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सूत्र
अथ तृतीयोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।। 1।।
Questions in this Discourse
ओशो, सांख्य समझ में तो आई है थोड़ी, लेकिन अनुभूति में नहीं आई है, इसलिए प्रश्न तो उठते ही हैं। ओशो, ज्ञाननिष्ठा अर्थात सांख्य, और कर्मनिष्ठा अर्थात योग क्या अपने-अपने में पूर्ण नहीं हैं? अथवा क्या वे एक-दूसरे के पूरक हैं? और उनमें विरोध दिखाई पड़ने का क्या कारण है? कृपया इसे बताएं।
अभी गुस्ताव जुंग ने व्यक्तियों के दो मोटे विभाजन किए हैं। एक को गुस्ताव जुंग कहता है एक्स्ट्रोवर्ट, और दूसरे को कहता है इंट्रोवर्ट। एक वे, जो बहिर्मुखी हैं; एक वे, जो अंतर्मुखी हैं।
जो व्यक्ति अंतर्मुखी हैं, उनके लिए योग जरा भी काम का नहीं है। जो व्यक्ति अंतर्मुखी हैं, उनके लिए सांख्य पर्याप्त है। पर्याप्त से ज्यादा है। जो व्यक्ति बहिर्मुखी हैं, सांख्य उनकी पकड़ में ही नहीं आएगा, कर्म ही उनकी पकड़ में आएगा। क्योंकि ध्यान रहे, कर्म के लिए बाहर जाना जरूरी है और ज्ञान के लिए भीतर जाना जरूरी है। कर्म अगर कोई भीतर करना चाहे, तो नहीं कर सकता। आप भीतर कर्म कर सकते हैं? कर्म के लिए बहिर्मुख होना जरूरी है, बाहर जाना जरूरी है। कर्म के लिए अपने से बाहर निकलना पड़ेगा, तो ही कर्म हो सकता है। इसलिए जितना कर्मठ व्यक्ति, उतना अपने से बाहर चला जाता है; चांद-तारों पर चला जाता है; भीतर नहीं आ सकता है।
योग बहिर्मुखी व्यक्ति के लिए मार्ग है; सांख्य अंतर्मुखी व्यक्ति के लिए मार्ग है। और इस तरह के, दो तरह के व्यक्ति हैं। इन दो तरह के व्यक्तियों में विरोध है; सांख्य और योग में विरोध नहीं है।
इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है। क्योंकि अक्सर व्यक्तियों का विरोध, शास्त्रों का विरोध मालूम पड़ने लगता है। व्यक्तियों का विरोध शास्त्रों का विरोध मालूम पड़ने लगता है, है नहीं। अब महावीर हैं, बुद्ध हैं, शंकर हैं या नागार्जुन हैं--इनके बीच जो भी विरोध हमें मालूम पड़ते हैं, वे इन व्यक्तियों के विरोध हैं; जिस सत्य, जिस अनुभूति, जिस अलौकिक जगत की वे बात कर रहे हैं, वहां कोई विरोध नहीं है। लेकिन जिस मार्ग से वे पहुंचे हैं, वहां भिन्नता है। भिन्नता ही नहीं, विरोध भी है।
अब जैसे एक बहिर्मुखी व्यक्ति है, तो उसके लिए धर्म सेवा बनेगी। अंतर्मुखी व्यक्ति है, उसके लिए धर्म ध्यान बनेगा। अंतर्मुखी व्यक्ति के लिए सेवा की बात एकदम से समझ में नहीं आएगी। बहिर्मुखी व्यक्ति के लिए ध्यान की बात एकदम से समझ में नहीं आएगी--कि भीतर डूबकर क्या होगा? जो भी है करने का, बाहर है। जो भी होने की संभावना है, बाहर है।
ये दो तरह के व्यक्ति हैं, मोटे हिसाब से। आमतौर से कोई भी व्यक्ति एकदम एक्सट्रोवर्ट और एकदम इंट्रोवर्ट नहीं होता। ये मोटे विभाजन हैं। हम सब मिश्रण होते हैं--कुछ अंतर्मुखी, कुछ बहिर्मुखी। मात्राओं के फर्क होते हैं। कभी होता है कि नब्बे प्रतिशत व्यक्ति बहिर्मुखी होता है, दस प्रतिशत अंतर्मुखी होता है।
आमतौर से व्यक्ति मिश्रित होते हैं। ऐसा बहुत कम होता है कि व्यक्ति शुद्ध रूप से अंतर्मुखी हो। क्योंकि शुद्ध रूप से अंतर्मुखी व्यक्ति एक क्षण भी जी नहीं सकता। भोजन करेगा, तो बाहर जाना पड़ेगा; स्नान करेगा, तो बाहर जाना पड़ेगा। अंतर्मुखी व्यक्ति अगर सौ प्रतिशत हो, तो तत्काल मृत्यु घटित हो जाएगी। बहिर्मुखी व्यक्ति भी अगर सौ प्रतिशत हो, तो तत्काल मृत्यु हो जाएगी। क्योंकि निद्रा भी चाहिए, जिसमें भीतर जाना पड़ेगा। विश्राम भी चाहिए, जिसमें अपने में डूबना पड़ेगा। काम से छुट्टी, अवकाश भी चाहिए; मित्रों, प्रियजनों से बचाव भी चाहिए; अन्यथा उसका अपने अंतर-जीवन के स्रोतों से संबंध टूट जाएगा और वह समाप्त हो जाएगा।
इसलिए यह जो विभाजन है, सैद्धांतिक है। व्यक्ति-व्यक्ति में मात्राओं के फर्क होते हैं। नब्बे प्रतिशत कोई व्यक्ति बहिर्मुखी हो सकता है, दस प्रतिशत अंतर्मुखी हो सकता है।
अर्जुन जो है, एक्सट्रोवर्ट है। अर्जुन जो है, बहिर्मुखी व्यक्ति है। इसलिए सांख्य की बात उसकी समझ में पड़नी असंभव है; या इतनी थोड़ी-सी पड़ सकती है कि उससे वह नए सवाल उठा सकता है। लेकिन उससे उसके जीवन का समाधान नहीं हो सकता। क्यों? अर्जुन बहिर्मुखी क्यों है?
अर्जुन का सारा जीवन क्षत्रिय के शिक्षण का जीवन है। सारा जीवन कुछ करने और करने में कुशलता पाने में बीता है। सारा जीवन दूसरे को ध्यान में रखकर बीता है--प्रतियोगिता में, प्रतिस्पर्धा में, संघर्ष में, युद्ध में। क्षत्रिय, इंट्रोवर्ट आदमी क्षत्रिय नहीं हो सकता है। और अगर अंतर्मुखी आदमी क्षत्रिय के घर में भी पैदा हो जाए, तो भी क्षत्रिय नहीं रह सकता।
जैनों के चौबीस तीर्थंकर क्षत्रियों के घर में पैदा हुए, लेकिन क्षत्रिय नहीं रह सके। वे सब इंट्रोवर्ट हैं। महावीर अंतर्मुखी व्यक्ति हैं। बाहर के जगत में उन्हें कोई अर्थ मालूम नहीं होता है। बुद्ध क्षत्रिय घर में पैदा हुए, लेकिन क्षत्रिय नहीं रह सके। बाहर का वह विस्तार, कर्मों का वह जाल, उन्हें बेमानी मालूम पड़ा, छोड़कर हट गए।
अगर ब्राह्मण के घर में भी बहिर्मुखी व्यक्ति पैदा हो जाए--जैसे परशुराम--तो ब्राह्मण नहीं रह सकता, क्षत्रिय हो जाएगा। क्षत्रिय अनिवार्यरूपेण बहिर्मुखी होता है। अगर क्षत्रिय होने में उसे सफल होना है।
अर्जुन, कहना चाहिए, क्षत्रिय होने का आदर्श है। क्षत्रिय जैसा हो सकता है, वैसा व्यक्तित्व है। कृष्ण ने उसे सांख्य की निष्ठा कही सबसे पहले, क्योंकि अर्जुन बातें ब्राह्मणों जैसी कर रहा है। अर्जुन आदमी क्षत्रिय जैसा, सवाल ब्राह्मणों जैसे उठा रहा है। युद्ध के मैदान पर खड़ा है, लेकिन प्रश्न जो पूछ रहा है, वे गुरुकुलों में पूछने जैसे हैं। प्रश्न जो पूछा रहा है, वे किसी बुद्ध से, किसी बोधिवृक्ष के नीचे बैठकर, वन के एकांत में पूछने जैसे हैं। लेकिन प्रश्न जो पूछ रहा है, वह पूछ रहा है युद्ध के समारंभ के शुरुआत में, जब कि शंखनाद हो चुका है और योद्धा आमने-सामने आ गए हैं और जब अब घड़ी भर की देर नहीं है कि लहू की धारें बह जाएंगी--ऐसे क्षण में वह जिज्ञासाएं जो कर रहा है, वे ब्राह्मण जैसी हैं।
कृष्ण ने बड़ी ही अंतर्दृष्टि का प्रमाण दिया है। क्योंकि बात वह ब्राह्मण जैसी कर रहा है, इसलिए ब्राह्मण की जो चरम उत्कृष्ट संभावना है--सांख्य--कृष्ण ने सबसे पहले वही कह दी। उन्होंने कहा कि अगर तू सच में ही ब्राह्मण की स्थिति में आ गया है, तो सांख्य की बात पर्याप्त होगी, ज्ञान पर्याप्त होगा।
उससे कुछ हल नहीं हुआ। अर्जुन वहीं का वहीं रहा, जैसे घड़े पर पानी गिरा और बह गया। दूसरा अध्याय व्यर्थ गया है अर्जुन पर। अर्जुन पर अगर सार्थक हो जाता, तो गीता वहीं बंद हो जाती, आगे गीता के चलने का उपाय न था।
अब कृष्ण को एक-एक कदम नीचे उतरना पड़ेगा। वे एक-एक कदम नीचे उतरकर अर्जुन से बात करेंगे। शायद एक सीढ़ी नीचे की बात अर्जुन की समझ में आ जाए। इतना तय हो गया कि ब्राह्मण वह नहीं है। वह उसका स्वधर्म नहीं है, वह उसका व्यक्तित्व नहीं है। सांख्य बेकार गया--सांख्य बेकार है, इसलिए नहीं। अर्जुन पर बेकार गया, अर्जुन के लिए बेकार है।
लेकिन कृष्ण के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण था, इसलिए सबसे पहले सांख्य की बात कर ली।
ओशो, एक बहुत ही छोटा-सा प्रश्न है, आपने अभी-अभी कहा कि व्यक्ति कुछ अंतर्मुखी है और कुछ बहिर्मुखी है। इसका अर्थ क्या यह है कि व्यक्ति को सांख्य और योग दोनों की साधना साथ-साथ करनी पड़ेगी?
जब मैंने कहा कि व्यक्ति में मात्राएं हैं, तो जिस व्यक्ति में जिस तत्व की ज्यादा मात्रा है, उसे उसी मार्ग पर जाना होगा। मार्ग तो एक ही चुनना होगा। अगर वह बहिर्मुखी है अधिक मात्रा में, तो योग मार्ग है; अगर अंतर्मुखी है अधिक मात्रा में, तो सांख्य मार्ग है। मार्ग तो चुनना ही होगा। दोनों पर नहीं चला जा सकता।
और इसीलिए एक बात और आपसे कह दूं। इसीलिए जो व्यक्ति जिस मार्ग से पहुंचेगा, वह बलपूर्वक कहेगा कि मेरा ही मार्ग ठीक है। उसके कहने में कोई गलती नहीं है, वह पहुंचा है उस मार्ग से। और वह बलपूर्वक यह भी कहेगा कि दूसरे का मार्ग ठीक नहीं है, जानते हुए भी कि दूसरे का मार्ग भी ठीक है। पर ऐसा क्यों कहेगा? क्योंकि अगर वह ऐसा कहे कि वह मार्ग भी ठीक है, यह मार्ग भी ठीक है, तो जिन लोगों को मार्ग पर चलना है, उनके लिए चुनाव कठिन होता चला जाता है।
इसलिए दुनिया में जब से इक्लेक्टिक रिलीजन पैदा हो गए, जैसे थियोसाफी, जिसने कहा कि सब मार्ग ठीक हैं, तो उस मार्ग पर कोई आदमी चला नहीं कभी। हां, लोग किताब पढ़ लिए। जब सब मार्ग ठीक हैं, तो चुनाव मुश्किल हो गया। जब से दुनिया में कुछ ऐसे लोगों ने बात करनी शुरू की कि सभी ठीक है, तब से करीब-करीब मतलब यह हुआ कि सभी बेकार है, कुछ भी ठीक नहीं है। जो अंततः मतलब हुआ। जब हम कहने लगते हैं कि सभी ठीक है, तो करीब-करीब बात ऐसी हो जाती है कि गलत कुछ भी नहीं है। और अंततः मनुष्य के मन पर जो परिणाम होता है, वह यह होता है कि सभी गलत है।
इसलिए सांख्य अनिवार्य रूप से कहेगा कि गलत है कर्म की बात; ज्ञान ही सही है। और मैं मानता हूं, इसमें करुणा है, इसमें डागमेटिज्म नहीं है। इस बात को ठीक से समझ लेना है। इसमें कोई रूढ़िवाद नहीं है; इसमें सिर्फ करुणा है। क्योंकि वह जो विराट मनुष्य जाति है, उसे चुनाव करना है। एक-एक आदमी को डिसीजन लेना है--कहां चले? अगर सभी ठीक है, तो आदमी इनडिसीसिव हो जाता है। वह अनिश्चय में पड़ जाता है। वह सिर्फ खड़ा रह जाता है।
अगर चौरस्ते पर आप किसी से पूछें कि कौन-सा रास्ता नदी पहुंचता है? और वह कहे कि सभी रास्ते नदी पहुंचते हैं, तो बहुत संभावना यही है कि आप चौरस्ते पर खड़े रह जाएं और दूसरे आदमी की प्रतीक्षा करें, जो एक रास्ता बता सकता हो।
सांख्य कहेगा: ठीक है ज्ञान। योग कहेगा: ठीक है साधना, कर्म, श्रम। उनके कहने में करुणा है। व्यक्तियों को, जिनसे यह बात कही जा रही है, उनके सामने स्पष्ट चुनाव चाहिए। लेकिन एक बात समझ लेनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने को तौलकर मार्ग.।
इसलिए गीता एक अर्थ में अदभुत ग्रंथ है। न कुरान इस अर्थ में अदभुत है, न बाइबिल इस अर्थ में अदभुत है, न महावीर के वचन, न बुद्ध के, इस अर्थ में अदभुत हैं। किसी और अर्थ में वे सारी चीजें अदभुत हैं। लेकिन गीता एक विशेष अर्थ में अदभुत है कि उसमें सब तरह के व्यक्तियों के मार्गों की चर्चा हो गई है। उसमें सब तरह की संभावनाओं पर चर्चा हो गई है, क्योंकि अर्जुन पर कृष्ण ने सभी तरह की संभावनाओं की बात की है। एक-एक संभावना बेकार होती गई है, वे दूसरी संभावना की बात करते चले गए हैं। ऐसे अर्जुन के बहाने कृष्ण ने प्रत्येक मनुष्य के लिए संभावना का द्वार खोल दिया है।
लेकिन उससे उलझन भी पैदा हुई। उलझन यह पैदा हुई कि कृष्ण जब सांख्य की बात करते हैं, तो वे कहते हैं, सांख्य परम है। तब वे ऐसे बोलते हैं, जैसे वे सांख्य स्वयं हैं। बोलना ही पड़ेगा। जब वे योग की बात करते हैं, तो लगता है, योग परम है। जब वे भक्ति की बात करते हैं, तो लगता है कि भक्ति परम है। इससे एक उपद्रव जरूर हुआ। वह उपद्रव यह हुआ कि भक्त ने पूरी गीता में से भक्ति निकाल डाली। निकाल ली भक्ति और पूरी गीता पर भक्ति को थोप देने की कोशिश की। रामानुज, वल्लभ, निम्बार्क--सबकी टीकाएं पूरी गीता पर भक्ति को थोप देती हैं। ज्ञानियों ने ज्ञान निकाल लिया और पूरी गीता पर ज्ञान थोपने की कोशिश की--शंकर। कर्मियों ने कर्म निकाल लिया--तिलक--और पूरी गीता पर कर्म को थोपने की कोशिश की।
लेकिन कोई भी इस सत्य को ठीक से नहीं समझ पाया कि गीता समस्त मार्गों का विचार है। और जब एक मार्ग की कृष्ण बात करते हैं, तो उस मार्ग से वे इतने लीन और एक हो जाते हैं कि वे कहते हैं, परम है, यही परम है। जब अर्जुन पर वह व्यर्थ हो जाता है, तब वे दूसरे मार्ग की बात करते हैं। तब वे अर्जुन से फिर कहते हैं, यही परम है, दिस इज़ दि अल्टिमेट, यही सत्य है पूर्ण। क्योंकि अर्जुन को वे फिर चाहते हैं कि इसे चुन ले। और अर्जुन वैसे ही अनिश्चयमना है, अगर कृष्ण भी स्यातवाद में बोलें कि शायद यह ठीक है, शायद वह ठीक है, तो अर्जुन के लिए चुनाव असंभव है। अगर कृष्ण यह कहें कि वह भी ठीक है, यह भी ठीक है; किसी के लिए वह ठीक है, किसी के लिए यह ठीक है; कभी वह ठीक है, कभी यह ठीक है। तो अर्जुन, जो इनडिसीजन में पड़ा है, जो अनिर्णय में पड़ा है, जो चिंता में पड़ा है, जिसे मार्ग नहीं सूझता, उसके लिए कृष्ण मार्ग नहीं बना सकेंगे, मार्ग नहीं दे सकेंगे।
इसलिए कृष्ण जब कहते हैं, यही परम है, तो वे अर्जुन की आंख में झांक रहे हैं और देख रहे हैं कि शायद यह उसे ठीक पड़ जाए; तो उसके लिए यही परम हो जाए।
इसलिए गीता विशिष्ट है इस अर्थ में कि अब तक सत्य तक पहुंचने के जितने द्वार हैं, कृष्ण ने उन सबकी बात की है। लेकिन वह बात सिंथेटिक नहीं है, वह बात गांधी जी जैसी नहीं है। वह बात ऐसी नहीं है कि वह भी ठीक है, यह भी ठीक है। कृष्ण कहते हैं, जो ठीक है, उसके लिए वह परम रूप से ठीक है, बाकी उसके लिए सब गलत है। दूसरा किसी के लिए ठीक है, तो वह उसके लिए परिपूर्ण रूप से ठीक है--एब्सोल्यूट--निरपेक्ष ठीक है, और बाकी उसके लिए सब गलत है।
गीता बड़ी हिम्मतवर किताब है। और इतनी हिम्मत के लोग कम होते हैं, जो अपनी ही बात को जिसे उन्होंने दो क्षण पहले कहा है, दो क्षण बाद कह सकें कि वह बिलकुल गलत है, यह बिलकुल ठीक है। और दो क्षण बाद इसको भी कह सकें कि यह बिलकुल गलत है और अब जो मैं कह रहा हूं वही बिलकुल ठीक है। इतना असंगत होने का साहस केवल वे ही लोग कर सकते हैं, जो भीतरी रूप से परम संगति को उपलब्ध हो गए हैं, और अन्य लोग नहीं कर सकते हैं।
यह तो बार-बार खयाल में आएगा आपको कि कृष्ण जब भी जो कुछ कहते हैं, एब्सोल्यूट, निरपेक्ष कहते हैं; जब जो कुछ कहते हैं, उसे पूर्णता से कहते हैं। खयाल यही है कि वह इतनी पूर्णता में ही अर्जुन के लिए चुनाव बन सकता है, अन्यथा चुनाव नहीं बन सकता है।
इसलिए दुनिया में जब से बहुत कम हिम्मत के दयालु लोग पैदा हो गए हैं--जो कहते हैं, यह भी ठीक है, वह भी ठीक है; सब ठीक है; और सबकी खिचड़ी बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं--तब से उन्होंने न हिंदू को ठीक से हिंदू रहने दिया, न मुसलमान को ठीक से मुसलमान रहने दिया; न अल्लाह के पुकारने में ताकत रह गई, न राम को बुलाने में हिम्मत रह गई। अल्ला-ईश्वर तेरे नाम बिलकुल इम्पोटेंट हो जाता है, बिलकुल मर जाता है; उसमें कोई ताकत नहीं रह जाती। उसमें कोई ताकत ही नहीं रह जाती।
एक व्यक्ति के लिए उसका निर्णय सदा परम होता है। वह निर्णय उसी तरह का है कि मैं किसी स्त्री के प्रेम में पड़ जाऊं, तो उस प्रेम के क्षण में मैं उससे कहता हूं कि तुझसे ज्यादा सुंदर और कोई भी नहीं है। और ऐसा नहीं है कि मैं उसे धोखा दे रहा हूं। ऐसा मुझे उस क्षण में दिखाई ही पड़ता है। ऐसा भी नहीं है कि कल मैं बदल जाऊंगा, तो आप कहें कि कल आप बदल गए तो उस दिन आपने धोखा दिया था? नहीं, तब भी उस क्षण में मैंने ऐसा ही जाना था और वह मेरे पूरे प्राणों से निकला था कि तुझसे ज्यादा सुंदर और कोई भी नहीं है। उस क्षण के लिए मेरे पूरे प्राणों की पुकार वही थी।
कृष्ण जैसे लोग क्षणजीवी होते हैं, लिविंग मोमेंट टु मोमेंट। जब वे सांख्य की बात करते हैं, तब वे सांख्य के साथ इस प्रेम में पड़ जाते हैं कि वे कहते हैं, सांख्य परम है। अर्जुन! सांख्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। और जब वे भक्ति के प्रेम में पड़ जाते हैं क्षण भर के बाद, तो वे कहते हैं, अर्जुन! भक्ति ही मार्ग है; उसके अतिरिक्त कोई भी मार्ग नहीं है।
इसे ध्यान में रखना पड़ेगा। इसमें कोई तुलनात्मक, कोई कंपेरेटिव बात नहीं है। जब कृष्ण कहते हैं, सांख्य परम है, या जब मैं कहता हूं किसी स्त्री से कि तुझसे सुंदर और कोई भी नहीं है, तब मैं दुनिया की स्त्रियों से उसकी तुलना नहीं कर रहा। असल में मेरे लिए वह अतुलनीय हो गई है, इसलिए दुनिया में अब कोई स्त्री उसके मुकाबले नहीं है। मैं कोई तुलना नहीं कर रहा, मैं कोई कंपेयर नहीं कर रहा, सारी तस्वीरें रखकर जांच नहीं कर रहा कि इससे सुंदर कोई स्त्री है या नहीं! न मैंने सारी दुनिया की स्त्रियां देखी हैं, न जानने का सवाल है। न! इस क्षण में मेरे पूरे प्राणों की आवाज यह है कि तुझसे सुंदर और कोई भी नहीं है। वह सिर्फ मैं यह कह रहा हूं कि मैं तुझे प्रेम करता हूं। और जहां प्रेम है, वहां परम, एब्सोल्यूट प्रकट होता है।
और कृष्ण जब सांख्य की बात करते हैं, तो वे सांख्य के साथ उसी तरह प्रेम में हैं, जैसे कोई प्रेमी। और अगर इतने प्रेम में न हों, तो गीता में इतने प्राण नहीं हो सकते थे, तब किताब भगवद्गीता नहीं कही जा सकती थी। तब वह भगवान का वचन नहीं कही जा सकती थी। भगवान का वचन वह इसीलिए कही जा सकी--वह इसीलिए गीत गोविंद बन गई--सिर्फ इसीलिए कि प्रतिपल कृष्ण ने जो भी कहा, उसके साथ वे इतने एक हो गए कि रत्ती भर का फासला न रहा।
सांख्य की बात करते वक्त वे सांख्य हो जाते हैं; भक्ति की बात करते वक्त वे भक्त हो जाते हैं; योग की बात करते वक्त वे महायोगी हो जाते हैं। अतीत गिर जाता, भविष्य शेष नहीं रहता, जो सामने होता है, उसके साथ वे पूरे एक हो जाते हैं।
इसे खयाल में रखेंगे, तो उनके वचन तुलनात्मक नहीं हैं। एक अध्याय की दूसरे अध्याय से तुलना नहीं की गई है। एक श्रृंखला दूसरी श्रृंखला से, एक निष्ठा दूसरी निष्ठा से तौली नहीं गई है। प्रत्येक निष्ठा अपने में परम है। निश्चित ही, जो भी उस निष्ठा से पहुंचता है, उसके लिए उससे श्रेष्ठ कोई निष्ठा नहीं रह जाती।
ओशो, बहिर्मुखी व्यक्ति साधना करते-करते अंतर्मुख होता जाए, तो क्या अपना रास्ता जीवन में आगे जाकर उसे बदलना चाहिए?
अंतर्मुखी व्यक्ति भीतर डूबते-डूबते इतना भीतर डूब जाता है कि भीतर भी नहीं बचता, शून्य हो जाता है। तब वह कह पाता है, मैं हूं ही नहीं। जैसे दीए की लौ बुझ गई और खो गई, ऐसा ही सब खो गया।
बहिर्मुखी व्यक्ति अंततः पूर्ण को पकड़ पाता है। अंतर्मुखी व्यक्ति अंततः शून्य को पकड़ पाता है। और शून्य और पूर्ण दोनों एक ही अर्थ रखते हैं। लेकिन बहिर्मुखी व्यक्ति बाहर की यात्रा कर-करके पहुंचता है; अंतर्मुखी व्यक्ति भीतर की यात्रा कर-करके पहुंचता है। बहिर्मुखी व्यक्ति अंततः अपने अंतस को बिलकुल काटकर फेंक देता है; भीतर कुछ बचता ही नहीं, बाहर ही बचता है। अंतर्मुखी व्यक्ति बाहर को भूलते-भूलते इतना भूल जाता है कि बाहर कुछ बचता ही नहीं है।
और बड़े मजे की बात है कि बाहर और भीतर दोनों एक साथ बचते हैं। एक नहीं बच सकता दो में से। इसलिए एक खोता है, तो दूसरा तत्काल खो जाता है। अगर आप बाहर ही बाहर बचे और भीतर कुछ न बचे, तो बाहर भी खो जाएगा। क्योंकि बाहर फिर किसका बाहर होगा! उसके लिए एक भीतर चाहिए, भीतर के कारण ही वह बाहर है। अगर भीतर ही बचे और बाहर बिलकुल न बचे, तो उसे भीतर कैसे कहिएगा? वह किसी बाहर की तुलना और अपेक्षा में भीतर है। असल में जैसे आपके कोट का खीसा है। उसका एक हिस्सा भीतर है, जिसमें आप हाथ डालते हैं; और एक हिस्सा उसका बाहर है, जो लटका हुआ है। क्या आप सोच सकते हैं कि कभी ऐसा हो जाए कि खीसे का भीतर ही भीतर बचे और बाहर न बचे!
आपका घर है। कभी आप सोच सकते हैं कि घर का भीतर ही भीतर बचे और घर का बाहर न बचे! अगर भीतर ही भीतर बचे और बाहर न बचे, तो भीतर भी न बचेगा। अगर बाहर ही बाहर बचे और भीतर न बचे, तो बाहर भी न बचेगा। बाहर और भीतर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
इसलिए दो रास्ते हैं। या तो बाहर को गिरा दो या भीतर को गिरा दो। दोनों गिर जाएंगे और तब जो शेष रह जाएगा, जो बाहर और भीतर दोनों में था, जो बाहर और भीतर दोनों के पार भी था। वह जो बचेगा, उसे हम ब्रह्म कहें--अगर हमने बाहर से यात्रा की हो। या उसे हम शून्य कहें, निर्वाण कहें--अगर हमने भीतर से यात्रा की हो।
जिन लोगों ने परमात्मा को पूर्ण की तरह सोचा है, वे बहिर्यात्रा कर रहे हैं। जिन्होंने परमात्मा को शून्य की तरह सोचा है, वे अंतर्यात्रा कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि योग की साधना करते-करते, बहिर-साधना करते-करते एक दिन फिर सांख्य की साधना करनी पड़ेगी--कोई जरूरत नहीं है! योग ही पहुंचा देगा।
इसे एक और तरह से समझ लें, तो खयाल में आ जाए। एक आदमी दस की संख्या पर खड़ा है। वह दस की संख्या से अगर ग्यारह और बारह ऐसा बढ़ता चला जाए, तो भी असीम पर पहुंच जाएगा। एक जगह आएगी, जहां सब संख्याएं खो जाएंगी। अगर वह दस से नीचे उतरे नौ, आठ.पीछे लौटता है, तो एक के बाद शून्य आ जाएगा, जहां सब संख्याएं खो जाएंगी। आप किसी भी तरफ यात्रा करें, संख्या खोएगी। और जब संख्या खो जाएगी, तो आपने कहां से यात्रा की थी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जो बचेगा--संख्या के बाहर--वह एक ही होने वाला है।
इसे पाजिटिव और निगेटिव की तरह भी खयाल में ले लेना चाहिए। कुछ लोग हैं जिनको विधायक शब्द प्रीतिकर लगते हैं, वे वे ही लोग हैं, जो बहिर्मुखी हैं। कुछ लोग हैं जिन्हें नकारात्मक, निषेधात्मक शब्द प्रीतिकर लगते हैं, वे वे ही लोग हैं, जो अंतर्मुखी हैं। जैसे बुद्ध। तो बुद्ध को नकारात्मक शब्द बड़े प्रीतिकर लगते हैं। अगर उन्हें परमात्मा भी प्रकट होगा, तो नहीं के रूप में प्रकट होगा, नथिंगनेस के रूप में प्रकट होगा, शून्य के रूप में प्रकट होगा।
इसलिए बुद्ध ने अपने मोक्ष के लिए जो नाम चुना, वह है निर्वाण। अब निर्वाण का मतलब होता है, दीए का बुझ जाना। जैसे दीया बुझ जाता है, बस ऐसे ही एक दिन व्यक्ति बुझ जाता है। तब जो रह गया, वह निर्वाण है। कोई बुद्ध से पूछता है कि आपके निर्वाण के बाद क्या होगा? तो बुद्ध कहते हैं, दीया बुझ जाता है, तो फिर क्या होता है? शून्य के साथ एक हो जाता है। तो बुद्ध का जोर निगेटिव है, नकारात्मक है। वह अंतर्मुखी का जोर है।
दुनिया में जब भी अंतर्मुखी बोलेगा, तो नकार की भाषा बोलेगा, निगेशन की भाषा बोलेगा--नहीं, नेति-नेति। वह कहेगा, यह भी नहीं, यह भी नहीं, यह भी नहीं। उस जगह पहुंचना है, जहां कुछ भी न बचे। लेकिन जहां कुछ भी न बचे, वहीं सब कुछ बचता है। एक पाजिटिव भाषा है--यह भी, यह भी, यह भी। अगर सब जुड़ जाए, तो जो बचता है, वह भी सब कुछ है।
ये दो ही ढंग हैं। इनमें किसी भी तरफ आप चुन सकते हैं यात्रा। और ये दोनों ढंग बड़े विरोधी मालूम पड़ते हैं। जहां तक ढंग का संबंध है, विरोधी हैं। लेकिन जहां तक उपलब्धि का संबंध है, कोई विरोध नहीं है। वहीं पहुंच जाते हैं शून्य से भी। वहीं पहुंच जाते हैं पूर्ण से भी। वहीं पहुंच जाते हैं नेति-नेति कहकर भी। वहीं पहुंच जाते हैं सब में परमात्मा को जानकर, देखते, मानकर, सोचते, अनुभव करते हुए भी। पहुंचना है वहां, जहां द्वैत न बचे।
तो द्वैत दो तरह से शून्य हो सकता है, मिट सकता है, या तो सब स्वीकृत हो जाए या सब अस्वीकृत हो जाए। या तो सब बंधन गिर जाएं और या सब बंधन आत्मा ही हो जाएं, तब भी हो सकता है। या तो बंधन बचें ही नहीं और या फिर बंधन ही सब कुछ-- आत्मा--बन जाएं; तब भी बंधन नहीं बचते।
न तो योगी को सांख्य में जाना पड़ता है, न सांख्य को योग में जाना पड़ता है। लेकिन दोनों जहां पहुंच जाते हैं, वह एक ही जगह है। कहीं कोई बदलाहट नहीं करनी पड़ती। वे दोनों ही वहीं ले जाते हैं। यह प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर देखने की बात है कि उसकी अपनी रुचि, उसका अपना स्वधर्म, उसका अपना लगाव विधायक के साथ है कि नकारात्मक के साथ है, पूर्ण के साथ कि शून्य के साथ।
इसे ऐसा भी समझ लें। अगर कोई भाव से भरा हुआ व्यक्ति है, इमोशनल, भावुक, तो उसे पूर्ण की भाषा स्वीकार होगी। और अगर कोई बहुत बौद्धिक, बहुत इंटलेक्चुअल व्यक्ति है, तो उसे नकार की, इनकार की भाषा स्वीकार होगी। तर्क इनकार करता है, तर्क इलिमिनेट करता है, काटता है--यह भी बेकार, यह भी बेकार, यह भी बेकार--फेंकता चला जाता है, उस समय तक जब कि फेंकने को कुछ बचता ही नहीं। तब जब कुछ फेंकने को नहीं बचता, तो तर्क भी गिर जाता है।
कभी आपने देखी है एक दीए की बाती! बाती तेल को जलाती है। जब सारे तेल को जला डालती है, फिर खुद जल जाती है। कभी आपने यह देखा कि बाती को आग की लपट जलाती है, फिर पूरी बाती जल जाती है, तो लपट भी बुझ जाती है!
तर्क इनकार करता चला जाता है--यह भी नहीं, यह भी नहीं, यह भी नहीं। आखिर में जब कुछ भी इनकार करने को नहीं बचता, तो इनकार करने वाला तर्क भी मर जाता है। श्रद्धा स्वीकार करती चली जाती है--यह भी, यह भी, यह भी। और जब सब स्वीकार हो जाता है, तो श्रद्धा की भी कोई जरूरत नहीं रह जाती, वह भी गिर जाती है। और जहां तर्क और श्रद्धा दोनों ही गिर जाते हैं, वहां एक ही मुकाम, एक ही मंजिल, एक ही मंदिर आ जाता है।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकंवद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्।। 2।।
हे कृष्ण, आप मिले हुए वचन से मेरी बुद्धि को मोहित-सी करते हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चय करके कहिए कि जिसमें मैं कल्याण को प्राप्त होऊं।
पूछता है अर्जुन, एक बात निश्चित करके कहिए, ताकि मैं इस उलझाव से मुक्त हो जाऊं। लेकिन क्या दूसरे की कही बात निश्चय बन सकती है? और क्या दूसरा कितने ही निश्चय से कहे, तो भी भीतर का अनिश्चय गिर सकता है? कृष्ण ने कम निश्चय से नहीं कही सांख्य की बात। कृष्ण ने पूरे ही निश्चय से कही है कि यही है मार्ग। लेकिन अर्जुन फिर कहता है, निश्चय से कहिए। इसका क्या अर्थ हुआ?
इसका अर्थ हुआ कि कृष्ण ने कितने ही निश्चय से कही हो, अर्जुन के व्यक्तित्व से उसका कोई तालमेल नहीं हो पाया। अर्जुन के लिए वह कहीं भी निश्चय की ध्वनि भी नहीं पैदा कर पाई। अर्जुन और उसके बीच समानांतर स्थिति रही--पैरेलल। वैसे ही जैसे रेल की दो पटरियां समानांतर होती हैं, चलती हैं जिंदगी भर साथ, मिलती कहीं भी नहीं हैं। साथ ही साथ होती हैं सदा और बहुत दूर फासले पर मिलती हुई मालूम भी होती हैं; लेकिन जब वहां पहुंचो तो पाया जाता है, उतनी ही अलग हैं, मिलती कहीं भी नहीं। पैरेलल लाइन की तरह अर्जुन और कृष्ण के बीच यह लंबा संवाद चलने वाला है।
अर्जुन कह रहा है, निश्चित कहो कि मेरा भ्रम टूटे, मेरा उलझाव मिटे। लेकिन जो चित्त भीतर उलझा हुआ है, वह निश्चित से निश्चित बात में से भी उलझाव निकाल लेता है। कोई बात निश्चित नहीं हो सकती जब तक चित्त उलझा हुआ है, क्योंकि वह हर निश्चय में से अनिश्चय निकाल लेता है। कितनी ही निश्चित बात कही जाए, वह उसमें से नए दस सवाल उठा लेता है। वे सवाल उसके भीतर से आते हैं, उसके अनिश्चय से आते हैं। और अगर निश्चित चित्त हो, तो कितनी ही अनिश्चित बात कही जाए, वह उसमें से निश्चय निकाल लेता है। हम वही निकाल लेते हैं, जो हमारे भीतर की अवस्था होती है। हममें कुछ डाला नहीं जाता; हम वही अपने में आमंत्रित कर लेते हैं, जो हमारे भीतर तालमेल खाता है।
साक्रेटीज मर रहा था। तो उसके एक मित्र ने साक्रेटीज से पूछा कि आप बड़े निश्चित मालूम पड़ रहे हैं और मृत्यु सामने खड़ी है, जहर पीसा जा रहा है! आपके निश्चय को देखकर मन डरता है, मन कंपता है। यह कैसा निश्चय है? मृत्यु सामने है, आप इतने निश्चितमना क्यों हैं?
साक्रेटीज ने कहा कि मैं सोचता हूं कि नास्तिक कहते हैं कि आत्मा बचेगी नहीं, सब मर जाएगा। अगर वे सही हैं, तो चिंता का कोई भी कारण नहीं। क्योंकि मैं मर ही जाऊंगा, चिंता करने वाला भी कोई बचने वाला नहीं है। आस्तिक कहते हैं कि नहीं मरोगे; शरीर ही मरेगा, आत्मा बचेगी ही; आत्मा को मारा ही नहीं जा सकता। अगर वे सही हैं, तो मेरे चिंतित होने का कोई भी कारण नहीं। क्योंकि जब बचूंगा ही, तो चिंता क्या करनी! साक्रेटीज कहता है, मुझे मालूम नहीं कि नास्तिक ठीक कहते हैं कि आस्तिक ठीक कहते हैं। लेकिन अगर नास्तिक ठीक कहते हैं, तो मैं निश्चित हूं। क्योंकि मर ही जाऊंगा, चिंता किसे है! और अगर आस्तिक ठीक कहते हैं, तो भी मैं निश्चित हूं। क्योंकि जब बचना ही है, तो चिंता कैसी?
अब इसको समझें। यह साक्रेटीज इतनी अनिश्चित स्थिति में से भी निश्चय निकाल लेता है। और कृष्ण इतनी निश्चित बात कहते हैं। उनका स्टेटमेंट टोटल है, कि सांख्य परम निष्ठा है; ज्ञान पर्याप्त है; स्वयं को जान लेना काफी है, कुछ और करने का कोई अर्थ नहीं है। अर्जुन कहता है, कुछ ऐसी निश्चित बात कहो कि मेरा अनिश्चित मन अनिश्चित न रहे, मेरा विषयों में भागता हुआ यह मन ठहर जाए। अर्जुन यह नहीं समझ पा रहा है कि बातें निश्चित नहीं होतीं, चित्त निश्चित होते हैं। सिद्धांत निश्चित नहीं होते, चेतना निश्चित होती है। सर्टेन्टीज जो हैं, निर्णायक तत्व जो हैं, वे सिद्धांतों से नहीं आते, चित्त की स्थिति से आते हैं।
कभी आपने अर्जुन शब्द का अर्थ सोचा है? बड़ा अर्थपूर्ण है। शब्द है एक--ऋजु। ऋजु का अर्थ होता है: सीधा-सादा, स्ट्रेट। अऋजु, अऋजु का अर्थ होता है: टेढ़ा-मेढ़ा, डांवाडोल। अर्जुन शब्द का अर्थ ही होता है, डोलता हुआ।
हम सबके भीतर अर्जुन है। वह जो हमारा चित्त है, वह अर्जुन की हालत में होता है। वह सदैव डोलता रहता है। वह कभी कोई निश्चय नहीं कर पाता। वह काम भी कर लेता है अनिश्चय में। काम भी हो जाता है, फिर भी निश्चय नहीं कर पाता। काम भी कर चुका होता है, फिर भी तय नहीं कर पाता कि करना था कि नहीं करना था। पूरी जिंदगी अनिश्चय है।
वह जो अर्जुन है, वह हमारे मन का प्रतीक है, सिंबालिक है। वह इस बात की खबर है कि मन का यह ढंग है। और मन से आप कितनी ही निश्चित बात कहें, वह उसमें से नए अनिश्चय निकालकर हाजिर हो जाता है। वह कहता है, फिर इसका क्या होगा? फिर इसका क्या होगा?
एक मित्र कल मुझे मिलने आए। कहने लगे, बर्ट्रेंड रसेल ऐसा कहते हैं कि आत्मा नहीं है, तो मेरा क्या होगा? मैंने कहा, बर्ट्रेंड रसेल कहते हैं, तो उनको चिंता करने दो, तुम क्यों चिंता करते हो? फिर मैंने कहा, बर्ट्रेंड रसेल कहते हैं कि आत्मा नहीं है, लेकिन खुद तो चिंतित नहीं हैं। तुम क्यों चिंतित होते हो? नहीं, उन्होंने कहा कि और ये बुद्ध, महावीर और कृष्ण, ये सब कहते हैं कि आत्मा अमर है, इससे बड़ी चिंता होती है। मैंने कहा कि बर्ट्रेंड रसेल कहते हैं कि आत्मा नहीं है, तो क्या चिंता होती है? तो चिंता होती है कि मैं समाप्त हो जाऊंगा। बुद्ध और महावीर कहते हैं कि आत्मा अमर है, तो क्या चिंता होती है? तो वे कहने लगे, चिंता यह होती है कि क्या मैं कभी भी समाप्त न होऊंगा! ऐसा ही बना रहूंगा! तब भी मन घबड़ाता है।
अब बड़ी मुश्किल है। एक साक्रेटीज है, जो कहता है, नास्तिक से भी निश्चय निकाल लेता है, आस्तिक से भी निश्चय निकाल लेता है। एक ये मित्र हैं, ये बिलकुल एंटीसाक्रेटीज हैं। ये बुद्ध और महावीर से भी चिंता निकालते हैं, बर्ट्रेंड रसेल से भी चिंता निकालते हैं। ये दोनों विरोधियों से भी चिंता निकाल लेते हैं। तो इसका अर्थ क्या है?
इसका अर्थ यह है, हम वही निकाल लेते हैं, जो हम निकाल सकते हैं। लेकिन फिर भी हम सोचते हैं कि वह बर्ट्रेंड रसेल की वजह से मुझे चिंता पैदा हो रही है, महावीर की वजह से चिंता पैदा हो रही है। सच बात यह है कि मैं चिंतित हूं, अनिश्चित हूं। मैं महावीर से भी अनिश्चय निकालता हूं, रसेल से भी अनिश्चय निकाल लेता हूं।
अर्जुन कहता है, कुछ ऐसा कहें मुझे कि मैं सारे अनिश्चय के पार होकर थिर हो जाऊं। अर्जुन की मांग तो ठीक है; लेकिन साफ-साफ उसे नहीं है कि कारण क्या है। हम सबकी भी यही हालत है। मंदिर में जाते हैं, मस्जिद में जाते हैं, गुरु के पास, साधु के पास--निश्चय खोजने कि कहीं निश्चित हो जाए बात। कहीं निश्चित न होगी। अनिश्चित मन लिए हुए इस जगत में कुछ भी निश्चित नहीं हो सकता। अर्जुन को भीतर लिए हुए इस जगत में कुछ भी निश्चित नहीं हो सकता। और निश्चित, ऋजु मन हो, तो इस जगत में कुछ भी अनिश्चित नहीं, सब निश्चित है। चित्त है आधार--शब्द और सिद्धांत और शास्त्र नहीं, दूसरे के वक्तव्य नहीं।
अब कृष्ण से ज्यादा निश्चित आदमी अर्जुन को कहां मिलेगा! मुश्किल है। जन्मों-जन्मों भी अर्जुन खोजे, तो कृष्ण जैसा आदमी खोज पाना बहुत मुश्किल है। पर उनसे भी वह कह रहा है कि आप कुछ निश्चित बात कहें, तो शायद मेरा मन निश्चित हो जाए! और ध्यान रहे, जो व्यक्ति दूसरे से निर्णय खोजता है, वह अक्सर निर्णय नहीं उपलब्ध कर पाता।
एक व्यक्ति मेरे पास आए। उन्होंने कहा, मैं संन्यास लेना चाहता हूं। आप सलाह दें कि मैं लूं या न लूं? मैंने कहा कि जब तक सलाह मानने की और मांगने की इच्छा रहे, तब तक मत लेना। जिस दिन सारी दुनिया कहे कि मत लो, फिर भी हो कि लेंगे, तभी लेना। अन्यथा लेकर भी पछताओगे, लेकर भी दुखी होओगे और लोगों से पूछने जाओगे कि कोई गलती तो नहीं की। संन्यास छोड़ दूं कि रखूं!
ध्यान रहे, जब हम दूसरे से पूछते हैं, तो वह केवल इसकी खबर होती है कि अब हम अपने से पूछने की हालत में बिलकुल नहीं रहे। अब हालत इतनी बुरी है कि अपने से पूछना बेकार ही है। अपने से जो उत्तर आते हैं, सब कनफ्यूजिंग हैं, सब.। लेकिन यह जिसके भीतर से हम पूछ रहे हैं, जो पूछ रहा है, वही तो सुनेगा न? वही फिर नए प्रश्न खड़े कर लेता है। अर्जुन करेगा।
ऐसे उसकी बड़ी कृपा है, अन्यथा गीता पैदा नहीं हो सकती थी। इस अर्थ में भर उसकी कृपा है कि वह उठाता जाएगा प्रश्न और कृष्ण से उत्तर संवेदित होते चले जाएंगे। कृष्ण जैसे लोग कभी कुछ लिखते नहीं। कृष्ण जैसे लोग सिर्फ रिस्पांड करते हैं, प्रतिसंवेदित होते हैं। लिखते तो केवल वे ही लोग हैं, जो किसी को कुछ थोपना चाहते हों। कृष्ण जैसे लोग तो कोई पूछता है, पुकारता है, तो बोल देते हैं।
तो अर्जुन खुद तो परेशानी में है, लेकिन अर्जुन से आगे आने वाले जो और अर्जुन होंगे, उन पर उसकी बड़ी कृपा है। गीता पैदा नहीं हो सकती थी अर्जुन के बिना; अकेले कृष्ण से गीता पैदा नहीं हो सकती थी। अर्जुन पूछता है, तो कृष्ण से उत्तर आता है। कोई नहीं पूछेगा, तो कृष्ण शून्य और मौन रह जाएंगे; कुछ भी उत्तर वहां से आने को नहीं है। उनसे कुछ लिया जा सकता है, उनसे कुछ बुलवाया जा सकता है। और अर्जुन ने वह बुलवाने का काम किया है। उसकी जिज्ञासा, उसके प्रश्न, कृष्ण के भीतर से नए उत्तर का जन्म बनते चले जाते हैं।
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।। 3।।
इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण बोले,
हे निष्पाप अर्जुन, इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गई है: ज्ञानियों की ज्ञानयोग से और योगियों की निष्काम कर्मयोग से।
कहते हैं कृष्ण, निष्पाप अर्जुन! संबोधन करते हैं, निष्पाप अर्जुन! क्यों? क्यों? इसे थोड़ा समझना जरूरी है। यह एक बहुत मनोवैज्ञानिक संबोधन है।
मनोविज्ञान कहता है, चित्त में जितना ज्यादा पाप, अपराध और गिल्ट हो, उतना ही इनडिसीजन पैदा होता है। चित्त में जितना पाप हो, जितना अपराध हो, उतना चित्त डांवाडोल होता है। पापी का चित्त सर्वाधिक डांवाडोल हो जाता है। अपराधी का चित्त भीतर से भूकंप से भर जाता है।
बड़े मजे की बात है कि कृष्ण से पूछा है अर्जुन ने, कोई निश्चित बात कहें। कृष्ण जो उत्तर देते हैं, वह बहुत और है। वे निश्चित बात का उत्तर नहीं दे रहे हैं। वे पहले अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वह भीतर निश्चित हो पाए। वे उससे कहते हैं, निष्पाप अर्जुन!
यह भी समझ लेने जैसा है कि पाप कम सताता है; पाप किया मैंने, यह ज्यादा सताता है। इसलिए जीसस ने रिपेंटेंस और प्रायश्चित्त की एक बड़ी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया निकाली और कहा कि अपने अपराध को और पाप को जो स्वीकार कर ले, वह पाप से मुक्त हो जाता है। सिर्फ स्वीकार करने से!
पाप के साथ एक मजा है कि पाप को हम छिपाना चाहते हैं। अगर इसे और ठीक से समझें, तो कहना होगा कि जिसे हम छिपाना चाहते हैं, वह पाप है। इसलिए जिसे हम प्रकट कर दें, वह पाप नहीं रह जाता। जिसे हम घोषित कर दें, वह पाप नहीं रह जाता।
जीसस ने एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया ईसाइयत को दी और वह यह कि अपने पाप को स्वीकार कर लो और तुम पाप से मुक्त हो जाओगे। ऐसी और भी प्रक्रियाएं सारी पृथ्वी पर पैदा हुईं, जिनमें यही किया गया कि व्यक्ति को आश्वासन दिलाया गया कि अब तुम निष्पाप हो। और अगर व्यक्ति को यह भरोसा आ जाए कि वह निष्पाप है, तो उसके भविष्य में पाप करने की क्षमता क्षीण होती है।
यह भी बहुत मजे की बात है कि हम वही करते हैं, जो हमारी अपने बाबत इमेज होती है। अगर एक आदमी को पक्का ही पता है कि वह चोर है, तो उसे चोरी से बचाना बहुत मुश्किल है। वह चोरी करेगा ही। वह अपनी प्रतिमा को ही जानता है कि वह चोर की प्रतिमा है, और तो कुछ उससे हो भी नहीं सकता। इसलिए अगर हम एक आदमी को चारों तरफ से सुझाव देते रहें कि तुम चोर हो, तो हम अचोर को भी चोर बना सकते हैं।
इससे उलटा भी संभव है, घटित होता है। अगर हम चोर को भी सुझाव दें चारों तरफ से कि तुम चोर नहीं हो, तो हम उसे चोर होने में कठिनाई पैदा करते हैं। अगर दस भले आदमी एक बुरे आदमी को भला मान लें, तो उस बुरे आदमी को भले होने की सुविधा और मार्ग मिल जाता है।
इसलिए सारी दुनिया में धर्मों ने बहुत-बहुत रूप विकसित किए थे। सब रूप विकृत हो जाते हैं, लेकिन इससे उनका मौलिक सत्य नष्ट नहीं होता।
हम इस देश में कहते थे कि गंगा में स्नान कर आओ, पाप धुल जाएंगे। गंगा में कोई पाप नहीं धुल सकते। गंगा के पानी में पाप धोने की कोई कीमिया, कोई केमिस्ट्री नहीं है। लेकिन एक साइकोलाजिकल सत्य है कि अगर कोई आदमी पूरे भरोसे और निष्ठा से गंगा में नहाकर अनुभव करे कि मैं निष्पाप हुआ, तो लौटकर पाप करना मुश्किल हो जाएगा। डिसकंटिन्युटी हो गई। वह जो कल तक पापी था, गंगा में नहाकर बाहर निकला और अब वह दूसरा आदमी है, आइडेंटिटी टूटी। संभावना है कि उसको निष्पाप होने का यह जो क्षण भर को भी बोध हुआ है.।
गंगा कुछ भी नहीं करती। लेकिन अगर पूरे मुल्क के कलेक्टिव माइंड में, अगर पूरे मुल्क के अचेतन मन में यह भाव हो कि गंगा में नहाने से पाप धुलता है, तो गंगा में नहाने वाला निष्पाप होने के भाव को उपलब्ध होता है। और निष्पाप होने का भाव निश्चय में ले जाता है, पापी होने का भाव अनिश्चय में ले जाता है।
इसलिए अर्जुन तो पूछता है कि कृष्ण, कुछ ऐसी बात कहो, जो निश्चित हो और जिससे मेरा डांवाडोलपन मिट जाए। लेकिन कृष्ण कहां से शुरू करते हैं, वह देखने लायक है। कृष्ण कहते हैं, हे निष्पाप अर्जुन!
कृष्ण जैसे व्यक्ति के मुंह से जब अर्जुन ने सुना होगा, हे निष्पाप अर्जुन! तो गंगा में नहा गया होगा। सारी गंगा उसके ऊपर गिर पड़ी होगी, जब उसने कृष्ण की आंखों में झांका होगा और देखा होगा कि कृष्ण कहते हैं, हे निष्पाप अर्जुन! और कृष्ण जैसे व्यक्ति जब किसी को ऐसी बात कहते हैं, तो सिर्फ शब्द से नहीं कहते; खयाल रखें! उनका सब कुछ कहता है। उनका रोआं-रोआं, उनकी आंख, उनकी श्वास, उनका होना--उनका सब कुछ कहता है, हे निष्पाप अर्जुन!
जब कृष्ण की उस गंगा में अर्जुन को निष्पाप होने का क्षण भर को बोध हुआ होगा। तो जो निश्चय कृष्ण के कोई वचन नहीं दे सकते, वह अर्जुन को निष्पाप होने से मिला होगा।
इसलिए कृष्ण पहले उसे मनोवैज्ञानिक रूप से उसके भीतर के आंदोलन से मुक्त करते हैं। कहते हैं, हे निष्पाप अर्जुन! और मजे की बात यह है कि यह कहकर, फिर वे वही कहते हैं कि दो निष्ठाएं हैं। वह कह चुके हैं। वह दूसरे अध्याय में कह चुके हैं। लेकिन तब तक अर्जुन को निष्पाप उन्होंने नहीं कहा था। अर्जुन डांवाडोल था। अब वे फिर कहते हैं कि दो तरह की निष्ठाएं हैं अर्जुन! सांख्य की और योग की, कर्म की और ज्ञान की।
एकदम तत्काल! कृष्ण ने तीन बार नहीं कहा कि हे निष्पाप अर्जुन, हे निष्पाप अर्जुन, हे निष्पाप अर्जुन। नियम यही था। नियम यही था। अदालत में शपथ लेते हैं तो तीन बार। इमाइल कुए है फ्रांस में; अगर वह सुझाव देता है, तो तीन बार। दुनिया के किसी भी सम्मोहनशास्त्री और मनोवैज्ञानिक से पूछें, तो वह कहेगा कि जितनी बार सुझाव दो, उतना गहरा परिणाम होगा। कृष्ण कुछ ज्यादा जानते हैं। कृष्ण कहते हैं एक बार, और छोड़ देते हैं। क्योंकि दुबारा कहने का मतलब है, पहली बार कही गई बात झूठ थी क्या!
जब अदालत में एक आदमी कहता है कि मैं परमात्मा की कसम खाकर कहता हूं कि सच बोलूंगा; और फिर दुबारा कहता है कि मैं परमात्मा की कसम खाकर कहता हूं कि सच बोलूंगा; तो पहली बात का क्या हुआ! और जिसकी पहली बात झूठ थी, उसकी दूसरी बात का कोई भरोसा है? वह तीन बार भी कहेगा, तो क्या होगा?
कृष्ण कुए से ज्यादा जानते हैं। कृष्ण एक बार कहते हैं इनोसेंटली--जैसे कि जानकर कहा ही नहीं--हे निष्पाप अर्जुन! और बात छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं; एक क्षण ठहरते भी नहीं। शक का मौका भी नहीं देते, हेजिटेशन का मौका भी नहीं देते, अर्जुन को विचारने का भी मौका नहीं देते। ऐसा भी नहीं लगता अर्जुन को कि उन्होंने कोई जानकर चेष्टा से कहा हो। बस, ऐसे संबोधन किया और आगे बढ़ गए।
असल में उसका निष्पाप होना, कृष्ण ऐसा मान रहे हैं, जैसे कोई बात ही नहीं है। जैसे उन्होंने कहा हो, हे अर्जुन! और बस, ऐसे ही चुपचाप आगे बढ़ गए। जितना साइलेंट सजेशन, उतना गहरा जाता है। जितना चुप, जितना इनडायरेक्ट, जितना परोक्ष--चुपचाप भीतर सरक जाता है। जितनी तीव्रता से, जितनी चेष्टा से, जितना आग्रहपूर्वक--उतना ही व्यर्थ हो जाता है।
पश्चिम के मनोविज्ञान को बहुत कुछ सीखना है। कुए जब अपने मरीज को कहता है कि तुम बीमार नहीं हो, और जब दुबारा कहता है कि तुम बीमार नहीं हो, और जब तिबारा कहता है कि तुम बीमार नहीं हो, तो कृष्ण उस पर हंसेंगे। वे कहेंगे कि तुम तीन बार कहते हो, तो तीन बार तुम उसे याद दिलाते हो कि बीमार हो, बीमार हो, बीमार हो।
हे निष्पाप अर्जुन! आगे बढ़ गए वे और कहा कि दो निष्ठाएं हैं। अर्जुन को मौका भी नहीं दिया कि सोचे-विचारे, पूछे कि कैसा निष्पाप? क्यों कहा निष्पाप? मुझ पापी को क्यों कहते हैं? कोई मौका नहीं दिया। बात आई और गई, और अर्जुन के मन में सरक गई।
ध्यान रहे, जैसे ही चित्त सोचने लगता है, वैसे ही बात गहरी नहीं जाती है। चित्त ने सोचा, उसका मतलब है कि हुक्स में अटक गई। चित्त ने सोचा, उसका मतलब है कि ऊपर-ऊपर रह गई, लहरों में जकड़ गई--गहरे में कहां जाएगी! विचार तो लहर है। सिर्फ वे ही बातें गहरे में जाती हैं, जो बिना सोचे उतर जाती हैं। इसलिए सोचने का जरा भी मौका नहीं है। और सोचने का मौका दूसरी बात में है, ताकि इसमें सोचा ही न जा सके।
वे कहते हैं, दो निष्ठाएं हैं। एक निष्ठा है ज्ञान की, एक निष्ठा है कर्म की।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।। 4।।
मनुष्य न तो कर्मों के न करने से निष्कर्मता को प्राप्त होता है और न कर्मों को त्यागने मात्र से भगवत् साक्षात्कार रूप सिद्धि को प्राप्त होता है।
कर्मों के न करने से निष्कर्म को मनुष्य प्राप्त नहीं होता है और न ही सब कुछ छोड़कर भाग जाने से भगवत् साक्षात्कार को उपलब्ध होता है।
बड़े ही विद्रोही और क्रांतिकारी शब्द हैं। क्या होगा त्यागियों का! क्या होगा भागने वालों का?
कृष्ण कहते हैं, मात्र कर्म को छोड़कर भाग जाने से कोई निष्कर्म को उपलब्ध नहीं होता। क्योंकि निष्कर्म कर्म के अभाव से ज्यादा बड़ी बात है। मात्र कर्म का न होना निष्कर्म नहीं है। निष्कर्म और भी बड़ी घटना है।
जैसे कि बीमारी का न होना स्वास्थ्य नहीं है; स्वास्थ्य और बड़ी घटना है। ऐसा हो सकता है कि आदमी बिलकुल बीमार न हो और बिलकुल स्वस्थ न हो। सब तरह की जांच-परख कहे कि कोई बीमारी नहीं है और आदमी बिलकुल ही स्वस्थ न हो। बीमारी का न होना मात्र, स्वास्थ्य नहीं है। और मात्र कर्मों को छोड़कर भाग जाने से निष्कर्म उपलब्ध नहीं होता। क्यों?
तो निष्कर्म की व्याख्या कृष्ण की समझनी पड़ेगी। क्योंकि आमतौर से हम अब तक कर्म के न करने को निष्कर्म समझते रहे हैं; निष्क्रियता को निष्कर्म समझा है। निष्क्रियता निष्कर्म नहीं है। तब तो आलसी भी निष्कर्म को उपलब्ध हो जाएंगे। तब तो मुरदे भी निष्कर्म को उपलब्ध हो जाएंगे। तब तो पत्थर इत्यादि परमात्म- साक्षात्कार में ही होंगे।
निष्कर्म नहीं, लेकिन कर्म कर्तारहित निष्कर्म बनता है। कर्म, जहां भीतर करने वाला मैं मौजूद नहीं है, निष्कर्म बनता है। निष्कर्म कर्म का अभाव नहीं, कर्ता का अभाव है--नाट एब्सेंस आफ डूइंग, बट एब्सेंस आफ दि डुअर, वह जो करने वाला है।
कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन से कि अगर तू यह छोड़ दे कि तू कर रहा है, तो तेरा कोई कर्म कर्म नहीं है, सब निष्कर्म हो जाता है। अगर तू यह पकड़े रहे कि मैं कर रहा हूं, तो तू कर्म से भाग भी जा, तो भागना भी तेरा कर्म बन जाता है।
भागना भी कर्म है, भागना भी तो पड़ेगा। त्यागना भी तो कर्म है, त्यागना भी तो पड़ेगा। जहां कर्ता मौजूद है, जहां लग रहा है कि मैं कर रहा हूं, वहां कर्म मौजूद है, चाहे वह करना आलस्य ही क्यों न हो, चाहे वह करना न-करना ही क्यों न हो। लेकिन जहां लग रहा है कि मेरे करने का कोई सवाल ही नहीं, परमात्मा कर रहा है; जो है, वह कर रहा है, सारा जीवन कर रहा है; जहां मैं एक हवा में डोलते हुए पत्ते की तरह हूं, जहां मैं नहीं डोल रहा, हवा डोल रही है; जहां मैं एक सागर की लहर की तरह हूं, मैं नहीं लहरा रहा, सागर लहरा रहा है; जहां मेरा मैं नहीं--वहां निष्कर्म है। निष्क्रियता नहीं, निष्कर्म।
कर्म होगा, फिर भी कर्म का जो उत्पात है, वह नहीं होगा। कर्म होगा, लेकिन कर्म की जो चिंता और संताप है, वह नहीं होगा। कर्म होगा, लेकिन कर्म के साथ जो विफलता और सफलता का रोग है, वह नहीं होगा। कर्म होगा, लेकिन कर्म के पीछे वह जो महत्वाकांक्षा का ज्वर है, बुखार है, वह नहीं होगा। कर्म होगा, लेकिन कर्म के पीछे वह जो फलाकांक्षा की विक्षिप्तता है, वह नहीं होगी। और तब कर्म फूल की तरह आनंददायी हो जाता है; तब उस पर कोई वजन नहीं रह जाता; तब कर्म फूल की तरह खिलता है। तब करने वाला मौजूद नहीं होता; तब कर्म का आनंद ही और हो जाता है; तब वह परमात्मा को समर्पित हो जाता है।
कृष्ण कह रहे हैं कि कर्म को छोड़कर तू अगर भाग गया, तो तू यह मत समझना कि तू निष्कर्म को उपलब्ध हो गया है। क्योंकि जो निष्कर्म को उपलब्ध होता है, वह कर्म को छोड़कर क्यों भागेगा! वह स्वीकार कर लेगा, जो नियति है, जो डेस्टिनी है, जो हो रहा है, उसे स्वीकार कर लेगा।
दूसरी बात वे कहते हैं कि चीजों को त्यागकर, छोड़कर कोई अगर सोचता हो कि संसार को त्यागकर परमात्मा का साक्षात्कार हो जाए, तो जरूरी नहीं है। ऐसा नहीं होता है। परमात्मा का साक्षात्कार किसी भी सौदे से नहीं होता है। कि आपने ये-ये चीजें छोड़ दीं, तो परमात्मा का साक्षात्कार हो जाएगा।
एक संन्यासी मेरे पास आए थे। वे कहने लगे कि मैंने घर छोड़ दिया, पत्नी छोड़ दी, बच्चे छोड़ दिए, दुकान छोड़ दी, अभी तक परमात्मा का साक्षात्कार क्यों नहीं हुआ है? तो मैंने कहा, कितनी कीमत थी मकान की, दुकान की, पत्नी की, बच्चों की? हिसाब है? तो उन्होंने कहा, आपका मतलब? मैंने कहा कि पक्का हो जाए कि कितने मूल्य की चीजें छोड़ी हैं, तो फिर परमात्मा के सामने शिकायत की जाए कि यह आदमी इतने दाम लग रहा है तुम्हारे लिए और तुम अभी तक छिपे हो! इसने एक मकान छोड़ दिया। मकान के बदले में परमात्मा?
असल में जहां भी बदले का खयाल है, वहां व्यवसाय है, वहां धर्म नहीं है। त्यागी कहता है, मैंने यह छोड़ दिया और अभी तक नहीं हुआ! लेकिन तुमसे कहा किसने कि छोड़ने से हो जाएगा! और जो तुमने छोड़ दिया है, उसका मूल्य क्या है? और कल जब मौत आएगी, तब तुम क्या करोगे? उसे छोड़ोगे कि पकड़े लिए चले जाओगे? मौत आएगी तो वह छूट जाएगा। और तुम नहीं थे, तब भी वह था। और तुम नहीं रहोगे, तब भी वह होगा। तो तुम अपने को छोड़ने वाला समझ रहे हो! जो तुम्हारे होने के पहले था और तुम्हारे होने के बाद रहेगा, उसे तुम छोड़ सकते हो? उसकी मालकियत पागलपन है। और ध्यान रहे, त्याग में भी मालकियत का खयाल है। और जब एक आदमी कहता है, मैंने त्यागा, तो वह यह कह रहा है कि मालकियत मेरी थी। सच बात यह है, मालकियत नहीं है। त्यागेंगे कैसे?
कृष्ण कहते हैं, कुछ त्याग देने से परमात्मा का साक्षात्कार नहीं हो जाता।
परमात्मा का साक्षात्कार बात ही अलग है। वह त्याग से फलित नहीं होती है। हां, ऐसा हो सकता है कि परमात्मा के साक्षात्कार से त्याग फलित हो जाए। ऐसा होता है। क्योंकि जब कोई उस विराट को जान लेता है, तो क्षुद्र को पकड़ने को राजी नहीं रहता। जब किसी को हीरे मिल जाते हैं, तो कंकड़-पत्थर छोड़ता है। त्याग से परमात्मा मिलता है, ऐसा नहीं; लेकिन परमात्मा से अक्सर त्याग फलित होता है। क्योंकि परमात्मा महाभोग है, वह परम रस है।
कृष्ण यहां एक बहुत ही कैटेगोरिकल वक्तव्य, एक बहुत निश्चयात्मक वक्तव्य दे रहे हैं। वह वक्तव्य बहुत कीमती है। उस वक्तव्य पर पूरे जीवन का यहां से वहां होना निर्भर है। वह वक्तव्य यह है कि कर्म नहीं छोड़ना है। छोड़ा भी नहीं जा सकता। जीते-जी कर्म को छोड़ने का कोई उपाय भी नहीं है।
संन्यासी भी कर्म करेगा ही! दुकान नहीं चलाएगा, तो भीख मांगेगा। फर्क क्या पड़ता है? भीख मांगना कोई कम कर्म है दुकान करने से? उतना ही कर्म है। घर नहीं बनाएगा, आश्रम बनाएगा। घर छोड़कर आश्रम बनाना कोई कम कर्म है? उतना ही कर्म है।
कर्म से भागा नहीं जा सकता। जब कर्म से भागा ही नहीं जा सकता, तो कर्म से भागना सिर्फ हिपोक्रेसी में ले जाएगा, पाखंड में ले जाएगा। जो असंभव है, उसे करने की कोशिश पाखंड पैदा करती है। अगर अर्जुन भाग भी जाए युद्ध के मैदान को छोड़कर, तो करेगा क्या? कुछ तो करेगा। वह जो भी करेगा, वह भी कर्म है। कर्म से नहीं भागा जा सकता। तो फिर क्या कोई उपाय नहीं है?
कृष्ण एक नया द्वार, एक नया डायमेंशन, एक नया आयाम खोलते हैं। वे कहते हैं, कर्म जारी रखो, कर्ता से भाग जाओ। कृष्ण मनुष्य के व्यक्तित्व में बड़ी गहरी क्रांति की बात कहते हैं। वे कहते हैं, कर्म जारी रखो। वह असंभव है, उससे जाया नहीं जा सकता; लेकिन कर्ता से जाया जा सकता है। कर्म को चलने दो, कर्ता को जाने दो। भीतर से कर्ता को छोड़ो, यह छोड़ो कि मैं कर रहा हूं।
इसलिए कृष्ण बार-बार गीता में अर्जुन को कहते हैं कि जिन्हें तू सोचता है कि तू मारेगा, मैं तुझे कहता हूं कि वे पहले ही मारे जा चुके हैं। जिन्हें तू सोचता है कि तेरे कारण मरेंगे, तू नासमझ है, तू मात्र निमित्त है, वे तेरे बिना भी मरेंगे। पूरे समय वे यह कह रहे हैं कि तू एक खयाल छोड़ दे कि तू करने वाला है। और अर्जुन की परेशानी यही है, उसे लग रहा है कि करने वाला मैं हूं। अगर मैं भाग जाऊं, तो युद्ध बच जाए।
यह जरूरी नहीं है। अर्जुन अकेला नहीं है। अर्जुन के भागने से भी युद्ध बच जाएगा, यह जरूरी नहीं है। युद्ध अनंत कारणों पर निर्भर है।
लोग सोचते थे कि पहला महायुद्ध हो गया, अब दूसरा महायुद्ध नहीं होगा। दूसरा भी हो गया। फिर दूसरे के बाद लोग सोचने लगे, अब तीसरा नहीं होगा। क्योंकि अब तो हिटलर भी मर गया, अब तो मुसोलिनी भी नहीं है, अब तीसरा किसलिए होगा? लेकिन क्या फर्क पड़ता है! माओ को पैदा होने से कैसे रोकिएगा? और नामों से फर्क पड़ता है! कोई फर्क नहीं पड़ता। नहीं हिटलर, तो माओ होगा। नहीं माओ, तो कोई और होगा। नहीं कोई और, तो कोई अ ब स होगा।
युद्ध इतना विराट जाल है कि वह कोई अर्जुन यह सोचता हो कि मेरे भाग जाने से हट जाएगा, तो बहुत ही ईगोइस्ट है, बहुत अहंकारी है। सोच रहा है, मेरी वजह से ही यह इतना बड़ा विराट युद्ध हो रहा है!
सभी को ऐसा खयाल होता है कि सारी दुनिया उन्हीं के कारण चल रही है। सबको यह खयाल होता है। छोटों को, बड़ों को; अनुयायियों को, नेताओं को--सबको यह खयाल होता है कि उनसे ही सारी दुनिया चल रही है। वे गए कि एकदम से सब चला जाएगा। लेकिन नेपोलियन चला जाता है, कहीं कोई पत्थर नहीं हिलता। सिकंदर चले जाते हैं, किसी पत्ते को खबर नहीं होती है। हिटलर आते हैं, चले जाते हैं; चर्चिल, गांधी, नेहरू, सब आते हैं, खो जाते हैं; जगत चलता चला जाता है।
कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि तू यह पागलपन छोड़ कि तेरी वजह से कुछ हो रहा है। वजह बड़ी है। विराट है जाल उसका। उस विराट जाल को ही नियति कहते हैं, डेस्टिनी कहते हैं। जो एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है। अनंत-अनंत कारणों के जाल पर जो निर्भर है। उससे हो रहा है। इसलिए तू यह पागलपन छोड़ कि तेरे हट जाने से कोई युद्ध नहीं होगा, कि तेरे होने से युद्ध हो रहा है। तू नहीं भी हो, तो भी हो जाएगा। क्योंकि तू बहुत छोटा पुर्जा है। तेरे बिना हो सकता है। शायद पुर्जा भी नहीं है। क्योंकि जिसने तुझे पुर्जा चुना है, वह किसी दूसरे को भी पुर्जा चुन सकता है। और तुझसे तो पूछकर चुना नहीं है उसने, दूसरे को भी बिना पूछे चुन लेगा।
कर्ता होने का खयाल अगर गिर जाए और व्यक्ति देखे कि अनंत नियमों के जाल में जीवन चलता है। एक धारा है, जो बही जा रही है; उसमें हम तिनकों-से बहते हैं--तिनके। हम बहते हैं, यह कहना भी शायद ठीक नहीं। धारा बहती है। हम तो तिनके हैं, हम क्या खाक बहते हैं! धारा बहती है, हम सिर्फ धारा में होते हैं। धारा पूरब बहती है, तो हम पूरब बहते हैं; धारा पश्चिम बहती है, तो हम पश्चिम बहते हैं।
कृष्ण का सारा जोर इस बात पर है कि तू यह भूल जा कि तू करने वाला है और फिर कर्म को होने दे; और फिर मैं तुझे विश्वास दिलाता हूं कि फिर कोई कर्म नहीं छूता।
पाप नहीं छूता, पाप का कर्ता होना छूता है। पुण्य नहीं छूता, पुण्य का कर्ता होना छूता है। अगर ठीक से समझें, आध्यात्मिक अर्थों में समझें, तो करने का खयाल एकमात्र पाप है। कर्ता का बोध एकमात्र पाप है। ओरिजिनल सिन अगर किसी चीज को कहें, मूल पाप, तो कर्ता का खयाल कि मैं कर रहा हूं।
लेकिन सोचने जैसा है। इधर कृष्ण तो कहते हैं अर्जुन को कि कर्ता एक ही है, परमात्मा। तू छोड़। अठारहवीं सदी के बाद सारी दुनिया में हमने परमात्मा को हटाने की कोशिश की है। कास्मिक आर्डर से, एक जगत की व्यवस्था से हमने कहा कि तुम रिटायर हो जाओ। परमात्मा को कहा कि आप छोड़ो। बहुत दिन हो गए, आप हटो। आदमी को कर्ता बनने दो!
ध्यान रहे, परमात्मा को अगर हम हटा दें जगत के खयाल से--जगत से तो नहीं हटा सकते, अपने खयाल से हटा सकते हैं--हटा दें, तो आदमी कर्ता हो जाता है। क्या आपने कभी यह सोचा कि जिन-जिन समाजों में आदमी कर्ता हो गया और परमात्मा कर्ता नहीं रहा, वहां मानसिक तनाव अपनी अति पर पहुंच गए हैं! वहां चिंता भयंकर हो गई है! वहां चित्त एकदम विक्षिप्त होने की हालत में पहुंच गया है! क्योंकि सारा बोझ मेरे मैं पर पड़ गया है। दुनिया चल रही है मेरे मैं पर; मैं हो गया है सेंटर।
आज पश्चिम की सारी सभ्यता मैं पर खड़ी है। इसलिए बड़ी पीड़ा है। न रात नींद है, न दिन चैन है। कहीं कोई शांति नहीं; कहीं कोई अर्थ नहीं; सब बेबूझ हो गया है। लेकिन एक बात खयाल में नहीं आती है कि जिस दिन से आदमी कर्ता बनने के खयाल में पड़ा है, उस दिन से चिंता उसने पुकार ली है।
अर्जुन भी चिंता में पड़ गया है। चिंता पैदा ही कर्ता होने के खयाल से पैदा होती है; कर्म से चिंता नहीं होती। आप कितना ही कर्म करें, कर्म चिंता नहीं लाता। और जरा-सा भी कर्ता बने कि चिंता आनी शुरू हो जाती है। एंग्जाइटी जो है, वह कर्ता की छाया है। अर्जुन बड़ा चिंतित है। उसकी सारी चिंता एक बात से है कि वह सोच रहा है, मैं मारने वाला हूं, मैं न मारूं तो ये न मरेंगे। मैं अगर युद्ध न करूं, तो युद्ध बंद हो जाएगा, शांति छा जाएगी। उसे ऐसा लग रहा है कि वही निर्णायक है। कोई निर्णायक नहीं है, समष्टि निर्णायक है; नियति निर्णायक है।
इसलिए कृष्ण उसको कहते हैं कि तू कर्ता को छोड़ और कर्म को चलने दे। निष्पाप बताकर उसे, वे जो दूसरी बात कहते हैं, वह निष्पाप में ले जाने वाली है। पहले उसे कहते हैं, तू निष्पाप है। और फिर वे जो दूसरा वक्तव्य देते हैं, वह समस्त पापों के बाहर ले जाने वाला है। वे निष्पाप कहकर चुप नहीं हो जाते, वे निष्पाप बनाने के लिए राह भी देते हैं। आश्वासन देकर मान नहीं लेते कि बात समाप्त हो गई। बात सिर्फ शुरू हुई है। और आदमी पूर्ण निष्पाप उसी दिन होता है, जिस दिन पूर्ण अकर्ता हो जाता है। कर्म नहीं बांधते, कर्ता बांध लेता है। कर्म नहीं छोड़ते, कर्ता छूट जाए तो छूटना हो जाता है।
ठीक उसके साथ ही दूसरी बात उन्होंने कही, त्याग नहीं साक्षात्कार को ले जाता है।
क्यों नहीं ले जाता है त्याग साक्षात्कार को? नहीं ले जाता इसलिए कि हम परमात्मा के सामने सौदे की हालत में खड़े नहीं हो सकते, बारगेनिंग नहीं हो सकती, खरीद-फरोख्त नहीं हो सकती। त्याग नहीं, समर्पण।
इस पर आगे हम बात करेंगे।
त्यागी कभी समर्पित नहीं होता। त्यागी आदमी कभी समर्पण नहीं करता। वह तो कहता है कि मेरे पास कारण है कि मैंने इतना छोड़ा, अब मुझे मिलना चाहिए। समर्पण तो वह करता है, जो कहता है, मेरे पास तो कुछ भी नहीं है, मैं तो कुछ भी नहीं हूं जो दावा कर सकूं कि मुझे मिलना चाहिए। मैं तो सिर्फ प्रार्थना कर सकता हूं, मैं तो सिर्फ चरणों में सिर रख सकता हूं। मेरे पास देने को कुछ भी नहीं है।
समर्पण वह करता है, जिसके खयाल में यह बात आ जाती है कि मैं असहाय हूं, टोटल हेल्पलेस हूं। मैं बिलकुल, मेरे पास कुछ भी नहीं है परमात्मा को देने को। रो सकता हूं, चिल्ला सकता हूं, पुकार सकता हूं; दे तो कुछ भी नहीं सकता। जो इतना दीन, इतना दरिद्र, इतना असहाय, इतना बेसहारा पुकारता है, वह समर्पित हो जाता है, वह साक्षात्कार को उपलब्ध हो जाता है।
त्यागी की तो अकड़ होती है, वह बेसहारा नहीं होता। उसके पास तो बैंक बैलेंस होता है त्याग का। कहता है कि यह मेरे पास है, इतना मैंने छोड़ा है--इतने हाथी, इतने घोड़े, इतने मकान--कहां हो, बाहर निकलो! त्याग पूरा कर दिया है, साक्षात्कार होना चाहिए।
त्यागी के पास तो दंभ होगा ही। त्यागी कभी दंभ के बाहर नहीं हो पाता। हां, उनकी बात दूसरी है, जिनके दंभ के जाने से त्याग फलित होता है। पर उनको त्याग का कभी पता नहीं चलता। उनको पता ही नहीं चलता कि उन्होंने कुछ त्यागा है। अगर आप उनसे कहें कि आपने कुछ त्यागा है? तो वे कहेंगे कि कभी था ही नहीं हमारे पास कुछ, हम त्यागेंगे कैसे! अगर उनसे आप कहें, आपने कुछ छोड़ा है? तो वे कहेंगे, कभी कुछ पकड़ा क्या था? छोड़ेंगे कैसे! खाली हाथ हैं, हमारे पास कुछ है नहीं। हम सिर्फ खाली हाथ ही परमात्मा के चरणों में रखते हैं।
और ध्यान रहे, जो भरे हाथ परमात्मा के सामने जाता है, वह खाली हाथ लौट आता है; और जो खाली हाथ जाता है, उसके हाथ भर दिए जाते हैं।
आज इतना ही। फिर कल हम बात करेंगे।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Do the songs of saints and the words of enlightened masters come from the experience of bliss?
According to Osho, the songs of saints and the words of enlightened ones arise not from an 'experience of bliss' but from bliss itself. Bliss is not an object witnessed; it is our very nature—sat-chit-ananda. When the knower dissolves, only bliss remains, and expression flows spontaneously—whether as silence, song, dance, or stillness—different peripheries, one essence.
In simple terms: Their songs and words come from being pure bliss itself, not from having a blissful feeling—and that being naturally shows up as silence, singing, dancing, or quiet presence.
Did Arjuna attain supreme knowledge while listening to the Gita, or did his practice begin afterward?
According to Osho, Arjuna realized the supreme state while listening to Krishna; no subsequent practice was needed. Doing is an egoic delusion—the Divine is already present; only awakening through right listening is required. When the mind steps aside and one hears without distortion, listening itself is meditation, and realization happens instantly. Practices exist only for those unable to truly listen.
In simple terms: Arjuna woke up just by truly listening to Krishna—you don’t need extra doing; listen so deeply your busy mind steps aside.
Is a Brahmin's consciousness superior to a Shudra's in terms of evolution?
According to Osho, no caste has inherently superior consciousness; superiority arises only when consciousness fully actualizes its own quality through total absorption—meditation—until the doer dissolves. A Brahmin merging with Brahman, a Kshatriya becoming the sword’s flash, a Shudra uniting with labor, or a Vaishya with work can all attain the same samadhi. Superiority depends on meditation, not varna.
In simple terms: No one is born higher; whoever becomes totally one with what they do—thinking, fighting, trading, or working—reaches the same peak.
Does living moment-to-moment lead to awareness of interdependence?
According to Osho, yes: living utterly in the present—free of past memory and future desire—removes the ego’s two supports. In the now, the ego cannot stand, and the One (Brahman) is revealed: life as a single continuum where all beings are waves of the same ocean. From this egoless seeing, awareness of interdependence naturally arises, along with non-egoic, unique individuality.
In simple terms: When you stop clinging to before or after and just be here now, the little ‘me’ fades and you feel we’re all parts of one big life.
Can the state of beholding a chosen deity be considered the state of supreme knowledge?
According to Osho, beholding a chosen deity (Kali, Krishna, Christ, etc.) is not supreme knowledge but the final threshold before it. Here, the world’s multiplicity has collapsed into two—the devotee and God—so duality still persists. Supreme knowledge is nonduality: when both seer and seen, knower and known, dissolve, leaving only pure knowing/awareness. At that point even the deity and the devotee are ‘dropped’—the ladder discarded.
In simple terms: Seeing your favorite god isn’t the final truth; the real end is when both you and the god disappear, and only quiet knowing remains.
Is being attracted to Krishna the same as being free of life’s other attractions?
According to Osho, being drawn to Krishna is not escaping life’s attractions; it is discovering Krishna within them and consecrating them to the Divine. Unlike Mahavira’s renunciation (non-taste), Krishna teaches supreme relish—go so deep that taste becomes Brahman. With right seeing, the world reveals itself as the Divine; thus attraction is transformed, not abandoned.
In simple terms: No—Krishna invites you to look so deeply into what attracts you that it turns into a doorway to God, rather than something to run from.
Can self-confidence and perseverance lead to success in spirituality?
According to Osho, self-confidence and perseverance do not lead to spiritual success because they arise from ego. Worldly success needs ego; spirituality reverses this. Realization comes through surrender: dropping the 'I', trusting the whole, and becoming empty and helpless. When the self disappears, space opens and the divine unfolds within.
In simple terms: No—trying harder and believing in yourself are ego games; in spirituality you relax the 'me,' trust life, and let grace do the work.
What image should we hold in mind during kirtan to achieve concentration?
According to Osho, you should not hold any image to concentrate in kirtan; the goal isn’t concentration but dissolution. Let images arise or fade without grasping, and surrender to absorption—melting like ice into a river—until the ego, thoughts, and even sacred forms dissolve into the formless, the oceanic feeling where only the One remains.
In simple terms: Don’t pick a picture; just sing and let yourself melt into the music until even the idea of “me” disappears into a big peaceful ocean.

Osho's Commentary
जीवन का सत्य कर्म से उपलब्ध है या ज्ञान से? यदि कर्म से उपलब्ध है, तो उसका अर्थ होगा कि वह हमें आज नहीं मिला हुआ है, श्रम करने से कल मिल सकता है। यदि कर्म से उपलब्ध होगा, तो उसका अर्थ है, वह हमारा स्वभाव नहीं है, अर्जित वस्तु है। यदि कर्म से उपलब्ध होगा, तो उसका अर्थ है, उसे हम विश्राम में खो देंगे। जिसे हम कर्म से पाते हैं, उसे निष्कर्म में खोया जा सकता है।
निश्चित ही जीवन का सत्य ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो कर्म करने से मिलेगा। जीवन का सत्य मिला ही हुआ है; उसे हमने कभी खोया नहीं है; उसे हम चाहें तो भी खो नहीं सकते हैं; हमारे प्राणों का प्राण वही है।
फिर हमने खोया क्या है? हमने सिर्फ उसकी स्मृति खोई है, उसकी सुरति खोई है। हम केवल, जो है हमारे पास मौजूद, उसे जान नहीं पा रहे हैं। हमारी आंख बंद है; रोशनी मौजूद है। हमारे द्वार बंद हैं; सूरज मौजूद है। सूरज को पाने नहीं जाना; द्वार खोले, सूरज मिला ही हुआ है।
कृष्ण ने अर्जुन को इस सूत्र के पहले सांख्ययोग की बात कही है। कृष्ण ने कहा, जो पाने जैसा है, वह मिला ही हुआ है। जो जानने जैसा है, वह निकट से भी निकट है। उसे हमने कभी खोया नहीं है। वह हमारा स्वरूप है। तो अर्जुन पूछ रहा है, यदि जो जानने योग्य है, जो पाने योग्य है, वह मिला ही हुआ है और यदि जीवन की मुक्ति और जीवन का आनंद मात्र ज्ञान पर निर्भर है, तो मुझ गरीब को इस महाकर्म में क्यों धक्का दे रहे हैं!
कृष्ण ने सांख्य की जो दृष्टि समझाई है, अर्जुन उस सांख्य की दृष्टि पर नया प्रश्न खड़ा कर रहा है। दो शब्द सांख्य की दृष्टि को समझ लेने के लिए जरूरी हैं।
दुनिया में, सारे जगत में मनुष्य जाति ने जितना चिंतन किया है, उसे दो धाराओं में बांटा जा सकता है। सच तो यह है कि बस दो ही प्रकार के चिंतन पृथ्वी पर हुए हैं, शेष सारे चिंतन कहीं न कहीं उन दो श्रृंखलाओं से बंध जाते हैं। एक चिंतन का नाम है सांख्य; और दूसरे चिंतन का नाम है योग। बस, दो ही सिस्टम्स हैं सारे जगत में। जिन्होंने सांख्य का और योग का नाम भी नहीं सुना है--चाहे अरस्तू, चाहे सुकरात, चाहे अब्राहिम, चाहे इजेकइल, चाहे लाओत्से, चाहे कनफ्यूसियस--जिन्हें सांख्य और योग के नाम का भी कोई पता नहीं है, वे भी इन दो में से किसी एक में ही खड़े होंगे। बस, दो ही तरह की निष्ठाएं हो सकती हैं।
सांख्य की निष्ठा है कि सत्य सिर्फ ज्ञान से ही जाना जा सकता है, कुछ और करना जरूरी नहीं है। कृत्य की, कर्म की कोई भी आवश्यकता नहीं है। प्रयास की, प्रयत्न की, श्रम की, साधना की कोई भी जरूरत नहीं है। क्योंकि जो भी खोया है हमने, वह खोया नहीं, केवल स्मृति खो गई है। याद पर्याप्त है, रिमेंबरिंग पर्याप्त है--करने का कोई भी सवाल नहीं है।
योग की मान्यता है, बिना किए कुछ भी नहीं हो सकेगा। साधना के बिना नहीं पहुंचा जा सकता है। क्योंकि योग का कहना है: अज्ञान को भी काटना पड़ेगा; उसके काटने में भी श्रम करना होगा। अज्ञान कुछ ऐसा नहीं है जैसा अंधेरा है कि दीया जलाया और अज्ञान चला गया। अंधेरा कुछ ऐसा है, जैसे एक आदमी जंजीरों से बंधा पड़ा है। माना कि स्वतंत्रता उसका स्वभाव है, लेकिन जंजीरें काटे बिना स्वतंत्रता के स्मरण मात्र से वह मुक्त नहीं हो सकता है।
सांख्य मानता है: अज्ञान अंधेरे की भांति है, जंजीरों की भांति नहीं। इसलिए दीया जलाया कि अंधेरा गया। ज्ञान हुआ कि अज्ञान गया। योग कहता है: अज्ञान का भी अस्तित्व है, उसे भी काटना पड़ेगा।
दो तरह की निष्ठाएं हैं जगत में--सांख्य की और योग की।
कृष्ण ने दूसरे अध्याय में अर्जुन को सांख्य की निष्ठा के संबंध में बताया है। उन्होंने कहा है, ज्ञान पर्याप्त है, ज्ञान परम है, अल्टिमेट है।
साक्रेटीज ने ठीक ऐसी ही बात यूनान में कही है। साक्रेटीज को हम पश्चिम में सांख्य का व्यवस्थापक कह सकते हैं। साक्रेटीज ने कहा है: ज्ञान ही चरित्र है। कुछ और करना नहीं है, जान लेना काफी है। जो हम जान लेते हैं, उससे हम मुक्त हो जाते हैं।
कृष्णमूर्ति जो भी कहते हैं, वह सांख्य की निष्ठा है। वह निष्ठा यह है कि जानना काफी है। टु नो दि फाल्स एज़ फाल्स इज़ इनफ, गलत को गलत जान लेना काफी है, फिर कुछ और करना नहीं पड़ेगा, वह तत्काल गिर जाएगा।
कुंदकुंद ने समयसार में जो कहा है, वह सांख्य की निष्ठा है। ज्ञान अपने आप में पूर्ण है; किसी कर्म की कोई जरूरत नहीं है।
अर्जुन पूछ रहा है कि यदि ऐसा है कि ज्ञान काफी है, तो मुझे इस भयंकर युद्ध के कर्म में उतरने के लिए आप क्यों कहते हैं? तो मैं जाऊं, कर्म को छोडूं और ज्ञान में लीन हो जाऊं! यदि ज्ञान ही पाने जैसा है, तो फिर मुझे ज्ञान के मार्ग पर ही जाने दें।
अर्जुन भागना चाहता है। और यह बात समझ लेनी जरूरी है कि हम अपने प्रत्येक काम के लिए तर्क जुटा लेते हैं। अर्जुन को ज्ञान से कोई भी प्रयोजन नहीं है। अर्जुन को सांख्य से कोई भी प्रयोजन नहीं है। अर्जुन को आत्मज्ञान की कोई अभी जिज्ञासा पैदा नहीं हो गई है। अर्जुन को प्रयोजन इतनी सी ही बात से है कि सामने वह जो युद्ध का विस्तार दिखाई पड़ रहा है, उससे वह भयभीत हो गया है, वह डर गया है। लेकिन वह यह स्वीकार करने को राजी नहीं कि मैं भय के कारण हटना चाहता हूं।
हममें से कोई भी कभी स्वीकार नहीं करता कि हम भय के कारण हटते हैं। अगर हम भय के कारण भी हटते हैं, तो हम और कारण खोजकर रेशनलाइजेशन करते हैं। अगर हम भय के कारण भी भागते हैं, तो हम यह मानने को कभी राजी नहीं होते कि हम भय के कारण भाग रहे हैं। हम कुछ और कारण खोज लेते हैं।
अर्जुन कह रहा है, यदि ज्ञान बिना कर्म के मिलता है, तो मुझे फिर कर्म में धक्का क्यों देते हैं?
ज्ञान पाने के लिए अगर अर्जुन यह कहे, तो कृष्ण पहले आदमी होंगे, जो उससे राजी हो जाएंगे। लेकिन वह फाल्स जस्टीफिकेशन, एक झूठा तर्क खोज रहा है। वह कह रहा है कि मुझे भागना है, मुझे निष्क्रिय होना है। और आप कहते हैं कि ज्ञान ही काफी है, तो कृपा करके मुझे कर्म से भाग जाने दें। उसका जोर कर्म से भागने में है, उसका जोर ज्ञान को पाने में नहीं है। यह फर्क समझ लेना एकदम जरूरी है, क्योंकि उससे ही कृष्ण जो कहेंगे आगे, वह समझा जा सकता है।
अर्जुन का जोर इस बात पर नहीं है कि ज्ञान पा ले; अर्जुन का जोर इस बात पर है कि इस कर्म से कैसे बच जाए। अगर सांख्य कहता है कि कर्म बेकार है, तो अर्जुन कहता है कि सांख्य ठीक है, मुझे जाने दो। सांख्य ठीक है, इसलिए अर्जुन नहीं भागता है। अर्जुन को भागना है, इसलिए सांख्य ठीक मालूम पड़ता है। और इसे, इसे अपने मन में भी थोड़ा सोच लेना आवश्यक है।
हम भी जिंदगी भर यही करते हैं। जो हमें ठीक मालूम पड़ता है, वह ठीक होता है इसलिए मालूम पड़ता है? सौ में निन्यानबे मौके पर, जो हमें करना है, हम उसे ठीक बना लेते हैं। हमें हत्या करनी है, तो हम हत्या को भी ठीक बना लेते हैं। हमें चोरी करनी है, तो हम चोरी को भी ठीक बना लेते हैं। हमें बेईमानी करनी है, तो हम बेईमानी को भी ठीक बना लेते हैं। हमें जो करना है, वह पहले है, और हमारे तर्क केवल हमारे करने के लिए सहारे बनते हैं।
फ्रायड ने अभी इस सत्य को बहुत ही प्रगाढ़ रूप से स्पष्ट किया है। फ्रायड का कहना है कि आदमी में इच्छा पहले है और तर्क सदा पीछे है; वासना पहले है, दर्शन पीछे है। इसलिए वह जो करना चाहता है, उसके लिए तर्क खोज लेता है। अगर उसे शोषण करना है, तो वह उसके लिए तर्क खोज लेगा। अगर उसे स्वच्छंदता चाहिए, तो वह उसके लिए तर्क खोज लेगा। अगर अनैतिकता चाहिए, तो वह उसके लिए तर्क खोज लेगा। आदमी की वासना पहले है और तर्क केवल वासना को मजबूत करने का, स्वयं के ही सामने वासना को सिद्ध, तर्कयुक्त करने का काम करता है।
इसलिए फ्रायड ने कहा है कि आदमी रेशनल नहीं है। आदमी बुद्धिमान है नहीं, सिर्फ दिखाई पड़ता है। आदमी उतना ही बुद्धिहीन है, जितने पशु। फर्क इतना है कि पशु अपनी बुद्धिहीनता के लिए किसी फिलासफी का आवरण नहीं लेते। पशु अपनी बुद्धिमानी को सिद्ध करने के लिए कोई प्रयास नहीं करते। वे अपनी बुद्धिहीनता में जीते हैं और बुद्धिमानी का कोई तर्क का जाल खड़ा नहीं करते। आदमी ऐसा पशु है, जो अपनी पशुता के लिए भी परमात्मा तक का सहारा खोजने की कोशिश करता है।
अर्जुन यही कर रहा है। कृष्ण की आंख से बचना मुश्किल है। अन्यथा अगर सांख्य की दृष्टि अर्जुन की समझ में आ जाए कि ज्ञान ही काफी है, तो अर्जुन पूछेगा नहीं कृष्ण से एक भी सवाल। बात खतम हो गई; वह उठेगा, नमस्कार करेगा और कहेगा, जाता हूं।
झेन फकीरों की मोनेस्ट्रीज में, आश्रम में एक छोटा-सा नियम है। जापान में जब भी कोई साधक किसी गुरु के पास ज्ञान सीखने आता है, तो गुरु उसे बैठने के लिए एक चटाई दे देता है। और कहता है, जिस दिन बात तुम्हारी समझ में आ जाए, उस दिन अपनी चटाई को गोल करके दरवाजे से बाहर निकल जाना। तो मैं समझ जाऊंगा, बात समाप्त हो गई। और जब तक समझ में न आए, तब तक तुम बाहर चले जाना, चटाई तुम्हारी यहीं पड़ी रहने देना। रोज लौट आना; अपनी चटाई पर बैठना; पूछना, खोजना। जिस दिन तुम्हें लगे, बात पूरी हो गई, उस दिन धन्यवाद भी मत देना। क्योंकि जिस दिन ज्ञान हो जाता है, कौन किसको धन्यवाद दे! कौन गुरु, कौन शिष्य? और जिस दिन ज्ञान हो जाता है, उस दिन कौन कहे कि मुझे ज्ञान हो गया, क्योंकि मैं भी तो नहीं बचता है। तो उस दिन तुम अपनी चटाई गोल करके चले जाना, तो मैं समझ लूंगा कि बात पूरी हो गई।
अगर अर्जुन को सांख्य समझ में आ गया हो, तो वह चटाई गोल करेगा और चला जाएगा। उसकी समझ में कुछ आया नहीं है। हां, उसे एक बात समझ में आई कि मैं जो एस्केप, जो पलायन करना चाहता हूं, कृष्ण से ही उसकी दलील मिल रही है।
कृष्ण कहते हैं, ज्ञान ही काफी है, ऐसी सांख्य की निष्ठा है। और सांख्य की निष्ठा परम निष्ठा है। श्रेष्ठतम जो मनुष्य सोच सका है आज तक, वे सांख्य के सार सूत्र हैं। क्योंकि ज्ञान अगर सच में ही घटित हो जाए, तो जिंदगी में कुछ भी करने को शेष नहीं रह जाता है; फिर कुछ भी ज्ञान के प्रतिकूल करना असंभव है। लेकिन तब अर्जुन को पूछने की जरूरत न रहेगी; बात समाप्त हो जाती है। लेकिन वह पूछता है कि हे कृष्ण, आप कहते हैं, ज्ञान ही परम है, तो फिर मुझे इस युद्ध की झंझट में, इस कर्म में क्यों डालते हैं? अगर उसे ज्ञान ही हो जाए, तो युद्ध झंझट न होगी।
ज्ञानवान को जगत में कोई भी झंझट नहीं रह जाती। इसका यह मतलब नहीं है कि झंझटें समाप्त हो जाती हैं। इसका मतलब सिर्फ इतना ही है कि ज्ञानवान को झंझट झंझट नहीं, खेल मालूम पड़ने लगती है। अगर उसे ज्ञान हो जाए, तो वह यह न कहेगा कि इस भयंकर कर्म में मुझे क्यों डालते हैं? क्योंकि जिसे अभी कर्म भयंकर दिखाई पड़ रहा है, उसे ज्ञान नहीं हुआ। क्योंकि ज्ञान हो जाए तो कर्म लीला हो जाता है। ज्ञान हो जाए तो कर्म अभिनय, एक्टिंग हो जाता है। वह नहीं हुआ है। इसलिए कृष्ण को गीता आगे जारी रखनी पड़ेगी।
सच तो यह है कि कृष्ण ने जो श्रेष्ठतम है, वह अर्जुन से पहले कहा। इससे बड़ी भ्रांति पैदा हुई है। सबसे पहले कृष्ण ने सांख्य की निष्ठा की बात कही; वह श्रेष्ठतम है। साधारणतः, कोई दूसरा आदमी होता, तो अंत में कहता। दुकानदार अगर कोई होता कृष्ण की जगह, तो जो श्रेष्ठतम है उसके पास, वह अंत में दिखाता। निकृष्ट को बेचने की पहले कोशिश चलती। अंत में, जब निकृष्ट खरीदने को ग्राहक राजी न होता, तो वह श्रेष्ठतम दिखाता।
कृष्ण कोई दुकानदार नहीं हैं, वे कुछ बेच नहीं रहे हैं। वे श्रेष्ठतम अर्जुन से पहले कह देते हैं कि सांख्य की निष्ठा श्रेष्ठतम है, वह मैं तुझे कह देता हूं। अगर उससे बात पूरी हो जाए, तो उसके ऊपर फिर कुछ बात करने को नहीं बचती है।
दूसरेअध्याय पर गीता खतम हो सकती थी, अगर अर्जुन पात्र होता। लेकिन अर्जुन पात्र सिद्ध नहीं हुआ। कृष्ण को श्रेष्ठ से एक कदम नीचे उतरकर बात शुरू करनी पड़ी। अगर श्रेष्ठतम समझ में न आए, तो फिर श्रेष्ठ से नीचे समझाने की वे कोशिश करते हैं। अर्जुन का सवाल बता देता है कि सांख्य उसकी समझ में नहीं पड़ा। क्योंकि समझ के बाद प्रश्न गिर जाते हैं। इसे भी खयाल में ले लें।
आमतौर से हम सोचते हैं कि समझदार को सब उत्तर मिल जाते हैं; गलत है वह बात। समझदार को उत्तर नहीं मिलते, समझदार के प्रश्न गिर जाते हैं। समझदार के पास प्रश्न नहीं बचते। असल में समझदार के पास पूछने वाला ही नहीं बचता है। असल में समझ में कोई प्रश्न ही नहीं है। ज्ञान निष्प्रश्न है, क्योंकि ज्ञान में कोई भी प्रश्न उठता नहीं। ज्ञान मौन और शून्य है, वहां कोई प्रश्न बनता नहीं। ऐसा नहीं कि ज्ञान में सब उत्तर हैं, बल्कि ऐसा कि ज्ञान में कोई प्रश्न नहीं हैं। ज्ञान प्रश्नशून्य है।
अगर सांख्य समझ में आता, तो अर्जुन के प्रश्न गिर जाते। लेकिन वह वापस अपनी जगह फिर खड़ा हो गया है। अब वह सांख्य को ही आधार बनाकर प्रश्न पूछता है। अब ऐसा दिखाने की कोशिश करता है कि सांख्य मेरी समझ में आ गया, तो अब मैं तुमसे कहता हूं कृष्ण, कि मुझे इस भयंकर युद्ध और कर्म में मत डालो। लेकिन उसका भय अपनी जगह खड़ा है। युद्ध से भागने की वृत्ति अपनी जगह खड़ी है। पलायन अपनी जगह खड़ा है। जीवन को गंभीरता से लेने की वृत्ति अपनी जगह खड़ी है।
सांख्य कहेगा कि जीवन को गंभीरता से लेना व्यर्थ है। क्योंकि जो कहेगा कि ज्ञान ही सब कुछ है, उसके लिए कर्म गंभीर नहीं रह जाते, कर्म खेल हो जाते हैं बच्चों के। सांख्य हम सब को, जो कर्म में लीन हैं, जो कर्म में रस से भरे हैं या विरस से भरे हैं, कर्म में भाग रहे हैं या कर्म से भाग रहे हैं--सांख्य की दृष्टि में हम छोटे बच्चों की तरह हैं, जो नदी के किनारे रेत के मकान बना रहे हैं, बड़े कर्म में लीन हैं। और अगर उनके रेत के मकान को धक्का लग जाता है, तो बड़े दुखी और बड़े पीड़ित हैं।
सांख्य कहता है, कर्म स्वप्न से ज्यादा नहीं है। अगर यह समझ में आ जाए, तो कृष्ण के सामने और प्रश्न उठाने की अर्जुन को कोई जरूरत नहीं है। यह समझ में नहीं आया है। फिर भी नासमझी भी समझदारी के प्रश्न खड़े कर सकती है। और अर्जुन वैसा ही प्रश्न खड़ा कर रहा है।