रामनाम जान्यो नहीं — प्रवचन 1 Ramnam Janyo Nahin #1
Questions in this Discourse
ओशो, रामनाम जान्यो नहीं, भई पूजा में हानि। कहि रहीम क्यों मानिहैं, जम के किंकर कानि।। आपने महाकवि रहीम के इस दोहे से आज प्रारंभ होने वाली प्रवचनमाला को नाम दिया है: रामनाम जान्यो नहीं। ओशो, क्या सच ही मृत्यु सिर्फ उनके लिए है जो राम को नहीं जानते हैं? इस राम को कैसे जाना जाता है? और ओशो, पूजा क्या है?
फूल तो नृत्य हैं अस्तित्व के। फूल तो आकांक्षा हैं पृथ्वी की आकाश के तारों को छू लेने के लिए। लेकिन जो बीज ही रह जाए, वह अभागा है--हुआ भी और न भी हुआ; व्यर्थ ही हुआ। होने और न होने में क्या भेद? अगर बीज ही रह जाना है, तो न भी होते तो भी चल जाता। अंतर तो तब पड़ेगा जब वसंत आएगा। अंतर तो तब पड़ेगा जब फूल हवाओं में और सूरज की किरणों में नाचेंगे। अंतर तो तब पड़ेगा जब मधुमक्खियां और तितलियां उनके पास गीत गाएंगी। उस रास से अंतर पड़ेगा। फूल की बांसुरी पर जब पक्षी अपनी धुन बिठाने लगेंगे, तब बीज को पता चलेगा कि मैं वस्तुतः क्या था। वह नहीं था जो दिखाई पड़ता था; वह था जो कभी दिखाई नहीं पड़ता था। दृश्य नहीं था, अदृश्य था।
लेकिन स्मरण रहे कि बीज को तोड़ कर तुम फूल नहीं पा सकते हो। बीज को खंड-खंड करके फूल पाना तो दूर, फूलों की संभावना भी समाप्त हो जाएगी।
और तर्क यही करता है--बीज को तोड़ता है, टुकड़े-टुकड़े करता है, इस आशा में...आशा पर संदेह नहीं, मंशा पर संदेह नहीं, भावना बुरी नहीं, मगर भ्रांत है, मूढ़ है, अंधी है। तर्क बीज को तोड़ता है; सोचता है छिपे हैं फूल भीतर, जैसे तिजोड़ियों में खजाने छिपे होते हैं। तोड़ो तिजोड़ी, खजाने मिल जाएंगे। लेकिन फूल यूं नहीं छिपे होते।
इसलिए तर्क आदमी में खोजने चलता है, लेकिन परमात्मा को नहीं पाता। आदमी को तोड़ लेता है, हड्डी-मांस-मज्जा पाता है, और कुछ भी नहीं। इससे तो न तोड़ा आदमी ही बेहतर था; कम से कम चमड़ी के भीतर व्यर्थ का कचरा तो छिपा था। तर्क उसको भी उघाड़ देता है। घाव भरते नहीं और मवाद बाहर आ जाती है। फूल तो उगते नहीं; फूल तो दूर, कांटों की संभावना तक असंभव हो जाती है। तर्क इस पृथ्वी पर सबसे अधार्मिक वस्तु है।
इसलिए जो लोग धर्म के पक्ष में तर्क देते हैं, उनसे ज्यादा मूढ़ और कोई भी नहीं। विक्षिप्त हैं वे लोग। धर्म की खोज प्रेम की खोज है। प्रेम का रास्ता बिलकुल ही भिन्न है।
बीज को तोड़ना नहीं है, गहरी जमीन देनी है। जमीन से पत्थर, कंकड़, कूड़ा-करकट अलग करना है। जमीन को इस योग्य बनाना है कि बीज को आत्मसात कर ले। खाद देनी है। पानी देना है। सूरज की किरणें तो आ ही रही हैं, उन्हें बीज तक पहुंचने देना है। सूरज का उत्ताप अत्यंत जरूरी है ताकि बीज में छिपा हुआ जीवन गतिमान हो सके, सूरज की अग्नि जरूरी है ताकि बीज के भीतर छिपी अग्नि को आह्वान मिल सके, चुनौती मिल सके। सूरज बाहर द्वार पर दस्तक देता है और भीतर बीज के क्रांति मचनी शुरू हो जाती है।
मिट्टी पचा लेगी बीज के अहंकार को। क्योंकि बीज के चारों तरफ जो पर्त है, वही अहंकार है। उसी के कारण बीज के और अस्तित्व के बीच में बाधा है, अवरोध है, दीवाल है। बीज जैसे बंदी है। जैसे उसके हाथ और पैरों पर जंजीरें हैं। मिट्टी पचा लेगी बीज की जंजीरों को। मिट्टी से ही बनी हैं, इसलिए पचाना कठिन नहीं। बीज के चारों तरफ खड़ी दीवालों को मिट्टी आत्मसात कर लेगी, आत्मलीन कर लेगी। और बीज में बंद आत्मा को मुक्त कर देगी।
वही आत्मा फूल बनती है। वही आत्मा सुगंध बनती है। वही आत्मा आकाश की तरफ उठने लगती है। फिर उसे पूजा कहो, प्रार्थना कहो, ध्यान कहो या जो मर्जी हो वह कहो। नाम सब गौण हैं।
एक बात स्मरण रखना, कुछ चीजें हैं जो हमेशा जीवन में नीचे की तरफ जाती हैं; और कुछ चीजें हैं जो हमेशा ऊपर की तरफ जाती हैं। जैसे दीये की लौ हमेशा ऊपर की तरफ जाती है; फूल की सुगंध हमेशा आकाश की तरफ पंख फैलाती है। जैसे ही बीज टूटता है--तर्क से नहीं, भूमि में समर्पित होकर--गलता है अपनी मर्जी से, अपनी अभीप्सा से, वैसे ही क्रांति घट जाती है। एक नये जीवन का सूत्रपात होता है। अगर बीज को तुम गिराओ पहाड़ से तो नीचे की तरफ जाएगा और सुगंध ऊपर की तरफ जाएगी। मिट्टी का दीया नीचे की तरफ जाएगा, लेकिन मिट्टी के दीये में जलती हुई ज्योति सूरज की तलाश करेगी; सूरज ही उसका स्रोत है। दीये में दो का मिलन हो रहा है--आकाश का और पृथ्वी का। बीज में भी दो का मिलन हो रहा है--अदृश्य का और दृश्य का। दृश्य पर मत अटक जाना।
और दृश्य पर ही अटके हैं लाखों-करोड़ों लोग।
इसी बात की याद है रहीम के इस दोहे में--
रामनाम जान्यो नहीं, भई पूजा में हानि।
कहि रहीम क्यों मानिहैं, जम के किंकर कानि।।
‘रामनाम जान्यो नहीं।’
राम से अर्थ मत ले लेना दशरथ-पुत्र राम का, नहीं तो भूल हो जाएगी; नहीं तो बीज मुक्त होने की संभावना खो देगा। राम तो दशरथ-पुत्र राम से बहुत पुराना नाम है। स्वभावतः, नहीं तो दशरथ अपने बेटे को राम नाम कैसे देते? नाम तो पुराना रहा होगा। नाम तो पहले से रहा होगा। और भी राम हो चुके थे, परशुराम हो चुके थे। उनका कुल नाम का मतलब इतना ही है--फरसे वाले राम।
कथा तो यह है कि बाल्मीकि, इसके पहले कि उसने रामायण लिखी, लुटेरा था, हत्यारा था, डकैत था। नारद को एक सुबह उसने अपनी वीणा पर संगीत छेड़े जंगल से गुजरते देखा। रोका, और कहा कि जो भी हो तुम्हारे पास रख दो!
बहुत लोगों को रोका होगा जिंदगी में, वही उसका धंधा था, लेकिन नारद जैसा व्यक्ति उसे पहली बार मिला था। उसने दो तरह के लोग जाने थे। एक, जो रोकने से डर जाते थे, भयभीत हो जाते थे, थर-थर कांपने लगते थे। उसका नाम ही इतना भयंकर था--बाल्या भील तब उसका नाम था। उसके नाम से ही लोगों की छाती दहक जाती थी। माताएं अपने बच्चों को डराती थीं कि भीतर हो जाओ, बाल्या आ रहा है; अगर गड़बड़ की तो बाल्या को दे देंगे। तो या तो लोग घबड़ा जाते, गिड़गिड़ाने लगते, हाथ-पैर जोड़ने लगते, जो पास होता दे देते; या तलवारें खिंच जातीं, मरने-मारने को तैयार हो जाते। बस दो ही तरह के लोग देखे थे--या तो भयभीत और या फिर मरने-मारने को राजी; कायर या हिंसक। लेकिन नारद एक तीसरे तरह के व्यक्ति थे, इसका बाल्या को पहली दफा अनुभव हुआ। और उसी ने उसके जीवन में क्रांति ला दी।
नारद का गीत तो चलता ही रहा। जिसे सच्चा गीत मिल गया है, वह रुकता ही नहीं। नारद की वीणा तो बजती ही रही। जिसके भीतर की वीणा बज उठी हो, उसकी बाहर की वीणा को बजने से कौन रोक सकता है? और बाहर की वीणा टूट भी जाए तो भी कुछ अंतर नहीं पड़ता, भीतर की वीणा अहर्निश बजती रहेगी। नारद का गीत जारी रहा। न तो नारद भागे, न गिड़गिड़ाए, न लड़ने को तैयार हुए। बाल्या ठिठका। यह आदमी नये ढंग का था। कहा कि समझे नहीं क्या? मैं कहता हूं जो भी पास हो, मुझे दे दो।
नारद ने कहा, पास तो मेरे बहुत कुछ है, मगर तुम ले सकोगे? पास तो मेरे राम है, मगर लेने की तुम्हारी तैयारी है? मैं तो खोजता ही फिरता हूं उन दीवानों को जो राम को लेने के लिए तत्पर हों। क्या तुमने मुझे पागल समझा है? किसलिए यह वीणा बजा रहा हूं? और किसलिए यह गीत है? और किसलिए यह दूर जंगलों में भटक रहा हूं? अरे उन्हीं की तलाश है जो लेने को राजी हैं। तू लेने को राजी है?
यह और मुश्किल बात थी। इस धन का नाम तो बाल्या ने सुना ही नहीं था। यह कौन सा धन है राम? न कोई पहचान थी, न कोई परिचय था इस धन से।
पूछा कि यह क्या है? सुना नहीं। ये जेवर कभी देखे नहीं। ये आभूषण परिचित नहीं। तुम किस राम की बात कर रहे हो?
नारद ने कहा, मेरे भीतर अनंत का संगीत उठा है, अनाहत नाद उठा है। मेरे भीतर की हृदय-तंत्री बज उठी है। और अब एक ही आकांक्षा है, एक ही अभीप्सा है कि कितना बांटूं! कितना बांटूं! कितनों को बांट सकूं! यह अपूर्व धनराशि, जितना बांटो बढ़ती जाती है। तुम मुझे लूट न सकोगे। और बाल्या, मैं तुझे सावधान करता हूं कि मुझे लूटने चला तो खुद लुट जाएगा! यह सौदा बड़ा मंहगा है। तू सोच ले। अगर तू लुटेरा है तो हम भी लुटेरे हैं। और तू क्या खाक लूटेगा! बाहर की कुछ चीजें छीन सकता है, तो ज्यादा मेरे पास कुछ है नहीं। यह वीणा है, यह तेरी रही। मगर यह वीणा तो केवल उपकरण है, यह तो भाषांतर का एक उपाय है। जो मेरे भीतर है, उसे कोई भी छीन नहीं सकता। मृत्यु भी नहीं छीन सकती। तू अपनी तलवार म्यान में वापस रख ले। नाहक तेरा हाथ दुखने लगा होगा। मुझे तुझ पर दया आती है। मगर मैं देने को राजी हूं। मगर यह मामला यूं है कि लेने वाला पहले राजी होना चाहिए।
बाल्या ने पूछा, क्या करना होगा लेने के लिए?
तो नारद ने कहा, यह जो राम है, यह जो शब्द है राम, इसकी गुहार मचानी होगी। यह तेरे हृदय में, तेरी श्वासों में यूं ओत-प्रोत हो जाए कि जागे तो जागे, सोए तो सोए, मगर अहर्निश राम की धारा तेरे भीतर चलती रहे। तेरे हृदय की धड़कन राम का गीत बन जाए। तेरी श्वास-श्वास राम का ही अनुच्चार हो जाए। तू चुप भी रहे तो भी तेरे भीतर नाद बजता ही रहे--अखंड, अहर्निश। तब तू जीवन की परम संपदा को पाएगा। तू क्या फिजूल की बातें इकट्ठी करने में लगा है! यह चार दिन की जिंदगी है। यह कचरा इकट्ठा करके क्या करेगा? और जिस ढंग से तू इकट्ठा कर रहा है, मंहगा सौदा है। बहुत पछताएगा पीछे। मिली थी जिंदगी क्या पाने को और कचरा इकट्ठा करने में गंवा दी!
नारद की वह अपूर्व प्रतिमा, नारद का वह अदभुत रूप, वह अपूर्व क्षण, जंगल का वह सन्नाटा, वीणा पर छिड़ा हुआ मद्धम-मद्धम राम का गीत, नारद की वह आंच--बाल्या अभिभूत हो गया। अक्सर यूं होता है कि जिनको तुम तथाकथित संत कहते हो, वे ज्यादा चालबाज होते हैं, ज्यादा हिसाबी-किताबी होते हैं। बाल्या सीधा-सादा आदमी था, साधारण अपराधी था। लुटेरा था। अक्सर यूं होता है कि सीधे-सादे लोग, चाहे वे लुटेरे ही क्यों न हों, कहीं ज्यादा निर्दोष होते हैं। बात चोट कर गई।
नारद ने कहा, तू यह सारा धंधा कर रहा है लूटपाट का, किसलिए? बच्चों के लिए, पत्नी के लिए, पिता के लिए?
उसने कहा, निश्चित! परिवार है, उसकी चिंता मुझे करनी है।
तो नारद ने कहा, एक काम कर, तू पूछ आ कि इस सबके करने में वे भागीदार हैं या नहीं? और इसके परिणाम में जो भी तुझे भोगना पड़ेगा, उसमें उनकी हिस्सेदारी रहेगी कि नहीं?
बाल्या ने कहा, मुझे धोखा देने की कोशिश मत करना। यूं मत करना कि मैं घर जाऊं और तुम भाग जाओ।
नारद ने कहा, तू मुझे इस वृक्ष से बांध दे।
बाल्या नारद को वृक्ष से बांध गया।
बंधे हुए नारद की भी वीणा बजती रही। जो मुक्त है, वह जंजीरों में भी मुक्त है। जो मुक्त है, वह कारागृह में भी मुक्त है। और जो मुक्त नहीं है, वह मुक्त आकाश के नीचे भी मुक्त नहीं है; हजार जंजीरें उसे वहां भी घेरे हैं।
बाल्या गया घर, उनसे पूछा। पत्नी ने कहा कि मुझे क्या पता तुम कैसे कमाते हो! मुझे विवाह करके ले आए थे, उस दिन तुमने जिम्मा लिया था मेरे भरण-पोषण का। तुम जानो तुम्हारा काम जाने! मेरा पेट भरना चाहिए, मेरा तन ढंकना चाहिए। मेरी क्या भागीदारी? मुझे पता नहीं कि तुम क्या करते हो, कहां से धन लाते हो। मेरी कोई भागीदारी नहीं।
बूढ़े पिता ने कहा, मेरा इसमें क्या लेना-देना है? यह तुम्हारा कर्तव्य है कि बूढ़े पिता का भरण-पोषण करो। अब तुम पुण्य से करते हो कि पाप से, यह जिम्मेवारी तुम्हारी है।
सब इनकार कर गए। छोटे-छोटे बच्चे भी इनकार कर गए। बाल्या तो सकते में आ गया। जिनके लिए मैं अपने जीवन को गंवा रहा हूं, उनमें से कोई भी मेरे पाप का भागीदार नहीं है!
लौटा तो दूसरा ही आदमी था। नारद को छोड़ा उसने, पैरों पर गिर पड़ा, और कहा कि मुझे दे दो वह धन, दे दो वह धन जिसको तुम राम कहते हो!
और बाल्या को नारद ने प्रभु-स्मरण की कीमिया दी। मगर बेपढ़ा-लिखा आदमी था, इसलिए कहानी बड़ी प्रीतिकर है कि वह भूल गया कि राम-राम राम-राम जपना है, वह मरा-मरा मरा-मरा जपता रहा। यूं तुम जोर-जोर से राम-राम राम-राम राम-राम जपोगे तो वह मरा-मरा मरा-मरा प्रतीत होने लगेगा। एक राम दूसरे पर चढ़ जाएगा। एक राम दूसरे से मिल जाएगा, बीच में जगह न रह जाएगी। तो राम-राम लिखा है कि मरा-मरा लिखा है, तय करना मुश्किल हो जाएगा। बेपढ़ा-लिखा आदमी था। लेकिन कहानी कहती है कि वह मरा-मरा जप कर परम सिद्धावस्था को उपलब्ध हुआ।
यह राम के जीवन के पहले की घटना है। राम पुराना नाम है।
और यह भी प्रीतिकर है स्मरण रखना कि बाल्या जब मरा-मरा जप कर...खयाल रखना, सवाल भाव का है, विधि का नहीं। लोग विधियों को ही बिठाने में मर जाते हैं, भाव की चिंता ही नहीं लेते! लोग संस्कृत कंठस्थ करने में मर जाते हैं। सोचते हैं कि मंत्र जब तक भाषा की दृष्टि से शुद्ध न होगा तब तक कैसे सिद्ध होगा! और यह अपूर्व कथा हमारे पास है कि भाषा की अशुद्धि तो दूर, राम और मरा में क्या लेना-देना है! सच पूछो तो बात ही उलटी हो गई। राम यानी जीवन का परम सूत्र और मरा यानी मृत्यु। राम यानी जीवन! जो जीवन को पा सका मृत्यु को जप कर, किस बात की सूचना है? इस बात की सूचना है कि असली सवाल भाव का है; असली सवाल त्वरा का है; असली सवाल भीतर की आकांक्षा का है, अभीप्सा का है; बाहरी सवाल नहीं है।
और बाल्या भील ने ही राम की कथा लिखी। यह भी बात बहुत सोचनीय है कि राम के पहले बाल्या भील ने राम की कथा लिखी। राम बाद में हुए, कथा पहले आई। राम की पूरी कहानी बाल्या भील ने लिखी। जिसके हृदय में परमात्म की प्रतीति हुई हो, उस हृदय से जो भी निकले वह सच हो जाता है। जिस हृदय में राम का साक्षात्कार हुआ हो, उस हृदय से असत्य के निकलने की संभावना ही नहीं रह जाती। इसलिए कथा पहले लिखी और फिर कहानी घटी। घटना पड़ा, मजबूरी थी। बाल्मीकि लिख गए तो वैसा ही होना जरूरी था।
तो एक बात स्मरण रखना कि रहीम का कोई संबंध दशरथ के बेटे राम से नहीं है, न मेरा कोई संबंध। राम तो केवल एक प्रतीक है। हमारे पास एक पूरा ग्रंथ है, विष्णु-सहस्रनाम, जिसमें भगवान के हजार नाम उल्लेख किए गए हैं। हजार प्रतीक है अनंत का। सभी नाम उसके हैं। इसलिए नाम पर मत अटकना।
यह जो कहा है रहीम ने: ‘रामनाम जान्यो नहीं, भई पूजा में हानि।’
रामनाम तो तुम सभी जानते हो। रामनाम कौन नहीं जानता? लेकिन इस जानने की बात नहीं है। जानने से मतलब जानना है, मानना नहीं। जानने से अर्थ साक्षात्कार है। जानने से अर्थ प्रतीति है, स्वाद है, अनुभूति है। यूं तो कोई भी राम का नाम जानता है। सारी दुनिया राम का नाम जानती है। हर साल तो राम की कथा देखते हो, राम की कथा सुनते हो, रामलीला देखते हो। लेकिन यह जानना नहीं है। मानना कभी भी जानना नहीं बन पाता। और जिसने मानने से शुरू किया है, वह जानने से वंचित रह जाता है। इसलिए पहला कदम जानने की तरफ है--मानने को छोड़ देना। मानना यानी झूठ। और झूठ से यात्रा शुरू करके कोई कैसे सत्य तक पहुंच सकता है? गलत से चलोगे तो गलत तक ही पहुंचोगे। पहला कदम बहुत जरूरी है, सोच कर उठाना। क्योंकि पहला कदम ही मंजिल की दिशा और मंजिल का अंतिम स्वभाव निर्णय करता है। सच पूछो तो पहला कदम आधी यात्रा है।
‘रामनाम जान्यो नहीं।’
इससे यह मत समझ लेना कि तुम्हें तो रामनाम पता है, तो यह रहीम का सूत्र तुम्हारे लिए नहीं। यह तुम्हारे लिए ही है। रहीम खुद तो मुसलमान थे, फिर भी बात बड़ी गहरी कही--रामनाम जान्यो नहीं। और मुसलमान के ओंठों से यह बात और भी गहरी हो जाती है।
साफ है कि रहीम के मन में कोई अंधश्रद्धा नहीं थी हिंदू या मुसलमान होने की। कोई पक्षपात नहीं था। कोई सिद्धांतों की दीवाल नहीं थी। आंखें साफ थीं। चीजों को वैसा ही देख सकते थे, जैसी हैं। दर्पण की तरह निर्मल रहे होंगे।
‘रामनाम जान्यो नहीं।’
मानो मत अगर जानना है। मानने को गिरा दो अगर जानना है। पीड़ा होगी गिराने में, क्योंकि सदियों-सदियों से माना है, पूजा है, आराधा है, हृदय के मंदिर में प्रतिष्ठापित किया है। गिराओगे, लगेगा मंदिर खाली हुआ।
कितना कठिन है इस दुनिया में यह जानना कि मैं हिंदू नहीं हूं, कि मुसलमान नहीं हूं, कि ईसाई नहीं हूं, कि जैन नहीं हूं, कि पारसी नहीं हूं! कितना कठिन है! होना तो नहीं चाहिए। क्योंकि कोई बच्चा न हिंदू पैदा होता है, न ईसाई पैदा होता है, न मुसलमान पैदा होता है। सभी बच्चे निर्दोष आते हैं। सभी बच्चे विश्वासमुक्त आते हैं। हम उन्हें भरते हैं कचरे से। फिर कचरे को चाहे तुम अच्छे-अच्छे नाम दे दो--गऊमाता का गोबर कहो, जो तुम्हारी मर्जी हो।
हिंदू पंचामृत पीते हैं। उसमें गाय की पांच चीजों को मिला कर पंचामृत बना लेते हैं। गोबर, गोमूत्र, दूध, दही, घी--ऐसी पांच चीजों को घोल-मेल करके पंचामृत बन गया। पंचामृत शब्द के पीछे क्या छिपा है, यह कोई नहीं देखता। और जब ब्राह्मण तुम्हें पंचामृत देता है तो तुम अहोभाव से स्वीकार करते हो। और वही तुमसे कहे, गोबर लोगे, गऊ-मूत्र लोगे? तो तुम्हारा जी मिचलाएगा। तुम कहोगे, कैसी बातें करते हो, होश की बातें करो। मगर पंचामृत! प्यारा शब्द है, सारी गंदगी को छिपा जाता है। प्यारे शब्दों की आड़ में बड़ी मूढ़ताएं छिपी हुई हैं।
रामनाम जान्यो नहीं, इसका अर्थ समझ लेना। जिन्होंने भी ईश्वर को मान रखा है, वे ईश्वर को कभी नहीं जान सकेंगे।
इस दुनिया में सबसे ज्यादा झूठे लोग वे आस्तिक हैं जिन्होंने बिना तलाश किए, बिना खोजे, बिना किसी अन्वेषण के, और ईश्वर को स्वीकार कर लिया है।
यह कैसी नपुंसकता है? और इस नपुंसकता की छाया में सारी पृथ्वी जी रही है। ये बड़े-बड़े चर्च, ये बड़े-बड़े मंदिर, ये आकाश छूती हुई मस्जिदों की मीनारें, तुम्हारी नपुंसकता को छिपा रही हैं, और कुछ भी नहीं। ये मंदिरों में बजते हुए घड़ियाल, ये मस्जिदों से उठती हुई अजानें, यह गिरजों में उठती हुई प्रार्थना, यह शिवालयों में जलती हुई धूप-दीप--यह सब आडंबर है, यह धोखा है, यह बेईमानी है; यह तुम्हें इस बात के लिए राजी रखना है कि मानना काफी है, जानने की कोई जरूरत नहीं। हर रविवार को चर्च हो आए, इतना काफी है। कभी-कभी सत्यनारायण की कथा करवा ली, वह भी उधार पंडित से, दो कौड़ी के आदमी से; या कभी मंदिर में प्रसाद बंटवा दिया, या कभी व्रत-उपवास कर लिया, बस काम पूरा हो गया। तुम किसको धोखा दे रहे हो?
मैं तुम्हारी आंखों में झांकता हूं तो मैं पाता हूं कि तुम किसी और को नहीं, अपने को ही धोखा दे रहे हो। और इस दुनिया में सबसे बड़ा धोखा अपने को धोखा देना है।
मानो मत अगर जानना है तो। जानने का पहला कदम है--मानने से मुक्त हो जाना। अगर तुम मुझसे पूछो, मेरा गणित पूछो, थोड़ा उलटा लगेगा, थोड़ा बेबूझ लगेगा, मगर मेरी भी मजबूरी है। मैं सत्य को वैसा ही कहने को मजबूर हूं जैसा है। अगर तुम सच में नास्तिक हो जाओ तो शायद कभी तुम आस्तिक भी हो सकते हो। नास्तिकता और आस्तिकता में विरोध नहीं है। नास्तिकता सीढ़ी है--प्राथमिक सीढ़ी है--आस्तिक होने के लिए।
अगर मेरा वश चले तो मैं हर बच्चे को नास्तिक बनाऊं। हर बच्चे को जिज्ञासा दूं, प्रश्न दूं, खोज की आकांक्षा दूं। हर बच्चे के जीवन में एक तीव्र प्रेरणा भरूं कि तू जानना, मानना मत; और जब तक तू न जान ले, ठहरना मत। बुद्ध ने जाना होगा तो बुद्ध पहुंचेंगे, और नानक ने जाना होगा तो नानक पहुंचेंगे, और कबीर ने जाना होगा तो कबीर पहुंचेंगे। उनके पहुंचने से तेरा पहुंचना नहीं हो सकता। तू जानेगा तो ही तू पहुंचेगा।
और पहले चाहिए कि तुम्हारे चित्त की स्लेट खाली हो जाए। पोंछ डालो जो भी दूसरों ने लिख दिया है। धो लो स्लेट, साफ कर लो। कोरी कर लो तुम्हारी किताब।
और मजा यह है कि कोरी किताब तुमने क्या की कि जैसे राम को आमंत्रण मिल जाता है। कोरी किताबों पर उतरता है वह फूल। कोरी किताबों पर आती है वह किरण। कोरी किताबों पर होता है वह विस्फोट। कोरी किताब यानी निर्दोष चित्त--मान्यताओं से, विश्वासों से मुक्त।
‘रामनाम जान्यो नहीं।’
फिर तुम जान सकोगे। फिर ही जान सकोगे।
‘भई पूजा में हानि।’
रहीम कहते हैं, पूजा खो गई, क्योंकि राम का नाम ही लोग भूल गए। राम से पहचान ही न रही। राम के और लोगों के बीच में पंडित और पुजारी और पुरोहित और इमाम और पादरी और पोप, न मालूम कितने लोग खड़े हो गए! राम और तुम्हारे बीच इतनी भीड़ खड़ी है कि तुम्हें लोगों की सिर्फ पीठें दिखाई पड़ रही हैं। राम का चेहरा तुम्हें कहां से दिखाई पड़े!
हटा दो इस भीड़ को। पूजा में हानि हो गई है। पूजा यूं चल रही है, मगर थोथी। तुम भी जानते हो भलीभांति। मंदिर में जाकर झुक भी जाते हो, मगर तुम्हारा अहंकार नहीं झुकता। बल्कि अक्सर यह होता है, अगर मंदिर में भीड़-भाड़ हो तो तुम और रंग-रौनक से झुकते हो, शोरगुल मचाते हो।
मैं छोटा था तो मेरे गांव के जिस मंदिर में मुझे ले जाया जाता था, जैन मंदिर था, वर्ष भर तो कोई खास जाता न था, लेकिन पर्युषण के दिन जब आते तो उन दस दिनों में बड़ी भीड़ होती थी। वे दस दिन लूट के समझो। और लोगों ने भी क्या हिसाब बनाए हुए हैं! वे दस दिन आते हैं बरसात के दिनों में--जब न खेती हो सकती, न दुकानदारी हो सकती, न कोई और धंधा हो सकता; सब दुकानें खाली होती हैं, किसान घरों में बैठे होते हैं, वर्षा मूसलाधार पड़ती है। कैसे कुशल लोग हैं! दस दिन खोजे भी हैं तो यूं कि कुछ खर्चा न हो। हिसाब से खोजे हैं। खाली ही बैठे हैं और मुफ्त अगर राम भी मिलता हो तो क्यों छोड़ना!
उन दस दिनों में मैंने एक मजा देखा कि जब भीड़-भाड़ ज्यादा होती तो लोग आरतियां लेकर ऐसे नाचते, वे ही लोग जिनको मैंने कभी अकेले में नाचते नहीं देखा। दो-चार आदमी होते तो बेमन से नाचते। और भीड़ अगर खास होती, तो फिर तो यूं होता कि रुकते ही नहीं, बामुश्किल रोकना पड़ता, आपे के बाहर होकर नाचते।
ऐसे एक नाचने वाले थे। एक दिन मैं उनके पीछे हो लिया। वे मुझसे पूछने लगे, मेरे पीछे क्यों चले आ रहे हो?
मैंने कहा, एक राज की बात पूछनी है। आपको हर रंग में, हर ढंग में देखा है। जब आप अकेले होते हैं तो आप पूजा की थाली उठाते भी नहीं। दो-चार आदमी होते हैं तो थाली उठाते हैं, बस एकाध दफा घुमाई, उतारी और रख दी। दस-पंद्रह हुए तो आपके पैरों में थिरक आ जाती है। और अगर सौ, दो सौ लोग इकट्ठे होते हैं तो आपको रोकना पड़ता है, पकड़ना पड़ता है। पकड़े-पकड़े हाथ में नहीं आते थे, छूट-छूट जाते थे, निकल-निकल जाते थे, फिर-फिर थाली उठा लेते थे। आखिर लोगों को दूसरे काम भी करने हैं, घर भी जाना है, भोजन भी करना है। इसका राज क्या है?
उन्होंने कहा, इसमें राज क्या? अरे अकेले नाचने में क्या सार, कोई देखने वाला भी तो होना चाहिए! साल में दो-चार ही ऐसे मौके आते हैं जब सब इकट्ठे होते हैं।
पर्युषण के अंतिम दिन तो वे ऐसा ऊधम मचा देते थे जैसे शराब पी रखी हो।
लोग झुकते भी हैं मंदिर में तो भी वह झुकना अहंकार का समर्पण नहीं है। झुकते भी हैं तो भी वह अहंकार का ही पूजन है।
और फिर पूजा के नाम पर क्या-क्या चल रहा है! न भाव है, न प्रीति है, न समपर्
ण है। सिर्फ एक पाखंड है। प्रतिष्ठा मिलती है, सम्मान मिलता है। लोग कहने लगते हैं--बहुत धार्मिक! संतत्व मिलता है, आदर मिलता है। मगर ये सब तो अहंकार के आभूषण हैं।
और क्या करोगे तुम पूजा में? दोहराओगे तोतों की तरह रटे हुए ग्रंथ। काश, इस तरह दोहराने से मोक्ष मिलता होता तो तोते तुमसे पहले पहुंच जाते।
एक तिब्बती लामा मेरे पास मेहमान हुआ। तिब्बती लामा एक छोटा सा यंत्र रखते हैं, पूजा-यंत्र। जैसे चरखे का चाक होता है, उस चाक में स्पोक लगे होते हैं, हर स्पोक पर मंत्र लिखा होता है। अब बार-बार क्या श्लोक कहना, तो वे बैठे-बैठे चक्र को घुमा देते हैं। दूसरे भी काम करते रहते हैं। चके को एक धक्का मार दिया, चका घूमने लगा, जितना चका चक्कर ले लेता है, जितने स्पोक ऊपर आए और नीचे गए, ऊपर आए और नीचे गए, उतने मंत्रों का लाभ हो जाता है।
यह लामा मेरे घर मेहमान था। मैंने उससे कहा कि यह तो बड़ी अच्छी तरकीब है। मैं तुझे और भी सुविधा बना देता हूं।
उसने कहा, क्या सुविधा?
मैंने कहा, तू ठहर। मैंने एक पड़ोसी इंजीनियर को बुलाया और कहा कि इसमें प्लग लगा कर इसको बिजली से जोड़ दे। यह बेचारे को बीच-बीच में बाधा पड़ती है। यह घूमता रहेगा बिजली से और इसको पुण्य-लाभ होता रहेगा।
कुछ लोग हैं जो बैठे-बैठे किताब में राम-राम, राम-राम लिखते रहते हैं। कुछ लोग हैं जो दुकान पर बैठे-बैठे हाथ में माला लिए रहते हैं और माला को थैली में छिपाए रखते हैं, और भीतर-भीतर गुरिए सटकाते रहते हैं। थैली भी इसलिए कि कोई यह न देख ले कि कभी-कभी वे गुरिया सटकाना भूल जाते हैं। और भूल ही जाते होंगे। क्योंकि मेरे सामने ही एक हलवाई रहता था। और ग्राहक आ जाते तो वह माला भी सटकाता रहता और इशारे भी करता रहता अपने नौकर को कि मार दे, डांडी मार दे! कुत्ता घुस आता तो इशारा कर देता--कुत्ते को भगाओ!
अब इस बीच में माला तो रुक ही जाती होगी। और न भी रुकी तो मन तो कुत्ते पर जा लगा, यह माला से तो कोई संबंध रहा नहीं।
इस हलवाई की बड़ी तोंद थी। हलवाइयों की अक्सर होती है। और तोंद ही नहीं थी, तोंद में बड़ा तुंडा भी था। तुंडा हलवाई ही उनका नाम था। बिलकुल फुग्गा थी उनकी...। और जब भी वे भाव-भक्ति से बैठे अपनी माला जपते रहते तो मैं पहुंच जाता। वे मुझे देख कर ही डरते थे। एकदम इशारा करने लगते--क्या चाहिए? मैं उनको इशारा करता--उनके पीछे ही उनकी अलमारी सजी रहती मिठाइयों की--कि फलां चीज चाहिए। वह पीछे देखा उन्होंने और मैंने उनका तुंडा बजाया। बस, फिर उनसे जो गालियां निकलती थीं, वे माला-वाला भूल जाते। मैं उनको याद भी दिलाता कि तुंडा बाबा, माला का क्या हुआ? रामनाम का क्या हुआ? वे कहते, ऐसी की तैसी माला की! मगर वे ऐसे मोटे थे कि उठ भी नहीं सकते थे, भाग भी नहीं सकते थे, मेरा पीछा भी नहीं कर सकते थे।
क्या चलता रहता है राम के नाम से! तुम्हारी अर्चना, तुम्हारी पूजा, तुम्हारी आराधना, सब धोखा है।
‘रामनाम जान्यो नहीं, भई पूजा में हानि।’
होगी ही। पूजा खो गई दुनिया से। लेकिन मैं तुम्हें याद दिला दूं, पूजा खो गई दुनिया से नास्तिकों के कारण नहीं, वैज्ञानिकों के कारण नहीं। पूजा खो गई दुनिया से पंडितों के कारण, पुरोहितों के कारण, तुम्हारे तथाकथित धार्मिक लोगों के कारण। अगर दुनिया को पुनः धर्म में प्रतिष्ठापित करना हो तो इसे धार्मिक लोगों से मुक्त करना होगा। इसे मंदिरों-मस्जिदों के बाहर लाना होगा। ये कारागृह हैं। इसे वेद, कुरान और बाइबिल से छुटकारा दिलाना होगा। तो शायद फिर जिज्ञासा जगे। फिर शायद आदमी पूछने लगे कि ईश्वर है? तो कहां है? तो कैसे पाया जा सकता है?
और जब तक उस परम सत्य की अनुभूति न हो तब तक तुम्हारे जीवन में फूल न खिलेंगे। तब तक तुम बासे ही रहोगे--उदास। और तुम्हारे चेहरे पर मक्खियां रहेंगी; तुम मुर्दा रहोगे। तुम एक लाश हो जो अपने को किसी तरह ढो रहे हो। हर आदमी अपनी लाश ढो रहा है।
‘रामनाम जान्यो नहीं, भई पूजा में हानि।
कहि रहीम क्यों मानिहैं, जम के किंकर कानि।।’
रहीम कहते हैं, एक बात खयाल रखना, धोखा दे सकते हो तुम पंडित को, पुरोहित को; धोखा दे सकते हो लोगों को; क्योंकि लोग अंधे हैं, तुम्हारे जैसे ही अंधे हैं। और धोखा तुम दे सकते हो मंदिर में रखी हुई पत्थर की मूर्तियों को; धोखा तुम दे सकते हो कागज पर लिखी गई किताबों को; लेकिन मौत को धोखा न दे सकोगे। और जब मौत द्वार पर दस्तक देगी तब बहुत पछताओगे, बहुत-बहुत पछताओगे, क्योंकि फिर क्षण भर का भी अवसर न बचेगा।
‘कहि रहीम क्यों मानिहैं।’
एक बात पक्की समझ लेना--रहीम कहते हैं--कि जब मौत के दूत तुम्हारे द्वार पर खड़े हो जाएंगे तो तुम्हारी धोखाधड़ी की पूजा-प्रार्थना को नहीं मानेंगे। मौत को तो केवल वही जीत पाता है जो अपने भीतर के अमृत को जान लेता है।
और उसी अमृत का नाम राम है, या कहो रहीम, या कहो रहमान, या कहो अल्लाह--कुछ फर्क नहीं पड़ता। तुम्हारे भीतर जो अमृत छिपा है, उसको जिसने जान लिया, फिर मौत उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। यह कसौटी है। मौत ही एकमात्र कसौटी है। मौत को जो जीतने में समर्थ है, मौत जिसका कुछ भी न बिगाड़ पाएगी। शरीर तो जाएगा, शरीर मिट्टी है। तो बीज की मिट्टी तो मिट्टी में समा जाएगी। लेकिन शरीर ही नहीं हो तुम। बीज सिर्फ बीज ही नहीं है, उसके भीतर आकाश के फूल भी छिपे हैं। जिसने अपने भीतर के फूल की खिलावट देख ली, जिसने भीतर के कमल को खिलते देख लिया, उस सहस्रदल कमल की जिसे आभा मिल गई, फिर मौत उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। मौत उसके पास भी नहीं फटक सकती, बिगाड़ना तो दूर। जिसके भीतर का दीया जल गया, क्या उसके पास अंधेरा आ सकता है? मृत्यु तो अंधकार है। चूंकि तुम्हारा भीतर का दीया नहीं जला है, इसलिए तुम्हें अंधकार घेर लेता है--घेरे ही हुए है। दीया जला कि अंधकार गया।
इस दीये जलाने को ही रहीम ने रामनाम कहा है। अपने भीतर के राम को पहचानो। अपने भीतर के शाश्वत से परिचय करो। अपने भीतर के अनंत से पहचान बनाओ। और जिसने अपने भीतर के अनंत को जान लिया--कैसे जाना, यह गौण है; किस विधि से जाना यह बेमानी है।
तुम यहां आए। तुम ट्रेन से आए, बस से आए, हवाई जहाज से आए, कि पैदल चल कर आए, कि रेलगाड़ी में आए, कि बैलगाड़ी में आए--क्या फर्क पड़ता है? तुम आ गए, फर्क इससे पड़ता है। अपने भीतर के शाश्वत को जानना है। हजारों मार्ग हैं। जो तुम्हें रुचिकर लगे, जो तुम्हें प्रीतिकर लगे, उससे ही चल पड़ो। लेकिन बैठे मत रहो, चल पड़ो।
बुद्ध ने कहा है: चरैवेति-चरैवेति।
रुकना मत, बैठना मत--चलते रहना। खोजो, चलो, अन्वेषण करो। और दूसरों की मानना मत, नहीं तो बैठे रह जाओगे।
और सारे लोग बैठे रह गए हैं। सारे लोग गोबर-गणेश हो गए हैं। दूसरों की मान कर बैठोगे तो फिर...वे भी बैठे थे किसी और की मान कर, तुम भी बैठे हो किसी और की मान कर। इससे बड़ा और कोई मनुष्य का अपमान नहीं है कि वह किसी की मान कर बैठ जाए। मेरी भी मानने की जरूरत नहीं है। चलो! खोजो! तुम्हारा जीवन है, तुम्हें अन्वेषण करना है, तुम्हें जानना है--क्या है यह जीवन? क्या है यह चैतन्य? क्या है तुम्हारे भीतर छिपा हुआ राज? कौन हो तुम अपने अंतरतम में? कौन छिपा है तुम्हारे हृदय की गुफा में--कौन सा नाद? कौन सा संगीत? कौन सा सत्य? कौन सा सौंदर्य?
और जिसने अपने भीतर के केंद्र को पहचान लिया, उसे मिल गया निर्वाण, उसे मिल गया मोक्ष, उसे मिल गया राम। राम कोई व्यक्ति नहीं है जो तुम्हें बाहर मिलेगा। राम है तुम्हारी आंतरिक संभावना। इसलिए मैंने कहा कि तुम्हें पहले ही याद दिला दूं, मेरा प्रयोजन दशरथ के बेटे राम से नहीं है। मेरा प्रयोजन तुम्हारे भीतर बैठे हुए शाश्वत के स्वर से है।
शांत होओ, मौन होओ, निःशब्द होओ, धीरे-धीरे मन की भीड़ से बाहर निकलो, चल पड़ो अपने अंतर-गृह की तरफ। जब पूर्ण सन्नाटा रह जाए, जब कोई तरंग भी न उठती हो, जब चेतना की झील यूं हो जाए जैसे दर्पण, तब सब राज खुल जाते हैं--भीतर के भी, बाहर के भी। क्योंकि वस्तुतः भीतर और बाहर के राज अलग-अलग नहीं हैं। भीतर और बाहर शब्द उपयोग करने पड़ते हैं तुम्हारे अहंकार के कारण। अहंकार गया तो फिर भीतर ही बाहर है और बाहर ही भीतर है। फिर एक ही शेष रह जाता है।
नामा गया कोई न कोई नामाबर गया।
तेरी खबर न आई, जमाना गुजर गया।।
हंसता हूं यूं कि हिज्र की रातें गुजर गईं।
रोता हूं यूं कि लुत्फे-दुआए-सहर गया।।
अब मुझको है करार तो सबको करार है।
दिल क्या ठहर गया कि जमाना ठहर गया।।
या रब नहीं मैं वाकिफे-रूदादे-जिंदगी।
इतना ही याद है कि जीया और मर गया।।
नामा गया कोई न कोई नामाबर गया।
तेरी खबर न आई, जमाना गुजर गया।।
क्या इरादा है? यूं ही मर जाना है?
या रब नहीं मैं वाकिफे-रूदादे-जिंदगी।
क्या जिंदगी के संगीत से नावाकिफ मर जाना है? क्या जीवन की कथा से अपरिचित मर जाना है?
या रब नहीं मैं वाकिफे-रूदादे-जिंदगी।
इतना ही याद है कि जीया और मर गया।।
बस इतना ही करना है? जीना है और मर जाना है? खाना है, पीना है, सोना है, उठना है, और मर जाना है? या और भी आकांक्षाएं हैं, अभीप्साएं हैं? या विराट की और भी पुकार आंदोलित करती है?
यह तो कोई आदमी की जिंदगी न हुई। आदमी की जिंदगी की शुरुआत ही राम की तलाश से होती है। आदमी और पशुओं में इतना ही भेद है कि पशु सिर्फ जीते हैं और मर जाते हैं, और आदमी जीने और मरने के बीच अमृत को पा लेता है।
दीवानगी कुछ इस तरह हद से गुजर गई
दुनिया की हर निगाह जो मुझ पे ठहर गई
जब गर्दिशे हयात पर मेरी नजर गई
टपकी जिगर की चोट टपक कर बिखर गई
पीकर तेरी निगाह से इक सागरे करम
मैं ढूंढता हूं गर्दिशे दौरां किधर गई
आते ही तेरे अहले चमन में ऐ दिलरुबा
फसले बाहर चूम के जुल्फें बिखर गई
सदके मैं उस निगाह के तेरी नजर से जो
मेरे जिगर में तीर की तरह उतर गई
आखिर वो बेनकाब सरे बाम आ गए
इक बदनसीब ‘राज’ की दुनिया संवर गई
परमात्मा तो राजी है प्रकट होने को, प्रतीक्षा कर रहा है। पुकार दो! दस्तक दो! और किसी और के द्वार पर दस्तक नहीं देनी है, अपने ही द्वार पर दस्तक देनी है। और परमात्मा कहीं और नहीं छिपा है, तुम्हारे भीतर छिपा है। परमात्मा यानी तुम्हारा स्वभाव, तुम्हारा स्वरूप। तुम उससे ही बने हो। तुम्हारे रोएं-रोएं में वही व्याप्त है। मगर बेहोश, नींद में खोए, हजार सपनों में दबे भूल ही गए हो कि तुम कौन हो।
धर्म है उसकी पहचान जो हमारे भीतर मौजूद है। और अधर्म है उसकी खोज जो हमारे भीतर मौजूद नहीं है, और हम लाख करके जिसे पा भी लें तो भी कभी पा न सकेंगे।
‘रामनाम जान्यो नहीं, भई पूजा में हानि।
कहि रहीम क्यों मानिहैं, जम के किंकर कानि।।’
और टालना मत, मत कहना कि कल। जिसने कल पर टाला, उसने सदा के लिए टाला।
करीब मौत खड़ी है, जरा ठहर जाओ।
फिजां से आंख लड़ी है, जरा ठहर जाओ।।
थकी-थकी सी फिजाएं, बुझे-बुझे तारे।
बड़ी उदास घड़ी है, जरा ठहर जाओ।।
नहीं उम्मीद कि हम आज की सहर देखें।
ये रात हम पे कड़ी है, जरा ठहर जाओ।।
अभी न जाओ कि तारों का दिल धड़कता है।
तमाम रात पड़ी है, जरा ठहर जाओ।।
फिर इसके बाद कभी हम न तुमको रोकेंगे।
लबों पे सांस अड़ी है, जरा ठहर जाओ।।
दमे-फिराक में जी भर के तुझ को देख तो लें।
ये फैसले की घड़ी है, जरा ठहर जाओ।।
मौत हमेशा करीब खड़ी है। और हमेशा यह फैसले की घड़ी है। इसे टालना मत, स्थगित मत करना, कहना मत कि कल। और यही लोग कर रहे हैं। आज करेंगे व्यर्थ, सार्थक कल। आज खोजेंगे धन, ध्यान कल। आज पद और प्रतिष्ठा, परमात्मा कल।
नहीं, बदलो इस पूरे गणित को बदलो। परमात्मा आज! ध्यान आज! तो ही तुम्हारे जीवन में क्रांति हो सकती है। और ऐसी क्रांति, जो तुम्हें अमृत के सागर में लीन कर दे। ऐसी क्रांति, जो तुम्हें मृत्यु के पार ले जाए। ऐसी क्रांति, जिसको पाते ही सब पा लिया जाता है।
ओशो, आपको पांच वर्ष से पढ़ और सुन रहा हूं और शिविर में भी भाग लेता हूं, लेकिन अभी तक संन्यास नहीं ले पाया। जिन मित्रों को मैंने आपके बारे में बताया, उनमें से पांच मित्र संन्यास ले चुके हैं। मैं विचित्तरसिंह खानदान से हूं, लेकिन बहुत ही डरपोक हूं। मेरी समझ में कुछ नहीं आता। आप कृपा करके कुछ मार्ग-दर्शन करें।
इस दुनिया में जहां मौत घटनी ही है, भयभीत होने का क्या कारण? जहां मौत अपरिहार्य है, वहां डरने की क्या जरूरत? देर-अबेर मरना ही होगा।
इतना ही तुमसे कह सकता हूं दर्शन सिंह, यदि मुझे सुन रहे हो, यदि मुझे समझ रहे हो, और यदि प्राणों में प्यास भी उठती है संन्यास की, तो टालो मत। और मत अपने को समझाओ कि मैं डरपोक हूं। लोग ज्यादा से ज्यादा पागल ही कहेंगे न! सो कौन सा हर्ज है? यूं भी लोग क्या कहते होंगे तुम्हारे संबंध में, तुम भी जानते हो, लोग भी जानते हैं।
एक राजनेता के संबंध में एक अखबार में खबर छपी। राजनेता बहुत नाराज था। उसने अपनी पत्नी से कहा कि मुकदमा चलाऊंगा। पत्नी ने कहा, इतने उत्तेजित न हो। जो छपा है अखबार में, नब्बे प्रतिशत लोग तो ऐसा मानते ही हैं कि तुम बेईमान हो, चोर हो, लुटेरे हो। तुम्हीं क्यों, राजनीति का सारा धंधा ही यही है। अखबार में न भी छपता तो भी लोग यही मानते। सो नब्बे प्रतिशत को तो कोई खास फर्क पड़ेगा नहीं। वे तो पहले से ही जानते थे, वे इतना ही पढ़ कर कहेंगे--अरे हमें मालूम ही था। रहे दस प्रतिशत, इनमें से पांच प्रतिशत तो पढ़ेंगे ही नहीं। वे तो अखबार उलटते हैं, पढ़ते थोड़े ही हैं। और उनको क्या पड़ी तुम्हारी! अपनी-अपनी तो सम्हल नहीं रही, दूसरों की कौन चिंता ले! बचे पांच प्रतिशत, इन पांच प्रतिशत को तुम लाख उपाय करो तो भी समझा न सकोगे। क्योंकि ये पांच प्रतिशत तुम्हारी चोरी में, बेईमानी में, धोखाधड़ी में सब सहयोगी हैं। बेहतर है तुम चुप ही रहो। अब नाहक शोरगुल मचाने से क्या सार है?
दर्शन सिंह, लोग क्या कहेंगे, यह डर संन्यास से रोकता है। मगर क्या कहेंगे? ज्यादा से ज्यादा यही कहेंगे न कि पागल हो गए! लेकिन व्यर्थ जीने से और व्यर्थ मर जाने से पागल हो जाना ज्यादा बेहतर है। सच तो यह है कि यही लोग हैं जिन्होंने बुद्ध को भी पागल कहा था; यही लोग हैं जिन्होंने महावीर को भी पागल कहा था। तो अगर ये तुम्हें भी पागल कहें तो तुम्हें अच्छी कोटि में रख रहे हैं, ढंग के लोगों के साथ तुम्हारी गिनती कर रहे हैं। कुछ बुरा नहीं।
बुद्धों के साथ पागल हो जाना बुद्धुओं के साथ होश से भरे होने से लाख दर्जा बेहतर है। यूं क्या घबड़ाना? क्या डर है? पत्नी हंसेगी? सो हंस लेगी। उस गरीब का भी थोड़ा मनोरंजन हो जाएगा। बच्चे पूछेंगे कि डैडी, आपको क्या हो गया? सो सीधा-सीधा कह देना--दीवाने हो गए। सरदार तो हो ही, अब दीवानगी में क्या बिगड़ जाएगा?
और यह कोई नयी बात तो नहीं। जो लोग नानक के साथ गए, वे भी दीवाने थे। जो जीसस के साथ गए, वे भी दीवाने थे। यह तो पुरानी कथा है।
खोने को क्या है? क्या कोई तुमसे छीन लेगा? और हर घड़ी फैसले की घड़ी है। कहीं ऐसा न हो कि तुम इन्हीं दो कौड़ी के लोगों के मंतव्यों का विचार करते-करते जीवन को गंवा दो। और तब ये उठा कर तुम्हारी अरथी को जला आएंगे और लौट कर भी न देखेंगे, निशान भी न रह जाएगा। जिस दुनिया में निशान भी मिट जाने हैं, उस दुनिया के मंतव्यों का क्या हिसाब रखना! खोओगे तो तुम कुछ भी नहीं, लेकिन पा बहुत सकते हो। यह सौदा करने जैसा है।
लेकिन मैं जानता हूं कि बात कहां अटकती है। हमारा अहंकार लोगों के मंतव्यों पर निर्भर होता है। और जब वे अपने मंतव्य बदलने लगते हैं, हमारा अहंकार खिसकने लगता है। उन्हीं की ईंटों से बना है। उन्हीं ने कहा था बड़े समझदार, तो हम अपने को समझदार मान कर बड़े अकड़े-अकड़े चल रहे थे। वे ही कहने लगे पागल, तो हमारी क्रीज निकल जाती है।
क्या उधार जी रहे हो! इसके पहले कि वे तुम्हें पागल कहें, तुम खुद ही लौटा दो उनका सम्मान। उनका सत्कार ही क्यों लेते हो? उनका सत्कार लेना बहुत खतरनाक है, क्योंकि उसके पीछे बड़े राज छिपे हैं। अजीब-अजीब बातें लोगों ने गढ़ रखी हैं।
एक पत्र मुझे कल मिला है। बहुत दूर से नहीं, अहमदनगर से। जिन्होंने लिखा है, कभी यहां आए नहीं। कुछ ही मीलों का फासला है, पूना आते ही होंगे। पत्र में जो लिखा है, वह विचारणीय है। पत्र में लिखा है कि महान पुरुष हमेशा जनता के पास जाते हैं। आप जनता के पास क्यों नहीं जाते?
अब पहले तो वे मुझे प्रलोभन दे रहे हैं महापुरुष होने का। मुझ पर ये जालसाजियां नहीं चलतीं। स्वभावतः कोई भी फंस जाएगा। अगर महापुरुष होना है तो जनता के पास जाओ; क्योंकि महापुरुष जनता के पास जाते हैं। तो पहले तो रिश्वत। मगर रिश्वत जरा सावधानी से लेना।
मैं तो मानता ही नहीं कि कोई महापुरुष है और कोई हीन-पुरुष है। यह बात ही गलत है। यह बात ही बेहूदी है। यह विभाजन अहंकार का है। कौन महान, कौन हीन? यहां सिर्फ एक भगवत्ता है।
मैं कोई महापुरुष नहीं। महापुरुष होने की आकांक्षा सिर्फ उन्हीं लोगों में होती है जो हीनता की ग्रंथि से पीड़ित होते हैं। जो अपनी हीनता को छिपाना चाहते हैं, वे महापुरुष होने का ढोंग रचते हैं। मुझ पर यह जालसाजी नहीं चलती। मैं तो जो हूं--हूं, न महापुरुष, न हीन-पुरुष। इसलिए मैं क्यों जाऊं जनता के पास?
फिर जिसको प्यास हो वह कुएं के पास आता है। कुएं कोई लोगों के पीछे नहीं घूमते, कि ऐ भाई, कहां जा रहे हो? अरे जरा ठहरो, जरा स्वाद ले लो। और इस तरह अगर कोई करता हो तो वह कुआं नहीं होगा, भिश्ती होगा।
उन सज्जन ने यह भी लिखा है कि आपको जनता के पास जाना चाहिए, जनता की सेवा करनी चाहिए।
क्यों? न मैंने जनता का कुछ बिगाड़ा, न जनता ने मेरा कुछ बिगाड़ा; क्यों मैं सेवा करूं? भगवान ने उन्हें हाथ-पैर दिए हैं, वे खुद ही अपने हाथ-पैर दबा लें या एक-दूसरे के दबा लें, जो उन्हें करना हो करें।
और मजा यह है कि ये सज्जन अहमदनगर में क्या कर रहे हैं? यह सेवा की धारणा! मगर ये सब जालसाजियां हैं समाज की। समाज सिखाता है ये बातें कि सेवा करो तो तुम महान। फिर जिसको महान होना है, उसको बेचारे को सेवा करनी पड़ती है। फिर वह ढूंढता है कोई परचुरे शास्त्री, जैसे महात्मा गांधी ने ढूंढ लिए थे, तो फिर बैठे हैं कोढ़ी के पैर दबा रहे हैं। अगर महात्मा होना है तो कोढ़ी के पैर दबाने पड़ेंगे।
मुझे महात्मा होना नहीं। मुझे किसी परचुरे शास्त्री की जरूरत नहीं है। मैं मजे में हूं। महात्मा होने से मुझे क्या लेना-देना? महात्मा होकर मुझे क्या मिल जाएगा?
लेकिन ये हमारी धारणाएं हैं। और इन धारणाओं के पीछे हजारों साल का जाल है। और यह जाल इतना गहरा हो गया है कि हम भूल ही गए हैं। एक तरफ गरीबों को पैदा करो और दूसरी तरफ गरीबों की सेवा करो! एक तरफ लोगों को नंगे और भूखे रहने दो और दूसरी तरफ जाकर कपड़े बांटो! यह कैसा षड्यंत्र है? इसकी कोई जरूरत नहीं है। दुनिया को महापुरुषों की और हीन-पुरुषों की कोई आवश्यकता नहीं है।
और हर आदमी को हम यह समझा रहे हैं...। उन्होंने पत्र में मुझे लिखा है कि आपसे यह अपेक्षा है, जैसे महात्मा, हमारे अतीत के ऋषि-मुनि जीवन जीते थे, आदर्श जीवन, और उसी आदर्श जीवन का लोगों को शिक्षण देते थे, आप भी दें।
मैं क्यों किसी की अपेक्षा पूरी करूं? मैं अपना मालिक हूं। मुझे अपना जीवन जीना है। ये कोई मूढ़, जो अहमदनगर में निवास करते हैं, इनकी अपेक्षा मैं क्यों पूरी करूं? मैं इनसे किसी अपेक्षा की आशा नहीं रखता कि ये पूरी करें। अपेक्षा का क्या नाता? और अगर तुम्हारे ऋषि-मुनियों को अच्छा लगता था कुछ करना तो वे करते थे, जो मुझे अच्छा लग रहा है वह मैं कर रहा हूं। न तो मैं तुम्हारे ऋषि-मुनियों से कहता हूं कि मेरे अनुसार चलो, न उन्हें कोई हक है कि वे मुझसे कहें कि उनके अनुसार चलूं। मुझे तुम्हारे ऋषि-मुनियों में कुछ खास दिखाई भी नहीं पड़ता। हां, तुम्हारी अपेक्षाएं वे पूरी कर रहे थे, इसलिए तुम्हें कुछ दिखाई पड़ता है; क्योंकि तुमने अपेक्षा के नाम पर उनको गुलाम बना रखा था।
यह बड़े मजे की बात है! तुम्हारे महापुरुष भी तुम्हारे दो कौड़ी के आदमियों के गुलाम होते हैं। राज बड़ा सूक्ष्म है, क्योंकि वे दो कौड़ी के आदमी तय करते हैं अपेक्षा। अगर दो कौड़ी के आदमी तय करते हैं कि महात्मा को नग्न खड़ा होना चाहिए, तो महात्मा नग्न खड़ा होता है। अगर महात्मा होना है तो नग्न खड़े होओ। अगर महात्मा नहीं होना, तुम्हारी मर्जी। गणित साफ है। मगर निर्णायक कौन है? वे दो कौड़ी के आदमी निर्णय कर रहे हैं कि अगर महात्मा होना है, अगर हमसे सर्टिफिकेट चाहिए महात्मा होने का, तो हमारी अनुकूलताएं, हमारी आकांक्षाएं, हमारी अपेक्षाएं पूरी करो।
और जो भी व्यक्ति इस दुनिया में किसी और की अपेक्षा पूरी करता है, वह तो व्यक्ति ही नहीं है, महात्मा वगैरह तो बहुत दूर की बात है। वह तो मशीन है। उसमें तो अभी आत्मा का भी प्रारंभ नहीं हुआ। उसके भीतर कोई ज्योति नहीं है। वह तो गुलाम है। मगर उस गुलामी को भी खूब चाशनी चढ़ा कर पेश किया जाता है। अगर तुम उनके महात्मा की तरह व्यवहार करोगे तो वे तुम्हारे चरणों में गिरेंगे।
मगर मुझे कोई जरूरत नहीं किसी के मेरे चरणों में गिरने की। कोई लाभ भी नहीं। नाहक मेरे पैर को और चोट इत्यादि पहुंचा दो या तुम्हारे सिर को चोट वगैरह लग जाए, क्या फायदा! और तुम्हें बहुत ही शौक हो तो योगासन सीख लो, अपने ही चरण छू रहे हैं! स्वावलंबन भी रहेगा, व्यायाम भी होगा, और घर की बात घर में रही, बाहर भी न गई।
दर्शन सिंह, तुम्हारी अड़चन यह होगी कि लोग क्या कहेंगे! क्योंकि लोग वही करते हैं जो मछलीमार मछलियों के साथ करते हैं--कांटे पर आटा लगा देते हैं। मछली कांटे को नहीं निगलेगी, आटे को निगल जाती है। और आटे को निगला कि कांटे में फंसी। फिर मछली कितना ही कहे कि मैं तो आटा निगलती थी। यह मछली का इरादा था आटा निगलने का, लेकिन जिसने आटा लटकाया था वह कोई बेवकूफ है, उसका कोई दिमाग खराब है? उसका प्रयोजन कुछ और था।
तो दर्शन सिंह, लोग तुम्हारे आस-पास आटा लटकाए बैठे हैं। तुम आटा गटक लो तो वे कहें--वाहे गुरुजी की फतह! वाहे गुरुजी का खालसा! चित्त प्रसन्न हो जाए, तालियां बज जाएं। और अगर तुम आटा न निगलो तो वे नाराज तो होंगे, क्योंकि उनके इरादे पूरे न हुए, वह कांटा जो छिपा बैठा था भीतर वह बेकार चला गया; मछली हाथ से निकल गई।
संन्यास समाज की अपेक्षाओं से मुक्ति का नाम है। संन्यास दो कौड़ी के लोगों की गुलामी से मुक्ति का नाम है। समाज है एक दासता का सिलसिला और संन्यास है स्वतंत्रता की घोषणा। मैं तुम्हें कोई भी और प्रलोभन नहीं दे रहा हूं, सिर्फ इतना कह रहा हूं, अपनी आत्मा का थोड़ा सम्मान करो! थोड़ी अपनी आत्मा को सादृत बनाओ! यूं दो कौड़ियों पर मत बेचो।
आदमी जिस दिन अपने भीतर का सम्मान शुरू करता है, उसी क्षण राम के करीब आना शुरू हो जाता है। समाज की अपेक्षाएं तुम्हें बाहर भटकाए रखती हैं; जैसे ही तुमने उन सारी अपेक्षाओं को छोड़ा, उसी दिन तुम्हारी घर की तरफ वापसी शुरू हो गई।
बात तुम्हें रुचती हो, आनंदित करती हो, तो सारे भयों को एक तरफ हटा कर रख दो। क्योंकि भयभीत जीना जिंदगी में जंग खाने जैसा है, जैसे तलवार जंग खा जाए। निर्भय होकर जीओ। एक ही जीने का ढंग है दुनिया में--निर्भय होकर जीओ। और जो निर्भय होकर जीता है, परमात्मा उसका पुरस्कारहै।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Is death truly only for the body?
According to Osho, death belongs only to the outer husk—the body and ego—not to the inner life-seed. When the ego dissolves, the imprisoned soul flowers into fragrance that rises upward; life is fulfilled through love, surrender, and meditation, not dissection by reason. What appears to die is merely the shell; your real essence is the invisible presence that blossoms beyond decay.
In simple terms: Like a seed losing its shell to become a flower, your body and ego can die, but the real you doesn’t—it blooms.
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According to Osho, living with gratitude means honoring the world and life as sacred while avoiding extremes; it keeps you in the 'supreme middle,' like a tightrope walker, where balance, music, and intelligence arise. Gratitude roots spirituality in real life—feeding the body so meditation can flower—and prevents consoling fantasies that excuse slavery or poverty, fostering engaged, creative, and free living.
In simple terms: Be thankful for life as it is, care for your needs, and grow inside at the same time—stay balanced, not extreme.
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