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Questions in this Discourse
पहली तो बात, गति और स्थिरता विरोधी नहीं हैं। गति और स्थिरता एक ही चीज की तारतम्यताएं हैं। जिसको हम स्थिरता कहते हैं वह ऐसी गति है जो हमारी पकड़ में नहीं आती। जिसको हम गति कहते हैं वह भी ऐसी स्थिरता है जो हमारे खयाल में नहीं आती। तो पहली तो बात गति और स्थिरता दो विरोधी चीजें नहीं हैं। बहुत तीव्र गति हो तो भी स्थिर मालूम होगी।
यह ऊपर पंखा है, यह तेज गति से चलता हो तो इसकी तीन पंखुड़ियां दिखाई नहीं पड़ती हैं। बहुत तेज चले तो संभावना ही नहीं है अनुमान करने की कि कितनी पंखुड़ियां हैं! क्योंकि बीच की जो खाली जगह है तीन पंखुड़ियों के, इसके पहले कि वह हमें दिखाई पड़े, पंखुड़ी उस जगह को भर देती है। यह पंखा इतनी तेज गति से भी चलाया जा सकता है कि हम इसके आर-पार किसी चीज को भी न निकाल सकें। यह इतना भी तेज चल सकता है कि हम इसको हाथ से छुएं और इसकी गति न मालूम पड़े। जब हम किसी चीज को हाथ से छूते हैं, अगर बीच का जो खाली हिस्सा है वह हमारे हाथ के स्पर्श के पकड़ने से पहले दूसरी पंखुड़ी फिर नीचे आ जाए तो हमें पता नहीं चल सकेगा। इसलिए विज्ञान कहता है कि हर चीज जो हमें थिर मालूम पड़ रही है वह सब गतिमान है। पर गति बहुत तीव्र है। हमारी पकड़ के बाहर है। तो गति और थिर होना दो चीजें नहीं हैं। और एक ही चीज की डिग्रीज हैं।
उस जगत में जहां शरीर नहीं है दोनों नहीं होंगी। क्योंकि जहां शरीर नहीं है वहां स्पेस भी नहीं है, टाइम भी नहीं है। जैसा हम जानते हैं, ऐसा कोई स्थान भी नहीं है, कोई समय भी नहीं है। समय और स्थान के बाहर किसी भी चीज को सोचना हमें अति कठिन है। क्योंकि हम ऐसी कोई चीज नहीं जानते जो समय और स्थान के बाहर हो।
तो वहां क्या होगा अगर दोनों न हों?
तो हमारे पास कोई शब्द नहीं है जो कहे कि वहां क्या होगा। जब पहली दफा धर्म के अनुभव में उस स्थिति की खबरें आनी शुरू हुईं तब भी यह कठिनाई खड़ी हुई। कहें क्या? ऐसे ठीक समानांतर उदाहरण विज्ञान के पास भी हैं जहां कठिनाई खड़ी हो गई कि कहें क्या? जब भी हमारी धारणाओं से भिन्न कोई स्थिति का अनुभव होता है तो बड़ी कठिनाई खड़ी होती है।
जैसे कि पिछले चालीस साल पहले जब पहली दफा इलेक्ट्रान का अनुभव विज्ञान को हुआ तो सवाल उठा कि इलेक्ट्रान कण है या तरंग? और बड़ी कठिनाई खड़ी हो गई। क्योंकि न तो उसे कण कह सकते, कण तो ठहरा हुआ होता है; तरंग गतिमान होती है। वह दोनों एक साथ है। तब सिर घूम जाता है, क्योंकि हमारी समझ में इन दोनों में से एक ही हो सकता है। और इलेक्ट्रान दोनों एक साथ है--कण भी और तरंग भी। कभी हमारी पकड़ में आता है कि वह कण है और कभी हमारी पकड़ में आता है कि वह तरंग है। और तब शब्द ही नहीं था दुनिया की किसी भाषा में कण-तरंग इकट्ठा कि जिसे हम प्रकट कर सकें। और जब वैज्ञानिकों ने यह कहा तो वैज्ञानिक खुद कहने तो लगे कि कण-तरंग दोनों है, लेकिन उनके लिए भी कंसीवेबल नहीं रहा है। रहस्य हो गई बात! और जब आइंस्टीन से लोगों ने कहा कि आप दोनों बातें एक साथ कहते हैं जो कि तर्क में नहीं आती हैं; ये तो बड़ी रहस्य की बातें हो गई हैं। तो आइंस्टीन ने कहा कि हम तर्क को मानें कि तथ्य को मानें। तथ्य यही है कि वह दोनों है एक साथ और तर्क यही कहता है कि दो में से एक ही हो सकता है।
अब एक आदमी खड़ा हुआ है या चल रहा है। तर्क कहेगा, दो में से एक ही हो सकता है। आप कहें कि वह खड़ा भी है और चल भी रहा है--एक साथ। तर्क नहीं मानेगा, तर्क के पास कोई धारणा नहीं है। लेकिन इलेक्ट्रान के अनुभव ने वैज्ञानिकों को कहा कि अब तर्क की फिकर छोड़ देनी पड़ेगी, क्योंकि या तो तथ्य को झुठलाओ! सारे प्रयोग कहते हैं कि वह दोनों है। यह मैंने उदाहरण के लिए आपको कहा।
सारे धार्मिक लोगों के अनुभव कहते हैं कि वह स्थिति दोनों नहीं है--न ठहरी हुई है, न गतिमान है। लेकिन जो भी यह कहेगा कि दोनों नहीं है अंतराल का क्षण, एक शरीर के छूटने और दूसरे शरीर के मिलने के बीच के क्षण में दोनों नहीं हैं, वह समझ के बाहर हो जाएगा। इसलिए कुछ धर्मों ने तय किया कि वे कहेंगे कि वह थिर है; कुछ धर्मों ने तय किया कि वे कहेंगे कि वह गतिमान है। लेकिन यह सिर्फ समझाने की कठिनाई का परिणाम है। अन्यथा कोई इस बात के लिए राजी नहीं है कि वहां स्थिति को, स्थिति कहें कि गति कहें। दोनों नहीं कहे जा सकते। क्योंकि जिस परिवेश में स्थिति और गति घटित होती हैं, वह परिवेश ही वहां नहीं है। स्थिति और गति दोनों के लिए शरीर अनिवार्य है। शरीर के बिना गति नहीं हो सकती। और शरीर के बिना स्थिति भी नहीं हो सकती। क्योंकि जिसके माध्यम से स्थिति हो सकती है, उसी के माध्यम से गति हो सकती है।
अब जैसे यह हाथ है मेरा, मैं इसे हिला रहा हूं या इसे ठहराए हुए हूं। कोई मुझसे पूछ सकता है कि इस हाथ के भीतर जो मेरी आत्मा है, जब हाथ नहीं रहेगा तो वह आत्मा ठहरी हुई रहेगी कि गति में रहेगी? दोनों बातें व्यर्थ हैं। क्योंकि इस हाथ के बिना न वह गति कर सकती है और न ठहरी हुई हो सकती है। ठहरना और गति दोनों ही शरीर के गुण हैं। शरीर के बाहर ठहरने और गति का कोई भी अर्थ नहीं है।
ठीक यही बात समस्त द्वंद्वों पर लागू होगी। बोलने या मौन होने पर। शरीर के बिना न तो बोला जा सकता और न मौन हुआ जा सकता। आमतौर से हमारी समझ में आ जाएगी यह बात कि शरीर के बिना बोला नहीं जा सकता; लेकिन मौन नहीं हुआ जा सकता, यह समझ में आनी कठिन पड़ेगी। क्योंकि हम सोचते हैं शरीर के लिए मौन...। लेकिन असली बात यह है कि जिस माध्यम से बोला जा सकता है उसी माध्यम से मौन हुआ जा सकता है। क्योंकि मौन होना भी बोलने का एक ढंग है। मौन होना बोलने की ही एक अवस्था है--न बोलने की है, लेकिन है बोलने की ही।
जैसे उदाहरण के लिए, एक आदमी है, अंधा है। तो हमें खयाल होता है कि शायद उसको अंधेरा दिखाई देता होगा। वह हमारी भ्रांति है। अंधेरा देखने के लिए भी आंख जरूरी है। आंख के बिना अंधेरा भी दिखाई नहीं पड़ता। पर हम आंख बंद करके सोचते हों तो हम गलती में पड़ते हैं। क्योंकि आंख बंद करके भी आंख है, आप अंधे नहीं हैं। और अगर एक दफा आपके पास आंख रही हो और फिर अंधी हो जाए, तो भी आपको अंधेरे का खयाल रहेगा, जो कि झूठ है, जो कि जन्म से अंधे आदमी को नहीं है। क्योंकि अंधेरा जो है, वह आंख का ही अनुभव है। जिससे प्रकाश का अनुभव होता है, उसी से अंधकार का भी अनुभव होता है। तो जो जन्मांध है, उसे अंधेरे का भी कोई पता नहीं है। अंधेरा भी जानेगा कैसे?
कान से आप सुनते हैं। भाषा में ठीक लगता है कि जिसके पास कान नहीं हैं, हम कहेंगे कि तुम मत कहो, वह नहीं सुन रहा है। लेकिन नहीं सुनने की घटना भी नहीं घटती है बहरे के लिए। नहीं सुनने की भी जो प्रतीति है, वह कान वाले की प्रतीति है। कभी ऐसा होता है कि आप नहीं सुनते हैं। पर वह कान उसके लिए भी जरूरी है। कान के बिना ‘नहीं सुनने’ का भी कोई पता नहीं चल सकता है। वह अंधेरे की तरह है।
तो जिस इंद्रिय से गति होती है, उसी इंद्रिय से ठहराव होता है। और दो में से एक भी चीज नहीं है तो दूसरी भी नहीं होगी। तो वैसी अवस्था में आत्मा बोलती है या चुप रहती है, दोनों ही बातें संभव नहीं हैं। उपकरण ही नहीं है बोलने का या चुप रहने का। ये सब उपकरण-निर्भर घटनाएं हैं। इन दोनों के लिए उपकरण चाहिए। जगत के समस्त अनुभव के लिए उपकरण चाहिए, साधन चाहिए, इंद्रिय चाहिए।
जहां भी शरीर नहीं है, वहां शरीर से संबंधित समस्त अनुभव तिरोहित हो जाते हैं। फिर वहां कुछ बचेगा? अगर आपके जीवन में कोई भी, शरीर के भीतर रहते हुए अशरीरी अनुभव हुआ हो, तो बचेगा। अन्यथा कुछ भी नहीं बचेगा। अगर आपके जीते-जी, शरीर के रहते हुए, कोई भी अनुभव हुआ हो जिसके लिए शरीर माध्यम नहीं था, वह बचेगा।
ध्यान के कोई भी अनुभव हों गहरे, तो वे बचेंगे। साधारण अनुभव नहीं बचेंगे ध्यान के, ध्यान में आपको प्रकाश दिखाई पड़ा, वह नहीं बचेगा। लेकिन ध्यान में अगर कोई ऐसा अनुभव हुआ हो जिसमें शरीर ने कोई माध्यम का काम ही नहीं किया था, आप कह सकते थे कि शरीर था या नहीं यह भी मुझे कोई संबंध नहीं रह गया था, तो बच जाएगा। पर ऐसे अनुभव के लिए कोई भाषा नहीं है। शरीर रहते हुए भी हो, तो भी भाषा नहीं है। ये सारी कठिनाइयां हैं।
फिर भी इसका यह मतलब नहीं है कि वैसी आत्मा मोक्ष में पहुंच गई, क्योंकि ये दोनों विवरण एक जैसे लगेंगे। फिर मोक्ष में और दो शरीरों के बीच में जो अंतराल है, इसमें क्या भेद रहा? भेद पोटेंशियलिटी के, बीज के रहेंगे। वास्तविकता के नहीं रहेंगे। दो शरीरों के बीच में जो अशरीरी व्यवधान है बीच का, उसमें आपके जितने संस्कार हैं समस्त जन्मों के, वे बीज-रूप में सब मौजूद रहेंगे। शरीर के मिलते ही वे फिर सक्रिय हो जाएंगे। जैसे एक आदमी के पैर हमने काट दिए, तो भी उसके दौड़ने के जो अनुभव हैं वे विदा नहीं हो जाएंगे। दौड़ नहीं सकता, रुक भी नहीं सकता, क्योंकि दौड़ नहीं सकता तो रुकेगा कैसे! लेकिन अगर पैर मिल जाएं तो दौड़ने की समस्त संस्कार-धारा पुनः सक्रिय हो जाएगी।
जैसे एक आदमी कार चलाता है। लेकिन कार छीन ली। तो अब कार नहीं चला सकता, एक्सीलरेटर नहीं दबा सकता; लेकिन ब्रेक भी नहीं लगा सकता, कार रोक भी नहीं सकता; वे दोनों ही कार के अनुभव थे। अब वह कार के बाहर है। लेकिन कार के चलाने का जो भी अनुभव है, वह सब बीज-रूप में मौजूद है। वर्षों बाद, एक्सीलरेटर पर पैर रखेगा, कार चला सकेगा।
मोक्ष में संस्कार-रहित हो जाता है। दो शरीरों के बीच में सिर्फ इंद्रिय-रहित होता है। मोक्ष में समस्त अनुभव, समस्त अनुभवजन्य संस्कार, सब कर्म, सब तिरोहित हो जाते हैं। उनकी निर्जरा हो जाती है। इस बीच और मोक्ष की अवस्था में एक समानता है--दोनों में शरीर नहीं होता। एक असमानता है--मोक्ष में शरीर नहीं होता, शरीर से संबंधित अनुभवों का जाल भी नहीं होता। यहां शरीर से संबंधित अनुभवों की सब सूक्ष्म तरंगें बीज-रूप से मौजूद होती हैं, जो कभी भी सक्रिय हो सकती हैं। और इस बीच जो-जो अनुभव होंगे, वह शरीर जहां नहीं था, वैसे अनुभव होंगे। जैसे मैंने कहा कि ध्यान के अनुभव होंगे।
लेकिन ध्यान के अनुभव तो बहुत कम लोगों के हैं। कभी करोड़ में एक आदमी को ध्यान के अनुभव हैं। शेष का क्या कोई अनुभव नहीं होगा?
अनुभव होंगे--स्वप्न के अनुभव। स्वप्न में शरीर की कोई इंद्रिय काम नहीं करती। इस बात की संभावना है कि अगर हम एक आदमी जो स्वप्न में हो, और उसे स्वप्न में ही रखे हुए उसके सारे शरीर को काट कर अलग कर दें, तो आवश्यक नहीं है कि उसके स्वप्न में जरा सा भी भंग पड़े। कठिनाई है कि उसकी नींद टूट जाएगी। काश, हम उसे नींद में रख सकें और उसके एक-एक अंग को अलग करते चले जाएं, तो उसके स्वप्न में कोई भंग नहीं होगा। क्योंकि शरीर का कोई हिस्सा उसके स्वप्न में कोई अनिवार्य कारण नहीं है। स्वप्न में शरीर बिलकुल सक्रिय नहीं है, शरीर का कोई उपयोग नहीं हो रहा है। स्वप्न के अनुभव आपके शेष रहेंगे। बल्कि आपके समस्त अनुभव स्वप्न का ही रूप लेकर शेष रहेंगे।
अगर कोई आपसे पूछे कि स्वप्न में आप थिर होते हैं कि गतिमान होते हैं? तो कठिनाई होगी। स्वप्न में थिर होते हैं कि गतिमान होते हैं? स्वप्न से जाग कर तो यह अनुभव होता है कि अपनी जगह पर पड़े हुए हैं, थिर, स्वप्न के भीतर। लेकिन स्वप्न के बाहर आकर पता लगता है कि स्वप्न में तो बड़ी गति थी। स्वप्न में गति भी नहीं होती। अगर बहुत ठीक से समझें तो स्वप्न में आप भागीदार भी नहीं होते, बहुत गहरे में सिर्फ साक्षी होते हैं। इसलिए स्वप्न में अपने को मरता हुआ भी देख सकते हैं। स्वप्न में अपनी लाश को पड़े हुए भी देख सकते हैं। और स्वप्न में अगर आप अपने को चलता भी देखते हैं, तो भी जिसे आप चलता देखते हैं वह सिर्फ स्वप्न होता है, आप तो देखने वाले ही होते हैं। स्वप्न को अगर ठीक से समझें तो आप सिर्फ विटनेस होते हैं स्वप्न में।
इसीलिए धर्म ने एक सूत्र खोज निकाला कि जो व्यक्ति जगत को स्वप्न-भांति देखने लगे, वह परम अनुभूति को उपलब्ध हो जाएगा। इसलिए जगत को माया और स्वप्न कहने वाली चिंतनाएं पैदा हुईं। राज उनका यही है कि अगर जगत को हम सपने की भांति देखने लगें तो हम साक्षी हो जाएंगे। सपने में कभी भी कोई पार्टिसिपेंट नहीं होता, हमेशा विटनेस होता है। कभी भी, किसी भी स्थिति में आप सपने में पात्र नहीं होते। भला आपको पात्र दिखाई पड़ें आप; लेकिन आप तो वही हैं जिसको दिखाई पड़ता है, आप हमेशा ही देखने वाले होते हैं, दर्शक होते हैं।
तो जितने अनुभव होंगे, बीज होंगे, शरीर-रहित होंगे, स्वप्न जैसे होंगे। जिनके अनुभव दुख को निर्मित किए हैं वे नरक के स्वप्न देखेंगे, नाइटमेयर्स देखेंगे। जिनके अनुभव सुख को अर्जित किए हैं, वे स्वर्ग देखते रहेंगे, सुखद होंगे सपने उनके। लेकिन ये सब सपने जैसे अनुभव होंगे।
कभी-कभी इसमें और घटनाएं भी घटेंगी। उन घटनाओं के अनुभव में भेद पड़ेगा। कभी-कभी ऐसा होगा कि ये जो आत्माएं न गतिमान हैं, न चलित हैं, ये आत्माएं कभी-कभी किन्हीं शरीरों में प्रवेश कर जाएंगी। अब यह भाषा की ही भूल है कहना कि ये प्रवेश कर जाएंगी। उचित होगा ऐसा कहना कि कभी-कभी कोई शरीर इनको अपने में प्रवेश दे देगा।
इन आत्माओं का लोक कुछ हमसे भिन्न नहीं है। ठीक हमारे निकट और पड़ोस में है। ठीक हम एक ही जगत में अस्तित्ववान हैं। यहां इंच-इंच जगह भी आत्माओं से भरी हुई है। यहां जो हमें खाली जगह दिखाई पड़ती है वह भी भरी हुई है।
अगर कोई भी शरीर किसी गहरी रिसेप्टिव हालत में हो, और दो तरह से शरीर--दूसरे लोगों के शरीर--ग्राहक अवस्था में होते हैं। या तो बहुत भयभीत अवस्था में। जितना भयभीत व्यक्ति हो, उसकी खुद की आत्मा उसके शरीर में भीतर सिकुड़ जाती है। सिकुड़ जाती है मतलब शरीर के बहुत हिस्सों को छोड़ देती है खाली। उन खाली जगहों में पास-पड़ोस की कोई भी आत्मा ऐसे बह सकती है जैसे गड्ढे में पानी बह जाता है। तब इसको जो अनुभव होते हैं वे ठीक वैसे ही हो जाते हैं जैसे शरीरधारी आत्मा को होते हैं। या बहुत गहरी प्रार्थना के क्षण में कोई आत्मा प्रवेश कर सकती है। बहुत गहरी प्रार्थना के क्षण में भी आत्मा सिकुड़ जाती है।
लेकिन भय की अवस्था में केवल वे ही आत्माएं सरक कर भीतर प्रवेश कर सकती हैं जो दुख-स्वप्न देख रही हैं। जिन्हें हम बुरी आत्माएं कहें, वे प्रवेश कर सकती हैं। क्योंकि भयभीत व्यक्ति बहुत ही कुरूप और गंदी स्थिति में है। उसमें कोई श्रेष्ठ आत्मा प्रवेश नहीं कर सकती। और भयभीत व्यक्ति गड्ढे की भांति है, जिसमें नीचे उतरने वाली आत्माएं ही प्रवेश कर सकती हैं।
प्रार्थना से भरा हुआ व्यक्ति शिखर की भांति है, जिसमें सिर्फ ऊपर चढ़ने वाली आत्माएं प्रवेश कर सकती हैं। और प्रार्थना से भरा हुआ व्यक्ति इतनी आंतरिक सुगंध से और सौंदर्य से भर जाता है कि उनका रस तो केवल बहुत श्रेष्ठ आत्माओं को हो सकता है। वे भी निकट में हैं। तो जिसको इनवोकेशन कहते हैं, आह्वान कहते हैं, प्रार्थना कहते हैं, उसमें भी प्रवेश होता है, लेकिन श्रेष्ठतम आत्माओं का। उस समय अनुभव ठीक वैसे ही हो जाते हैं जैसे कि शरीर में हुए, इन दोनों अवस्थाओं में।
तो जिनको देवताओं का आह्वान कहा जाता रहा है, उसका पूरा विज्ञान है। वे देवता कहीं आकाश से नहीं आते हैं। जिन्हें भूत-प्रेत कहा जाता रहा, वे भी किन्हीं नरकों से, किन्हीं प्रेत-लोकों से नहीं आते हैं। वे सब मौजूद हैं, यहीं! असल में एक ही स्थान पर मल्टी-डाइमेन्शनल एक्झिस्टेंस है। एक ही बिंदु पर बहुआयामी अस्तित्व है। अब जैसे यह कमरा है, यहां हम बैठे हैं। हवा भी है यहां। यहां कोई धूप जला दे तो सुगंध भी भर जाएगी यहां। यहां कोई गीत गाने लगे तो ध्वनि-तरंगें भी भर जाएंगी यहां। धूप का कोई भी कण ध्वनि-तरंग के किसी भी कण से नहीं टकराएगा। इस कमरे में संगीत भी भर सकता है, प्रकाश भी भरा है। लेकिन प्रकाश की कोई तरंग संगीत की किसी तरंग से टकराएगी नहीं। और न संगीत के भरने से प्रकाश की तरंगों को बाहर निकलना पड़ेगा कि जगह खाली करनी पड़े।
असल में इसी स्थान को ध्वनि की तरंगें एक आयाम में भरती हैं, और प्रकाश की तरंगें दूसरे आयाम में भरती हैं, वायु की तरंगें तीसरे आयाम में भरती हैं। और इस तरह के हजार आयाम इसी कमरे को हजार तरह से भरते हैं। एक-दूसरे में कोई बाधा नहीं पड़ती। एक-दूसरे को एक-दूसरे के लिए कोई स्थान खाली नहीं करना पड़ता। इसलिए स्पेस जो है वह मल्टी-डाइमेन्शनल है।
यहां हमने एक टेबल रखी है। अब दूसरी टेबल नहीं रख सकते इस जगह। क्योंकि एक टेबल और दूसरी टेबल एक ही आयाम में बैठती हैं। तो इस टेबल को रख दिया तो इस स्थान पर--इसी टेबल के स्थान पर--दूसरी टेबल नहीं रख सकते। वह इसी आयाम की है। लेकिन दूसरे आयाम का अस्तित्व इस टेबल से कोई बाधा नहीं पाएगा।
ये सारी आत्माएं ठीक हमारे निकट हैं। और कभी भी इनका प्रवेश हो सकता है। जब इनके प्रवेश होंगे तब जो इनके अनुभव होंगे वे ठीक वैसे ही हो जाएंगे जैसे शरीर में प्रवेश पर होते हैं।
दूसरी बात, जब ये व्यक्तियों में प्रवेश कर जाएं तब ये वाणी का उपयोग कर सकते हैं। तब संवाद संभव है। इसलिए आज तक पृथ्वी पर कोई प्रेत या कोई देव प्रत्यक्ष और सीधा कुछ भी संवादित नहीं कर पाया है। लेकिन ऐसा नहीं है कि संवाद नहीं हुए हैं। संवाद हुए हैं। और देवलोक या प्रेतलोक के संबंध में, स्वर्ग और नरक के संबंध में जो भी हमारे पास सूचनाएं हैं वे काल्पनिक लोगों के द्वारा नहीं हैं, वे इन लोकों में रहने वाले लोगों के ही द्वारा हैं। लेकिन किसी के माध्यम से हैं।
इसलिए बहुत पुराने दिनों से जो व्यवस्था थी वह यह थी--जैसे कि वेद हैं--तो वेद का कोई ऋषि नहीं कहेगा कि हम इनके लेखक हैं। वे हैं भी नहीं। इसमें कोई विनम्रता कारण नहीं है कि वे विनम्रतावश कहते हैं कि हम लेखक नहीं हैं। इसमें तथ्य है। ये जो-जो कही गई हैं बातें, ये उन्होंने कही नहीं हैं, किसी और आत्मा ने उनके द्वारा कहलवाई हैं। और यह अनुभव इतना साफ होता है, जब कोई और आत्मा तुम्हारे भीतर प्रवेश करके बोलेगी तब यह अनुभव इतना साफ है, क्योंकि तुम पूरी तरह जानते हो कि तुम अलग बैठे हो, और तुम बोल ही नहीं रहे हो, और कोई और ही बोल रहा है। तुम भी सुनने वाले हो, बोलने वाले नहीं हो। बाहर से तो पता चलाना मुश्किल होगा, लेकिन बाहर से भी जो लोग ठीक से कोशिश करें तो बाहर से भी पता चलेगा। क्योंकि आवाज का ढंग बदल जाएगा, टोन बदल जाएगी, शैली बदल जाएगी, भाषा भी बदल जा सकती है। और उस व्यक्ति को तो भीतर बहुत ही साफ मालूम पड़ेगा।
अगर प्रेत आत्मा प्रवेश की है तो शायद वह इतना भयभीत हो जाए कि मूर्च्छित हो जाए। लेकिन अगर देव आत्मा प्रवेश की है तो वह इतना जागरूक होगा जितना कि कभी भी नहीं था; और तब स्थिति बहुत साफ उसे दिखाई पड़ेगी। तो जिनमें प्रेतात्माएं प्रवेश करेंगी वे तो प्रेतात्माओं के जाने के बाद ही कह सकेंगे कि कोई हममें प्रवेश कर गया। वे इतने भयभीत हो जाएंगे कि मूर्च्छित हो जाएंगे। लेकिन जिनमें दिव्य आत्मा प्रवेश करेगी, वे उसी क्षण भी कह सकेंगे कि यह कोई और बोल रहा है, यह मैं नहीं बोल रहा। ये दो आवाजें एक ही उपकरण उपयोग करेगा, जैसे एक ही माइक्रोफोन का दो आदमी एक साथ उपयोग कर रहे हों। एक चुप खड़ा रह जाए और दूसरा बोलना शुरू कर दे।
तो शरीर की इंद्रियों का ऐसा उपयोग हो तब संवाद हो पाता है। इसलिए देवताओं के, प्रेतों के संबंध में जो भी उपलब्ध है जगत में, वह संवादित है, वह कहा गया है। और तो जानने का कोई उपाय नहीं है, जानने का वही उपाय है। और इन सबके पूरे के पूरे विज्ञान निर्मित हो गए थे। और जब विज्ञान पूरा होता है तो बड़ी आसानी हो जाती है। तब हम चीजों को समझ-बूझ पूर्वक उपयोग कर सकते हैं। जब विज्ञान नहीं होता तो समझ-बूझ पूर्वक उपयोग नहीं करते, कभी घटनाएं घटती हैं। तो इनका ठीक विज्ञान तय हो गया था। जैसे एक व्यक्ति प्रवेश कर गया, कोई दिव्य आत्मा किसी में प्रवेश कर गई आकस्मिक रूप से, तो धीरे-धीरे इसका विज्ञान निर्मित कर लिया गया कि किन परिस्थितियों में वह दिव्य आत्मा प्रवेश करती है। वे परिस्थितियां अगर पैदा की जा सकें तो वह फिर प्रवेश कर सकेगी।
अब जैसे कि मुसलमान लोबान जलाएंगे। वह किन्हीं विशेष दिव्य आत्माओं के प्रवेश करने के लिए सुगंध के द्वारा वातावरण निर्मित करना है। या हिंदू धूप जलाएंगे, या घी के दीये जलाएंगे। ये आज सिर्फ औपचारिक हैं, लेकिन कभी उनके कारण थे। एक विशेष मंत्र बोलेंगे। विशेष मंत्र इनवोकेशन बन जाता है। वह किसी विशेष...इसलिए जरूरी नहीं है कि मंत्र में कोई अर्थ हो, अक्सर नहीं होगा। क्योंकि अर्थ वाले मंत्र विकृत हो जाते हैं। अर्थहीन मंत्र विकृत नहीं होते। अर्थ में आप कुछ और भी प्रवेश कर सकते हैं। समय के अनुसार उसका अर्थ बदल सकता है। लेकिन अर्थहीन मंत्र में आप कुछ भी प्रवेश नहीं कर सकते हैं, समय के अनुसार कोई अर्थ नहीं बदलता।
इसलिए जितने गहरे मंत्र हैं वे अर्थहीन हैं, मीनिंगलेस हैं। उसमें कोई अर्थ नहीं है जिसमें कि युग के अनुसार कोई फर्क पड़ेगा। सिर्फ ध्वनियां हैं। और ध्वनि-उच्चारण की एक विशेष व्यवस्था है, उसी ढंग से उसका उच्चारण होना चाहिए। उतनी ही चोट, उतनी ही तीव्रता, उतना उतार, उतना चढ़ाव, उतनी चोट होने पर वह आत्मा तत्काल प्रवेश हो सकेगी। या वह आत्मा खो गई होगी तो उस जैसी कोई आत्मा प्रवेश हो सकेगी।
सारी दुनिया के धर्मों के जो मंत्र हैं, जैसे कि जैनों का ‘नमोकार’ है, उसके पांच हिस्से हैं और प्रत्येक हिस्से पर जो इनवोकेशन है, जो आह्वान है, वह गहरा होता जाता है। प्रत्येक पद पर आह्वान गहरा होता जाता है। और गहरी आत्माओं के लिए होता चला जाता है। और साधारणतः जैसा लोग समझते हैं, जैसा आज चलता है, कि पूरे नमोकार को पढ़ेंगे--वह ठीक स्थिति नहीं है। जिसे पहले पद से संबंध जोड़ना है उसको पहले पद को ही दोहराना चाहिए। बाकी चार को बीच में लाने की जरूरत नहीं है। उस पर ही जोर देना चाहिए। क्योंकि उस पद से संबंधित आत्माएं बिलकुल अलग हैं।
जैसे, नमो अरिहंताणम्। उसमें अरिहंत के लिए नमस्कार। अब ‘अरिहंत’ विशेष रूप से जैनों का शब्द है। जिसने अपने समस्त शत्रुओं को नष्ट कर दिया, अरिहंत का अर्थ है। ‘अरि’ का अर्थ है शत्रु और ‘हंत’ जिसने मार डाला। तो वह ऐसी आत्मा के लिए पुकार है जो अपनी इंद्रियों को बिलकुल ही समाप्त करके विदा हुई है। यह उस आत्मा के लिए पुकार है जिसका सिर्फ एक ही जन्म हो सकता है। यह एक ही पद को दोहराना है एक विशेष ध्वनि और चोट के साथ।
यह बहुत स्पेसिफिक पुकार है, विशेष पुकार है। इस पुकार के द्वारा इतर जैन दिव्य आत्मा से संबंध नहीं होगा। यह एक पारिभाषिक शब्द है, जो सिर्फ जैन दिव्य आत्मा से संबंध जुड़ा पाएगा। इसमें क्राइस्ट से संबंध नहीं हो सकता।
इसमें आकांक्षा नहीं है। इसमें बुद्ध से संबंध नहीं हो सकता। यह पारिभाषिक शब्द है और यह पारिभाषिक आत्मा के लिए पुकार है। ठीक ऐसे, अलग-अलग पूरे पांच हिस्सों में पांच अलग तरह की आत्माओं के लिए पुकार है। अंतिम जो पुकार है, नमो लोए सव्व साहूणं, वह समस्त साधुओं को नमस्कार है। उसमें विशेष पुकार नहीं है। उसमें साधु आत्मा मात्र के लिए आह्वान है। उसमें जैन और इतर जैन का प्रश्न नहीं है। उसमें कोई भी साधु आत्मा से संबंध जोड़ने की आकांक्षा है। वह बड़ी जनरलाइज्ड पुकार है। कोई विशेष निमंत्रण नहीं है उसमें।
सारी दुनिया के धर्मों के पास ऐसे मंत्र हैं जिनसे संबंध जोड़ा जाता रहा। और तब वे शक्ति-मंत्र बन गए। और बड़ी उनकी बीज-महत्ता हो गई। वे नाम की तरह हैं। जैसे आपका नाम रख दिया राम। फिर राम की आवाज दी तो आप चौकन्ने हो गए। ऐसे ही सारे मंत्र हैं। प्रेतात्माओं के लिए भी वैसे ही मंत्र हैं। और दोनों का अपना शास्त्र है। व्यक्ति तो खोते चले जाएंगे, आत्माएं बदलती चली जाएंगी, लेकिन तालमेल खाती आत्माएं सदा उपलब्ध रहेंगी जिनसे संबंध जोड़ा जा सके। इस स्थिति में संवाद हो सकता है।
अब जैसे मोहम्मद को...इसलिए मोहम्मद ने कभी नहीं कहा, मोहम्मद ने सदा यही कहा कि मैं सिर्फ पैगंबर हूं, सिर्फ पैगाम दे रहा हूं--मैसेंजर। क्योंकि मोहम्मद को कभी ऐसा नहीं लगा कि जो वे दे रहे हैं वह उनका है। इतनी साफ आवाज ऊपर से आई, जिसे मुसलमान इलहाम कहते हैं, रिवील हुआ--कि कोई और भीतर प्रवेश कर गया और बोलना शुरू कर दिया। खुद मोहम्मद को भरोसा नहीं आया कि यह जो मैं बोल रहा हूं, कोई मेरी मानेगा। क्योंकि कभी मैं यह बोला नहीं, मेरा कोई परिचय नहीं है लोगों से ऐसा। लोग जानते नहीं हैं कि मैं इस तरह की बात बोल सकता हूं, इसलिए कोई मेरा मानने वाला नहीं है।
इसलिए मोहम्मद डरे हुए घर लौटे। और रास्ते में बचे हुए घर आए कि कहीं किसी से बोल न दें, अन्यथा अविश्वास के सिवाय कुछ भी नहीं होगा। क्योंकि पीछे कोई भी तो आधार नहीं है, पृष्ठभूमि नहीं है। तो जाकर पहले सिर्फ अपनी पत्नी को कहा। और उससे भी कहा कि तुझे भरोसा हो तो करना, नहीं भरोसा हो तो मत करना। और तुझे भरोसा आ जाए तो फिर मैं किसी और को कहूं, अन्यथा मैं न कहूं। क्योंकि जो हुआ है, जो आया है, वह ऊपर से आया है। वह कोई बोल गया है। वह मेरी नहीं है आवाज! सिर्फ शब्द मेरे हैं, बोल कोई और रहा है। पत्नी को भरोसा आया, तो फिर और निकट के किसी को कहा।
मूसा के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ। वाणी उतरी।
यह जो वाणियों का उतरना है, वह किसी और बड़ी दिव्य आत्मा के द्वारा किसी का प्रयोग करना है। हर किसी का प्रयोग नहीं हो सकता। उसी का प्रयोग हो सकता है जो इतना वीहिकल, वाहन बनने की पवित्रता में हो। छोटी घटना नहीं है, उतनी पात्रता तो चाहिए ही, उतनी पवित्रता चाहिए, तब संवाद हुआ है। संवाद तो हो सकता है, लेकिन तब दूसरे के शरीर का उपयोग करना पड़ेगा।
अभी इस तरह की कोशिश कृष्णमूर्ति के साथ चली, जो कि असफल हुई।
बुद्ध का एक अवतार होने की बात है--मैत्रेय। बुद्ध ने कहा है कि मैं मैत्रेय के नाम से एक बार और लौटूंगा। पर बहुत वक्त हो गया, ढाई हजार साल हो गए हैं। और ऐसी प्रतीति है कि कोई योग्य गर्भ उपलब्ध नहीं हो रहा है। और मैत्रेय जन्म लेना चाहता है, लेकिन कोई योग्य गर्भ उपलब्ध नहीं है। तब एक दूसरी कोशिश करने की व्यवस्था की गई कि गर्भ अगर नहीं मिल सकता है तो कोई व्यक्ति को विकसित किया जाए और उस व्यक्ति के माध्यम से वह बोल डाले।
तो इसके लिए बड़ा आयोजन चला। सारी थियोसाफी का पूरा का पूरा आंदोलन सिर्फ एक काम के लिए निर्मित हुआ कि वह इतना काम कर दे, पूरा आंदोलन, कि एक ऐसे व्यक्ति को खोज कर तैयार कर दे सब तरह से कि वह वीहिकल बन जाए।
मोहम्मद से जो आत्मा संदेश देना चाहती थी उसको यह तकलीफ नहीं हुई, वीहिकल बनाना नहीं पड़ा, तैयार मिला। मूसा से जिस आत्मा ने संदेश दिया उसको भी वाहन बनाने के लिए कोई चेष्टा नहीं करनी पड़ी, वाहन मिल गया। बहुत सरल युग थे। वाहन मिलना कठिन नहीं था। अहंकार इतना कम था कि इतनी विनम्रता से समर्पण हो सकता था कि कोई दूसरा उसका उपयोग कर ले शरीर का और कोई हट जाए बिलकुल ऐसे जैसे है ही नहीं। अब यह असंभव हो गया। इंडिविजुअलिटी प्रगाढ़ है। व्यक्ति-अहंकार भारी है। कोई इंच भर नहीं हट सकता। तो कठिन है मामला। तो व्यक्ति तैयार कर लिया जाए।
तो थियोसाफिस्ट्स ने तीन-चार छोटे बच्चों को चुना, क्योंकि पक्का भरोसा नहीं है कि कौन बच्चे का भविष्य क्या हो जाए। उसमें कृष्णमूर्ति को चुना, उनके एक भाई नित्यानंद को चुना। कृष्ण मेनन को भी पीछे चुना। एक और व्यक्ति जॉर्ज अरंडेल को भी चुना। नित्यानंद की तो मृत्यु हुई अति चेष्टा करने से, दुर्घटना हुई। नित्यानंद पर इतनी चेष्टा की गई--कृष्णमूर्ति के भाई पर--कि वह ठीक माध्यम बन जाए मैत्रेय का संदेश देने का। उस चेष्टा में ही उसकी मृत्यु हुई। उसकी मृत्यु से भी कृष्णमूर्ति को इतना धक्का पहुंचा कि उनके भी माध्यम बनने में बाधा पड़ी। उसकी मृत्यु उस पूरे प्रयोग में हुई।
कृष्णमूर्ति को नौ साल की उम्र में एनीबीसेंट और लीडबीटर ने लिया। लेकिन यह मजे का खेल है, जगत एक बड़ा ड्रामा है। और छोटी शक्तियों का खेल नहीं, बड़ी शक्तियों का खेल है। और जब मैत्रेय की आत्मा की संभावना बढ़ने लगी कि हो सकता है कृष्णमूर्ति से उतर जाए, तो जिस आत्मा ने, देवदत्त नाम के व्यक्ति ने, जिसने बुद्ध का जीवन भर विरोध किया, बुद्ध के जीवन में बुद्ध की हत्या की अनेक कोशिशें कीं, बुद्ध का चचेरा भाई था, उसकी आत्मा कृष्णमूर्ति के पिता पर हावी हो गई। और एक मुकदमा चला जो प्रिवि कौंसिल तक गया।
यह बात कभी नहीं कही गई है, यह मैं पहली दफा कह रहा हूं। कृष्णमूर्ति के पिता के द्वारा यह दावा करवाया गया कि उसके बच्चे को जबरदस्ती इन लोगों ने कब्जा कर लिया है और वह वापस चाहते हैं। नाबालिग बच्चा है। एनीबीसेंट ने जी-जान लगा कर वह संघर्ष किया। फिर भी नियमानुसार वह जीत नहीं सकती थी। क्योंकि नाबालिग बच्चे थे और बाप का हक था। अगर बच्चे भी कहें तो भी कोई बात नहीं थी, क्योंकि वे नाबालिग थे, उनकी बात का कोई मतलब नहीं हो सकता था।
इसलिए कृष्णमूर्ति को लेकर हिंदुस्तान के बाहर भाग जाना पड़ा। इधर मुकदमा चलाया गया, उधर लेकर भाग गए। इधर मुकदमा चला, इधर से हारी एनीबीसेंट। लेकिन तब तक कृष्णमूर्ति को बाहर निकाल लिया गया। फिर वह सुप्रीम कोर्ट में चला, वहां से भी एनीबीसेंट हारी। क्योंकि वह तो कानूनन मामला था। देवदत्त के हाथ में ज्यादा ताकत थी। और अक्सर ऐसा होता है कि बुरे आदमियों के हाथ में कानून अक्सर सहयोगी हो जाता है। क्योंकि अच्छा आदमी तो बहुत कानून की फिकर नहीं करता। बुरे आदमी कानून का पहले इंतजाम कर लेते हैं। फिर वह प्रिवि कौंसिल में गया। लेकिन प्रिवि कौंसिल ने, सब कानून को तोड़ कर प्रिवि कौंसिल ने निर्णय दिया कि वह एनीबीसेंट के पास रहे। इसके लिए कोई प्रिसीडेंट नहीं था। यह बिलकुल न्यायोचित नहीं थी घटना। इसके लिए कोई नियम नहीं था, यह बिलकुल ही गैर-कानूनी था फैसला। लेकिन प्रिवि कौंसिल के ऊपर तो कोई उपाय नहीं था।
यह निर्णय भी मैत्रेय की आत्मा के द्वारा ही संभव हुआ, नहीं तो संभव नहीं हो सकता था। और इसीलिए छोटी कोर्ट्स में इसकी कोशिश नहीं की गई, क्योंकि उनके ऊपर बड़ी कोर्ट्स थीं। आखिरी कोर्ट में ही उपयोग किया गया। छोटी अदालतों में इसका उपयोग करना बेकार था, क्योंकि बड़ी अदालत से वह फिर हार हो जाती। इसलिए आखिरी अदालत के लिए रोक कर रखा गया।
यह नीचे के तल पर तो एक खेल था, जो इधर दिखाई पड़ रहा था, अखबारों में चल रहा था, अदालतों में मुकदमा लड़ा जा रहा था। लेकिन ऊपर के तल पर भी शक्तियों का एक संघर्ष था। फिर कृष्णमूर्ति पर जितनी मेहनत की गई, इतनी शायद ही कभी किसी व्यक्ति पर की गई है। व्यक्तियों ने खुद की है अपने ऊपर, इससे भी ज्यादा मेहनत की है, लेकिन दूसरे लोगों ने किसी पर इतनी मेहनत की हो, ऐसा कभी नहीं हुआ। पर सारी मेहनत के बावजूद भी बात बिगड़ गई, और ऐन वक्त पर।
जिस दिन थियोसाफिस्ट्स ने सारी दुनिया से छह हजार लोगों को हालैंड में इकट्ठा कर रखा था और जिस दिन घोषणा होने वाली थी कि कृष्णमूर्ति उस दिन अपने व्यक्तित्व को छोड़ देंगे और मैत्रेय के व्यक्तित्व को स्वीकार कर लेंगे। सारी तैयारियां हो गई थीं। आखिरी इंच की घोषणा थी, एक बिंदु की बात थी, कि मंच पर खड़े होकर वह कहेंगे कि अब मैं कृष्णमूर्ति नहीं हूं, बस इतनी ही घोषणा बाकी थी। सारी भीतरी तैयारी पूरी थी कि वे इतना कह देंगे कि अब मैं कृष्णमूर्ति के व्यक्तित्व को इनकार करता हूं और खाली बैठ जाएंगे, ताकि मैत्रेय की आत्मा प्रवेश हो जाए और बोलना शुरू कर दे।
सारी दुनिया से छह हजार लोग जो समझते थे और उत्सुक थे और प्यासे थे, वे इकट्ठे हुए थे दूर-दूर से आकर इस घटना को देखने के लिए--मैत्रेय की आवाज को सुनने के लिए। यह बहुत अनूठी घटना होने वाली थी। लेकिन ऐन वक्त पर कुछ नहीं हुआ। और कृष्णमूर्ति ने इनकार कर दिया। देवदत्त फिर धक्का दिया। और वह जो प्रिवि कौंसिल में नहीं हो सका था वह अंततः आखिरी अदालत में हार गया मामला। देवदत्त फिर धक्का दिया और ऐन वक्त पर इनकार करवा दिया कि मैं कोई शिक्षक नहीं हूं, मैं कोई जगतगुरु नहीं हूं, किसी की आत्मा से मुझे कुछ लेना-देना नहीं है। मैं मैं हूं और जो मुझे कहना था वह कह दिया।
बहुत बड़ा प्रयोग असफल हुआ है। पर एक अर्थ में पहला ही प्रयोग था उस तरह का, और असफल होने की ही ज्यादा संभावना थी।
उस तल पर आत्माएं संवाद नहीं कर सकती हैं, जब तक वे किसी के शरीर को न ग्रहण कर लें। और बीच में उनकी कोई प्रगति नहीं होती। इसीलिए मनुष्य-जन्म फिर अनिवार्य है। आज कोई मरा और सौ साल तक वह अशरीरी हालत में रहे, तो इस सौ साल में किसी तरह का विकास नहीं होता। वह जहां मरा था पिछले जन्म में, ठीक वहीं से नये जन्म में प्रवेश करेगा, चाहे कितने ही समय बाद प्रवेश करे। यह विकास का काल नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे रात जहां आप सोते हैं, सुबह आप वहीं उठते हैं। नींद कोई विकास का काल नहीं है।
इसलिए अगर बहुत से धर्म नींद के खिलाफ हो गए तो उसका कारण था, और उसको कम करने में लग गए। क्योंकि वह विकास का काल नहीं है, उसमें कोई विकास नहीं होता। जहां आप थे, सुबह आप वहीं उठते हैं। ऐसे ही दो शरीरों के बीच में, जहां से आप मरे थे, वहीं आप जन्मते हैं। आपकी स्थिति में कोई अंतर नहीं पड़ता। बिलकुल ऐसे जैसे हमने एक घड़ी बंद कर दी अभी और जब हम दुबारा शुरू करेंगे तो वह वहीं से शुरू हो जाएगी जहां हमने बंद की थी। बीच में सब विकास अवरुद्ध है।
इसलिए कोई भी देव-योनि से मोक्ष नहीं जा सकता। देव-योनि से मोक्ष न जाने का कुल कारण इतना ही है कि देव-योनि में कोई कर्म-योनि नहीं है। आप कुछ कर नहीं सकते हैं। कुछ हो नहीं सकता। सपने देख सकते हैं, अंतहीन सपने देख सकते हैं। तो मनुष्य होने लौटना ही पड़े।
इसका मतलब यह है कि अगर एक आत्मा किसी के शरीर में प्रवेश कर जाए, तो वह आत्मा इन सारी आत्माओं को देख सकती है। फिर भी वे आत्माएं उसे नहीं देखेंगी। और अगर एक आत्मा किसी के शरीर में प्रवेश कर जाए तो वह दूसरी आत्माओं को, जो कि अशरीरी हैं, उनके बाबत कुछ जान सकती है। लेकिन वे आत्माएं उसके बाबत कुछ भी नहीं जान सकतीं।
असल में जानना जो है, परिचय जो है, वह भी जिस मस्तिष्क से संभव होता है वह भी शरीर के साथ ही विदा हो जाता है। हां, कुछ संभावनाएं फिर भी शेष रह जाती हैं जो कि हो सकती हैं। जैसे अगर किसी व्यक्ति ने जीते-जी मस्तिष्क-मुक्त टेलीपैथी या क्लेअरवायंस के संबंध निर्मित किए हों, किसी व्यक्ति ने जीते-जी मस्तिष्क के बिना जानने के मार्ग निर्मित कर लिए हों, तो वह प्रेत या देव-योनि में भी जान सकेगा। पर ऐसे तो बहुत कम लोग हैं। इसलिए जिन आत्माओं ने कुछ खबरें दी हैं उस लोक की आत्माओं के बाबत, वे इस तरह की आत्माएं हैं।
यह करीब-करीब स्थिति ऐसी है कि जैसे बीस आदमी शराब पी लें, सब बेहोश हो जाएं, लेकिन एक आदमी ने शराब पीने का इतना अभ्यास किया हो कि वह कितनी ही शराब पी ले और बेहोश न हो, तो वह शराब पीकर भी होश में बना रहे। और जो व्यक्ति शराब पीकर भी होश में बना रह सकता है, वह शराब के अनुभव के संबंध में कुछ कह सकता है जो बेहोश रहने वाले नहीं कह सकते। कभी नहीं कह सकते, क्योंकि वे जानने के पहले ही बेहोश हो गए होते हैं।
तो इस तरह के भी छोटे-छोटे संगठन काम करते रहे हैं दुनिया में जो कुछ लोगों को तैयार करते हैं कि वे मरने के बाद जो लोक होगा, उस लोक के संबंध में कुछ जानकारी दे सकें। जैसे लंदन में एक छोटी सी संस्था थी। जिसके कुछ बड़े-बड़े लोग--ओलिवर लाज जैसे लोग सदस्य थे। जिन्होंने पूरी कोशिश की, ओलिवर लाज मरा, तो उन्होंने पूरी चेष्टा की कि मरने के बाद वह खबर दे सके।
लेकिन बीस साल तक मेहनत करने पर भी कोई खबर न मिल सकी। ऐसी संभावना मालूम होती है कि ओलिवर लाज ने बहुत कोशिश की, क्योंकि कुछ और आत्माओं ने खबर दी कि ओलिवर लाज पूरी कोशिश कर रहा है, लेकिन कोई ट्यूनिंग नहीं बैठ पाई। बीस साल निरंतर, बहुत दफा ओलिवर लाज ने खटखटाया उन लोगों को, जिनसे उसने वायदा किया था कि मैं खबर दे दूंगा। मैं मरते से ही पहला काम यह करूंगा कि कुछ खबर दे दूं। उसकी सारी तैयारी करवाई गई थी कि वह खबर दे सकेगा। जैसे नींद में सोए हुए आदमी को वह--हड़बड़ा कर, घबड़ा कर उसका साथी बैठ जाएगा। उसे लगेगा कि ओलिवर लाज कहीं पास में है। और फिर बस बात खत्म हो जाएगी।
ट्यूनिंग नहीं बैठ पाई। ओलिवर लाज तैयार गया, लेकिन कोई दूसरा आदमी तैयार नहीं था इस योग्य, जो ओलिवर लाज कुछ कहे तो उसे पकड़ ले। बीस साल वह निरंतर चेष्टा करता रहा। न मालूम कितनी दफे रास्ते में अकेले में कोई जा रहा है, एकदम कोई कंधे पर हाथ रख देगा। मित्र, जो कि ओलिवर लाज के हाथ के स्पर्श को जानते थे, वे एकदम चौंक कर कहेंगे--लाज! लेकिन बस फिर बात खो जाएगी। इसकी बहुत, बीस साल--उसके साथी तो सब घबड़ा गए और परेशान हो गए कि यह क्या हो रहा है! लेकिन कोई संदेश, एक भी संदेश नहीं दिया जा सका। संदेश कुछ नहीं हो सका, हालांकि उसने द्वार बहुत खटखटाए।
दोहरी तैयारी चाहिए। अगर टेलीपैथी का ठीक अनुभव हुआ हो जीते-जी, बिना शब्द के बोलने की क्षमता आई हो, बिना आंख के देखने की क्षमता आई हो, तो फिर उस योनि में भी उस तरह का व्यक्ति बहुत चीजें जान सकेगा। जानना भी सिर्फ हमारे होने पर निर्भर नहीं होता।
जैसे हम एक बगीचे में जाएं, और एक वनस्पति-शास्त्री भी उस बगीचे में जाए, और एक कवि भी उस बगीचे में जाए, और एक दुकानदार भी उस बगीचे में जाए, एक छोटा बच्चा भी उस बगीचे में जाए। वे सब एक ही बगीचे में जाते हैं। लेकिन एक ही बगीचे में नहीं जाते! बच्चा तितलियों के पीछे भागने लगता है। दुकानदार बैठ कर अपनी दुकान की बात सोचने लगता है। उसे न फूल दिखाई पड़ते हैं, न बगीचा दिखाई पड़ता है। कवि फूलों में अटक जाता है, और कविताओं में खो जाता है। वनस्पति-शास्त्री कुछ जानता है जिसकी उसकी ट्रेनिंग है भारी--पचास साल या बीस साल या तीस साल उसने वनस्पति की जो जानकारी ली है, वह उससे बोलना शुरू कर देगी। वह एक-एक जड़, एक-एक पत्ते और एक-एक फूल में उसे दिखाई पड़ने लगता है बहुत कुछ, जो इनमें से किसी को दिखाई नहीं पड़ सकता।
तो उस लोक में, जो ऐसे ही मर जाते हैं इस जीवन में शरीर के अतिरिक्त बिना कुछ जाने, उनका तो कोई परिचय, कोई संबंध, कुछ नहीं हो पाता। वे तो एक कोमा में, एक गहरी तंद्रा में पड़े रह कर नये जन्म की प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन जो कुछ तैयारी करके जाते हैं वे...।
इसकी तैयारी के भी शास्त्र हैं। और मरने के पहले अगर कोई वैज्ञानिक ढंग से मरे, विज्ञानपूर्वक मरे, और मरने की पूरी तैयारी करके मरे, पूरा पाथेय लेकर, मरने के बाद के पूरे सूत्र लेकर कि क्या-क्या करेगा, तो बहुत काम कर सकता है। विराट अनुभव की संभावनाएं वहां हैं। लेकिन साधारणतः नहीं। साधारणतः आदमी मरा, अभी जन्म जाए कि वर्षों बाद जन्मे, वह इस बीच से कुछ भी लेकर, कुछ भी करके नहीं आता है। और सीधे संवाद की कोई संभावना नहीं है। कोई संभावना नहीं है।
कुछ समय तो बहुत थिर होते हैं, जहां चीजें बहुत मंद गति से चलती हैं। जितने हम पीछे जाएंगे, उतना ही मंद गति से चलने वाला समय था। कुछ युग अति तीव्र होते हैं, जहां चीजें बहुत तीव्रता से जाती हैं। आज हम ऐसे ही समय में हैं जहां चीजें इतनी तीव्रता में हैं, जहां सब चीजें तीव्रता में हैं, जहां कोई भी चीज थिर नहीं है। धर्म अगर पुराने ढंग और पुरानी चालों से चले तो पिछड़ जाएगा और पिट जाएगा। जब विज्ञान भी बहुत धीमी गति से चलता था, दस हजार साल हो जाते थे और बैलगाड़ी में कोई फर्क नहीं पड़ता था। बैलगाड़ी ही होती थी। लोहार के औजार में कोई फर्क नहीं पड़ता था, वह वही औजार होता था। सब चीजें ऐसे चलती थीं जैसे कि नदी बहुत आहिस्ता सरकती है कि कहीं पता ही न चलता हो कि नदी सरकती भी है। किनारे करीब-करीब वही के वही होते थे। तब धर्म भी इतनी ही गति से चलता था, तो तालमेल था। धर्म अभी भी उसी गति से चलता है। और सब चीजें बहुत तीव्रता में हैं। तो धर्म अगर पिछड़ जाए और लोगों के पैर से उसका कोई तालमेल न रह जाए तो आश्चर्य नहीं है।
तो इसलिए भी जल्दी है। जितनी तीव्रता से जगत का पौद्गलिक ज्ञान बढ़ता है और जितनी तीव्रता से विज्ञान कदम भरता है, उतनी ही तीव्रता से, बल्कि थोड़ा उससे भी ज्यादा धर्म को गति करनी चाहिए। क्योंकि धर्म जब भी आदमी से पीछे पड़ जाए तभी आदमी का नुकसान होता है। धर्म आदमी से सदा थोड़ा आगे होना चाहिए। क्योंकि आदर्श सदा ही थोड़ा आगे होना चाहिए। नहीं तो आदर्श का कोई अर्थ नहीं रह जाता। वास्तविकता से आदर्श सदा ही थोड़ा आगे, पार जाने वाला होना चाहिए।
यह एक बहुत बुनियादी फर्क है। अगर हम राम के जमाने में जाएं तो धर्म सदा आदमी से आगे है। और अगर हम आज अपने जमाने में आएं तो आदमी सदा धर्म से आगे है। तो आज सिर्फ वही आदमी धार्मिक हो पाता है, जो बहुत पिछड़ा हुआ आदमी है। उसका कारण है। क्योंकि धर्म से सिर्फ उसके ही पैर मिल पाते हैं। जितना विकासमान है आज आदमी, उसका धर्म से संबंध छूट जाएगा--या औपचारिक संबंध रह जाएगा जो वह दिखावे के लिए रखेगा। धर्म होना चाहिए आगे।
अब यह कितनी हैरानी की बात है कि अगर हम बुद्ध और महावीर के जमाने को देखें तो उस युग के जो श्रेष्ठतम लोग हैं वे धार्मिक हैं और अगर हम आज के धार्मिक आदमी को देखें तो हमारे बीच का जो निकृष्टतम आदमी है वही धार्मिक है। उस जमाने में जो अग्रणी है, चोटी पर है, वह धार्मिक है; और आज जो बिलकुल ग्रामीण है, पिछड़ा हुआ है, वही धार्मिक है। बाकी कोई धार्मिक नहीं है। उसका कारण है। धर्म आदमी से आगे कदम नहीं बढ़ा पा रहा है। इसलिए भी जल्दी है।
फिर इसलिए भी जल्दी है कि कुछ समय इमरजेंसी के होते हैं, आपातकालीन होते हैं। जैसे जब आप कभी अस्पताल की तरफ जा रहे होते हैं तब आपकी चाल वही नहीं होती जो आपकी दुकान की तरफ जाने की होती है। वह चाल आपातकालीन है, इमरजेंसी की है।
आज करीब-करीब हालत ऐसी है कि अगर धर्म कोई बहुत प्राणवान आंदोलन जगत में पैदा नहीं कर पाया तो पूरी मनुष्यता भी नष्ट हो सकती है। तो समय बिलकुल इमरजेंसी का है, अस्पताल की तरफ जाने जैसा है। जहां कि हो सकता है कि हमारे पहुंचने के पहले मरीज मर जाए, हमारे औषधि लाने के पहले मरीज मर जाए, हमारा निदान हो और मरीज मर जाए।
इसका कोई व्यापक परिणाम धार्मिक चिंतकों पर नहीं है। यद्यपि धार्मिक चिंतकों की बजाय सारी दुनिया की नई पीढ़ी पर और विशेषकर विकसित मुल्कों की नई पीढ़ी पर इसका बहुत सीधा परिणाम हुआ है। और वह परिणाम यह हुआ है कि आज अगर अमरीका के युवक को मां-बाप यह कहें कि तू युनिवर्सिटी में पढ़ ले दस साल, पढ़ लेगा तो अच्छी नौकरी मिल जाएगी। तो युवक यह कहता है कि क्या इस बात की गारंटी है कि दस साल बाद मैं बचूंगा या यह आदमियत बचेगी? और मां-बाप के पास जवाब नहीं है। कल का भरोसा सर्वाधिक कम आज अमरीका में है। सर्वाधिक कम! कल बिलकुल गैर-भरोसे का है। कल होगा भी कि नहीं, इसका कोई पक्का नहीं। इसलिए इतने जोर से आज को ही भोग लेने की आकांक्षा है। यह आकस्मिक नहीं है। यह बहुत तीव्र चारों तरफ साफ स्थिति है कि चीजें कल बिखर सकती हैं बिलकुल! करीब-करीब ऐसी हालत है जैसे कि मरीज खाट पर पड़ा हो और किसी भी क्षण मर सकता है। ऐसी पूरी आदमियत है।
इसलिए भी जल्दी है कि अगर आपके निदान बहुत धीमे और मद्धिम रहे तो कोई परिणाम होने वाला नहीं है। इसलिए बहुत तीव्रता में मैं हूं कि जो भी हो सकता है वह शीघ्रता से होना चाहिए। और यह जो मैंने कहा कि गांव-गांव घूमूंगा, वह मैं एक अर्थ में अपने हिसाब से घूम लिया हूं। जिन आदमियों पर मेरा खयाल है, वह मेरा खयाल आ गया है। अब उन पर काम करने की बात है। बड़ी कठिनाई तो इसलिए होती है कि मेरे खयाल में कोई आदमी आ जाए इससे उस आदमी के खयाल में मैं आ जाऊं, यह जरूरी थोड़े ही है। और जब तक उसके खयाल में मैं न आ जाऊं, तब तक कुछ काम नहीं हो सकता।
काम शुरू भी किया है। और कम आऊंगा-जाऊंगा उसका भी प्रयोजन यही है कि काम कर सकूं। नहीं तो मैं आता ही जाता रहूंगा तो काम नहीं हो पाएगा। और भेजूंगा लोगों को तैयार करके बहुत जल्दी, दो वर्ष में गांव-गांव लोगों को भेज दूंगा। वे बिलकुल जा सकेंगे। और ऐसी स्थिति नहीं आएगी। सौ नहीं, दस हजार आदमी तैयार किए जा सकेंगे। जो बहुत संकट के काल होते हैं, खतरे के भी होते हैं, संभावना के भी होते हैं। उपयोग न किया जाए तो दुर्घटना हो जाती है। उपयोग कर लिया जाए तो बहुत संभावना के हो जाते हैं। बहुत संभावना का क्षण भी है, बहुत लोगों को तैयार भी किया जा सकता है। बहुत साहस का भी योग है, बहुत से लोगों को बहुत अज्ञात में छलांग के लिए भी तैयार करवाया जा सकता है। वह होगा!
और यह तो जो बाहर की स्थिति है, वह मैंने कही। लेकिन जब भी कोई एक युग ध्वंस के करीब आता है, तब भीतरी तल पर बहुत सी आत्माएं विकास के आखिरी किनारे पर पहुंच गई होती हैं। उनको जरा से धक्के की जरूरत होती है। जरा से इशारे से उनकी छलांग लग सकती है। और जैसे आमतौर से हम जानते हैं कि मौत करीब देख कर आदमी मौत के पार का चिंतन करने लगता है; एक-एक व्यक्ति, निकट जैसे मौत आती है, वैसे धार्मिक होने लगता है। मौत करीब आती है तो सवाल उठने शुरू होते हैं मौत के पार के, अन्यथा जिंदगी इतना उलझाए रखती है कि सवाल नहीं उठते। जब कोई पूरा युग मरने के करीब आता है, तब करोड़ों आत्माओं में भी वे खयाल भीतर से आने शुरू होते हैं। वह भी संभावना है, उसका उपयोग किया जा सकता है।
इसलिए मैं धीरे-धीरे अपने को बिलकुल कमरे में ही सिकोड़ लूंगा। मैं आने-जाने को समाप्त ही कर दूंगा। अब तो जो लोग मेरे खयाल में हैं, उन पर काम शुरू करूंगा। उनको तैयार करके भेजूंगा। और जो मैं अकेला घूम कर नहीं कर सकता हूं, वह मैं दस हजार लोगों को घुमा कर करवा सकूंगा।
और मेरे लिए धर्म बिलकुल वैज्ञानिक प्रक्रिया है। तो ठीक वैज्ञानिक टेक्नीक के ढंग से सारी चीजें मेरे पास खयाल में हैं। जैसे-जैसे लोग तैयार होते जाएंगे, उनको वैज्ञानिक टेक्नीक दे देनी है। वे उस टेक्नीक से जाकर काम कर सकेंगे हजारों लोगों पर। मेरी जरूरत नहीं है उसमें। मेरी जरूरत इन लोगों को खोजने के लिए थी। इनसे अब मैं काम ले सकूंगा। मेरी जरूरत कुछ सूत्र निर्मित करने की थी, वे निर्मित हो गए। एक वैज्ञानिक का काम पूरा हो गया। अब टेक्नीशियंस का काम होगा।
एक वैज्ञानिक काम पूरा कर लेता है। उसने बिजली खोज कर रख दी। एक एडिसन ने बिजली का बल्ब बना दिया। अब तो गांव का मिस्त्री भी बिजली के बल्ब को ठीक कर लेता है और लगा देता है। इसमें कोई अड़चन नहीं है। इसके लिए कोई एडिसंस की जरूरत नहीं है।
अब मेरे पास करीब-करीब पूरा खयाल है। अब जैसे-जैसे लोग तैयार होते जाएंगे, उनको खयाल देकर प्रयोग करवा कर उनको भेज दूंगा कि वे जा सकें दूर-दूर। और मेरी नजर में हैं। क्योंकि सभी को संभावनाएं दिखाई नहीं पड़तीं, अधिक लोगों को तो वास्तविकताएं ही दिखाई पड़ती हैं। संभावनाएं देखना बहुत कठिन बात है। संभावनाएं मेरी नजर में हैं। बहुत सरलता से, बुद्ध और महावीर के समय में जैसे बिहार के छोटे से इलाके की स्थिति थी, वैसी दस वर्ष में सारी दुनिया की स्थिति हो सकती है--उतने ही बड़े व्यापक पैमाने पर।
लेकिन बिलकुल नये तरह का धार्मिक आदमी निर्मित करना पड़ेगा। नये तरह का संन्यासी निर्मित करना पड़ेगा। नये तरह के ध्यान और योग के प्रयोग और प्रक्रियाएं निर्मित करनी पड़ेंगी। वे सब निर्मित हैं मेरे खयाल में। जैसे-जैसे लोग मिलते जाएंगे, उनको दे दिया जाएगा और उनको पहुंचा दिया जाएगा।
खतरा भी बहुत है, क्योंकि अवसर चूके तो बहुत नुकसान भी होगा। अवसर का उपयोग हो सके तो इतना कीमती अवसर मुश्किल से कभी आता है जैसा आज है। सभी अर्थों में युग अपने शिखर पर है, अब आगे उतार ही होगा। अब अमरीका इससे आगे नहीं जा सकेगा, बिखराव होगा। इंग्लैंड छू चुका अपने शिखर को और बिखर गया। अब कोई संभावना नहीं है। इस युग की सभ्यता बिखराव पर है। आखिरी क्षण है।
यह हमको खयाल में नहीं है कि बुद्ध और महावीर के बाद हिंदुस्तान बिखरा। बुद्ध और महावीर के बाद फिर वह स्वर्ण-शिखर नहीं छुआ जा सका। लोग आमतौर से सोचते हैं कि बुद्ध और महावीर की वजह से ऐसा हो गया होगा। बात उलटी है। असल में बिखराव के पहले ही बुद्ध और महावीर की हैसियत के लोग काम कर पाते हैं, नहीं तो काम नहीं कर पाते। क्योंकि बिखराव के पहले जब सब चीजें अस्तव्यस्त होती हैं और सब चीजें गिरने के करीब होती हैं, तो जैसे व्यक्ति के सामने मौत खड़ी हो जाती है, ऐसा पूरी सामूहिक चेतना के सामने मौत खड़ी हो जाती है। और समूहगत चेतना धर्म के और अज्ञात के चिंतन में उतरने के लिए तैयार हो जाती है। इसलिए यह संभव हो पाया कि बिहार जैसी छोटी सी जगह में पचास-पचास हजार संन्यासी महावीर के साथ घूम सके।
यह फिर संभव हो सकता है। इसकी पूरी संभावना है। और उसकी पूरी कल्पना और योजना मेरे खयाल में है। मेरा जो काम था वह एक अर्थ में पूरा हो गया। एक अर्थ में पूरा हो गया कि मैं जिन लोगों को खोजना चाहता था, उन्हें मैंने खोज लिया है। उन्हें भी पता नहीं, मैंने उन्हें खोज लिया है। अब उन पर काम कर लेना है और उनको तैयार करके भेज देना है।
इसलिए जल्दी है, इसलिए भी जल्दी है। क्योंकि जब तक मेरा काम था, तब तक मैं बहुत आश्वस्त था, बहुत जल्दी की बात नहीं थी। मैं जानता था क्या मुझे करना है, वह मैं कर रहा था। अब मुझे दूसरों से काम लेना है, अब उतना आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता। जब तक मैं ही कर रहा था कुछ तब तक मुझे खयाल था कि क्या करना है, बात ठीक थी। अब दूसरों से काम लेना है इसलिए कठिनाई, जटिलता पैदा होती है। और फिर मैं मित्रों को साफ कर ही देना चाहता हूं कि मैं जल्दी में हूं, उन्हें भी जल्दी में होना चाहिए। क्योंकि जिस गति से लोग चलते हुए दिखाई पड़ते हैं, उस गति से वे कहीं नहीं पहुंचने वाले हैं। तो मुझे तीव्रता में देख कर ही उनमें भी तीव्रता आ सकती है, अन्यथा उनमें आ नहीं सकती।
कई बार, जैसे कि जीसस को करना पड़ा। जीसस ने तो कहा कि बहुत जल्दी सब समाप्त होने वाला है। मगर लोग कितने नासमझ हैं, हिसाब लगाना बहुत मुश्किल है। जीसस ने कहा कि बहुत जल्दी सब समाप्त हो जाएगा। तुम अपनी आंखों के सामने देखोगे कि सब नष्ट हो जाएगा। चुनाव का वक्त करीब है। और जो आज नहीं बदलेंगे, उनको बदलने का फिर कोई मौका नहीं बचेगा।
जो सुने, समझे, उन्होंने अपने को बदला। लेकिन अधिक लोग तो पूछने लगे कि कब आएगा वह समय? देखें? अभी भी ईसाइयत--दो हजार साल बाद--ईसाई पंडित और पुरोहित और थियोलाजियंस बैठ कर विचार कर रहे हैं कि जीसस से कुछ गलती हो गई मालूम होती है। क्योंकि अभी तक तो वह डे ऑफ जजमेंट आया नहीं। वह निर्णय का दिन अभी तक नहीं आया, दो हजार साल हो गए। और जीसस ने कहा था कि अभी, तुम्हारे सामने, अभी यह घटना घट जाएगी। अभी मेरे देखते-देखते चुनाव का वक्त आ जाएगा और जो चूक जाएंगे वे सदा के लिए चूक जाएंगे। तो वह अभी तक नहीं आया। या तो जीसस से कोई भूल हो गई या फिर हमने कुछ समझने में भूल कर दी। कुछ हैं जो कहते हैं कि जीसस को कुछ पता नहीं था, इतनी बड़ी गलती की, इसलिए और भी कुछ पता नहीं होगा। कुछ हैं जो कहते हैं कि कुछ शास्त्र की व्याख्या में भूल हो गई।
लेकिन उनमें से किसी को पता नहीं कि जीसस जैसे लोग जो कहते हैं, उसके प्रयोजन होते हैं। इतनी तीव्रता जीसस ने पैदा की, उस तीव्रता में जो लोग समझ सके वे लोग रूपांतरित हो गए। और आदमी तीव्रता में ही रूपांतरित होता है। नहीं तो रूपांतरित नहीं होता। उसको अगर पता है कि कल हो जाएगा, तो वह आज तो करेगा ही नहीं। वह कहेगा, कल करेंगे। उसे अगर पता है परसों हो जाएगा, तो वह कहेगा परसों कर लेंगे। उसे अगर पता चल जाए कि कल है ही नहीं, तो ही रूपांतरण की क्षमता आती है।
और एक लिहाज से बिखराव की जो सभ्यताएं होती हैं, जब सभ्यता बिखरती है, तब कल बहुत संदिग्ध हो जाता है। कल का कोई पक्का नहीं रह जाता। तब आज ही सिकुड़ना पड़ता है हमें। भोगना हो तो भी आज सिकुड़ना पड़ता है और त्यागना हो तो भी आज सिकुड़ना पड़ता है। नष्ट करना हो स्वयं को तो भी आज ही करना पड़ता है, रूपांतरित करना हो तो भी आज ही करना पड़ता है।
तो एक घटना तो घट गई है कि यूरोप और अमरीका भोगने के लिए आज तैयार हो गए हैं कि जो करना है आज कर लो, कल की फिकर छोड़ दो। पीना है पी लो, भोगना है भोग लो, चोरी करना है चोरी कर लो, खाना है खा लो। जो करना है, आज कर लो। यह एक घटना घट गई भौतिक तल पर।
मैं चाहता हूं आध्यात्मिक तल पर भी यह घटना घट जानी चाहिए कि जो रूपांतरण करना है वह आज कर लो, अभी कर लो। वह ठीक इसके समानांतर घट सकती है। उसकी तीव्रता में मैं हूं कि वह खयाल में आना शुरू हो जाए। निश्चय ही, वह पूरब से ही खयाल आ सकेगा। उसकी हवा पूरब से ही जा सकेगी। पश्चिम उस हवा में जोर से बह सकता है; लेकिन हवा उसकी पूरब से ही जाएगी।
चीजों के पैदा होने का भी स्थान होता है। जैसे सभी वृक्ष सब मुल्कों में नहीं हो जाते हैं। जड़ें होती हैं, जमीन होती है, हवा होती है, पानी होता है। ऐसे ही सभी विचार भी सभी भूमियों में नहीं हो जाते हैं। जड़ें होती हैं, हवा होती है, पानी होता है।
विज्ञान पूरब में पैदा नहीं हो सका। उस वृक्ष के लिए पूरब में जड़ें नहीं हैं। धर्म पूरब में ही पैदा होता रहा है, उसके लिए बड़ी गहरी जड़ें हैं, उसकी हवा बिलकुल तैयार है, पानी बिलकुल तैयार है, भूमि बिलकुल तैयार है। अगर विज्ञान पूरब में आया है, तो वह पश्चिम से ही आया है। अगर धर्म पश्चिम जाएगा, तो वह पूरब से ही जाएगा।
कई बार मुकाबला पैदा हो सकता है। जैसे जापान है। मुल्क पूरब का है, लेकिन विज्ञान में पश्चिम के किसी भी मुल्क से मुकाबला ले सकता है। लेकिन फिर भी मजे की बात है, सिर्फ इमीटेट करता है, कभी भी मौलिक नहीं हो पाता। कितना ही! यानी ऐसा भी कर लेता है इमीटेशन कि जो मूल में था वह भी फीका दिखाई पड़ने लगता है। लेकिन फिर भी होता इमीटेशन है। फिर भी जापान एक चीज इनवेंट नहीं कर पाता--यानी एक आविष्कार नहीं कर पाता। हां, रेडियो बनाएगा तो वह अमरीका से आगे बनाने लगेगा, लेकिन फिर भी होगी वह नकल। वह नकल में कुशल हो जाएगा। लेकिन होंगे वृक्ष पराए। उनको लगा लेगा, सम्हाल लेगा। लेकिन नये अंकुर उसके पास अपने नहीं आने वाले।
ठीक धर्म के साथ, पश्चिम में आगे जा सकता है अमरीका अभी। अगर पूरब से हवा पहुंच जाए तो वह एक मामले में पूरब को फीका कर सकेगा। लेकिन फिर भी वह नकल होगी। जो इनीशिएटिव है, जो पहला कदम है वह पूरब के हाथ में है।
इसलिए जल्दी ही मैं इस फिकर में हूं कि पूरब से लोग तैयार किए जाएं और पश्चिम भी भेजे जा सकें। जोर से वहां आग पकड़ लेगी, लेकिन चिनगारी पूरब से ही जानी है।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What happens to the soul in the interval after leaving the body?
According to Osho, in the gap between deaths and rebirths consciousness has no senses or body, so whatever it experiences is dreamlike—yet more vivid than waking life. Heaven and hell there are profound dream-states: bliss or torment feels absolute, inconsistencies go unnoticed, and doubt never arises. With a new body, those memories dissolve quickly, like dreams after waking.
In simple terms: Between lives it’s like a super-strong dream that feels totally real then, but fades when you get a new body.
What is the disembodied form of the soul?
According to Osho, the disembodied soul is a presence beyond motion and rest, beyond space and time—the very conditions that define movement and stillness. Outside the body, such opposites have no meaning. It is an ineffable, non-spatial, non-temporal awareness that cannot be captured by language or concepts of duality.
In simple terms: When there’s no body, the soul isn’t moving or still; it simply is—beyond space, time, and words.
Can two souls recognize one another?
According to Osho, two souls cannot directly recognize one another; acquaintance arises through the mind, which departs with the body. A soul using a living mind may perceive others, yet the unembodied cannot reciprocate. Only rare beings trained in mind-free telepathy or awareness can know across realms—and even then, mutual tuning on both sides is needed, so such recognition is exceptional.
In simple terms: Souls don’t meet like people; without a mind they can’t recognize each other—except for the very few who learned to know without words.
