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Questions in this Discourse
धर्म की एक खूबी है कि वह एक अर्थ में सदा पुराना है। इस अर्थ में, कि वैसी अनुभूति अनंत लोगों को हो चुकी है। धर्म की कोई अनुभूति ऐसी नहीं है कि कोई व्यक्ति कहे कि वह मेरी है। इसके दो कारण हैं। एक तो धर्म की अनुभूति होते ही ‘मेरा’ मिट जाता है। इसलिए ‘मेरे’ का दावा इस जगत में सब चीजों के लिए हो सकता है, सिर्फ धर्म की अनुभूति के लिए नहीं हो सकता। सिर्फ वही अनुभूति ‘मेरे’ की सीमा के बाहर पड़ती है, क्योंकि उसकी अनिवार्य शर्त है कि ‘मेरा’ मिट जाए तो ही वह अनुभूति होती है। इसलिए कोई व्यक्ति धर्म की अनुभूति को ‘मेरी’ नहीं कह सकता। न ही कोई व्यक्ति धर्म की अनुभूति को नई कह सकता है। क्योंकि सत्य नया और पुराना नहीं होता। इस अर्थ में मैं महावीर और जीसस, कृष्ण और क्राइस्ट के नाम, और औरों के नाम भी लेता हूं। उन्हें अनुभूति हुई है। लेकिन जब मैं कहता हूं, मैं उनसे प्रभावित नहीं हूं, तो मेरा मतलब यह है कि मैं जो कह रहा हूं वह मैं उनसे प्रभावित होकर नहीं कह रहा हूं। मैं खुद भी जान कर कह रहा हूं। और अगर मैं उनका नाम भी ले रहा हूं, तो चूंकि मेरे जानने से उनका मेल खाता है, इसीलिए ले रहा हूं। मेरे लिए कसौटी मेरा अनुभव है। वह कसौटी पर उन्हें भी मैं ठीक पाता हूं, इसलिए उनके नाम लेता हूं। इसलिए प्रभावित उनसे जरा भी नहीं हूं। मैं जो भी कह रहा हूं, वह उनसे प्रभावित होकर नहीं कह रहा हूं। मैं जो भी कह रहा हूं, अपने ही अनुभव से कह रहा हूं। लेकिन मेरे अनुभव पर वे लोग भी खरे उतरते हैं। इसलिए उनका नाम भी ले रहा हूं। वे मेरे लिए गवाह हो जाते हैं। मेरे अनुभव के लिए वे भी गवाह हैं।
लेकिन इस अनुभूति को, जैसा कि मैंने कहा कि नया नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक दूसरे अर्थों में इसे बिलकुल नया भी कहा जा सकता है। और यही धर्म का बुनियादी रहस्य और पहेली है। उसे नया इसलिए कहा जाता है कि जिस व्यक्ति को भी कभी वह अनुभव होगा उसके लिए बिलकुल ही नया है। उसे इसके पहले नहीं हुआ है। किसी और को हुआ होगा। लेकिन किसी और के होने से उसका क्या लेना-देना है! जिस व्यक्ति को भी अनुभव होगा उसके लिए नया है। उसके लिए इतना नया है कि वह इसकी तुलना भी नहीं कर सकता कि यह कभी हुआ होगा या किसी को हुआ होगा। जहां तक उस व्यक्ति की चेतना का संबंध है, यह अनुभूति पहली ही दफे हुई है।
और फिर धर्म की अनुभूति इतनी ताजी और कुंआरी है, वर्जिन है, कि जब भी किसी को होगी उसे यह खयाल भी नहीं आ सकता कि यह पुरानी हो सकती है। वह जैसे फूल सुबह खिला हो और उसकी पंखुड़ी पर ओस हो और अभी सूरज की किरण पड़ी हो, इतनी ताजी है। इस फूल को देख कर, जिसने पहली दफे यह फूल देखा हो, वह यह नहीं कह सकता कि यह फूल पुराना है। हालांकि रोज सुबह फूल उगते रहे हैं, खिलते रहे हैं; और रोज सुबह धूप और ओस और सूरज की किरणों ने नये फूलों को घेरा है; रोज किसी की आंखों ने उन फूलों को देखा होगा। लेकिन जिस आदमी ने पहली दफे इस फूल को देखा है, वह यह सोच भी नहीं सकता कि यह पुराना हो सकता है। यह इतना नया है कि अगर वह यह घोषणा करे कि सत्य बिलकुल पुराना कभी नहीं होता, सदा नया ही है, एकदम मौलिक ही है, तो भी गलत नहीं है।
धर्म को हम इसलिए पुरातन और सनातन कह सकते हैं, क्योंकि सत्य सदा से है। और धर्म को हम इसलिए नया और नवीनतम कह सकते हैं, नूतन कह सकते हैं, क्योंकि सत्य का अनुभव जब भी होता है, तो जिस व्यक्ति पर भी वह आघात पड़ता है, उसकी प्रतीति एकदम नये और ताजे की और कुंआरे की है। यदि कोई व्यक्ति इन दो में से कोई भी एक धारा पकड़ ले तो वह व्यक्ति कभी असंगत मालूम नहीं पड़ेगा। दो में से कोई भी एक धारा पकड़ ले तो वह कभी असंगत नहीं मालूम पड़ेगा। अगर वह कहे कि सत्य सनातन है और कभी न कहे कि सत्य नया है, तो आपको कभी कोई अड़चन और असंगति दिखाई नहीं पड़ेगी। क्योंकि कोई इनकंसिस्टेंसी नहीं है। कोई व्यक्ति पकड़ ले कि सत्य नया है और नूतन है...।
गुरजिएफ से पूछेंगे, तो वह कहेगा: पुराना है, सनातन है। कृष्णमूर्ति से पूछेंगे, तो वे कहेंगे: नया है, बिलकुल नया है। पुराने से कुछ वास्ता ही नहीं। पुराना है ही नहीं। ये दोनों व्यक्ति बिलकुल ही संगत मालूम पड़ेंगे। तो जो सवाल आप मुझसे पूछ सकते हैं वह गुरजिएफ से नहीं पूछ सकते। वह सवाल कृष्णमूर्ति से भी नहीं पूछ सकते। लेकिन मेरी अपनी प्रतीति ऐसी है कि यह अर्ध-सत्य है। ये दोनों अर्ध-सत्य हैं। अर्ध-सत्य सदा ही संगत हो सकता है। कंसिस्टेंट हो सकता है। पूर्ण सत्य सदा ही असंगत होगा, इनकंसिस्टेंट होगा। क्योंकि पूर्ण में विरोधी को भी समाहित करना होगा। अधूरे में हम विरोधी को छोड़ सकते हैं।
एक आदमी कहता है, प्रकाश ही प्रकाश है बस सत्य, तो अंधेरे को असत्य कर देता है। उसके असत्य करने से अंधेरा छूट नहीं जाता है, लेकिन वह संगत हो जाता है। जब अंधेरे को इनकार ही कर दिया तो अब कोई सवाल न रहा। उसे कोई संगति बिठालने की जरूरत न रही। उसके वक्तव्य सीधे, साफ और गणित के जैसे हो सकते हैं। उसके वक्तव्य में पहेली नहीं रह जाएगी। जो आदमी कहता है, अंधेरा ही अंधेरा है, प्रकाश धोखा है, उसकी भी कठिनाई नहीं है।
कठिनाई उस आदमी की है जो कहता है कि अंधेरा भी है और प्रकाश भी है। और जो आदमी दोनों को स्वीकार करता है, वह किसी गहरे अर्थ में यह बात भी स्वीकार करेगा कि दोनों--अंधेरा और प्रकाश--एक ही चीज के दो छोर हैं। अन्यथा प्रकाश के बढ़ने से अंधेरा नहीं घट सकता, अगर दोनों अलग चीजें हों। अन्यथा प्रकाश के कम होने से अंधेरा नहीं बढ़ सकता, अगर दोनों चीजें अलग चीजें हों। लेकिन प्रकाश को कम-ज्यादा करने से अंधेरा कम-ज्यादा होता है। अर्थ साफ है कि अंधेरा कहीं प्रकाश का ही हिस्सा है, उसका ही दूसरा छोर है। इसे छुओ तो वह भी प्रभावित हो जाता है।
मैं पूरे ही सत्य को कहने की कोशिश में कठिनाई में पड़ता हूं। तो मैं दोनों बातें एक साथ कहता हूं कि सत्य सनातन है, नया कहना गलत है; और कह भी नहीं पाता कि मैं दूसरी चीज भी कहना चाहता हूं कि सत्य सदा नया है, पुराना कहने का कोई अर्थ ही नहीं है। यहां मैं सत्य को उसकी पूरी की पूरी स्थिति में पकड़ने की कोशिश में हूं। और जब भी सत्य को उसकी पूरी स्थिति में पकड़ा जाएगा, जब उसके अनेकांत में पकड़ा जाएगा, तो विरोधी वक्तव्य एक साथ देने होंगे। महावीर का स्यातवाद ऐसे ही विरोधी वक्तव्यों का संतुलन है--एक ही साथ। तो ठीक जो कहा है पहले वचन में, दूसरे में उसके विपरीत बोलना पड़ेगा। क्योंकि उससे जो विपरीत शेष रह गया है, उसे भी समाहित करना है, उसे भी कॉम्प्रिहेंड करना है। अगर वह बाहर रह गया तो यह सत्य पूरा नहीं होगा।
इसलिए जो सत्य बहुत साफ दिखाई पड़ते हैं और सुलझे हुए दिखाई पड़ते हैं, वे अधूरे होते हैं। पूरे सत्य की अपनी मजबूरी है। वही उसका सौंदर्य भी है, वही उसकी जटिलता भी है। लेकिन वह जो विपरीत को भी समाहित कर लेना है, वही सत्य की शक्ति भी है।
असत्य अपने से विपरीत को समाहित नहीं कर सकता। यह बहुत मजे की बात है! असत्य अपने से विपरीत को समाहित नहीं कर सकता। असत्य अपने से विपरीत के विरोध में खड़े होकर ही जीता है। लेकिन सत्य अपने से विपरीत को भी पी जाता है। तो एक अर्थ में असत्य कभी भी बहुत उलझा हुआ नहीं होता, सीधा-साफ होता है। लेकिन सत्य में उलझाव होंगे, क्योंकि अस्तित्व में उलझाव हैं। और सारा जीवन विरोधों से निर्मित है। बिना विरोध के जीवन में एक भी चीज नहीं है। हां, हमारा मन जो है, हमारा तर्क जो है, वह विरोध से निर्मित नहीं है। तर्क जो है हमारा वह संगत होने की चेष्टा है और अस्तित्व जो है वह असंगत होना ही है। अस्तित्व में सब असंगतियां एक साथ खड़ी हैं।
जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी है। तर्क में विपरीत को काट कर हम चलते हैं, इसलिए तर्क साफ-सुथरा है। तर्क साफ-सुथरा है, क्योंकि जन्म है तो जन्म है और मृत्यु है तो मृत्यु है। ये दोनों एक साथ नहीं हो सकते। तो हम तर्क में कहते हैं: अ अ है; अ ब नहीं है। हम कहते हैं: जन्म जन्म है; जन्म मृत्यु नहीं है। फिर मृत्यु मृत्यु है, और मृत्यु जन्म नहीं है। तो हम साफ-सुथरा तो कर लेते हैं, गणित तो बिठा लेते हैं, लेकिन जिंदगी का जो राज था वह चूक गए।
इसलिए तर्क से कभी सत्य नहीं पकड़ा जा सकता। क्योंकि तर्क, संगत होने की चेष्टा है; और सत्य, असंगत होना ही है। वह असंगति के बिना सत्य का कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए जो-जो तर्क से चलेंगे वे संगति को पहुंच जाएंगे, सत्य को नहीं। कंसिस्टेंट होंगे, बिलकुल संगत होंगे। उन्हें पराजित नहीं किया जा सकता। लेकिन चूक गए, उससे चूक गए जो था।
मैं तार्किक नहीं हूं, यद्यपि निरंतर तर्क का उपयोग करता हूं। लेकिन तर्क का उपयोग ही इसलिए करता हूं कि किसी सीमा पर ले जाकर तर्क के बाहर धक्का दिया जा सके। तर्क को न थकाया जाए तो उसके पार होने का उपाय भी नहीं है। सीढ़ी से चढ़ता हूं, लेकिन सीढ़ी से प्रयोजन नहीं है; एक क्षण सीढ़ी को छोड़ देने से प्रयोजन है। तर्क का उपयोग करता हूं कि तर्कातीत का खयाल आ जाए। तर्क से कुछ सिद्ध नहीं करना चाहता, तर्क से सिर्फ तर्क को ही असिद्ध करना चाहता हूं। तो इसलिए मेरे वक्तव्य अतार्किक होंगे, अतर्क्य होंगे, इल्लॉजिकल होंगे। और मैं यह कहना चाहूंगा कि जहां तक मेरे वक्तव्य में तर्क दिखाई पड़े वहां तक समझना कि मैं सिर्फ विधि का उपयोग कर रहा हूं। जहां तक तर्क दिखाई पड़े वहां तक मैं सिर्फ इंतजाम बिठा रहा हूं, साज जमा रहा हूं। गीत शुरू नहीं हुआ है। जहां से तर्क की रेखा छूटती है वहीं से मेरा असली गीत शुरू होता है; वहीं से साज बैठ गया और अब संगीत शुरू होता है।
लेकिन जो साज के बिठाने को संगीत समझ लेंगे उनको बड़ी कठिनाई होगी। वे मुझसे कहेंगे कि यह क्या मामला है? पहले तो हथौड़ी लेकर और तबला ठोकते थे, अब हथौड़ी क्यों रख दी?
हथौड़ी से तबला ठोक रहा था, वह कोई तबले का बजाना नहीं था। वह सिर्फ तबला बजने की स्थिति में आ जाए, फिर तो हथौड़ी बेकार है। हथौड़ी से कहीं तबले बजे हैं?
तो तर्क मेरे लिए सिर्फ तैयारी है अतर्क्य के लिए। और यही मेरी कठिनाई हो जाती है कि जो मेरे तर्क से राजी होकर चलेगा वह थोड़ी ही देर में पाएगा कि मैं कहीं उसे अंधेरे में ले जा रहा हूं। क्योंकि जहां तक तर्क दिखाई पड़ेगा वहां तक प्रकाश है, साफ-सुथरी हैं चीजें; लेकिन उसे लगेगा कि मैंने सिर्फ प्रकाश का प्रलोभन दिया था और अब तो मैं अंधेरे में सरकने की बात कहने लगा। इसलिए वह मुझसे नाराज होगा और वह कहेगा, यहां तक ठीक है, इसके आगे हम कदम नहीं रख सकते। अब आप अतर्क्य की बात कर रहे हैं, और हम तो भरोसा किए थे तर्क का। और जो आदमी अतर्क्य से मोहित है वह मेरे साथ चलेगा नहीं, क्योंकि वह कहेगा, आप तर्क की बातें कर रहे हैं, हम आपके साथ नहीं चलते हैं। मेरे साथ दोनों ही कठिनाई में पड़ेंगे। तर्क वाला थोड़ी दूर चल सकेगा, फिर इनकार करेगा। अतर्क्य वाला चलेगा ही नहीं। उसे पता ही नहीं है कि थोड़ी दूर चल ले तो मैं अतर्क्य में ले जाऊंगा।
लेकिन मेरी समझ ऐसी है कि जिंदगी ऐसी है। तर्क साधन बन सकता है, साध्य नहीं। इसलिए मैं निरंतर तर्कसंगत बातों के आगे-पीछे, कहीं न कहीं, अतर्क्य वक्तव्य भी दूंगा। वे असंगत मालूम पड़ेंगे, वे बिलकुल असंगत मालूम पड़ेंगे। लेकिन वे बहुत सोच-विचार कर दिए गए हैं, वे अकारण नहीं हैं; असंगत हो सकते हैं, अकारण नहीं हैं। मेरी तरफ कारण साफ है।
तोएक दफे मैं कहूंगा कि महावीर और बुद्ध और कृष्ण और क्राइस्ट, उनसे मैं जरा भी प्रभावित नहीं हूं। हूं भी नहीं। उनसे प्रभावित होकर मैंने कुछ भी नहीं कहा है। जो भी मैंने कहा है वह मैंने जान कर कहा है। लेकिन जब मैंने जाना है तब मैंने यह भी जाना कि जो उन्होंने कहा है वह यही है। इसलिए जब मैं उनका वक्तव्य देने की बात करूंगा, या उनके संबंध में कुछ कहूंगा, तो मैं यह भूल ही जाऊंगा कि मैं उनके संबंध में कह रहा हूं। मैं पूरा का पूरा खड़ा ही हो जाऊंगा। मैं खुद ही खड़ा हो जाऊंगा उनके वक्तव्य में। क्योंकि तब मुझे कोई फासला ही नहीं दिखाई पड़ता। इसलिए जब भी मैं उनके संबंध में कुछ कहने जाऊंगा तो बहुत गहरे में मैं अपने संबंध में ही कह रहा हूं। इसलिए मैं फिर कोई शर्त नहीं रखूंगा, मैं फिर पूरे भाव से ही डूब जाऊंगा उनको कहने में।
तो जिस व्यक्ति ने यह सुना कि मैं उनसे प्रभावित नहीं हूं और फिर एक दफा मुझे भाव में डूबा हुआ उनके संबंध में बात करते देखा, उसकी कठिनाई स्वाभाविक है। उसकी कठिनाई बिलकुल स्वाभाविक है। वह कहेगा कि प्रभावित नहीं हैं तो उनकी बात करते वक्त इतने क्यों डूब जाते हैं? इतना तो जो प्रभावित है वह भी नहीं डूबता! जो प्रभावित है वह भी फासला रखता है।
मेरे देखे तो जो प्रभावित है उसको फासला रखना ही पड़ेगा। क्योंकि जो प्रभावित है वह अज्ञानी है। प्रभावित हम सिर्फ अज्ञान में होते हैं; ज्ञान में प्रभाव का, इनफ्लुएंस का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। ज्ञान में हम जानते हैं। ज्ञान में हम प्रभावित नहीं होते, लेकिन सम-ध्वनियां सुनते हैं, रिजोनेंसेज सुनते हैं। जो हम गा रहे हैं वही गीत किसी और से भी सुनते हैं। और वह गीत, और वह गाने वाला, और वह सब इतना एक हो जाता है कि वहां प्रभावित होने की भी दुई और फासला नहीं है। प्रभावित होने के लिए भी दूसरा होना जरूरी है, अनुयायी होने के लिए भी दूसरा होना जरूरी है। उतना फासला भी नहीं है।
इसलिए जब मैं महावीर के किसी वक्तव्य की व्याख्या करने लगूं या कृष्ण की गीता पर बोलने लगूं तब मैं करीब-करीब अपने ही वक्तव्य की व्याख्या कर रहा हूं। कृष्ण केवल बहाना रह जाते हैं। मैं बहुत जल्दी भूल जाता हूं। कब शुरू किया था उन पर, यह बात खत्म हो जाती है। उनसे शुरू ही करता हूं, अंत तो मैं अपने पर ही कर पाता हूं। कब वे छूट गए, यह भी मुझे पता नहीं!
अब यह बहुत मजे की बात है कि मैंने गीता कभी पूरी नहीं पढ़ी। कभी नहीं पढ़ी पूरी। कई दफे शुरू की है। दो-चार-दस पंक्तियां पढ़ीं और मैंने कहा ठीक है बात, उसे मैंने वहीं बंद कर दी। अब जब गीता पर बोल रहा हूं तब पहली दफे ही सुन रहा हूं। इसलिए गीता की व्याख्या करने का तो उपाय नहीं है मेरे पास। क्योंकि व्याख्या तो वह करे जिसने गीता पर अध्ययन किया हो, विचार किया हो, सोचा-समझा हो।
अब यह बहुत बड़े मजे की बात है कि कृष्ण की गीता पढ़ते वक्त मैं उठा कर रख देता हूं, लेकिन साधारण सी कोई किताब पढ़ता हूं तो आद्योपांत पढ़ जाता हूं, क्योंकि वह मेरा अनुभव नहीं है। यह बड़ी कठिन बात है। एक बिलकुल साधारण सी किताब मैं पूरी पढ़ता हूं शुरू से आखिर तक। उसको मैं रुक नहीं सकता; क्योंकि वह मेरा अनुभव नहीं है। लेकिन कृष्ण की किताब उठाता हूं तो दो-चार पंक्तियां पढ़ कर रख देता हूं, कि बात ठीक है। उसमें आगे मेरे लिए कुछ खुलेगा और, ऐसा मुझे नहीं मालूम पड़ता।
तो मुझे कोई जासूसी उपन्यास पकड़ा जाए तो मैं पूरा पढ़ता हूं; क्योंकि मुझे सदा उसमें आगे खुलने को बचता है। लेकिन कृष्ण की गीता मुझे ऐसे ही लगती है जैसे कि मैंने ही लिखी हो। इसलिए ठीक है, जो लिखा होगा वह मुझे पता है। वह बिना पढ़े पता है। इसलिए जब गीता पर बोल रहा हूं तो मैं गीता पर नहीं बोल रहा हूं; गीता सिर्फ बहाना है। शुरुआत गीता से होती है, बोल तो मैं वही रहा हूं जो मुझे बोलना है, जो मैं बोल सकता हूं वही बोल रहा हूं। और अगर आपको लगता है कि इतनी गहरी व्याख्या हो गई, तो वह इसलिए नहीं कि मैं कृष्ण से प्रभावित हूं, बल्कि इसलिए कि कृष्ण ने वही कहा है जो मैं कह रहा हूं। उनमें रिजोनेंस है। मैं जो कह रहा हूं वह व्याख्या नहीं है गीता की। तिलक ने जो कही है वह व्याख्या है, गांधी ने जो कही है वह व्याख्या है। वे प्रभावित लोग हैं।
मैं जो गीता में से कह रहा हूं वह गीता से कुछ कह ही नहीं रहा हूं। गीता जिस स्वर को छेड़ देती है वह मेरे भीतर भी एक स्वर छेड़ जाता है। फिर तो मैं अपने सुर को पकड़ लेता हूं। मैं अपनी ही व्याख्या कर रहा हूं, बहाना गीता का होगा। तो कृष्ण पर बोलते-बोलते कब मैं अपने पर बोलने लगता हूं, इसका आपको ठीक-ठीक पता उसी क्षण चलेगा जब आपको लगे कि मैं कृष्ण पर बहुत गहरा बोल रहा हूं। तब मैं अपने पर ही बोल रहा हूं।
महावीर के साथ भी वही है, क्राइस्ट के साथ भी वही है, बुद्ध और लाओत्सु के साथ और मोहम्मद के साथ भी वही है। क्योंकि मेरे लिए ये सिर्फ नाम के फर्क हैं। मेरे लिए ये मिट्टी के दीये में जो फर्क होता है वह फर्क है, लेकिन जो ज्योति जलती है वह एक है। तो वह मोहम्मद के दीये में जली है, कि महावीर के दीये में, कि बुद्ध के दीये में, उससे मुझे प्रयोजन नहीं है।
कई बार मैं मोहम्मद, महावीर और बुद्ध के खिलाफ भी बोलता हूं। तब और जटिलता हो जाती है कि पक्ष में इतना गहरा बोलता हूं, फिर खिलाफ बोल देता हूं।
जब भी खिलाफ बोलता हूं तब मेरे खिलाफ बोलने का कारण यही होता है कि अगर कोई भी व्यक्ति दीये पर बहुत जोर देता है तो मैं खिलाफ बोलता हूं। जब भी मैं पक्ष में बोलता हूं तब ज्योति पर मेरा जोर होता है; और जब भी मैं खिलाफ बोलता हूं तब दीये पर मेरा जोर होता है। जब कोई आदमी मुझे दीये से मोहित मालूम पड़ता है, मिट्टी से मोहित मालूम पड़ता है, तब मैं एकदम खिलाफ बोलता हूं। उसकी कठिनाई स्वाभाविक है, क्योंकि उसके लिए महावीर का मिट्टी का दीया और महावीर की चिन्मय ज्योति में कोई फर्क नहीं है, वह एक ही चीज समझ रहा है।
इसलिए जब भी मुझे ऐसा लगता है कि कोई दीये पर बहुत जोर दे रहा है तब मैं बहुत खिलाफ बोलता हूं। जब भी मुझे ऐसा लगता है कि ज्योति की बात छिड़ गई तब मैं एकदम एक होकर बोलने लगता हूं। और यह फासला है। महावीर के दीये और मोहम्मद के दीये में बहुत फर्क है। उसी फर्क को लेकर तो जैन और मुसलमान का फर्क है। दीये की बनावट बहुत अलग ढंग की है। क्राइस्ट के दीये और बुद्ध के दीये में बहुत फर्क है। होगा ही। पर वे फर्क शरीर के फर्क हैं, आवरण के फर्क हैं, आकार के फर्क हैं। और जिनको भी आवरण और आकार का बहुत मोह है, मेरा मानना है कि उनको ज्योति दिखाई नहीं पड़ी है। क्योंकि जिसको भी ज्योति दिखाई पड़ जाएगी वह दीये को भूल जाएगा। ज्योति दिखाई पड़ जाए और दीया याद रह जाए, यह असंभव है। दीये की याददाश्त तभी तक है जब तक ज्योति न दिखाई पड़ी हो। अनुयायियों की हालत ऐसी है जैसे कि वे दीये के नीचे खड़े हों जहां अंधेरा होता है, और वहां से देख रहे हों। वहां से ज्योति तो नहीं दिखाई पड़ती, दीये की पेंदी दिखाई पड़ती है। सबकी पेंदियां अलग हैं। और पेंदी के नीचे घना अंधेरा है। और अनुयायी वहीं खड़ा रहता है, और पेंदियों के संबंध में झगड़े और विवाद चलते रहते हैं।
तो जब भी मैं किसी को पेंदी के नीचे खड़ा देखता हूं तो मैं सख्ती से और खिलाफत में बोलता हूं। इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि अनुयायी कभी भी नहीं समझ पाता है। क्योंकि अनुयायी के लिए, अनुयायी होने के लिए छाया में खड़ा होना पड़ता है, उसे अंधेरे में खड़ा होना पड़ता है। दीये के नीचे खड़ा होना पड़ता है। इसलिए जितना बड़ा अनुयायी अर्थात उतने सेंटर में। परिधि के अनुयायी थोड़ा-बहुत दूसरे के बाबत भी समझ लें। लेकिन ठीक बीच में खड़े हुए अनुयायी कभी नहीं समझ पाते।
लेकिन जिसे भी दीये को देखना है उसे परिधि के बिलकुल बाहर आ जाना चाहिए। वह अंधेरे की छाया के बिलकुल बाहर आ जाना चाहिए। और एक बार ज्योति दिख जाए तो दीयों के फर्कों का फासला और विवाद क्या अर्थ रखता है? इसलिए मेरे लिए कोई अंतर नहीं है।
क्राइस्ट पर बोलता हूं कि कृष्ण पर, कि महावीर पर, कि बुद्ध पर, इससे मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता है। मैं एक ही ज्योति की बात कर रहा हूं जो बहुत दीयों में जली है। लेकिन उनसे मैं प्रभावित होकर नहीं बोल रहा हूं। बोल तो मैं वही रहा हूं जो मैं जानता हूं। लेकिन जब भी रिजोनेंस मुझे मिल जाती है, जब भी मुझे ऐसा लग जाता है कि दूसरी तरफ से भी वही ध्वनि आ रही है, तो इसे मैं इनकार भी नहीं कर सकता हूं। क्योंकि यह इनकार करना भी उतना ही गलत होगा। यह फिर ज्योति की तरफ पीठ करके खड़ा हो जाना हो जाएगा। यह अनुयायी ने एक गलती की है कि वह पेंदी के नीचे खड़ा हुआ है। फिर यह पीठ करके खड़ा हो जाना होगा। ये दोनों को मैं एक सी गलतियां मानता हूं।
अब अगर कृष्णमूर्ति से आप पूछेंगे तो वे रिजोनेंस भी स्वीकार नहीं करेंगे। वे यह भी स्वीकार नहीं करेंगे कि मुझे जो हो रहा है वह कृष्ण को हुआ होगा। वे यह भी स्वीकार नहीं करते। वे यह भी स्वीकार नहीं करेंगे कि मुझे जो हो रहा है वह किसी और को हुआ होगा। वे इसकी चर्चा ही नहीं चलाएंगे। इसे भी मैं गलत मानता हूं। क्योंकि सत्य इतना निर्वैयक्तिक है; और इससे कोई सत्य की गरिमा में कमी नहीं पड़ती कि वह और को भी हुआ है। गरिमा बढ़ती है, गरिमा कम नहीं होती। सत्य इतना कमजोर नहीं है कि बासा हो जाए, कि किसी और को हो गया हो तो बासा हो जाए! लेकिन इसके इनकार करने का मोह भी गलत है।
तो मेरी कठिनाई कि जहां-जहां मुझे सत्य दिखाई पड़ता है, मैं स्वीकार करूंगा। प्रभावित जरा भी नहीं हूं। और जहां-जहां सत्य के नाम पर कुछ और पकड़े हुए लोग मुझे दिखाई पड़ेंगे, वहां मैं इनकार भी करूंगा और विरोध भी करूंगा। और जब भी जो करूंगा उसे पूरे मन से करूंगा, इसलिए और मुश्किल हो जाती है। जब भी जो करूंगा उसे पूरे मन से करूंगा; समझौते की मेरी वृत्ति नहीं है। और मैं मानता हूं कि समझौते से कभी कोई सत्य पर नहीं पहुंचता।
तो मेरी वृत्ति ऐसी है कि जब भी जो मैं कहूंगा तब मैं पूरे प्राण से कह रहा हूं। तो अगर किसी ने ज्योति की बात की तो मैं कहूंगा कि महावीर भगवान हैं, कृष्ण अवतार हैं और जीसस ईश्वर के बेटे हैं; और किसी ने अगर दीये की बात की तो मैं कहूंगा कि अपराधी हैं, क्रिमिनल हैं। दोनों स्थिति में जिस वक्तव्य को मैं दे रहा हूं, मैं पूरा उसके साथ खड़ा हूं। और जब मैं उस वक्तव्य को दे रहा हूं तब दूसरे वक्तव्य का मुझे स्मरण भी नहीं है। क्योंकि मेरी समझ यह है कि दोनों वक्तव्य अपने में पूरे हैं और एक-दूसरे को काटते नहीं हैं। अगर मुझे ऐसा खयाल हो कि एक-दूसरे को काटते हैं...अगर मैं आपके शरीर से कहता हूं कि यह मरणधर्मा है और आपसे कहता हूं कि आप अमृत हो, तो इन दोनों को मैं विपरीत वक्तव्य नहीं मानता। और न मैं यह मानता हूं कि ये एक-दूसरे को काटते हैं। न मैं यह मानता हूं कि इन दोनों में समझौते की कोई जरूरत है।
आपका शरीर तो मरेगा ही, इसलिए मरणधर्मा है। और अगर आप समझते हैं कि आप शरीर ही हैं तो मैं कहता हूं आप मरोगे। और इसको मैं पूरे ही बल से कहूंगा। इसमें रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं रखूंगा आपके बचने की। लेकिन आपकी आत्मा की चर्चा है तो मैं कहूंगा, आप कभी पैदा ही नहीं हुए, अजन्मा हो; मरने का कोई सवाल ही नहीं है, अमर हो, अमृत हो। ये दोनों वक्तव्य अपने में पूरे हैं। ये एक-दूसरे को कहीं काटते नहीं। इनका आयाम अलग है, इनका डाइमेन्शन अलग है।
इसलिए निरंतर कठिनाई हो
जाती है। और फिर और कठिनाई इससे जटिल हो जाती है कि मेरे सारे वक्तव्य चूंकि लिखे हुए नहीं हैं, बोले हुए हैं, इसलिए जटिलता और बढ़ जाती है। लिखे हुए वक्तव्य में एक तरह की निरपेक्षता होती है। वह किसी से कहा नहीं गया होता, लिखा गया होता है। सुनने वाला, पढ़ने वाला सामने नहीं होता। इसलिए उसमें वह सम्मिलित नहीं हो पाता। वह बाहर होता है। लेकिन जब बोला जाता है कुछ, तो जो सुन रहा है वह इनक्लूडेड होता है।
तो जब भी मैं कुछ बोल रहा हूं तो उस दिए गए वक्तव्य के लिए मैं अकेला जिम्मेवार नहीं हूं, वह आदमी भी जिम्मेवार है जिससे मैं बोल रहा हूं। इससे जटिलता भारी हो जाती है। जब भी मैं बोल रहा हूं तो मेरे वक्तव्य की जिम्मेवारी दोहरी है। मैं तो जिम्मेवार हूं ही, लेकिन उस वक्तव्य को उस भांति से निर्मित करवाने में वह आदमी भी जिम्मेवार है जिससे मैं बोल रहा हूं। अगर वह न होता, उसकी जगह कोई दूसरा होता, तो मेरा वक्तव्य भिन्न होता। अगर तीसरा होता तो और भिन्न होता। और अगर मैंने शून्य में वक्तव्य दिया होता तो बिलकुल ही भिन्न होता।
तो चूंकि मेरे सारे वक्तव्य बोले गए वक्तव्य हैं, और मैं मानता हूं कि बोले गए वक्तव्य ही जीवित होते हैं। क्योंकि वक्तव्य को जीवन दोनों से आता है--बोलने वाले से और सुनने वाले से। जब बोलने वाला अकेला बोलता है और सुनने वाला कोई भी नहीं होता तो वह इस तरह का सेतु बना रहा है जिसमें दूसरा किनारा नहीं है। वह सेतु बन नहीं सकता। वह एक किनारे पर खड़ा हुआ सेतु है। वह गिरेगा ही। वह अधर में है। इसलिए इस जगत के सब श्रेष्ठतम सत्य बोले गए सत्य हैं, लिखे गए नहीं।
अगर मैं लिखता भी हूं तो पत्र लिखता हूं, क्योंकि पत्र करीब-करीब बोला गया है। उसमें दूसरा सेतु है, उसमें दूसरा तट है, जिससे मैं सेतु बना रहा हूं। पत्र के अलावा मैंने कुछ नहीं लिखा। क्योंकि पत्र मुझे बोलने का ही एक ढंग मालूम हुआ। उसमें दूसरा मेरे सामने है कि मैं किससे बोल रहा हूं।
इसलिए हजार लोगों से जब बोलता हूं तो हजार वक्तव्य हो जाते हैं; इसमें हर बोलने वाला सम्मिलित हो जाता है। तब जटिलता भारी हो जाएगी।
लेकिन ऐसा है, और इस जटिलता को जान-बूझ कर कम करने को मैं उत्सुक नहीं हूं। मेरी उत्सुकता यह है कि इस जटिलता को समझ कर भी आप इस उदघाटित सत्य की सरलता को समझ पाएं तो आपका विकास है। इस जटिलता को कम करने को मैं उत्सुक नहीं हूं। क्योंकि कम यह की जाए तो कट जाएगी। इसको सरल किया जा सकता है। लेकिन तब इसके बहुत से अंग कट जाएंगे। तब यह मुर्दा होगी कट कर। इसकी जटिलता को मैं रत्ती भर कम करने को उत्सुक नहीं हूं। उत्सुक इसमें हूं कि आप इस जटिलता के भीतर भी सरलता को खोज पाएं तो आपका विकास है।
मेरी कठिनाई कम इसमें हो जाए कि मैं इसको सरल कर दूं। वक्तव्य सीधे और गणित के कर दूं। मेरी कठिनाई बिलकुल ही खत्म हो जाए। लेकिन मेरी कठिनाई की मुझे कोई चिंता नहीं। वह कोई कठिनाई है नहीं। आप इतनी जटिलता में भी सरलता को देख पाएं, इतने विरोध में भी निर्विरोध सत्य को देख पाएं, इतने उलटे वक्तव्यों में भी एक ही तारतम्य देख पाएं तो आपका विकास होता है, आपकी दृष्टि ऊंची उठती है। यह आप तभी देख पाएंगे जितने आप ऊपर उठेंगे। तभी यह जटिलता आपको सरल हो पाएगी।
ये पहाड़ पर चढ़ते हुए हजार रास्ते एक-दूसरे को काटते हुए बड़े जटिल हैं, लेकिन शिखर पर खड़े होकर एकदम सरल हो जाते हैं। जब सब दिखाई पड़ते हैं इकट्ठे, एक पैटर्न में, तब मालूम पड़ता है कि सभी पर्वत शिखर की तरफ भाग रहे हैं। न तो वे किसी को काट रहे हैं और न किसी के विरोध में हैं। लेकिन जब कोई आदमी पहाड़ पर चढ़ता है अपने रास्ते पर, तब बाकी सब रास्ते गलत जाते हुए मालूम पड़ते हैं। और ऐसा आदमी जो पहाड़ की चोटी से कह रहा हो कि सब ठीक है, या कभी किसी से कह रहा हो कि यह ठीक है और दूसरा गलत है, और कभी उस दूसरे से कह रहा हो कि तेरा ठीक है और पहले वाला गलत है, तब बहुत जटिलता बढ़ जाती है। लेकिन सब वक्तव्य एड्रेस्ड हैं। मेरा प्रत्येक वक्तव्य पता-ठिकाना लिए हुए है। वह किसी से कहा गया है। और उसी से ही कहा गया है और उस विशेष स्थिति में ही कहा गया है।
अब अगर एक आदमी को मैं डांवाडोल देखता हूं उसके रास्ते पर, तो मैं कहता हूं, सब गलत है, यही ठीक है। लेकिन इसको कहना चाहिए, यह जो वक्तव्य है, यह सिर्फ उसकी सुविधा के लिए है। ऊपर आकर तो वह भी जान लेगा और हंसेगा कि दूसरे रास्ते भी ले आते हैं। लेकिन अपने रास्ते पर, जब वह अधूरे में खड़ा था, अगर उसको यह खयाल आ जाए कि बगल वाला रास्ता भी ले आता है और वह डांवाडोल हो और उस रास्ते पर जाने लगे, और यह उसकी चित्त की दशा हो जाए तो कल और तीसरा रास्ता दिखाई पड़े और उस पर जाने लगे, तो वह कभी पर्वत पर नहीं आ पाएगा। उससे तो मुझे कहना ही पड़ेगा कि तू बिलकुल ठीक चल रहा है, और सब गलत है, तू आ। लेकिन उसके पड़ोस में कोई दूसरे रास्ते पर भी चल रहा है, और जब मैं उससे बात कर रहा हूं तो उससे भी मुझे वही सिचुएशन है। और जब ये दोनों वक्तव्य दोनों को मिल जाते हैं तो कठिनाई हो जाती है।
अब यह मैं आपसे कहूं कि महावीर और बुद्ध को यह कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। क्योंकि उनके वक्तव्य उनके सामने लिखे नहीं गए। पांच सौ साल बाद दूसरों को दिक्कत हुई। जो सवाल आप मुझसे पूछ रहे हैं, यह बुद्ध से नहीं पूछा जा सका। पांच सौ साल बाद दिक्कत हुई, इसलिए पांच सौ साल बाद पंथ बने। पच्चीस पंथ बने। वक्तव्य दिए गए थे, लिखे गए नहीं थे। इसलिए कभी कंपेअर नहीं किए जा सके।
आपको मैंने एक बात कही थी। आपको दूसरी कही थी। उनको तीसरी कही थी। आप तीनों को कभी मौका नहीं मिला लिखित वक्तव्य का कि आप तीनों कंपेअर कर लें, तुलना कर लें कि मुझसे यह कहा, तुमसे यह कहा, उनसे यह कहा। ये वक्तव्य निजी थे और आपके भीतर डूब गए थे। जब लिखे गए तब उपद्रव शुरू हुआ। इसलिए पुराने धर्मों ने बहुत दिनों तक अपने शास्त्रों को न लिखे जाने की जिद की, कि वे लिखे न जाएं। क्योंकि लिखे जाते ही कंट्राडिक्शन साफ हो जाएंगे। जैसे ही लिखा जाएगा, पता चलेगा कि यह मामला क्या है! जब तक नहीं लिखा गया है तब तक व्यक्तिगत है। जैसे ही लिखा गया कि व्यक्तिगत नहीं रह जाता।
तो जो कठिनाई मेरे सामने है, वह बुद्ध-महावीर के सामने नहीं थी। लेकिन अब आगे कोई उपाय नहीं है। अब तो जो भी कहा जाएगा वह लिखा जाएगा। और लिखे जाते से...कहा तो गया था व्यक्ति से, लिखे जाते से समाज की संपत्ति हो जाएगी। फिर सब इकट्ठा हो जाएगा, और उस सब इकट्ठे में फिर सूत्र खोजना मुश्किल हो जाएगा। मगर अब ऐसा होगा। इसके सिवाय कोई उपाय नहीं है। और मैं मानता हूं, अच्छा है। क्योंकि बुद्ध के सामने लिखा गया होता तो बुद्ध इसका उत्तर भी दे सकते थे। पांच सौ साल बाद जब लिखा गया और जब सवाल पूछे गए तो उत्तर देने वाला कोई भी नहीं था।
इसलिए किसी ने एक वक्तव्य को ठीक माना, उसने एक पंथ बना लिया। उससे विपरीत वक्तव्य को जिसने ठीक माना, उसने दूसरा पंथ बना लिया। जिसके पास जो वक्तव्य था उसने उसके हिसाब से पंथ बना लिया। सारे पंथ ऐसे जन्मे हैं। मेरे साथ पंथ नहीं जन्म सकेंगे। क्योंकि मेरा सारा उलझाव सीधा-साफ है। कल साफ होगा ऐसा नहीं, आज ही साफ है। और मुझसे सीधी बात पूछी जा सकती है।
शब्द से ही बोलना पड़ेगा और यह जानते हुए बोलना पड़ेगा कि शब्द अगर पकड़ लिए गए तो जो हम प्रयास कर रहे थे वह व्यर्थ हो गया। हम प्रयास कर रहे थे कि निःशब्द में ले जाएं, बोलें शब्द से। यह मजबूरी थी, कोई उपाय न था। अगर शब्द पकड़ लिए गए तो प्रयोजन व्यर्थ हो गया, क्योंकि ले जाना था निःशब्द में। इसलिए शब्द से बोल कर और शब्द के खिलाफ निरंतर बोलना पड़ेगा, वह भी शब्द में ही बोलना पड़ेगा। उसका भी कोई उपाय नहीं है। चुप हुआ जा सकता है, उसमें कोई कठिनाई नहीं है। वैसे लोग भी हुए हैं जो इस परिस्थितिगत कठिनाई से चुप हो गए। उनके चुप होने से वे तो झंझट के बाहर हो गए, लेकिन जो उनके पास था वह दूसरों तक न पहुंच पाया।
मेरे चुप हो जाने में मुझे कोई अड़चन नहीं है। मैं चुप हो जा सकता हूं। और कोई आश्चर्य नहीं कि कभी हो जाऊं! क्योंकि जो कर रहा हूं वह करीब-करीब, जिसको कहना चाहिए इंपासिबल एफर्ट है, वह असंभव को संभव बनाने की चेष्टा है।
लेकिन मेरे चुप हो जाने से कुछ हल नहीं होता। आप तक कोई संवाद नहीं पहुंचता। खतरा फिर वही का वही है। पहले शब्द पकड़े जा सकते थे। उनसे डर था कि शब्द पकड़ जाएं तो जो मैं पहुंचाना चाहता था वह नहीं होगा। अब चुप्पी रह जाएगी। अब पहुंचाने की बात ही खत्म हो गई। लेकिन पहले में एक संभावना थी कि कुछ लोगों तक पहुंच जाएगा। सौ से बात करूंगा तो एक तो शब्द को बिना पकड़े जा सकेगा; निन्यानबे प्रयास व्यर्थ होंगे, एक तो सार्थक हो जाएगा! चुप रह कर वह एक भी संभव नहीं रह जाता। उसका भी उपाय नहीं रह जाता। इसलिए व्यर्थ चेष्टा करनी पड़ती है।
और मजे की बात यह है कि जिसको भरोसा है कि शब्द से कहा जा सकता है, वह बहुत ज्यादा नहीं बोलेगा। उसने थोड़ा बोल दिया, बात खत्म हो गई। लेकिन जिसे भरोसा नहीं है कि शब्द से कहा जा सकता है, वह बहुत बोलेगा। क्योंकि कितना ही बोले उसे पक्का पता है कि अभी भी पहुंचा नहीं। वह और बोलेगा, और बोलेगा, और बोलेगा। यह जो बुद्ध का चालीस साल निरंतर बोलना है सुबह से सांझ तक, यह इसलिए नहीं है कि शब्द से कहा जा सकता है इसलिए इतना बोल रहे हैं। यह इसलिए है कि हर बार बोल कर पता लगता है कि अभी भी तो नहीं पहुंचा, फिर बोलो, और ढंग से बोलो, किसी और रास्ते से बोलो, कोई और शब्द का उपयोग करो।
इसलिए चालीस साल निरंतर बोलने में बीत गए। फिर डर भी लगता है कि जब चालीस साल निरंतर बोलूंगा तो कहीं ऐसा न हो कि लोगों को शब्द पकड़ जाएं, क्योंकि चालीस साल से शब्द ही तो दे रहा हूं! इसलिए फिर निरंतर यह भी चिल्लाते रहो कि शब्द पकड़ मत लेना। पर यह स्थिति है, और इस स्थिति के बाहर जाने के लिए सिवाय इसके कोई मार्ग नहीं है। शब्द से बाहर जाने के लिए शब्द का ही उपयोग करना पड़ेगा।
यह करीब-करीब स्थिति ऐसी है, जैसे यह कमरा है। इस कमरे से बाहर जाने के लिए भी इस कमरे में दस-पांच कदम चलने पड़ेंगे--बाहर जाने के लिए भी। क्योंकि जहां हम बैठे हैं वहां से दस कदम तो उठाने ही पड़ेंगे बाहर जाने के लिए। हालांकि कोई कह सकता है कि कमरे में ही चलने से कमरे के बाहर कैसे पहुंचोगे? लेकिन कमरे में चलने के ढंग पर निर्भर करता है।
एक आदमी वर्तुलाकार चल सकता है कमरे में, गोल चक्कर काट सकता है। वह मीलों चल ले तो भी बाहर नहीं पहुंचेगा। लेकिन एक द्वार की तरफ चल सकता है। वर्तुलाकार नहीं, लीनियर होगा उसका चलना, रेखाबद्ध होगा। अगर रेखा कहीं जरा भी मुड़ गई तो चक्कर खा जाएगा कमरे के भीतर। अगर रेखा बिलकुल सीधी रही तो दरवाजे से निकल भी सकता है। लेकिन दोनों को चलना तो पड़ेगा कमरे में ही। अगर मैं उस आदमी से कहूं, जो कमरे में कई चक्कर लगा चुका है, उससे मैं कहूं कि दस कदम चलो, बाहर निकल जाओगे। वह कहेगा, पागल हैं! दस कदम कह रहे हो, मैं मीलों चल चुका और कमरे के बाहर नहीं निकला। उसका कहना भी गलत नहीं है। वह गोल चल रहा है।
और एक बड़े मजे की बात है कि इस जगत में अगर बहुत प्रयास न किया जाए तो सब चीजें गोल चलती हैं--सब चीजें! गति गोल है, सर्कुलर है। सब गतियां सर्कुलर हैं। अगर आप चेष्टा न करें तो सब चीजें गोल चलेंगी। सीधा चलाना बहुत एफर्ट की बात है।
हम लोग भी?
हां, सभी कुछ इस जगत में। गति सर्कुलर है--चाहे एटम्स चलें, चाहे चांद-तारे चलें, चाहे आदमी की जिंदगी चले, चाहे विचार चलें--इस जगत में जो भी चलता है वह गोल चलता है। इसलिए बड़ी से बड़ी साधना सीधा चलना है। पर वह बड़ा कठिन मामला है। आपको पता ही नहीं चलता कि आप कब गोल हो गए। इसलिए ज्यामेट्री तो कहेगी कि सीधी रेखा ही नहीं खींची जा सकती। सब सीधी रेखाएं भी किसी बड़े वर्तुल के हिस्से हैं; बस धोखा देते हैं कि सीधे हैं। कोई सीधी रेखा नहीं है जगत में। स्ट्रेट लाइन खींची नहीं जा सकती है, स्ट्रेट लाइन सिर्फ डेफिनिशन में है।
यूक्लिड कहता है कि स्ट्रेट लाइन सिर्फ व्याख्या है, कल्पना है, खिंच नहीं सकती। कितनी ही बड़ी सीधी रेखा खींचें हम, पहले तो हम उसे पृथ्वी पर खींचेंगे और पृथ्वी चूंकि गोल है इसलिए वह गोल हो जाएगी। इस कमरे में हम सीधी रेखा खींच सकते हैं, लेकिन वह पृथ्वी के बड़े गोल का एक टुकड़ा है।
एक कर्व है?
हां, एक कर्व है। लेकिन कर्व इतनी छोटी है कि हमें दिखाई नहीं पड़ती। उसको हम दोनों तरफ बढ़ाए चले जाएं तो हमको पता चल जाएगा कि पूरी पृथ्वी का सर्किल लगा कर वह गोल घेरा बन गई। वस्तुतः तो खींचना मुश्किल ही है।
साधना में सबसे बड़ा जो प्रश्न है, गहरे अंतर में, वह यही है कि विचार भी वर्तुल चलते हैं, चेतना भी वर्तुल घूमती है। और जो आर्डुअसनेस है, जो तपश्चर्या है, वह इस वर्तुल के बाहर छलांग लगाने में है। लेकिन कोई उपाय नहीं है। सब शब्द वर्तुलाकार हैं। कभी हम खयाल नहीं करते कि शब्द वर्तुलाकार हैं। सब शब्द वर्तुलाकार हैं। आप जब एक शब्द की व्याख्या करते हैं तो दूसरा शब्द उपयोग करते हैं।
अगर आप डिक्शनरी उठा कर देखें, उसमें देखें कि मनुष्य, तो लिखा है आदमी। और आदमी का शब्द उठा कर देखें, तो लिखा है मनुष्य। यह तो बड़ा पागलपन है। यानी तुम्हें दोनों का ही पता नहीं है, इसका मतलब यह हुआ! लेकिन डिक्शनरी पढ़ने वालों को कभी खयाल में नहीं आता कि डिक्शनरी बिलकुल सर्कुलर है। उसमें एक जगह जो व्याख्या दी गई है वही व्याख्या उस शब्द के लिए फिर वहां दे दी गई है। इसका फल क्या हुआ? इससे मतलब क्या हुआ? मनुष्य आदमी है और आदमी मनुष्य है, तो हम वहीं के वहीं खड़े हैं। इससे व्याख्या हुई कहां?
सारी व्याख्याएं वर्तुलाकार हैं, सारे सिद्धांत वर्तुलाकार हैं। एक सिद्धांत को समझाने के लिए दूसरे का उपयोग करना, दूसरे के लिए फिर उसी का करना पड़ता है। पूरी चेतना वर्तुलाकार है। इसलिए बूढ़े आखिरी अवस्था में करीब-करीब बच्चों जैसे हो जाते हैं। वर्तुल पूरा हो गया।
शब्द कितने ही बोले जाएं, वर्तुल में ही घूमते हैं। शब्दों की बनावट वर्तुलाकार है। सीधी रेखा में वे चल नहीं सकते। अगर आप सीधी रेखा में चलें तो शब्द के बाहर पहुंच जाएं। पर शब्दों में हम जीते हैं, इसलिए अगर मुझे शब्दों के खिलाफ भी कुछ कहना है तो शब्दों में ही कहना पड़ेगा। यह बड़ा पागलपन है। लेकिन इसमें मेरा कसूर नहीं है; ऐसी स्थिति है।
तो शब्द बोलता रहूंगा; शब्द के खिलाफ बोलता रहूंगा। इस आशा में शब्द बोलूंगा कि शब्द के बिना आप समझ नहीं सकते हैं। इस आशा में शब्द के खिलाफ बोलूंगा कि शायद शब्द की पकड़ से बच जाएं। अगर ये दोनों घटनाएं घट सकें तो ही मैं आपको जो कहना चाहता हूं वह पहुंचा पाता हूं। अगर आप सिर्फ मेरे शब्द समझ गए तो भी चूक गए। अगर आप शब्द ही न समझे तो भी चूक गए। शब्द तो मेरे समझने ही पड़ेंगे, लेकिन शब्द के साथ-साथ जो निःशब्द का इंगित है वह भी समझना पड़ेगा।
इसलिए शास्त्रों के खिलाफ बोलता रहूंगा, और आज नहीं कल मेरे वचन सब शास्त्र बन जाएंगे। सब शास्त्र इसी तरह बने हैं। ऐसा एक भी कीमती शास्त्र नहीं है जिसमें शब्द के खिलाफ वक्तव्य न हो। इसका मतलब यह हुआ कि एक भी ऐसा शास्त्र नहीं है जिसमें शास्त्र के खिलाफ वक्तव्य न हो--चाहे उपनिषद हों और चाहे गीता हो और चाहे कुरान हो और चाहे बाइबिल हो, चाहे महावीर, चाहे बुद्ध हों। तो ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि मेरे साथ कुछ भिन्न हो जाएगा। वही असंभव कोशिश चलती है, वही चलेगी। शब्द के खिलाफ बोल-बोल कर शब्द बहुत बोल चुका होऊंगा, कोई न कोई उन्हें पकड़ लेगा और शास्त्र बन ही जाएंगे।
लेकिन इस डर से बोलना बंद नहीं किया जा सकता। क्योंकि सौ के साथ एक के निकलने की संभावना है। न बोलने के साथ एक की भी संभावना खो जाती है। फिर डर इसलिए भी नहीं है कि मेरे शब्दों और शास्त्रों के खिलाफ बोलने वाला कोई न कोई फिर मिल जाएगा, इसलिए डर नहीं है।
अब यहां एक दूसरी उलझन खड़ी हो जाती है। वह यह है कि इस जगत में मेरा काम कभी भी कोई वही आदमी करेगा जो मेरे खिलाफ बोलेगा। यह जो कठिनाई है वह ऐसी है कि आज अगर बुद्ध के पक्ष में काम करना है तो बुद्ध के खिलाफ बोलना पड़ेगा। क्योंकि उनके शब्द किन्हीं के लिए पत्थर की तरह पकड़ गए हैं और उन पत्थरों को तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक बुद्ध को न हटाया जाए। क्योंकि बुद्ध की प्रतिष्ठा के साथ वे पत्थर उनकी छाती पर जमे हुए हैं। पत्थर को हटाना है तो बुद्ध को गिराना पड़े; तो वे पत्थर हटाएं। अगर बुद्ध को न गिराओ तो वे पत्थर न हटाएं।
अब मेरे जैसे आदमी की मजबूरी खयाल में आ सकती है कि मुझे बुद्ध के खिलाफ बोलना पड़े, और यह जानते हुए कि उनका काम कर रहा हूं। मगर जिनको बुद्ध के नाम के साथ आग्रह पकड़ गया है और शब्द के साथ आग्रह पकड़ गया है, उन्हें हिलाने का क्या उपाय है? जब तक बुद्ध न हिलें तब तक वे नहीं हिल सकते। तो अकारण बुद्ध के साथ झंझट करनी पड़ती है इस आदमी को हिलाने के लिए। जब तक वेद न हिलाया जाए तब तक यह आदमी नहीं हिल सकता। यह वेद को पकड़े बैठा हुआ है। जब इसको पक्का हो जाए कि वेद बेकार है, तभी यह छोड़ सकता है। एक दफे खाली हो तो कुछ आगे बढ़ सके। हालांकि जो वेद ने कहा है वही मैं इससे कहूंगा--खाली होने के बाद। तब जटिलता और बढ़ जाती है। तब अकारण गलत मित्र पैदा हो जाते हैं और गलत शत्रु पैदा हो जाते हैं। बाकी सौ में निन्यानबे मौके गलत मित्रों और गलत शत्रुओं के हैं।
गलत मित्र वे हैं जो मेरी बात को शास्त्र की तरह पकड़ लेंगे और गलत शत्रु वे हैं जो कि मेरी बात को शास्त्र के शत्रु मान कर पकड़ लेंगे, कि मैं दुश्मन हूं शास्त्रों का। मगर ऐसा है, और ऐसा होगा। और इसमें कुछ बेचैनी का कारण नहीं है; क्योंकि सारी स्थिति ऐसी है।
नहीं लिखना चाहूंगा। नहीं लिखना चाहूंगा कई कारणों से। नहीं लिखना चाहूंगा कई कारणों से। एक तो इसलिए कि लिखना मेरी दृष्टि में एब्सर्ड है, बिलकुल व्यर्थ है। व्यर्थ इसलिए कि किसके लिए? यानी लिखना मेरे लिए ऐसा है कि एक पत्र लिखा है, लेकिन पता नहीं है मालूम। तो लिफाफे में बंद करके उसको भेजना कहां है? वक्तव्य सदा ही एड्रेस्ड है। लिखते वे लोग हैं जो मॉस के लिए एड्रेस कर रहे हैं। वे भी एड्रेस कर रहे हैं अनजान भीड़ के लिए। लेकिन जितनी अनजान भीड़ हो उतनी ही ओछी बातें कही जा सकती हैं। और जितना जाना-माना व्यक्ति हो उतनी गहरी बातें कही जा सकती हैं।
गहरे सत्य व्यक्तियों से कहे जा सकते हैं--व्यक्ति से कहे जा सकते हैं। भीड़ से कामचलाऊ बातें कही जा सकती हैं। भीड़ से कभी गहरे सत्य नहीं कहे जा सकते। क्योंकि जितनी बड़ी भीड़ हो उतनी ही समझ कम हो जाती है, और अगर भीड़ बिलकुल अज्ञात हो तो समझ को शून्य मान कर चलना पड़ता है। इसलिए जितना मॉस लिटरेचर होगा, बहुत जमीन पर आ जाएगा, आसमान की उड़ान नहीं रह जाएगी।
अगर कालिदास के काव्य में कोई खूबी है और आज के कवि में खूबी नहीं है तो उसका कोई फर्क कालिदास और आज के कवि में नहीं है। कालिदास का वक्तव्य एड्रेस्ड है, किसी सम्राट के सामने कहा गया है। किन्हीं दस-पांच चुने हुए लोगों के बीच कही गई कविता है। आज का कवि अखबार में छाप रहा है कविता। कोई चाय की दुकान में पढ़ेगा, कोई मूंगफली खाते हुए पढ़ेगा, कोई हुक्का पीते हुए देख लेगा एक नजर--कौन, वह भी पता नहीं। तो वह जो अनजान आदमी है उसको तो हमें आखिरी मान कर चलना पड़ता है। अगर लिखना हो तो उसको ध्यान में रख कर लिखना पड़ता है।
अब मेरी तो तकलीफ यह है कि हमारे बीच जो श्रेष्ठतम हैं उससे भी कहने में मुश्किल है सत्य, तो हमारे बीच जो निकृष्टतम हैं उससे तो कहने का कोई उपाय नहीं है। हमारे बीच जो श्रेष्ठतम हैं, जिसको हम कहें चूजन-फ्यू, जो गहरे से गहरा समझ सकते हैं, उनमें से भी सौ से कहूंगा तो एक समझेगा, निन्यानबे चूक जाएंगे। तो भीड़ को तो कहने का कोई अर्थ ही नहीं है। और लिखा तो भीड़ के लिए जा सकता है, व्यक्ति के लिए कहा जा सकता है।
और दूसरे भी कारण हैं। मेरा मानना है कि हर मीडियम के साथ कंटेंट बदल जाता है। हर माध्यम के साथ विषय-वस्तु बदल जाती है। आप जैसे ही माध्यम बदलते हैं, विषय-वस्तु वही नहीं रह जाती। माध्यम भी विषय-वस्तु को बदलने के लिए चेष्टा करता है। यह एकदम से दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन इसे...।
जब मैं बोल रहा हूं तब माध्यम और है। एक तो जीवंत है, सुनने वाला भी जीवित मौजूद है, मैं भी जीवित मौजूद हूं। जब मैं बोल रहा हूं तब वह मुझे सुन ही नहीं रहा, मुझे देख भी रहा है। मेरे चेहरे के हलके से फर्क, मेरी आंख पर जरा सी बदली हुई लहर, मेरी अंगुली का उठना या गिरना, वह सब उसे दिखाई भी पड़ रहा है। सुन भी रहा है, देख भी रहा है। मेरे शब्द ही नहीं सुन रहा है, मेरे ओंठ भी देख रहा है। शब्द ही नहीं कहते, ओंठ भी कहते हैं। मेरी आंखें भी कुछ कह रही हैं। यह सब इकट्ठा पी रहा है वह। सुन भी रहा है, देख भी रहा है, यह सब इकट्ठा जा रहा है। एक कंटेंट अलग होगा इसका।
जब वह एक किताब पढ़ रहा है, तब मेरी जगह सिर्फ काले अक्षर हैं, काली स्याही है, और कुछ भी नहीं है। तो मैं और काली स्याही, ये इक्विवेलेंट नहीं हैं। इनका कोई लेन-देन नहीं है, इनका कोई, कहीं कोई संबंध नहीं है। काली स्याही में न तो कोई भाव उठते, न कोई गेस्चर्स होते, न कोई जीवन है। मुर्दा टंका हुआ संदेश है। बहुत बड़ा हिस्सा खो गया; जो, जो बोलने के साथ जीवंत था वह खो गया। एक मुर्दा वक्तव्य उसके हाथ में है।
बड़े मजे की बात है, किताब पढ़ने के लिए उतना अटेंटिव होना जरूरी नहीं है। सुनने वाले में भी फर्क होते हैं। सुनने वाला जब सुनता है तब, और जब पढ़ता है तब, दोनों में बुनियादी ध्यान के फर्क हो जाते हैं। सुनते समय आपको पूरा-पूरा एकाग्र होना पड़ता है, क्योंकि जो बोला गया है वह दोहराया नहीं जाएगा। उसको वापस लौट कर नहीं देख सकते हैं। वह खो गया। प्रतिपल जब मैं बोल रहा हूं तो जो भी बोला जा रहा है वह अनंत खाई में खोता चला जा रहा है। अगर आपने पकड़ लिया तो पकड़ लिया, अन्यथा वह गया। वह फिर नहीं लौटेगा। किताब पढ़ते वक्त कोई डर नहीं है, आप दस दफे लौट कर किताब पढ़ सकते हैं। इसलिए बहुत अटेंटिव होने की जरूरत नहीं है।
इसलिए दुनिया में जब से किताब आई तब से ध्यान कम हुआ, अटेंशन कम हो गई। होगी ही, वह कंटेंट बदल गया। किताब के साथ तो ऐसा है न कि आप अभी एक पूरा पन्ना पढ़ जाते हैं और फिर खयाल आता है कि अरे कुछ खयाल में नहीं आया, फिर उलटा कर पढ़ लेते हैं। लेकिन मुझे उलटाया नहीं जा सकता। मैं गया।
यह बोध कि जो सुना जा रहा है वह खो जाएगा, एक दफे चूका कि सदा के लिए चूका, वह कभी पुनरुक्त नहीं हो सकेगा, आपकी चेतना को, जिसको कहना चाहिए पीक पिच में रखता है, आपकी चेतना को उसके ऊंचे से ऊंचे शिखर पर रखता है ध्यान के। फिर जब आप बैठे हैं आराम से, पढ़ रहे हैं, खो गया, कोई हर्जा नहीं, पन्ने पलटाए, फिर पढ़ गए हैं! समझ कम होती है किताब के साथ, पाठ बढ़ता है। समझ ध्यान के साथ कम हो जाती है।
इसलिए अकारण नहीं है कि बुद्ध या महावीर या जीसस बोलने के माध्यम को चुनते हैं। लिखा जा सकता था। बोलने के माध्यम को चुनते हैं, उसके दोहरे कारण हैं। एक तो बोलने का माध्यम बड़ा माध्यम है। उसके साथ बहुत चीजें और जुड़ी हैं जो लिखने में खो जाएंगी।
इसलिए आप ध्यान रखें कि जैसे ही फिल्म आई, उपन्यास खो गए। क्योंकि फिल्म ने वापस जीवंत कर दी चीज को। उपन्यास को कौन पढ़ेगा? वह मृत है, मृतवत हो गया। उपन्यास ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह सकता। उसकी जान चली गई। वह विधा खो जाएगी, क्योंकि माध्यम, अब हमारे पास ज्यादा जीवंत माध्यम है। मैकलोहान इसको हॉट मीडियम कहता है। यह हॉट मीडियम है, यह जो टेलीविजन है या फिल्म है; क्योंकि जीवंत है, इसके खून में गर्मी है। यह कोल्ड मीडियम है किताब जो है। यह बिलकुल डेड कोल्ड है, ठंडा है बिलकुल। इसमें कोई जान नहीं है। खून बहता नहीं है इसमें। आपका टेलीफोन खो जाएगा, जिस दिन भी हम व़िजन जोड़ देंगे उस दिन टेलीफोन एकदम खो जाएगा; जैसे रेडियो खो गया टेलीविजन के सामने। रेडियो कोल्ड मीडियम हो गया; टेलीविजन हॉट मीडियम हो गया।
तो बोलना जो है मेरे हिसाब से हॉट मीडियम है। उसमें खून है, गर्मी है।
अब अभी तक भी भाषा का हम कोई उपाय नहीं कर सकते। जैसे कि जब मुझे किसी चीज पर जोर देना होता है तो मैं जरा जोर से बोलता हूं। उसके बोलने का न्यूएंस बदल जाता है, उसके बोलने की तर्ज बदल जाती है, उसका जोर बदल जाता है। लेकिन शब्द में कोई उपाय नहीं है। शब्द बिलकुल डेड है। प्रेम, चाहे प्रेम करने वाले ने लिखा हो और चाहे प्रेम न करने वाले ने लिखा हो और चाहे प्रेम में जलने वाले ने लिखा हो और चाहे प्रेम को बिलकुल न जानने वाले ने लिखा हो, प्रेम प्रेम है। उसमें कोई न्यूएंस नहीं है, उसमें कोई ध्वनि-तरंग नहीं है। वह मुर्दा है। तो जब जीसस कहेंगे ‘प्रार्थना’, तो उसका मतलब वह नहीं होता जो किताब में कोई भी लिख देता है प्रार्थना उसका होता है। यह जीसस की पूरी जिंदगी प्रार्थना है, वह सिर से अंगूठे तक प्रार्थना है, रोआं-रोआं प्रार्थना है। जब वे कहते हैं--प्रार्थना! तो इसका कुछ अर्थ ही और है, जो कि भाषाकोश में नहीं हो सकता।
साथ ही जब भी किसी से बोला जा रहा है तब बहुत जल्दी जिसको कहें एक ट्यूनिंग निर्मित हो जाती है। बहुत जल्दी आपका हृदय, सुनने वाले का हृदय, निकट आ जाता है। द्वार खुल जाते हैं। आपके डिफेंस गिर जाते हैं। सुनते वक्त अगर आप ध्यान से सुन रहे हैं, तो आपका सोचना बंद हो ही जाता है। जितने ध्यान से सुन रहे हों उतना सोचना बंद हो जाता है, द्वार खुल जाते हैं। रिसेप्टिविटी साफ हो जाती है, ग्राहकता बढ़ जाती है, चीजें सीधी चली जाती हैं। और एक-दूसरे से हम परिचित हो जाते हैं एक बहुत गहरे अर्थ में और भीतर से सुर-संबंध बन जाते हैं। बोलना ऊपर चलता है, भीतर के सुर-संबंध भी यात्रा शुरू कर देते हैं। पढ़ते वक्त ऐसा कोई सुर-संबंध नहीं बनता, क्योंकि बनेगा किससे? पढ़ते वक्त आप समझते नहीं, समझना पड़ता है। सुनते वक्त आप समझते हैं, समझना पड़ता नहीं है।
फिर, जिन्होंने मुझे बोलते सुना है वे अगर मुझे पढ़ते हैं, और अगर मैंने जैसा कहा है वैसा ही रिपोर्ट किया गया है--ठीक वैसा, अक्षरशः--तो वे भूल जाते हैं कि पढ़ रहे हैं। थोड़ी देर में उनको लगता है कि वे सुन रहे हैं। अगर जरा भी इधर-उधर हेर-फेर किया गया है तो धारा टूट जाती है। तो जिसने मुझे एक दफा सुन लिया है उसके लिए मेरा कहा गया और लिखा हुआ जब वह पढ़ेगा, तो वह करीब-करीब पढ़ना नहीं होगा, सुनना होगा। और भी फर्क हैं। फर्क बहुत हैं; माध्यम के फर्क बहुत हैं। और कंटेंट बदलता है। बड़ी कठिनाई जो है वह यह है कि जो हम कहने जा रहे हैं, वह जिस माध्यम से हम कहते हैं, वह उसके साथ बदलता है। अब इधर मैं अनुभव करता हूं, बदलेगा ही। अगर उसी बात को काव्य में कहना है तो काव्य अपनी ही व्यवस्था थोपेगा, तोड़-फोड़ करेगा, काट-छांट करेगा। अगर उसी को गद्य में कहना है तो बात और होगी--कंटेंट बदल जाएगा।
इसलिए प्राथमिक रूप से सारे के सारे दुनिया के ग्रंथ काव्य में लिखे गए। उसका कारण था; जो कहा जा रहा था वह इतना तर्कातीत था कि उसे गद्य में कहना कठिन पड़ा। गद्य बहुत लॉजिकल है, पद्य बहुत इल्लॉजिकल है। अच्छा, पद्य में इल्लॉजिक को क्षमा किया जा सकता है, गद्य में नहीं किया जा सकता। अगर आप कविता में थोड़ा सा बुद्धि के इधर-उधर सरकें तो माफ किया जा सकता है, लेकिन प्रोज में माफ नहीं किया जा सकता। क्योंकि प्रोज गहरे में लॉजिक है और पोएट्री गहरे में इल्लॉजिक है।
अगर उपनिषद को आप गद्य में लिखें, या गीता को गद्य में लिख दें, आप पाएंगे, उसका प्राण खो गया। यह मीडियम बदल गया। वही बात जो पद्य में बहुत प्रीतिकर लगती थी, गद्य में आकर खटकने लगेगी, क्योंकि वह तर्कहीन हो जाएगी। गद्य जो है वह तर्क की व्यवस्था है। उपनिषद तो कहे गए पद्य में, गीता कही गई पद्य में, लेकिन बुद्ध और महावीर पद्य में नहीं बोले, गद्य में बोले हैं। कारण था। युग बदल गया था पूरा का पूरा। जब उपनिषद और वेद रचे गए तब एक अर्थ में युग ही पद्यात्मक था। लोग सीधे-सादे थे, तर्क की उनकी मांग ही नहीं थी। उनसे किसी ने कह दिया कि ईश्वर है, तो उन्होंने कहा, है। फिर वे यह भी पूछने नहीं आए कि कैसा है? क्या है?
अगर बच्चों को देखें तो आपको पता चल जाएगा कि उस युग के लोग कैसे रहे होंगे।
एक बच्चा आपसे कितना ही कठिन सवाल पूछे, लेकिन कितने ही सरल जवाब से राजी हो जाता है। सवाल कितना ही कठिन पूछे, जवाब से बड़े सरल राजी हो जाता है। वह पूछेगा, बच्चे कहां से आते हैं? आप कहते हैं कि कौवा लाता है। वह चला गया खेलने। सवाल उसने भारी कठिन पूछा था, जिसको कि अभी बड़े से बड़ा बुद्धिमान भी ठीक से जवाब नहीं दे पा सकता है। सवाल बड़ा कठिन था उसका, अल्टीमेट पूछ लिया था, बच्चे कहां से आते हैं? आपने कहा कि कौवे ले आते हैं। वह अपने गया। बड़े सरल जवाब से राजी हो गया। ध्यान रखें, जवाब जितना पोएटिक होगा बच्चा उतने जल्दी राजी हो जाएगा। अगर इसको ही आप पोएट्री में कह देते--कौवा ले आया। और भी जल्दी राजी हो जाता। और भी जल्दी राजी हो जाता। इसलिए छोटे बच्चों की किताब हमें पोएट्री में लिखनी पड़ती है। क्योंकि उसके हृदय में जल्दी से पहुंच जाती है। उसमें धुन होती है, लय होती है। वह उसके मन में उतर जाती है। अभी वह धुन और लय के जगत में जीता है।
बुद्ध और महावीर को गद्य का उपयोग करना पड़ा। क्योंकि युग तार्किक था और लोग भारी तर्क कर रहे थे। लोग सवाल छोटा सा पूछते, लेकिन बड़े से बड़े जवाब से राजी नहीं थे। हालत उलटी हो गई थी। छोटा सा सवाल लोग पूछेंगे, बड़े से बड़ा जवाब भी उनको काफी नहीं था। क्योंकि पच्चीस सवाल और पूछेंगे। इसलिए बुद्ध और महावीर को बिलकुल ही गद्य में बोलना पड़ा।
और अब दुनिया में पद्य में कभी बोला जा सकेगा इसकी कठिनाई है। इसलिए पद्य अब ज्यादा से ज्यादा मनोरंजन है। उसमें कोई गहरी बातें नहीं कही जातीं, जब कि दुनिया की प्राथमिक सभी बातें पद्य में कही गई हैं। लेकिन अब पद्य सिर्फ मनोरंजन है। कुछ लोग जिनको फुर्सत में कुछ मनोरंजन करना है, करते हैं। लेकिन जो भी कीमती बातें हैं वे अब गद्य में कही जाएंगी। क्योंकि अब आदमी जो है बच्चे जैसा नहीं है, प्रौढ़ है। हर चीज पर तर्क करेगा। गद्य ही उस तक पहुंचेगा।
हर माध्यम कंटेंट को बदलता है। पहुंचाने की सुविधा, संभावना को बढ़ाता और घटाता है। और मेरी अपनी दृष्टि तो यह है कि जैसे-जैसे टेक्नालॉजी विकसित होती जा रही है वैसे-वैसे बोलने का माध्यम वापस लौट आएगा। बीच में खोया था। बीच में खोया था; क्योंकि किताब ने पकड़ लिया था चीजों को। टेक्नालॉजी हमें वापस लौटाए दे रही है। टेलीविजन आ जाएगा। कल थ्री डाइमेन्शनल टेलीविजन हो जाएगा। कोई किताब पढ़ने को राजी नहीं होगा। किताब लिखने की कोई जरूरत नहीं होगी। मैं सारी दुनिया से एक साथ बोल सकता हूं, टेलीविजन पर बोल सकता हूं। वे मुझे सीधा ही सुन सकते हैं। बहुत जल्दी, किताब के लिए बड़े खतरे हैं। भविष्य किताब का बहुत अच्छा नहीं है। किताब के लिए खतरे हैं। जल्दी, किताब भी पढ़ी नहीं जाएगी, देखी जाएगी एक अर्थ में। किताब जल्दी से ट्रांसफार्म होगी। उसको देखने में ट्रांसफार्म करना पड़ेगा। अभी भी माइक्रो फिल्म्स बन गई हैं, जिनमें कि किताब को पर्दे पर आप देखेंगे। बहुत जल्दी इनको हम पिक्चर में बदल लेंगे। इसमें ज्यादा देर नहीं लगेगी।
मेरी अपनी समझ ऐसी है कि लिखने का माध्यम एक मजबूरी थी। कोई और उपाय नहीं था तो लिखा गया। फिर भी जिन्हें कुछ बहुत बड़ी बात कहनी थी वे अब तक भी बोलने का ही माध्यम उपयोग करते रहे।
तो मेरे मन में कभी खयाल नहीं आता कुछ लिखने का।
एक तो मेरी यही समझ में नहीं आता कि किसके लिए? जब तक मेरे सामने किसी का चेहरा न हो तब तक इस वजह से और भी मेरे भीतर कुछ उठता नहीं; क्योंकि मेरे पास, एक जो कहने का रस होता है, वह मेरे लिए कारण नहीं है। एक तो रस होता है कि कुछ कहूं। एक साहित्यकार में और एक ऋषि में वही फर्क है। साहित्यकार को कहने में रस है। कह पाया, आनंदित है। अभिव्यक्ति बड़ा आनंद है। कह दिया, जैसे कोई बोझ हलका हो गया। कोई भारी थी चीज।
मेरे ऊपर कोई बोझ नहीं है। जब मैं आपसे कुछ कह रहा हूं तो मुझे कहने की वजह से कोई आनंद नहीं आ रहा है। कह कर मेरा कोई बोझ हलका नहीं हो रहा है। मेरा कहना, बहुत गहरे में, एक्सप्रेशन कम और रिस्पांस ज्यादा है। मुझे कुछ कहना ही है आपसे, ऐसा नहीं है, आपको कुछ कहलवाना हो तो ही मेरे भीतर से कुछ आ सकता है। यानी करीब-करीब हालत मेरे मन की भीतर ऐसी है कि अगर आप बाल्टी डाल दें तो ही मेरे कुएं से कुछ आ सकता है। इसलिए धीरे-धीरे आप देखें, मुझे मुश्किल होता जा रहा है। जब तक मुझसे कुछ पूछा न जाए मुझे कहना मुश्किल होता जा रहा है। इसलिए बहुत कठिन है आगे कि मैं सीधा बोल पाऊं। वह मुझे भारी पड़ने लगा। इसलिए अब मुझे बहाने खोजने पड़ेंगे।
अगर गीता पर बोल रहा हूं तो उसका कारण है। मुझे बहाना चाहिए। आप कोई बहाना खड़ा कर देंगे तो मैं बोल दूंगा। आपने बहाना नहीं खड़ा किया तो मेरे लिए मुश्किल हो जाता है कि खूंटी नहीं है तो...और क्या टांगना है और क्यों टांगना है, वह भी पकड़ में नहीं आता। एकदम खाली बैठा रह जाता हूं। अगर आप नहीं पूछ रहे हैं तो मैं खाली हूं। आप कमरे के बाहर गए कि मैं खाली हूं। जिसको अभिव्यक्ति देनी है, जब आप कमरे के बाहर गए, तब वह तैयारी कर रहा है। उसके दिमाग में कुछ तैयार हो रहा है। जब वह भारी हो जाएगा तब वह उसको प्रकट करेगा। मैं बिलकुल खाली हूं। आप कुछ बुलवा लेंगे तो बोल दूंगा। आप कोई प्रश्न खड़ा कर देंगे तो कुछ बोल दूंगा। तो लिखना मुश्किल है। क्योंकि लिखना जो है, वे जो भारी हैं, उनके लिए आसान है। वे निकालें, वे निकाल दे सकते हैं।
इस संबंध में कुछ और पूछना हो तो पूछ लें। फिर दूसरे प्रश्न दूसरे दिन लेंगे।
अब यह बहुत मजेदार है। असल में आत्मा के जानने के बाद कोई आत्म-कथा नहीं होती। और सब आत्म-कथाएं अहंकार-कथाएं हैं। आत्म-कथाएं नहीं हैं, ईगो-ग्राफीज हैं। मेरी बात समझी न? पहला तो यह कि हम कहते हैं आत्म-कथा उसे, आत्म-कथा नहीं है। क्योंकि जब तक आत्मा का पता नहीं है तब तक जो भी हम लिखते हैं वह ईगो-ग्राफी है, वह अहं-कथा है।
इसलिए बड़े मजे की बात है कि जीसस ने आत्म-कथा नहीं लिखी, कृष्ण ने नहीं लिखी, बुद्ध ने नहीं लिखी, महावीर ने नहीं लिखी। न लिखी, न कही। आत्म-कथ्य जो है वह इस जगत में किसी भी उस आदमी ने नहीं लिखा जिसने आत्मा जानी है। क्योंकि आत्मा को जानने के बाद वह ऐसे निराकार में खो जाता है कि जिन्हें हम तथ्य कहते हैं वे सब उखड़ कर बह जाते हैं। जिनको हम खूंटियां कहते हैं--यह जन्म हुआ, यह यह हुआ, यह यह हुआ--वे सब उखड़ कर बह जाती हैं। इतना बड़ा अंधड़ है आत्मा का आना कि उस आंधी के बाद जब वह देखता है तो पाता है कि सब साफ ही हो गया; वहां कुछ बचा ही नहीं। कोरा कागज हो जाता है। आत्म-कथा लिखने का जो रस है वह आत्मा जानने के पहले है--जरूर है! इसलिए राजनीतिज्ञ आत्म-कथा लिखेंगे। साधु आत्म-कथा लिखेंगे। लेखक, कवि, साहित्यकार आत्म-कथा लिखेंगे। ये आत्म-कथाएं बहुत गहरे में ‘मैं’ की ही सजावटें हैं।
तेरा मतलब भी मैं समझा कि उस अनुभव की बात लिखूं जो मुझे हुआ।
तो आत्म-कथ्य तो बचता नहीं। उसका कोई मूल्य ही नहीं रह जाता। आत्मा को जानने के बाद आत्म-कथा करीब-करीब ऐसी हो जाती है जैसे कोई अपने सपने लिखे। करीब-करीब ऐसी जैसे कोई अपने सपनों का ब्योरा लिखे रोज सुबह कि आज मैंने यह सपना देखा, कल मैंने यह सपना देखा, परसों मैंने यह देखा। और एक आदमी अगर अपने सपनों की कथा लिखे तो जितनी उसकी कीमत हो सकती है उससे ज्यादा कीमत इसकी भी नहीं है जिसको हम यथार्थ कहते हैं।
और जाग गया आदमी लिख सकता है--कठिन है मामला। क्योंकि जागते से ही पता चलता है कि सपना था, उसको लिखने योग्य भी नहीं कुछ बचता। अनुभव की बात रह जाती है कि जो जाना है, वह भी नहीं लिखा जा सकता। वह नहीं लिखा जा सकता इसलिए कि लिखते ही बहुत फीका और बेमानी हो जाता है। उसको ही कहने की कोशिश चलती है निरंतर, बहुत-बहुत मार्गों से, बहुत-बहुत विधियों से। जिंदगी भर उसी को कहता रहूंगा, वह जो हुआ है। उसके अलावा अब कुछ कहने को है नहीं। लेकिन उसको भी लिखा नहीं जा सकता। क्योंकि जैसे ही लिखते हैं उसको, वैसे ही पता चलता है कि यह तो कोई बात न हुई। क्या लिखेंगे? लिख सकते हैं कि आत्मा का अनुभव हुआ, कि बड़ा आनंद मिला, कि बड़ी शांति मिली। सब बेमानी मालूम होता है। शब्द मालूम होते हैं।
बुद्ध या महावीर या क्राइस्ट पूरी जिंदगी, जो उन्होंने जाना है, उसको ही बहुत रूपों में कहे चले जा रहे हैं। फिर भी थकते नहीं हैं; क्योंकि रोज लगता है कि बाकी रह गया। फिर उसको और तरह से कहते हैं, फिर और तरह से कहते हैं। वह चुकता नहीं। बुद्ध-महावीर चुक जाते हैं, वह नहीं चुकता। वह कथा कहने को बाकी ही रह जाती है।
तो दोहरी कठिनाइयां हैं। जो कहा जा सकता है वह सपने जैसा हो जाता है। जो नहीं कहा जा सकता है वह कहने जैसा लगता है। और उसको ही...।
फिर यह भी खयाल में निरंतर होता है कि उसको सीधा कहने से कुछ भी तो प्रयोजन नहीं है। तुमसे मैं कह दूं मुझे यह हुआ, उससे कुछ प्रयोजन नहीं है। प्रयोजन तो इससे है कि तुम्हें उस रास्ते पर ले चलूं जहां तुम्हें हो जाए, तो तुम शायद किसी दिन समझ सको कि क्या हुआ होगा। उसके पहले समझ भी नहीं सकोगे। सीधा यह वक्तव्य कि मुझे क्या हुआ, क्या मतलब रखता है? तुम भरोसा करोगे, यह भी मैं नहीं मानता। तुम भरोसा भी नहीं कर सकोगे!
तो तुम्हें गैर-भरोसे में डालने से क्या प्रयोजन है? नुकसान ही होगा। यही उचित है कि तुम्हें उस रास्ते पर, उस किनारे पर धक्का दिया जाए जहां कि तुम्हें किसी दिन हो जाए। उस दिन तुम भरोसा कर सकोगे। उस दिन तुम जान सकोगे कि ऐसा होता है। नहीं तो भरोसे का भी उपाय नहीं।
और जैसे बुद्ध की मृत्यु का वक्त है और लोग पूछ रहे हैं कि आप जब मर जाएंगे तो कहां जाएंगे? तो अब बुद्ध क्या कहें? वे कहते हैं, मैं कहीं था ही नहीं तो मर कर मैं कहां जाऊंगा! मैं कभी कहीं गया ही नहीं, मैं कभी कहीं था ही नहीं। तब भी पूछने वाले पूछ रहे हैं कि नहीं, फिर भी कुछ तो बताएं कि कहां जाएंगे! अब वे बिलकुल तथ्य कह रहे हैं। क्योंकि बुद्धत्व का मतलब ही नो-व्हेयर-नेस है। उस स्थिति में कोई न कहीं होता है और न होने का कोई सवाल होता है।
तुम भी अगर शांत पड़ कर किसी क्षण रह जाओ तो सिवाय श्वास चलने के और क्या बचेगा? सिर्फ श्वास ही रह जाएगी और बचेगा क्या? तो श्वास वैसे ही रह जाएगी जैसे बबूले में हवा रहती है, और क्या रह जाएगा? वह तो हम कभी खयाल नहीं करते और हमें खयाल में नहीं आता। क्योंकि हम कभी उतने क्षण में भी नहीं होते। कभी दो क्षण को भी मौन होकर बैठ जाओ, तो तुम क्या पाओगे कि तुममें है क्या सिवाय श्वास के? विचार नहीं हैं तो सिवाय श्वास के तुममें क्या बचेगा? और तुममें श्वास का बाहर-भीतर आना, एक बबूले में श्वास का या एक बैलून में हवा के बाहर-भीतर आने से ज्यादा और क्या है?
तो बुद्ध कहते हैं, मैं एक बबूला था, था कहां? इसलिए जाने का क्या सवाल है? एक बबूला फूट गया, हम पूछते हैं कहां चला गया? हम नहीं पूछते, क्योंकि हम पहले से ही जानते हैं कि बबूला था ही कहां! इसलिए हम नहीं पूछते कहां चला गया! बस ठीक है, वह था ही नहीं तो जाने की क्या बात है!
अब बुद्ध जैसा व्यक्ति अपने को जान रहा है कि बबूला है, तो क्या तो आत्म-कथा लिखे? क्या अनुभव की बात कहे? और जो भी कहेगा वह मिसअंडरस्टैंड होने वाला है।
जापान में एक फकीर हुआ, लिंची। तो लिंची ने एक दिन सुबह घोषणा की कि हटाओ ये बुद्ध की मूर्तियां वगैरह यहां से! यह आदमी कभी हुआ नहीं। अभी उसने बुद्ध की मूर्ति की पूजा की है, अभी उसने कहा कि हटाओ यहां से! यह आदमी कभी हुआ नहीं, यह सरासर झूठ है। तो किसी ने खड़े होकर कहा कि आप क्या कह रहे हैं! आपका मस्तिष्क तो दुरुस्त है? उस लिंची ने कहा: जब तक मैं सोचता था कि मैं हूं, तब तक मैं मान सकता था कि बुद्ध हैं। लेकिन जब मैं ही नहीं हूं, हवा का बबूला है, तो यह आदमी कभी हुआ नहीं। सांझ फिर पूजा कर रहा था वह बुद्ध की। तो लोगों ने कहा कि यह क्या कर रहे हो? तुम दोपहर तो कह रहे थे कि यह नहीं हुआ। उसने कहा कि लेकिन इसके न होने से मुझे भी न होने में सहायता मिली, तो धन्यवाद मैं दे रहा हूं। लेकिन एक बबूले का एक बबूले को धन्यवाद है, इसमें कुछ और ज्यादा बात नहीं है।
लेकिन ये वक्तव्य समझे नहीं जा सकते। लोगों ने समझा कि यह आदमी कुछ गड़बड़ हो गया है। यह कुछ बुद्ध के खिलाफ हो गया है।
आत्म-कथ्य बचता नहीं। बहुत गहरे में समझो तो आत्मा भी बचती नहीं। तो आमतौर से यहां तक तो हम समझ पाते हैं कि अहंकार नहीं बचता, क्योंकि हमसे हजारों साल से यह कहा जा रहा है। और कोई वजह नहीं है। हजारों साल से कहा जा रहा है कि अहंकार नहीं बचता तो हम समझ लेते हैं--वर्बली हमको समझ में आ जाता है कि ज्ञान की स्थिति में अहंकार नहीं बचता। लेकिन अगर ठीक से समझना चाहो तो आत्मा भी नहीं बचती। पर यह समझने में बहुत घबड़ाहट होती है।
इसलिए तो बुद्ध को हम नहीं समझ पाए। उसने कहा कि आत्मा भी नहीं बचती, अनात्म हो जाते हैं। यह बहुत कठिन पड़ गया। इस पृथ्वी पर बुद्ध को समझना अब तक सर्वाधिक कठिन पड़ा। क्योंकि महावीर अहंकार तक की बात कहते हैं, कि अहंकार नहीं बचता। वहां तक हम समझ सकते हैं। ऐसा नहीं कि महावीर को पता नहीं है कि आत्मा भी नहीं बचती है। लेकिन हमारी समझ को ही ध्यान में रखे हुए हैं कि ठीक है, अहंकार तो छोड़ो, फिर आत्मा तो अपने से छूट जाती है। कोई अड़चन नहीं है उसको कहने की। लेकिन बुद्ध ने पहली दफा वह स्टेटमेंट दे दिया जो बहुत दिन तक सीक्रेट था, जो कहा नहीं गया था।
उपनिषद भी जानते हैं और महावीर भी जानते हैं कि आत्मा नहीं बचती। क्योंकि आत्मा का खयाल भी अहंकार का ही सूक्ष्म रूप है। लेकिन बुद्ध ने एक सीक्रेट, जो सदा से सीक्रेट था, कह दिया। कह दिया कि आत्मा नहीं बचती। मुश्किल पड़ गई। वही लोग जो मानते थे कि अहंकार नहीं बचता, वही लड़ने खड़े हो गए कि यह क्या कह रहे हैं! अब बुद्ध की अड़चन समझते हैं? ये लोग मानते हैं कि अहंकार नहीं बचता, वे ही लड़ने खड़े हो गए कि आप यह क्या कह रहे हैं? आत्मा ही नहीं बचती तो सब बेकार है। जब हम ही नहीं बचते तो फिर क्या करना है!
बुद्ध ने ठीक कहा। फिर कैसी आत्म-कथा होगी? फिर कोई आत्म-कथा नहीं हो सकती। सब सपने जैसा है, बबूले का देखा हुआ सपना है, बबूले पर बने हुए रंग-बिरंगे किरण के जाल हैं। बबूले के साथ सब खो जाते हैं। ऐसा जब दिखाई पड़ता हो तो बड़ी कठिनाई होती है, बड़ी कठिनाई होती है। ऐसी जब बिलकुल ही स्पष्ट स्थिति हो तो बहुत कठिनाई हो जाती है।
ऑटो-बायोग्राफी न सही, बायोग्राफी तो लिखी जा सकती है।
बायोग्राफी कोई लिख लेता है, कोई लिख लेता है। हूं। बायोग्राफी कोई लिख लेता है। हजार हो सकती हैं, उसमें कोई कठिनाई नहीं है। हजार देखने के ढंग हो सकते हैं, उसमें कोई कठिनाई नहीं है। वह हो सकती है।
मेरा मतलब समझे? उसकी तकलीफ तुम्हारे लिए कह रहा हूं। यानी अब वह जानता है कि भूत तो झूठा था ही, वह कभी था ही नहीं, मंत्र ने सिर्फ अंधेरे में भरोसा दिलाया कि ठीक, ताकत में आ जाओ, कोई बात नहीं। अब वह जानता है कि भूत भी झूठा था, भगाया जिस मंत्र से वह भी झूठा था। अब वह किस मुंह से तुमसे कहे कि मैंने मंत्र से भूत को भगाया! अब वह घटना बेमानी हो गई। हालांकि तुम्हारे लिए भूत है, और अगर वह कह सके कि मंत्र से मैंने भगाया तो मंत्र तुम्हारे काम पड़ सकता है। समझे न?
इसलिए वह यह नहीं कहेगा कि मैंने मंत्र से भूत को भगाया। वह तुमसे यही कहेगा कि भूत मंत्र से भगाए जा सकते हैं। वह तुमसे यही कहेगा कि भूत मंत्र से भगाए जा सकते हैं। तुम मंत्र का उपयोग करो, भूत भाग जाता है। लेकिन यह तुमसे वह नहीं कहेगा, क्योंकि वह फॉल्स स्टेटमेंट है, वह यह कहे कि मैंने मंत्र से भूत को भगाया। क्योंकि अब वह जानता है कि मंत्र उतना ही झूठा था जितना भूत झूठा था।
इसलिए ऐसे व्यक्ति के वक्तव्य बहुत ही कम सेल्फ सेंटरिक होंगे। वह मुश्किल से ही कभी अपने बाबत बोलेगा। वह सदा तुम्हारे लिए, और तुम्हारे बाबत, और तुम्हारी परिस्थिति के बाबत बोलता रहेगा। उसकी तकलीफ है। या फिर उसको फॉल्स स्टेटमेंट देना पड़ते हैं।
साधना के प्रोसेस सब भूत हैं?
सब भूत हैं! क्योंकि आखिर में जो तुम पाओगे वह तुम्हें सदा से मिला ही हुआ है। आखिर में तुम जो पाओगे वह तुम्हें सदा से मिला ही हुआ है। आखिर में जिससे तुम छुटकारा पाओगे उसमें तुम कभी बंधे ही नहीं हो। लेकिन यह भी कठिनाई है न! यही मैं कहता हूं कि सिद्ध की कठिनाइयां हैं। अगर वह तुमसे यह कह दे कि साधना के सब उपाय झूठ हैं तो तुम्हें दिक्कत में डाल देगा। क्योंकि तब तुम्हारे लिए भूत तो सच्चा रहेगा और साधना के उपाय झूठे हो जाएंगे। भूत झूठा हो जाए, तो साधना के उपाय झूठ हैं सार्थक है। मेरा मतलब समझ रहे न? तो भूत तो झूठा नहीं होगा।
यह बड़े मजे की बात है कि गलत गलत कहने से गलत नहीं होता। लेकिन सही, गलत कहने से हम फौरन मान लेते हैं कि गलत है। गलत गलत कहने से गलत नहीं होता। कोई कितना ही कहे कि क्रोध गलत है, इससे क्रोध गलत नहीं होता। लेकिन कोई कह दे कि ध्यान गलत है, फौरन गलत हो जाता है। एक सेकेंड नहीं लगता गलत होने में।
कोई आदमी तुमसे कहे कि फलां आदमी संत है, तुम नहीं मान लेते। लेकिन कोई आदमी कहे कि फलां आदमी चोर है, तुम बिलकुल मान लेते हो। कोई आदमी कहे संत है, तो तुम पचास तरकीब से पता लगाओगे कि है कि नहीं! क्योंकि तुम्हें भी बेचैनी रहेगी उसके संत होने से। तुम्हारे अहंकार को चोट लगेगी। तुम कोई न कोई तरकीब निकाल कर कर लोगे पक्का कि नहीं है, वह भी कोई संत नहीं है। लेकिन कोई कह दे कि फलां आदमी चोर है, तुम बिलकुल पता लगाने नहीं जाते, तुम बिलकुल मान ही लेते हो कि चोर है! तुम कभी पता नहीं लगाओगे कि यह आदमी चोर है! क्योंकि तुम्हें सुख मिलता है इस बात को मान लेने में कि हम अकेले ही चोर नहीं हैं, वह भी चोर है।
निंदा इतनी जल्दी स्वीकृत होती है, प्रशंसा कभी स्वीकृत नहीं होती। और प्रशंसा जब तुम स्वीकार भी कर लेते हो, मजबूरी में, कोई उपाय नहीं देख कर, तब भी वह टेंटेटिव होती है। तब भी वह सिर्फ मजबूरी होती है कि कभी मौका मिल जाएगा तो सुधार कर लेंगे। निंदा एब्सोल्यूट हो जाती है, फिर मौका भी तुम्हें मिल जाए सुधार करने का तो तुम नहीं करोगे।
ठीक ऐसा ही जीवन में चलता है कि गलत अगर कोई कह दे गलत है, तो हम सुन लेते हैं, उससे वह गलत नहीं होता; लेकिन ठीक को अगर कोई कह दे गलत है, हम फौरन मान लेते हैं, क्योंकि हम झंझट से बचे। क्योंकि ठीक में कुछ करना पड़ता है।
क्रोध हो जाता है, ध्यान करना पड़ता है। कोई कह दे क्रोध गलत है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, वह होता रहेगा। लेकिन ध्यान करना पड़ता है। कोई कह दे गलत है, छूट जाएगा।
ध्यान तो एक अवस्था बताई आपने, क्रिया तो नहीं?
यही तो दिक्कत है। यही मैं कह रहा हूं कि सिद्ध की दिक्कत यही है। सिद्ध की दिक्कत यही है कि अगर उसकी बात तुमने...वह अगर पूरी बात तुमसे कह दे, जैसा उसको है, तो तुम भटक जाओगे सदा के लिए। क्योंकि वह तुम्हारा नहीं है मामला। जैसे कि मैंने कह दिया कि ध्यान अवस्था है। बिलकुल सच बात है यह, ध्यान अवस्था है। लेकिन तुम्हारे लिए क्रिया ही होगी, तुम्हारे लिए अवस्था नहीं हो सकती। क्योंकि ध्यान अवस्था है, इससे तुम अब क्या करोगे? अब कुछ करने को नहीं बचा। बात खत्म हो गई। अगर क्रिया है तो तुम कुछ करोगे; अवस्था है तो बात खत्म हो गई। तुम निश्ंिचत हुए कि ठीक है।
लेकिन क्रोध जारी रहेगा। इसके मानने से कि ध्यान अवस्था है, क्रोध खत्म नहीं होगा। काम जारी रहेगा, लोभ जारी रहेगा। यह जो तकलीफ है, तकलीफ यह है कि अगर तुम्हें देख कर कहूं तो मुझे कुछ न कुछ झूठ बोलना ही पड़ता है। और अगर अपने को देख कर कहूं तो जो मैं बोलता हूं वह बेकार है। बेकार ही नहीं, खतरनाक भी है। क्योंकि सुनने वाले तुम हो; तुम्हें गहरे में कुछ न कुछ उससे बाधा पड़ने वाली है। इसलिए अगर मैं ठीक वही कहूं जो मुझे लगता है तो मैं तुम्हारे किसी फायदे में नहीं आ सकता, तुम्हें नुकसान पहुंचा सकता हूं।
जैसा कृष्णमूर्ति का, मैं मानता हूं कि लोगों को नुकसान पहुंचता है। और जितना ज्यादा मैं देख पा रहा हूं उतना मुझे लगता है कि नुकसान पहुंचता है। क्योंकि वे वही कह रहे हैं जो भीतर है। तुमसे कोई प्रयोजन नहीं है।
सुनाने की जरूरत क्यों पड़ती है?
जरूरत इसलिए पड़ती है, जरूरत इसलिए पड़ती है कि तुम्हें मैं देख रहा हूं कि तुम गड्ढे में जा रहे हो। तुम्हें मैं देख रहा हूं कि तुम गिरोगे गड्ढे में, हाथ-पैर तोड़ लोगे। मैं खड़ा हूं, मैं मौन से कह सकता हूं, लेकिन मौन से सुनने का तुम्हारे पास कान नहीं है। तो मैं चिल्ला कर कहूं कि गड्ढे में गिर जाओगे!
उसमें अपनी शक्ति लूज हुई, इसमें कोई हर्जा नहीं है?
न, न, न, कुछ लूज तो होती ही नहीं है। जिसको शक्ति का पता चल गया उसका कुछ कभी नहीं खोता। जिसको पता नहीं चला उसी का सब खोता रहता है। जिसको पता चल गया उसका कभी कुछ नहीं खोता।
किसी भी रूप में निःशब्द को कहने के लिए शब्द का प्रयोग किया जाता है...।
तो वही तो मैं कह रहा हूं, कि जो कठिनाई है वह यह है कि अगर मैं आत्म-कथा की तरह कुछ लिखूं, तो वह या तो झूठ होगी या सच होगी। दो ही उपाय हैं। सच होगी तो तुम्हें नुकसान पहुंचाएगी, झूठ होगी तो मैं वैसा वक्तव्य नहीं देना चाहूंगा। मेरी बात समझ रही है न तू? उस तल पर पकड़ ही नहीं पाओगे। या तो बिलकुल सत्य होगी तो फिर तुम्हारे लिए नुकसान ही पहुंचाने वाली है, क्योंकि तुम जो कर रहे हो, वह सब उससे निकलेगा कि बेकार है। सब बेकार है। और तुम बड़ी जल्दी राजी हो जाओगे बेकार के लिए।
एक व्यक्ति आए। उन्होंने कहा कि वह कृष्णमूर्ति ने तो कहा कि मेडिटेशन बेकार है, तो हमने छोड़ दिया। बहुत अच्छा किया छोड़ कर! अब छोड़ कर तुम्हें क्या मिला? छोड़ कर कुछ नहीं मिला। तो पकड़ी तुमने किसलिए थी? पकड़ी इसलिए थी कि यह क्रोध चला जाए, अज्ञान चला जाए। छोड़ने से चला गया? वह नहीं गया। तो फिर तुमने कैसे छोड़ दिया? कृष्णमूर्ति ने कहा इसलिए छोड़ दिया। क्योंकि बेकार है मेडिटेशन। जब बेकार है, जब इतना ज्ञानी आदमी कहता हो तो हम काहे के लिए झंझट में पड़ें।
यह जो, यह जो बड़ी मुश्किल की बात है न! बड़ी मुश्किल की बात है। मैं भी जानता हूं बेकार है। किसी क्षण मैं किसी से कहता भी हूं कि बेकार है; लेकिन उसी से कहूंगा जो बहुत कर चुका और अब बेकार होने को समझ सकता है, जो अब उस जगह पहुंच गया जहां मेडिटेशन भी छूटनी चाहिए। लेकिन बाजार में कहने का कि मेडिटेशन बेकार है, खतरा है बहुत। अभी उसने कभी मेडिटेशन की नहीं। जो नासमझ सुन रहे हैं उन्होंने कभी की नहीं। उनसे तुम कह रहे हो बेकार है! वे कभी करेंगे ही नहीं अब। उनको तो बहुत राहत मिल गई कि बिना ही किए सब हो गया, मामला खत्म।
तो चालीस साल से कृष्णमूर्ति को लोग सुन रहे हैं और नासमझों की भांति बैठे हुए हैं। क्योंकि वे कहते हैं, बेकार है। जब बेकार ही है, जब कृष्णमूर्ति कह रहे हैं, तो अब ठीक है। कोई गलत तो नहीं कह रहे हैं। सारी जिंदगी से वे वही कह रहे हैं। वे गलत जरा भी नहीं कह रहे हैं। और फिर भी गलत कह रहे हैं। क्योंकि तुम्हारे ऊपर कोई दृष्टि नहीं है; अपनी कहे चले जा रहे हैं।
इसलिए मैं निरंतर इस कोशिश में रहता हूं कि अपने को बचाऊं, अपनी कहूं ही नहीं तुमसे। क्योंकि अगर मैं अपनी कहूंगा और ठीक-ठीक कहूंगा, तो तुम्हारे किसी काम का नहीं होगा। लेकिन अब कितना मजा है कि अगर मैं तुम्हारी कहूं, तुम्हारी फिकर से कहूं, तो तुम ही मुझसे कहने आओगे कि अरे आपने ऐसा कह दिया। इसमें यह विरोध आ गया। मैं बिलकुल अविरोध की बात कह सकता हूं, लेकिन तब तुम्हारे किसी काम की नहीं होगी। हां, इतने ही काम की होगी कि तुम जहां हो वहीं ठहर जाओगे।
तो सिद्ध की कठिनाई है कि वह जो जानता है वह कह नहीं सकता। और इसलिए जो पुरानी व्यवस्था थी एक लिहाज से उचित थी, गहरी थी। तुम्हारी स्थिति के अनुसार बातें कही जाती थीं। तुम कहां तक हो वहां तक बात कही जाती थी। सब बातें टेंटेटिव थीं, कोई बात अल्टीमेट नहीं थी। तुम जैसे-जैसे बढ़ते जाओगे वैसे-वैसे हम खिसकाते जाएंगे। तुम्हारी जितनी गति होगी उतना हम पीछे हटाते जाएंगे। हम कहेंगे, अब यह बेकार हो गया, अब इसको छोड़ दो। जिस दिन तुम उस स्थिति में पहुंच जाओगे जब हम कह सकेंगे कि परमात्मा बेकार है, आत्मा बेकार है, ध्यान बेकार है, उस दिन कह देंगे। लेकिन यह उसी वक्त कहा जा सकता है जब कि इसके बेकार होने से कुछ भी बेकार नहीं होता। जब इसके बेकार होने से कुछ भी बेकार नहीं होता, तब तुम हंसते हो, और जानते हुए हंसते हो।
अगर मैं कहूं कि ध्यान बेकार है और तुम ध्यान करते चले जाओ, तो मैं मानता हूं कि तुम पात्र थे, तुमसे कहा तो ठीक कहा। अगर मैं कहूं कि संन्यास बेकार है और तुम संन्यास ले लो, तो मैं जानता हूं कि तुम पात्र थे और तुमसे ठीक कहा।
अब ये जो, ये जो कठिनाइयां हैं, ये कठिनाइयां खयाल में आएंगी धीरे-धीरे तुम्हें!
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What is the significance of writing?
According to Osho, writing is largely futile for conveying deep truths: it addresses an unknown mass, forcing ideas to be diluted. The medium itself deadens content; black ink lacks the living presence, gestures, and immediacy of a spoken encounter. True transmission needs a person-to-person, alive exchange that demands total attention; mass literature lowers understanding and erodes attentiveness.
In simple terms: Writing to everyone makes the message thin and lifeless; real understanding happens face-to-face with full attention.
Why don't you write your own experiences—your autobiography?
According to Osho, an autobiography is an ego-graphy; once the soul is known the 'I' dissolves, facts lose meaning, and the page becomes blank. The realized cannot compress the living experience into words without falsifying it, nor would telling his story help; instead he speaks only to lead seekers to their own realization, which alone convinces.
In simple terms: He won’t write his life story because awakening erases the ‘me’ and words can’t hold it—better to help you awaken yourself.
Is it important for seekers that the process a siddha passes through before enlightenment be documented?
According to Osho, documenting a siddha's path can pragmatically help seekers, yet the enlightened one hesitates: he now knows both the 'ghost' (problems) and the 'mantra' (methods) were unreal. To avoid falsehood, he rarely narrates 'my journey,' but speaks in impersonal, provisional guidance - use methods as temporary devices; ultimately, sadhana and obstacles dissolve in the truth that was always yours.
In simple terms: Stories of an enlightened person’s path can guide you, but they’re like training wheels—use them for a while, then drop them when you see the fear and the fixes were never real.
What is the significance of silence in relation to speech?
According to Osho, silence is the inexhaustible power and true language of truth, but most cannot yet hear it; therefore speech is a compassionate device. The enlightened use words as provisional, tailored pointers to the wordless, never losing power by speaking. Ultimate statements are withheld or adapted to the listener’s stage, so that words become bridges to silence rather than dogmas that mislead or paralyze.
In simple terms: Silence is the real message; words are just helpful signs until you can hear that silence for yourself.
