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Questions in this Discourse
मुझसे आप पूछते हैं: मैं हरिजन के घर क्यों नहीं ठहरता?
पहली तो बात यह कि मेरी दृष्टि में कोई हरिजन नहीं है। उसको ढूंढूं कहां? आदमी हैं, हरिजन नहीं हैं। गांधी जी की दृष्टि में हरिजन होंगे, इसलिए वे हरिजन का घर ढूंढ लेते हैं। यह ध्यान रहे, कि अछूत और शूद्र बड़े अच्छे शब्द थे, यह हरिजन बहुत खतरनाक शब्द है। अछूत और शूद्र में एक चोट थी, एक दर्द था, एक पीड़ा थी। अछूत और शूद्र अपने को कोई कहने में घबड़ाता था, बुरा मानता था। यह हरिजन बहुत खतरनाक शब्द है। इसे कहने में अकड़ मालूम पड़ती है, कि हम हरिजन हैं। बात वही है। बीमारी का नाम बदल देने से बीमारियां नहीं बदल जाती हैं। और जहर के ऊपर शक्कर लगा देने से सिर्फ मरने की सुविधा हो जाती है, खाने में आसानी हो जाती है और कुछ भी नहीं होता।
ये हरिजन जैसे शब्द बड़े खतरनाक हैं। किसी भी तरह से हरिजन को रिकग्निशन देना हरिजन को बचाने की तरकीब है। चाहे उसको गाली दो और चाहे सम्मान दो, और चाहे उसे छुओ मत और चाहे उसके घर ठहरने का आयोजन करो। लेकिन हरिजन की स्वीकृति, रिकग्निशन कि यह आदमी हरिजन है, छूने योग्य नहीं है या इसके घर ठहरना जरूरी है, बड़ी ऊंची बात है। दोनों स्थितियों में हरिजन बचता है और बचाया जाता है। हरिजन को मिटाना है, बचाना नहीं है।
लेकिन गांधी जी के साथ एक कठिनाई थी। बड़ी बीमारी के, वह हिंदू नाम की जो बीमारी है, उसके वे बड़े प्रेमी थे। उसी बीमारी की यह छोटी संतति है। यह जो हरिजन है, यह जो शूद्र है, अछूत है, उसी बड़ी बीमारी की पैदाइश है। उस बड़ी बीमारी को तो वे बचाना चाहते थे और उसी बड़ी बीमारी के भीतर इस छोटी बीमारी के लिए भी कोई समझौते का रास्ता खोजना चाहते थे। सच तो यह है कि हिंदू, मुसलमान, ईसाई, ये सारी बीमारियां मिटनी चाहिए। और जो लोग हिंदू समाज के भीतर दुखी अनुभव करते हैं उन्हें हिम्मत जुटानी चाहिए कि वे कहें कि हम हिंदू नहीं हैं। क्या जरूरत है उन्हें हिंदू होने की? हिंदू होने ने उन्हें क्या दिया है? लेकिन अगर वे हिम्मत भी जुटाए कि हिंदू नहीं हैं, तो वे कहेंगे कि हम मुसलमान होते हैं, हम ईसाई होते हैं, हम बौद्ध होते हैं। एक जेल से छूटे नहीं कि वे फौरन पूछते हैं कि हम किस जेल में जाएं?
अंबेदकर ने थोड़ी हिम्मत जुटाई और कहा कि छोड़ दो हिंदू धर्म! लेकिन हिम्मत पूरी नहीं है वह भी। अंबेदकर ने इधर हिम्मत जुटाई, तत्काल दूसरे जेल में भिजवा दिया। हो सकता है दूसरा जेल थोड़ा कंफर्टेबल हो। कंफर्टेबल जेल और खराब होते हैं। क्योंकि उनको छोड़ने का मन भी नहीं होता। हिंदू से हटो, बौद्ध हो जाओ, ईसाई हो जाओ, मुसलमान हो जाओ। वे भी सब पागल घर हैं। यह भी एक पागल घर है। हरिजनों को, अछूतों को, शूद्रों को मुक्त हो जाना चाहिए सब जेलों से। कह देना चाहिए, हम सिर्फ निपट आदमी हैं। और हम किसी के साथ जुड़ते नहीं। लेकिन वे भी उत्सुक हैं कि उनको हरिजन माना जाए। वे भी बड़े उत्सुक हैं कि उनको सम्मान दिया जाए हरिजन होने का। अपमान उन्होंने काफी झेल लिया है, अब बदले में सम्मान चाहते हैं। लेकिन ध्यान रहे, अपमान हो या सम्मान हो, हरिजन होने से आदमी आप नहीं हो सकते हैं।
और इस समय दुनिया को आदमियों की जरूरत है। एक प्रयोग करना चाहिए कि हम कारागृह से बाहर होंगे। जब तक पृथ्वी पर इतने हिम्मतवर लोग कुछ इकट्ठे नहीं होते जो सब जेलखानों को इनकार कर दें और कहें कि हम बस सिर्फ आदमी हैं। और यह हिंदुस्तान की सरकार है, सिक्युलर कहलाती है अपने को, धर्म-निरपेक्ष कहलाती है। लेकिन यहां भी नौकरी के फार्म पर लिखा रहता है: आपका धर्म क्या है? क्या पागलपन है! धर्म पूछने की जरूरत क्या है? एक आदमी का आदमी होना काफी है। स्कूल में भरती करो लड़के को, तो फार्म में लिखा रहता है कि धर्म क्या है? यह क्या पागलपन है! धर्म पूछने की क्या जरूरत है? आदमी होना काफी है।
सेंसेस होगा, मुल्क की मतगणना होगी, जनगणना होगी, उसमें भी भरा रहेगा: कौन किस धर्म को मानता है? फिर यह सब बेईमानी की सेक्यूलरिज्म है। यह कोई ठीक सेक्यूलरिज्म न हुआ। धर्म-निरपेक्ष होने का मतलब है कि हम इस देश में आदमी को सिर्फ आदमी मानते हैं। और हम कोई दूसरी सीमा और कोई विशेषण उसके ऊपर नहीं लगाते। अगर थोड़ी हिम्मत जुटाई जाए तो हिंदुस्तान आदमियों का समाज बन सकता है। लेकिन सब तरफ वही आदमी और आदमी के बीच दीवाल खड़े करने का बड़ा आग्रह है। गांधीजी ने कितनी मेहनत की जिंदगी भर कि हिंदू-मुसलमान एक हो जाएं। लेकिन पहले बीमारी को स्वीकार करते हैं। फिर एक करना चाहते हैं। पहले कहते हैं, हिंदू भी ठीक, मुसलमान भी ठीक। दोनों एक हो जाएं। दोनों गलत हैं। और दोनों के एक होने की जरूरत नहीं है। दोनों के मिटने की जरूरत है। वह दोनों मिटेंगे तो आदमियत एक होगी। दोनों एक नहीं हो सकते। हिंदू-मुसलमान एक नहीं हो सकते। उनका हिंदू होना, मुसलमान होना ही उनका अन्य होना है, अलग होना है, पृथक होना है। हिंदू होने में ही दुश्मनी छिपी है। मुसलमान होने में दुश्मनी छिपी है। हिंदू-मुसलमान दोनों मिट जाएं तो आदमियत एक हो सकती है। हिंदू-मुसलमान कभी एक नहीं हो सकते। अब मलेरिया-प्लेग एक हो जाएं तो फायदा थोड़ी ही होगा, और खतरा होगा। इनको मिटाने की जरूरत है। इनको एक करने की जरूरत नहीं। जिंदगी भर गांधीजी वही कोशिश करते रहे कि सब बीमारियों के साथ समझौते की उनकी आदत है। किसी बीमारी को मिटाने के लिए सीधा खयाल नहीं है। वही शूद्रों और हरिजनों के साथ चला सिलसिला।
ओशो, आपका शंकराचार्य वर्णाश्रम के संबंध में जो कहते हैं, शास्त्र जो कहते हैं, उस संबंध में क्या मत है?
लेकिन यह मुल्क बहुत बेईमान है। शंकराचार्य पुरी के अगर कहेंगे, तो उनका विरोध किया जाएगा। लेकिन जिन शास्त्रों के आधार पर वे कह रहे हैं उन्हीं शास्त्रों की पूजा चलती रहेगी। यह कैसा मुल्क है? ये कैसे लोग हैं? शंकराचार्य कहते हैं, तो उनका विरोध करते हैं आप, और जिन शास्त्रों के आधार पर वे कहते हैं उन शास्त्रों की पूजा जारी है। तो फिर समझ में आने वाला मामला नहीं दिखता। फिर कोई बेईमानी दिखती है। ऐसा दिखता है, कि समय की हवा बदल गई, इसलिए शंकराचार्य का विरोध भी करते हैं। लेकिन चित्त नहीं बदला। इसलिए शास्त्र की पूजा भी करते हैं। शंकराचार्य का क्या कसूर है? इतना ही कसूर हो सकता है कि उनके पास कोई अपनी बुद्धि नहीं मालूम पड़ती। शास्त्र ही उनकी बुद्धि है। और कोई कसूर नहीं मालूम पड़ता है। वे एक टेप-रिकार्डर मालूम होते हैं। शास्त्र में जो लिखा है, वह दोहराते हैं। उनका क्या कसूर है? लेकिन सारा मुल्क उन पर टूट पड़ा। और उन सारे शास्त्रों की पूजा जारी रहेगी, तो फिर यह उचित नहीं है। यह अन्यायपूर्ण है। यह ठीक नहीं है। शास्त्रों से मुक्त होने की जरूरत है। सच तो यह है कि अतीत से मुक्त होने की जरूरत है। क्योंकि उस अतीत ने ही यह सारी की सारी नासमझियां पैदा कीं। उस अतीत की जड़ें, वह जो बीत गया हमारा अतीत का इतिहास, उसमें इन सब रोग के कीटाणु हैं। उसको तो हम गौरव से गौरवान्वित करते हैं। उसका तो हम शोरगुल मचाते हैं पूरा। उसका तो हम चाहते हैं कि राम-राज्य फिर से आ जाए। राम-राज्य फिर से आ जाए तो फिर शंकराचार्य ठीक कहते हैं। फिर आप सब गलत कहते हैं।
अगर राम-राज्य फिर से आएगा, तो शूद्र होगा। और यह भी होगा कि कोई शूद्र वेद के वचन नहीं सुन सकेगा। और शूद्र अगर वेद के वचन सुन लेगा, तो उसके कान में शीशा पिघला कर डाला जाएगा। बिलकुल डाला जाएगा। अगर राम-राज्य लाना है तो इसकी तैयारी रखना। या फिर राम-राज्य जैसी बेकार बातों में मत पड़ना। गया जो गया। वह अब नहीं लौटाया जा सकता है। न लौटाने की जरूरत है। लेकिन हमारे मुल्क का पूरा चित्त अतीत से बंधा है। और सारी बीमारियां जो अतीत ने दी हैं उनसे हम छूटना चाहते हैं और अतीत से छूटना नहीं चाहते। तो एक तरह की जीच, एक तरह की तनाव की स्थिति मुल्क के चित्त के सामने पैदा हो गई है। और यह ध्यान रहे, यह मत सोचना कि हम ऐसा कर सकते हैं कि अतीत का जो अच्छा है उसे बचा लें। और जो बुरा है उसे छोड़ दें। इसे थोड़ा समझ लेना।
हर समय एक आर्गनिक यूनिटी है। ऐसा नहीं है कि एक आदमी की आंखें बहुत प्यारी लगती हैं, तो आंखें बचा लो, बाकी आदमी को जाने दो। ऐसा नहीं हो सकता कि आदमी का हमें हृदय बड़ा प्यारा लगता है, तो हृदय बचा लें, बाकी हमको नहीं जंचता, जाने दें। आदमी एक आर्गनिक इकाई है, एक इकट्ठी इकाई है। हर युग, हर समय, हर सदी, हर शास्त्र, हर विचार, हर धर्म एक आर्गनिक यूनिटी है। अगर जाएगा तो पूरा जाएगा। अगर बचेगा तो पूरा बचेगा।
लेकिन हम इस मुल्क में यह कर रहे हैं कि हम कहते हैं जो गलत है उसे छोड़ दें, जो ठीक है, उसे हम बचा लें। लेकिन जिस चित्त से वह ठीक पैदा हुआ था उसी चित्त से वह गलत पैदा हुआ था। वह गलत और ठीक किसी एक ही चीज के दो हिस्से हैं। और इसलिए हम बड़ी मुश्किल में पड़े हैं। हम हमेशा यह खयाल करते हैं कि कुछ अच्छा है, उसे बचाते चलें। जो बुरा है, उसे छोड़ते चलें। ऐसा नहीं होता। पिछली इकाई को छोड़ना होता है। नई इकाई को जन्म देना होता है। पिता मरता है तो ऐसा नहीं होता कि पिता की खोपड़ी बहुत अच्छी थी इसलिए बेटे की खोपड़ी अलग रखो, पिता की खोपड़ी जोड़ दो। पिता पूरा मरता है। बेटा पूरा पैदा होता है। हर युग को पूरा मरना चाहिए, ताकि हर नया युग पूरा पैदा हो सके। अगर पुराने युग में से कुछ बचाने की कोशिश चलती है तो नये युग के हाथ-पैर पंगु हो जाते हैं, वह पैदा नहीं हो पाते। हिंदुस्तान बहुत दिन से इस मुश्किल में पड़ा हुआ है। पुराना यहां मरता ही नहीं हैं, नये को जन्म की सुविधा नहीं। और वे जो पुराने के पक्षपाती हैं वे तो ठीक ही हैं, साफ हैं। लेकिन वे जो पुराने पक्षपातियों के विरोधी हैं, वे भी पुराने पक्षपाती हैं। इसलिए इस मुल्क के मस्तिष्क में साफ-साफ नहीं हो पाता कि हम क्या करें? क्या न करें?
जो लोग शंकराचार्य का विरोध करेंगे और कहेंगे, शंकराचार्य गलत कहते हैं, वह भी शास्त्रों को उठा कर यह सिद्ध करने की कोशिश करेंगे कि शास्त्रों में शूद्र नहीं है। लेकिन शास्त्रों में ही सिद्ध करने की कोशिश करेंगे। यह नहीं कहेंगे कि होगा शास्त्रों में, लेकिन शास्त्रों से हमें प्रयोजन क्या? कोई ठेका ले लिया है शास्त्रों ने, सदा के लिए कि हम उनसे बंधे हैं? कोई मनु महाराज ने कोई ठेका ले लिया है कि अब आने वाली दुनिया कभी भी उनसे मुक्त नहीं हो सकेगी। मनु महाराज मर गए। उनका विचार भी मर जाना चाहिए। सब चीजें मरनी चाहिए अगर जिंदगी को जिंदा रखना है। जैसे आदमी बदलते हैं, वैसे ही समाज, शास्त्र, विचार सब बदलने चाहिए। सभ्यता को भी मरना सीखना चाहिए। और जो सभ्यता मरना नहीं सीखती, उसका नया जन्म होना बंद हो जाता है। सभ्यताएं भी मरती हैं। लेकिन इस देश में हमें यह खयाल है कि हमारी सभ्यता कोई बहुत अदभुत बात है।
रोम मर गया, बेबीलोन मर गया, सीरिया मर गया, इजिप्त मर गया। हम? हम मरते ही नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मरे-मराए हों इसलिए नहीं मरते हों। सिर्फ मरा हुआ नहीं मरता है। ध्यान रहे, मरे हुए आदमी को एक फायदा होता है, फिर नहीं मर सकता है। फिर मरने का सवाल ही नहीं है। जिंदा कौम मरती भी है, जन्मती भी है। जिंदगी का लक्षण है यह। युग मरने चाहिए, ताकि नये युग पैदा हो सकें। शास्त्र भी मरने चाहिए, ताकि नये शास्त्र जन्म ले सकें। विचारक भी विदा होने चाहिए, ताकि नये विचारक आ सकें। यह धारा बढ़नी चाहिए, रुक नहीं जानी चाहिए। लेकिन यह सब रुकी हुई है।
वे शंकराचार्य कहते हैं, हमारी किताब में यह लिखा है। उनका भी दावा किताब का है। उनके विरोधी कहते हैं कि नहीं, उस किताब का दूसरा मतलब है। लेकिन किताब के दोनों दावेदार हैं। ये दोनों दुश्मन हैं देश के। इनमें एक नहीं है दुश्मन। शंकराचार्य नहीं है, वह दूसरा भी है। क्योंकि वह यह कहता है, नहीं लिखा। लेकिन अगर सिद्ध हो जाए कि लिखा है, फिर वह भी राजी हो जाएगा। पर किताब से मुक्त होने की हिम्मत किसी की भी नहीं है।
यह क्या मामला है? क्या हमारे पास कोई बुद्धि सोचने वाली नहीं है जो हम उधार बुद्धि से ही सोचते रहें। क्या ऐसा कुछ हो गया है कि संपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया है, अब आगे कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होना है? ज्ञान रोज आगे बढ़ेगा। और जो कौम तय कर लेगी कि हम अब आगे नहीं सोचेंगे वह कौम सड़ने लग जाएगी। और ध्यान रहे, सभ्यता जितनी पुरानी हो जाती है उतनी ही पाखंडी हो जाती है। नई सभ्यता में ताजगी होती है। नयापन होता है। ईमानदारी होती है। पुरानी सभ्यता बेईमान हो जाती है। उसका कारण है। अनुभव चालाक कर देता है।
एक बच्चा पैदा होता है। बच्चे में इनोसेंस होती है, निर्दोषता होती है, ताजगी होती है। वही बच्चा जब सत्तर साल के बाद बूढ़ा हो जाएगा तो चालाक हो जाता है। कनिंग हो जाता है। बूढ़ा आदमी और निर्दोष खोजना, जरा मुश्किल है। बच्चा और चालाक खोजना जरा मुश्किल है। और जो बच्चे और बूढ़े के संबंध में सच है वही नई सभ्यता और पुरानी सभ्यता के संबंध में सच है। यह हमारी पूरी सभ्यता चालाक हो गई है। इसके इतने अनुभव हैं कि अनुभवों ने इसे बेईमान कर दिया है। और अनुभवों का ढेर लगता चला जाता है। नई सभ्यताएं ताजी होती हैं। जिंदा होती हैं। ताकतवर होती हैं, कुछ करने की हिम्मत होती है। हममें कुछ भी करने की हिम्मत नहीं। शूद्र जैसी सड़ी और गिरी-गिराई चीज को भी गिराने की हिम्मत नहीं, उसको भी हम पूछते हैं कि कैसे गिराएं? उसको भी हम पूछते हैं कि शूद्र को कैसे मिटाएं? शूद्र को मिटाने के लिए क्या करना पड़ेगा? कुछ करना पड़ेगा। सिर्फ मुल्क सोच ले और शूद्र आज मिट गया? कुछ मिटाने के लिए कुछ उपाय करना पड़ेगा। शूद्र कोई टी़ बी., कोई कैंसर है कि कोई इलाज करना पड़ेगा? सिर्फ मान्यता है। एक आदमी शूद्र है, सिर्फ यह मान्यता है। मान्यता को मिटाने के लिए भी कुछ करना पड़ेगा? सिर्फ मान्यता छोड़ देनी पड़ेगी। लेकिन वह मान्यता भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। वह मान्यता भी नहीं मिट पा रही हैं। तो हद हो गई। शायद हम कुछ भी करने में समर्थ नहीं रह गए हैं।
मैं किसी आदमी को नीचा-ऊंचा नहीं मानता हूं।
ओशो, ये शूद्र पैदा क्यों हो गए हैं? ये हरिजन पैदा क्यों हो गए हैं?
हिंदुस्तान ने एक तरकीब ईजाद की प्रतियोगिता खत्म करने की। करोड़ों शूद्रों से प्रतियोगिता खत्म हो गई। अब उनके बेटे ब्राह्मणों के बेटों से संघर्ष न कर सकेंगे ऋषि होने का। अब उनके बेटे वैश्यों के बेटों से धनपति होने का संघर्ष न कर सकेंगे। अब उनके बेटे बहादुरों की तरह लड़ न सकेंगे, क्षत्रियों से संघर्ष न कर सकेंगे। एक बड़े वर्ग को, नीचे के विराट वर्ग को हमने बिलकुल जमा दिया और द्वार बंद कर दिए, अब तुम कहीं आ-जा न सकोगे। ऊपर के वर्गों को लाभ हुआ। फिर क्रमशः हम जमाते चले गए। शूद्र के बाद वैश्य को हमने जमा दिया, और उससे कह दिया धन तेरी दुनिया है। इससे आगे तू नहीं बढ़ सकता है। यश और ज्ञान तेरी दुनिया नहीं। क्षत्रिय को कह दिया कि यश तेरी दुनिया है लेकिन ज्ञान तेरी दुनिया नहीं। और सबके ऊपर वह जो ज्ञानवान है, वह जो पंडित है, वह जो ब्राह्मण है, वह बैठ गया। ये वर्ग जमा दिए, इससे प्रतियोगिता खत्म हो गई और समाज जड़ हो गया। हिंदुस्तान को वर्ण से जितनी मृत्यु मिली, जितनी जड़ता मिली उतनी किसी और चीज से नहीं मिली। इसका फिर परिणाम अनंत रूपों से घातक हुआ।
हिंदुस्तान पर हमला हुआ। हिंदुस्तान पर हमला हुआ तो शूद्र ने कहा, हमें क्या मतलब है? शूद्र को क्या मतलब है? भंगी भंगी रहेगा, चाहे मुसलमान दिल्ली में बैठें कि हिंदू बैठें कि अंग्रेज बैठें। भंगी में क्या फर्क पड़ने वाला है? भंगी भंगी रहेगा। भंगी ने कहा, हमारा भाग्य तो तय है। तो कोई भी राजा हो, हमें क्या हानि है। हम तो अपने चलते चले जाएंगे। हम जो करते हैं, करते चले जाएंगे।
हिंदुस्तान की विराट जनता वर्णों के कारण हिंदुस्तान के जीवन में अरुचि से भर गई। विरागपूर्ण हो गई। हिंदुस्तान कभी गुलाम न होता अगर हिंदुस्तान में शूद्र न होते। हिंदुस्तान कभी गुलाम न होता अगर हिंदुस्तान में वर्ण न होते। हिंदुस्तान की वर्ण व्यवस्था ने हिंदुस्तान में ऐसे तबके बांट दिए कि एक आदमी को कोई जरूरत न रही चिंतित होने की। सिर्फ थोड़े से लोगों को, चिंता क्षत्रियों को थी कि हम अपने राज्य को बचाएं। बाकी पूरे देश को प्रयोजन न था। गरीब को क्या प्रयोजन है अमीरों के झगड़े से? कोई प्रयोजन नहीं है। वही तो अभी भी हो गया। फिर से वही हो गया। अंग्रेज हिंदुस्तान से गए। गरीबों ने सोचा था, हमें कुछ मिल जाएगा। फिर उनको पता चला, कुछ नहीं मिलता। अंग्रेज पूंजीपति बदल जाता है, हिंदू पूंजीपति उसकी जगह बैठ जाता है। गरीब अपनी जगह है। वह वहीं के वहीं हैं। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है।
अमीरों के झगड़े हैं, ऊपर के झगड़े हैं। नीचे के आदमी को क्या मतलब है? यह हिंदुस्तान के हजारों वर्ष के शूद्रों की वर्ण-व्यवस्था की टूटने ऐसी स्थिति जमा दी कि हिंदुस्तान में कोई सामाजिक धारणा, कोई राष्ट्र, कोई नेशन, कोई भी पैदा नहीं हो सका। लेकिन जो लोग इनके विरोध में खड़े हैं, वे भी मौलिक आधारों के विरोध में नहीं हैं। गांधीजी चाहते थे कि अछूत मिट जाए, लेकिन गांधीजी कर्म के सिद्धांत के संबंध में एक शब्द भी विरोध में नहीं बोले। और शायद आपको खयाल में भी न हो कि हिंदुओं ने जो व्यवस्था की है, हिंदुओं का दिमाग इतना सिस्टममेकर रहा है, उन्होंने इतनी व्यवस्था की है सिद्धांतों की। सिद्धांतों के मुकाबले सिद्धांत बनाने के लिए हमसे बढ़िया लोग दुनिया में खोजने मुश्किल हैं। हम ऐसे गजब के सिद्धांत बनाते हैं। हम इतने कुशल हैं सिद्धांत बनाने में कि जिसका कोई हिसाब नहीं। शूद्र हमने ऐसे ही खड़ा नहीं कर दिया। हमने पूरी मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक पृष्ठभूमि बनाई है। हमारा कहना यह है कि जो आदमी जैसे कर्म करता है वैसा उसे जन्म मिलता है। शूद्र वे हैं जिन्होंने पाप किए हैं, वे शूद्र वर्ग में पैदा होते हैं। ब्राह्मण वे हैं जिन्होंने पुण्य किए हैं, वे ब्राह्मण वर्ग में पैदा होते हैं। पिछले जन्मों में जिन्होंने जैसे कर्म किए हैं उनके चार विभाजन, और उन चार विभाजनों में लोग पैदा होते हैं। इसलिए शूद्र भी बेचारा राजी हो गया। उसने कोई बगावत नहीं की। उसने कहा कि ठीक है, हमने पिछले जन्म में बुरे कर्म किए होंगे, इसलिए हम शूद्र हो गए हैं। अब अच्छे कर्म करेंगे तो अगले जन्म में ब्राह्मण हो जाएंगे। अगले जन्म की आशा में वह आज शूद्र होने को राजी हो गया। हिंदुस्तान का शूद्र राजी है, अगले जन्म की प्रतीक्षा कर रहा है। और हिंदुस्तान का दिमाग बेईमान है। जिसको भी राजी करवाना हो उसे अगले जन्म का प्रलोभन दे दो। वह राजी हो जाता है।
जब तक यह कर्म की विचार-सरणी न टूटे और जब तक हम इसकी पुनर्व्याख्या न करें तब तक शूद्र को मुक्त होना बहुत मुश्किल मामला है। और बड़ा मजा तो यह है कि जिससे उसे मुक्त होना है वह उसी से बंधने की पूरी कोशिश कर रहा है। विनोबाजी या गांधीजी उसको उन्हीं मंदिरों में ले जाने के लिए प्रवेश दिलवा रहे हैं, जिन मंदिरों से उसे मुक्त होना चाहिए। यह बड़े मजे की बात है। जिन हिंदू पुरोहितों से मुक्त होना है गांधीजी और विनोबाजी कह रहे हैं कि उन मंदिरों में शूद्र का प्रवेश होना चाहिए। यह बड़ी क्रांति की बात है कि मंदिर में शूद्र का प्रवेश हो! किसके मंदिर में? उसी मंदिर ने जिसने उसे शूद्र बनाया? उन्हीं पुरोहितों के मंदिर में जिन्होंने उसको हजारों वर्षों तक पीड़ित किया और शोषित किया?
मैं तो कहूंगा, एक शूद्र को किसी मंदिर में नहीं जाना चाहिए। अगर सारे ब्राह्मण पैर पड़ें तो भी नहीं जाना चाहिए। क्योंकि उस मंदिर में क्यों जाना जिस मंदिर ने तुम्हें तोड़ा और नष्ट किया और बरबाद किया और शोषण किया। लेकिन गांधीजी और उनके सब साथी कहते हैं कि मंदिर का द्वार खोलो। हम शूद्र को मंदिर में ले जाएंगे। यह बड़ी क्रांति हो रही है। शूद्र को मंदिर में ले जाने की। यह ब्राह्मण का ढीला पंजा जो हो रहा है उसको फिर कसे जाने की तरकीब है। फिर ब्राह्मण के हाथ में पहुंच जाएगा यह शूद्र उसके मंदिर में जाते ही। आज वर्ण टूटने के करीब आ गए हैं। व्यवस्था टूटने के करीब आ गई है। उसको फिर से नई शक्ल देकर, फिर उसको उसी व्यवस्था के भीतर रखने की कोशिश चल रही है। डर है कि कहीं शूद्र हिंदुओं के बाहर न चला जाए।
लेकिन शूद्र को हिंदू के भीतर रहने की जरूरत क्या है? सच तो यह है किसी को भी हिंदू होने की जरूरत क्या है? किसी को मुसलमान होने की जरूरत क्या है? आदमी होना पर्याप्त है। और जिसको आदमी होना पर्याप्त नहीं मालूम होता वह हिंदू या मुसलमान होने से कुछ और विकसित नहीं हो जाएगा? आदमी होना काफी है। हिंदुस्तान में एक क्रांति की जरूरत है कि शूद्र तो कह ही दें कि अब हम हिंदू नहीं हैं। लेकिन बहुत से वे लोग जो शूद्र नहीं हैं और बुद्धिमान हैं, वे भी कह दें कि हम हिंदू नहीं हैं। और बहुत से वे लोग जो बुद्धिमान हैं, कह दें कि हम मुसलमान नहीं हैं। बहुत से वे लोग जो बुद्धिमान हैं, कह दें कि हम जैन और ईसाई नहीं हैं, हम आदमी हैं। और अगर हमें खोज लगनी है सत्य की। अगर हमें प्रभु को खोजना है, तो हम खोजेंगे। लेकिन हिंदू के मंदिर में नहीं, मुसलमान के मंदिर में नहीं। इतनी बड़ी दुनिया उसका मंदिर है, हम यहीं खोजेंगे। हम क्यों किसी मंदिर की बंद दीवालों के भीतर जाएं, इतना विराट मंदिर है उसका, हम इसका दर्शन यहीं करेंगे। लेकिन इसकी हिम्मत शूद्र भी नहीं जुटा पाते हैं। वे भी कहते हैं, हम हरिजनों को अधिकार दो, हम हरिजनों को जगह दो, मंदिर का द्वार खोलो, हम भीतर प्रवेश करेंगे। तुम किससे अधिकार मांगते हो? और ध्यान रहे, अधिकार मांगने वाले कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकते? अधिकार मांगने वाले कैसे स्वतंत्र हो सकते हैं। जिनसे अधिकार मिलेंगे, वे उनके परतंत्र बने ही रहेंगे। और जिन्होंने हजारों वर्षों तक दिमागी सांचे बना कर आदमी को कसा है वे इतने होशियार हैं कि वे नये सांचे बना लेंगे और फिर कस लेंगे।
नहीं, सब जाल तोड़ कर बाहर आने की जरूरत है। किसी हिंदू मंदिर में किसी शूद्र को जाने की जरूरत नहीं है। और किसी शूद्र को अपने को हरिजन कहने की जरूरत नहीं है। आदमी कहना काफी है। तो मुझसे मत पूछें कि मैं हरिजन के घर में क्यों नहीं ठहरता? मैं घर में ठहरता हूं। हरिजन और गैर-हरिजन से मुझे कोई मतलब नहीं है। आप आ जाएं और मुझसे कहें कि चलें मेरे घर, वहां मैं ठहर जाऊंगा, लेकिन अगर जरा भी आपको भ्रम हो और आप प्रचार करें कि हरिजन के घर में ठहरा हूं, तो ऐसे पागलपन में मैं नहीं जाने को राजी होऊंगा। यह पागल-घर है। आदमी का घर होता है। मैं मेहमान बन सकता हूं आदमी का, हरिजन वगैरह से मुझे कोई मतलब नहीं है। हजार कारण हो सकते हैं, लेकिन एक ही कारण काफी है।
ओशो, विचार छोड़ दें, कैसे छोड़ दें? विचार छूटेगा कैसे? सुबह आपने कहा कि विचार छोड़ दो और निर्विचार हो जाओ, लेकिन विचार कैसे छोड़ दें?
मन के आकाश पर एक विचार चल रहा है। आप फौरन कहते हैं कि यह मैं हूं। झंझट में पड़ गए। मन के आकाश पर विचार उतनी ही दूरी पर चल रहा है आपसे जितना उस आकाश पर एक बदली का टुकड़ा चल रहा है। आप फिर भी अलग हैं। आप दूर खड़े साक्षी से ज्यादा नहीं हैं। यह हमें स्मरण करना होगा निरंतर कि विचार से मैं पृथक हूं, अलग हूं। और कोई विचार से मैं जुड़ा हुआ नहीं हूं। लेकिन हम? हम विचार से अपने को जोड़ने की आदत के इतने आदी हो गए हैं कि हमें खयाल ही नहीं आता। जब क्रोध आता है, तो बजाय इसके कि आप यह कहें कि मेरे सामने क्रोध आ गया है, आप कहते हैं, मैं क्रोधी हो गया हूं। आप गलत कहते हैं। जब आपके सामने सुख आ जाए तो बजाय यह कहने के कि मेरे सामने सुख आ गया, आप कहते हैं, मैं सुखी हो गया हूं। अगर आप सुखी हो गए हैं तो अब कभी दुखी न हो सकेंगे? लेकिन हम जानते हैं कि सुख चला जाएगा, दुख आ जाएगा।
एक कमरे में मैं सुबह बैठ जाऊं। सूरज निकले, किरणें भर जाएं, तो मैं यह नहीं कहता कि मैं प्रकाश हो गया हूं। मैं कहता हूं, कमरे में प्रकाश भर गया है, मैं प्रकाश को देख रहा हूं। फिर सांझ आती है, अंधेरा भर जाता है, मैं कहता हूं कि मैं अंधेरा हो गया हूं? मैं कहता हूं, अब अंधेरा भर गया, अब मैं अंधेरे को देख रहा हूं। प्रकाश, अंधेरा कमरे में आता-जाता है, मैं दृष्टा हूं, देखता हूं। मन में विचार आते-जाते हैं, सुख-दुख आते-जाते हैं, क्रोध, प्रेम, घृणा आते-जाते हैं, भाव आते हैं, जाते हैं और वह जो बैठा हुआ है भीतर, वह हरेक के साथ कहने लगता है कि यह मैं हो गया हूं। तब पकड़ शुरू हो जाती है। तब क्लिंगिंग शुरू हो जाती है। फिर मुक्त होना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए मैंने सुबह कहा, ध्यान का अर्थ है: साक्षीभाव। मैं देखूं, जो आ रहा है।
एक सम्राट ने अपने वजीरों को कहा कि मैं तुमसे एक ऐसा सूत्र चाहता हूं जो मुझे हर स्थिति में काम दे सके। सुख आए तो काम दे, दुख आए तो काम दे। मुझे एक सूत्र ताबीज पर लिख दो जो हर स्थिति में काम दे। वजीर बड़ी मुश्किल में पड़ गए। क्या लिखें? ऐसा कौन सा सूत्र है जो हर जगह काम दे। फिर उन्होंने एक फकीर को पूछा। फकीर ने एक ताबीज दे दिया और उसमें एक कागज की पुड़िया लिख कर रख दी। और कहा कि जब सुख-दुख आए, इसे खोल कर पढ़ लेना। राजा पर सुख आया, उसने ताबीज खोला। दुख आया, ताबीज खोला। उसमें सिर्फ एक छोटा सा वाक्य लिखा था, लिखा था: दिस टू विल पास। यह भी चला जाएगा। इतना ही लिखा था उस कागज पर, दिस टू विल पास। सुख आया, राजा ने पढ़ा, यह भी चला जाएगा। और राजा पृथक हो गया। क्योंकि जो चला जाएगा वह मैं नहीं हो सकता हूं। मैं तो बच रहूंगा। फिर दुख आया और राजा ने पढ़ा, यह भी चला जाएगा, और राजा अलग हो गया। क्योंकि जो चला जाएगा वह तो मैं नहीं हूं। मुझ पर चीजें आती हैं, जाती हैं, मैं तो अलग हूं। इस पृथकता को खोजना ही साक्षीभाव है।
तो यह मत पूछें कि हम विचार को कैसे रोकें। रोकने की कोई जरूरत नहीं है। विचार को आने दें, जाने दें, आप पृथक हो जाएं, आप अलग हो जाएं, आप भिन्न हो जाएं। आप जान सकें कि मैं अलग हूं, तो विचार धीरे-धीरे अपने आप विसर्जित हो जाते हैं। उन पर पकड़ छूट जाती है। फिर वही रह जाता है जो है, अकेला। उस अकेले में जो अनुभव होते हैं निर्विचार के, वे ध्यान के अनुभव हैं।
लेकिन हम क्या करते हैं, हम विचार से लड़ते हैं। लड़ कर तो आप कभी विचार को अलग नहीं कर सकते। ध्यान रहे, लड़ना तो बुलाने का उपाय है। अगर किसी विचार से आप लड़े और आपने कहा, इसे मैं अलग करके रहूंगा। बस फिर आप मुश्किल में पड़ जाएंगे। फिर उस विचार से कभी आप मुक्त न हो सकेंगे। आप जितना लड़ेंगे उतना ही वह आएगा। क्योंकि जितना आप लड़ेंगे उतना ही आप मान रहे हैं कि मैं उससे एक हूं। नहीं तो लड़ेंगे क्यों, लड़ने की क्या जरूरत है? वह अलग है। मैं अलग हूं। वह आया है, चला जाएगा। मुझे क्या प्रयोजन है? लेकिन हम लड़ते हैं।
मैंने सुना है, तिब्बत में एक फकीर था। उसके पास एक आदमी आया। और उसने कहा, मुझे एक मंत्र दे दें। मैं कोई सिद्धि करना चाहता हूं। फकीर ने कहा: मेरे पास कोई मंत्र नहीं। लेकिन नहीं माना वह व्यक्ति, पैर पकड़ लिए, हाथ जोड़ने लगा, दे ही दें। तो उस फकीर ने एक कागज पर एक मंत्र दे दिया और कहा, इसे पांच बार पढ़ लेना। फिर तो वह आदमी भागा। उसने लौट कर धन्यवाद भी न दिया। वह मंदिर की सीढ़ियां उतरता था, तब वह फकीर चिल्लाया कि ठहरो, मैं एक बात भूल गया, एक शर्त बताना भूल गया। ध्यान रहे, बंदर का स्मरण न आए जब तुम यह मंत्र पढ़ो। अगर बंदर का स्मरण आया, मंत्र बेकार हो जाएगा। बंदर दुश्मन है इस मंत्र का। उस आदमी ने कहा, मुझे कभी बंदर का स्मरण जिंदगी हो गई नहीं आया। इसकी फिकर मत करो। लेकिन भूल हो गई। पूरी सीढ़ियां उतरना भी मुश्किल हो गया। बंदर का स्मरण शुरू हो गया।
रास्ते पर घर की तरफ चला और बंदर चारों तरफ मन में घूमने लगे। बहुत आंख बंद करता है, बंदरों को भगाता है, लेकिन बंदर जोर से आते हैं। घर पहुंचा। स्नान करता है, लेकिन बंदर तो घिरते चले जाते हैं। रात हो गई। मंत्र लेकर बैठता है, हाथ में मंत्र है, लेकिन भीतर बंदर हैं। तो घबड़ा गया। उसने कहा:, इन बंदरों से कोई संबंध कभी नहीं रहा, आज क्या हो गया है? क्या ये बंदर पांच मिनट के लिए भी न रुकेंगे? रात भर मुश्किल हो गई। लेकिन पांच मिनट के लिए बंदर से छुटकारा नहीं। सुबह तो पागल हो गया। जाकर मंत्र वापस लौटा दिया उस फकीर को और कहा: क्षमा करो, अगले जन्म में हो सकती है अब यह सिद्धि। फकीर ने कहा: क्यों, क्या बात है? उसने कहा: वह बंदर जान लिए ले रहे हैं। और अब उनसे छुटकारा इस जन्म में नहीं हो सकता। और तुम्हें अगर मालूम था कि बंदर से बाधा है, तो एक दिन रुक जाते, बाद में बता देते, तो यह सिद्ध हो जाता मंत्र। अब यह नहीं हो सकेगा। उस फकीर ने कहा: मैं क्या कर सकता हूं, यही शर्त है। यह शर्त पूरी करनी जरूरी है।
क्या हो गया उस आदमी को, बंदर से छुटकारा नहीं होता। जिस विचार से हम लड़ते हैं, उस विचार पर हम केंद्रित हो जाते हैं। जिस विचार से हम लड़ते हैं उस विचार से हम हिप्नोटाइज्ड हो जाते हैं। जिस विचार से हम हटना चाहते हैं, सारा चित्त उसी पर केंद्रित हो जाता है। किसी को भुलाने की कोशिश करो, फिर मुश्किल हो जाएगी। वह नहीं भूलेगा। प्रेमियों से पूछो, प्रेमिकाओं को भुलाने की कोशिश बहुत मुश्किल हो जाती है। जिनको नहीं भुलाना, वे भूल जाते हैं। जिनको भुलाना है, वे कभी नहीं भूलते। चित्त की आदत है। जिससे लड़ोगे, चित्त वहीं केंद्रित हो जाएगा। एक नया-नया आदमी साइकिल सीखता है। रास्ते पर एक पत्थर पड़ा है। इतना बड़ा रास्ता है, साठ फीट चौड़ा, लेकिन वह पत्थर उसे दिखा कि वह डरता है, कहीं पत्थर से न टकरा जाऊं। अब अगर कोई निशानेबाज भी साठ फीट रास्ते पर पत्थर से टकराना चाहे तो चूकने की संभावना ज्यादा है। लेकिन ये सज्जन टकराएंगे। ये नहीं बच सकते। साठ फीट रास्ता अब इनको दिखाई न पड़ेगा। अब इनको वह पत्थर ही दिखाई पड़ेगा। अब इनका चाक घूमा और इनके प्राण घबड़ाए और ये हिप्नोटाइज्ड हुए उस पत्थर से। अब इनकी साइकिल चली उस तरफ। ये उससे टकराएंगे।
आदमी जिससे बचना चाहता है उसी से टकरा जाता है। आदमी जिससे भागना चाहता है उसी से घिर जाता है। पूछो ब्रह्मचारियों से, सिवाय स्त्रियों के और किसी का दर्शन नहीं होता। हो ही नहीं सकता। अगर भगवान भी प्रकट होंगे तो स्त्री की शक्ल में ही प्रकट होंगे। और किसी शक्ल में वे प्रकट नहीं हो सकते। ब्रह्मचारी का कष्ट है बेचारे का, वह सेक्स से लड़ रहा है और सेक्स से घिर गया है। इसीलिए तो ऋषि-मुनि स्त्रियों के लिए इतनी नाराजगी जाहिर करते हैं। यह नाराजगी किसके लिए है? वे जो स्त्रियां उनको घेर लेती हैं, उनके लिए। असली स्त्रियों के लिए नहीं। असली स्त्रियों से क्या मतलब है? ऋषि-मुनि कहते हैं, स्त्रियां नक का द्वार है। स्त्री से बचो। यह किससे बचने के लिए कह रहे हैं? वह जो भीतर स्त्री उनको घेरती है। और घेरती क्यों है? स्त्री से भागते हैं इसलिए स्त्री घेरती है। जिससे भागोगे, वह घेर लेगा। जिससे बचोगे, वह पकड़ लेगा। जिसको हटाओगे, वह आ जाएगा। जिसको कहोगे, मत आओ, वह समझ जाएगा कि डर गए हो। आना जरूरी है। वह आ जाएगा।
चित्त से लड़ना, चित्त के विचार से लड़ना आत्मघातक है। फिर वही उलझन हो जाएगी। इससे बचना जरूरी है। बचेंगे कैसे? बचने के लिए आवश्यक है कि विचार से लड़ो ही मत। सेक्स से मुक्त होना हो, तो सेक्स से लड़ो मत, साक्षी बनो। क्रोध से मुक्त होना हो, लड़ो मत, साक्षी बनो। जिससे मुक्त होना हो, उसे देखो और जानो कि मैं पृथक हूं, वह पृथक है। दूरी है, फासला है। दोनों के बीच अनंत फासला है। मैं अलग हूं, वह अलग है। और सच्चाई यही है। और जितनी यह स्पष्टता गहरी होगी कि मैं अलग हूं, उतनी हंसी आएगी कि मैं किससे लडूं। जिससे कोई झगड़ा ही नहीं, जिससे कोई संबंध नहीं, उससे लड़ने की जरूरत क्या है? और तब जिससे लड़ना बंद हो जाता है, जैसा मैंने कहा, लड़ने से आती है कोई चीज, न लड़ने से जाने लगती है। न लड़ने से जाने लगती है। ब्रह्मचर्य सेक्स से लड़ने से नहीं आता। सेक्स के प्रति जागने से सेक्स चला जाता है। जो शेष रह जाता है, उसका नाम ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य सेक्स से उलटा नहीं है। ब्रह्मचर्य सेक्स के विदा हो जाने का अभाव है। वह जो शेष रह जाता है सेक्स के चले जाने पर। लेकिन सेक्स से लड़ कर कोई ब्रह्मचारी नहीं हो सकता।
मुझे साधु-संन्यासी मिलते हैं, जब वे सबके सामने होते हैं तब वे आत्मा-परमात्मा की बात करते हैं। फिर वे कहते हैं, अकेले में मिलना है। और जब अकेले में मिलते हैं तो सिवाय सेक्स के दूसरी बात ही नहीं करते। असली सवाल तो वही है। सबके सामने पूछ भी नहीं सकते। क्योंकि सबको तो वे सुबह से सांझ तक यही बातें सिखा रहे हैं, जो उनको ही नहीं हो सकी हैं। और होंगी भी नहीं। क्योंकि विधि ही गलत है, मेथड ही गलत है। अज्ञानपूर्ण है। अ-मनोवैज्ञानिक है। खतरनाक है। असंगत है। उसकी कोई संगति नहीं है जीवन के परिवर्तन और रूपांतरण से। लड़ने की संगति है, झगड़े की संगति है।
गांधीजी के आश्रम में रामायण पढ़ी जाती थी। तो एक प्रसंगआता है--वह सबको पता है प्रसंग कि सीता को रावण लेकर भाग गया है। भागते में सीता ने अपने गहनें फेंक दिए मार्ग पर। राम खोजते निकलेंगे तो गहनों से पता चल सके कि सीता किस रास्ते से चुरा कर ले जाई गई है। गहने मिल गए हैं। राम-लक्ष्मण खोजते गए हैं। गहनें मिल गए हैं। लेकिन राम इतने दुख में हैं, शोक में हैं कि उनकी आंखें इतनी आंसुओं से भरी हैं कि वे गहनों को पहचान नहीं पाते। और सच तो यह है कि कोई पति अपनी पत्नी के गहने नहीं पहचान पाएगा। पत्नी के गहने पहचानना बहुत मुश्किल है। पत्नी को कोई देखता ही नहीं है इतने गौर से कि उसके गहने पहचाने जा सकें। पड़ोस की पत्नी ने क्या गहने पहने हैं, यह पहचाने जा सकते हैं। राम को भी नहीं समझ में आते कि ये गहने सीता के हैं। तो लक्ष्मण से पूछते हैं कि ये गहने तू पहचानता है? लक्ष्मण कहता है, गहने! मैं सिर्फ पैर के गहनें पहचानता हूं, क्योंकि रोज-रोज पैर पड़ता हूं तो पैर के गहने पहचानता हूं। बाकी गहनों का मुझे कुछ पता नहीं। गांधीजी कहते हैं, यह कैसे हुआ होगा कि लक्ष्मण इतने दिनों से साथ है, वह सीता के गहने नहीं पहचानता? तो विनोबा ने कहा कि इसका कारण है, लक्ष्मण ब्रह्मचर्य धारण किए हुए है। वह सीता का मुंह नहीं देखता, वह सीता के ऊपर नहीं देखता, वह सिर्फ पैर पर ही नजर रखता है। वह ब्रह्मचारी है। गांधीजी को यह व्याख्या जंच गई। और उन्होंने कहा: विनोबा बड़ी ठीक व्याख्या करते हैं। मैं बहुत हैरान हुआ यह व्याख्या पढ़ कर। अगर विनोबा की व्याख्या ठीक है तो लक्ष्मण ब्रह्मचारी नहीं, व्यभिचारी सिद्ध होता है। क्योंकि जो लक्ष्मण सीता के चेहरे की तरफ देखने से डरता हो, वह ब्रह्मचारी है?
सीता के भी चेहरे को देखने से जो डरता हो वह ब्रह्मचारी है? यह ब्रह्मचर्य का अर्थ हुआ? यह ब्रह्मचर्य का अर्थ नहीं हुआ। यह तो अत्यंत कामुक चित्त का अर्थ हुआ। सीता के चेहरे पर भी देखने में जहां भय हो!
भय का अर्थ क्या है? भीतर कहीं कोई वासना है, तो भय है। नहीं तो भय क्या है सीता के चेहरे में? नहीं, लक्ष्मण इसलिए नहीं पहचान पाया दूसरे गहनों को कि उसने सीता का चेहरा नहीं देखा। पैर के गहने पहचान सकता है। निश्र्चित रोज पैर पड़े होंगे, वह परिचित रहे होंगे। यह दूसरी बात है। लेकिन यह कहना कि वह इसलिए नहीं पहचान पाया कि उसने ऊपर कभी देखा नहीं सीता को, क्योंकि वह ब्रह्मचर्य की साधना कर रहा था। तो वह बड़े गलत ब्रह्मचर्य की साधना करता था लक्ष्मण।
अगर विनोबा ठीक कहते हैं, तो वह बड़ी गलत ब्रह्मचर्य की साधना कर रहा था। और उस ब्रह्मचर्य की साधना में बड़ी मुश्किल में पड़ा होगा, जैसे ब्रह्मचारी पड़ते हैं। और जो सीता के चेहरे को देखने से डरा होगा तो सपने में सिवाय सीता के चेहरे के और कुछ भी नहीं देखा होगा।
नहीं, लेकिन लक्ष्मण पर यह बात, व्याख्या थोपनी ही गलत है। यह व्याख्या ही गलत है। लक्ष्मण को पैर के गहनें पहचान गए होंगे क्योंकि रोज उसने पैर पड़े होंगे। वे गहनें परिचित थे। इसका यह मतलब नहीं कि उसने और गहनें न देखें होंगे, चेहरे की तरफ न देखा होगा। लेकिन हमारा तथाकथित ब्रह्मचर्य इसी तरह एस्केपिस्ट है, भागने वाला है। वह कहता है, भाग जाओ, देखो मत। वह डराने वाला है। फियर है वहां। और जहां भय है, जहां भागना है, जहां पलायन है, जहां आंख बंद करना है। ध्यान रहे, जिससे आंख बंद होगी, वही आंख के भीतर खड़ा हो जाता है। फिर उससे छुटकारा बहुत मुश्किल है।
इसलिए मैं कहता हूं, चित्त के किसी भी विकार से, चित्त की किसी भी विकृति से, चित्त के किसी भी विचार से, चित्त की किसी भी प्रवृत्ति से कभी मत लड़ना। भूल कर मत लड़ना। लड़े कि हारे। हारना हो तो लड़ना। जो लड़ेगा वह हारेगा। उसकी हार सुनिश्र्चित है। अपने चित्त से लड़ कर कोई कभी जीत नहीं सकता। हां, अगर जीतना हो तो लड़ना मत। देखना, जानना, साक्षी बनना। और जैसे ही साक्षी बनोगे, पाओगे कि मैं तो बाहर हूं। मैं तो बियांड हूं। मैं तो जो दिखाई पड़ रहा है उससे अलग और दूर हूं। वह जो चारों तरफ घिरा है धुआं, वह अलग है, मैं अलग हूं। सूरज के चारों तरफ अंधेरा घिर जाए तो भी सूरज अंधेरा नहीं है, लेकिन अगर सूरज अंधेरे से लड़ने लगे और अंधेरे पर ही ध्यान केंद्रित करने लगे और कहने लगे कि मरा, गया, यह अंधेरा मुझे घेर रहा है, अंधेरा हुआ जा रहा हूं मैं, तो सूरज मुश्किल में पड़ जाएगा। लेकिन अगर सूरज जाने कि ठीक है, अंधेरा वह है, मैं तो सूरज हूं, मैं तो अलग हूं। घिरने दो अंधेरे को। कितना ही अंधेरा निकट आ जाए, फिर भी मैं सूरज हूं। कितना ही अंधेरा पास आ जाए, फिर भी मैं अलग हूं। फिर भी प्रकाश और अंधेरे के बीच फासला अनंत है।
यह प्रत्येक के भीतर जो साक्षी है, जो चेतना है, जो कांशसनेस है, उसे सजग करने से, जागने से, साक्षी बनने से विचार विसर्जित होते हैं। वृत्तियां विसर्जित होती हैं। मन विसर्जित होता है। और धीरे-धीरे वह जगह आती है जहां चित्त का आकाश खाली हो जाता है और सिर्फ चेतना रह जाती है। वह साक्षीभाव के लिए सुबह मैंने कहा है: यह मत पूछें कि कैसे लड़ें? यह मत पूछें कि कैसे विचारों को निकालें? यह मत पूछें कि कैसे विचारों को बंद करें? यह पूछें ही मत। यह पूछना ही गलत है। यह पूछें कि कैसे जागें? कैसे देखें? कैसे पहचानें? कैसे साक्षी बनें? वह मैंने सुबह कहा, कल सुबह हम और बात करेंगे।
एक-दो छोटे प्रश्र्न और हैं।
ओशो, आप पहले तो बहुत सौम्य, मृदु-भाषा में बोलते थे। अब आप बहुत एग्रेसिव, बहुत आक्रामक क्यों हो गए हैं?
जीसस चर्च में गए। जीसस के मित्र उन्हें जानते थे। बहुत सौम्य और मृदु हैं। लेकिन वहां उन्होंने देखा कि चर्च के बाहर ब्याजखोर बैठे हुए हैं, और जन्मों से चल रहा है ब्याज लोगों का, और नहीं चुकता। जीवन बीत गए हैं बूढ़ों के, और जितना कर्ज उन्होंने लिया था उससे कई गुना वे चुका चुके, और वह नहीं चुकता। और मंदिर के सामने ही ब्याजखोर बैठे हैं। वे सब ब्याजखोर पुरोहितों के एजेंट हैं। जीसस ने कोड़ा उठा लिया। उठा कर कोड़ा उन्होंने दुकानें उलट दीं, कोड़े मारने शुरू कर दिए। जीसस के मित्रों ने कहा होगा, क्या करते हैं आप? आप जो कहते हैं कि जो एक गाल पर चांटा मारे उसके सामने दूसरा गाल कर देना। इतने मृदु, इतने सौम्य आप, आप कोड़ा उठा कर ब्याजखोरों की दुकानें उलटते हैं? तो मैं कहता हूं, जीसस ने ठीक किया। ब्याजखोरों की दुकानें किसी को उलटनी ही पड़ेंगी। अगर ब्याजखोरों की दुकानें कोई नहीं उलटता तो ब्याजखोर तो यह चाहता है कि सौम्य और मृदु-भाषा में आप बात करें, ताकि उसकी ब्याज की दुकान चलती रहे। और सौम्य और मृदु-भाषा कहीं कोई चोट नहीं पहुंचाती, कहीं कोई नुकसान नहीं करती। दुनिया में अब आने वाले बुद्धों को, आने वाले महावीरों को, आने वाले कनफ्यूशियस को, आने वाले जीसस को आक्रमक होना पड़ेगा। दुनिया बहुत कुरूप रह चुकी। और सौम्य होने से अब नहीं चल सकता है। इसलिए वह आपने जो पूछा, ठीक पूछा।
लेकिन, क्या आप कभी समझते हैं कि आक्रामक होना हिंसा से ही निकलता हो, ऐसा अनिवार्य नहीं है। आक्रामक होना करुणा से भी निकल सकता है, कंपेसोनेट भी हो सकता है। लेकिन हम एक ही तरह के आक्रमक होने को जानते हैं--हिंसा के आक्रमण को। हम एक दूसरे आक्रमण को नहीं जानते--करुणा के आक्रमण को। अब तक हिंसा आक्रामक रही है। अहिंसा सौम्य रही है। करुणा सौम्य रही है। सौम्य करुणा के कारण ही दुनिया में अच्छी बातें तो बहुत हुईं, लेकिन दुनिया अच्छी नहीं हो सकी है। करुणा को भी आक्रामक होना पड़ेगा। करुणा को भी बदलने के लिए क्रांतिकारी होना पड़ेगा। करुणा को भी चोट करनी पड़ेगी। और कई बार ऐसा होता है कि हमें दिखाई भी नहीं पड़ता कि चोट हमारे हित में है, हमारे मंगल में है। कठिनाई तो यह है कि जिनके हित में चोट हो वे ही आकर कहेंगे कि आप और ऐसी चोट की बात कर रहे हैं? क्योंकि हजारों साल से उन्हें समझाया गया है कि चोट की बात ही नहीं करनी है।
मैंने सुना है, एक फकीर था। उस फकीर के पास एक आदमी आया। और उस आदमी ने आकर उस फकीर को कहा कि मैं अध्यात्म, योग, ज्ञान-साधना चाहता हूं, मैं आध्यात्मिक होना चाहता हूं। मुझे अपनी शरण में लें, मुझे वह शास्त्र बताएं जिसे पढ़ कर मैं आध्यात्मिक हो जाऊं। उस फकीर ने कहा: बंद कर बकवास! अध्यात्म वगैरह की बात मत कर, और यहां से बाहर निकल जा और दुबारा इस आश्रम में लौट कर मत आना, बाहर होओ। वह आदमी तो घबड़ा गया। आस-पास दस-पच्चीस जो बैठे दूसरे आदमी थे वे भी घबड़ा गए। वह आदमी तो बेचारा चला गया। उन दस-पच्चीस लोगों ने कहा कि महाराज हम तो सदा आपको सौम्य समझते थे, और आपने यह कैसा दुर्व्यवहार किया? हम समझे नहीं। आप इतने जोर से क्यों बोले?
उस फकीर ने कहा: थोड़ी देर ठहरो। इसके पहले कि मैं तुम्हें भी निकाल कर बाहर करूं, मैं तुम्हें एक दृष्टांत देता हूं। वह फकीर थोड़ी देर चुप बैठा रहा। एक पक्षी खिड़की से घुसा भीतर और सारे कमरे में चक्कर लगाने लगा। अब आप जानते ही हैं पक्षियों को, आदमियों जैसी ही बुद्धि उनकी भी होती है। अगर पक्षी कमरे के भीतर घुस जाए तो खुली खिड़की को छोड़ कर सब जगह चोट मारेगा, निकलने की कोशिश करेगा, खुली खिड़की छोड़ देगा। आदमियों जैसी बुद्धि उसकी भी होती है। खुली खिड़की छोड़ देगा और सब दीवालों पर चोट मारेगा। और जहां से न निकल सकेगा वहां और जोर से चोट मारेगा। और जब नहीं निकल सकेगा, घबड़ा जाएगा, घबड़ाहट में पागल की तरह चोट मारेगा। फिर खुली खिड़की देखना मुश्किल हो जाएगी। वह पक्षी जोर से चक्कर काट रहा है, दीवाल से टकरा रहा है। फिर वह जाकर घबड़ा कर खुली खिड़की के ऊपर बैठ गया। फकीर ने एक क्षण उसे बैठे देखा और जोर से ताली बजाई। वह ताली का बजना, वह पक्षी फड़फड़ाया, घबड़ा गया और खिड़की के बाहर हो गया।
उस फकीर ने उन बैठे हुए मित्रों को कहा: देखा, मेरी ताली सुन कर पक्षी ने सोचा होगा, बड़ा दुष्ट है, कैसा दुर्व्यवहार कर रहा है, लेकिन उसी फड़फड़ाहट में वह खुले आकाश में चला गया है। अब शायद उसे पता चले कि ताली किसलिए बजाई गई थी। हो सकता है अब भी पता न चले। तो जिसको मैंने जोर से बाहर निकाल दिया है, अगर उसमें थोड़ी भी समझ होगी तो वह खुले आकाश में पहुंच जाएगा। मेरा आक्रोश, उस फकीर ने कहा, उसकी स्वतंत्रता के लिए ही है।
मैं भी आपसे कहता हूं, बहुत सी बातें हैं, जो मैं बहुत आक्रोश से कहना चाहता हूं। कहता हूं वह सिर्फ इसलिए है कि इस देश के प्राण जो न मालूम कितने दिनों से बंदी हैं। यह भूल ही गए कि बंदी हैं, वह मुक्त हो सकें। इस देश की आत्मा जो कितने दिन से गुलाम है, यह भूल ही गई कि वह गुलाम है। गुलामी को ही स्वतंत्रता समझ रही है और जंजीरों को आभूषण समझ रही है। उस पर चोट लग सके। उसे दिखाई पड़ सके। निश्र्चित ही सोए आदमी को जगाना सोए आदमी को बहुत एग्रेसिव मालूम पड़ता है। सोए हुए आदमी को जगाएं, बहुत गुस्सा आता है। सपने देखते थे, सब तोड़ दिया। नींद खराब कर दी। लेकिन सोए हुए को जगाना हो तो हिलाना ही पड़ता है। मेरा आक्रोश हिलाने के अतिरिक्त और किसी प्रयोजन से नहीं है। नीचे से जड़ें टूट जाएं। अतीत का पाखंड छूट जाए। गुलामी टूट जाए। जंजीरें टूट जाएं। इस देश की आत्मा मुक्त हो सके। खुले आकाश में उड़ सके। इसके लिए अब शांति की बातें और राम-धुन करने भर से नहीं चल सकता है। बहुत हो चुकी राम-धुन! बहुत हो चुके भजन-कीर्तन! बहुत हो चुकी शांति की वार्ता! किसी न किसी को शांति को क्रांति बनाना ही पड़ेगा। किसी न किसी को शांति को अंगार देना पड़ेगा। क्रांति की ज्योति देनी पड़ेगी। किसी न किसी को अब शांति को भी धार देनी पड़ेगी। उसमें भी धार आ जाए। और शांति भी शांति रह कर मुर्दा न हो जाए, जीवंत बने और जीवन को बदले।
इसलिए मैं कहता हूं, वह निश्र्चित मित्र पूछते हैं, वह मेरी गलती थी जो मैं सौम्य था। अब ऐसी गलती नहीं होगी।
और कुछ प्रश्र्न रह गए हैं, वह कल संध्या हम बात करेंगे। सुबह चौथे सूत्र पर बात करूंगा। कल सांझ आपके उत्तर दूंगा।
मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उसके लिए अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
How do we drop thoughts?
According to Osho, you don't 'drop' thoughts by fighting them; you stop holding them. Like an unclenched fist, the mind opens when you end identification. Notice each thought as something passing—'anger is here,' not 'I am angry'—and remember, 'This too will pass.' By remaining the witness, separateness emerges, clinging loosens, and thoughts naturally dissolve into meditative stillness.
In simple terms: Stop trying to push thoughts away; just watch them come and go without calling them “me,” and they fade by themselves.
Why don't you stay in the homes of 'Harijans' like Gandhi?
According to Osho, he refuses to stay in a 'Harijan' home because the very label is a prison: honoring or insulting it equally preserves caste identity. In his vision there are no 'Harijans'—only human beings. Such gestures are cosmetic compromises that keep the Hindu social framework intact. Real compassion dissolves all labels; freedom begins when we drop every religious and caste identity.
In simple terms: I don’t stay in 'Harijan' homes because using that label, even to honor, keeps the box alive—I see only human beings, not categories.
Why has the style of communication changed from gentle to aggressive?
According to Osho, gentle, soft language pleases but fails to transform; it leaves the world’s ugliness intact and serves vested interests. Hence he adopts an outwardly aggressive tone—rooted in inner gentleness and compassion—to shock, disrupt complacency, and catalyze real change. True compassion sometimes strikes, like Jesus overturning moneylenders, because only forceful clarity can awaken and liberate.
In simple terms: He uses strong, wake-up words—like tough love—because soft talk pleases people but doesn’t stop harmful habits or injustice.
What is the reason for the existence of Shudras and Harijans?
According to Osho, Shudras (and later ‘Harijans’) arose not from any divine order but from India’s calculated invention of varna—a device to freeze fluid class differences, eliminate competition, and secure upper-caste privilege. By fixing people’s destiny through social barriers and doctrines like karma, society immobilized the lower masses, bred apathy toward the nation’s fate, and invited stagnation and enslavement.
In simple terms: Society made these groups to keep poor people stuck below so the powerful had no competition—not because God wanted it.
What is the significance of varna-ashrama according to scriptures?
According to Osho, scriptures that uphold varna-ashrama are 'criminal' inventions of exploiters, not utterances of true rishis. Any doctrine ranking humans as higher or lower turns life into hell and must be discredited. Authentic spirituality recognizes no hierarchy; we must free ourselves from such past-bound texts entirely and birth a new, egalitarian, compassionate social order.
In simple terms: Throw out old rules that say some people are above others, and treat everyone as equal.

Osho's Commentary
मेरे प्रिय आत्मन्!