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सूत्र
Questions in this Discourse
और वह जो आप कहते हैं, यह खतरा है हमेशा। क्योंकि दुनिया के पिछले सारे मूर्तिभंजकों की मूर्तियां बन चुकी हैं। जीसस मूर्तिभंजक हैं और बुद्ध भी मूर्तिभंजक हैं। लेकिन बुद्ध की तो इतनी मूर्तियां बनीं कि बुत शब्द जो है वह बुद्ध का ही रूपांतरण है, वह बुद्ध का ही बिगड़ा हुआ रूप है। इतनी मूर्तियां बनीं कि बुत का मतलब ही बुद्ध होने लगा, बुत का मतलब ही बुद्ध हो गया।
तो वह बुतपरस्ती पैदा होती है। अब तक यह हुआ है। और अब इससे सीख लेनी चाहिए उन लोगों को जो मूर्तिभंजक हैं। और पहली सीख यह है कि वे अपनी मूर्ति को किसी भी तरह स्थापित न होने दें। क्योंकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके चित्त में कौन सी मूर्ति है। आपके चित्त में मूर्ति है, कि बात खत्म हो गई। आपका चित्त मूर्ति से मुक्त होना चाहिए। तो मैं तो पूरी चेष्टा करूंगा कि मेरी मूर्ति स्थापित न हो जाए।
अब जैसे कि कल ही मैंने आपसे कहा कि मैं कोई चरित्र का दावा नहीं करता हूं। अगर मुझे अपनी मूर्ति स्थापित करनी है तो मुझे चरित्र का दावा करना चाहिए।
यानी जैसे कि कल भी बात हुई, वह भूल होती है। मेरे चित्त में, जिसको पाजिटिव प्रोग्राम कहें, उसके लिए कोई जगह नहीं है। मेरी मौलिक दृष्टि निगेटिव है। और मेरा मानना भी यह है कि क्रांति की दृष्टि अनिवार्यरूपेण नकारात्मक होती है। पर उस नकार के प्रभाव से बहुत सा विधायक कार्यक्रम पैदा होता है। वह इतर बात है, वह बाइ-प्रोडक्ट है, उससे सीधा मेरा कोई संबंध नहीं है।
वह बाई-प्रॉडक्ट है।
हां, वह बिलकुल बाई-प्रॉडक्ट है। इसलिए उससे मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। मेरी दृष्टि सिर्फ यह है कि मेरा विचार स्पष्ट हो जाए और मेरा विचार साफ-साफ लोगों तक पहुंच जाए। तो वह जो मैं निषेध कर रहा हूं, अगर स्पष्ट हो जाए, तो विधायक कार्यक्रम उससे अनिवार्यरूपेण पैदा होगा। उसकी मुझे चिंता नहीं है।
दो बातें हैं। पहली तो बात यह कि जिन-जिन चीजों से भरने की संभावना हो सकती है, उन-उन को मैं नकारता हूं। जैसे कि इस कमरे में कोई मुझसे पूछे कि कुर्सी क्या है? तो मैं कहता हूं: टेबल कुर्सी नहीं है; पलंग कुर्सी नहीं है; दीवार कुर्सी नहीं है। मैं कुर्सी को छोड़ कर प्रत्येक चीज को नकारता हूं। सिर्फ रह जाती है कुर्सी!
और मेरी मान्यता है कि जो इतने नकार को समझ लेगा उसे कुर्सी दिखाई पड़ जाएगी! जैसा कि उपनिषद कहते हैं: नेति-नेति! वे कहते हैं: नाट दिस, नाट दैट। वे कहते चले जाते हैं कि यह भी नहीं, यह भी नहीं, यह भी नहीं। छोड़ देते हैं सिर्फ उसको जो है। इस सबको इनकार करने पर जो है, वह रह जाएगा। और जो इतने इनकार से गुजरेगा उसे वह दिखाई पड़ेगा, उसे वह दिखाई पड़ेगा।
और हम क्यों जोर नहीं देते हैं कि यही है सीधा, इसे कहने के लिए। क्योंकि जैसे ही हमने यह कहा, यही है सीधा, वह जो नकार की क्रांति है उससे वह आदमी गुजर ही नहीं पाता। और वही क्रांति उसके मस्तिष्क को विकसित करती है।
पाजिटिव पकड़ लेने से कोई विकास नहीं होता। जैसे हमने कह दिया, यह रही कुर्सी। वह मेरी मानता है और कुर्सी को पकड़ लेता है। अभी उसे पता नहीं चला कि यह कुर्सी क्यों है? यह टेबल क्यों नहीं है? क्योंकि टेबल को उसने इनकार नहीं किया, न उसने दीवार को इनकार किया। उसे तो कुर्सी पकड़ा दी गई, उसने कुर्सी पकड़ ली। उसने मेरी मान कर पकड़ ली।
पाजिटिव इशारा हमेशा बिलीफ पैदा करता है। निगेटिव इशारा कभी भी बिलीफ पैदा नहीं करता। क्योंकि डाउट से गुजर कर वह आदमी विचारशील बनता है। विचारशील बनने पर जब उसे दिखाई पड़ता है कि कुर्सी यह है, तो यह मामला बहुत और हो गया। यानी सत्य का साक्षात उसे होना चाहिए। मैं असत्य बता सकता हूं कि यह असत्य है, यह असत्य है।
मेरा मतलब समझे न?
और जैसे ही नकार से एक शून्य पैदा होता है, अनिवार्यरूपेण शून्य चल नहीं सकता, शून्य भरेगा। हम चाहते भी हैं कि शून्य भरे, हम चाहते भी हैं। लेकिन हम चाहते हैं कि सत्य से शून्य भरे। और असत्य का अगर ठीक-ठीक बोध हो जाए, तो फिर असत्य से यह शून्य कभी नहीं भरेगा।
यहां इतने लोग बैठे हैं, मैंने कहा, बच्चू भाई बढ़िया आदमी हैं। फिर मैं बच्चू भाई के प्रति भी अवेयर नहीं हो सकता; क्योंकि मेरी आसक्ति शुरू हो गई। और जयंत भाई के प्रति भी अवेयर नहीं हो सकता; क्योंकि उनके प्रति मेरा नकार शुरू हो गया। मैं जाग सकता हूं इस कमरे के सारे लोगों के प्रति तभी, जब मेरा कोई चुनाव नहीं है, मैं सिर्फ जाग कर देख रहा हूं।
तो वह जो च्वाइसलेस अवेयरनेस है, वह च्वाइस नहीं है।
और मेरा यह भी खयाल है कि--मैं उसको संडास नहीं कहता--सेक्स के बाथरूम को खुला रखने से क्या सिर्फ सुगंध ही फैलेगी?
इस पर मैं बात कर लेता हूं, पहले यह बात कर लूं।
जिसको हम नैतिकता कहते रहे हैं आज तक, वह नैतिकता नहीं है। वह नैतिकता ही नहीं है। क्योंकि जिस नैतिकता को भय के ऊपर खड़ा करना पड़ता है और डरा कर, स्वर्ग और नरक के प्रलोभन और डर पर, पाप और पुण्य की घबड़ाहट पर, दबाव पर, जबरदस्ती, उसको मैं नैतिक नहीं मानता। क्योंकि यह जबरदस्ती की प्रक्रिया ही अनैतिक है।
नैतिक होने का अर्थ है: एक व्यक्ति की चेतना जागरूक हो। और उस जागरूक चेतना को अनिवार्यरूपेण, जो शुभ है वही करने का भाव पैदा होता है, अशुभ का उसे भाव पैदा नहीं होता। मेरा मतलब कहने का आप समझे न? तो मैं अनैतिकता की तरफ ले जाने का जिम्मा नहीं ले रहा हूं। बल्कि मैं अनैतिकता से नैतिकता की तरफ ले जाने का प्रयास कर रहा हूं।
वही निगेटिव?
हां, निगेटिव ही। और दूसरी जो बात आप कहते हैं कि सेक्स की संडास को खुला रखने से...
संडास नहीं, बाथरूम मैं कहता हूं।
बाथरूम कहिए, इससे क्या फर्क पड़ता है। वह आपको संडास का खयाल है इसलिए बाथरूम कहते हैं। वह सेक्स के बाथरूम को खुला रखने से सुगंध ही फैलेगी, ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं। पहली तो बात यह कि सेक्स का बाथरूम नहीं है, संडास भी नहीं है।
बाग है?
यह सवाल नहीं है। यह जैसे ही हम चुनाव करते हैं न, यह जैसे ही हम थोपते हैं उस पर कुछ, हम कोई भाव ले रहे हैं। सेक्स सिर्फ जीवन का एक सहज तथ्य है, सिर्फ फैक्चुअलिटी है। उस फैक्चुअलिटी को हम चाहें तो संडास भी बना सकते हैं और चाहें तो बाग भी बना सकते हैं। सेक्स अपने आप में न्यूट्रल फैक्ट है। इसको समझ लें। मैं नहीं कह रहा हूं कि बाग है।
आप फर्ड और लारेंस के साथ नहीं हैं।
न। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि बाग है, न मैं कह रहा हूं कि संडास है। मेरा मानना है कि वह जो पुरानी नैतिकता थी, जो संडास कहती थी, उसके खिलाफ लारेंस की बगावत है। वह रिएक्शनरी है लारेंस। अब वह उसको संडास से हटा कर बगीचा कह रहा है।
मैं यह कह रहा हूं कि न मुझे पुरानी नैतिकता से मतलब है, न इन विद्रोहियों से मतलब है। मैं सेक्स को एक तटस्थ तथ्य मानता हूं। हम चाहें तो उसे संडास भी बना सकते हैं। और अगर संडास बनाना हो तो पहला काम दरवाजा बंद कर देना है। हम चाहें तो उसे बगीचा भी बना सकते हैं। और अगर बगीचा बनाना हो तो पहला काम दरवाजा खोल लेना है। यह मैं पहला ही काम कह रहा हूं, इससे काम पूरा नहीं हो गया। समझे न?
लेकिन सेक्स सुगंधपूर्ण बनाया जा सकता है। इतना सुगंधपूर्ण बनाया जा सकता है कि वह प्रेयरफुल हो जाए; इतना सुगंधपूर्ण बनाया जा सकता है कि वह स्प्रिचुअल एक्ट हो जाए। और उसे इतना गर्हित और कुत्सित और निंदित बनाया जा सकता है कि वह...।
मगर वह सब्जेक्ट्स पर आधारित होगा न बनाना। जो सब्जेक्ट्स कम्यूनियन में होंगे, वह सामाजिक व्यवस्था...
उन पर ही होगा। वही मैं कह रहा हूं। बनाने का मतलब आप समझे न?
आपके बारे में मैं नहीं कह सकता। मगर जो...
न-न, उन पर ही होगा। लेकिन उनका चित्त समाज निर्मित करता है। और अगर समाज बचपन से बच्चों को सेक्स का कंडेमनेशन सिखाता है, तो समाज संडास बनाने का इंतजाम कर रहा है। क्योंकि एक लड़के को, एक लड़की को, बीस साल तक सिखाया जाए कि सेक्स पाप है, गर्हित है।
मगर अब थोड़ा सा रिलीज हुआ है, पहले जैसा नहीं है।
हां-हां, मैं कह रहा हूं कि रिलीज हुआ है।
लेकिन हां, क्रिश्चिएनिटी में जैसा सीन है, वैसे हमारे में तो...
वह जैसे ही आप कहते हैं कि रिलीज हुआ है, आप मानते हैं कि वहां कुछ अभी जकड़ा हुआ है, जिसमें से कुछ रिलीज हुआ है। लेकिन तथ्य की तरह, तटस्थ तथ्य की तरह उसकी स्वीकृति कहीं भी नहीं है।
सब-कांशस में पड़ा होगा।
वह है न पूरा, वह है। हजारों साल से हमारा जो कलेक्टिव माइंड है, उसमें वह पड़ा हुआ है। तो हम जो रिलीज भी करते हैं थोड़ा सा, वह रिलीज भी टोटल नहीं है। और उस रिलीज से भी टेंशन पैदा होता है, क्योंकि आधा रिलीज होता है, आधा खिंचता है। यानी वह मामला ऐसा है कि जैसे कोई आदमी कार चला रहा हो, एक्सीलरेटर भी दबाता है और ब्रेक भी लगाता है। तो जो कार की हालत होने वाली है, वह आदमी के माइंड की हो रही है। इधर वह एक्सीलरेटर भी दबाता है कि गाड़ी बढ़नी चाहिए, उधर उसका अनकांशस माइंड ब्रेक भी लगाता है। इसमें गाड़ी के सिवाय टूट जाने के, एक्सीडेंट के, कुछ होने वाला नहीं है। इससे तो पुरानी हालत भी बेहतर थी, वह सिर्फ ब्रेक लगाने वाली हालत है--एक। एक सिर्फ पश्चिम की हालत है--एक्सीलरेटर दबाने वाली। अभी जो नया माइंड है वह इन दोनों के बीच में उपद्रव में पड़ गया है।
मेरा मानना है, मेरा मानना यह है कि एक्सीलरेटर भी दबाने योग्य है और उसको दबाने का वक्त है। और उसका ब्रेक भी लगाने योग्य है, लेकिन उसका भी वक्त होता है। और दोनों पर एक साथ लगाने योग्य कभी भी नहीं है। मेरी आप बात समझ रहे हैं न? जो आदमी सेक्स को सुंदर बनाना चाहता है, वह कोई ब्रेक नहीं तोड़ डालेगा; बल्कि मेरा मानना है कि उसका ब्रेक ज्यादा मजबूत साफ-सुथरा होगा। और ब्रेक इसलिए नहीं होगा कि सेक्स पाप है। ब्रेक इसलिए होगा कि सेक्स से बहुल इनर्जी है। और उस इनर्जी को कितना ऊंचा उठाना है, उतना संगृहीत करना जरूरी है।
अच्छा, प्राब्लम टेल के लेखक ए.एस.निल ने स्वयंभू-नीति की बात की है--इनहीबिशनलेस। चर्च था और चर्च में, चर्च के बाहर लड़के लोग प्ले-ग्राउंड में ऊधम करते थे और आवाज भी करते थे। तो क्या हुआ कि एक दिन रविवार आ गया तो लड़कों ने अपने आप ही अपनी स्वयंभू-नीति से ही निश्चित किया कि आज चर्च में कार्यक्रम होगा इसलिए हम यहां दंगा-फसाद, धमाल नहीं करेंगे। तो वह तो क्रिश्चिएनिटी में ही बना हुआ, गुजरा हुआ एक दृष्टांत है। ऐसे भी दृष्टांत मिलते हैं कि जो अपने आप ही वह है। इनहीबिशन है, वहां भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं।
ऐसे उदाहरण मिल सकते हैं।
तो यह व्यक्ति पर आधारित है? वह तो एक समूह था लड़कों का।
व्यक्ति पर नहीं, समाज का जो मैकेनिज्म है, उस पर बहुत कुछ निर्भर है। असल में चर्च किसी को बुलाता नहीं। समझ लें। न किसी को रोकता है, न खेलने से रोकता है। लेकिन चर्च इतना आकर्षक हो सकता है, इतना शांत हो सकता है, वहां का संगीत इतना मधुर हो सकता है, प्रार्थना इतनी आनंदपूर्ण हो सकती है कि सामने खेलने वाले बच्चों को लगे कि आज हम चर्च में चलें। लेकिन इसमें अगर कोई समझ रहा हो कि बच्चे चर्च में गए, तो बहुत गलती में है--बच्चे संगीत के लिए गए होंगे, बच्चे प्रार्थना के लिए गए होंगे।
नहीं, चर्च में जाने के लिए नहीं।
मेरा मतलब आप समझे रहे हैं न? वह अगर चर्च में बहुत संगीत बज रहा है, प्रार्थना हो रही है, लोग शांत बैठे हैं, तो भी बच्चे रुक सकते हैं कि हम ऊधम न करें, यह भी संभव है। यह भी संभव है। और यह जितना सहज हो, उतना ही उचित है, महत्वपूर्ण है, श्रेष्ठ है।
उसका कोई हर्ज नहीं।
उसका कोई भी हर्ज नहीं है। जितना सहज हो जीवन, उतना ही महत्वपूर्ण है। और वह तो इनहीबिशनलेस तो होना ही चाहिए व्यक्तित्व।
आपके जो विधान दैनिक पत्र में आए थे गांधीजी के बारे में, तो चरखे को जला दो जैसे विधान शॉक ट्रीटमेंट में यकीनन काम आ सकते हैं, आ रहे हैं। मगर मास माइंड में इससे आपके शुभहितों को थोड़ी सी हानि नहीं पहुंचेगी--आपके शुभहितों को, आपका जो मिशन है?
मैं समझा। दो बातें हैं। दो बातें हैं। एक तो मेरा मिशन क्या है? मेरा मिशन है लोगों में विचार को जगा देना। उसको कोई नुकसान इससे नहीं पहुंचने वाला है, एक बात। दूसरी बात, चरखा जला देने जैसी बात मैंने कभी कही नहीं है।
अच्छा, इट इज़ शॉकिंग! वह तो जनसाधन में छपी भी थी।
कहा जो मैंने है वह यह है, मैंने कहा है कि एक वक्त आ गया है--एक समय था कि गांधी ने अंग्रेजी कपड़े जलवाए--एक वक्त आ गया है कि गांधी ने जो टोपी दी थी लोगों को, वह जलाने के योग्य हो गई है, क्योंकि वह प्रतीक बन गई है अब सत्ता की, ब्यूरोक्रेसी की, शोषण की। एक वक्त आ गया है कि अब वह गांधी की टोपी भी जला दी जाए। यह मैंने कहा था इस संदर्भ में कि जिनको हमने कल सेवक समझा था, उनकी टोपी आज सत्ता का प्रतीक बन गई है। चरखा जलाने की बात मैंने कभी कही नहीं। टोपी! और वह भी मैंने कहा कि वक्त आ गया है कि अब वह टोपी जलाने के योग्य हो गई है।
मगर इन सब चीजों को दूसरी शक्ल दे दी जाती है।
नेहरूजी अपनी इमेज बनाए रखने के लिए हिप्नोटिज्म करते हैं और मैं लोगों के भले के लिए कर रहा हूं, ऐसा कह कर आप अपनी इमेज को थोड़ा सा ईगोइस्ट बना दिए हैं--ऐसा लोगों का खयाल है।
यह भी मैंने कभी नहीं कहा। अब यह भी समझ लेने जैसा है। मैंने कहा कुल इतना कि मनुष्य और बृहत्तर मनुष्यता विचार से कम प्रभावित होती है, सुझाव से ज्यादा प्रभावित होती है। दुनिया में जो बहुत बड़ा जो क्राउड माइंड है, जो भीड़ का मन है, वह विचार वगैरह से प्रभावित कम होता है।
तो मैंने कहा यह कि हिटलर तो जान कर, जितने भी हिप्नोटिक टेक्नीक हैं, उनका उपयोग करता था। जैसे हाल को अंधेरा रखेगा, खुद को ऊंचे मंच पर खड़ा करेगा। प्रकाश सिर्फ हिटलर के ऊपर जले रहेंगे, सारा अंधकार रहेगा। कोई आदमी दो घंटे तक किसी दूसरे को देख नहीं सकेगा, दो घंटे तक उसको हिटलर के ही चेहरे को देखना पड़ेगा। यह इमेज उसके भीतर प्रविष्ट होगी। वैज्ञानिकों से पूछ कर तय किया जाता था कि आंख का पलक कितना ऊंचा रहना चाहिए सुनने वाले का, ताकि आंख के स्नायु शिथिल हो जाएं और सजेस्टेबल हो जाए माइंड।
तो हिटलर तो यह सब जान कर करता था। मैंने कहा यह कि हिटलर यह जान कर करता था। नेहरू ने कभी जान कर यह नहीं किया है, लेकिन नेहरू से यह हुआ है, यह बिलकुल हुआ है। वह प्रोसेस में ऐसा हो गया है, नेहरू को पता भी नहीं है इसका। लेकिन यह हो गया है। मेरा मतलब आप समझ रहे हैं न?
उनका गुलाब भी सिंबल बन गया।
हां, वह सारी चीजें सिंबल बन जाती हैं। अगर नेहरू की जगह आप एक दूसरे आदमी को लाकर खड़ा कर दें भाषण करने को और कहें कि नेहरू भाषण कर रहा है, और गुलाब और सारी पूरी बात हो, तो जनता उतनी ही प्रभावित होगी जितनी नेहरू से। वह जनता नेहरू से प्रभावित नहीं हो रही, वह अपनी इमेज से प्रभावित हो रही है। वह जो इमेज उसने बना रखी है।
नेहरू के सिवाय कोई और ऐसा गुलाब रखता...।
मैं यह नहीं कह रहा, कोई और का नहीं कह रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि नेहरू की जगह, जनता को पता हो कि नेहरू ही आकर भाषण दे रहे हैं और नेहरू की इमेज पूरी की पूरी बना कर खड़ी कर दी जाए, तो जनता उतनी ही प्रभावित होगी इस आदमी से भी जो कि नेहरू नहीं है।
वे इमेज से काम ले रहे हैं। उनका रिश्ता इमेज से है।
हां, जनता इमेज से प्रभावित हो रही है, नेहरू-वेहरू से नहीं। और आज नेहरू को लाकर आप खड़ा कर दें दूसरी शक्ल में और लोगों को पता न हो कि नेहरू है...।
मैंने पढ़ा ठक्कर बाबा के बाबत, कि ठक्कर बाबा किसी ट्रेन से जा रहे हैं, कहीं से शायद अहमदाबाद आ रहे हैं या कहीं आस-पास। और उनका वहां भाषण होने वाला है, अखबारों में सब फोटो और भाषण की बात छपी है। और थर्ड क्लास के कंपार्टमेंट में एक आदमी बिस्तर लगाए हुए लेटा है। और उस भीड़ में ठक्कर बाबा खड़े हैं और उस आदमी से कहते हैं कि भई तुम थोड़ा हट जाओ, तो मुझे बैठ जाने दो। वह कहता है, खड़े रहो बुड्ढे! गड़बड़ न करो! और अखबार पढ़ कर वह बगल के आदमी से कहता है कि ठक्कर बाबा का भाषण है, वह सुनने चलना है जरूर, बहुत गजब का आदमी है साहब!
और ठक्कर बाबा बगल में खड़े हैं, उनको बैठने दे नहीं रहा है। यही आदमी कल भीड़ में ठक्कर बाबा को सुनेगा और प्रभावित होगा। यानी हम इमेज से चलते हैं।
तो मैंने कहा यह कि नेहरू का पूरा व्यक्तित्व और सारी व्यवस्था, नेहरू पर कोई पचास हजार रुपया रोज खर्च होता रहा है--सारे इंतजाम, सारी व्यवस्था, सारे शोरगुल में। यह सारा का सारा इंतजाम और सारी व्यवस्था से आदमी प्रभावित होता है।
और यह तो मैंने कभी कहा नहीं कि मैं जो हिप्नोटिज्म...एक तो मैं हिप्नोटिज्म का प्रयोग करता नहीं। समझ लें मेरी बात को! मैं तो चाहता हूं कि आदमी सजग हो जाए हिप्नोटिज्म से और कभी हिप्नोटिक रास्तों से प्रभावित न हो। क्योंकि वही सबसे खतरनाक तरकीब है जिससे आदमी के विचार को चोट पहुंचती है। तो मैं तो समझाना--यह जो बात भी समझाई थी वह इसलिए कि एक-एक आदमी को जानना चाहिए कि किन-किन तरकीबों से आपका दिमाग हिप्नोटिक स्लीप में जाता है। और उन तरकीबों से सावधान रहना चाहिए। क्योंकि जितना आदमी सावधान होगा, उतना ही दुनिया का हिप्नोटिक शोषण कम किया जा सकता है। इसलिए मैंने कहा। मैं तो यह कहता ही नहीं कि मैं हिप्नोटिज्म का प्रयोग करता हूं।
लेकिन वह जो पत्रकार ने गड़बड़ की। हुआ क्या, जो पत्रकार इसमें बातचीत में थे, वे मेरे साथ ट्रेन में बंबई तक गए। और मुझसे उन्होंने कहा कि मुझे कुछ तकलीफ है पेट में। और वह तकलीफ ऐसी है कि डाक्टर मुझे कहते हैं कि पेट में तो तकलीफ नहीं है, शायद आपके मन में ही तकलीफ है। तो क्या आप मुझे बता सकते हैं कि कोई हिप्नोटिक तरकीबों से यह फायदा हो सकता है? तो मैंने उनसे कहा कि बराबर हो सकता है, अगर तकलीफ झूठी है तो हिप्नोटिज्म से फायदा हो सकता है। और उन्होंने कहा, तो क्या आप कभी मुझे सहायता कर सकते हैं? मैंने कहा, मेरे पास वक्त हो तो दो-तीन दिन के लिए आप आ जाएं, तो मैं हिप्नोटिज्म से पूरी सहायता कर सकता हूं।
मैंने उनसे कहा, हिप्नोटिज्म एक थेरेपी बन सकता है। लेकिन मास-माइंड को प्रभावित करने के लिए बहुत खतरनाक ईजाद है।
मेरा फर्क समझ रहे हैं न आप?
उन सज्जन से मैंने कहा था कि यह थेरेपिटिक हो सकता है। और है। अगर झूठी बीमारी है तो झूठे इलाज से ठीक हो जाएगी, इसमें कोई तकलीफ नहीं है। उन सज्जन से मैंने यह कहा। उन्होंने जाकर अखबार में छापा कि मैं कहता हूं कि मेरे हिप्नोटिज्म से तो फायदा हो सकता है--क्योंकि मैंने उनसे कहा था कि आपकी बीमारी को मैं फायदा पहुंचा सकता हूं--और दूसरों के हिप्नोटिज्म से नुकसान होता है।
मैं हिप्नोटिज्म के सख्त खिलाफ हूं, थेरेपी को सिर्फ छोड़ कर। हिप्नोटिज्म को मैं एक थेरेपी मानता हूं। और जब तक दुनिया में लोग झूठे ढंग से बीमार पड़ते हैं तब तक वह काम कर सकता है। और लोग झूठे बीमार पड़ते हैं, सौ में से पचहत्तर परसेंट बीमारियां तो झूठी होती हैं, जो सिर्फ कल्पना में होती हैं।
और यह संभावना रहती है, क्योंकि एनक्डोट जो है उसके तो मल्टी आस्पेक्ट्स हैं। अब मैं किसी और आस्पेक्ट से कह रहा हूं, आपको कोई दूसरा आस्पेक्ट खयाल में आ गया तो...
राधाकृष्णन में आप वह बात नहीं कह रहे हैं।
नहीं, वह बात नहीं कह रहा हूं! दूसरी बात यह कि राधाकृष्णन को मैं कोई धार्मिक आदमी नहीं मानता, पहली बात, न ही विचारक मानता हूं और न चिंतक मानता हूं। राधाकृष्णन बिलकुल ही एक टीकाकार और एक कमेंट्रेटर और एक अनुवादक से ज्यादा नहीं हैं। अच्छे अनुवादक हैं, सुंदर अनुवादक हैं और बहुत पोएटिक एक्सप्रेशन के अनुवादक हैं। लेकिन न तो एक मौलिक विचार है उनके पास और न ही वे धार्मिक व्यक्ति हैं। धार्मिक व्यक्ति उस अर्थ में जैसे कि रमण; धार्मिक व्यक्ति उस अर्थ में जैसे कि कृष्णमूर्ति; तो उस अर्थ में वे बिलकुल भी धार्मिक नहीं हैं।
उस अर्थ में नहीं हैं!
उसी अर्थ को मैं धार्मिक कहता हूं।
तिरुपति जी का प्रसाद भी लेते हैं!
हां-हां! वे धार्मिक बिलकुल नहीं हैं। बल्कि मेरी अपनी दृष्टि यह है कि उनको अगर कहीं भी तौला जा सके, तो वे एक बहुत ही चालाक किस्म के राजनीतिज्ञ हैं। एक पोलिटीशियन से ज्यादा वे नहीं हैं। और वह भी मैं चालाक किस्म के कहता हूं। क्योंकि पोलिटीशियन भी साफ-सुथरा हो और सीधा हो, तो उसमें भी एक बात होती है। वे साफ-सुथरे और सीधे भी नहीं हैं। वे पीछे के रास्तों से राजनीति पर सारी यात्रा किए हैं।
बनारस यूनिवर्सिटी में जब राधाकृष्णन वाइस चांसलर थे, तो राज बहादुर, वह वहां प्रेसिडेंट था यूनियन का विद्यार्थियों की। तो उसने पीछे एक वक्तव्य में कहा कि जब मैं प्रेसिडेंट था यूनियन का, तो राधाकृष्णन मेरी खुशामद करके और मुझसे कहते थे कि कांग्रेसी नेताओं से मेरी सिफारिश करके आगे मुझे बढ़ाने की कोशिश करो। और डाक्टर लोहिया ने उसका वक्तव्य पार्लियामेंट में भी पेश किया।
इट इज़ नाट टु बी प्रिंटेड?
नहीं, मैं नहीं कहता। प्रिंट-व्रिंट करो जो करना है, उसमें कोई हर्जा नहीं है। उसमें कोई हर्जा नहीं है। इसमें कोई चिंता की बात नहीं है।
राधाकृष्णन को मैं कोई न तो धार्मिक आदमी मानता हूं और न कुछ कोई बड़ा विचारक मानता हूं।
रही विवेकानंद और दयानंद के बारे में।
हां, दयानंद एक बड़े पंडित हैं। और कई अर्थ में मौलिक पंडित हैं, बड़ा मौलिक चिंतन है उनका। लेकिन वे पंडित ही हैं, धार्मिक आदमी नहीं हैं। दयानंद की बजाय विवेकानंद ज्यादा धार्मिक आदमी हैं, मौलिक चिंतक भी हैं।
मगर वह तो इनएक्शन, केवल थ्रू निगेटिंग एक्शन थ्रूआउट योर लाइफ...।
हां-हां, बिलकुल हो सकता है। धार्मिक व्यक्ति की अभिव्यक्तियां बहुत तरह की हो सकती हैं। एक धार्मिक व्यक्ति परिपूर्ण रूप से सक्रिय हो सकता है। एक धार्मिक व्यक्ति परिपूर्ण रूप से निष्क्रिय हो सकता है। लेकिन एक मजे की बात है, दोनों के बीच एक खूबी रहेगी: धार्मिक व्यक्ति अगर परिपूर्ण रूप से सक्रिय है तो भी भीतर से निष्क्रिय होगा; और धार्मिक व्यक्ति अगर बाहर से बिलकुल निष्क्रिय है तो भी भीतर से परिपूर्ण सक्रिय रहेगा।
मेरे खयाल से रमण का प्रतिरूप आप हैं, एक्शन को...
यह हो सकता है। मेरी दृष्टि में धार्मिक व्यक्ति की दो स्थितियां हो सकती हैं--या तो उसकी प्रवृत्ति में निवृत्ति होगी या निवृत्ति में उसकी प्रवृत्ति होगी।
तब फिर जरूरी यह है कि हम एक-एक व्यक्ति के विचार को परसुएड करें, समझाएं-बुझाएं और इस बात के लिए राजी करें कि तुम अकेले मत बदलो, बल्कि समाज के यंत्र को बदलने का सामूहिक प्रयास करो। क्योंकि समूह का जो यंत्र है वह सिर्फ व्यक्ति के हृदय बदल जाने से नहीं बदल जाने वाला, उस यंत्र को भी बदलना पड़ेगा।
जैसे हम यहां इतने लोग बैठे हैं। कंडीशनर चल रहा है, वह एक यंत्र है। बच्चू भाई बदल गए, वे कहते हैं, कंडीशनर नहीं चलना चाहिए। लेकिन हम दस लोग कहते हैं कि कंडीशनर चलना चाहिए। समझे न आप? तो बच्चू भाई क्या कर सकते हैं? बच्चू भाई क्या कर सकते हैं? वह एक यंत्र है, जो हम दस की इच्छा से चल रहा है। बच्चू भाई की भी इच्छा थी, उन्होंने अपनी इच्छा खींच ली, तो बच्चू भाई गिर जाएंगे यंत्र के बाहर; लेकिन यंत्र जारी रहेगा और बच्चू भाई की जगह दूसरा आदमी बैठ जाएगा। उस यंत्र को बदलने के लिए जरूरी है...हम दसों आदमी भी राजी हो जाएं और फिर भी यंत्र को न बदलें, हम दसों भी राजी होकर बैठ गए और यंत्र को न बदलें, तो भी यंत्र जारी रहेगा।
इट इज़ पासिबल?
इसलिए मैंने कहा कि गांधी जी का वह ट्रस्टी का काम नहीं करेगा। वह गांधी जी की ट्रस्टीशिप की बात व्यक्ति पर विश्वास को जाहिर करती है, लेकिन अवैज्ञानिक है। क्योंकि हम कब किस स्थिति में आकर दुनिया के साढ़े तीन अरब लोगों को राजी करेंगे कि तुम अब व्यक्तिगत संपत्ति छोड़ दो या व्यक्तिगत संपत्ति के ट्रस्टी हो जाओ।
तो मेरा कहना यह है कि हमें व्यक्ति के विचार को राजी करके और समूह के यंत्र की प्रक्रिया को तोड़ना और बदलना पड़ेगा।
पहले सामाजिक व्यवस्था या परिवेश? पहले परिवेश या सामाजिक व्यवस्था?
न, ऐसा पहले और पीछे का प्रश्न ही असंगत है, साथ ही है सारा मामला। वह मुर्गी और अंडे जैसा मामला है कि कौन पहले? वह कोई पहले नहीं है। व्यक्ति का विचार बदलेगा--समाज बदलेगा। समाज बदलेगा--व्यक्ति का विचार बदलेगा। इतने जुड़े हुए हैं ये कि हमें दोनों तरफ प्रयास करना होगा।
ही इज़ जस्ट ए कॉग इन ए ग्रेट मशीनरी।
हां, उस बड़ी मशीन में वह कर क्या सकता है? और अगर समझो वह सब कुछ छोड़ देगा, तो वह भिक्षा-पात्र लेकर बैठ जाएगा, सर्वोदय-पात्र लेकर, और शोषण जारी करेगा। वह करेगा क्या? जब शोषण की व्यवस्था चल रही है और आपको उसमें जीना है...।
हां, एक ही रास्ता है, आप शोषण से बच सकते हैं इस व्यवस्था में कि आप मर जाएं।
सुसाइड?
हां, और कोई रास्ता नहीं है। तो वह आप करेंगे क्या? जयंत भाई को अच्छी लगी मेरी बात और उन्होंने जमीन दान दे दी। फिर जयंत भाई क्या करेंगे? ये कुछ तो करेंगे न इस सोसाइटी में जीने के लिए! ये जो भी करेंगे उसमें शोषण जारी रहेगा। और बहुत संभावना इस बात की है कि जितनी जमीन इन्होंने छोड़ दी है, उसको पैदा करने के लिए तेजी से शोषण करेंगे। क्योंकि इनकी सारी स्थिति डगमगा गई वह छोड़ देने से, उनको फिर वापस पैदा कर लेना पड़ेगा।
तो मैं एकाध-दो उदाहरण के आधार पर नहीं कह रहा हूं। मैं कह रहा हूं कि वह निरपवाद वैसा है।
ग्लैमर ऑफ अनसर्टेनटी।
हां, तो वह अनसर्टेनटी इतनी रसपूर्ण है कि वह हमें पैदा करनी चाहिए।
वह मिस्टीक बन जाती है।
हां, बिलकुल मिस्टीक है। और वह हमें पैदा करनी चाहिए। सच बात तो यह है कि सिक्योरिटी बिलकुल फाल्स है, जिंदगी इनसिक्योरिटी है। और उस इनसिक्योरिटी में हम कितना रस ले पाते हैं, इस पर ही हमारी जीवन की कला निर्भर है।
हां, वह सिर्फ, अगर वह अहिंसा उसने साध ली है ऊपर से, तो भीतर उसके हिंसा मौजूद है। ऊपर से क्षमा साध ली है, भीतर क्रोध मौजूद है। क्योंकि आपकी जो प्रक्रिया है चरित्र को पैदा करने की, वह दमन की है। तो चरित्रवान जो व्यक्ति है वह भीतर से उतना ही चरित्रहीन है जितना कि दूसरा चरित्रहीन बाहर से आपको चरित्रहीन दिखाई पड़ रहा है। बल्कि एक मेरी और मान्यता है कि सामान्यतः जिसको हम चरित्रहीन कहते हैं, वह ज्यादा सरल, सीधा और साफ हो सकता है। लेकिन जिसको हम चरित्रवान कहते हैं, वह बहुत कुटिल, जटिल और कनिंग होता है। क्योंकि उसको दोहरे व्यक्तित्वों को सम्हालना पड़ता है पूरे वक्त।
स्प्लिट पर्सनैलिटी है।
हां, स्प्लिट पर्सनैलिटी है। मैं उसको चरित्रवान कहता नहीं। मेरा कहना है कि एक और चरित्र है, जो जीवन की स्पांटेनिटी, जो जीवन की सहजता से निकलता है, जो जीवन को समझने से निकलता है। वैसा जो आदमी है, वह जीवन को समझने की वजह से एक तरह से जीता है, दमन की वजह से नहीं। इस वजह से नहीं कि मोक्ष जाना है, इस वजह से भी नहीं कि लोग अच्छा कहेंगे, रिस्पेक्टबिलिटी उसका कारण नहीं है।
लेकिन जिसको आप चरित्रवान कहते हैं, उसका मौलिक कारण सिर्फ रिस्पेक्टबिलिटी है कि लोग आदर देंगे। अगर लोगों का आदर खिसक जाए तो वह चरित्र उसका खिसक जाएगा। मैं उस व्यक्ति को चरित्रवान कहता हूं, जो न रिस्पेक्टबिलिटी के लिए वैसा कर रहा है, न मोक्ष के लिए, न स्वर्ग के लिए, न पुण्य के लिए; उसे आनंदपूर्ण जो है वह कर रहा है, समझपूर्ण जो है वह कर रहा है। ऐसा व्यक्ति चरित्रवान होगा मेरी दृष्टि में। लेकिन ऐसे व्यक्ति को चरित्रवान होने का दावा भी नहीं होगा। ऐसे व्यक्ति को चरित्रवान होने का अहंकार भी नहीं होगा। ऐसे व्यक्ति को चरित्रवान होने का पता भी नहीं होगा। वह कांशस भी नहीं होगा कि मैं चरित्रवान हूं।
तो गार्ड के लिए वह टिकट लेता है ट्रेन में, ऐसा चरित्रवान होगा तथाकथित।
बिलकुल ही, उसके लिए ही लेता है, उसके लिए ही लेता है।
अच्छा, महात्मा जी ने राजकरण में धर्म को प्रवेश दिया। आज लोग कहते हैं कि धर्म प्रवचन के निमित्त आपने धर्म में राजकरण का प्रवेश करवाया। एनी कमेंट?
मेरी दृष्टि यह है, मेरी दृष्टि यह है कि जीवन एक समग्रता है। उसे मैं धर्म, राजनीति और शिक्षा, इस तरह तोड़ता नहीं हूं। मेरे लिए जीवन एक अखंडता है! और जो व्यक्ति जीवन की अखंडता को समझने चलेगा, उस व्यक्ति को जीवन के सारे पहलुओं पर सोचना पड़ेगा और सारे पहलुओं पर विचार भी करना पड़ेगा। तो मैं जीवन को खंड-खंड में, वह कंपार्टमेंटलाइज करने के पक्ष में नहीं हूं। मेरे लिए जीवन एक अखंड इकाई है!
और अब तक लेकिन यही किया गया है कि जीवन को खंड-खंड बांट दिया गया है। एक धार्मिक आदमी है तो वह बस निपट धार्मिक है। उसकी मंदिर तक सीमा है, उसे जीवन की किसी बात पर नहीं बोलना है। जीवन में राजनीति में जो आदमी खड़ा है, उसे मंदिर से कुछ लेना-देना नहीं है, वह अपनी दुनिया में है। ऐसे हमने टुकड़े-टुकड़े बांटे हैं। इन टुकड़ों से समाज भी स्प्लिट पर्सनैलिटी हो गई है और व्यक्ति भी स्प्लिट पर्सनैलिटी हो गई है। मैं इन सबको इकट्ठा करना चाहता हूं। मेरे लिए यह सवाल ही नहीं है।
गांधी जी के लिए यह सवाल था। क्योंकि गांधी जी यह कहते थे कि मैं एक राजनैतिक व्यक्ति हूं और धार्मिक बनने की कोशिश कर रहा हूं। मैं यह नहीं कहता हूं कि मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूं और राजनैतिक बनने की कोशिश कर रहा हूं। मैं यह नहीं कहता हूं। मैं यह कहता हूं कि मैं एक व्यक्ति हूं जो जीवन को उसकी अखंडता में देखना और जीना चाहता हूं। उस अखंडता में जो भी आता है, मुझे स्वीकार है। उस अखंडता में मुझे किसी चीज से इनकार नहीं है।
उसमें लीडिंग का तत्व आता है।
जरा भी नहीं आता। मैं अपनी दृष्टि जाहिर कर रहा हूं। जैसे ही मैं यह कहूं कि मेरी दृष्टि को मान कर चलो, वैसे ही लीडिंग का तत्व आता है। मेरा कुल कहना इतना है...।
वह तो स्टाइल का सवाल हुआ न।
न-न, स्टाइल का सवाल नहीं है, मेरी दृष्टि का ही पूरा सवाल है। मेरा कहना ही कुल इतना है कि मैंने जो कह दिया...वह तो कृष्णमूर्ति भी अगर लोगों से यह कहते हैं...
हां, वह तो पूछा ही है कि आप गुरु नहीं हैं?
नहीं, अगर यह भी आप लोगों को कहते हैं कि किसी को लीड करना, इसमें भी वासना है, तो यह कहना भी उस अर्थ में लीड करना शुरू हो गया।
महर्षि तो बोलते भी नहीं थे।
न, न, न। तो न बोलें तो भी लीड करना शुरू हो गया।
मौन भी कभी...।
इससे क्या फर्क पड़ता है, इससे क्या फर्क पड़ता है? आप यह कह रहे हैं कि नहीं बोलना चाहिए। इससे फर्क क्या पड़ता है? असल में जीना अभिव्यक्ति है। यू कैन नॉट एक्झिस्ट विदाउट एक्सप्रेशन। तो तुम एक्झिस्ट करोगे, तुम्हारा जो भी एक्सप्रेशन हो! मैं कल चुप होकर बैठ जाऊं एक कोने में, तो भी मैं लीड कर रहा हूं एक अर्थ में। क्योंकि जयंत भाई मेरे पास आएंगे और देखेंगे और कहेंगे कि हां, यह आदमी शांत हो गया चुप बैठने से; हम भी जाएं, चुप बैठें और शांत हो जाएं।
मेरा मतलब आप समझ रहे हैं न? आप जब तक जीते हैं तो आप अभिव्यक्त करेंगे, कुछ भी करेंगे अभिव्यक्त, आंख बंद कर लेंगे, तो एक आदमी सोचेगा कि आंख बंद कर लेने से मिलता है सत्य, तो आंख बंद कर लेगा। हमारा जीना अभिव्यक्ति है। इसलिए कोई किसी भी तरह से जीए, जब तक वह जीता है, अभिव्यक्त करेगा। इसलिए इसको मैं लीड करना नहीं कहता। मेरा कहना है कि जब वह सचेष्ट, जब वह चेष्टा करके और आपको अनुगमन देने की कोशिश करता है। और कहता है, मेरे पीछे आओ! जो मैं कहता हूं, उसको मानो! जो मैं कहता हूं, वही सत्य है! जो मैं कहता हूं, वैसे ही चल कर तुम कहीं पहुंच सकोगे, नहीं तो नहीं पहुंच सकोगे! तब वह लीड कर रहा है।
मेरा यह काम नहीं है। मेरा काम कुल इतना है कि मुझे जो ठीक लगता है, जो आनंदपूर्ण है, वह मैं कह देता हूं। बात खत्म हो गई। इससे आगे मेरा आपसे कोई संबंध नहीं है।
आपने कल बताया कि धूल में लेटने-खेलने वाले सिंहासन को लात मारने की चेष्टा जताने की तकलीफ क्यों उठाते हैं। उनका रिएक्शन है। सिंहासन को लात मारने की बात करते हैं। मेरा मंतव्य यह है कि आपका अभियान धूल-धूसरित लोगों के सामने है।
नहीं, मेरा सबके सामने है। मुझे कोई प्रयोजन नहीं धूल-धूसरित से और महल में रहने वाले से।
आप दृष्टांत जब देते थे, तब सिंहासन वाले को धूल वाला ऐसा बोलता है यहां संतुष्ट रह कर। तो कल जो आप कह रहे थे, इसमें से टोन ऐसा लगता था कि आप धूल-धूसरित लोगों के सामने ऐसा कहते हैं।
जरा भी नहीं, जरा भी नहीं। वह जो दृष्टांत मैं दे रहा था, वह तो सिर्फ मैं यह कह रहा था कि लोग दुख में रह कर सुखी आदमी की तरफ देख कर संतोष पाने के न मालूम कितने उपाय खोजते हैं।
मेरे अभियान के लिए किसी आदमी से उसका कोई संबंध नहीं है, न गरीब से, न अमीर से। आदमी से संबंध है। और अभियान से भी मेरा संबंध कुल इतना है कि मुझे जो ठीक लगता है वह मैं कह देता हूं, क्योंकि कहना मुझे आनंदपूर्ण है। बात खत्म हो गई। उसके पीछे कोई अभियान नहीं है, मिशन जैसी भी कोई बात नहीं है।
अच्छा, आप यह तो कबूल करते होंगे न कि प्रतिक्रिया में सत्य वाष्पीभूत हो जाता है?
बिलकुल वाष्पीभूत हो जाता है। प्रतिक्रिया में सत्य कभी बचता ही नहीं, क्योंकि प्रतिक्रिया हमेशा दूसरी अति पर चली जाती है। सत्य तो सिर्फ वहीं बचता है, जहां प्रतिक्रिया भी नहीं है और प्रतिगामिता भी नहीं है। जहां चीजें अत्यंत मध्य में हैं, वह जो गोल्डन मीन है, न हम प्रतिगामी हैं और न प्रतिक्रियावादी हैं, न हम किसी चीज को जोर से पकड़ लिए हैं, न जोर से छोड़ना चाहते हैं, हम मध्य में खड़े होकर चीजों को देखते हैं, वहीं सत्य होता है। सत्य सदा मध्य में है, अतियों पर कभी सत्य नहीं है। और प्रतिक्रिया में हमेशा अति हो जाती है।
आरोपण है?
आरोपण भी क्या है, सिर्फ प्रचलन है। मैं जिस कालेज में प्रोफेसर था, तो उस इलाके में तो प्रोफेसर को हिंदी में आचार्य कहते हैं।
अध्यापक-प्राध्यापक, ऐसा नहीं कहते?
नहीं!
आचार्य यहां प्रिंसिपल को कहते हैं।
वहां प्रिंसिपल को प्राचार्य कहते हैं। वहां प्रिंसिपल को प्राचार्य कहते हैं और प्रोफेसर को आचार्य कहते हैं। वह उसकी वजह से आचार्य लग गया पीछे। न तो आरोपण है, न उसका कोई सवाल है, वह सिर्फ प्रचलन है। उसे बिलकुल ही खत्म कर देना चाहिए। उसे खत्म करने का उपाय करना चाहिए। क्योंकि जो आप कहते हैं उससे भ्रम पैदा होता है, उसे खत्म ही कर देना चाहिए।
मौन का महिमा-महत्व समझाने के लिए, एक घंटे तक...
हां, और वेश-परिवेश की बात भी आपकी रह गई है, वह आपकी बात रह गई है। मुझे जो आनंदपूर्ण है वैसा वेश मैं पहनता हूं। मुझे जो आनंदपूर्ण है वैसा ही मुझे पहनना चाहिए। अगर इस डर से मैं पहनूं कि किसको कैसा लगेगा, तब फिर मैं आपकी दृष्टि में अपनी इमेज को देखने की फिकर कर रहा हूं। मुझे जो आनंदपूर्ण है वह मैं पहनता हूं।
मैं भी खादी पहनता हूं, कांग्रेस में नहीं मानता।
ठीक है, जो आनंदपूर्ण है वह आप पहनेंगे, वही पहनना चाहिए। अगर मैं इस डर से भी अपने कपड़े बदल दूं कि कहीं मेरे कपड़ों को देख कर कहीं कोई धार्मिक न समझ लेता हो, तब भी मैं आपकी आंख में, आप मुझे क्या समझते हैं, इसकी चिंता कर रहा हूं। मुझे इसकी चिंता नहीं है कि आप क्या समझते हैं।
सार्त्र कहता है न कि दि अदर पीपुल्स लाइफ इज़ हेल।
है ही, बिलकुल है ही। बिलकुल है ही।
मौन का महिमा-महत्व समझाने के लिए एक घंटे तक प्रवचन देना, क्या एक कंट्राडिक्शन नहीं है?
बिलकुल नहीं है, बिलकुल नहीं है। क्योंकि मजा ऐसा है कि अगर सफेद लकीर भी खींचनी हो तो हम काले तख्ते पर खींचते हैं। कंट्राडिक्शन नहीं है। बोलने से भी समझाया जा सकता है कि बोलना बेकार है; और पढ़ने से भी जाना जा सकता है कि पढ़ना व्यर्थ है; और चलने से पता चल सकता है कि कहीं चलने से नहीं पहुंचा जाता है।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Is the statement that the exploiter gives in charity while not disappearing a generalization from a few small examples?
According to Osho, this is not a mere generalization from a few cases but an invariant truth: in an exploitative society, an individual donor cannot cease exploiting while alive. Charity or renunciation doesn’t dissolve systemic machinery; one remains a cog, often compensating by exploiting more to regain lost position. Only death escapes complicity.
In simple terms: Giving to charity doesn’t stop exploitation because the whole system makes people keep exploiting unless they’re no longer part of it.
Is revolution a metaphorical flower that continues to blossom?
According to Osho, revolution is a living flower: yes—indeed, it keeps blossoming. It is not a single event but an ongoing unfolding, each moment opening new petals of awareness. Such transformation renews itself continually when nourished by consciousness, love, and courage, inviting us to remain open, responsive, and alive to the ever-fresh movement of change.
In simple terms: True revolution keeps opening like a flower that never stops blooming.
Doesn't the iconoclast end up having his own image established in the popular mind?
According to Osho, a genuine iconoclast destroys the very tendency to make idols, including his own, and actively prevents any image of himself from forming. If he smashes others’ idols while desiring his own, he secretly becomes an idol‑maker. The lesson: keep consciousness image‑free; refuse moral halos and personal statues, or truth hardens into worship and opposes reality.
In simple terms: A real breaker of idols also stops people from turning him into an idol; otherwise he’s just making a new statue.
What is the significance of the title Acharya in relation to spiritual identity?
According to Osho, the title 'Acharya' has no spiritual significance; it was merely a regional academic designation for a professor that stuck to his name. Because it breeds confusion and reinforces concern for others' perceptions, it should be dropped. Spiritual identity, he says, lies in authentic, blissful living, not in titles, clothes, or borrowed images.
In simple terms: It's just an old job title, not a holy label; who you are has nothing to do with names or outfits.
What is meant by 'vivek'?
According to Osho, vivek is the inner discernment that arises when thought becomes utterly pure—free of motives, fear, and conditioning. In such clarity, mind functions like a spotless mirror, distinguishing the real from the unreal without distortion. Vivek is not mere intellect; it is a transparent awareness that guides right seeing, right feeling, and right action.
In simple terms: Vivek means your thinking is so clean and clear that you can see the truth and choose wisely.
How can changing the environment occur without a change in the social order?
According to Osho, the either/or framing is false: environment and social order (and the individual mind) co-create each other in a single, simultaneous movement. No side comes first. Transform the individual and society shifts; transform social structures and minds shift. Therefore, cultivate inner awareness while working for outer reforms; coordinated change on both fronts is essential.
In simple terms: You can’t change the setting without changing the players, so grow inside and fix outside at the same time.
Does twisting stories for illustrative purposes harm facts and history?
According to Osho, twisting stories for illustrative purposes does not harm facts or history: he never alters genuinely historical anecdotes, preserving them exactly. When a tale is non-historical—a parable, myth, or teaching story—he may reshape it to clarify insight. Facts remain intact; only fictional frames are flexed to convey the essence of truth.
In simple terms: If it really happened, he keeps it unchanged; if it’s a teaching tale, he might tweak it to make the lesson clearer.
Is choiceless awareness a kind of choice, and what is the paradox involved?
According to Osho, choiceless awareness is not a choice but pure awakening: you simply look, without deciding right/wrong or accepting/rejecting. Awareness by nature is choiceless; the moment choice appears, bias and psychological sleep begin. The paradox is that trying to 'choose' choicelessness reintroduces choice—so one cannot decide into awareness; one relaxes into simple, preference-free seeing.
In simple terms: Don’t pick sides—just watch everything without liking or disliking, because choosing blocks clear seeing.
