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सूत्र
नैन के झरौखे मांहि झांकत न देखिए।
नाक के झरौखे मांहि नैकु न सुबास लेत,
कान के झरौखे मांहि सुनत न लेखिए।।
मुख के झरौखे मैं बचन न उचार होत,
जीभ हूं कौ षटरस स्वाद न विशेखिए।
सुंदर कहत कोऊ कौन विधि जानै ताहि,
कारौ पीरौ काहू द्वार जातौ हू न पेखिए।।
बोलिए तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ,
न तौ मुख मौन करि चुप होइ रहिए।
जोरिएऊ तब जब जोरिबौऊ जानि परै,
तुक छंद अरथ अनूप जामैं लहिए।।
गाइएऊ तब जब गाइबै कौ कंठ होइ,
श्रवण कै सुनत ही मन जाइ गहिए।
तुकभंग छंदभंग अरथ मिलै न कछु,
सुंदर कहत ऐसी बानी नहिं कहिए।।
एकनि के बचन सुनत अति सुख होइ,
फूल से झरत हैं अधिक मनभावने।
एकनि के बचन अशन मानौ बरषत,
श्रवण के सुनत लगत अलखावने।।
एकनि के बचन कंटक कटु विषरूप,
करत मरम छेद दुख उपजावने।
सुंदर कहत, घट घट में बचन भेद,
उत्तम मध्यम अरु अधम सुनावने।।
जल कौ सनेही मीन बिछुरत तजै प्राण,
मणि बिन अहि जैसे जीवित न लहिए।
स्वाति बूंद के सनेही प्रगट जगत मांहिं,
एक सीप दूसरौ सु चातकऊ कहिए।।
रवि को सनेही पुनि कंवल सरोबर मैं,
ससि कौ सनेहीऊ चकोर जैसैं रहिए।
तैसें ही सुंदर एक प्रभु सौं सनेह जोरि,
और कछु देखि काहू बोर नहिं बहिए।।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
How to put the instruction into practice after experiencing joy and understanding?
According to Osho, after joy and understanding, do nothing to ‘practice’; trust awareness itself. Forget the words; if insight is real, it sinks inward and expresses outward as conduct without effort. Stop forcing character; stay close, listen, and dive in with alertness. When the inner shifts, the outer follows naturally—practice then happens by itself.
In simple terms: Don’t try to do anything; if you truly understand, your actions will change on their own—just keep listening and being aware.
What happens when I surrender myself completely?
According to Osho, when you surrender totally, the self-made hell drops in an instant, like iron touched by a touchstone turning to gold, leaving you unburdened, joyous, carefree, ready to dance and sing. The transformation is real and immediate, though others may doubt to protect their egos. Understand their fear, don't react; keep moving with trust and courage.
In simple terms: When you truly let go, the heavy bag in your heart drops and you feel light and happy, even if others say it’s pretend.

Osho's Commentary
कलैव ब्रह्म!--कला ही ब्रह्म है। ऐसा उपनिषद के ऋषियों का वचन है। पर कौन सी कला? उपनिषद के ऋषि मूर्तिकला की बात तो न करेंगे, न ही चित्रकला की, न नाट्यकला की। किस कला को ब्रह्म कहा होगा?
एक कला है जो पत्थर में छिपी मूर्ति को निखारती, उघाड़ती है। एक कला है जो शब्द में पड़े छंद को मुक्त करती है। एक कला है जो वीणा में सोए संगीत को जगाती है। और एक कला है जो मनुष्य में सोए ब्रह्म को उठाती है। उस कला की ही बात है।
मनुष्य की मिट्टी में अमृत छिपा है। मनुष्य की कीचड़ में कमल छिपा है। उस कला को जिसने सीखा, उसने धर्म जाना। हिंदू या मुसलमान या जैन होने से कोई धार्मिक नहीं होता। मंदिर-मस्जिदों में पूजा और प्रार्थना करने से कोई धार्मिक नहीं होता। जब तक अपनी मृण्मय देह में चिन्मय का आविष्कार न हो जाए, तब तक कोई धार्मिक नहीं होता। जब तक स्वयं की देह मंदिर न बन जाए उस देवता का; जब तक अपने ही भीतर खोज न लिया जाए खजाना और साम्राज्य--तब तक कोई धार्मिक नहीं होता।
धर्म सबसे बड़ी कला है, क्योंकि इस जगत में सबसे बड़ी खोज ब्रह्म की खोज है। जो ब्रह्म को खोज लेते हैं, वे ही जीते हैं। शेष सब भ्रम में होते हैं--जीने के भ्रम में। दौड़-धूप बहुत है, आपा-धापी बहुत है, लेकिन जीवन कहां है? जीवन उन थोड़े से लोगों को ही मिलता है, जीवन का रस उन थोड़े ही लोगों में बहता है--जो खोज लेते हैं उसे, जो भीतर छिपा है; जो जान लेते हैं कि मैं कौन हूं।
उपनिषद परिभाषा भी करते हैं कला की: ‘कलयति निर्माययति स्वरूपं इति कला।’ जो स्वरूप का निर्माण करती है वह कला है। तब फिर ठीक ही कहा है: कलैव ब्रह्म। तो कला ब्रह्म है। तो कला धर्म है। तो कला जीवन का सार-सूत्र है।
सुंदरदास उन थोड़े से कलाकारों में एक हैं जिन्होंने इस ब्रह्म को जाना। फिर ब्रह्म को जान लेना एक बात है, ब्रह्म को जनाना और बात है। सभी जानने वाले जना नहीं पाते। करोड़ों में कोई एकाध जानता है और सैकड़ों जानने वालों में कोई एक जना पाता है। सुंदरदास उन थोड़े से ज्ञानियों में एक हैं, जिन्होंने निःशब्द को शब्द में उतारा; जिन्होंने अपरिभाष्य की परिभाषा की; जिन्होंने अगोचर को गोचर बनाया, अरूप को रूप दिया। सुंदरदास थोड़े से सदगुरुओं में एक हैं। उनके एक-एक शब्द को साधारण शब्द मत समझना। उनके एक-एक शब्द में अंगारे छिपे हैं। और जरा सी चिनगारी तुम्हारे जीवन में पड़ जाए तो तुम भी भभक उठ सकते हो परमात्मा से। तो तुम्हारे भीतर भी विराट का आविर्भाव हो सकता है। पड़ा तो है ही विराट, कोई जगाने वाली चिनगारी चाहिए।
चकमक पत्थरों में आग दबी होती है, फिर दो पत्थरों को टकरा देते हैं, आग प्रकट हो जाती है। ऐसी ही टकराहट गुरु और शिष्य के बीच होती है। उसी टकराहट में से ज्योति का जन्म होता है। और जिसकी ज्योति जली है वही उसको ज्योति दे सकता है, जिसकी ज्योति अभी जली नहीं है। जले दीये के पास हम बुझे दीये को लाते हैं। बुझे दीये की सामर्थ्य भी दीया बनने की है, लेकिन लपट चाहिए। जले दीये से लपट मिल जाती है। जले दीये का कुछ भी खोता नहीं है; बुझे दीये को सब मिल जाता है, सर्वस्व मिल जाता है।
यही राज है गुरु और शिष्य के बीच। गुरु का कुछ खोता नहीं है और शिष्य को सर्वस्व मिल जाता है। गुरु के राज्य में जरा भी कमी नहीं होती। सच पूछो तो, राज्य और बढ़ जाता है। रोशनी और बढ़ जाती है। जितने शिष्यों के दीये जगमगाने लगते हैं उतनी गुरु की रोशनी बढ़ने लगती है।
यहां जीवन के साधारण अर्थशास्त्र के नियम काम नहीं करते। साधारण अर्थशास्त्र कहता है: जो तुम्हारे पास है, अगर दोगे तो कम हो जाएगा। रोकना, बचाना। साधारण अर्थशास्त्र कंजूसी सिखाता है, कृपणता सिखाता है। अध्यात्म के जगत में जिसने बचाया उसका नष्ट हुआ; जिसने लुटाया उसका बढ़ा। वहां दान बढ़ाने का उपाय है। वहां देना और बांटना--विस्तार है। वहां रोकना, संगृहीत कर लेना, कृपण हो जाना--मृत्यु है।
इसलिए जिनके जीवन में रोशनी जन्मती है, वे बांटते हैं, लुटाते हैं। कबीर ने कहा है: दोनों हाथ उलीचिए। लुटाओ! अनंत स्रोत पर आ गए हो, लुटाने से कुछ चुकेगा नहीं। और नई धाराएं, और नये झरने फूटते आएंगे। ऐसे एक की ज्योति जल जाए तो अनेक की ज्योति जलती है। सुंदरदास के सत्संग में बहुतों के दीये जले। ज्योति से ज्योति जले!
इन अपूर्व वचनों को ऐसे ही मत सुन लेना जैसे और बातें सुन लेते हो। और बातों की तरह सुन लिया तो सुना भी--और सुना भी नहीं। इन्हें तो गुनना! इन्हें सिर्फ कानों से मत सुनना। कानों के पीछे अपने हृदय को जोड़ देना, तो ही सुन पाओगे। सुना तो जागना बहुत दूर नहीं है।
अनलिखे अक्षर बहुत
दीखे
बोल अनबोले बहुत
सीखे
भरे घट पाए कई
रीते
पनप भी पाए न हम
बीते!
अधिक लोग ऐसे ही बीत जाते हैं।
पनप भी पाए न हम
बीते!
सभी बीज लेकर आते हैं ब्रह्म होने का, और बीज के जैसे ही मर जाते हैं। फिर बीज और कंकड़ में भेद क्या? अगर बीज वृक्ष बने तो ही भेद है। अगर बीज वृक्ष न बने तो क्या भेद है कंकड़ और बीज में? बीज बन सकता है वृक्ष, बस वही भेद है।
इस जगत में जो व्यक्ति अपने भीतर छिपे परमात्मा को जान ले, वही भरा; शेष सब खाली ही चले जाते हैं। और जो खाली चले जाते हैं, उन्हें वापस लौट आना पड़ता है। आना ही पड़ेगा, क्योंकि परमात्मा खाली घटों को अंगीकार नहीं करता। पूर्ण घट चाहिए, भरे घट चाहिए। उसके द्वार पर जले दीये ही अंगीकार होते हैं। बुझे दीये की तरह, अपशकुन की तरह उसके द्वार पर मत चले जाना। जले दीये की तरह जाना। भरे घट की तरह जाना। छलकते घट की तरह जाना। पूर्ण घट की तरह जाना। कुंभ बन कर जाना, तो ही अंगीकार हो सकोगे, अन्यथा वापस लौटा दिए जाओगे।
जब बीज की तरह जाओगे तो वापस लौटा दिए जाओगे। ऐसे ही आवागमन चलता है। जिस दिन भी कोई फूल की तरह पहुंचता है, अंगीकार हो जाता है। इसलिए तो मंदिर में हम पूजा के लिए फूल ले जाते हैं। वे तो प्रतीक हैं। ऐसे ही उस परमात्मा की परम पूजा में तुम फूल बन कर जाना--जलते हुए दीये बन कर।
‘फिराक’ तू ही मुसाफिर है तू ही मंजिल भी
किधर चला है मोहब्बत की चोट खाए हुए
और खयाल रखना, तुम ही बीज हो, तुम ही वृक्ष। तुम ही मृत्यु हो, तुम ही अमृत। तुम ही प्रकट हो, तुम ही अप्रकट। तुम ही आकार, तुम ही निराकार।
‘फिराक’ तू ही मुसाफिर है तू ही मंजिल भी
और मंजिल कहीं बाहर नहीं है। और तुमसे कुछ दूर और अन्यथा नहीं है। अपने ही भीतर हृदय में टटोलने की बात है। लेकिन आदमी और सब जगह खोजता है, एक जगह नहीं खोजता--भीतर नहीं खोजता। इसलिए अधिक लोग भिखमंगों की तरह जीते हैं, भिखमंगों की तरह समाप्त हो जाते हैं।
सम्राट होना तुम्हारी नियति है। सम्राट से कम पर राजी होना भी मत। जो सम्राट हो गया, उसने ही कला जानी--जो कह सके, घोषणा कर सके जगत को: अहं ब्रह्मास्मि! वही कह सकेगा: कलैव ब्रह्म!
ब्रह्म कला है। आत्यंतिक कला है। जीवन की सबसे बड़ी कला और कुछ हो भी क्या सकती है, कि तुम्हारे भीतर जो अभी बेनिखरा पड़ा है, निखरे। तुम्हारी खदान में जो हीरा अनगढ़ पड़ा है, वह गढ़ा जाए! तुम्हारे भीतर जो ज्योति दबी पड़ी है, वह उमगे। जो गीत तुम गाने को आए हो, गा सको। जो नृत्य तुम्हारे पैरों में छिपा है वह प्रकट हो। जो सुगंध तुम लेकर आए हो वह लुटा सको हवाओं को।
जिस दिन तुम अपने को फूल की भांति हवाओं में लुटाने में समर्थ हो जाते हो उसी दिन मुक्ति फलित होती है। वही समाधि है।
यह संसार तो ऐसा ही चलता रहता है। जिसने इस भीतर की कला को पहचान लिया, जिसने इस भीतर छिपे ब्रह्म से थोड़े संबंध जोड़ लिए, फिर संसार ऐसा ही चलता रहता है। संसार तुम्हारे बदलने से नहीं बदलता। लेकिन तुम पर इसका फिर कोई परिणाम नहीं होता।
वही रूप
वही रंग
मन की समाधि
नहीं हुई भंग!
कण को भी
मानव मस्तिष्क जब
बेध गया
शून्य के रहस्य का
बिंदु जब
भेद गया
दुर्दम
वातचक्र चले,
ग्रह-उपग्रह
हिले-डुले;
सिंधु का
अगाध उर
चीर कर
शैल शिखर उठा
हुआ जीर्णतर;
बदले इतिहास
नये युग आए
ऋचा छोड़
ऋषि ने
जन-गुण गाए;
पृथ्वी ने करवट ली
फूटी हरियाली,
पूर्व दिशा में छाई
प्रातः की लाली;
तब भी रहा
वही रूप
वही रंग
मन की समाधि
नहीं हुई भंग
एक बार भीतर का फूल खिल जाए, फिर कुछ भंग नहीं होता। फिर तुम शाश्वत में जीते हो। जगत ऐसे ही रूपांतरित होता रहता है। इतिहास करवटें लेता रहता है। पृथ्वियां बनती और बिगड़ती हैं। सृष्टि रची जाती है और विसर्जित होती है। यह वर्तुल घूमता रहता है, यह चाक घूमता रहता है--जिसे हम संसार कहते हैं। लेकिन तुम केंद्र पर अडिग, थिर, अस्पर्शित होते हो। उस समाधि को खोज लेने का नाम ही कला है।
और आदमी और सब करता है, बस उस एक कला को नहीं सीखता। हजार उपक्रम करता है। हजारों यात्राएं करता है, दूर-दिगंत तक खोज करता है; सिर्फ अपने में नहीं खोजता। कारण साफ है। हम यह मान ही लेते हैं कि भीतर क्या रखा है, होगा तो बाहर होगा। क्यों ऐसा मान लेते हैं? क्योंकि आंखें बाहर खुलती हैं, कान बाहर खुलते हैं, हाथ बाहर फैलते हैं। ये पांचों इंद्रियां बाहर की तरफ खुलती हैं, इससे एक भ्रांति खड़ी होती है कि जो भी है बाहर होगा। रोशनी आती है तो बाहर से आती मालूम पड़ती है। सूरज बाहर निकलता है, चांद बाहर उगता है। श्वास आती है तो बाहर से आती मालूम पड़ती है। प्यास लगती है तो पानी बाहर। भूख लगे तो भोजन बाहर। प्रेम उमगे तो प्रेमी बाहर। सब बाहर. स्वभावतः यह खयाल गहरा होता चला जाता है कि जो भी है बाहर है, भीतर क्या रखा है?
बाहर सब-कुछ है, सिर्फ एक को छोड़ कर--परमात्मा को छोड़ कर। बाहर सब-कुछ है, सिर्फ एक को छोड़ कर--तुम को छोड़ कर, स्वयं को छोड़ कर। स्वयं का होना तो बाहर कैसे हो सकता है? वह तो सारी इंद्रियों के पीछे बैठा है। वह तो इंद्रियातीत है। हाथ से हम सब-कुछ पकड़ लेंगे; उसको तो न पकड़ पाएंगे जो हाथ के भीतर छिपा है; जो हाथ से चीजों को पकड़ता है। आंख से हम और सब देख लेंगे; उसको तो न देख पाएंगे, जो आंख के पीछे खड़ा है और आंख के झरोखे से जगत को देखता है। कान से हम और सब सुन लेंगे; सुनने वाले को तो न सुन पाएंगे। नाक से हम और सब सूंघ लेंगे; सूंघने वाला तो अनसूंघा रह जाएगा।
बाहर की यह तलाश इतनी सघन हो गई है कि हम परमात्मा का मंदिर भी बाहर बना लेते हैं। तीर्थयात्रा भी करते हैं तो काबा और कैलाश जाते हैं। आदमी का निखार तो भूल ही गया। अंतर्यात्रा का तो विस्मरण ही हो गया है।
मजहब कोई लौटा ले और उसकी जगह दे दे
तहजीब सलीके की, इनसान करीने के
जो जहरे-हलाहल है अमृत भी वही नादां
मालूम नहीं तुझको अंदाज ही पीने के
ये सारे मजहब अगर कोई लौटा ले तो कुछ हर्ज न हो।
मजहब कोई लौटा ले और उसकी जगह दे दे
तहजीब सलीके की, इनसान करीने के
कलैव ब्रह्म! जो ब्रह्म होने की कला जानता है, वही है इनसान करीने का। और जिसने भीतर को जाना है वही सुसंस्कृत है। बाहर से मिलती है सभ्यता, संस्कृति भीतर से उमगती है। सभ्यता की शिक्षा हो सकती है, संस्कृति की साधना होती है। सभ्यता दूसरे से सीखी जाती है--मां-बाप सिखाते, शिक्षक-गुरु सिखाते, स्कूल-पाठशाला सिखाती। सभ्यता बाहर से सीखी जाती है। संस्कृति? संस्कृति का जन्म भीतर होता है--स्वयं के जागरण से, स्वयं की ज्योति के जलने से, स्वयं की ऊर्जा से परिचित होने से, आत्म-अनुभव से। वह भीतर का परिष्कार है।
सभ्यता बाहर से आदमी को सुंदर बना देती है। अच्छे वस्त्र पहना देती है, करीने से उठना-बैठना सिखा देती है। शिष्टाचार, बोल-चाल के ढंग, व्यवहार-कुशलता सब सिखा देती है। मगर भीतर चेतना वैसी की वैसी अपरिष्कृत है। भीतर जंगली आदमी वैसा का वैसा जंगली है। इसलिए सभ्यता कभी भी चमड़ी से ज्यादा गहरी नहीं होती। जरा खरोंचो, और भीतर से जंगली आदमी बाहर निकल आता है।
हिंदू-मुस्लिम दंगा हो जाए; हिंदू भी बड़े सभ्य थे, मुसलमान भी बड़े सभ्य थे। एक घड़ी पहले बिलकुल सभ्य थे। बड़ी प्यारी-प्यारी बातें कर रहे थे। अल्लाह-ईश्वर तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान--गा रहे थे। फिर दंगा-फसाद हो गया, फिर सारी सभ्यता उतर गई। ऐसे बह जाती है जैसे कच्चा रंग वर्षा में बह जाए। भीतर का जंगली आदमी बाहर आ जाता है, खून की नदियां बह जाती हैं। मृत्यु का तांडव-नृत्य होने लग जाता है। मित्र मित्र को काटने लगते हैं। पड़ोसी पड़ोसी को मारने लगते हैं। मस्जिद-मंदिर धू-धू करके जलने लगते हैं। जरा सी देर नहीं लगती हमारी सभ्यता के गिर जाने में। सभ्यता दो कौड़ी की है, कामचलाऊ है।
सुसंस्कृत आदमी बड़ा और होता है। उसका अर्थ होता है, जो वह बाहर जी रहा है वह उसके अंतरतम से आ रहा है।
मजहब कोई लौटा ले और उसकी जगह दे दे
तहजीब सलीके की, इनसान करीने के
जो जहरे-हलाहल है अमृत भी वही नादां
मालूम नहीं तुझको अंदाज ही पीने के
यह जिंदगी परमात्मा से भरी है।.
मालूम नहीं तुझको अंदाज ही पीने के
लबालब है परमात्मा से। बाहर-भीतर वही लहरा रहा है। उठते, सोते, जागते हम उसी में हैं। मालूम नहीं तुझको अंदाज ही पीने के!
कबीर ने ठीक ही कहा है कि मुझे बड़ी हंसी आती है जब मैं सागर में मछली को प्यासा देखता हूं। यह मछली पागल हो गई है--सागर में और प्यासी!
मालूम नहीं तुझको अंदाज ही पीने के
जो जहरे-हलाहल है, अमृत भी वही नादां
इस जिंदगी में मृत्यु ही नहीं है, अमृत भी छिपा है। इस जीवन में दुख ही दुख नहीं है, परमानंद भी छिपा है। इस जीवन में मिट्टी ही मिट्टी नहीं है, मिट्टी के पार चिन्मय का आवास है।
मालूम नहीं तुझको अंदाज ही पीने के
सुंदरदास से पीने के थोड़े अंदाज सीखना। तुम्हारा जला दीया भी बुझे,.. ऐसे उपाय तो जिंदगी में बहुत हो रहे हैं, जहां तुम्हारा जला दीया भी बुझ जाए। ऐसे उपाय बहुत कम हैं, कहीं-कहीं हो रहे हैं, जहां तुम्हारा बुझा दीया जले। ऐसे ही उपाय में हम यहां संलग्न हैं। यह सत्संग है। इसका अर्थ इतना ही है--यहां से तुम ज्योतिर्मय होकर जाओ, ज्योति की शिखाएं बन कर जाओ।
मगर सब तुम पर निर्भर है। यह ज्योति तुम पर ऊपर से जबर्दस्ती नहीं थोपी जा सकती। तुम्हारा सहयोग चाहिए, तुम्हारी श्रद्धा चाहिए, तुम्हारा साथ चाहिए। नहीं तो बुद्ध आते, महावीर आते, कृष्ण आते, मोहम्मद आते, कबीर आते, सुंदर आते, दादू आते. आते,… आते रहते हैं! परमात्मा के पैगंबर उतरते रहते हैं और आदमी जैसा है वैसा का वैसा। अंधेरा वैसा ही घना। यह अमावस की रात कटती ही नहीं। सुबह होती ही नहीं।
हजारों खिज्र पैदा कर चुकी है नस्ल आदम की
ये सब तस्लीम लेकिन आदमी अब तक भटकता है।
कितने खिज्र पैदा होते हैं, कितने देवदूत उतरते हैं! कितनी बार कुरान, कितनी बार गीता, कितनी बार धम्मपद उतरता है। कितनी ऋचाएं आविर्भूत होती हैं। कितने वेद जन्म लेते हैं। मगर कुछ खूबी है आदमी की--कुछ ऐसा चिकना घड़ा--कि वर्षा हो भी जाती है और आदमी भीगता भी नहीं!
भीगो!. रोशनी चारों तरफ तुम्हारे नाच भी जाती है, मगर तुम जल ही नहीं पाते। आदमी वैसा का वैसा बना रहता है। क्यों? क्योंकि कृष्ण क्या करें? बुद्ध ने कहा है: मैं राह बता सकता हूं, चलना तो तुम्हीं को पड़ेगा। यह मत सोच लेना कि किसी ने राह बता दी तो चलना हो गया। किसी ने रोटी की बात कर दी तो पेट तो नहीं भरता? और न जल की चर्चा से कंठ की प्यास बुझती है। जल की चर्चा इतना ही कर सकती है कि तुम्हें जल की तलाश में ले जाए। भोजन की बात इतना ही कर सकती है कि तुम्हारी भूख को और प्रज्ज्वलित कर दे, प्रचंड कर दे। ऐसा भभका दे कि तुम सब छोड़ कर भोजन की तलाश में लग जाओ। यही सत्संग का प्रयोजन है।
मेरे पास तुम आए हो तो खयाल रखना, इसीलिए आए हो कि तुम्हारे भीतर परमात्मा को खोजने की ऐसी अपूर्व वासना का जन्म हो, ऐसी प्रकांड वासना का जन्म हो कि और सारी वासनाएं उसी वासना में निमज्जित हो जाएं। और जब सारी वासनाएं परमात्मा को पाने की वासना बन जाती हैं तो उसी का नाम प्रार्थना है।
तुझे पाके खुद को मैं पाऊंगा कि तुझी में खोया हुआ हूं मैं
ये तेरी तलाश है इसीलिए कि मुझे है अपनी ही जुस्तजू।
परमात्मा की खोज को खयाल रखना, पराए की खोज मत समझ लेना। ‘परमात्मा’ शब्द में वह जो ‘पर’ लगा है उससे भ्रांति में मत पड़ जाना। परमात्मा की खोज पर की खोज नहीं है, परमात्मा की खोज स्व की खोज है। परमात्मा की खोज आत्मा की खोज है। यह खोज आंतरिक है। यहां आंखें भीतर लौटानी हैं, आंखें पलटानी हैं। यहां कान उलटाने हैं। यहां सारी यात्रा अंतर्मुखी करनी है। आंख खोल कर बहुत खोजा, अब आंख बंद करके खोजना है। बहुत सुने बाहर के संगीत, शायद कभी थोड़ा मन को भरमाए भी, थोड़ा मन को लुभाए भी, थोड़ा मनोरंजन भी किए--अब मनोभंजन करना है! अब भीतर का संगीत सुनना है। अब अनाहत नाद सुनना है।
सुंदरदास के सूत्र:
देह तौ प्रगट महिं ज्यौं को त्यौंहीं जानियत,
नैन के झरोखे मांहि झांकत न देखिए।
बैठा है पूरा का पूरा परमात्मा तुम्हारे भीतर। पूरा का पूरा! जो जानते हैं वे यह नहीं कहते कि तुम परमात्मा का अंश हो; जो जानते हैं वे कहते हैं: तुम पूरे परमात्मा हो। उसके कहीं अंश होते हैं, कहीं खंड होते हैं? रात पूर्णिमा का चांद निकलता है। हजारों झीलों में, तालाबों में, सागरों में, नदियों में, पोखरों में उसका प्रतिबिंब बनता है। सब प्रतिबिंब पूरे चांद के प्रतिबिंब होते हैं। कुछ ऐसा थोड़े ही है कि एक झील में बन गया चांद का प्रतिबिंब तो अब दूसरी झील में कैसे बने? ऐसा थोड़े ही है कि खंड-खंड बनते हैं, कि एक टुकड़ा बन गया इस सागर में, एक टुकड़ा बन गया उस सागर में। सभी प्रतिबिंब पूरे चांद के होते हैं।
ऐसे ही तुम पूरे परमात्मा हो, क्योंकि तुम पूरे परमात्मा के प्रतिबिंब हो।
परमात्मा एक है, अनंत उसके प्रतिबिंब हैं।
देह तौ प्रगट महिं ज्यौं को त्यौंहीं जानियत,
प्रकट हुआ है तुम्हारे भीतर पूरा का पूरा, जैसा का तैसा। और चाहो तो जैसा का तैसा जान लो। क्षण भर भी गंवाने की बात नहीं है। लेकिन चूक होती है। चूक इसलिए होती है:
नैन के झरौखे मांहि झांकत न देखिए।
तुम उसको नैन के झरोखों से देखना चाहते हो। नैन के झरोखों से तो उसे न देख सकोगे। नैन के झरोखे से तो ‘पर’ देखा जाता है, ‘स्व’ नहीं देखा जाता। ‘स्व’ तो नैन के पीछे बैठा है।
क्या तुम सोचते हो अंधे आदमी को आत्म-ज्ञान नहीं हो सकता? सच तो यह है अंधे आदमी को आंख वाले से जल्दी आत्म-ज्ञान हो जाता है। इस कारण इस देश ने अंधों को सदा सम्मान दिया है। उन्हें हम कहते हैं: सूरदास। उन्हें बड़े आदर से पुकारते हैं। उनकी बाहर की आंख नहीं है। बहुत संभावना है कि जो ऊर्जा बाहर की आंख से बहती थी वह ऊर्जा अब भीतर की तरफ बह रही होगी। क्योंकि बाहर का तो द्वार नहीं है। अंधे को हमने बड़ा सम्मान दिया है! सिर्फ एक ही कारण से प्रतीकवत कि ज्ञानी भी अंधे जैसा हो जाता है। बाहर की आंख तो बंद हो जाती है उसकी। उसे बाहर तो कुछ दिखाई नहीं पड़ता; उसे भीतर दिखाई पड़ने लगता है।
हमारी चूक यही है कि हम आंख से उसकी तलाश में निकले हैं, जो आंख के पीछे खड़ा है। हम उसकी तलाश में निकले हैं, जो तलाश कर रहा है। यह तलाश कैसे पूरी होगी? जिस घोड़े पर सवार हो उसी को खोजने निकले हो!
कभी-कभी ऐसा हो जाता है लोग उसी चश्मे को लगाए होते हैं और उसी चश्मे की तलाश कर रहे होते हैं। और चश्मा तुम्हारे कानों पर चढ़ा है। ठीक वैसी ही भूल है।
नैन के झरौखे मांहि झांकत न देखिए।
जैसे कोई खिड़की पर खड़े होकर आकाश को देखता है, आकाश के तारों को देखता है--ऐसे ही तुम आंख के झरोखे के पीछे खड़े हो सारे संसार को देख रहे हो। लेकिन तुम झरोखे के पीछे खड़े हो, तभी तो देख पा रहे हो। देखने वाला कौन है?
द्रष्टा को खोजो, और तुम परमात्मा को पा लोगे। दृश्य में उलझे रहो और तुम्हारा संसार का वर्तुल चलता ही रहेगा, चलता ही रहेगा। दृश्य से द्रष्टा में रूपांतरण--यही कला है। यही वह कला है जिसको उपनिषद के ऋषि कहते हैं: कलैव ब्रह्म।
नाक के झरौखे मांहि नैकु न सुबास लेत,
तुम उसकी सुवास नाक के झरोखे से न ले सकोगे। नाक के झरोखे से तो बाहर की सुवास मिलती है।
कान के झरौखे मांहि सुनत न लेखिए।
और कान से सुनने चले हो तो नहीं सुन पाओगे उसे। कान से तो जो भी तुम सुनोगे, वह कुछ और होगा। उसे सुनने के लिए तो वाणी काम नहीं आएगी, मौन काम आएगा, चुप्पी काम आएगी।
ज्ञानियों ने सदा कहा है: उसे कहा नहीं जा सकता। ज्ञानियों ने दूसरी बात भी कही है कि उसे सुना नहीं जा सकता। न कहा जा सकता है। न सुना जा सकता है। कहो तो बात झूठ हो जाती है, सुनो तो बात झूठ हो जाती है। कहे-सुने के पार है। कहे में नहीं आता, सुने में नहीं आता है, क्योंकि वह कहने वाला है, वह सुनने वाला है--इसलिए पार है।
मैं तुमसे कह रहा हूं। जो मैं कह रहा हूं, उसमें वह नहीं है; लेकिन जो कह रहा है, उसमें है। मैं तुमसे कुछ कह रहा हूं। जो तुम सुन रहे हो, उसमें वह नहीं है, लेकिन जो सुन रहा है, उसमें वह है। जब कहने वाले और सुनने वाले का मिलन हो जाता है, कही-सुनी बंद हो जाती है और कहने वाले और सुनने वाले का मिलन हो जाता है, तब सत्संग होता है। जब तक कही-सुनी बात ही चलती रहती है, तब तक वार्तालाप, तब तक सत्संग नहीं।
सत्संग चुप्पी का संबंध है, मौन का नाता है। मौन का सेतु जब बनता है, तो सत्संग होता है।
सदगुरु के पास जो सर्वाधिक बहुमूल्य क्षण हैं वे शब्दों के नहीं होते, वे निःशब्द के होते हैं। और जो सदगुरु के शब्द शांति से सुनता है, मौन से सुनता है, शब्द तो ऊपर-ऊपर आते हैं और चले जाते हैं, निःशब्द की धार भीतर बहने लगती है। शब्द तो खोल की तरह होते हैं, निःशब्द को तुम तक पहुंचा देते हैं। शब्द तो निमित्त होते हैं। शब्द के निमित्त पर चढ़ कर निःशब्द तुम्हारे पास पहुंच जाता है।
सुनते समय, जो कहा जाए उसकी बहुत फिकर न करो; जो कह रहा है उसकी फिकर लो। और जो सुन रहे हो, उसकी बहुत फिकर मत करो; जो सुन रहा है, उसके प्रति जागो।
कान के झरौखे मांहि सुनत न लेखिए।।
मुख के झरौखे मैं बचन न उचार होत,
जीभ हूं कौ षटरस स्वाद न विशेखिए।
वह रसरूप है। रसो वै सः। लेकिन जीभ से उसका स्वाद नहीं मिलेगा। उसका रस जीभ से नहीं मिलेगा। वह तो रस लेने वाला है। इस बात को बार-बार सुंदरदास दोहरा रहे हैं, ताकि हर तरफ से यह चोट तुम्हारे भीतर साफ हो जाए कि कहां खोजें? किस दिशा में तलाश करें?
मुख के झरौखे मैं बचन न उचार होत,
जीभ हूं कौ षटरस स्वाद न विशेखिए।
सुंदर कहत कोऊ कौन विधि जानै ताहि,
तब सुंदर कहते हैं फिर किस विधि उसे जानें? अगर आंख से दिखाई पड़ता तो देख लेते। कान से सुनाई पड़ता तो सुन लेते। हाथ की पकड़ में आता, पकड़ लेते। पैर की यात्रा के बस में होता तो कितने ही दूर होता, पहाड़ों को, समुद्रों को लांघ जाते, पहुंच जाते। अब इसको हम कैसे पहुंचें? हमारे पास कोई विधि नहीं है। किस विधि इसे जानें?
सब विधियां छोड़ कर वह जाना जाता है। विधि-मात्र के त्याग से जाना जाता है। उसे पाने की कोई विधि नहीं होती। विधि हमेशा पराए पर ले जाती है। निर्विधि, निरुपाय.
तुमने शब्द ‘निरुपाय’ सुना है न! उसका तुमने एक अर्थ समझा है सिर्फ--असहाय। उसका दूसरा अर्थ है: निर्विधि। निरुपाय, अब कोई उपाय नहीं।
जब खोजी जानता है कि उसे पाने का कोई उपाय नहीं, कोई विधि नहीं,. क्योंकि जितनी विधियां हैं वे मेरी पांचों इंद्रियों से जुड़ी हैं। और ये इंद्रियां तो सिर्फ झरोखे हैं और वह रहा इनके पीछे, पूरा का पूरा बैठा है।
देह तौ प्रगट महिं ज्यौं कौ त्यौंहीं जानियत,
मगर है भीतर. और ये सारी इंद्रियों की दौड़ बाहर की तरफ है। मिलन कैसे होगा? अगर इंद्रियों से चलूंगा तो उस तक नहीं पहुंच पाऊंगा। इंद्रियों से चलूंगा तो उससे दूर होता चला जाऊंगा। अतींद्रिय है वह। फिर किस विधि उसे पाएं?
सुंदर कहत कोऊ कौन विधि जानै ताहि,
अब बड़ी मुश्किल आई, बड़ी पहेली हुई, कि जितनी विधियां थीं उनसे तो कुछ काम होने वाला नहीं। अब हम करें क्या? योग, तप कुछ काम न आएंगे। व्रत-उपवास कुछ काम न आएंगे। लेकिन यह बोध कि उसे पाने की कोई विधि नहीं हो सकती, इस बोध में सारी विधियां गिर जाती हैं। खोजी असहाय हो जाता है, निरुपाय हो जाता है, ठहर जाता है, ठिठक जाता है। जाना कहां अब? सब जाना गलत जाना है। गए कि चूके। अब जाना नहीं है। इस अवस्था में ही पहला संस्पर्श होता है उसका। इसको ही स्थिति-धीः कहो। जब सारी विधियां छूट गईं। विधियों का मोह छूट गया। विधियों की संभावना भी नष्ट हो गई।
इसलिए ज्ञानी कहते हैं: वह तो सहज पाया जाता है। सहज का अर्थ होता है: विधि के बिना। साधो, सहज समाधि भली! इसका नाम है सहज समाधि। सहज समाधि कोई विधि नहीं है--सारी विधियों की व्यर्थता का बोध; सारी इंद्रियों की व्यर्थता का बोध। तो अचानक सब ठहर जाता है। आंखें बंद हो जाती हैं, कान बहरे हो जाते हैं, हाथ जड़ हो जाते हैं, पैर की गति अवरुद्ध हो जाती है। कहां जाना? कहीं कुछ जाने का उपाय न रहा। इस निरुपाय दशा में आदमी अचानक पाता है; अपने भीतर हूं। अचानक पाता है कि आ गया अपने घर। बिना कहीं गए, आ गया अपने घर। न की कोई यात्रा, न कोई दिशा में खोज की। यह अपूर्व घटना घटती है चमत्कार की तरह। विधियों में आदमी भटक जाता है। विधियों में आदमी गोरखधंधे में पड़ जाता है। निर्विधि होकर अपने घर आ जाता है। क्योंकि परमात्मा हमारा स्वभाव है। उसे पाने के लिए कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। उसे पाने के लिए यह बोध आना चाहिए कि हमारा सब किया बाधा बन जाता है। अक्रिया में पाया जाता है परमात्मा।
सुंदर कहत कोऊ कौन विधि जानै ताहि,
कारौ पीरौ काहू द्वार जातौ हू न पेखिए।।
न तो किसी ने उसे देखा है कि काला है कि पीला है, न किसी ने कभी उसे निकलते हुए देखा है देह से। मृत्यु होती है तब भी वह जाता हुआ दिखाई नहीं पड़ता। न कभी किसी ने उसे आते देखा है, न कभी किसी ने जाते देखा। वह तो सदा है; न आता है, न जाता है। जब तुम मृत्यु से गुजरते हो तब भी वह कहीं आता-जाता नहीं, सिर्फ देह से उसका संबंध छूट जाता है। जैसे बल्ब फूट गया, तो तुम सोचते हो बिजली कहीं चली गई? बिजली जहां के तहां है, सिर्फ बल्ब से संबंध छूट गया। रोशनी नहीं हो रही अब। न वह आता, न वह जाता। उसका कोई आवागमन नहीं है। इसे पाने के लिए आने-जाने की कोई जरूरत नहीं।
ऐ फिराक, उन्हें पाकर हम ये दिल में कहते हैं
सोचिए तो मुश्किल है, देखिए तो आसां है
समझना। यह बात सिर्फ देखने की है। सोचिए तो मुश्किल है। सोच में पड़ गए तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। देखिए तो आसां है। मैं जो तुमसे कह रहा हूं, उसे देखने की कोशिश करो। वह सत्य सोचने का नहीं है, विचारगम्य नहीं है। विचार के लिए अगम्य है, तर्कातीत है। समझ के भीतर नहीं है, बाहर है।
देखो। सिर्फ इस सच्चाई को देखो, कि जो भीतर है, उसे पाने के लिए बाहर जाने की कोई जरूरत नहीं हो सकती। जो जन्म से ही मेरे भीतर है, उसे पाने के लिए किसी विधि की कोई जरूरत नहीं हो सकती। जो मेरा स्वभाव है, उसे खोया भी नहीं जा सकता, उसे पाया भी नहीं जा सकता--वह तो मैं हूं ही। न काशी न काबा, कहीं जाना नहीं। न मंत्र, न तंत्र; न योग, न त्याग; न व्रत, न उपवास। ये सब मन की ईजादें हैं। तो फिर क्या करूं?
करने में ही भूल हो जाती है। करने में ही कर्ता और अहंकार आ जाता है। और करने में ही यात्रा शुरू हो जाती है। करने का मतलब होता है: यात्रा; चले, कुछ करेंगे।
बैठ रहो! कभी-कभी चौबीस घंटे में घड़ी दो घड़ी को बस बैठ रहो, कुछ न करो--निरुपाय, निर्विधि, असहाय। आंखों को बंद हो जाने दो, कानों को बंद हो जाने दो--निर्जीव हो रहो। ऐसे रमण को समाधि मिली थी।
रमण की समाधि समझने जैसी है। यह सूत्र तुम्हें समझ में आ सकेगा। ज्यादा उम्र उनकी न थी। ज्यादा होती तो शायद समाधि मिलती भी न। ज्यादा उम्र क्या हो जाती है लोगों की, अनुभव का कचरा खूब इकट्ठा हो जाता है। फिर उस कचरे से छूटना बड़ा मुश्किल होता है। ज्यादा उम्र क्या हो जाती है, लोग ज्ञानी हो जाते हैं, बिना ज्ञान के--और बिना ज्ञान के जो ज्ञानी हो गया, उसकी हालत अज्ञानी से बहुत बदतर हो जाती है। ज्यादा उम्र क्या हो जाती है, लोग सुन-सुन कर पंडित हो जाते हैं, तोते हो जाते हैं। उपनिषद-वेद दोहराने लगते हैं। और जितने ही वेद-उपनिषद कंठस्थ हो जाते हैं, उतना ही समझ लेना कि परमात्मा से दूरी बढ़ी। अब तुम्हारा वेद नहीं जन्म सकेगा; अब तुम उधार वेद से बंध गए। अब तुम्हारा उपनिषद नहीं जन्मेगा; अब तुमने दूसरों के उपनिषद पकड़ लिए।
सत्रह साल की उम्र थी रमण की। परिवार में किसी की मृत्यु हो गई। रमण ने मृत्यु को घटते देखा। अभी-अभी था यह आदमी, अभी-अभी नहीं हो गया!
कारौ पीरौ काहू द्वार जातौ हू न पेखिए।
और न देखा काला, न पीला। न किसी को देखा आते, न किसी को देखा जाते। सब वैसा ही का वैसा। नाक, मुंह, आंख, कान, सब वैसे, हाथ-पैर, सब वैसे। एक क्षण पहले यह था और एक क्षण बाद न रहा। हुआ क्या! कौन चला गया! कहां चला गया! कहां से आया था!
रमण को एक बात सूझी। बच्चों को अक्सर बातें सूझ जाती हैं। घर के लोग तो रोने-धोने में लगे थे, वे बगल के कमरे में चले गए और जमीन पर लेट गए, जैसे वह मुर्दा आदमी लेटा था, वैसे लेट गए। हाथ-पैर वैसे ही कर लिए ढीले, जैसे मुर्दे ने किए थे। आंखे बंद कर लीं। एक प्रयोग किया मृत्यु का कि मैं देखूं कि मेरे भीतर क्या होता है; अगर मैं ऐसे ही मर जाऊं तो कोई आता-जाता है या नहीं; कोई बचता है कि नहीं भीतर? शरीर को शिथिल छोड़ दिया। सरल भाव का बच्चा रहा होगा--अति सरल भाव का, कि जल्दी ही लगा कि मौत घट रही है। हाथ-पैर सब सूख गए। थोड़ी देर विचार घूमते रहे, फिर विचार भी समाप्त हो गए। थोड़ी देर बाहर की आवाजें और रोना-धोना सुनाई पड़ता रहा, फिर पता नहीं वे भी सब आवाजें कहीं दूर निकल गईं। कान जैसे बंद हो गए। थोड़ी देर श्वास चलती मालूम पड़ती रही, फिर उससे भी दूरी हो गई। मृत्यु जैसे घटी। और जब घंटे भर बाद रमण ने आंखें खोलीं तो वे दूसरे ही व्यक्ति थे। चमत्कार हो गया। देख ही लिया उन्होंने भीतर अपने कि ‘जो है’, उसकी कोई मृत्यु नहीं। जाकर घर के लोगों को कहा: व्यर्थ रो रहे हो, धो रहे हो। कोई कहीं गया नहीं, कोई कहीं जाता नहीं।
और उसी दिन उन्होंने घर छोड़ दिया, चल पड़े जंगल की तरफ। अब इस संसार में कुछ अर्थ न रहा। सारे अर्थों का अर्थ तो भीतर मिल गया। संपदा तो मिल गई, अब क्या तलाश करनी है? इस संसार में तो हम संपदा की ही तलाश करते रहते हैं। जब मिल गई संपदा, धनी हो गए, तो अब यहां क्या करना है? चल पड़े। और ऐसा रस लगा, यह मरने की कला में ऐसा रस लगा कि लोग कहते हैं कि जहां रमण बैठ जाते थे, दिनों बैठे रहते थे। आंख बंद कर ली, शरीर को मुर्दा कर लिया और बैठ हैं और पी रहे रस!.
मालूम नहीं तुझको अंदाज ही पीने के
.दिन बीत जाते। न भोजन की फिकर है, न प्यास का पता है। लेकिन एक आभा प्रकट होने लगी, एक तेजोमंडल आविर्भूत होने लगा। चारों तरफ एक सुगंध फैलने लगी। लोग सेवा करने लगे। लोग भोजन ले आते, हाथ-पैर दबाते कि लौट आओ, भोजन कर लो। कोई पानी ले आता, कोई स्नान करवा देता; नहीं तो वे बैठे रहते बिना ही स्नान के। मक्खियों के झुंड के झुंड उन पर बैठे रहते और वे मस्त हैं, वे मदहोश हैं। और लोग पूछते: तुम करते क्या हो? तो वे कहते कि मैं कुछ भी नहीं करता हूं। करने की कोई जरूरत ही नहीं। फिर यही उनका जिंदगी भर संदेश रहा जो भी उनके पास जाता, पूछता: हम क्या करें परमात्मा को पाने को? तो वे कहते: करने की कोई जरूरत नहीं, बस बैठ रहो। खाली बैठे रहो। खाली बैठे-बैठे, बैठे-बैठे, एक दिन ऐसा सुर बंध जाएगा कि जो भीतर है उसकी प्रतीति होने लगेगी। बाहर से मन मुड़ जाएगा, भीतर का अनुभव होने लगेगा।
सुंदर कहत कोऊ कौन विधि जानै ताहि,
विधि से तो नहीं होता, बिना विधि के होता है। इसलिए छोटे बच्चे चाहें तो उनको भी हो सकता है। स्वस्थ को हो सकता है, बीमार को हो सकता है। बाजार में जो बैठा है, उसको हो सकता है; हिमालय पर जो बैठा है, उसको हो सकता है। सुंदर को, कुरूप को, गरीब को, अमीर को, पढ़े-लिखे को, गैर पढ़े-लिखे को, सबको हो सकता है। क्योंकि बात सब छोड़ कर भीतर थोड़ी देर चुपचाप डुबकी मार लेने की है।
और जब ऐसा हो जाए तो सुंदर कहते हैं कुछ बोलना। नहीं तो लोगों के सिर वैसे ही कचरे से भरे हैं, और कचरे से मत भरना।
इस जगत में जो सबसे बड़ा पाप चल रहा है, वह है--उनके द्वारा बोला जाना जिन्हें अनुभव नहीं है। वे लोगों के मस्तिष्क कचरे से भरते रहते हैं।
बोलिए तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ,
तब बोलना जब उसकी सुधि आ जाए, जब उसका जागरण हो जाए, जब ज्योति जगे, जब भीतर लपट उठे, जब बोलना अनिवार्य हो जाए, जब पुकारना ही पड़े, जब कि पुकार रोके से भी न रुके, जब कि तुम्हारे बस में न रह जाए! जैसे कि फूल को खिलना ही पड़े और सुगंध को बिखेरना ही पड़े। और बदली को बरसना ही पड़े। ऐसा जब हो जाए, जब तुम ऐसे भरे होओ--तब बोलना।
यह अपने शिष्यों को कह रहे होंगे। पहले उनको कहा, कैसे जागना, कैसे ज्योतिर्मय हो जाना--और फिर कहा कि जब ज्योतिर्मय हो जाओ तो बोलना, उसके पहले मत बोलना।
बोलने में बड़ा रस है। दूसरे को सलाह देने में अहंकार को बड़ी तृप्ति है। जिन्हें ईश्वर का कुछ पता नहीं, वे दूसरों को समझा रहे हैं कि ईश्वर है। जिन्हें आत्मा का कुछ पता नहीं, वे दूसरों को तर्क दे रहे हैं कि आत्मा है। दूसरों को समझाने में कभी-कभी भूल ही जाते हैं कि हमें पता ही नहीं है। और जब तुम्हें पता न होगा, तुम क्या खाक समझाओगे? बुझे दीये बुझे दीयों को जलाने चले हैं! मुर्दे मुर्दों को जीवन का दान दे रहे हैं।
नानक ने, कबीर ने, दोनों ने कहा है: ‘अंधा अंधा ठेलिया, दोनों कूप पड़ंत।’
अंधे अंधों को ठेल रहे हैं, कह रहे हैं मार्ग-दर्शन। अंधे नेता हो गए हैं अंधों के। और एक कारण भी है उसमें, क्योंकि अंधों की भाषा बाकी अंधों को भी समझ में आती है। आंख वाले की भाषा तो अंधों को समझ में नहीं आती। आंख वाले की भाषा से तो अंधे नाराज हो जाते हैं। कभी-कभी तो बहुत नाराज हो जाते हैं। बुद्ध पर पत्थर बरसा देते हैं। जीसस को सूली लगा देते हैं। मंसूर की गर्दन काट देते हैं। कभी-कभी तो बड़े नाराज हो जाते हैं। अंधे ही हैं; आंख वाले की भाषा उन्हें नहीं जमती। अंधों की भाषा उन्हें बिलकुल जमती है, तालमेल पड़ जाता है।
इसलिए तुम मरे, मुर्दा साधुओं के पास लोगों को इकट्ठा होता पाओगे। गोबर-गणेशों की पूजा पाओगे। मिट्टी के लौंदे लोग बैठा लिए हैं और उनकी पूजा कर रहे हैं। अपने ही हाथ से मिट्टी से भगवान बना लेते हैं और उसकी पूजा शुरू कर देते हैं और उसी के सामने झुकने लगते हैं।
सुंदरदास कह रहे हैं: बोलना तब जब सुध आ जाए। ‘सुध’ बड़ा प्यारा शब्द है। इसका अर्थ होता है--जब स्मृति आ जाए, जब स्मरण आ जाए कि मैं कौन हूं, जब सुरति जगे।
बोलिए तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ,
अभी तो तुम बेहोश हो। अभी तो तुम मूर्च्छित हो। अभी तुम्हें कुछ भी पता नहीं कि तुम कौन हो? अभी तो किरण भी हाथ नहीं लगी, सूर्यों की बातें न करो, नहीं तो अंधेरों में ही भटकते रहोगे; तुम्हारी अमावस फिर कभी टूटेगी नहीं। अभी सुगंधों की चर्चा मत करो, क्योंकि तुमने जो भी जाना है वह दुर्गंध से ज्यादा नहीं है। कहीं ऐसा न हो जाए कि दुर्गंधों को ही सुगंध समझ बैठो। अभी फूलों की बात मत छेड़ो। अभी तुम्हारी पहचान सिर्फ कांटों से हुई है। लेकिन कहीं ऐसा न हो जाए दुर्भाग्य से कि तुम कांटों को ही फूल समझ लो।
यही हुआ है। शास्त्रों को लोग सत्य समझ कर बैठ गए हैं। शब्दों को, सिद्धांतों को लोगों ने अपने प्राण बना लिया है। पत्थरों की पूजा हो रही है। मुर्दों के आस-पास सत्संग चल रहा है। अंधा अंधा ठेलिया! और फिर स्वाभाविक है, अगर दोनों कुएं में गिर पड़ें तो कुछ आश्चर्य नहीं है। फिर एक-दूसरे को सांत्वना दे रहे हैं, एक-दूसरे को समझा रहे हैं।
और आदमी इतना बेईमान है. शायद उसकी मजबूरी भी है, उसे बेईमान होना पड़ता है। जिंदगी में इतनी तकलीफें हैं कि वह अगर अपने को समझा ही न ले तो शायद जीना मुश्किल हो जाए। तो वह कहता है: यह कुआं नहीं है, यह तो तीर्थ है। कुएं में थोड़े ही गिरे, तीर्थ पहुंच गए। तीर्थ में पहुंचने पर ऐसा गिरना ही होता है।
फिर आदमी अपने को समझा लेता है। तुम मंदिर भी हो आते हो, पूजा भी कर लेते हो, पाठ भी कर लेते हो--कभी उसकी सुधि तो आती नहीं। कब तक इस पूजापाठ को जारी रखोगे? कब तक उनके शब्दों में उलझे रहोगे, जिनके भीतर अभी शून्य का आविर्भाव नहीं हुआ है? कब तक खाली घड़ों के पास बैठे पूजा करते रहोगे?
मैंने सुना है, एक सूफी कहानी है। एक आदमी बहुत प्यासा था। इतना प्यासा था और इतना रुग्ण और बीमार, मौत उसकी करीब थी और वह प्यासा चिल्ला रहा था और वहां कोई भी सुनने वाला न था। हालांकि बहुत लोग थे, बाजार भरा था; लेकिन बाजार था, वहां कौन किसकी सुने! अपनी ही लोगों को सुनाई नहीं पड़ रही थी, दूसरों की कौन सुने! वहां खूब शोर-शराबा था। एक खाली सुराही उस कमरे में पड़ी थी। उस आदमी की प्यास की बातें सुन-सुन कर खाली सुराही यह भूल ही गई कि मैं खाली हूं। प्यास की बातें और सुराही को यह खयाल कि मैं सुराही हूं.
अब सच पूछो तो जब तक सुराही भरी न हो, उसे सुराही कहना नहीं चाहिए। खाली घड़े को क्या घड़ा कहना? लेकिन कामचलाऊ भाषा है। हम तो सुराही खाली हो तो भी उसको सुराही कहते हैं। सुरा उसमें है ही नहीं, फिर भी सुराही। खाली सुराही थी; आदमी भूल में आ जाता है शब्दों की, तो बेचारी सुराही अगर भूल में आ गई तो कुछ आश्चर्य तो नहीं।
उसके मन में बड़ी दया उपजी। किसी तरह सरक कर सुराही उस आदमी के पास पहुंची और कहा: पी ले, जितना पीना हो पी ले। एक तो आदमी प्यासा और यह मजाक; एक तो आदमी मर रहा है और यह मजाक कि खाली सुराही कहती है कि पी ले जितना पीना हो। उसने उठाया सुराही को और दीवार से दे मारा। टुकड़े-टुकड़े होकर गिरी।
सूफी कहते हैं: जरा खयाल रखना, जब तक भर न गए होओ तब तक किसी की प्यास बुझाने मत चले जाना। अन्यथा जो गति सुराही की हुई वही तुम्हारी हो जाएगी।
बोलिए तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ,
न तौ मुख मौन करि चुप होइ रहिए।
नहीं तो चुप रहो। और गहरी चुप्पी साधो क्योंकि चुप्पी से सुधि जागेगी। सुधि से सुगंध उठेगी। सुधि से सरोवर बनेगा। फिर तुम जरूर लोगों की प्यास बुझा सकोगे। और तुम्हें जाना नहीं होगा, जैसे खाली सुराही को जाना पड़ा। जब तुम सरोवर हो जाओगे तो जो प्यासे हैं वे अपने आप तुम्हारे पास आने लगेंगे। दूर-दूर देशों से, दूर-दूर दिशाओं से आने लगेंगे। अपने आप आने लगेंगे। जिन्हें तलाश है वे सरोवर को खोज ही लेंगे। मगर तुम सरोवर तो हो जाओ।
जब कभी कोई होश से भर जाता है तो जिनके जीवन में सच में तलाश है वे फिर परमात्मा की फिकर नहीं करते। वे परमात्मा की बात भी नहीं उठाते। वे होश से भरे आदमी की तरफ चलने लगते हैं। क्योंकि जहां होश है वहीं कहीं परमात्मा की खबर मिलेगी। जहां जागरण घटा है, जहां थोड़ी सी रोशनी उतरी है आकाश से, उसी रोशनी में हम भी नहाएंगे।
गरज कि होश में आना पड़ा मोहब्बत को
हमीं को देख लें दीवाने तेरे दूर न जाएं
जब कभी कोई जाग जाता है, सुधि से भर जाता है तो इतना ही तो कहता है लोगों से, और क्या कहेगा?
गरज कि होश में आना पड़ा मोहब्बत को
हमीं को देख लें दीवाने तेरे दूर न जाएं
फिर कहीं जाने की जरूरत नहीं है। अगर परमात्मा के एक भी जागे हुए प्रेमी को तुमने देख लिया तो तुमने परमात्मा को देख लिया। मगर बड़ी कठिनाई हो गई है उन लोगों की वजह से, जो बिना कुछ जाने समझाए जा रहे हैं, बिना किसी बोध के बोले जा रहे हैं। बिना किसी अंतर-अनुभूति के सिद्धांतों और शास्त्रों का गुणगान किए जा रहे हैं।
यहां सौ वाणियों में निन्यानबे झूठी हैं। भटकाव बहुत बढ़ गया है। साधारण आदमी खोजे तो कैसे खोजे? किसको सच माने? कैसे सच माने? यहां झूठ का बाजार इतना गरम है!
और खयाल रखना, झूठे सिक्कों की एक खूबी होती है--वे सच्चे सिक्कों को चलन के बाहर कर देते हैं। अगर तुम्हारी जेब में दो सिक्के हैं--एक झूठा और एक सच्चा--तो पहले तुम झूठे को चलाते हो। पान वाले को ही पकड़ा दोगे कि किसी तरह निपट जाए। पहले झूठे को चलाते हो कि पहले झूठा निपट जाए, असली तो कभी भी चल जाएगा। जिन-जिन के पास झूठे सिक्के हैं वे सभी चला रहे हैं झूठों को। तो झूठे सिक्के बाजार में होते हैं तो असली को चलन के बाहर कर देते हैं।
इसलिए बुद्धों की गति नहीं चल पाती तुम पर वे असली सिक्के हैं। पंडित-पुरोहित झूठे सिक्के हैं, मगर झूठे सिक्के सदा असली सिक्कों को चलन के बाहर कर देते हैं। असली सिक्के को खोजने तो वही जाता है, जिसने तय ही कर लिया है खोजने का; जिसने निर्णय ही कर लिया है कि बिना परमात्मा को पाए नहीं जाना है इस जगत से।
अनलिखे अक्षर बहुत
दीखे
बोल अनबोले बहुत
सीखे
भरे घट पाए कई
रीते
पनप भी पाए न हम
बीते
जिसने तय कर लिया है कि ऐसे ही नहीं बीत जाएंगे। इस जीवन को भर कर जाना है। बहुत जीवनों में आए और खाली के खाली गए, इस बार खाली नहीं जाना है। ऐसा संकल्प जिसमें जगा है, ऐसा भाव जिसमें उठा है, वही खोज पाएगा।
बोलिए तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ,
और जब सच में उसकी स्मृति उठती है तो अपने आप गीत फूटते हैं। अपने आप! अपने आप वाणी स्फुरित होती है।
जैन शास्त्र ठीक कहते हैं। जैन शास्त्र ऐसा नहीं कहते कि महावीर बोले। जैन शास्त्र कहते हैं: महावीर से वाणी झरी। यह अभिव्यक्ति प्यारी है और सत्य के बहुत करीब है। और लोग बोलते हैं, महावीर थोड़े ही बोलते हैं। महावीर से वाणी झरती है, जैसे दीये से रोशनी झरती है। जैसे अभी देखते हो, आकाश से बादलों से जल झर रहा है। ऐसे ही महावीर से वाणी झरी। भरे से झरेगी। इतने भर गए कि झरना ही पड़ा। बोलने का सवाल नहीं है अब।
तू एक था मेरे अशआर में हजार हुआ
इस एक चिराग से कितने चिराग जल उठे
वह एक उतर आए तुम्हारे भीतर, तो तुम्हारे भीतर हजार गीत पैदा हो जाते हैं।
तू एक था मेरे अशआर में हजार हुआ
इस एक चिराग से कितने चिराग जल उठे
और फिर यह रुकती नहीं श्रृंखला। इसी श्रृंखला से वस्तुतः परंपरा पैदा होती है। सच्ची परंपरा इसी श्रृंखला का नाम है। एक झूठी परंपरा होती है, जो जन्म से मिलती है। तुम हिंदू घर में पैदा हुए तो तुम मानते हो मैं हिंदू हूं; यह झूठी परंपरा है। यह कोई परंपरा है? परंपरा कहीं खून से चलती है, हड्डी-मांस-मज्जा से चलती है? जरा अपने खून को निकलवा कर अस्पताल में जाकर जांच करवाना, कोई डॉक्टर नहीं बता सकेगा कि हिंदू का है कि मुसलमान का। खून कहीं हिंदू-मुसलमान का होता है? लाख सिर पटकें डॉक्टर, पता नहीं लगा सकेंगे कि ईसाई है कि प्रोटेस्टेंट है कि कैथोलिक है कि कौन है। जरा मरघट चले जाना, किसी की हड्डी उठा लाना और जांच करवा लेना। जन्म से कहीं धर्म का कोई संबंध होता है?
एक जीवंत परंपरा होती है। एक दीये से दूसरा दीया जलता है--एक श्रृंखला पैदा होती है। जब तुम किसी सदगुरु को खोज कर उसके पास पहुंचते हो और तुम्हारे भीतर समर्पण घटित होता है, तब तुम एक परंपरा के अंग हो जाते हो। यह वास्तविक धर्म का जन्म है।
तू एक था मेरे अशआर में हजार हुआ
इस एक चिराग से कितने चिराग जल उठे
जैसे ही उसकी अनुभूति उतरती है, उसकी अनुभूति का रस ऐसा है, उसकी अनुभूति का आनंद ऐसा है कि बंटना चाहता है।
तुमने खयाल किया? दुख सिकोड़ता है, दुख बंटना नहीं चाहता। जब तुम दुखी होते हो तो तुम चादर ओढ़ कर पड़ रहना चाहते हो। जब तुम बहुत दुखी होते हो, तुम द्वार-दरवाजे बंद कर देते हो। तुम कहते हो: मुझे मत छेड़ो। मुझे मुझ पर छोड़ दो, मेरे हाल पर छोड़ दो। तुम अपने प्यारे से प्यारे से भी नहीं मिलना चाहते। तुम कहते हो, अभी मैं दुखी हूं, अभी मुझे छोड़ दो। अभी मुझे पड़ा रहने दो अंधेरे में। लेकिन जब तुम आनंद से भरते हो तो तुम मित्रों की तलाश करते हो। जब तुम आनंदित होते हो, तब तुम अकेले नहीं रहना चाहते, तब तुम संग-साथ खोजते हो।
तुमने खयाल किया? शास्त्र इस संबंध में बेईमानी करते रहे हैं, क्योंकि गलत लोगों ने लिखे हैं। महावीर संसार छोड़ कर चले गए, यह तो शास्त्रों में लिखा है; लेकिन वे यह बात नहीं कहते कि बारह वर्ष बाद महावीर संसार में वापस लौट आए। बुद्ध संसार छोड़ कर चले गए, इसकी तो बड़ी चर्चा की गई, रत्ती-रत्ती का हिसाब दिया गया है--कितने हाथी, कितने घोड़े, कितना बड़ा राज्य; लेकिन जब वे छह वर्ष बाद लौट कर आ गए, इसकी कोई बात नहीं करता। यह अधूरी कहानी है। कहानी पूरी करो। महावीर जब दुखी थे, भाग गए संसार से। जब आनंद फला, लौट आए। लौटना ही पड़ा। खोजना पड़ा लोगों को, क्योंकि अब आनंद बांटना होगा।
बुद्ध जब दुखी थे, सरक गए चुपचाप एकांत में, निर्जन में। जब दीया जला तो दीये के जलने के साथ ही यह अपूर्व करुणा भी जन्मती है--कि अब जो बुझे हैं वे भी जल जाएं। अब जो तलाश रहे हैं उनको भी राह दिखा दूं। ऐसा नहीं कि मुझे क्या प्रयोजन? मुझे क्या लेना-देना? ऐसी उपेक्षा नहीं होती। बुद्ध ने तो कहा है: ज्ञान की अनिवार्य छाया करुणा है। और जहां करुणा न हो, समझ लेना, वहां प्रज्ञा नहीं है, झूठ है, पांडित्य होगा। आनंद तो बंटना ही चाहेगा।
उमड़ते हैं सागर
तोड़ते हैं बंध;
प्रवहमान कलकल
शब्द स्वच्छंद!
यही जीवन
यही गति--
सफल श्रेष्ठ छंद;
यही साध्य
यही सत्य,
यही परमानंद!
जब परम आनंद उठेगा तो हजार-हजार गीतों में फूटेगा, हजार-हजार झरनों में बहेगा। अनेक गंगाओं का जन्म होता है हिमालय से। गंगा निकलती, यमुना निकलती, सिंधु निकलती, ब्रह्मपुत्र निकलती, अनंत-अनंत गंगाओं का जन्म होता है हिमालय से। जब कोई उस चैतन्य के परम शिखर पर पहुंच जाता है तो वहां से भी अनंत-अनंत गंगाओं का जन्म होता है। सब दिशाओं में गंगाएं बह उठती हैं।
एक
महक की तरह
बस गया वसंत,
अनगिनत अधरों पर!
रोम-रोम धूप-छांव
फूल मुस्कुराए;
तन की डाली पर
मन की कोयल ने--
शीत-तप्त गीत
गुनगुनाए
केशर-पगे, धानी
मत्त, रूप उन्मत्त
थिरक-थिरक नाचे
सरिता लहरों पर
एक
महक की तरह
बस गया वसंत
अनगिनत अधरों पर!
और एक प्राण में वसंत का जन्म हो तो अनंत-अनंत अधरों पर वसंत की केसर फैलने लगती है।
आज चित्र नहीं बनाऊंगा
आज तो.
स्वरों के आरोह-अवरोह के
ध्वज, कलश
चढ़ाऊंगा वाणी के मंदिर पर
गोपुर अलंकृत करूंगा
छंद-मंजरियों से;
गमकेंगे ध्वनि-सौष्ठव के मृदंग!
आज तो.
छहराएंगे निकुंज
उत्फुल्ल अनुभूतियों के
भावानुभव सरोवर में
लहराएंगे
मानस-बिंबों के
अनस्पर्शित प्रतिबिंब;
उठेंगे झकोरे वासंती बयार के
प्राकृत-पाटल पर--
थिरेकेंगे
जीवन सुषमा के अंग-अंग!
आज चित्र नहीं बनाऊंगा
आज तो.
स्वरों के आरोह-अवरोह के
ध्वज, कलश
चढ़ाऊंगा वाणी के मंदिर पर
गोपुर अलंकृत करूंगा
छंद-मंजरियों से
गमकेंगे ध्वनि-सौष्ठव के मृदंग!
जब कभी कोई बुद्ध पैदा होता है, जब कहीं सुधि जागती है, जब कहीं सुधि का सौष्ठव उमगता है, तो वाणी फूटती है, वेद का जन्म होता है, उपनिषद उतरते हैं। लेकिन जब तक ऐसा न हो तब तक चुप ही रह जाना। तब तक मौन ही रहना। मौन में पकने देना उपनिषद को। मौन में जैसे गर्भ है। मौन में जैसे सत्य गर्भ में बढ़ता है। जब नौ महीने पूरे होंगे, जब घड़ी आएगी प्राकट्य की, अभिव्यक्ति की, तब सब अपने से होगा।
इसलिए कहते हैं सुंदरदास:
बोलिए तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ,
न तौ मुख मौन करि चुप होइ रहिए।
जोरिएऊ तब जब जोरिबौऊ जानि परै,
तुक छंद अरथ अनूप जामैं लहिए।।
तभी बनाना गीत, जब भीतर कुछ बन गया हो! ‘जोरिएऊ तब’. तभी जोड़ना शब्द और बनाना गीत. ‘जब जोरिबौऊ जानि परै’. जब ऐसा लगे कि हां, अब कुछ कहने योग्य है, अब कुछ गाने योग्य है, अब छेडूं वीणा के तार, अब छेडूं मृदंग!
महावीर बारह वर्ष चुप रहे, फिर वाणी झरी। उन बारह वर्षों में वाणी पकी, सत्य बढ़ा। सत्य का शिशु महावीर के गर्भ में बड़ा हुआ।
जोरिएऊ तब जब जोरिबौऊ जानि परै,
जल्दी मत करना। अहंकार बड़ी जल्दी में पड़ जाता है। जरा सा कुछ हो जाता है कि अहंकार बताने चल पड़ता है। सावधान! अहंकार के धोखे से सावधान! जरा कुछ हो गया, जरा रोशनी दिखाई पड़ गई कि जरा रीढ़ में कुछ लहर आ गई कि चले बताने--कि कुंडलिनी जाग गई, कि सहस्रार में कमल खिल गया. चले बताने! जल्दी मत करना। अगर बहुत ही कहने को हो जाए तो गुरु को कह देना। अगर कहे बिना बने ही नहीं, कहना ही पड़े तो गुरु को कह देना; मगर इधर-उधर मत कहते फिरना, अन्यथा जो थोड़ी सी पुलक आई वह भी खो जाएगी। गर्भपात हो जाएगा। गर्भ को सम्हालना!
जोरिएऊ तब जब जोरिबौऊ जानि परै,
तुक छंद अरथ अनूप जामैं लहिए।।
फिर अपने से ही पैदा होता है सब। जब वह अनुपम अनुभव होता है तो ‘तुक छंद अरथ’ सब अपने से पैदा हो जाता है। फिर तुक बांधनी थोड़े ही पड़ती है, फिर छंद संभालना थोड़े ही पड़ता है! संतों ने जो गीत गाए, ये कोई मात्र कविताएं तो नहीं हैं।
कवि और ऋषि का यही भेद है। कवि के पास कहने को कुछ भी नहीं है। शब्द जोड़ता है, तुक-छंद बिठाता है। ऋषि के पास कुछ कहने को है; तुक-छंद अपने से जुड़ते हैं। और जुड़ें तो जुड़ें, न जुड़ें तो न जुड़ें, उसे कुछ फिकर भी नहीं होती। उसके भीतर कुछ है जो आंदोलित हो रहा है, जो प्रवाहमान होना चाहता है।
गाइएऊ तब जब गाइबै कौ कंठ होइ,
और जब तुम्हारी वाणी में रोशनी उतर आए तो गाना, जरूर गाना! मगर पहले सत्य के अनुभव को आने दो। पंडित मत हो जाना। पंडित यानी पोपट, तोते। तोते मत बन जाना!
गाइएऊ तब जब गाइबै कौ कंठ होइ,
श्रवण कै सुनत ही मन जाइ गहिए।
कहना तब जब कहने योग्य कुछ सघन हो जाए, कि किसी के कान पर पड़ जाए तो जगाए उसे। किसी की सुधि में प्रवेश कर जाए तो सावधान करे उसे। जिसके हृदय में गूंजने लगे, उसकी वीणा झंकृत हो उठे।
सोती किस्मत चौंक उठी
तू बोला या जादू बोला!
तब बोलना जब बोलने में जादू आ जाए। जब शब्द-शब्द निःशब्द से भरा हो। शब्द की पोर-पोर निःशब्द के रस से भरी हो। जब शब्द की पोर-पोर से निःशब्द का रस झलक रहा हो।
खिलते हैं फूल
गमकती है महक
धरा से क्षितिज तक.
कितने हाथ
विविध वर्ण
ऊपर को उठते
थरथराते हैं.!
निहारते हैं
सतत गतिशील ज्योति-पुंज
रवि-रथ को
अपलक.
गंधपूत
अनगिनत
भाव-दूत
ऋतुमती
धरित्री के
नभ तक
सरसराते हैं!
देखते हो फूलों को! धरा में छिपी हुई गंध को आकाश तक पहुंचाते हैं। ऐसे ही जब तुम्हारे प्राणों में छिपी हुई गंध प्रकट होने को तैयार हो जाए तो खिलेंगे फूल, उगेंगे गीत, शब्द भी जन्मेंगे। बांसुरी बजेगी, मगर कृष्ण को आ तो जाने दो! कृष्ण का कुछ पता ही नहीं है, बांसुरी बजाने बैठ गए हो। स्वर नहीं सधेगा। स्वर तो उसके ही हों तभी सधे हुए होते हैं। तुम गाओगे, तुम्हारी दुर्गंध ही फैलेगी। उसे गाने देना--जब पक्का हो जाए कि अब मैं नहीं, वह है।
तैरती है एक बूंद
सिंदूरी
जल पर.
स्वरारोह टंका
धरती-आकाश के बीच
झीने परदे पर.
वेदों की एक ऋचा अभी-अभी
रूप धर
उतरी है धरती पर!
जब तुम्हें लगे कि उतरा कुछ आकाश से मेरे भीतर.
वेदों की एक ऋचा अभी-अभी
रूपधर
उतरी है धरती पर!
जब तुम्हें लगे अनंत ने मुझे चुना; जब तुम्हें लगे अब मैं परमात्मा का निमित्त हुआ. मगर उसके पहले मिटो। पूर्ण होने के पहले शून्य हो जाओ। होने के पहले मिटना अनिवार्य शर्त है। पोली बांस की पोंगरी हो जाओ, फिर जरूर ऋचाएं उतरती हैं।
गाइएऊ तब जब गाइबै कौ कंठ होइ,
श्रवण कै सुनत ही मन जाइ गहिए।
तुकभंग छंदभंग अरथ मिलै न कछु,
सुंदर कहत ऐसी बानी नहिं कहिए।।
मत कहो वह, जो तुम्हारे मौन से नहीं जन्मा है।
मत कहो वह, जो तुम्हारे मौन का संदेशवाहक नहीं है।
मत कहो वह, जो तुम्हारे ध्यान का स्वर नहीं है; जो तुम्हारी समाधि की भाव-भंगिमा नहीं है।
मत कहो वह, जो तुम कह रहे हो। परमात्मा को बोलने दो!
एकनि के बचन सुनत अति सुख होइ,
और इसलिए तो ऐसा हो जाता है कि एक के वचन सुन कर अपूर्व सुख का आविर्भाव होता है।
फूल से झरत हैं अधिक मनभावने।
बुद्धों के वचन. जैसे झर गए हरसिंगार के फूल! झर झर झर. और जैसे भर गए सुगंध से प्राणों को!
एकनि के बचन सुनत अति सुख होइ,
फूल से झरत हैं अधिक मनभावने।
एकनि के बचन अशम मानौ बरषत,
श्रवण के सुनत लगत अलखावने।।
और किसी के वचन ऐसे लगते हैं जैसे कोई पत्थर मार रहा हो! बड़े अप्रिय, बड़े कर्ण-कटु, जहरीले! शब्द वही हैं; किसी के ओंठों पर अमृत हो जाते हैं, किसी के ओंठों पर जहर हो जाते हैं।
जो जहरे-हलाहल है अमृत भी वही नादां
मालूम नहीं तुझको अंदाज ही पीने के
एकनि के बचन कंटक कटु विषरूप,
करत मरम छेद दुख उपजावने।
और किसी के शब्द छेद देते हैं हृदय को, जैसे कांटे छेद गए हों, कि शूल, कि किसी ने भाला मार दिया हो, कि घाव कर जाते हैं। और एक के वचन घाव भर जाते हैं। एक के वचन रुग्ण करते हैं, एक के स्वास्थ्य दे जाते हैं।
रुको! इसके पहले कि कुछ कहने चलो, इसके पहले कि किसी को सलाह दो--मिटो! नहीं तो तुम्हारी सलाह कोई सुनेगा नहीं, कोई मानेगा भी नहीं।
कहावत है कि दुनिया में जो चीज सबसे ज्यादा दी जाती है वह सलाह है और जो सबसे कम ली जाती है वह भी सलाह है।
और सच तो यह है कि सलाह देने वाले को कोई कभी क्षमा नहीं कर पाता।
तुम्हें जो भी सलाह देता है, तुमने उसे क्षमा किया? भीतर ही भीतर तुम कष्ट पाते हो। सलाह देने वाले पर तुम्हें क्रोध उमगता है। सलाह देने वाला ऐसा लगता है कि एक मौके का लाभ ले रहा है; तुम मुसीबत में हो, इन्हें ज्ञान बघारने की पड़ी है। तुम्हारी पत्नी मर गई है और कोई सलाह दे रहा है कि आत्मा अमर है भाई, क्यों रो रहे हो? तबीयत होती है कि इनकी पत्नी भी मरे तो कुछ पता चले। सुन लेते हो, पर यह बात बेहूदी है। और जिसने कही है उसे न आत्मा की अमरता का पता है, न उसे कुछ लेना-देना है। वह यह मौका नहीं छोड़ सका। तुम्हारा दुख था, उसने ज्ञान दिखाने का मौका बना लिया, उसने एक अवसर का लाभ ले लिया। तोते की तरह रटे हुए शब्द उसने दोहरा दिए।
सावधान रहना, ऐसा मत करना। जो तुमने न जाना हो उसे मत कहना। इस दुनिया में लोग अगर उन बातों को कहना बंद कर दें जो उन्होंने नहीं जानी हैं तो बड़ी शांति हो जाए।
एक सूफी कहानी तुमसे कहूं। एक आदमी जंगल गया। शिकारी था। किसी झाड़ के नीचे बैठा था थका-मांदा, पास ही एक खोपड़ी पड़ी थी किसी आदमी की। ऐसे ही, कभी-कभी हो जाता है न, तुम भी अपने स्नानगृह में अपने से बात करने लगते हो कि आईने के सामने खड़े होकर मुंह बिचकाने लगते हो। आदमी का बचपन कहीं जाता तो नहीं। खोपड़ी पास पड़ी थी, ऐसे ही बैठे, कुछ काम तो था नहीं, उसने कहा: हलो! क्या कर रहे हैं? मजाक में ही कहा था। अपने से ही मजाक कर रहा था। खाली पड़ा था, कुछ खास काम भी नहीं था, आशा भी नहीं थी कि खोपड़ी बोलेगी।
खोपड़ी बोली कि हलो! घबड़ा गया एकदम! अब कुछ पूछना जरूरी था, क्योंकि जब खोपड़ी बोली अब कुछ न पूछें तो भी भद्दा लगेगा। तो पूछा उसने कि आपकी यह गति कैसे हुई? तो उस खोपड़ी ने कहा: बकवास करने से। भागा शहर की तरफ घबड़ाहट में। भरोसा तो नहीं आता था, मगर बिलकुल कान से सुना था, आंख से देखा था। सोचा जाकर राजा को कह दूं। कुछ पुरस्कार भी मिलेगा, ऐसी खोपड़ी अनूठी है! राजमहल में होनी चाहिए। राजा को जाकर कहा कि ऐसी खोपड़ी देखी है। राजा ने कहा: फिजूल की बकवास मत कर! उसने कहा: नहीं, बकवास नहीं कर रहा हूं। अपनी आंख से देख कर आ रहा हूं। भागा चला आया हूं आपको खबर देने।
सम्राट ने पहले तो टालने की कोशिश की, लेकिन वह शिकारी जाहिर था, प्रसिद्ध शिकारी था। सम्राट उसे जानता भी था, झूठ बोलेगा भी नहीं। लेकर अपने दरबारियों को पहुंचा। शिकारी आगे-आगे प्रसन्नता से. उसने जाकर उस खोपड़ी से कहा: हलो! खोपड़ी कुछ भी न बोली। अरे, उसने कहा: हलो! खोपड़ी बिलकुल न बोली। हिलाया खोपड़ी को, कहा: हलो! मगर खोपड़ी एकदम सन्नाटे में हो गई। थोड़ा घबड़ाया। राजा ने कहा: मुझे पहले ही पता था। अपने दरबारियों से कहा: उतारो इसकी गर्दन। उसकी गर्दन कटवा दी।
जब राजा लौट गया गर्दन कटवा कर तो वह खोपड़ी बोली: हलो! आपकी यह गति कैसे हुई?
उसने कहा: बकवास करने से।
सावधान रहना! जो तुमने न जाना हो, मत कहना। जो तुम्हारा अपना अनुभव न हो, उसे मत कहना। कहने का बहुत मन होता है। कहने की बड़ी आतुरता होती है। कहने का बड़ा मजा है, रस है। अहंकार को बड़ी तृप्ति मिलती है। अहंकार को ज्ञान दिखाने से ज्यादा और किसी बात में तृप्ति नहीं मिलती है। और जिसको ज्ञानी होना हो, जिसे सच में ही ज्ञान पाना हो, उसे इस भ्रांत वासना से बचना चाहिए।
सुंदर कहत, घट घट में बचन भेद,
उत्तम मध्यम अरु अधम सुनावने।।
सुंदर कहते हैं: तीन तरह के वचन हैं। एक तो अधम वचन--उस आदमी के, जिसने कुछ जाना नहीं, व्यर्थ बोल रहा है। और ध्यान रखना, अक्सर ऐसा हो जाता है कि तुम्हें खयाल भी नहीं होता कि तुम झूठ बोल रहे हो। क्योंकि बात अच्छी होती है, बात सुंदर होती है, इसलिए झूठ मालूम नहीं पड़ती। लेकिन सौंदर्य से कोई बात सच नहीं होती। जब तुम अपने बेटे से कहते हो कि ईश्वर है, तो जरा सोचना, तुमने जाना है, तुम्हारा अनुभव है, तुम्हारी प्रतीति है? अगर नहीं है तो तुम झूठ बोल रहे हो। और तुम इस जगत में सबसे बड़ा झूठ बोल रहे हो, क्योंकि परमात्मा के संबंध में भी झूठ बोल रहे हो।
जो आदमी छोटी-मोटी चीजों के संबंध में झूठ बोलता है, दो रुपये को तीन रुपया बताता है, वह कोई खास झूठ नहीं बोल रहा है। मगर तुम तो एक ऐसी बात बोल रहे हो, जो परम झूठ है, परम असत्य है। और साथ ही तुम बेटे को शिक्षा देते हो कि बेटा, सच बोलना--और परमात्मा है! परमात्मा देख रहा है। सच बोलना, झूठ मत बोलना, नहीं तो परमात्मा दंड देगा, नरक भेजेगा। और तुम सरासर झूठ बोल रहे हो। न तुम्हें परमात्मा का पता है, न तुम्हें नरक का पता है, न तुम्हें इस बात का पता है कि परमात्मा सदा देख रहा है। अगर परमात्मा सदा देख रहा है तो अभी भी देख रहा है कि बाप बेटे से झूठ बोल रहा है। फंसे तुम! फिर मत कहना पीछे, अगर कोई कहे: हलो! यह हालत कैसे हुई?
‘बकवास करने से।’ फिर मत कहना।
धर्म के नाम पर इतना झूठ चल रहा है। अच्छी-अच्छी बातें हैं। और मैं यह नहीं कह रहा हूं कि परमात्मा नहीं है; लेकिन जब तक तुम्हारा अनुभव नहीं है, तब तक तुम्हारा वचन झूठ है। सत्य तुम्हारा अनुभव हो तो ही सत्य होता है।
तो अधम वचन तो वह है जिसका तुम्हें कोई अनुभव नहीं और तुम बोल रहे हो।
उत्तम वचन वह है: तुम ठीक वही बोल रहे हो, जो तुम्हारा अनुभव है। सच तो यह है: तुम बोल नहीं रहे, अनुभव ही बोल रहा है, तो उत्तम वचन है। और मध्यम दोनों के बीच में है। कुछ-कुछ तुम्हारा अनुभव है, कुछ-कुछ तुम जोड़ रहे हो।
जो तुम जोड़ रहे हो उसको छोड़ दो। उतना ही कहो जितना देखा, जितना जाना; उसमें रत्ती भर मत जोड़ो। उसमें नमक-मिर्च मत मिलाओ। यह हमारी आदत है।
एक अफवाह तुम उड़ा दो। शाम तक तुम खुद ही हैरान होओगे, जब अफवाह सारे गांव में घूम कर तुम्हारे पास वापस आएगी, इतनी बड़ी हो जाएगी कि तुम खुद ही चक्कर में पड़ जाओगे! तुम्हें भरोसा ही नहीं आएगा कि यह मेरी ही अफवाह है जो मैंने उड़ाई थी सुबह। चिंदी का सांप हो जाता है!
आदमी हर चीज को बढ़ा-चढ़ा कर कहने का आदी होता है। क्यों? क्योंकि आदमी का अहंकार बड़ी से बड़ी चीज चाहता है। बड़ा मकान न सही, बड़ी दुकान न सही, बड़ा झूठ तो हो सकता है अपना!
मैं एक गांव में एक घर में मेहमान था। पति बड़े वकील हैं। जाने के पहले, उन्होंने मुझे अलग बुलाया और कहा कि मैं तो कोर्ट जा रहा हूं, लेकिन अब आपको अपने घर छोड़ जा रहा हूं, एक बात आपको बता दूं कि मेरी पत्नी कुछ भी कहे, आप मानना मत। उसकी बढ़ा-चढ़ा कर कहने की आदत है। फुंसी हो जाए तो कैंसर बताती है। और अब आपको मैं छोड़े जा रहा हूं उसी के सहारे। वही घर में है, मैं जा रहा हूं। वह अब बताएगी आपको न मालूम क्या-क्या! और आपको पता नहीं, मैं तीस साल का अनुभवी हूं। इसलिए आपको कह रहा हूं कि उसकी बातों में पड़ना ही मत, जब तक मैं शाम तक लौट न आऊं। तो वह कुछ भी कहती है।
और सच थी बात! लोग बीमारियां भी बड़ी कर-कर के बताते हैं! एक महिला ने डॉक्टर से जाकर कहा ऑपरेशन की टेबल पर कि अपेंडिक्स तो निकाल रहे हो, चीरा कितना लंबा लगाओगे? उसने कहा कि दो-तीन इंच का होगा कोई। उसने कहा कि नहीं, छह इंच से कम लगाना ही मत।
क्यों?
उसने कहा कि मेरे पति का पांच इंच का है और वह इसी की अकड़ बताए फिरते हैं कि पांच इंच का चीरा लग गया। छह इंच का लगा देना; एक दफा अकड़ खत्म करवा देनी है उनकी।
मैंने तो यह भी सुना है कि एक महिला ने जाकर डॉक्टर को कहा कि कुछ भी ऑपरेशन कर दो।
काहे के लिए?
उसने कहा: सभी स्त्रियों का. किसी का कोई, किसी ने टांसिल निकलवाया, किसी ने अपेंडिक्स निकलवाई और मेरा कुछ नहीं निकला तो, बात करने का कोई मसाला ही नहीं है। सब हांकती हैं अपना कि मेरा ऐसा हुआ ऑपरेशन, मेरा वैसा हुआ ऑपरेशन, कुछ भी निकाल दो। कुछ बात करने को तो चाहिए।
आदमी के पास कुछ न हो तो बड़े झूठ सही। अहंकार चीजों को बड़ा करने का आदी है; वह राई से, रत्ती से पहाड़ बनाता है। तुम सावधान रहना।
तो अधम, जिसे कुछ भी अनुभव नहीं है। मध्यम, जिसे कुछ-कुछ अनुभव है और उसमें खूब बढ़ा-चढ़ा रहा है। और उत्तम, जो स्वयं नहीं बोलता, जो परमात्मा को बोलने देता है। उत्तम को ध्यान में रखना।
अधिकतर लोग अधम की हालत में हैं। और मध्यम में अटक मत जाना। क्योंकि मध्यम में जो अटका है वह कभी भी अधम में गिर सकता है। थोड़े से लोग मध्यम की हालत में हैं और वहीं अटक जाते हैं। थोड़ा सा कुछ हो जाता है कि बस सब हो गया! रुके वहीं।
अंत को ध्यान में रखना। परम लक्ष्य को ध्यान में रखना। परम लक्ष्य यही है कि तुम ऐसे शून्यवत हो जाओ कि परमात्मा बोले, नाचे, गाए तुम से।
जल कौ सनेही मीन बिछुरत तजै प्राण,
मणि बिन अहि जैसे जीवित न लहिए।
और जैसे मछली तड़प जाती है जल के बाहर और प्राण छोड़ देती है, ऐसे ही तुम परमात्मा को चाहोगे तो पा सकोगे। इससे कम में काम न चलेगा।
मणि बिन अहि जैसे जीवित न लहिए।
और जैसे सांप की मणि खो जाए तो वह जीना नहीं चाहता, ऐसे ही बिना परमात्मा के तुम जीना भी न चाहो--ऐसी जब तुम्हारी आकांक्षा हो, ऐसी बलवती जब तुम्हारी अभीप्सा हो, तभी तुम मिट पाओगे और परमात्मा तुम्हारे भीतर प्रविष्ट होगा।
स्वाति बूंद के सनेही प्रगट जगत मांहिं,
एक सीप दूसरौ सु चातकऊ कहिए।।
चातक बनो! क्योंकि चातक ही जान सकता है कि जल क्या है और स्वाति की बूंद क्या है। एक सीप से दूसरी सीप में भेद चातक ही कर पाता है। चातक की अभीप्सा ऐसी है कि वह सार से असार को भेद कर लेता है।
तुम जब परमात्मा को प्रगाढ़ता से चाहोगे तो असार तुम्हें अपने आप दिखाई पड़ने लगेगा। और जिसने असार को असार की भांति देख लिया, उसने सार की तरफ आधी यात्रा पूरी कर ली।
रवि को सनेही पुनि कंवल सरोबर मैं,
और जैसे सूरज का प्यारा, कमल, राह देखता है सूरज की कि कब उगे सूरज और मैं खिलूं; प्रतीक्षा करता है सुबह की कि कब आए सूरज और जगाए--ऐसी करो प्रतीक्षा! रात तुम्हारी भी लंबी है और अंधेरी है। और तुम भी वैसे ही कीचड़ में पड़े हो जैसा कमल पड़ा है। सूरज की प्रतीक्षा करो। पुकारो, आह्वान करो! आएगा सूरज जरूर। निश्चित आता है। जब कमल की प्रार्थना सुन ली जाती है, तुम्हारी न सुनी जाएगी?
ससि कौ सनेहीऊ चकोर जैसैं रहिए।
और जैसे चांद का प्यारा चकोर चांद को ही देखता रहता है, टकटकी लगाए चांद को ही देखता रहता है--ऐसे ही तुम इस सारे संसार में कहीं भी रहो, कैसे भी रहो, कहीं उठो, बैठो, सोओ, मगर तुम्हारी टकटकी परमात्मा पर लगी रहे। उस परम प्यारे पर लगी रहे। अपलक तुम्हारी आंख उस पर जुड़ी रहे, तो एक दिन जरूर, मिलन होता है।
यहां कुछ भी अभीप्सा व्यर्थ नहीं जाती। यहां कोई भी प्यास व्यर्थ नहीं जाती। यहां प्यास के पहले जल है।
तैसें ही सुंदर एक प्रभु सौं सनेह जोरि,
और कछु देखि काहू बोर नहीं बहिए।।
ऐसे उस एक परमात्मा से अपने स्नेह के धागे को जोड़ लो, प्रेम के धागे को जोड़ लो। और किसी दूसरी तरफ मन को मत जाने दो। मन बहुत दौड़ लिया, बहुत भटक लिया। जन्म-जन्म तक यह भटकाव चल लिया। अब सारी ऊर्जा को उस एक तरफ प्रवाहित करो। उस एक को पुकारो! श्वास-श्वास में उस एक को समाने दो। हृदय की धड़कन-धड़कन में उस एक को बैठ जाने दो।
मिलन होगा, मिलन निश्चित होगा! मैं उसका गवाह हूं, साक्षी हूं। मिलन होता है--मगर उसी का होता है, जिसकी अभीप्सा पूरी हो!
हुस्न से कब तक परदा करते
इश्क से कब तक परदा होता
प्रेम जगे तो परमात्मा प्रकट होने को राजी है। उसका सौंदर्य बरसने को राजी है मगर तुम झोली तो फैलाओ! तुम मांगो तो!
जीसस के वचन हैं: मांगो और मिलेगा! खटखटाओ--और द्वार खुलेंगे!
आज इतना ही।