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मूल हिंदी
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Osho's Commentary
जीवन जिनका यज्ञरूप है, वासनारहित, अहंकारशून्य, ऐसे पुरुष परात्पर ब्रह्म को उपलब्ध होते हैं, अमृत को उपलब्ध होते हैं, आनंद को उपलब्ध होते हैं। लेकिन जिनका जीवन यज्ञ नहीं है, ऐसे पुरुष तो इस पृथ्वी पर ही आनंद को उपलब्ध नहीं होते, परलोक की बात तो करनी व्यर्थ है। इस सूत्र में कृष्ण ने दो-तीन बातें अर्जुन से कहीं।
एक, जिनका जीवन यज्ञ बन जाता!
जीवन के यज्ञ बन जाने का अर्थ क्या है? जब तक जीवन वासनाओं के आस-पास घूमता, तब तक यज्ञ नहीं होता है। जब तक जीवन स्वयं के अहंकार के ही आस-पास घूमता, तब तक जीवन यज्ञ नहीं होता। जैसे ही व्यक्ति वासनाओं को क्षीण करता और स्वयं के आस-पास नहीं, परमात्मा के आस-पास परिभ्रमण करने लगता है.।
मंदिर को हम जानते हैं। मंदिर की वेदी के चारों तरफ बनी हुई परिक्रमा को भी हम जानते हैं। लेकिन उसके अर्थ को हम नहीं जानते। हजारों बार मंदिर में गए होंगे और वेदी के आस-पास परिक्रमा लगाकर घर लौट आए होंगे। लेकिन मंदिर में परमात्मा की वेदी के आस-पास जो परिक्रमा है, वह प्रतीक है उस पुरुष का, जिसका अपना अहंकार नहीं रहा, जो अब परमात्मा के आस-पास ही जीवन में परिभ्रमण करता है, जो उसके चारों ओर ही घूमता है। अपना कोई केंद्र ही नहीं रहा, जिस पर घूम सके। परमात्मा का उपग्रह बन जाता है। वही हो जाता केंद्र में, हम हो जाते परिधि पर; उसके आस-पास ही घूमते हैं, परिभ्रमण करते हैं।
जैसे ही कोई व्यक्ति वासना और अहंकार से शून्य होता, उसका जीवन यज्ञ हो जाता है। इस यज्ञ के संबंध में काफी बातें मैंने पीछे कहीं हैं, वह खयाल में ले लेनी जरूरी हैं।
दूसरी बात, कृष्ण कहते हैं, ऐसा पुरुष ज्ञानरूपी अमृत को उपलब्ध होता है। ज्ञानरूपी अमृत को!
इस जगत में अज्ञान के अतिरिक्त और कोई मृत्यु नहीं है। अज्ञान ही मृत्यु है; इग्नोरेंस इज़ डेथ। क्या अर्थ हुआ इसका कि अज्ञान ही मृत्यु है?
अगर अज्ञान मृत्यु है, तो ही ज्ञान अमृत हो सकता है। अज्ञान मृत्यु है, इसका अर्थ हुआ कि मृत्यु कहीं है ही नहीं। हम नहीं जानते हैं, इसलिए मृत्यु मालूम पड़ती है। मृत्यु असंभव है। मृत्यु इस पृथ्वी पर सर्वाधिक असंभव घटना है, जो हो ही नहीं सकती, जो कभी हुई नहीं, जो कभी होगी नहीं। लेकिन रोज मृत्यु मालूम पड़ती है। यह मृत्यु हमें मालूम पड़ती है, क्योंकि हम जानते नहीं हैं। हम अंधेरे में खड़े हैं, अज्ञान में खड़े हैं। जो नहीं मरता, वह मरता हुआ दिखाई पड़ता है। इस अर्थ में अज्ञान ही मृत्यु है। और जिस दिन हम जान लेते हैं, उस दिन मृत्यु तिरोहित हो जाती है। कहीं थी ही नहीं कभी। अमृत ही, अमृतत्व ही शेष रह जाता है, इम्मारटेलिटी ही शेष रह जाती है।
कभी आपने खयाल किया, आपने किसी आदमी को मरते देखा? आप कहेंगे, बहुत लोगों को देखा। पर मैं कहता हूं, नहीं देखा। आज तक किसी व्यक्ति ने किसी को मरते नहीं देखा। मरने की प्रक्रिया आज तक देखी नहीं गई। जो हम देखते हैं, वह केवल जीवन के विदा हो जाने की प्रक्रिया है, मरने की नहीं।
बटन दबाई हमने, बिजली का बल्ब बुझ गया। जो नहीं जानता, वह कहेगा, बिजली मर गई। जो जानता है, वह कहेगा, बिजली अभिव्यक्त थी, अब अप्रकट हो गई। प्रकट थी, अप्रकट हो गई। मर नहीं गई। फिर बटन दबेगा, बिजली फिर वापस लौट आएगी। फिर बटन दबाएंगे, बिजली फिर भीतर तिरोहित हो जाएगी।
जीवन समाप्त नहीं होता, केवल शरीर से विदा होता है। लेकिन विदाई हमें मृत्यु मालूम पड़ती है। क्यों मालूम पड़ती है? क्योंकि हमने कभी अपने भीतर शरीर से अलग किसी अस्तित्व का अनुभव नहीं किया है। हमारा अनुभव यही है कि मैं शरीर हूं, इसलिए जब शरीर समाप्त होगा, जलाने के योग्य हो जाएगा, तब स्वभावतः निष्कर्ष होगा कि मर गए।
शरीर से अलग जिसने अपने भीतर किसी तत्व को नहीं जाना, वह अज्ञानी है। अज्ञानी का मतलब यह नहीं कि जिसे यूनिवर्सिटी की डिग्री नहीं है, विश्वविद्यालय का कोई सर्टिफिकेट नहीं है। सच तो यह है कि विश्वविद्यालय ने जितने सर्टिफिकेट दिए, अज्ञान उतना बढ़ा है, कम नहीं हुआ। कारण है। कारण यह है कि विश्वविद्यालय के सर्टिफिकेट को लोग ज्ञान समझने लगे। इसलिए असली ज्ञान की खोज की कोई जरूरत नहीं मालूम पड़ती। अज्ञानी आदमी के पास सर्टिफिकेट नहीं होता; वह ज्ञान की खोज करता है। तथाकथित ज्ञानी के पास सर्टिफिकेट होता है; वह मान लेता है कि मैं ज्ञानी हूं। मेरे पास यूनिवर्सिटी की डिग्री है। और क्या चाहिए?
ज्ञान तो सिर्फ एक है, स्वयं का ज्ञान। बाकी सब सूचनाएं हैं, इनफर्मेशनस हैं, नालेज नहीं। बाकी सब परिचय है, ज्ञान नहीं।
बर्ट्रेंड रसेल ने ज्ञान के दो हिस्से किए हैं, नालेज और एक्वेनटेंस--ज्ञान और परिचय। ज्ञान तो सिर्फ एक ही चीज का हो सकता है, जो मैं हूं; बाकी सब परिचय है, ज्ञान नहीं है। अपने से पृथक जिसे भी मैं जानता हूं, वह सिर्फ एक्वेनटेंस, परिचय है। जान तो सिर्फ अपने को सकता हूं; क्योंकि अपने से जो भिन्न है, उसके भीतर मेरा प्रवेश नहीं हो सकता, सिर्फ बाहर घूम सकता हूं। परिचय ही कर सकता हूं, ऊपर-ऊपर से जान सकता हूं, भीतर तो नहीं जा सकता। भीतर तो सिर्फ एक ही जगह जा सकता हूं, जहां मैं हूं।
यह बहुत मजे की बात है, अपना परिचय नहीं होता और दूसरे का ज्ञान नहीं होता। दूसरे का परिचय होता है, अपना ज्ञान होता है। अपना परिचय नहीं होता; क्योंकि अपने बाहर घूमने का उपाय नहीं है। दूसरे का ज्ञान नहीं होता; क्योंकि दूसरे के भीतर प्रवेश नहीं है।
लेकिन हम बड़े अजीब लोग हैं! हम दूसरे का ज्ञान ले लेते हैं और अपना परिचय कर लेते हैं। हम अपना परिचय कर लेते हैं, जो कि हो नहीं सकता। और हम दूसरे के ज्ञान को ज्ञान समझ लेते हैं, जो कि हो नहीं सकता। यह अज्ञान की स्थिति है। अज्ञान में मृत्यु है।
जब आप एक व्यक्ति को बुझते देखते हैं--बुझते, मरते नहीं। इसलिए बुद्ध ने ठीक शब्द का उपयोग किया है। वह शब्द है, निर्वाण। निर्वाण का अर्थ है, दीए का बुझना। बस, दीया बुझ जाता है; कोई मरता नहीं। दिखाई पड़ती थी ज्योति, अब नहीं दिखाई पड़ती। देखने के क्षेत्र से विदा हो जाती है, अदृश्य में लीन हो जाती है। फिर प्रकट हो सकती है, फिर लीन हो सकती है। यह प्रकट-अप्रकट होने का क्रम अनंत चल सकता है। जब तक कि ज्योति पहचान न ले कि प्रकट में भी मैं वही हूं, अप्रकट में भी मैं वही हूं; न मैं प्रकट होती, न मैं अप्रकट होती, सिर्फ रूप प्रकट होता और अप्रकट होता। वह जो रूप के भीतर छिपा हुआ सत्व है, वह न प्रकट में प्रकट होता, न अप्रकट में अप्रकट होता; न जीवन में जीवित होता, न मृत्यु में मरता। तब अमृत का अनुभव है।
हम दूसरों को मरते देखकर, बुझते देखकर, हिसाब लगा लेते हैं कि सब मरते हैं, तो मैं भी मरूंगा। लेकिन कभी किसी मरने वाले से पूछा कि मर गए? लेकिन वह उत्तर नहीं देता। इसलिए मान लेते हैं कि हां में उत्तर देता होगा। मौन को सम्मति का लक्षण समझने की बात सभी जगह ठीक नहीं है। मरे हुए आदमी से पूछो, मर गए? अगर वह उत्तर दे, तो समझना मरा नहीं; और अगर मौन रह जाए, तो हम समझ लेते हैं कि मर गया!
लेकिन मौन सम्मति का लक्षण नहीं है। नहीं बोल पा रहा है, इसलिए मर गया, ऐसा समझने का कोई कारण नहीं है।
दक्षिण के ब्रह्मयोगी, एक साधु ने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और कलकत्ता तथा रंगून यूनिवर्सिटी में मरने के प्रयोग करके दिखाए थे। वे दस मिनट के लिए मर जाते थे। कलकत्ता यूनिवर्सिटी में दस डाक्टर मौजूद थे, जिन्होंने सर्टिफिकेट लिखा कि यह आदमी मर गया है; क्योंकि मृत्यु के जो भी लक्षण हैं चिकित्सा-शास्त्र के पास, पूरे हो गए। श्वास नहीं; बोल नहीं सकता; खून में गति नहीं रही; ताप गिर गया; नाड़ी बंद हो गई; हृदय की धड़कन नहीं है। सब सूक्ष्मतम यंत्रों ने कह दिया कि आदमी मर गया। उन दस ने लिखा, दस्तखत किए, क्योंकि ब्रह्मयोगी कहकर गए थे कि दस्तखत करके सर्टिफिकेट, डेथ सर्टिफिकेट दे देना कि मैं मर गया।
फिर दस मिनट बाद सब वापस लौट आया। श्वास फिर चली; धड़कन फिर हुई; खून फिर बहा; उस आदमी ने आंख भी खोलीं; वह बोलने भी लगा; उठकर बैठ गया। उसने कहा, अब आपके सर्टिफिकेट के संबंध में मैं क्या मानूं? आप बड़े जालसाज हैं। जिंदा आदमी को मरने का सर्टिफिकेट देते हैं! उन्होंने कहा, जहां तक हम जानते थे, मौत घट गई थी। उसके आगे हम नहीं जानते।
लेकिन उनमें से एक डाक्टर ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि उस दिन से मैं फिर मृत्यु का सर्टिफिकेट नहीं दे सका, किसी को भी। क्योंकि उस दिन जो मैंने देखा, उससे साफ हो गया कि मृत्यु के लक्षण सिर्फ विदा होने के लक्षण हैं। और चूंकि आदमी लौटना नहीं जानता है, इसलिए हमारे सर्टिफिकेट सही हैं, वरना सब गलत हो जाएं। वह ब्रह्मयोगी लौटना जानता है।
तीन बार, लंदन, कलकत्ता और रंगून विश्वविद्यालय में उन्होंने मरकर दिखाया और तीनों जगह, पृथ्वी पर पहला आदमी है, जिसने तीन दफे मृत्यु का सर्टिफिकेट लिया!
क्या, हुआ क्या? जब ब्रह्मयोगी से चिकित्सक पूछते कि हुआ क्या, किया क्या? तो वह कहते, मैं सिर्फ सिकोड़ लेता हूं अपने जीवन को। जैसे कि सूरज अपनी किरणों को सिकोड़ ले; जैसे कि फूल अपनी पंखुड़ियों को बंद कर ले; जैसे पक्षी अपने पंखों को सिकोड़कर और अपने घोंसले में बैठ जाए--ऐसे मैं सिकोड़ लेता हूं जीवन को भीतर, भीतर, वहां जहां तुम्हारे यंत्र नहीं पकड़ पाते। होता तो मैं हूं ही, इसीलिए वापस लौट आता हूं। फिर खोल देता हूं पंखों को, फिर जीवन के आकाश में उड़ आता हूं--घोंसले के बाहर।
हम सबके भीतर वह गुह्य स्थान है, जहां आत्मा सिकुड़ जाए, तो फिर यंत्र पता नहीं लगा पाते, इंद्रियां पता नहीं लगा पातीं। असल में यंत्र इंद्रियों के एक्सटेंशन से ज्यादा नहीं हैं। यंत्र हमारी ही इंद्रियों का विस्तार हैं। आंख है; तो हमने दूरबीन और खुर्दबीन बनाई। वह आंख का विस्तार है, आंख को मैग्नीफाई कर देती है, बढ़ा देती है। कान है; तो हमने टेलीफोन बनाया। वह कान का विस्तार है। मेरा हाथ है; यहां से बैठकर मैं आपको छू नहीं सकता। मैं एक डंडा हाथ में पकड़ लूं और उससे आपको छुऊं, तो डंडा मेरे हाथ का विस्तार हो गया।
सारे यंत्र हमारी इंद्रियों के विस्तार हैं। अब तक एक भी यंत्र नहीं बना, जो हमारी इंद्रियों से अन्य हो, विस्तार न हो। सब एक्सटेंशंस हैं। इंद्रियां जिसे नहीं पकड़ पातीं, यंत्र कभी-कभी उसे पकड़ता, सूक्ष्म होता तो, लेकिन जो अतींद्रिय है, उसे यंत्र भी नहीं पकड़ पाता।