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Questions in this Discourse
आसनों के बारे में आपका क्या विचार है?
अभी एक महिला थी इस कैंप में...(अस्पष्ट। करीब-करीब सारी मुद्राएं उसके हाथों से होती हैं, सारी मुद्राएं। जितनी मुद्राओं की चर्चा है शास्त्रों में, वे सारी मुद्राएं उसमें आ गईं। वहां से चित्र नहीं आए हैं आपके पास? वहां की मूवी भी बनाई है, और मूवी भी पंजाब में दस-पांच जगह दिखाई है। उस कैंप में ही बनाई थी। तो न मालूम कितने आसन में कोई चला जाएगा, कोई क्या होगा? पर जो आसन अपने आप बनता है वही आपके लिए फायदे का है। बनाया जाना फिर वह डायरेक्टली आपका नहीं है। अपने आप बनता है। काम अपने आप बनता है।
दूसरा कुछ...
...
शरीर को जरूरत से क्या मतलब है?
बॉॅडी की अपनी विज़डम है, आदमी ने बॉडी की व़िजडम भी खो दी है। जानवर ने नहीं खोई है। यहां आप एक भैंस को छोड़ दें, यहां पच्चीस तरह का घास लगाया हुआ है। वह अपने घास को चुनकर खा लेगी। बाकी सारा घास छोड़ देगी। चुनाव नहीं कर रही है वह, उसको कुछ पता भी ही नहीं है। उसने कोई घास के संबंध में किताब भी नहीं पढ़ी है कि किस स्पीसी का घास खाना, कि नहीं खाना। बस वह अपने उसी को ही खाती है, वह बॉडी पर ही जीती है, बॉडी उसकी खुद जानती है। वह उसे चुन लेती है, बाकी छोड़ देती है।
एक कुत्ता है। उसको आप, उसके पेट में भार है, तो वह फौरन वॉमिट कर देगा। उसको पता नहीं है वे मुद्राएं भी, वॉमिटिंग एजेंट ले। नहीं, लेकिन उसकी बॉडी काम कर रही है। वह कुछ भी खाता है तो वह फौरन वोमिट कर देता है। कोई भी जानवर बीमार हो जाए, आप उसको खाना नहीं खिला सकते। आदमी भर को खिला सकते हो। क्यों? आदमी ने बॉडी की विज़डम ही खो दी है उसने। नहीं तो बीमारी में खाना खाना ही मतलब बीमारी को खाना खिलाना है। कोई जानवर नहीं खाएगा। वह इंकार कर देगा बिलकुल खाना खाने से। तो शरीर की अपनी व़िजडम है। जिसका हमें बोध मिट गया है, क्योंकि हम इंटलेक्ट से जी रहे हैं।
इंटलेक्ट जो है वह, जिसको कहना चाहिए कि बॉडी की जो इंस्टेंट जो समझ है, उससे इधर-उधर कर देती है। इतना अदभुत हुआ है आदमी के शरीर के साथ गड़बड़ उस इंटलेक्ट की वजह से कि जिसका कोई हिसाब नहीं। तो यह जो, इस प्रक्रिया में जब हम बॉडी को पूरा छोड़ देते हैं इंटलेक्ट के बाहर तो वह अपनी बेसिक इंस्टिंक्ट ( अस्पष्ट....)को उपलब्ध होगी। तब फिर उसे जो करना है वह कर लेती है, जो उसके लिए जरूरी है वह कर लेती है। उस वक्त जो आसन बनें, मुद्राएं बनें, वे बन जाती हैं।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
वह रिमूव कर लेगी, वह रिमूव कर लेगी। बिल्कुल रिमूव कर लेगी।
इसलिए यह बड़े मजे की बात है कि अगर कोई बीमार है तो बीमारी जागने में ठीक नहीं होती उसकी, नींद में ठीक होती है। और अगर नींद ही न आती हो तो बीमारी ठीक करना मुश्किल हो जाए। उसका कारण है कि जागने में बॉडी की विज़डम को काम नहीं करने देता वह। नींद में बॉडी अपना काम कर लेती है। इसलिए हर बीमारी के लिए नींद जरूरी है, ठीक करने के लिए। अब एक मरीज को नींद न आती हो और बीमारी हो, तो पहले नींद ठीक करो उसकी, पीछे बीमारी ठीक होने वाली है, नहीं तो नहीं होने वाली। क्योंकि वह चौबीस घंटे जगा हुआ है, वह बॉडी को कुछ करने नहीं देता। अब रात में उसका हाथ कहां गिरता है, पैर कहां गिरता है, होश में नहीं गिरने देगा वह। रात उसके मुंह से कुछ उधर गिर जाए, अब वह होश में नहीं गिरने देगा। बॉडी को काम नहीं करने दे रहे हैं। इंटलेक्ट हावी हो गई है उसके ऊपर। फिर भारी तकलीफ होगी।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
तो दो वक्त बहुत अच्छे हैं। एक तो नींद से जगने के बाद, सुबह। और एक रात सोने के पहले। सनराइज का सवाल उतना नहीं है बड़ा, उतना बड़ा सनराइज का नहीं है। अगर उठ सकें तो बहुत अच्छा है। बहुत अच्छा है। सनराइज के साथ ही साथ सबसे अच्छा है, बिफोर नहीं। उधर सूरज उग रहा है इधर आपकी प्रक्रिया चल रही है, तो ज्यादा कारगर है। और या फिर रात सोने के पहले। ये दो वक्त बहुत अच्छे हैं। वक्त तो कोई भी अच्छा है, वक्त तो कोई भी अच्छा है, आधी रात भी बहुत बढ़िया है। वक्त तो कोई भी अच्छा है, हां, डिस्टर्बेंस बाहरी कम हो जाते हैं, बाहरी कम हो जाते हैं, बहुत कम हो जाते हैं।
ध्यान में आपने परमात्मा के एक जप का प्रयोग किया है। यह तो ऐसा ट्रेडीशनल कर दिया है वह मतलब का नहीं है। क्योंकि यह बात कोई मायने नहीं रखती?
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
वह मैं अभी आपसे कह रहा था कि प्रकाश का अनुभव पहला अनुभव होगा, और उसका कारण है। हमारी जीवन भर की प्रतीति अंधेरे की प्रतीति है। न कुछ दिखाई पड़ता है, न कुछ समझ आता है। न कुछ पता चलता है, कहां से आए हैं? कहां जा रहे हैं? क्यूं हैं? यह सब अंधेरे का भाव है। जैसे एक अंधेरे में घिरे हों, जहां न आगे का पता चलता है, न पीछे का पता चलता है, न प़ड़ोसी का पता चलता है, न अपना पता चलता है। ऐसी अंधेरी किनारी का टूटना।
तो ध्यान की पहली जो चोट होती है वह इस अंधेरे पर हो जाती है। और पहली चोट के बाद हमें पहला अनुभव होना शुरू होता है, और वह एक पर्दे में लाइट का होता है। चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश दिखेगा। उस प्रकाश में भी और इस प्रकाश में बुनियादी फर्क होता है। इस प्रकाश में उष्णता है, उस प्रकाश में कोई उष्णता नहीं है। ठंडा प्रकाश है। इस प्रकाश में कोई सोर्स है, वह विदाउट सोर्स होगा।...कहीं दीया है तो वहां से आ रहा है, सूरज है तो वहां से आ रहा है। ध्यान में जिस प्रकाश का अनुभव बढ़ता है, प्रकाश ही होता है, सोर्स कोई नहीं। इसलिए जैसे कि सुबह सूरज नहीं निकला है और रात समाप्त हो गई है, उस समय जैसा प्रकाश होता है, वैसे प्रकाश की प्रतीति बढ़नी शुरू होती है।
दूसरी प्रतीति शांति की होती है। परम शांति की। परम शांति बहुत घनीभूत होती है। और तीसरी प्रतीति आनंद की है। वह, उसको कहना चाहिए कि कंडैंस्ड पीस का अनुभव, आनंद। बहुत घनीभूत शांति बनती है तो वह आनंद बनता है।
फिर आंख खोलने को मन नहीं करेगा?
तो यह तीन तलों पर—यहां शांति में मैं रहूंगा और चारों तरफ शांति रहेगी। आनंद में मैं और आनंद एक हो जाएंगे। और परमात्मा में मैं रह ही नहीं जाता। बस इसीलिए आनंद तक की खबर लोग ला सके, उसके आगे की खबर लोग नहीं ला सके। क्योंकि खबर लाने वाले ही वहां खो गए। इसलिए आनंद तक खबर है। इसलिए सच्चिदानंद जो है वह आखिरी खबर है। जहां तक आदमी खबर लाया है। वहां सत्य है, चित्त है और आनंद है। एग्जिस्टेंस है वहां, कांशसनेस है वहां, और बिलीफ है वहां। यह आखिरी खबर है, आखिरी पड़ाव—जिसके बाद आदमी मिट जाता है। क्योंकि उसके बाद की कोई खबर नहीं है। मगर असली बात इसके आगे है। यह आखिरी पड़ाव है जहां तक मील के पत्थर लगे हैं। उसके बाद जंगल है, जहां रास्ता खत्म हो जाता है, जहां हम भी खत्म हो जाते हैं।
इसलिए आखिरी खबर, जो गहरी से गहरी खबर लाई जा सकी है, वह सच्चिदानंद है। मगर बात उसके भी आगे है। इसलिए यह ब्रह्म की परिभाषा नहीं है सच्चिदानंद। यह आदमी के आखिरी पड़ाव की परिभाषा है। जिसके आगे फिर आदमी नहीं बढ़ता। इसलिए उसके आगे की खबर नहीं आती। यह मुकाम की खबर नहीं है। लास्ट, लास्ट स्टोन जो हमने लगाया, लगा सकते हैं हम, उस बॉर्डर का। मगर यह इसी तरफ है बॉर्डर। क्योंकि बॉर्डर के उस तरफ पत्थर नहीं लग सकता, वह इसी तरफ लगेगा।
इसलिए मैं नहीं कहता कि यह ब्रह्म की परिभाषा है। यह ब्रह्म तक की जाने वाली आखिरी संभावना है परिभाषा की। इसके आगे अपरिभाषित, नान-डेफिनिशन की दुनिया शुरू होती है। वहीं है ब्रह्म। इसलिए मुझसे कोई पूछता है कि सच्चिदानंद यानी ब्रह्म, तो मैं नहीं कहता?
मैं कहता हूं ब्रह्म यानी सच्चिदानंद के आगे। फिर न सच है, न चित्त है, न आनंद है। न इनको जानने वाला है। पर कामचलाऊ ठीक है, कि हम कहें कि यह ब्रह्म की परिभाषा हो सकती है।
तो उस कंट्रोवर्सी की वजह से जो बिखरा या पूछा जाए, क्या आपका दूसरे लोगों से फर्क है? क्यों वे इतने अपसेट हुए हैं? तो इसके बारे में अगर आप कुछ बताएं हमें तो मेहरबानी होगी।
तो लिविंग रिलीजन की कोई ट्रेडीशन नहीं होती। सिर्फ डेड रिलीजन की ट्रेडीशन होती है। सभी धर्म मरे हुए धर्म हैं। और धर्म कभी मर नहीं सकता। तो धर्म तो जीवंत अनुभव है। तो नानक को एक अनुभव होगा, वह अनुभव तो जीवित है। लेकिन सिक्ख जिसको पकड़े बैठा है, वह मृत है। वह नानक का कहा हुआ शब्द उसके पास है। बुद्ध को जो अनुभव हुआ, वह तो जीवित है। लेकिन बुद्ध को मानने वाला जो पकड़े बैठा है, वह बुद्ध का कहा हुआ शब्द पकड़े बैठा है। वह मृत है।
धर्म एक है, लेकिन मरे हुए धर्म बहुत हैं। क्योंकि जितनी बार लोगों को जीवित सत्य का अनुभव हुआ है उतनी बार ही शब्दों में प्रयुक्त होने के बाद शास्त्र बनने के बाद वह मृत हो जाता है। इस दुनिया में कोई तीन सौ धर्म हैं। और मेरी अपनी समझ यह है कि इन तीन सौ मरे हुए धर्मों के कारण ही जीवित धर्म की अनुभूति बहुत मुश्किल हो जाती है। क्योंकि यह हमें पकड़ लेते हैं चारों तरफ से।
नानक जहां पहुंचे; बुद्ध जहां पहुंचे; मोहम्मद जहां पहुंचे; वहां हम नहीं पहुंच पाते, क्योंकि हम तो नानक, बुद्ध और कृष्ण के शब्दों को पकड़ कर रुक जाते हैं।
इसलिए मैं शास्त्र-विरोधी भी हूं।
मेरा मानना है कि धर्म का कोई शास्त्र नहीं, धर्म-शास्त्र जैसा कोई शास्त्र नहीं। सब शास्त्र धार्मिक लोगों के लिखे हुए हैं, लेकिन धर्म-शास्त्र कोई भी नहीं। ऐसा कोई भी शास्त्र नहीं, जिसको पढ़ कर धर्म उपलब्ध हो जाए। धर्म तो उपलब्ध करना पड़ेगा अनुभव से। हां, शास्त्र गवाही दे सकेगा कि तुम्हें जो अनुभव हुआ है वह नानक को भी हुआ था। वह बुद्ध को भी हुआ था।
तो वह ज्यादा से ज्यादा गवाही का काम कर सकता है। लेकिन अनुभव देने का काम नहीं कर सकता। स्वभावतः परंपरा के विरोध में कहूं कुछ, शास्त्र को कहूं कि उससे धर्म नहीं मिलेगा, और सत्य के संबंध में कहता हूं कि उसे कभी बॉरोड, उधार नहीं पाया जा सकता। वह ट्रांसफरेबल नहीं है कि मुझे सत्य मिल जाए तो मैं आपको दे दूं।
इसलिए मेरा कहना है कि धर्म के जगत में गुरु नहीं हो सकता। सिर्फ शिष्य हो सकते हैं। और शिष्य होने का मतलब है: मेरा एटिट्यूड ऑफ डिसाइपलशिप। सीखने का एक भाव हो सकता है भावुक आदमी में, वह सीखता है, सब तरफ से सीख सकता है। और कहीं से भी सीख सकता है, लेकिन गुरु नहीं होता। ऐसा कोई आदमी नहीं होता जो कहता है कि मैं तुम्हें दूंगा। क्योंकि धर्म की दुनिया में प्रवेश करने के बाद मैं तो बचता नहीं, देने वाला बचता नहीं। तो कोई दावेदार तो हो नहीं सकता वहां। हां, खोजने वाले किसी भी स्रोत से सीख सकते हैं। लेकिन शिष्य ही होते हैं, गुरु नहीं होते।
और मेरी समझ है कि गुरुओं के खयाल की वजह से पंथ और संप्रदाय खड़े हुए हैं। अगर सीखने वाले पर हमारा जोर हो तो फिर पंथ और संप्रदाय की कोई जरूरत नहीं है। कोई कहीं से भी सीख सकता है। फिर सारा जगत शिक्षा की जगह बन जाती है। और सारा जगत गुरु बन जाता है।
तो परंपरा, शास्त्र, गुरु, इन सबको मैं धर्म न कहूं तो विवाद उठना अत्यंत स्वाभाविक है।
ओशो, आपकी यह तो हुई इंटरप्रिटेशन का सवाल, आपकी पाजिटिव फिलॉसफी ऑफ लाइफ जो है वह क्या है?
स्वतंत्रता का असल में पाजिटिव कोई मतलब होता ही नहीं है। स्वतंत्रता का मतलब ही होता है: निगेटिव। और धर्म जो है वह मुक्ति है, वह एब्सोल्यूट फ्रीडम की खोज है। जहां हम परम स्वतंत्र हों, जहां कोई सीमा न होगी, कोई बंधन न होगा, कोई रुकावट न होगी। तो धर्म बेसिकली निगेटिव है। कहां-कहां बंधन है, वहां-वहां तोड़ देना है। तो मैं मानता हूं: रूढ़ि बंधन है; परंपरा बंधन है; गुरु बंधन है; शास्त्र बंधन है; सिद्धांत बंधन हैं; ये सारे बंधन हैं। ये सब तोड़ देने हैं। इनके तोड़ते ही जो शेष रह जाएगा, वह अनुभूति ही पाजिटिव है। इन सबके तोड़ते ही जो शेष रह जाएगी जिसको आप तोड़ ही नहीं सकते, उसी को स्वरूप कहें, स्वभाव कहें, हमारा परम सत्य कहें, परमात्मा कहें, जो भी नाम दें।
हमारे सारे बंधन जहां टूट जाएंगे, वहां जो शेष रह जाएगा वह पाजिटिव है। लेकिन हमें जो करना पड़ेगा वह तो निगेटिव होगा। सारे बंधन तोड़ने का काम करना पड़ेगा। तो मेरी कोई पाजिटिव फिलॉसफी है ही नहीं। क्योंकि मैं मानता ही यह हूं कि पाजिटिव फिलॉसफी ही बंधन बन जाती है। सिर्फ निगेटिव माइंड ही स्वतंत्र हो सकता है, पाजिटिव माइंड तो बंध ही जाएगा। क्योंकि जिसको भी वह पाजिट करेगा उसी से बंध जाएगा। अगर वह कहेगा कि यह भगवान एक ऐसा भगवान है, उससे बंधेगा। कहेगा कि ऐसा स्वर्ग है, उससे बंधेगा। कहेगा ऐसा मोक्ष है, उससे बंधेगा।
और नहीं जो बंधता कहीं और सब तरह के बंधन छोड़ देता है, तो भीतर जब चेतना पर सब बंधन गिर जाते हैं, तब एक फ्रीडम उपलब्ध होती है। वह जो स्वतंत्रता है, वह हमारा स्वभाव है। वह हमारा इनहेरेंट नेचर है। उसको तो निगेटिविटी से ही पाना पड़ता है। निषेध से पाना पड़ता है। इसलिए जो परम अनुभव जिन्हें हुआ है वे नेति-नेति ही कहेंगे। वे कहेंगे: यह भी नहीं, यह भी नहीं। नॉट दिस, नॉट दैट। यह भी छोड़ो, वह भी छोड़ो। और हम हमेशा पूछेंगे कि पकड़ें क्या? पाजिटिव का मतलब होता है कि पकड़ें क्या? लेकिन पकड़ना बंधन बन जाता है।
तो मैं कहता हूं: पकड़ो ही मत, बिना पकड़े जीओ। और अगर बिना पकड़े जी सकते हो, विदाउट ऐनी क्लिंगिंग, तो ही मुक्त हो सकते हो, पकड़ा कि बंधे। जहां पकड़ा कि वहीं बंधे। इसलिए पकड़ना ही मत। इसलिए मेरे पास कोई पाजिटिव फिलॉसफी नहीं है, वह भी दिक्कत है। वह भी एक कंट्रोवर्सी का कारण है। क्योंकि जो भी आदमी छोड़ने को कहता है, वह कहता है कि पहले हमें पकड़ने को तो बता दो। आप कहते हो कि ये मुट्ठी में जो रखे हैं इसे छोड़ दो, तो हम कहां मुट्ठी बांधें?
और मैं कहता हूं कि मुट्ठी ही छोड़ दो। मैं यह नहीं कहता हूं कि तुम मुट्ठी में जो रखे हुए हो वह छोड़ दो। उससे क्या फर्क पड़ता है, दूसरी चीज पर मुट्ठी बंध जाएगी। मिट्टी न होगी, पत्थर होगा; पत्थर न होगा, सोना होगा; लेकिन मुट्ठी तो हर हालत में बंधी होगी। और मेरा जोर यह है कि मुट्ठी खुली होनी चाहिए। इसलिए सवाल यह नहीं है कि क्या पकड़े हो, सवाल यह है कि पकड़े हो या नहीं पकड़े हो।
तो मेरा कहना है कि सब तरह की क्लिंगिंग जहां छूट जाती है, ए माइंड विदाउट क्लिंगिंग, विदाउट ऐनी पाजिटिव क्लिंगिंग।
...एट मेंटल अवेयरनेस शुड रीच एट लेवल वेयर वन शुड नॉट डिपेंड ऑन एनीथिंग, बट दि इनडिपेंडेंट एण्ड सेल्फ-सफिशिएंट मेंटली। एम आई करेक्ट एण्ड...तो दूसरा मेरा इसी सिलसिले में प्रश्न है कि एक यह समझा जाता है कि फ्रीडम फ्रॉम वांट? शायद यह एक स्वतंत्रता का, जेहनी स्वतंत्रता का एक चिह्न होता है। तो इस संबंध में आपको कुछ कहना हो तो?
और दूसरी बात, फ्रीडम फ्रॉम वांट में स्वतंत्रता नहीं कहता। क्योंकि जिसको हमने अब तक इच्छाएं, जरूरतें, और वांट कहा है वे जीवन के अस्तित्व की अनिवार्यताएं हैं। जरूरतें हैं।
बट माई क्वेश्चन इ़ज नॉट एनी क्लियर—फ्रीडम फ्रॉम वांट—बट आई मेंट वा़ज मीटिंग ऑफ ऑल वांट्स। आई मीन आई डोंट थिंक आई शुड से दैट निगेटिवली स्पीकिंग वांट शुड नॉट बादर अबाउट वन्ज वांट्स, बट दि फुलफिलमेंट ऑफ ऑल दोज डिजायर देन वांट्स, आई मीन इन पाजिटिव वे। सो उस लिहाज में मैं कहता हूं कि अगर सभी जरूरियात किसी की पूरी हो जाएं तो फिर वह इंडिपेंडेंट हो जाता है। इस कांसेप्ट को आप कैसे समझते हैं?
तो मेरी दृष्टि में इच्छाओं का कोई विरोध नहीं है। जीवन में जो भी वासनाएं, जो भी इच्छाएं, जो भी डिजायर्स दिए हैं, वे जैसे-जैसे पूरी हों, जिस भांति पूरी हों, ऐसा समाज चाहिए, ऐसी धारणाएं चाहिए, ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां वे अधिकतम पूरी हो सकें। इसलिए मैं पावर्टी के पक्ष में नहीं हूं।
और मेरा मानना है कि रिलीजन की फ्लॉवरिंग एफ्लुएंट सोसाइटी में ही होती है, गरीब समाज में नहीं होती। जैसे एफ्लुएंस आता है, जहां सारी इच्छाएं पूरी होने लगती हैं, वहां ही पहली दफा एक नई इच्छा का जन्म होता है कि हम सारी इच्छाओं के बाहर कैसे हो जाएं। जहां सब इच्छाएं पूरी होने लगती हैं, वहीं पहली दफा सवाल उठता है कि जीवन का सत्य क्या है? परमात्मा क्या है? मोक्ष क्या है? ये जीवन की जो चारों तरफ की इच्छाएं पूरी होती हैं, तब यह गहरी इच्छा पैदा होनी शुरू होती है। इस गहरी इच्छा के शुरू होने के लिए भी जीवन की साधारण इच्छाएं पूरी हो जाना जरूरी हैं।
तो मैं लाइफ-अफरमेटिव हूं। जीवन का मैं पूरा स्वीकार करता हूं। जीवन के समस्त रूपों को और जीवन की समस्त आकांक्षाओं को मैं स्वीकार करता हूं। और उनको पूरा करके ही उनके पार जाने का मार्ग है। जहां वे पूरी होती हैं, वहीं हम उनके पार जाते हैं। इच्छाएं पूरी हों, इच्छाओं का दमन न हो, इच्छाओं को काटा-पीटा न जाए। तो किसी तरह की ऑस्टैरिटी, किसी तरह के त्याग और तपश्चर्या का मैं पक्षपाती नहीं हूं। क्योंकि मेरा मानना है कि त्याग, जिसे हम त्याग कहते रहे हैं, रिनंसिएशन, जिसे हम छोड़ना कहते रहे हैं, तो वह सब का सब मनुष्य को क्रिपल्ड करता है, पंगु करता है, सब तरफ से उसको तोड़ डालता है। उससे चेतना विकसित नहीं होती, अविकसित ही रह जाती है।
लेकिन एक और तरह का रिनंसिएशन है, एक और तरह का त्याग है जो चीजों के अनुभव से उपलब्ध होता है। एक तो त्याग वह है कि एक, एक गरीब आदमी, जिसने जिंदगी में कुछ भी नहीं जाना, चीजों को छोड़ता है। एक बुद्ध जैसा आदमी, जिसने जीवन में सारी चीजों को जाना और छोड़ रहा है। इन दोनों के छोड़ने में मैं फर्क मानता हूं। गरीब को छोड़ना पड़ता है, बुद्ध का छोड़ना बहुत सहज और स्पांटेनियस है। चीजें व्यर्थ हो गई हैं। मीनिंगलेस हो गई हैं।
तो जीवन के संबंध में, जीवन की इच्छाओं, जरूरतों, आवश्यकताओं के संबंध में मैं मैटीरियलिज्म को पूरी तरह स्वीकार करता हूं। और मैं मानता हूं कि एक ठीक धर्म एंटी-मैटीरियलिस्ट नहीं हो सकता। और अगर एंटी-मैटीरियलिस्ट होगा तो एंटी-लाइफ भी होगा। क्योंकि जीवन का सारा आधार भौतिक है। और पदार्थ जीवन का आधार है। यह भी मेरी समझ है कि धर्म की बुनियाद तो मैटीरियलिस्ट ही होगी। लेकिन उसकी पीक स्प्रिचुअलिस्ट होगी। तो उसके मंदिर के नीचे के पत्थर तो भौतिकवादी होते हैं, लेकिन मंदिर का शिखर अध्यात्म का होता है।
और अध्यात्म और भौतिक में, स्प्रिचुअलिटी में और मैटीरियलिज्म में मैं विरोध नहीं मानता। क्योंकि मेरी यह भी समझ है कि शरीर और आत्मा में भी कोई विरोध नहीं है। और परमात्मा और सृष्टि में भी कोई विरोध नहीं है। बल्कि ये दो चीजें नहीं हैं। एक ही चीज के दो एस्पेक्ट्स हैं। एक तरफ से जो हमें शरीर की तरह दिखाई पड़ता है, वही चीज दूसरी तरफ से आत्मा की तरह अनुभव में आती है। और एक तरफ से जो हमें पदार्थ मालूम पड़ता है, वही दूसरी तरफ से हमें परमात्मा की तरह दिखाई पड़ता है।
ऐसी दो चीजें...नहीं तो मैं डुअलिस्ट नहीं हूं। और, और मैं मानता हूं कि डुअलिज्म ने सारे धार्मिक चिंतन को स्क़िजोफ्रेनिक कर दिया। यानी आदमी ने दो हिस्से कर दिए। उसने कहा कि यह शरीर है, यह दुश्मन है। और तुम आत्मा हो, तुम इसके खिलाफ लड़ते रहो। शरीर से लड़ो; प्रकृति से लड़ो; जीवन से लड़ो।
तो जीवन से, शरीर से और प्रकृति से लड़ कर हम परमात्मा तक नहीं पहुंच सकते। बल्कि इनमें पूरी तरह लीन होकर, डूब कर इनके रस में पूरी तरह विमुग्ध होकर, इनके रस में पूरी तरह एक होकर ही परमात्मा तक पहुंच सकते हैं। क्योंकि हम इनसे अलग नहीं हैं।
इसलिए मैं लाइफ-निगेटिव नहीं हूं। लाइफ-अफरमेटिव हूं। लेकिन रिलीजियस माइंड को मैं मानता हूं कि वह निगेटिव माइंड है। निगेटिव माइंड का मेरा मतलब यह है कि फ्रीडम के लिहाज से वह जहां-जहां बंधन हैं, वहां-वहां बंधन को तोड़ने के लिए तत्पर है। उसकी आकांक्षा परम स्वतंत्रता की है। और द्वैत भी एक बंधन है। क्योंकि जब मैं अपने को दो में बांट लेता हूं तो बहुत मुश्किल में पड़ जाता हूं। वह लड़ाई ऐसी हो जाती है जैसे बाएं और दाएं हाथ को मैं लड़ाऊं। और कोई भी न जीते। क्योंकि दोनों हाथ मेरे हैं। और दोनों हाथ लड़ें, जीते भी कोई न, लेकिन मैं हार जाऊं। क्योंकि दोनों हाथ लड़ा-लड़ा कर थक जाऊं।
तो जिंदगी को अब तक ठीक-ठीक धार्मिक शक्ल नहीं मिल सकी। क्योंकि द्वैत ने हमें बहुत बुरी तरह से दो हिस्सों में, खंडों में तोड़ दिया है। अद्वैत मेरे मन में यह अर्थ रखता है...ऐसा अर्थ नहीं रखता जैसा शंकर के लिए। शंकर के लिए अद्वैत का मतलब होता है कि संसार है ही नहीं। और मैं मानता हूं तब शंकर द्वैतवादी ही हैं। और संसार को बिना इंकार किए उन्हें उपाय नहीं है कोई। तो संसार को डिनाई करेंगे तो ही अद्वैत को बचा पाते हैं। लेकिन जिसको हम डिनाई करते हैं, डिनाई करने की वजह से भी वह है, उसे इनकार करना पड़ता है। माया, इलुजन कहना पड़ता है, तो भी वह है।
अद्वैत का मेरे लिए मतलब यह है कि जो भी है, वह एक है। उसमें कुछ भी इनकार करने योग्य नहीं है और कोई भी लड़ने योग्य नहीं है उसमें। और उसमें खंड करने की जरूरत नहीं है, वह इंटिग्रेटेड, एक है। और मैं पूरे जीवन को स्वीकार करता हूं। तो टोटल एक्सेप्टिबिलिटी को आप मेरा पाजिटिव एलिमेंट कह सकते हैं। टोटल एक्सेप्टिबिलिटी, कि मुझे सब स्वीकार है, जीवन जैसा है, पूरी तरह स्वीकार है।
तो अगर यह कहा जाए कि आपकी जो धारणा है, वह आज के युग में एक नई तरह की धारणा है। जिसकी पहले परंपरा, इस प्रचलित जमाने में नहीं है, तो यह ठीक रहेगा या इस तरह का कोई और आप उदाहरण दे सकेंगे। कि और लोग भी होंगे जो इस तरह का खयाल रखते हैं?
तो मेरी यह भी धारणा है कि सारी धर्म की परंपराएं जिनके नाम पर बनी हैं, उनके ही खिलाफ हैं। क्योंकि बनाने वाला जो है, वह बहुत दूसरा आदमी है। वह चारों तरफ से इकट्ठा होकर बनाता है। और नानक के आस-पास जो लोग इकट्ठे होकर एक ऑर्गनाइजेशन बनाते हैं, एक सिस्टम बनाते हैं—वे। और उनके पास नानक का अनुभव नहीं है। उनके पास सिर्फ नानक के शब्द हैं। और उन शब्दों की भी उनकी अपनी व्याख्या है, जिसका नानक से कोई लेना-देना नहीं।
क्योंकि मेरी समझ यह है कि नानक के शब्दों को समझने के लिए भी नानक की हैसियत का अनुभव चाहिए। उसके बिना कुछ और उपाय नहीं है। यानी मामला ऐसा है कि एक आंख वाला आदमी प्रकाश देखता है, और फिर अंधे इकट्ठे होकर उसके ऊपर सिस्टम बनाते हैं। वह तो सब गड़बड़ हो जाता है। तो ट्रेडीशन तो कोई भी नहीं है जो मैं कह रहा हूं उसकी। लेकिन जो मैं कह रहा हूं, वह नया बिलकुल नहीं है। सदा वही कहा गया है, और सदा उसी के आस-पास उससे उलटी ट्रेडीशन बनी है।
और इसलिए बड़े मजे की बात है। वह बड़े मजे की बात यह है कि दुनिया में जब भी किसी को धर्म की अनुभूति होगी। तो जिनको भी कभी धर्म की अनुभूति हुई है, वह उनकी ही बात कह रहा है। लेकिन जितने लोग पिछले तीर्थंकरों, पैगंबरों, गुरुओं के पीछे खड़े हैं, वे सब उसके दुश्मन हो जाएंगे फौरन। वे इसलिए हो जाएंगे कि परंपरा जो है, वह डेविएट हो जाती है। अनिवार्य रूप से और उलटी हो जाती है।
अब बुद्ध ने लोगों से कहा कि किसी की पूजा मत करना। क्योंकि जिसकी तुम पूजा कर रहे हो वह तुम्हारे भीतर बैठा हुआ है। लेकिन लोग बुद्ध की पूजा करने लगे। और लोगों ने कहा कि और किसी की चाहे हम न करें, किसी की न करेंगे अब। न राम की करेंगे, न कृष्ण की करेंगे; लेकिन तुमने तो हमें ज्ञान बताया है, तुम्हारी तो करेंगे। और बुद्ध चिल्ला रहे हैं: किसी की पूजा मत करना। इसमें बुद्ध इनक्लूडिड हैं।
अब बुद्ध कह रहे हैं: किसी की मूर्ति मत बनाना। क्योंकि मूर्ति से क्या मतलब है? तो लोगों ने कहा कि हम तुम्हारी तो मूर्ति कम से कम बना ही लेंगे। तो बुद्ध की जितनी मूर्तियां हैं जमीन पर उतनी किसी और आदमी की नहीं हैं। और जितना बुद्ध ने विरोध किया मूर्ति का उतना किसी और आदमी ने किया नहीं।
अब यह बड़े मजे की बात है। पर्शियन में या उर्दू में जो ‘बुत’ शब्द है, वह बुद्ध का बिगड़ा हुआ रूप है। इतनी मूर्तियां बनीं बुद्ध की कि मूर्ति और बुद्ध का एक ही मतलब हो गया। बुत जो है, वह बुद्ध का ही पर्वर्शन है, वह उसका ही बिगड़ा हुआ रूप है। जब पहली दफा सारी दुनिया में मूर्तियां गईं तो वे बुद्ध की ही गईं। तो लोगों ने पूछा: यह क्या है? तो उन्होंने कहा: बुद्ध। मूर्ति और बुद्ध पर्यायवाची हो गए। उस आदमी के नाम के साथ मूर्ति जुड़ गई जो मूर्ति का सबसे बड़ा दुश्मन था। बुद्ध ने कहा: किसी की शरण में मत जाना। तो लोगों ने कहा, ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’—हम तुम्हारी ही शरण आते हैं।
तो सारी तकलीफ जो है वह ये है धर्म पर जब प्रवचन कोई देता है...
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What is the reason for the controversy surrounding your teachings?
According to Osho, controversy is natural and arises because he opposes tradition, scriptures, and the authority of gurus. He insists religion is a living, personal experience that cannot be borrowed, codified, or transferred, and that only discipleship—a readiness to learn from anywhere—matters. By rejecting dead, hand-me-down truths and sectarian claims, he challenges entrenched structures, which inevitably provokes resistance.
In simple terms: People argue about Osho because he says real religion is your own fresh experience, not old books or gurus, so he won’t support traditions.
What is the fulfillment of all wants?
According to Osho, the fulfillment of all wants is to live them consciously until they are exhausted, so their grip dissolves into freedom. When ordinary desires are satisfied, a spontaneous renunciation arises and a new longing for truth awakens. This life-affirmative fulfillment—rooted in material well-being—flowers into desirelessness, not by suppression but by experiencing, where the material foundation supports the spiritual peak.
In simple terms: If you fully live your ordinary desires, they naturally fade, and you become free to seek something higher.
What is a positive philosophy of life?
According to Osho, a “positive philosophy of life” doesn’t exist as a fixed creed; real positivity is the freedom that remains when every bondage—beliefs, doctrines, traditions, gurus, scriptures, identities—is negated. Through neti, neti (not this, not that), drop all clinging; don’t grasp anything, not even ideas of God or liberation. Open the fist—let awareness rest as unbound, lived experience.
In simple terms: True positivity is open hands: let go of everything so your real self can shine.
Was India once subjugated?
According to Osho, yes—India was once subjugated by others; but the deeper issue now is self-subjugation. External rule has ended, yet inner bondage persists through conditioning, fear, complacency and collective mindsets. True freedom requires inner awakening and responsibility, not merely political independence. Liberation must move from outer chains to transforming consciousness.
In simple terms: India used to be ruled by others, but today its biggest chains are the ones it puts on itself in its own mind and habits.
What do needs mean for the body?
According to Osho, a body's 'needs' are the directives of its own innate wisdom. Left unhindered by the intellect, the body spontaneously chooses what nourishes, rejects what harms, moves where tension demands, refuses food when sick, and heals chiefly in sleep. Our task is to stop imposing mind-made disciplines and quietly listen, allowing natural postures, rhythms, and times (e.g., morning/evening) to guide practice.
In simple terms: Your body already knows what to eat, when to move, and when to rest—so hush the overthinking and let it lead.
What is the view on asanas?
According to Osho, asanas need not be practiced deliberately; when you relax and let go, the body spontaneously takes the postures and mudras it needs. These organic, arising-asanas are truly beneficial because they come from inner intelligence; forced, imitative forms are secondary. Through meditative release, the right postures appear by themselves, doing the inner work without willful effort.
In simple terms: Don’t force yoga poses; relax, and your body will naturally move into the shapes that help you.
What happens when one feels the urge to open their eyes during meditation?
According to Osho, in genuine meditation you won’t feel like opening your eyes at all. As attention deepens, peace becomes bliss, and in bliss the sense of ‘I’ merges with the experience—leaving no separate observer to be curious or restless. Go still further and even the ‘I’ disappears into the Divine, where no urge, question, or report remains.
In simple terms: When meditation is deep, you’re so full and quiet that you forget to open your eyes—there’s no ‘you’ left to want it.
What does it mean to be mentally independent and self-sufficient?
According to Osho, mental independence means an awareness that can stand on its own—existing without psychological dependence on people, things, or ideas. You reach it not by denying life’s real needs but by systematically breaking your dependencies; this deliberate untangling is the path. Freedom is not “freedom from want,” because basic desires sustain life; true freedom is awareness freed from clinging while honoring necessary needs.
In simple terms: Learn to stop clinging to things and people while still meeting your real needs like food, rest, and safety.

Osho's Commentary
आप बहुत गहरा भाव करते हैं तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ कल्पना ही है आपको। नहीं आपमें से किसी गहरे व्यक्ति से संबंधित होगा। और वह जो संबंधित हो जाए न, वहां उसके कोई फासले का सवाल नहीं है, टाइम का सवाल नहीं है, दूरी का सवाल नहीं है। यही सब पूरा का पूरा साइंटिफिक मामला है, सारी की सारी साइंस की बात है। आपकी कहीं समझ बढ़ जाए तो बहुत काम आएगी।