चेति सकै तो चेति — प्रवचन 4 Cheti Sake To Cheti #4
Series Place: Ahmedabad
Series Dates: Jun – Dec 1969
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1:12:41
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Questions in this Discourse
ओशो, आपको पहली बार सुना था, तब से यह प्रश्न मन में है कि जैसे अशांत व्यक्ति का गुस्सा होता है, क्रोध होता है--अपने लिए। वैसे ही क्या शांत व्यक्ति का भी क्रोध होता है, गुस्सा होता है--दूसरों के लिए, समाज के लिए?
हां-हां, बिलकुल होगा गुस्सा। बिलकुल ही शांत आदमी का गुस्सा भी होता है, युद्ध भी होता है उसका, संघर्ष भी है उसका। लेकिन अपने लिए नहीं है, इतना ही फर्क है। अशांत व्यक्ति भी लड़ता है, लेकिन वह अपने लिए लड़ता है। शांत व्यक्ति दूसरे के लिए लड़ेगा भी, क्रोध से भी भरेगा, लेकिन अपने लिए अब उसका कोई क्रोध नहीं है। क्रोध का उसका कोई अब भीतरी कारण नहीं है।
तो मैं जो कहता हूं, व्यक्ति शांत होना चाहिए और समाज में एक क्रांति आनी चाहिए। मेरा मानना है कि शांत व्यक्ति ही क्रांति ला सकता है, क्योंकि अशांत व्यक्ति बेचारा कहां से क्रांति लाएगा! क्रांति लाने के लिए जो शांत चित्तता चाहिए, वही उसके पास नहीं है।
लेकिन शांत व्यक्ति अब तक--यह रहा है अब तक--कि अब तक जो शांत व्यक्ति रहे हैं, उन्होंने कोई क्रांति नहीं लाई है। और उसका कारण यह था कि उनकी शांति भी मुर्दा थी, वह शांति जिंदा नहीं थी। तो एक आदमी ऐसे भी शांत हो सकता है कि बिलकुल मुर्दा हो जाए, निष्क्रिय हो जाए, तो भी शांत हो जाता है। निष्क्रिय नहीं चाहता हूं आदमी को; मेरा कहना है कि शांति सक्रिय होनी चाहिए, नहीं तो शांति बेमानी है। और शांति जीवित होनी चाहिए। और शांत व्यक्ति दूसरे के लिए बहुत पीड़ित होगा। लेकिन वह पीड़ा उसकी नहीं है, अपने लिए तो बात समाप्त हो गई है, अब पीड़ा दूसरे के लिए है। और दूसरे की पीड़ा को मिटाने की वह चेष्टा करेगा।
यह बात सच है कि व्यक्ति ही क्रांति लाएंगे। लेकिन अशांत व्यक्ति जो क्रांति लाते हैं, वह उनकी अशांति से जन्मती है, वह उनकी करुणा से नहीं जन्मती है। और अशांति से जन्मी हुई क्रांति आग तो लगा देती है, जला तो देती है, मिटा तो देती है, बना नहीं पाती। तो क्रांतियां बहुत हुई हैं दुनिया में। और ऐसा हुआ अब तक दुर्भाग्य कि शांत आदमी क्रांति नहीं करता और क्रांति करने वाला आदमी शांत नहीं होता, ऐसा हुआ आज तक। और इसलिए शांति भी हुई है और क्रांति भी हुई है, लेकिन क्रांति से हित नहीं हुआ और शांत आदमी समाज के जीवन और जगत के जीवन में एक कोने में सिमट कर समाप्त हो गया। इनका किसी तरफ जोड़ होना चाहिए।
मैं सब तरह के विरोधों को जोड़ने के लिए चेष्टा करता हूं। सब तरह के विरोध जुड़ जाने चाहिए। विज्ञान और धर्म जुड़ जाने चाहिए। भौतिकवाद और अध्यात्म जुड़ जाने चाहिए। शांति और क्रांति जुड़ जानी चाहिए। ये सब जुड़ जाने चाहिए। और तभी हम अच्छा समाज निर्माण कर सकेंगे, नहीं तो नहीं कर सकेंगे।
वह तो धीरे-धीरे जब मेरी पूरी बात, मैं सारे समाज को बदलने की पूरी दृष्टि मेरी साफ कर सकूंगा; और व्यक्ति की भी शांति का मेरा क्या खयाल है, वह साफ होगा, तो कठिनाई नहीं होगी देखने में कि ये दोनों एक ही व्यक्ति की संभावनाएं हैं। अब तक ऐसा हुआ नहीं है। और इसलिए शांत व्यक्ति एक तरह का पलायनवादी हो जाता है, भागा हुआ हो जाता है। और क्रांतिकारी जो है, वह इतना क्रुद्ध रहता है कि क्रोध तो उसमें बहुत है, लेकिन अकेले क्रोध से कुछ होता है? सृजनात्मक नहीं हो पाता अकेला क्रोध।
मेरा कहना है कि शांत आदमी को भी क्रुद्ध होना पड़ेगा।
यह उलटा दिखता है--कि शांत आदमी और क्रुद्ध होगा! लेकिन जब तक शांत आदमी क्रुद्ध नहीं होगा, तब तक समाज बदलेगा नहीं। क्योंकि समाज का यह सब चल रहा है, इतनी कुरूपता चल रही है और शांत आदमी बैठा हुआ देखता रहता है, इसलिए सब चल रहा है। उसे क्रुद्ध होना पड़ेगा।
तो मैं जो कहता हूं, व्यक्ति शांत होना चाहिए और समाज में एक क्रांति आनी चाहिए। मेरा मानना है कि शांत व्यक्ति ही क्रांति ला सकता है, क्योंकि अशांत व्यक्ति बेचारा कहां से क्रांति लाएगा! क्रांति लाने के लिए जो शांत चित्तता चाहिए, वही उसके पास नहीं है।
लेकिन शांत व्यक्ति अब तक--यह रहा है अब तक--कि अब तक जो शांत व्यक्ति रहे हैं, उन्होंने कोई क्रांति नहीं लाई है। और उसका कारण यह था कि उनकी शांति भी मुर्दा थी, वह शांति जिंदा नहीं थी। तो एक आदमी ऐसे भी शांत हो सकता है कि बिलकुल मुर्दा हो जाए, निष्क्रिय हो जाए, तो भी शांत हो जाता है। निष्क्रिय नहीं चाहता हूं आदमी को; मेरा कहना है कि शांति सक्रिय होनी चाहिए, नहीं तो शांति बेमानी है। और शांति जीवित होनी चाहिए। और शांत व्यक्ति दूसरे के लिए बहुत पीड़ित होगा। लेकिन वह पीड़ा उसकी नहीं है, अपने लिए तो बात समाप्त हो गई है, अब पीड़ा दूसरे के लिए है। और दूसरे की पीड़ा को मिटाने की वह चेष्टा करेगा।
यह बात सच है कि व्यक्ति ही क्रांति लाएंगे। लेकिन अशांत व्यक्ति जो क्रांति लाते हैं, वह उनकी अशांति से जन्मती है, वह उनकी करुणा से नहीं जन्मती है। और अशांति से जन्मी हुई क्रांति आग तो लगा देती है, जला तो देती है, मिटा तो देती है, बना नहीं पाती। तो क्रांतियां बहुत हुई हैं दुनिया में। और ऐसा हुआ अब तक दुर्भाग्य कि शांत आदमी क्रांति नहीं करता और क्रांति करने वाला आदमी शांत नहीं होता, ऐसा हुआ आज तक। और इसलिए शांति भी हुई है और क्रांति भी हुई है, लेकिन क्रांति से हित नहीं हुआ और शांत आदमी समाज के जीवन और जगत के जीवन में एक कोने में सिमट कर समाप्त हो गया। इनका किसी तरफ जोड़ होना चाहिए।
मैं सब तरह के विरोधों को जोड़ने के लिए चेष्टा करता हूं। सब तरह के विरोध जुड़ जाने चाहिए। विज्ञान और धर्म जुड़ जाने चाहिए। भौतिकवाद और अध्यात्म जुड़ जाने चाहिए। शांति और क्रांति जुड़ जानी चाहिए। ये सब जुड़ जाने चाहिए। और तभी हम अच्छा समाज निर्माण कर सकेंगे, नहीं तो नहीं कर सकेंगे।
वह तो धीरे-धीरे जब मेरी पूरी बात, मैं सारे समाज को बदलने की पूरी दृष्टि मेरी साफ कर सकूंगा; और व्यक्ति की भी शांति का मेरा क्या खयाल है, वह साफ होगा, तो कठिनाई नहीं होगी देखने में कि ये दोनों एक ही व्यक्ति की संभावनाएं हैं। अब तक ऐसा हुआ नहीं है। और इसलिए शांत व्यक्ति एक तरह का पलायनवादी हो जाता है, भागा हुआ हो जाता है। और क्रांतिकारी जो है, वह इतना क्रुद्ध रहता है कि क्रोध तो उसमें बहुत है, लेकिन अकेले क्रोध से कुछ होता है? सृजनात्मक नहीं हो पाता अकेला क्रोध।
मेरा कहना है कि शांत आदमी को भी क्रुद्ध होना पड़ेगा।
यह उलटा दिखता है--कि शांत आदमी और क्रुद्ध होगा! लेकिन जब तक शांत आदमी क्रुद्ध नहीं होगा, तब तक समाज बदलेगा नहीं। क्योंकि समाज का यह सब चल रहा है, इतनी कुरूपता चल रही है और शांत आदमी बैठा हुआ देखता रहता है, इसलिए सब चल रहा है। उसे क्रुद्ध होना पड़ेगा।
ओशो, उन लोगों का कहना क्या है कि वह जो विस्फोट न हो, उसके लिए सूक्ष्म दृष्टि से भीतर जो लोग खोज करते हैं...
मेरा कहना यह है कि जितना दमन किया है, उतनी ही स्थूल दृष्टि हो जाएगी, एक। दमन जो है, दृष्टि की सूक्ष्मता को कम करेगा। दूसरा, भीतर जाने की हिम्मत कम हो जाएगी। और भीतर जाने की हिम्मत तभी बढ़ेगी, जब कि आप दमन को मुक्त छोड़ दें फिर से। और वह इतना घबड़ाने वाला होगा, क्योंकि इतना ज्यादा आपने अगर इकट्ठा कर लिया है दमन कि वह आपको पागल करने वाला होगा।
ये तथाकथित ब्रह्मचारी और साधु और संन्यासी, अगर इनको दस-पंद्रह साल की साधना के बाद इनको कहा जाए कि चित्त को तुम मुक्त छोड़ दो, तो सिवाय पागल होने के ये कुछ भी नहीं हो सकते! इसी वक्त पागल हो जाएंगे--इसी वक्त! क्योंकि इनके पास तो भारी उबलता हुआ लावा इकट्ठा है। वह तो किसी तरह से सम्हाले बैठे हुए हैं!
तो इनका, न तो ये सूक्ष्म हो सकते हैं, न यह अंतर्दृष्टि इनकी भीतर प्रवेश कर सकती है। क्योंकि प्रवेश कहां करोगे? अंतर्दृष्टि पैदा कैसे करोगे? अंतर्दृष्टि पैदा करने का मतलब यह है कि जीवन में एक सरलता हो, दमन न हो। और जीवन के बीच खंड-खंड टुकड़े न हों, कि एक खंड टुकड़ा दूसरे खंड टुकड़े की छाती पर चढ़ जाए। वह जिस टुकड़े के ऊपर चढ़ गया है, वह टुकड़ा उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहा है। और जो चढ़ गया है, अब उसने एक प्रतिष्ठा बना ली है, अब वह हट नहीं सकता वहां से। हटे तो उसे लगेगा, सब अस्तव्यस्त हो गया।
मनुष्य के भीतर इतने खंड जो हैं व्यक्तित्व के, अगर इनमें एक इनर-कांफ्लिक्ट है, तो न तो आप सूक्ष्म हो सकते हैं और न भीतर आप प्रवेश कर सकते हैं। आप सदा के लिए भयभीत हो जाएंगे, जितना ही आप दमन करेंगे। मेरा कहना है कि वह तो जितना जीवन को सरलता की स्वीकृति जिसकी है--जैसा जीवन है, जो भीतर है, उसके लिए सरल चित्त से स्वीकार है। जैसे हमारी आंख है, हाथ है, वैसा सेक्स है, वैसा क्रोध है। और हम नहीं जानते कि क्यों है! इसलिए हम झगड़े में पड़ते नहीं। हम सिर्फ जानना चाहते हैं कि क्या है। हम यह मान कर चलते भी नहीं कि जानने से सेक्स विलीन हो जाता है। क्योंकि विलीन हो जाने की जो कामना है, वह मूलतः दमन का ही सूक्ष्म रूप है। हमें यह पता नहीं कि वह विलीन होगा कि और बढ़ जाएगा। और हमारा कोई पक्ष भी नहीं है कि वह विलीन हो, कि बढ़े, कि न बढ़े, कि घटे; हमें कोई प्रयोजन नहीं है।
हम इतना ही करना चाहते हैं कि जो भी हमारे भीतर है, वह सचेत और जागरूक हो जाए। अगर क्रोध भी हमारे भीतर हो, तो क्रोध सचेत और जागरूक हो जाए। और उसकी पूरी शक्ति और महत्ता से मैं परिचित हो जाऊं। और उसकी पूरी जो इनर वर्किंग है, उसको मैं जान लूं। सिर्फ इसे हमें जानने जाना है।
ऐसा व्यक्ति ऐसे सरल भाव से...इसको मैं सरल भाव कहूंगा। दमन करने वाला तो सरल कभी होता ही नहीं। उससे ज्यादा जटिल आदमी नहीं। वह चाहे कितना ही सरल दिखाई पड़े, वह लंगोटी लगाए हुए खड़ा है, और आप जाते हैं तो झुक कर वह नमस्कार करता है, लेकिन वह सरल कभी नहीं हो सकता। वह जटिलता उसके भीतर खड़ी हुई है। तो जितना चित्त जटिल होगा, उतना भीतर प्रवेश नहीं होता है।
एक्सट्रीम में क्या होता है?
एक्सट्रीम में जो होने वाला है, अगर दमन कोई करता ही चला जाए...
एक्सट्रीम पर रिवर्स होता है न! जैसे टाल्सटाय का, ही एनज्वायड कंप्लीटली एंड देन ही वेंट बैक। इट वाज़ ए रिएक्शन!
नहीं, कहीं वेंट बैक हुआ नहीं टाल्सटाय का बेचारे का!
उसका रिएक्शन ही हुआ न कंप्लीटली भोग में उतरने का...
वह कुछ मामला नहीं है, बस वह सब मेंटल मामला है, इससे ज्यादा नहीं है गहरा कुछ टाल्सटाय का। वह हम बात करेंगे!
यह जो अगर कोई दमन करता ही चला जाए और दमन सफल हो जाए--सफल होना बहुत मुश्किल मामला है--तो स्प्लिट पर्सनैलिटी हो जाएगी। दो हिस्सों में टूट जाएगा, अगर सफल हो जाए। सफल होना बहुत मुश्किल मामला है। दमन सफल होता नहीं, क्योंकि प्रकृति के बिलकुल ही प्रतिकूल है आपका कार्य जो है। शीर्षासन करने जैसा है। दस-पांच मिनट आप खड़े हो जाते हैं, फिर चौबीस घंटे पैर पर ही खड़े रहते हैं।
मगर यदि कोई आदमी चौबीस घंटे सिर पर खड़े रहने के लिए तैयार हो जाए, तो दमन की अगर पूरी सफलता मिल जाए, तो व्यक्तित्व दो हिस्सों में टूट जाएगा और उन दो हिस्सों को एक-दूसरे का कोई पता नहीं रह जाएगा। अगर पूर्ण सफल हो दमन में। दो आदमी हो जाएंगे इसके भीतर, यह एक आदमी रह ही नहीं जाएगा। और इसके बीच के जो सेतु हैं, वे सब टूट जाएंगे। इसका आखिरी परिणाम पागलपन हो सकता है। विस्फोट होगा और इतना होगा कि सारा का सारा एक्सप्लोजन हो जाए, यह आदमी बिलकुल ही पागल हो जाए।
दमन पागल करता है और दमन करने वाली सभ्यता पागल करती है। और करीब-करीब हर आदमी को हमने उस हालत में पहुंचा दिया है इन पांच हजार वर्षों के सभ्यता के इतिहास में कि वह विस्फोट हो जाए। अगर वह नहीं हो रहा है, तो उसका कारण यह है कि दमन सफल नहीं हो पाया है। यानी निकास के रास्ते निकल आते हैं। यानी वह ब्रह्मचर्य वगैरह थोपता है, लेकिन गैर-ब्रह्मचर्य का कोई न कोई रास्ता खोज लेता है। और इसलिए ब्रह्मचर्य भी चलता है। इसीलिए ब्रह्मचर्य चलता है, नहीं तो वह इसी वक्त खतम हो जाए। अंततः विस्फोट ही हो सकता है पूरे व्यक्तित्व का और पागलपन, विक्षिप्तता के सिवाय कहीं कोई ले जा नहीं सकता।
इसलिए मेरा कहना यह है कि इस विक्षिप्तता के बाद कुछ काम हो सकता है, क्योंकि वह फिर उस हालत में आ जाएगा जहां चीजें सरल हो गईं। लेकिन यह बहुत उपद्रव का मामला है, इससे कोई मतलब नहीं है। यह ऐसे उपद्रव का मामला है कि हो सकता है उस विक्षिप्तता में वह टूट ही जाए, व्यक्तित्व ही टूट जाए, शरीर ही टूट जाए। यह जिंदगी तो कम से कम खराब हो जाए।
अभी वे अमेरिका में एक छोटा सा प्रयोग करते हैं। अभी वे कहते हैं कि जो पागलपन है, जैसा कल तक हम सोचते थे कि गरीबी व्यक्ति का जिम्मा है, ऐसा आज उसमें एक वर्ग है मनोवैज्ञानिकों का, जो कहता है, पागलपन भी व्यक्ति का जिम्मा नहीं है। पागलपन भी उसके आस-पास के सारे अंतर्संबंधों का दबाव है। और इसलिए पागल का सीधा अकेला इलाज करना बिलकुल व्यर्थ है। वह हो नहीं सकता। क्योंकि वह उसका मामला ही नहीं है। तो वे कहते हैं कि उसका इलाज करने के लिए तो पूरी एक कम्युनिटी होनी चाहिए। और कम्युनिटी कुछ डेवलप करते हैं, दो-चार प्रयोग कर रहे हैं कि वह पूरी कम्युनिटी जो है, वह उस व्यक्ति के पूरे अंतर्संबंध बदल दे।
जैसे कि कल उसने सड़क पर किसी स्त्री को जाते देखा था और उसका मन हुआ था कि वह उसको गले लगा ले। गले लगाता है, तो पिटता है, तो जाता है जेलखाने! नहीं गले लगाता है, तो वह गले लगाने वाला चित्त उसका चक्कर मारता है और वह उसे पागल बनाता है। तो अब एक कम्युनिटी होनी चाहिए, जहां जो दस-पांच स्त्रियां रह रही हैं, उनको यह समझाया गया है कि अगर कोई गले लगा ले तो यह कोई बहुत उपद्रव और तूल बनाने की जरूरत नहीं है। उससे गले लग कर, नमस्कार करके, रास्ते पर चले जाना है। ताकि वह जो गले लगाने वाला पागल है, वह अगर किसी को गले लगा ले, और कुछ उपद्रव न हो कहीं भी, और ये चीजें ऐसी ही हो जाएं जैसे हवा का झोंका आया और गया, तो उसका पागलपन मिट सकता है। नहीं तो नहीं मिट सकता है।
और उसके बड़े अच्छे परिणाम हुए हैं। आज जिसको हम पागल कहते थे, वह आदमी पागल था ही नहीं। वह सिर्फ कम्युनिटी के प्रेशर ऐसे थे कि उसको सप्रेसिव बनाया उसने। और वह सप्रेसिव होने से बेचारा पागल हो गया था। अगर ये विलेज कम्युनिटीज इस तरह की सफल होती हैं, तो आज नहीं कल आपको बड़े पैमाने पर सोचना पड़ेगा कि बजाय अलग कम्युनिटी बनाने के आप एक ऐसी सोसाइटी क्यों न बनाएं जो इस तरह की बेवकूफियों से आदमी को बचाती हो। हमारी पूरी सोसाइटी इस तरह की बेवकूफियां सिखाती है, बचाती नहीं है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
रेशनली देखता है, अगर रेशनली देखता है, और हम कहते हैं कि अपने से बाहर जाता है, अलग खड़ा होता है, तो इसमें स्प्लिट पर्सनैलिटी शुरू होगी और टेंशन शुरू होगा, और वह भी पागल कर सकती है।
इसलिए मेरा कहना है कि यह जो देखने का मामला है, इट शुड नॉट बिकम एन एफर्ट। और अपने से बाहर जाने का कोई सवाल नहीं है। यह तो बहुत एफर्टलेस, जो हो रहा है, उसकी जस्ट अवेयरनेस है। यह ऑब्जर्वेशन नहीं है ऐसा कि जैसे मैं आपको देख रहा हूं, ऐसा ही मैं अपने को देखूं, तब तो पागलपन पैदा करने वाला है। वह तो बिलकुल ही पागलपन लाने वाला है। इसलिए हमारे साधु-संन्यासी जो इस तरह का ऑब्जर्वेशन करने की कोशिश करते हैं, वे पागल होंगे। वह तो फिर उन्होंने दो हिस्सों में तोड़ लिया अपने को। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस काम के लिए दो हिस्सों में तोड़ते हैं। किसी काम के लिए दो हिस्सों में तोड़ें--चाहे सप्रेशन के लिए, चाहे ऑब्जर्वेशन के लिए--आपने एक गल्फ पैदा कर ली। और गल्फ के जो परिणाम होने वाले हैं, वे होंगे। वे आपको दो हिस्सों में तोड़ देंगे।
इसलिए मैं कहता हूं कि यह जो सेल्फ-ऑब्जर्वेशन, जिसकी मैं बात करता हूं, वह वैसा सेल्फ-ऑब्जर्वेशन नहीं है कि आप अपने से बाहर खड़े होकर और अकड़ कर खड़े हो गए हैं और अपने ही चित्त की वृत्तियों को दूर से देखने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी कोई दूरी नहीं है, आप ही चित्त हो और आप खड़े हो नहीं सकते। यह खड़ा होना बिलकुल ही अस्वाभाविक, झूठा और काल्पनिक है। और यह जो इमेजिनरी आप आउटसाइड गए हो, यह गए-वए नहीं हो कहीं, यह सिर्फ खयाल में चले गए हो।
दिस लीड्स टु मॉरल हिपोक्रेसी।
बिलकुल ही ले जाएगा, बिलकुल ही। ले ही जा रहा है। सारे तरफ से पाखंड पैदा करेगा। और पाखंड पैदा कर दे, इससे कोई हर्जा नहीं है। आपको खंड-खंड करेगा। यानी पाखंड तो ठीक है। पाखंड तो यह भी हो सकता है कि सिर्फ, सोसाइटी चूंकि बहुत कनिंग है, गलत है, इसलिए आपको पाखंडी होकर रास्ता निकालना पड़ता है। उस हालत में पाखंड शायद आपके लिए नुकसान भी नहीं पहुंचा रहा है। या आप पागल हो जाओगे, अगर आप पाखंडी नहीं होते। सोसाइटी ने विकल्प ऐसे छोड़े हुए हैं कि या तो आप पाखंडी हो जाओ और या फिर जीना मुश्किल है, पागल हो जाओ। तो समझदार आदमी पाखंडी हो जाएगा। वहां कोई रास्ता नहीं है उसको निकालने का और।
आप खंड-खंड हो जाओगे! जो कि भारी खतरा है। और खंड-खंड होना शुरू हो गया, जैसे ही आपने अपने साथ कुछ करना शुरू किया, यानी ऑब्जर्वेशन या कुछ भी, आपने कुछ करना शुरू किया अपने साथ कि आपने दो टुकड़े मान लिए--एक मैं करने वाला और एक होने वाला।
मैं जो कह रहा हूं वह यह कह रहा हूं कि आप इकट्ठे एक ही हैं। जब क्रोध है, तो आप क्रोध ही हैं। ऐसा नहीं है कि आप आउटसाइड क्रोध के खड़े हो गए हैं और देख लेंगे। आप क्रोध ही हैं। इस क्रोध को जो समझना है, वह समझना भी कोई आप अलग हैं, ऐसा नहीं है। अपने ही क्रोध को उसके साथ एक रह कर उसे जानना, समझना है। न कोई लड़ाई लेनी है उससे, न जानने-समझने में कोई स्ट्रेन पैदा करना है। लेकिन जैसे मैं अपने हाथ को समझता हूं, जैसे मेरे पैर में तकलीफ है तो मैं पैर को समझता हूं, जैसे मेरे सिर में दर्द है तो मैं सिर को समझता हूं; ऐसे ही जो भी मेरे भीतर है, मैं उसे समझने की कोशिश करता हूं। यह जो कोशिश है, दो हिस्सों में तोड़ने वाली नहीं है। और न मेरी आकांक्षा है कि इसको मैं बदल दूं, न मेरी आकांक्षा है कि यह कुछ और हो जाए, न यह कोई कामना है कि यह बदल जाए। कामना कुल इतनी है कि जो भी मैं हूं...इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अच्छा है या बुरा, यह बेमानी है। अच्छा और बुरा दूसरों का वैल्युएशन है। मैं तो जो भी हूं, वही हूं। वह जो फैक्ट है मेरा, उसे मैं जान लूं और उसे जीने की पूरी कोशिश करूं।
इस कोशिश से, आउट ऑफ दिस, कुछ होना शुरू होता है, वह स्प्लिट में नहीं ले जाता आपको। बल्कि वह आपको मोर इंटीग्रेटेड और धीरे-धीरे-धीरे-धीरे वहां ले जाता है, जहां आपके भीतर विरोधी स्वर होता ही नहीं। आप जो होते हैं, टोटल होते हैं। क्रोध में भी, प्रेम में भी, सेक्स में भी; जो भी आप होते हैं, टोटल होते हैं। जो बच रहता है, वह आपको टोटेलिटी दे जाता है। और मेरा मानना है, ऐसे व्यक्ति का सेक्स भी और है, ऐसे व्यक्ति के क्रोध का आनंद भी और है। ऐसे व्यक्ति का, जो भी उसके जीवन में है, वह समग्र हो गया है, इकट्ठा हो गया है। और ऐसी स्थिति को तो मैं कहता हूं कि विमुक्ति की स्थिति बन सकती है। लेकिन वे तो स्थितियां सब विक्षिप्त बनने की स्थितियां हैं।
यह जो इस भांति सहज, सरल और जैसे हम हैं उसके स्वीकार से चलने वाला जो जानना है, यह तो आपको सूक्ष्मतम दृष्टि दे सकता है। लेकिन असहज, कठिनाई से, दबाने वाला, तोड़ने वाला उसको खंड-खंड में, कोई आपको सूक्ष्म दृष्टि नहीं दे सकता है।
इसलिए कई दफे इतनी हैरानी होती है कि जिनको आप बड़ी सूक्ष्म दृष्टि के लोग कहते हैं, वे अत्यंत स्थूल दृष्टि के लोग होते हैं, जिनमें सूक्ष्म जैसी कोई चीज ही नहीं होती, हो ही नहीं सकती। हमारे बड़े-बड़े महात्मा, जिनका हम भारी शोरगुल मचाए रखते हैं, अत्यंत स्थूल दृष्टि के लोग होते हैं। वे बातें भी जो करते हैं बड़ी-बड़ी, वे बातें भी अत्यंत स्थूल होती हैं, उनमें कुछ मामला नहीं होता। यानी उसमें कोई गहरा जानना नहीं है। क्योंकि जानने से तो वे बच ही गए हैं। और बच गए हैं...जानना तभी हो सकता है, जब मेरा कोई आग्रह न हो। इस कमरे में मैं आऊं और जो भी है उसे जानने की मेरी तैयारी हो, मेरा कोई आग्रह ही न हो। मैं आऊं और जान लूं जो भी है। न मेरा यह खयाल हो कि यह कुर्सी यहां से वहां होनी चाहिए, न मेरा यह खयाल हो कि दीवाल का रंग यह नहीं होना चाहिए, वह होना चाहिए। ये सब आग्रह लेकर मैं इस कमरे में आया, तो इस कमरे में और मेरे भीतर जो कांफ्लिक्ट होने वाली है, वह स्थूल करेगी, वह सूक्ष्म नहीं करती है।
और दो नहीं हैं वहां कोई। यह जो भ्रांति हजारों साल में हमको पैदा की गई है कि क्रोध कुछ अलग है, घृणा कुछ अलग है, सेक्स कुछ अलग है और हम कुछ अलग ही हैं। यह बड़ी खतरनाक है! लेकिन वह खड़ी है। ये सब अद्वैत की बातें करने वाले लोग हैं, लेकिन बुनियादी रूप से द्वैत पर खड़े हुए हैं--यह शरीर तुम नहीं हो, तुम शरीर से अलग हो।
नहीं, क्रोध भी मैं हूं। जो कुछ भी है, मैं हूं। और इसलिए लड़ाई किससे लेनी है? और लड़ाई लेगा कौन? यह कोई सवाल नहीं है। इतना ही हो सकता है कि मैं जो हूं, उसे मैं पूरा नहीं जानता हूं, बहुत सा हिस्सा अंधेरे में, छाया में दबा पड़ा है, वह भी मैं हूं, उसे मुझे जानना चाहिए। उसे मैं पूरा जानूं, तो शायद जीना ज्यादा सुंदर, ज्यादा सरल, सहज और आनंदपूर्ण हो जाए। तो सिर्फ उसे पूरा जान लूं। जानने में ही जो विलीन हो जाएगा, वह बात अलग। जानने में जो बच जाएगा, वह पूरा हो जाएगा, बात अलग।
लेकिन पुरानी सारी साधना आज तक की, सारी दुनिया की, द्वंद्व को लेकर चलती है, वहीं से वह शुरू होती है। वह लड़ाई को मान कर चलती है। और लड़ाई को मान कर चली हुई कोई भी साधना अंततः और गहरी लड़ाई में ही ले जाएगी, और कहीं पहुंचा नहीं सकती। और जितना कष्ट और जितनी पीड़ा इस द्वंद्व ने पैदा की है जगत में, उतनी किसी और बात ने पैदा नहीं की है। बहुत कष्ट और पीड़ा पैदा की है। इतनी आत्मग्लानि और इतनी आत्महीनता पैदा की है! और वह तरकीब ऐसी है, जैसे हमने कुत्ते को उसकी पूंछ पकड़ने की धुन पकड़ा दी हो--कि जब तक तू अपनी पूंछ नहीं पकड़ लेगा, तेरा जीवन व्यर्थ है। अब वह कुत्ता अपनी पूंछ पकड़ने के लिए उछलकूद मचा रहा है। झपटता है, तो लगता है कि आई पकड़ में। लेकिन वह जितना झपटता है, उतनी पूंछ पीछे फिर फिंक जाती है। अब वह पागल होने के रास्ते पर पड़ा है, कुत्ता पागल होगा। या तो पागल होगा, या पाखंडी हो जाएगा। पूंछ रखे रहेगा, कहेगा: हां, मैंने पकड़ ली। मैंने पकड़ ली! मैंने पूंछ पकड़ ली! और वह जानता है कि पूंछ तो पकड़ी नहीं है। अब वह धोखा देगा। और या फिर यह होगा कि वह पागल हो जाएगा, तब यह झंझट छूटेगी।
पागल होना भी हमारे व्यक्तित्व की आखिरी कोशिश है हमें उससे मुक्त करने की जो हमने जबरदस्ती थोप लिया है। इट इज़ लास्ट सॉल्युशन। यानी जब कुछ नहीं कर पाता है हमारा चित्त, तो फिर यही है रास्ता कि ठीक है भई, इस आदमी को पागल कर दो, ताकि यह झंझट से छूट जाए। वह आखिरी कोशिश है।
तो पागलपन, यह बड़ी कृपा है ऐसे प्रकृति की। अगर वह भी न हो, तब हम कहां पहुंचेंगे, कहना मुश्किल है। हम कहां पहुंच जाएं, बहुत मुश्किल है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
अगर हमने एफर्ट बनाया है जाग्रत रहना, तब तो वह बार-बार खो सकता है। क्योंकि कोई भी एफर्ट जो है, वह सतत नहीं हो सकता है। एफर्ट कोई भी सतत नहीं हो सकता है। श्रम कोई भी सतत नहीं हो सकता है, विश्राम करना पड़ेगा। यानी अगर मैं मिट्टी खोदता हूं आठ घंटे, तो आठ घंटे खोद लूंगा, फिर मुझे दस घंटे सोना पड़ेगा। तब मैं फिर इस योग्य होऊंगा कि मिट्टी खोदूं। मिट्टी खोदना चौबीस घंटे नहीं चल सकता। कोई भी श्रम चौबीस घंटे नहीं चल सकता। क्योंकि जैसे ही वह श्रम बना, उससे विश्राम की जरूरत पड़ जाएगी।
इसलिए जो भी संत संतत्व को श्रम बना लेते हैं, उनको फिर छुट्टी लेनी पड़ेगी संतत्व से। और वह छुट्टी लेनी हमको पाखंड मालूम पड़ेगा--कि वह आदमी सबके सामने तो कहता था सिगरेट पीना बुरा है; और दरवाजा बंद करके सिगरेट पी रहा था! तो वह हमको पाखंडी लगता है। वह बेचारा सिर्फ छुट्टी ले रहा है। सिगरेट न पीना एक श्रम था उसको। अब वह श्रम शिथिल होगा। एक जगह जाकर आएगा कि वह कहेगा कि अब विश्राम करो। तो उसको सिगरेट पीनी पड़ेगी।
हां, जो मैंने यह कहा कि जो सहज-सहज जागते चले जाना है। यह जागरण जैसे ही आ जाता है, इसके लौटने का कोई सवाल ही नहीं है। क्योंकि इसको आप लाए नहीं हैं, यह आया है। और धीरे-धीरे-धीरे-धीरे जागरण और आप दो चीजें नहीं रह गए हैं, आप ही जागरण हो गए हैं। आपने क्रोध तक को दूसरा नहीं माना, तो जागरण को दूसरा मानने का क्या सवाल है! वह धीरे-धीरे आप ही हो गए हैं, आप ही हैं। उसके लौटने का कोई प्रश्न नहीं है, उसके लौटने का कोई सवाल नहीं है।
जो भी हमने जान लिया है--जान लिया है--उससे पीछे लौटने का सवाल नहीं है। उसको फिर अनजाना नहीं किया जा सकता। उसे अनजाना करना मुश्किल है। हां, जो हमने न जाना हो, ऐसे ही सीख लिया हो जबरदस्ती, वह कल फिर डांवाडोल हो सकता है। लेकिन जो मैंने जान लिया है--जैसे एक बच्चे ने प्रेम जान लिया, नहीं जाना था अब तक, अब उसने प्रेम जान लिया। अब वह प्रेम को अनजाना नहीं कर सकता। उसका अनजाना होना अब असंभव है। जानना जो है, चूंकि वह हमारा हिस्सा ही हो जाता है, वह हमसे कहीं अब छूट सकता नहीं। हां, जानना ऐसा हो सकता है कि उसने प्रेम की चार किताबें पढ़ ली हों और प्रेम के संबंध में कुछ जानना सीख लिया हो, वह अनजाना कल हो सकता है।
जागरण के प्रयोग से धीरे-धीरे-धीरे-धीरे जो भी हममें होता है, तो जागरण कोई ऐसी क्वाालिटी नहीं है जो बाहर से आकर आपसे जुड़ जाती है, बल्कि आपका ही इनर बीइंग है जो धीरे-धीरे प्रकट हो जाता है। यह कोई ऐसी चीज होती कि आपके खीसे में रख दी गई, तो गिर सकती थी, खो सकती थी, जा सकती थी। यह आप ही थे जो रि-डिस्कवर हो गए। यह आप ही थे जो आपने उघाड़ लिया अपने को। अब, अब कोई सवाल नहीं रहा।
मगर बाह्य परिस्थिति कुछ उलटी-सुलटी हो, तो उसमें फिर उसके रिएक्शंस में कुछ फर्क नहीं पड़ता?
वह उलटी-सुलटी हो तो रिएक्शंस में फर्क पड़ेगा, अगर यह जागरण आपने साधा हो। तो साधने के लिए अनुकूल, प्रतिकूल परिस्थितियां फर्क ला देंगी। क्योंकि वह जो साधा था, तो साधने के लिए अनुकूल परिस्थिति चाहिए थी।
एक आदमी मौन हो गया जंगल में बैठ कर। तो जंगल की स्थिति में मौन रह सकता है वह, बाजार में लाओ तो झंझट में पड़ जाएगा। क्योंकि वह मौन जो है एक कंडीशनिंग है। वह जंगल की एक खास परिस्थिति में उसने मौन को संस्कारित कर लिया है। अब उसको आप बाजार में ले आओ, तो मुश्किल पड़ गई। लेकिन एक आदमी है जो बाजार में, जंगल में, सब में घूमते-डोलते हुए मौन हो गया है। बाजार में भी आया है, जंगल में भी गया है; गांव में भी है, शहर में भी है; लड़ भी रहा है, झगड़ भी रहा है; और मौन हो गया है। वह सारी परिस्थिति में, उसने कोई विशेष परिस्थिति की मांग नहीं की है साधने के लिए। तो कोई विशेष परिस्थिति उसकी साधना को तोड़ नहीं सकती।
यानी हमने जो साधते वक्त मांगा हो, तो फिर झंझट होगी। हमने अगर कहा हो कि भई मैं तो पत्नी से दूर रह कर ही ब्रह्मचर्य को उपलब्ध हो सकता हूं। तो फिर यह ब्रह्मचर्य मुश्किल में पड़ जाएगा, कल अगर पत्नी पास आ गई। तो फिर दिक्कत की बात है। क्योंकि उसकी तो कंडीशनिंग थी, वह शिथिल होते ही से बहुत मुश्किल में पड़ जाएगा।
स्वामी राम अमेरिका से लौटे, तो उनकी पत्नी उनसे मिलने गई। ऐसा आते देखा पत्नी को, सरदार पूर्ण सिंह उनके पास रहते थे, उनसे कहा, दरवाजा लगा दो!
तो सरदार पूर्ण सिंह ने कहा, हैरानी की बात है! आपको मैंने हजारों स्त्रियों से मिलते देखा, आप कभी भयभीत नहीं हुए। इस गरीब औरत ने क्या बिगाड़ा है? क्या यह अभी भी आपकी पत्नी है? और आप तो कहते हैं कि छोड़-छाड़ कर चले गए! बात खतम हो गई। अब यह एक सामान्य स्त्री है, जैसी और स्त्रियां हैं।
पूर्ण सिंह ने कहा, अगर आप अपनी पत्नी से नहीं मिलोगे, तो मैं भी आपको नमस्कार करता हूं। क्योंकि यह मेरी समझ के बाहर है। अभी तक आप कहते हैं, सब में ब्रह्म है। आज अचानक इस स्त्री में ब्रह्म नहीं रहा? दरवाजा बंद करवाते हैं, इसके लिए खास इंतजाम करते हैं! यह कुछ खास है?
और खास है वह। क्योंकि वह जो साधा है, इसको छोड़ कर साधा है। इसके आने से वह डांवाडोल हो सकता है। यानी इस स्त्री को विशेष स्वीकृति मन की है, क्योंकि इसकी तरफ पीठ करके कुछ साधा गया है। मुंह करने से वह डोल सकता है, गिर सकता है, खंडित हो सकता है।
तो अगर आपने कोई अनुकूल परिस्थिति मांगी है साधना में, तो कल प्रतिकूल परिस्थिति होने पर आप मुश्किल में पड़ जाएंगे। इसीलिए मेरा कहना है, कोई विशेष परिस्थिति मत मांगो। जो परिस्थितियां आती हैं, जिनमें जीना ही पड़ता है, उनमें ही जीओ और जानते रहो। इस सबसे तोड़ कर अपने को मत ले जाओ। नहीं तो कल फिर झंझट है, फिर वापस लौटना हो सकता है।
साधु पतित होते हैं, क्योंकि वे साधु ही नहीं होते। और पतित होने का कुल कारण इतना होता है कि एक विशेष घेरा बना कर उसमें किसी तरह खड़े होकर अपने को साध लेते हैं। वह घेरा कल टूटता है। टूटेगा, फिर मुश्किल हो जाएगी, फिर कठिनाई हो जाएगी। फिर थोड़ा सा भी उसमें फर्क, और सब डांवाडोल हो जाएगा। असल में इसीलिए मैं कहता हूं कि वह कोई जानना-वानना नहीं था। एक कवायद थी, जो सीख ली थी। वह काम दे गई कवायद के वक्त, फिर बेकार हो गई।
यह तो मानसिक से ही होगा यह सारा इंटीग्रेटेड, होल ऑफ दि बॉडी।
असल में यह भी हमारा जो खयाल है--मानसिक, शारीरिक, आत्मिक--यह सब बचकाना है। यह सब कामचलाऊ डिवीजन है। ऐसा कोई डिवीजन कहीं है नहीं।
नहीं, मगर समझ लीजिए कि ऐसी परिस्थिति में आ गए, तो मानसिक तो इंटीग्रेटेड हो गए। तो बॉडी का भी जो है, विल नॉट दैट बी आल्सो कंप्लीटली फ्री फ्रॉम डिजीजेज ऑर एनीथिंग लाइक दैट?
जरूरी नहीं है। बहुत दूर तक काम करेगा यह। बहुत दूर तक काम करेगा। अगर माइंड बहुत इंटीग्रेटेड है, तो बॉडी पर माइंड के डिसइंटीग्रेशन से जो-जो नुकसान होते थे, वे नहीं होंगे। लेकिन बॉडी पर और चीजों से जो नुकसान होने वाले हैं, वे होंगे।
कोई गोली चला कर मार देगा आपको, तो आपका इंटीग्रेटेड माइंड कुछ भी नहीं कर लेगा। गोली तो छेदेगी और शरीर कट जाएगा। मतलब अगर हम ठीक से देखें, तो शरीर हमारा बाहर के जगत से प्रतिपल जुड़ा हुआ है।
सच बात तो यह है कि हम अपने शरीर को कहां खतम करें, यह कहना बहुत मुश्किल है। यानी यह जो चमड़ी की सीमा आ जाती है, यह मेरे शरीर की सीमा है, यह कहना बिलकुल नासमझी है। बिलकुल नासमझी है। क्योंकि यह पूरी हवा का जो चारों तरफ फैलाव है, यह मेरे शरीर का हिस्सा है। अगर यह सारी हवा यहां से अलग कर ली जाए, तो मैं एक सेकेंड नहीं जी सकूंगा। वह जो दूर सूरज है दस करोड़ मील दूर पर, वह मेरे शरीर का हिस्सा है। अगर वह वहां ठंडा हो जाए, तो मैं यहां ठंडा हो जाऊंगा। वह सारा उत्ताप तो उससे मुझे आ रहा है।
तो मेरा शरीर क्या है? अगर बहुत गौर से हम देखें, और अगर मैं को हम केंद्र मान लें, तो सारा का सारा यूनिवर्स मेरा शरीर है। कहां हम उसको खतम करें, किस जगह पर जाकर?
इंटर-डिपेंडेंस है।
हां। तो यह जो सारा का सारा इंपैक्ट है, यह तो कोई आपके इंटीग्रेशन, डिसइंटीग्रेशन से इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। यह फर्क पड़ेगा उतना कि शरीर पर करीब-करीब सौ में से पचास मौकों पर बीमारियां भीतर की तरफ से आ रही हैं। ये भीतर की तरफ से आनी वाली बीमारियां तो विलीन हो जाएंगी। माइंड की कांफ्लिक्ट से शरीर पर जो असर पड़ रहा है, वह तो विलीन हो जाएगा। लेकिन बाहर के जगत के संघर्षण से जो असर पड़ रहा है, वह विलीन होने वाला नहीं है।
इसलिए महावीर भी मरेंगे, बुद्ध भी मरेंगे। और अरविंद जैसे लोग पागलपन की बातें सोचेंगे कि हम फिजिकली इम्मार्टल हो गए, और फिर मर जाएंगे! अब इस तरह के लोगों को सिर्फ एक ही फायदा है कि जिंदा-जिंदा तो आप उनसे कोई झगड़ा नहीं कर सकते, क्योंकि वे कहते हैं हम फिजिकली इम्मार्टल हैं। और मर जाते हैं, तब झगड़ा करने को कोई बचता नहीं है। तो कोई भी दावा कर सकता है कि मैं फिजिकली इम्मार्टल हूं। इसमें कोई झंझट ही नहीं है। क्योंकि मैं भी दावा कर दूं कि मैं शरीर से अमर हूं, तो आप कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं। क्योंकि जब तक मैं हूं, तब तक तो दावा मेरा सही है। और जब मैं मर गया, तो आप किससे झगड़िएगा?
तो शरीर जो है, वह तो अगर हम गौर से देखें तो उसमें दो तरह के प्रभाव आ रहे हैं। एक भीतर की तरफ से आने वाले। लेकिन ऐसा मत सोचें कि भीतर की तरफ कोई दूसरी एनटाइटी बैठी है। सिर्फ भीतर की तरफ--जैसे मैंने श्वास ली, एक श्वास वह है जो बाहर से भीतर की तरफ गई, एक श्वास वह है जो भीतर से बाहर की तरफ गई। वे एक ही श्वास के दो प्रवाह हैं, जैसे लहर आई और गई। तो एक तो भीतर से बाहर की तरफ आने वाले प्रभाव हैं, उनको हम मानसिक कह दें। बाहर से भीतर की तरफ आने वाले प्रभाव हैं, उनको हम शारीरिक कह दें।
तो जितने मानसिक प्रभाव हैं द्वंद्व के, जो शरीर को तोड़ते हैं, वे विलीन हो जाएंगे। तो शरीर मानसिक रोगग्रस्त तो नहीं होगा। फिर बाहर से आने वाले प्रभाव हैं, वे जारी रहेंगे। उनसे अगर बचना है, तो विज्ञान से सलाह लेनी पड़ेगी।
तो फिर उसके लिए विज्ञान के हिसाब से प्लानिंग करनी पड़ेगी।
बिलकुल ही, बिलकुल ही करनी पड़ेगी।
इतना लक्ष्य तो रखना ही पड़ेगा।
हां, बिलकुल ही रखना पड़ेगा।
नहीं रखने से आत्महिंसा की स्थिति हो जाएगी।
हो ही रही है। साधु-संन्यासी जितनी हिंसा कर रहे हैं शरीर के साथ, शायद ही कोई कर रहा हो! एकदम, जिसको मैसोचिस्ट कहें, वे हैं पूरे के पूरे। और ये सब बातें भी बड़ी खतरनाक हैं, अगर खयाल में बैठ जाएं। असल मतलब यह है कि हमने चीजों को तोड़-तोड़ कर ऐसे कंपार्टमेंट बना लिए हैं, जो कि वस्तुतः नहीं हैं। बाहर और भीतर कामचलाऊ बातें हैं। यानी एक डिवीजन करने में उपयोगी हैं। लेकिन बाहर यानी क्या है? और भीतर यानी क्या है? एक ही चीज के बाहर-भीतर होते आंदोलन हैं। और चूंकि मैं अपनी तरफ से खड़े होकर देखता हूं, इसलिए जो मुझे भीतर दिखाई पड़ता है वह आपके लिए बाहर है और जो आपके लिए भीतर दिखाई पड़ता है वह मेरे लिए बाहर है। तो वे बिलकुल ही रिलेटिव कंसेप्शंस हैं, एक ही चीज है।
अगर यह बहुत साफ हो जाए, तो विज्ञान और धर्म दो चीजें नहीं रह जाते। अगर बाहर और भीतर एक हो जाता है, तो हम जानते हैं कि बाहर जाता हुआ जो प्रवाह है, उसके संबंध में जानना, समझना, खोजना धर्म है; भीतर की तरफ आता हुआ बाहर से जो प्रवाह है, उसे जानना, समझना, खोजना विज्ञान है। और किसी दिन जब कि यह शरीर और आत्मा का द्वैत, पदार्थ और परमात्मा का द्वैत, दोनों विलीन हो जाएंगे, तो धर्म और विज्ञान जैसी दो चीजें नहीं होंगी, एक ही चीज होगी। एक ही चीज होगी। और जिस दिन यह होगा, उसी दिन हम पूरी तरह से उस जगह खड़े होंगे, जहां चीजें साफ-साफ जानी गईं। नहीं तो नहीं जानेंगे।
धर्म को पाने के बाद भी विज्ञान की दृष्टि अगर कम हो, तो उसके जो परिणाम शरीर पर होने चाहिए, वे तो होंगे।
बराबर होने वाले हैं। उससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं।
तो उसके लिए भी खुद की जागरूकता होनी चाहिए।
होनी ही चाहिए। जरूर होनी चाहिए।
यह मैं खास पर्टिकुलर इसलिए पूछता हूं कि मैंने भी सफरिंग किया है बॉडी को निग्लेक्ट करने के कारण। तो साधना के योग के अंदर शरीर के प्रति कुछ ध्यान देना चाहिए कि नहीं?
बिलकुल पूरा ध्यान देना चाहिए, शरीर की पूरी फिक्र करनी चाहिए। असल में हमारी पूरी की पूरी भाषा रोगग्रस्त हो गई है। चूंकि वह द्वैत इस बुरी तरह से बैठ गया है कि जब मैं, जिसको कि कोई अंतर नहीं है दोनों में, वह भी बात करे, तो भी मुझे कहना पड़ता है: शरीर की फिक्र करनी चाहिए। और उसमें ऐसा भ्रम पैदा होता है कि आप कोई और हैं फिक्र करने वाले और शरीर कोई और है जिसकी फिक्र करनी है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
वही तो मैं कह रहा था इतनी देर से, वही तो मैं इतनी देर से कह रहा था कि अगर मेरे तीन पीढ़ियों में डायबिटीज चला आ रहा है, तो मेरे माइंड को क्या फर्क पड़ता है, इससे बॉडी को कोई मतलब नहीं है। बॉडी की हेरिडिटी तो बहुत और है और उसका अपना कांस्टीट्यूशन है। जैसे मेरे घर में बाल गिर जाते हैं पच्चीस साल के बाद सभी के, तो इससे क्या फर्क पड़ने वाला है, वह बाल मेरे गिरने वाले हैं।
मेरे तीन पीढ़ी से बाल गिरते रहे हैं और मेरे बाल गिर जाएंगे, इसमें वह जरा थोड़ा सा फर्क कर रहे हैं। विज्ञान अभी इस पर काम कर रहा है कि मेरे बच्चों के बाल नहीं भी गिरें!
वह दूसरी बात है, वह विज्ञान करेगा। वह मैं कह नहीं रहा हूं। कल यह भी हो सकता है कि बाल बिलकुल न गिरें। पर वह विज्ञान करेगा। उससे, मेरे माइंड में जो फर्क पड़े हैं, उससे कोई संबंध नहीं है। वह विज्ञान करेगा, वह ठीक है। कल दांत न गिरें, बाल न गिरें, आदमी बूढ़ा न हो, वह सब विज्ञान कर लेगा। लेकिन विज्ञान कुछ करेगा, तब वह होगा। समझे न आप?
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
यह जो मैं बात कर रहा हूं, यह बात ही नहीं है। मैं जो कह रहा हूं, वह यह कह रहा हूं, आप यह पूछ रहे हैं कि अगर भीतर मन शांत हो जाए, इंटीग्रेटेड हो जाए, तो क्या बॉडी परफेक्ट हो जाएगी? मैं आपसे कह रहा हूं कि नहीं हो जाएगी। बॉडी को तो परफेक्ट करने के लिए, विज्ञान जो करेगा, उससे ही कुछ होगा। नहीं तो महावीर न मरें, बुद्ध न मरें, कोई न मरे। और फिर हमें झूठी कहानियां गढ़नी पड़ती हैं।
महावीर को पेचिश हो गई मरते वक्त, छह महीने तक। और बड़ा मुश्किल हो गया सवाल जैनियों के सामने कि महावीर को और दस्त लगते हैं! और इतने दस्त लगे कि उससे ही वे मरे! तो फिर कहानियां गढ़नी पड़ीं कि किसी ने जादू चला दिया है और किसी ने यह कर दिया है और किसी ने वह कर दिया है।
अब ये सब फिजूल की बातें हैं, इससे कोई मतलब नहीं है। महावीर को क्यों पेचिश नहीं हो सकती? पेचिश होना बिलकुल और मामला है। और वह बिलकुल ही और तल की बात है, उससे महावीर का कोई लेना-देना नहीं है।
व्हेन ए पर्सन इज़ इंटीग्रेटेड एंड होल, ही शुड बी परफेक्ट इन आल डायमेंशंस। दैट इज़ अवर एजम्पशन।
बिलकुल गलत बात है। और दूसरा मामला यह है, दूसरा मामला यह है कि परफेक्शन के हमारे बड़े डेड कंसेप्ट हैं। वे भी डायनेमिक नहीं हैं, वे भी बड़े डेड कंसेप्ट हैं। अब सच बात यह है कि जब महावीर पैदा हुए हैं, तो मरेंगे। और मरना इम्परफेक्शन है, यह कौन कहता है? यानी सवाल यह है कि एक आदमी पैदा हुआ, तो परफेक्शन तो यही है कि एक सर्किल पूरा करेगा और मरेगा।
एक वृक्ष पर पत्ते लगते हैं वसंत में, तब आप कहते हैं परफेक्ट। और जब पतझड़ में सब पत्ते गिरते हैं, तब आप क्या कहते हैं--इम्परफेक्ट? यह अब भी परफेक्ट है। और परफेक्ट का मतलब यह है कि जिस तरह पूरे पत्ते खिले थे और लगे थे, उसी तरह पूरे पत्ते गिर जाएं, तो यह भी परफेक्शन है। इसमें इम्परफेक्शन कहां आ गया? अधूरे पत्ते गिर जाएं, कच्चे गिर जाएं, तो इम्परफेक्शन! नहीं तो यह भी परफेक्शन है। पैदा हुआ था वृक्ष, यह भी एक यात्रा थी परफेक्शन की; कल मरेगा, यह भी यात्रा उसी की है।
लेकिन हमारे मोह हैं!
अब जैसे समझ लो कि मेरे शरीर में एक बीमारी हो गई। मेरे शरीर में एक बीमारी हो गई और करोड़ों कीटाणु उस बीमारी में पैदा हुए हैं और वे जी रहे हैं। हमारे लिए बीमारी है। उन करोड़ों कीटाणुओं के लिए नये जीवन का आविर्भाव है। उनका आविर्भाव चल रहा है। हम कहते हैं कि यह बड़ी इम्परफेक्ट बॉडी हो गई।
हो सकता है कि पृथ्वी पर हम सब इसी तरह के कीटाणु हों, जो एक बड़ी बॉडी पर अपना पोषण कर रहे हैं। हमारी बॉडी पर भी करोड़ों कीटाणु जी रहे हैं। यह जो बाहर का सारा जगत है, इसमें परफेक्शन भी हमारी डिजायर का परफेक्शन है। यानी हमारी कामना यह है कि शरीर ऐसा हो कि बीमारी न आए। लेकिन क्यों? हमारी कामना ऐसी है कि शरीर ऐसा हो कि वृद्ध न हो। लेकिन क्यों? हमारी कामना ऐसी है कि शरीर ऐसा हो कि मरे न। लेकिन क्यों? वह जो हमारे भीतर के सब भय और सब दुख और पीड़ाएं हैं, उन सबसे बचने की हमने यह परफेक्शन की कामना की है। लेकिन क्यों?
वह जितना माइंड इंटीग्रेटेड होगा भीतर, तो शरीर परफेक्ट नहीं हो जाएगा, लेकिन शरीर का जो जैसा है, वह सब स्वीकृत हो जाएगा। एक सहज स्वीकृति उसकी भी हो जाएगी। बुढ़ापा है, तो उसकी एक सहज स्वीकृति होगी। मृत्यु है, तो उसकी एक सहज स्वीकृति होगी। और वैसा आदमी उतने ही आनंद से मरेगा, जितने आनंद से जीया था। यह तो समझ में आने वाली बात है। लेकिन मरेगा नहीं, यह निपट नासमझी की बात है। मरेगा तो ऐसे ही आनंद से मरेगा जैसे जी रहा था--उतने ही आनंद से। बीमारी में भी वह उतना ही शांत जीएगा, उसी तरह उठेगा-बैठेगा, जैसा वह स्वास्थ्य में था। यह जो भीतर उसका मन है, इसकी अगर एक स्थिति बन जाए, तो जीवन की हरेक स्थिति के प्रति एक सहजता की भाव-दशा पैदा होती है।
और शरीर पर जो कुछ होने वाला है, अगर उसमें कोई भी फर्क करना है, तो उसके लिए तो विज्ञान कुछ करेगा, उसका धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है। हां, जितनी बीमारियां मन से पैदा होकर आती हैं--और बहुत बीमारियां आती हैं--वे विलीन हो जाएंगी। यानी इस बात की संभावना बहुत कम है कि उस तरह की बीमारियां आनी शुरू हों, जो मन से आती हैं। जैसे एक आदमी भयभीत है, और भयभीत होने की वजह से उसके हाथ कंप रहे हैं। अब यह नहीं होगा उसको, क्योंकि भय कहां होने वाला है उसे। वह जानने से ही...
नहीं तो हमारे मुल्क में बड़ी गलत धारणा पैदा हो गई है योग के बाबत। यह धारणा पैदा हो गई है कि वह कुछ...
शरीर की बीमारी के लिए विज्ञान है। तो धर्म किस बीमारी का इलाज है? और धर्म क्या है?
मेरा तो कहना ही यह है कि जिस दिन भीतर का विज्ञान पूरा साफ-साफ होगा, धर्म विदा हो जाएंगे, उनकी कोई जरूरत नहीं रह जाती। धर्म जो है उसी दिशा में अवैज्ञानिक ढंग से अब तक की गई खोज-बीन का नाम है। कल अगर वैज्ञानिक दृष्टि से उस दिशा में खोज-बीन हो जाती है, धर्म वहां-वहां से विदा होता चला जाएगा। जिसे आज आप विज्ञान कह रहे हैं, कल धर्म वहां भी दावेदार था। कल वह बताता था कि पानी कब गिरेगा, और पृथ्वी चलती है कि नहीं चलती है।
आज भी धर्म की मीनिंग क्लियर नहीं है।
धर्म का हमेशा एक ही मीनिंग है। आज और कल और परसों का सवाल नहीं है। जो मैं अभी कह रहा था कि वह जो हमारा अंतर्जगत है, उस अंतर्जगत के ज्ञान की, उस अंतर्जगत को जानने की, उस अंतर्जगत को उसकी परिपूर्णता में जीने की और होने की पद्धति का नाम धर्म है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
आप मेरी बात नहीं समझे। मेरा कहना यह है कि जितना ज्यादा अज्ञान होगा जगत में, धर्म का क्षेत्र उतना बड़ा होगा। क्योंकि धर्म तब सब चीजों को छुएगा। फिर जैसे-जैसे जिस-जिस क्षेत्र में ज्ञान बहुत सुनिश्चित, व्यवस्थित और वैज्ञानिक होता चला जाएगा, वहां-वहां से धर्म हटता चला आएगा। कुछ क्षेत्रों से बिलकुल हट गया। हट गया, ठीक है, वहां विज्ञान खड़ा हो गया है।
आज नहीं कल, हम भीतर भी खोज-बीन करते चले जाते हैं, और जब भीतर भी चीजें बहुत साफ और स्पष्ट हो जाएंगी, तो धर्म की वहां भी कोई जरूरत नहीं रह जाती। या अगर हम उसको धर्म कहेंगे, तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
असल में मुश्किल क्या होती है कि वेद बड़ी चीज है। वेद में हजार तरह की चीजें हैं। उसमें उस जमाने का सोशल कोड भी है, कानून भी है, उस जमाने की नीति-व्यवस्था भी है, सब कुछ है। असल बात यह है कि वेद उस जमाने की अकेली किताब है। जो भी था, सब उसमें इकट्ठा है। उसमें लोकगीत भी है, लोककथा भी है। उसमें सब इकट्ठा है। उसमें इतिहास भी है, पुराण भी है। सब इकट्ठा है। और स्वाभाविक है, क्योंकि वह प्राथमिक आदमी की चेष्टा है। पहली दफा लिखा जा रहा है, सब लिख लिया, जो भी है।
धीरे-धीरे, धीरे-धीरे स्पेशलाइजेशन होता है, चीजें टूटती हैं अलग-अलग। तो नीति अलग चली जाती है, समाजशास्त्र अलग चला जाता है, विज्ञान अलग चला जाता है, भूगोल अलग चला जाता है, ज्योतिष अलग चला जाता है। फिर सब अलग-अलग होते चले जाते हैं। इसमें धर्म की भी अपनी एक यात्रा है, जो अलग चली जाती है।
और वेद के कुछ वचन हैं जो धर्म के वचन हैं। सारा वेद धर्म नहीं है। वे वचन धर्म के हैं जो मनुष्य के अंतस-लोक से कुछ संबंध रखते हैं, वहां की जो खोज-बीन करते हैं। वहां के संबंध में उस समय के आदमी का जो अनुभव है, उसको कहते हैं। वे वचन भर धर्म हैं।
तो इंडियन पेनल कोड नहीं है धर्म। इंडियन पेनल कोड समाज की नीति-व्यवस्था है, समाज की राज-व्यवस्था है। वेद में वह भी है।
वह भी है और उसको धर्म समझा गया था अभी तक। और आज भी समझा जाता है।
वह कठिनाई क्या होती है कि वह धर्म-पुस्तक थी। धर्म-पुस्तक से उस दिन मतलब ही यह था। मैंने कहा कि जितना अज्ञान होगा, उतना धर्म सब क्षेत्रों को छुएगा।
जैसे अभी कल तक, हम कहते थे--केमिस्ट्री। तो केमिस्ट्री के सब क्षेत्र छूते थे। आज समझिए कि आर्गनिक केमिस्ट्री अलग है और इनआर्गनिक अलग है और कुछ अलग है। आज जिसे हम आर्गनिक केमिस्ट्री कह रहे हैं, कल वह दस हिस्सों में टूट सकती है। और ज्ञान जैसे बढ़ता है, वैसे खंड-खंड होते चले जाते हैं। आज भी आप विज्ञान की डाक्टरेट को पीएच.डी. की डिग्री दिए चले जा रहे हैं। वह तीन सौ साल पहले की बात है, जब आप डाक्टर ऑफ फिलॉसफी कहते थे। कोई भी आदमी...क्योंकि फिलॉसफी यानी सब कुछ था। पर अब भी आज एक आदमी केमिस्ट्री में कर रहा है पीएच.डी. और उसको आप कहे चले जा रहे हैं डाक्टर ऑफ फिलॉसफी!
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
हां, ठीक। तो यह वैसा ही मामला है। वेद जो है, वह प्राथमिक संकलन है। सच तो यह है कि उस समय का विश्वकोश, उस समय जो जानकारी थी, सब इकट्ठी हो गई है उसमें। उसको पूरे को धर्म कहना आज गलत है। उस दिन तो ठीक रहा होगा, आज गलत है, क्योंकि उसमें से अब बहुत थोड़ा सा ही धर्म बचा। बाकी सब तो अलग हिस्सों ने ले लिया। उन्होंने अलग क्लेम कर लिया अपना-अपना। जिसको मैं धर्म कह रहा हूं, वह जो अंतस की खोज की निरंतर चेष्टा है आदमी की, उसको मैं धर्म कह रहा हूं। और मेरा मानना है कि जितना वह अंतस की खोज भी वैज्ञानिक होती चली जाए, उतना धर्म को अलग होने की कोई जरूरत नहीं रह जाती। एक दिन ऐसा आ सकता है कि दो तरह के विज्ञान हों--बाहर की खोज करने वाला, भीतर की खोज करने वाला। उसको चाहे विज्ञान कहो, चाहे धर्म कहो, उससे कोई अंतर नहीं पड़ने का है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
रिलीजन कहें कि साइंस कहें, यह बहुत बेमानी है। यह जो दो शब्दों का जो फासला है, वह भी पिछले अतीत इतिहास की वजह से पैदा हो गया है। हम उसे क्या कहते हैं, यह मेरे लिए बहुत मूल्य का नहीं है। हम उसे साइंस कहें कि रिलीजन कहें, कुछ भी कहें। अब तक वे दो रहे हैं। और अब तक दोनों की मेथडोलॉजी में बुनियादी फर्क रहा है। लेकिन जैसे-जैसे साइंस भी आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे एक अर्थ में रिलीजन का फील्ड सिकुड़ता चला जाता है। और ठीक है, सिकुड़ जाना चाहिए। क्योंकि उसने सारा सब कुछ घेरा हुआ था, जो उसका था ही नहीं। वह वहां से हट जाएगा। लेकिन कुछ है जो उसका है। और वह ‘कुछ है’ से कभी हटने वाला नहीं है। वह जो कुछ है, वह उसका जो अपना है, उससे वह कभी हटने वाला नहीं है।
लेकिन मेरा मानना है कि साइंस जैसे-जैसे विकसित होती है, वह उस ‘कुछ’ की दिशा में भी बहुत कुछ कर सकेगी। और उस हालत में, उस बिंदु पर जहां रिलीजन का कुछ अपना है, जिसको मैं मेडिटेशन कहूं, समाधि कहूं, वह उस तरह के जो सारे के सारे उसकी सब्जेक्टिविटी के जो प्रयोग हैं। साइंस का सारा का सारा प्रयोग ऑब्जेक्टिविटी के लिए है। ऑब्जेक्टिविटी है। और जो धार्मिक लोग उसे इनकार करें और माया कहें, उनको मैं समझता हूं बकवास कर रहे हैं। सब्जेक्टिविटी भी है। और जो वैज्ञानिक उसे इनकार करें और कहें कि नहीं है, मैं कहता हूं, वे बकवास कर रहे हैं। और यह बकवास एक ही चीज की रिएक्शन है। एक ने, जिसने ऑब्जेक्टिविटी को इनकार किया है, तो ऑब्जेक्टिविटी वाले को लगता है कि सब्जेक्टिविटी वगैरह कुछ भी नहीं है।
वह जो सब्जेक्टिव होना है, वह जो मेरा होना है, वह भी है। मैं जो जान रहा हूं, वह भी है; और जो जान रहा है, वह भी है। किसी न किसी अर्थ में वह है। अब इस जानने वाले को कैसे जाना जाए? निश्चित ही इसको जानने का मेथड वही नहीं हो सकता, जो ऑब्जेक्ट्स को जानने का मेथड होगा। इसके जानने के मेथड में बुनियादी फर्क पड़ेगा। क्योंकि मैं कभी भी, किसी भी स्थिति में, खुद के लिए तो ऑब्जेक्ट बन ही नहीं सकता। दूसरे के लिए मैं ऑब्जेक्ट बन सकता हूं।
तो अभी साइकोलॉजी जो कर रही है, वह मनुष्य की सब्जेक्टिविटी के साथ भी ऑब्जेक्टिव जैसा प्रयोग कर रही है। क्योंकि वह सारे के सारे मेथड साइंस के प्रयोग कर रही है। साइंस के जितने मेथड हैं, वे बेसिकली ऑब्जेक्टिव होने को बाध्य हैं। क्योंकि उसके बिना वे साइंटिफिक नहीं रह जाते, हवा में सब खो जाती है बात, कुछ पता नहीं चलता कि क्या हुआ। तो साइकोलॉजी अभी जो प्रयोग कर रही है, उसने रिलीजन का तो क्षेत्र लिया हुआ है और साइंस के मेथड लिए हुए हैं!
तो साइंस के मेथड से हम दूसरे व्यक्ति की जो सब्जेक्टिविटी है, उसको बाहर से कितना ऑब्जर्व कर सकते हैं? और उसका ऑब्जर्वेशन बिहेवियर ही हो सकता है, और तो कुछ हो नहीं सकता। बिहेवियर को ही हम ऑब्जेक्टिव बना सकते हैं। लेकिन जिसका बिहेवियर है, वह फिर छूट जाता है, वह बच जाता है, वह कहीं खिसक जाता है।
यह जो निरंतर छूट जाने वाला है, इसे जानने के लिए कुछ और ही रास्ता खोजा है धर्म ने। उसे वे मेडिटेशन कहते हैं। उसे वे यह कहते हैं कि उसे हम तब जान सकते हैं, जब कि सारे ऑब्जेक्ट चेतना से विलीन हो जाएं। ऑब्जेक्ट ही न हो, सिर्फ सब्जेक्टिविटी ही रह जाए। तो वह जो ध्यान है, अटेंशन जो है, चूंकि ऑब्जेक्ट पर अटकी हुई थी, अगर सारे ऑब्जेक्ट विलीन हो जाएं, तो वह जो अटेंशन है, वह वापस लौट आती है। क्योंकि वह कहां जाएगी? उसके लिए कोई ऑब्जेक्ट नहीं मिलता, तो वह अपने पर ही वापस लौट आती है। वह जो लौटती हुई चेतना है, वह स्वयं को अनुभव करवाती है। वह स्वयं-संवेद संभव हो पाता है।
यह जो बात है, यह बात अनिवार्य रूप से एंटी-साइंटिफिक नहीं है, नॉन-साइंटिफिक हो सकती है। यह जो बात है, यह अनिवार्य रूप से एंटी-साइंटिफिक होती, तब तो यह होता कि या तो विज्ञान जीतेगा तो फिर यह धर्म विलीन हो जाएगा और या फिर धर्म जीतेगा तो विज्ञान नहीं घुस पाएगा। इसे मैं कहता हूं कि यह नॉन-साइंटिफिक हो सकती है, एंटी-साइंटिफिक नहीं है। इसके एंटी-साइंटिफिक होने की कोई वजह नहीं है। और कल अगर विज्ञान विकास करते-करते उस जगह आता है, जहां वह यह अनुभव करता है कि जिस तरह ऑब्जेक्ट को जानने का ऑब्जेक्टिव ऑब्जर्वेशन रास्ता था, उस तरह सब्जेक्ट को जानने का सब्जेक्टिव इंट्रोस्पेक्शन और मेडिटेशन भी रास्ता हो सकता है, यह अगर विज्ञान को अनुभव होता है--और यह अनुभव होना बहुत कठिन नहीं है--तो फिर जो अनुभव अब तक हम धर्म कहते थे, उसे चाहे हम वैज्ञानिक कहने लगें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। या धर्म को विज्ञान कहने लगें, कोई फर्क नहीं पड़ता।
लेकिन मेरा मानना यह है कि चूंकि बुनियादी रूप से एक ही एनटाइटी है--ऐसा शरीर और आत्मा जैसी दो नहीं हैं, ऐसा पदार्थ और परमात्मा जैसी दो नहीं हैं, ऐसा क्रिएटर और क्रिएशन जैसी दो नहीं हैं--एक ही है, हम उसे क्या नाम देते हैं और किस तरफ से नाम देना शुरू करते हैं, यह बहुत ही औपचारिक बात है।
अगर हम विज्ञान की तरफ से नाम देना शुरू करते हैं, तो हम कल उसे कह सकेंगे कि वह विज्ञान है, भीतर का विज्ञान है। कुछ और कहेंगे--सुप्रीम साइंस कहें, इनर साइंस कहें, कुछ और नाम दे दें, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। या हो सकता है हम उसे साइकोलॉजी ही कहते चले जाएं, वह स्प्रिचुओलॉजी हो जाए, कुछ और हो जाए। यह गौण बात है। लेकिन एक बात जो गौण नहीं है, वह यह है कि एसेंशियली कुछ है हमारे भीतर, जो ठीक ऑब्जेक्टिव होने को बाध्य नहीं होता है और ऑब्जेक्ट को ट्रांसेंड करता मालूम पड़ता है। अगर वह ऑब्जेक्ट ही हो जाए, तब तो रिलीजन की कोई जगह नहीं रह जाती, बात खतम हो गई। रिलीजन जैसी चीज गलत थी, अज्ञान था। फिर साइंस रह जाती है। लेकिन अगर ऐसी कोई चीज है, व्हिच ट्रांसेंड्स नेसेसरिली दि ऑब्जेक्टिव, तो फिर रिलीजन बाकी रहेगा।
नाम बहुत गौण बात है, नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भी पसंद करूंगा कि उसे विज्ञान ही कहा जाए, क्योंकि दो-दो नाम रखने की कोई जरूरत नहीं है। हमें जहां तक बने कम से कम कंसेप्ट से और ज्यादा से ज्यादा उपयोग लेना चाहिए। उतनी सुविधा होती है। व्यर्थ का उपद्रव बचता है, व्यर्थ की कांफ्लिक्ट बचती है।
तो इस बात की बहुत संभावना है कि धर्म जैसा शब्द भी खो जाएगा। और इसीलिए संभावना है क्योंकि वह अनावश्यक हो जाएगा। लेकिन धर्म का एसेंशियल जो कंट्रीब्यूशन है, वह खोने वाला नहीं है। बल्कि शायद जब हम पूरी तरह साइंटिफिक ढंग से उस दिशा में इंगित कर पाएंगे, तो शायद पहली दफा बुद्ध या महावीर या पतंजलि पहली बार पूरी तरह साफ हो सकेंगे हमारे लिए। क्योंकि जिस टर्मिनालॉजी में वे बोले हैं, वह साइंस की नहीं है। क्योंकि साइंस की टर्मिनालॉजी ही नहीं थी। वे जिस टर्मिनालॉजी में बोले हैं वह या तो मेटाफिजिक्स की है, या मेटाफर की है, या पोएट्री की है। आदमी मजबूर है, जो टर्मिनालॉजी उपलब्ध हो, उसी में बोलना पड़ेगा। अगर मैं हिंदी के सिवाय कोई भाषा नहीं जानता हूं, तो मजबूरी है कि मैं जो भी बोलूंगा, वह हिंदी में बोलूंगा।
आज से दो हजार साल पहले जो भाषा थी हमारे पास, काव्य की थी, कहानी की थी। इस तरह की भाषा थी। उसी भाषा में कहने की जरूरत थी। तो मेरा मानना है कि रिलीजस एक्सपीरिएंस जैसे ही हुआ, उसको पोएट्री की भाषा में ही प्रकट करना पड़ा। वह लैंग्वेज की गड़बड़ है, जो आज कांफ्लिक्ट बढ़ रही है।
और अब जब कि साइंस की भाषा विकसित हो गई--ज्यादा एग्जेक्ट, ज्यादा मैथमेटिकल, ज्यादा साफ-सुथरी--तो अब पोएट्री की भाषा में रिलीजन को प्रकट करने की कोई जरूरत नहीं रह जाने वाली है। आज नहीं कल हम साइंस की भाषा में ही रिलीजन को प्रकट कर सकेंगे। उस हालत में, जिसको हम रिलीजन कहते रहे थे आज तक, वह सब विदा हो जाएगा। हो जाना चाहिए। लेकिन रिलीजस एक्सपीरिएंस एज सच, वह विलीन होने वाला नहीं है।
और इसलिए उसको हम क्या नाम देंगे, कोई फर्क नहीं पड़ता। रिलीजन कहें, साइंस कहें, कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन वह एक्सपीरिएंस ऑब्जेक्टिव एक्सपीरिएंस से कुछ पृथक अपनी सत्ता रखता है, उसकी अपनी आथेंटिसिटी है, यह मेरा कहना है। और इसलिए वह विदा होने वाला नहीं है। वह एक्सपीरिएंस विदा होने वाला नहीं है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
उसको ईच एंड एवरीबडी को प्रूव करने का न सवाल है, न प्रश्न है। वह तो जो प्रूव करना चाहे उसे उतरना पड़ेगा उस दिशा में।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
न-न, यह सवाल नहीं है। सवाल है, जो फर्क है, जो डिस्टिंगशन है, वह दूसरा है। साइंटिस्ट आज नहीं कल, जीवन क्या है, यह जान लेंगे। लेकिन जीवन को जानने की उनकी जो मेथडोलॉजी है, वह ऑब्जेक्टिव है। वे जीवन को जान लेंगे, जैसा जीवन बाहर से देखा जा सकता है, जैसा हम बाहर से ऑब्जर्व कर सकते हैं। वे जीवन को ऐसे जानेंगे, जैसा दूसरा जीवन को जानता है। लेकिन जीवन अपने में, भीतर, स्वयं कैसा अनुभव करता है, जीवंत होना कैसा है, वह साइंटिस्ट बाहर से नहीं जान पाता। वह उसकी जो सब्जेक्टिव फीलिंग है...
जैसे मैं कहूं--प्रेम है। एक फिनामिना है। बाहर से हम ऑब्जर्व करते हैं कि प्रेमी क्या करता है, क्या नहीं करता है, उसका बिहेवियर क्या है, प्रेमी के मस्तिष्क पर क्या होता है, प्रेमी के शरीर पर क्या होता है, हम सारा ऑब्जर्व करते हैं। और हम, प्रेम क्या है, इसके बाबत कुछ नतीजे लेते हैं। और वे नतीजे भी अर्थ रखते हैं। वे नतीजे ऑब्जेक्टिव हैं। लेकिन प्रेमी प्रेम करने में सब्जेक्टिवली क्या अनुभव करता है, यह हमारे ऑब्जेक्टिव ऑब्जर्वेशन से छूट जाता है, इट इज़ बियांड दैट। और वह जो छूट जाता है, उसको जानने का ऑब्जेक्टिव कोई रास्ता नहीं है। क्योंकि ऑब्जेक्टिव हम जो भी जानेंगे, वह सब्जेक्टिव फिर छूट जाएगा, बच जाएगा।
तो लाइफ को वैज्ञानिक जान लेगा कि लाइफ क्या है, कैसे बनती है, कैसे आती है, किन-किन तत्वों से मिल कर प्रकट होती है। लेकिन लिविंग होना, डेड होना और लिविंग होना...
यह तकिया पड़ा है। समझ लें कि अगर डेड है, और यह तकिया अगर लिविंग हो जाए, तो डेड होने और लिविंग होने के बीच में तकिया क्या अनुभव करता है, वह जो उसका इनर एक्सपीरिएंस है लिविंग होने का वह क्या है, वह हम बाहर से ऑब्जर्व नहीं कर पाते हैं। न उसका कोई उपाय है, न हो सकता है। क्योंकि सब्जेक्टिविटी को ऑब्जेक्टिवली नहीं जाना जा सकता। वह कंट्राडिक्शन इन टर्म्स है।
और इसलिए रिलीजन का...रिलीजन का कहना यह नहीं है, रिलीजन का मतलब भी यह नहीं है कि विज्ञान जीवन को नहीं जान सकेगा। विज्ञान जीवन को जानेगा। लेकिन फिर भी वह जानना वह जानना नहीं है जो धर्म कहता है आत्म-साक्षात्कार। वे दोनों अलग बातें हैं।
बट दिस सब्जेक्टिविटी आल्सो कैन बी ऑब्जर्व्ड!
ऑब्जेक्टिवली ही सब्जेक्टिविटी को अध्ययन करेंगे न! विज्ञान इतना करेगा। यह हो रहा है, साइकोलॉजी यह कर रही है।
अध्ययन तो सब्जेक्टिविटी का ही होगा न!
नहीं समझे आप। सब्जेक्टिवली! ये दोनों बुनियादी बातों में फर्क हो गया। डीप साइकोलॉजी जो कर रही है, वह यही कर रही है, सब्जेक्टिविटी का ऑब्जेक्टिवली अध्ययन कर रही है। लेकिन दैट स्टडी टू इज़ नॉट सब्जेक्टिव, इट इज़ ऑफ दि सब्जेक्टिव एंड ऑब्जेक्टिवली। बट टु अंडरस्टैंड सब्जेक्टिविटी एज ए सब्जेक्ट रिमेंस बियांड साइंस।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
मेरा किसी से प्रेम का अनुभव एक बात है, और मेरे प्रेम का अध्ययन आप सब मिल कर करेंगे, यह बिलकुल दूसरी बात है। प्रेम का दो तरह से अध्ययन किया जा सकता है। एक ऑब्जेक्टिवली--कि प्रेम का फिनामिना क्या है? क्या होता है प्रेम में? फिजियोलॉजिकली क्या होता है? मेंटली क्या होता है? केमिकली क्या होता है? किसके लिए, यह सवाल नहीं है। प्रेम को दो तरह से अध्ययन कर सकते हैं। ऑब्जेक्टिवली अध्ययन जो है, वह प्रेम की साइंटिफिक स्टडी होगी। लेकिन प्रेम साइंटिफिक स्टडी पर समाप्त नहीं होता, शेष रह जाता है। और वह जो कुछ शेष रह जाता है, वह जो सब्जेक्टिव फीलिंग है प्रेम की, वह पकड़ में नहीं आती। और उसको मेडिटेटिवली ही जाना जा सकता है, नहीं तो नहीं जाना जा सकता।
यानी मैं जो कह रहा हूं, वह यह कि हमारी साइंस की कितनी ही प्रोग्रेस हो, ऐसा नहीं हो जाता है कि कोई चीज छूट नहीं जाती पीछे, कुछ चीज बाकी नहीं रह जाती।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
जो दूसरे के लिए मिले, वही करने योग्य है? और अपने लिए मिले, वह करने योग्य नहीं है? अगर यही क्राइटेरियन है कि जो दूसरे के लिए मिले वही करने योग्य है और अपने लिए मिले वह करने योग्य नहीं है, तब तो बात अलग है। तब तो कुछ नहीं मिला। और अगर अपने लिए मिला वह भी करने योग्य है...
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
जब भी हम धार्मिक व्यक्ति के वक्तव्यों को ऑब्जेक्टिवली पूछने लगेंगे, तो हम करीब-करीब ऐसी भूल कर रहे हैं कि हम दो ऐसी लैंग्वेजेज को मिक्सअप कर रहे हैं, जिनका मिक्सअप होना बुनियादी रूप से गलत है--अभी।
जैसे मैं कहूं: एक आदमी कहीं से संगीत सुन कर आया और उसने हमें आकर कहा कि मैंने बहुत अदभुत संगीत सुना। हम उससे पूछते हैं, उस संगीत की सुगंध क्या थी? वह आदमी कहता है, आप क्या बात कर रहे हैं!
मैंने कभी संगीत नहीं सुना, लेकिन फूल मैंने सूंघे हैं और बगीचे का आनंद लिया है। और वह आदमी कहता है कि बहुत आनंद आया, संगीत मैंने सुना। मैं उससे पूछता हूं, संगीत की सुगंध क्या थी? वह आदमी कहता है, सुगंध? आप बड़ी इररेलेवेंट बात पूछते हैं! मैं उससे कहता हूं, थोड़ा सा संगीत तुम ले नहीं आए, जरा मैं देख लूं। वह आदमी कहे, आप पागल हो गए हैं! संगीत मैं कैसे ला सकता था, संगीत कोई लाने की बात नहीं। तो मैं उससे कहूं कि जिसमें न कोई सुगंध है, न जिसमें कोई स्वाद है, न जिसे लाया ले जाया जा सकता है, उसके होने का मतलब भी क्या है?
मैं उससे कह सकता हूं। और मैं एकदम गलत भी नहीं हूं। लेकिन मेरा जो यह सारा कहना है, एक अर्थ में इररेलेवेंट है। इररेलेवेंट इस अर्थ में है कि मेरी इन सब बातों के अतिरिक्त भी संगीत हो सकता है और उसके होने का अर्थ हो सकता है।
महावीर को क्या मिला और क्या नहीं मिला, जब हम पूछने लगते हैं, तो हम उस टर्मिनालॉजी में उत्तर चाहते हैं जो हम जानते हैं। जैसे कि आइंस्टीन को रिलेटिविटी की थ्योरी मिली, तो वह रिलेटिविटी की थ्योरी क्या है? हम वैसे ही पूछ रहे हैं जैसे आइंस्टीन ने जो एक्सपेरिमेंट किया, उसको जो मिला, तो वह क्या है? तो वह किताब लिखी गई है। तो महावीर को जो केवल-ज्ञान मिला वह क्या है?
केवल-ज्ञान के बाबत जो भी कहा जाएगा...केवल-ज्ञान तो एक सब्जेक्टिव अनुभूति है, और जो कहा जाएगा वह ऑब्जेक्टिव एक्सप्रेशन है।
आई वुड से, कहा ही नहीं जा सकता। और कहा जा ही नहीं सकता है। उसका एक्सप्रेशन ही नहीं हो सकता। दैट इज़ योर ज्ञान, दैट इज़ अवर ज्ञान, दैट इज़ व्हाट वी विल अचीव आफ्टर मेडिटेशन।
ठीक है न, यह तो आपको पता है फिर!
एनी ऑफ माई वडर्स रिमेन सब्जेक्ट टु करेक्शन।
न, न, न। करेक्शन का नहीं। यह पता है हमें। और जरूर कहा गया है। यह भी कहा जाना है। अगर कोई केवल-ज्ञान के बाबत यह कहे कि उसे नहीं कहा जा सकता, ही हैज सेड समथिंग। और बड़ी मीनिंगफुल बात कही उसने, कोई गैर-मीनिंगफुल बात नहीं कही। विट्गिंस्टीन ने एक सेंटेंस लिखा है, आप देखे होंगे, विट्गिंस्टीन की कोई...तो टैक्टेटस में वह एक सेंटेंस लिखता है: दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड, मस्ट नॉट बी सेड। लेकिन वह यह नहीं कहता कि दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड इज़ नॉट। और न वह यह कहता है कि दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड, मस्ट नॉट बी सेड, इज़ नॉट ए सेइंग अबाउट इट।
मेरा मतलब आप समझ रहे हैं न? जब हम यह कहते हैं, अगर हम किसी चीज के बाबत कहते हैं कि वह नहीं कही जा सकती, तो हमने उसके बाबत कुछ कहा। और यह कहना बहुत साधारण नहीं है। इसने कुछ इंडीकेट किया, इसने कुछ बात कही, इसने कुछ इशारा भी किया। अगर हम यह कहते हैं कि केवल-ज्ञान एक अनुभूति है, तो हमने कुछ कहा। अगर हम यह कहते हैं कि वह अनुभूति ऐसी है जो जानी ही जा सकती है, कही नहीं जा सकती, तो भी हमने कहा।
यह बड़ा मजा है! सारे धर्मग्रंथ, जिस संबंध में कहते हैं कुछ नहीं कहा जा सकता, उसी के संबंध में लिखे गए हैं।
लाओत्से अपनी किताब शुरू करता है--ताओ तेह किंग--उसमें वह लिखता है कि मैं वह कहूंगा, जो नहीं कहा जा सकता। मैं वह कहूंगा इस किताब में, जो नहीं कहा जा सकता। और इसलिए कहने से वह अनिवार्यरूपेण गलत हो जाएगा, उसके लिए क्षमा करना। कहता है--सारी बात कहता है--और यह क्षमायाचना के साथ।
मेरा कहना है कि यह क्षमायाचना भी कुछ कह रही है। वह जो एक तकलीफ है कहे जाने की, वह उसके बाबत कुछ कह रही है। कहे जाने की इच्छा है, कहा जाना चाहिए, किसी को बताना चाहिए, जो जाना है वह कहा जाना चाहिए, उसका भी तीव्र प्रवाह है। नहीं कहा जा सकता, इसका भी बोध है। और इन दोनों के बीच में जो चेष्टा चल रही है, वह भी कुछ कह रही है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
मेरा कहना यही है कि अगर नहीं जा सकते हैं मेडिटेशन करने, तो मेडिटेशन के संबंध में हां और न के कोई जवाब मत पकड़ें। अगर नहीं जा सकते हैं, तो बकवास छोड़ें। छोड़ें उस बात को, वह अपना नहीं है काम।
अगर मैं म्युजिक की दुनिया में नहीं जा सकता हूं, तो फिजूल मैं बातें न करूं। ठीक है, बात खतम हो गई। मेरी वह दुनिया नहीं है, मुझे नहीं जाना है या जाने की सुविधा नहीं है। फिर मैं हां और न के जवाब न पकडूं। फिर दोनों जवाब खतरनाक हैं। या तो मैं यह कहूं कि केवल-ज्ञान है ही नहीं कुछ। यह भी गलत बात है। या फिर मैं केवल-ज्ञान के संबंध में चुप रहूं।
बट यू कांट से देअर इज़ नथिंग।
नहीं-नहीं, मेरा कहना यह है, जो नहीं जा सकता, जैसे आप अगर केमिस्ट्री के बाबत नहीं गए हैं कुछ अध्ययन करने, तो आप चुप तो रहते हैं कम से कम। आप कुछ कहते तो नहीं हैं। अगर आप गणित के बाबत नहीं गए हैं और हायर मैथमेटिक्स से आपका कुछ संबंध नहीं है, तो आप कम से कम चुप तो हैं। इतनी ईमानदारी भी धर्म के संबंध में नहीं बरती जा रही है।
पर अभी वह चुप रहने का जमाना भी नहीं है। जो सुना है, जो समझ में नहीं आता है उसको मान लेना भी और उसको...
यह कौन कहता है? मैं कहां कहता हूं!
वह तो अनुभव की बात है!
मैं तो दिन-रात यही कह रहा हूं, मैं तो दिन-रात यही कह रहा हूं।
समझो कि मैं नहीं जा रहा हूं...
तो चुप रह जाइए आप, हां-न मत करिए।
चुप रहने की अब जरूरत नहीं है।
तो क्या करिएगा? कुछ न कुछ कहिएगा मेडिटेशन के बाबत, बिना जाए? मेरा कहना यह है कि अगर मेडिटेशन में नहीं जा सकते हैं तो सीखिए।
आज समझो कि मैं ड्राइविंग नहीं जानता...
इतना तय है कि ड्राइविंग सीखिए, और फिर गाड़ी ले लीजिए। तो मेडिटेशन सीखिए और फिर चल पड़िए।
वह तो मैं तभी सीखूं व्हेन आई सी दैट एवरीबडी इज़ ड्राइविंग दि कार एंड इट इज़ सेफर।
समझा मैं, समझा मैं। तो आप देखिए महावीर को, बुद्ध को। खोज करिए कि ये सेफर हैं या नहीं।
मेरा कहना क्या है कि एक भी एग्जाम्पल बताइए कि मेडिटेशन से उसको यह मिला और उसने बताया कि यह हो सकता है...
क्यों परेशान होते हैं? एग्जाम्पल तो मैं हूं। पर आप क्यों परेशान होते हैं? और मैं दूसरा एग्जाम्पल कहां से लाऊं? और उसका क्या मतलब है? उससे क्या प्रयोजन है?
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
ऐसी स्थिति में जहां कि सब अर्थहीनता हो जाती है, मन बहुत करता है कि कहीं भी पकड़ लो, कहीं भी गुजर जाओ, बाहर निकल जाओ, पीछे लौट जाओ, आगे चले जाओ। नहीं जाना है। जम कर ही बैठ जाना है संदेह पर। तो एक ट्रांसेंडेंस आती है, जो अपने से आती है, उसको तो लाने का सवाल ही नहीं है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
तो कुछ है जो इनडुबिटेबल है आपके लिए। और वह आपको ट्रांसेंड नहीं करने देगा।
आखिर ऐसी कोई भी चीज नहीं है जो डाउट के योग्य न हो। ऐसी कोई धारणा ही नहीं है जो डाउट के योग्य न हो। इनडुबिटेबल जैसा कुछ हो ही नहीं सकता। सेल्फ इविडेंट भी कुछ नहीं है। और जैसे ही आपने कुछ माना, कि कहीं न कहीं आपका मीनिंग रूट पकड़े हुए है और कहीं न कहीं आप आस्थावान हैं। आस्था क्या है, यह बहुत सवाल नहीं है।
और मेरा मानना है कि अगर आस्था थोड़ी भी है, तो डाउट के पार आप कभी नहीं हो पाएंगे। क्योंकि वह जो आस्था है, डाउट को कभी भी टोटल नहीं होने देगी। डाउट को टोटल नहीं होने देगी। आपके डाउट में एक कमी रह गई। और वह कमी छोटी कमी नहीं है। यानी एक अर्थ में आप डाउट की परेशानी से गुजर ही नहीं रहे हैं। कुछ है, जहां डाउट नहीं है। और आप निश्चिंत वहां खड़े हुए हैं। डाउट से पूरी तरह गुजरना, कि एक भी ऐसी बात न रह गई जो संदेह के परे है। संदेह भी न रह गया संदेह के परे।
ये तथाकथित ब्रह्मचारी और साधु और संन्यासी, अगर इनको दस-पंद्रह साल की साधना के बाद इनको कहा जाए कि चित्त को तुम मुक्त छोड़ दो, तो सिवाय पागल होने के ये कुछ भी नहीं हो सकते! इसी वक्त पागल हो जाएंगे--इसी वक्त! क्योंकि इनके पास तो भारी उबलता हुआ लावा इकट्ठा है। वह तो किसी तरह से सम्हाले बैठे हुए हैं!
तो इनका, न तो ये सूक्ष्म हो सकते हैं, न यह अंतर्दृष्टि इनकी भीतर प्रवेश कर सकती है। क्योंकि प्रवेश कहां करोगे? अंतर्दृष्टि पैदा कैसे करोगे? अंतर्दृष्टि पैदा करने का मतलब यह है कि जीवन में एक सरलता हो, दमन न हो। और जीवन के बीच खंड-खंड टुकड़े न हों, कि एक खंड टुकड़ा दूसरे खंड टुकड़े की छाती पर चढ़ जाए। वह जिस टुकड़े के ऊपर चढ़ गया है, वह टुकड़ा उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहा है। और जो चढ़ गया है, अब उसने एक प्रतिष्ठा बना ली है, अब वह हट नहीं सकता वहां से। हटे तो उसे लगेगा, सब अस्तव्यस्त हो गया।
मनुष्य के भीतर इतने खंड जो हैं व्यक्तित्व के, अगर इनमें एक इनर-कांफ्लिक्ट है, तो न तो आप सूक्ष्म हो सकते हैं और न भीतर आप प्रवेश कर सकते हैं। आप सदा के लिए भयभीत हो जाएंगे, जितना ही आप दमन करेंगे। मेरा कहना है कि वह तो जितना जीवन को सरलता की स्वीकृति जिसकी है--जैसा जीवन है, जो भीतर है, उसके लिए सरल चित्त से स्वीकार है। जैसे हमारी आंख है, हाथ है, वैसा सेक्स है, वैसा क्रोध है। और हम नहीं जानते कि क्यों है! इसलिए हम झगड़े में पड़ते नहीं। हम सिर्फ जानना चाहते हैं कि क्या है। हम यह मान कर चलते भी नहीं कि जानने से सेक्स विलीन हो जाता है। क्योंकि विलीन हो जाने की जो कामना है, वह मूलतः दमन का ही सूक्ष्म रूप है। हमें यह पता नहीं कि वह विलीन होगा कि और बढ़ जाएगा। और हमारा कोई पक्ष भी नहीं है कि वह विलीन हो, कि बढ़े, कि न बढ़े, कि घटे; हमें कोई प्रयोजन नहीं है।
हम इतना ही करना चाहते हैं कि जो भी हमारे भीतर है, वह सचेत और जागरूक हो जाए। अगर क्रोध भी हमारे भीतर हो, तो क्रोध सचेत और जागरूक हो जाए। और उसकी पूरी शक्ति और महत्ता से मैं परिचित हो जाऊं। और उसकी पूरी जो इनर वर्किंग है, उसको मैं जान लूं। सिर्फ इसे हमें जानने जाना है।
ऐसा व्यक्ति ऐसे सरल भाव से...इसको मैं सरल भाव कहूंगा। दमन करने वाला तो सरल कभी होता ही नहीं। उससे ज्यादा जटिल आदमी नहीं। वह चाहे कितना ही सरल दिखाई पड़े, वह लंगोटी लगाए हुए खड़ा है, और आप जाते हैं तो झुक कर वह नमस्कार करता है, लेकिन वह सरल कभी नहीं हो सकता। वह जटिलता उसके भीतर खड़ी हुई है। तो जितना चित्त जटिल होगा, उतना भीतर प्रवेश नहीं होता है।
एक्सट्रीम में क्या होता है?
एक्सट्रीम में जो होने वाला है, अगर दमन कोई करता ही चला जाए...
एक्सट्रीम पर रिवर्स होता है न! जैसे टाल्सटाय का, ही एनज्वायड कंप्लीटली एंड देन ही वेंट बैक। इट वाज़ ए रिएक्शन!
नहीं, कहीं वेंट बैक हुआ नहीं टाल्सटाय का बेचारे का!
उसका रिएक्शन ही हुआ न कंप्लीटली भोग में उतरने का...
वह कुछ मामला नहीं है, बस वह सब मेंटल मामला है, इससे ज्यादा नहीं है गहरा कुछ टाल्सटाय का। वह हम बात करेंगे!
यह जो अगर कोई दमन करता ही चला जाए और दमन सफल हो जाए--सफल होना बहुत मुश्किल मामला है--तो स्प्लिट पर्सनैलिटी हो जाएगी। दो हिस्सों में टूट जाएगा, अगर सफल हो जाए। सफल होना बहुत मुश्किल मामला है। दमन सफल होता नहीं, क्योंकि प्रकृति के बिलकुल ही प्रतिकूल है आपका कार्य जो है। शीर्षासन करने जैसा है। दस-पांच मिनट आप खड़े हो जाते हैं, फिर चौबीस घंटे पैर पर ही खड़े रहते हैं।
मगर यदि कोई आदमी चौबीस घंटे सिर पर खड़े रहने के लिए तैयार हो जाए, तो दमन की अगर पूरी सफलता मिल जाए, तो व्यक्तित्व दो हिस्सों में टूट जाएगा और उन दो हिस्सों को एक-दूसरे का कोई पता नहीं रह जाएगा। अगर पूर्ण सफल हो दमन में। दो आदमी हो जाएंगे इसके भीतर, यह एक आदमी रह ही नहीं जाएगा। और इसके बीच के जो सेतु हैं, वे सब टूट जाएंगे। इसका आखिरी परिणाम पागलपन हो सकता है। विस्फोट होगा और इतना होगा कि सारा का सारा एक्सप्लोजन हो जाए, यह आदमी बिलकुल ही पागल हो जाए।
दमन पागल करता है और दमन करने वाली सभ्यता पागल करती है। और करीब-करीब हर आदमी को हमने उस हालत में पहुंचा दिया है इन पांच हजार वर्षों के सभ्यता के इतिहास में कि वह विस्फोट हो जाए। अगर वह नहीं हो रहा है, तो उसका कारण यह है कि दमन सफल नहीं हो पाया है। यानी निकास के रास्ते निकल आते हैं। यानी वह ब्रह्मचर्य वगैरह थोपता है, लेकिन गैर-ब्रह्मचर्य का कोई न कोई रास्ता खोज लेता है। और इसलिए ब्रह्मचर्य भी चलता है। इसीलिए ब्रह्मचर्य चलता है, नहीं तो वह इसी वक्त खतम हो जाए। अंततः विस्फोट ही हो सकता है पूरे व्यक्तित्व का और पागलपन, विक्षिप्तता के सिवाय कहीं कोई ले जा नहीं सकता।
इसलिए मेरा कहना यह है कि इस विक्षिप्तता के बाद कुछ काम हो सकता है, क्योंकि वह फिर उस हालत में आ जाएगा जहां चीजें सरल हो गईं। लेकिन यह बहुत उपद्रव का मामला है, इससे कोई मतलब नहीं है। यह ऐसे उपद्रव का मामला है कि हो सकता है उस विक्षिप्तता में वह टूट ही जाए, व्यक्तित्व ही टूट जाए, शरीर ही टूट जाए। यह जिंदगी तो कम से कम खराब हो जाए।
अभी वे अमेरिका में एक छोटा सा प्रयोग करते हैं। अभी वे कहते हैं कि जो पागलपन है, जैसा कल तक हम सोचते थे कि गरीबी व्यक्ति का जिम्मा है, ऐसा आज उसमें एक वर्ग है मनोवैज्ञानिकों का, जो कहता है, पागलपन भी व्यक्ति का जिम्मा नहीं है। पागलपन भी उसके आस-पास के सारे अंतर्संबंधों का दबाव है। और इसलिए पागल का सीधा अकेला इलाज करना बिलकुल व्यर्थ है। वह हो नहीं सकता। क्योंकि वह उसका मामला ही नहीं है। तो वे कहते हैं कि उसका इलाज करने के लिए तो पूरी एक कम्युनिटी होनी चाहिए। और कम्युनिटी कुछ डेवलप करते हैं, दो-चार प्रयोग कर रहे हैं कि वह पूरी कम्युनिटी जो है, वह उस व्यक्ति के पूरे अंतर्संबंध बदल दे।
जैसे कि कल उसने सड़क पर किसी स्त्री को जाते देखा था और उसका मन हुआ था कि वह उसको गले लगा ले। गले लगाता है, तो पिटता है, तो जाता है जेलखाने! नहीं गले लगाता है, तो वह गले लगाने वाला चित्त उसका चक्कर मारता है और वह उसे पागल बनाता है। तो अब एक कम्युनिटी होनी चाहिए, जहां जो दस-पांच स्त्रियां रह रही हैं, उनको यह समझाया गया है कि अगर कोई गले लगा ले तो यह कोई बहुत उपद्रव और तूल बनाने की जरूरत नहीं है। उससे गले लग कर, नमस्कार करके, रास्ते पर चले जाना है। ताकि वह जो गले लगाने वाला पागल है, वह अगर किसी को गले लगा ले, और कुछ उपद्रव न हो कहीं भी, और ये चीजें ऐसी ही हो जाएं जैसे हवा का झोंका आया और गया, तो उसका पागलपन मिट सकता है। नहीं तो नहीं मिट सकता है।
और उसके बड़े अच्छे परिणाम हुए हैं। आज जिसको हम पागल कहते थे, वह आदमी पागल था ही नहीं। वह सिर्फ कम्युनिटी के प्रेशर ऐसे थे कि उसको सप्रेसिव बनाया उसने। और वह सप्रेसिव होने से बेचारा पागल हो गया था। अगर ये विलेज कम्युनिटीज इस तरह की सफल होती हैं, तो आज नहीं कल आपको बड़े पैमाने पर सोचना पड़ेगा कि बजाय अलग कम्युनिटी बनाने के आप एक ऐसी सोसाइटी क्यों न बनाएं जो इस तरह की बेवकूफियों से आदमी को बचाती हो। हमारी पूरी सोसाइटी इस तरह की बेवकूफियां सिखाती है, बचाती नहीं है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
रेशनली देखता है, अगर रेशनली देखता है, और हम कहते हैं कि अपने से बाहर जाता है, अलग खड़ा होता है, तो इसमें स्प्लिट पर्सनैलिटी शुरू होगी और टेंशन शुरू होगा, और वह भी पागल कर सकती है।
इसलिए मेरा कहना है कि यह जो देखने का मामला है, इट शुड नॉट बिकम एन एफर्ट। और अपने से बाहर जाने का कोई सवाल नहीं है। यह तो बहुत एफर्टलेस, जो हो रहा है, उसकी जस्ट अवेयरनेस है। यह ऑब्जर्वेशन नहीं है ऐसा कि जैसे मैं आपको देख रहा हूं, ऐसा ही मैं अपने को देखूं, तब तो पागलपन पैदा करने वाला है। वह तो बिलकुल ही पागलपन लाने वाला है। इसलिए हमारे साधु-संन्यासी जो इस तरह का ऑब्जर्वेशन करने की कोशिश करते हैं, वे पागल होंगे। वह तो फिर उन्होंने दो हिस्सों में तोड़ लिया अपने को। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस काम के लिए दो हिस्सों में तोड़ते हैं। किसी काम के लिए दो हिस्सों में तोड़ें--चाहे सप्रेशन के लिए, चाहे ऑब्जर्वेशन के लिए--आपने एक गल्फ पैदा कर ली। और गल्फ के जो परिणाम होने वाले हैं, वे होंगे। वे आपको दो हिस्सों में तोड़ देंगे।
इसलिए मैं कहता हूं कि यह जो सेल्फ-ऑब्जर्वेशन, जिसकी मैं बात करता हूं, वह वैसा सेल्फ-ऑब्जर्वेशन नहीं है कि आप अपने से बाहर खड़े होकर और अकड़ कर खड़े हो गए हैं और अपने ही चित्त की वृत्तियों को दूर से देखने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी कोई दूरी नहीं है, आप ही चित्त हो और आप खड़े हो नहीं सकते। यह खड़ा होना बिलकुल ही अस्वाभाविक, झूठा और काल्पनिक है। और यह जो इमेजिनरी आप आउटसाइड गए हो, यह गए-वए नहीं हो कहीं, यह सिर्फ खयाल में चले गए हो।
दिस लीड्स टु मॉरल हिपोक्रेसी।
बिलकुल ही ले जाएगा, बिलकुल ही। ले ही जा रहा है। सारे तरफ से पाखंड पैदा करेगा। और पाखंड पैदा कर दे, इससे कोई हर्जा नहीं है। आपको खंड-खंड करेगा। यानी पाखंड तो ठीक है। पाखंड तो यह भी हो सकता है कि सिर्फ, सोसाइटी चूंकि बहुत कनिंग है, गलत है, इसलिए आपको पाखंडी होकर रास्ता निकालना पड़ता है। उस हालत में पाखंड शायद आपके लिए नुकसान भी नहीं पहुंचा रहा है। या आप पागल हो जाओगे, अगर आप पाखंडी नहीं होते। सोसाइटी ने विकल्प ऐसे छोड़े हुए हैं कि या तो आप पाखंडी हो जाओ और या फिर जीना मुश्किल है, पागल हो जाओ। तो समझदार आदमी पाखंडी हो जाएगा। वहां कोई रास्ता नहीं है उसको निकालने का और।
आप खंड-खंड हो जाओगे! जो कि भारी खतरा है। और खंड-खंड होना शुरू हो गया, जैसे ही आपने अपने साथ कुछ करना शुरू किया, यानी ऑब्जर्वेशन या कुछ भी, आपने कुछ करना शुरू किया अपने साथ कि आपने दो टुकड़े मान लिए--एक मैं करने वाला और एक होने वाला।
मैं जो कह रहा हूं वह यह कह रहा हूं कि आप इकट्ठे एक ही हैं। जब क्रोध है, तो आप क्रोध ही हैं। ऐसा नहीं है कि आप आउटसाइड क्रोध के खड़े हो गए हैं और देख लेंगे। आप क्रोध ही हैं। इस क्रोध को जो समझना है, वह समझना भी कोई आप अलग हैं, ऐसा नहीं है। अपने ही क्रोध को उसके साथ एक रह कर उसे जानना, समझना है। न कोई लड़ाई लेनी है उससे, न जानने-समझने में कोई स्ट्रेन पैदा करना है। लेकिन जैसे मैं अपने हाथ को समझता हूं, जैसे मेरे पैर में तकलीफ है तो मैं पैर को समझता हूं, जैसे मेरे सिर में दर्द है तो मैं सिर को समझता हूं; ऐसे ही जो भी मेरे भीतर है, मैं उसे समझने की कोशिश करता हूं। यह जो कोशिश है, दो हिस्सों में तोड़ने वाली नहीं है। और न मेरी आकांक्षा है कि इसको मैं बदल दूं, न मेरी आकांक्षा है कि यह कुछ और हो जाए, न यह कोई कामना है कि यह बदल जाए। कामना कुल इतनी है कि जो भी मैं हूं...इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अच्छा है या बुरा, यह बेमानी है। अच्छा और बुरा दूसरों का वैल्युएशन है। मैं तो जो भी हूं, वही हूं। वह जो फैक्ट है मेरा, उसे मैं जान लूं और उसे जीने की पूरी कोशिश करूं।
इस कोशिश से, आउट ऑफ दिस, कुछ होना शुरू होता है, वह स्प्लिट में नहीं ले जाता आपको। बल्कि वह आपको मोर इंटीग्रेटेड और धीरे-धीरे-धीरे-धीरे वहां ले जाता है, जहां आपके भीतर विरोधी स्वर होता ही नहीं। आप जो होते हैं, टोटल होते हैं। क्रोध में भी, प्रेम में भी, सेक्स में भी; जो भी आप होते हैं, टोटल होते हैं। जो बच रहता है, वह आपको टोटेलिटी दे जाता है। और मेरा मानना है, ऐसे व्यक्ति का सेक्स भी और है, ऐसे व्यक्ति के क्रोध का आनंद भी और है। ऐसे व्यक्ति का, जो भी उसके जीवन में है, वह समग्र हो गया है, इकट्ठा हो गया है। और ऐसी स्थिति को तो मैं कहता हूं कि विमुक्ति की स्थिति बन सकती है। लेकिन वे तो स्थितियां सब विक्षिप्त बनने की स्थितियां हैं।
यह जो इस भांति सहज, सरल और जैसे हम हैं उसके स्वीकार से चलने वाला जो जानना है, यह तो आपको सूक्ष्मतम दृष्टि दे सकता है। लेकिन असहज, कठिनाई से, दबाने वाला, तोड़ने वाला उसको खंड-खंड में, कोई आपको सूक्ष्म दृष्टि नहीं दे सकता है।
इसलिए कई दफे इतनी हैरानी होती है कि जिनको आप बड़ी सूक्ष्म दृष्टि के लोग कहते हैं, वे अत्यंत स्थूल दृष्टि के लोग होते हैं, जिनमें सूक्ष्म जैसी कोई चीज ही नहीं होती, हो ही नहीं सकती। हमारे बड़े-बड़े महात्मा, जिनका हम भारी शोरगुल मचाए रखते हैं, अत्यंत स्थूल दृष्टि के लोग होते हैं। वे बातें भी जो करते हैं बड़ी-बड़ी, वे बातें भी अत्यंत स्थूल होती हैं, उनमें कुछ मामला नहीं होता। यानी उसमें कोई गहरा जानना नहीं है। क्योंकि जानने से तो वे बच ही गए हैं। और बच गए हैं...जानना तभी हो सकता है, जब मेरा कोई आग्रह न हो। इस कमरे में मैं आऊं और जो भी है उसे जानने की मेरी तैयारी हो, मेरा कोई आग्रह ही न हो। मैं आऊं और जान लूं जो भी है। न मेरा यह खयाल हो कि यह कुर्सी यहां से वहां होनी चाहिए, न मेरा यह खयाल हो कि दीवाल का रंग यह नहीं होना चाहिए, वह होना चाहिए। ये सब आग्रह लेकर मैं इस कमरे में आया, तो इस कमरे में और मेरे भीतर जो कांफ्लिक्ट होने वाली है, वह स्थूल करेगी, वह सूक्ष्म नहीं करती है।
और दो नहीं हैं वहां कोई। यह जो भ्रांति हजारों साल में हमको पैदा की गई है कि क्रोध कुछ अलग है, घृणा कुछ अलग है, सेक्स कुछ अलग है और हम कुछ अलग ही हैं। यह बड़ी खतरनाक है! लेकिन वह खड़ी है। ये सब अद्वैत की बातें करने वाले लोग हैं, लेकिन बुनियादी रूप से द्वैत पर खड़े हुए हैं--यह शरीर तुम नहीं हो, तुम शरीर से अलग हो।
नहीं, क्रोध भी मैं हूं। जो कुछ भी है, मैं हूं। और इसलिए लड़ाई किससे लेनी है? और लड़ाई लेगा कौन? यह कोई सवाल नहीं है। इतना ही हो सकता है कि मैं जो हूं, उसे मैं पूरा नहीं जानता हूं, बहुत सा हिस्सा अंधेरे में, छाया में दबा पड़ा है, वह भी मैं हूं, उसे मुझे जानना चाहिए। उसे मैं पूरा जानूं, तो शायद जीना ज्यादा सुंदर, ज्यादा सरल, सहज और आनंदपूर्ण हो जाए। तो सिर्फ उसे पूरा जान लूं। जानने में ही जो विलीन हो जाएगा, वह बात अलग। जानने में जो बच जाएगा, वह पूरा हो जाएगा, बात अलग।
लेकिन पुरानी सारी साधना आज तक की, सारी दुनिया की, द्वंद्व को लेकर चलती है, वहीं से वह शुरू होती है। वह लड़ाई को मान कर चलती है। और लड़ाई को मान कर चली हुई कोई भी साधना अंततः और गहरी लड़ाई में ही ले जाएगी, और कहीं पहुंचा नहीं सकती। और जितना कष्ट और जितनी पीड़ा इस द्वंद्व ने पैदा की है जगत में, उतनी किसी और बात ने पैदा नहीं की है। बहुत कष्ट और पीड़ा पैदा की है। इतनी आत्मग्लानि और इतनी आत्महीनता पैदा की है! और वह तरकीब ऐसी है, जैसे हमने कुत्ते को उसकी पूंछ पकड़ने की धुन पकड़ा दी हो--कि जब तक तू अपनी पूंछ नहीं पकड़ लेगा, तेरा जीवन व्यर्थ है। अब वह कुत्ता अपनी पूंछ पकड़ने के लिए उछलकूद मचा रहा है। झपटता है, तो लगता है कि आई पकड़ में। लेकिन वह जितना झपटता है, उतनी पूंछ पीछे फिर फिंक जाती है। अब वह पागल होने के रास्ते पर पड़ा है, कुत्ता पागल होगा। या तो पागल होगा, या पाखंडी हो जाएगा। पूंछ रखे रहेगा, कहेगा: हां, मैंने पकड़ ली। मैंने पकड़ ली! मैंने पूंछ पकड़ ली! और वह जानता है कि पूंछ तो पकड़ी नहीं है। अब वह धोखा देगा। और या फिर यह होगा कि वह पागल हो जाएगा, तब यह झंझट छूटेगी।
पागल होना भी हमारे व्यक्तित्व की आखिरी कोशिश है हमें उससे मुक्त करने की जो हमने जबरदस्ती थोप लिया है। इट इज़ लास्ट सॉल्युशन। यानी जब कुछ नहीं कर पाता है हमारा चित्त, तो फिर यही है रास्ता कि ठीक है भई, इस आदमी को पागल कर दो, ताकि यह झंझट से छूट जाए। वह आखिरी कोशिश है।
तो पागलपन, यह बड़ी कृपा है ऐसे प्रकृति की। अगर वह भी न हो, तब हम कहां पहुंचेंगे, कहना मुश्किल है। हम कहां पहुंच जाएं, बहुत मुश्किल है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
अगर हमने एफर्ट बनाया है जाग्रत रहना, तब तो वह बार-बार खो सकता है। क्योंकि कोई भी एफर्ट जो है, वह सतत नहीं हो सकता है। एफर्ट कोई भी सतत नहीं हो सकता है। श्रम कोई भी सतत नहीं हो सकता है, विश्राम करना पड़ेगा। यानी अगर मैं मिट्टी खोदता हूं आठ घंटे, तो आठ घंटे खोद लूंगा, फिर मुझे दस घंटे सोना पड़ेगा। तब मैं फिर इस योग्य होऊंगा कि मिट्टी खोदूं। मिट्टी खोदना चौबीस घंटे नहीं चल सकता। कोई भी श्रम चौबीस घंटे नहीं चल सकता। क्योंकि जैसे ही वह श्रम बना, उससे विश्राम की जरूरत पड़ जाएगी।
इसलिए जो भी संत संतत्व को श्रम बना लेते हैं, उनको फिर छुट्टी लेनी पड़ेगी संतत्व से। और वह छुट्टी लेनी हमको पाखंड मालूम पड़ेगा--कि वह आदमी सबके सामने तो कहता था सिगरेट पीना बुरा है; और दरवाजा बंद करके सिगरेट पी रहा था! तो वह हमको पाखंडी लगता है। वह बेचारा सिर्फ छुट्टी ले रहा है। सिगरेट न पीना एक श्रम था उसको। अब वह श्रम शिथिल होगा। एक जगह जाकर आएगा कि वह कहेगा कि अब विश्राम करो। तो उसको सिगरेट पीनी पड़ेगी।
हां, जो मैंने यह कहा कि जो सहज-सहज जागते चले जाना है। यह जागरण जैसे ही आ जाता है, इसके लौटने का कोई सवाल ही नहीं है। क्योंकि इसको आप लाए नहीं हैं, यह आया है। और धीरे-धीरे-धीरे-धीरे जागरण और आप दो चीजें नहीं रह गए हैं, आप ही जागरण हो गए हैं। आपने क्रोध तक को दूसरा नहीं माना, तो जागरण को दूसरा मानने का क्या सवाल है! वह धीरे-धीरे आप ही हो गए हैं, आप ही हैं। उसके लौटने का कोई प्रश्न नहीं है, उसके लौटने का कोई सवाल नहीं है।
जो भी हमने जान लिया है--जान लिया है--उससे पीछे लौटने का सवाल नहीं है। उसको फिर अनजाना नहीं किया जा सकता। उसे अनजाना करना मुश्किल है। हां, जो हमने न जाना हो, ऐसे ही सीख लिया हो जबरदस्ती, वह कल फिर डांवाडोल हो सकता है। लेकिन जो मैंने जान लिया है--जैसे एक बच्चे ने प्रेम जान लिया, नहीं जाना था अब तक, अब उसने प्रेम जान लिया। अब वह प्रेम को अनजाना नहीं कर सकता। उसका अनजाना होना अब असंभव है। जानना जो है, चूंकि वह हमारा हिस्सा ही हो जाता है, वह हमसे कहीं अब छूट सकता नहीं। हां, जानना ऐसा हो सकता है कि उसने प्रेम की चार किताबें पढ़ ली हों और प्रेम के संबंध में कुछ जानना सीख लिया हो, वह अनजाना कल हो सकता है।
जागरण के प्रयोग से धीरे-धीरे-धीरे-धीरे जो भी हममें होता है, तो जागरण कोई ऐसी क्वाालिटी नहीं है जो बाहर से आकर आपसे जुड़ जाती है, बल्कि आपका ही इनर बीइंग है जो धीरे-धीरे प्रकट हो जाता है। यह कोई ऐसी चीज होती कि आपके खीसे में रख दी गई, तो गिर सकती थी, खो सकती थी, जा सकती थी। यह आप ही थे जो रि-डिस्कवर हो गए। यह आप ही थे जो आपने उघाड़ लिया अपने को। अब, अब कोई सवाल नहीं रहा।
मगर बाह्य परिस्थिति कुछ उलटी-सुलटी हो, तो उसमें फिर उसके रिएक्शंस में कुछ फर्क नहीं पड़ता?
वह उलटी-सुलटी हो तो रिएक्शंस में फर्क पड़ेगा, अगर यह जागरण आपने साधा हो। तो साधने के लिए अनुकूल, प्रतिकूल परिस्थितियां फर्क ला देंगी। क्योंकि वह जो साधा था, तो साधने के लिए अनुकूल परिस्थिति चाहिए थी।
एक आदमी मौन हो गया जंगल में बैठ कर। तो जंगल की स्थिति में मौन रह सकता है वह, बाजार में लाओ तो झंझट में पड़ जाएगा। क्योंकि वह मौन जो है एक कंडीशनिंग है। वह जंगल की एक खास परिस्थिति में उसने मौन को संस्कारित कर लिया है। अब उसको आप बाजार में ले आओ, तो मुश्किल पड़ गई। लेकिन एक आदमी है जो बाजार में, जंगल में, सब में घूमते-डोलते हुए मौन हो गया है। बाजार में भी आया है, जंगल में भी गया है; गांव में भी है, शहर में भी है; लड़ भी रहा है, झगड़ भी रहा है; और मौन हो गया है। वह सारी परिस्थिति में, उसने कोई विशेष परिस्थिति की मांग नहीं की है साधने के लिए। तो कोई विशेष परिस्थिति उसकी साधना को तोड़ नहीं सकती।
यानी हमने जो साधते वक्त मांगा हो, तो फिर झंझट होगी। हमने अगर कहा हो कि भई मैं तो पत्नी से दूर रह कर ही ब्रह्मचर्य को उपलब्ध हो सकता हूं। तो फिर यह ब्रह्मचर्य मुश्किल में पड़ जाएगा, कल अगर पत्नी पास आ गई। तो फिर दिक्कत की बात है। क्योंकि उसकी तो कंडीशनिंग थी, वह शिथिल होते ही से बहुत मुश्किल में पड़ जाएगा।
स्वामी राम अमेरिका से लौटे, तो उनकी पत्नी उनसे मिलने गई। ऐसा आते देखा पत्नी को, सरदार पूर्ण सिंह उनके पास रहते थे, उनसे कहा, दरवाजा लगा दो!
तो सरदार पूर्ण सिंह ने कहा, हैरानी की बात है! आपको मैंने हजारों स्त्रियों से मिलते देखा, आप कभी भयभीत नहीं हुए। इस गरीब औरत ने क्या बिगाड़ा है? क्या यह अभी भी आपकी पत्नी है? और आप तो कहते हैं कि छोड़-छाड़ कर चले गए! बात खतम हो गई। अब यह एक सामान्य स्त्री है, जैसी और स्त्रियां हैं।
पूर्ण सिंह ने कहा, अगर आप अपनी पत्नी से नहीं मिलोगे, तो मैं भी आपको नमस्कार करता हूं। क्योंकि यह मेरी समझ के बाहर है। अभी तक आप कहते हैं, सब में ब्रह्म है। आज अचानक इस स्त्री में ब्रह्म नहीं रहा? दरवाजा बंद करवाते हैं, इसके लिए खास इंतजाम करते हैं! यह कुछ खास है?
और खास है वह। क्योंकि वह जो साधा है, इसको छोड़ कर साधा है। इसके आने से वह डांवाडोल हो सकता है। यानी इस स्त्री को विशेष स्वीकृति मन की है, क्योंकि इसकी तरफ पीठ करके कुछ साधा गया है। मुंह करने से वह डोल सकता है, गिर सकता है, खंडित हो सकता है।
तो अगर आपने कोई अनुकूल परिस्थिति मांगी है साधना में, तो कल प्रतिकूल परिस्थिति होने पर आप मुश्किल में पड़ जाएंगे। इसीलिए मेरा कहना है, कोई विशेष परिस्थिति मत मांगो। जो परिस्थितियां आती हैं, जिनमें जीना ही पड़ता है, उनमें ही जीओ और जानते रहो। इस सबसे तोड़ कर अपने को मत ले जाओ। नहीं तो कल फिर झंझट है, फिर वापस लौटना हो सकता है।
साधु पतित होते हैं, क्योंकि वे साधु ही नहीं होते। और पतित होने का कुल कारण इतना होता है कि एक विशेष घेरा बना कर उसमें किसी तरह खड़े होकर अपने को साध लेते हैं। वह घेरा कल टूटता है। टूटेगा, फिर मुश्किल हो जाएगी, फिर कठिनाई हो जाएगी। फिर थोड़ा सा भी उसमें फर्क, और सब डांवाडोल हो जाएगा। असल में इसीलिए मैं कहता हूं कि वह कोई जानना-वानना नहीं था। एक कवायद थी, जो सीख ली थी। वह काम दे गई कवायद के वक्त, फिर बेकार हो गई।
यह तो मानसिक से ही होगा यह सारा इंटीग्रेटेड, होल ऑफ दि बॉडी।
असल में यह भी हमारा जो खयाल है--मानसिक, शारीरिक, आत्मिक--यह सब बचकाना है। यह सब कामचलाऊ डिवीजन है। ऐसा कोई डिवीजन कहीं है नहीं।
नहीं, मगर समझ लीजिए कि ऐसी परिस्थिति में आ गए, तो मानसिक तो इंटीग्रेटेड हो गए। तो बॉडी का भी जो है, विल नॉट दैट बी आल्सो कंप्लीटली फ्री फ्रॉम डिजीजेज ऑर एनीथिंग लाइक दैट?
जरूरी नहीं है। बहुत दूर तक काम करेगा यह। बहुत दूर तक काम करेगा। अगर माइंड बहुत इंटीग्रेटेड है, तो बॉडी पर माइंड के डिसइंटीग्रेशन से जो-जो नुकसान होते थे, वे नहीं होंगे। लेकिन बॉडी पर और चीजों से जो नुकसान होने वाले हैं, वे होंगे।
कोई गोली चला कर मार देगा आपको, तो आपका इंटीग्रेटेड माइंड कुछ भी नहीं कर लेगा। गोली तो छेदेगी और शरीर कट जाएगा। मतलब अगर हम ठीक से देखें, तो शरीर हमारा बाहर के जगत से प्रतिपल जुड़ा हुआ है।
सच बात तो यह है कि हम अपने शरीर को कहां खतम करें, यह कहना बहुत मुश्किल है। यानी यह जो चमड़ी की सीमा आ जाती है, यह मेरे शरीर की सीमा है, यह कहना बिलकुल नासमझी है। बिलकुल नासमझी है। क्योंकि यह पूरी हवा का जो चारों तरफ फैलाव है, यह मेरे शरीर का हिस्सा है। अगर यह सारी हवा यहां से अलग कर ली जाए, तो मैं एक सेकेंड नहीं जी सकूंगा। वह जो दूर सूरज है दस करोड़ मील दूर पर, वह मेरे शरीर का हिस्सा है। अगर वह वहां ठंडा हो जाए, तो मैं यहां ठंडा हो जाऊंगा। वह सारा उत्ताप तो उससे मुझे आ रहा है।
तो मेरा शरीर क्या है? अगर बहुत गौर से हम देखें, और अगर मैं को हम केंद्र मान लें, तो सारा का सारा यूनिवर्स मेरा शरीर है। कहां हम उसको खतम करें, किस जगह पर जाकर?
इंटर-डिपेंडेंस है।
हां। तो यह जो सारा का सारा इंपैक्ट है, यह तो कोई आपके इंटीग्रेशन, डिसइंटीग्रेशन से इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। यह फर्क पड़ेगा उतना कि शरीर पर करीब-करीब सौ में से पचास मौकों पर बीमारियां भीतर की तरफ से आ रही हैं। ये भीतर की तरफ से आनी वाली बीमारियां तो विलीन हो जाएंगी। माइंड की कांफ्लिक्ट से शरीर पर जो असर पड़ रहा है, वह तो विलीन हो जाएगा। लेकिन बाहर के जगत के संघर्षण से जो असर पड़ रहा है, वह विलीन होने वाला नहीं है।
इसलिए महावीर भी मरेंगे, बुद्ध भी मरेंगे। और अरविंद जैसे लोग पागलपन की बातें सोचेंगे कि हम फिजिकली इम्मार्टल हो गए, और फिर मर जाएंगे! अब इस तरह के लोगों को सिर्फ एक ही फायदा है कि जिंदा-जिंदा तो आप उनसे कोई झगड़ा नहीं कर सकते, क्योंकि वे कहते हैं हम फिजिकली इम्मार्टल हैं। और मर जाते हैं, तब झगड़ा करने को कोई बचता नहीं है। तो कोई भी दावा कर सकता है कि मैं फिजिकली इम्मार्टल हूं। इसमें कोई झंझट ही नहीं है। क्योंकि मैं भी दावा कर दूं कि मैं शरीर से अमर हूं, तो आप कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं। क्योंकि जब तक मैं हूं, तब तक तो दावा मेरा सही है। और जब मैं मर गया, तो आप किससे झगड़िएगा?
तो शरीर जो है, वह तो अगर हम गौर से देखें तो उसमें दो तरह के प्रभाव आ रहे हैं। एक भीतर की तरफ से आने वाले। लेकिन ऐसा मत सोचें कि भीतर की तरफ कोई दूसरी एनटाइटी बैठी है। सिर्फ भीतर की तरफ--जैसे मैंने श्वास ली, एक श्वास वह है जो बाहर से भीतर की तरफ गई, एक श्वास वह है जो भीतर से बाहर की तरफ गई। वे एक ही श्वास के दो प्रवाह हैं, जैसे लहर आई और गई। तो एक तो भीतर से बाहर की तरफ आने वाले प्रभाव हैं, उनको हम मानसिक कह दें। बाहर से भीतर की तरफ आने वाले प्रभाव हैं, उनको हम शारीरिक कह दें।
तो जितने मानसिक प्रभाव हैं द्वंद्व के, जो शरीर को तोड़ते हैं, वे विलीन हो जाएंगे। तो शरीर मानसिक रोगग्रस्त तो नहीं होगा। फिर बाहर से आने वाले प्रभाव हैं, वे जारी रहेंगे। उनसे अगर बचना है, तो विज्ञान से सलाह लेनी पड़ेगी।
तो फिर उसके लिए विज्ञान के हिसाब से प्लानिंग करनी पड़ेगी।
बिलकुल ही, बिलकुल ही करनी पड़ेगी।
इतना लक्ष्य तो रखना ही पड़ेगा।
हां, बिलकुल ही रखना पड़ेगा।
नहीं रखने से आत्महिंसा की स्थिति हो जाएगी।
हो ही रही है। साधु-संन्यासी जितनी हिंसा कर रहे हैं शरीर के साथ, शायद ही कोई कर रहा हो! एकदम, जिसको मैसोचिस्ट कहें, वे हैं पूरे के पूरे। और ये सब बातें भी बड़ी खतरनाक हैं, अगर खयाल में बैठ जाएं। असल मतलब यह है कि हमने चीजों को तोड़-तोड़ कर ऐसे कंपार्टमेंट बना लिए हैं, जो कि वस्तुतः नहीं हैं। बाहर और भीतर कामचलाऊ बातें हैं। यानी एक डिवीजन करने में उपयोगी हैं। लेकिन बाहर यानी क्या है? और भीतर यानी क्या है? एक ही चीज के बाहर-भीतर होते आंदोलन हैं। और चूंकि मैं अपनी तरफ से खड़े होकर देखता हूं, इसलिए जो मुझे भीतर दिखाई पड़ता है वह आपके लिए बाहर है और जो आपके लिए भीतर दिखाई पड़ता है वह मेरे लिए बाहर है। तो वे बिलकुल ही रिलेटिव कंसेप्शंस हैं, एक ही चीज है।
अगर यह बहुत साफ हो जाए, तो विज्ञान और धर्म दो चीजें नहीं रह जाते। अगर बाहर और भीतर एक हो जाता है, तो हम जानते हैं कि बाहर जाता हुआ जो प्रवाह है, उसके संबंध में जानना, समझना, खोजना धर्म है; भीतर की तरफ आता हुआ बाहर से जो प्रवाह है, उसे जानना, समझना, खोजना विज्ञान है। और किसी दिन जब कि यह शरीर और आत्मा का द्वैत, पदार्थ और परमात्मा का द्वैत, दोनों विलीन हो जाएंगे, तो धर्म और विज्ञान जैसी दो चीजें नहीं होंगी, एक ही चीज होगी। एक ही चीज होगी। और जिस दिन यह होगा, उसी दिन हम पूरी तरह से उस जगह खड़े होंगे, जहां चीजें साफ-साफ जानी गईं। नहीं तो नहीं जानेंगे।
धर्म को पाने के बाद भी विज्ञान की दृष्टि अगर कम हो, तो उसके जो परिणाम शरीर पर होने चाहिए, वे तो होंगे।
बराबर होने वाले हैं। उससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं।
तो उसके लिए भी खुद की जागरूकता होनी चाहिए।
होनी ही चाहिए। जरूर होनी चाहिए।
यह मैं खास पर्टिकुलर इसलिए पूछता हूं कि मैंने भी सफरिंग किया है बॉडी को निग्लेक्ट करने के कारण। तो साधना के योग के अंदर शरीर के प्रति कुछ ध्यान देना चाहिए कि नहीं?
बिलकुल पूरा ध्यान देना चाहिए, शरीर की पूरी फिक्र करनी चाहिए। असल में हमारी पूरी की पूरी भाषा रोगग्रस्त हो गई है। चूंकि वह द्वैत इस बुरी तरह से बैठ गया है कि जब मैं, जिसको कि कोई अंतर नहीं है दोनों में, वह भी बात करे, तो भी मुझे कहना पड़ता है: शरीर की फिक्र करनी चाहिए। और उसमें ऐसा भ्रम पैदा होता है कि आप कोई और हैं फिक्र करने वाले और शरीर कोई और है जिसकी फिक्र करनी है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
वही तो मैं कह रहा था इतनी देर से, वही तो मैं इतनी देर से कह रहा था कि अगर मेरे तीन पीढ़ियों में डायबिटीज चला आ रहा है, तो मेरे माइंड को क्या फर्क पड़ता है, इससे बॉडी को कोई मतलब नहीं है। बॉडी की हेरिडिटी तो बहुत और है और उसका अपना कांस्टीट्यूशन है। जैसे मेरे घर में बाल गिर जाते हैं पच्चीस साल के बाद सभी के, तो इससे क्या फर्क पड़ने वाला है, वह बाल मेरे गिरने वाले हैं।
मेरे तीन पीढ़ी से बाल गिरते रहे हैं और मेरे बाल गिर जाएंगे, इसमें वह जरा थोड़ा सा फर्क कर रहे हैं। विज्ञान अभी इस पर काम कर रहा है कि मेरे बच्चों के बाल नहीं भी गिरें!
वह दूसरी बात है, वह विज्ञान करेगा। वह मैं कह नहीं रहा हूं। कल यह भी हो सकता है कि बाल बिलकुल न गिरें। पर वह विज्ञान करेगा। उससे, मेरे माइंड में जो फर्क पड़े हैं, उससे कोई संबंध नहीं है। वह विज्ञान करेगा, वह ठीक है। कल दांत न गिरें, बाल न गिरें, आदमी बूढ़ा न हो, वह सब विज्ञान कर लेगा। लेकिन विज्ञान कुछ करेगा, तब वह होगा। समझे न आप?
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
यह जो मैं बात कर रहा हूं, यह बात ही नहीं है। मैं जो कह रहा हूं, वह यह कह रहा हूं, आप यह पूछ रहे हैं कि अगर भीतर मन शांत हो जाए, इंटीग्रेटेड हो जाए, तो क्या बॉडी परफेक्ट हो जाएगी? मैं आपसे कह रहा हूं कि नहीं हो जाएगी। बॉडी को तो परफेक्ट करने के लिए, विज्ञान जो करेगा, उससे ही कुछ होगा। नहीं तो महावीर न मरें, बुद्ध न मरें, कोई न मरे। और फिर हमें झूठी कहानियां गढ़नी पड़ती हैं।
महावीर को पेचिश हो गई मरते वक्त, छह महीने तक। और बड़ा मुश्किल हो गया सवाल जैनियों के सामने कि महावीर को और दस्त लगते हैं! और इतने दस्त लगे कि उससे ही वे मरे! तो फिर कहानियां गढ़नी पड़ीं कि किसी ने जादू चला दिया है और किसी ने यह कर दिया है और किसी ने वह कर दिया है।
अब ये सब फिजूल की बातें हैं, इससे कोई मतलब नहीं है। महावीर को क्यों पेचिश नहीं हो सकती? पेचिश होना बिलकुल और मामला है। और वह बिलकुल ही और तल की बात है, उससे महावीर का कोई लेना-देना नहीं है।
व्हेन ए पर्सन इज़ इंटीग्रेटेड एंड होल, ही शुड बी परफेक्ट इन आल डायमेंशंस। दैट इज़ अवर एजम्पशन।
बिलकुल गलत बात है। और दूसरा मामला यह है, दूसरा मामला यह है कि परफेक्शन के हमारे बड़े डेड कंसेप्ट हैं। वे भी डायनेमिक नहीं हैं, वे भी बड़े डेड कंसेप्ट हैं। अब सच बात यह है कि जब महावीर पैदा हुए हैं, तो मरेंगे। और मरना इम्परफेक्शन है, यह कौन कहता है? यानी सवाल यह है कि एक आदमी पैदा हुआ, तो परफेक्शन तो यही है कि एक सर्किल पूरा करेगा और मरेगा।
एक वृक्ष पर पत्ते लगते हैं वसंत में, तब आप कहते हैं परफेक्ट। और जब पतझड़ में सब पत्ते गिरते हैं, तब आप क्या कहते हैं--इम्परफेक्ट? यह अब भी परफेक्ट है। और परफेक्ट का मतलब यह है कि जिस तरह पूरे पत्ते खिले थे और लगे थे, उसी तरह पूरे पत्ते गिर जाएं, तो यह भी परफेक्शन है। इसमें इम्परफेक्शन कहां आ गया? अधूरे पत्ते गिर जाएं, कच्चे गिर जाएं, तो इम्परफेक्शन! नहीं तो यह भी परफेक्शन है। पैदा हुआ था वृक्ष, यह भी एक यात्रा थी परफेक्शन की; कल मरेगा, यह भी यात्रा उसी की है।
लेकिन हमारे मोह हैं!
अब जैसे समझ लो कि मेरे शरीर में एक बीमारी हो गई। मेरे शरीर में एक बीमारी हो गई और करोड़ों कीटाणु उस बीमारी में पैदा हुए हैं और वे जी रहे हैं। हमारे लिए बीमारी है। उन करोड़ों कीटाणुओं के लिए नये जीवन का आविर्भाव है। उनका आविर्भाव चल रहा है। हम कहते हैं कि यह बड़ी इम्परफेक्ट बॉडी हो गई।
हो सकता है कि पृथ्वी पर हम सब इसी तरह के कीटाणु हों, जो एक बड़ी बॉडी पर अपना पोषण कर रहे हैं। हमारी बॉडी पर भी करोड़ों कीटाणु जी रहे हैं। यह जो बाहर का सारा जगत है, इसमें परफेक्शन भी हमारी डिजायर का परफेक्शन है। यानी हमारी कामना यह है कि शरीर ऐसा हो कि बीमारी न आए। लेकिन क्यों? हमारी कामना ऐसी है कि शरीर ऐसा हो कि वृद्ध न हो। लेकिन क्यों? हमारी कामना ऐसी है कि शरीर ऐसा हो कि मरे न। लेकिन क्यों? वह जो हमारे भीतर के सब भय और सब दुख और पीड़ाएं हैं, उन सबसे बचने की हमने यह परफेक्शन की कामना की है। लेकिन क्यों?
वह जितना माइंड इंटीग्रेटेड होगा भीतर, तो शरीर परफेक्ट नहीं हो जाएगा, लेकिन शरीर का जो जैसा है, वह सब स्वीकृत हो जाएगा। एक सहज स्वीकृति उसकी भी हो जाएगी। बुढ़ापा है, तो उसकी एक सहज स्वीकृति होगी। मृत्यु है, तो उसकी एक सहज स्वीकृति होगी। और वैसा आदमी उतने ही आनंद से मरेगा, जितने आनंद से जीया था। यह तो समझ में आने वाली बात है। लेकिन मरेगा नहीं, यह निपट नासमझी की बात है। मरेगा तो ऐसे ही आनंद से मरेगा जैसे जी रहा था--उतने ही आनंद से। बीमारी में भी वह उतना ही शांत जीएगा, उसी तरह उठेगा-बैठेगा, जैसा वह स्वास्थ्य में था। यह जो भीतर उसका मन है, इसकी अगर एक स्थिति बन जाए, तो जीवन की हरेक स्थिति के प्रति एक सहजता की भाव-दशा पैदा होती है।
और शरीर पर जो कुछ होने वाला है, अगर उसमें कोई भी फर्क करना है, तो उसके लिए तो विज्ञान कुछ करेगा, उसका धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है। हां, जितनी बीमारियां मन से पैदा होकर आती हैं--और बहुत बीमारियां आती हैं--वे विलीन हो जाएंगी। यानी इस बात की संभावना बहुत कम है कि उस तरह की बीमारियां आनी शुरू हों, जो मन से आती हैं। जैसे एक आदमी भयभीत है, और भयभीत होने की वजह से उसके हाथ कंप रहे हैं। अब यह नहीं होगा उसको, क्योंकि भय कहां होने वाला है उसे। वह जानने से ही...
नहीं तो हमारे मुल्क में बड़ी गलत धारणा पैदा हो गई है योग के बाबत। यह धारणा पैदा हो गई है कि वह कुछ...
शरीर की बीमारी के लिए विज्ञान है। तो धर्म किस बीमारी का इलाज है? और धर्म क्या है?
मेरा तो कहना ही यह है कि जिस दिन भीतर का विज्ञान पूरा साफ-साफ होगा, धर्म विदा हो जाएंगे, उनकी कोई जरूरत नहीं रह जाती। धर्म जो है उसी दिशा में अवैज्ञानिक ढंग से अब तक की गई खोज-बीन का नाम है। कल अगर वैज्ञानिक दृष्टि से उस दिशा में खोज-बीन हो जाती है, धर्म वहां-वहां से विदा होता चला जाएगा। जिसे आज आप विज्ञान कह रहे हैं, कल धर्म वहां भी दावेदार था। कल वह बताता था कि पानी कब गिरेगा, और पृथ्वी चलती है कि नहीं चलती है।
आज भी धर्म की मीनिंग क्लियर नहीं है।
धर्म का हमेशा एक ही मीनिंग है। आज और कल और परसों का सवाल नहीं है। जो मैं अभी कह रहा था कि वह जो हमारा अंतर्जगत है, उस अंतर्जगत के ज्ञान की, उस अंतर्जगत को जानने की, उस अंतर्जगत को उसकी परिपूर्णता में जीने की और होने की पद्धति का नाम धर्म है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
आप मेरी बात नहीं समझे। मेरा कहना यह है कि जितना ज्यादा अज्ञान होगा जगत में, धर्म का क्षेत्र उतना बड़ा होगा। क्योंकि धर्म तब सब चीजों को छुएगा। फिर जैसे-जैसे जिस-जिस क्षेत्र में ज्ञान बहुत सुनिश्चित, व्यवस्थित और वैज्ञानिक होता चला जाएगा, वहां-वहां से धर्म हटता चला आएगा। कुछ क्षेत्रों से बिलकुल हट गया। हट गया, ठीक है, वहां विज्ञान खड़ा हो गया है।
आज नहीं कल, हम भीतर भी खोज-बीन करते चले जाते हैं, और जब भीतर भी चीजें बहुत साफ और स्पष्ट हो जाएंगी, तो धर्म की वहां भी कोई जरूरत नहीं रह जाती। या अगर हम उसको धर्म कहेंगे, तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
असल में मुश्किल क्या होती है कि वेद बड़ी चीज है। वेद में हजार तरह की चीजें हैं। उसमें उस जमाने का सोशल कोड भी है, कानून भी है, उस जमाने की नीति-व्यवस्था भी है, सब कुछ है। असल बात यह है कि वेद उस जमाने की अकेली किताब है। जो भी था, सब उसमें इकट्ठा है। उसमें लोकगीत भी है, लोककथा भी है। उसमें सब इकट्ठा है। उसमें इतिहास भी है, पुराण भी है। सब इकट्ठा है। और स्वाभाविक है, क्योंकि वह प्राथमिक आदमी की चेष्टा है। पहली दफा लिखा जा रहा है, सब लिख लिया, जो भी है।
धीरे-धीरे, धीरे-धीरे स्पेशलाइजेशन होता है, चीजें टूटती हैं अलग-अलग। तो नीति अलग चली जाती है, समाजशास्त्र अलग चला जाता है, विज्ञान अलग चला जाता है, भूगोल अलग चला जाता है, ज्योतिष अलग चला जाता है। फिर सब अलग-अलग होते चले जाते हैं। इसमें धर्म की भी अपनी एक यात्रा है, जो अलग चली जाती है।
और वेद के कुछ वचन हैं जो धर्म के वचन हैं। सारा वेद धर्म नहीं है। वे वचन धर्म के हैं जो मनुष्य के अंतस-लोक से कुछ संबंध रखते हैं, वहां की जो खोज-बीन करते हैं। वहां के संबंध में उस समय के आदमी का जो अनुभव है, उसको कहते हैं। वे वचन भर धर्म हैं।
तो इंडियन पेनल कोड नहीं है धर्म। इंडियन पेनल कोड समाज की नीति-व्यवस्था है, समाज की राज-व्यवस्था है। वेद में वह भी है।
वह भी है और उसको धर्म समझा गया था अभी तक। और आज भी समझा जाता है।
वह कठिनाई क्या होती है कि वह धर्म-पुस्तक थी। धर्म-पुस्तक से उस दिन मतलब ही यह था। मैंने कहा कि जितना अज्ञान होगा, उतना धर्म सब क्षेत्रों को छुएगा।
जैसे अभी कल तक, हम कहते थे--केमिस्ट्री। तो केमिस्ट्री के सब क्षेत्र छूते थे। आज समझिए कि आर्गनिक केमिस्ट्री अलग है और इनआर्गनिक अलग है और कुछ अलग है। आज जिसे हम आर्गनिक केमिस्ट्री कह रहे हैं, कल वह दस हिस्सों में टूट सकती है। और ज्ञान जैसे बढ़ता है, वैसे खंड-खंड होते चले जाते हैं। आज भी आप विज्ञान की डाक्टरेट को पीएच.डी. की डिग्री दिए चले जा रहे हैं। वह तीन सौ साल पहले की बात है, जब आप डाक्टर ऑफ फिलॉसफी कहते थे। कोई भी आदमी...क्योंकि फिलॉसफी यानी सब कुछ था। पर अब भी आज एक आदमी केमिस्ट्री में कर रहा है पीएच.डी. और उसको आप कहे चले जा रहे हैं डाक्टर ऑफ फिलॉसफी!
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
हां, ठीक। तो यह वैसा ही मामला है। वेद जो है, वह प्राथमिक संकलन है। सच तो यह है कि उस समय का विश्वकोश, उस समय जो जानकारी थी, सब इकट्ठी हो गई है उसमें। उसको पूरे को धर्म कहना आज गलत है। उस दिन तो ठीक रहा होगा, आज गलत है, क्योंकि उसमें से अब बहुत थोड़ा सा ही धर्म बचा। बाकी सब तो अलग हिस्सों ने ले लिया। उन्होंने अलग क्लेम कर लिया अपना-अपना। जिसको मैं धर्म कह रहा हूं, वह जो अंतस की खोज की निरंतर चेष्टा है आदमी की, उसको मैं धर्म कह रहा हूं। और मेरा मानना है कि जितना वह अंतस की खोज भी वैज्ञानिक होती चली जाए, उतना धर्म को अलग होने की कोई जरूरत नहीं रह जाती। एक दिन ऐसा आ सकता है कि दो तरह के विज्ञान हों--बाहर की खोज करने वाला, भीतर की खोज करने वाला। उसको चाहे विज्ञान कहो, चाहे धर्म कहो, उससे कोई अंतर नहीं पड़ने का है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
रिलीजन कहें कि साइंस कहें, यह बहुत बेमानी है। यह जो दो शब्दों का जो फासला है, वह भी पिछले अतीत इतिहास की वजह से पैदा हो गया है। हम उसे क्या कहते हैं, यह मेरे लिए बहुत मूल्य का नहीं है। हम उसे साइंस कहें कि रिलीजन कहें, कुछ भी कहें। अब तक वे दो रहे हैं। और अब तक दोनों की मेथडोलॉजी में बुनियादी फर्क रहा है। लेकिन जैसे-जैसे साइंस भी आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे एक अर्थ में रिलीजन का फील्ड सिकुड़ता चला जाता है। और ठीक है, सिकुड़ जाना चाहिए। क्योंकि उसने सारा सब कुछ घेरा हुआ था, जो उसका था ही नहीं। वह वहां से हट जाएगा। लेकिन कुछ है जो उसका है। और वह ‘कुछ है’ से कभी हटने वाला नहीं है। वह जो कुछ है, वह उसका जो अपना है, उससे वह कभी हटने वाला नहीं है।
लेकिन मेरा मानना है कि साइंस जैसे-जैसे विकसित होती है, वह उस ‘कुछ’ की दिशा में भी बहुत कुछ कर सकेगी। और उस हालत में, उस बिंदु पर जहां रिलीजन का कुछ अपना है, जिसको मैं मेडिटेशन कहूं, समाधि कहूं, वह उस तरह के जो सारे के सारे उसकी सब्जेक्टिविटी के जो प्रयोग हैं। साइंस का सारा का सारा प्रयोग ऑब्जेक्टिविटी के लिए है। ऑब्जेक्टिविटी है। और जो धार्मिक लोग उसे इनकार करें और माया कहें, उनको मैं समझता हूं बकवास कर रहे हैं। सब्जेक्टिविटी भी है। और जो वैज्ञानिक उसे इनकार करें और कहें कि नहीं है, मैं कहता हूं, वे बकवास कर रहे हैं। और यह बकवास एक ही चीज की रिएक्शन है। एक ने, जिसने ऑब्जेक्टिविटी को इनकार किया है, तो ऑब्जेक्टिविटी वाले को लगता है कि सब्जेक्टिविटी वगैरह कुछ भी नहीं है।
वह जो सब्जेक्टिव होना है, वह जो मेरा होना है, वह भी है। मैं जो जान रहा हूं, वह भी है; और जो जान रहा है, वह भी है। किसी न किसी अर्थ में वह है। अब इस जानने वाले को कैसे जाना जाए? निश्चित ही इसको जानने का मेथड वही नहीं हो सकता, जो ऑब्जेक्ट्स को जानने का मेथड होगा। इसके जानने के मेथड में बुनियादी फर्क पड़ेगा। क्योंकि मैं कभी भी, किसी भी स्थिति में, खुद के लिए तो ऑब्जेक्ट बन ही नहीं सकता। दूसरे के लिए मैं ऑब्जेक्ट बन सकता हूं।
तो अभी साइकोलॉजी जो कर रही है, वह मनुष्य की सब्जेक्टिविटी के साथ भी ऑब्जेक्टिव जैसा प्रयोग कर रही है। क्योंकि वह सारे के सारे मेथड साइंस के प्रयोग कर रही है। साइंस के जितने मेथड हैं, वे बेसिकली ऑब्जेक्टिव होने को बाध्य हैं। क्योंकि उसके बिना वे साइंटिफिक नहीं रह जाते, हवा में सब खो जाती है बात, कुछ पता नहीं चलता कि क्या हुआ। तो साइकोलॉजी अभी जो प्रयोग कर रही है, उसने रिलीजन का तो क्षेत्र लिया हुआ है और साइंस के मेथड लिए हुए हैं!
तो साइंस के मेथड से हम दूसरे व्यक्ति की जो सब्जेक्टिविटी है, उसको बाहर से कितना ऑब्जर्व कर सकते हैं? और उसका ऑब्जर्वेशन बिहेवियर ही हो सकता है, और तो कुछ हो नहीं सकता। बिहेवियर को ही हम ऑब्जेक्टिव बना सकते हैं। लेकिन जिसका बिहेवियर है, वह फिर छूट जाता है, वह बच जाता है, वह कहीं खिसक जाता है।
यह जो निरंतर छूट जाने वाला है, इसे जानने के लिए कुछ और ही रास्ता खोजा है धर्म ने। उसे वे मेडिटेशन कहते हैं। उसे वे यह कहते हैं कि उसे हम तब जान सकते हैं, जब कि सारे ऑब्जेक्ट चेतना से विलीन हो जाएं। ऑब्जेक्ट ही न हो, सिर्फ सब्जेक्टिविटी ही रह जाए। तो वह जो ध्यान है, अटेंशन जो है, चूंकि ऑब्जेक्ट पर अटकी हुई थी, अगर सारे ऑब्जेक्ट विलीन हो जाएं, तो वह जो अटेंशन है, वह वापस लौट आती है। क्योंकि वह कहां जाएगी? उसके लिए कोई ऑब्जेक्ट नहीं मिलता, तो वह अपने पर ही वापस लौट आती है। वह जो लौटती हुई चेतना है, वह स्वयं को अनुभव करवाती है। वह स्वयं-संवेद संभव हो पाता है।
यह जो बात है, यह बात अनिवार्य रूप से एंटी-साइंटिफिक नहीं है, नॉन-साइंटिफिक हो सकती है। यह जो बात है, यह अनिवार्य रूप से एंटी-साइंटिफिक होती, तब तो यह होता कि या तो विज्ञान जीतेगा तो फिर यह धर्म विलीन हो जाएगा और या फिर धर्म जीतेगा तो विज्ञान नहीं घुस पाएगा। इसे मैं कहता हूं कि यह नॉन-साइंटिफिक हो सकती है, एंटी-साइंटिफिक नहीं है। इसके एंटी-साइंटिफिक होने की कोई वजह नहीं है। और कल अगर विज्ञान विकास करते-करते उस जगह आता है, जहां वह यह अनुभव करता है कि जिस तरह ऑब्जेक्ट को जानने का ऑब्जेक्टिव ऑब्जर्वेशन रास्ता था, उस तरह सब्जेक्ट को जानने का सब्जेक्टिव इंट्रोस्पेक्शन और मेडिटेशन भी रास्ता हो सकता है, यह अगर विज्ञान को अनुभव होता है--और यह अनुभव होना बहुत कठिन नहीं है--तो फिर जो अनुभव अब तक हम धर्म कहते थे, उसे चाहे हम वैज्ञानिक कहने लगें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। या धर्म को विज्ञान कहने लगें, कोई फर्क नहीं पड़ता।
लेकिन मेरा मानना यह है कि चूंकि बुनियादी रूप से एक ही एनटाइटी है--ऐसा शरीर और आत्मा जैसी दो नहीं हैं, ऐसा पदार्थ और परमात्मा जैसी दो नहीं हैं, ऐसा क्रिएटर और क्रिएशन जैसी दो नहीं हैं--एक ही है, हम उसे क्या नाम देते हैं और किस तरफ से नाम देना शुरू करते हैं, यह बहुत ही औपचारिक बात है।
अगर हम विज्ञान की तरफ से नाम देना शुरू करते हैं, तो हम कल उसे कह सकेंगे कि वह विज्ञान है, भीतर का विज्ञान है। कुछ और कहेंगे--सुप्रीम साइंस कहें, इनर साइंस कहें, कुछ और नाम दे दें, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। या हो सकता है हम उसे साइकोलॉजी ही कहते चले जाएं, वह स्प्रिचुओलॉजी हो जाए, कुछ और हो जाए। यह गौण बात है। लेकिन एक बात जो गौण नहीं है, वह यह है कि एसेंशियली कुछ है हमारे भीतर, जो ठीक ऑब्जेक्टिव होने को बाध्य नहीं होता है और ऑब्जेक्ट को ट्रांसेंड करता मालूम पड़ता है। अगर वह ऑब्जेक्ट ही हो जाए, तब तो रिलीजन की कोई जगह नहीं रह जाती, बात खतम हो गई। रिलीजन जैसी चीज गलत थी, अज्ञान था। फिर साइंस रह जाती है। लेकिन अगर ऐसी कोई चीज है, व्हिच ट्रांसेंड्स नेसेसरिली दि ऑब्जेक्टिव, तो फिर रिलीजन बाकी रहेगा।
नाम बहुत गौण बात है, नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भी पसंद करूंगा कि उसे विज्ञान ही कहा जाए, क्योंकि दो-दो नाम रखने की कोई जरूरत नहीं है। हमें जहां तक बने कम से कम कंसेप्ट से और ज्यादा से ज्यादा उपयोग लेना चाहिए। उतनी सुविधा होती है। व्यर्थ का उपद्रव बचता है, व्यर्थ की कांफ्लिक्ट बचती है।
तो इस बात की बहुत संभावना है कि धर्म जैसा शब्द भी खो जाएगा। और इसीलिए संभावना है क्योंकि वह अनावश्यक हो जाएगा। लेकिन धर्म का एसेंशियल जो कंट्रीब्यूशन है, वह खोने वाला नहीं है। बल्कि शायद जब हम पूरी तरह साइंटिफिक ढंग से उस दिशा में इंगित कर पाएंगे, तो शायद पहली दफा बुद्ध या महावीर या पतंजलि पहली बार पूरी तरह साफ हो सकेंगे हमारे लिए। क्योंकि जिस टर्मिनालॉजी में वे बोले हैं, वह साइंस की नहीं है। क्योंकि साइंस की टर्मिनालॉजी ही नहीं थी। वे जिस टर्मिनालॉजी में बोले हैं वह या तो मेटाफिजिक्स की है, या मेटाफर की है, या पोएट्री की है। आदमी मजबूर है, जो टर्मिनालॉजी उपलब्ध हो, उसी में बोलना पड़ेगा। अगर मैं हिंदी के सिवाय कोई भाषा नहीं जानता हूं, तो मजबूरी है कि मैं जो भी बोलूंगा, वह हिंदी में बोलूंगा।
आज से दो हजार साल पहले जो भाषा थी हमारे पास, काव्य की थी, कहानी की थी। इस तरह की भाषा थी। उसी भाषा में कहने की जरूरत थी। तो मेरा मानना है कि रिलीजस एक्सपीरिएंस जैसे ही हुआ, उसको पोएट्री की भाषा में ही प्रकट करना पड़ा। वह लैंग्वेज की गड़बड़ है, जो आज कांफ्लिक्ट बढ़ रही है।
और अब जब कि साइंस की भाषा विकसित हो गई--ज्यादा एग्जेक्ट, ज्यादा मैथमेटिकल, ज्यादा साफ-सुथरी--तो अब पोएट्री की भाषा में रिलीजन को प्रकट करने की कोई जरूरत नहीं रह जाने वाली है। आज नहीं कल हम साइंस की भाषा में ही रिलीजन को प्रकट कर सकेंगे। उस हालत में, जिसको हम रिलीजन कहते रहे थे आज तक, वह सब विदा हो जाएगा। हो जाना चाहिए। लेकिन रिलीजस एक्सपीरिएंस एज सच, वह विलीन होने वाला नहीं है।
और इसलिए उसको हम क्या नाम देंगे, कोई फर्क नहीं पड़ता। रिलीजन कहें, साइंस कहें, कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन वह एक्सपीरिएंस ऑब्जेक्टिव एक्सपीरिएंस से कुछ पृथक अपनी सत्ता रखता है, उसकी अपनी आथेंटिसिटी है, यह मेरा कहना है। और इसलिए वह विदा होने वाला नहीं है। वह एक्सपीरिएंस विदा होने वाला नहीं है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
उसको ईच एंड एवरीबडी को प्रूव करने का न सवाल है, न प्रश्न है। वह तो जो प्रूव करना चाहे उसे उतरना पड़ेगा उस दिशा में।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
न-न, यह सवाल नहीं है। सवाल है, जो फर्क है, जो डिस्टिंगशन है, वह दूसरा है। साइंटिस्ट आज नहीं कल, जीवन क्या है, यह जान लेंगे। लेकिन जीवन को जानने की उनकी जो मेथडोलॉजी है, वह ऑब्जेक्टिव है। वे जीवन को जान लेंगे, जैसा जीवन बाहर से देखा जा सकता है, जैसा हम बाहर से ऑब्जर्व कर सकते हैं। वे जीवन को ऐसे जानेंगे, जैसा दूसरा जीवन को जानता है। लेकिन जीवन अपने में, भीतर, स्वयं कैसा अनुभव करता है, जीवंत होना कैसा है, वह साइंटिस्ट बाहर से नहीं जान पाता। वह उसकी जो सब्जेक्टिव फीलिंग है...
जैसे मैं कहूं--प्रेम है। एक फिनामिना है। बाहर से हम ऑब्जर्व करते हैं कि प्रेमी क्या करता है, क्या नहीं करता है, उसका बिहेवियर क्या है, प्रेमी के मस्तिष्क पर क्या होता है, प्रेमी के शरीर पर क्या होता है, हम सारा ऑब्जर्व करते हैं। और हम, प्रेम क्या है, इसके बाबत कुछ नतीजे लेते हैं। और वे नतीजे भी अर्थ रखते हैं। वे नतीजे ऑब्जेक्टिव हैं। लेकिन प्रेमी प्रेम करने में सब्जेक्टिवली क्या अनुभव करता है, यह हमारे ऑब्जेक्टिव ऑब्जर्वेशन से छूट जाता है, इट इज़ बियांड दैट। और वह जो छूट जाता है, उसको जानने का ऑब्जेक्टिव कोई रास्ता नहीं है। क्योंकि ऑब्जेक्टिव हम जो भी जानेंगे, वह सब्जेक्टिव फिर छूट जाएगा, बच जाएगा।
तो लाइफ को वैज्ञानिक जान लेगा कि लाइफ क्या है, कैसे बनती है, कैसे आती है, किन-किन तत्वों से मिल कर प्रकट होती है। लेकिन लिविंग होना, डेड होना और लिविंग होना...
यह तकिया पड़ा है। समझ लें कि अगर डेड है, और यह तकिया अगर लिविंग हो जाए, तो डेड होने और लिविंग होने के बीच में तकिया क्या अनुभव करता है, वह जो उसका इनर एक्सपीरिएंस है लिविंग होने का वह क्या है, वह हम बाहर से ऑब्जर्व नहीं कर पाते हैं। न उसका कोई उपाय है, न हो सकता है। क्योंकि सब्जेक्टिविटी को ऑब्जेक्टिवली नहीं जाना जा सकता। वह कंट्राडिक्शन इन टर्म्स है।
और इसलिए रिलीजन का...रिलीजन का कहना यह नहीं है, रिलीजन का मतलब भी यह नहीं है कि विज्ञान जीवन को नहीं जान सकेगा। विज्ञान जीवन को जानेगा। लेकिन फिर भी वह जानना वह जानना नहीं है जो धर्म कहता है आत्म-साक्षात्कार। वे दोनों अलग बातें हैं।
बट दिस सब्जेक्टिविटी आल्सो कैन बी ऑब्जर्व्ड!
ऑब्जेक्टिवली ही सब्जेक्टिविटी को अध्ययन करेंगे न! विज्ञान इतना करेगा। यह हो रहा है, साइकोलॉजी यह कर रही है।
अध्ययन तो सब्जेक्टिविटी का ही होगा न!
नहीं समझे आप। सब्जेक्टिवली! ये दोनों बुनियादी बातों में फर्क हो गया। डीप साइकोलॉजी जो कर रही है, वह यही कर रही है, सब्जेक्टिविटी का ऑब्जेक्टिवली अध्ययन कर रही है। लेकिन दैट स्टडी टू इज़ नॉट सब्जेक्टिव, इट इज़ ऑफ दि सब्जेक्टिव एंड ऑब्जेक्टिवली। बट टु अंडरस्टैंड सब्जेक्टिविटी एज ए सब्जेक्ट रिमेंस बियांड साइंस।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
मेरा किसी से प्रेम का अनुभव एक बात है, और मेरे प्रेम का अध्ययन आप सब मिल कर करेंगे, यह बिलकुल दूसरी बात है। प्रेम का दो तरह से अध्ययन किया जा सकता है। एक ऑब्जेक्टिवली--कि प्रेम का फिनामिना क्या है? क्या होता है प्रेम में? फिजियोलॉजिकली क्या होता है? मेंटली क्या होता है? केमिकली क्या होता है? किसके लिए, यह सवाल नहीं है। प्रेम को दो तरह से अध्ययन कर सकते हैं। ऑब्जेक्टिवली अध्ययन जो है, वह प्रेम की साइंटिफिक स्टडी होगी। लेकिन प्रेम साइंटिफिक स्टडी पर समाप्त नहीं होता, शेष रह जाता है। और वह जो कुछ शेष रह जाता है, वह जो सब्जेक्टिव फीलिंग है प्रेम की, वह पकड़ में नहीं आती। और उसको मेडिटेटिवली ही जाना जा सकता है, नहीं तो नहीं जाना जा सकता।
यानी मैं जो कह रहा हूं, वह यह कि हमारी साइंस की कितनी ही प्रोग्रेस हो, ऐसा नहीं हो जाता है कि कोई चीज छूट नहीं जाती पीछे, कुछ चीज बाकी नहीं रह जाती।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
जो दूसरे के लिए मिले, वही करने योग्य है? और अपने लिए मिले, वह करने योग्य नहीं है? अगर यही क्राइटेरियन है कि जो दूसरे के लिए मिले वही करने योग्य है और अपने लिए मिले वह करने योग्य नहीं है, तब तो बात अलग है। तब तो कुछ नहीं मिला। और अगर अपने लिए मिला वह भी करने योग्य है...
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
जब भी हम धार्मिक व्यक्ति के वक्तव्यों को ऑब्जेक्टिवली पूछने लगेंगे, तो हम करीब-करीब ऐसी भूल कर रहे हैं कि हम दो ऐसी लैंग्वेजेज को मिक्सअप कर रहे हैं, जिनका मिक्सअप होना बुनियादी रूप से गलत है--अभी।
जैसे मैं कहूं: एक आदमी कहीं से संगीत सुन कर आया और उसने हमें आकर कहा कि मैंने बहुत अदभुत संगीत सुना। हम उससे पूछते हैं, उस संगीत की सुगंध क्या थी? वह आदमी कहता है, आप क्या बात कर रहे हैं!
मैंने कभी संगीत नहीं सुना, लेकिन फूल मैंने सूंघे हैं और बगीचे का आनंद लिया है। और वह आदमी कहता है कि बहुत आनंद आया, संगीत मैंने सुना। मैं उससे पूछता हूं, संगीत की सुगंध क्या थी? वह आदमी कहता है, सुगंध? आप बड़ी इररेलेवेंट बात पूछते हैं! मैं उससे कहता हूं, थोड़ा सा संगीत तुम ले नहीं आए, जरा मैं देख लूं। वह आदमी कहे, आप पागल हो गए हैं! संगीत मैं कैसे ला सकता था, संगीत कोई लाने की बात नहीं। तो मैं उससे कहूं कि जिसमें न कोई सुगंध है, न जिसमें कोई स्वाद है, न जिसे लाया ले जाया जा सकता है, उसके होने का मतलब भी क्या है?
मैं उससे कह सकता हूं। और मैं एकदम गलत भी नहीं हूं। लेकिन मेरा जो यह सारा कहना है, एक अर्थ में इररेलेवेंट है। इररेलेवेंट इस अर्थ में है कि मेरी इन सब बातों के अतिरिक्त भी संगीत हो सकता है और उसके होने का अर्थ हो सकता है।
महावीर को क्या मिला और क्या नहीं मिला, जब हम पूछने लगते हैं, तो हम उस टर्मिनालॉजी में उत्तर चाहते हैं जो हम जानते हैं। जैसे कि आइंस्टीन को रिलेटिविटी की थ्योरी मिली, तो वह रिलेटिविटी की थ्योरी क्या है? हम वैसे ही पूछ रहे हैं जैसे आइंस्टीन ने जो एक्सपेरिमेंट किया, उसको जो मिला, तो वह क्या है? तो वह किताब लिखी गई है। तो महावीर को जो केवल-ज्ञान मिला वह क्या है?
केवल-ज्ञान के बाबत जो भी कहा जाएगा...केवल-ज्ञान तो एक सब्जेक्टिव अनुभूति है, और जो कहा जाएगा वह ऑब्जेक्टिव एक्सप्रेशन है।
आई वुड से, कहा ही नहीं जा सकता। और कहा जा ही नहीं सकता है। उसका एक्सप्रेशन ही नहीं हो सकता। दैट इज़ योर ज्ञान, दैट इज़ अवर ज्ञान, दैट इज़ व्हाट वी विल अचीव आफ्टर मेडिटेशन।
ठीक है न, यह तो आपको पता है फिर!
एनी ऑफ माई वडर्स रिमेन सब्जेक्ट टु करेक्शन।
न, न, न। करेक्शन का नहीं। यह पता है हमें। और जरूर कहा गया है। यह भी कहा जाना है। अगर कोई केवल-ज्ञान के बाबत यह कहे कि उसे नहीं कहा जा सकता, ही हैज सेड समथिंग। और बड़ी मीनिंगफुल बात कही उसने, कोई गैर-मीनिंगफुल बात नहीं कही। विट्गिंस्टीन ने एक सेंटेंस लिखा है, आप देखे होंगे, विट्गिंस्टीन की कोई...तो टैक्टेटस में वह एक सेंटेंस लिखता है: दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड, मस्ट नॉट बी सेड। लेकिन वह यह नहीं कहता कि दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड इज़ नॉट। और न वह यह कहता है कि दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड, मस्ट नॉट बी सेड, इज़ नॉट ए सेइंग अबाउट इट।
मेरा मतलब आप समझ रहे हैं न? जब हम यह कहते हैं, अगर हम किसी चीज के बाबत कहते हैं कि वह नहीं कही जा सकती, तो हमने उसके बाबत कुछ कहा। और यह कहना बहुत साधारण नहीं है। इसने कुछ इंडीकेट किया, इसने कुछ बात कही, इसने कुछ इशारा भी किया। अगर हम यह कहते हैं कि केवल-ज्ञान एक अनुभूति है, तो हमने कुछ कहा। अगर हम यह कहते हैं कि वह अनुभूति ऐसी है जो जानी ही जा सकती है, कही नहीं जा सकती, तो भी हमने कहा।
यह बड़ा मजा है! सारे धर्मग्रंथ, जिस संबंध में कहते हैं कुछ नहीं कहा जा सकता, उसी के संबंध में लिखे गए हैं।
लाओत्से अपनी किताब शुरू करता है--ताओ तेह किंग--उसमें वह लिखता है कि मैं वह कहूंगा, जो नहीं कहा जा सकता। मैं वह कहूंगा इस किताब में, जो नहीं कहा जा सकता। और इसलिए कहने से वह अनिवार्यरूपेण गलत हो जाएगा, उसके लिए क्षमा करना। कहता है--सारी बात कहता है--और यह क्षमायाचना के साथ।
मेरा कहना है कि यह क्षमायाचना भी कुछ कह रही है। वह जो एक तकलीफ है कहे जाने की, वह उसके बाबत कुछ कह रही है। कहे जाने की इच्छा है, कहा जाना चाहिए, किसी को बताना चाहिए, जो जाना है वह कहा जाना चाहिए, उसका भी तीव्र प्रवाह है। नहीं कहा जा सकता, इसका भी बोध है। और इन दोनों के बीच में जो चेष्टा चल रही है, वह भी कुछ कह रही है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
मेरा कहना यही है कि अगर नहीं जा सकते हैं मेडिटेशन करने, तो मेडिटेशन के संबंध में हां और न के कोई जवाब मत पकड़ें। अगर नहीं जा सकते हैं, तो बकवास छोड़ें। छोड़ें उस बात को, वह अपना नहीं है काम।
अगर मैं म्युजिक की दुनिया में नहीं जा सकता हूं, तो फिजूल मैं बातें न करूं। ठीक है, बात खतम हो गई। मेरी वह दुनिया नहीं है, मुझे नहीं जाना है या जाने की सुविधा नहीं है। फिर मैं हां और न के जवाब न पकडूं। फिर दोनों जवाब खतरनाक हैं। या तो मैं यह कहूं कि केवल-ज्ञान है ही नहीं कुछ। यह भी गलत बात है। या फिर मैं केवल-ज्ञान के संबंध में चुप रहूं।
बट यू कांट से देअर इज़ नथिंग।
नहीं-नहीं, मेरा कहना यह है, जो नहीं जा सकता, जैसे आप अगर केमिस्ट्री के बाबत नहीं गए हैं कुछ अध्ययन करने, तो आप चुप तो रहते हैं कम से कम। आप कुछ कहते तो नहीं हैं। अगर आप गणित के बाबत नहीं गए हैं और हायर मैथमेटिक्स से आपका कुछ संबंध नहीं है, तो आप कम से कम चुप तो हैं। इतनी ईमानदारी भी धर्म के संबंध में नहीं बरती जा रही है।
पर अभी वह चुप रहने का जमाना भी नहीं है। जो सुना है, जो समझ में नहीं आता है उसको मान लेना भी और उसको...
यह कौन कहता है? मैं कहां कहता हूं!
वह तो अनुभव की बात है!
मैं तो दिन-रात यही कह रहा हूं, मैं तो दिन-रात यही कह रहा हूं।
समझो कि मैं नहीं जा रहा हूं...
तो चुप रह जाइए आप, हां-न मत करिए।
चुप रहने की अब जरूरत नहीं है।
तो क्या करिएगा? कुछ न कुछ कहिएगा मेडिटेशन के बाबत, बिना जाए? मेरा कहना यह है कि अगर मेडिटेशन में नहीं जा सकते हैं तो सीखिए।
आज समझो कि मैं ड्राइविंग नहीं जानता...
इतना तय है कि ड्राइविंग सीखिए, और फिर गाड़ी ले लीजिए। तो मेडिटेशन सीखिए और फिर चल पड़िए।
वह तो मैं तभी सीखूं व्हेन आई सी दैट एवरीबडी इज़ ड्राइविंग दि कार एंड इट इज़ सेफर।
समझा मैं, समझा मैं। तो आप देखिए महावीर को, बुद्ध को। खोज करिए कि ये सेफर हैं या नहीं।
मेरा कहना क्या है कि एक भी एग्जाम्पल बताइए कि मेडिटेशन से उसको यह मिला और उसने बताया कि यह हो सकता है...
क्यों परेशान होते हैं? एग्जाम्पल तो मैं हूं। पर आप क्यों परेशान होते हैं? और मैं दूसरा एग्जाम्पल कहां से लाऊं? और उसका क्या मतलब है? उससे क्या प्रयोजन है?
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
ऐसी स्थिति में जहां कि सब अर्थहीनता हो जाती है, मन बहुत करता है कि कहीं भी पकड़ लो, कहीं भी गुजर जाओ, बाहर निकल जाओ, पीछे लौट जाओ, आगे चले जाओ। नहीं जाना है। जम कर ही बैठ जाना है संदेह पर। तो एक ट्रांसेंडेंस आती है, जो अपने से आती है, उसको तो लाने का सवाल ही नहीं है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)
तो कुछ है जो इनडुबिटेबल है आपके लिए। और वह आपको ट्रांसेंड नहीं करने देगा।
आखिर ऐसी कोई भी चीज नहीं है जो डाउट के योग्य न हो। ऐसी कोई धारणा ही नहीं है जो डाउट के योग्य न हो। इनडुबिटेबल जैसा कुछ हो ही नहीं सकता। सेल्फ इविडेंट भी कुछ नहीं है। और जैसे ही आपने कुछ माना, कि कहीं न कहीं आपका मीनिंग रूट पकड़े हुए है और कहीं न कहीं आप आस्थावान हैं। आस्था क्या है, यह बहुत सवाल नहीं है।
और मेरा मानना है कि अगर आस्था थोड़ी भी है, तो डाउट के पार आप कभी नहीं हो पाएंगे। क्योंकि वह जो आस्था है, डाउट को कभी भी टोटल नहीं होने देगी। डाउट को टोटल नहीं होने देगी। आपके डाउट में एक कमी रह गई। और वह कमी छोटी कमी नहीं है। यानी एक अर्थ में आप डाउट की परेशानी से गुजर ही नहीं रहे हैं। कुछ है, जहां डाउट नहीं है। और आप निश्चिंत वहां खड़े हुए हैं। डाउट से पूरी तरह गुजरना, कि एक भी ऐसी बात न रह गई जो संदेह के परे है। संदेह भी न रह गया संदेह के परे।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Does a peaceful person experience anger towards others or society?
According to Osho, yes—a truly peaceful person can feel anger, but never for personal hurt. His anger has no private cause; it arises from compassion for others’ suffering and becomes energy for creative action. Peace must be living and active; joined with steadiness of mind, such anger fuels constructive revolution rather than destructive rage. Thus, peace and revolution meet in a single integrated person.
In simple terms: A calm person may still get mad, but only to help others and fix unfairness, not because their own ego is hurt.
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Osho's Commentary
बुद्ध ने अपने पिछले जन्म की एक कहानी कही है। पिछले जन्म की कहानी है। तब वे बुद्धपुरुष नहीं थे। और उस जन्म में, जो उस जमाने में एक बुद्धपुरुष थे, वे उनके दर्शन करने गए थे। तो जब उन्होंने उन बुद्धपुरुष के पैर छुए, पैर छूकर वे उठ ही पाए थे कि वे बुद्धपुरुष भी झुके और इनके पैर छू लिए! ये बहुत हैरान हो गए। इन्होंने कहा कि मैं आपके पैर छुऊं, नमस्कार करूं, यह तो ठीक है। आप मेरे पैर छुएं और नमस्कार करें, यह तो मेरी समझ के बाहर हो गया! तो उस बुद्धपुरुष ने कहा कि यह तुम्हारी समझ के बाहर है। क्योंकि मुझमें जो वास्तविक हो गया है, वह तुममें संभावना है। और आज नहीं कल तुममें भी वास्तविक हो जाएगा। वास्तविक हो जाएगा तुममें भी; जो आज बीज है वह कल वृक्ष हो जाएगा। मैं उस संभावना को नमस्कार करता हूं। और इसलिए कर रहा हूं ताकि तुम्हें याद दिला सकूं कि तुममें भी वह संभावना है।