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Questions in this Discourse
नींद क्रिया नहीं है, मृत्यु क्रिया नहीं है, जन्म क्रिया नहीं है, लेकिन भाषा में वे क्रियाएं बन जाती हैं।
आप भी कहते हैं कि मैं कल रात सोया। लेकिन अगर कोई आपसे पूछे कि कैसे सोए? सोने की क्रिया क्या है? तो आप कठिनाई में पड़ जाएंगे। सोए आप बहुत बार हैं, लेकिन सोने की क्रिया न बता सकेंगे कि सोए कैसे। हो सकता है कहें कि तकिए लगाए, बिस्तर लगाया, कमरा अंधेरा किया, लेकिन इनमें से सोने की क्रिया कोई भी नहीं है। यह भी हो सकता है, तकिया भी हो, बिस्तर भी हो, अंधेरा हो और नींद न आए। तकिया, बिस्तर और अंधेरा नींद नहीं है। हां, इनकी उपस्थिति में नींद का आना सरल हो जाता है, लेकिन नींद का आना अलग ही बात है।
और आप कभी नींद नहीं ला सकते, नींद आती है। इसलिए नींद अक्रिया है। आप ला नहीं सकते। पकड़ नहीं सकते, कोशिश नहीं कर सकते। फिर भी नींद आ सके, इसके लिए तैयारी कर सकते हैं। प्रकाश में नींद आने में कठिनाई पड़ेगी, अंधेरे में आसानी होगी। नीचे कांटे बिछे हों, तो नींद आने में कठिनाई पड़ेगी। ठीक बिस्तर हो, तो आसानी होगी। लेकिन फिर भी नींद आप नहीं लाते हैं, नींद आती है।
जब मैं कहता हूं, ध्यान अक्रिया है, तो मेरा मतलब यही है कि आप जो भी कर रहे हैं, वह ध्यान की बाहरी व्यवस्था है। फिर उस व्यवस्था में ध्यान आएगा, आप ला नहीं सकते हैं। आप सिर्फ ऊपरी इंतजाम कर रहे हैं। ऊपरी इंतजाम का क्या मतलब है, यह भी समझ लेना चाहिए।
इसलिए दुनिया में ध्यान की कोई विधि, कोई मेथड नहीं है। न नींद की कोई विधि है, न कोई मेथड है। रिचुअल है, क्रियाकांड है नींद का।
एक छोटा बच्चा है, वह अंगूठा मुंह में डाल कर सो जाता है। अंगूठा बाहर खींचो और उसको नींद आना मुश्किल हो जाए। उसने एक इंतजाम कर रखा है, एसोसिएशन बना रखा है कि जब भी उसका अंगूठा मुंह में गया कि उसका मन नींद के लिए तैयार हो जाता है। अंगूठे का मुंह में जाना सिग्नल का काम करता है उसके लिए कि अब नींद आ जाएगी और कुछ भी नहीं है। तकिया और बिस्तर भी सब सिग्नल का काम करते हैं और कुछ भी नहीं। इसलिए नये मकान में, नये घर में, नये तकिए पर, नये बिस्तर पर नींद मुश्किल हो जाती है। थोड़ा सा भेद हो गया है। छोटे कमरे में सोने का आदी बड़े कमरे में सोने में थोड़ी अड़चन पाता है। मन कहता है कि यह वह जगह नहीं जहां रोज नींद आती थी। थोड़ी बाधा डालता है।
तो ऊपरी इंतजाम का मतलब है कि मन बाधा न डाले, ऐसी व्यवस्था कर लें। अब जैसे, यहां जो भी हम करेंगे, वह ध्यान नहीं है वस्तुतः। ध्यान तो आएगा। हम सिर्फ इतना ही करेंगे कि हमारी तरफ से ध्यान में जो बाधाएं उपस्थित होती हैं, वे हम अलग कर देंगे और प्रतीक्षा करेंगे।
सुबह सूरज निकला है, आप दरवाजा बंद करके बैठे हैं, सूरज भीतर नहीं आ रहा है। आप मुझसे पूछते हैं, हम सूरज को भीतर लाने के लिए क्या करें? टोकरियों में सूरज की रोशनी भर लाएं, गठरियों में बांध लें, मजदूर लगाएं, क्या करें? सूरज की रोशनी को भीतर लाना है। मैं आपसे कहता हूं, आप न ला सकेंगे। सूरज की रोशनी भीतर आ सकती है। लाई नहीं जा सकती, इसको क्रिया नहीं बना सकते। आप कृपा करके इतना ही करें कि सूरज की रोशनी में जो बाधा पड़ रही है दरवाजा बंद होने की, उतना दरवाजा भर खोल दें। वह क्रिया है, दरवाजा खोलना क्रिया है। फिर सूरज आएगा, वह क्रिया नहीं है। हालांकि आप लोगों से कह सकते हैं कि आज मैं दरवाजा खोल कर सूरज को भीतर ले आया। लेकिन आप गलत कह रहे हैं। आपने सिर्फ दरवाजा खोला, आने का काम सूरज ने किया, आपने नहीं किया। लेकिन दरवाजा न खोलते, तो सूरज को रोकने का काम आप करते।
इसका मतलब यह हुआ कि ध्यान को हम रोक सकते हैं, ला नहीं सकते। और हम सब मिल कर ध्यान को रोक रहे हैं। तो जब मैं कहता हूं कि यह व्यवस्था कर लें, तो उसका मतलब है कि ध्यान को रोकने का आपका जो इंतजाम है, कृपा करके उसको हटा दें--ध्यान आ जाएगा। दरवाजा खोल लें--सूरज आ जाएगा। और इसलिए जिस दिन ध्यान आएगा, उस दिन आप जाकर किसी से कह न सकेंगे कि मुझे ध्यान मिल गया। उस दिन आप कहेंगे, प्रभु की कृपा! जिसको मिलेगा, वह यह नहीं कह सकेगा कि मैंने पा लिया। वह कहेगा, उसका प्रसाद! वह कहेगा, उसकी ग्रेस!
और अगर परमात्मा को नहीं मानता, तो वह कहेगा कि मुझे कुछ पता नहीं कहां से आ गया! अनजान, अज्ञात से आगमन हुआ--मेरा कोई हाथ नहीं। जिसको मिलेगा, वह यह न कह सकेगा--मैंने पा लिया। क्योंकि उसे साफ दिखाई पड़ेगा कि मैंने तो पाने की बहुत कोशिश की, मैं न पा सका। इसलिए जिन्होंने पाया है, वे इतना ही कहेंगे कि हम बाधा न बनें--बस।
जिस दिन बुद्ध को ज्ञान मिला, किसी ने पूछा कि आपने कैसे पाया? तो बुद्ध ने कहा: जब तक पाने की कोशिश की, तब तक तो नहीं पाया। जिस दिन बाधाएं छोड़ दीं, अपनी तरफ से जो हमने इंतजाम किए थे, दीवाल-परकोटे उठाए थे, वे गिरा दिए, उस दिन पा लिया। वह मिला ही हुआ था, वह द्वार पर ही खड़ा था, लेकिन द्वार बंद थे। तो आप द्वार बंद कर सकते हैं, खोल सकते हैं, लेकिन प्रकाश को ला नहीं सकते। प्रकाश आएगा।
तो जब मैंने कहा, ध्यान अक्रिया है, तो मेरा मतलब है, आपकी क्रिया नहीं है। लेकिन इससे आप यह मत समझ लेना कि आपको कुछ भी नहीं करना है। दरवाजा तो खोलना ही है, बिस्तर तो लगाना ही है, तकिया तो जमाना ही है, अंधेरा तो करना ही है। नींद आएगी, लेकिन उसकी पूर्व-भूमिका भी बना लेनी जरूरी है। कभी-कभी बिना पूर्व-भूमिका के भी आती है। अगर बहुत थक गए हों, बहुत दिन सोने न मिला हो, तो पत्थर पर भी आती है, रोशनी भरी दोपहरी में भी आती है। तकिए की भी जरूरत नहीं पड़ती, रात की भी आवश्यकता नहीं होती, शांति की भी जरूरत नहीं होती, बाजार में भी आ सकती है, सड़क के रास्ते पर भी आ सकती है। कभी आती है, लेकिन उतना थका होना जरूरी है। उतना कोई थका हुआ नहीं है।
परमात्मा की, सत्य की इतनी प्यास हो जाए, इतने थक गए हों, इतने दौड़े हों, इतना चाहा हो, इतना खोजा हो, तो, तो ध्यान बिना किसी इंतजाम के भी आता है। इसलिए जब किन्हीं को बिना इंतजाम के आ जाता है, तो वे दूसरों से कहते हैं, इंतजाम की कोई जरूरत नहीं। लेकिन इतने इंतजाम की जरूरत है। फिर भी यह इंतजाम ध्यान का नहीं है। यह फर्क समझ लेना। यह सिर्फ पूर्व-भूमिका है, जिसमें आ सके, इसके लिए हम द्वार खोल देते हैं। इस पूर्व-भूमिका के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण जो सूत्र है, वह मैं आपको कह दूं। कोई कहने से समझ में नहीं, प्रयोग करने से ही समझ में आ सकता है।
पहली बात, जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है ध्यान में प्रवेश के लिए, वह श्वास है। श्वास द्वार है। जीवन की समस्त महत्वपूर्ण चीजों का द्वार श्वास है। श्वास के ही मार्ग से जन्म आता है, श्वास के ही मार्ग से मृत्यु आती है, श्वास के ही मार्ग से ध्यान आता है, श्वास के ही मार्ग से परमात्मा आता है। श्वास जो है, वह मार्ग है। श्वास से ही संबंधित होकर जीवन प्रकट होता है और श्वास से ही विच्छिन्न होकर जीवन अप्रकट होता है।
ये पौधे भी श्वास ले रहे हैं और यह सागर भी श्वास ले रहा है और ये पक्षी भी श्वास ले रहे हैं। सारा जीवन श्वास का खेल है। ऐसा समझ सकते हैं कि श्वास की अनंत लहरों का नाम जीवन है। जहां-जहां से श्वास विदा हो जाती है, वहां-वहां जीवन क्षीण हो जाता है। श्वास के ही पथ से परमात्मा भी आएगा। श्वास के ही पथ से सब-कुछ आया है और गया है। इसलिए श्वास ध्यान के लिए बड़ी महत्वपूर्ण बात है।
लेकिन श्वास दो तरह से ली जा सकती है। एक, अनजाने, बेहोशी में, मूर्च्छित, जैसा हम ले रहे हैं। श्वास चल रही है चौबीस घंटे, लेकिन हमने कभी खयाल नहीं दिया श्वास पर। जो जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्रिया है, वह बिलकुल ही अनजान, चुपचाप चल रही है। हमने कभी उस पर ध्यान नहीं दिया। श्वास पर हम कभी जागे नहीं। यदि हम श्वास के प्रति जाग सकें, तो तत्काल श्वास के साथ ध्यान के आगमन का द्वार खुल जाता है। कुछ और करने की जरूरत नहीं।
अगर कोई व्यक्ति चौबीस घंटे में, जब भी उसे खयाल आ जाए, श्वास के प्रति होश से भर जाए, माइंडफुल हो जाए कि यह श्वास जा रही है, यह श्वास आ रही है, यह श्वास जा रही है, तो तत्काल एक दूसरा मार्ग भीतर खुलना शुरू हो जाता है। श्वास की अवेयरनेस, श्वास को होशपूर्वक देखने से तत्काल चेतना में नये दरवाजे खुलने शुरू हो जाते हैं।
श्वास मूर्च्छित और श्वास अमूर्च्छित। अगर श्वास मूर्च्छित ले रहे हैं आप, तो आप ध्यान के रास्ते पर प्रवेश न कर सकेंगे। होशपूर्वक ले रहे हैं, जान कर ले रहे हैं, खयाल है कि यह श्वास जा रही है, आ रही है, तो आपके भीतर दो चीजें हो गईं--एक श्वास और एक आप। ये दो अलग हो गए तत्काल। अभी श्वास और आप एक हैं। अभी आइडेंटिटी है। अभी ऐसा लगता है कि मैं श्वास हूं। अगर कोई आपकी नाक दबा दे, तो आप चिल्ला कर कहेंगे--मुझे मारो मत! मार डालोगे क्या! छोड़ो मुझे! कोई गर्दन दबाए, श्वास रोके, तो आप कहेंगे--मरा! अभी मैं और श्वास एक है।
अज्ञानी और ज्ञानी में एक ही फर्क है, जिसकी ‘मैं’ और ‘श्वास’ एक है, वह अज्ञानी है। और जिसकी ‘मैं’ और ‘श्वास’ भिन्न हो गए, वह ज्ञानी है। जिसे यह साफ दिखाई पड़ गया कि मैं अलग और श्वास अलग, उसके बाद उसकी मृत्यु नहीं हो सकती। जब तक श्वास समझा है उसने कि मैं श्वास हूं, तब तक मृत्यु होगी, क्योंकि कल श्वास टूटेगी। जिस दिन उसने जाना कि मैं श्वास के पीछे हूं--अलग, भिन्न--उस दिन के बाद मृत्यु असंभव हो गई। श्वास टूटेगी, फिर भी वह जानेगा कि मैं भिन्न हूं। श्वास बंद हो जाएगी, फिर भी वह जानेगा कि मैं हूं।
इसलिए श्वास पर पहला सूत्र है कि हम श्वास को देखते हुए कैसे ले सकें, होश से कैसे ले सकें। श्वास को कैसे देख सकें, जान सकें, पहचान सकें। और हमारे भीतर जो क्रिया हो रही है, वह श्वास की ही क्रिया हो रही है। यह हमारा पूरा शरीर श्वास की क्रिया को करने के लिए इंतजाम है, सिचुएशन है। यह सारा इंतजाम--यह खून का दौड़ना, इन हड्डियों का होना, इस हृदय की धड़कन--यह सारा का सारा यंत्र एक काम के लिए है--इसके केंद्र पर श्वास है। श्वास लेने के लिए सारी की सारी व्यवस्था है। यह पूरा शरीर श्वास लेने का यंत्र है। तो जैसे ही हम श्वास से अलग हुए, हम शरीर से भी अलग हो गए। तत्काल पता चलेगा कि मैं शरीर नहीं हूं। और जिसे यह अनुभव होने लगा कि मैं शरीर नहीं हूं, उसे अनुभव होने लगेगा कि मैं कौन हूं।
ओशो, कुंडलिनी क्या है?
वह तो बड़ी बात है। अगली बार संभव हुआ तो दो-चार दिन उस पर ही बात करनी पड़े। बहुत संक्षिप्त में इतना समझें कि मनुष्य के शरीर के भीतर अदभुत शक्तियों का निवास है, लेकिन सोई हुई हैं बहुत सी शक्तियां। कुंडलिनी उस शक्ति को कह रहे हैं, जो मनुष्य के पहले केंद्र से उठ कर अंतिम केंद्र की तरफ यात्रा करती है। वह आपकी रीढ़ से होकर गुजरेगी, मस्तिष्क के ऊपर तक जाएगी। जैसे कोई विद्युत की धारा भीतर बहती हो और ऊपर उठती हो, या जैसे कोई सांप सोया हो और फन उठाता हो, बहुत तरह का अनुभव हो सकता है। जब वैसा अनुभव हो रहा हो, तब भयभीत होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि जहां भयभीत हो गए, वहीं अनुभव रुक जाएगा। जब वैसा अनुभव हो रहा हो, तब अत्यंत प्रफुल्लता से, अत्यंत रिसेप्टिविटी से, निमंत्रण से, इनवाइटिंगली उस अनुभव को स्वीकार कर लें, ताकि वह पूरा हो सके।
बहुत से मित्रों ने पूछा है कि पूरे शरीर में विद्युत की धाराएं दौड़ती हुई मालूम पड़तीं हैं।
बहुत से मित्रों के मुंह से जोर से चिल्लाहट निकल गई।
निकल जाएगी और भी ज्यादा। कुछ तो रोक लेते हैं।
ध्यान की गहराई तभी उपलब्ध होगी जब वह सब अटका हुआ बिखर कर बह जाए। उसे रोकेंगे, तो ध्यान की गहराई में जाना असंभव है। इसलिए रोकें मत। चिल्लाने की स्थिति हो गई हो भीतर और फूट रहा है पूरा प्राण चिल्लाने को, तो चिल्ला लेने दें। थोड़ी देर में वे आवाजें निकल जाएंगी और भीतर आप हलके हो जाएंगे। वर्षों का भार निकल सकता है। लेकिन उसे रोकेंगे, तो वहीं अटक जाएंगे।
और यहां हम इसकी चिंता ही न करें कि कौन क्या सोचेगा। यह कौन क्या सोचेगा, यही हमारी मृत्यु बन गई है। चौबीस घंटे हम ऐसे डरे हुए जी रहे हैं कि कौन क्या सोचेगा। जीना हमें है, सोचना दूसरों को है! उनके सोचने की वजह से हम जी ही नहीं पाते। अकेले हैं आप, किसी के सोचने का कोई मूल्य नहीं है। जीना है आपको, होना है आपको। तो बिलकुल छोड़ दें।
क्या कारण है कि यह पशु की आवाज हमारे भीतर है?
इसके कारण तो लंबे हैं। लेकिन एक संक्षिप्त बात आपसे कह दूं कि हम सब किसी न किसी पशु योनियों से यात्रा करके मनुष्य तक आते हैं। अगर आपके भीतर से किसी पशु की आवाज बहुत जोर से निकलने लगे, तो वह बहुत सिंबालिक है। वह इस बात की खबर है कि आप किस योनि से यात्रा करके मनुष्य तक आ रहे हैं। वह आपकी पिछली योनि की खबर देती है। उसे निकल जाने दें, उसकी कोई चिंता न लें।
किसी के शरीर में इतने जोर से शक्ति का आविर्भाव होगा कि नाचने लगे, खड़ा हो जाए, चिल्लाने लगे। दूसरे की चिंता नहीं करनी है। आप अगर आंख खोल कर भी देख लेते हैं, तो आप भटक जाते हैं। आप गए। आपका काम बंद हो गया। किसको क्या हो रहा है, वह उसे होने दें। आपको जो हो रहा है, वह आप होने दें। रोकें न। अगर खड़े होने की शरीर की स्थिति है, तो खड़े हो जाएं; क्योंकि खड़े होने की स्थिति का मतलब ही यह है कि भीतर कोई धारा उठना चाहती है, जो बैठे में नहीं पूरी तरह उठ पाएगी, इसलिए शरीर खड़ा हो रहा है। किसी के हाथ मुद्रा बना रहे हैं, किसी का सिर घूम रहा है, कोई चक्कर खा रहा है, कोई गिर पड़ा है, कोई मछली की तरह तड़प रहा है, किसी का एक पैर ही कंप रहा है, किसी का एक हाथ ही ऊंचा-नीचा उठ रहा है--वह जो भी हो रहा है, आप छोड़ दें। शक्ति भीतर काम कर रही है, उसे काम करने दें। वह शक्ति आपको पहले से अदभुत नई स्थितियों में छोड़ जाएगी।
कोई बीस-पच्चीस मित्र उस जगह आ गए हैं, जहां एक नया अनुभव भी हो सकता है। उसकी मैं आज बात कर लूं, संभव है वह आज हो सके।
जब आप पूरी तीव्रता में, टोटल इनटेंसिटी में, जब आप समग्रता से समर्पण करते हैं, जब आप पूरी तरह अपने को छोड़ते हैं और जब आपके भीतर जो भी होता है आप होने देते हैं, रोकने वाले नहीं बनते, जब यह ठीक चरम स्थिति में पहुंचे, तो आपके भीतर कोई बड़ी शक्ति ऊपर से उतर गई हो, जैसे कोई नदी किसी सागर में गिरे, जैसे कोई विद्युत की धारा ऊपर से आपके ऊपर आ जाए और आप में प्रवेश कर जाए, वैसा अनुभव भी शुरू होगा। जब वैसा अनुभव होगा, तो आप बिलकुल ही मुश्किल में पड़ जाएंगे, क्योंकि उतनी बड़ी शक्ति का आवर्तन, उतरना, अवतरण कभी भी आपके लिए खयाल में नहीं है। जब वह आएगी, तब बिलकुल ही आप यंत्रवत घूमने लगेंगे। गिरेंगे, लोटेंगे, चिल्ला सकते हैं, नाच सकते हैं, कुछ भी हो सकता है, कुछ भी कहा नहीं जा सकता। अपनी तरफ से आप चरम स्थिति में पहुंच जाएं, तो बड़ी शक्ति ऊपर से भी आपके साथ संबंधित हो सकती है।
लेकिन आप अपनी तरफ से जब तक पूरे न पहुंच जाएं, तब तक यह नहीं होगा। वह कांटेक्ट, वह संपर्क आपकी चरम स्थिति में ही हो पाएगा। इसलिए आज हम फिर कोशिश करें पूरी ताकत से। इन चार दिनों में काफी गति हुई है।
और ध्यान रहे, एक भी आदमी दर्शक की भांति न बैठा रहे, क्योंकि वह पूरे एटमॉस्फियर को नुकसान पहुंचाता है। वह आदमी जिस जगह बैठा है, उस जगह सब तरफ जो विद्युत की धाराएं फैलने लगती हैं, वह उस आदमी की वजह से निरंतर बाधा पड़ती है। वह नॉन-कंडक्टर की तरह बीच में बैठ जाता है। किसी को देखना भी हो, तो वह बीच से एकदम हट जाए, वह कहीं भी किनारे दूर दीवालों पर बैठ जाए। बीच में यहां न बैठा हो। और देखने का कोई मूल्य भी नहीं है। देखने से कुछ होने वाला भी नहीं है।
आज मैं आशा करता हूं, हम पूरी शक्ति लगाएंगे। हमने कोशिश की है, लेकिन फिर भी बहुत शक्ति बाकी रह जाती है।
कल मैंने कहा था कि मैं ध्यान के पहले कुछ लोगों को जाकर स्पर्श करूंगा, वे ही दोपहर आ सकेंगे। लेकिन उसमें कम से कम घंटा भर लग जाएगा। इसलिए वह संभव नहीं है। और मैं जिस वजह से स्पर्श करना चाहता था, वह आपको ही कह देता हूं, आप खुद ही खयाल कर लेंगे।
मैं उन लोगों को स्पर्श करना चाहता था, जिनके भीतर बहुत तीव्रता से शक्ति जग रही है, लेकिन जो कहीं छोटी-मोटी बाधा डाल रहे हैं। तो जिनको भी ऐसा लगता हो कि कुछ हो रहा है, लेकिन मैं बाधा डाल रहा हूं, वे लोग दोपहर मिलने को आ जाएं। और फिर जो मुझे करना था आपको स्पर्श करके, वह नारगोल के शिविर में संभव हो सकेगा, क्योंकि चार दिन हम साथ होंगे, ज्यादा समय होगा। और जिन मित्रों को भी खयाल हो और गहरे जाने का, वे नारगोल जरूर ही आ जाएं। इस बार बहुत पूर्व लक्षण हैं कि वहां बहुत कुछ हो सकेगा।
अब हम ध्यान के लिए बैठें।
तो पहले तो देख लें कि कोई किसी को स्पर्श न करे और एक-दूसरे से दूर हो जाएं। जिनको लेटना है या उन्हें पता है कि बीच में वे गिर जाएंगे, वे पहले से लेट जाएं, ताकि उनके लिए जगह बन जाए। चुपचाप।
एक संकल्प लेकर बैठें कि आज अपनी पूरी शक्ति लगा देंगे। दूसरी प्रार्थना लेकर बैठें कि अपनी पूरी शक्ति जब लग जाए, तो परमात्मा की शक्ति भी उतर सके।
ढीला छोड़ दें, आंख बंद कर लें। बीच में भी लेटने का मन हो, तत्काल लेट जाएं। इसकी बिलकुल फिकर मत करें कि किसी के पैर पर भी सिर पड़ जाएगा। पड़ जाएगा तो चिंता नहीं है। गिरते हो, गिर जाएं, रोकेंभर नहीं। और आज पूरी ताकत लगानी है।
आंख बंद कर लें, श्वास गहरी लेना शुरू करें। जितनी गहरी ले सकते हो श्वास लें। उतनी ही गहरी छोड़ें, उतनी ही गहरी लें। गहरी श्वास लेना शुरू करें। गहरी श्वास लें, गहरी श्वास छोड़ें। गहरी श्वास लें, गहरी श्वास छोड़ें। पूरी शक्ति से गहरी श्वास लेना शुरू करें। श्वास ही लेना है, पूरी शक्ति लगा दें। गहरी श्वास भीतर जाए, गहरी श्वास बाहर जाए। गहरी श्वास भीतर जाए, गहरी श्वास बाहर जाए। श्वास भीतर, श्वास बाहर। गहरी श्वास, गहरी श्वास, गहरी श्वास...।
और देखते हुए, भीतर देखते रहें--श्वास भीतर गई, श्वास बाहर गई। इसके साक्षी बने रहें, इसके द्रष्टा बने रहें। श्वास भीतर जा रही, हम देख रहे हैं; श्वास बाहर जा रही, हम देख रहे हैं। श्वास भीतर जा रही, हम देख रहे हैं; श्वास बाहर जा रही, हम देख रहे हैं। देखते रहें और गहरी श्वास लेते रहें--दो काम।
दस मिनट के लिए पूरी शक्ति से करें। गहरी श्वास लें, गहरी श्वास लें...पूरा शरीर कंप जाए, फिकर न करें पर गहरी श्वास लें। सारे शरीर में विद्युत की तरंगें दौड़ने लगेंगी। गहरी श्वास लें और गहरी श्वास छोड़ें। गहरी श्वास लें, गहरी श्वास छोड़ें और देखने वाले बने रहें भीतर--यह श्वास भीतर गई, यह श्वास बाहर गई। देखते रहें, देखते रहें, देखते रहें...गहरी श्वास...देखते रहें...।
दस मिनट के लिए मैं चुप हो जाता हूं। आप गहरी श्वास लें और देखते रहें। और पूरी शक्ति लगा दें, दांव पर सब लगा दें। गहरी श्वास...।
गहरी श्वास लें, गहरी श्वास लें, गहरी श्वास लें, बस श्वास लेने का एक यंत्र रह जाए सारा शरीर और भीतर देखते रहें--यह श्वास भीतर गई, यह श्वास बाहर गई; श्वास भीतर गई, श्वास बाहर गई।
शक्ति पूरी लगा दें--शुरू से ही पूरी लगा दें, ताकि अंत तक पहुंचते-पहुंचते वह चरम बिंदु आ जाए, जिसे चाहता हूं कि आए। छोड़ें...पूरी ताकत लगाएं। गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...देखते रहें--गहरी श्वास...गहरी श्वास... थका डालें।
और दूसरे की चिंता न करें। यह बीच में कोई भी आंख खोल-खोल कर न देखे। अपनी फिकर करें।
गहरी श्वास...पूरी शक्ति लगा दें...पूरी शक्ति लगा दें...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी...और गहरी...और गहरी...और गहरी...और गहरी...पूरी शक्ति दांव पर लगा दें...और गहरी...और गहरी...और गहरी श्वास...और गहरी श्वास...देखते रहें...बस श्वास लेने की एक धौंकनी हो जाएं...श्वास...श्वास...श्वास ही रह गई और सब मिट जाए, श्वास ही रह जाए और सब मिट जाए। गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...पूरी शक्ति लगाएं, पूरी शक्ति लगाएं...गहरी श्वास...और गहरी...और गहरी...और गहरी...दांव पर सब लगा दें। और गहरी...और गहरी...पीछे कुछ बाकी न बचे। और गहरी...और गहरी...और गहरी...और गहरी...और गहरी...दूसरे सूत्र में प्रवेश के पहले पूरी शक्ति लगाएं।
एक दो मिनट के लिए अब पूरी शक्ति लगाएं, ताकि दूसरे सूत्र में प्रवेश हो सके। पूरी शक्ति पर ही दूसरे में प्रवेश करना है। और गहरी...और गहरी श्वास...देखते रहें--गहरी श्वास भीतर गई, श्वास बाहर गई; श्वास भीतर गई, श्वास बाहर गई। लगाएं पूरी शक्ति...और गहरा, और गहरा, और गहरा, और गहरा, और गहरा, और गहरा, और गहरा...और गहरा लगाएं, और गहरी ताकत लगाएं।
एक मिनट के लिए पूरी शक्ति लगाएं, दूसरे सूत्र में प्रवेश के पहले पूरी शक्ति लगाएं...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...मैं दूसरे सूत्र की सूचना दूं, तैयारी करें...और गहरी श्वास, और गहरी श्वास, और गहरी श्वास, और गहरी श्वास, और गहरी श्वास, और गहरी श्वास, और गहरी श्वास, और गहरी, और गहरी...श्वास ही रह जाए, श्वास ही रह जाए, श्वास ही रह जाए, श्वास ही रह जाए...सिर्फ श्वास रह गई, देखने वाले रह गए हैं...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...।
(अनेक तरह की आवाजें आ रही हैं, लोग रो रहे हैं, चीख रहे हैं...)
अब दूसरे सूत्र में प्रवेश कर जाएं--गहरी श्वास लेते रहें, गहरी श्वास लेते रहें और शरीर को बिलकुल छोड़ दें। शरीर को छोड़ दें...शरीर को बिलकुल छोड़ दें...शरीर को जो हो, हो। शरीर घूमे, चक्कर खाए, गिरे, चिल्लाए, रोए, चिंता छोड़ दें। शरीर को ढीला छोड़ दें...गहरी श्वास लें और शरीर को छोड़ दें...गहरी श्वास लें और शरीर को छोड़ दें...शरीर को जो होना हो, होने दें। शरीर को बिलकुल छोड़ दें, ताकि साफ दिखाई पड़े कि शरीर अलग है। शरीर अलग यंत्र की भांति घूमने लगे, गिरने लगे, रोने लगे, चिल्लाने लगे, उसे छोड़ दें। भीतर जो शक्ति उठे, वह शरीर को जैसा चलाए, कोऑपरेट करें। हाथ हिलते हों, पैर हिलता हो, सिर घूमता हो, शरीर गिरता हो, आवाज निकलती हो, चिल्लाहट आती हो, रोना आता हो, मुद्रा बदलती हो, छोड़ दें बिलकुल। दूसरा सूत्र है: शरीर को छोड़ दें।
श्वास गहरी जारी रहे, शरीर को छोड़ दें। शरीर इतना थक जाए, जितना थक सके--छोड़ दें बिलकुल। अब दस मिनट के लिए शरीर को होने दें जो होता है। श्वास गहरी जारी रखें...श्वास गहरी रहे...श्वास गहरी रहे...श्वास गहरी रहे...श्वास गहरी रहे...शरीर को छोड़ दें...बिलकुल छोड़ दें...जरा भी रोकें न, संकोच न करें...छोड़ दें, शरीर को जैसा होना हो, होने दें।
शरीर के भीतर शक्ति जो करती है, उसे करने दें। जो भी होता है, होने दें। न मालूम कितनी बीमारियां समाप्त हो जाएंगी। शरीर को बिलकुल छोड़ दें...न मालूम कितने दबे वेग सदा के लिए निकल जाएंगे। शरीर को बिलकुल छोड़ दें...श्वास गहरी जारी रहे और शरीर को छोड़ दें...शरीर को छोड़ दें...शरीर को बिलकुल छोड़ दें...जो भी होता है, होने दें। श्वास गहरी जारी रहे और भीतर श्वास को देखते रहें और शरीर को छोड़ दें। जो भी होता है, जो भी होता है, होने दें। शरीर को ढीला छोड़ दें। शरीर घूमता है, घूमता है, घूमने दें...हाथ-पैर कंपते हैं, हिलते हैं, हिलने दें...सारा शरीर एक यंत्र की भांति चक्कर खाता है, खाने दें...गिरता है, गिरने दें...खड़ा हो जाए शरीर, खड़ाहो जाने दें...आवाज निकले, निकल जाने दें...चिल्लाहट निकले, निकल जाने दें...रोना निकले, निकल जाने दें...छोड़ दें...छोड़ दें...।
बढ़ाते जाएं, श्वास बढ़ाते जाएं, शरीर को छोड़ते जाएं...बढ़ाते जाएं, श्वास को गहरा लेते जाएं और शरीर को छोड़ दें...।
छोड़ दें...शरीर को बिलकुल छोड़ दें...श्वास गहरी...श्वास गहरी...श्वास गहरी...श्वास गहरी...रोकें न जरा भी, कुछ भी न रोकें, जो होता है होने दें। श्वास गहरी...श्वास गहरी...श्वास गहरी...श्वास गहरी...श्वास गहरी...श्वास गहरी...श्वास गहरी...श्वास गहरी...और बिलकुल छोड़ दें...।
पांच मिनट बचते हैं। इस पांच मिनट में पूरे शरीर को जो होता है, होने दें। छोड़ दें...शरीर जो होता है होने दें, ताकि साफ दिखाई पड़े कि शरीर अलग, मैं अलग।
शरीर को छोड़ दें...रोता है, रोए...हंसता है, हंसे...चिल्लाता है, चिल्लाए...नाचता है, नाचे...जो होता है, होने दें...छोड़ दें...बिलकुल छोड़ दें...भीतर कोई पकड़, कोई रेसिस्टेंस न रहे...जरा भी रोकें नहीं। गहरी श्वास जारी रहे...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...।
छोड़ दें...छोड़ दें, शरीर जो करे, करने दें। आप न रोकें, संकोच न करें, नियंत्रण न करें। आप श्वास गहरी जारी रखें और शरीर को छोड़ दें...शक्ति भीतर जो करे होने दें...छोड़ दें, शक्ति जो करवाए होने दें। चेहरे की मुद्रा बदले, बदलने दें...आवाज निकले, निकलने दें...कोई पशु भीतर से चिल्लाने लगे, चिल्लाने दें...जो भी होता है, होने दें। गहरी श्वास...गहरी श्वास...पूरी शक्ति लगा दें...पूरी शक्ति लगा दें...गहरी श्वास...गहरी श्वास...थका ही डालना है सारे यंत्र को। कंजूसी न करें, बिलकुल थका डालें। छोड़ दें...।
(अनेक लोगों का हुंकार, चीत्कार आदि करना...)
गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...श्वास गहरी लें, पूरी ताकत लगाएं।
दो ही मिनट हैं। तीसरे सूत्र में जाने के लिए पूरी ताकत लगाएं। गहरी श्वास लें और शरीर को बिलकुल छोड़ दें। गहरी श्वास लें, शरीर को बिलकुल छोड़ दें। जो होता है, होने दें। गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...छोड़ दें शरीर को बिलकुल।
आखिरी मिनट है। तीसरे सूत्र के पहले शरीर को जो करना है करने दें...रोना है, चिल्लाना है, गिरना है, हिलना है, डुलना है--छोड़ दें...पूरी ताकत से छोड़ें...गहरी श्वास...गहरी श्वास...शरीर को छोड़ दें...छोड़ दें, रोकें नहीं। छोड़ दें...छोड़ दें...पूरा वातावरण एक साथ रोने-चिल्लाने लगे...छोड़ दें...सब छोड़ दें। आखिरी मिनट है। तीसरे सूत्र में जाने के पहले पूरी शक्ति लगाएं। गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...और गहरी, और गहरी, और गहरी...और शरीर को छोड़ें आखिरी बार, बिलकुल छोड़ दें, जो भी होता है, होने दें।
पूरी ताकत लगाएं...पूरी ताकत लगाएं...पूरी ताकत लगाएं...तीसरे सूत्र में जाने के पहले पूरी ताकत लगाएं...पूरी ताकत लगाएं...और तीव्रता, और तीव्रता, और तीव्रता, और तीव्रता...पूरी ताकत लगा दें...पूरी ताकत...पूरी ताकत...जरा भी रोकें न, पीछे कुछ बचे न, बिलकुल छोड़ दें...पीछे कहने को न रहे कि मैंने कुछ रोक लिया। छो़़ड़ें...छोड़ दें...एक मिनट के लिए बिलकुल छोड़ दें, जो होता है, होने दें। जो होता है, होने दें। छोड़ें...छोड़ें...छो़ड़ें...तीसरे सूत्र में जाने के लिए छोड़ दें, बिलकुल छोड़ दें...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...और गहरी, और गहरी, और गहरी, और गहरी...।
और तीसरे सूत्र में प्रवेश करें। श्वास गहरी रहेगी, शरीर को जो करना है करता रहेगा, आप भीतर ताकत से पूछना शुरू करें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?....भीतर अपने मन में जोर से पूछें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...शरीर को हिलने दें, श्वास को गहरा चलने दें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...पूरे प्राण पूछने लगें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...शरीर का रोआं-रोआं पूछने लगे, हृदय की धड़कन-धड़कन पूछने लगे--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...पूरी ताकत भीतर लगाएं--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...दस मिनट के लिए पूरी शक्ति लगा दें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
पूरी शक्ति लगाएं भीतर--मैं कौन हूं? यह मैं कौन हूं?...एक तूफान उठ जाए। दस मिनट के बाद फिर विश्राम करेंगे। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...सारे प्राण कंप जाएं--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...दो मैं कौन हूं के बीच जगह न बचे--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...पूरी शक्ति लगा दें...अपने को तूफान में डाल दें, तभी हम ध्यान में जा सकेंगे। जो जितनी तीव्रता से पूछेगा, उतने ही गहरे ध्यान में जा सकेगा। चौथा सूत्र ध्यान का होगा। अपनी ताकत पूरी लगाएं--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
पूरी शक्ति लगाएं...आखिरी विश्राम के पहले शक्ति पूरी लगा दें, ताकि विश्राम गहरा हो सके।
मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...शरीर घूमता रहे, शरीर को घूमने दें। शरीर में शक्ति को पूरा घूमने दें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...पूरी शक्ति से घूमने दें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
पांच मिनट बचे हैं, पूरी शक्ति लगाएं--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...इस पांच मिनट के लिए पूरी शक्ति लगा दें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...गहरी श्वास...थका डालें अपने को। गहरी श्वास...गहरी श्वास...शरीर को जो होता है, होने दें। शरीर को पूरा छोड़ दें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...गहरी श्वास...गहरी श्वास...गहरी श्वास...शक्ति पूरी लगाएं, ताकि ऊपर की शक्ति से संबंध हो सके। जैसे ही संबंध होगा, शरीर एकदम नाचने लगे, उसकी फिकर न करें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
(रोने-चिल्लाने की अनेक आवाजें...)
शक्ति पूरी लगाएं। सिर्फ तीन मिनट बचे हैं। पूरी शक्ति लगा दें। पूरी शक्ति लगा दें। गहरी श्वास...गहरी श्वास...और गहरी, और गहरी, और गहरी...और भीतर पूछें तूफान की तरह--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
चौथे सूत्र में जाने के पहले शक्ति पूरी लगा दें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...पूरी ताकत लगाएं। अपनी शक्ति को पूरा लगा दें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...शक्ति पूरी लगाएं। और ऊपर से शक्ति आती मालूम पड़े, तो जो भी शरीर को हो, होने दें। नाचने लगे, फिकर न करें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
एक दो मिनट और बचते हैं, पूरी शक्ति लगाएं, फिर विश्राम करना है...विश्राम उतना ही गहरा होगा, जितनी शक्ति हम लगाएंगे। अपने को पागल कर दें, पूरी ताकत लगा दें। अपने को पागल कर दें, पूरी ताकत लगा दें। और इस बीच ऊपर से किसी को भी शक्ति आती मालूम पड़े, तो अपने को छोड़ दें, जो भी हो, हो। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...बिलकुल पागल हो जाएं, छोड़ दें अपने को। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
चौथे सूत्र में प्रवेश का क्षण करीब आता है। जोर से लगाएं--मैं कौन हूं?...छोड़ दें...और शक्ति ऊपर से उतरे, तो फिकर न करें। ऐसा लगे कि नाच आ जाए, तो नाचें, घबड़ाएं न। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...पूरी ताकत लगाएं...गहरी श्वास...अवसर को चूकें न, पूरी ताकत लगाएं। एक ही मिनट की बात है। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...तूफान पूरा उठा दें...मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...बढ़ें, तीव्रता से बढ़ें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...थका दें...मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
किसी का भी शरीर खड़ा होना चाहे, रोकें नहीं, छोड़ दें। छोड़ दें...शरीर खड़ा होता हो, हो जाने दें...छोड़ दें...मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...रोकें नहीं, किसी का भी शरीर खड़ा होता हो, हो जाने दें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...छोड़ दें, शरीर खड़ा होता है, हो जाने दें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...शरीर खड़ा होता है, रोकें मत, छोड़ दें, खड़े हो जाएं...नाचता है, नाच लें...मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...छोड़ दें...जिनका भी शरीर खड़ा हो रहा है, उठ जाने दें, छोड़ दें, खड़े हो जाएं...मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
एक सेकेंड और...छोड़ दें बिलकुल...शरीर खड़ा होता है, हो जाने दें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं...छोड़ दें...जिनके शरीर भी खड़े होना चाहते हैं, छोड़ दें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं...रोकें नहीं, छोड़ दें। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...पूरी ताकत लगा दें--मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?...
अब छोड़ दें...सब छोड़ दें--श्वास की गहराई भी छोड़ दें, पूछना भी छोड़ दें, चौथे सूत्र में प्रवेश कर जाएं। मैं कौन हूं, यह भी छोड़ दें, श्वास का गहरा लेना भी छोड़ दें। जहां जो जैसा है, वैसा ही रह जाए। बैठना हो, बैठ जाएं...लेटना हो, लेट जाएं...सब छोड़ दें। अब दस मिनट के लिए परम विश्राम में चले जाएं।
द्वार खुला है, प्रभु को आना हो, आ जाए। अब दस मिनट कुछ भी न करें। रह जाएं, बस मात्र रह जाएं। पक्षी बोलेंगे, सुनते रहें...सागर की लहरें चिल्लाएंगी, सुनते रहें...रास्ते पर आवाज होगी, सुनते रहें...बस पड़े रह जाएं प्रतीक्षा में, जस्ट अवेटिंग। द्वार खोल दिया, मेहमान आना हो, आ जाए। द्वार खोल दें, द्वार पर प्रतीक्षा में बैठ जाएं। कुछ करना नहीं है, दस मिनट बस पड़े रह जाना है। इस दस मिनट में ही ध्यान की झलक आएगी। इस दस मिनट में ही उसका पता चल सकता है, जो है। अब मैं चुप हो जाता हूं। दस मिनट बस रह जाएं, कुछ करना नहीं है।
(दस मिनट का परम विश्राम)
अब धीरे-धीरे आंख खोल लें। जिनकी आंख न खुले, वे दोनों हाथ आंख पर रख लें, फिर आहिस्ता से आंख खोलें। जो लेट गए हैं, गिर गए हैं, वे धीरे-धीरे उठ आएं। उठते न बने, तो पहले दो-चार गहरी श्वास लें, फिर उठें। फिर भी उठते न बने, तो लेटें रहें और गहरी श्वास लेते रहें। लेकिन उठने में कोई जल्दी न करें, आहिस्ता उठें। जो खड़े हैं, वे भी धीरे-धीरे आंख खोलें, थोड़ी गहरी श्वास लें, फिर आहिस्ता से बैठें, एकदम से न बैठें। धीरे-धीरे आंख खोलें, गहरी श्वास लें, फिर आहिस्ता से बैठ जाएं।
इस प्रयोग को रोज रात्रि में करते रहें। प्रयोग क
रें और सो जाएं, ताकि रात्रि की पूरी नींद में प्रयोग का परिणाम गूंजता रहे।
इन पांच दिनों में बहुत सा काम हुआ। कुछ मित्र बहुत ही निकट पहुंचे। कुछ का उस विराट शक्ति से संपर्क भी हुआ। कुछ कदम दो कदम, सीढ़ी दो सीढ़ी पहले रुक गए। लेकिन सभी की गति हुई है। और मैं चाहूंगा कि नारगोल आ जाएं, ताकि उन चार दिनों में सच में ही सबकी छलांग लग जाए। नारगोल में बहुत कुछ होने की संभावना है, इसलिए अवसर को मत चूकें। और जो भी, किसी भी भांति आ सके, आ ही जाए।
हमारी आज की बैठक पूरी हुई। जो लोग दोपहर, जिन्हें लगता हो कि कहीं शक्ति का उठाव रुक गया या ऊपर से किसी शक्ति का प्रवेश हुआ, लेकिन कहीं रुक गया--जिन्हें कहीं भी कोई कठिनाई, अड़चन मालूम पड़ती हो, वे दोपहर तीन से चार मिलने आ जाएं। लेकिन बौद्धिक जिज्ञासाओं को लेकर नहीं, जिनकी व्यक्तिगत साधना से ही कोई सवाल उठा हो, केवल वे ही दोपहर आएं।
हमारी सुबह की बैठक पूरी हो गई।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Should the breath be both deep and intense at the same time?
According to Osho, yes: combine depth with intensity—deep and fast—so all your energy fuses with the breath. This total engagement deprives the mind of any other task, dissolving thought-activity. Whatever faint residue of mind remains can then be turned toward the inquiry “Who am I?”, making the meditation swift and penetrating.
In simple terms: Breathe big and strong, quickly, so your whole mind stays with the breath; then use the tiny leftover attention to ask, “Who am I?”
How can meditation be considered a non-action?
According to Osho, meditation is a non-action because it cannot be produced, seized, or forced; it happens when you stop obstructing it. Like sleep or sunlight entering a room, your role is only to make outer arrangements—quiet, ease, watchfulness—and open the 'door' by removing mental hindrances. There is no technique to ‘do’ meditation; you simply allow it to come.
In simple terms: You don’t do meditation; you clear the clutter and wait, and it comes on its own—like sleep when the lights are off and the bed is ready.
What happens to the breath when asking 'Who am I?' with intensity?
According to Osho, when you ask 'Who am I?' with full intensity, the breath rhythm won’t remain as before—your energy naturally shifts from breathing to the inquiry. Don’t worry about the breath; give yourself totally to whichever is alive—breath or question—until no energy is left over. Such totality itself brings the transformative result.
In simple terms: If you put all your energy into asking ‘Who am I?’, your breath may fade or change—just let it happen and be total.
How should one decide whether to hold back in self-expression?
According to Osho, you should not hold back at all in self-expression—drop hesitation, fear, and calculation and let your being flow totally and authentically. Withholding fragments your energy and breeds inner conflict; full expression aligns you with your truth, invites presence, and allows love and creativity to move through you. Be wholehearted, spontaneous, and complete in whatever you say, feel, or do.
In simple terms: Don’t keep anything inside; share your true self openly and completely.
What is Kundalini?
According to Osho, kundalini is the innate life-energy that surges through the body like racing electrical currents. When permitted to flow freely—without suppression or control—it cleanses body and mind, sometimes erupting as spontaneous cries or movements. Blocking this current creates disturbance; total acceptance and openness allow the energy to purify and harmonize you.
In simple terms: Kundalini is your natural inner power; let it move and express (even as shaking or shouting) so it can clean you, instead of trying to stop it.

Osho's Commentary
मेरे प्रिय आत्मन्!
कल मैंने कहा कि ध्यान अक्रिया है।