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Questions in this Discourse
ओशो, बाबा अलाउद्दीन अपने जीवन के अंतिम दिनों में कहा करते थे: सब माटी होए गैलो, अमि तो किछु नाई, नाद-सुर को पार न पायो। क्या उन्हें कोई सदगुरु न मिला, इसलिए वे ऐसा कहते हुए मरे या कि नाद-सुर अनंत हैं, उसके पार होने का उपाय ही नहीं है, इसलिए? कृपा करके समझाएं!
रामकृष्ण कहते थे: ऐसी ही है सत्य की खोज जैसे कोई नमक का पुतला सागर में डुबकी मारे थाह लगाने को। नमक का पुतला और सागर में डुबकी--गल ही जाएगा! जैसे गहरा जाएगा, वैसे ही गलता जाएगा। जैसे-जैसे गहराई बढ़ेगी वैसे-वैसे मिटेगा। परम गहराई में शेष ही न रह जाएगा; लौट कर खबर देने को कोई भी न बचेगा।
जीवन अपने सभी आयामों में अनंत है। यहां मनुष्य की बनाई हुई चीजों की ही सीमाएं हैं। परमात्मा का बनाया हुआ कुछ भी सीमित नहीं हो सकता। उसके हाथ की जिस चीज पर छाप है वही अनंत है, वही असीम है। न आदि है उसका, न अंत है उसका।
और नाद गहरे से गहरा आयाम है।
भौतिकविद कहते हैं कि अस्तित्व का निर्माण हुआ है विद्युत-ऊर्जा से। रहस्यवादी कहते हैं: अस्तित्व का निर्माण हुआ है ध्वनि से, नाद से। और दोनों बातें भिन्न दिखाई पड़ती हैं भिन्न नहीं हैं, क्योंकि नवीनतम खोजें यह भी कहती हैं कि विद्युत-ऊर्जा को नाद में बदला जा सकता है, नाद को विद्युत-ऊर्जा में बदला जा सकता है। वे दोनों एक ही मौलिक शक्ति की अभिव्यक्तियां हैं।
यह जो तुमने कहानी सुनी है शायद कहानी ही हो, लेकिन उसमें सत्य का बड़ा अंश छिपा है। तुमने जरूर सुना है कि एक समय था, ऐसे संगीतज्ञ भी थे जो दीपक राग बजा सकते थे, जो ऐसा राग उठा सकते थे कि बुझे दीये जल जाएं। ऐसा कभी हुआ हो या न हुआ हो, मगर ऐसा हो सकता है। विज्ञान आज इसके लिए गवाही देता है। क्योंकि अगर विद्युत ध्वनि बन सकती है और ध्वनि विद्युत बन सकती है, तो फिर एक विशिष्ट नाद में बुझे दीये जल सकते हैं, जले दीये बुझ सकते हैं। ये ऊर्जा की ही दो अभिव्यक्तियां हैं। जिन्होंने बाहर से खोजा--विज्ञान ने, भौतिक शास्त्रियों ने--उन्होंने विद्युत-ऊर्जा को पाया। विद्युत-ऊर्जा मालूम होती है--देह है अस्तित्व की। और नाद, ओंकार--प्राण हैं अस्तित्व का। जिन्होंने भीतर खोजा, जो अंतर्तम में गए, उन्होंने नाद की बात कही।
इस देश में तीन धर्म हैं। उनमें हर बात में भेद है: हिंदू हैं, जैन हैं, बौद्ध हैं; उनमें किसी बात में तालमेल नहीं है। बाद में भी जो और धर्म पैदा हुए, जैसे सिक्ख, उनमें भी बड़े भेद हैं। लेकिन एक बात के संबंध में वे सब राजी हैं, और वह है ओंकार का नाद। जैन मानते हैं कोई ईश्वर नहीं है। अब इससे बड़ा विरोध और क्या होगा हिंदू-विचार का? हिंदू-विचार ईश्वर के आस-पास ही नृत्य करता है। हिंदू-विचार ही ईश्वर की बांसुरी के बिना अर्थ नहीं रखेगा! ईश्वर ही केंद्र-बिंदु है। वही केंद्र है; हिंदू-चिंतन उसकी परिधि है। लेकिन जैनों ने ईश्वर को इनकार कर दिया और एक धर्म बनाया जो अदभुत है--अनीश्वरवादी धर्म। और आज से ढाई हजार साल पहले!
अभी पश्चिम में इस पर विचार चलता है। अनीश्वरवादी धर्म हो सकता है या नहीं, इसका विचार ही चल रहा है अभी। लेकिन यहां हमने अनीश्वरवादी धर्म निर्मित भी किया। नास्तिक भी धार्मिक हो सकता है, हमने उसके लिए भी द्वार खोले। आस्तिक होना अनिवार्य शर्त न रखी। नास्तिक के लिए भी धर्म उतना ही सुगम और सुलभ बनाया जितना आस्तिक के लिए। यह बड़ी क्रांति थी। फिर बुद्ध तो और एक कदम आगे गए--महावीर से भी आगे एक कदम लिया। कम से कम महावीर आत्मा को तो मानते हैं। बुद्ध ने तो कहा: आत्मा भी नहीं है। न कोई परमात्मा है, न कोई आत्मा है। शून्य है। नास्तिक भी इतनी हिम्मत नहीं करता, बुद्ध महा-नास्तिक हैं! नास्तिक भी इतनी हिम्मत नहीं करता कि मैं नहीं हूं; भला नास्तिक कहता हो शाश्वत आत्मा नहीं है, लेकिन इतना तो मानेगा अभी हूं! बुद्ध कहते हैं: अभी भी नहीं हूं। आत्मा है ही नहीं। क्षणभंगुर भी नहीं है, शाश्वत की तो बात ही छोड़ दो। न कोई ईश्वर है, न कोई आत्मा है; फिर भी धर्म हो सकता है! धर्म हुआ और बुद्ध के पीछे चल कर अनंत-अनंत लोगों ने जीवन का परम स्वाद पाया।
इन तीनों धर्मों में हर चीज का विरोध है--यज्ञ का, हवन का, वर्णाश्रम-धर्म का, विधि-विधानों का कोई तालमेल नहीं है। मगर एक संबंध में तीनों राजी हैं कि उस अंतर्तम में, जिसको महावीर आत्मा कहते हैं, हिंदू परमात्मा कहते हैं, बुद्ध शून्य कहते हैं--एक नाद उठता है, एक अपूर्व नाद उठता है! एक वीणा बजती है। वीणा नहीं है वहां--और बजती है। कोई संगीतज्ञ नहीं है वहां--और संगीत उठता है। इस संबंध में तीनों राजी हैं। अगर हम गौर से समझें तो इसका यह अर्थ हुआ कि ईश्वर से भी ज्यादा, आत्मा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण विचार है नाद का, संगीत का, इसका कोई पार नहीं हो सकता।
अलाउद्दीन ठीक कहते हैं कि नाद का कोई पार न पाया... ‘नाद-सुर को पार न पायो।’ और इस सदी में जो लोग नाद-सुर की गहराई में गए हैं, उनमें बाबा अलाउद्दीन का और कोई मुकाबला नहीं है। बाबा अलाउद्दीन तो कहीं से भी नाद में उतर जाते थे। कोई वीणा ही नहीं चाहिए, कोई सितार ही नहीं चाहिए; लोहे के दो टुकड़े पड़े मिल जाएं, उन्हीं को बजा देंगे और उन्हीं से अदभुत संगीत का जन्म हो जाएगा! चम्मच से थाली को बजाने लगेंगे और मंत्रमुग्ध कर देंगे। एक बार जिसे स्वाद आ गया, एक बार जिसे उसका बोध आ गया, वह उसे कहीं से भी पुकार ले सकता है। लेकिन जितनी गहराई बढ़ी उतना ही यह भी अनुभव बढ़ा कि पार पाया न जा सकेगा। मैं मिट जाऊंगा लेकिन पार पाया न जा सकेगा।
हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हेराइ।
बुंद समानी समुंद में, सो कत हेरी जाइ।।
हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हेराइ।
समुंद समाना बुंद में, सो कत हेरी जाइ।।
ऐसा अपूर्व उनका अनुभव हुआ होगा। इसी अपूर्व अनुभव के कारण कहते हैं: ‘सब माटी होए गैलो!’ सब प्रयत्न, प्रयास, अभ्यास, सब मिट्टी हो गया। जीवन भर चेष्टा की, सब मिट्टी हो गई। मनुष्य की चेष्टा मिट्टी हो ही जाती है। मनुष्य के किए कुछ हुआ है, कि होगा? होता है उसके किए। हम नाहक ही अकड़ लेते हैं। हम नाहक ही बीच में अपने अहंकार को भर लेते हैं।
दो व्यक्ति नदी के किनारे बैठे हैं--एक युवक और युवती। सांझ का समय है। बाढ़ में आई नदी है। बड़ी लहरें उठ रही हैं। पूर्णिमा की रात है। नदी चांदी हो गई है। दोनों प्रेम में हैं, नये-नये प्रेम में हैं। प्रेम का गहरा अंधापन है अभी, अभी हर चीज हरी-हरी सूझती है--और ऐसी रात! और दूर पपीहे की पुकार और नदी के किनारे का सन्नाटा! युवक कहने लगा: ‘आओ लहरो आओ, नाचो लहरो नाचो।’ और लहरें आने लगीं! आ ही रही थीं लहरें तो। और लहरें नाचने लगीं! नाच ही रही थीं लहरें तो। युवती और पास आ गई, गले से लग गई युवक के और कहा: तो नदी की लहरें भी तुम्हारी आज्ञा मानती हैं। धन्य हो तुम! तुम्हें पाकर मैं भी धन्य हूं।
फूल खिल ही रहे हैं, चांद-तारे चल ही रहे हैं। यह विराट अस्तित्व तुम्हारे किए से नहीं हो रहा है। तुम नहीं थे तब भी चल रहा था। तुम नहीं रहोगे तब भी चलेगा। मगर बीच में दो घड़ी को तुम अकड़ लेते हो, नाहक अकड़ लेते हो! और बड़े प्रयास करते हो, बड़ी चेष्टाएं करते हो--अपने को सिद्ध करने की, छोड़ जाने की हस्ताक्षर, छोड़ जाने की कुछ चिह्न समय की रेत पर। जो जानते हैं, वे ऐसा ही कहेंगे: सब माटी होए गैलो! वह जो किया-धरा था सब मिट्टी हो गया। और जिसने ऐसा अनुभव कर लिया कि मेरा किया-धरा सब मिट्टी हो गया, उसके ऊपर सोने की वर्षा हो जाती है। लेकिन वह प्रसाद-रूप है, वह प्रसाद ही है। प्रयास नहीं, प्रयत्न नहीं। वह प्रसाद उतरता तभी है जब तुम बिलकुल निष्प्रयत्न, अप्रयास में, शून्य, आतुर, उन्मुख, राजी, द्वार खोले बैठे होते हो--आता है अतिथि, जरूर आता है। तुम्हारे बुलाने से नहीं आता। न तुम्हारे बुलाने से सूरज की किरणें कमरे के भीतर आती हैं, न हवा के झोंके आते हैं, न पानी की बूंदें आती हैं। हां, इतना ही तुम करो कि द्वार खुला रखना; सूरज उगे तो आए; हवा बहे तो आए, पानी बरसे तो बूंदाबांदी हो। इतना ही करना कि तुम द्वार खुला रखना। इससे ज्यादा मनुष्य को करने को और कुछ भी नहीं है।
अलाउद्दीन ठीक कहते हैं:
‘सब माटी होए गैलो,
अमि तो किछु नाई।’
अब मैं कुछ भी नहीं हूं। खो गए, मिट गए। सब मिट्टी हो गया प्रयास। और जब प्रयास मिट्टी हो जाता है तो अहंकार को बनने की कोई जगह नहीं रह जाती, खड़े होने को कोई स्थान नहीं रह जाता, सहारा नहीं रह जाता, कोई टेका नहीं रह जाता। जब तुम्हारे सारे प्रयास मिट्टी हो जाएंगे, जब तुम पाओगे कि तुम्हारे सारे प्रयास व्यर्थ हैं, तो तुम कैसे कह सकोगे कि मैं हूं? मैं को कैसे निर्मित करोगे? मैं के लिए प्रयास की ईंटें चाहिए, तो मैं का भवन बनता है, बड़ा भवन बनता है। हालांकि भवन होता है सिर्फ ताश के पत्तों का; हवा के जरा से झोंके में गिर जाता है, देर नहीं लगती। मौत आती है और देर नहीं लगती, पत्ते बिखर जाते हैं, महल भूमिसात हो जाते हैं। पत्तों के महल ही नहीं बिखर जाते, पत्थरों के महल भी बिखर जाते हैं। यहां सभी कुछ मिट्टी हो जाता है।
अलाउद्दीन का वचन महत्वपूर्ण है। संगीत से उन्होंने परमात्मा को जाना, संगीत से उन्हें परमात्मा की झलक मिली। संगीत में ही उन्हें सदगुरु मिला।
‘सब माटी होए गैलो,
अमि तो किछु नाई,
नाद-सुर को पार न पायो।’
सीधे-सादे आदमी थे। पर बड़ी चेष्टा की, जीवन भर चेष्टा की। नाद-सुर में सब कुछ समर्पित किया था। और पार नहीं मिला। और यही धन्यता है। पार मिल जाता तो उसका अर्थ था: नाद-सुर को जाना ही नहीं, नाद-सुर के नाम पर खेल-खिलौने सीखे; नाद-सुर के नाम पर आदमी के ही बनाए हुए वाद्ययंत्रों में उलझे रहे; नाद-सुर न जाना।
जिसका पार मिल जाए, जानना वह आदमी की ही बनावट है। जिसका पार न मिले, समझना कि प्रभु से जुड़े, प्रभु के निकट आए। अपार को ही तलाशो, अनंत को ही तलाशो। और तलाश के लिए तुम्हें कोई कृत्य नहीं करना है--तुम्हें मिटना है, तुम्हें ना-कुछ होना है। तुम शून्य हो जाओ तो पूर्ण आज उतरने को राजी है।
ओशो, ईश्वर-प्राप्ति में कार्य-कारण नहीं; तो फिर ध्यान का औचित्य समझाने की कृपा करें।
लेकिन मैं तुम्हारा प्रश्न समझा।
तुम यह पूछ रहे हो कि ‘ईश्वर-प्राप्ति में कार्य-कारण नहीं।’
निश्चित ही ईश्वर-प्राप्ति में कोई कारण नहीं। तुम ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते जिससे ईश्वर पाया जा सके। तुम कुछ कर सकते तो कारण होता। तुम्हारे किए ईश्वर मिलता तो कुछ कारण होता। ईश्वर पाने में कोई भी कारण काम नहीं आता। इसीलिए तो ईश्वर विज्ञान का अंग नहीं है, इसीलिए तो विज्ञान ईश्वर को अंगीकार नहीं कर पाता। क्योंकि विज्ञान का एक मौलिक आधार है और वह है कार्य-कारण का सिद्धांत। जो चीज कार्य-कारण के सिद्धांत के भीतर है वह विज्ञान स्वीकार करेगा।
सौ डिग्री तक पानी गर्म करो, भाप बनता है; फिर सौ डिग्री तक गर्म चाहे मस्जिद में करो, चाहे मंदिर में, चाहे गुरुद्वारा में, चाहे चर्च में, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि मंदिर में निन्यानबे डिग्री पर बन जाएगा भाप और मस्जिद में थोड़ा देर लगाएगा कि यह मांसाहारियों की जगह है। सौ डिग्री पर ही बनेगा, चाहे मस्जिद हो, चाहे मंदिर हो, हिंदू-मुसलमान का कोई भेद न करेगा। फिर चाहे भारत हो और चाहे पाकिस्तान हो और चाहे चीन हो, चाहे जापान हो, सौ डिग्री पर ही भाप बनेगा। सौ डिग्री गर्मी कारण है। जैसे ही कारण पूरा हुआ, पानी को भाप बनना ही पड़ेगा। लेकिन इसका एक अर्थ हुआ कि पानी गुलाम है। सौ डिग्री तक तुमने गर्मी पैदा कर दी तो अब पानी मालिक नहीं है कि कह सके कि आज दिल नहीं, कि आज भाप न बनेंगे, कि आज उमंग ही नहीं हो रही, आज आकाश में उड़ने का इरादा ही नहीं है, फिर कभी देखेंगे, कि आज चित्त बहुत खिन्न है। पानी कुछ भी न कह सकेगा। पानी की कोई स्वतंत्रता नहीं है।
कार्य-कारण का सिद्धांत स्वतंत्रता का अंत है--हत्या है। जहां कार्य-कारण का सिद्धांत लागू होता है वहां नियति है, वहां भाग्य है। यह पानी का भाग्य है कि उसे सौ डिग्री पर भाप बनना ही पड़ेगा। यह अपरिहार्य भाग्य है, अनिवार्य भाग्य है। इससे बचने का कोई उपाय नहीं है।
परमात्मा कार्य-कारण के भीतर नहीं है, नहीं तो गुलाम होता। ...कि किसी आदमी ने सौ उपवास कर दिए कि परमात्मा को आना ही पड़ेगा। तब तो परमात्मा आदमी से छोटा होता, जैसे पानी आदमी से छोटा है। तब तो हमारी मुट्ठी में होता; जैसा चाहते वैसा नचाते, जहां चाहते वहां बिठाते। फिर तो परमात्मा प्रयोगशाला में होता। फिर तो हम नई-नई तरकीबें खोज लेते। जैसे पुराने जमाने में लोग पानी गर्म करते तो लकड़ी जलाते, बामुश्किल लकड़ी जलती, फिर पानी गर्म होता, घंटों लगते। अब हम जानते हैं कि बिजली से क्षण में हो जाए। और विद्युत से क्षण में होता है, अणु की भट्टी से तो क्षण भी न लगे। जैसे गर्म तवे पर पानी की बूंद बस छन्न से उड़ जाती हवा में, ऐसे सागर के सागर उड़ सकते हैं अणु-ऊर्जा से--क्षण में!
अगर कार्य-कारण का सिद्धांत परमात्मा पर लागू होता हो तो महावीर ने बारह साल में पाया, पच्चीस सौ साल में हमने ऐसी तरकीबें खोज ली होतीं कि बारह साल लगते? बारह मिनट में पाते। ...कि और भी जल्दी कर लेते, नये-नये यंत्र खोजते, नई-नई व्यवस्था करते। अगर उपवास से ही परमात्मा मिलता हो, तो उपवास करता क्या है? तुम्हारे शरीर में से एक पौंड रोज वजन कम करेगा। तुम्हारे भोजन के यंत्र को निष्क्रिय कर देगा, तुम्हारे पेट की अंतड़ियों को खाली कर देगा। लेकिन यह सब तो विज्ञान के द्वारा घड़ियों में हो सकता है, इसके लिए महीनों की क्या जरूरत है? इसमें तो कोई बड़ी अड़चन नहीं है। अगर इससे परमात्मा मिलता हो तो महावीर ने बारह साल उपवास किए, यह तो दो-चार दिन में हो जाएगा। तुम्हारे शरीर की इतनी शुद्धि तो ऐसे ही हो सकती है।
लेकिन विज्ञान की सीमा के बाहर है परमात्मा; पकड़ में नहीं आता; किसी प्रयोग में नहीं आता। कार्य-कारण का तो कोई संबंध परमात्मा से नहीं है। इसलिए रामनाथ का प्रश्न ठीक है: फिर ध्यान का क्या औचित्य?
प्रश्न इसलिए उठ रहा है कि रामनाथ के मन में यह भाव होगा कि ध्यान कारण है और परमात्मा कार्य है। ध्यान कारण नहीं है। ध्यान केवल अवसर है, कारण नहीं। ध्यान निषेधात्मक है, कारण विधायक होता है। इस भेद को समझो।
जैसे मैंने अभी तुमसे कहा: सूरज निकला। यह तुम्हारी इच्छा से नहीं निकल सकता कि तुम जब चाहो तब निकल आए। लेकिन एक काम तुम कर सकते हो कि सूरज निकला रहे और तुम आंख बंद किए बैठे रहो। तो लाख सूरज सिर पटके, तुम्हारे लिए तो नहीं निकला सो नहीं निकला। सूरज तुम्हारी इच्छा से नहीं निकलता; लेकिन तुम्हारी इच्छा से तुम चाहो न देखना तो नहीं देखो, जन्मों-जन्मों तक न देखो, आंख बंद रख सकते हो। द्वार-दरवाजे बंद रख सकते हो। परदे मोटे लटका सकते हो कि तुम्हारे कमरे में अंधकार ही रहे, दिन में भी अंधकार रहे। यह तुम कर सकते हो।
ध्यान का भी ऐसा ही निषेधात्मक प्रयोजन है। ध्यान कहता है: परदे खोलो। परदे खोलने से सूरज के पैदा होने का कोई संबंध नहीं है। ध्यान कहता है: खिड़कियां, द्वार-दरवाजे खोलो। द्वार-दरवाजे खुलने से ही सुबह नहीं हो जाएगी; लेकिन द्वार-दरवाजे खुले हों तो जब सुबह होगी तब तुम्हारे जीवन में रोशनी भर जाएगी। सुबह तो जब होगी तब होगी। सुबह के तो अपने राज हैं, अपने रास्ते हैं, अपना मार्ग है।
परमात्मा को जब आना है तब आएगा; तुम खींच कर नहीं ला सकते। लेकिन इतना तुम कर सकते हो कि जब परमात्मा आए तो तुम मौजूद रहो। द्वार पर बंदनवार बांध सकते हो, दीये जला सकते हो; द्वार पर बांसुरी बजा सकते हो; उसके स्वागत में फूल बिछा सकते हो, पलक-पांवड़े बिछा सकते हो। आएगा तब आएगा। कार्य-कारण की बात नहीं कि सौ डिग्री हमने पूरी कर दी, अब आना ही पड़ेगा; ऐसी कोई अपरिहार्यता नहीं है। आएगा तब आएगा। प्रसाद जब बरसेगा जब बरसेगा। लेकिन इतना तुम कर सकते हो कि प्रसाद बरसे तो तुम वंचित न रह जाओ। तुम अपना सारा कूड़ा-करकट खाली कर सकते हो कि जब आए अतिथि तो तुम्हें रहने योग्य पाए। तुम मंदिर बन सकते हो।
ध्यान परमात्मा को नहीं लाता, तुम्हें मंदिर बनाता है। ध्यान परमात्मा को नहीं लाता, तुम्हारी आंखों को खोलता है। ध्यान परमात्मा को नहीं लाता, लेकिन तुम्हें उसके स्वागत के लिए तत्पर करता है। ध्यान उत्सव है, अवसर है।
ध्यान में औचित्य मत खोजो। लेकिन हमारा मन ऐसा है कि हर चीज में साधन-साध्य की बातें सोचता है। हमारा मन दुकानदार का है: लाभ क्या होगा?
लोग मुझसे आकर पूछते हैं: ‘ध्यान करेंगे तो लाभ क्या होगा?’ जरा सोचते हो, लाभ की भाषा और ध्यान! ...‘मिलेगा क्या?’ आदमी पहले पूछता है: मिलेगा क्या? ध्यान तो उत्सव है, अपने आप में आनंद है। द्वार खुला हो, पक्षियों के ये गीत तुम्हारे द्वार पर प्रवेश करने लगें; ये वृक्षों की सुगंध तुम्हारे नासापुटों में भर जाए! यह सूरज, ये चांद-तारे तुम्हें दिखाई पड़ने लगें। यह अस्तित्व तुम्हारे अनुभव में आने लगे। परमात्मा कहीं और थोड़े ही है--यहीं है, यही है, अभी है। कण-कण में है! मगर तुम जड़ हो। ध्यान परमात्मा को नहीं लाएगा; तुम्हारी जड़ता को तोड़ेगा।
ध्यान को तुम परमात्मा से जोड़ो ही मत। इसीलिए तो बुद्ध भी ध्यान की शिक्षा दे सके। क्योंकि परमात्मा से कोई लेना-देना ही नहीं है। महावीर भी ध्यान की शिक्षा दे सके क्योंकि परमात्मा से कुछ लेना-देना नहीं है।
चकित होओगे जान कर तुम कि पतंजलि ने परमात्मा को भी ध्यान करने के लिए एक निमित्त माना है। यह तुम चकित होओगे जान कर, उलटी हो गई बात। आमतौर से लोग सोचते हैं कि ध्यान कारण है, परमात्मा कार्य; ध्यान निमित्त है, परमात्मा उसका लक्ष्य। पतंजलि ने कहा है कि परमात्मा ध्यान करने में सिर्फ एक आलंबन है, एक निमित्त। कुछ लोग हैं जो बिना परमात्मा के ध्यान नहीं कर सकते, तो चलो भाई, मान लो परमात्मा को और ध्यान तो करो। चलो इसीलिए ध्यान करो कि ध्यान करने से परमात्मा मिलेगा। हालांकि ध्यान करने से परमात्मा के मिलने का कोई संबंध नहीं है। ध्यान तुम करोगे तो तुम खुलोगे, तुम प्रकट होओगे। तुम्हारी कली जो बंद-बंद है, विकसित होगी, कमल बनेगा। और उस कमल की अनुभूति का नाम ही भगवत्ता है। भगवान कोई व्यक्ति नहीं है--खुले हुए कमल की अभिव्यक्ति। वह आनंद जो फूल के खिलने पर उपलब्ध होता है, जब तुम्हारी चेतना का कमल खुलेगा तो उस आनंद का नाम भगवत्ता है।
कार्य-कारण का कोई संबंध नहीं है। औचित्य की कोई बात नहीं है। ध्यान तो एक दीवानगी है। यहां लाभ-हानि का हिसाब, इतनी होशियारी से नहीं चलेगा। पहले पक्का हो जाए कि क्या मिलेगा, तब ध्यान करोगे, तो कभी ध्यान ही न कर सकोगे।
जीवन में कुछ तो रहने दो जो औचित्य के पार हो! जीवन में कुछ तो बचने दो जो साधन न हो, कारण न हो। जीवन में कुछ तो बचने दो जो बस अपने आप में अपना साध्य हो। नाचने का मजा अपने में है। नाचना क्या अपने में काफी नहीं है? हां, जो न नाच सकते हों, बिलकुल ही पंगु हों, लकवा खा गए हों, उनके लिए जरूरत हो तो भगवान की धारणा को बना लें। पहले कृष्ण की मूर्ति खड़ी कर लें, फिर नाचें। अगर तुम नाच सकते हो तो कृष्ण की मूर्ति की भी कोई जरूरत नहीं है। किसी आलंबन की कोई जरूरत नहीं है, नृत्य पर्याप्त है। कृष्ण के आस-पास नाचने का सवाल नहीं है; जहां तुम नाचोगे, कृष्ण आस-पास होंगे। नाचोगे तो कृष्ण को आस-पास होना ही है। नृत्य की भाव-भंगिमा भगवत्ता है।
जब तुम शून्य होकर बैठ जाओगे तो परमात्मा नहीं तो और कौन होगा? जब तुम मिट जाओगे तो जो बचेगा उसका नाम परमात्मा है।
ओशो, स्वर सभी असमर्थ मेरे, कैसे अभिनंदन करूं जी यही कहता, तुम्हारा मूक अभिनंदन करूं!
अभिनंदन मौन ही होगा। अभिनंदन समर्पण है, झुक जाना है। क्यों सदियों-सदियों में लोग प्रार्थना में झुके हैं? क्या तुम सोचते हो पृथ्वी पर सिर रख देने से कुछ धार्मिकता हो जाती है? पृथ्वी पर सिर रख देने से कुछ धार्मिकता नहीं हो जाती। लेकिन क्या करे आदमी? शब्द काम नहीं पड़ते और धन्यवाद देना है। धन्यवाद दिए बिना भी नहीं बनता, क्योंकि जब इतना प्रसाद बरसता हो तो लाज आती, संकोच लगता, धन्यवाद देने का मन होता; धन्यवाद न दो तो लगता है अपराध हुआ। तो करे क्या आदमी? असमर्थ, असहाय--झुक जाता है! वह झुकना केवल मनुष्य की असमर्थता है, शब्द की असमर्थता है, बोल की असमर्थता है। पृथ्वी पर सिर टेक देता है कि अब और क्या करूं?
अर्पित मेरी भावना--इसे स्वीकार करो!
तुमने गति का संघर्ष दिया मेरे मन को,
सपनों को छवि के इंद्रजाल का सम्मोहन,
तुमने आंसू की सृष्टि रची है आंखों में,
अधरों को दी है शुभ्र मधुरिमा की पुलकन!
उल्लास और उच्छ्वास तुम्हारे ही अवयव,
तुमने मरीचिका और तृषा का सृजन किया,
अभिशाप बना कर तुमने मेरी सत्ता को,
मुझको पग-पग पर मिटने का वरदान दिया।
मैं हंसा तुम्हारे हंसते-से संकेतों पर,
मैं फूट पड़ा लख बंक भृकुटि का संचालन,
अपनी लीलाओं से हे विस्मित और चकित!
अर्पित मेरी भावना--इसे स्वीकार करो!
अर्पित है मेरा कर्म--इसे स्वीकार करो!
क्या पाप और क्या पुण्य? इसे तो तुम जानो,
करना पड़ता है, केवल इतना ज्ञात यहां।
आकाश तुम्हारा और तुम्हारी ही पृथ्वी,
तुममें ही तो इन सांसों का आघात यहां।
तुममें निर्बलता और शक्ति इन हाथों की,
मैं चला कि चरणों का गुण केवल चलना है,
ये दृश्य रचे, दी वही दृष्टि तुमने मुझको,
मैं क्या जानूं क्या सत्य और क्या छलना है।
रच-रच कर करना नष्ट तुम्हारा ही गुण है,
तुममें ही तो है कुंठा इन सीमाओं की,
हे निज असफलता और सफलता से प्रेरित!
अर्पित है मेरा कर्म--इसे स्वीकार करो!
अर्पित मेरा अस्तित्व--इसे स्वीकार करो!
रंगों की सुषमा रच मधुऋतु जल जाती है,
सौरभ बिखरा कर फूल धूल बन जाता है,
धरती की प्यास बुझा जाता गल कर बादल,
चट्टानों से टकरा कर निर्झर गाता है!
तुमने ही तो पागलपन का संगीत दिया,
करुणा बन गलना तुमने मुझको सिखलाया,
तुमने ही मुझको यहां धूल से ममता दी,
रंगों में जलना मैंने तुमसे ही पाया!
उस ज्ञान और भ्रम में ही तो तुम चेतन हो।
जिनसे मैं बरबस उठता-गिरता रहता हूं,
निज खंड-खंड में हे असीम, तुम हे अखंड,
अर्पित मेरा अस्तित्व--इसे स्वीकार करो!
झुको! झुक जाओ पृथ्वी पर! झुक जाओ धूल में! कुछ मंदिरों की तलाश करनी जरूरी नहीं है। तुम जहां झुके वहां मंदिर है। तुम जहां अकड़े वहीं तीर्थ खो गया--संसार...। तुम जहां झुके वहीं तीर्थ बन गया।
शब्द तो नहीं कह पाएंगे, जगदीश! स्वर नहीं कह पाएंगे, लेकिन मौन झुकने की कला सब कह देती है--जो नहीं कहा जा सकता, वह भी; जो अव्याख्य है, वह भी; जो अनिर्वचनीय है, वह भी। ज्ञानी जो नहीं कह पाते, भक्त कह जाते हैं।
ओशो, मैं विवाह करने ही वाली थी कि मेरा होने वाला पति लापता हो गया है। मैं बहुत दुखी हूं। सांत्वना की तलाश में आपके द्वार आई हूं।
गरीब सोचते हैं अमीर हो जाएं। अज्ञानी सोचते हैं ज्ञानी हो जाएं! भोगी सोचते हैं त्यागी हो जाएं। अविवाहित सोचते हैं विवाहित हो जाएं। विवाहित सोचते हैं मर जाएं, कैसे मर जाएं, कब मर जाएं। जो नहीं है उसकी तरफ दौड़ बनी रहती है।
तू बच गई! भगवान का हाथ रहा होगा। नहीं तो पति कुछ ऐसे लापता नहीं होते। सदभाग्य है।
अब तू कहती है: ‘सांत्वना दो।’
सांत्वना देने का तो अर्थ हुआ कि पहले मैं यह मान लूं कि तेरा जो दुख है वह दुख है। उसे मैं दुख नहीं मान सकता। क्योंकि जिनके विवाह हो गए हैं उनको सुख कहां? जरा चारों तरफ आंख उठा कर देख, विवाहितों को देख।
एक ज्योतिषी ने एक नवयुवक का भविष्य बताते हुए कहा: पच्चीस वर्ष की आयु में तुम्हारा विवाह हो जाएगा।
नवयुवक ने घबड़ा कर कहा: लेकिन आपने अभी-अभी तो बताया था कि मैं कम से कम पचास वर्ष जीऊंगा।
जिस दिन विवाह हुआ उसी दिन आदमी मर जाता है। फिर बचता कहां!
ढब्बू जी चंदूलाल से पूछ रहे थे: चंदूलाल, कोई आदमी गलती कर अपनी गलती का इकरार कर ले, तो उसे तुम क्या कहोगे?
सत्यवादी, चंदूलाल ने कहा।
और उसे जिसने गलती न की हो, फिर भी स्वीकार कर ले, उसे तुम क्या कहोगे चंदूलाल?
चंदूलाल ने कहा: शादीशुदा।
कमला! तू बची, तू धन्यभागी है।
सुनिए! आपका जिगरी दोस्त शादी करने जा रहा है। और जिस लड़की से उसकी शादी होने वाली है वह बिलकुल घटिया है।
पति महोदय चुपचाप अखबार पढ़ते रहे।
आप भी अजीब हैं, उसका जीवन बर्बाद हो जाएगा और आप चुपचाप बैठे हैं! पत्नी ने फिर कहा।
फिर भी पति चुप्पी साधे रहे।
पत्नी बौखला उठी: क्या आपका फर्ज नहीं बनता कि उसे समझा कर ऐसा करने से रोकें?
मैं नहीं जाऊंगा, पति ने कहा, मुझे कौन समझाने आया था?
तेरा पति जरूर बड़ा ज्ञानी रहा होगा, जो भाग गया। अब तू क्या पता लगा रही है उसका? कहीं इसी खयाल से तो यहां नहीं आई कि अक्सर... अनेक भागे हुए लोग यहां हैं... शायद भागा हुआ पति यहां मिल जाए। पहचानना मुश्किल होगा। दाढ़ी-वाढ़ी बढ़ा ली होगी, गैरिक वस्त्र पहन लिए होंगे।
चौबे जी अपनी भारी-भरकम पत्नी के पास बैठे हुए पूछ रहे थे: अच्छा यह बताओ कि आदमी का एकदम मर जाना बेहतर है या घुट-घुट कर?
मैं समझती हूं आज के तनावग्रस्त जीवन से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य को एकदम मर जाना चाहिए। श्रीमती चौबे ने अपनी राय व्यक्त की।
ठीक है, तो अपनी दूसरी टांग भी मुझ पर रख लो, कहते हुए चौबे जी सीधे सोफे पर लेट गए।
तू सांत्वना लेने किस आदमी के पास आ गई! किसी पंडित-पुरोहित के पास जाना था, तो तेरी जन्मपत्री, कुंडली इत्यादि देखते, तुझे भरोसा बंधाते कि घबड़ा मत; पति पूरब गए हैं, लौट आएंगे; कि ज्यादा दूर नहीं निकल गए हैं, अभी बंबई ही हैं, थोड़ी देर चेष्टा करेंगे फिल्म अभिनेता होने की, फिर जो पास के पैसे हैं खर्च होते ही घर आ जाएंगे, घबड़ा मत। कुछ विधि-विधान बताते कि यज्ञ-हवन करवा ले, कि सत्यनारायण की कथा करवा ले। तू भी कहां मेरे पास आ गई!
मैं तो इतना ही तुझसे कह सकता हूं कि अब उस जगह मत रहना जहां पति जानते हैं कि तू रहती है, नहीं तो कहीं भूल-चूक से लौट ही न आएं। जगह बदल ले, ताकि लौट भी आएं तो तुझे न पाएं। और अगर कभी मिलना हो भी जाए तो जैसे वे लापता हो गए ऐसे तू भी लापता हो जाना। एक झंझट बची, एक व्यर्थ का उपद्रव बचा। उपद्रवों में से जाकर भी निकलना तो पड़ता ही है। निकलना मुश्किल होता जाता है, क्योंकि जाल उलझता जाता है। पति अकेले तो नहीं आते, मुसीबतें अकेली तो नहीं आतीं। फिर बाल-बच्चे आते हैं। इसलिए तो कहा है ज्ञानियों ने: मुसीबतें अकेली नहीं आतीं। पति आए, फिर बाल-बच्चे आए...! फिर पति के रिश्तेदार हैं और सास और ससुर और न मालूम क्या-क्या आएगा...! फिर उस सबमें से, जंगल में से निकलना मुश्किल हो जाएगा। पति तुझे बचा गए। अनुग्रह मान, धन्यवाद दे। जन्म-जन्म का साथ होगा तेरा उनसे! इस बार कृपा कर गए।
सांत्वना किस बात की? कुछ गंवाया थोड़े ही तूने; कुछ पाया! चल इस बहाने यहां आ गई। यह भी कुछ कम है? कौन जाने इसी बहाने जीवन में क्रांति हो जाए!
तू कहती है कि ‘मैं बहुत दुखी हूं।’
तू सोचती है, जो विवाहित हैं वे सुखी हैं?
अपने आस-पास जरा आंख खोल कर देखो। धन है तो लोग दुखी हैं, धन नहीं है तो लोग दुखी हैं। पद है तो लोग दुखी हैं, पद नहीं है तो लोग दुखी हैं। विवाहित हैं तो दुखी हैं, अविवाहित हैं तो दुखी हैं। दुख का कोई संबंध बाहर से नहीं है, बाहर की परिस्थिति से नहीं है। दुख का कोई उत्तरदायित्व बाहर मत छोड़ो।
मेरे पास लोग आते हैं। कोई इसलिए दुखी है कि उनके बहुत बच्चे हैं; कोई इसलिए दुखी है कि उनके बच्चे नहीं हैं। मैं कहता हूं: तुम दोनों जरा आपस में बातचीत करो, सत्संग करो। दो-चार दिन के लिए घर बदल लो। जिसके बच्चे हैं, तुम उसके घर जाकर रह जाओ और उसे तुम अपने घर रख दो। तब तुम्हें थोड़ी अकल आ जाएगी कि तुम जिन बच्चों के लिए तड़पे जा रहे हो वे बच्चे कैसा उपद्रव ले आते हैं। और वह जो बच्चों से तड़पा जा रहा है उसे जरा एकांत में रहने दो दो-चार दिन, वह भी घबड़ा जाएगा। क्योंकि एकांत में रहने की क्षमता भी नहीं है। अकेलापन काटता है।
चारों तरफ नजर फैलाओ। बुद्धिमान आदमी वह है जो दूसरों को देख कर समझ ले। बुद्धिहीन वह है जो खुद भी गुजर-गुजर कर न समझे। जिंदगी बड़ी है। इसमें अगर हर अनुभव करके ही तुम्हें समझना है तो और बहुत-बहुत जन्म लग जाएंगे, फिर भी शायद समझ न हो पाएगी। समझदार तो दूसरे को देख कर समझ लेता है। चारों तरफ नजर खोलता है, देखता है कि जिनके पास है उनको क्या है? तब फिर अगर मेरे पास नहीं है तो इस कारण दुख नहीं हो सकता। कारण दुख का कोई और होगा। न तो पति की मौजूदगी से दुख होता है, न पति के लापता हो जाने से दुख होता है। दुख तो हमारा आत्म-अज्ञान है।
तुम झूठे बहाने मत खोजो। दुख तो सिर्फ इसलिए होता है कि हमारे भीतर अभी दीया नहीं जला--ध्यान का दीया नहीं जला, ज्योति नहीं जली ध्यान की। ध्यान की रोशनी है सुख, आत्म-ज्ञान की अनुभूति है सुख। जिन्होंने अपने को जाना है बस उन्होंने सुख जाना है। शेष सब लोग तो दुख ही जानते हैं, दुख में ही जीते हैं, दुख में ही मरते हैं। फिर दुख के कारण अलग-अलग हो सकते हैं; कोई इस गड्ढे में गिरे, कोई उस गड्ढे में गिरे, इससे क्या फर्क पड़ता है? कोई इस भट्टी में जले, कोई उस भट्टी में जले, इससे क्या फर्क पड़ता है?
एक आदमी मरा। राजनेता था, दिल्ली का बड़ा नेता था! बहुत चकित हुआ जब उसे नरक ले जाया गया। उसने कहा कि नरक! मैं वी. वी. आई. पी. हूं! नरक मेरे लिए? कुछ भूल-चूक हो गई होगी। शैतान भी थोड़ा डरा--वी. वी. आई. पी.! आदमी ताकतवर था। गांधी टोपी, अचकन, चूड़ीदार पाजामा, बिलकुल पक्का नेता था, कोई कमी नहीं थी। और नेताओं से नरक में भी शैतान डरता है, क्योंकि हड़ताल करवा दें, घेराबंदी करवा दें। अभी कुछ दिनों से शैतान तक का घेराव होने लगा है। पुराने शास्त्रों में उल्लेख नहीं है क्योंकि पुराने शास्त्रों में... ये नई-नई कलाएं विकसित नहीं हुई थीं। तो अब तो नेताओं को भी सम्हाल कर रखना पड़ता है। उसने कहा: आप घबड़ाएं न, आप विशिष्ट आदमी हैं, आपके विशिष्ट आयोजन करेंगे। आप आएं, आपके लिए विशेष सुविधा दी जाएगी। आप खुद देख लें, नरक के कई खंड हैं। जो खंड आपको पसंद आ जाए, वहीं रहें।
नेता प्रसन्न हुए। यह बात कुछ बात हुई! नरक भी है तो कोई बात नहीं लेकिन विशिष्ट चुनाव का मौका है। कोई साधारण आदमी नहीं हैं!
पहले खंड में ले जाया गया। लोग जलाए जा रहे थे, कड़ाहों में चुड़ाए जा रहे थे। नेता ने कहा कि नहीं, यह नहीं जमेगा। यह सब तो हम दिल्ली में बहुत देख चुके। किसी तरह तो दिल्ली से बचे, अब फिर कड़ाहे में जलना! यह नहीं होगा।
दूसरे खंड में ले जाया गया। वहां कीड़े-मकोड़े, एकदम कीड़े-मकोड़े ही कीड़े-मकोड़े! लोगों में घुस रहे, निकल रहे, बाहर आ रहे, भीतर जा रहे; छेद ही छेद! नेता ने कहा: यह सब दिल्ली की पुनरुक्ति है, कुछ नया दिखलाओ।
ऐसे कई खंड दिखलाए, नेता को कुछ जंचा नहीं। फिर आखिरी खंड--एक तो आखिरी था वह, अब इसके आगे कुछ था भी नहीं, और जंचा भी। थोड़ी अड़चन थी उसमें, मगर जिसने दिल्ली देखी, उसे क्या अड़चन! छोटी अड़चन का क्या रखा है, यह सब तो खेल-खिलवाड़ था। अड़चन इतनी थी कि लोग खड़े थे मल-मूत्र में घुटने-घुटने तक। तो नेता ने कहा: इससे हम डरते नहीं, हम तो स्वमूत्र पहले ही पीते थे। यह कुछ हमारा बिगाड़ नहीं सकता। यह ठीक है।... तो हम पहले से ही जीवन-जल के परिपोषक रहे हैं। यह जगह जमेगी। यह जैसे अपने लिए ही बनाई गई है। जरा एक कदम और आगे है। मूत्र तो है ही, मल भी है--एक कदम और आगे। यह जरा आगे की सीढ़ी है। यह जरा और सिद्धों के लिए है। मगर जमेगी!
और लोग प्यालियों में कॉफी पी रहे थे। खड़े थे घुटने-घुटने उसमें। नेता ने कहा कि यह ठीक है, थोड़ी सी तकलीफ है घुटने-घुटने मल-मूत्र में खड़े होना। मगर यहां मजा ही मजा है। लोग... कोई कॉफी पी रहा है, कोई कोकाकोला पी रहा है। नेता ने कहा: यह भी अच्छा है, दिल्ली में कोकाकोला भी मिलना बंद हो गया था। जो जिसका दिल हो, अपनी-अपनी मौज के लोग... कोई फैंटा पी रहा है। तरह-तरह की चीजें पी जा रही हैं। लोग पी रहे हैं... बस एक ही अड़चन है कि घुटने-घुटने तक। नेता ने कहा: यह तो कोई अड़चन ही नहीं। यह तो सुख समझो। यह तो हमारे लिए स्वर्ग है।
लेकिन बस थोड़ी देर में ही पता चल गया। जैसे ही नेता ने कोकाकोला की बोतल हाथ में ली, बस दो-चार घूंट ही मार पाया था कि जोर की घंटी बजी और आज्ञा आई कि अब सब लोग शीर्षासन करें। तब पता चला कि नरक में कहीं भी जाओ, नरक ही है। थोड़ी-बहुत देर को कोकाकोला भी कहीं-कहीं मिलता है, मगर फिर घुटने तक खड़े होना तो ठीक था मगर शीर्षासन करना! ऐसे नेता को शीर्षासन करना भी आता था। जिंदगी भर और किया ही क्या! सिर के बल खड़े रहे। लेकिन इस मल-मूत्र में...।
यहां लोगों ने अलग-अलग नरक चुन लिए हैं, बस इतना ही फर्क समझना। उनके नरकों की तस्वीरें अलग हैं। उनकी तस्वीरों के रंग अलग हैं, मगर गहरे में नरक ही नरक है, दुख ही दुख है। अगर सुख चाहिए तो सिर्फ एक उपाय है--सिर्फ एक, एकमात्र--और वह है स्वयं को जानना। जो नहीं स्वयं को जानता वह तो दुख उठाएगा--विवाहित हो तो विवाह से दुख उठाएगा; अविवाहित हो तो अविवाहित होने से दुख उठाएगा। गरीब हो तो गरीबी से दुख उठाएगा, अमीर हो तो अमीरी से दुख उठाएगा। उसके भाग्य में दुख है क्योंकि उसके भीतर सुख की किरण नहीं है। सुख भीतर की घटना है, बाहर से नहीं आता; इसका कोई बहिर्गमन नहीं होता। तुम सुख को अर्जित नहीं कर सकते हो। सुख का कोई भी संबंध तुम्हारे पास क्या है इससे नहीं है; तुम क्या हो इससे है। और तब तुम्हें नरक में भी भेज दिया जाए, तो भी तुम सुखी रहोगे। और ऐसे तुम स्वर्ग में भी चले जाओ तो भी तुम दुखी रहोगे। तुम जरा सोचो, अगर तुम जैसे हो अभी, ऐसे के ऐसे तुम्हें उठा कर किसी चमत्कार से स्वर्ग में बिठा दिया जाए, तो तुम क्या करोगे? तुम सोचते हो कुछ फर्क पड़ जाएगा? नहीं, जरा भी फर्क नहीं पड़ेगा।
एक ईसाई पादरी मरा, स्वर्ग पहुंचा। पादरी था तो स्वर्ग पहुंचना ही था। सेंट पीटर ने दरवाजा खोला स्वर्ग का। और पादरी को स्वर्ग के भ्रमण के िलए और उपयोग के लिए एक फटियल सी पुरानी फोर्ड टी मॉडल कार दी, लेकिन फिर भी पादरी प्रसन्न हुआ कि कुछ भेंट तो दी। उसे कुछ पता नहीं था और क्या-क्या चल रहा है यहां। और भी खुश हुआ जब उसने देखा कि उसी के पास से एक अयातुल्ला, एक मुसलमान मौलवी साइकिल पर ही चला जा रहा है। तो उसने कहा: अरे! अब देखो फर्क मुसलमान होने का और ईसाई होने का! हम जा रहे हैं फोर्ड में, माना कि टी मॉडल है, बाबा आदम के जमाने का--जिसमें ईश्वर ने आदम और हव्वा को बिठाल कर स्वर्ग के बाहर निकाला था--मगर है तो आखिर... कार तो कार ही है! और फिर जो समझदार हैं वे इसको ऐसा नहीं कहते, वे इसको कहते हैं: एंटीक! जो जानकार हैं वे इसकी बड़ी कद्र करते हैं।
तभी उसने देखा एक रबाई फर्र से एक रॉल्स रॉयस में निकला। उसने कहा: ये यहूदी मात यहां भी किए दे रहे हैं। ये जिंदगी में भी मजा करते रहे, वहां भी धन इकट्ठा करते रहे।
रबाई तो पूरे मजे में जीता है, शादी भी करता है, बच्चे भी होते हैं, मकान भी होता है, धन-दौलत भी होती है। रबाई कोई ऐसे कोई त्यागी, भोग को छोड़-छाड़ कर भागा हुआ नहीं होता। यह तो हद हो गई और यह तो बड़ी ज्यादती हो गई। और हम जीसस के मानने वाले... पहुंचा एकदम वह नाराजगी में, ईर्ष्या जन्मी।
तुम देखते हो, तुम जो यहां हो वही वहां हो जाएगा। किसी को साइकिल पर देख कर बड़ा अहंकार जन्मा था--अहा! दिल खुश हुआ था। और रबाई को देखा रॉल्स रॉयस में जाते हुए, और रबाई ने हाथ हिलाया...! पुरानी पहचान थी, एक ही गांव में दोनों रहे थे। आग लग गई छाती में। अब उसे दिखाई पड़ी यह एंटीक वगैरह कुछ नहीं है, यह फटियल गाड़ी है। पहुंचा वापस, सेंट पीटर से कहा कि यह अन्याय हो रहा है। ये यहूदी दुनिया में भी मजा करते रहे, सारी दुनिया का धन इकट्ठा किए बैठे थे। और यह रबाई मैं इसे भलीभांति जानता हूं; न कभी इसने पूजा की, न कभी प्रार्थना की, इसको फुर्सत ही नहीं थी। होटल, क्लब, गोल्फ, और न मालूम कहां-कहां के उपद्रवों में यह रहा। इसने ऐसा कोई पाप नहीं है जो न किया हो। यह मेरे ही सामने तो रहता था, इसको मैं भलीभांति जानता हूं। हम पूजा कर-कर के मरे और यह फोर्ड टी मॉडल... और इस लफंगे को रॉल्स रॉयस!
सेंट पीटर ने कहा: धीरे, आहिस्ता बोलो! वह परमात्मा का निकट रिश्तेदार है। और तुम्हें याद होना चाहिए कि जीसस भी यहूदी थे, उनका भी वह निकट रिश्तेदार है। हम तो बहुत पीछे आए, बाकी दूसरे लोग तो बहुत पीछे आए।
पादरी ने छाती पीट ली। तो उसने कहा: यहां भी रिश्तेदारी चलती है, भाई-भतीजावाद!
नहीं; तुम अगर एकदम से ऐसे के ऐसे उठा कर स्वर्ग भी पहुंचा दिए जाओ तो तुम यही हो, यही रहोगे। यही ईर्ष्याएं, यही वैमनस्य, यही द्वेष, यही स्पर्धाएं तुम्हें वहां भी घेर लेंगी। तुम सुख न पा सकोगे। और तुम अगर अपने अंतस्तल में विराजमान हो जाओ, ध्यानस्थ हो जाओ, तो स्वर्ग यहीं उतर आएगा। स्वर्ग कहीं और थोड़े ही है, नरक कहीं और थोड़े ही है। ये कोई भौगोलिक स्थितियां थोड़े ही हैं। स्वर्ग और नरक तुम्हारी मनोदशाएं हैं। स्वर्ग है स्व-ज्ञान और नरक है स्व-अज्ञान।
तू कहती है: ‘मैं बहुत दुखी हूं।’
कमला, व्यर्थ दुखी है। कीचड़ से बच गई; अब तेरा नाम कमला है, कमल बन। पति भाग गया, धन्यवाद दे, सदा-सदा के लिए अनुग्रह मान। कभी मिल जाए तो चरण छूना। कहना: गुरुदेव! हे सदगुरु! तुम्हारी अपरंपार कृपा! ठीक समय रहते तुम भाग गए। और जरा देर हो जाती और घोड़े पर चढ़ जाते और बैंड-बाजे बज जाते, तो फिर बचना मुश्किल हो जाता।
स्त्रियों का बचना तो और भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि पुरुषों ने उन्हें ऐसा दीन कर दिया है। सदियों-सदियों तक उन्हें शिक्षा नहीं दी, क्योंकि शिक्षित हो जाएं तो स्वतंत्र हो जाएं। सदियों-सदियों तक उन्हें काम नहीं करने दिया दुनिया में, रोटी-रोजी नहीं कमाने दी; क्योंकि वे रोटी-रोजी कमाने लगें तो फिर पति की जो मालकियत है वह कहां टिके? जब पत्नी खुद रोटी-रोजी कमाने लगे तो फिर इतनी निर्भर नहीं रह जाती। फिर वह यह नहीं कहेगी कि मैं तुम्हारे चरणों की दासी। किसलिए कहेगी? और अगर तुमसे ज्यादा कमाए तो फिर तुम्हीं को लिखना पड़े--तुम्हारे चरणों का दास!
कोई पति पसंद नहीं करता अपने से ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की से विवाह करना। कोई पुरुष पसंद नहीं करता। क्योंकि उसमें बड़ी हीनता मालूम होती है। कोई पुरुष पसंद नहीं करता कि पत्नी उससे ज्यादा कमाए, क्योंकि तब उसके अहंकार को चोट लगती है।
तुम्हारा होने वाला पति भाग गया, अच्छा हुआ। सांत्वना मत खोजो, सत्य खोजो। इस अवसर का उपयोग कर लो। इस अवसर को अंतर्यात्रा के लिए चुनौती बना लो। पति से तो विवाह चूक गया, क्यों न परमात्मा से विवाह कर लें, क्यों न अब महासगाई हो जाए! तो कमला, तू कमल हो जाए!
कीचड़ में कमल छिपा है। कोई सोच भी नहीं सकता कि कीचड़ में और कमल छिपा होगा! कहां कीचड़, कहां कमल! मगर कीचड़ से कमल पैदा होता है। ऐसे ही हम सबके भीतर कमल छिपे हैं। कीचड़ भी रहें तो कीचड़ ही रह कर मर जाएंगे। कमल भी हो सकते हैं। लेकिन ये कमल चैतन्य के कमल हैं। ये कमल ध्यान की ही ऊर्जा से खिल सकते हैं--ध्यान का सूरज ही निकले तुम्हारे भीतर तो।
और ध्यान का अर्थ क्या है? निर्विचार, मौन, शांत, ऐसी चैतन्य की अवस्था कि जहां कोई हलचल न हो, कोई चहल-पहल न हो, कोई तरंगें न हों। ऐसा ही अगर कर पाओ तो महासगाई हो जाए। अब मौका ही आ गया। अब क्या छोटे-मोटे किसी की दुल्हन बनना--राम की दुल्हनिया बनो! अब राम से ही हो जाए गठबंधन।
सांत्वना नहीं दूंगा। सांत्वना मैं किसी को भी नहीं देता। सांत्वना जो दे वह दुश्मन है, क्योंकि वह मलहम-पट्टी कर देता है। मेरा भरोसा सर्जरी में है, मलहम-पट्टी में नहीं है।
इस जगत का सारा प्यार नश्वर है--दो कौड़ी का है।
तुम प्यार नहीं कर पाओगे।
तुम नश्वर हो तो भावों में अमरत्व कहां से लाओगे?
तुम प्यार नहीं कर पाओगे।
पथरीली है यह प्रेम डगर,
कोमलतम जग के नारी, नर
कुछ पहले ही दम तोड़ गए,
कुछ बैठ गए थोड़ा चल कर,
प्रियतम, इस पथ में पांव न दो, चलते-चलते थक जाओगे।
मैं आज प्रणय-पथ में आई,
मन में सुख के सपने लाई,
पर इसका कुछ भी ठीक नहीं--
कल कौन तुम्हारे मन भाई?
यह ज्ञात नहीं, इस जीवन में तुम किस-किस के कहलाओगे?
मानव का मन ही है चंचल,
अपने से भी करता है छल,
दो छींटों से बुझ जाता है,
विक्षिप्त धधकता विरहानल,
तुम भी तृणवत् मन की गति के हलकोरों में बह जाओगे।
मैं तुम से प्रियतम कहती हूं,
तुम ज्यादा हो, कम कहती हूं,
मैं, किंतु प्रणय के बंधन को,
सच पूछो तो भ्रम कहती हूं,
तुम सुख के सुंदर धोखे में उर को कब तक उरझाओगे?
तुम प्यार नहीं कर पाओगे।
तुम नश्वर हो तो भावों में अमरत्व कहां से लाओगे?
तुम प्यार नहीं कर पाओगे।
स्वप्न है प्रेम एक--स्वप्न शाश्वत का! स्वप्न है इस तरह जीने का, जैसे कि ज्ञानी जीए, ध्यानी जीए। स्वप्न है सुंदरतम को पाने का, मगर कहां तुम पानी के बबूलों में सुंदरतम को पाओगे? हां, कभी-कभी सूरज की किसी किरण में पानी का कोई बबूला इंद्रधनुष जैसा चमक जाए क्षण भर को, बात और। मगर अब फूटा तब फूटा। रेत की इस दुनिया में घर कैसे बनाओगे? हां, बनाते हैं घर, बच्चे बनाते हैं घर, मगर उन घरों में कोई रह तो नहीं पाता। और वे घर बन भी नहीं पाते और गिर जाते हैं। कागज की नावों में तैरने चले हो! नावें कागज की बस नावें कहलाती हैं, नावें हैं नहीं। और हो सकता है थोड़े-बहुत तर भी जाओ, मगर कितनी दूर तर पाओगे? इस अथाह सागर में कागज की नावें काम न देंगी।
प्रेम जिसको तुम कहते हो, कागज की नाव है। प्रार्थना की नाव पकड़ो।
लेकिन तुझे चोट लगी है। तेरे अहंकार को पीड़ा हुई है। स्वाभाविक है। मैं समझता हूं। बड़ी प्रतीक्षा तूने की होगी। शहनाई बजती होगी, द्वार पर अतिथि इकट्ठे हुए होंगे। सहेलियों ने तुझे सजाया होगा। और फिर आया नहीं दूल्हा, फिर घोड़े की टापें सुनाई ही न पड़ीं। फिर खबर आई दूल्हे की जगह, कि भाग गया है, लापता हो गया है। तेरे मन पर सांप लोट गए होंगे। तो सारे स्वप्न धूल-धूसरित हो गए होंगे। तुझे पीड़ा हुई है। ...लेकिन पीड़ा से ही तो कोई जागता है। पीड़ा ही तो चुनौती बनती है। इसे चुनौती समझ। इसे एक अवसर समझ--एक नई यात्रा का, एक नये संक्रमण का।
ये बियाबान मेरे वास्ते बने होंगे
इनकी रौनक न बढ़ाऊं तो किधर जाऊंगा,
सर्द रातों में चिलकती हुई धूपों के तले
मैं न गाऊंगा तो मर जाऊंगा।
बारहा मुझको सफर करना है
राह में आग बिछा दो तो भी तर जाऊंगा,
तुमने जिस राह पर अपनी हो बनाई मंजिल
ताउम्र भूल से उस राह नहीं आऊंगा।
चंद सांसों की सलामी में जिंदगी खो दूं
ऐसा सौदा तो मैं सांसों का न कर पाऊंगा,
कोई अपना तो नहीं रात के सायों के सिवा
काले सूरज को उजाले तो न दे पाऊंगा।
तुमने छीनी हैं जो मुझसे वो सुनहरी किरणें
उनकी स्याही में बहुत गहरे उतर जाऊंगा,
फिर न मैं लौट के उस गांव कभी आऊंगा
अब ना मातम तेरे जाने का मैं मनाऊंगा।
कसम लो कि हो गई बात, एक खेल से छुटकारा हुआ। समय रहते छुटकारा हुआ।
चंद सांसों की सलामी में जिंदगी खो दूं
ऐसा सौदा तो मैं सांसों का न कर पाऊंगा।
फायदा भी क्या था? होता भी क्या, हो भी क्या जाता? धोखा खड़ा कर देते हैं हम। लोगों को आशाओं के सहारे पर जिलाए जाते हैं हम। छोटे बच्चों को कहते हैं: बड़े हो जाओगे तब सुख मिलेगा। फिर वे बड़े हो जाते हैं तो कहते हैं: विवाहित हो जाओगे तब सुख मिलेगा। फिर वे विवाहित हो जाते हैं तो कहते हैं: जब तक बच्चे न होंगे तब तक कैसे सुख? फिर बच्चे हो जाते हैं तो कहते हैं: अब बच्चों का विवाह इत्यादि करो तब सुख मिलेगा। और ऐसे-ऐसे मौत आती है, सुख नहीं आता। ऐसे हम टालते हैं। ऐसे हम स्थगित करते हैं। हम कहते हैं, कल। और कल के हम बड़े सपने संजोते हैं। और आज? आज नरक में जीते हैं।
मैं तुमसे कहता हूं: आज ही स्वर्ग है, अभी स्वर्ग है! कल पर मत टालो। और स्वर्ग में होने के लिए कोई भी बाह्य उपकरण आवश्यक नहीं है। तुम जहां हो जैसे हो, वैसे ही अपने भीतर डुबकी मार लो। और तब फिर रेगिस्तान भी उद्यान हो जाते हैं। और तब अंधेरी रातें सूरज की रोशनी से भर जाती हैं। और तब कांटे फूलों में रूपांतरित हो जाते हैं।
ये बियाबान मेरे वास्ते बने होंगे
इनकी रौनक न बढ़ाऊं तो किधर जाऊंगा,
सर्द रातों में चिलकती हुई धूपों के तले
मैं न गाऊंगा तो मर जाऊंगा।
फिर गीत उठने शुरू होते हैं रेगिस्तानों से भी मरूद्यानों के; कांटों से भी फूलों के; अंधेरी रातों से भी सुनहरी प्रभातों के।
चुनौती स्वीकार करो। सांत्वना मत खोजो। सांत्वना कमजोरों और कायरों के लिए छोड़ो। जिनके पास थोड़ी आत्मा है वे जीवन की प्रत्येक स्थिति को चुनौती बना लेते हैं। हर चुनौती सीढ़ी बन जाती है प्रभु के मंदिर की।
ओशो, राजनीति में सफल होने का नुस्खा क्या है?
जो मूर्ति नहीं बना सकते, जो चित्र नहीं रंग सकते, जो गीत नहीं गा सकते, जो कुछ भी नहीं कर सकते--उन सब अयोग्यों के लिए राजनीति है। आखिर अयोग्यों के लिए भी तो कुछ होना चाहिए। जिनमें और कोई योग्यता नहीं है उनमें राजनीति की योग्यता होती है।
राजनीति के लिए बुद्धि नहीं चाहिए। क्योंकि बुद्धिमान आदमी इतनी बेईमानी नहीं कर सकता; कुछ तो सोचेगा! बुद्धिमान आदमी इतने धोखे नहीं दे सकता; कुछ तो विचारेगा! बुद्धिमान आदमी इतने झूठ नहीं बोल सकता, आखिर खुद की आत्मा कचोटेगी। और राजनीति तो सिर्फ झूठे आश्वासन हैं। सिर्फ झूठ पर झूठ। अत्यंत सोई हुई चेतना चाहिए राजनीति में सफल होने के लिए।
शहर में एनसेफेलाइटिस, मस्तिष्क-ज्वर से अनेक मौतों की खबर पढ़ कर चिंतित हुई पत्नी ने अपने राजनेता पति से कहा: क्यों, पढ़ा आपने, यह रोग यहां भी फैल गया!
राजनेता ने कहा: तो क्या?
तो क्या, पत्नी बोली: मुझे बड़ा डर लग रहा है कि कहीं तुम्हें...?
घबड़ाओ मत! राजनेता ने कहा: इस रोग का संक्रमण केवल मस्तिष्क हो तभी होता है।
आखिर मस्तिष्क हो तो ही मस्तिष्क का ज्वर हो सकता है।
मैंने सुना है कि एक आदमी के मस्तिष्क का आपरेशन किया जा रहा था। बड़ा आपरेशन था, पूरा मस्तिष्क खोपड़ी से बाहर निकाल लिया गया था। और डॉक्टर मस्तिष्क को साफ-सुथरा करने में लगे थे। मरीज बिस्तर पर लेटा था। तभी एक आदमी भीतर भागा हुआ आया, उसने कहा कि नेताजी, आप यहां क्या कर रहे हैं? आप तो देश के प्रधानमंत्री चुन लिए गए।
वह आदमी एकदम उठ कर खड़ा हो गया। डॉक्टर तो बड़े हैरान हुए! वह तो चलने ही लगा। डॉक्टरों ने कहा: अरे भाई, आपका मस्तिष्क तो यहीं है। उसने कहा: अब मस्तिष्क की क्या जरूरत? अब रखो यहीं। अब करते रहो साफ-सुथरा। अब मुझे मस्तिष्क की क्या जरूरत? मैं मुल्क का प्रधानमंत्री हो गया हूं। अब तो मस्तिष्क हो तो अड़चन होगी।
तुम पूछते हो: ‘राजनीति में सफल होने का नुस्खा क्या है?’
बुद्धि का अभाव चाहिए, बेईमानी चाहिए, झूठ चाहिए। हर तरह से एक ही दृष्टि चाहिए बस, कि किसी तरह पद पर पहुंच जाएं; मार्ग ठीक हो कि गलत, साधन ठीक हो कि गलत, कोई चिंता नहीं--न शुभ की, न अशुभ की; न नीति की, न अनीति की। इतना कठोर हृदय चाहिए कि लोगों के सिर की सीढ़ियां बना सको। और इतनी कुशलता चाहिए कि चेहरे बदल सको। इतने मुखौटे चाहिए कि जब जैसी जरूरत पड़ जाए वैसा मुखौटा लगा लिया।
होटल में एक पहलवान शराब पीकर अपने दाएं तथा बाएं बैठे लोगों को चैलेंज कर रहा था। दाहिनी ओर अंगुली उठा कर बोला: गधो...। बाईं ओर अंगुली उठा कर बोला: घोड़ो...। है तुम लोगों में से किसी की हिम्मत जो मुझसे आकर कुश्ती लड़े?
तुरंत एक प्रसिद्ध राजनेता, जो दाहिनी ओर बैठा था, उठा और बाईं ओर जाने लगा। पहलवान ने सीना फुलाते हुए उसे घूरा, और कहा: क्यों बे नेताजी के बच्चे, तू लड़ेगा मुझसे?
नेताजी ने कहा: अरे पहलवान साहब! मेरी क्या मजाल आपसे लड़ने की! मैं तो गलत साइड पर गधों की तरफ बैठ गया था, सो घोड़ों की तरफ जा रहा हूं।
मुखौटे बदलने की हिम्मत चाहिए। लोगों के जूते चाटने की हिम्मत चाहिए। झूठ की कुशलता चाहिए। मूढ़ सपने देखने की कुशलता चाहिए।
ढब्बू जी चंदूलाल से कह रहे थे: जानते हो चंदूलाल, मैं रोजाना दो सौ पचास रुपये बचाता हूं! ऐसे करते-करते आज नहीं कल करोड़पति हो जाऊंगा।
चंदूलाल ने कहा: वह कैसे?
ढब्बू जी ने कहा: आजकल मैं रोजाना रेल में सफर करता हूं। और रेल में एक जंजीर होती है, उस जंजीर का गलत इस्तेमाल करने वाले को दो सौ पचास रुपये जुर्माना भरना पड़ता है।
चंदूलाल ने कहा: पर उससे क्या?
अरे ढब्बू ने कहा: तुम कुछ समझे नहीं, आज तक मैंने वह जंजीर नहीं खींची। दो सौ पचास रुपये रोज बचते हैं। करोड़पति हो जाने वाला हूं। तुम देखना, तुम जरा देखते रहो।
इस तरह के मूढ़तापूर्ण गणित बिठाने की क्षमता चाहिए। राजनीति जड़ों का, जड़ताओं का अड्डा है। वहां जो जितना ज्यादा जड़ हो उतने सफल होने की संभावना है। बुद्धिमान तो बहुत पहले हट जाएंगे दौड़ से क्योंकि दौड़ इतनी गंदी है।
महेंद्र, तुमने यह प्रश्न पूछा ही क्यों? क्या राजनीति में उतरने के इरादे हैं? क्या जीवन में कुछ और करने को नहीं बचा? क्या जीवन में और कुछ करने योग्य नहीं मालूम होता? लेकिन राजनीति में उतरने की आकांक्षाएं पैदा होती हैं। क्योंकि राजनेताओं को इतनी प्रतिष्ठा मिलती है। यह दुर्भाग्य है कि राजनेताओं को इतनी प्रतिष्ठा मिलती है। यह ज्यादा दिन चलेगा नहीं। भविष्य राजनीति का नहीं है। राजनेताओं की प्रतिष्ठा धीरे-धीरे डूबती ही जाने वाली है।
जैसे राजा चले गए ऐसे ही राजनेता भी चले जाएंगे, मैं तुमसे यह कहता हूं। आज नहीं कल तुम देखोगे, कुछ नये लोगों की ही प्रतिष्ठा और पूजा होगी। सृजनात्मक लोगों की प्रतिष्ठा और पूजा होगी। मगर अभी थोथे लोग पूजे जाते हैं। तुम्हारे मन में भी आकांक्षा उठती है। मगर जरा गौर तो करो, इन थोथे लोगों की तरफ जरा देखो तो! इनकी आत्माएं इन्हें कभी का छोड़ चुकी हैं। इन्होंने अपनी आत्माएं बेच दी हैं और पद खरीद लिए हैं। इनसे ज्यादा गरीब आदमी, इनसे ज्यादा भिखमंगे आदमी खोजना कठिन है। मगर अखबारों में इनका नाम देख कर, रोज इनकी तस्वीरें देख कर तुम्हारे मन में भी भाव उठता है: कभी हम भी कुछ हो जाएं!
एक अदालत में मुकदमा चल रहा था। एक राजनेता को किसी होटल में किसी आदमी ने उल्लू का पट्ठा कह दिया था। स्वभावतः राजनेता नाराज हो गया। उसने अदालत में मानहानि का मुकदमा चलाया। मुल्ला नसरुद्दीन उसका गवाह था।
मजिस्ट्रेट ने कहा कि जिस आदमी ने उल्लू का पट्ठा कहा है उसका कहना है कि होटल में कम से कम दो सौ पचास आदमी मौजूद थे। मैंने किसी का नाम नहीं लिया। हां, मैंने ‘उल्लू का पट्ठा’ शब्द का उपयोग किया है। लेकिन मैंने राजनेता को उल्लू का पट्ठा नहीं कहा। वहां दो सौ पचास लोग मौजूद थे, मैं किसी को भी कह सकता हूं। मैं खुद को भी कह सकता हूं। नाम मैंने किसी का लिया नहीं। इसलिए राजनेता नाहक ही भड़क गए हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन से पूछा मजिस्ट्रेट ने कि तुम गवाह हो राजनेता के, क्या सबूत है तुम्हारे पास कि इस आदमी ने राजनेता को ही उल्लू का पट्ठा कहा था?
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि छाती पर हाथ रख कर, खुदा की कसम खाकर कहता हूं कि इसने राजनेता को ही उल्लू का पट्ठा कहा था।
लेकिन मजिस्ट्रेट ने पूछा: दो सौ पचास लोग वहां थे, नाम इसने किसी का लिया नहीं। तुम इतना बलपूर्वक कैसे कहते हो?
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि अब आप मानते नहीं तो फिर सच्ची बात कह दूं। दो सौ पचास लोग थे, मगर उल्लू का पट्ठा वहां एक ही था। इसने राजनेता को ही उल्लू का पट्ठा कहा है।
महेंद्र, तुम्हें उल्लू का पट्ठा होना है? जिंदगी में कुछ और करने को है। जिंदगी में कुछ और करो। यह तो छोड़ दो जो कूड़ा-करकट है। यह तो छोड़ दो तुम समाज के चौथे वर्ग को--शूद्रों को। मैं राजनीति को शूद्रों का धंधा कहता हूं। राजनीति यानी शूद्रता। अब हमें बदल देनी चाहिए परिभाषाएं, जमाना बदल गया। अब हम शूद्र कहते हैं, बुहारी लगा रहा है कोई आदमी सड़क पर उसको। काहे के लिए? स्वच्छता कर रहा है, उसको शूद्र कह रहे हो? ब्राह्मण कहना चाहिए। स्वच्छता कर रहा है। और राजनेता सब तरह की गंदगी फैला रहा, उसको तुम नेता समझ रहे हो। शूद्र!
शूद्र होने की कोई जरूरत नहीं है। ब्राह्मण बनो! ब्रह्म को जानो। और जानो नहीं केवल, प्रकट भी करो, अभिव्यक्त भी करो। तुम्हारे गीतों में झलके, तुम्हारे नृत्यों में उतरे। सृजनात्मक कोई आयाम पकड़ो। राजनीति तो विध्वंस है।
ओशो, आपने अपना बनाया, मेहरबानी आपकी हम तो इस काबिल न थे, है कद्रदानी आपकी आपने अपना बनाया...
इस अस्तित्व में जहां परमात्मा के स्रोत से सबका आगमन होता है, कोई सम्राट से कम हो भी कैसे सकता है!
मेरे ये चरण जो कि पग-पग पर कम्पमान,
मेरा यह मस्तक है जिसका अभिशाप ज्ञान,
मेरे ये हाथ जो कि फैले हैं अंजलि बन,
मेरा ये उर ‘उठना-गिरना’ जिसका विधान!
इनमें ही मेरे अस्तित्व का पराभव है,
अपनी सीमा से उठ सकना कब संभव है?
मेरे आगे जो अनजाना-सा है प्रसार--
इसमें किसकी सत्ता, है किसका अहंकार?
टेढ़े-मेढ़े अगणित पथ अगणित लोगों के,
किंतु निगल लेता है प्रति पथ को अंधकार!
ज्ञात है मुझे--तुम कह दोगे, ‘यह सपना है!’
पर मैं पंथी हूं, पथ मेरा भी अपना है!
खिलना--कलियों का गुण, मुरझाना--फूलों का,
टूट-टूट कर फिर-फिर चुभ-चुभ जाना शूलों का,
गुण उसका ‘जो कुछ’ है, निर्गुण अस्तित्वहीन,
मेरे जीवन का गुण-संचय है भूलों का!
मेरा विश्वास शिथिल, मेरा स्वर धीमा है,
अपराजित अंधकार, ज्ञान एक सीमा है!
मेरे सपनों में हंस-हंस पड़ते नव-प्रभात,
मेरे संघर्षों में धुंधली-सी निहित रात,
तेरे चरणों पर लहराते हैं सप्त सिंधु,
मेरे मस्तक पर मंडराते आकाश सात!
क्षिति की प्राचीरों से मुझको टकराना है,
मेरे आगे सुख-दुख का ताना-बाना है?
शशि में शीतलता है, रवि में है असह ताप,
अलि में गुन-गुन गुंजन, कोयल में है प्रलाप!
मेरे होंठों पर हिम, उर में अंगारे हैं,
अपनी सांसों में मैं युग-युग की लिए माप!
सांसों का स्रोत कहां? युग भी अनजाना है,
मैं कहता--‘कब मैंने निज को पहचाना है?’
बस उतनी ही भूल है--निज को पहचाना नहीं। नहीं तो सारा आकाश तुम्हारा है, और सारे चांद-तारे तुम्हारे भीतर हैं। निज को पहचाना नहीं, अन्यथा तुम शाश्वत हो, न तुम्हारा कोई जन्म है, न कोई मृत्यु है। देह नहीं हो तुम, मन भी नहीं हो तुम। तुम स्वयं परमात्मा हो। जानोगे, जागोगे तो चकित हो जाओगे--विस्मयविमुग्ध! नाच उठोगे--अनुग्रह से, आंनद से, उत्सव से!
कृष्णतीर्थ, तुम्हें पता नहीं तुम कौन हो। मिट्टी नहीं हो, मिट्टी में दबे हीरे हो! मिट्टी नहीं हो, मिट्टी में छिपे अमृत हो! मृण्मय होगा दीया, लेकिन ज्योति चिन्मय है--और वही ज्योति तुम हो।
इसलिए मेरे पास जो भी आए, स्वीकार है। मैं पूछता नहीं पाप-पुण्य, मैं पूछता नहीं योग्यता-अयोग्यता, मैं पूछता नहीं जाति-धर्म, मैं पूछता नहीं कुछ भी। जो भी मेरे पास आए स्वीकार है, क्योंकि प्रत्येक के भीतर परमात्मा विराजमान है, किसको अस्वीकार करो!
मुझसे लोग पूछते हैं कि आप सभी को संन्यास दे देते हैं? सभी को! मैं भी क्या करूं? परमात्मा सभी को जीवन दे दिया है। और जब उसने नहीं पूछा तो मैं पूछने वाला कौन हूं? और अगर उसने भरोसा किया है तो मैं संदेह करने वाला कौन हूं? जो भी आए, स्वीकार है, अंगीकार है। क्योंकि मैं तो देखता हूं तुम्हारी संभावना।
गुरजिएफ कहा करता था अपने शिष्यों से कि तुम जो हो सकते हो उससे मुझे प्रेम है लेकिन तुम जो हो उससे मुझे घृणा है और तुम्हारी सात पीढ़ियों तक घृणा है।
मैं तुमसे कहता हूं: तुम जो हो सकते हो उससे मुझे प्रेम है और तुम जो हो उससे भी मुझे प्रेम है और तुम्हारी सात पीढ़ियों तक प्रेम है! क्योंकि तुम जो हो सकते हो वह उसमें ही छिपा है जो तुम हो। तुम्हारे होने में ही तुम्हारा भविष्य है। तुम अगर बीज हो तो आज फूल दिखाई नहीं पड़ते, क्या इस कारण तुम्हारे बीज को इनकार कर दूं? और बीज को इनकार कर दूंगा तो फूल कैसे पैदा होंगे? बीज को अंगीकार करना है, स्वीकार करना है। प्रेम से बीज को सहलाना है, सम्हालना है, भूमि देनी है, खाद देना, सूरज देना, पानी देना--तो एक दिन वसंत आएगा और बीज में फूल खिलेंगे।
मैं एक बगिया बना रहा हूं। इस बगिया में सब अंगीकार है, क्योंकि मैं चाहूंगा इस बगिया में सब तरह के फूल हों। वैविध्य हो! जितनी विविधता होती है उतनी ही गहनता होती है। जितनी विविधता होती है उतनी ही संपदा होती है।
ओशो, मैं आपका संदेश घर-घर, हृदय-हृदय में पहुंचाना चाहता हूं, पर लोग बिलकुल बहरे हैं, अंधे हैं। मैं क्या करूं? जो पाया है उसे पाकर न बांटूं, यह भी संभव नहीं है। उसे बांटने की भी तो एक अपरिहार्यता है।
बांटना तो पड़ेगा, लेकिन बांटने में शर्तबंदी न करो। क्या फिकर करना कि कौन बहरा है, कौन अंधा है? आखिर अंधे को भी तो आंख देनी है न और बहरे को भी कान देने हैं न! ऐसे देख-देख कर चलोगे कि आंख वाले को देंगे तो आंख वाले को तो जरूरत ही नहीं है; वह तो खुद ही देख ले रहा है। और उसको ही देंगे जो सुन सकता है... जो सुन सकता है उसने तो सुन ही लिया होगा, वह तुम्हारी प्रतीक्षा में बैठेगा? आंख है जिसकी खुली हुई उसने देख लिया। कान हैं जिसके पास सुनने के, उसने सुन लिया नाद। वह तुम्हारी राह थोड़े ही देखेगा कि तुम जब आओगे तब सुनेगा। उसकी बांसुरी तो बज गई, उसकी रोशनी तो जल गई।
अंधे और बहरों को ही जरूरत है। इसलिए यह मत सोचो कि अंधे-बहरे लोग हैं, इनको कैसे दें? इनको ही देने में मजा है। इन्हीं को देने में कला है। इन्हीं को देने की चेष्टा में तुम्हें नये-नये उपाय खोजने पड़ेंगे, नई भाषा, नई भाव-भंगिमाएं खोजनी पड़ेंगी। और इन्हीं को देने में तुम विकसित भी होओगे; क्योंकि जो मिला है इसका कोई अंत थोड़े ही है। जितना बांटोगे उतना और मिलेगा। जितना लुटाओगे उतना और पाओगे।
फिकर छोड़ो, शर्तबंदी छोड़ो। जीसस ने कहा है अपने शिष्यों से: चढ़ जाओ मकानों की मुंडेरों पर और चिल्लाओ। लोग बहरे हैं, चिल्लाना पड़ेगा। झकझोरो, लोगों को जगाओ। लोग सोए हैं।
और जब तुम झकझोरोगे सोए हुए लोगों को, तो वे नाराज भी होंगे, गालियां भी देंगे। कौन जागना चाहता है सुखद नींद से! और नींद वाले को पता भी क्या कि जागने का मजा क्या है! पता हो भी कैसे सकता है? वह क्षम्य है अगर नाराज हो। और बहरा अगर न माने नाद के अस्तित्व को, तो तुम क्रुद्ध मत हो जाना। वह मानेगा तो उसका मानना झूठ होगा। और झूठे मानने से कोई क्रांति नहीं होती। उसके न मानने से टकराना। उसके न मानने को काटना, इंच-इंच तोड़ना। उठाना छैनी और उसके पत्थर को काटना। जन्म से कोई भी बहरा नहीं है और जन्म से कोई भी अंधा नहीं है।
मैं आध्यात्मिक अंधेपन और बहरेपन की बात कर रहा हूं। जन्म से सभी लोग आध्यात्मिक आंखें और आध्यात्मिक कान लेकर पैदा हुए हैं, क्योंकि आत्मा लेकर पैदा हुए हैं। समाज ने कानों को बंद कर दिया है, रुंध कर दिया है। कानों में रुई भर दी है--शास्त्रों की, शब्दों की, सिद्धांतों की। आंखों पर पट्टियां बांध दी हैं, जैसे कोल्हू के बैल या तांगे में जुते घोड़े की आंख पर पट्टी बांध देते हैं। ऐसी पट्टियां बांध दी हैं। कोई अंधा नहीं है, कोई बहरा नहीं है। जरा तुमने अगर प्रेमपूर्ण मेहनत की तो पट्टियां उतारी जा सकती हैं। फुसलाना होगा। जरा तुमने अगर मेहनत की तो उनके कानों से रुई निकाली जा सकती है। मगर एकदम से वे तुम्हारी बात मानने को राजी नहीं होंगे।
जल्दी भी क्या है? परमात्मा के काम में जल्दी की जरूरत भी नहीं है। उसकी मर्जी होगी तो तुमसे काम ले लेगा। उसकी मर्जी होगी तो तुमसे किन्हीं को जगवा लेगा, किन्हीं की आंखें खुलवा लेगा। और उसकी मर्जी नहीं होगी तो तुम्हारी चिंता क्या है? तुम्हारी खुल गईं, यही क्या कम है!
तुम बहते जाना, बहते जाना, बहते जाना भाई!
तुम शीश उठा कर सरदी-गरमी सहते जाना भाई!
सब यहां कह रहे हैं रो-रो कर अपने दुख की बातें!
तुम हंस कर सबके सुख की बातें कहते जाना भाई!
भ्रम रहे यहां पर हैं बेसुध-से सूरज, चांद, सितारे,
गल रही बरफ, चल रही हवा, जल रहे यहां अंगारे,
है आना-जाना सत्य, और सब झूठ यहां पर भाई,
कब रुकने पाए झुकने वाले जीवन पर बेचारे?
तुम किस पर खुश हो गए और तुम बोलो किस पर रूठे?
जो कल वाले थे स्वप्न सुनहले आज पड़ गए झूठे!
है यह कांटों की राह विवश-सा सबको चलते रहना,
जो स्वयं प्रगति बन जाए उसी के स्वप्न अपूर्व अनूठे!
तुम जो देते हो मानवता को आठों याम चुनौती,
तुम महल खजानों को जो अपनी समझे हुए बपौती!
तुम कल बन कर रजकण पैरों से ठुकराए जाओगे।
है कौन यहां पर ऐसा जो खा आया हो अमरौती?
यह रंग-बिरंगी ऊषा लिए है दुख की काली रातें,
हैं ग्रीष्म-काल की दाहक लपटों में रस की बरसातें!
यह बनना-मिटना अमिट काल के चल-चरणों का क्रम है,
छाया के चित्रों सदृश यहां हैं ये सुख-दुख की बातें।
रुकना है गति का नियम नहीं, तुम चलते जाना भाई;
बुझना प्राणों का नियम नहीं, तुम जलते जाना भाई!
हिम-खंड सदृश तुम निर्मल, शीतल, उज्ज्वल यश के भागी,
जमना आंसू का नियम नहीं, तुम गलते जाना भाई!
तुम बहते जाना, बहते जाना, बहते जाना भाई!
तुम शीश उठा कर सरदी-गरमी सहते जाना भाई!
सब यहां कह रहे हैं रो-रो कर अपने दुख की बातें!
तुम हंस कर सबके सुख की बातें कहते जाना भाई!
फिकर न करना। तुम्हारे भीतर जो हुआ है उसे कहे जाओ, कहे जाओ--कोई सुने तो, कोई सुने न तो, कोई चिंता नहीं; कोई देखे तो, कोई न देखे तो। तुम बांटते रहो। सौ में से अगर एक ने भी देख लिया और सौ में से अगर एक ने भी सुन लिया तो तुम धन्यभागी हो। उतना ही बहुत है। तुम्हारा श्रम सार्थक हुआ।
कृष्णदेव, बांटना अपरिहार्य है। शर्तबंदी छोड़ दो। पात्र-अपात्र का विचार न करो। यह पात्र-अपात्र का विचार ही बाधा बन जाता है। लोग सोचते हैं, पात्र को देंगे। फिर पात्र मिलता नहीं। क्या पात्र, क्या अपात्र? तुम जिसको दोगे वही पात्र बन जाएगा। तुम देते ही जाना भाई!
तुम बहते जाना, बहते जाना, बहते जाना भाई!
तुम शीश उठा कर सरदी-गरमी सहते जाना भाई!
सब यहां कह रहे हैं रो-रो कर अपने दुख की बातें!
तुम हंस कर सबके सुख की बातें कहते जाना भाई!
रोने दो लोगों को, तुम गीत गाओ। लोगों को आंख बंद किए बैठे रहने दो, तुम रोशनी जलाओ। लोगों को कान बंद किए पड़े रहने दो, तुम वीणा के तार छेड़ो। आज नहीं कल, कल नहीं परसों--कोई सुनेगा, कोई जगेगा, कोई देखेगा। और एक भी देख ले, तुम्हारे जले दीये से एक दीया भी जल जाए, तो बहुत कृत-कृत्य हुए तुम। ...और जलेंगे दीये, जरूर जलेंगे। जलते रहे हैं! यही क्रम है सदा से। सौ को बुलाओ, दस आते हैं। जो दस आते हैं, उनमें से एक जग पाता है। यही अनुपात है।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
How can I offer my homage when I feel inadequate?
According to Osho, true homage needs no words: become utterly silent and bow: surrender your feeling, your actions, and your very existence. Inadequacy is itself the doorway; let helplessness melt into a simple, wordless prostration. Wherever you bow, there is a temple; gratitude said in silence reaches what speech cannot. Offer everything - success and failure - and allow humility to speak for you.
In simple terms: When words fail, just be very quiet and bow—inside or to the earth—and offer your feelings, actions, and whole life as your thank-you.
What is the recipe for success in politics?
According to Osho, political “success” requires a near-absence of intelligence and conscience: a deeply sleeping awareness that can lie, deceive, and abandon morality. Cultivate a single-pointed lust for power, a hard heart that climbs on people’s heads, and a changeling face—endless masks, sycophancy, and boot‑licking—shifting sides as needed. Intelligence, artistry, and meditation, he says, belong elsewhere.
In simple terms: To win in politics, keep changing faces, tell lies, and chase power without caring about right or wrong—real intelligence and heart only get in the way.
How can I effectively share my message with others who are unresponsive?
According to Osho, share inevitably and unconditionally: give even to the “deaf and blind” with compassion, invent new ways to reach them, and persist—shout if needed—yet remain patient and unhurried. Expect resistance and forgive it; lovingly chip away at denial. Trust existence: if it’s His will, some will awaken. Keep flowing; as you pour out, you grow.
In simple terms: Speak your truth kindly and boldly, try different ways, be patient with pushback, and keep going without worrying about results.
Did Baba Alauddin's statement reflect his inability to find a true master or his understanding of nada and sur?
According to Osho, Baba Alauddin’s remark does not confess failure to find a true master; it proclaims realization. Nada and sur are the innermost, infinite dimension—there is no going beyond them. All sages concur that at the ultimate depth an inner music (Omkar) arises; crossing it is impossible because the seeker dissolves into it.
In simple terms: He wasn’t stuck; he reached the deepest inner music, and there’s simply nothing beyond it.
