नहीं राम बिन ठांव — प्रवचन 12 Nahin Ram Bin Thaon #12
Questions in this Discourse
ओशो, कल आपने कहा कि क्रोध-घृणा आदि भावों को दूसरे पर न निकालें। लेकिन ध्यान में जाने पर जब दमित काम-ऊर्जा बाहर कूद पड़ेगी, तो उसके रेचन के लिए तो दूसरा आवश्यक ही है। और यह काम-ऊर्जा जब भयंकर झंझावात की तरह अपने आदिम रूप में प्रकट होती है, तो न तो नियंत्रण काम देता है और न साक्षीभाव। वह तो अभिव्यक्ति ही मांगती है। लेकिन काम के साथ हमारे सारे नैतिक मूल्य जुड़े हुए हैं। तो इस काम-ऊर्जा की अभिव्यक्ति के लिए यदि विद्यमान पति या पत्नी में पर्याप्त गहराई न हो, तो क्या साधक अनुकूल साथी की खोज करे? और क्या इससे बहुत-सी उलझनें पैदा नहीं होंगी?
इसलिए जब भी दूसरे के साथ हम किसी भाव से जुड़ते हैं, तो हम एक अंतहीन उपद्रव में पड़ रहे हैं।
संन्यास का अर्थ ही यही है कि अब से मेरे भाव और मेरे संवेग दूसरे से मैं नहीं जोडूंगा। अब मेरे भाव और मेरे संवेग एकांत में ही प्रकट होंगे और विसर्जित होंगे। यह अनंत आकाश ही अब उन्हें लेने वाला होगा, अब मैं व्यक्तियों को उन्हें नहीं दूंगा।
व्यक्तियों को देने का अर्थ ही यह होता है कि मैं संबंध निर्मित कर रहा हूं, एक श्रृंखला बना रहा हूं। दूसरा भी मनुष्य है, मेरे ही जैसा कमजोर है, उसमें प्रतिक्रियाएं पैदा होंगी। दूसरा आकाश जैसा तो नहीं है कि तुम्हें आत्मलीन कर लेगा, आत्मसात कर लेगा और प्रत्युत्तर न देगा। दूसरे में तो प्रतिगूंज होगी। फिर तुममें प्रतिगूंज की प्रतिगूंज होगी। और फिर यह सिलसिला जारी रहेगा।
जन्मों-जन्मों से यही तुमने किया है। न मालूम कितने जाल तुमने अपने चारों तरफ खड़े कर लिए हैं। न मालूम कितने लोगों पर क्रोध किया है। न मालूम कितने लोगों से लोभ किया है। न मालूम कितने लोगों से मोह और काम के संबंध निर्मित किए हैं। उन सबका बोझ तुम ढो रहे हो।
इस बोझ के बाहर जाने का केवल एक ही उपाय है कि तुम दूसरे से अपने संवेगों को जोड़ना छोड़ दो। एकांत में तुम्हारे संवेग प्रकट हों।
इसे समझना पड़े, क्योंकि बड़ा कठिन है। क्रोध तुम्हें समझ में भी आ जाए कि एकांत में निकाल लेंगे, लेकिन काम कैसे निकालेंगे?
क्रोध भी कठिन है एकांत में निकालना प्रथम चरणों में, क्योंकि क्रोध भी दूसरे की मांग करता है। इसलिए मैंने तुम्हें तकिया दिया। वह सिर्फ सहारा है। जल्दी ही उसे भी छोड़ देना है, क्योंकि वह भी दूसरा बन जाता है। पर प्राथमिक रूप से उचित है, उपयोगी है।
अगर तुम तकिए पर क्रोध वास्तविक रूप से कर सकते हो, तो कोई भी कारण नहीं है कि तकिए पर तुम प्रेम क्यों वास्तविक रूप से नहीं कर सकते? अगर तकिए पर तुम नाराज हो सकते हो, तो तकिए को तुम आलिंगन क्यों नहीं कर सकते?
और जब तुम दूसरे व्यक्ति के साथ क्रोध या प्रेम के संबंध बनाते हो, तब भी खेल तो सब मन का ही है। दूसरा करेगा क्या? जब तुम किसी को आलिंगन में लेते हो, तब दूसरे का हड्डी-मांस-मज्जा ही तुम्हारे हाथ में आती है। वह कुछ तकिए से ज्यादा मूल्यवान नहीं है। आखिर हड्डी या मांस या चमड़ी तकिए से कैसे ज्यादा मूल्यवान हो सकती है? बस तुम्हारा खयाल है कि दूसरा मौजूद है। इसलिए तुम अपने प्रेम को विस्तीर्ण कर पाते हो।
जब तुम किसी आदमी के सिर पर चोट करते हो, तो उस चोट में और एक तकिए पर लकड़ी से चोट करने में क्या फर्क है? फर्क तुम्हें दिखाई पड़ता है, क्योंकि तुम मानते हो, दूसरा वहां है और तकिया तो कोई भी नहीं। फर्क दिखाई पड़ता है, क्योंकि दूसरे से प्रत्युत्तर मिलेगा और तकिए से प्रत्युत्तर नहीं मिलेगा, इतना ही फर्क है।
दूसरा जवाब देगा। जब तुम प्रेम से किसी व्यक्ति को आलिंगन में लोगे, तो वह भी तुम्हें आलिंगन में लेगा। उससे तुम्हें प्रेम करने में सुविधा पड़ेगी, क्योंकि प्रत्युत्तर जगाएगा, प्रत्युत्तर उत्तेजित करेगा और श्रृंखला निर्मित हो जाएगी।
तकिए के साथ कठिनाई यह है कि तुम अकेले हो। तकिया कोई उत्तर न देगा। सब कुछ तुम्हें ही निर्मित करना पड़ेगा।
लेकिन यह प्राथमिक कठिनाई सभी वेगों में होगी--काम हो, क्रोध हो या कोई भी वेग हों। थोड़े ही क्षणों में, थोड़े ही दिनों में, तुम समर्थ हो जाओगे। और तब तुम्हें बड़ी हंसी आएगी कि तुमने अब तक जितने लोगों को आलिंगन किया था, वे भी तकिए से ज्यादा नहीं थे, वे भी निमित्त थे।
प्रेम भी तुम्हारा एकांत ध्यान बने, इसमें कई अड़चनें हैं। अड़चनें संस्कार की हैं। अड़चनें ऐसी हैं कि बचपन से कुछ बातें सिखाई गई हैं, और वे बाधा डालेंगी।
जैसे पुरुष है, अगर कामवासना तकिए पर प्रकट करे, तो यह भी हो सकता है कि उसका वीर्य स्खलित हो जाए। तो भय है। वह भय बचपन से सिखाया गया है कि वीर्य की एक बूंद भी स्खलित हो जाए, तो महागर्त में गिर रहे हो, बड़ी जीवन-ऊर्जा नष्ट हो रही है। हिंदू मानते हैं कि चालीस दिन में भोजन करने से एक बूंद वीर्य बनता है। सरासर असत्य है, झूठ बात है, इसमें रत्तीभर भी सच्चाई नहीं। लेकिन बच्चों को डराने के लिए ईजाद की गई है। और बच्चे डरते हैं, वह तो ठीक है, बूढ़े भी डरते हैं।
एक साधारण पुरुष सत्तर वर्ष के जीवन में आसानी से कोई चार हजार बार संभोग कर सकता है। प्रत्येक संभोग में कोई एक करोड़ से लेकर दस करोड़ तक वीर्याणु स्खलित होते हैं। एक शरीर के भीतर इतने वीर्याणु हैं कि अगर प्रत्येक वीर्याणु गर्भस्थ हो जाए, तो इस पृथ्वी पर जितनी जनसंख्या है, वह एक जोड़े से पैदा हो सकती है। चार अरब व्यक्ति एक स्त्री और एक पुरुष से पैदा हो सकते हैं।
और यह जो वीर्य है, यह कोई आपके भीतर संचित संपदा नहीं है कि रखा हुआ है, इसमें से कुछ निकल गया, तो कुछ कम हो जाएगा। यह वीर्य प्रतिपल पैदा हो रहा है। शरीर श्वास ले रहा है, भोजन कर रहा है, व्यायाम कर रहा है--यह वीर्य पैदा हो रहा है। और आप हैरान होंगे कि जो आधुनिक खोजें हैं चिकित्साशास्त्र की, वे बड़ी भिन्न हैं, विपरीत हैं।
वे कहती हैं, जो व्यक्ति जितना वीर्य का उपयोग करेगा, उतने ज्यादा दिन तक पुंसत्व उसमें शेष रहेगा। जो जितनी जल्दी भय से बंद कर देगा वीर्य का उपयोग या संभोग, उतने जल्दी उसका वीर्य खो जाएगा। क्योंकि जब तुम वीर्य का उपयोग करते हो, तो तुम्हारे पूरे शरीर को फिर वीर्य पैदा करने की क्रिया में संलग्न होना पड़ता है। जब तुम वीर्य का उपयोग नहीं करते, तो शरीर को संलग्न नहीं होना पड़ता। धीरे-धीरे शरीर की क्षमता वीर्य को पैदा करने की कम हो जाती है। यह बहुत उलटा दिखाई पड़ेगा। जो लोग जितना ज्यादा संभोग करेंगे, उतनी लंबी उम्र तक संभोग करने में समर्थ रहेंगे। जो लोग जितना कम संभोग करेंगे, उतनी जल्दी रिक्त हो जाएंगे और चुक जाएंगे।
तो पश्चिम में चिकित्सक समझाते हैं कि बुढ़ापे तक, सत्तर और अस्सी वर्ष और नब्बे वर्ष तक भी अगर संभोग जारी रखा जा सके, तो तुम्हारे ज्यादा जीने की संभावना है। क्योंकि शरीर तुम्हारा ताजा रहेगा। वीर्य बाहर जाता है, तो नया वीर्य शरीर पैदा करता है। और नए वीर्य में शक्ति होती है, ताजगी होती है। पुराना वीर्य धीरे-धीरे बासा हो जाता है, जड़ हो जाता है। और वीर्य की जड़ता के साथ तुम्हारे पूरे शरीर में जड़ता व्याप्त हो जाती है।
हमें यहां हैरानी होती है--पश्चिम में हम सुनते हैं, कोई नब्बे वर्ष का व्यक्ति शादी कर रहा है। हमें बहुत हैरानी होती है कि शादी का क्या प्रयोजन है अब? लेकिन पश्चिम में नब्बे वर्ष का बूढ़ा भी संभोग कर सकता है। और करने का कारण सिर्फ यह है कि वीर्य के संबंध में सारी धारणा बदल गई है। और वैज्ञानिक धारणा सच्चाई के ज्यादा करीब है।
जीवन के सभी अंगों में यह बात सच है कि उनका तुम उपयोग करो, तो वे सक्षम रहते हैं। एक आदमी चलता रहे, बुढ़ापे तक चलता रहे, तो पैर मजबूत रहते हैं। चलना बंद कर दे, पैर कमजोर हो जाते हैं। एक आदमी मस्तिष्क का उपयोग करता रहे आखिरी क्षण तक, तो मस्तिष्क ताजा रहता है। उपयोग बंद कर दे, मस्तिष्क जड़ हो जाता है।
सारी इंद्रियों का जीवन उपयोग पर निर्भर है, क्रियात्मकता पर निर्भर है। तुम जिन इंद्रियों का उपयोग करते हो, वे उतने ही ज्यादा दिन तक ताजी रहेंगी। और वीर्य भी एक इंद्रिय है। उसके लिए कोई अपवाद नहीं है। वह भी शरीर का ही अंग है। शरीर का नियम यह है कि तुम जितना ज्यादा उपयोग लोगे, उतना ज्यादा जीवंत रहेगा। तुम भयभीत हुए, डरे, उपयोग बंद किया, उतनी ही जल्दी शरीर क्षीण हो जाएगा।
और यह एक दुष्टचक्र है। क्योंकि जो व्यक्ति डरता है, कम उपयोग करता है, शरीर क्षीण होता है। क्षीण होने से और डरता है। और डरने से अपने को और रोकता है। और रोकने से और क्षीण होता है। फिर कोई उपाय नहीं। फिर उसने एक रास्ता पकड़ लिया, जिस पर वह जल्दी ही मिट जाएगा।
भय रोकता है, रोकने से हम मरते हैं। निर्भय होकर जीवन को ऐसा उपयोग करो--रोजा लक्जेंबर्ग ने, एक जर्मन महिला ने कहा है--जैसे कोई मशाल दोनों तरफ से जले, ऐसे जलो।
घबड़ाओ मत, तुम ज्यादा जलोगे, जीवन बड़ा विराट है। तुम्हारे दीए में बहुत तेल है। लेकिन तुम जलाओ ही नहीं बाती को, भयभीत हो जाओ, तो तुम डूब जाओगे।
सारी दुनिया में पुरानी संस्कृति और सभ्यताओं ने वीर्य के संबंध में बड़ा भयभीत किया है लोगों को। इसके कारण हैं। क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति वीर्य के संबंध में भयभीत हो जाता है, उसे गुलाम बनाना आसान है। आपने उसकी जड़ पकड़ ली। वीर्य जड़ है। अगर किसी व्यक्ति को कामवासना के संबंध में बहुत अपराध से भर दिया, तो यह व्यक्ति न तो विद्रोही रह जाएगा, न शक्तिशाली रह जाएगा। और सदा अपराध की भावना इसको दबाएगी। अपराधी को दबाना बहुत आसान है।
तो राज्य भी चाहता है कि आप अपराध अनुभव करें, समाज भी चाहता है। सभी--जिनके हाथ में सत्ता है--चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति, जो पैदा हो, वह भयभीत रहे। भयभीत रहे, तो उसकी मालकियत की जा सकती है, उसका मालिक हुआ जा सकता है। निर्भय हो जाए, तो वह सब बंधन तोड़ देगा, सब रास्ते; वह स्वतंत्रता से जीएगा। विद्रोही हो जाएगा।
तो बचपन से हम बच्चों को सिखाते हैं कि वीर्य का स्खलन न हो जाए, सम्हालना। वीर्य के संबंध में हम कंजूसी सिखाते हैं। और इसको हम ब्रह्मचर्य कहते हैं।
यह ब्रह्मचर्य नहीं है। कृपणता ब्रह्मचर्य नहीं है। और न वीर्य को जबर्दस्ती रोक लेने से ब्रह्मचर्य का कोई संबंध है। ब्रह्मचर्य तो एक ऐसे आनंद की घटना है, जब आपका अस्तित्व के साथ संभोग शुरू हो गया; और इसलिए व्यक्ति के साथ संभोग की कोई जरूरत नहीं रह जाती।
यह जरा कठिन है समझना। और अगर मैं कहूं, तो बहुत बेचैनी होगी। संत वैसा व्यक्ति है, जिसका अस्तित्व के साथ संभोग शुरू हो गया। वहां कोयल कूकती है, तो उसका पूरा शरीर संभोग के आनंद को अनुभव करता है। वहां वृक्ष में फूल खिलते हैं, तो उसके पूरे शरीर पर, जैसी संभोग में आपको थिरक अनुभव होती है, उसका रोआं-रोआं वैसा थिरकता है और नाचता है। सुबह सूरज उगता है, रात चांद आकाश में होता है, तो हर घड़ी संभोग की समाधि उसे उपलब्ध होती रहती है। उसका रोआं-रोआं संभोग में समर्थ हो गया है; आपकी केवल जननेंद्रिय संभोग में समर्थ है।
इस संबंध में एक बात समझ लेनी जरूरी है। कभी खयाल भी नहीं आया होगा! हमने शिव की प्रतिमा, शिवलिंग निर्मित की है। शिव जैसे पूरे के पूरे लिंग हैं, इसका मतलब यह होता है। इसका मतलब होता है, शिव के पास न आंखें हैं, न हाथ हैं, न पैर हैं, मात्र लिंग है, सिर्फ जननेंद्रिय है।
यह संतत्व की आखिरी दशा है, जब व्यक्ति का पूरा शरीर जननेंद्रिय हो गया। इसका प्रतीक अर्थ यह हुआ कि अब वह पूरे शरीर के साथ जगत के साथ संभोग में रत है। अब यह संभोग लोकल नहीं है। यह जननेंद्रिय और जननेंद्रिय का मिलना नहीं है, अब यह अस्तित्व और अस्तित्व का मिलना है।
शिव का शिवलिंग हमने निर्मित करके जगत को एक ऐसी धारणा दी है, जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है।
लेकिन हिंदू भी यह अर्थ नहीं करेगा। अर्थ बिलकुल साफ है। अंधे हम हैं। हम इतने भयभीत हैं कि हम यह अर्थ ही नहीं करेंगे। हम तो छिपाने की कोशिश करते हैं।
पश्चिम में बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक हुआ कार्ल गुस्ताव जुंग। वह भारत आयायात्रा पर। तो वह पुरी, कोणार्क, खजुराहो के मंदिर देखने गया। जब वह कोणार्क के मंदिर को देखने गया, तो जो पंडित उसे मंदिर दिखा रहा था, वह बड़ा बेचैन, परेशान था--क्योंकि जगह-जगह नग्न-मैथुन की प्रतिमाएं थीं--और बहुत गिल्टी, अपराधी अनुभव कर रहा था। और जुंग बहुत प्रभावित था। क्योंकि जुंग इस सदी के उन थोड़े से लोगों में से है, जिन्होंने मनुष्य की चेतना में बड़ा गहरा प्रवेश किया है।
और जितनी गहराई में प्रवेश होगा, उतना ही मैथुन अर्थपूर्ण होगा। क्योंकि मैथुन से ज्यादा गहरा आपके भीतर कुछ भी नहीं जाता। शायद मैथुन के क्षण में आप जिस अवस्था में होते हैं, उससे ज्यादा गहरी अवस्था में साधारणतः आप कभी नहीं होते। जिस दिन समाधि उपलब्ध होगी, उस दिन ही मैथुन के पार आप जाएंगे, उससे गहरी अवस्था उपलब्ध होगी।
तो जुंग तो बहुत आनंद से देख रहा था। वह पंडित बहुत परेशान था। उसको लग रहा था कि क्या गलत चीजें हम दिखा रहे हैं। और यह आदमी पश्चिम में खबर ले जाएगा, तो हमारी संस्कृति के बाबत क्या सोचेंगे?
और ऐसा वह पंडित ही सोचता था, ऐसा नहीं है। गांधीजी तक सोचते थे कि कोणार्क और खजुराहो को मिट्टी के ढेर में दबा देना चाहिए, ताकि हमारी बदनामी न हो।
एक लोग थे इस मुल्क में, जिन्होंने खजुराहो बनाया, कोणार्क बनाया। और बनाया था संतों के निर्देशन में, क्योंकि ये मंदिर हैं। फिर महात्मा हमारे मुल्क में होने लगे, जो उन्हें मिटा देना चाहते हैं या दबा देना चाहते हैं।
गांधी को मैं कभी भी हिंदू नहीं मान पाता। वह ईसाई हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा, उनकी पकड़ ईसाई की है। ईसाई बहुत डरा हुआ है इस तरह की चीजों से। ईसाई सोच ही नहीं सकता कि चर्च में और मैथुन की प्रतिमा हो सकती है, या शिवलिंग हो सकता है।
जैसे ही मंदिर से विदा होने लगे जुंग, तो उस आदमी ने, पंडित ने, कान में कहा कि क्षमा करें, यह विकृति अतीत में कुछ लोगों के मन की प्रतिछवि है; यह कोई हमारा राष्ट्रीय प्रतीक नहीं है। और ऐसा मत सोचना आप कि यह हमारा धर्म या हमारा दर्शन है। यह तो कुछ विकृत मस्तिष्कों का उपद्रव है।
जुंग ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मैं हैरान हुआ कि इतनी महत्वपूर्ण प्रतिमाएं हैं, और इतने गहरे गई प्रतिमाएं हैं। लेकिन आज के हिंदू की यह दृष्टि है! हिंदू भी कमजोर हो गया है।
शिवलिंग का अर्थ है: एक ऐसी दशा, जब तुम्हारा पूरा शरीर रोएं-रोएं से संभोग अनुभव कर सकता है। तभी तुम्हें जननेंद्रिय के संभोग से छुटकारा मिलेगा और ब्रह्मचर्य उपलब्ध होगा।
तो ब्रह्मचर्य भोग से मुक्ति नहीं है, परमभोग का आस्वाद है। लेकिन भोग इतना परम हो जाता है कि तुम्हें उसे करने की अलग से जरूरत नहीं होती। हवा का झोंका आता है, तो तुम्हारा रोआं-रोआं उस पुलक को अनुभव करता है, जो प्रेमी अपनी प्रेयसी के स्पर्श से अनुभव करेगा।
लेकिन हमने बच्चों को डराया हुआ है। उनको इतना डरा दिया है कि कभी काम में ठीक संभोग उपलब्ध ही नहीं हो पाता। वह भय बना ही रहता है। कंजूसी-कृपणता बनी ही रहती है। डर बना ही रहता है कि कहीं शक्ति खो न जाए। एक-एक दर्जन बच्चों के मां-बाप हो जाने के बाद भी लोगों को यह डर बना रहता है कि शक्ति कहीं खो न जाए।
शक्ति खोने का डर नास्तिक को हो सकता है, आस्तिक को नहीं होना चाहिए। आस्तिक की धारणा ही यही है कि हम शक्ति के अनंत स्रोत से जुड़े हैं। नास्तिक को डर होना चाहिए। इसलिए नास्तिक अगर कृपण हो जाए वीर्य के संबंध में, समझ में आता है; आस्तिक कृपण हो जाए, बिलकुल समझ में नहीं आता।
उस भय के कारण तुम्हें एकांत में प्रेम बड़ा मुश्किल मालूम पड़ेगा।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, भय छोड़ो। और जैसा तुमने क्रोध तकिए पर प्रकट किया है, वैसा ही तुम प्रेम तकिए पर प्रकट करो। जो भी परिणाम हों, परिणामों की फिक्र जल्दी मत करो। यह भी हो सकता है कि प्राथमिक चरणों में तुम इतने उत्तेजित हो जाओ कि वीर्य-स्खलन हो जाए। उस स्खलन को तुम परमात्मा के चरणों में समर्पण ही समझना। जिससे ऊर्जा आती है, उसी में वापस चली गई। तुम उससे भयभीत मत होना।
जल्दी ही वह क्षण आ जाएगा, जब इस प्रेम के ध्यान में वीर्य का स्खलन नहीं होगा। और जब यह ध्यान गहन होगा और वीर्य का स्खलन न होगा, तब तुम एक नए स्वाद को उपलब्ध होओगे। वह स्वाद है बिना शक्ति को खोए आनंद के अनुभव का। शक्ति जब तुम्हारे भीतर दौड़ती है प्रगाढ़ता से, तुम एक तूफान बन जाते हो शक्ति के, तुममें एक ज्वार आता है, लेकिन यह ज्वार तुम उलीचकर फेंक नहीं देते, यह ज्वार एक नृत्य बनकर तुममें ही लीन हो जाता है।
इस फर्क को ठीक से समझ लें।
एक तो साधारण जीवन का ढंग है, जिसको हम भोग कहते हैं। वह ढंग यह है कि तुममें एक ज्वार आता है, वह ज्वार भी जैसे चाय की प्याली में आया तूफान, क्योंकि लोकल है, जननेंद्रिय से संबंधित है। तो सारे शरीर में जो भी तरंगें उठती हैं, वे जननेंद्रिय पर जाकर केंद्रित हो जाती हैं। एक दो क्षण में चुक जाता है ज्वार। एक हवा आई, तुम आंदोलित हुए, जननेंद्रिय ने सारी ऊर्जा को लेकर निष्कासित कर दिया। जैसे फुग्गे से हवा निकल गई, तुम मुर्दा पड़ गए, सो गए। यह जो क्षणभर के लिए ज्वार आना और खो जाना है, इसको तुमने भोग समझा है। यह तो भोग का अ, ब, स, भी नहीं है।
भोग की तंत्र की जो व्याख्या है, वह है: तुम्हारा पूरा शरीर ज्वार से भर जाए। रोआं-रोआं तरंगित हो, तुम अपने को इस तरंगायित स्थिति में बिलकुल विस्मृत ही कर जाओ, तुम्हें याद भी न रहे कि मैं हूं। नृत्य रह जाए, नर्तक न बचे। गीत रह जाए, गायक न बचे। तुम्हारा पूरा अस्तित्व एक्सटेटिक हो, समाधिस्थ हो, तो तुम एक ऊंचाई पर पहुंचोगे--ऊंचाई पर--रोज ऊंचाई बढ़ती जाएगी।
और ध्यान रहे: यह जो ऊंचाई के बढ़ने की प्रतीति है, यह तुम्हारे पूरे शरीर को होगी, जैसे तुम्हारा पूरा शरीर स्पंदित हो रहा है, सजग हो रहा है। अभी जननेंद्रिय में तुम स्पंदन अनुभव करते हो, सजगता अनुभव करते हो। तब पूरा शरीर शिवलिंग हो जाएगा और तुम अनुभव करोगे कि तुम्हारे शरीर की जो रूपरेखा है, वह खो गई है।
शिवलिंग कविता नहीं है, एक अनुभव है। और जब पूरे ज्वार से जीवन भर जाता है और तुम्हारा सारा शरीर रोमांचित होता है, तब तुम अपने आसपास ठीक शिवलिंग की आकृति में प्रकाश का एक वर्तुल देखोगे। तुम पाओगे कि तुम्हारे पूरे शरीर की रूपरेखा खो गई और शिवलिंग बन गया। एक प्रकाश का अंडाकार रूप, जिसमें तुम्हारी आंखें नहीं होंगी, नाक नहीं होगी, कान नहीं होंगे, हाथ नहीं होंगे, सिर्फ एक अंडाकार रूप रह जाएगा।
यह ज्योतिर्मय जो रूप है, यह जो अंडाकार रूप है, यही तुम्हारी आत्मा का रूप है। जिस दिन तुम मां के गर्भ में प्रवेश हुए, ठीक शिवलिंग की आकृति का एक प्रकाश-बिंदु मां के गर्भ में प्रविष्ट हुआ। शरीर तो तुम्हें गर्भ के भीतर मिला। जब तुम शरीर को छोड़ोगे, मृत्यु घटित होगी--पहले भी घटित हुई है--तब तुम्हारा शरीर, आकार पड़ा रह जाएगा; शिवलिंग, ज्योतिर्मय पिंड तुमसे उठेगा और दूसरी यात्रा पर निकल जाएगा।
जिस दिन तुम संभोग की परम अवस्था में आओगे और पूरा शरीर रोमांचित होगा, उस दिन तुम जैसे जन्म के समय में घटना घटी थी, मृत्यु के समय में घटी थी, लेकिन जन्म के समय तुम मूर्च्छित थे, मृत्यु के समय फिर तुम मूर्च्छित हो जाओगे, इस संभोग के क्षण में--इस संभोग का कोई संबंध दूसरे से नहीं है, इस संभोग का संबंध तुम्हारे भीतर शरीर के सब बांध को तोड़कर तुम्हारी चेतना का शिवलिंग बन जाने से है--तुम्हें पहली दफा अपने स्वरूप का अनुभव होगा। और यह स्वरूप अस्तित्व के साथ जो आनंद का अनुभव करता है, उसको तंत्र ने संभोग कहा है।
यह एकांत में भी घट सकता है, किसी के साथ भी घट सकता है।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, एकांत की ही तुम चिंता करना, क्योंकि दूसरे के साथ उपद्रव खड़े होने ही वाले हैं। एकांत में घट जाए, तो तुम मुक्त हो गए। फिर दूसरे के साथ भी घटेगा, तो भी तुम जानोगे कि इसका दूसरे से कुछ लेना-देना नहीं है। यह घटना स्वतंत्र है। रोएं-रोएं से प्रकाश निकलता है, तुम्हारे भीतर एक ज्वार उठता है।
और जो फर्क है...जब तुम्हारे भीतर पूर्ण ज्वार होता है, तो उस पूर्ण ज्वार का कोई भी स्खलन नहीं है। वह स्खलित होगा भी कैसे? और जो अंडाकार आकृति है, वह स्खलन को रोकती है। उसमें कहीं छिद्र भी नहीं है, जहां से स्खलन हो सके। ऊर्जा वर्तुल में घूमने लगती है, स्खलित नहीं होती। एक अंतर-वर्तुल निर्मित हो जाता है और ऊर्जा वर्तुल में घूमने लगती है। और धीरे-धीरे, धीरे-धीरे तुममें फिर लीन हो जाती है, तुमसे बाहर नहीं जाती। तुममें उठती है, तुममें लीन हो जाती है। जैसे सागर में ज्वार आता है, फिर लीन हो जाता है। कहीं कुछ खोता नहीं।
औैर जब पहली दफा तुम्हें अनुभव होता है कि भोग की परम क्षमता शिखर को छूकर फिर मुझमें लीन हो जाती है, तब तुम्हारा भोग स्थिर हो जाता है। तब तुम प्रतिपल ऐसे आनंदित होते हो जैसे संभोगी व्यक्ति क्षणभर को होता है।
संतत्व का यही आनंद है। संत संभोग को छोड़ सके, इसलिए नहीं कि उन्होंने वीर्य पर नियंत्रण पा लिया। संत संभोग को छोड़ सके, क्योंकि उन्होंने परमसंभोग की कला खोज ली। उन्हें विराट राज्य मिल गया, वे तुम्हारे क्षुद्र उपद्रव में उत्सुक न रहे। यह बड़े की उपलब्धि है, छोटा अपने आप छूट जाता है।
जो छोटे को छोड़ने में लगता है, बड़े को बिना पाए, वह मुश्किल में पड़ जाता है। बड़ा तो मिलता नहीं और छोटे को छोड़ने में दुखी हो जाता है।
इसलिए तुम्हारे तथाकथित संत दुखी, उदास, परेशान, पीड़ित, हारे हुए, पिटे-पिटाए, बस किसी तरह जी रहे हैं। उनकी आंखों से, उनके व्यक्तित्व से, उस परम का नाद उठता हुआ मालूम नहीं पड़ता और ऐसा नहीं लगता कि उनके हृदय की वीणा बज रही है। उनके पास जाकर तुम भी उदास हो सकते हो, उनके पास जाकर तुम अपराध अनुभव कर सकते हो, उनके पास जाकर तुम्हें लग सकता है कि तुम निपट पापी हो, उनके पास जाकर तुम कुछ कसमें और व्रत और नियम ले सकते हो, लेकिन उनके पास जाकर तुम अहोभाव से नहीं भर सकते। उनके पास से तुम्हें रोग मिल सकते हैं, परम स्वास्थ्य नहीं मिल सकता।
मैं उस घड़ी को परम स्वास्थ्य कहता हूं, जब तुम अपनी ऊर्जा के शिखर को वर्तुल बनाने में समर्थ हो जाते हो। यह एकांत में ही घटेगा।
और जो मैं कह रहा हूं, वह खतरे से भरा है। सभी महत्वपूर्ण चीजें खतरे से भरी हैं। जिन चीजों से कोई हानि नहीं होती, उनसे कभी कोई लाभ नहीं होता; जिनसे हानि हो सकती है, उनसे लाभ हो सकता है। हमेशा हानि और लाभ का द्वार बराबर खुलता है।
तो मैं जो कह रहा हूं, वह खतरे से भरा है, चूंकि उसमें परम आनंद का द्वार भी छिपा है। यह भी हो सकता है कि तुम्हारा यह एकांत में प्रेम और काम की वृत्ति में भरना सिर्फ हस्तमैथुन जैसी चीज बन जाए, मास्टरबेशन बन जाए। तब तुम खतरे में पड़ गए।
वह खतरा है। उसी खतरे से समाज ने डरा-डराकर तुम्हें इस हालत में ला दिया है कि तुम्हारे जीवन से काम और प्रेम की सुगंध चली गई है। उस खतरे से मैं आगाह करता हूं। लेकिन वह खतरा तभी है, जब तुम होशपूर्वक इस प्रयोग में न उतरो और तुम अपने को धोखा देने लग जाओ।
अगर तुम अपने को धोखा नहीं दे रहे हो, तो एकांत में जो आत्म-रमण है--अपने ही भीतर प्रेम की प्रक्रिया को पूरा उठा लेना है--वह परम उपलब्धि बन सकती है।
चरण उसके होंगे। पहले चरण में खतरा है, वीर्य-स्खलन हो सकता है। स्त्रियों के लिए पहले चरण में हस्तमैथुन जैसी स्थिति आ सकती है। लेकिन उससे भयभीत नहीं होना। उसको ज्यादा ध्यान भी नहीं देना। ध्यान तो भीतर जो घट रही है घटना, उस पर लगाना। और ध्यान इस बात पर देना कि तुम्हारा पूरा शरीर उत्त्
ोजित हो--स्थानीय उत्तेजना न हो--पूरा शरीर आंदोलित हो। सारा शरीर कंपे, पुलकित हो, कोई भी शरीर का हिस्सा वंचित न रह जाए इस ज्वार से।
तो तुम नाचना, तुम कूदना, तुम प्रफुल्लित होना। और तुम रोएं-रोएं को मौका देना कि वह भागीदार हो जाए। अगर तुमने पूरे शरीर को भागीदार होने का मौका दिया, तो जननेंद्रिय पर जो केंद्रीकरण है, वह विघटित हो जाएगा।
मनोवैज्ञानिक इस स्थिति को पोलीमार्फस कहते हैं। पूरा शरीर! मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चा जब पैदा होता है, तो उसका पूरा शरीर काम के रस को अनुभव करता है। लेकिन फिर हम उसको धीरे-धीरे स्थानीय में बदल देते हैं। पूरा शरीर इरोटिक है, इसलिए छोटा बच्चा अपने अंगूठे को भी पीकर इतना आनंदित मालूम पड़ता है। अगर छोटे बच्चे का आप अध्ययन करें, वह अपने अंगूठे को पी रहा है, तो ऐसा लगता है जैसे किसी संभोग में लीन है। देखें, आपने गौर से देखा नहीं होगा, क्योंकि हम कुछ चीजों के प्रति अपने को अंधा रखते हैं; एक छोटे बच्चे को अपना अंगूठा पीते देखें। और आप पाएंगे, वह पूरा शरीर उसका पुलक रहा है। एक किलकारी उसके पूरे शरीर पर फैल रही है। वह रसमग्न है।
मगर आपसे नहीं देखा जाता, आप फौरन अंगूठा उसका मुंह के बाहर कर देंगे, आपकी बर्दाश्त के बाहर है। आप समझते हैं, आप कुछ सिखा रहे हैं। आप एक चीज सिखा रहे हैं कि उसका पूरा शरीर इरोटिक, कामुक न रह जाए। और बच्चे का पूरा शरीर कामुक है। अभी बच्चे की जो कामेंद्रिय है, वह अलग नहीं है, वह पूरा शरीर ही उसका कामेंद्रिय की हालत में है। इसलिए वह शरीर के किसी भी कोने से रस लेता है। बच्चा पड़ा-पड़ा सिर्फ करवट लेता रहता है या पड़ा-पड़ा सिर्फ हिलता रहता है और रस लेता है। उसका पूरा शरीर अभी सुख अनुभव करता है।
जल्दी ही हम उसके सुख की धारा को एक नहर बना देंगे। फिर वह पूरे शरीर में नहीं डोलेगी। वह सिर्फ कामेंद्रिय में प्रवेश कर जाएगी। फिर उसके जीवन में जो भी सुख होंगे काम के, वे एक छोटी-सी इंद्रिय पर सीमित हो जाएंगे क्षणभर को। और सारे शरीर की ऊर्जा उस इंद्रिय से निष्कासित होकर, शरीर हल्का हो जाएगा।
कामवासना से हमें जो सुख मिलता है, वह सुख कम है, केवल बोझ का हल्का हो जाना है--एक रिलीफ। एक तनाव पैदा हो जाता है शक्ति के होने के कारण, वह शक्ति निकल जाती है, आप हल्के हो जाते हैं।
इसलिए अक्सर लोग कामवासना को नींद की एक दवा की तरह उपयोग करते हैं। शरीर ऊर्जा से भरा हो तो नींद नहीं आती, रेस्टलेसनेस मालूम होती है। ऊर्जा शरीर से निकल जाए, तो आप हल्के हो गए, सो जाते हैं। थक गए, सो जाते हैं। अन्यथा कोई और बड़ा सुख कामवासना से आपको मिल नहीं रहा है।
इसलिए जब साधु-संत आपको समझाते हैं कि कामवासना में कोई सुख नहीं, तो आप राजी हो जाते हैं। क्योंकि आपको कोई सुख मिल ही नहीं रहा है, वे ठीक आपका ही अनुभव कह रहे हैं। या जब वे कहते हैं, क्या क्षुद्र सुख में प़ड़े हो, तो आप राजी हो जाते हैं। क्योंकि क्षुद्र तो मालूम होता है, कोई सुख तो मिलता दिखता नहीं, सिर्फ एक आदत बन गई है।
और आदतों की एक खूबी है। जैसे किसी को सिगरेट पीने की आदत है। वह पीता है, तो कुछ भी नहीं पाता; नहीं पीता है, तो बेचैनी और तलफ लगती है। आदतों का यह स्वभाव है कि अगर उनको करें, तो कुछ मिलता नहीं; न करें, तो ऐसा लगता है, कुछ खो रहा है। करें, तो मिलता कुछ भी नहीं; न करें, तो लगता है, कुछ खो रहा है।
बस कामवासना भी एक आदत हो गई है। उसको आप करते चले जाते हैं। इसलिए जब साधु-संत कहते हैं, इसमें कुछ भी सार नहीं, आप भी राजी होते हैं, क्योंकि आपका भी अनुभव है कि सार कुछ भी नहीं।
पर मैं आपसे कहता हूं कि कामवासना अगर पूरे शरीर पर फैल जाए और आप शिवलिंग बन जाएं...। अच्छा होगा एक छोटा-सा शिवलिंग वहां रखें, जहां आप ध्यान करने बैठते हैं। शिवलिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रतिमा पृथ्वी पर कभी नहीं खोजी गई। उसमें आपकी आत्मा का पूरा आकार छिपा है। और आपकी आत्मा की ऊर्जा एक वर्तुल में घूम सकती है, यह भी छिपा है। और जिस दिन आपकी ऊर्जा आपके ही भीतर घूमती है और आपमें ही लीन हो जाती है, उस दिन शक्ति भी नहीं खोती और आनंद भी उपलब्ध होता है। फिर जितनी ज्यादा शक्ति संगृहीत होती जाती है, उतना आनंद बढ़ता जाता है। और जल्दी ही एक घड़ी आ जाती है, जब आप बिना कुछ खोए, बिना कुछ दिए, बिना कुछ लगाए दांव पर, आनंद को पाते हैं।
अकारण आनंद जिस दिन मिलने लगता है--और यह जो अकारण आनंद की दशा है, इसको सच्चिदानंद कहा है--पूरे अस्तित्व के साथ संभोग शुरू हो जाता है। होना ही संभोग का रूप हो जाता है। आपका होना, श्वास लेना भी संभोग का स्वरूप हो जाता है। भीतर श्वास गई और आनंद से भर जाता है। बाहर श्वास गई और आनंद से भर जाता है। फिर आनंद के लिए कुछ विशेष आयोजन नहीं करने होते। जो भी हो रहा है, वही आनंद हो जाता है। धूप में बैठे हैं और सूरज की किरणें चेहरे पर पड़ रही हैं, तो वहां भी आनंद हो जाता है। और आनंद संभोग जैसा हो जाता है।
सभी आनंद का स्वभाव संभोग जैसा है।
हमने शंकर की प्रतिमा को, शिव की प्रतिमा को अर्धनारीश्वर बनाया है। शंकर की आधी प्रतिमा पुरुष की और आधी स्त्री की--यह अनूठी घटना है।
और जो लोग भी जीवन के परम रहस्य में जाना चाहते हैं, उन्हें शिव के व्यक्तित्व को ठीक से समझना ही पड़ेगा। और सब देवताओं को हमने देवता कहा है, शिव को महादेव कहा है। उनसे ऊंचाई पर हमने किसी को रखा नहीं। उसके कुछ कारण हैं। क्योंकि उनकी कल्पना में हमने सारा जीवन का सार और कुंजियां छिपा दी हैं।
अर्धनारीश्वर का अर्थ यह हुआ कि जिस दिन परमसंभोग घटना शुरू होता है, आपका ही आधा व्यक्तित्व आपकी पत्नी और आपका ही आधा व्यक्तित्व आपका पति हो जाता है। आपकी ही आधी ऊर्जा स्त्रैण और आधी पुरुष हो जाती है। है ही वैसा। और इन दोनों के भीतर जो रस और जो लीनता पैदा होती है, फिर शक्ति का कहीं कोई विसर्जन नहीं होता।
अगर आप बायोलाजिस्ट से पूछें आज, तो वह राजी है। वे कहते हैं, हर व्यक्ति दोनों है, बाई-सेक्सुअल है। वह आधा पुरुष है, आधा स्त्री है। होना भी चाहिए, क्योंकि आप पैदा एक स्त्री और एक पुरुष के मिलन से हुए हैं। तो आधे-आधे आप होना ही चाहिए। अगर आप सिर्फ मां से पैदा हुए होते, तो स्त्री होते; सिर्फ पिता से पैदा हुए होते, तो पुरुष होते। लेकिन आपमें पचास प्रतिशत आपके पिता और पचास प्रतिशत आपकी मां मौजूद है। तो आप आधे-आधे होंगे ही। आप न तो पुरुष हो सकते हैं, न स्त्री हो सकते हैं--अर्धनारीश्वर हैं।
बायोलाजी ने तो अब खोजा है इधर पचास वर्षों में, लेकिन हमने अर्धनारीश्वर की प्रतिमा में, आज से कम से कम पचास हजार साल पहले, इस धारणा को स्थापित कर दिया। और यह धारणा हमने कोई बायोलाजी, जीव-शास्त्र के आधार पर नहीं खोजी, यह हमने खोजी योगी के अनुभव के आधार पर। क्योंकि जब योगी भीतर लीन होता है, तब वह पाता है कि मैं दोनों हूं, प्रकृति भी और पुरुष भी; मुझमें दोनों मिल रहे हैं; मेरा पुरुष मेरी प्रकृति में लीन हो रहा है; मेरी प्रकृति मेरे पुरुष से मिल रही है; उनका आलिंगन अबाध चल रहा है; वर्तुल पूरा हो गया है।
मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि आप आधे पुरुष हैं और आधे स्त्री हैं। आपका चेतन पुरुष है, आपका अचेतन स्त्री है। अगर आपका चेतन स्त्री का है, तो आपका अचेतन पुरुष है। और उन दोनों में एक मिलन चल रहा है।
जगत द्वंद्व से निर्मित है, इसलिए आप दो होंगे ही। आप बाहर खोज रहे हैं स्त्री को, क्योंकि आपको भीतर की स्त्री का पता नहीं। आप बाहर खोज रहे हैं पुरुष को, क्योंकि आपको भीतर के पुरुष का पता नहीं।
और इसीलिए, कोई भी पुरुष मिल जाए, तृप्ति न होगी, कोई भी स्त्री मिल जाए, तृप्ति न होगी। क्योंकि भीतर जैसी सुंदर स्त्री बाहर पाई नहीं जा सकती।
और आपके पास, सबके पास, एक ब्लू-प्रिंट है। वह आप जन्म से लेकर घूम रहे हैं। इसलिए आपको कितनी ही सुंदर स्त्री मिल जाए, कितना ही सुंदर पुरुष मिल जाए, थोड़े दिन में बेचैनी शुरू हो जाती है, लगता है कि बात बन नहीं रही। सभी प्रेमी असफल होते हैं। क्योंकि बात बननी करीब-करीब असंभव है।
वह जो प्रतिमा आप भीतर लिए हैं, वैसी प्रतिमा जैसी स्त्री आपको अगर कभी मिले, तो शायद तृप्ति हो सकती है। लेकिन वैसी स्त्री आपको कहीं मिलेगी नहीं। उसके मिलने का कोई उपाय नहीं है। क्योंकि जो भी स्त्री आपको मिलेगी, वह किन्हीं पिता और मां से पैदा हुई और उन पिता और मां की प्रतिछवि उसमें घूम रही है। आप अपनी प्रतिछवि लिए हुए हैं हृदय के भीतर।
जब आपको अचानक किसी को देखकर प्रेम हो जाता है, तो उसका कुल मतलब इतना होता है कि आपके भीतर जो प्रतिछवि है, उसकी ध्वनि किसी में दिखाई पड़ गई, बस। इसलिए पहली नजर में भी प्रेम हो सकता है, अगर किसी में आपको वह बात दिखाई पड़ गई, जो आपकी चाह है--चाह का मतलब, जो आपके भीतर छिपी स्त्री या पुरुष है--किसी में वह रूप दिखाई पड़ गया, जो आप भीतर लिए घूम रहे हैं, जिसकी तलाश है।
चीन में एक पुरानी कथा है कि जब पहली दफा पृथ्वी पर परमात्मा ने स्त्री और पुरुष को बनाया, तो उन दोनों को इकट्ठा पैदा किया। वे जुड़े थे--ठीक जुड़वां तभी अर्थ होता है--वे जुड़े थे। अर्धनारीश्वर थे। लेकिन इससे बड़ी अड़चन होती थी। काम-धाम, दोनों को साथ जाना पड़ता, दो शरीर साथ ढोने पड़ते। तो उन्होंने प्रार्थना की कि हमें अलग-अलग कर दें, सुविधा रहेगी। सुविधा की दृष्टि से परमात्मा ने उन्हें अलग-अलग कर दिया। अलग-अलग होकर इतनी बड़ी पृथ्वी पर अनंत-अनंत जन्मों में वे खो गए।
प्रेम अपने उस जुड़वां हिस्से की तलाश है, चीन में वे कहते हैं, जो खो गया; जब मिल जाएगा, तो तृप्ति होगी।
और इतनी बड़ी पृथ्वी है, कोई चार अरब स्त्री-पुरुष हैं। आप खोज रहे हैं अपनी स्त्री को। कोई खोज रहा है अपने पुरुष को। खोज चल रही है जन्मों-जन्मों में। जो भी मिलता है, उससे ही तृप्ति नहीं होती। मिलना करीब-करीब असंभव मालूम पड़ता है। चार अरब में संयोग की ही बात है, कभी उससे मिलना हो जाए, जिससे आपकी तृप्ति हो जाए।
यह कथा प्रीतिकर है। कथा ही है, पर प्रीतिकर है, अर्थपूर्ण है। मेरे हिसाब से वह मिलना कभी भी नहीं होगा, जब तक आपकी आंख भीतर न जाए। भीतर वह स्त्री मौजूद है। उस स्त्री और आपके भीतर के पुरुष के मिलने की कला ही योग है। और जिस दिन यह मिलन घट जाता है, उस दिन आपकी शक्ति खोती नहीं, ब्रह्मचर्य उत्पन्न होता है।
इसलिए मेरी ब्रह्मचर्य की धारणा निषेध की धारणा नहीं है, त्याग की धारणा नहीं है, परमभोग की धारणा है। और मेरी बात को गलत समझना बिलकुल आसान है। और मैं जो कह रहा हूं, उसमें योग को देखना बहुत कठिन है, भोग देखना बिलकुल सरल है। इसलिए मुझे रोज गालियां पड़ती रहती हैं कि मैं लोगों को भोग सिखा रहा हूं।
एक अर्थ में गालियां सही हैं। भोग मैं सिखा रहा हूं--लेकिन परमभोग। सारा योग, सारा तंत्र, सारा धर्म वही सिखाता है। परमात्मा को मैं परमभोग कहता हूं--वह परमसंभोग का अनुभव है। अपने ही भीतर द्वंद्व खो गया, द्वैत खो गया; अद्वैत पैदा हो गया। आलिंगन अद्वैत है; जहां दो मिट जाते हैं और एक बचता है।
बाहर की स्त्री से ऐसा अद्वैत कभी भी नहीं सधेगा, दो बने ही रहेंगे। क्षणभर को भूलेंगे भी दूसरे को, तो क्षणभर बाद फिर याद आ जाएगी। संभोग के क्षण में भी आप आप हैं; पत्नी पत्नी है। मिलते हैं, कहीं छूते हैं, लेकिन मिल नहीं पाते। इसलिए सभी संभोग के पीछे एक तिक्त स्वाद मुंह में छूट जाता है कि जैसे कोई चीज असफल हो गई। बस करीब-करीब पहुंच गए थे, फिर खो गया। इसलिए फिर संभोग
की आकांक्षा जगती है। लेकिन कोई संभोग तृप्त नहीं करता, क्योंकि कोई संभोग समाधि नहीं बन सकता। तड़पाता है।
लेकिन जिस दिन भीतर के स्त्री-पुरुष का मिलन हो जाता है, उस दिन बात समाप्त हो गई। उस दिन बाहर अब कोई खोज नहीं है। अब कोई दूसरा न बचा, द्वंद्व मिटा, निर्द्वंद्व हुए। द्वैत मिटा, अद्वैत घटा। अद्वैत यानी परम आलिंगन। और ऐसा जो व्यक्ति है, शिवलिंग जैसा हो गया। अपने भीतर वर्तुलाकार पूर्ण हो गया, अपने ही भीतर रस, आत्म-रमण होने लगा जिसका, जिसका स्व-संभोग शुरू हुआ। ऐसा व्यक्ति कोई भी ऊर्जा नहीं खोता।
आपको पता है कि ऊर्जा खोने के लिए नुकीले बिंदु चाहिए। आपके शरीर की विद्युत अंगुलियों से खो सकती है, सिर से नहीं खो सकती। क्योंकि कोई भी चीज जो गोलाकार है, वहां से ऊर्जा को खोने का उपाय नहीं मिलता। जगह नहीं मिलती, जहां से वह खो जाए। जननेंद्रिय से ऊर्जा खो सकती है। जननेंद्रिय विशेष आयोजन है, ऊर्जा को खोने का।
यह आपको समझ ही लेना चाहिए कि शरीर के दो हिस्से हैं। एक हिस्सा है, जहां से शरीर ऊर्जा लेता है। और एक हिस्सा है, जहां से शरीर ऊर्जा खोता है। लेने वाले सब हिस्से आपके सिर में हैं, वह आपका एक छोर है। और इसीलिए सिर गोलाकार है, क्योंकि वहां से खोना नहीं है, वहां से इकट्ठा करना है। भोजन आप मुंह से लेते हैं, श्वास नाक से लेते हैं, किरणें आंख से लेते हैं, ध्वनि कान से लेते हैं। वहां से खोना नहीं है, वहां से पकड़ना है। वे रिसीविंग, ग्राहक अंग हैं। वहां दरवाजे हैं, जिनसे चीजें भीतर जा सकती हैं, लेकिन वहां से लौट नहीं सकतीं।
फिर मल-मूत्र का त्याग है। वह सब शरीर के नीचे के हिस्से पर, वह दूसरा छोर है। जननेंद्रिय भी वहीं है, वह खोने की जगह है। इसलिए जानकारों ने वीर्य को मल-मूत्र से ज्यादा नहीं कहा है। वह है भी मल-मूत्र। वहां से आप ऊर्जा को खोते हैं। वहां से शरीर, जो इकट्ठा किया, उसे निकालता है, उससे मुक्त होता है। वह मल-विसर्जन है।
सिर गोल है, वहां संगृहीत करना है। जननेंद्रिय विसर्जन है, वह नुकीला अंग है। और इसीलिए जननेंद्रिय में प्रकृति ने एक व्यवस्था की है, कि जब आप कामवासना से भर जाएं, तब जननेंद्रिय उभार में आ जाए और पूरी तरह नुकीली हो जाए। क्योंकि उस क्षण में जितनी नुकीली हो जननेंद्रिय, उतनी शीघ्रता से ऊर्जा का विसर्जन हो जाएगा।
यह जो वर्तुलाकार शिवलिंग है, यहां से कहीं से भी ऊर्जा के निकलने का उपाय नहीं है। इस शिवलिंग की परिधि पर ऊर्जा घूम सकती है, घूमती रह सकती है, लेकिन बाहर नहीं जा सकती।
हमने मंदिरों के ऊपर गोलाकार गुंबद बनाए थे, वह सिर्फ इसीलिए कि मंदिर के भीतर जो मंत्रोच्चार किया जाए, जो प्रार्थना की जाए, वह वापस गूंजकर गिर जाए मंदिर में, बाहर न जाए। वह गिरती रहे, वह प्रार्थना करने वाले पर वापस बरसती रहे। गूंज उसकी लौटती रहे, एक वर्तुल निर्मित हो जाए।
इस अर्थ में मंदिर की जो खूबी है, वह खूबी मस्जिद की नहीं, चर्च की भी नहीं। मंदिर ठीक सिर की भांति हमने निर्मित किया है। वहां ऊर्जा बरसती रहे, उसके नीचे जाकर कोई ऊर्जावान हो, शक्तिशाली हो, संगृहीत करे।
और आपका सिर मंदिर की भांति बन जाता है, अगर आपके भीतर के स्त्री-पुरुष का मिलन होता है।
अगर ठीक से मंदिर के आर्किटेक्ट को आप समझें, तो वह ठीक आदमी के शरीर में निर्मित किया गया है। आपका शरीर चौकोन है, तो मंदिर चौकोन है। ऊपर सिर की भांति मंदिर का गुंबद है। और जब योगी बैठता है पद्मासन में, तो जो उसके शरीर की आकृति है, वही मंदिर की आकृति है। ठीक योगी पद्मासन में बैठा है, वही मंदिर की स्थापत्यकला का सूत्र है। वैसे ही हमने मंदिर बनाया है, वह सिर्फ प्रतीक है।
ऐसे ही भीतर के मिलन के क्षण में आप मंदिर बन जाएंगे।
तो एकांत में डरें मत। पहले संभावना है, स्खलन हो जाए। भयभीत न हों। उसको भी--परमात्मा का है--परमात्मा को दिया। कंजूस मत बनें। और बीच में रुकावट मत डालें। और घबड़ाएं भी मत। मेरा है क्या? आज नहीं कल, यह शरीर तो छूट ही जाएगा। इस शरीर के साथ इसका वीर्य भी छूट जाएगा। उसको कहां ले जाइएगा?
यह बड़े मजे की बात है कि तथाकथित साधु-संन्यासी समझाते हैं, धन इकट्ठा मत करो, क्योंकि यहीं छूट जाएगा। लेकिन वीर्य इकट्ठा करो! वीर्य कहां ले जाओगे? वह भी यहीं छूट जाएगा। वह शरीर का अंग है, तुम उसे ढो नहीं सकते। तुम उसे ले जा नहीं सकते।
तो अगर स्खलन भी हो जाए, तो घबड़ाना मत, अपराध से मत भरना। क्योंकि अपराध से भरे कि ध्यान वहीं रुक जाएगा। उसको परमात्मा ने दिया, परमात्मा ने लिया। धन्यवाद देना और अपने ध्यान में लीन हो जाना।
जल्दी ही स्खलन रुक जाएगा। क्योंकि स्खलन होता ही इसलिए है कि तुमने जबर्दस्ती रोका है। जब तुम रोकोगे ही नहीं, स्खलन बंद हो जाएगा। और शीघ्र ही वह घड़ी आएगी, जब तुम्हारा प्रेमी, तुम्हारा प्रेमपात्र भीतर मिलेगा।
तो चाहे काम हो, चाहे क्रोध हो, चाहे कोई भी वेग हो, ध्यानी को उसे दूसरे से नहीं जोड़ना है। संसार का यही अर्थ है--मेरे भावावेगों के लिए दूसरा जरूरी है। संन्यास का यही अर्थ है--मेरे भावावेगों के लिए मैं अकेला काफी हूं।
यह अकेले होने का नाम ही संन्यास है। और अगर तुम्हारे भावावेगों के लिए तुम्हें दूसरे की जरूरत पड़ती है, तो फिर तुम संन्यास में कैसे प्रवेश करोगे?
न तो घर छोड़कर जंगल जाना है, न पत्नी छोड़कर भाग जाना है। लेकिन वेगों की, भावावेगों की निभर्र्रता को छोड़ देना है। तुम अकेले अपने मालिक हो जाओ। तुम स्वयं हो सको, दूसरा आवश्यक नहीं है होने के लिए।
इसका यह मतलब भी नहीं है कि फिर तुम पत्नी को प्रेम न कर सकोगे। तुम कर सकोगे, लेकिन वह स्वतंत्र व्यक्तित्व का दान होगा। उसकी गरिमा अनूठी है, अलग है। अभी तुम मजबूरी में करते हो। अभी तुम निर्भर, परतंत्र अनुभव करते हो। इसलिए पति-पत्नी एक-दूसरे पर सदा क्रोध में होते हैं।
सैकड़ों पति-पत्नियों को मैं जानता हूं, लेकिन ऐसे पति-पत्नी को मैंने नहीं देखा, जो एक-दूसरे पर क्रोध में न हों। उसका कारण है। होना स्वाभाविक है। क्योंकि जिस पर भी हम निर्भर होते हैं, उस पर क्रोध आता है। जिस पर भी हम निर्भर होते हैं, वह मालिक मालूम पड़ता है, हम गुलाम हो गए। और दोनों की यह प्रतीति है, क्योंकि दोनों ही निर्भर हैं। मालिक कोई भी नहीं, दोनों गुलाम हैं। और गुलाम की गुलामी, उस पर निर्भर रहना पड़ता है। और निर्भरता का एक-दूसरे पर वे शोषण करते हैं।
अक्सर अगर घर में विवाद हो, पत्नी जीत जाती है--चाहे गलत हो, चाहे सही हो--क्योंकि पति उस पर निर्भर है कामवासना के लिए। वह डरता है, व्यर्थ का विवाद खड़ा करो, वह कामवासना से इंकार कर देगी। झंझट करो, तो प्रेम मिलना मुश्किल हो जाएगा। और प्रेम चाहिए तो इतना सौदा करना पड़ता है। इसलिए अक्सर पति हार जाता है। और पत्नी जानती है। इसलिए दो ही मौके पर पत्नियां उपद्रव खड़ा करती हैं--या तो पति भोजन कर रहा हो, या प्रेम करने की तैयारी कर रहा हो। क्योंकि वही दो बातों पर वह निर्भर है। उन्हीं दो बातों पर वह गुलाम है। इसलिए पति भोजन की थाली पर बैठा कि पत्नी की शिकायतें शुरू हो जाती हैं। उपद्रव शुरू हुआ! और पति डरता है कि किसी तरह भोजन...तो हां-हूं भरता है।
और ध्यान रहे, भोजन और कामवासना दोनों जुड़े हैं। भोजन तुम्हारे अस्तित्व के लिए जरूरी है, व्यक्ति के; और कामवासना समाज के अस्तित्व के लिए जरूरी है। कामवासना एक तरह का भोजन है, समाज का भोजन। और वह व्यक्ति का भोजन है। दोनों बातों पर पति निर्भर है।
इसलिए बड़े से बड़ा पति, चाहे वह नेपोलियन क्यों न हो, घर लौटकर दब्बू हो जाता है। नेपोलियन भी जोसेफीन से ऐसा डरता है जैसे कोई भी पति अपनी पत्नी से डरता है। वह सब बहादुरी, युद्ध का मैदान, वह सब खो जाता है। क्योंकि यहां किसी पर निर्भर है। कुछ जोसेफीन से चाहिए, जो कि वह इंकार कर सकती है।
वेश्याएं ही अपने शरीर का सौदा करती हैं, ऐसा आप मत सोचना; पत्नियां भी करती हैं। क्योंकि यह सौदा हुआ कि इतनी बातों के लिए राजी हो जाओ, तो शरीर मिल सकता है; नहीं तो नहीं मिल सकता। शरीर चाहिए, तो इतनी बातों के लिए राजी हो जाओ।
इसलिए क्रोध पति का पत्नी पर बना रहता है। पत्नी का क्रोध पति पर बना रहता है। क्योंकि वह भी निर्भर है इस पर। जहां भी निर्भरता है, वहां क्रोध होगा, वहां प्रेम नहीं हो सकता।
प्रेम तुम उसी दिन कर पाओगे, जिस दिन तुम निर्भर नहीं हो। जिस दिन तुम स्वावलंबी हुए, प्रेम की दिशा में स्वावलंबी हुए। तुम अकेले भी हो सकते हो, और तुम्हारे आनंद में रत्तीभर फर्क नहीं पड़ेगा। बस, उस दिन ही तुम प्रेम कर सकोगे और उसी दिन पत्नी तुम्हारी तुम्हें सताना बंद करेगी। क्योंकि अब वह जानती है कि अब सताने का कोई अर्थ नहीं रहा, अब झुकाने का कोई उपाय नहीं रहा, निर्भरता समाप्त हो गई है।
घर बड़ी कलह है, क्योंकि जिस पर हम निर्भर होंगे, उससे कलह होती ही रहेगी। वह एक कशमकश है। वह एक सतत संघर्ष है।
संन्यस्त का अर्थ यह नहीं है कि तुम प्रेम न करोगे। संन्यस्त का अर्थ है कि प्रेम तुम्हारा दान होगा, तुम्हारी निर्भरता नहीं। तुम दे सकते हो। तुम बांटोगे, तुम शेयर करोगे। लेकिन यह एक मुक्त व्यक्ति का दान है। और तुम इसके बदले में भी कुछ न मांगोगे। तुम दोगे, क्योंकि देना तुम्हारी खुशी है।
और जिस दिन कभी दो व्यक्ति एक-दूसरे को प्रेम दे पाते हैं, जब देना सिर्फ खुशी होती है, किसी तरह की कोई निर्भरता और सौदा नहीं, उस दिन ही इस जगत में पति-पत्नी की घटना घटती है। बाकी सब औपचारिक संस्थाएं हैं। तब कभी कोई राम और सीता जैसा व्यक्तित्व, कोई राधाकृष्ण, कोई गौरीशंकर जैसा...। इसलिए हम इन राधाकृष्ण, गौरीशंकर या सीताराम को अलग-अलग याद नहीं करते हैं। इनको अलग-अलग याद करना ठीक भी नहीं है। ये अलग-अलग रहे ही नहीं। इनमें कलह जरा भी नहीं थी। इसलिए अलग-अलग नहीं हो सकते।
ध्यान रहे, कलह अलग-अलग करती है। प्रेम जोड़ता है, कलह तोड़ती है। तो सीताराम के बीच हाईफन भी नहीं है, वह भी लगाना ठीक नहीं है। उतनी भी कलह नहीं है। तो गौरीशंकर, राधाकृष्ण करीब-करीब एक नाम हो गए। उनको दो नाम कहना भी ठीक नहीं है। भीतर ऐसी एकता जन्मी है।
अगर भय न खाया और एकांत में तुम प्रेम, क्रोध, काम में सफल हो गए, तुम एक मुक्त व्यक्ति हो जाओगे। और इस जीवन का सारा सुख उसके लिए है, जो मुक्त है। और यह जीवन अपनी सारी संपदा उसके लिए लुटा देता है, जो मुक्त है। तुम्हारे हाथ में है कि तुम उसके मालिक हो सकते हो।
ओशो, आखिर हम पूछ ही क्या सकते हैं, फिर भी आपने हमसे प्रश्न पुछवाए हैं! क्यों?
हर चीज पर मन प्रश्न उठाता है। तो यह भी हो सकता है, संकोच-शिष्टाचारवश तुम मुझसे न पूछो। या इस भयवश कि लोग क्या कहेंगे; कि प्रश्न छोटा-सा है, पूछने जैसा नहीं; कि प्रश्न बेतुका है, असंगत है, शोभा नहीं देता; कि प्रश्न पूछने से ऐसा लगता है कि तुम इतने अज्ञानी हो कि अभी यह प्रश्न भी तुम्हारा हल नहीं हुआ--इन सब भय के कारण तुम पूछते नहीं। लेकिन तुम प्रश्नों को दबाए बैठे रहोगे। वे दबे हुए प्रश्न तुम्हारे चित्त को सदा उद्विग्न करेंगे।
और मैं दमन के हर स्थिति में विरोध में हूं। तुम्हारे प्रश्न का भी दमन नहीं होना चाहिए। क्योंकि दबा हुआ प्रश्न तुम्हें सताता रहेगा, जन्मों-जन्मों तक तुम्हारा पीछा करेगा। जो भी दबाया है, वह मौजूद रहेगा।
तुम पूछ लो, ताकि उसका रेचन हो जाए। यह मत सोचना कि तुम्हारे पूछने से मैं जो उत्तर दूंगा, वह उत्तर तुम्हें तृप्त करेगा। वह नहीं होने वाला। मेरे उत्तर से तुम्हारा प्रश्न समाप्त हो जाएगा, यह भी नहीं होने वाला। मेरा उत्तर तुममें और हजार प्रश्न पैदा करेगा।
इसलिए उत्तर देकर फिर मैं तुम्हारी तरफ देखता हूं, क्योंकि उसने और प्रश्न पैदा कर दिए होंगे। जितनी देर मैंने उत्तर दिए, उतनी देर में तुमने हजार प्रश्न तैयार कर लिए होंगे। तो मेरा उत्तर, तुम्हारा उत्तर कभी बनने वाला नहीं है। मेरे उत्तर से और प्रश्न पैदा होंगे।
फिर मैं क्यों उत्तर दे रहा हूं?
कुछ बातों के प्रति तुम्हें सचेत करने को। हर उत्तर और प्रश्न पैदा करेगा, तुम धीरे-धीरे सचेत होते जाओगे। कुछ बातें तुम्हारे अनुभव में आएंगी। यह पहली बात अनुभव में आएगी कि उत्तर से उत्तर नहीं मिलता। उत्तर कहीं और खोजना पड़ेगा। कोई दूसरा उत्तर दे, इससे भी उत्तर नहीं मिलता। उत्तर स्वयं ही खोजना पड़ेगा। प्रश्न हल भी हो जाए, बौद्धिक तल पर, तो भी समाधान नहीं होता। तो यह प्रश्न-उत्तर की दौड़, जो बुद्धि की दौड़ है, कहीं ले जाएगी नहीं। तुम्हें किसी हृदय की दौड़ पर निकलना पड़ेगा।
और इतना तुम पूछोगे, इतना मैं जवाब दूंगा, और आखिर में तुम पाओगे, तुम्हारा कन्फ्यूजन, तुम्हारा भ्रम, पहले से भी ज्यादा हो गया, बजाय कम होने के। प्रश्न बढ़ गए, बजाय कम होने के। तभी तुम शायद चेतो और तुम्हें खयाल आए कि प्रश्नों का उत्तर उत्तर में नहीं है। प्रश्नों का उत्तर ध्यान में है। उत्तर तो बाहर से दिया जा सकता है। ध्यान भीतर से पैदा करना होगा।
प्रश्नों के उत्तर शास्त्रों में नहीं हैं। क्योंकि मन का स्वभाव प्रश्न पैदा करना है, इसलिए शास्त्र पढ़कर और प्रश्न पैदा हो जाएंगे। उत्तर मन से मुक्त होने में है। जब तक मन न गिर जाए, तब तक प्रश्न जारी रहेंगे।
तुम्हारा मन है, इसलिए मैं तुमसे कहता हूं, पूछो। इससे कुछ सीधा हल हो जाने वाला नहीं है। लेकिन परोक्ष हल हो सकता है। धीरे-धीरे तुम सचेत होने लगोगे कि यह पूछना और यह जवाब, यह खेल है। इससे कुछ होने वाला नहीं है। और कब तक तुम ये शतरंज के नकली हाथी-घोड़े चलते रहोगे! एक दिन तुम उठाकर यह पूरा शतरंज फेंक दोगे।
जापान में एक परंपरा है: जब कोई झेन गुरु के पास आता है, तो अपनी चटाई अपने साथ लाता है। चटाई बिछाकर बैठ जाता है और प्रश्न पूछता है। फिर चटाई उसे वहीं छोड़ देनी पड़ती है। फिर वह आता है रोज, जब भी उसके पास प्रश्न होते हैं, अपनी चटाई पर बैठकर प्रश्न पूछता है। ऐसा कभी वर्षों लग जाते हैं।
फिर जिस दिन वह थक जाता है इस पूछने और इस उत्तर पाने से, और जिस दिन उसे साफ दिख जाता है कि यह सब व्यर्थ है, वह अपनी चटाई को गोल करके दबाकर निकल जाता है।
वह जिस दिन चटाई गोल करता है, उस दिन गुरु कहता है, आशीर्वाद! कर ली चटाई गोल?
वह चटाई गोल करना प्रतीक है, अब थक गया पूछ-पूछकर, सुन-सुनकर। अब यह पूछना-सुनना बंद करता हूं।
उस दिन से ध्यान शुरू होता है।
तो जिस दिन तुम चटाई गोल करोगे, एकदम अपनी चटाई लेकर भागने लगोगे, और मैं तुम्हें रोकूंगा कि पूछ लो और तुम कहोगे कि नहीं, उस दिन मेरा आशीर्वाद!
तुम पूछना चाहते हो, पूछने की हिम्मत नहीं जुटाते, इसलिए मैं तुम्हें कहता हूं, पूछ लो। उत्तर देता हूं, ताकि तुम और पूछो। तुम्हें थकाना है, तुम्हें भलीभांति थकाना है। तुम्हें इतना थका देना है कि तुम एकदम गिर पड़ो और कहो कि बस, नहीं कोई प्रश्न, नहीं कोई उत्तर।
उस क्षण में तुम्हारे ध्यान की पहली किरण उतरेगी। उस क्षण मन से तुम थकोगे। उस क्षण तुम मन को डाल सकोगे एक कोने पर और कहोगे कि अब अनुभव चाहता हूं, उत्तर नहीं; अब समाधान चाहता हूं, उत्तर नहीं।
समाधान तो समाधि में है।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What is the purpose of asking questions?
According to Osho, asking questions serves as catharsis for the questioning mind and an indirect path to awakening: by expressing doubts rather than repressing them, you become aware that answers never satisfy, proliferate more questions, and the intellect’s game is futile. This ripens you to ‘roll up the mat’—drop inquiry, turn inward, and discover the living answer in meditation beyond mind.
In simple terms: Ask until you see thinking can’t give peace—then be silent and find the answer inside through meditation.
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According to Osho, when repressed sexual energy erupts in meditation, don’t seek an ‘other.’ Let the surge express and dissolve in aloneness; the inner sky will absorb it. Props (even a pillow) can help at first; drop them later. Release guilt and conditioning about semen loss—nothing precious is being depleted. With awareness, the energy discharges without creating karmic chains and becomes quiet, spaciousness.
In simple terms: If strong sexual feelings arise while meditating, stay alone, let them move through without shame or involving someone else—they’ll pass and leave you calmer.
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