लगन महूरत झूठ सब — प्रवचन 3 Lagan Mahurat Jhooth Sab #3
Questions in this Discourse
ओशो, पैंगल उपनिषद के अनुसार चार महावाक्य हैं। पहला: तत्वमसि, वह तू है; दूसरा: त्वं तदसि, तू वह है; तीसरा: त्वं ब्रह्मास्मि, तू ब्रह्म है; और चौथा: अहं ब्रह्मास्मि, मैं ब्रह्म हूं। ओशो, इन महावाक्यों के अर्थ और अर्थभेद बताने की अनुकंपा करें।
गुरु के साथ तीन प्रकार के संबंध हो सकते हैं। विद्यार्थी का; तब गुरु केवल शिक्षक होता है। वहां वाणी आवश्यक है। संवाद जरूरी है। क्योंकि बात बुद्धि से बुद्धि तक होगी। वह सबसे ऊपरी नाता है। विद्यार्थी जिज्ञासु है, मुमुक्षु नहीं। जानना चाहता है, होना नहीं। होने के लिए तो न होने की तैयारी चाहिए। जानने में कुछ कीमत चुकानी नहीं पड़ती। जानकारी इकट्ठी करके और भी अहंकार को रस आता है। जैसे-जैसे जानकारी बढ़ती है वैसे-वैसे अहंकार और परिपुष्ट होता है।
इसीलिए तो उपनिषद कहते हैं कि अज्ञान तो थोड़ा ही भटकाता है, ज्ञान बहुत भटका देता है। अज्ञान ले जाता है अंधकार में, ज्ञान ले जाता है महाअंधकार में।
उपनिषद अनूठे हैं। पृथ्वी पर कहीं भी किसी काल, किसी देश में वैसी अपूर्व घटना नहीं घटी है। गुरु और शिष्य के बीच यह जो पहला नाता है, इसमें उपनिषद निर्मित नहीं होते। शास्त्र बन सकते हैं, तर्क निर्मित हो सकता है, दर्शन स्थापित हो सकता है, लेकिन बात ऊपर-ऊपर की ही रहेगी, भीतर की नहीं हो सकती।
दूसरा नाता है गुरु और शिष्य के बीच शिष्यत्व का। विद्यार्थी अब केवल पूछने में उत्सुक नहीं है; प्रश्न ही नहीं है, अब विद्यार्थी स्वयं प्रश्न बन गया। अब जानकारी इकट्ठी नहीं करनी है। अब जानना है। और जो भी कीमत चुकानी पड़े, चुकाने की तैयारी है। जानने में मिट भी जाना पड़े तो भी पीछे पैर नहीं लौटेगा। इतने साहस से ही विद्यार्थी का रूपांतरण शिष्य में होता है।
इसलिए नानक ने अपने सत्संगियों को सिक्ख कहा। वह पंजाबी रूपांतरण है शिष्य का।
शिष्य के साथ ही धर्म की शुरुआत है। विद्यार्थी दर्शन के जंगल में भटकता, शब्दों के जाल में अटकता, शिष्य सुलझने लगता, राह पाने लगता है। राह प्रेम की है, भटकाव तर्क का है। उलझाव बुद्धि का है, सुलझाव हृदय का है। जब ऊर्जा बुद्धि से हृदय में प्रवेश करती है तो विद्यार्थी रूपांतरित होता है। उसके भीतर आत्म-क्रांति घटित होती है। वह शिष्य होता है।
शिष्य और गुरु के बीच पहली बार कुछ सार्थक जन्म पाता है। उसके पहले तो बातचीत ही बातचीत थी। उसके पहले तो संभाषण था, अब कुछ गहराई में उतरना हुआ। अब चले उस प्रगाढ़ता की तरफ। जैसे नमक का पुतला सागर में डुबकी मारे थाह का पता लगाने को, थाह मिलते-मिलते खुद भी खो जाए; थाह मिले, लेकिन खुद न बचे। शिष्य करीब सरकने लगा गुरु के। कुछ-कुछ, दूर जैसे कोयल बोले, ऐसे गुरु की बात समझ में आनी शुरू होगी। शब्द अब भी गुरु बोलेगा, लेकिन शिष्य अब शब्दों के बीच में जो खाली जगह है वह सुनेगा। वह जो विराम है, वह जो विश्राम है, ज्यादा महत्वपूर्ण हो उठेगा। शब्द उसको उभारने के काम में आएंगे। शब्द उसे पृष्ठभूमि देंगे। अभी शब्दों की जरूरत रहेगी, लेकिन बड़ी बदली हुई जरूरत।
विद्यार्थी सिर्फ शब्द को सुनता था, लकीरों को पढ़ता था, शिष्य शब्दों के बीच में जो शून्य है, उसे गुनता है; पंक्तियों के बीच में जो रिक्त स्थान है, उसे सुनता है। गुरु क्या कहता है, यह कम महत्वपूर्ण है, गुरु क्या है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण होने लगता है। यह नाता प्रेम का है। यह मामला तर्क, समझ, गणित के पार गया।
इसलिए विद्यार्थी तो दुनिया में सब जगह हुए हैं--स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय विद्यार्थियों से भरे हुए हैं--लेकिन शिष्य कभी-कभी हुए हैं। किसी जीसस के पास, किसी बुद्ध के पास, किसी नानक के पास, किसी कबीर के पास, शिष्य कभी-कभी हुए हैं। शिष्य होने के लिए अहंकार को छोड़ने का साहस चाहिए। क्योंकि जब तक अहंकार है तब तक प्रेम नहीं।
और तीसरा जो संबंध है गुरु और शिष्य के बीच उसे संबंध भी कैसे कहें? क्योंकि जहां दो न बचे वहां कैसा संबंध? मगर वही परम संबंध है। विद्यार्थी से जो यात्रा शुरू हुई थी, वह उसी परम संबंध पर जाकर समाप्त होती है। शिष्य का तो पड़ाव है। इसलिए तीसरा जो रूप है, वह भक्त का है।
विद्यार्थी बाहर-बाहर, परिधि पर, भक्त केंद्र पर; दोनों के मध्य में शिष्य। शिष्य को शब्दों की जरूरत होती है--विद्यार्थी को सिर्फ शब्दों की जरूरत होती है, शिष्य को शब्दों की और शब्दों के साथ शून्य की जरूरत होती है। भक्त को शब्दों की कोई जरूरत नहीं रह जाती, शून्य पर्याप्त होता है।
उपनिषद प्रारंभ होता है शिष्य के साथ और पूर्ण होता है भक्त के साथ। बुद्धि विद्यार्थी बनाती है, हृदय शिष्य बनाता है, और हृदय से भी गहरा जो तुम्हारे प्राणों का प्राण है, तुम्हारी आत्मा है, वह भक्त बनाती है।
भक्त का संबंध आत्मीय है। संबंध नहीं कहना चाहिए। मजबूरी है भाषा की, इसलिए संबंध कह रहा हूं। दो तो मिट गए, दुई गई, अब तो न गुरु है न शिष्य है, एक सन्नाटा है, एक शून्य है, जिसमें दोनों लीन हैं। और तभी असली गुफ्तगू है। वहीं उपनिषद घटे हैं।
उपनिषदों में सच में ही महावाक्य हैं। महावाक्य कहते हैं उन वाक्यों को जो महाशून्य में घटे हों। अनुकंपा है कि किन्हीं ने उन्हें संकलित कर लिया है।
ये चारों महावाक्य बड़े महत्वपूर्ण हैं। पहले तीन, गुरु ने शिष्य से कहे हैं; चौथा, शिष्य समझा है गुरु ने जो कहा है, उसे जीआ है, पहचाना है और अपने पहचान की उदघोषणा की है। चौथा वक्तव्य शिष्य का है। तीन वक्तव्य गुरु के हैं। तीन में गुरु तैयारी करवा रहा है, चौथे में शिष्य ने उदघोषणा की अपनी तैयारी की।
पहला है: ‘तत्वमसि, वह तू है।’ दूसरा: ‘त्वं तदसि, तू वह है।’ तीसरा: ‘त्वं ब्रह्मास्मि, तू ब्रह्म है।’ और चौथा: ‘अहं ब्रह्मास्मि, मैं ब्रह्म हूं।’
तीन गुरु के द्वारा कहे गए वचन हैं--सीढ़ियां--चौथा मंदिर में प्रवेश है। जो चला था खोजी, वह आ गया मंजिल पर। मंजिल पर आने की घोषणा की है उसने गुरु को। यह उसका निवेदन है गुरु के चरणों में कि जो आपने कहा था, जाना, चखा, पीआ, हुआ--‘अहं ब्रह्मास्मि। मैं ब्रह्म हूं।’
फिर ये जो तीन पहले वचन हैं, इनमें भी क्रम है। पहला: ‘तत्वमसि, वह तू है।’
जोर है वह पर। ताकि तू मिट सके। तू को मिटाना है। जितना तू गलेगा, जितना तू मिटेगा, उतना वह विराट होगा, प्रकट होगा प्रखर रूप से, उदघाटित होगा, अनावृत होगा। तू में आच्छादित है। तू को हटाना है, ताकि उसे निर्बाध जाना जा सके।
इसलिए पहला सूत्र है: ‘तत्वमसि, वह तू है।’
याद रख, वह है, असली वह है, तू तो बस छाया है। तू उसकी छाया, उसका प्रतिबिंब। वह आकाश में ऊगा पूर्णिमा का चांद, तू झील में बनी उसकी छाईं, परछाईं। जोर वह पर है।
जब गुरु देखता है कि बात समझ में आ गई, तू खो गया, वह ही शेष रहा, तब दूसरे महावाक्य की उदघोषणा है: ‘त्वं तदसि, तू वह है।’
अब जोर तू पर है। क्योंकि जब तू न रहा, तो वही रहा। जब तू न रहा, तब उसके सिवाय और क्या बचा? तो कहीं भ्रांति न हो जाए कि मुझे छोड़ कर और सब ब्रह्म है। उस भ्रांति को न बनने देने के लिए दूसरा महावाक्य है कि मत घबड़ा; अब तू नहीं है इसलिए इस योग्य हुआ है कि तुझसे कहा जा सकता है कि तू भी वही है। चिंता न कर, यूं न सोच कि और सब परमात्मा है मुझे छोड़ कर। जब सब वही है, तो तू भी सबमें सम्मिलित है। सम्मिलित ही नहीं है, अब यह भी कहा जा सकता है कि तू प्रथम है। क्योंकि सारी यात्रा अपने से ही शुरू होगी। यह जरा बारीक और नाजुक बात है, सूक्ष्म है। जब तू मिट जाए तो फिर तू की बात की जा सकती है। फिर कोई अड़चन नहीं है, फिर कुछ हर्जा नहीं है।
‘त्वं तदसि, तू वह है।’
लेकिन अभी इन दोनों महावाक्यों में वह शब्द का प्रयोग हुआ है। वह शब्द दूरी का प्रतीक है। जैसे हम किन्हीं वस्तुओं की बात कर रहे हों, तटस्थ; जैसे अभी जीवंत ब्रह्म की बात नहीं छेड़ी, अभी थोड़ी-सी दूरी बचा रखी है--कहीं भी कोई खतरा न हो जाए। गुरु तो फूंक-फूंक कर कदम रखता है। खतरे की बहुत संभावना है। क्योंकि हम सदियों-सदियों से, जन्मों-जन्मों से भ्रांति में जीए हैं। हम भ्रांतियों में लिपटे हैं। हमारे रोएं-रोएं में भ्रांति समाई हुई है। हमें धोना है, निखारना है, साफ करना है गुरु को।
कबीर ने कहा है, गुरु तो रंगरेज है। मगर इसके पहले कि वह रंगे, सफाई करेगा, धोएगा, निखारेगा, गंदगी वस्त्र की दूर करेगा। साफ-स्वच्छ हो जाए वस्त्र तो ही रंगा जाए; तो ही रंग अपनी परिपूर्णता में प्रकट होंगे।
जब ये दो बातें पूरी हो गईं, यह बात साफ हो गई कि शिष्य समझ गया कि वह नहीं है, स्वयं नहीं है, अस्तित्व है, तो उससे दूसरी बात कही कि भय मत कर, तू भी वह अस्तित्व है। मगर अभी वह का प्रयोग किया जा रहा है। जब यह भी बात समझ में आ गई कि अस्तित्व, वह सब कुछ है, तो अब बात को थोड़ा और गहराया जा सकता है। अब थोड़ा और भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म में प्रवेश कराया जा सकता है। ‘त्वं ब्रह्मास्मि।’ वह ही नहीं है तू, ब्रह्म भी तू है।
ब्रह्म का अर्थ होता है: अब हमने वह को व्यक्तित्व दिया। वह को चेतना दी, वह को जीवन दिया। अब वह कोई वस्तु न रही, कोई मंदिर की प्रतिमा न रही, अब तटस्थ रहने की कोई जरूरत न रही, अब तैयारी इतनी है कि हम उसको व्यक्ति की भांति स्वीकार कर सकते हैं। अब उसे निर्विकार, निराकार ऐसा कहने की कोई जरूरत नहीं है; वह तो खतरा था तुम्हारे साथ।
अगर पहले यह कहा जाता तो मंदिर की मूर्ति पकड़ जाती। अगर पहले तुमसे कहा जाता: त्वं ब्रह्मास्मि, कि तुम ब्रह्म हो, तो बड़ी अकड़ आ जाती। तब तो भ्रांति होने वाली थी। लेकिन क्रम से, आहिस्ता-आहिस्ता, नेति-नेति, धीरे-धीरे; जैसे कि मूर्तिकार मूर्ति को गढ़ता है। छैनी उठा कर धीरे-धीरे पत्थर को तोड़ता है। जो-जो अनावश्यक है, अलग करता जाता है, तब जो प्रकट हो जाती है मूर्ति। ऐसे तो वह छिपी ही पड़ी थी, पत्थर में छिपी थी, लेकिन अनावश्यक से जुड़ी थी। अनावश्यक अलग हो गया, अब मूर्ति अपनी प्रगाढ़ता में प्रकट हो गई है। अब मूर्ति बन सकती है। अब हम वह शब्द का प्रयोग न करें, अब अस्तित्व को अस्तित्व कहना उचित नहीं, अब प्रकृति कहना उचित नहीं, अब परमात्मा शब्द को लाया जा सकता है।
देखना, कितनी समझपूर्वक एक-एक सूत्र आगे बढ़ रहा है! इससे नास्तिक भी बेचैन नहीं होगा। दो सूत्रों से तो नास्तिक भी राजी हो जाएगा। अस्तित्व के सूत्र हैं, परमात्मा की बात ही नहीं उठाई है अभी। तार्किक भी राजी हो जाएगा। क्योंकि अस्तित्व तो है, यह तो दिखाई ही पड़ रहा है, और मैं भी अस्तित्व हूं, सभी कुछ अस्तित्व है। अस्तित्व यानी समग्रता का नाम।
इन दो सूत्रों से कार्ल मार्क्स को एतराज नहीं होगा, चार्वाकों को एतराज नहीं होगा, इपिकुरस को एतराज नहीं होगा; पदार्थवादी को, विज्ञानवादी को, भौतिकवादी को, किसी को एतराज नहीं होगा। और प्रथमतः सभी लोग वहीं हैं, उसी अवस्था में हैं।
तीसरा सूत्र तो केवल उससे कहा जा सकता है, जिसने दो सूत्र पूरे कर लिए हों।
‘त्वं ब्रह्मास्मि।’
अब गुरु आहिस्ता से कहता है: अब तू पते की बात सुन! अस्तित्व कोई जड़ पदार्थ मात्र नहीं है, ब्रह्म है, चिदानंद है, चैतन्य है। त्वं ब्रह्मास्मि का अर्थ हुआ: तू शरीर नहीं है, तू मन नहीं है, तू आत्मा है।
ये तीन घोषणाएं गुरु की। फिर गुरु प्रतीक्षा करता है। जब शिष्य समझ लेता है, और समझ का यहां अर्थ होता है कि जब पी लेता है, जब डोलने लगता है, जब मस्ती में आ जाता है--तब उसके भीतर से उदघोष होता है--वह उदघोष करता नहीं, उदघोष होता है: ‘अहं ब्रह्मास्मि!’ अनलहक! मैं ब्रह्म हूं!
इन्हें महावाक्य कहा है, क्योंकि इन चार वाक्यों में सब शास्त्र आ जाते हैं। कुछ शेष नहीं बचता। क्या शेष बचा अब और?
लेकिन शर्तें समझ लेना: मैं जाए, तो ही संभावना है यह जानने की कि मैं कौन हूं। मैं जाए, तो ही ब्रह्म आए। और फिर अदभुत अवस्था हो जाती है।
संन्यास उपनिषद में यह अपूर्व श्लोक है। निश्चित अटपटा लगता है। क्योंकि वे चार महावाक्य अभी पूरे नहीं हुए, तो अटपटा लगेगा ही।
आत्मनेऽस्तु नमस्तुभ्यमविच्छिन्न चिदात्मने।
परासृष्टोऽस्मि बुद्धिऽस्मि प्रोदितोऽस्म्यस्यचिरादहम्।।
उद्धृतोऽस्मि विकल्पेभ्यो योऽस्मि सोऽस्मि नमोऽस्तुते।
तुभ्यं मह्यमनन्ताय तुभ्यं मह्यं चिदात्मने।
नमस्तुभ्यं परेशाय नमो मह्यं शिवाय च।।
मुझ अविच्छिन्न रूप आत्मा को नमस्कार है। मैं सदैव परम, प्रत्यक्ष, लब्ध और उदित हूं। मैं विकल्पों से रहित हूं; मैं जो हूं, सो हूं, मुझे नमस्कार है। तू और मैं अनंत हैं, मैं और तू चिदात्मा हैं; (दोनों को) नमस्कार है। मुझ परमेश्वर और मुझ शिव रूप को नमस्कार है।
सहजानंद ठीक ही पूछते हैं कि कैसा अटपटा सूत्र है! मुझको ही नमस्कार है! यह कोई बात हुई! यह तो बड़े अहंकार की घोषणा मालूम पड़ती है।
‘मुझ अविच्छिन्न रूप आत्मा को नमस्कार है।’
संत नानक और कबीर के समय एक जैन फकीर हुए, संत तारण। उन्होंने एक पूरा का पूरा शास्त्र ही लिखा: आत्म-पूजा। अपनी ही पूजा। अपनी ही उतारनी है आरती। धूप-दीप जलाना अपने लिए। फूल चढ़ा लेना अपने ही सिर पर।
यूं तो पागलपन लगेगा, लेकिन अगर चार महासूत्र समझ में आ गए तो फिर पागलपन नहीं लगेगा, फिर तो यह बड़ा प्यारा सूत्र है। क्योंकि कौन नमस्कार करे और किसको नमस्कार करे? यहां एक ही है। वही नमस्कार करने वाला है, उसी को नमस्कार किया जाना है। वही एक दो में बंट कर खड़ा है।
इसीलिए तो इस देश ने नमस्कार का एक अदभुत ढंग निकाला। दुनिया में वैसा कहीं भी नहीं है। इस देश ने कुछ दान दिया है मनुष्य की चेतना को, अपूर्व! यह अकेला देश है जहां जब दो व्यक्ति नमस्कार करते हैं तो दो काम करते हैं। एक तो दोनों हाथ जोड़ते हैं। दो हाथ जोड़ने का मतलब होता है: दो नहीं हैं, एक। दो हाथ दुई के प्रतीक हैं, द्वैत के प्रतीक हैं। उन दोनों को जोड़ लेते हैं कि दो नहीं हैं, एक ही है। उस एक का ही स्मरण दिलाने के लिए दोनों हाथों को जोड़ कर नमस्कार करते हैं। और, दोनों हाथ जोड़ कर जो भी शब्द उपयोग करते हैं, वह परमात्मा का स्मरण होता है। कहते हैं: राम-राम, जयराम, या कुछ भी, लेकिन वह परमात्मा का नाम होता है। दो को जोड़ा कि परमात्मा का नाम उठा। दुई गई कि परमात्मा आया। दो हाथ जुड़े और एक हुए कि फिर बचा क्या; हे राम!
दुनिया में नमस्कार के बहुत ढंग हैं। कहीं हाथ मिला कर लोग नमस्कार करते हैं, कहीं नाक से नाक रगड़ कर नमस्कार करते हैं। और भी पहुंचे हुए लोग हैं--जीभ से जीभ मिला कर नमस्कार करते हैं। कहीं कहते हैं शुभ संध्या या शुभ प्रभात--गुड मार्निंग या गुड इवनिंग।
लेकिन यह देश अकेला है जो दूसरे को छूता ही नहीं, सिर्फ अपने दोनों हाथों को जोड़ देता है। ऐसे एक की उदघोषणा कर देता है और फिर राम का स्मरण करता है। और जय भी बोलता है तो राम की। क्या सुबह की बात करनी! क्या सांझ की बात करनी! सुबहें आती हैं, सांझें आती हैं; सुबहें जाती हैं, सांझें जाती हैं; जो सदा टिका है वह राम है। उसी में सुबह होती है, उसी में सांझ होती है, उसकी बात कर ली तो सबकी बात कर ली। उस एक को मांग लिया तो सब मांग लिया।
एक सम्राट विजय-यात्रा को निकला। सारी दुनिया को विजय करके जब लौटता था, तो उसकी सौ पत्नियां थीं, उसने खबर भिजवाई कि जिसकी जो मांग हो, उसके लिए मैं वही ले आऊं। निन्यानबे पत्नियों ने अपनी-अपनी मांगें भेजीं। किसी ने कहा कोहिनूर ले आना और किसी ने कुछ, किसी ने कुछ। एक पत्नी ने सिर्फ इतनी खबर भेजी कि तुम जल्दी घर लौट आओ, बस! और क्या चाहिए, तुम आ गए तो सब आ गया!
सम्राट सभी के लिए लाया जो जिसने मांगा था। जिन्होंने कोहिनूर मांगे थे, उनके लिए कोहिनूर, हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी के जेवर--जो जिसने मांगा था, सबके लिए ले आया। सबको दे दिए। लेकिन गया उस पत्नी के पास जिसने सिर्फ उसे ही मांगा था।
वे निन्यानबे रानियां हैरान हुईं और उन्होंने कहा कि आप आए इतने लंबे दिनों बाद, क्या कारण है कि आप उस एक पत्नी को सौ में से चुन रहे हैं? वह सबसे सुंदर भी नहीं है। वह सबसे युवा भी नहीं है। सम्राट ने कहा, उसका कारण है कि उसने भर मुझे मांगा। तुमने कुछ और मांगा। तुम्हारा मेरा नाता वस्तुओं का नाता। उसका मेरा नाता हृदय का नाता। तुमने जो मांगा, तुम्हें मिल गया। उसने जो मांगा, मुझे उसे देने दो।
क्या सुबह की जय बोलें! क्या सांझ की जय बोलें! जय बोलनी तो उस एक की बोलनी। मगर वह एक पूजा करने वाले में विराजमान है और जिसकी तुम पूजा करते हो उसमें विराजमान है। इस परम उदघोषणा को यह संन्यास उपनिषद का सूत्र कह रहा है--
आत्मनेऽस्तु नमस्तुभ्यमविच्छिन्न चिदात्मने।
‘मुझ अविच्छिन्न रूप आत्मा को नमस्कार है।’
अटपटा लगेगा, क्योंकि वे चार महाकाव्य अभी पूरे नहीं हुए। अभी अहं ब्रह्मास्मि की घड़ी नहीं आई, इसलिए अटपटा लगेगा। नहीं तो बात बिलकुल सीधी-साफ है।
परासृष्टोऽस्मि बुद्धिऽस्मि प्रोदितोऽस्म्यस्यचिरादहम्।।
‘मैं सदैव परम, प्रत्यक्ष, लब्ध और उदित हूं।’
क्या प्यारे शब्द हैं! ‘मैं सदैव परम!’ मुझसे ऊपर और कुछ भी नहीं। मगर ‘मैं’ छूटे, तुम यह तभी जान पाओगे कि मुझसे ऊपर और कुछ भी नहीं। यह ‘मैं’ की अकड़ बन जाए तो तुमसे नीचे और कुछ भी नहीं। यह मैं की घोषणा हो तो मैं से नीचे और कुछ भी नहीं।
मैं एक अदभुत सीढ़ी है। इसी से नर्क में भी उतर सकते हो, इसी से स्वर्ग में भी प्रवेश कर सकते हो। एक ही सीढ़ी है, एक छोर नर्क में लगा है, एक छोर स्वर्ग में लगा है।
‘मैं सदैव परम।’
जहां ‘मैं’ नहीं हो, जैसे-जैसे ‘मैं’ को छोड़ते गए, वैसे-वैसे परम अवस्था आती चली गई।
‘प्रत्यक्ष...।’
यह शब्द तो बहुत सोचने जैसा है। तुम और सारी चीजों को कहते हो, तुम कहते हो कि मैंने अपनी आंख से देखा, चश्मदीद गवाह हूं, यह बात मेरे सामने हुई, बिलकुल प्रत्यक्ष में हुई। परोक्ष हम कहते हैं जो हमने न देखा; किसी ने कहा। किसी ने तुमसे कहा कि रास्ते पर दो कारें टकरा गईं। यह परोक्ष हुआ। पर के द्वारा खबर मिली। माध्यम से खबर मिली। भरोसे का माध्यम हो तो तुम भरोसा कर लो, भरोसे का माध्यम न हो तो न करो। लेकिन चाहे भरोसा करो चाहे न करो, एक बात साफ रखना कि तुमने नहीं देखा। प्रत्यक्ष नहीं है यह। तुम्हारी आंख के सामने नहीं हुआ।
लेकिन तुम्हारी आंख के सामने भी हो तो भी क्या जरूरी है तुम वही देखो जो हो रहा है?
एडमंड बर्क बहुत बड़ा इतिहासज्ञ हुआ। वह विश्व का इतिहास लिख रहा था। उसने इतिहास लिखने में कोई बीस-बाईस वर्ष खर्च किए थे। और बाईसवें वर्ष यह घटना घटी कि उसके घर के पीछे हत्या हो गई। वह भागा हुआ पहुंचा--शोरगुल सुना, लाश पड़ी थी, अभी आदमी ठंडा भी नहीं हुआ था, अभी खून गर्म था, हत्यारा पकड़ लिया गया था, उसके हाथ में रंगीन छुरा था खून से लहूलुहान, उसके शरीर पर भी खून के दाग थे, राह पर खून की धार बह रही थी और सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठी थी। बर्क पूछने लगा लोगों से कि क्या हुआ? एक ने एक बात कही, दूसरे ने दूसरी बात कही, तीसरे ने तीसरी बात कही। जितने मुंह उतनी बातें। और वे सभी चश्मदीद गवाह थे। उन सबने अपनी आंख के सामने यह घटना देखी थी।
बर्क बड़ी मुश्किल में पड़ गया। बर्क बड़ी चिंता में पड़ गया। वह घर के भीतर गया और उसने बाईस साल मेहनत करके जो इतिहास लिखा था उसमें आग लगा दी। उसने कहा, मेरे घर के पीछे हत्या हो, आंख से देखने वाले लोगों का समूह हो, और एक आदमी दूसरे से राजी न हो कि हुआ क्या, कैसे हुआ, हर एक की अपनी कथा हो--और मैं इतिहास लिखने बैठा हूं सारी दुनिया का! प्रथम से, शुरुआत से! क्या मेरे इतिहास का अर्थ?
हम वही देख लेते हैं जो हम देखना चाहते हैं। उसमें कोई हत्यारे का मित्र था, उसे बात कुछ और दिखाई पड़ी। उसमें कोई जिसकी हत्या की गई थी उसका मित्र था, उसे कुछ बात और दिखाई पड़ी। जो तटस्थ था, उसे कुछ बात और दिखाई पड़ी। सब प्रत्यक्ष गवाह थे। मगर क्या गवाही दे रहे थे!
उपनिषद के हिसाब से, समस्त जाग्रत पुरुषों के हिसाब से प्रत्यक्ष तो सिर्फ एक चीज है, वह तुम्हारी आत्मा है। बाकी सब परोक्ष है। क्यों? क्योंकि मन खबर देगा न! मन तो बीच में आ जाएगा, मन पर है। मन कहेगा, ऐसा हुआ। मन व्याख्या करेगा।
बुद्ध ने एक रात समझाया लोगों को कि तुम जितने लोग यहां हो उतनी ही बातें सुन रहे हो। बोलने वाला तो मैं एक हूं, लेकिन चूंकि सुनने वाले अनेक हैं, इसलिए बातें अनेक हो जाती हैं। जैसे एक ही आदमी खड़ा हो और बहुत दर्पण लगे हों, तो बहुत तस्वीरें बनेंगी। फिर दर्पण-दर्पण अपने ढंग से तस्वीर बनाएगा।
तुमने कभी वे दर्पण देखे होंगे किसी सर्कस में, किसी म्यूजियम में, कोई दर्पण तुम्हें लंबा कर देता है, कोई मोटा कर देता है, कोई छोटा कर देता है, कोई तिरछा कर देता है। किसी में तुम अष्टावक्र मालूम पड़ते हो। किसी में आदमी कम, ऊंट ज्यादा मालूम पड़ते हो। किसी में एकदम बिजली का खंबा हो जाते हो। और किसी में इतने मोटे, इतने ठिगने, कि तुम्हें भरोसा ही न आए कि यह क्या हुआ? और सभी दर्पण हैं। और सभी एक ही कक्ष में सजे हैं। सब अलग-अलग बता रहे हैं।
मन तो दर्पण है। और हर एक के पास अलग मन है।
बुद्ध ने कहा, जितने तुम यहां लोग हो, उतनी ही बातें सुन रहे हो। दूसरे दिन सुबह आनंद ने पूछा कि यह बात मेरी कुछ समझ में आई नहीं। जब आप कहने वाले एक हैं और शब्द आपके हम सुन रहे हैं, तो वही शब्द तो सुनेंगे न जो आपने कहे हैं!
बुद्ध ने कहा, पागल, तू यूं समझ! कल रात--तू जा पता लगा ले--कल रात की सभा में जब मैंने यह कहा तो मेरे जो भिक्षु थे, उन्होंने एक बात समझी; एक चोर भी आया था, उसने दूसरी बात समझी; एक वेश्या भी आई थी, उसने तीसरी बात समझी।
बुद्ध का नियम था कि रोज रात को प्रवचन के अंत में वे कहते थे, अब जाओ, दिन का अंतिम कार्य पूरा करो। भिक्षुओं ने समझा कि अब जाएं और ध्यान करें; क्योंकि वह दिन का अंतिम कार्य था। समाधिस्थ हों और फिर उसी समाधि में डूबते-डूबते निद्रा में डूब जाएं। ध्यान करते-करते नींद में उतर जाना सारी नींद को समाधि बना लेना है। तो छह घंटे सोओ, आठ घंटे सोओ, वे आठ घंटे परम समाधि में गए। तुमने उनका उपयोग कर लिया। तुमने नींद को भी व्यर्थ न जाने दिया। लोग तो यहां जागरण को भी व्यर्थ जाने दे रहे हैं, तुमने नींद का भी उपयोग कर लिया। तुमने नींद के समय में भी अमृत ढाल लिया।
तो मेरे भिक्षुओं ने, बुद्ध ने कहा, समझा कि अब हम उठें; वे उठे कि अब जाएं ध्यान करें, सोने का समय हो गया। चोर एकदम से चौंका, उसने कहा कि मैं भी कहां की बातों में पड़ा हूं! अरे, जाऊं अपने काम में लगूं! और वेश्या ने कहा कि अदभुत हैं ये बुद्ध भी! इन्हें कैसे पता चल गया कि मैं भी आई हुई हूं? क्या कहते हैं कि जाओ, अपने काम में लगो! अब अपना आखिरी काम करो!
वेश्या अपने धंधे पर गई, चोर अपने धंधे पर गया, भिक्षु अपने धंधे पर चले गए।
बुद्ध ने आनंद से कहा, तू न माने तो जाकर पूछ ले। आनंद बड़ा जिज्ञासु था! वह अंत तक विद्यार्थी बना रहा। बहुत साथ रहा बुद्ध के, लेकिन शिष्यत्व सधा उसका बुद्ध की मृत्यु के बाद। कभी-कभी निकटता भी बाधा हो जाती है। आदमी बड़ा अजीब है! कभी-कभी दूरी सहयोगी हो जाती है, निकटता बाधा हो जाती है। वह चचेरा भाई था बुद्ध का। यही खतरा हो गया। चचेरा भाई ही नहीं था, बड़ा भाई भी था। तो वह अकड़ उसमें बनी ही रही कि अरे, है तो मेरा ही भाई! और फिर मैं बड़ा भाई! दोनों साथ पढ़े, दोनों साथ बढ़े; शिकार खेला, लड़े-झगड़े; कभी उसने बुद्ध को चारों खाने चित भी कर दिया होगा। भाई ही थे! एक ही महल में बड़े हुए थे।
फिर बुद्ध जब ज्ञान को उपलब्ध हुए, तब भी उसने अपनी अकड़ न छोड़ी। आया तो, झुका तो, लेकिन झुकने के पहले उसने कहा कि तू सुन; सिद्धार्थ, तू सुन! जब तक मैं तेरा भिक्षु नहीं हुआ हूं तब तक मैं तेरा बड़ा भाई हूं, तू मेरा छोटा भाई है; तब तक मैं जो कहूं, उसको सुन और मैं जो कहूं, उसको मान। फिर तो मैं भिक्षु हो जाऊंगा, तेरा शिष्य हो जाऊंगा, फिर पुराना नाता तो समाप्त हो जाएगा, फिर मैं तेरी सुनूंगा और तेरी मानूंगा। इसके पहले कुछ बातें तय हो जानी चाहिए। देख, ये मेरी कुछ शर्तें हैं।
पहली शर्त तो यह कि भिक्षु हो जाने के बाद मुझे कभी तू अपने से दूर न भेज सकेगा। यह मेरी आज्ञा है। तू छोटा भाई है, तुझे माननी ही होगी। तू मुझे कभी भेज न सकेगा दूर। तू यह न कह सकेगा कि आनंद, अब तू जा और कहीं प्रचार कर, प्रसार कर। मैं तो साथ ही रहूंगा। दूसरी बात, मैं तो उसी कमरे में सोऊंगा जिसमें तू सोएगा। मैं रत्ती-पल को भी दूर नहीं होना चाहता। तीसरी बात, मैं जो भी पूछूंगा, उसका तुझे उत्तर देना होगा। जैसा तू औरों से कहता है कि साल भर बाद पूछना, कि दो साल चुप रहो, फिर पूछना, यह मेरे साथ न चलेगा। आखिर मैं तेरा भाई! आखिर तेरा बड़ा भाई! और चौथी बात कि अगर आधी रात को भी मैं किसी को ले आऊं, तो तुझे मिलना पड़ेगा। क्योंकि मैं तेरे साथ रहूंगा, लोग मुझसे प्रार्थना करेंगे कि मिलवा दो; अगर मुझे लगा कि किसी को मिलवाना जरूरी है, तू मुझे रोक न सकेगा। आधी रात जगा कर भी, तो भी तू यह न कह सकेगा कि यह क्या करते हो? ये चार तू वचन दे दे; फिर मैं दीक्षा ले लेता हूं, फिर मैं समर्पण कर देता हूं।
तो बुद्ध ने ये चार वचन दिए। उनकी करुणा, इसलिए चार वचन दिए, कि चल, इस बहाने ही सही, मगर तू दीक्षित तो हो, फिर पीछे निपट लेंगे। मगर वह अकड़ जो बनी रही बनी रही। बुद्ध के जीते-जी न मिटी। वह जिज्ञासु ही रहा, विद्यार्थी ही रहा; ज्यादा से ज्यादा नाता उसका उतना ही बना।
उसने पूछा जाकर--आम्रपाली नाम की वेश्या के पास गया जो रात आई थी और उसने पूछा कि क्या तेरे मन में ऐसा हुआ था? आम्रपाली ने कहा, यह तो हद हो गई। एक तो उन्हें कैसे पता चला कि मैं आई हूं! और यह कैसे पता चला कि मेरे मन में भी ये विचार उठे! सच कहते हैं वे। यही विचार उठे। जैसे ही उन्होंने कहा कि जाओ, अब रात्रि का अंतिम कार्य करो, मैं एकदम कपड़े झाड़ कर खड़ी हो गई। मैंने कहा, मैं भी कहां रात गंवाए दे रही हूं, प्यारी रात है, ग्राहक आ गए होंगे।
आम्रपाली बड़ी सुंदरी थी। नगरवधू थी। दूर-दूर से राजा और सम्राट उसके द्वार पर आते थे। वह अपने रथ पर बैठी और वापस गई। और सच में वहां मेहमान खड़े थे आकर। गुहार मची थी कि आम्रपाली कहां है? आज कहां गई आम्रपाली?
आनंद ने जब उससे जाकर यह पूछा कि क्या तेरे मन में ऐसा हुआ था और उसने कहा, हां, हुआ था, तो आनंद के साथ-साथ वह खुद भी आई बुद्ध के चरणों में, उसने दीक्षा ले ली। उसने कहा कि आपने रात भी मुझे पहचान लिया और पकड़ लिया। और इतना ही नहीं कि बाहर से पहचाना और पकड़ा, भीतर से भी पहचाना और पकड़ा। अब इन चरणों के सिवाय मेरे लिए कहीं और कोई शरण नहीं है। अब कहीं नहीं जाना है। अब सब धंधा समाप्त; अब सब काम समाप्त। मुझ अपात्र को स्वीकार कर लें।
आनंद तो उस चोर के पास भी गया। और वह चोर भी दीक्षित हो गया। और आनंद ने बुद्ध से कहा कि आपने भी हद कर दी! कहीं ऐसा तो नहीं है कि मुझे जो यह जो जिज्ञासा हुई कि मैं जा-जा कर पूछूं इस चोर से, इस वेश्या से, वह भी आपकी ही तरकीब रही हो! क्योंकि ये दोनों आ गए और डूब गए! और मैं तो अभी भी किनारे पर खड़ा हूं सो किनारे पर खड़ा हूं! भौचक्क, कि यह क्या हुआ, कैसे हुआ?
वह आखिर तक भौचक्क रहा।
प्रत्यक्ष तो सिर्फ आत्मा ही हो सकती है। शेष सब में तो मन आ जाएगा।
इसलिए यह सूत्र प्यारा है: ‘मैं सदैव परम, प्रत्यक्ष, लब्ध!’
क्या अदभुत बात है! लब्ध अर्थात सदा उपलब्ध। ऐसा एक क्षण भी न था जब तुम परमात्मा न थे। ऐसा एक भी क्षण कभी नहीं होगा जब तुम परमात्मा न होओगे। अभी भी तुम परमात्मा हो--जानो, न जानो! पहचानो, न पहचानो! भूलो, भटको! मगर बदल नहीं सकते। लाख उपाय करो, तुम जो हो सो हो।
यह संन्यास उपनिषद का श्लोक कहता है: ‘लब्ध और उदित हूं।’
और भीतर सूर्य निकला ही हुआ है। जरा आंख भीतर ले जाओ, और रोशनी ही रोशनी है। कहीं कोई अंधकार नहीं है।
‘मैं विकल्पों से रहित हूं; मैं जो हूं सो हूं’--उससे अन्यथा न हुआ हूं, न हो सकता हूं--‘मुझे नमस्कार है।’
अब ऐसी अदभुत रहस्य की अनुभूति को नमस्कार न करोगे? क्या सिर्फ इस कारण रुक जाओगे कि कैसे अपने को नमस्कार करूं? अरे, कहां अपना, कहां पराया, ऐसी अपूर्व अनुभूति को तो नमन करना ही होगा, झुकना ही होगा।
‘तू और मैं अनंत हैं, मैं और तू चिदात्मा हैं; (दोनों को) नमस्कार है। मुझ परमेश्वर और मुझ शिवरूप को नमस्कार है।’
अगर उपनिषद के चार महावाक्य समझ में आ गए, तो फिर संन्यास उपनिषद का यह अटपटा-सा सूत्र भी कठिन नहीं रह जाता है। इन पर ध्यान करना। इनमें डूबना। इनमें सीढ़ी-सीढ़ी उतरना। क्योंकि यही है मार्ग।
और जब तक इस मार्ग पर कोई चले न और जब तक अहं ब्रह्मास्मि की अंतिम उदघोषणा न हो जाए, तब तक अतृप्ति रहेगी, असंतोष रहेगा, विषाद रहेगा, संताप रहेगा; तब तक नर्क है और नर्क ही रहेगा। इस उदघोषणा के साथ ही तुम्हारे जीवन के फूल खिल जाएंगे, सुगंध ही सुगंध हो जाएगी, वीणा बज उठेगी; अनाहत का नाद होने लगेगा, अमृत की झड़ी लग जाएगी। एक नहीं, जैसे हजार सूर्य एक साथ उदित हो गए हों। और झड़ी ऐसी नहीं कि एक दफा शुरू हुई तो बंद हो जाए। फिर अमृत बरसता ही रहता है। वेद कहते हैं: अमृतस्य पुत्रः! तुम हो अमृत के पुत्र। मगर भूल गए हो, भटक गए हो, सो गए हो। नींद में हो, जागो!
उनसे जब दिल की बात होती है
बज्म में कायनात होती है
लब को महसूस तक नहीं होता
आंखों आंखों में बात होती है
भूल जाते हैं सिर्फ अपनी ही
वरना दुनिया की बात होती है
एक रात उनकी है--खुदा रखे
एक अपनी भी रात होती है
उनसे जब दिल की बात होती है
बज्म में कायनात होती है
उपनिषद दिल की बातें हैं।
लब को महसूस तक नहीं होता
ओंठों को पता भी नहीं चलता।
लब को महसूस तक नहीं होता
आंखों आंखों में बात होती है
शिष्य और गुरु के बीच कुछ हो जाता है।
लब को महसूस तक नहीं होता
आंखों आंखों में बात होती है
उनसे जब दिल की...
यह नाता प्रेम का है, परम प्रेम का है। सब प्रेम छोटे पड़ जाते हैं इस नाते के समक्ष। सब प्रेम बड़े क्षुद्र हैं, बड़े सीमित हैं, सिर्फ गुरु और शिष्य के बीच जो घटित होता है वह विराट है, विशाल है, असीम है।
ओशो, आज के प्रवचन के पश्चात मंच की सीढ़ियां उतरते समय जैसे ही आपने कहा, ‘सोहन!’ मानो पूरे बुद्ध हाल में लहर-सी दौड़ गई। उस एक शब्द से कई के हृदय की वीणा जैसे आपने छेड़ दी। एक अजीब-सा दृश्य छा गया। हमारे ओंठों पर हंसी और आंखों में आंसू थे। मा सोहन व माणिक बाबू की स्थिति तो देखते ही बनती थी! दत्ताबाल जैसा कटु विषय सामने होते हुए भी आप क्या जादू कर देते हो ओशो कि उसका भी अमृत में रूपांतरण हो जाता है?
और तुम्हारी हृदय की वीणा तैयार तो कर रहा हूं। रोज उसी की तैयारी चल रही है। वीणा तैयार हो तो कोई भी बहाना उसे छेड़ दे सकता है। हवा का झोंका भी उसके तारों को झनझना दे सकता है। वीणा तैयार है, इसलिए ऐसी घटना घट जाती है।
यहां कोई भीड़ तो नहीं है। यहां हर कोई के लिए तो मार्ग नहीं है। यह तो दीवानों की बस्ती है। यह तो परवानों का मेला है। और इसलिए, तुम कहते हो कि हमारे ओंठों पर हंसी और आंखों में आंसू थे। दोनों बातें तो सिर्फ पागलों को ही घटती हैं--हंसना भी और रोना भी। मगर एक ऐसा पागलपन भी है जो सारी समझदारी से ऊपर है। और जिसे पाने के लिए सारी समझदारी चुका देनी पड़े तो कुछ महंगा सौदा नहीं है।
अहले-खिरद क्या जाने दिल को इनकी भी मजबूरी है
इश्क में कुछ पागल-सा होना शायद बहुत जरूरी है
चलते-चलते युग बीते हैं दिल की नाजुक राहों में
वक्ते-सफर तो हमने सुना था: दो कदमों की दूरी है
इश्क में कुछ पागल-सा होना शायद बहुत जरूरी है
अक्ल भला क्या सुलझाएगी दिल के उलझे तारों को
अहले-खिरद से अहले-जुनूं तक तर्जो-शमा की दूरी है
इश्क में कुछ पागल-सा होना शायद बहुत जरूरी है
कहते हैं इन्सां को बुरा जो पीर-ओ-पयम्बर कहने दो
आदमे-खाकी उसकी नजर में नूरानी है, नूरी है
इश्क में कुछ पागल-सा होना शायद बहुत जरूरी है
नाकामी को अपने घर से ‘अंजुम’ मत जाने देना
उस पै खुदा आशिक होता है जिसकी आस अधूरी है
इश्क में कुछ पागल-सा होना शायद बहुत जरूरी है
अहले-खिरद क्या जाने दिल को इनकी भी मजबूरी है
इश्क में कुछ पागल-सा होना शायद बहुत जरूरी है
यह तो पागलों की बस्ती है; रिंदों की जमात है। यहां तो पियक्कड़ बैठे हैं। कोई भी बहाना--कोई भी बहाना पर्याप्त है। वीणा के तार छिड़ जाएंगे। रोके न रुकेंगे। बजते ही चले जाएंगे। रोकना भी चाहोगे तो न रुकेंगे। आंसू भी बहेंगे, ओंठों पर हंसी भी होगी। और जब ये दोनों साथ होते हैं, तो जादू घटता है। वह जादू मेरा नहीं है। वह जादू तुम्हारा है। तुमने तैयारी की है मेरे साथ पागल होने की, इसलिए घट रहा है।
ओशो, प्रणाम स्वीकार करें! भरपूर प्रसाद बरसाया आपने, और चक्कर में भी डाल दिया। पहले तो लस्सी पिला कर गर्दन सीधी करवा दी, ऊपर से रसमलाई--अरे गजब! और अब जब कि सीधी गर्दन का आनंद आने लगा है तो कहते हैं कि इसे टेढ़ी ही रखो! सदगुरुदेव, नुस्खा बड़ा मसालेदार है; कृपया, चक्कर में पड़े इस घनचक्कर को मार्गदर्शन दें।
स्त्रियां हर चीज का हिसाब रखती हैं। शुरू से ही यह चल रहा है।
कहते हैं, जब ईश्वर ने अदम और हौवा को बनाया तो वे दोनों ही थे। ईदन के बगीचे में उनके अलावा कोई भी न था। फिर भी जरा भी देर हो जाती अदम को आने में, तो हौवा एकदम वही करती जो अभी भी हौवाएं करती हैं। कि कहां थे? इतनी देर क्यों लगी? अदम लाख समझाता कि भई, तेरे सिवाय तो यहां कोई है ही नहीं, जाऊंगा भी तो कहां जाऊंगा! अरे, जरा मस्त मौसम था, जरा धीरे-धीरे चल कर चला आ रहा था। इसमें इतनी क्या बेचैनी की बात है? मगर कहानी यह कहती है कि जब रात अदम सो जाता तो हौवा उसकी पसलियां गिनती। क्योंकि ईश्वर ने हौवा को अदम की एक पसली से बनाया था। तो वह पसलियां गिन लेती कि पूरी हैं या नहीं? कहीं और स्त्री तो नहीं बना दी ईश्वर ने? एकाध पसली निकाल कर और बना दी हो! भरोसा नहीं आता था, रोज रात पसलियां गिन लेती थी कि हां, जब पूरी हैं तभी सोती थी।
तो तुम्हारी पत्नी लौटेगी, सुभाष, और देखेगी गर्दन सीधी है, कहेगी: किसने तुम्हारी कुंडलिनी जगाई? गर्दन सीधी कैसे हुई? जब मैं थी तब तो तिरछी ही रहती थी! जरूर तुम गुलछर्रे उड़ा रहे थे। इसलिए मैंने कहा कि गर्दन यूं तो सीधी ही रखो--अब हो ही गई सीधी तो अच्छा हुआ--मगर जब पत्नी आए, जैसे ही खबर मिले कि आ रही हूं, गर्दन टेढ़ी कर लेना। वही उदास चेहरा, जो कि हर पति को बनाए रखना पड़ता है, वही गंभीर उदासी! क्योंकि पत्नी अगर देख ले कि प्रसन्न हो तो उसका मतलब है कि मामला कुछ गड़बड़ है! प्रसन्न क्यों हो? प्रसन्न हो मतलब जिंदगी में कोई और स्त्री कहीं से आ रही है। और आदमी प्रसन्न तभी होता है जब नई-नई स्त्री आती है। फिर तो कभी प्रसन्न होता नहीं!
तो स्त्रियों को गणित पता है। इसलिए तुमको थोड़ा सावधान किया कि यह अभ्यास एकदम मत छोड़ देना! ऐसा थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करते रहे; सुबह बैठ गए, पत्नी की याद की, गर्दन तिरछी कर ली, उदास होकर बैठ गए आईने के सामने! बस, थोड़ा-सा अभ्यास जारी रखना। तो जब आए तो काम पड़े। नहीं तो एकदम सीधी गर्दन किए खड़े रहे तो वह तिरछी कर देगी--सदा के लिए तिरछी कर देगी! फिर न लस्सी काम आएगी, न बूंदी काम आएगी, न रसमलाई, कुछ भी नहीं!
मम्मी ने
डैडी को मारा
तो बच्चे ने
पड़ोस के अंकल को
सहायता के लिए
पुकारा
अंकल बोले--बेटे,
अपने घरेलू मामले में
हमें न उलझाओ।
हो सके तो जाओ
और अपनी
आंटी को समझाओ।
पत्नी पराक्रम की
देकर दुहाई
तुम्हारी आंटी
सुबह से तीन बार
कर चुकी हैं
हमारी पिटाई।
टिल्लू गुरु अपने बाप चंदूलाल से पूछ रहे थे: ‘पापा, आप अंधेरे से डरते हैं?’
चंदूलाल ने कहा: ‘नहीं बेटा, कभी नहीं। अरे, क्यों डरूंगा अंधेरे से? तूने क्या मुझे कायर समझा है?’
टिल्लू गुरु ने कहा: ‘बादल, बिजली और शेर से डरते हैं?’
चंदूलाल ने कहा: ‘अरे, किसी से नहीं डरता। गरजता रहे बादल, दहाड़ता रहे शेर, चमकती रहे बिजली!’
टिल्लू गुरु ने कहा: ‘बिलकुल नहीं डरते?’
चंदूलाल ने कहा: ‘बिलकुल नहीं डरता!’
तो टिल्लू गुरु ने कहा: ‘इसका मतलब है आप मम्मी को छोड़ कर किसी से नहीं डरते।’
मम्मी से तो डरना ही पड़ता है।
चंदूलाल की शादी हुई तो ढब्बूजी को कह रहे थे कि जिस दिन मेरी पत्नी मेरे घर आई, उसी दिन मेरे यहां चोरी हुई। ढब्बूजी बोले: ‘बूढ़ों ने ठीक ही कहा है, अरे, सयाने पहले ही कह गए कि मुसीबत कभी अकेली नहीं आती।’
चंदूलाल और उनकी पत्नी में भयंकर लड़ाई हुई और पत्नी ने पति की खूब पिटाई की और कहा: ‘मैं जा रही हूं मायके। जाते ही तलाक के लिए मुकदमा करूंगी।’
चंदूलाल बोले: ‘जा-जा! ऐसी मीठी-मीठी बातें न कर!’
मीठी-मीठी बातें!
‘तू मुझे रिझाने की नाहक कोशिश न कर! जब देखो तब वायदे! वायदे ही वायदे, कोई वायदा पूरा नहीं होता!’
मुल्ला नसरुद्दीन और चंदूलाल शिकार को गए थे। चंदूलाल नए-नए थे। एक तो मारवाड़ी बेचारे! बंदूक पकड़ना भी न आए। किसी तरह बंदूक पकड़ी, किसी तरह बंदूक चलाई। बंदूक तो चल गई, लेकिन मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी के बिलकुल पास से गोली निकली। मार तो वे रहे थे आकाश में उड़ते हुए बगुले को--और जमीन पर बैठी पत्नी!
नसरुद्दीन तो बहुत नाराज हुआ। उसने कहा: ‘अबे चंदूलाल के बच्चे, तुझे बंदूक अधिक सावधानी से चलानी चाहिए! तेरी गोली मेरी पत्नी को लगते-लगते बच गई!’
चंदूलाल ने कहा कि ‘बड़े मियां, नाराज होने की कोई बात नहीं, यह बंदूक लो, आप मेरी पत्नी पर दो बार गोली चलाओ! बस, मेरा नाम भर मत बताना! मैंने कुछ भी नहीं कहा है। मैं इस बात में ही नहीं हूं। मैं इसके बिलकुल बाहर हूं।’
मगर बड़ी मुसीबत है। पत्नी हो तो मुसीबत, न हो तो मुसीबत। न हो तो बड़ी याद आती है। पत्नी मायके क्या जाती है, लोग क्या-क्या प्यारे-प्यारे पत्र लिखते हैं!
अब ये सुभाष ही लिख रहे होंगे--रोज! खुद न बनता होगा तो पास-पड़ोस के संन्यासियों से लिखवा रहे होंगे कि भैया, प्यारी-प्यारी बातें लिख दो; मुझसे तो नहीं लिखी जातीं, क्योंकि डर भी लगता है! और न लिखो तो भी डर लगता है।
भटक रहे हैं गली-गली बंजारे गंगाराम
शाला के सन्मुख बेचें गुब्बारे गंगाराम
पत्नी गई प्रसव में, संग-संग गया आंख का तारा
आंगन में रहता है तब से लगातार अंधियारा
बड़े मुखर थे, मौन हुए मन-मारे गंगाराम
जीवन की बाजी में सब कुछ हारे गंगाराम
आ-ई के जमघट में खुशियां बांट रहे हैं
बीड़ी पीते हुए जाग कर रातें काट रहे हैं
असमय लगते हैं बूढ़े बेचारे गंगाराम
कल कोरस थे आज हुए इकतारे गंगाराम
पत्नी चली जाए तो कोरस इकतारा हो जाता है। और पत्नी आए तो कोरस कहां, बाजार का धूम-धड़क्का, हंगामा मच जाता है! कोरस हर हालत में खो जाता है। साथ रहना मुश्किल, दूर रहना मुश्किल। आदमी की मुसीबत तो देखो! परमात्मा ने भी कैसा आदमी को उलझाया! इसको कहते हैं लीला! तुमको तो मैं सिर्फ सावधान कर रहा था कि लीला से सावधान रहना!
अब तुम कह रहे हो, ‘सदगुरुदेव, आपने बड़ा मसालेदार नुस्खा बताया। कृपया, चक्कर में पड़े इस घनचक्कर को मार्गदर्शन दें।’
अभी तो तुम्हें सिर्फ रसमलाई का नुस्खा बताया। तुमसे मैंने कहा कि सोहन दिखाई पड़े, फौरन: ‘जय हो माई! रसमलाई!’ और एकदम चरण छू लिए। और अगर उसके पति साथ हों, तो खयाल रखना, जब बहती गंगा हो तो हाथ धो ही लेना, एकदम उनके पैरों पर भी गिर पड़ना। मगर उनका मंतर अलग है! जंतर-मंतर अलग-अलग होते हैं हर देवी-देवता के। उनसे मत कह देना ‘जय हो माई, रसमलाई’, नहीं तो और पिटाई हो जाए!...हो जाए पिटाई! वह मंतर काम न आए! अगर माणिक बाबू साथ हों, एकदम उनके पैर पर भी गिर पड़ना और कहना: ‘जय हो लाला! करांची वाला!’ अलग-अलग मंतर अलग-अलग देवी-देवता के।
अभी तो तुमको आधा मंतर बताया। जब बहुत रसमलाई तुम में हो जाए और जी घबड़ाने लगे, बेचैनी बढ़ने लगे...। जैसे देखा नहीं, दत्ताबाल को डायबिटीज हो गई बेचारों को, और बेचैनी होती है! तो जब रसमलाई बहुत हो जाएगी तो डायबिटीज होगी। फिर बेचैनी होगी। तो फिर माणिक बाबू तुमको समोसे, पकौड़े, बड़े--पुरुष जातीय चीजें खिलाएंगे। उससे सब ठीक हो जाएगा। तुम घबड़ाओ मत! अगर चक्कर में डालूंगा तो चक्कर से निकलने का नुस्खा भी बताऊंगा।
ओशो, पुराणों में जैसी कथाएं हैं वैसी घटनाएं अब क्यों नहीं घटतीं?
कपटवस्तु नामक एक गांव में लुट्टोधन नाम का एक चमार रहता था। परिवार-नियोजन के विभिन्न साधनों के बावजूद भी बुढ़ापे में उसकी पत्नी गर्भवती हो गई और बच्चे के प्रसव के तुरंत बाद चल बसी। पंडित पोपटमल ज्योतिषी ने बताया कि बच्चा होनहार है। या तो यह महान ख्याति प्राप्त साधु बनेगा या फिर बड़ा भारी अंतर्राष्ट्रीय डाकू।
लुट्टोधन ने पूछा: ‘हे गुरुदेव, मैं अपने बटे को डाकू होने से बचाने के लिए क्या करूं?’
पोपटमल बोले: ‘इसे इस तरह से पालो-पोसो कि इसे चोर-डाकू आदि के विषय में पता ही न चले।’
लुट्टोधन ने वैसा ही किया। अपनी रखैल को आज्ञा दी कि बालक को कभी चोर-डाकुओं की कहानियां न सुनाना। मोहल्ले में अगर कभी चोरी वगैरह हो जाए तो इसे इसके मामा-नाना के यहां छोड़ आना--आठ-आठ, दस-दस दिन के लिए।
रखैल ने वाकई में बच्चे को अपने सगे लड़के की तरह पाला। उसे साधु-महात्माओं के चरणों में भेजा। ‘जय जगदीश हरे’ की आरती और गणेश जी की प्रार्थना करवाई। बच्चे को स्कूल पढ़ने नहीं भेजा इस डर से कि कहीं गलत संग-साथ में न पड़ जाए। किंतु लड़का तो होनहार था, विधाता के लिखे को भला कोई कैसे बदल सकता है! आठ-दस साल की उम्र होते-होते उसके लक्षण प्रकट होने लगे। लोगों ने उसे धूर्तराज कहना शुरू कर दिया।
बाप ने सोचा कि बेटा तो बिगड़ा जा रहा है, अतः उसका बाल-विवाह कर दिया, ताकि घर-गृहस्थी की झंझट में पड़ कर सब धमा-चौकड़ी भूल जाए। किंतु परिणाम उलटा हुआ। धूर्तराज की बीबी भगोदरा इतनी झगड़ालू थी कि बेचारा धूर्तराज घर से भागने के संबंध में दिन-रात सोचने लगा।
उनतीस वर्ष की अवस्था में जब धूर्तराज अपने दोस्त के साथ रैदास जयंती समारोह में भाग लेने पड़ोस के शहर में जा रहा था, तो रास्ते में एक बड़ी-बड़ी मूंछों वाले पहलवान को हाथ में डंडा लिए अकड़ कर चलते हुए देख कर उसने अपने मित्र से पूछा, ‘यह आदमी इस तरह क्यों चल रहा है? क्या इसकी कमर अकड़ गई है?’ दोस्त ने कहा, ‘नहीं यार, यह तो दादा लफंगानाथ है। रंगदारों का गुरु है। काम-धाम कुछ नहीं, हराम का दूध-दही खाता है और लोगों को डराता-धमकाता है।’ धूर्तराज ने पूछा, ‘क्या मैं भी इसी तरह का जीवन जी सकता हूं? जूता सीते-सीते तो मैं तंग आ गया।’ दोस्त ने कहा, ‘क्यों नहीं, आज से ही डंड-बैठक लगाना शुरू कर दो। जनता को डराना-धमकाना शुरू कर दो।’
रास्ते में आगे चलने पर एक पचासी वर्ष का बुड्ढा मिला जो चुस्त चूड़ीदार पाजामा और खूबसूरत अचकन में मात्र पच्चीस साल का नौजवान पट्ठा लग रहा था। धूर्तराज ने प्रश्न किया, ‘इस खूसट की उम्र न ढलने का क्या राज है?’ दोस्त ने समझाया, ‘यह भूतपूर्व प्रधानमंत्री है। फिर से प्रधानमंत्री बनने की आशा में जीता है। खुद का ही ‘जीवनजल’ पीता है। इसी कारण इस आयु में भी दंद-फंद मचाने से बाज नहीं आता। छोकरों को भी मात देता है। यदि तुम्हें भी सदाबहार जवानी चाहिए हो तो अभी से कुछ दंद-फंद मचाना शुरू करो। जूतों की सिलाई में समय व्यर्थ न करो।’
आगे चल कर देखा ‘राम नाम सत्य है’ का उदघोष करती एक भीड़ के आगे चार लोगों के कंधों पर रखी पालकी पर बैठे एक मोटे-ताजे काले-कलूटे महाशय आ रहे थे। धूर्तराज ने कहा, ‘आश्चर्य है! यह आदमी तो जिंदा है, इसे अरथी पर क्यों रख दिया गया है?’ दोस्त ने बताया, ‘यह अरथी नहीं, ढब्बू! अरे बच्चू, नेता जी की शोभा-यात्रा की पालकी है!’ धूर्तराज ने प्रश्न किया, ‘फिर ये लोग राम नाम क्यों ले रहे हैं?’ जवाब मिला, ‘यह तो मंत्री जी का शुभ नाम है, बाबू जगजीवन राम। ये भी अपनी ही जाति के आदमी हैं और आज रैदास जयंती समारोह का उदघाटन करने के लिए आए हैं। अगर मेहनत करो तो तुम भी एक दिन उनके समान महान नेता बन कर नाम कमा सकते हो।’
शोभा-यात्रा से गुजर जाने के बाद धूर्तराज ने देखा, एक शुभ्र, श्वेत खादीधारी आदमी हाथ में माला और मुंड पर विनम्रता का भाव लिए जय बाबूजी, जय बाबूजी का उच्चार करता हुआ भागा जा रहा है। धूर्तराज ने सवाल किया, ‘और यह व्यक्ति कौन है? यह इस तरह श्वेत वस्त्र क्यों पहने है?’ मित्र ने बताया, ‘यह आदमी चमचा है। नेताजी की सेवा करने जा रहा है। यदि नेताजी प्रसन्न हो गए इसकी भक्ति से तो इसे अपने साथ दिल्ली ले जाएंगे और वरदानस्वरूप मुंहमांगी मुराद पूरी कर देंगे।’ धूर्तराज ने कहा, ‘क्या मैं भी ऐसा कर सकता हूं?’ दोस्त ने उत्तर दिया, ‘क्यों नहीं!’ इतना सुनते ही धूर्तराज ने कहा, ‘मित्र, अब घर वापस चलो। मुझे रैदास जयंती में अब कोई उत्सुकता नहीं रही।’ दोनों वापस अपने गांव लौट गए।
उसी रात को दो बजे धूर्तराज उठा, अपने पिता लुट्टोधन के बटुए में से सारे रुपए निकाले, सौतेली मां के पैरों में से बिछिए और आहिस्ते से हाथों में से चूड़े खिसका लिए, झगड़ालू बीबी भगोदरा के मुंह पर धीमे से आखिरी बार थूक दिया, अपने नवजात शिशु ‘काहिल’ को घृणास्पद नजरों से देखा और घर से चलता बना। जो भी पहली ट्रेन उसे मिली, उसी में बिना टिकट चढ़ कर वह सीधा दिल्ली जा पहुंचा। और फिर वही हुआ जो पुराण की कथाओं में होता है।
धूर्तराज ने तपस्या शुरू कर दी। चमचागिरी तपस्या ही तो है आधुनिक युग की, आधुनिक तप। इज्जत-बेइज्जत की परवाह नहीं। कोई आदर दे या दुतकारे, सबको समभाव से देखना, और फिर-फिर अपना निवेदन प्रस्तुत करना, यही तो हठयोग है। धूर्तराज ने भी खूब हठयोग साधा। दर-दर की ठोकरें खाईं, गालियां सहीं, मगर किसी न किसी तरह, येन-केन- प्रकारेण कुछ विधायकों को खुश कर ही लिया। लेकिन विधायकों से ज्यादा ऊपर उसकी पहुंच न हो सकी। अतः उसने अपनी साधना में और प्रगति करने के लिए आधुनिक उपवास अर्थात अनशन का सहारा लिया। हड़ताल, दंगा-फसाद, शहर बंद, दलबदल, छल-मक्कारी, भाषणबाजी, अफवाह-प्रचार तथा अन्य उपायों के साधनों पर भी जब धूर्तराज को सफलता न मिली तो वह छह सालों में इस सारे उपद्रव से घबड़ा कर तय कर लिया कि मंत्री बनना अपने भाग्य में नहीं है। उसको थका हुआ देख कर उसके पांच बदमाश साथी, जो अब तक उसे हर प्रकार से मदद कर रहे थे, उसे छोड़ कर चले गए।
उस रात धूर्तराज एक फाइव स्टार होटल में गया और स्विमिंग पूल में नहाने के बाद वहीं एक पेड़ के नीचे उदास होकर आंखें बंद करके बैठ गया। पूर्णिमा की रात थी। कुछ समय उपरांत जब मिस कुवैता नामक एक सुंदर और अश्लील मंत्री-पुत्री वहां स्नान करने आई तो चांदनी रात में वृक्ष के नीचे बैठे इस युवक को देख कर मोहित हो गई और साथ सोने का प्रस्ताव लेकर उसके पास पहुंची। धूर्तराज ने हां भर दी। दोनों रात भर रासलीला करते रहे। सुबह जब आखिरी तारा डूबने को था तब उस कामिनी ने अचानक घबड़ा कर कहा, ‘ओफ, माई गॉड! मैं तो कल शाम को कंट्रासेप्टिव गोली खाना ही भूल गई! अब क्या होगा? मैं तो गर्भवती हो गई हूं!’
उस सुंदरी ने फौरन अपने डैडी को फोन पर इसकी सूचना दी। डैडी बोले, ‘घबड़ाने की बात नहीं, बेटी, कोई चिंता न कर, उस युवक को अपने साथ घर ले आ। मैं आज ही तुम दोनों की शादी की व्यवस्था किए देता हूं। और तुझे तो पता ही है कि हमें एक राजदूत की आवश्यकता है, कुवैत भेजने के लिए। प्रधानमंत्री ने मुझसे कह रखा था कि मेरे रिश्तेदार को ही एंबेसेडर बनाया जाएगा। सो बस, तुम्हारे होने वाले पति को आज ही कुवैत के लिए राजदूत नियुक्त करवा दूंगा। जल्दी घर आ जाओ!’
जिस प्रकार सिद्धार्थ गौतम उस प्रातःकाल गौतम बुद्ध बन गए थे, उसी प्रकार धूर्तराज महाशय राजदूत बन गए अर्थात पंडित पोपटमल ज्योतिषी की भविष्यवाणी के अनुसार बड़े भारी अंतर्राष्ट्रीय डाकू बन गए।
अथ नेता पुराण समाप्तो।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What is the intended meaning of the worship described in the Sannyas Upanishad?
According to Osho, the ‘worship’ of the Sannyas Upanishad is Atma-puja: saluting the indivisible consciousness that is both worshipper and worshipped. It is not ego glorification but the nondual recognition, “I am That.” Namaste embodies this—joining two into One. True devotion seeks the One Source, in whom all things arise, rather than transient objects.
In simple terms: It means bowing to the same one light inside everyone, where the one who prays and the one prayed to are actually the same.
More on this question ›Why do events like those described in the Puranas no longer happen?
According to Osho, nothing has stopped; the mythic still unfolds now. Human nature, destiny, saints and scoundrels—everything the Puranas dramatized—continues in contemporary forms. What changed is our eye: cynicism, schooling and labels make us miss the sacred pattern inside ordinary events. Drop nostalgia and look freshly—the same play of consciousness is happening in today’s streets.
In simple terms: Those old-time wonders still happen today, but we miss them because we’re not looking with fresh, trusting eyes.
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