारे अनुपात से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया।
वैसे ही प्राणायाम और दूसरी चीजें भी कुछ संप्रदायों में अतिशय महत्वपूर्ण हो गईं। और तब यह हो गया कि कुछ साधु बेचारे दिन-रात व्यायाम करने में व्यय करते हैं, आत्मा की शोध में नहीं। और हमारा चित्त इतना ज्यादा डिसेप्टिव है, इतना ज्यादा वंचित है कि अगर उसे कोई भी चीज पकड़ा दी जाए तो वह मूल पर जाने की बजाए...तो वह तो जाना नहीं चाहता, मूल पर जाने में उसकी मृत्यु। जो हमारा माइंड है, वह पूरा का पूरा बचना चाहता है कि कहीं ध्यान में न चला जाए। तो कोई भी बचने का अगर उसको थोड़ा सा रास्ता मिल जाए मूल से हटने का, तो तत्काल उसको पकड़ लेता है। और सोचता है पहले इसको पूरा कर लूं, तब तो असली बात करेंगे। अब जब वह यह पूरी कभी होगी नहीं; असली बात होने का कभी प्रश्न नहीं उठेगा।
इसलिए मैंने सख्ती से यह तय किया कि कोई सहयोगी नहीं। बात इतनी ही है करनी। तो इतनी ही बात करनी है। इतना जरूर मेरा अनुभव है कि अगर इसका प्रयोग जारी किया, तो जो-जो चीजें सहयोगी हैं वे धीरे-धीरे अपने आप आती चली जाएंगी। अगर इसका ठीक से प्रयोग किया, थोड़े दिन में आपको पता चलेगा कि श्वास लेने का आपका ढंग बदल गया है; थोड़े दिन में आपको पता चलेगा, आपका सोने का ढंग बदल गया है; थोड़े दिन में आपको पता चलेगा, आपके भोजन का ढंग बदल गया है। यह आपको अचानक पता चलेगा। क्योंकि चित्त जैसे-जैसे शांत होगा, चित्त की अशांति से जो-जो चीजें संबंधित थीं, वे विलीन होने लगेंगी।
जैसे हमारे चित्त की अशांति से हमारा आहार संबंधित है। जितना चित्त अशांत है, उतना मादक, उत्तेजक आहार प्रिय होता है। हम सोचते हैं यह प्रिय होना कोई गलती की बात है। असल में चित्त की अशांति से साथ मादक और उत्तेजक आहार प्रिय होगा। और अगर चित्त को बिना बदले कोई आहार को बदलेगा तो उसे बड़ा त्याग मालूम पड़ेगा कि भारी कष्ट कर रहे हैं, बड़ा त्याग कर रहे हैं। लेकिन अगर चित्त शांत हो जाए, आहार में एकदम परिवर्तन हो जाएगा। अपने से परिवर्तन हो जाएगा।
एक महिला मेरे पास, एक बंगाली महिला अभी आती रही हैं। अविवाहित हैं। मुझे उनकी मां ने आकर बताया कि हमारे बंगालियों में अविवाहित लड़की मांस-मछली छोड़े तो अपशगुन समझते हैं। वह असल में विधवा मांस-मछली छोड़ देती है इसलिए। तो उन्होंने आकर मुझको कहा कि इसने मांस-मछली खाना छोड़ दिया तो हमको तो बड़ी परेशानी हो गई। समाज में बदनामी होगी। तो आपसे हम प्रार्थना करने आए हैं कि इसको कह दें कि यह खाए। तो मैंने कहा कि मैंने तो कभी उसको रोका नहीं कि वह न खाए। इसलिए मैं कोई कहने वाला नहीं हूं कि वह खाए। वह ध्यान करने आती है, ध्यान का यह परिणाम होगा।
उस लड़की को भी मैंने पूछा कि तुमने यह बंद क्यों किया? उसने कहा कि बंद करने का कोई सवाल नहीं है। मुझे आश्चर्य है कि मैं इतने दिन तक खाया कैसे? जैसे-जैसे मन शांत हुआ है, यह बिलकुल फिजूल सी बात मालूम होने लगी। इसको कैसे खाऊं, यह सवाल है? इसको खाने नहीं खाने का तो प्रश्न ही नहीं है।
सभी ढेर घटनाएं घटती हैं। जिन लोगों ने ध्यान का थोड़ा सा प्रयोग किया, उनके आचरण में, व्यवहार में, पच्चीसों बातों में अंतर पड़ना शुरू हो गया। हमारी श्वास जो है चित्त की अशांति के कारण, बार-बार गैर-रिदमिक हो जाती है। अनुभव किया होगा: क्रोध में श्वास का रिदम टूट जाएगा। तीव्र कामवासना में श्वास का रिदम टूट जाएगा। किसी भी उत्तेजना में श्वास का रिदम टूट जाएगा। श्वास कंपती हुई, झटके से और लंबी और छोटी चलने लगेगी। उसमें जो गतिबद्धता है, लयबद्धता है वह विलीन हो जाएगी। वह डिसहार्मोनियस हो जाएगी।
तो चौबीस घंटे में हम इतनी बार उत्तेजित होते हैं कि श्वास कई बार डिसहार्मोनियस होकर शरीर को नुकसान पहुंचाती है। उसके प्रतिकार के रूप में प्राणायाम है कि श्वास को हम लयबद्धता दे दें। यानी इस बीमारी के लिए वह प्रतिकार है। लेकिन अगर चित्त शांत हो जाए तो यह बीमारी ही नहीं होती। उसके, उसके प्राणायाम करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। बीमार होते हैं इसलिए स्वास्थ्य के लिए औषधि लेनी पड़ती है। और अगर हम स्वस्थ हो जाएं तो औषधि व्यर्थ हो जाती है।
मूल बात को ही पक़़ड़ें ध्यान में। और उस पर ही प्रयोग को जारी रखें। धीरे-धीरे जो गौण हैं वे अपने आप दीखने लगेंगे। और सहयोगी हैं वे दिखाई पड़ने लगेंगे। और उनका काम शुरू हो जाएगा। और जो सहयोग-योग पर पहले चिंतन करेगा, वह मूल तक नहीं पहुंच पाएगा। तो मेरी पूरी एम्फेसिस जो है...वह जान कर ही आपको कोई और सहयोग की बात नहीं करता। नहीं तो इतना बड़ा प्रपंच है सहयोग का कि वह उसके धुएं में मूल बात कहां खो जाएगी, पता नहीं।
इतने ग्रंथ हैं। मैं तो हैरान हो गया हूं, जैन-दर्शन पर सैंकड़ों अभी किताबें लिखी गई हैं। उनमें ध्यान पर एक अध्याय भी नहीं है। तो बहुत हैरान हो गया कि वह दर्शन पर और धर्म पर लिखी हुई किताब, उसमें ध्यान पर एक अध्याय भी नहीं है। ऐसी किताब में हमने देखा कि हजार पृष्ठ की किताब है, ध्यान पर दो पन्ने कहीं एक जगह लिखे हुए। बाकी ये सब सहायक हैं। जिनसे, जिनका इतना विस्तार हो गया है, जिन पर इतना ज्यादा वाद-विवाद, इतना उपद्रव है, और वह एक मौलिक बात गौण हो गई।
तपश्चर्या कितनी सहयोगी होगी ध्यान करने में...
एक साधु मेरे पास थे। वह मुझसे कहे कि मैं बड़े उपवास करता हूं। मैंने कहा: जब तक तुम उपवास करते हो तब तक वह तपश्चर्या नहीं है। जब उपवास हो तब वह तपश्चर्या है। तो वह बोले: उपवास कैसे होगा? हम नहीं करेंगे तो होगा कैसे? हम करेंगे तभी तो होगा? मैंने उनसे कहा कि तुम ध्यान का थोड़ा प्रयोग करो, तुम अचानक कभी-कभी पाओगे कि उपवास हो गया। फिर बाद में छह महीने बाद वे मेरे पास आए। हिंदू साधु थे, और उन्होंने कहा कि जिंदगी में पहली दफा एक उपवास हुआ।
मैं सुबह पांच बजे उठ कर ध्यान करने बैठा, उस वक्त अंधेरा था। जब मैंने वापस आंख खोली तो मैं समझा, अभी सुबह नहीं हुई क्या? पूछने पर पता चला, रात हो गई थी। पूरा दिन बीत गया, मुझे न तो समय का पता है, न किसी और बात का। उस दिन भोजन नहीं हुआ। उन्होंने मुझे आकर कहा: एक उपवास मेरा हुआ।
इसको तो मैं उपवास कहता हूं। और हम जो करते हैं, वह अनाहार है। वह उपवास नहीं है। वह भोजन न करना है। यह उपवास है। उपवास शब्द का भी अर्थ है: उसके निकट वास। वह आत्मा के निकट वास है। उस वास में भोजन का स्मरण नहीं आएगा। तो वह तो हुआ उपवास। और एक है अनाहार, कि हम खाना न खाएं, उसमें भोजन-भोजन का ही स्मरण आएगा। वह तपश्चर्या की हुई हुई, वह तपश्चर्या अपने से हुई।
महावीर ने तपश्चर्या की है, इस...बात ही भ्रांत है। या कोई कभी तपश्चर्या करता है? सिर्फ अज्ञानी तपश्चर्या करते हैं। ज्ञानियों से तपश्चर्या होती है। होने का अर्थ यह है कि उनका जीवन, उनकी पूरी चेतना कहीं ऐसी जगह लगी है, जहां बहुत सी बातों का हमें खयाल आता है, वह उन्हें नहीं आता। हम सोचते हैं कि वह त्याग कर रहे हैं। और उनके तईं बात यह है कि उनको स्मरण भी नहीं आ रहा। हम सोचते हैं कि उन्होंने बड़ी बहुमूल्य चीजें छोड़ दीं। हम सोचते हैं उन्होंने बड़ा कष्ट सहा। और वह हमारे मूल्यांकन में भेद है। असल में वैल्युएशन हमारे और उनके अलग हैं।
जिस चीज को महावीर सार्थक समझते हैं, हम उसे व्यर्थ समझते हैं। जिसको वे व्यर्थ समझते हैं, हम सार्थक समझते हैं। तो जब हम उनको, हमारी दृष्टि से सार्थक को छोड़ते देखते हैं तो हम सोचते हैं कितना कष्ट झेल रहे हैं, कितनी तपश्चर्या कर रहे हैं? और उनकी तईं स्थिति बिलकुल दूसरी; जो व्यर्थ है, वह छूटता चला जा रहा है।
महावीर ने घर छोड़ा। हां वह बिलकुल सहज छूट रहा है। तपश्चर्या करनी नहीं है, केवल ज्ञान को जगाना है। जो-जो व्यर्थ है वह छूटता चला जाएगा। दूसरों को दिखेगा कि आप तपश्चर्या कर रहे हैं। और आपको दिखेगा कि आप निरंतर ज्यादा आनंद को उपलब्ध को होते चले जा रहे हैं। दूसरों को दिखेगा, बड़ा कष्ट सह रहे हैं। और आपको दिखेगा कि हम तो बड़े आनंद को उपलब्ध होते चले जा रहे हैं। धीरे-धीरे आपको दिखेगा कि मैं तो आनंद को उपलब्ध हो रहा हूं। दूसरे लोग कष्ट भोग रहे हैं। और दूसरों को यह दिखेगा कि आप कष्ट उठा रहे हैं। और वे आपके पैर छूने आएंगे और नमस्कार करने कि आप बड़ा भारी काम कर रहे हैं।
तपश्चर्या दूसरों को दीखती है, स्वयं को केवल आनंद है। और अगर स्वयं को तपश्चर्या दिखती है तो अज्ञान है, और कुछ नहीं। वह पागलपन कर रहा है। अगर उसको स्वयं को भी दिखता है कि मैं बड़ा तप कर रहा हूं, बड़ी तपश्चर्या, बड़ी कठिनाई—तो वह बिलकुल पागल है। वह नाहक परेशान हो रहा है। और उससे केवल उसका दंभ विकसित होगा। आत्मज्ञान उपलब्ध नहीं होगा।
जो तपश्चर्या करता है: वह दंभी है, वह अहंकारी है। और वह अहंकार का पोषण करता है, जब वह सुनता है कि उसने तीस उपवास किए। और चारों तरफ लोग फूल-मालाएं लिए खड़े हैं। तो जो सुख मिल रहा है—वह इन फूल-मालाओं का, और इन लोगों के आदर का, और सम्मान का है। तपस्वी कहलाने का है। और जिसमें सचमुच तपश्चर्या हुई हो, उसे पता भी नहीं पड़ता कि उसने कुछ किया है। अगर आप उसका सम्मान करने जाएं तो उसे सिर्फ हैरानी भर होती है कि आपको क्या हो गया है? उसे तपश्चर्या का बोध नहीं होता।
तो मेरी दृष्टि में तो एक ही तपश्चर्या है, और वह तपश्चर्या यह है कि जागरूकता को पैदा करें। मूर्च्छा को तोड़ें। चित्त की विकार-विकल्प की स्थिति को विसर्जित करें। निर्विकार, निर्विकल्प समाधि को उत्पन्न करें। और उसके परिणाम में जो-जो परिवर्तन होंगे, वे दूसरों को दिखाई पड़ेंगे कि तपश्चर्या हो रही है।
अब जैसे महावीर का उल्लेख। महावीर को लोगों ने मारा, ठोंका, पीटा। उनको कष्ट दिए। हमको लगता है: यह आदमी कितना सहा! कितना तपस्वी था! लोग मार रहे हैं, और वे सह रहे हैं—हमको ऐसा लगता है। क्योंकि असल में महावीर की जगह हम अपने को रख कर सोचते हैं। अगर लोग हमको मार रहे हैं, और हमको उन्हें न मारना पड़े तो कितना कष्ट होगा? कितनी तपश्चर्या होगी? और जहां तक महावीर का संबंध है, उन्हें केवल यह हैरानी हो रही होगी कि इन बेचारों को कैसी पीड़ा है कि यह मारने पर उतारू हो गए हैं।
एक साधु थे उत्तर प्रदेश में। उनको अनेक लोग मानते थे। बड़े-बड़े राजा-महाराजा उनकी सेवा में जाते थे। किसी राजा ने बहुत से स्वर्ण-पात्र उनको भेंट कर दिए। देवहरवा बाबा उनका नाम था। पूरा का पूरा एक बड़ा बोरा भर कर भेज दिए। तो वहां तो झोपड़े में सांकल भी लगाने को नहीं थी। तो रात को एक चोर उसको उठा कर...। तो देवहरवा बाबा नंगे पड़े रहते थे उस झोपड़े में। उन्होंने अंधेरे में देखा कि कोई उठाने आया है, तो उनको आंसू आ गए। कि बेचारा इतनी रात आया, जरूर तकलीफ में होगा। वह पहली बात उनको जो खयाल में आई, इतनी रात आया! अरे दिन में ही आ जाता। जरूर ज्यादा तकलीफ में है। नहीं तो कौन इतनी रात, ठंडी रात, और इधर आना! इतनी परेशानी, इस पहाड़ी नाले को पार करना, पहाड़ी में आना। अंधेरे में डर भी लगा होगा। रास्ते में दिक्कत भी हो सकती है। और यह बेचारा आया, जरूर तकलीफ में है।
वह बोरा था वजनी, और वह आदमी था कमजोर। तो वह उसको उठाता था, वह पूरा उठता नहीं था। मोह था धन में, उसमें से कुछ छोड़ सकता नहीं था। तो उनको भारी कष्ट होने लगा कि ये बेचारा है कमजोर, और बोरा है वजनी। उस राजा को मैं पहले ही कहा था कि थोड़े ही भेंट कर, इतने क्या करेगा? आज अगर उसने थोड़े ही भेंट किए होते तो यह उसे बड़ी आसानी से ले जाता। और इस मूरख को यह भी पता नहीं कि अपनी ताकत से ज्यादा काम नहीं करना। दुबारा आ जाना। इतनी भी क्या जल्दी है? उन यह, उनको यह भी लगा कि इसको मैं उठ कर सहारा दे दूं। मगर कहीं यह चौंक न जाए, कहीं भाग न जाए, यह भी एक दिक्कत थी। और किसी के काम में अपने को बाधा नहीं बनना चाहिए, यह भी खयाल था। फिर भी जब उनसे नहीं सहा गया तो वह उठे, वह उसको पीछे से उठा रहा था ऊपर, तो उन्होंने उसको हाथ लगाया। उसको दरवाजे के बाहर तक पहुंचाया। बाहर जाकर कहा कि भैया, इससे आगे मैं नहीं जा सकता। अब तू ले जा। लेकिन एक बात भर स्मरण रख—तो वह तो बोरा गिर पड़ा घबराहट में, जब उसने इनकी आवाज सुनी। वह तो हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। इन्होंने उससे कहा: एक बात भर स्मरण रख, हमेशा अपनी ताकत के हिसाब से काम करना। समझे न? बोरा बड़ा है और ताकत तेरी कम है। थोड़ा दूध-मलाई खा, थोड़ा ताकतवर बन। तब बड़े, तब बड़े बोरे उठाया करना। अभी छोटे बोरे, अभी छोटे बोरे ही उठाना ठीक है। वह तो पैर पर गिर पड़ा। वह तो बोरा चोरी नहीं गया। वह तो उनका भक्त हो गया। लेकिन वह घटना बड़ी महत्वपूर्ण है। उस आदमी को कैसे दिखेगा? उसका मूल्यांकन भिन्न है।
जिन लोगों ने महावीर को जाकर मारा होगा, उनको क्या दीखा होगा? उनको दीखा होगा, ये बड़े उद्विग्न हैं, बड़े परेशान हैं। नहीं तो मुझे काहे को मारने आते? परेशानी है इनके भीतर कुछ, जो इनके मारने में प्रकट हो रही है। सिर्फ इस वजह से दया और करुणा भर आई होगी। इस वजह से कोई, कोई और दूसरा प्रश्न नहीं उठता है। हमको लगता है, उन्होंने बड़ा कष्ट सहा। उनको लगा होगा कि यह जो मारने आया है, बड़े कष्ट में है।
तप का, और कष्ट का, और पीड़ा का, और सहने का—ये सारे शब्द गलत हैं। मनुष्य को जो आनंदपूर्ण है उसके अनुसार व्यवहार करता है। हमको जो आनंदपूर्ण है हम उसको मान कर व्यवहार करते हैं। उनको जो आनंदपूर्ण है, वे उसको मान कर व्यवहार करते हैं। और दोनों के आनंद की दृष्टि में जमीन-आसमान का अंतर है। इसलिए जो हमको तप है, वह उनको आनंद है; और जो हमको आनंद है, वह उनके लिए अज्ञान है। वह हम पर दया से भरे हुए हैं कि हम मूर्ख हैं। हम किन चीजों में अपने समय को खो रहे हैं। और हम उनके ऊपर श्रद्धा से भरे हुए हैं कि कितने महान हैं कि बड़ा, बड़ा त्याग कर रहे हैं!
... वह जो समझता है कि मैं बराबर अच्छा करता हूं ...तपश्चर्या करता है?
मैं अभी एक, इलाहाबाद में बड़ा यज्ञ था, वहां गया। वहां उन्होंने सारे संप्रदायों के साधुओं को बुलाया हुआ था। उन्होंने इतना बड़ा मंच बनाया कि उस पर सौ साधु इकट्ठे बैठ सकें। उसने लाख चेष्टा की, हाथ-पैर जोड़े कि सारे साधु एक दफा बैठ जाएं मंच पर। दो साधु एक साथ बैठने को राजी नहीं हुए। क्योंकि कोई किसी से नीचे नहीं बैठ सकता। दो शंकराचार्य मौजूद थे। लेकिन दोनों बैठने को राजी नहीं हुए। क्योंकि दोनों का सिंहासन एक दूसरे से ऊंचा होना चाहिए। आखिर उस सौ आदमियों के मंच पर, सौ बोलने वालों के मंच पर एक-एक आदमी को भाषण करवाना पड़ा। बाकी लोग सुन भी नहीं सके बैठ कर, कि वह अपने शिविर में...बोला आदमी, अपने शिविर चला गया। दूसरा साधु बोला, उसे उसके शिविर में पहुंचा दिया। कोई दो साधु मंच पर इकट्ठे होकर नहीं बैठ सके। तो हैरानी होगी कि मामला क्या है?
अभी पूरे मुल्क में यह दिक्कत है, दो साधु मिल जाएं तो कौन किसको पहले नमस्कार करे—यह दिक्कत है। इसलिए दो साधु मिलना नहीं चाहते कि पहले कौन किसको नमस्कार करे? दो साधु इसलिए भी नहीं मिलना चाहते कि कौन किससे मिलने जाए? आप उनसे मिलने गए थे, या वे आपसे मिलने आए थे? यह बड़ा महत्वपूर्ण है। हमें दीखता नहीं। अन्यथा जो तथाकथित साधु है, इस तरह के कामों में लगा हुआ है। वह इतने दंभ का पोषण करता है जिसका कोई हिसाब नहीं।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
वर्तमान इतनी बात है कि मैं और आप मौजूद हैं, और दुख से भरे हैं। और जिस स्थिति में हैं, उससे तृप्त नहीं हैं। यह एक तथ्य ऐसा है जैसा किसी धार्मिक को विभिन्न सोचने की जरूरत नहीं है। यह वास्तविक तथ्य है। बाकी तो फिर ठीक है, विस्तार है सोचने का। यह वास्तविक तथ्य है कि मैं दुख से भरा हुआ हूं। यह भी वास्तविक तथ्य है कि इस दुख से मैं सहमत नहीं हूं। इसके ऊपर उठना चाहता हूं। तब एक ही बात खोजने की रह जाती है। ऊपर उठना कैसे हो सकता है? बाकी बातें गौण हैं। और बाकी बातों का बहुत मूल्य नहीं है। क्योंकि आप क्या करिएगा सोच कर भी? इससे क्या फर्क पड़ता है? ये थोड़ी सी बातें महत्वपूर्ण हैं। यानी हमारे बहुत चिंतन में से हमको उतनी थोड़ी सी बातें पकड़ लेनी चाहिए जो कि वस्तुतः महत्वपूर्ण हैं।
ओशो, सत्य को कोई पकड़ भी ले, न भी पकड़े; कोई छ: महीने के बाद पकड़ सकता है; कोई अभी शुरुआत कर सकता है; कोई कल कर सकता है तो उसकी शुरुआत कल से हो जाएगी। किसी की नहीं भी होगी, उसका क्या?
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
एक कथा है। बुद्ध शुरू-शुरू में, जब ज्ञान को उपलब्ध हुए तो वह काशी आए। वह काशी के बाहर एक वृक्ष के नीचे ठहरे थे। अकेले थे। उस वक्त कोई भीड़ न थी, कोई संग न था। कोई जानने वाला न था। अभी उन्होंने किसी को उपदेश भी नहीं दिया था। लेकिन ज्ञान उन्हें उपलब्ध हुआ था। और उसका प्रकीर्ण प्रकाश उनसे दिखाई भी पड़ने लगा था। अनुभव लोगों को होने लगा था, कुछ हुआ है। काशी का नरेश संध्या को अपने रथ को लेकर नगर के बाहर निकला था। बहुत चिंतित था। कई भार थे उस पर राज्य के। तो वह सांझ को भ्रमण पर निकला था। सारथी से उसने बीच में एकदम रोक कर कहा कि रोक दो! यह कौन मनुष्य इस वृक्ष के नीचे लेटा हुआ है? बुद्ध, सांझ को सूरज डूबता था, एक वृक्ष से टिके बैठे हुए थे। उसने कहा: रोक दो, यह कौन मनुष्य इस वृक्ष के नीचे लेटा हुआ है? इतना आनंदमय, इतना शांत। और इसके पास कुछ दिखाई भी नहीं पड़ता। थोड़ी देर मैं इससे मिलूं। वह उतर कर बुद्ध के पास गया और उसने कहा: तुम्हारे पास कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता, फिर इतने शांत और निश्चिंत कैसे लेटे हो? मेरे पास तो सब कुछ है लेकिन न निश्चिंतता है, न शांति है। बुद्ध ने कहा: एक दिन तुम जिस स्थिति में हो, मैं भी था। और आज के दिन मैं जिस स्थिति में हूं, चाहो तो तुम अभी उस स्थिति में भी हो सकते हो। मैं दोनों स्थितियों से गुजर गया, तुम अभी एक से गुजरे हो। और अगर मुझे देखो तो तुम्हारा पुरुषार्थ जाग सकता है। अगर तुम मुझे देख कर अपमानित हो जाओ तो तुम्हारा पुरुषार्थ जाग सकता है। और तुम एक सिंह-गर्जना कर सकते हो कि मैं भी होकर रहूंगा।
यानी मेरी धारणा में तो यही बात है कि महावीर, बुद्ध, और कृष्ण, और ईसा—इनको देख कर अगर हम अपमानित हो जाएं तो पुरुषार्थ जाग जाए। लेकिन हम इतने होशियार हैं कि हम अपमानित नहीं होते, उलटा उनका सम्मान करके अपने घर चले आते हैं। उनके पैर में सिर झुका आते हैं। असलियत यह है कि उन्हें देख कर हमें अपमानित हो जाना चाहिए। कहीं हमारे भीतर यह आकांक्षा जग जानी चाहिए, कि अगर इनको उपलब्ध हो सका तो मैं...। लेकिन इससे बचने के लिए कि हमारा पुरुषार्थ न जगे, हम कहेंगे कि—वे भगवान हैं, वे तीर्थंकर हैं, वे अवतार हैं, उनको हो सकता है। हम साधारण-जन हमको कैसे होगा? ये तरकीबें हैं। ये हमारे हिसाब कि हम बच जाएं तो उनको अवतार, उनको तीर्थंकर, उनको भगवान कह कर छुटकारा पाते हैं कि हम साधारण-जन, आप ठहरे भगवान! आप हैं विशिष्ट, आप कर सकते हैं, हम कैसे करेंगे?
और एक बहुत बहुमूल्य पुरुषार्थ के जागने का अवसर हम तीर्थंकर कह कर खो देते हैं। उन्हें अति सामान्य मानने की जरूरत है, जैसे हम हैं। लेकिन उसमें हमको बहुत दुख होगा। उसमें हमें बहुत आत्मग्लानि होगी। अगर हम महावीर को भी अति सामान्य मानें, कि वह भी ठीक हमारे जैसे हैं तो फिर हमें बहुत आत्मग्लानि होगी, कि फिर हम क्या कर रहे हैं? अगर वे भी हमारे जैसे हैं, और इस स्थिति को पा सके, तो फिर हम क्या कर रहे हैं बैठे हुए? यह आत्मग्लानि न हो, इसलिए हम उनको कहते हैं कि तुम तीर्थंकर हो, तुम भगवान हो और हम साधारण-जन हैं।
हम पूजा ही कर सकते हैं, हम कुछ और नहीं कर सकते। यह सेल्फ-डिसेप्टिव जो हमारा दिमाग है, वे उसके खोजे हुए रास्ते हैं ये सारे सिद्धांत: तीर्थंकर के, अवतार के, भगवान के, फलां के, ढिकां के। सच बात यह है कि वे ठीक हमारे जैसे लोग हैं। एक दिन, और फिर एक दिन अचानक हमारे जैसे नहीं रह जाते हैं। वह जो क्रांति उनमें घटित होती है, वह हममें भी घटित हो सकती है अगर हम उनको सामान्य मान लें। और चेष्टा की—महावीर, बुद्ध ने पूरी चेष्टा की कि उनको एक सामान्य आदमी आप मान लें। इसलिए ईश्वर से इनकार किया। ईश्वर के अवतार से इनकार किया। बाकी हम बहुत होशियार हैं, हमने नये शब्द खोज लिए, कि न सही अवतार, तीर्थंकर सही; न सही तीर्थंकर, बुद्ध सही—मगर हो भगवान, हम तुम्हें पूजेंगे। पुरुषार्थ के जागरण का कुल अर्थ इतना ही है: कुछ हममें प्रसुप्त है, कोई एक शक्ति प्रसुप्त है हममें, जो अगर जाग सके, अगर हम उसे पुकार सकें तो वह शक्ति हमारे भीतर इस क्रांति को घटित कर सकती है। और न पुकारें उसको, तो चलता है जीवन। चलता चला...।
बाकी एक्सप्लेनेशंस कोई खोजना मुझे रुचिकर नहीं है। वास्तविक तथ्यों को पकड़ लें कि ये तथ्य हैं हमारे सामने। हम दुखी हैं, यह एक तथ्य है। पीछे जन्म था या नहीं, यह कोई तथ्य नहीं है। आगे जन्म होगा या नहीं, यह कोई तथ्य नहीं है। तथ्य यह है कि मैं दुखी हूं। और यह भी एक तथ्य है कि दुख से ऊपर उठने की मेरी आकांक्षा है। तब एक बात ही रह जाती है कि—दुखी हूं, दुख से ऊपर उठने की आकांक्षा है। तो दुख से ऊपर उठने का उपाय खोज लूं। इससे ज्यादा और कोई अर्थ की बात नहीं है। और अर्थ—फिर तब पांडित्य है, फिर बहुत शास्त्र हैं। और उनको मजे से पढ़ा जा सकता है, और उनका अध्ययन किया जा सकता है। और ढेर साधु हैं जो उनकी व्याख्याएं समझा सकते हैं। और उससे चलता है, उससे कोई, उससे कुछ होता नहीं।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
मेरी धारणा तो यह है कि जो भी सद्धर्म को उपलब्ध होता है और सद्धर्म के संबंध में बोलता है, वह तीर्थंकर है। मेरी बात कह रहा हूं मैं। जो भी सद्धर्म को उपलब्ध होता है, और अगर नहीं बोलता उसके संबंध में, तो तीर्थंकर नहीं है, केवल सद्धर्म को उपलब्ध है। केवल ज्ञानी है। और यह जो बोलना और न बोलना है, बोलना न बोलना है, तो मेरी दृष्टि में इस भांति सोचने पर लाखों तीर्थंकर हैं जगत में। हमेशा हुए हैं, हमेशा होंगे। और उसमें उन सबको गिन लेता हूं: जो कभी भी, जिसने कभी भी स्वयं सत्य को उपलब्ध होकर सत्य के संबंध में किसी को भी कहा हो, उस दिशा की तरफ कोई भी इंगित किया हो—चाहे एक को ही किया हो, तो भी वह तीर्थ का प्रवर्तन करता है।
और यह भी करना नहीं है उसकी तरफ से कुछ। जैसे यह उपलब्ध होता है, वैसे ही बहुत सहज, सहज प्रेरणा, बहुत सहज भाव से उस अनुभूति को दूसरों से कहने की उसको हो जाती है। इसमें कुछ चेष्टित नहीं है कि इसको, वह कोई जाकर और चेष्टा करके और विचार करके, योजना करके किसी को कहता हो। यह लगभग ऐसा ही है कि अगर मेरे हृदय में परिपूर्ण प्रेम भर गया है, अगर सतत चौबीस घंटे मेरी चेतना प्रेम से भर गई है तो मेरे करीब जो भी आएगा उसको मैं प्रेम के सिवाय कुछ दे नहीं सकूंगा।
एक राबिया नाम की मुसलमान फकीर स्त्री हुई है। कुरान में कहीं एक वचन है: शैतान को घृणा करने के संबंध में। राबिया ने वह वचन काट दिया। कुरान में किसी तरह का संशोधन करना बहुत कुप्रीति, बहुत पाप की बात है। और यह तो हद पाप की बात थी कि उसमें किसी वचन को कोई काट ही दे। एक बायजीद नाम का फकीर उसके घर ठहरा था। उसने सुबह-सुबह कुरान पढ़ने को मांगी। यह देख कर कि वचन कटा हुआ है, बहुत हैरान हुआ। उसने कहा कि यह...सुधार किसने किया है इसमें! यह कौन नासमझ, जो कुरान में भी सुधार करता है? राबिया ने कहा कि मैंने खुद ही किया है। बायजीद तो दंग हो गया कि तुम पागल हो! राबिया ने कहा कि जब से मेरा हृदय शांत हुआ, उसमें घृणा है ही नहीं, तो अब मैं शैतान को घृणा कैसे करूं? शैतान भी मेरे सामने खड़ा हो जाए तो मैं जितना प्रेम ईश्वर को कर सकती हूं, उतना ही उसको कर सकती हूं। क्योंकि वह मेरे भीतर रहा नहीं। अब मैं प्रेम और घृणा करती नहीं, मैं प्रेम से भर गई हूं—तो प्रेम ही होता है। जो ज्ञान से भर गया है, उसे सहज ज्ञान प्रकीर्ण होगा।
हम भी अज्ञान को प्रकीर्ण करते हैं। अगर हम इसको समझ लें, तो हम ज्ञानी के ज्ञान के प्रकीर्ण करने को भी समझ लेंगे। हमको पता न भी हो कि आत्मा क्या है? तो भी हम बताने को जरूर किसी को मिल जाएंगे। और उसको बताएंगे कि आत्मा यह है, और धर्म यह है। हम अज्ञान को प्रकीर्ण करते हैं। अज्ञान को फैलाते हैं। वैसे ही एक स्थिति ज्ञान की—जब व्यक्ति उपलब्ध हो जाता है, तो सहज जैसे हम अज्ञान को फैलाते रहते हैं, वैसे सहज वह ज्ञान को फैलाने लगता है। तो उसमें कोई चेष्टित नहीं है। जगत में जितने लोगों ने भी धर्म को उपलब्ध करके उसके संबंध में किसी को भी इशारा किया हो, तो ये सारे लोग मेरे लिए तीर्थंकर हो जाते हैं। तो यह मेरी अपनी बात कह रहा हूं। परंपरागत जैसा जैन सोचते हैं, उनका हिसाब वैसा है।
ज्ञान क्या है?
हां, उसकी बात करता हूं पूरे वक्त में। नहीं, इतना ही...मैं, मैं जो पूरी बात करता हूं, मेरे लिए तो दो स्थितियां हैं हमारी। ज्ञान की एक स्थिति वह है: जब हम कुछ जानते हैं। जैसे मैं ज्ञान से इस वस्तु को देख रहा हूं, ज्ञान से आपको देख रहा हूं। ज्ञान से जब मैं किसी को जानता हूं, ज्ञानपूर्वक किसी न किसी को जान रहा है। यह ज्ञान की मिश्रित स्थिति है। इसमें ज्ञान भी है, ज्ञाता पीछे छिपा है। और ज्ञेय सामने खड़ा हुआ है। मैं हूं जानने वाला, वह पीछे छिपा है। आप, जिसको मैं जान रहा हूं मेरे सामने खड़े हैं, और दोनों के बीच का जो संबंध है, वह ज्ञान है।
अगर ठीक से इस बात को समझें तो जब ज्ञेय पता नहीं चलेगा, तो ज्ञाता भी पता नहीं चलेगा। क्योंकि वह अंतर-संबंधित था। तो ज्ञेय था, इसलिए हम उसे ज्ञाता कहते थे। जब ज्ञेय कोई भी नहीं रहा, तो उसे ज्ञाता भी नहीं कहेंगे। तब मात्र ज्ञान का अनुभव होगा। केवल मात्र ज्ञान है, इसका अनुभव होगा। उस केवल मात्र ज्ञान के अनुभव को केवल ज्ञान कहा है। केवल ज्ञान की शक्ति भर का बोध होगा। न कोई जान रहा है, न कोई जाना जा रहा है, केवल जानने की क्षमता का स्पंदन हो रहा है। प्योर कांशसनेस भर रह गई है। किसी चीज के प्रति कांशस नहीं है। कोई कांशस नहीं है, केवल प्योर कांशसनेस रह गई है।
यह प्योर कांशसनेस समाधि में भी अनुभव होगी। लेकिन समाधि में यह थोड़ी देर टिकेगी और विलीन हो जाएगी। अगर यह सतत चौबीस घंटे अनुभव होने लगे तो केवल ज्ञान हो जाएगी। केवल ज्ञान की जो प्राथमिक अनुभूतियां हैं, वे समाधि में मिलनी शुरू होंगी। और जब समाधि पूरे चौबीस घंटे पर फैल जाएगी तो वह केवल ज्ञान हो जाएगा।
ज्ञान मात्र का शेष रह जाना, ज्ञाता और ज्ञेय दोनों का मिट जाना है। अभी हमको एकदम से दिक्कत होगी कि वह ज्ञान मात्र कैसे रह जाएगा? क्योंकि अभी तो हम जब भी जानते हैं ज्ञान को, तब किसी को जान रहे हैं। अभी मैं केवल कह सकता हूं। लेकिन अगर ध्यान का प्रयोग चले, और किसी दिन समाधि में लगेगा कि अकेला मैं ही रह गया था। केवल ज्ञान मात्र रह गया था। न कोई जान रहा था, ना कोई जाना जा रहा था—केवल ज्ञान था। केवल एक कांशेसनेस भर रह गई थी। उस वक्त पहला अनुभव मालूम होगा, जो कि सूचना देगा कि मात्र ज्ञान के अकेले रह जाने का क्या अर्थ है।
तो कुछ बातें ऐसी हैं, कि शब्द तभी उनको बता पाते हैं जब साथ में अनुभूति भी हो। और सच तो यह है कि हमारे सामान्य जीवन के भी शब्द जब अनुभूति हो, तभी कुछ बता पाते हैं। जैसे मैंने कहा: किवाड़, तो मेरा शब्द आपको कुछ सूचना दे पाता है, क्योंकि आप भी किवाड़ को जानते हैं। अगर आप किवाड़ को नहीं जानते तो शब्द तो मेरा आपके कान में गूंजेगा—किवाड़, लेकिन कोई अर्थ बोध नहीं होगा। शब्द अर्थ नहीं देता। अर्थ तो स्वयं की, उसी वस्तु की सामान्य अनुभूति से आता है। मैंने कहा: किवाड़, अगर आप भी किवाड़ से परिचित हैं तो मेरा शब्द सार्थक हो जाएगा। और मैंने कहा: किवाड़, और आप किवाड़ से परिचित नहीं हैं, तो मेरा शब्द केवल ध्वनि रह जाएगा, उसमें अर्थ नहीं होगा।
तो सामान्य जीवन में भी शब्द तभी बोधपूर्ण होते हैं जब उनकी सामान्य अनुभूति होती है। धर्म के जीवन में दिक्कत है। वहां शब्द ही गूंजते रह जाते हैं। मैंने कहा: आत्मा ध्वनि है, शब्द नहीं है यह। जब तक कि वहां भी अनुभूति न हो, तब तक यह केवल ध्वनि है। इससे कुछ बोध नहीं होता कि—क्या? एक कान पर शब्द गूंजता है—आत्मा, और विलीन हो जाता है। अर्थ तो इसमें तब आएगा, जब थोड़ी सी अनुभूति भी दूसरी तरफ आएगी।
कबीर से एक मुसलमान फकीर फरीद मिला था। फरीद निकला था यात्रा को। कबीर उन दिनों मगहर काशी के पास रहते थे। जब वह करीब से निकला तो कबीर के भक्तों ने कहा कि ऐसा करें कि फरीद को दो दिन रोक लें। तो आप दोनों में चर्चा होगी तो हमें बड़ा आनंद आएगा। कबीर बोला कि तुम चाहो तो रोक लो, चाहो तो आनंद भी ले लेना, चर्चा शायद ही हो। वे समझे कि कबीर ने यह मजाक में कहा है। फरीद के भी शिष्य जो उसके साथ जा रहे थे, उन्होंने कहा कि बड़ा भला हो कि दो दिन कबीर का आश्रम पड़ेगा, वहां रुक जाएं। आपकी चर्चा होगी, हमको बड़ा आनंद होगा। उसने कहा कि तुम चाहो तो रुक जाओ, आनंद भी शायद तुम्हें हो, लेकिन चर्चा शायद ही हो। ये जब भक्त मिले, तो दोनों ने कहा कि ऐसा-ऐसा कहा था। वे दोनों मिले, दोनों गले मिले, दोनों खूब हंसे। दो दिन रहे, लेकिन अदभुत कथा है कि दोनों कुछ बोले नहीं। दो दिन बाद कबीर विदा भी कर आए गांव के बाहर, दोनों गले मिल लिए, लेकिन वह बातचीत हुई नहीं। दोनों के भक्त बहुत परेशान हुए और उन्होंने लौट कर पूछा कि हम तो थक गए दो दिन राह देख कर, वे कुछ तो बोलते? कबीर ने कहा: बोलते क्या? जो वे जानते हैं, वह मैं जानता हूं। फरीद ने भी कहा: जो वे जानते हैं, वह मैं जानता हूं। अनुभूति बिलकुल सामान्य एक, एक सी है। बोलने को कुछ है नहीं।
यही धार्मिक जीवन की अदभुत बात है कि अगर अनुभूति बिलकुल एक सी हो जाए आत्मिक-जीवन की, तो बोलने को कुछ नहीं रह जाता। और जब तक अनुभूति एक सी नहीं, तब तक जो बोला जाता है वह कोई अर्थ नहीं देता। तब तक बोला जा सकता है, लेकिन अर्थ नहीं होता। और जब अनुभूति एक सी हो जाए तो बोलने को कुछ नहीं रह जाता—तब अर्थ मिल सकता है। तब जिसे हम कहें, केवल ज्ञान। तो कुछ समझाया जा सकता है। लेकिन समझाने से कुछ बोध होता होगा बहुत, यह नहीं पकड़ में आता। इसलिए हमको अक्सर लगता है कि तृप्ति तो नहीं हुई उस बात को समझने से। तृप्ति नहीं होगी। तृप्ति तो उस दिन होगी, जब थोड़ी सी झलक उस बात की मिल जाए जब केवल ज्ञान मात्र रह गया है।
तो मैंने तो यह अनुभव किया, धीरे-धीरे मैं यह कहना भी शुरू किया कि ग्रंथ—जो धर्म के हैं, वे साधना के बाद पढ़ें तो उनमें कुछ आनंद आएगा। साधना के पूर्व पढ़ें, उनमें कोई आनंद उपलब्ध नहीं होगा। थोड़ी साधना हो तो कई शब्द इतने अर्थपूर्ण हैं कि साधना उनके अर्थ को खोल देगी। तब एक-एक शब्द आपको अनुभूति को खोलता हुआ मालूम होगा। मेरी तो धारणा विपरीत सी है। मेरा तो मानना ही यह है कि योग के जितने ग्रंथ हैं, वे साधक के पढ़ने के नहीं हैं। वे सिद्ध के पढ़ने के हैं। हालांकि तब पढ़ने की कोई जरूरत नहीं रह जाती, पढ़ें या न पढ़ें। लेकिन सिद्ध के पढ़ने के हैं। और वे केवल पहचानने के लिए हैं कि जो मुझे मिला उसको पुराने सिद्धों ने क्या नाम दिए? इससे ज्यादा कोई मायने नहीं हैं।
हर परंपरा शब्द देती है। जैसे जैनों की परंपरा है, बौद्धों की, हिंदुओं की, योगियों की परंपराएं हैं। हर परंपरा शब्द देती है। जब पहली दफा साधक को समाधि का अनुभव होता है तो उसे कुछ नहीं सूझता इसको मैं क्या कहूं? कुछ कहने को शब्द होते ही नहीं।
समझ लीजिए कि मैं इस घर में आया और मैंने पहली दफा कोई चीज इस कमरे में रखी देखी तो मैं उसे देखूंगा जरूर, अनुभव जरूर करूंगा। लेकिन शब्द क्या दूं? शब्द तो परंपरा से दिए जाते हैं। तो जब पहली दफा व्यक्ति आत्म-साक्षात करेगा तब उसको समझ में नहीं आता, क्या शब्द दूं? तो अगर वह बौद्ध की परम्परा में पला है तो उसके ग्रंथ उसको बताएंगे कि इसको क्या नाम देना है? अगर वह जैनों की परंपरा में पला है तो उसकी परंपरा के ग्रंथ बताएंगे कि इस अनुभूति को क्या नाम देना है? उसमें, ग्रंथों में लक्षण भी दिए हुए हैं, नाम भी दिए हुए हैं। लक्षण उसको सूचना देंगे कि ठीक यह बात घट गई है, और नाम उसे मिल जाएगा।
परंपराएं केवल नाम देती हैं, ज्ञान नहीं देतीं। ज्ञान अनुभव से आता है। नाम परंपरा से मिल जाते हैं। और उलटी हमारी स्थिति है, हम पहले नाम पढ़ लेते हैं। ज्ञान-व्यान तो आता नहीं, वे नाम सीख जाते हैं। और फिर उन्हीं में से हम प्रश्न पूछते रहते हैं और जिंदगी भर उलझते रहते हैं कि—वह क्या है? और फलां क्या है, ढिकां क्या है—उससे कुछ हल नहीं होता। बिलकुल फिकर छोड़ दें नामों की, शब्दों की, सिद्धांतों की—कोई चिंता न करें। एक ही चिंता करें कि मेरे भीतर कुछ घटित हो जाए।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
हम असल में चौबीस घंटे जो भी जान रहे हैं, जो वास्तविक है उसको नहीं जान रहे। जो स्मृति का संकलन है उसके माध्यम से उसकी व्याख्या कर रहे हैं। इस स्मृति के माध्यम से हम उसकी व्याख्या कर रहे हैं—जो ज्ञेय है। इसलिए हम ज्ञेय को भी नहीं जान रहे। बीच में स्मृति का पर्दा है, अगर आप कल मुझे गाली दे गए और आज फिर मिलने आए हैं, तो मैं जानता हूं यह दुष्ट कहां से आ गया? हो सकता है आप क्षमा मांगने आए हों। हो सकता है आप कहने आए हों कि कल भूल हो गई। हो सकता है आप कहने आए हों, कल मैं होश में नहीं था। बेहोश था, शराब पीए था। लेकिन मैं यह सोच रहा हूं कि यह सज्जन कहां से आ गए हैं? और मेरे बीच वह कल का पर्दा आपका खड़ा हो जाएगा, मैं आपके चेहरे को नहीं देखूंगा जो अभी मौजूद है। मैं उस चेहरे को बीच में पहले देखूंगा जो कल मौजूद था।
स्मृति ज्ञेय के और ज्ञाता के बीच में हमेशा खड़ी है। इसलिए हम ज्ञेय को भी नहीं जान पाते। और स्मृति का जो संकलन है, उसी को हम ज्ञाता समझ लेते हैं। जो भ्रम होता है: ज्ञेय को हम नहीं जान पाते, स्मृति बीच में आ जाती है। और स्मृति का जो संकलन, जो एकुमुलेशन है मेमोरी का, हम समझ लेते हैं—यही मैं जानने वाला हूं।
जैसे अगर कोई आपसे पूछे: आप कौन हैं? तो आप क्या बताइएगा? आप कुछ स्मृतियां बताइएगा। मैं फलां का लड़का हूं, यह एक स्मृति है। तीस साल में मैंने ये-ये अनुभव लिए, उनमें से कुछ बताएंगे। इतना पढ़ा हूं, यहां नौकरी करता हूं, यहां ये हूं, यहां वह हूं—ये सारी आपकी मेमोरीज हैं तीस वर्ष की। इनका एकुमुलेशन आप हैं। इसलिए कभी-कभी यूं होता है कि किसी चोट से अगर स्मृति विलीन हो जाती है, उससे पूछिए कि आप क्या हैं? तो वह खड़ा रह जाता है। उसको याद ही नहीं पड़ता कि कोई स्मृति हो।
थोड़ी देर आप कल्पना करिए कि अगर आपकी स्मृति पोंछ दी जाए, और आपसे फिर पूछा जाए, आप क्या हैं? तो आप खड़े रह जाएंगे। आपको कुछ उत्तर नहीं सूझेगा कि मैं क्या हूं? क्योंकि आप जो भी उत्तर देते हैं, वह स्मृति से है। स्मृति का जो संग्रह है, उसी को हम समझ लेते हैं—मैं हूं।
स्मृति ज्ञेय को भी नहीं जानने देती, स्मृति का संग्रह ज्ञाता को भी नहीं जानने देता। स्मृति के पीछे ज्ञाता छिपा हुआ है, और स्मृति के आगे ज्ञेय बैठा हुआ है। बीच में स्मृति की धारा है, उस तरफ ज्ञेय है; इस तरफ ज्ञाता है, बीच में मेमोरी है। मेमोरी न ज्ञेय को जानने देती है, न ज्ञाता को जानने देती है। अगर मेमोरी का, स्मृति का विसर्जन हो जाए तो मैं ज्ञेय को पहली दफा देखूंगा। और पहली दफा इंसटेंटिनियस।
अलग-अलग घटना नहीं घटेगी यह, क्योंकि ज्ञाता और ज्ञेय साथ ही जाने जाएंगे। जिस क्षण मैं ज्ञेय को देखूंगा, उसी क्षण ज्ञाता भी। यह अलग नहीं जाने जाएंगे, दोनों एक साथ। दोनों एक साथ अनुभव होंगे। और वह साथ होना इतना गहरा होगा कि मुझे ऐसा नहीं मालूम होगा कि ज्ञेय अलग, ज्ञाता अलग। मुझे असल में ज्ञान का अनुभव होगा। मुझे केवल कांशसनेस का अनुभव होगा। अगर मेमोरी विसर्जित हो जाए तो केवल ज्ञान का अनुभव होगा। जो हम कहते हैं: महावीर ने या किन्हीं और ने अपने समस्त पुराने कर्मों से अपना छुटकारा पा लिया। तो मैं पाता हूं कि कर्म असल में सिवाय स्मृति के और कुछ भी नहीं। कर्म-बंध का अर्थ स्मृति-बंध है। कर्म-बंध का अर्थ है मेमोरी। वह जो हम कहते हैं, कर्म चिपक जाते हैं। कर्म नहीं चिपकता, केवल स्मृति चिपक जाती है। किए हुए की स्मृति चिपक जाती है; किए हुए का संसार चिपक जाता है।
जिसको महावीर निर्जरा कह रहे हैं, वह असल में डीमेमोराइज्ड...एक ही बात है। कुछ भी कह सकते हैं। इम्प्रेशंस जो हैं, वे संस्कार कह लें, स्मृति कह लें। क्योंकि हम स्मृति उसको कहते हैं जो हमको याद है। और अनेक संस्कार हममें ऐसे हैं जो हमको याद नहीं हैं। लेकिन जो याद नहीं है, वह भी हमारे अचेतन में मौजूद है। और सब याद किए जा सकते हैं। मैं अभी वहां प्रयोग किया, तो आपको पिछले जन्म याद दिलाए जा सकते हैं। एक पूरी स्मृति की धारा याद हो जाएगी आपको। एक-एक पर्दा भीतर मौजूद है, उघाड़ा जा सकता है। और आपको फिल्म की तरह सब दौड़ने लगेगा—यह हुआ, यह हुआ, यह हुआ।
और अगर आपकी सारी स्मृति उघाड़ दी जाए तो आप हैरान होंगे कि एक दफा जो संस्कार पड़ा है चित्त पर, वह मौजूद है। सब संस्कार स्मृति हैं। और सच तो यह है कि अगर मैं आपसे अभी पूछूं कि उन्नीस सौ पचास में एक जनवरी को आपने क्या किया? आपको कुछ याद नहीं है। तो आप कहेंगे, इसकी तो विस्मृति हो गई। इसकी विस्मृति नहीं हुई, यह अभी मौजूद है। और मैं अभी आपको बेहोश करूं, हिप्नोटाइज्ड करूं, और आपसे पूछूं तो आप एक तारीख को ऐसे दोहरा देंगे जैसे अभी देख रहे हैं।
मैं कुछ दिन प्रयोग करता था तो मैं बहुत हैरान हुआ, वह तो कुछ भूलते ही नहीं हैं। फिर मुझे यह दिक्कत हुई कि पता नहीं एक तारीख को आपने किया या नहीं, या बेहोशी में आप कुछ भी अनर्गल बोलते हैं। फिर मैं कुछ लोगों पर नियमित रूप से ध्यान रखा। उनसे आज मिला तो नोट कर लिया कि उनसे मेरी क्या बात हुई थी? वे क्या कर रहे थे? छह महीने बाद उनको बेहोश करके पूछा, वह तो उन्होंने बताया कि आप दो बजे मिले थे और यह-यह मुझसे कहा था। होश में तो उनको पता ही नहीं कि आप उस दिन मिले भी थे, या नहीं मिले थे।
फिर मैं धीरे-धीरे पिछले जन्मों में भी प्रयोग किया। आप हैरान होंगे, मां के गर्भ में भी आप पर जो संस्कार पड़े हैं, वे स्मरण दिलाए जा सकते हैं। जिस क्षण कंसेप्शन हुआ मां के पेट में आपका, वह संस्कार भी स्मरण दिलाए जा सकते हैं। फिर धीरे से उस पार, उस जन्म के जो संस्कार हैं, वे भी स्मरण दिलाए जा सकते हैं। सारे जन्म-मरण की पूरी कथाएं स्मरण आ सकती हैं। वे सब मेमोरी हैं।
और अगर मेमोरी से कोई बिलकुल मुक्त हो जाए, तो वह निर्जरा है। अगर ये सारी मेमोरीज झड़ जाएं, और इनसे व्यक्ति पृथक हो जाए, और जान ले कि मैं इन मेमोरीज में नहीं हूं; इनके बाहर और अलग हूं। और अगर यह कंडीशनिंग जो मेमोरी से पैदा हुई है, यह सब विसर्जित हो जाए—तो मोक्ष है। स्मृति से मुक्त होना मोक्ष है, और स्मृति में घूमना संसार है। उस स्मृति के विसर्जन में जो भी है, वह दिखेगा। स्मृति के विसर्जन में चैतन्य का जागरण है। इसके प्राथमिक प्रयोग विचार के विसर्जन से शुरू होंगे, क्योंकि स्मृति भी केवल विचार के प्रवाह का अंत है। और कोई खास बात नहीं है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
जगत एक इटरनल नाव है। एक इटरनिटी है, जो प्रत्येक क्षण...पूरा जगत एक सतत प्रवाह है, एक्चुअल जगत जो है। हां, हमारी स्मृति में अतीत, वर्तमान और भविष्य होते हैं। इसलिए टाइम जो है, समय जो है, वह केवल मेमोरी से पैदा हुई चीज है। टाइम कहीं है नहीं। पे्रजेंट जो है, वह मेमोरी के हिस्से हैं। वह मेमोरी के हिस्से हैं। इसलिए जिसकी मेमोरी चली जाएगी, वह टाइमलेसनेस में चला जाएगा। उसे टाइम का पता नहीं रहेगा।
इसलिए लोगों ने कहा: समाधि जो है, वह समयातीत है। समय के बाहर है, कालातीत है। वह काल के बाहर है। समाधि में समय नहीं है, काल नहीं है, क्षेत्र नहीं है—केवल होना मात्र है। स्मृति में जो सीक्वेंस है—कुछ चीजें पहले हैं, कुछ चीजें बाद में हैं, कुछ चीजें आगे हैं। उसकी वजह से, उस सीक्वेंस की वजह से टाइम बनता है। अगर सारी मेमोरी विलीन हो जाए, थोड़ी देर को समझिए: आपकी सारी मेमोरीज अगर विलीन हो गई, तो पहले आपका जन्म हुआ और बाद में मृत्यु हुई, यह आपको पता नहीं चल सकता। बहुत अजीब सा लगेगा अगर सारी मेमोरीज विलीन हो गई, तो आपका जन्म पहले हुआ और मृत्यु बाद में हुई, ऐसा नहीं कहा जा सकता। शायद उस मैमोरीलेस स्थिति में ये घटनाएं, साइमलटेनियस में ये घटनाएं हुईं ही नहीं। आपको पता ही नहीं पड़ेगा कि कब आप जन्मे, कब आप मरे। क्योंकि कब जो है—आगे और पीछे का संबंध—वह स्मृति का है।
स्मृति विलीन हुई तो कब आगे-पीछे विलीन हो गया, सीक्वेंस विलीन हो गया...इसलिए बहुत अदभुत बात जो मुझे दिखाई पड़ने लगी, महावीर पच्चीस सौ साल पहले मुक्त हुए हैं। और आप अभी मुक्त हो जाएं। तो हमको लगता है कि पच्चीस सौ साल बाद मुक्त हुए। लेकिन कांशसनेस का जो जगत है, वहां दोनों साइमलटेनियस मुक्त हो रहे हैं। एक ही साथ मुक्त हो रहे हैं। पर यह बात तो अजीब सी होगी, इसका कोई मान्य नहीं होगा दिखने में ऊपर से। यह हमारी मेमोरी है जो पच्चीस सौ साल आगे-पीछे करती है। चैतन्य के जगत में सब एक साथ मुक्त हो रहे हैं, और एक साथ बद्ध। वहां कोई समय नहीं है, वहां कोई आगे-पीछे नहीं है। हां, वह एडजस्ट टूगेदर।
ओशो, आदमी जब मैड हो जाता है, उसकी क्या हालत होती है?
इसलिए पागल में और मुक्त में करीबी अनुभव में एक सी कुछ बातें मालूम होंगी। एक में सिर्फ पीछे के अनुभव रह गए हैं। वर्तमान के कोई अनुभव नहीं पैदा हो रहे। वह भी हमको पागल लगेगा। क्योंकि वर्तमान से उसकी कोई संगति नहीं है। और मुक्त और सिद्ध भी हमको कुछ न कुछ पागल प्रतीत होगा। क्योंकि न उसमें अतीत के कोई स्मरण रह गए हैं, न भविष्य के, न वर्तमान के। उसमें भी हमें थोड़े से पागलपन की झलक मालूम होगी।
इसलिए सारे साधुओं को, सारे संतों को हम चाहे कितना ही आदर दें, हमको यह थोड़ा बहुत शक बना ही रहता है कि ये कुछ पागल तो नहीं हैं। हमारा जो भाव है, वह कहीं न कहीं उनके पागल होने का बना रहता है। और कहीं किसी किनारे पर वे पागल के करीब मालूम होते हैं। उनकी आंख में भी वही वैक्यूम दिखाई पड़ेगा जो पागल की आंख में दिखाई देता है—वही वैक्यूम। वही आपको देखते हुए भी जैसे आपको नहीं देख रहे हैं, वही बात है। आपसे बोलते हुए भी जैसे आपसे नहीं बोल रहे हैं, वही बात है। आपके बिलकुल करीब होकर भी जैसे आपसे दूर हों, वही बात। आंख में वैक्यूम मालूम होगा, जैसे आपका कोई प्रतिबिंब उनकी आंख में नहीं बन रहा। आपकी वह कोई मैमोरी नहीं पकड़ रहे हैं।
इसलिए बड़े से बड़े सिद्ध की आंख में झांक कर आपको जो पहला अनुभव होगा, वह पागल का होगा। तो उसकी आंख में जो अनुभव होगा, वह पागल का होगा। तो एक थो़ड़ी सी दोनों में करीबी बात है। दोनों में स्मृति का एक, संबंध एक सा हो गया है। एक की स्मृतियां टूट गई हैं, विक्षोभ के कारण। उसके पहले जितनी बनीं हैं, वे विक्षुब्ध उसमें तैर रही हैं। उसका सब जीवन असंगत हो गया। एक में स्मृतियां टूट गई हैं, अविक्षुब्ध शांति के कारण। उसमें भी कुछ लहरें नहीं उठ रही हैं। एक में विक्षोभ के कारण सब टूट खंडित हो गया है; एक में शांति के कारण सब खंडित हो गया है। दोनों बिलकुल अलग कोनों पर खड़े लोग हैं। लेकिन दोनों में एक बात कहीं कुछ समान है। इसलिए भक्त उनको, जिनका भक्त है, उसको साधु समझ लेते हैं—सिद्ध। और गैर-भक्त उसको पागल भी समझते रहते हैं तो कोई अंतर नहीं पड़ता।
(ध्वनि मुद्रण अस्पष्ट)
बहुत फर्क है, फर्क बहुत है। फर्क इतना ही है कि हिप्नोटिस्ट जो है, सम्मोहित जो कर रहा है, इस सम्मोहन में भी घटना करीब-करीब वैसी घट रही है जैसे स्वयं ध्यान करने पर घटी। करीब-करीब वैसे ही। इसमें भी सूक्ष्म शरीर बाहर निकाला जा सकता है, भेजा जा सकता है, देखा जा सकता है। लेकिन यह दूसरे के द्वारा इनड्यूस्ड है, और जबरदस्ती है, और फोर्स्ड है। यह दूसरे के द्वारा आपमें की गई घटना है।
जागरूकता में जब कुछ होता है स्वयं के भीतर तो आप अपने जगत और जीवन के रहस्य के कुछ नए तथ्यों से परिचित होते हैं। वह परिचय आपको आत्म-साधना में सहयोगी होता है। हिप्नोसिस में आप तो परिचित होते नहीं, आप तो बेहोश हैं। आपको कोई लाभ नहीं होता, लेकिन घटना करीब-करीब एक सी ही घटती है।
वह विधि जो है, बीमारियां सब अच्छी करते हैं?
वह फोर्स से होती है?
कुछ दूसरे का पोर्सन जिसको बाहर निकाल कर अपना नीड डाल सकता है?
...वह हिप्नोसिस है?
पुरानी स्मृतियों में...?
...लाभ भी...?
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Do you speak only about the Divine, or do you also address other topics?
According to Osho, all his words point to the same nameless Reality, 'That,' whether he seems to discuss love, meditation, society, or self. He insists he never speaks of anything else; differing topics and metaphors are just doorways to the one Divine. Attend to the essence, not the changing forms, and you'll hear the single teaching.
In simple terms: He only ever talks about the one Divine truth, no matter what the topic sounds like.
What is the best posture for meditation?
According to Osho, the 'best' meditation posture is simply whatever is most comfortable and non-disturbing for your body. Don't worship form; value ease. Sit, lie down, or stand, your inner being is unchanged. Choose a position that doesn't call attention to itself, so awareness isn't pulled to aches or strain. Practice anytime this condition is met, and deeper, wondrous experiences unfold.
In simple terms: Pick any comfy position that doesn’t bother your body, so your attention can rest quietly.
How should we deal with arising thoughts during meditation?
According to Osho, when thoughts arise in meditation, do nothing: simply sit like a witness on the riverbank, allow the leaves and silt to float away and settle by themselves. Any effort to stop or fix the mind only muddies it further. Meditation is not doing but understanding; with patient, neutral awareness, clarity comes on its own.
In simple terms: Watch your thoughts like muddy water clearing—don’t stir it; just wait and it becomes clear.
What is the state of a person when they go mad?
According to Osho, when a person goes mad, awareness of the self disappears and only past memory remains. From the moment of madness, no new memories form; the person mechanically repeats impressions from before, unable to be touched by the present, thus appearing incoherent. This memory-bound vacuum can resemble a saint’s emptiness, yet differs utterly: madness is brokenness through turmoil, while liberation is choiceless peace without clinging to memory.
In simple terms: Going mad means your awareness turns off, you stop making new memories, and you just replay old ones, so you can’t meet the present.
How helpful is austerity in practicing meditation?
According to Osho, austerity isn’t a technique to reach meditation; meditation itself is true austerity. When awareness deepens, non-essentials fall away on their own—then fasting or renunciation “happens” effortlessly and joyfully. Forced austerities only feed ego and suffering. So don’t ‘do’ tapas; awaken awareness. Let simplicity arise as a natural byproduct, not a goal.
In simple terms: Don’t force hard practices; just meditate, and the wish to drop unnecessary things will come naturally.
What happens when one becomes absorbed while doing work?
According to Osho, becoming absorbed in work narrows consciousness to a single object; you become oblivious to everything else and even forget yourself. This is “absorption in the other”—it yields efficiency and pleasure but not awareness. True mastery is to act with total awareness, remaining centered in oneself while engaging, which brings skillfulness and inner bliss.
In simple terms: When you get totally into a task, you block out everything—even yourself—so the real art is to work while staying aware and centered.
What does it mean to forget the real world according to the scriptures?
According to Osho, the real world is not something to be forgotten, escaped, or denied; it is to be directly known. Forgetting breeds ignorance and division, while attentive knowing reveals truth. Spirituality means meeting reality with awareness, not averting your eyes. By seeing what is, fully and without prejudice, illusion falls away and understanding - rather than withdrawal - becomes the path.
In simple terms: Don’t ignore life; pay close attention to it so you truly understand what it is.
How can awareness and harmony be brought together?
According to Osho, awareness and harmony unite when you practice active meditation: remain a silent witness to thoughts and actions without identification, beginning with daily periods of watching the mind and extending this clarity into every deed. As inner silence accompanies outer movement, attention stays unbroken, actions become seamless - like Gandhi's spinning - and life turns into continuous meditation where awareness guides action, producing effortless harmony.
In simple terms: Quietly watch your thoughts and actions without getting caught in them, and keep that gentle watching as you do things so everything flows together.

Osho's Commentary
...और जब हम पूछते हैं कि संसारी का क्या मार्ग हो? तो असल में हमारा मतलब यह है कि हम संन्यासी नहीं हैं। सामान्य घर-गृहस्थी में हैं। हम क्या करें? यही है न मतलब हमारा। हम कहां हैं? हमारा... खोज ले सकता है। क्योंकि आत्मा प्रति क्षण उपस्थित तो है मेरे भीतर। मैं कहीं बाहर घूम रहा हूं, और भीतर जाने का मार्ग नहीं पाता हूं। निरंतर यह सुनने पर भी कि भीतर जाना है, मेरा सारा घूमना बाहर ही होता है। और भीतर हो जाना, नहीं हो पाता। तो असल में कुल इतना समझ लेना है कि बाहर मैं किन वजहों से घूम रहा हूं? कौन से कारण मुझे बाहर घुमा रहे हैं? अगर वे कारण मेरे हाथ से छूट जाएं तो मैं भीतर पहुंच जाऊंगा। अगर ठीक से समझें तो भीतर पहुंचने के लिए किसी मार्ग की जरूरत नहीं है। जिन मार्गों के कारण हम बाहर घूम रहे हैं, अगर वे भर हम छोड़ दें, उनका कारण भर नकारात्मक हो जाए स्थिति, तो हम पहुंच जाएंगे।
जैसे मैं एक डगाल को खींच कर पकड़े हूं वृक्ष की, और अगर कोई मुझसे कहे कि कैसे यह डगाल अपनी जगह वापस जाए? तो मैं इतना ही कहूंगा कि अगर मैं छोड़ दूं तो यह अपनी जगह वापस पहुंच जाएगी। बाहर आने की वजह से तनाव पड़ा है। अपने में पहुंच जाने में तो कष्ट नहीं है, दिक्कत नहीं है। आत्मा को जब हम पूछते हैं, तो मैं वही तो हूं। मैं स्वयं ही तो आत्मा हूं। तो मुझे अपने तक पहुंचने में तो कोई तकलीफ नहीं। बाहर तक जिन वजहों से, जिन कारणों से, जिन रास्तों से आ गया हूं—उन्हीं रास्तों को समझ लेने की जरूरत है। सबसे बड़ा रास्ता जो मुझे बाहर लाया हुआ है, वह विचार है—विचार। विचार मुझे बाहर लाया हुआ है। अगर निर्विचार हो जाऊं तो भीतर पहुंच जाऊंगा।