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Questions in this Discourse
ओशो, मलूक बाबा जैसे पियक्कड़ों की परंपरा तो क्या, संगी-साथी भी कम सुनाई पड़ते हैं! पियक्कड़ों के साथ पीने में सदा से क्या भय और एतराज रहा है? कृपा करके कहें।
संतों की कोई जमात नहीं है। जमात के पीछे ही, भीड़ के पीछे ही भय छिपा है। भेड़ चलती है भीड़ में भय के कारण। अकेले होने का साहस नहीं है। दूसरों के संग-साथ में भय छिपा रहता है। अकेले होते ही भय उभर आता है।
समाज है इसीलिए कि आदमी भयभीत है। जैसे-जैसे आदमी निर्भय होगा वैसे-वैसे समाज तिरोहित होगा। व्यक्ति होंगे फिर; समाज जैसी चीज शिथिल होती जाएगी।
समाज का अर्थ ही यही है कि अकेले-अकेले हम बहुत अधूरे हैं, चलो, हाथ में हाथ डाल लें। एक भ्रम पैदा करें कि अकेले नहीं हैं।
तुमने देखा: एक अकेला आदमी गुजरता हो मरघट से, तो डरता है। दूसरा आदमी साथ मिल जाए, तो डर कम हो जाता है। दूसरा भी इतना ही डर रहा था। दोनों डरे हुए हैं; दोनों अलग-अलग डरे हुए हैं। लेकिन दोनों साथ होकर सोचते हैं कि शायद कोई आश्वासन मिल गया।
दो डरे हुए आदमियों के साथ होने से क्या फर्क पड़ता है? डर दुगुना हो जाना चाहिए; और क्या होगा! लेकिन भ्रम पैदा होता है--कि चलो, दूसरा है। दूसरे की मौजूदगी से एक आभास पैदा होता है कि जरूरत पड़ेगी, तो कोई संग-साथ है। इसलिए हम परिवार बनाते हैं। अकेले में भय है। समाज बनाते हैं। राष्ट्र बनाते हैं। राज्य बनाते हैं। समूहों पर समूह निर्मित करते हैं। लेकिन सब के पीछे गहरे में भय है।
संत तो अकेला है। और संत के पीछे और संत के साथ तो केवल वे ही हो सकते हैं, जिनकी अकेले होने की हिम्मत है। फर्क को समझना। ऐसा नहीं कि बुद्ध के साथ लोग नहीं चले। चले--हजारों लोग चले। लेकिन वही लोग चले, जो भीड़ की तलाश में न थे; जिन्हें अकेले होने की हिम्मत थी।
संतत्व का अर्थ ही है: अकेले होने का साहस।
अगर तुम बुद्ध के पास गए होते, तो तुम पाते: दस हजार भिक्षु बैठे हैं। ऊपर से तो ऐसा ही दिखेगा कि यह भी भीड़ है। मगर तुम भ्रांति में पड़ गए। यह भीड़ नहीं है। यहां एक-एक आदमी अपनी वजह से बैठा है। ऊपर से तो भीड़ दिखाई पड़ती है, क्योंकि दस हजार लोग बैठे हैं, लेकिन ये दस हजार में एक भी आदमी ऐसा नहीं है, जो बाकी नौ हजार नौ सौ निन्यानबे के कारण बैठा है। अगर नौ हजार नौ सौ निन्यानबे चले जाएंगे, तो उठ जाएगा उनके साथ--ऐसा नहीं है। अपने कारण बैठा है। यहां एक-एक अकेला बैठा है। यहां दस हजार एक बैठे हैं। इसको खयाल में लेना।
तुम दस आदमियों के साथ ध्यान में बैठ सकते हो। लेकिन जैसे ही तुम ध्यान में जाओगे, वहां दस इकट्ठे न रह जाएंगे। प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग हो गया। ध्यान में उतरते ही अलग-अलग हो गया। आंख बंद होते ही भीड़ खो गई। तुम बचे। तुम अकेले बचे; दूजा कोई न रहा।
यह जो भीड़ से जुड़ा हुआ आदमी है, परंपरा से जकड़ा हुआ आदमी है, यह ध्यान भी नहीं कर पाता, क्योंकि ध्यान में अकेला होना पड़ेगा। ध्यान तो मार्ग है--संतत्व का।
तुम पूछते हो: ‘बाबा मलूकदास जैसे पियक्कड़ों की परंपरा क्यों नहीं बनी?’
परंपरा बन नहीं सकती।
कभी-कभी कोई बिरला व्यक्ति उस ऊंचाई तक उठता है। ऐसे तारे कभी-कभी उगते हैं और खो जाते हैं। फिर सदियों प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
तुम भी ऐसे तारे बन सकते हो, अगर भय छोड़ो। तुम भी ऐसे ज्योति पिंड बन सकते हो, अगर भीड़ से नाता छोड़ो।
तुम खयाल करते हो: कहां-कहां तुमने अपने को भीड़ से बांध रखा है? कोई कहता है: मैं हिंदू। कोई कहता है: मैं मुसलमान। कोई कहता है: मैं ईसाई। कोई कहता है: मैं सिक्ख। कोई कहता कि मैं भारतीय; कोई कहता; मैं चीनी; कोई कहता: मैं जापानी। कोई कुछ कहता; कोई कुछ कहता। हजार-हजार समूहों से हमने संबंध बांध रखा है।
एक-एक आदमी न मालूम कितने समूहों से बंधा है! इन सारे बंधनों के ऊपर उठते ही तुम भी संतत्व को उपलब्ध हो जाओगे।
संतों की भीड़ नहीं होती, और न संतों की कोई जमात होती है।
फिर मलूकदास जैसे लोगों की जमात तो और भी मुश्किल है। इतने मस्त लोगों के साथ तो तुम चलने में घबड़ाते हो। इनकी मस्ती तुम्हें और भी भय से भर देती है।
मस्ती से बड़ा भय है। क्यों? क्योंकि मस्ती के लिए एक अनिवार्य शर्त है कि तुम अपना नियंत्रण छोड़ो। डोलना हो मस्त हाथी की भांति, तो नियंत्रण न रख सकोगे। शराबी की भांति चलना हो तरंग में, तो फिर नियंत्रण न रहेगा। और नियंत्रण गया कि अहंकार गया।
अहंकार नियंत्रक है। अहंकार पूरे समय बैठा हुआ है नियंत्रण जमाए। अहंकार तानाशाह है तुम्हारे भीतर। अहंकार जो कहता है, वही तुम करते हो। जो कहता है: मत करो, वह तुम नहीं करते। अहंकार तुम्हें चलाता है, तो तुम चलते हो। अहंकार बिठाता है, तो बैठते हो।
मस्त आदमी का क्या अर्थ होता है? मस्त आदमी का अर्थ होता है: अब कोई चलाने वाला नियंत्रण भीतर न रहा। अब तो छोड़ दिया सब परमात्मा पर। जहां उसकी मरजी हो, ले जाए। डुबाना हो डुबा दे; हम गीत गुनगुनाते डूब जाएंगे। मिटाना हो मिटा दे; हम मुस्कुराते मिट जाएंगे। जो उसकी मरजी; जैसी उसकी मरजी।
अहंकार कहता है: हिसाब से चलो; कदम-कदम फूंक कर रखो; कहीं भटक मत जाना। होशियारी रखो; चालाकी रखो। तो मस्तों के साथ नहीं चल पाते।
बाबा मलूकदास तो पियक्कड़ हैं। पियक्कड़ के साथ जाने का मतलब ही यह होता है कि तुम भी पीने की हिम्मत जुटाओगे। नहीं तो पियक्कड़ के साथ बैठने का क्या सार? और खतरा यह है कि पीने वालों के साथ बैठो, तो सत्संग के परिणाम होते हैं। शराबियों के पास बैठोगे, शराब पीने लगोगे। संतों के पास बैठोगे, शराब पीने लगोगे।
सत्संग का अर्थ ही क्या है? सत्संग का अर्थ है कि तुम संत की ‘बीमारी’ के लिए खुले हो। अगर संत की ‘बीमारी’ तुम्हारी तरफ आने लगेगी, तो तुम प्रतिरोध न करोगे। तुम कहोगे: आओ, द्वार खुले हैं। संतत्व संक्रामक है। जैसे बीमारी लगती है न, ऐसे ही संतत्व भी लगता है।
संतों से लोग डरते हैं! डर के कारण पूजा भी कर लेते हैं। पूजा डर का ही एक उपाय है। पैर छूकर और भागे! बैठते नहीं हैं पास में। पैर छूते हैं और कहते हैं: बाबा, बख्शो। पैर छूकर यह कहते हैं कि आप भले, हम भले; आपकी कृपा बनी रहे। आपका आशीर्वाद बना रहे। लेकिन संतों के पास ज्यादा देर रुकते नहीं। खतरा है।
कठिन है
बहुत कठिन है
बैठे-बैठे सहना--सौंदर्य को
धुली धुली दुरवा का
बिखरा बिखरा हुआ रूप
हलके हलके बादल
खुली-मुंदी हलकी धूप
कठिन है
बहुत कठिन है
झांक कर रह जाना
इन्हें खिड़की से
वृक्षों पर नये पत्ते
पत्तों की हर-हर
पड़े पड़े बिस्तर पर सुनना
बाहर बरसा की झड़ी
कठिन है
बहुत कठिन है।
पुकार आती है। बाहर निकला सूरज--पुकार आती है। वसंत आया, फूल झरे--पुकार आती है। गंध लाती--हजार हजार संदेश। कहती: आओ बाहर। फिर कठिन है पड़े रहना द्वार-दरवाजे बंद किए।
जैसे प्रकृति बुलाती है--सुनते हैं इन पक्षियों को?--ऐसे परमात्मा भी बुलाता है संतों से।
संतों के पास अगर अपने को रखोगे, तो उनके हृदय की धड़कन में तुम्हें परमात्मा की गूंज सुनाई पड़ेगी।
कठिन है
बहुत कठिन है
बैठे-बैठे सहना--सौंदर्य को
चलना पड़ेगा; उठना पड़ेगा; साथ होना पड़ेगा।
जब पुकार आएगी, तो तुम पुकार को झुठला न सकोगे। इसलिए लोग होशियार हैं--दूर ही रहते हैं। दूर रहने के हजार बहाने खोज लेते हैं। कोई दूर रहता कह कर कि संतत्व में कुछ धरा नहीं है; परमात्मा इत्यादि सब बातें हैं; बकवास है। स्वर्ग, नरक, मोक्ष, कुछ होते नहीं हैं। कहां की आत्मा? कैसी आत्मा? बस मनुष्य तो मिट्टी है। दो दिन का खेल है--खेल लो। फिर गए सो गए।
कोई नास्तिक बन कर संतों के पास आने से बचता है। यह एक तरकीब है, नकारात्मक तरकीब है। यह भी तरकीब बचने की है, खयाल रखना। नास्तिक संतों से बचने के उपाय खोज रहा है। अपने चारों तरफ बागुड़ लगा रहा है कि है ही नहीं, तो जाना क्यों? जब यही बात पक्की मन में बिठा ली, दृढ़ कर लिया विचार कि ईश्वर नहीं, स्वर्ग नहीं, मोक्ष नहीं, समाधि नहीं, सब पाखंड है; सब वितंडा है--जब ऐसा पक्का कर लिया, तो जाने का भाव ही न उठेगा। और अगर कभी भूल-चूक से पहुंच भी गए, तो कानों में इतना सीसा भरा है इन धारणाओं का कि कुछ सुनाई न पड़ेगा। अगर संत को कभी देखा भी तो जो गलत है, वही दिखाई पड़ेगा; सही दिखाई ही न पड़ेगा। आंखें तुमने पहले से तैयार कर रखी हैं गलत को देखने के लिए।
एक दूसरी तरकीब भी है, जो आस्तिक की तरकीब है। तुम यह तो जानते हो कि नास्तिक शायद बचने की कोशिश कर रहा है, लेकिन मैं तुमसे कहना चाहता हूं: आस्तिक भी बचने की कोशिश कर रहा है। आस्तिक भी उपाय खोजता है कि न जा पाए संत के पास। उसके उपाय क्या हैं? एक उपाय उसका--कि वह मुर्दा संतों की पूजा करता है। राम में कोई खतरा नहीं है। कृष्ण में कोई खतरा नहीं है। क्राइस्ट में अब कोई खतरा नहीं है। कबीर, नानक में अब कोई खतरा नहीं है। जब जिंदा थे, तब खतरा था।
मरा संत क्या करेगा! तुम तो मरे-मरे हो ही, तुम्हारा संत भी मरा हुआ! दो मुरदों के बीच खूब बन जाती है; दोस्ती बन जाती है। मुरदा संत तुम्हें बदल नहीं सकते। इसलिए आस्तिक मुरदा संतों को पूजता है; और जिंदा संतों से बचता है। क्योंकि जिंदा संत खतरनाक है; चिंगारी है। गिरेगी, तो तुम्हारा घास-फूस जल जाएगा।
कबीर ने कहा है: ‘जो घर फूंके आपना, चले हमारे संग।’ तुम्हारा घर फुंक जाएगा। तो राख की पूजा...। राख को तुम कहते--विभूति। राख की पूजा करो। राख को लगाते तिलक की तरह, टीके की तरह।
जीवित संत अंगारा है; तुम राख पूजते।
तो या तो उपाय है कि मुरदा संतों को पूजो। या अगर कभी भूल-चूक जिंदा संत के पास पहुंच जाओ, तो कहो कि महाराज आऊंगा कभी। माना कि आप बिलकुल ठीक हैं...। यह मानना कि आप बिलकुल ठीक हैं--बचने की तरकीब है। क्योंकि जब मान ही लिया कि बिलकुल ठीक हैं, तो अब करने को क्या बचा? बेचैनी गई। मान ही लिया कि आप बिलकुल ठीक हैं। मान ही लिया कि मैं पापी; मैं पतित; आप महान। कहां आप, कहां मैं! मैंने स्वीकार ही कर लिया सब कि आप जो कहते हैं, सब अक्षरशः ठीक है। मगर अभी मेरा समय नहीं आया है। जब मेरा समय आएगा, तब आऊंगा।
तो पैर में दो फूल चढ़ा कर चले आए!
पूजा भी उपाय है--संत से बचने का।
संत के पास वही पहुंचता है, जो सारे उपाय बचने के छोड़ देता है। जो कहता है कि चलो, साहस से एक बार आंख खोल कर देखें कि संतत्व क्या है। कौन जाने, जिस जीवन-निधि को हम खोज रहे और-और, अलग-अलग दिशाओं में, वह संतत्व में ही छिपी हुई पड़ी हो। कौन जाने...।
न तो संत के पास नकार से भर कर जाना, और न अकार से भर कर जाना। न नास्तिक की तरह जाना, न आस्तिक की तरह जाना। संत के पास तो खुला हृदय लेकर जाना; खुली आंख लेकर जाना; दर्पण होकर जाना--कि जो है, वह दिखाई पड़ जाए। और जो है, वह दिखाई पड़ जाए, तो निश्चित ही...।
कठिन है
बहुत कठिन है
बैठे-बैठे सहना--सौंदर्य को
धुली धुली दुरवा का
निखरा बिखरा हुआ रूप
हलके हलके बादल
खुली-मुंदी हलकी धूप
कठिन है
बहुत कठिन है
झांक कर रह जाना
इन्हें खिड़की से
वृक्षों पर नये पत्ते
पत्तों की हर-हर
पड़े-पड़े बिस्तर पर सुनना
बाहर बरसा की झड़ी
कठिन है
बहुत कठिन है।
जब तुम परमात्मा की झर-झर सुनोगे--संत के हृदय में; परमात्मा का कल-कल नाद सुनोगे--संत के हृदय में; जब तुम संत के हृदय के पास कान लगा कर बैठ जाओगे, वही तो शिष्यत्व का अर्थ है।...
शिष्यत्व का अर्थ नहीं है: पूजन। शिष्यत्व का अर्थ है: श्रवण, सुनने की क्षमता। शिष्यत्व का अर्थ है: जो है, उसे वैसा ही देखूंगा; बदलूंगा नहीं; व्याख्या न करूंगा। अपने को बीच में न लाऊंगा; अपने को हटा कर देखूंगा। एक बार तो सही: खिड़की से झांक कर देख लूं कि बाहर क्या हो रहा है। एक बार तो देख लूं कि मनुष्य के भीतर क्या हो सकता है--क्या संभावना है? जिसके भीतर हुआ है, उसके भीतर एक बार झांक कर देख लूं, तो अपनी भी सुधि आ जाए।
तो लोग संतों से डरते हैं। फिर पियक्कड़ संतों से तो और भी ज्यादा। संत भी दो तरह के हैं। एक तो संत हैं, जिनको हम कहें--मर्यादा, समाज, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता--उसके अनुकूल। जैसे हम राम को कहते हैं: मर्यादा पुरुषोत्तम। तो एक तो संत होते राम जैसे; जो रत्ती भर समाज की मर्यादा से हटते नहीं।
एक संत होते हैं क्रांति-द्रष्टा; कृष्ण जैसे; जिनके जीवन में कोई मर्यादा नहीं होती। यह कुछ संयोग की बात नहीं कि इस देश ने राम को आंशिक अवतार कहा और कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा। जिन्होंने जाना, उन्हें यह कहना ही पड़ा। जो परंपरा के अनुकूल चलता है; वह अंश ही है--पूरा नहीं। जो परंपरा को ध्यान में रख कर चलता है--लीक-लीक, उसमें अभी अंश ही परमात्मा उतरा है--पूरा परमात्मा नहीं।
पूरा परमात्मा तो जब उतरेगा, तब कैसी मर्यादा? कैसी सीमा? बाढ़ की तरह उतरेगा। पूरा परमात्मा कुछ नल की टोंटी नहीं है--कि तुमने खोला और अब तुम्हारी मर्यादा में उतरा! पूरा परमात्मा तो बाढ़ की तरह है कि बादल खुल गए, और हुई मूसलाधार वर्षा; कि भर गए नदी-तालाब, सर-सरिताएं; कि कंप गई सारी पृथ्वी।
तो एक तो संत का सौम्यरूप है; राम उसके प्रतीक हैं। एक संत का क्रांतिरूप है; कृष्ण उसके प्रतीक हैं। मलूक कृष्ण की धारा में आते हैं। वह पियक्कड़ों की धारा है।
राम का उपयोग इतना ही है कि अगर तुममें हिम्मत न हो, तो चलो मूसलाधार वर्षा में स्नान नहीं कर सकते हो, कोई हर्जा नहीं है। अपने घर की नल की टोंटी के नीचे बैठ कर ही कम से कम स्नान तो कर लो। आज नल की टोंटी के नीचे स्नान करोगे, तो शायद स्नान का रस लग जाए। तो कल शायद हिम्मत जुटा कर नग्न खड़े हो सको वर्षा के नीचे; और आनंदित हो सको निसर्ग में।
परंपरागत संत की इतनी ही उपयोगिता है कि वह तुम्हें किसी दिन क्रांतिकारी संत के पास पहुंचा दे। वह सीढ़ी है; सीढ़ी से ज्यादा नहीं है। अंततः तो किसी न किसी दिन बाबा मलूकदास जैसे किसी आदमी के हृदय में झांक कर देखना होगा। वहां परमात्मा अपने पूरे रूप में प्रकट होता है।
मआल-ए-सोज ए गमहा ए निहानी।
देखते जाओ भड़क उठी है सम्मे-ए-जिंदगानी देखते जाओ।
जब कभी कोई मलूक जैसा व्यक्ति पैदा होता है, तो उसकी जीवन की मशाल पूरी भड़क उठी है।
भड़क उठी है स सम्मे-ए-जिंदगानी देखते जाओ।
मगर उतनी विराट लपट को शायद तुम न झेल पाओ; शायद वैसी आंच को तुम न झेल पाओ; तुम अंधेरे के आदी हो, तो कोई हर्जा नहीं है। छोटा सा दीया जलाओ। राम ऐसे ही छोटे दीये हैं।
जो संत तुम्हारी धारणाओं के अनुकूल पड़ता है, वह मिट्टी का दीया है, जिसे तुमने जला लिया है। रोशनी उससे भी होती है। फिर एक मशाल भी है--दोनों छोरों से जलती हुई मशाल है; रोशनी उससे भी होती है। रोशनी का पूरा मजा तो मशाल में है। मगर चलो, स्वाद। कम से कम अंधेरे से रोशनी में आए। छोटे टिमटिमाते दीये की रोशनी ही सही; फिर भी भली है।
मलूकदास जैसे व्यक्ति, जिस भाषा में बोलते हैं, वह भाषा भी घबड़ा देती है पंडित को, पुरोहित को। विशेषकर उनको जो अपने को धार्मिक मानते हैं और धार्मिक नहीं हैं, उनके पैरों के नीचे की जमीन खिंच जाती है। उनके पैरों के नीचे खंदक हो जाती है। वे घबड़ा उठते हैं।
मलूक जैसे व्यक्तियों का बड़ा विरोध होने लगता है। उनके पास आना तो दूर, उनसे दूर ले जाने के सब उपाय होने लगते हैं।
वह आ रहा है असा टेकता हुआ वाइज।
बहा दे इतनी कि साकी कहीं न थाह मिले।।
वह जो धर्मगुरु चला आ रहा है अपनी लकड़ी टेकते हुए...। मलूक जैसे संत तो कहते: हे प्रभु, इतनी शराब बहा दे कि यह डूब ही जाए। इसको कहीं थाह भी न मिले।
उठे कभी घबड़ा के तो मयखाने से हो आए।
पी आए तो फिर बैठ रहे याद-ए-खुदा में ए रियाज।।
एक ऐसी परम दृष्टि है, जहां जीवन को अखंड रूप में देखा जाता है; जहां जीवन के साधारण सुख और परमात्मा के विराट सुख में विरोध नहीं है। जहां जीवन के साधारण सुख में भी परमात्मा के ही परम सुख की किरण है। जहां हमें इस जगत में जो सौंदर्य प्रकट हो रहा है, उस सौंदर्य को भुलाने के लिए नहीं, उस सौंदर्य में गहरे उतर जाने का निमंत्रण है। फूल में भी परमात्मा है; काश! तुम फूल में गहरे उतर सको! हरे-हरे नये-नये आए पत्तों में भी परमात्मा ही आया है; काश, तुम पत्तों में गहरे उतर सको! तुममें भी परमात्मा ही विराजमान है।
जहां-जहां तुमने सुख की थोड़ी झलक भी पाई है--झूठी ही सही, सपना ही सही; लेकिन जहां भी तुमने सुख की थोड़ी सी झलक पाई है, वहां परमात्मा ही करीब था। उसकी ही सुगंध आई थी।
वह जो क्रांतिद्रष्टा संत है, उसके लिए सृष्टि में और स्रष्टा में विरोध नहीं है। यह सृष्टि भी स्रष्टा का ही रूप है। यह तथाकथित साधु-संन्यासी को, तथाकथित महात्मा को, तथाकथित धर्मगुरु को बहुत खटकने-अखरने वाली बात है।
धर्मगुरु का तो सारा व्यवसाय इसमें है कि वह तुम्हें संसार के विरोध में खड़ा कर दे। परमात्मा के पास तो नहीं पहुंचा पाता, लेकिन संसार के विरोध में खड़ा कर देता है। संसार को तुम्हारे भीतर से मिटा भी नहीं पाता, लेकिन विषाक्त कर देता है। परमात्मा का सुख तो उतरता ही नहीं, इस जीवन का जो थोड़ा बहुत सुख उतरता था, वह भी उतरना बंद हो जाता है। तुम बिलकुल रूख-सूख जाते हो।
मस्ती से भरे हुए संतों की धारणा बड़ी और है। वे तुमसे कहते हैं: छोड़ने को यहां कुछ भी नहीं है; पाने को सब-कुछ है। वे तुमसे कहते हैं: छोड़ने की बात ही गलत शुरुआत है। संसार छोड़ना नहीं है; प्रभु को पाना है। फिर उसको पाने से जो छूट जाए--छूट जाए। उसको पाने से जो अपने से छूट जाए--छूट जाए।
गर यार मय पिलाए, तो फिर क्यूं न पीजिए
जाहिद नहीं, मैं शेख नहीं, कुछ वली नहीं।।
अगर परमात्मा ही पिला रहा हो, तो फिर क्यों न पीजिए!
जाहिद नहीं, मैं शेख नहीं, कुछ वली नहीं।
परमात्मा जो पिलाए--पीओ। परमात्मा जो दिखाए--देखो। परमात्मा जैसा नचाए--नाचो।
यह जो परमात्मा का परम स्वीकार है, इसके कारण मलूकदास जैसे लोगों को समाज की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। मलूकदास जैसे लोगों को समाज का विरोध झेलना पड़ता है।
समाज की बड़ी टुच्ची धारणाएं हैं, जिनका कोई भी मूल्य नहीं है। लेकिन समाज उन्हीं धारणाओं से जीता है और घबड़ाता है कि कहीं वे धारणाएं छूट न जाएं। उन धारणाओं से कुछ मिला भी नहीं है; कुछ पाया भी नहीं है। लेकिन उन धारणाओं में इतने दिन रहे हैं कि छूट जाए धारणा, टूट जाए धारणा, तो प्राण कंपते हैं।
ऐसा ही समझो कि जैसे कोई आदमी बहुत दिन तक जंजीरों में रह गया हो, बहुत दिन तक कारागृह में रहा हो, फिर उसकी तुम जंजीरें तोड़ो, तो उसे बेचैनी होती है। वे जंजीरें तो अब उसके आभूषण बन गई हैं। वे जंजीरें तो अब उसके शरीर का हिस्सा हो गई हैं।
ऐसा हुआ, फ्रांस की क्रांति में वेस्टाइल के किले को क्रांतिकारियों ने तोड़ दिया और उस किले में बंद कारागृह में बड़े पुराने कैदी थे। कोई चालीस साल से बंद था, कोई तीस साल से बंद था, कोई तो ऐसा था कि पचास साल से बंद था। उस किले में केवल आजीवन जिनको सजाएं मिली थीं, ऐसे हजारों कैदी थे। उन्होंने उन सबको छुट्टी दे दी; बाहर निकाल दिया।
सोचा था क्रांतिकारियों ने कि वे बड़े प्रसन्न होंगे। लेकिन वे बड़े नाराज हुए। उनमें से कुछ ने तो साफ इनकार कर दिया बाहर जाने से। उन्होंने कहा: हम चालीस साल से, पचास साल से यहां हैं; बूढ़े हो गए हैं, अब कहां जाएंगे? अब तो हमें याद भी नहीं है कि हम किस को खोजेंगे! किस घर में निवास करेंगे? और अब तो हम सब काम-धाम भी भूल गये हैं। अब हम काम-धाम इस बुढ़ापे में क्या करेंगे? और फिर हमें हमारी कोठरी रास आती है। पचास साल जो कोठरी के अंधेरे में रह गया हो, बाहर की रोशनी तिलमिलाएगी।
और तुम चकित होओगे जान कर...। फिर भी क्रांतिकारी तो जिद्दी, उन्होंने बाहर निकाल ही दिया; जबरदस्ती बाहर निकाल दिया। दुनिया में तुम किसी आदमी को जबरदस्ती स्वतंत्र नहीं कर सकते। जबरदस्ती परतंत्र तो कर सकते हो, लेकिन जबरदस्ती स्वतंत्र नहीं कर सकते। कैसे करोगे?
आधी रात होते-होते अनेक उनमें से लौट आए। और उन्होंने कहा कि हमें नींद ही नहीं आती! एक ने तो कहा कि मेरी जंजीरें मुझे वापस लौटा दो। क्योंकि उनके बिना मुझे लगता है, मैं नंगा-नंगा हूं। मैं सो ही नहीं सकता। तुम थोड़ा सोचो: पचास साल जिस आदमी के हाथ में लोहे की मजबूत जंजीरें, पैर में मजबूत बेड़ियां पड़ी हों; वह उन्हीं के साथ सोया पचास साल तक। अब करवट लेता है, तो उसको खाली-खाली लगता है। न जंजीर बजती, न आवाज होती! न वजन मालूम होता। वह नींद उसकी टूट-टूट जाती है। आदत!
साधारण आदमी आदत से जीता है। और क्रांतिद्रष्टा संतों का एक ही आग्रह है: आदत से जागो; होश से जीओ।
और मजा यह है कि यह कुछ ऐसा होश है कि एक तरफ होश बढ़ता है और एक तरफ मदमस्ती बढ़ती है। यह कुछ ऐसा होश है कि पुरानी बेहोशी चली जाती है और एक नये तरह की, एक अभिनव तरह की बेहोशी आती है। पुराना अज्ञान चला जाता है और एक नये तरह की निर्दोषता का आविर्भाव होता है।
अब तुम्हें धन के कारण मस्ती नहीं आती; न पद के कारण मस्ती आती है; अब तुम्हें अकारण मस्ती आती है। तुम मस्ती में डोलते ही रहते हो। जैसे मस्त हाथी डोलता हो--कहा मलूक ने; कि जैसे शराबी पीकर चलता हो--ऐसे जिसने परमात्मा को पी लिया है, उसकी चौबीस घड़ियां मस्ती में डूबी हुई बीतती हैं।
मगर ऐसा आदमी समाज के लिए बहुत झंझट का कारण हो जाएगा। क्योंकि इतने मस्त आदमियों को गुलाम नहीं बनाया जा सकता। इतने मस्त आदमी अपनी मस्ती से जीते हैं। इतने मस्त आदमियों को तुम भेड़ें नहीं बना सकते। ऐसे मस्त आदमी सिंहों की तरह जीते हैं। और समाज भेड़ें चाहता है। राजनेता, पंडित, पुरोहित भेड़ें चाहते हैं; ऐसे आदमी नहीं चाहते। इतने खतरनाक आदमी झेलने की क्षमता अभी समाज की नहीं है।
समाज अभी संतों को झेलने के योग्य नहीं हो पाया है। अभी संतों का कोई समाज नहीं हो पाया है। अभी धर्म के नाम पर पाखंड जीतता है, धर्म के नाम पर सत्य नहीं।
अभी तुम उस संत की पूजा करते हो, जो तुम्हारे आंगन में समा जाता है। तुम उस संत से तो भयभीत हो जाते हो, जो तुम्हारे आंगन को तोड़ दे; तुम्हारी दीवालों को उखाड़ दे; तुम्हें भी खुले आकाश के नीचे ले आए।
इसलिए मलूक जैसे लोगों के पीछे कोई परंपरा नहीं बनती; संगी-साथी भी पैदा मुश्किल से होते हैं कभी-कभार।
समाज इनसे भयभीत रहा है। अक्सर तुम भय के कारण ही पूजा भी करते हो।
तुम्हारी पूजा में भी भय ही होता है।
सभी दुनिया की भाषाओं में एक बहुत ही अरुचिपूर्ण, कुरुचि से भरा हुआ शब्द उपयोग में आता है, वह है: ईश्वर-भीरु, गॉड-फियरिंग। धार्मिक आदमी को हम कहते हैं: ईश्वर-भीरु। यह कोई बात हुई! धार्मिक आदमी और ईश्वर से भयभीत?
महात्मा गांधी कहते थे: मैं किसी से नहीं डरता, सिवाय ईश्वर के। मगर ईश्वर से डरते हैं! सबसे डरो; कम से कम ईश्वर से तो न डरो। क्योंकि जिससे डर होगा, उससे प्रेम न हो सकेगा। भय के साथ प्रेम का संबंध ही नहीं है। जहां भय है, वहां प्रेम मर जाता है। जिससे भय है, उससे घृणा हो सकती है, प्रेम कैसे होगा?
तुमने किसी से भयभीत होकर प्रेम किया है? कोई तुम्हारी छाती पर छुरा रख दे, उससे तुम प्रेम करोगे? हां, तुम बतला सकते हो कि मैं तुम्हारे प्रेम में हूं। लेकिन उससे तुम प्रेम करोगे?
मैंने सुना है कि आदमियों की बीमारियां जंगलों तक पहुंच जाती हैं। एक बार जंगल में जानवरों ने एक प्रतियोगिता का आयोजन किया। जैसे आदमी करते हैं। तो सब तरह के खेल--कबड्डी, और वालीबॉल, और फुटबॉल--और जो-जो जंगली जानवर कर सकते थे, उन्होंने सब खेलों का आयोजन किया। सिंह भी आया। बैठा देखता रहा। और सब प्रतियोगिता में तो उसने भाग न लिया; बड़े आनंद से देखता रहा; लेकिन आखिरी प्रतियोगिता थी, लतीफे सुनाने की। चुटकुले सुनाने की, उसमें वह भी भाग लेना चाहता था। उसने सोचा: कम से कम एक में तो मैं भी भाग लूं।
पहले एक खरगोश खड़ा हुआ; उसने एक लतीफा सुनाया। लेकिन खरगोश की जान कितनी? भीड़-भड़क्का और जानवरों को देख कर बहुत घबड़ा गया। आधा ही लतीफा सुना पाया और उसको पसीना बह गया; वह बैठ गया। फिर लोमड़ी ने सुनाया। लोमड़ी कुशल; पुरानी राजनीतिज्ञ; उसने लोगों को खूब हंसाया। ऐसे और भी जानवर कहे।
आखिर में सिंह खड़ा हुआ। सन्नाटा छा गया। सब उत्सुक हुए कि सिंह कौन सा लतीफा सुनाता है--देखें। माइक के पास आकर लतीफा तो दूर उसने बड़ी जोर से सिंह-गर्जना की। इतने जोर से...। एक तो वैसे ही सिंह-गर्जना और फिर लाउड स्पीकर पर! छोटे-मोटे प्राणियों के तो प्राण निकल गए। खरगोश जो सामने ही बैठा था, प्रतियोगिता में पहले नंबर भाग लेने आया था, वह तो वहीं ढेर हो गया। कई प्राणी एकदम बेहोश हो गए। जो बचे उनकी भी छातियां धड़क गईं।
दहाड़ने के बाद सिंह ने कहा, अब मूर्खो हंसो। हंसते क्यों नहीं? यही लतीफा था। हंसो। हंसी किसी को भी नहीं आ रही है। हंसी का कोई कारण नहीं है। लेकिन हंसना पड़ा। जब सिंह कहे...। तो लोग हंसने लगे। ऐसे हंसने लगे कि कई जानवरों को तो खांसी आने लगी हंसी के मारे। मगर जब तक सिंह कहे ना कि रुको, तब तक रुक भी नहीं सकते!
स्वभावतः पहला पुरस्कार सिंह को गया।
जहां शक्ति है और जहां शक्ति के साथ जबरदस्ती है, वहां भय पैदा हो जाता है। भय में तुम हंस भी सकते हो। अब सिंह कहता है कि हंसो मूर्खो, हंसो; यही लतीफा था। हंसी किसी को भी नहीं आ रही है। लेकिन यह कोई हंसी होगी! इसमें हंसी होगी? इसमें सिर्फ एक धोखा होगा, एक प्रवंचना होगी; एक अभिनय होगा, एक पाखंड होगा।
ईश्वर से भयभीत--तो फिर प्रेम कैसे करोगे? और अगर ईश्वर से तुम भयभीत हो, तो भीतर गहरे में तुम्हारे घृणा होगी। तुम बदला लेना चाहोगे।
नीत्शे ने कहा है कि ईश्वर मर गया। और यह भी कहा है कि और किसी ने नहीं, आदमी ने ही उसकी हत्या कर दी है। नीत्शे से लोग बहुत नाराज हैं--कि उसने ऐसी अभद्र बात कही। लेकिन मेरे देखे, मेरे समझे नीत्शे ने जो कहा वह स्वाभाविक परिणाम है--ईश्वर-भीरुता का। जब आदमी इतने दिन तक डराया गया है ईश्वर से, तो कोई तो हिम्मतवर आदमी कहेगा कि मारो गोली; खत्म करो ईश्वर को; बहुत हो गया भय।
अगर उस दिन जंगल के जानवरों में कोई एकाध भी हिम्मतवर होता, तो खड़े होकर कहता कि बंद करो यह बकवास। यह कोई चुटकुला है? यह कोई लतीफा हुआ?
नीत्शे ने यह भी कहा है कि ईश्वर मर गया है और आदमी अब स्वतंत्र है। अब आदमी जो चाहे, कर सकता है। क्योंकि अब तक आदमी ने ईश्वर के डर से ही बहुत कुछ नहीं किया है।
आदमी बदला नहीं है; सिर्फ भय के कारण ग्रसित है। और जब महात्मा गांधी जैसे व्यक्ति भी कहते हैं कि मैं और किसी से नहीं डरता, सिर्फ ईश्वर से डरता हूं, तो जाहिर होती है बात कि ऐसे व्यक्तियों को भी ईश्वर की कोई प्रतीति नहीं है। प्रतीति हो नहीं सकती।
ईश्वर यानी प्रेम। प्रेम में कहां भय है! प्रेम में कैसा भय? प्रेम कोई तलवार थोड़े ही है। प्रेम में फुसलावा हो सकता, मनुहार हो सकती; प्रेम में कोई जबरदस्ती थोड़ी ही है।
लेकिन आदमी अब तक ऐसे ही मानता रहा है--कि भय के कारण।... तो तुमने जो एक समाज बना रखा है, उसमें सारी व्यवस्था भय के कारण है। तुम नैतिक हो, तो भय के कारण। तुम चोरी नहीं करते--तो भय के कारण। तुम झूठ नहीं बोलते--तो भय के कारण। तुम्हारे सब सदगुण भय पर टिके हैं! इसलिए तुम्हारे सब सदगुण दो कौड़ी के हैं।
जब मलूक जैसे व्यक्ति जगत में आते हैं, तो वे कहते हैं: छोड़ो भय; आओ, प्रेम की बात करें। छोड़ो भय--आओ, मस्त हों। छोड़ो भय--आओ, प्रभु के गीत गुनगुनाएं--आनंद में, प्रेम में। प्रभु-प्रेम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आओ, प्रभु के हाथ में हाथ डालें, प्रभु को आलिंगन में लें; नाचें प्रभु के साथ, रास रचाएं।
जब ऐसी कोई बात कभी कोई संत कहता है, तुम घबड़ा जाते हो। क्योंकि तुम्हारे भय के जन्मों-जन्मों के जाल, तुम्हारी जंजीरें, तुम्हारी आदतें, तुम्हारी धारणाएं, तुम्हारे संस्कार--सब एकदम घबड़ा कर, ठिठक कर खड़े हो जाते हैं कि यह तो बात खतरनाक है।
तुम जानते हो कि तुमने भय छोड़ा, तो तुम्हारी सब नीति गई; तुम्हारा सब आचरण गया। सब झूठा है, इसलिए जाने का डर है।
मलूक एक नये तरह का आचरण जगत में लाते हैं--एक आचरण जो प्रेम पर निर्भर है; एक आचरण जो आनंद पर निर्भर है। तुम बुरा इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि तुम इतने आनंदित हो कि बुरा कैसे कर सकोगे! तुम बुरा नहीं कर सकते, क्योंकि तुम इतने प्रेम से प्लावित हो कि बुरा कैसे कर सकोगे!
प्रेम ही एकमात्र नीति है; और प्रेम ही एकमात्र चरित्र है।
इस प्रेम की मस्ती से जो सुगंध उठती है, उस सुगंध को बहुत कम लोग ही जान पाते हैं। क्योंकि तुम्हारे नासापुट खराब हो गए हैं।
मैंने सुना है कि देहात--दूर देहात से मछलियां बेचने एक आदमी गांव आया था--शहर आया था। जब वह मछलियां बेच कर वापस जा रहा था, भरी दुपहरी थी; बड़ी तेज धूप थी और सूरज आग बरसा रहा था। वह एक सड़क पर भूखा-प्यासा, थका-मांदा बेहोश होकर गिर पड़ा।
वह सड़क उस गांव की, उस शहर की गंधियों की गली थी, जहां सुगंध बेचने वालों की दुकानें थीं। एक गंधी भागा; उसने अपनी तिजोड़ी से बड़ा बहुमूल्य इत्र निकाला, जिस इत्र की यह खूबी थी कि बेहोश आदमी को सुंघा दो, तो वह होश में आ जाए।
उसने ले जाकर, वह इत्र, उस आदमी के जो बेहोश पड़ा था, उसकी नाक पर रखा। वह आदमी तो और जोर से हाथ-पैर फेंकने लगा और बड़ी बेचैनी उसके चेहरे पर उतर आई। वह गंधी तो बड़ा हैरान हुआ।
भीड़ आ गई थी। एक आदमी भीड़ में खड़ा था उसने कहा: ठहरो भाई, तुम उसको मार डालोगे। तुम्हें पता नहीं, यह कौन है। यह मछुआ है। तुम्हारी इस बहुमूल्य गंध का इसको क्या पता? यह गंध तो इसे दुर्गंध जैसी लगेगी। यह तो एक ही गंध जानता है--मछली की गंध। उसी को सुगंध मानता है। ठहरो।
उस आदमी के पास उसकी टोकरी, और गंदी टोकरी में गंदे कपड़े, और उन गंदे कपड़ों में ही बांध कर वह मछलियां लाया था, वे पड़ी थीं। वह आदमी भागा; पास के नल से उसने थोड़ा सा पानी लिया; उन गंदे कपड़ों पर पानी छिड़का; टोकरी पर पानी छिड़का। ला कर टोकरी और वे गंदे कपड़े उसके मुंह पर रख दिए।
मछली की गंध उठी। लोग तो तिलमिला गए। मगर वह आदमी होश में आ गया। और उस आदमी ने आंखें खोल देख कर कहा: धन्यवाद, किसने यह कृपा की! किसने मेरी मछलियों की गंध मेरे पास ला दी? अन्यथा मैं आज मर जाता।
अगर मछलियों की गंध में ही जीवन भर जीए हो, तो इत्र की गंध तुम्हें दुर्गंध मालूम होगी। तुम उसे न सह पाओगे। और आदमी ऐसी ही मछलियों की गंध में जीआ है।
बाबा मलूकदास जैसे लोग उस परम इत्र को जगत में ले आते हैं, जिसकी एक झलक, जिसकी एक लहर तुम्हें जगा दे--सदा के लिए जगा दे। मगर तुम्हारे नासापुट खराब हैं।
इसलिए न तो संगी-साथी मिलते, न परंपरा बनती।
लेकिन अपने भीतर खोज-बीन जारी रखना। अगर तुम कभी बाबा मलूकदास जैसे किसी आदमी के साथ पड़ जाओ, तो चाहे लाख तकलीफ मालूम पड़े तुम्हें--पुराने संस्कार छोड़ने में; छोड़ना। लाख अड़चन मालूम पड़े--तुम्हारी पुरानी आदतों के टूटने में--तोड़ना। क्योंकि उन आदतों से न कभी कुछ मिला है, न कुछ कभी मिलेगा। लेकिन ऐसे व्यक्ति के पास अगर तुम रम जाओ: अगर ऐसे व्यक्ति के पास तुम टिक जाओ, तो तुम्हारे भीतर वैसे सूरज का उदय हो सकता है, जिसके उदय हुए बिना कोई कभी न तृप्त हुआ है--न हो सकता है।
तुझे क्या सुनाऊं मैं दिलरुबा, तेरे सामने मेरा हाल है। तेरी इक निगाह की बात है, मेरी जिंदगी का सवाल है।।
जिसने पूछा है--स्वामी वाहिद काजमी ने--ठीक ही पूछा है।
‘तुझे क्या सुनाऊं मैं दिलरुबा,
तेरे सामने मेरा हाल है।’
परमात्मा से कहने को भी तो हमारे पास कुछ नहीं है। जो हम कह सकते हैं, वह तो वह जानता ही होगा। और जो हम ही नहीं जानते हैं, उसे तो हम कैसे कहेंगे।
सच तो यह है कि जो हम नहीं जानते हैं, वह भी वह जानता होगा। इसलिए परमात्मा के सामने कहने का तो कुछ सवाल नहीं है। जो लोग परमात्मा के सामने बैठ कर कुछ कहते हैं, बड़ी नासमझी करते हैं। प्रार्थनाएं चुप होनी चाहिए। केवल चुप प्रार्थनाएं ही सुनी जाती हैं। बोले कि चूके।
प्रार्थना करने में बोलना ही मत। क्योंकि तुम जो भी बोलोगे, गलत बोलोगे। तुम सही तो बोल ही नहीं सकते। सही का तो तुम्हें पता ही नहीं है। सही की तो तुम्हें पहचान ही नहीं है।
तुम प्रार्थना में कहोगे क्या?
तुम अवाक रह जाना; मौन रह जाना। तुम बोलना ही मत। तुम गूंगे हो जाना। तुम्हारी गूंगी प्रार्थना ही पहुंचती है। मैं इसे दोहरा दूं--सिर्फ गूंगी प्रार्थनाएं ही परमात्मा तक पहुंचती हैं; मुखर प्रार्थनाएं नहीं पहुंचतीं--पहुंच ही नहीं सकतीं।
पहली तो बात: तुम्हारी भाषा परमात्मा नहीं समझता। तुम्हारी भाषा तुम्हारी भाषा है; आदमी की ईजाद है। परमात्मा तो मौन की भाषा समझता है। मौन अस्तित्व की भाषा है। हिंदी बोलो, तो हिंदुस्तानियों की भाषा है। अरबी बोलो, तो अरबस्थानियों की भाषा है। चीनी बोलो, तो चीनियों की भाषा है। ये आदमियों की भाषाएं हैं; इनकी सीमाएं हैं।
मौन अस्तित्व की भाषा है। मौन की भाषा ही परमात्मा समझता है।
तो तुम ठीक कहते हो: ‘तुझे क्या सुनाऊं मैं दिलरुबा, तेरे सामने मेरा हाल है।’
सुनाना ही मत; कहना ही मत; बोलना ही मत। रो सको तो रोना। आंसू ज्यादा कुशलता से कह देंगे, जो तुम न कह पाओगे। नाच सको, तो नाचना। नाच सुगमता से कह देगा, जो भाषा न कह पाएगी। नहीं तो चुप बैठ जाना, गूंगे हो जाना। गूंगी प्रार्थनाएं पहुंच जाती हैं।
‘तेरी इक निगाह की बात है,
मेरी जिंदगी का सवाल है।’
यह भी सच है। उसकी एक निगाह की बात है; उसकी एक निगाह काफी है। उसकी एक किरण काफी है--मुरदों को जिला देने को। लेकिन उसकी आंख तुम पर उठे, इसके लिए तुम्हें कुछ करना होगा। आंख ऐसे ही न उठेगी।
तुम तो जो कर रहे हो, वे कुछ ऐसे उपाय हैं कि उसकी आंख कभी उठ ही न सके। या अगर उठे भी, तो तुम बच जाओ। अगर वह देखे भी, तो तुम्हारी पीठ उसकी तरफ है। उसकी आंख तभी कारगर होगी, जब तुम्हारी आंख से मिल जाए। इसे समझना।
अगर तुम परमात्मा की तरफ पीठ किए खड़े हो, तो वह देखता भी रहे, तो क्या होगा? पीठ पर तुम्हारे आंखें नहीं हैं। और हम सब परमात्मा की तरफ पीठ किए खड़े हैं। संसार की तरफ हमारी आंख है, परमात्मा की तरफ पीठ है।
दूसरे की तरफ हमारी आंख है, स्वयं की तरफ हमारी पीठ है। बाहर की तरफ आंख है, भीतर की तरफ पीठ है। नीचे की तरफ आंख है, ऊपर की तरफ पीठ है। और हमारी आंखें जड़ हो गई हैं बाहर की तरफ; भीतर जाती ही नहीं।
आंख बंद कर लो, तो भी आंख भीतर नहीं जाती; फिर भी बाहर ही भटकती रहती है। आंख बंद कर लो, तब भी तुम दुकान ही देखते हो। आंख बंद कर लो, तब भी पत्नी, पति, बच्चे, मित्र, शत्रु--वही दिखाई पड़ते हैं। मुकदमा, अदालत, बाजार--वही सब दिखाई पड़ता है। आंख बंद कर लो, तो भी रुपये, धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा--वही दिखाई पड़ती है। गहरी नींद में जब तुम सो जाते हो, तब भी तुम भीतर नहीं देख पाते। तब भी सपनों का जाल फैलता रहता है।
तुम हर हालत में बाहर हो--आंख खुली है, तो बाहर; आंख बंद है, तो बाहर। भीतर कब आओगे? भीतर आओगे, तो परमात्मा से आंख मिल सकती है; क्योंकि परमात्मा कहीं और नहीं, तुम्हारे भीतर छिपा बैठा है। तुम लौटो घर।
तुम जरा मुड़ो भीतर की तरफ; प्रतिक्रमण करो; प्रत्याहार करो; लौटो भीतर की तरफ; परमात्मा की तरफ आंख करो। उसकी आंख तुम्हारी आंख से मिल जाए, तो बस, एक पल का मिलन काफी है। फिर तुम दुबारा लौट न सकोगे बाहर की तरफ। बंधे रह जाओगे--कीलित--हिल न सकोगे। फिर बाहर कुछ बचता ही नहीं खोजने को। जिसको हम बाहर खोज रहे थे, वह भीतर मिल गया।
यह सुरागी फरोग-ए-मय ये गुलरंग, यह जाम।
चश्म-ए-साकी की इनायत के सिवा कुछ भी नहीं।।
जीवन में जो अपूर्व मस्ती आती है, आनंद आता है, जीवन में जो मदहोशी आती है--‘चश्म-ए-साकी की इनायत के सिवा कुछ भी नहीं।’ वह उसके आंख की कृपा है। वह सिर्फ उसकी आंख का तुम्हारी आंख से मिल जाना है।
मेल नहीं हो रहा है। उसकी आंख तो तुम्हें देखे चली जा रही है।
तुमने यह बात सुनी होगी--बचपन से सुनी होगी--कि परमात्मा तुम्हें देख रहा है; कि हर घड़ी देख रहा है; कि तुम जहां हो, वहीं देख रहा है; कि तुम जो कर रहे हो, वही देख रहा है। तुम उससे हट कर कहीं जा नहीं सकते।
मैंने सुनी है एक सूफी कहानी। एक सदगुरु के पास दो युवक आए और उन्होंने कहा, हमें परमात्मा से मिला दें। हमें उसकी आंख में आंख डाल कर देख लेना है।
उस फकीर ने दोनों की तरफ देखा और दो कबूतर, जो उसके पास ही घूम रहे थे, उसके ही पाले हुए कबूतर थे; उठा कर उसने दोनों को एक-एक कबूतर दे दिया और कहा कि एक काम करो; यह तुम्हारी परीक्षा है। तुम ऐसी जगह चले जाओ, जहां तुम्हें कोई न देख रहा हो, वहां इन कबूतरों को मार डालना। और जब तुम ऐसी जगह पा लो, जहां तुम्हें कोई नहीं देख रहा है और तुम कबूतर को मार डालो, तो लौट आना। फिर आगे की बात शुरू होगी।
दोनों युवक उठे; भागे। एक तो गया पास की गली में; देखा: कोई भी नहीं है; दोपहर थी; लोग सोए थे। गरमी की दोपहर--कौन निकलता है घर से! चारों तरफ देख कर, उसने जल्दी से, दीवाल की आड़ में खड़े होकर कबूतर की गरदन मरोड़ दी। लौट कर आ गया; उसने चरणों में कबूतर रख दिया। कहा कि पास गली में ही मार लाया। यह भी कोई बड़ी बात थी! यह कैसी परीक्षा?
गुरु ने कहा: तुझसे मेरा मेल न बैठ सकेगा। तू किसी और को खोज। मैं तुझे परमात्मा की आंख में आंख डालने का उपाय न बात सकूंगा।
दूसरा युवक तो महीनों तक न लौटा। कहते हैं: साल बीतने लगा, तब वह आया। तब तो उसे पहचानना ही मुश्किल हो गया। दाढ़ी बढ़ गई थी; रूखे बाल। कपड़े जो पहने था, फट गए थे। धूल-धंवास से भरा हुआ। पहचानना मुश्किल था; काला पड़ गया था; और कबूतर जिंदा ले आया था। गुरु के चरणों में कबूतर रख दिया और उसने कहा कि मुझे क्षमा करें; मैं हार गया। यह परीक्षा मैं पास न कर सका; और यह परीक्षा मैं पास न कर सकूंगा। साल भर जो भी मैं कर सकता था, मैंने कर के देख लिया। ऐसी कोई जगह न पा सका, जहां कोई भी न देख रहा हो, अंधेरी गलियों में गया, तलघरों में उतरा; वीरानों में चला गया; रेगिस्तान में गया। तलघरों के भीतर जाकर अंधेरे से अंधेरे में खड़ा हो गया, लेकिन वहां भी कबूतर देख रहा था! टक-टक उसकी आंखें! तो मैंने कबूतर की आंखों पर पट्टियां बांध दीं। लेकिन मैं देख रहा था। तो फिर मैंने अपनी आंखों पर भी पट्टियां बांध लीं। लेकिन तब मुझे याद आया कि परमात्मा तो देख ही रहा है। मैं ऐसी जगह कहां खोजूंगा, जहां परमात्मा न देख रहा हो? यह तो आपने बेबूझ पहेली दे दी। यह कबूतर अपना वापस ले लें; मुझे क्षमा कर दें। मैं हार गया; मैं दुखी हूं कि एक छोटा-सा काम न कर सका, जो आपने दिया था। मैं अयोग्य हूं; मैं अपात्र हूं।
गुरु ने उसे गले लगा लिया और कहा कि तू रुक; काम हो गया; तू परीक्षा में पार उतर गया। तेरा पहला साथी हार गया। वह तो घड़ी भर में मार कर आ गया था! घड़ी भी न लगी थी। वह तो बगल की गली में मार कर आ गया था। उसे तो कुछ तो कुछ होश ही न था; उसे तो कुछ समझ ही न थी कि वह क्या कर रहा है। तुझे होश है; तुझे समझ है। तेरी आंख परमात्मा की तरफ है; मिलन हो जाएगा। इतना ही जिसे याद है कि परमात्मा देख रहा है, फिर बहुत कठिनाई नहीं है।
प्रतीक्षा करो।...
पहली बात: भीतर की तरफ मुड़ो; और दूसरी बात: प्रतीक्षा करो।
मय कशो! मय की कमी-बेशी पर नाहक जोश है।
यह तो साकी जानता है, किसको कितना होश है।।
नाहक शिकायतें मत करो कि मेरे प्याले में बहुत कम डाला; दूसरे के प्याले में बहुत ज्यादा भर दी है शराब।
मय कशो! मय की कमी-बेशी पर नाहक जोश है।
यह तो साकी जानता है, किसको कितना होश है।।
उसे पता है कि तुम्हारी कितनी जरूरत है अभी; तुम कितनी पी सकोगे, तुम कितनी झेल सकोगे।... तो अपनी तैयारी बढ़ाए जाओ। जैसे-जैसे तुम्हारी पात्रता बढ़ती है, तुम्हारा पात्र गहरा होता है, वैसे-वैसे उसकी शराब तुममें ज्यादा उतरने लगेगी। अपनी आंख साफ किए जाओ, जैसे-जैसे तुम्हारी आंख साफ होने लगेगी, वैसे-वैसे उसकी आंख तुम्हारी आंख में झांकने लगेगी। जिस दिन तुम्हारी आंख परिपूर्ण शुद्ध हो जाती है, उस दिन तुम चकित होकर हैरान होओगे कि तुम्हारी आंख और उसकी आंख दो नहीं है, एक ही है।
बड़े अपूर्व संत इकहार्ट ने कहा है कि जब मैंने परमात्मा को वस्तुतः देखा, तो मैं चकित हो गया, क्योंकि मैंने उसे बाहर नहीं देखा; मैंने देखा कि वह मेरी आंख से झांक रहा है। वही देख रहा है। वही मेरे भीतर देखने वाला है; वही द्रष्टा है।
परमात्मा कभी दृश्य नहीं बनता; दृश्य तो कैसे बनेगा? प्राणों का प्राण कैसे दृश्य बनेगा? अंतर्तम हमारा कैसे दृश्य बनेगा? हम उसे कभी सामने रख कर थोड़े ही देख पाएंगे कि ये रहे, इनको सामने रख लिया और देख लिए। परमात्मा तो तुम्हारे भीतर छिपे हुए द्रष्टा का नाम है। तुम्हारी आंख से भी जो देख रहा है, वह परमात्मा ही है। लेकिन यह तो आंख की परम शुद्धि की बात है--जब आंख पूरी तरह भीतर मुड़ी होती है, और आंख पर से सारे धूल के बादल हटा दिए गए होते हैं।
मगर कभी-कभी क्षण भर को झलक मिल जाएगी--उसकी आंख की। अशुद्ध आंखों को भी कभी-कभी उसकी क्षण भर को झलक मिलती है। नहीं तो फिर तो कोई उपाय ही न था।
अंधों को भी कभी-कभी उसकी किरण दिखाई पड़ती है। बहरों के कान में भी कभी-कभी उसकी आवाज पड़ जाती है। क्योंकि वस्तुतः तुम बहरे नहीं हो; बहरे बने हुए हो। और वस्तुतः तुम अंधे नहीं हो; आंख बंद किए बैठे हो। लेकिन कभी-कभी भूल-चूक से तुम्हारी भी आंख खुल जाती है; और भूल-चूक से तुम्हारे कान भी सुन लेते हैं।
परमात्मा से मिलने के पहले--इसके पहले कि उसकी शराब तुम्हारे जीवन में उतरे, कई बार छोटी-छोटी झलकें आएंगी।
देखा किए वो मस्त निगाहों से बार-बार।
जब तक शराब आए, कई दौर हो गए।।
परम समाधि के पहले बहुत से दौर हो जाएंगे। कई बार तुम बहुत करीब आ जाओगे; करीब से करीब आ जाओगे। क्षणभर को एक ज्योति चमकेगी और खो जाएगी, जैसे बिजली चमकती है अंधेरी रात में।
अब बिजली की रोशनी में कोई रास्ता नहीं खोज सकता। आई और गई। लेकिन रास्ता दिख तो जाता है। एक क्षण को तो सब रोशन हो जाता है; सारा जंगल रोशन हो जाता है। एक बात तो पक्की हो जाती है कि रास्ता है। फिर अंधेरा छा जाता है। फिर टटोलना पड़ेगा। फिर खोजना पड़ेगा। लेकिन एक बात तो आस्था बन गई कि रास्ता है; और वही आस्था अंततः मंजिल तक पहुंचा देती है।
इसके पहले कि सुबह हो, बहुत बार बिजली कौंधेगी। लेकिन आदमी ने क्या किया है। बिजली कौंधती भी है, तो वह उसे झुठला देता है।
मेरे पास अनेक बार लोग आते हैं, जिनके जीवन में बिजली कौंधी है और उन्होंने उसे झुठला दिया। उन्होंने सोच लिया कि मन की कल्पना होगी। उन्होंने सोच लिया कि कुछ सपना है। उन्होंने सोच लिया कि मालूम होता है मैं पागल हो रहा हूं! उन्होंने अपने को समझा लिया है। न केवल समझा लिया है, उन्होंने खींच-तान कर अपने को वापस अपनी स्थूल दुनिया में बुला लिया है।
न मालूम कितनी बार तुम्हें मौके आते हैं, जब तुम बहुत करीब होते हो रोशनी के। लेकिन तुम्हारे जीवन भर के अनुभव और रोशनी का अनुभव इतने विपरीत हैं...। और तुम्हारे जीवन के अनुभव का बाहुल्य है, बहुमत है।
जैसे एक आदमी ने निन्यानबे अनुभव तो संसार के किए और फिर एक अनुभव परमात्मा का आया। तो निन्यानबे की भीड़ के कारण वह एक अनुभव झुठला दिया जाता है।
फिर एक और तकलीफ है कि जब बिजली चमकती है, तो तुम्हारे हाथ से नहीं चमकती। अगर कोई कहे: फिर से चमकाओ, तो तुम नहीं चमका सकते। पुनरुक्ति नहीं हो सकती। यह कोई टॉर्च तो नहीं है तुम्हारे हाथ की कि बटन दबा दी; जला ली, बुझा ली। यह विराट की बिजली है। चमकती है, तब चमकती है।
समझो कि तुम बैठो हो और तुमने देखा: परम प्रकाश तुम्हारे भीतर--तुम्हारे बाहर! तुम भागे और तुमने अपनी पत्नी से कहा कि मुझे प्रकाश दिखाई पड़ा है। तो उसने कहा: तो बैठो, मुझे दिखला दो। अब यह कोई टॉर्च तो नहीं है! एवरेडी टॉर्च नहीं है कि बटन तुम दबा दो।
सच तो यह है कि अब अगर तुम बैठे, तो एक बात पक्की है कि यह नहीं होगा; क्योंकि पहली बार जब तुम बैठे थे, तो कुछ करने नहीं बैठे थे। अब तुमने एक नई चीज जोड़ दी--चेष्टा। अब तुम एक तरह का प्रयास कर रहे हो, जो पहली घटना में मौजूद नहीं था। और इतना प्रकाश भरा था कि तुम्हें पूर्ण विश्वास है कि फिर से आ सकता है। पत्नी भी देखेगी; तुम भी देखोगे; पड़ोसी भी देख लेंगे। यह फिर से नहीं आएगा, तब तुम हारे हुए अनुभव करोगे।
पत्नी हंसेगी और कहेगी: मैं पहले से ही जानती थी कि तुम्हारा दिमाग ऊलजलूल बातें सोचता है; कि तुम ये किताबें पढ़-पढ़ कर खराब हुए जा रहे हो; कि तुम अपना होश सम्हालो। बाल-बच्चेदार आदमी हो, काम-धंधा करना है। कहां का प्रकाश? कहां की बातें? कुछ वहम हो गया होगा।
फिर तो तुम्हें भी शक होने लगता है कि हो न हो वहम ही रहा होगा क्योंकि अब तो दुबारा नहीं हो रहा है। फिर तुम कई बार एकांत में भी कोशिश करते हो कि बैठ कर फिर उस प्रकाश को बुला लें। लेकिन वह बुलाने से नहीं आता। वह तो किन्हीं घड़ियों में आता है, जब तुम्हारे भीतर सच में ही तैयारी होती है।
बुलाने से नहीं आता। तुम्हारी चेष्टा से नहीं आता। तुम जब सचमुच ही किसी निर्दोष क्षण में होते हो...। और चेष्टा के कारण निर्दोष तो हो ही नहीं सकते। प्रयास के कारण तुम्हारा मन तो डांवाडोल है। उत्सुकता भरी है; अपेक्षा भरी है; वासना जगी है कि हो जाए। निश्चित ही बड़े आनंद का क्षण था। लेकिन बार-बार कोशिश करके जब तुम हार जाते हो, तो तुम्हें भी पक्का हो जाता है कि ‘हो न हो कल्पना ही थी। अब क्यों नहीं होती!’
यहां रोज ऐसा होता है। ध्यान करने लोग आते हैं; पहली दफा जब ध्यान का अनुभव उन्हें होता है, तो अपूर्व! फिर बस, मुश्किल हो जाती है। पहले ध्यान के अनुभव के बाद बड़ी मुश्किल हो जाती है। जब तक न हुआ था, तब तक भी कम से कम चैन था कि अपने को अभी हुआ नहीं--होगा।
एक दफा हुआ; एक दफा खुल गए कपाट; अचानक तुमने पाया कि तुम मंदिर के भीतर हो--रसमग्न; सब भांति डूब गए। अब बड़ी मुश्किल! अब तुम चाहते हो--रोज-रोज ऐसा हो। इतना स्वादिष्ट था अनुभव; ऐसा मधुर था; तुम चाहो न, तो ही आश्चर्य होगा। तुम्हारी चाह स्वाभाविक है। तुम चाहते हो: अब रोज-रोज हो। जब भी ध्यान करूं, तब हो। अब तुम ध्यान करते हो और नहीं होता। अब तुम जितनी चेष्टा करते हो बुलाने की, उतना ही मुश्किल होता चला जाता है; क्योंकि तुम्हारी चेष्टा में तो तुम मौजूद हो जाते हो। और तुम्हारी मौजूदगी ही बाधा है। और तुम्हारी चेष्टा के कारण ध्यान तो लगता ही नहीं।
ध्यान का तो अर्थ है: निश्चेष्ट हो जाना, वासना-शून्य हो जाना। परमात्मा की वासना भी जब नहीं होती, तभी परमात्मा उतरता है।
तो बुलावे से तो नहीं आता। कभी-कभी आ जाता है, अचानक द्वार पर दस्तक दे देता है; जैसे हवा के झोंके आते हैं; कि सूरज की किरण आती है; कि एक बादल तैरता हुआ आ जाता है; कि रात में बिजली चमक जाती है--अचानक, अनायास; तुम्हारे प्रयास से नहीं। और फिर अड़चन होती है।
फिर जब तुम नहीं ला पाते, बार-बार चेष्टा कर के हार जाते हो, तुम्हारा अहंकार बहुत धूल-धूसरित हो जाता है, तो अहंकार कहता है: मैं पहले ही कहता था कि ये बातें होती नहीं; तुम किसी भ्रांति में पड़ गए; या--या कि किसी ने तुम्हें सम्मोहित कर दिया; या कि भीड़ में लोग थे, और भी लोग इस तरह की भावनाओं में भरे थे; एक वातावरण था, उस वातावरण में तुम डूब गए। मगर बात सच्ची नहीं हो सकती। सच्ची होती तो फिर-फिर आती; जब तुम चाहते, तब आती। यहीं फर्क समझना, विज्ञान और धर्म का भेद यहीं है।
विज्ञान जो अनुभव करता है, वह पुनरुक्ति योग्य है; उसका फिर-फिर प्रयोग हो सकता है। तो विज्ञान की कसौटी यह है कि जिस प्रयोग को बार-बार दोहराया जा सके, वही सच्चा प्रयोग है। समझो।
सौ डिग्री पर पानी भाप बन जाता है। एक दिन तो सौ डिग्री पर बने और दूसरे दिन नब्बे डिग्री पर बन जाए; और तीसरे दिन बने ही नहीं--चाहे तुम दो सौ डिग्री तक गरम करते जाओ! तो फिर कोई विज्ञान का सिद्धांत निर्मित न होगा। तुम लाख चिल्ला कर कहो कि यह बन गया था सौ डिग्री पर एक दिन; अब नहीं बनता; मैं क्या करूं! तो वैज्ञानिक कहेंगे: तुम किसी भ्रांति में पड़ गए, थर्मामीटर तुम्हारा खराब रहा होगा। या कुछ गड़बड़ हो गई; भूल-चूक हो गई। यह पुनरुक्त होना ही चाहिए।
विज्ञान की कसौटी यह है कि वही नियम माना जाएगा, जो पुनरुक्त हो सके। इसी कसौटी के कारण विज्ञान धर्म को नहीं समझ पाता। क्योंकि धर्म का कोई भी अनुभव पुनरुक्त नहीं हो सकता; हो ही नहीं सकता पुनरुक्त। हो गया, हो गया। नहीं हुआ, नहीं हुआ। और कभी अनायास हो जाता है, कभी बहुत प्रयास से नहीं होता। कभी बिन मांगे बरस जाता है और कभी मांग-मांग कर तुम थक जाते हो और एक बूंद भी नहीं आती।
विज्ञान धर्म के विपरीत इसीलिए है कि उसकी जो मौलिक शर्त है कि हर अनुभव पुनरुक्ति योग्य होना चाहिए, वह धर्म पूरा नहीं कर सकता। लेकिन धर्म की भी मजबूरी है; वह पूरा किया नहीं जा सकता।
तो इस कारण बहुत बार अनुभव करने के बाद भी हम उन अनुभवों को झुठला देते हैं या कल्पना मान लेते हैं।
आज से खयाल रखो: जब भी जीवन में कुछ अपूर्व घटे, जिसको तुम न तो समझा सको, और न समझ सको, तो उसे संजो कर रखना। उसे फेंक मत देना। वह दोहरता न हो, तो कल्पना मत कह देना। वह फिर-फिर न आए, तो इनकार मत कर देना।
यह अनुभव ऐसा अपूर्व है कि फिर-फिर आता नहीं। इसे सम्हाल कर रखते जाना। एक अनुभव हुआ, फिर महीनों बीत जाएंगे, दूसरा अनुभव होगा; उसे भी सम्हाल कर रख लेना। ऐसे धीरे-धीरे अनुभव की संपदा बढ़ती जाएगी।
इन्हीं अनुभव के छोटे-छोटे ईंट-पत्थर-गारे से परमात्मा का मंदिर निर्मित होता है। फिर जैसे-जैसे तुम यह जानने लगोगे कि मेरे मांगने से नहीं होता, तो मांगोगे नहीं--और ज्यादा होगा। जब तुम देखोगे कि बिना मांगे खूब होता है, तो फिर तुम मांगोगे ही क्यों! फिर रोज-रोज होगा। जब तुम बिलकुल जान लोगे यह बात कि मेरी जरा सी भी चेष्टा बाधा बन जाती है, तो तुम बिलकुल निश्चेष्ट हो जाओगे।
अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कहि गए, सबसे दाता राम।।
फिर तो तुम अजगर जैसे हो जाओगे। फिर तो तुम पंछियों जैसे हो जाओगे। फिर तो तुम कहोगे: परमात्मा देने वाला है, मैं मांगूं ही क्यों!
दास मलूका कहि गए, सबके दाता राम।
वह देता ही है, तो मांगना क्या? मांग कर और भिखारी क्यों बनना?
जैसे-जैसे तुम्हारी मांग और वासना क्षीण होती जाएगी, तुम पाओगे: अनुभव रोज बरसने लगा। फिर ऐसी घड़ी आ जाती है, जब अनुभव जाता ही नहीं; रोशनी तुम्हें घेरे ही रखती है; उस घड़ी को ही हम संतत्व कहते हैं। जब सत्य तुम्हारे भीतर चौबीस घड़ी बरसता रहता है, तब तुम संत हुए।
ओशो, मैंने सैकड़ों संबंध बनाए--शारीरिक और मानसिक दोनों, लेकिन आखिर में बढ़ती हुई अतृप्ति के सिवाय कुछ भी हाथ नहीं आया। मैं कुछ पकड़ नहीं पाती; सब हाथ से फिसल-फिसल जाता है और मैं बेबस और भयभीत खड़ी देखती रहती हूं; ऐसा क्यों है?
इतना भी साफ हो गया कि इस संसार के सारे संबंध बनते हैं, मिट जाते हैं; हाथ खाली के खाली रह जाते हैं। बड़ा गहरा अनुभव है। इस अनुभव को स्मरण में रखो। अब बार-बार इनको दोहराए मत जाओ। क्योंकि पुनरुक्ति से कुछ बढ़ेगा नहीं। इनसे कुछ सीखो।
अनुभव से जब तुम कुछ सीखते हो, तो ज्ञान निर्मित होता है। और अनुभव को जब तुम दोहराए चले जाते हो, तो मूढ़ता और जड़ता निर्मित होती है।
दुनिया में बहुत कम लोग हैं, जो अनुभव से सीखते हैं। अनुभव से जो सीख ले, वही समझदार है।
एक दिन क्रोध किया: दूसरे दिन क्रोध किया; हजार बार क्रोध किया, अब तक सीखा नहीं! इतने बार क्रोध करके पाया कि कुछ भी नहीं मिलता, तो अब तो रुको! अब तो जाने दो इस क्रोध को। अगर हजार बार क्रोध करके भी तुमने इतनी सी बात सीख ली कि क्रोध में कुछ सार नहीं, तो वे हजार बार का क्रोध भी तुम्हें बहुत कुछ दे गए; वे भी व्यर्थ न गए; उनसे भी तुमने कुछ निचोड़ लिया; कुछ इत्र उनसे भी निचोड़ लिया। अब तुम क्रोध से मुक्त हो जाओ।
हजार बार कामवासना में उतरे और कुछ भी न पाया, तो अब जागो। और फर्क समझ लेना: मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कामवासना को त्यागो। मैं कह रहा हूं: जागो।
त्यागने का तो मतलब यह है कि अभी भी रस लगा है। रस लगने का मतलब है, अभी भी आशा बंधी है। आशा बंधे होने का मतलब है कि क्या पता, अब तक नहीं मिला, आगे मिल जाए; कल मिल जाए; परसों मिल जाए। तो फिर त्यागना पड़ता है। लेकिन जब तुम जाग कर देख लेते हो कि मिलता ही नहीं; मिल ही नहीं सकता...।
जैसे एक आदमी रेत से तेल निचोड़ने की कोशिश कर रहा हो--वर्षों से--और एक दिन जाग कर देखे कि अरे, मैं पागल हूं; रेत के निचोड़ने से तेल कैसे निकलेगा? तिल निचोड़ने से तेल मिलता है। तो फिर त्याग करेगा रेत का? बात खतम हो गई। झाड़ कर उठ बैठेगा। हाथ-पैर से झाड़ देगा रेत; फिर लौट कर भी नहीं देखेगा। बात खतम हो गई। त्याग क्या है इसमें?
जिस दिन तुम्हें लगे: क्रोध में कुछ भी नहीं, काम में कुछ भी नहीं, उठ खड़े हुए; बात खत्म हो गई। त्याग नहीं। तुम व्रत थोड़े ही लोगे जाकर--कि ब्रह्मचर्य का व्रत लूंगा। जिसने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया, उसने तो बता दिया कि अभी समझ आई नहीं। व्रत में ही नासमझी छिपी है। नासमझों के सिवाय व्रत कोई लेता ही नहीं। समझदार क्यों व्रत लेगा? समझदारी पर्याप्त है; व्रत की कोई जरूरत नहीं है।
इतनी बात समझ में आ गई कि यहां कुछ भी नहीं है, बात खत्म हो गई। अब व्रत किसके खिलाफ लेना है? व्रत तो अपने खिलाफ लिया जाता है। डर है कि कल शायद फिर लगने लगे कि है कुछ, तो फिर क्या करूंगा? तो व्रत का बंधन बना लो। कसम खा लो--भीड़ में जाकर, बाजार में--बीच बाजार में खड़े होकर कि मैंने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया। ताकि फिर डर लगे कि अब लोगों से कह चुका; प्रतिष्ठा का सवाल है। अहंकार पर चोट लगे; घबड़ाहट हो कि अब अगर भूल-चूक की, तो लोग क्या कहेंगे?
मगर यह तो कुछ जागना न हुआ। जागरणशील व्यक्ति को व्रत की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हें अव्रती बनाता हूं। तुम्हारे जीवन से सारे व्रत समाप्त हो जाने चाहिए, क्योंकि कोई व्रत क्रांति नहीं लाता। समझ क्रांति लाती है।
इस संसार में सभी क्षणभंगुर है। और इस मन के द्वारा क्षणभंगुर से ज्यादा किसी चीज से कोई संबंध नहीं जुड़ता। शाश्वत से जुड़ना हो, तो मन के पार जाना जरूरी है।
इस दिल-ए-मायूसी की वीरानसाजी कुछ न पूछ।
इसने जब और जो चमन ताका बयांबा हो गया।।
जहां भी यह मन देखेगा, वहीं विकृति हो जाएगी। जहां यह मन अपनी छाप छोड़ेगा, वहीं राख छूट जाएगी।
इस दिल-ए-मायूसी की वीरानसाजी कुछ न पूछ।
इसने जब और जो चमन ताका बयांबा हो गया।।
तुमने अगर फूल भी देखे, तो कुम्हला जाएंगे। तुमने हरे-भरे वृक्ष को देखा--सूख जाएगा।
इस मन के द्वारा शाश्वत से कोई संबंध ही नहीं जुड़ता। इस मन का संबंध ही क्षण भर का है। क्षण भर है; अभी है, अभी नहीं है। अभी सब ठीक; अभी सब गलत। अभी प्रेम, अभी घृणा। अभी करुणा, अभी क्रोध। अभी लुटाने को तैयार थे, अब लूटने को तैयार हो गए। इस मन के साथ इससे ज्यादा कुछ भी नहीं हो सकता। और इस मन के फैलाव का नाम संसार है।
तो जागो। कहीं ऐसा न हो, जैसा कि अधिकतर होता है। जीवन भर लोग जीते हैं, मगर सीखते कुछ भी नहीं।
चुन लिए औरों ने गुलहा-ए-मुराद।
रह गए दामन ही फैलाने में हम।।
चुन लिए औरों ने गुलहा-ए-मुराद।
रह गए दामन ही फैलाने में हम।।
कहीं ऐसा न हो कि दूसरे तो फूल चून लें और तुम दामन ही फैलाते रहो और मौत आ जाए।
किन फूलों की बात कर रहा हूं? उन फूलों की बात कर रहा हूं, जो इस जीवन के प्रत्येक अनुभव में से निःसृत होते हैं।
क्रोध किया; पाया--व्यर्थ है; एक फूल चूना। काम किया; पाया--व्यर्थ है; एक फूल और चुना। लोभ किया; पाया--व्यर्थ है; एक फूल और चुना। चुनते गए फूल। इन्हीं सारे फूलों की माला एक दिन बन जाती है। उसी माला को ही तो परमात्मा के चरणों में अर्पित करना है।
अगर नहीं चुने फूल; फिर-फिर क्रोध में उतरे, फिर-फिर वासना में उतरे, तो बस, दामन ही फैलाने में समय बीत जाएगा।
तो कुसुम को कहता हूं: अब जाग। देखा सब; देखना जरूरी था। सिर्फ एक बात का खयाल रखना कि कुछ भी नहीं मिलता, व्यर्थता मिलती है और जीवन में बेचैनी बढ़ती है--यह तेरा अनुभव होना चाहिए। ऐसा न हो कि जल्दबाजी हो। ऐसा न हो कि लोभ के कारण यह प्रश्न लिखा हो, तो चूक हो जाएगी।
अक्सर ऐसा भी हो जाता है। संतों की वाणी पढ़ते, संतों के वचन सुनते लोभ जगता है। और उनकी वाणी के प्रभाव में ऐसा लगता है कि ठीक ही तो कहते हैं। मगर उनके ठीक से कुछ भी न होगा।
मेरा ठीक, तुम्हारा ठीक नहीं है। तुम्हारा ठीक ही तुम्हारा ठीक है। मेरा बोध, मेरा बोध है; तुम्हारा बोध नहीं बनेगा। मैं लाख कहूं कि क्रोध में कुछ भी नहीं, और तुम सुन भी लो, समझ भी लो, बुद्धि से बात जंच भी जाए, मगर इससे कुछ सार न होगा; जब तक कि तुम्हारे जीवन के अनुभव से यह निष्पत्ति न निकले।
तो बस, एक ही बात खयाल रखना: जल्दबाजी मत करना।
मेरे साथ इतना स्मरण रखना सदा जरूरी है कि लोभ में मत पड़ना। हां तुम्हें लग गया हो कि कोई सार नहीं है--शारीरिक संबंधों में, तो बात खत्म हो गई। मेरे कहने से मत कर लेना अन्यथा फिर लौट कर आएगी यह वासना। फिर डुलाएगी; फिर खींचेगी-तानेगी। और दमन शुरू हो जाएगा। और दमन के मैं बिलकुल विपरीत हूं। जागरण ठीक; दमन तो रोग लाता है।
नहीं कुछ यहां मिलने को है, इसलिए जल्दबाजी भी करने की जरूरत नहीं है। नहीं, कुछ मिलता ही नहीं है, तो फिर घबड़ाना क्या!
तुम्हारे तथाकथित महात्मा बड़े घबड़ाए होते हैं। घबड़ाहट भी क्या? यहां कुछ मिलने को तो है नहीं। तुम रेत से ही तेल निचोड़ रहे हो; और थोड़ी देर निचोड़ो। कुछ मिलने को नहीं है; कुछ खोने को नहीं है। मगर तुम्हारे ही भीतर यह किरण उतर आए, कि यह रेत है, तभी छोड़ देना; उसके पहले मत छोड़ना। अधकच्चे मत गिर जाना वृक्ष से, नहीं तो कड़वे रह जाओगे।
इसलिए तुम्हारे तथाकथित महात्मा बड़े कड़वे रह जाते हैं। जीवन का माधुर्य नहीं होता, कड़वाहट होती है। क्रोध से भरे होते हैं; निंदा से भरे होते हैं; क्योंकि जिस-जिस बात को छोड़ दिया है, वह छूटी तो नहीं थी अभी। छोड़ बैठे हैं। अभी भी राग है; अभी भी भीतर रंग उठता है; अभी भी वासना उद्वेलित होती है। उस वासना से लड़ने के लिए रोज उस वासना को गाली देनी पड़ती है।
अगर तुम किसी महात्मा को सुनने जाओ और वह कामिनी और कांचन को ही गाली देने की बात कर रहा हो, तो समझ लेना कि कामिनी-कांचन उसके पीछे अभी भी पड़े हैं। नहीं तो क्या जरूरत है--चौबीस घंटे कामिनी-कांचन के पीछे पड़े रहने की!
वक्त की कुछ पीढ़ियों के बाद आखिर क्या मिलेगा?
उम्र की इन सीढ़ियों के बाद आखिर क्या मिलेगा?
पत्थरों को सर झुकाने का चला है सिलसिला।
पाप की परछाइयों में पुण्य है फूला फला।।
रामनामी ओढ़ने के बाद आखिर क्या मिलेगा?
दूरियों को पास लाने की बड़ी है कशमकश।
बर्फ में बरसों सुलाने की हुई है पेशकश।।
श्यास की इन सरदों के बाद आखिर क्या मिलेगा।
वक्त की कुछ पीढ़ियों के बाद आखिर क्या मिलेगा।।
क्या मिलने को है यहां? जैसे दिन गए, अभी और दिन जाएंगे। जैसे वक्त बीता, और वक्त बीतेगा। समय में कुछ मिलता ही नहीं। समय एक सपना है, जो सिर्फ बीतता है, रीतता है--मिलता कुछ भी नहीं।
मगर अगर इतनी ही बात मिल जाए--कि समय में कुछ नहीं मिलता, तो हीरा हाथ लगा; तो बड़ा बहुमूल्य हीरा हाथ लगा। फिर इसी हीरे के सहारे तो तुम परमात्मा तक पहुंच सकते हो। मगर कच्चा न हो हीरा। हीरा कच्चा हो--तो कोयला। कोयला पक जाए--तो हीरा।
तुम्हें पता है न कि कोयला और हीरा दोनों एक ही तरह की चीजें हैं। उनमें फर्क कच्चे और पक्के का है। हीरे और कोयले का रसायन बिलकुल एक जैसा है। दोनों एक ही तत्व से बने हैं। जिसको तुम हीरा कहते हो, वह हजारों-हजारों साल पृथ्वी के अंतर्गर्भ में दबा हुआ कोयला है। दबता--दबता--दबता--दबता--उस दबाव के कारण इतना मजबूत और सख्त हो गया है कि अब हीरा है। कोयला ही था पहले। कोहिनूर भी कोयला था; लाखों वर्षों की प्रक्रिया और दबाव के बाद हीरा बन गया है।
कोयला और हीरा में फर्क नहीं है। पक जाए, तो हीरा। तो पक जाने का खयाल रखो। तुम्हारा काम पक जाए, तो राम। तुम्हारा क्रोध पक जाए, तो करुणा।
जिंदगी पकने का एक अवसर है।
ओम। समझ में कुछ नहीं आता, ओशो! समझाएं। राम तो बस, राम ही हैं; राम किसके गीत गाएं?
राम का गीत तो तभी तक गाना पड़ता है, जब तक राम से दूरी है। फिर तो राम ही तुम्हारे भीतर गाएंगे; अपना ही गीत गाएंगे--स्व-गीत।
यह सारा जो विराट चल रहा है, यह राम अपना ही गीत गा रहे हैं। वृक्षों में राम हरे हैं; पक्षियों के कंठ में राम अनेक-अनेक ध्वनियों में प्रकट हुए हैं। सरिताओं में, सागरों की कलकल में राम का कलकल नाद है।
यह सारा नाद ब्रह्मनाद है। यह अनाहत ही चल रहा है। जिस दिन पहचानोगे, उस दिन पाओगे: राम अपना ही गीत गा रहे हैं। और किसका गीत गाने को है?
राम अपना ही नाच नाच रहे हैं। राम गुनगुना रहे हैं। लेकिन जब तक यह पहचान नहीं हुई, तब तक तुम्हें लगता है: तुम अलग, राम अलग। तब तक राम का गीत गाना है। जब तक दूरी है, तब तक राम का गीत गाना है। ऐसा राम का गीत गाते-गाते दूरी मिट जाएगी। जिस दिन दूरी मिट जाएगी, तुम राम के गीत हो जाओगे, तुम राम हो जाओगे। वही तो मलूक ने कहा: साहब--साहब हो गए। थे वही--वही हो गए। थोड़ी देर बीच में भूल गए थे कि मैं कौन हूं। थोड़ी देर आत्म-विस्मरण हो गया था।
परमात्मा तुमसे दूर नहीं है, सिर्फ आत्म-विस्मरण हो गया है।
तुम पूछते हो: ‘समझ में कुछ नहीं आता।’
समझ में आने की बात भी नहीं है। हृदय में आने की बात है। समझ में आने की बात भी नहीं है। समझ से तो सावधान। समझ यानी बुद्धि की।
हृदय की समझ जगाओ। हृदय की समझ यानी प्रेम; बुद्धि की समझ यानी तर्क; बुद्धि की समझ यानी विचार। हृदय की समझ यानी श्रद्धा।
तुम कहते हो: ‘समझ में कुछ नहीं आता।’
बुद्धि से समझने की कोशिश कर रहे होओगे, तो कुछ भी समझ में न आएगा। क्योंकि ये बुद्धि-अतीत बातें हो रही हैं; ये मलूकदास--ये बुद्धि के बाहर गए हुए लोग हैं। यह जो मस्ती, यह जो शराब--ये बुद्धि से बाहर जाने के उपाय हैं। यह बुद्धि से समझ में आएगा न। यह गणित नहीं है, जिसे तुम हल कर लोगे। यह पहेली नहीं है, जिसको तुम सुलझा लोगे। यह जीवन का रहस्य है, इसे तुम जीओगे, तो ही जानोगे। इसका स्वाद लोगे, तो जानोगे। चखो।
समझ पर ही अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता है। समझ पर ही सत्य समाप्त नहीं हो जाता है। समझ ज्यादा से ज्यादा तुम्हें मंदिर के द्वार तक ला सकती है; मंदिर के भीतर न ले जा सकेगी। मंदिर के भीतर जाना हो, तो समझ को वहीं छोड़ देना होगा, जहां तुम जूते छोड़ आते हो; वहीं समझ भी रख आनी पड़ेगी; बुद्धि वहीं रख आनी पड़ेगी। भीतर तो निर्बुद्धि होकर जाओगे, बालक की तरह निर्दोष होकर जाओगे, तो ही पहुंचोगे।
जीसस ने कहा है: जो बच्चों की भांति सरल हैं, वे ही केवल मेरे प्रभु के राज्य में प्रवेश कर सकेंगे और दूसरे नहीं।
तो तुम पूछते हो: ‘समझाएं।’
रोज तो समझा रहा हूं। समझाने से समझ में आएगा भी नहीं। फिर भी समझाता हूं। समझाने से इतना भी समझ में आ जाए कि समझाने से समझ में नहीं आता, तो कुछ बात बनी। तो तुम द्वार पर आकर खड़े हो गए।
एक दिन तो थक जाओगे--समझने से, समझाने से। एक दिन तो घबड़ा जाओगे--समझने से, समझाने से। एक दिन तो कहोगे कि अब बहुत हो गई बुद्धि; अब बुद्धि को छोड़ते हैं। एक दिन तो बुद्धि बोझरूप हो जाएगी। और वह बड़े सौभाग्य का क्षण है, जब बुद्धि बोझरूप हो जाती है; तभी उठती है प्रार्थना; तभी उठता है प्रेम; तभी उठती है पूजा।
जिसकी जिल्लत में भी इज्जत है, सजा में भी मजा।
कुछ समझ में नहीं आता कि मोहब्बत क्या है।।
कुछ समझ में नहीं आता...
प्रेम समझ में थोड़े ही आता है। प्रेम तुमसे बड़ा है; समझ में आएगा कैसे? तुम्हारी मुट्ठी बहुत छोटी है; प्रेम बड़ा आकाश है--मुट्ठी बांधी कि खो जाएगा। अगर आकाश को चाहिए हो मुट्ठी में, तो मुट्ठी मत बांधना। खुले हाथ में तो आकाश होता है, बंद हाथ में आकाश खो जाता है।
हृदय को खोलो। खुला हुआ हृदय--और तुम समझ पाओगे। एक और ही तरह की समझ; एक दूसरी तरह की ही समझ; एक पृथक ढंग की ही समझ।
प्रार्थना में लगो। राम को गुनगुनाओ; राम के गीत गाओ। असली बात तो गीत गाना है--राम तो बहाना है। तुम गीत गा सको, इसके लिए राम की खूंटी का सहारा ले लो। तुम गुनगुना सको; तुम नाच सको; तुम्हारे हृदय में छिपी हुई मुस्कुराहट ओंठों तक आ जाए और तुम्हारे भीतर भरा हुआ मधुकलश छलकने लगे...।
बस, राम तो बहाना है। राम से कुछ लेना थोड़े ही है; राम से कुछ देना थोड़े ही है। इसलिए कोई भी नाम काम दे देगा। अल्लाह के गीत गाओ; खुदा के गीत गाओ; कि राम के, कि कृष्ण के--इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता।
गीत गाना सीख लो। प्रार्थना उठने लगे। जीवन से एक ऐसा संबंध बनने लगे, जो बुद्धि का नहीं है--हृदय का है।
समझो; गुलाब का फूल खिला। तुम उसके पास जाकर खड़े हुए। बुद्धि का संबंध तो यह है कि तुम सोचो: अरे! बड़ा सुंदर गुलाब! कहां से आया? ईरान से आया? कहां से आया? ऐसा गुलाब कभी देखा नहीं; इतना सुंदर! इतना बड़ा फूल! बहुत देखे गुलाब, मगर ऐसा गुलाब नहीं देखा। ऐसी बहुत सी बातें सोचने लगो, विचार करने लगो, तो गुलाब से यह बुद्धि का संबंध हुआ।
खिला गुलाब; तुम गुलाब के पास आए। आंखें भर गईं गुलाब से। नासापुट भर गए गुलाब की गंध से। तुम नाचने लगे। ऐसा गुलाब कभी खिला नहीं था! तुम गीत गुनगुनाने लगे। तुमने गुलाब की स्तुति में एक गीत गाया; कि तुम नाचे; कि तुमने बांसुरी बजाई। यह संबंध दूसरे ढंग का हुआ; यह बुद्धि का न हुआ।
कभी नाचे हो गुलाब के फूल के चारों तरफ मग्न होकर कि ऐसा फूल खिला? तुमने प्रभु को धन्यवाद दिया है? रोए हो कभी; आनंद के आंसू बहाए हैं कभी गुलाब के पास खड़े होकर? तो एक दूसरे तरह का संबंध बना।
रात को आकाश में चांद देखा, तो सोचने लगे कि चांद की लंबाई-चौड़ाई कितनी है। मिट्टी-पत्थर हैं--क्या है? खाई-खड्डे हैं--क्या है? वैज्ञानिक सोचता है; चूक जाता है। जो आदमी चांद पर चल कर आए हैं, वे भी चूक गए। क्योंकि वह सब सोच-विचार का संबंध है। और भी तरह के लोग इस जमीन पर हुए हैं; कवि हुए हैं, रहस्यवादी हुए हैं; चांद पर कभी नहीं गए। चांद निकला--पूरा चांद निकला--और नाचे।
पूर्णिमा की रात और तुम नाचो ना, तो जरूर तुम्हारे भीतर कुछ मुरदा जैसा है। पूर्णिमा की रात और तुम गीत न गाओ, पूर्णिमा की रात और तुम आकाश को एकटक देखते न रह जाओ; भावविह्वल न हो उठो...! सागर जैसी चीज भी, जड़ चीज भी लहराने लगती है--पूर्णिमा की रात और तुम बिना लहराए रह जाते हो! सागर उत्तुंग तरंगें लेने लगता है, और तुम्हारे भीतर कोई मदमस्ती नहीं आती।
बुद्धि ने खूब पथराया है तुम्हें। आंखों ने देखने की क्षमता खो दी है। हृदय में अंकुरण नहीं होता। पूरे चांद की रात तुम अगर नाच सको, तो एक तरह का संबंध बना। और मैं तुमसे कहता हूं कि जो आदमी चांद पर चल कर आए हैं, उनसे गहरा संबंध बना। चांद पर चलने से क्या होगा? तुम चांद के ज्यादा करीब पहुंच गए; तुमने चांद की आत्मा को छुआ।
जिन्होंने इस देश में कहा था कि चांद में देवता का निवास है, वे ज्यादा सच थे। चांद में देवता का निवास उसी क्षण हो जाता है, जिस क्षण चांद तुम्हारे हृदय को आंदोलित कर देता है। उस क्षण चांद फिर चांद नहीं रह गया--चंद्रदेव हो गया।
सूरज को जिन्होंने नमस्कार किया था इस देश में; पानी का अर्घ्य चढ़ाया; सुबह-सुबह नदी के तट पर खड़े होकर ओंकार की ध्वनि की, उन्होंने ज्यादा सूरज को समझा था। वह समझ और ढंग की है। खयाल कर लेना। वह समझ वैज्ञानिक नहीं है; बुद्धिगत नहीं है। उन्होंने देखा सूरज में--जीवन को उगते। सूरज हमारा जीवन है; उसके बिना हम न हो सकेंगे। हम सूरज की किरणें हैं। हम सूरज के बिना एक क्षण न हो सकेंगे।
जो हमारा स्रोत है, उसको देख कर हम नाचें न! और जो हमारा स्रोत है, उसको देख कर हम झुकें न, तो चूक हो गई। यह एक और तरह का देखना है; यह एक और तरह का समझना है।
तो मैं तुमसे यही कहूंगा...। और जिसने पूछा है यह प्रश्न, उनका नाम है--स्वामी प्रेम सागर! तुम्हें नाम ही दिया--प्रेम सागर! अभी भी तुम समझने की बातें कर रहे हो? अब तो समझने की नासमझी छोड़ो। अब तो प्रेम की नासमझी पकड़ो।
तुम मुझे दे दो महकती गंध जीवन के लिए
मांगता हूं आज कुछ अनुबंध जीवन के लिए
याचना मेरी धरोहर सी रहे बन कर सदा
तुम मुझे दो आज यह सौगंध जीवन के लिए
दर्द में डूबी हुई मन की सतह को ढूंढ दें
चाहता है ऐसे सहज संबंध जीवन के लिए
जी बिना बोले गुजर जाती तुम्हारे पास से
तुम मुझे दे दो वही मकरंद जीवन के लिए
जिंदगी का गीत भी अब तक अधूरा ही पड़ा
नेह में डूबे हुए दो छंद जीवन के लिए
तुम मुझे दे दो महकती गंध जीवन के लिए।
अब तो प्रभु से उस गंध को मांगो, जो जीवन को महका दे। अब तो प्रभु से उस छंद को मांगो, जो तुम्हारी जिंदगी को गीत बना दे।
अभी तो राम का गीत होगा--शुरुआत--बारहखड़ी--क ख ग। अभी तो राम का गीत होगा। अभी तो राम तुम्हें पराया मालूम पड़ेगा, तो उसके गीत गाओगे। अभी तो भक्त बनोगे--भगवान दूर। फिर धीरे-धीरे करीब आओगे। फिर बहुत करीब आओगे। फिर एकदम भगवान के आर-पार हो जाओगे। और तब तुम न पहचान सकोगे कि कौन भक्त है--और कौन भगवान। तब भी गीत उठेगा, लेकिन तब राम ही अपना गीत गाएंगे; तब प्रभु ही नाचेंगे।
इसके पहले कि प्रभु तुम्हारे भीतर नाच सकें, और तुम प्रभु में नाच सको, नाच तो सीख लो।
जब हम होते तब तू नाहीं,
अब तू ही है मैं नाहीं।
मिलन और मिलन में भेद है। दो कंकड़ों को पास रख दो; बिलकुल पास रख दो--सटा कर पास रख दो। तो एक तरह का मिलन हुआ। दोनों अभी अलग-अलग हैं; सिर्फ परिधि छूती है। बाहर का जरा सा हिस्सा छूता है। भीतर दोनों अलग-अलग हैं मिल कर भी टूटे हैं। दो तो अभी दो हैं, तो मिले कहां?
फिर पानी की दो बूंदों को पास ले आओ। सुबह जाओ; घास के पत्तों पर जमी हुई ओस की दो बूंदों को पास ले आओ। पास आती बूंदें--पास आईं--आईं, जब तब बिलकुल पास न आईं, तब तक दो हैं। जैसे ही पास आ गईं, एक हो गईं।
एक यह भी मिलन है। यहां अद्वैत हो गया। दो दो न रहे। यही वास्तविक मिलन है; क्योंकि दो कंकड़ पास आकर भी कहां पास थे? एक दूसरे के प्राण में नहीं डूबे थे। एक दूसरे के केंद्र से मिले नहीं थे। बाहर-बाहर परिधि-परिधि मिली थी। ये जो दो बूंद ओस की आकर पास खो गईं, ये जो शबनम की दो बूंदें एक दूसरे में लीन हो गईं, अब पहचानना भी मुश्किल है कि कौन-कौन है। अब तुम उन्हें दुबारा अलग न कर सकोगे--पुराने ढंग से--कि यह पुरानी नंबर एक, यह नंबर दो। अब तो मेल हो गया।
परमात्मा दूसरे ढंग का मिलन है। जैसे दो ओस की बूंदें मिलतीं--ऐसा। इस संसार का प्रेम दो कंकड़ जैसा प्रेम है। जैसे पति-पत्नी मिलते, मित्र मिलते। ये सब दो कंकड़ करीब आते--बस; बहुत करीब आ जाते, तो भी दूर बने रहते, अलग बने रहते, थलग बने रहते।
परमात्मा ऐसे है, जैसे बूंद सागर में उतरती है। लीन हो गई। सच है; इसलिए संतों ने कहा है कि जब तक मैं हूं, तब तक तू नहीं। और जब तू होता है, तो मैं नहीं होता। एक ही बचता है।
कबीर ने कहा है:
प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाय।
ये दो जहां नहीं समाते, उस गली में ही समा जाने का नाम भक्ति है। भक्त और भगवान एक हो जाते हैं।
इसलिए तुम्हारा पूछना कि ‘तो फिर मिलन कहां हुआ?’ एक अर्थ में ठीक है। अगर तुम पहले मिलन का हिसाब रखते हो, तो दूसरा मिलन मिलन नहीं। अगर तुम दूसरे को मिलन कहते हो, तो पहला मिलन मिलन नहीं। तुम समझ लो; तुम्हें जो कहना हो। शब्दों में कुछ सार नहीं है।
‘कैसा हुआ? किसका हुआ? कहां हुआ?’
तुम ‘मिलन’ शब्द के ये दो अर्थ खयाल में ले लो। दो कंकड़ों का मिलन; अगर तुम उसको मिलन मानते हो, तो फिर परमात्मा से मिलन को मिलन नहीं कहना चाहिए। अगर तुम कहते हो, मिलन की वही परिभाषा है--और किसी ढंग का मिलन स्वीकार नहीं होगा, तो फिर परमात्मा और भक्त का मिलन मिलन नहीं कहा जा सकता; लीनता कहो; विसर्जन कहो; नाम से कुछ फर्क नहीं पड़ता।
अगर तुम कहते हो कि दूसरा मिलन ही वास्तविक मिलन है, क्योंकि पहले मिलन में तो मिलन हुआ कहां! दो तो दो ही बने रहे। पास आ गए; मिलन कहां हुआ? अगर दूसरे को मिलन कहते हो, तो भी चलेगा। तो फिर पहले को मिलन मत कहो; संग-साथ कहो--मिलन मत कहो। संबंध कहो--मिलन मत कहो।
मगर भाषा में अब तक दोनों प्रयोग होते रहे हैं। मिलन के दोनों अर्थ हैं: एक संबंध का और एक विसर्जन का।
भाषा पर मत अटकना; शब्दों पर मत अटकना; सार को ग्रहण करना।
जहां भी भाषा बाधा बने, वहां स्मरण रखना। जहां शब्द बहुत अतिशय हो जाए, वहां खयाल रखना।
यह परमात्मा की यात्रा--भाषा के बाहर यात्रा है; यह शब्दातीत है। यहां शब्द पीछे छोड़ जाने हैं। इसलिए शब्दों के साथ बहुत माथा-पच्ची मत करना अन्यथा तुम कभी भी इस परम निगूढ़ सत्य को न समझ पाओगे।
इसलिए परमात्मा के संबंध में जितने शब्द उपयोग किए गए हैं, सब विरोधाभासी हैं। कहते हैं: परमात्मा से मिलन, लेकिन विरोधाभासी बात है, क्योंकि न तो मिलने वाला बचा, न वह बचा जिससे मिलना है। दोनों खो गए।
कहते हैं: परमात्मा बहुत दूर; और यह भी कहते हैं कि परमात्मा बहुत पास; दोनों बातें कैसे साथ होंगी? कहते हैं: परमात्मा को खोजना है; और यह भी कहते हैं कि परमात्मा तुम्हारे भीतर मौजूद है। ये दोनों बातें साथ कैसे होंगी? पर ये दोनों बातें साथ हो रही हैं।
हमारी भाषा द्वंद्वात्मक है; हमारी भाषा में हर चीज में द्वंद्व है। और परमात्मा का अस्तित्व निर्द्वंद्व है। निर्द्वंद्व के लिए, द्वंद्वातीत के लिए हमारी भाषा समर्थ नहीं है प्रकट करने में। इसलिए जो भी हम बोलते हैं परमात्मा के संबंध में, उसे बच्चे की तुतलाहट समझना। जो भी कहा गया है, परम से परम ज्ञानियों ने भी जो कहा है, वह बच्चों की तुतलाहट है। ऐसा स्मरण रहे, तो तुम्हारे मन में व्यर्थ की झंझटें खड़ी न होंगी और व्यर्थ के प्रश्न न उठेंगे।
निष्प्रश्न हो गया चित्त ही उसके प्रति खुलता है।
निःशब्द हो गया चित्त ही उसके प्रति खुलता है।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Why is there fear and objection to drinking with drunkards?
According to Osho, people fear and object to drinking with drunkards because their ecstatic, uncontrollable energy threatens our dependence on crowds, tradition, and self-control. The intoxicated saint exposes our insecurity: to join their celebration we must drop control and stand alone. Fear hides in groups; ecstasy dissolves them. Hence society resists the drunkard’s freedom and condemns his company.
In simple terms: We avoid drinking with drunks because their joyful wildness makes us let go of control and crowd-comfort, and that scares us.
What is the meaning of existence?
According to Osho, existence isn’t a problem to be solved but the divine’s self-song—Ram/Brahman eternally singing, dancing, flowering through all forms. Meaning appears when the felt distance dissolves: you stop 'understanding' with the head and awaken the heart’s trust, love, and direct tasting. Then you don’t sing about Ram—you become the song itself, remembrance replacing self-forgetfulness.
In simple terms: Life’s meaning is to feel and live the one great song behind everything, not think about it—love, trust, and experience until you sense no separation.
What happens when I experience dissatisfaction in relationships?
According to Osho, dissatisfaction in relationships is not your fault; it’s insight. Worldly bonds are like mirages—beautiful yet empty—so their failure reveals their nonessential nature. Learn from this and wake up, rather than repeat or renounce. With clear seeing, clinging, lust, and anger fall away naturally—no vows needed—and attention shifts from the transient to the essential.
In simple terms: When relationships feel empty, take it as a wake-up call to stop chasing them for lasting happiness and turn to clear understanding instead of making strict vows.
What is the significance of love in my life?
According to Osho, love is the Divine’s glance—one moment of true love or grace that floods a whole lifetime with meaning. It is not accumulation but intensity: a single touch from the beyond can transform your entire being. Therefore, the significance of love is total: it awakens, sanctifies, and orients life toward presence, gratitude, and surrender.
In simple terms: Love is like one warm look from something bigger than you that makes your whole life feel bright and worth living.
