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Questions in this Discourse
ओशो, प्रश्न कुछ बनता नहीं। पता नहीं कुछ पूछना भी चाहती हूं या नहीं। पर आपसे कुछ सुनना चाहती हूं--मेरे लिए। मेरा नाम मत लेना।
जैसी तेरी मर्जी! नहीं लेंगे नाम। ऐसे भी किसी का कोई नाम नहीं है। नाम तो बस एक झूठ है! जैसे और बहुत झूठों में हम जीते हैं, वैसे ही नाम को भी अपना मान कर जी लेते हैं। अपना कुछ पता नहीं। और यह बात खलती है, अखरती है कि हमें अपना पता नहीं। तो झूठा पता, झूठा नाम, समझा लेते हैं अपने मन को कि नहीं-नहीं, पता है।
नाम लेकर तू आई नहीं थी, नाम लेकर तू जाएगी भी नहीं। नाम तो बस बीच का झमेला है। दे दिया औरों ने; दे देना जरूरी था; जगत-व्यवहार है। पर भ्रांति हमारी ऐसी है कि व्यवहार को हम सत्य समझ लेते हैं। लोग नामों के लिए जीते हैं और नामों के लिए मरते हैं। नाम, जो कि सरासर झूठ है! किसका क्या नाम है? हम सब अनाम हैं। हमारे भीतर के सत्य का न तो कोई रूप है, न कोई व्याख्या है, न कोई सीमा है। हम असीम हैं, अनिर्वचनीय हैं, अव्याख्य हैं। हमारा होना विराट है। नाम से बंध कर हम छोटे हो जाते हैं।
नींद में भी तुझे तेरा नाम भूल जाता है, तो मौत की तो बात ही क्या! न मालूम कितने तेरे जन्म हुए होंगे और न मालूम कितने तेरे नाम हुए होंगे, अब किसी की भी याद नहीं है। सब पानी पर पड़ी हुई लकीरों जैसे मिट गए। रेत पर बनी लकीर भी नहीं है नाम, क्योंकि रेत पर बनी लकीर भी थोड़ी देर टिके, टिक सकती है, पानी पर खींची गई लकीर है, टिकती ही नहीं। और कितनी बार नहीं हम उसी-उसी भ्रांति में पड़ते हैं।
सूफियों की कहावत है कि आदमी ही अकेला एक गधा है जो उसी गड्ढे में दोबारा गिरता है। कोई गधा नहीं गिरेगा--उसी गड्ढे में। एक दफा गिर गया तो समझ गया। गधे भी इतने गधे नहीं हैं। गधों में भी कुछ सूझ-बूझ है। और किसी गड्ढे में गिर जाए, मगर उसी गड्ढे में नहीं गिरेगा। एक दफा गिर कर देख लिया। लेकिन आदमी ऐसा गधा है, गड्ढे भी नहीं बदलता; उन्हीं-उन्हीं गड्ढों में बार-बार गिरता है, फिर-फिर गिरता है। जैसे आदमी होश में ही नहीं है!
मुल्ला नसरुद्दीन एक रात खूब पीकर लौटा। एक ही झाड़ उसके मकान के सामने है--एक नीम का झाड़। डोल रहा था, आंखें चकरा रही थीं, तो एक झाड़ अनेक झाड़ दिखाई पड़ता था। उसे तो लगा कि नीम का एक जंगल लगा हुआ है। बहुत घबड़ाया कि कैसे इस जंगल से निकल पाऊंगा! कहीं टकरा न जाऊं किसी झाड़ से! इतने झाड़! बहुत बचने की कोशिश की, मगर टकरा गया। झाड़ से चोट खाई, पीछे हटा, फिर सम्हला। अब की बार सम्हल कर निकलने की कोशिश की। मगर झाड़ ही झाड़ थे, चारों तरफ झाड़ ही झाड़ थे, बचे भी तो कैसे बचे! फिर टकरा गया। और जब चार-छह बार ऐसा टकराया तो जोर से चिल्लाया कि भाई कोई है, बचाओ! मैं जंगल में खो गया हूं! उसकी पत्नी ने ऊपर से खिड़की खोली और कहा कि कुछ होश की बातें करो। एक नीम का झाड़ है। आवाज मैं भी सुन रही हूं तुम्हारे टकराने की। उससे बचने की कोई जरूरत भी नहीं है।
किसी तरह उसे घर के भीतर ले जाया गया। पूछा पत्नी ने कि एक ही झाड़ था, उससे इतना टकराने की क्या जरूरत थी?
तो नसरुद्दीन ने कहा, आत्मरक्षा के लिए।
जैसे झाड़ कोई हमला कर रहा हो! और एक झाड़ से कैसे कोई बार-बार टकरा रहा है? उसे एक नहीं दिखाई पड़ रहा है। और यहां तुम्हीं भटके हो, ऐसा नहीं है। यहां सभी भटके हैं। तुम जिनसे सलाह लो, वे भी भटके हैं, उन्हें भी बहुत झाड़ दिखाई पड़ रहे हैं।
नसरुद्दीन को उसकी पत्नी ले गई मनोचिकित्सक के पास और कहा कि इनके लिए कुछ करिए, इन्हें कुछ दिनों से एक चीज तीन दिखाई पड़ती है। मनोवैज्ञानिक ने नीचे से ऊपर और चारों तरफ गौर से देखा और कहा, पांचों की तीन चीजें दिखाई पड़ती हैं?
उसको एक की पांच चीजें दिखाई पड़ती हैं। यहां तुम्हीं नहीं भ्रांत हो, तुम्हारे सलाहकार तुमसे और भी ज्यादा भ्रांत हैं। तुम्हारे पंडित तुमसे और भी गहरे गड्ढों में गिरे हैं--शास्त्रीय गड्ढों में गिरे हैं, शाब्दिक गड्ढों में गिरे हैं। और उन्होंने अपने गड्ढों को सुंदर नाम भी दे रखे हैं--कोई हिंदू, कोई मुसलमान, कोई ईसाई, कोई जैन, कोई बौद्ध। उन्होंने अपने गड्ढों को सजा भी लिया है। उन गड्ढों पर मंत्र लिख दिए हैं--गायत्री, नमोकार; कुरान की आयतें खोद दी हैं। फिर तो गिरना ही पड़ेगा। ऐसे पवित्र गड्ढों में नहीं गिरोगे तो कहां गिरोगे!
आदमी बेहोश है, आदमी के मार्गदर्शक बेहोश हैं। आदमी अंधा है, आदमी के मार्गदर्शक अंधे हैं। अंधे अंधों को चला रहे हैं। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा है।
हंसा, तेरा नाम कहां! नाम से ही छुड़ाने को तो यहां तुम्हें निमंत्रण दिया हूं। तुम्हारा नाम इसीलिए तो बदल देता हूं संन्यास देते वक्त। इसलिए नहीं कि नया नाम पुराने नाम से ज्यादा सच्चा है। नाम तो सब एक से झूठे हैं। लेकिन नाम पुराना जड़ हो गया है। बदल देता हूं। पुराना नाम तो तुम्हें मिला था, तब तुम इतने छोटे थे कि तुम्हें उसका होश भी नहीं है। सुनते-सुनते सम्मोहित हो गए हो। नाम बदल देता हूं--इस बात का स्मरण दिलाने को कि नाम तो ऊपरी चीज है, कभी भी बदला जा सकता है। यूं चुटकी में बदला जा सकता है। जब चाहो तब बदल ले सकते हो।
तुम नाम नहीं हो, यह बोध दिलाने के लिए ही संन्यास में तुम्हारा नाम बदला जाता है। क्योंकि बदलाहट के बीच के क्षण में शायद तुम्हें दिखाई पड़ जाए कि अगर मैं नाम ही होता तो बदलाहट कैसे हो सकती थी!
मगर मूर्च्छा हमारी गहरी है। मूर्च्छा हमारी ऐसी है कि पुराने नाम से हम छूट नहीं पाते तो नये से पकड़ लेते हैं, नये से जकड़ जाते हैं। फिर नये को हम जोर से पकड़ लेते हैं। हमारी मुट्ठी नहीं खुलती। कुछ न कुछ पकड़ने को चाहिए। हम मुट्ठी खोलने से घबड़ाते हैं कि कहीं, मुट्ठी खाली है, ऐसा दिखाई न पड़ जाए!
इस दुनिया में सबसे बड़ी पीड़ा यही है कि कहीं यह न दिखाई पड़ जाए कि मुझे मेरा पता नहीं है, कि मैं अपने से अजनबी हूं! कहीं यह पता न चल जाए कि मैं मूर्च्छित हूं, कि मुझे इतना भी होश नहीं कि मैं कौन हूं! इससे बड़ी मूर्च्छा और क्या होगी?
तो आदमी अपने को समझाता रहता है। तुम पागल से पागल आदमी को कहो कि तुम पागल हो, वह कहेगा: क्या कहा? पागल होओगे तुम। मैं और पागल! कोई मूढ़ से मूढ़ व्यक्ति भी अपने को मूढ़ मानने को राजी नहीं। बेहोश से बेहोश आदमी अपने को बेहोश मानने को राजी नहीं। बेहोश से बेहोश आदमी भी यही चेष्टा करता है कि मैं होश में हूं।
एक और रात मुल्ला नसरुद्दीन घर लौटा है। ताला खोलने की कोशिश करता है, मगर चाबी नहीं लगती, क्योंकि हाथ कंप रहे हैं। पुलिसवाला खड़ा देख रहा है चौराहे पर। जब बहुत देर हो गई तो उसने कहा, बड़े मियां, लाओ चाबी मुझे दो, मैं खोल दूं।
नसरुद्दीन ने कहा कि चाबी तुम्हें देने की जरूरत नहीं है। चाबी तो मैं अपने सगे बाप को भी नहीं देता। तुम जरा मकान को सम्हाल लो, यह मकान बहुत कंप रहा है, चाबी तो मैं ही लगा लूंगा।
दया करके पुलिसवाला पास आया, टार्च जलाई, तो देखा, चाबी भी कहां है वहां! वह तो सिगरेट से ताला खोलने की कोशिश कर रहा है।
तब तक पत्नी भी जाग गई। उसने ऊपर खिड़की से पूछा कि दूसरी चाबी फेंक दूं? पहली चाबी कहीं भूल आए होओगे।
नसरुद्दीन ने कहा, चाबी की कोई चिंता न कर, तू दूसरा ताला फेंक दे। चाबी तो मेरे पास है, यह ताला ही कुछ गड़बड़ है।
कोई यह मानने को राजी नहीं कि मैं गड़बड़ हूं, कि मेरे हाथ में जो है वह गलत है, कि मैं भूल में हूं। सारी दुनिया होगी भूल में। सारी दुनिया होगी मूर्च्छित। सारी दुनिया होगी पागल। आदमी खुद अपने को बचाए चला जाता है।
हंसा, नहीं तेरा कोई नाम है। नहीं तेरा कोई गाम है। नहीं कुछ पता-ठिकाना है। इस सत्य का उदभावन हो जाए, तो हमारे जीवन में पहली दफा थोड़ी सी मूर्च्छा टूटती है, थोड़ा सा होश जगना शुरू होता है।
चहल-पहल की इस नगरी में हम तो निपट बिराने हैं,
हम इतने अज्ञानी निज को हम ही स्वयं अजाने हैं।
इसीलिए हम तुमसे कहते
दोस्त हमारा नाम न पूछो,
हम तो रमते-राम सदा के
दोस्त हमारा गाम न पूछो,
एक यंत्र सा जो कि नियति के
हाथों से संचालित होता--
कुछ ऐसा अस्तित्व हमारा,
दोस्त हमारा काम न पूछो।
यहां सफलता या असफलता--ये तो सिर्फ बहाने हैं;
केवल इतना सत्य कि निज को हम ही स्वयं अजाने हैं।
चरणों में कंपन है, मस्तक पर शत-शत शंकाएं हैं;
अंधकार आंखों में, उर में चुभती हुई व्यथाएं हैं!
अपनी इन निर्बलताओं का--
हम कहते हैं--हमें ज्ञान है,
इसीलिए हम ढूंढ़ रहे हैं
जो शाश्वत है, जो महान है।
जितने देखे--मिटने वाले,
जितने देखे--मरने वाले,
जीवन औ’ निर्माण लिए जो--
प्रेम अकेला शक्तिवान है।
बुरा न मानो जनम-जनम के हम तो प्रेम दिवाने हैं।
इसीलिए हम तुमसे कहते हम तो निपट बिराने हैं।
एक जलन सी है सांसों में, एक पुलक है प्राणों में,
हमें नहीं कुछ भेद दीखता कलियों में, पाषाणों में।
कोमलता का प्रश्न सदा से
इन आंखों में कितना जल है?
औ’ कठोरता पूछ रही है--
मन में बोलो कितना बल है?
हमें दूसरों से क्या मतलब?
अपने से उत्तर पाना है,
उलझे-उलझे केवल हम हैं,
यह दुनिया तो सहज सरल है।
पाप-पुण्य, यश-अपयश, सुख-दुख सब जाने-पहचाने हैं,
एक अकेले हम ही जग में अपने लिए अजाने हैं।
नहीं किसी से हमको कटुता, नहीं किसी पर क्रोध हमें;
नत-मस्तक, श्रीहत कर देना अपना ही अवरोध हमें।
दोस्त हमारी तरह विश्व के
सब प्राणी हैं खोए-खोए।
अरे हंसे कब अपने मन से?
अपने मन से कब वे रोए?
निरुद्देश्य से, लक्ष्यहीन से
सब अभाव में भटक रहे हैं,
करुणा-दया मांगते हैं वे
अपनी अपनी व्यथा संजोए।
देख चुके हम गिरते-लुटते कितने महल-खजाने हैं,
और इसी से हम कह उठते हम तो निपट बिराने हैं।
हम ममता लेकर आए हैं, ममता देने आए हैं,
ममता वालों के बोलो कब अपने और पराए हैं।
इसीलिए हम तुमसे कहते
दोस्त व्यर्थ का नाम-गाम है,
हम फकीर युग-युग के हमको
बंधन से क्या यहां काम है?
कैसा संचय? खाली हाथों,
आना और चले जाना है;
धन-वैभव हो तुम्हें मुबारक,
अपना दाता दोस्त, राम है।
भले हमें तुम मूरख समझो, हम तो बड़े सयाने हैं,
इस अज्ञान भरी दुनिया में, हम भी बड़े अजाने हैं।
एक ही बात खयाल में आ जाए--
चहल-पहल की इस नगरी में हम तो निपट बिराने हैं,
हम इतने अज्ञानी निज को हम ही स्वयं अजाने हैं।
नहीं हमें हमारा परिचय है, नहीं हमें हमारा बोध है, नहीं हमें हमारी पहचान है। धर्म और क्या है? आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया! भीतर एक दीये को जलाना है, ताकि जो हम हैं उसे भर आंख देख सकें, पहचान सकें। साक्षी बनना है, जागरूक होना है। और तब तुम पाओगे: न तो देह हो तुम, न मन हो तुम। तो नाम क्या? जाति क्या? देश क्या? धर्म क्या?
इसीलिए हम तुमसे कहते
दोस्त हमारा नाम न पूछो,
हम तो रमते-राम सदा के
दोस्त हमारा गाम न पूछो,
एक यंत्र सा जो कि नियति के
हाथों से संचालित होता--
कुछ ऐसा अस्तित्व हमारा,
दोस्त हमारा काम न पूछो।
जब तक मनुष्य साक्षी नहीं है, जब तक स्वयं के भीतर जागृति का दीया नहीं जला है, जब तक ध्यान की ज्योति नहीं जगमगाई है, तब तक तुम एक यंत्र हो। होश में नहीं, बेहोश चले जा रहे हो। तुम जो भी कर रहे हो, तुम नहीं कर रहे हो, बस प्रकृति की अंधी शक्तियां तुमसे करवाए लिए जा रही हैं। तुम प्रेम करो कि घृणा, तुम मैत्री बनाओ कि शत्रुता, तुम परिवार बसाओ, आकांक्षाएं संजोओ, महत्वाकांक्षाओं की यात्राएं करो, या कि ऊब कर, थक कर सब छोड़-छाड़ कर जंगल भाग जाओ, इससे कुछ भी न होगा। यह सब अंधी शक्तियों की दौड़ है।
यहां सफलता या असफलता--ये तो सिर्फ बहाने हैं;
केवल इतना सत्य कि निज को हम ही स्वयं अजाने हैं।
तुम सफल हो जाओ तो, तुम असफल हो जाओ तो--सब बहाने हैं; अपने को भुलाए रखने के अलग-अलग ढंग हैं। और लोगों ने बहुत ढंग ईजाद कर लिए हैं। करने पड़ते हैं, नहीं तो कहीं न कहीं से यह बात कांटे की तरह चुभने ही लगेगी कि यह जीवन हाथ से ही निकला जा रहा है, क्षण-क्षण करके जीवन की गागर रीती जा रही है, बूंद-बूंद करके--और अभी तक अपने से पहचान भी नहीं हुई! और कौन जाने मौत कब द्वार पर दस्तक दे दे! एक क्षण का भरोसा नहीं है, वहां हम कितने आश्वस्त हैं, कितनी व्यर्थ की बातों में लगे हैं! जैसे कि हमें सदा यहां रहना है! कितने दीवाने हैं हम! और हमारी जीवन-प्रक्रिया क्या है? यंत्र से ज्यादा नहीं। जैसे बटन दबाओ, बिजली जल जाए; बटन दबाओ, बिजली बुझ जाए--ऐसी तुम्हारी बटनें हैं। दबा दो, क्रोध में आ गए; दबा दो, प्रसन्न हो गए; दबा दो, दुखी हो गए; दबा दो, सुखी हो गए।
तुम भी भलीभांति जानते हो कि तुम्हारी बटनें हैं। हर आदमी अपना-अपना स्विच-बोर्ड टांगे हुए चल रहा है। और तुम यह भी जानते हो कि दूसरों की भी बटनें हैं। और रोज तुम्हारी बटनें दबाई जाती हैं और तुम भी दूसरों की बटनें दबाते हो। और तुम जानते हो कि दूसरे भी यंत्रवत व्यवहार करते हैं और तुम भी यंत्रवत व्यवहार करते हो।
बाल्या भील, जो पीछे बाल्मीकि बना, हत्यारा था, लुटेरा था। लूटने गया था--और उस दिन लुट गया। क्योंकि नारद से मुलाकात हो गई।
कभी-कभी ऐसे व्यक्ति मिल जाते हैं, जिनके हाथों लुट जाना होता है। तुम चाहे लूटने ही जाओ, तो भी लुट जाते हो। कभी-कभी ऐसे होश से भरे व्यक्ति मिल जाते हैं, जिनके सामने झुक ही जाना होता है। नारद को उसने तो पकड़ लिया। उसने तो अपनी तलवार निकाल ली। मगर न नारद को उसकी तलवार की फिक्र है, न उसके खूंखार चेहरे की, न उसकी आंखों की। वे तो अपनी वीणा बजा रहे हैं, सो बजा रहे हैं। वह जो वीणा से स्वर चल रहा था, अखंड चल रहा है। उसमें व्याघात नहीं हुआ। अंगुलियां रुकी नहीं, तार थमे नहीं, गीत ठहरा नहीं।
चौंका बाल्या। उसने दो ही तरह के लोग देखे थे: एक, जो उसकी तलवार देख कर अपनी तलवार निकाल लेते थे; उनसे वह परिचित था। और दूसरे, जो उसकी तलवार देख कर पूंछ दबा कर भाग खड़े होते थे; वह उनसे भी परिचित था। वे दोनों ही यांत्रिक व्यवहार की बातें हैं। लेकिन यह कोई तीसरी ही तरह का आदमी है, न तलवार निकाली, न भागा। भागना तो दूर, तलवार निकालना दूर, वीणा पर चलता हुआ इसका गीत है उसमें व्याघात भी नहीं पड़ा। वही आनंद, वही मस्ती! हाथ से इशारा किया बाल्या को कि तू ठहर, पहले मेरा भजन पूरा होने दे!
भजन पूरा हुआ। पूरा होते-होते बाल्या पूरा हो गया। इस आदमी को गौर से देखा। यह आदमी उन आदमियों में से नहीं है जिनकी बटनें दबाई जा सकती हैं। इसको तुम काट भी दो तो भी इसके चेहरे पर भजन रहेगा, यही भाव रहेगा। यह मर भी जाए तो भी गीत खंडित नहीं होगा, गीत चलता ही रहेगा--किसी और लोक में, किसी और तल पर, किसी और आयाम में!
बाल्या झुक गया। बाल्या ने कहा कि क्षमा करें, एक प्रश्न मेरे मन में उठा है। मैं दो तरह के लोगों को जानता हूं। मैं अपढ़ आदमी हूं, गंवार। मगर इतनी मुझे भी पहचान है, दो ही तरह के लोग दुनिया में मैंने अब तक देखे थे। आप कुछ तीसरी तरह के आदमी मालूम होते हैं!
और नारद ने कहा कि तीसरी तरह का आदमी ही आदमी होता है। वे जो तलवार निकाल लेते हैं या भाग खड़े होते हैं, वे तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कोई डराता है, कोई डरता है; मगर दोनों ही डर के ही रूप हैं। दोनों ही भय के ही रूप हैं। अपने से कमजोर हो तो दबाओ, डराओ। अपने से ताकतवर हो तो डर जाओ, भयभीत हो जाओ। लेकिन तुम मुझे न मिटा सकते हो...तुम मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकते। क्योंकि मैंने उसे पहचान लिया है जो शाश्वत है। इसलिए तुम मुझे संचालित नहीं कर सकते, तुम मेरे मालिक नहीं हो, मैं अपना मालिक हूं।
और बाल्या ने पूछा, ऐसी मालकियत मुझे कैसे मिल सकती है?
और ऐसे बाल्या के जीवन में बाल्मीकि होने की यात्रा शुरू हुई। यह मालकियत मुझे कैसे मिल सकती है? यंत्र तो मालिक नहीं हो सकता अपना। मालिक तो सिर्फ वही हो सकता है जो समग्ररूपेण चैतन्य है।
हंसा, जागो! बेहोशी छोड़ो! यंत्रवत गति छोड़ो!
अपने सिवा और भी कुछ है
जिस पर मैं निर्भर हूं !
मेरी प्यास हो न हो जग को,
मैं प्यासा निर्झर हूं !
हटा शैल पर शैल निरंतर
अपने वक्षस्थल से,
व्यक्त कराता रहा व्यथा की
कथा तरंगित जल से !
पृथ्वी पर पथ खोज रहा जो,
मैं वह नीलांबर हूं !
चरणचिह्न जिस प्रभापुरुष के
अगम गगन के तारे;
पहुंच नहीं पाता मन जिस तक,
नयन ज्ञान के हारे;
मैं उस प्रभु की द्रवित दया का
दृगजल-बिंदु अमर हूं !
लहरों के युग भुज फैलाए,
युग-युग का संवेदन !
भुजा-पाश में आन समाए
उत्पीड़ित हतचेतन !
नव करुणायन महाकाव्य का
मैं पहला अक्षर हूं !
जो तुम ऊपर से दिखाई पड़ते हो, वह तुम नहीं हो। तुम्हारी देह तो वस्त्रों से ज्यादा नहीं है। और तुम्हारा मन भी, समझो कि थोड़े भीतर के वस्त्र। देह और मन अलग-अलग नहीं हैं। मन देह का ही भीतरी हिस्सा है; देह मन का ही बाहरी रूप है। तुम दोनों नहीं हो। तुम तो अक्षर हो--जो न कभी जन्मा, जो न कभी मरता! तुम तो उस महाकाव्य के हिस्से हो, जिसको कोई परमात्मा कहता है, कोई मोक्ष, कोई निर्वाण। तुम तो उस प्रभु की आंखों का टपके हुए मोती की तरह एक दृगजल-बिंदु हो। तुम तो उस परमात्मा का ही अंग हो, हिस्से हो; अलग नहीं। तुम्हारा नाम क्या होगा!
इसलिए उपनिषद के ऋषि अपने ब्रह्म होने की घोषणा करते हैं--अपने होने की नहीं; ब्रह्म के होने की घोषणा करते हैं।
इसलिए अलहिल्लाज मंसूर अनलहक का उदघोष करता है--अनलहक! मैं सत्य हूं! मैं नहीं हूं, सत्य है।
हमारा नाम हमें भिन्न करता है। अपने अनाम को स्मरण करो, ताकि यह भिन्नता मिटे। इस अस्तित्व से अभिन्नता सधे। हमारा रूप, हमारा रंग, हमारी जाति, हमारा वर्ण--हमें तोड़ता है। और जो भी तोड़ता है वह धर्म नहीं है। जो जोड़ता है, अनंत से जोड़ता है, वही धर्म है।
तूने पूछा, हंसा: ‘प्रश्न कुछ बनता नहीं। पता नहीं कुछ पूछना भी चाहती हूं या नहीं।’
ऐसी ही दशा है। तुम्हें पक्का भी नहीं--कुछ पूछना भी है या नहीं? कुछ-कुछ धुंधला-धुंधला लगता है। कुछ अंधेरे में टटोलता-टटोलता सा हमारा जीवन है। कोई स्पष्ट प्रश्न भी नहीं है। और जो पूछते हैं, वे प्रश्न भी उनके अपने नहीं होते, वे भी उधार होते हैं। जितने लोग स्पष्ट प्रश्न पूछते हैं, वे उधार होते हैं। और जो लोग सच में ही अपना प्रश्न पूछना चाहते हैं, उनकी दशा हंसा जैसी ही होगी; उन्हें लगेगा कि क्या पूछना है!
अक्सर स्पष्ट प्रश्न वे ही होते हैं, जो तुम्हारे नहीं हैं। जैसे: संसार को किसने बनाया?
तुम्हें क्या लेना-देना? किसी ने बनाया हो--अ ने, कि ब ने, कि स ने--क्या फर्क पड़ेगा? और किसी ने न बनाया हो तो भी क्या फर्क पड़ेगा? व्यर्थ के प्रश्न बिलकुल स्पष्ट होते हैं लोगों को। मगर ये उधार प्रश्न हैं। ये तुमने सुन लिए हैं। तुम्हारे उत्तर ही उधार नहीं हैं, तुम्हारे प्रश्न तक उधार हैं। ऐसी दयनीय दशा है।
उत्तर भी तुम दूसरों से सीख लेते हो। कोई कहता है: ईश्वर ने बनाया। कोई कहता है: यह किसी ने नहीं बनाया, यह तो सनातन है। यह तो शाश्वत है। यह तो सदा से चला आया है। जैन घर में पैदा हुए तो तुम यह बात सुनोगे कि यह तो सदा से चला आया है।
प्रकृति शब्द हिंदुओं को उपयोग नहीं करना चाहिए; वह जैनों और सांख्यों का शब्द है। प्रकृति का अर्थ है कि जो कृति के पहले से है; जिसकी कभी कृति नहीं हुई; जिसको कभी बनाया नहीं गया। जो प्र-कृति है! कृति के भी पूर्व से मौजूद है! जो सदा से ही मौजूद है! हिंदुओं को प्रकृति शब्द का, या मुसलमानों को या ईसाइयों को प्रकृति शब्द का उपयोग नहीं करना चाहिए। और जैनों को, बौद्धों को सृष्टि शब्द का उपयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि सृष्टि का अर्थ होता है: जो बना, बनाया गया। लेकिन सब गड्ड-मड्ड हो गया है। लोगों को कुछ भी साफ नहीं है। जैन सृष्टि शब्द का प्रयोग करते हुए मालूम पड़ते हैं। हिंदू प्रकृति शब्द का प्रयोग करते हुए मालूम पड़ते हैं। उन्हें साफ नहीं रहा कि ये शब्द पारिभाषिक हैं। इन शब्दों के पीछे पूरा दर्शन छिपा है।
अगर तुम जैन घर में पैदा हुए हो या बौद्ध घर में पैदा हुए हो, तो परमात्मा है ही नहीं, प्रकृति है। प्रकृति के साथ परमात्मा हो ही नहीं सकता। परमात्मा और प्रकृति का क्या लेना-देना? परमात्मा होगा तो सृष्टि के साथ हो सकता है, क्योंकि वह स्रष्टा है। प्रकृति के साथ तो उसकी कोई जरूरत ही नहीं; वह बिलकुल गैर-जरूरी परिकल्पना हो गया। उसका कोई उपयोग नहीं है। उसका कोई स्थान नहीं है। अगर जैन घर में पैदा हुए तो तुमने यही सुना है कि यह अस्तित्व सदा से है। इसलिए जैन नहीं पूछता कि यह संसार किसने बनाया। यह प्रश्न जैन नहीं पूछता। यह प्रश्न हिंदू पूछते हैं, मुसलमान पूछते हैं, ईसाई पूछते हैं; बौद्ध नहीं पूछते, सांख्यवादी नहीं पूछते। नास्तिक तो पूछेंगे ही क्यों! कम्युनिस्ट तो पूछेंगे ही क्यों! वैज्ञानिक भी नहीं पूछते कि यह संसार किसने बनाया। क्योंकि प्रश्न में ही तो कहीं उत्तर छिपा होता है। यह पूछते ही वे लोग हैं जिनको सिखाया गया है कि संसार परमात्मा ने बनाया।
अगर तुम हिंदू घर में पैदा हुए हो तो तुम्हें यह धारणा बैठ जाएगी कि संसार परमात्मा ने बनाया। और अगर तुम रूस में पैदा हुए तो यह धारणा बैठ जाएगी कि परमात्मा है ही नहीं, आत्मा है ही नहीं। सब मिट्टी का खेल है! मिट्टी से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
इसीलिए तो स्टैलिन लाखों लोगों को काट सका--बेरहमी से, बिना किसी दिक्कत के। जब मिट्टी ही है तो मिट्टी के घड़े फोड़ने में क्या दिक्कत? कोई पीड़ा न हुई उसे, कोई चिंता न पकड़ी। निश्चिंत काटता रहा। अनुमान किया जाता है कि उसने अपने पूरे शासन काल में कम से कम एक करोड़ लोग मारे। शायद दुनिया में किसी आदमी ने इतने लोग नहीं मारे। मगर एक करोड़ लोग मार कर उसके प्राणों में कहीं भी कोई पीड़ा न उठी, कोई तीर न छिदा, कोई दंश न उठा! कोई, भाले की तो बात छोड़ो, कांटा भी नहीं अटका।
उसका कारण है: उसका दर्शनशास्त्र; मार्क्सीय विचार-परंपरा। ईश्वर तो है नहीं, आत्मा तो है नहीं; मनुष्य तो केवल बस मिट्टी का पुतला है। जो चार्वाकों की भारत में धारणा थी वही मार्क्स की धारणा है। रूस में बच्चा-बच्चा जानता है कि ईश्वर नहीं है, क्योंकि वही सिखाया गया है। जिस परंपरा में तुम पैदा हुए हो, जो संस्कार तुम पर डाला गया है, वही उत्तर तुम सीख लेते हो। और आश्चर्य तो यह है कि प्रश्न भी तुम्हारे उधार हैं। उधार प्रश्न ही साफ-सुथरे होते हैं।
इस बात से मैं खुश हूं हंसा, कि तुझे पता नहीं कि कुछ पूछना भी चाहती हूं या नहीं। इसका अर्थ है कि अब तू उधार प्रश्नों और उत्तरों से मुक्त हो रही है। यह अच्छा लक्षण है। अब तू अपने धुंधलके में प्रवेश कर रही है। ऐसे ही जैसे बाहर की धूप से कोई बहुत दुपहरी में घर लौटे, तो घर के भीतर एकदम अंधेरा मालूम होता है। बैठे थोड़ा, सुस्ताए थोड़ा, तो धीरे-धीरे रोशनी दिखाई पड़ने लगती है। क्योंकि आंखों को समायोजित होना पड़ता है। जब तुम धूप में होते हो बाहर, तो तुम्हारी आंखों के जो लेंस हैं, वे छोटे हो जाते हैं, ताकि ज्यादा धूप भीतर प्रवेश न कर जाए। स्वचालित तुम्हारी आंखों के लेंस हैं। तुम्हारी पुतली छोटी हो जाती है। कभी धूप से आकर आईने के सामने देखना, तुम पाओगे कि तुम्हारी काली पुतली बिलकुल छोटी हो गई है; जितनी धूप होगी उसी अनुपात में छोटी हो गई है। उतनी छोटी पुतली लेकर जब तुम घर में प्रवेश करोगे तो एकदम अंधेरा मालूम पड़ेगा। अब पुतली बड़ी होनी चाहिए, तब तुम्हें रोशनी मालूम पड़ेगी। लेकिन पुतली को बड़ा होने में थोड़ा सा समय लगेगा। बैठो, सुस्ताओ, थोड़ा जलपान करो, धीरे से आंख की पुतली बड़ी हो जाएगी, लेंस बड़ा हो जाएगा। अब ज्यादा खुल जाएगी तुम्हारी आंख। तो जहां अंधेरा था वहां रोशनी दिखाई पड़ने लगेगी।
ठीक ऐसी ही घटना हमारे अंतर्जगत में घटती है। तुम बाहर ही बाहर भटके हो--सदियों से, जन्मों-जन्मों से--तो तुम्हारी आंख की पुतलियां बाहर के लिए आदी हो गई हैं। जब भीतर आओगे तो पहले अंधेरा मिलेगा। यह निरंतर ध्यानियों का अनुभव है। समस्त बुद्धपुरुष कहते हैं कि भीतर प्रकाश ही प्रकाश है। और जब भी कोई ध्यान करता है तो पहले उसे अंधेरा मिलता है।
मेरे पास लोग आकर कहते हैं कि यह तो बात बड़ी उलटी है! हम तो जब भी आंख बंद करके बैठते हैं तो अंधेरा ही अंधेरा! और समस्त जाग्रत पुरुषों की, सभी प्रज्ञावान पुरुषों की एक ही उदघोषणा है कि भीतर प्रकाश ही प्रकाश है। कबीर तो कहते हैं: जैसे हजारों सूरज एक साथ उग जाएं, इतनी रोशनी है! कहां है वह रोशनी? हमें तो अंधेरा दिखाई पड़ता है।
वह अंधेरा तुम्हें दिखाई पड़ता है, क्योंकि तुम बहुत जन्मों के बाद भीतर जा रहे हो। बहुत दिन धूप में रह लिए हो, आंखें तुम्हारी धूप की आदी हो गई हैं, बाहर की आदी हो गई हैं। थोड़ा समय लगेगा। थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी। थोड़ा धैर्य रखना होगा। कोई तीन महीने से नौ महीने का समय लग जाता है तब कहीं भीतर की रोशनी की थोड़ी सी झलक मिलनी शुरू होती है।
यह अच्छा लक्षण है हंसा कि तू कहती है, मुझे कुछ पता नहीं क्या पूछना है। पूछना भी है या नहीं पूछना, यह भी पता नहीं।
यह शुभ लक्षण इसलिए है कि यह उधारी से मुक्ति की शुरुआत है। अब बासे प्रश्न तो तेरे पास नहीं हैं जो औरों ने सिखाए हैं और न बासे उत्तर तेरे पास हैं। अब पहली बार निर्भार होकर भीतर गति हो रही है।
तू कहती है: ‘प्रश्न कुछ बनता नहीं।’
जैसे-जैसे शांत होती जाएगी, जैसे-जैसे अंतर्गमन होगा, प्रश्न बनेगा ही नहीं। लोग सोचते हैं कि जब हम भीतर पहुंच जाएंगे, आत्म-साक्षात्कार होगा, तो हमें सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे। गलत सोचते हैं, बिलकुल गलत सोचते हैं। उन्हें भीतर का कुछ भी पता नहीं है। जब तुम भीतर पहुंचोगे तो सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलेंगे; सभी प्रश्न गिर जाएंगे, समाप्त हो जाएंगे। उत्तर नहीं मिलेगा, प्रश्न नहीं बचेंगे। और जब निष्प्रश्न हो जाते हो, उसी दशा का नाम समाधान है, समाधि है। उत्तर कुछ भी नहीं है, लेकिन चूंकि प्रश्न नहीं बचा, इसलिए समाधान है, समाधि है। निष्प्रश्न हो जाना ही ध्यान की चरम अवस्था है।
लेकिन यहां बहुत लोग पूछते हैं, तो हंसा के मन में भी होता होगा: सब पूछते हैं, मैं भी पूछूं। कुछ पूछना चाहिए। जिज्ञासा, कुतूहल, कि इतने लोग पूछते हैं तो जरूर कुछ पूछने योग्य है!
पूछने योग्य कुछ भी नहीं है। मैं भी तुम्हें जो उत्तर दे रहा हूं, वे उत्तर नहीं हैं; तुम्हारे प्रश्नों की हत्याएं हैं। मेरा काम उत्तर देना नहीं है; मेरा काम तुम्हारे प्रश्नों को जड़ से काटना है।
इस भेद को तुम ठीक से समझ लेना। उत्तर देते हैं पंडित। उनसे तुम पूछो। उनके पास उत्तर तैयार होते हैं, रेडीमेड होते हैं। तुम पूछो नहीं कि उनका उत्तर आया। इधर तुमने पूछा कि उधर उत्तर शुरू। तुम पूरा पूछ भी नहीं पाओगे, उनका उत्तर शुरू, कि निकले गीता के श्लोक, कि उपनिषद के वचन, कि वेद की ऋचाएं, उद्धरण पर उद्धरण।
पश्चिम का एक बहुत बड़ा विचारक, कर्नल इंगरसोल, जो कि पश्चिम के श्रेष्ठतम वक्ताओं में से एक था इस सदी के, जब भी खड़ा होकर बोलता था तो पहले हाथ से कुछ इशारा करता, अंगुलियां हवा में घुमाता। लोग बड़े हैरान होते थे कि वह करता क्या था! हमेशा! जैसे कोई जादू-मंतर! और जब खतम करता व्याख्यान, तब दूसरे हाथ से अंगुलियां हवा में घुमाता और बैठ जाता। बार-बार लोग उससे पूछते, वह हंसता और चुप रह जाता। जब मर रहा था इंगरसोल, तो उसके साथियों ने पूछा कि अब तो बता जाओ! महाराज, अब तो तुम चले भी! अब तो बता दो कि वह क्या मंतर, क्या जादू? जरूर कुछ राज होगा, क्योंकि तुम जैसा बोलने वाला देखा भी नहीं। तुम बोलते क्या थे, जैसे फूल झरते थे! तुम बोलते क्या थे, तुम्हारे शब्द-शब्द में गीत था। तुम बोलते क्या थे, कि जो सुने वही मोहित हो, वही मुग्ध हो जाए। मगर इस बात का रहस्य तुम हमेशा छिपाए रहे। अब तो जा रहे हो, अब तो बता जाओ!
इंगरसोल हंसा और उसने कहा, उसमें कुछ रहस्य नहीं था, न कोई जादू-मंतर। जब मैं बोलता था, शुरू करता था, तो अपने बाएं हाथ से उद्धरण के चिह्न बनाता था--उद्धरण के चिह्न! और जब बोलना बंद करता था तो अपने दाएं हाथ से उद्धरण के चिह्न बंद करता था। मैं यह कह रहा था कि इसमें मेरा कुछ भी नहीं है, सब उधार है। यह सब किसी और का है, सब बासा है। मगर यह मैं कहना भी नहीं चाहता था साफ-साफ और छिपाना भी नहीं चाहता था। छिपाता तो मेरी अंतरात्मा को दुख होता था और कहता तो मेरे अहंकार को चोट लगती थी। सो बिना कहे सूचना दे देता था कि जो समझ सकते हों समझ लें।
पंडित के पास तो जो भी होता है, सब उद्धरणों का, अपना कुछ भी नहीं है।
मेरे पास तुम्हें देने को कोई उत्तर नहीं है। न मुझे कुरान से कुछ लेना है, न बाइबिल से, न गीता से। मेरे पास एक अंतर्दृष्टि है, एक अनुभव है, एक स्वानुभूति है। तुम जब प्रश्न पूछते हो तो मैं उत्तर देता हुआ मालूम पड़ता हूं, उत्तर देता नहीं। हां, तुम्हारा प्रश्न पकड़ कर तुमको जितना झकझोर सकता हूं उतना झकझोरता हूं। प्रश्न के बहाने तुम्हारी जड़ें जितनी काट सकता हूं काटता हूं। प्रश्न के बहाने तुम्हारे मन को जितना मिटा सकता हूं मिटाता हूं। तुम कुछ पूछो तो, तुम कुछ न पूछो तो।
अब देखते हो, हंसा ने कुछ पूछा ही नहीं। और यह घंटा पूरा होने आ गया। अब मैं हंसा की पिटाई किए ही जा रहा हूं!
हंसा कहती है: ‘प्रश्न कुछ बनता नहीं।’
बनने की आवश्यकता भी नहीं है। प्रश्न तो खुजलाहट की तरह हैं। खुजाओ, अच्छा लगता है। मगर थोड़ी ही देर में लहू निकल आएगा। अच्छा तो यही है कि न खुजाओ। मुश्किल होता है। जब खुजलाहट उठे तो न खुजाना बहुत मुश्किल होता है। बड़े संयम की जरूरत पड़ती है। उपवास करना आसान है, खुजलाहट उठे और न खुजाना बहुत मुश्किल है। ऐसी मिठास मालूम होती है खुजलाहट में, ऐसा लगता है कि नहीं खुजलाएंगे तो कुछ चूक जाएगा; खुजा लेंगे तो कुछ अमृत की वर्षा होने को है। और पता है तुम्हें कि खुजलाहट से कुछ मिलने वाला नहीं। और हो सकता है चमड़ी छिल जाए, कहीं ज्यादा लोभ में ज्यादा खुजा जाओ।
और खुजलाहट भी बड़े अजीब समयों पर उठती है, जब नहीं उठनी चाहिए। जैसे ध्यान करने बैठो। वैसे कभी न उठे। कभी पालथी मार कर ध्यान करने बैठे? सिद्धासन लगाया कि बस कहीं पैर में चींटी चलेगी। देखोगे उघाड़ कर तो चींटी वगैरह कुछ भी नहीं है। कोई कल्पना। कहीं पीठ में खुजलाहट।
एक अमरीकी महिला तो मुझ पर दया करके एक प्लास्टिक का हाथ ले आई। उसमें बैटरी भी लगी हुई थी। मैंने पूछा, यह क्या है? उसने कहा कि मैं तो जब भी ध्यान करने बैठती हूं तो मेरी पीठ में खुजलाहट उठती है। तो अमरीकी तो अमरीकी हैं, वे तो हर चीज के लिए साधन बना लेते हैं। हाथ से क्या खुजाना! और फिर पीठ में कई दफा हाथ पहुंचता भी नहीं। तो उन्होंने प्लास्टिक का हाथ बना लिया है और बैटरी उसमें लगी है। बस प्लास्टिक का हाथ कर दिया पीठ पर और बटन दबा दी तो वह प्लास्टिक का हाथ खुजला देता है। वह कहने लगी कि मुझे तो ध्यान में बड़ी झंझट एक ही होती है कि बस पीठ में खुजलाहट उठती है और ध्यान के ही वक्त उठती है। तो मैंने सोचा कि आपकी क्या दशा नहीं होती होगी! चौबीस घंटे ध्यान में रहते हैं, कितनी खुजलाहट नहीं उठती होगी पीठ में! सो इस हाथ को मैं ले आई।
वह जो खुजलाहट उठती है--कभी पैर में, कभी हाथ में, कभी पीठ में, कभी यहां, कभी वहां--वह सिर्फ शरीर कह रहा है कि मुझ पर ध्यान दो। कहां जाते हो? ऐसे कैसे चले! इतनी आसानी से न जाने दूंगा। ऐसे नाता तोड़ लोगे जन्मों-जन्मों का? चलो, वापस लौटो! यह रही खुजलाहट, आना ही पड़ेगा।
मन में भी खुजलाहट उठती है। जब तुम ध्यान करने बैठोगे, न मालूम कैसे-कैसे प्रश्न उठेंगे, जो कभी नहीं उठते। जिंदगी हो गई, काम में, धाम में लगे रहते हो। लेकिन जब शांत होकर बैठोगे तो मन न मालूम कैसे-कैसे प्रश्न खड़े करेगा! तुम खुद ही चौंकोगे कि कभी सोचा भी न था कि मेरे पास भी ऐसा दार्शनिक मन है! कि मैं भी ऐसा अदभुत विचारक हूं! कि ऐसे-ऐसे विचारों की तरंगें और लहरें आ रही हैं! लेकिन वह मन सिर्फ कह रहा है कि कहीं इतनी आसानी से जाने न देंगे। दोस्ती यूं छोड़ दोगे? नाते-रिश्ते ऐसे तोड़ दोगे? विवाह करना आसान है, तलाक देना आसान नहीं है। विवाह तो किसी से भी करना हो तो कर सकते हो। जब तलाक देने जाओगे, तब मुसीबतें आनी शुरू होती हैं। फिर अदालत है, और वकील हैं, और संपत्ति का बंटवारा है, और बच्चों का बंटवारा है, और हजार झंझटें।
मुल्ला नसरुद्दीन अपनी पत्नी को तलाक देना चाहता था। दोनों में झगड़ा बहुत हो गया। गए वकील के पास। वकील ने कहा कि ठीक है, आधा-आधा बांट लो।
नसरुद्दीन ने कहा कि देखो, कमाया सब मैंने, खून-पसीना मैंने किया और आधा-आधा!
पत्नी ने कहा कि तुम इसमें ही भला मानो कि इतने पर भी मैं राजी हूं।
ठीक, नसरुद्दीन ने कहा कि ठीक, आधा-आधा बांट लेते हैं। सवाल अड़ गया इस पर कि तीन बच्चे हैं, इनको कैसे आधा-आधा बांटें? तो पत्नी ने पकड़ा हाथ नसरुद्दीन का और कहा कि चलो घर, अगले साल आएंगे।
वकील भी बहुत चौंका! वकील ने भी कहा कि स्त्री है होशियार, कि चार करके आएंगे तब बंटवारा कर लेंगे, ऐसी क्या जल्दी पड़ी है!
वकील ने कहा कि तुझे पक्का है कि साल भर में चार हो जाएंगे?
उसने कहा, बिलकुल पक्का है।
और वकील ने कहा, तू तो अभी कह रही थी कि तेरा पति तुझे बिलकुल प्रेम ही नहीं करता और रात-रात भर नदारद रहता है और शराबखाने में पड़ा रहता है और आता भी है तो इतना पीए रहता है कि प्रेम इत्यादि करने का सवाल ही नहीं उठता। उसको होश ही नहीं रहता कि कौन कौन है, क्या क्या है। एक दिन रात को सूटकेस खोल कर बैठा हुआ था और मैंने पूछा कि क्या कर रहे हो? तो बोला, कुरान पढ़ रहे हैं।
एक रात रास्ते में कुट-पिट कर आया था, तो बचाने के लिए कि कहीं सुबह पता न चले, दर्पण के सामने खड़े होकर सारे मुंह पर उसने मलहम लगा ली। और सुबह पत्नी ने कहा कि उठ! सारा दर्पण खराब कर दिया! दर्पण पर क्यों मलहम लगाई? होश ही कहां था उनको, वह तो सोच रहा था कि अपने मुंह पर लगा रहा है, लगा रहा था दर्पण पर, जहां-जहां मुंह दिखाई पड़ रहा था वहां-वहां बेचारा लगा रहा था।
तो इसको जब इतना ही होश नहीं है कि कहां दर्पण, कहां मुंह, तुझे पक्का है कि अगले साल तक चार बच्चे हो जाएंगे?
पत्नी ने कहा कि अब तुमने बात ही छेड़ दी है तो मैं सत्य ही कहे देती हूं। अगर इस पर मैं निर्भर रहती तो तीन भी नहीं होते। इस पर निर्भर ही कौन है! तुम बेफिक्र रहो, मैं चार लेकर आऊंगी।
विवाह तो आसान है, तलाक मुश्किल मामला है। और जब तुम शरीर से और मन से तलाक देने लगते हो--और वही संन्यास है, वही ध्यान है--तो दोनों उपद्रव खड़े करते हैं, सब तरह के उपद्रव खड़े करते हैं। शरीर खींचता है: मेरी तरफ ध्यान दो! मन खींचता है: मेरी तरफ ध्यान दो! मन नई-नई वासनाएं उठाता है, मन नई-नई अभीप्साएं-आकांक्षाएं जगाता है। मन कहता है: अभी तो जवान हो। ये कोई दिन हैं ध्यान करने के? अरे ध्यान तो बुढ़ापे में किया जाता है! यह कोई समय है संन्यास का? संन्यास तो पचहत्तर साल के बाद लिया जाता है!
बड़े होशियार लोग रहे होंगे जिन्होंने तय किया था कि पचहत्तर साल के बाद संन्यास लेना। जैसे कि पचहत्तर साल के बाद भी कुछ बच रहता है संन्यास लेने को! पचहत्तर साल के बाद क्या संन्यास लेने को बच रहता है? पहली तो बात यह कि पचहत्तर साल तक तुम ही न बचोगे। वैज्ञानिक खोजें कहती हैं कि आज से पांच हजार साल पहले आदमी चालीस साल से ज्यादा जिंदा ही नहीं रहता था। जितने भी अस्थिपंजर मिले हैं अब तक आदमी के, पांच हजार साल पुराने, उनमें कोई भी चालीस साल से ज्यादा उम्र का नहीं मिला। और यह बात ठीक भी मालूम पड़ती है।
अभी भी औसत उम्र भारत जैसे देश की कितनी है? अभी भी यहां मुश्किल से कभी कोई पचहत्तर के पार हो पाता है। और कैसे-कैसे कठिन काम करने पड़ते हैं! जैसे मोरारजी देसाई बेचारे स्वमूत्र पी-पी कर जीने की कोशिश कर रहे हैं--और जी लें, और जी लें! क्या-क्या नहीं आदमी करने को राजी है! और जीकर क्या करोगे? और स्वमूत्र पीओगे! स्वमूत्र पीएंगे और जीने के लिए, और जीकर क्या करेंगे? और स्वमूत्र पीएंगे!
कभी-कभी कोई जीता रहा होगा पचहत्तर साल तक। लेकिन आम आदमी तो पचहत्तर साल के पहले कभी का खतम हो जाता है। वेदों में आशीर्वाद भी ऋषि देते हैं कि सौ वर्ष जीओ। अगर लोग आमतौर से ही सौ वर्ष जीते थे, तो यह आशीर्वाद तो आशीर्वाद नहीं होगा, अभिशाप हो जाएगा। अगर लोग आमतौर से ही सौ वर्ष जीते थे, तो किसी से कहो कि सौ वर्ष जीओ, तो वह नाराज हो जाएगा, कि यह कोई आशीर्वाद हुआ! अरे सौ वर्ष तो हम खुद ही जीएंगे, इसमें तुम्हारा आशीर्वाद क्या है? और शायद एक सौ दस वर्ष जीते, तो तुम और हमारा सौ किए दे रहे हो!
पुरानी व्यवस्था थी: पच्चीस वर्ष गुरुकुल, पच्चीस वर्ष गृहस्थ, फिर पच्चीस वर्ष वानप्रस्थ। वानप्रस्थ का मतलब जंगल जाना नहीं। वानप्रस्थ का अर्थ है: जंगल जाने की तैयारी। पच्चीस साल लगाओगे? हद हो गई! फिर पचहत्तर साल में संन्यास। पच्चीस साल फिर संन्यास, आखिरी। पचहत्तर से सौ। जैसे कि हरेक आदमी सौ साल जीता रहा हो।
लोग चालीस साल से ज्यादा नहीं जीते थे। हां, लेकिन यह हो सकता है कि उनको उम्र लंबी मालूम पड़ती हो। कई कारणों से। एक तो जिंदगी बहुत शिथिल थी। जिंदगी इतनी शिथिल थी, इतनी धीमी गति थी, बैलगाड़ी की गति थी, कि जिंदगी बहुत लंबी मालूम पड़ती हो। क्योंकि हमारी प्रतीतियां गति पर निर्भर होती हैं। अभी जिंदगी में बहुत त्वरा है, बहुत गति है। सब चीजें भागी जा रही हैं! तब हर चीज ऐसी धीमी-धीमी बह रही थी कि लगता था कि बहुत समय है। और लोगों को समय का बोध भी नहीं था। लोगों को गिनती भी नहीं थी। अब भी गांव का, देहात का आदमी, गैर पढ़ा-लिखा आदमी नहीं जानता उसकी उमर कितनी है। कौन रखे हिसाब! कैसे रखे हिसाब! उसका हिसाब उसकी दस अंगुलियों पर खतम हो जाता है। उसकी गिनती बस दस पर पूरी हो जाती है। दस पर बस आ जाता है। तो हो सकता है उसे चालीस साल ऐसे लगते हों कि बहुत जी लिया।
लोग कहते हैं कि विवाहित आदमी अविवाहित आदमियों से ज्यादा जीते हैं। ऐसा मुझे नहीं लगता। मुझे तो लगता है कि विवाहित आदमी को जिंदगी लंबी मालूम पड़ती है। काटे नहीं कटती, कि हे प्रभु, कब कटे! प्रार्थना कर-कर के...! बहुत लंबी मालूम पड़ती है।
मनोवैज्ञानिक इस सत्य से राजी हैं कि दुख में समय लंबा मालूम होता है, सुख में छोटा मालूम होता है। तुम अगर अपनी प्रेयसी के पास बैठे हो, तो घंटा ऐसे बीत जाता है जैसे मिनट। तुम्हें शक होता है कि घड़ी धोखा तो नहीं दे गई! कि घड़ी भी तो दुश्मनी नहीं कर गई! और तुम अपनी पत्नी के पास बैठे हो, तो मिनट ऐसे बीतते हैं जैसे घंटा। बीतते ही नहीं लगते। घड़ी को तुम बार-बार देखते हो, बस लगता है...कई दफा कान में लगा कर देखते हो कि बंद तो नहीं हो गई! जब कोई किसी स्त्री के पास बैठ कर घड़ी को कान में लगा कर सुनने लगे, तो समझ लेना उसकी पत्नी है। उसे शक हो रहा है कि घड़ी बंद तो नहीं हो गई! समय बीतता ही नहीं मालूम हो रहा है।
दुख में समय नहीं बीतता। सुख में समय तीव्रता से बीतता है। और दुनिया बहुत दुख में रही होगी अतीत में। तब चालीस साल सौ साल जैसे लगते रहे होंगे। लेकिन सौ साल आदमी अतीत में भी जीया नहीं था कभी। अभी भी बहुत थोड़े से लोग जी पाते हैं। और बहुत समृद्ध देश में ही लोग सौ साल की उम्र पार कर पाते हैं। लेकिन मन बहाने खोजता है। मन ने खूब बहाना खोज लिया कि पचहत्तर साल के बाद संन्यास लेना। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी! तुम निश्चिंत किए जाओ जो करना है, पचहत्तर साल के बाद संन्यास लेंगे। बचोगे ही नहीं तो संन्यास कौन लेगा?
इस मन और तन की, दोनों की तैयारी नहीं होती तुम्हें छोड़ देने की। दोनों खींचते हैं। सब तरह के प्रलोभन और आकर्षण देते हैं। ऐसे मन में प्रश्न उठते हैं। प्रश्न बस ऐसे ही हैं जैसे शरीर में खुजलाहट उठे। प्रश्न उलझाने के उपाय हैं। मैं उनके उत्तर नहीं देता। मैं तो सिर्फ तुम्हें सचेत कर रहा हूं कि इन प्रश्नों में मत पड़ना। और मैं जो उत्तर देता मालूम पड़ रहा हूं, वे उत्तर नहीं हैं, वे केवल प्रश्नों का निरसन है, उनका विसर्जन है। उनको काट कर फेंक देना है।
तू कहती है, हंसा: ‘प्रश्न कुछ बनता नहीं।’
बनाना ही क्यों? बनाने की उत्सुकता क्यों? मत बनने दे। अच्छा ही है कि नहीं बनता। अच्छी घड़ी करीब आ गई। अब निष्प्रश्न में छलांग ले।
और तू कहती है: ‘पता नहीं कुछ पूछना भी चाहती हूं या नहीं।’
यह भी अच्छी सूचना है कि तू भीतर के संध्या-काल में प्रवेश कर रही है, जहां सब धुंधला होता है, कुछ साफ नहीं होता। सब रहस्यमय होता है। और थोड़े गहरे, और थोड़े गहरे--और चीजें स्पष्ट होने लगेंगी। फिर न कुछ सुनने को रह जाता है, न कुछ पूछने को रह जाता है, न कुछ जानने को रह जाता है। हां, सदगुरु के साथ बैठने का रस होता है। सत्संग का रस होता है।
सत्संग का अर्थ समझते हो न! बस साथ बैठना। मस्तों की टोली जहां बैठ जाए! दीवाने जहां इकट्ठे हों। परवाने जहां बैठें। जहां परवाने डोलें--आनंद में, उल्लास में। जहां रसधार बहती हो, मधु-धार बहती हो। जहां सबके हृदय एक-दूसरे से जुड़े हों और तरंगित होते हों। फिर सत्संग ही रह जाता है। सदगुरु के साथ उठना-बैठना या सहयात्रियों के साथ उठना-बैठना। धीरे-धीरे सत्संग ही बचेगा। यह पूर्व-तैयारी है। जो मैं तुमसे बातें कर रहा हूं, वे सिर्फ इसलिए हैं कि तुम्हारे मन के जाल कट जाएं। मकड़ी के जाल हैं, कुछ बड़े कठिन नहीं हैं काट देने। तुमने ही बुन लिए हैं। जरा सा श्रम चाहिए--जरा सा! और जाल की तरह टूट जाएंगे, मकड़ी के जाल की तरह टूट जाएंगे।
लेकिन हम हैं अलाल। हम उतना सा भी श्रम नहीं लेते। हम तो मकड़ी के जाल को घना करते जाते हैं, और बुनते चले जाते हैं। धीरे-धीरे अपने ही बनाए हुए जालों में खो जाते हैं--अपने ही शब्दों में, अपने ही शास्त्रों में, अपनी ही धारणाओं में, अपने ही पक्षपातों में, मान्यताओं में, विश्वासों में, अंधविश्वासों में। इतनी भीड़ लग जाती है हमारे चारों तरफ कि हम उन्हीं में खो जाते हैं। फिर हमें पता ही नहीं रहता कि हम कौन हैं, किसलिए हैं, क्या प्रयोजन है। यह जीवन का मेला हम झमेले में बदल लेते हैं।
यह मेला रह सकता है--और बड़ा आनंदपूर्ण मेला है! मगर हमारे भीतर इतना झमेला हो जाता है कि कुछ भी हमें फिर सूझता नहीं; और जो भी सूझता है, गलत सूझता है। हमारी आंखों में इतने परदे हो जाते हैं, जालियों पर जालियां हो जाती हैं, कुछ का कुछ दिखाई पड़ने लगता है।
न तो प्रश्न पूछो, न उत्तर इकट्ठे करो। शून्य में चलना है। हंसा, उड़ चल वा देस! शून्य के देश में चलना है। शून्य की यात्रा करनी है। क्योंकि शून्य में ही पूर्ण का अवतरण है।
ओशो, हमें किसी से प्रेम है या मोह है, यह कैसे जाना जा सकता है?
प्रेम हो तो प्रश्न उठेगा ही नहीं। प्रश्न उठता है तो मोह ही होगा। जैसे कोई पूछे कि प्रकाश है या अंधेरा है, हम कैसे जानें? अगर तुम्हारे पास आंखें हैं, तो यह प्रश्न उठेगा ही नहीं। और अगर तुम्हारे पास आंखें नहीं हैं, तो ही यह प्रश्न उठ सकता है। अंधा ही पूछ सकता है कि प्रकाश है या अंधेरा? दिन है या रात? अंधे को पूछना ही पड़ेगा। अंधे के पास अपनी आंख नहीं है; उसे दूसरों की आंखों पर निर्भर रहना पड़ता है।
प्रेम तो हृदय की आंख है। प्रेम तो हृदय का खुल जाना है कमल की भांति। प्रेम का फूल खिलेगा और तुम्हें पता न चलेगा! यह असंभव है। ऐसा कभी हुआ ही नहीं। ऐसा नियम नहीं है जीवन का। जब प्रेम का फूल खिलता है तो पता चलता ही चलता है। छिपाना भी चाहो तो नहीं छिपता। तुम्हीं को पता नहीं चलेगा, औरों को भी, जिनको प्रेम की थोड़ी सी भी झलक मिली है, उनको भी पता चल जाएगा। क्योंकि उनको भी गंध लग जाएगी, उन तक भी तुम्हारी किरणें पहुंचने लगेंगी। जिन्होंने प्रेम को जाना है वे भी तुम्हें देख कर पहचान लेंगे कि इस व्यक्ति के जीवन में भी प्रेम जगा है, ज्योति जगी है, नूतन का आविर्भाव हुआ है।
प्रेम क्रांति है। प्रेम मृत्यु है अहंकार की। इससे बड़ी कोई क्रांति होती ही नहीं। क्योंकि जहां अहंकार मरा वहां परमात्मा आया। अहंकार ने जगह खाली की कि परमात्मा के आने के लिए अवकाश बना। प्रेम है प्रार्थना। प्रेम है परमात्मा।
लेकिन प्रश्न उठता है। प्रश्न इसीलिए उठता है कि जिसे हम जी रहे हैं वह प्रेम नहीं है, मोह है। मोह अंधा है; प्रेम के पास आंख होती है। जो लोग कहते हैं कि प्रेम अंधा होता है, गलत कहते हैं। प्रेम ही बस अंधा नहीं होता, और सब अंधा होता है।
लेकिन उनका कहना भी ठीक है। वे जब प्रेम कहते हैं तो उनका मतलब मोह से होता है, क्योंकि उनका अनुभव भी मोह का है, प्रेम का अनुभव नहीं है। वे मोह के लिए अंधा कहना चाहते हैं, प्रेम को अंधा कह रहे हैं। तुम्हारे शब्दकोशों में प्रेम और मोह में कोई भेद नहीं है। तुम्हारे जीवन के कोश में भी कोई भेद नहीं है। बस तुम्हारी हालत अंधे जैसी है। तुम चाहो भी तो भेद कैसे करोगे प्रकाश में और अंधकार में?
एक अंधा आदमी रात विदा हो रहा है एक मित्र के घर से। मित्र ने दया करके कहा कि रात अंधेरी है, अमावस की रात है, तुम हाथ में लालटेन लेते जाओ।
वह अंधा आदमी हंसने लगा। उसने कहा, मैं लालटेन का क्या करूंगा? मैं तो अंधा हूं, मुझे तो दिन में भी रात ही है। पूर्णिमा हो तो भी अमावस है। मुझे तो पूर्णिमा और अमावस में कोई भेद दिखाई पड़ता नहीं। मुझे तो दिन और रात में भी भेद नहीं दिखाई पड़ता। लालटेन का मैं क्या करूंगा? लालटेन क्या मेरे काम आएगी?
लेकिन मित्र भी तार्किक था, उसने कहा कि यह तो मैं भी समझता हूं कि तुम अंधे हो, तुम्हारे हाथ में लालटेन तुम्हारे किसी काम की नहीं। लेकिन दूसरे तो तुम्हें देख लेंगे अंधेरे में कि तुम आ रहे हो, तो कोई दूसरा तुमसे अंधेरे में न टकरा जाए। इतना ही बचाव हो जाए तो क्या कम है!
यह तर्क सही मालूम पड़ा, उचित मालूम पड़ा। अंधा राजी हो गया। लेकर लालटेन चला था। सौ ही कदम गया होगा कि एक आदमी आकर टकरा गया। अंधा तो बड़ा हैरान हुआ। उसकी लालटेन भी गिर गई और फूट गई, वह खुद भी गिर पड़ा और उसने कहा कि भई क्या है? क्या तुम भी अंधे हो? इस गांव में तो मैं अकेला ही अंधा हूं, तुम क्या परदेश से आ गए कोई और?
वह आदमी हंसने लगा, उसने कहा कि मैं अंधा नहीं हूं, लेकिन तुम्हारी लालटेन बुझ गई। तुम बुझी लालटेन लिए चल रहे हो।
अंधे आदमी को पता भी कैसे चले कि लालटेन जली है कि बुझी! उसको लालटेन पकड़ा दी तो वह चल पड़ा। ऐसे ही तुम सिद्धांतों को पकड़े हुए हो; वे बुझी हुई लालटेनें हैं। कृष्ण के हाथ में जिस गीता में ज्योति थी, तुम्हारे हाथ में उसी गीता में कोई ज्योति नहीं है। तुम्हारे हाथ उसकी ज्योति को बुझा देने के लिए पर्याप्त हैं। तुम काफी हो। तुम्हारे हाथ में और गीता में ज्योति रह जाए, यह असंभव है। तुम्हारे हाथ में तो जो पड़ेगा, तुम्हारा रंग ले लेगा। कुरान पड़ेगी तो लड़खड़ा जाएगी। बाइबिल तुम्हारे हाथ में पड़ेगी, अंधी हो जाएगी। वेद तुम्हारे हाथ में पड़ेंगे, मूर्च्छित हो जाएंगे। तुम गजब के हो! तुम्हें सिद्धांत और शास्त्र नहीं बदल पाएंगे; तुम सिद्धांत और शास्त्रों को बदल दोगे। तुम्हारे साथ तुम्हारे शास्त्र भी लड़खड़ा रहे हैं, जगह-जगह नालियों में पड़े हैं--तुम्हारे साथ। तुम जहां हो वहीं तुम्हारे शास्त्र भी होंगे।
एक आदमी रात खूब पी लिया; होशियार आदमी था, दार्शनिक था, बड़ा विचारक था। तो घर से सोच कर आया था कि जब ज्यादा पी लूंगा तो कहीं ऐसा न हो कि रास्ते में रास्ता भटक जाऊं, कि दिखाई न पड़े। तो घर से ही लालटेन लेकर गया था। जब डट कर पी ली, उठाई अपनी लालटेन और चल पड़ा। गिरा एक नाली में। टकराया एक भैंस से। उठा कर अपनी लालटेन देखी कि बात क्या है! है तो लालटेन! किसी तरह सम्हला, फिर उठा, फिर एक दीवार से टकराया। कई जगह गिरा, घुटने तोड़ लिए। सुबह उसे उठा कर लोगों ने घर पहुंचाया। बेहोश पड़ा था। और दोपहर को शराबघर का मालिक आया और कहा कि महाराज, आप रात को मेरे तोते का पिंजरा उठा लाए। यह आपकी लालटेन वापस लो और मेरा तोता मुझे वापस करो।
तब उसने गौर से देखा, खोजबीन की, तो पता चला कि हां। मगर तोता तो मर चुका था। इतना टकराया--भैंसें, दीवारें! बेचारा तोता कैसे बचता! उसने कहा कि भई यह पिंजरा ले जाओ, तोता तो चल बसा।
मगर तोते के पिंजरे को वह लालटेन समझता रहा!
तुम जब तक प्रेम को जानो न, तभी तक ऐसा सवाल उठ सकता है। दीपिका, यह पूछना कि हमें किसी से प्रेम है या मोह है, यह कैसे जाना जा सकता है? यह प्रश्न ही बताता है कि मोह है। प्रेम तो नहीं है। प्रेम हो तो तत्क्षण जाना जाता है। कुछ लक्षण इतने स्पष्ट होते हैं! जैसे जब किसी से मोह होता है तो हम उस पर निर्भर हो जाते हैं, उसके बिना सुख नहीं मिलता, अकेलापन खलता है, काटता है, दूभर होता है। लेकिन जब हमें किसी से प्रेम होता है तो हम उस पर निर्भर नहीं होते। हमारी स्वतंत्रता अखंडित रहती है। हम अकेलेपन में भी उतने ही आनंदित होते हैं जितने साथ। हमारे आनंद में कोई भेद नहीं पड़ता।
सच तो यह है कि मोह व्यक्तियों से होता है, मोह एक संबंध है; और प्रेम एक स्थिति, संबंध नहीं। प्रेम व्यक्तियों से नहीं होता। प्रेम की एक भावदशा होती है। जैसे दीया जले, तो जो भी दीये के पास से निकलेगा उस पर रोशनी पड़ेगी। वह कुछ देख-देख कर रोशनी नहीं डालता कि यह अपना आदमी है, जरा ज्यादा रोशनी; कि यह अपना चमचा है, जरा ज्यादा; कि यह तो पराया है, मरने दो, जाने दो अंधेरे में! रोशनी जलती है तो सब पर पड़ती है। फूल खिलता है, सुगंध सबको मिलती है। कोई मित्र नहीं, कोई शत्रु नहीं।
प्रेम एक अवस्था है, संबंध नहीं। मोह एक संबंध है। प्रेम तो बड़ी अदभुत बात है। जब तुम्हारे भीतर प्रेम होता है तो तुम्हारे चारों तरफ प्रेम की वर्षा होती है--जिसको लूटना हो लूट ले; जिसको पीना हो पी ले; जो पास आ जाए उसकी ही झोली भरेगी; जो पास आ जाए उसकी ही प्याली भर जाएगी। फिर न कोई पात्र देखा जाता, न अपात्र। फिर न कोई अपना है, न कोई पराया।
प्रेम तुम्हारी आत्मा का जाग्रत रूप है। और मोह तुम्हारी आत्मा की सोई हुई अवस्था है। मोह में तुम अपने से दुखी हो। इसलिए सोचते हो कि दूसरे के साथ रह कर शायद सुख मिल जाए। खुद तुम सुखी नहीं हो। अकेले में सिवाय नरक के और कुछ भी नहीं है। इसलिए दूसरे की तलाश करते हो। और बड़ा मजा यह है कि दूसरा भी तुम्हारी तलाश इसीलिए कर रहा है कि वह भी अकेले में दुखी है। अब दो गलतियां मिल कर कहीं एक ठीक होता है! दो गलतियां मिल कर दो गलतियां हो जाती हैं; दो ही नहीं, दुगनी ही नहीं, गुणनफल हो जाता है। तुम भी भिखमंगे, दूसरा भी भिखमंगा। वह इस आशा में है कि तुमसे मिलेगा आनंद; तुम इस आशा में हो कि उससे मिलेगा आनंद। दोनों एक-दूसरे को आशा दे रहे हो। दोनों लगाए अपने-अपने कांटे में आटा बैठे हो। दोनों फंसोगे। और जल्दी ही पाओगे कि कांटा निकला, आटा था नहीं। आटा ऊपर-ऊपर था; वह तो कांटे को छिपाने के लिए था। और जब कांटा छिद जाएगा, तब बड़ी देर हो गई। तब भाग निकलना मुश्किल हो गया।
पहले अकेले दुखी थे, अब दो जन मिल कर इकट्ठे दुखी होओगे। और स्वभावतः, जब दो जन इकट्ठे मिल कर दुखी होंगे तो ज्यादा दुखी होंगे। क्योंकि दोनों की कुशलता मिल जाएगी, दोनों का गणित मिल जाएगा, दोनों एक-दूसरे पर टूट पड़ेंगे और दोनों एक-दूसरे से बदला लेंगे।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी मरी, तो जब उसके ताबूत को उतारा जा रहा था घर से, तो जीने पर ताबूत--जीना संकरा था--ताबूत जरा टकरा गया। ताबूत को धक्का लगा, ढक्कन खुल गया ताबूत का और पत्नी उठ कर बैठ गई! वह अभी मरी नहीं थी। शायद बेहोश हो गई होगी, कोमा में हो गई होगी। वह तीन साल और जिंदा रही। फिर मरी। फिर सच में ही मरी। फिर ताबूत में रखी गई। और जब लोग उतारने लगे जीने से तो मुल्ला ने कहा, भाइयो, जरा सम्हाल कर! जरा जीने का खयाल रखना। क्योंकि हमको भी जीने दो! तुम्हारी जरा सी भूल के लिए तीन साल जो हमने भोगा है...।
पहले लोग अकेले दुखी हैं, फिर दोहरे दुखी हो जाते हैं।
मोह दुख लाता है। मोह तुम्हारी पीड़ा को सघन करता है। हां, शुरू-शुरू में जब तक आटा थोड़ा सा रहता है...ज्यादा देर नहीं रहता, कितनी देर रहेगा! सचाई तो कांटे की है, जो भीतर छिपा है। जब प्रेमी एक-दूसरे से मिलते हैं शुरू-शुरू में तो क्या बातें करते हैं! क्या कविताएं! क्या रोमांस! चांद-तारे तोड़ लाऊंगा तुम्हारे लिए, प्रेमी कहता है।
एक प्रेमी अपनी प्रेयसी से कह रहा था कि हिमालय लांघ जाऊंगा तेरे लिए। अरे आग बरसती हो तो भी आ जाऊंगा। तुझे बिना देखे एक क्षण नहीं रह सकता।
जब विदा होने लगे तो प्रेयसी ने कहा कि कल सांझ आ रहे हो न?
उसने कहा कि निर्भर करता है, अगर पानी न गिरा।
पहाड़ लांघना और आग की वर्षा में आ जाना, वे सब बातें हैं, प्यारी बातें हैं! अच्छी लगती हैं सुनने में, कहने में। लोग प्रफुल्लित होते हैं एक-दूसरे से इस तरह की बातें कह कर। मगर जल्दी ही इन बातों का रंग उड़ जाता है, असलियतें जाहिर हो जाती हैं। लोग रंग-रोगन लगा कर मिलते हैं, मुखौटे ओढ़ कर मिलते हैं। फिर जल्दी ही मुखौटे उतर जाते हैं। फिर असलियत दिखाई पड़नी शुरू होती है कि दोनों तरफ दुखी जन हैं, दोनों तरफ अंधकार है, दोनों तरफ भिखमंगे हैं। और अब बड़ी मुश्किल हो गई, अब छूटें कैसे! छूट कर भी जाएं तो कहां जाएं! क्योंकि और तरफ भी सब तरफ भिखमंगे ही हैं।
मोह सिर्फ एक धोखा है, थोड़ी देर को खा सकते हो। प्यारा भ्रम है, थोड़ी देर भरमा सकते हो। मगर जल्दी ही दुख पाओगे और जल्दी ही भ्रम टूटेगा।
बुझ गई न जो बन एक आह अधरों पर
ऐसी तो कोई चाह नहीं जीवन में।
मेरे पैरों को मिली थकन की सीमा
मेरे मस्तक को गुरुता की नादानी
दिल में घिर आया करता एक धुआं सा
आंखों में घिर आता है अक्सर पानी।
अनजानी दुनिया का अनजाना क्रम है,
अनजाना सा ही सकल ज्ञान औ’ भ्रम है,
अनजान दिशा का मैं अनजाना पंथी
केवल असफलता है जानी-पहचानी।
खो गई न हो जो अंधकार में सहसा
ऐसी तो कोई राह नहीं जीवन में।
उल्लास-तरंगों से जो अधर विचुंबितवे
लिए हुए हैं चुभती जलन तृषा की,
आंसू में उमड़ा जो अभाव का सागर
उनमें ही लहरें हैं छवि की सुषमा की।
मेरे पीछे अगणित खंडहर के क्रंदन
मेरे आगे बस धुंधला सा सूनापन
यह राग-रंग, यह चहल-पहल सब कुछ है,
पर अपने अंदर मैं कितना एकाकी।
पल भर को जो अवलंब मुझे दे सकती
ऐसी तो कोई थाह नहीं जीवन में।
जिसको देखा वह खोया अपने-पन में
जिसको पाया वह बेसुध यहां जलन में।
पागल सा मैंने अलख जगाया दर-दर।
जिससे पूछा है वही एक उलझन में।
प्रत्येक मौन में कुछ घुटता सा भय है
प्रति स्वर में कुछ कांपता हुआ संशय है।
कितने निःश्वासों से बोझिल है धरती
हैं डूब चुके कितने उच्छवास गगन में।
विचलित कर सकती जो कि नियति के क्रम को
ऐसी तो कोई आह नहीं जीवन में।
बुझ न गई जो बन एक आह अधरों पर
ऐसी तो कोई चाह नहीं जीवन में।
जरा अपने जीवन को देखा, दीपिका। जरा सजग होकर, साक्षी होकर अपने जीवन की जांच-परख करो। यहां दुख के अतिरिक्त और क्या पाया है? जिन-जिन से आशा की थी सुख की, उन-उन से दुख पाया है। जिनसे जितनी आशा की थी सुख की, उनसे उतना ज्यादा दुख पाया है। जितनी बड़ी अपेक्षा थी, उतना ही बड़ा नरक निर्मित हुआ है।
मोह नरक-निर्माण की कला है। मोह नरक है और प्रेम स्वर्ग।
लेकिन दीपिका, तेरे प्रश्न को भी मैं समझता हूं। क्योंकि लोग तो मोह को ही प्रेम कहे चले जाते हैं। मैं भी जब प्रेम की बात करता हूं तो मैं प्रेम की बात करता हूं, तुम मोह की ही बात समझते हो। तुम तो वही समझ सकते हो, जिससे तुम परिचित हो। वही तुम्हारी भाषा है। मैं कहता हूं: प्रेम करो। तुम सुनते हो: मोह करो। तुम सोचते हो मैं तुम्हारे मोह का समर्थन कर रहा हूं। तुम्हारे मोह के लिए मुझसे बड़ा दुश्मन खोजना मुश्किल है। लेकिन मैं प्रेम का निश्चित ही समर्थक हूं।
इस प्रेम और मोह के भेद को तुम भी नहीं कर पाते हो, तुम्हारे तथाकथित महात्मागण भी नहीं कर पाते हैं। उनको जब भी मोह को गाली देनी होती है, वे प्रेम को गाली देते हैं। तुमको जब मोह की प्रशंसा करनी होती है, तुम प्रेम शब्द का उपयोग करने लगते हो। दोनों की भ्रांति एक ही है। तुम्हारे महात्मा मोह से इतने डर गए हैं कि प्रेम से घबड़ा गए हैं। वे भाग खड़े हुए हैं। उन्होंने प्रेम के जगत से सारे संबंध तोड़ लिए हैं। मगर ध्यान रहे, उनके जीवन में निराशा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, हो भी नहीं सकता। उनका परमात्मा से जोड़ने वाला जो सेतु था, वह भी टूट गया।
प्रेम के अतिरिक्त तुम परमात्मा से जुड़ भी न सकोगे, और कोई उपाय नहीं है। प्रेम और ध्यान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जितने ध्यानी बनोगे उतने प्रेमी हो जाओगे। और जितने प्रेमी बनोगे उतने ध्यानी हो जाओगे। ध्यान अर्थात जागरण। और प्रेम अर्थात उस जागरण से तुम्हारे भीतर जो आनंद-उल्लास होगा, उसे बांटना।
बुद्ध ने कहा है: जो ध्यान को उपलब्ध होता है, जो ध्यान की प्रज्ञा को उपलब्ध होता है, उससे करुणा, प्रेम की धाराएं बहने लगती हैं।
बहेंगी ही। भीतर ध्यान होगा तो बाहर तुम्हारे जीवन में प्रेम की तरंगें उठेंगी। लेकिन जिसने मोह के डर से प्रेम से ही दुश्मनी कर ली, उसके जीवन में तो सिवाय अंधकार के, रिक्तता के, और कुछ भी नहीं होगा। इसलिए तुम्हारे महात्माओं के जीवन बिलकुल खाली हैं, थोथे हैं--तुमसे भी ज्यादा थोथे हैं। तुम्हारी जिंदगी में कुछ तो है, कम से कम दुख तो है। दुख है तो सुख भी कभी हो सकता है। नरक तो है। नरक है तो कभी-कभी स्वर्ग की भी संभावना है। सीढ़ी लगा लेंगे। लेकिन तुम्हारे महात्मा बिलकुल रिक्त हैं; उनके भीतर कुछ भी नहीं है। तुमसे गालियां उठती हैं, घबराने की कोई जरूरत नहीं है; क्योंकि जिन शब्दों से गालियां बनती हैं उन्हीं शब्दों से गीत बन जाते हैं। तुम्हारे महात्माओं से गालियां नहीं उठतीं, मगर गीत भी नहीं उठते। तुम्हारे महात्मा बिलकुल ही खाली हो गए हैं--शून्य के अर्थों में नहीं, रिक्तता के अर्थों में। शून्य तो बड़ी अदभुत घटना है; वह तो केवल समाधिस्थ को उपलब्ध होती है। रिक्तता तो कोई भी कर ले सकता है।
तुम्हारे महात्मा शांत नहीं हैं। मरघट का सन्नाटा शांति नहीं है। ऐसी शांति चाहिए जो नाचती हो, गाती हो, गुनगुनाती हो। ऐसी शांति चाहिए जहां फूल खिलते हों, पक्षी गीत गाते हों, मोर नाचते हों, कोयल पुकारती हो, पपीहा पी-कहां की टेर देता हो। ऐसी शांति चाहिए। मरघट की शांति... तुम्हारे महात्मा मरघट की शांति से भरे हुए हैं। मुर्दा है वह शांति। जैसे लाश पड़ी हो तो शांत हो जाती है। मगर उसको तुम शांत थोड़े ही कहते हो, कि देखो महात्मा जी कैसे शांत लेटे हुए हैं! अभी-अभी तक संसारी थे, अब महात्मा हो गए। अभी तक बोलते थे, चालते थे; अभी तक उलझे थे संसार के माया-मोह में। अब देखो कैसे शांत पड़े हैं--बिलकुल निर्लिप्त, अनासक्त!
नहीं, लाश को तुम महात्मा नहीं कहते। लेकिन तुम जिनको महात्मा कह रहे हो, वे करीब-करीब लाशें हैं। और भ्रांति कहां से पैदा हो रही है? प्रेम और मोह के बीच भेद नहीं किया जा सक रहा है। महात्मा मोह के डर से प्रेम से भी भाग जाते हैं। उनको डर लगता है कि जहां प्रेम होगा वहां कहीं मोह न हो जाए। और तुम प्रेम की आकांक्षा में मोह में पड़ जाते हो। दोनों ही एक सी भूल कर रहे हो।
मैं चाहता हूं, दीपिका, तुम इस भेद को स्पष्ट समझ लो। मोह वह है जो दुख लाए, बंधन लाए, परावलंबन लाए। मोह वह है जो तुम्हें दूसरे पर निर्भर कर दे। तुम्हारा सुख जब दूसरे में हो तो मोह है। और तुम्हारा आनंद जब अपने भीतर हो और आनंद को बांटने की गहन अभीप्सा उठे, तो प्रेम। मोह संबंध है; प्रेम तुम्हारी सहज स्वाभाविक अवस्था है।
ओशो, लल्लू के पट्ठों के संबंध में थोड़ा कुछ और कहें!
अब और नहीं। अब कुछ और नहीं। कहने को बचा भी क्या है! सांप निकल गया, लकीर रह गई है। कि रस्सी जल गई, ऐंठ रह गई है। कहने योग्य क्या है अब? लल्लू के पट्ठे जितना उपद्रव कर सकते थे, कर चुके; जितना ऊधम कर सकते थे, कर चुके।
लल्लू के पट्ठे लोग इसलिए उनको कहने लगे कि उल्लू के पट्ठे कहना ठीक नहीं मालूम पड़ता। बाप का नाम लल्लू था, सो लल्लू के पट्ठे। उसी तरह अब कहते हैं लोग: लल्लू मर गए, औलाद छोड़ गए। तर्जुमा तुम कर लो।
साठ साल तक लल्लू के पट्ठे गर्भ में रहे और कहते रहे: पहले आप! पहले आप! फिर साठ साल के अनुभव से उन्होंने यह सीखा कि ये साठ साल बेकार गए, तो बाहर निकलते ही से कहने लगे--पहले मैं! सो बात आप-आप से शुरू हुई और मैं-मैं तू-तू पर समाप्त हुई।
लेकिन राजनीति का सारा संसार ही मैं-मैं तू-तू का संसार है, झगड़े-झांसे का, उपद्रव का, कोलाहल का। चलता है, क्योंकि तुम सब मूर्च्छित हो। तुम मूर्च्छित हो तो तुमसे ज्यादा मूर्च्छित लोग चाहिए जो तुम्हारे नेता हो जाएं। तुमसे थोड़ी ज्यादा ही मूर्च्छा चाहिए, तो ही नेता हो सकते हैं। तुम अगर अंधकार में हो तो तुमसे भी ज्यादा अंधे लोग चाहिए। तुम अगर अहंकार में हो तो तुमसे ज्यादा अहंकारी लोग चाहिए जो तुम्हारा नेतृत्व करें। तुम अपने ही जैसों को खोज लेते हो; जिम्मेवारी किसी और की नहीं, तुम्हारी ही है। कसूर उनका क्या है? जहां मांग होती है वहां पूर्ति शुरू हो जाती है। तुम्हारी मांग है गलत लोगों की।
लेकिन यह तुम्हारी आशा--कि करोड़ों-करोड़ों गरीबों का उद्धार कौन करेगा? यह धारणा ही गलत है। तुम सदियों-सदियों से इसी आशा में बैठे हो, इसीलिए तो दीन हो, इसीलिए दरिद्र हो, कि कोई उद्धार करना चाहिए तुम्हारा।
अपने पैरों पर खड़े होओ। अपना भरोसा करो। अपना अंधापन छोड़ो। अपनी मूढ़ताएं छोड़ो। तुम तो मूढ़ताएं करो, उद्धार कोई और करे! तुम बच्चे पैदा करो, तुम बच्चों की कतार लगाए चले जाओ, तुम गरीबी बढ़ाए चले जाओ, और उद्धार कोई और करे! तुमने बड़ी कृपा की।
तुम्हारी गरीबी के कारण तुम हो। तुम्हारी सारी धारणाएं मूढ़तापूर्ण हैं। और अगर कोई तुम्हारी धारणाओं को गलत कहे तो तुम नाराज हो। और तुम्हारी धारणाएं जब तक न टूटें, तब तक तुम्हारे जीवन में कोई सूर्योदय नहीं हो सकता।
पहली तो बात, तुम गरीबी को सम्मान देते रहे हो सदियों से। तो रहो गरीब अब। जिसको सम्मान दोगे वही हो गया। खूब तुमने प्रार्थना की परमात्मा से, उसने सुन ली! अब इसमें उसका क्या कसूर है? दरिद्रनारायण! महात्मा गांधी गरीब को कहते हैं--दरिद्रनारायण! सो अच्छा ही है, सभी दरिद्र हैं सो सभी दरिद्रनारायण हैं, सो देवता ही देवता समझो! अछूत हैं, सो हरिजन हैं।
हरिजन हम कहते थे भक्तों को--कबीर को, नानक को, रैदास को, फरीद को, बुल्लेशाह को। इनको हम कहते थे हरिजन। लेकिन अब बाबू जगजीवन राम हरिजन हैं!
अभी राम जी बड़ी मुश्किल में पड़े हैं। अब कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह सीता मैया के चरणों में कैसे जगह मिल जाए! देख रहे हो राम जी की कैसी गति है!
हरिजनों को कह दिया कि तुम तो प्रभु के प्यारे हो। अछूत शब्द अच्छा था; उसमें चोट थी, उसमें दंश था, उसमें पीड़ा थी। कोई अछूत नहीं होना चाहता था। हरिजन तो कोई भी होना चाहे। गरीब को कह दिया--दरिद्रनारायण! हम तो अच्छे शब्द खोजने में बड़े कुशल हैं! हम तो शब्दों में ही सब मामला हल कर लेते हैं। और दरिद्रता का तुम बड़ा सम्मान करते हो। अगर कोई आदमी नंगा खड़ा हो जाए--महात्मा! तो तुम अगर सब नंगे हो गए तो सब महात्मा हो गए, ऐसी परेशानी की बात क्या है? कोई धन-दौलत छोड़ देता है--महावीर ने धन-दौलत छोड़ी, बुद्ध ने राज छोड़ा, तब बेचारे जाकर महात्मा हो पाए। छोड़ने की झंझट करनी पड़ी। तुम्हारे पास है ही नहीं, तुम उस झंझट से भी बचे। तुम तो बुद्ध-महावीर हो ही! जरा तुम सोचो तो तुम पर परमात्मा की कृपा कैसी है! उनको तो बेचारों को झंझट करनी पड़ी--छोड़ो पहले। पिछले पापों के फल से उनको धन मिला होगा; सो पुण्य करने के लिए उसको छोड़ा। तुमने कोई पाप कभी किए नहीं, सो धन तुम्हें मिला नहीं, छोड़ने का कोई सवाल नहीं। तुम मुक्त ही पैदा हुए हो!
यह खयाल छोड़ो कि तुम्हारा कोई और उद्धार करेगा। इसी उद्धारक की तलाश में तो तुम पांच हजार साल से दीन-दरिद्र हो। यह दरिद्रता तुम्हारी कोई आज की है? तुम सदा से पीड़ित और दुखी हो। और जिम्मेवारी तुम्हारी है। और यह आशा रखना कि कोई उद्धार करेगा, बस अपने को भुलावा देना है। कोई तुम्हारा उद्धार नहीं करेगा। किसी को क्या पड़ी?
एक मां, एक ईसाई मां अपने बच्चे को समझा रही थी कि बेटा, दूसरों की सेवा करनी चाहिए। परमात्मा ने तुम्हें इसीलिए बनाया है कि दूसरों की सेवा करो।
छोटे बच्चे कभी-कभी बड़े महत्वपूर्ण सवाल पूछते हैं। उस बेटे ने कहा, अच्छा! तो माने लेते हैं कि परमात्मा ने मुझे इसलिए बनाया है कि दूसरों की सेवा करूं। दूसरों को किसलिए बनाया? इसलिए कि मैं उनकी सेवा करूं? या कि इसलिए कि वे मेरी सेवा करें?
मां जरा दिक्कत में पड़ी। उसे भी सूझा नहीं एकदम से कि अब क्या कहे! बच्चे कई दफे दिक्कत में डाल देते हैं तुम्हें। उनके पास दृष्टि साफ होती है। उसने बात बिलकुल सीधी देख ली। उसने कहा, यह भी क्या उलटी-सीधी बात है! मुझे बनाया इसलिए कि उनकी सेवा करूं; उनको बनाया इसलिए कि मेरी सेवा करें। अरे भैया तो तुम अपनी सेवा करो, मैं अपनी सेवा करूं। क्यों इतनी झंझट खड़ी करनी!
उद्धार कौन तुम्हारा करेगा? क्यों करेगा?
नहीं लेकिन, लोग बैठे हैं--यदा-यदा हि धर्मस्य...कि जब-जब धर्म की ग्लानि होगी, कृष्ण भगवान आएंगे। सो होने दो ग्लानि! और करो ग्लानि! अभी पूरी नहीं हुई, नहीं तो आते। जाहिर है कि पूरी नहीं हुई ग्लानि। और ग्लानि करो! और जितना उपद्रव मचा सको, मचाओ! तब कृष्ण भगवान आएंगे और तब तुम्हारा उद्धार करेंगे।
जैसे उस समय उन्होंने कोई उद्धार कर दिया था! उस समय कौन सा उद्धार हो गया था? महाभारत का युद्ध हुआ, उद्धार क्या हुआ? लोग मरे, कटे, पिटे; उद्धार क्या हुआ? हजारों-लाखों स्त्रियां विधवा हो गईं; उद्धार क्या हुआ? हजारों बच्चे, लाखों बच्चे अनाथ हो गए; उद्धार क्या हुआ? और कृष्ण के मरने के बाद कृष्ण के अनुयायियों का, यादुकों का क्या हुआ? एक-दूसरे को मार-काट कर खतम हो गए सब! उद्धार किसका हुआ?
कि क्या तुम सोचते हो रामचंद्र जी तुम्हारा उद्धार कर गए? कौन किसका उद्धार कर सकता है! सीता मैया का उद्धार करने में ही बड़ी मुश्किल पड़ी उनको। और वह भी पूरा नहीं हो पाया, एक धोबी ने बीच में दिक्कत दे दी। और फिर सीता मैया को जंगल भेजा। क्या उद्धार? किसका उद्धार? कौन कब किसका उद्धार कर पाया है! यह धारणा ही गलत है।
दूसरे देशों में यह धारणा नहीं है, इसलिए वे अपना उद्धार करने में समर्थ हो सके। अमरीका में कोई नहीं सोचता कि हमारा कोई उद्धार करे। प्रत्येक व्यक्ति मेहनत कर रहा है, श्रम कर रहा है। तो अमरीका ने इतनी समृद्धि पैदा कर ली! और समृद्धि को सम्मान दे रहा है।
तुम दरिद्रता को सम्मान दो और चाहो कि समृद्ध हो जाओ, यह कैसे होगा? अभी भी तुम नंगों को पूज रहे हो--कोई मुनि, महामुनि, कोई महात्मा--क्योंकि वे लंगोटी ही लगाए हुए हैं। कोई करपात्री, क्योंकि वे हाथ में भोजन करते हैं। तुम्हारी सारी की सारी चेष्टाएं और तुम्हारे आदर-सम्मान बता रहे हैं कि तुम दीनता के पुजारी हो। तो तुम दीन रहोगे। तुम्हारी ये धारणाएं गिरनी चाहिए। अगर तुम समृद्ध होना चाहते हो तो समृद्धि का सम्मान करो, तो तुम समृद्ध हो सकते हो। क्योंकि तुम जिसका सम्मान करोगे, उसको तुम पैदा करोगे।
तुम्हारे राजनेताओं का इतना कसूर नहीं है। वे तो तुम्हारी ही पैदाइश हैं। वे लल्लू के पट्ठे हैं, तुम लल्लू हो! तुमको अपनी जिम्मेवारी अपने हाथ में लेनी होगी।
मैं व्यक्ति का सम्मान करता हूं। मेरा भरोसा व्यक्ति में है। समाज, समूह, राजनीति, धर्म, इन सब बातों में मेरा भरोसा नहीं है। मेरा भरोसा है व्यक्ति की आत्मा में, व्यक्ति के जागरण में। तुम जागो! तुम होश से भरो! तुम अपने जीवन को व्यवस्था दो! तुम अपने जीवन से गलत धारणाएं अलग करो। तुम अपने पक्षपात छोड़ो। तुम अतीत से अपना छुटकारा करो।
तुम सड़े जा रहे हो अतीत के बोझ के नीचे, मगर अहंकार है कि घोषणा किए जाता है कि हम महान! दो कौड़ी पास नहीं, मगर हम महान! कि भारत-भूमि पुण्य-भूमि! देवता यहां पैदा होने को तरसते हैं! मैं तो सोच ही नहीं पाता कि देवता क्यों यहां पैदा होने को तरसेंगे? किस कारण? और अगर देवता यहां पैदा होने को तरसते हैं तो उनका दुर्भाग्य, तो उनकी मति मारी गई।
मगर तुम इस तरह के अहंकारों से भरे हुए हो। ये सब अहंकार छोड़ने जरूरी हैं। यह जाति अहंकार से सड़ रही है। और यह जाति भ्रांत धारणाओं में उलझी हुई है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन को संयोजित करना जरूरी है। ऐसे ही यह समाज संयोजित हो सकता है।
और सब से बड़ी धारणा जो तुम्हें सता रही है, वह यह कि कोई उद्धारक आए। किसको क्या पड़ी? कोई उद्धारक न कभी आया है, न कभी आएगा। बुद्ध ने अपना उद्धार किया। और जिनको अपना उद्धार करना था, उन्होंने बुद्ध से सीख ले ली। महावीर ने अपना उद्धार किया। और जिनको अपना उद्धार करना था, उन्होंने महावीर की रोशनी से अपने दीये जला लिए।
यहां एक रोशनी जली है। तुम्हें अपना दीया जलाना हो, जला लो। लेकिन व्यर्थ की बातों में मत पड़ो--कि इस देश का उद्धार कौन करेगा? कौन उद्धारक आएगा? अवतार कब होगा परमात्मा का? ईश्वर क्यों चुप है?
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
How can we distinguish between love and attachment?
According to Osho, love is self-evident: when the heart’s eye opens, there is no question, only a fragrant, radiant knowing that dissolves the ego and becomes prayer. Doubt signals attachment—blind, possessive, dependent on borrowed lights (doctrines). Distinguish by your state: if there’s insecurity, grasping, and need to ask, it’s attachment; if there’s clarity, freedom, and surrender, it’s love.
In simple terms: If you have to ask whether it’s love, it isn’t—real love feels clear, free, and peaceful; attachment feels needy and blind.
What will happen to the country's poor masses in the face of political corruption?
According to Osho, the poor will keep suffering while corrupt leaders enrich themselves, because the real trap is waiting for saviors. Hope in politicians or messiahs sustains poverty; honoring poverty and clinging to blind beliefs perpetuate it. Only when people assume responsibility, drop glorification of poverty, make wiser choices (including limiting reckless reproduction), and stand on their own feet, can their fate change.
In simple terms: If you wait for corrupt leaders to save you, you’ll stay poor; start changing your life yourself.
