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ओशो: क्रोध क्या है

ओशो: क्रोध क्या है

क्रोध से क्रोध कभी नहीं मिटता — करुणा से मिटता है। क्रोध को दबाना नहीं, देखना है। ओशो के अपने शब्दों में।

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क्रोध पर ओशो की दृष्टि दोहरी भूल से बचाती है — न दमन, न अभिव्यक्ति का अंधा समर्थन। उनके अनुसार क्रोध पहले स्वयं को जलाता है, फिर दूसरे तक पहुंचता है; और जो आदमी हर गाली पर भड़क उठता है, वह मनुष्य नहीं, यंत्र है जिसकी बटन कोई भी दबा सकता है।

ओशो का मार्ग है साक्षी-भाव: क्रोध को दबाओ मत, लड़ो मत — देखो। बुद्ध और महावीर की देशनाओं पर बोलते हुए वे बार-बार यही सूत्र देते हैं कि क्रोध की ऊर्जा ही, देखे जाने पर, करुणा में रूपांतरित हो जाती है। नीचे उनके हिंदी प्रवचनों से चुने हुए अंश दिए गए हैं।

उनके ही शब्दों में

प्रवचनों से

ओशो ने जहां-जहां इस विषय पर बात की — हर अंश पूरे प्रवचन से जुड़ा है। हिंदी पुस्तकों के लिंक मूल हिंदी प्रवचन खोलते हैं।

Osho, ever since I first heard you, this question has been on my mind: just as a disturbed person has anger—for himself—does a peaceful person also have anger—for others, for society?

प्रश्न: ओशो, जब से मैंने आपको पहली बार सुना है, तब से यह प्रश्न मेरे मन में है: जैसे अशांत व्यक्ति को क्रोध होता है—अपने लिए—क्या शांत व्यक्ति को भी क्रोध होता है—दूसरों के लिए, समाज के लिए? हां, हां—क्रोध निश्चित ही होगा। सचमुच शांत व्यक्ति को भी क्रोध होता है; उसका भी अपना युद्ध है, अपना संघर्ष है। लेकिन अपने लिए नहीं—बस यही फर्क है। अशांत व्यक्ति भी लड़ता है, लेकिन वह अपने लिए लड़ता है। शांत व्यक्ति दूसरों के लिए लड़ेगा; वह भी क्रोध से भर जाएगा, लेकिन अपने लिए उसके भीतर कोई क्रोध शेष नहीं रहता। उसके क्रोध का अब कोई भी भीतरी, निजी कारण नहीं होता। इसलिए मैं कहता हूं: व्यक्ति शांत होना चाहिए, और समाज में क्रांति होनी चाहिए। मेरा मानना है कि केवल शांत व्यक्ति ही क्रांति ला सकता है, क्योंकि अशांत व्यक्ति उसे कैसे लाएगा?
ओशो के मूल हिंदी शब्द · Osho's original Hindi

ओशो, आपको पहली बार सुना था, तब से यह प्रश्न मन में है कि जैसे अशांत व्यक्ति का गुस्सा होता है, क्रोध होता है--अपने लिए। वैसे ही क्या शांत व्यक्ति का भी क्रोध होता है, गुस्सा होता है--दूसरों के लिए, समाज के लिए?

हां-हां, बिलकुल होगा गुस्सा। बिलकुल ही शांत आदमी का गुस्सा भी होता है, युद्ध भी होता है उसका, संघर्ष भी है उसका। लेकिन अपने लिए नहीं है, इतना ही फर्क है। अशांत व्यक्ति भी लड़ता है, लेकिन वह अपने लिए लड़ता है। शांत व्यक्ति दूसरे के लिए लड़ेगा भी, क्रोध से भी भरेगा, लेकिन अपने लिए अब उसका कोई क्रोध नहीं है। क्रोध का उसका कोई अब भीतरी कारण नहीं है। तो मैं जो कहता हूं, व्यक्ति शांत होना चाहिए और समाज में एक क्रांति आनी चाहिए। मेरा मानना है कि शांत व्यक्ति ही क्रांति ला सकता है, क्योंकि अशांत व्यक्ति बेचारा कहां से क्रांति लाएगा! क्रांति लाने के लिए जो शांत चित्तता चाहिए, वही उसके पास नहीं है। लेकिन शांत व्यक्ति अब तक--यह रहा है अब तक--कि अब तक जो शांत व्यक्ति रहे हैं, उन्होंने कोई क्रांति नहीं लाई है। और उसका कारण यह था कि उनकी शांति भी मुर्दा थी, वह शांति जिंदा नहीं थी। तो एक आदमी ऐसे भी शांत हो सकता है कि बिलकुल मुर्दा हो जाए, निष्क्रिय हो जाए, तो भी शांत हो जाता है। …

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

Anger comes in a second—then how can we suppress it in a second?

प्रश्न: क्रोध एक क्षण में आ जाता है—तो फिर हम उसे एक क्षण में दबा कैसे सकते हैं? नहीं, नहीं—मैं दबाने की बात नहीं कर रहा हूं। मैं दमन नहीं कह रहा हूं। (प्रश्न की ऑडियो रिकॉर्डिंग स्पष्ट नहीं है।) एकांत खोजो—कहीं दरवाजा बंद कर लो, शांत बैठ जाओ—और जो भी उठता है, उसे देखो। बस देखो; कुछ करना मत। वह एक क्षण के लिए उठेगा—ठीक उसी को देखो। कोई चिंता नहीं। तुम यह सोचने में भूल कर रहे हो कि क्रोध केवल एक क्षण के लिए उठता है; उसका आवेग बहुत देर तक बना रहता है। भड़कना क्षण भर का हो सकता है, लेकिन उसके पीछे धुएं की लकीर बहुत दूर तक चलती चली जाती है। कोई चिंता नहीं, यदि तुम उसे उसकी पूरी जवानी में न देख सको; यदि वह अपने बुढ़ापे में भी दिखाई दे, तो भी कोई हर्ज नहीं। यदि उसकी केवल अंतिम रेखा ही दिखाई दे, तो भी कोई हर्ज नहीं। देखने का प्रयोग शुरू करो।
ओशो के मूल हिंदी शब्द · Osho's original Hindi

आपने एक प्रश्न पूछा है कि आनंद का थोड़ी देर को अनुभव होता है, फिर वह आनंद चला जाता है। तो वह आनंद और अधिक देर तक कैसे रहे?

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।) हां, मेरी धारणा मैं आपको बताऊं...

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

Vigyan Bhairav Tantra Vol 1 · Discourse 18Question 2 1972-12-09 Woodlands, Bombay English

According to last night's technique, when anger, violence, sex, etc., arises, one should consider it and then suddenly quit it. But when one does it, one sometimes feels sick and uneasy. What are the reasons for these negative feelings?

प्रश्न: कल रात की विधि के अनुसार, जब क्रोध, हिंसा, कामवासना आदि उठें, तो व्यक्ति को उस पर विचार करना चाहिए और फिर अचानक उसे छोड़ देना चाहिए। लेकिन जब कोई ऐसा करता है, तो कभी-कभी अस्वस्थ और बेचैन अनुभव करता है। इन नकारात्मक भावनाओं के कारण क्या हैं? केवल एक कारण है: तुम्हारा विचार समग्र नहीं है। हर कोई क्रोध को समझे बिना छोड़ना चाहता है; हर कोई कामवासना को समझे बिना छोड़ना चाहता है। और समझ के बिना कोई क्रांति नहीं होती। तुम और समस्याएँ पैदा करोगे, और अपने लिए और दुख पैदा करोगे। किसी भी चीज़ के त्याग के बारे में मत सोचो, बस यह सोचो कि उसे कैसे समझना है: समझ, त्याग नहीं। किसी भी चीज़ को छोड़ने के बारे में सोचने की कोई जरूरत नहीं है। केवल एक ही जरूरत है—उसे उसकी समग्रता में समझना। यदि तुमने उसे उसकी समग्रता में समझ लिया, तो रूपांतरण अपने-आप घटेगा। यदि वह तुम्हारे लिए शुभ है, यदि वह तुम्हारे अस्तित्व के लिए शुभ है, तो वह बढ़ेगी।

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

The Path Of The Mystic · Discourse 15Question 2 1986-05-11 Punta Del Este, Uruguay English

Beloved Osho, I am angry with my parents for the first time. They are simple people, and I say to myself that it is not their fault that they have no understanding of Osho. But my anger is so much in conflict with my love that it hurts. I am so angry writing this that I can't even formulate the question. Can you help please?

प्रश्न: प्रिय ओशो, पहली बार मैं अपने माता-पिता से क्रोधित हूं। वे सीधे-सादे लोग हैं, और मैं अपने आप से कहता हूं कि यह उनकी गलती नहीं है कि उन्हें ओशो की कोई समझ नहीं है। लेकिन मेरा क्रोध मेरे प्रेम से इतना टकरा रहा है कि पीड़ा होती है। यह लिखते हुए मैं इतना क्रोधित हूं कि प्रश्न भी ठीक से बना नहीं पा रहा हूं। कृपया, क्या आप सहायता कर सकते हैं? विश्वविख्यात ईसाई मिशनरियों में से एक बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति थे—स्टैनली जोन्स। वे मेरे बहुत मित्र थे, लेकिन फिर वे बहुत क्रोधित हो गए और मित्रता टूट गई। वे वृद्ध व्यक्ति थे, महात्मा गांधी के मित्र थे, और महात्मा गांधी उनका बहुत सम्मान करते थे। वे उस नगर में आया करते थे जहां मैं रहता था, और मेरे एक मित्र के घर ठहरते थे।

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

Vedanta Seven Steps To Samadhi · Discourse 7Question 3 1974-01-14 Mt. Abu, Rajasthan, India English

Beloved Osho, though we can be aware of anger and refrain from hurting others with it, inner anger seems to remain in a dormant state, and at times it becomes aroused by outer happenings. It doesn't seem possible to entirely throw it as it is deep-rooted in early, wrong training, and a lifetime of struggle in the world. Isn't the total disappearance of anger simultaneous with enlightenment? Does an enlightened one ever have any anger?

प्रश्न: प्रिय ओशो, यद्यपि हम क्रोध के प्रति जागरूक हो सकते हैं और उससे दूसरों को चोट पहुंचाने से अपने को रोक सकते हैं, फिर भी भीतर का क्रोध जैसे सुप्त अवस्था में बना रहता है, और कभी-कभी बाहरी घटनाओं से वह उत्तेजित हो उठता है। उसे पूरी तरह फेंक देना संभव नहीं लगता, क्योंकि उसकी जड़ें बचपन के गलत प्रशिक्षण में, और संसार में जीवन-भर के संघर्ष में गहरी जमी हुई हैं। क्या क्रोध का पूर्ण रूप से विलीन हो जाना संबोधि के साथ ही घटित नहीं होता? क्या संबुद्ध व्यक्ति को कभी कोई क्रोध होता है? पहली बात: यदि तुम्हें क्रोध आता है और यदि तुम्हें लगता है कि अभी उसे दबाना जरूरी है, तो फिलहाल उसे दबा दो—क्योंकि किसी पर बस क्रोधित हो जाना और फिर एक शृंखला बना देना व्यर्थ है। तब वह क्रोधित होगा और फिर और क्रोध पैदा होगा, और यह बात जन्मों-जन्मों तक चल सकती है। हर चीज में कारण और परिणाम की एक निरंतरता होती है; वह एक शृंखला बन जाती है।

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

Osho, I am ignorant. All around me there is nothing but darkness. What is the path for me?

अंतिम प्रश्न: ओशो, मैं क्रोध से अत्यंत पीड़ित हूँ। मेरा सारा जीवन इसके कारण नष्ट हो रहा है। मैं इस दुष्ट क्रोध का त्याग करना चाहता हूँ। कृपा करके मुझे आशीर्वाद दें, ताकि क्रोध के रूप में यह शत्रु सदा-सदा के लिए भस्म हो जाए। क्रोध में तुम ठीक ऐसी ही बेहोशी की अवस्था में होते हो। जाकर किसी रसायनशास्त्री से पूछो, किसी चिकित्सक से पूछो: क्रोध में क्या होता है? जो ग्रंथियां विषैले द्रव्य छोड़ती हैं, वे अपना विष तुम्हारे रक्त में छोड़ देती हैं। तुम्हारा सारा रक्त विषाक्त हो जाता है। उस विषैली अवस्था में, तुमने शराब बाहर से पी या भीतर ही पैदा हो गई—इससे क्या फर्क पड़ता है? फिर तुम जो भी करते हो, तुम होश में नहीं होते। कई बार लोगों ने हत्या कर दी है, और उन्होंने वह होशपूर्वक नहीं की; वह विक्षिप्त अवस्था में घटित हुई।
ओशो के मूल हिंदी शब्द · Osho's original Hindi

आखिरी प्रश्न: ओशो, मैं अज्ञानी हूं। मेरे चारों ओर अंधकार ही अंधकार है। मेरे लिए क्या मार्ग है?

संगीत! अंधकार केवल एक बात का प्रमाण है कि आलोक हो सकता है। अंधकार केवल एक चीज का सबूत है कि आलोक संभव है। इसलिए अंधकार को नकारात्मक दृष्टि से मत देखो। नास्तिक की दृष्टि से मत देखो। आस्तिक की दृष्टि से देखो। तो फिर तुम्हें अंधकार में भी रोशनी छिपी मालूम पड़ेगी। अंधकार तो गर्भ है रोशनी का। अंधकार से घबड़ा न जाओ, न भयभीत, न चिंतित--आनंदमग्न, क्योंकि आती होगी सुबह! और जितना अंधकार घना होता है, भोर उतनी ही करीब होती है। गहन है यह अंध कारा; स्वार्थ के अवगुंठनों से हुआ है लुंठन हमारा। खड़ी है दीवार जड़ की घेर कर, बोलते हैं लोग ज्यों मुंह फेर कर, इस गगन में नहीं दिनकर, नहीं शशधर, नहीं तारा।

यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।

शिक्षा का सार

क्रोध पर ओशो की दृष्टि

उनके हिंदी प्रवचनों में बार-बार लौटने वाले सूत्र — हर सूत्र के साथ मूल प्रवचन का अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।

क्रोध से क्रोध नहीं मिटता

धम्मपद के सूत्र 'एस धम्मो सनंतनो' की व्याख्या में ओशो बुद्ध का सनातन नियम दोहराते हैं — वैर से वैर मिटाने की कोशिश अपने हाथों नर्क रचना है।

यही सनातन धर्म है। शत्रुता से शत्रुता समाप्त नहीं होती। क्रोध से क्रोध समाप्त नहीं होता। वैर से वैर नहीं मिटता। और जितना वैर बढ़ता जाता है, उतना तुम अपने चारों तरफ अपने हाथों नर्क निर्मित करते चले जाते हो।
एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन 1, Para 1 →

क्रोध पहले स्वयं को जलाता है

क्रोध का पहला घाव क्रोधी को ही लगता है। ओशो कहते हैं — दूसरे को दुख देने की योजना बनाते ही हमने अपना विनाश शुरू कर दिया।

अगर बहुत गौर से देखा जाए, तो जब तुम दूसरे को दुख देना चाहते हो, तब तुमने अपने को दुख देना शुरू कर ही दिया। तुम दुखी होने शुरू हो ही गए। तुम क्रोधित हो, किसी पर क्रोध करके उसे नष्ट करना चाहते हो; उसे तुम करोगे या नहीं, यह दूसरी बात है, लेकिन तुमने अपने को नष्ट करना शुरू कर दिया।
एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन 1, Para 1 →

यंत्र मत बनो — मालिक बनो

जिसकी क्रोध की बटन कोई भी दबा दे, वह मशीन है। ओशो के लिए क्रोध पर मालकियत ही प्रतिक्रिया और क्रिया का भेद है — और यही मनुष्य होने की परिभाषा है।

मनुष्य होने का इतना ही अर्थ है कि कोई तुम्हारी क्रोध की बटन दबाए चला जाए, लेकिन तुम कहते हो नहीं करना है, तो बटन दबती रहती है, वह आदमी थक जाता है, लेकिन तुम क्रोध नहीं करते। तुम कहते हो मैं अपना मालिक हूं। जब करना चाहूंगा करूंगा, जब न करना चाहूंगा नहीं करूंगा। प्रतिक्रिया और क्रिया में यही फर्क है। प्रतिक्रिया में दूसरा मालिक है, तुम नहीं। और क्रिया में तुम मालिक हो, दूसरा नहीं।
एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन 6, Question 4 →

क्रोध आता है, आप क्रोधी नहीं होते

महावीर-वाणी पर बोलते हुए ओशो साक्षी का सूत्र देते हैं: क्रोध एक घटना है जो चित्त में घटती है — देखने वाला उससे सदा अलग है। यही भेद मुक्ति का द्वार है।

और सच यही है कि आप देखते हैं, आप कभी क्रोधी होते नहीं। वह भ्रांति है कि आप क्रोधी होते हैं। आप सदा देखने वाले बने रहते हैं। जब पेट में भूख लगती है तब आप भूख नहीं हो जाते, आप सिर्फ जानने वाले होते हैं कि भूख लगी है। जब पैर में कांटा गड़ता है तो आप दर्द नहीं हो जाते, तब आप जानते हैं कि पैर में दर्द हो रहा है, ऐसा मैं जानता हूं।
महावीर-वाणी, प्रवचन 12, Para 1 →
संक्षिप्त उत्तर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ओशो के अनुसार क्रोध को कैसे जीतें?

ओशो क्रोध से लड़ने को नहीं कहते — वे कहते हैं कि क्रोध की फिक्र छोड़ो, ध्यान करो। क्रोध मन की मूर्च्छा में घटता है; जैसे-जैसे साक्षी-भाव सधता है, क्रोध की जड़ ही कट जाती है। दमन से क्रोध भीतर अंगारे की तरह सुलगता रहता है और बहाना मिलते ही फूट पड़ता है।

क्या क्रोध को दबाना ठीक है?

नहीं। ओशो के अनुसार दबाया हुआ क्रोध नष्ट नहीं होता, संस्कार बनकर गहरा होता जाता है — राख के नीचे दबा अंगारा, जिसे किसी की एक फूंक फिर भड़का देती है। उनका मार्ग तीसरा है: न दमन, न अंधी अभिव्यक्ति — क्रोध को पूरे होश से देखना, जिससे उसकी ऊर्जा रूपांतरित हो सके।

क्रोध और करुणा का क्या संबंध है?

ओशो कहते हैं — करुणा से ही क्रोध मिटता है, जैसे प्रेम से वैर। क्रोध वही ऊर्जा है जो रूपांतरित होकर करुणा बनती है; इसीलिए वे क्रोध को शत्रु नहीं, कच्चा हीरा कहते हैं। बुद्ध के जीवन-प्रसंगों से वे दिखाते हैं कि जिसके भीतर क्रोध शेष नहीं, उस पर थूका भी जाए तो भी करुणा ही उठती है।