✓ already translated: opens instantly. A new translation takes about a minute and is then saved for everyone.
Questions in this Discourse
ओशो, शुभ क्या है और अशुभ क्या है? फिर शुभाशुभ के पार क्या है?
जैसे, महाभारत युधिष्ठिर को धर्मराज कहता है, और धर्मराज जुआ खेलने में जरा भी संकोच अनुभव नहीं करते। जुआ अनैतिक नहीं था। उन दिनों जुआ नैतिक था। धर्मराज के धर्मराज होने में जुआ खेलने से कोई बाधा नहीं आती। और छोटे-मोटे जुआरी भी न रहे होंगे, सब लगा दिया! सब ही नहीं लगा दिया, पत्नी भी लगा दी! पत्नी कोई संपत्ति नहीं है। पत्नी के पास उतनी ही आत्मा है जितनी पति के पास। किसी को कोई हक नहीं है कि पत्नी को या पति को दांव पर लगा दे। दांव पर लगाने का मतलब है कि पत्नी को बेचने का हक था। इस देश में तो लोग कहते ही हैं--स्त्री-संपत्ति। यह बड़ी अनैतिक बात है--आज। आज धर्मराज को धर्मराज कहना बहुत मुश्किल होगा। अगर धर्मराज धर्मराज हैं तो फिर अधर्मराज कौन है? यह बात ही बेहूदी है, असंस्कृत है। पर उस दिन स्वीकार थी, कोई अड़चन न थी।
आज जो नैतिक है, कल अनैतिक हो जाएगा। नीति बदलती है। इसलिए नीति के साथ शुभ को एक मत समझ लेना। शुभ शाश्वत है। शुभ न हिंदू का, न मुसलमान का, न जैन का, न ईसाई का। शुभ तो परमात्मा से संबंधित होने का नाम है। शुभ सांसारिक धारणा नहीं है, न सामाजिक धारणा है। शुभ तो अंतस-छंद की प्रतीति है। शांडिल्य से पूछो, या अष्टावक्र से, या मुझसे, उत्तर यही होगा कि जिस बात से तुम्हारे भीतर के छंद में सहयोग मिले, वह शुभ। और जिस बात से तुम्हारे भीतर के छंद में बाधा पड़े, वह अशुभ। जिससे तुम्हारा अंतर्संगीत बढ़े, वह शुभ। जिससे तुम्हारा अंतर्संगीत छिन्न-भिन्न हो, खंडित हो, वह अशुभ। जिससे तुम समाधि के करीब आओ, वह शुभ; और जिससे तुम समाधि से दूर जाओ, वह अशुभ। कसौटी भीतर है, कसौटी बाहर नहीं है।
यह बहाना है। मांसाहार करना चाहते होओगे, तो बहाना खोज रहे हो कि मोहम्मद पहुंच गए, तो मैं क्यों नहीं पहुंच जाऊंगा? इस तरह अपने को समझाओ मत। परखो, प्रयोग करो। मैं प्रयोग का पक्षपाती हूं, विश्वास का नहीं। तुम्हारा जीवन ही निर्धारक होगा। तुम अगर पाओ कि मांसाहार करने के बाद चित्त शांत होता है, चित्त में उद्वेग कम हो जाते हैं, क्रोध कम हो जाता है, हिंसा कम हो जाती है, ईर्ष्या कम हो जाती है, अहंकार कम हो जाता है, तो फिक्र छोड़ो महावीरों की और बुद्धों की, तुम मांसाहार करो। और अगर तुम पाओ कि मांसाहार करने से द्वेष बढ़ता है, घृणा बढ़ती है, वैमनस्य बढ़ता है, जीवन में उत्पन्न होता है गलत, जीवन के संबंध विषाक्त होते हैं, तो फिर फिकर छोड़ो क्राइस्ट की और मोहम्मद की, वे जानें उनका, तुम अपनी फिकर करो।
तुम पाओगे कि मांसाहार करने से अड़चन आती है। और मैं यह नहीं कहता हूं कि मांसाहार करने वाला समाधिस्थ नहीं हो सकता है। समाधिस्थ हो सकता है। लेकिन फिजूल की अड़चनें। ऐसे ही समझो कि कोई आदमी पहाड़ चढ़ रहा है और गले से एक पत्थर बांधे हुए है। चढ़ सकता है, कोई अड़चन नहीं है, ऐसी अड़चन नहीं है, असंभव नहीं हो गई है बात, पत्थर बांध कर भी कोई चढ़ सकता है। लेकिन इसलिए तुम पत्थर बांध कर चढ़ो, यह तो कोई तर्क न हुआ। अपना ही बोझ चढ़ा लो तो बहुत है, पत्थर और किसलिए बांधते हो? फिर कोई चढ़ गया होगा, रहा होगा कोई राममूर्ति जैसा कि छाती पर पत्थर तुड़वा लिए होंगे। लेकिन तुम्हारे पास वैसी छाती है? पत्थर शायद ही टूटें, छाती टूट जाएगी।
फिर व्यक्ति-व्यक्ति अलग हैं। किसी के भीतर एक तत्व जाकर आनंद उत्पन्न करता है, किसी के भीतर विषाद उत्पन्न करता है। व्यक्ति को परख भीतर से लेनी चाहिए। स्वयं के अतिरिक्त कहीं और कोई कसौटी नहीं है।
तुम पूछते हो: ‘शुभ क्या है?’
शुभ, तुम्हारे छंद में बढ़ती जिससे हो। वही खाओ, वही पीयो, वही उठो, वही बोलो, वही चलो, जिससे तुम्हारा भीतर का छंद बढ़े। जिससे भीतर की वीणा ठीक से बजे। जिससे तुम्हारे जीवन में एक उल्लास, एक हलकापन, जिससे तुम्हें पंख लगें और तुम उड़ सको।
अष्टावक्र का शरीर आठ जगह से टेढ़ा था--इसीलिए उनका नाम अष्टावक्र। तुम यह तो नहीं पूछते कि मैं भी अपने शरीर को आठ जगह से टेढ़ा करूं, क्योंकि अष्टावक्र तो पहुंच गए, आठ जगह से टेढ़े थे--ऊंट जैसे रहे होंगे--इस कारण तुम अपने शरीर को आठ जगह से टेढ़ा तो न करोगे! और मैं यह नहीं कहता हूं कि अष्टावक्र नहीं पहुंचे। जरूर पहुंचे। मगर यह फिजूल झंझट किसलिए लेनी? भले-चंगे पहुंच सकते हो, तो आठ जगह से शरीर को तिरछा क्यों करना? जहां सुगमता से पहुंचा जा सके, वहां व्यर्थ की बाधाएं क्यों खड़ी करना?
शराब पीने वाले भी पहुंच जाते हैं। इससे शराब पीने मत लग जाना। शराब पीने वाला पहुंचता है--शराब पीने के कारण नहीं, शराब पीने के बावजूद। मांसाहारी भी पहुंचता है--मांसाहार के कारण नहीं, मांसाहार के बावजूद। अष्टावक्र पहुंचते हैं, आठ जगह से टेढ़े होने के कारण नहीं, आठ जगह से टेढ़े होने के बावजूद। आठ जगह से टेढ़े होने के कारण तो हजार तरह की अड़चनें आती ही हैं। तुम सौभाग्यशाली हो अगर उन अड़चनों से बच जाओ।
और फिर मैं दोहरा दूं कि मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जिसने मांसाहार किया वह नहीं पहुंचा। नहीं तो राम भी नहीं पहुंचेंगे--क्षत्रिय घर में पैदा हुए थे। और रामकृष्ण भी नहीं पहुंचेंगे, क्योंकि बंगाली घर में मछली तो चलेगी! बिना मछली के कहीं बंगाली का भोजन होता है? फिर तो बहुत कम लोग पहुंचेंगे, सारी पृथ्वी तो मांसाहारियों से भरी है। लेकिन तुम सौभाग्यशाली हो अगर शाकाहारी होने की सुविधा हो। क्योंकि शाकाहार तुम्हारी देह को निर्मल रखेगा, मन को ताजा और स्वच्छ रखेगा। शाकाहार तुम्हें हलका-फुलका रखेगा। तुम भारी न हो जाओगे।
तुमने देखा, शाकाहारी पशु-पक्षी दिन भर भोजन करते हैं, मांसाहारी सिंह एक ही बार चौबीस घंटे में। क्यों? मांसाहार इतना भारी है कि चौबीस घंटे पचाने में लग जाते हैं। बंदर बैठा है वृक्ष पर, वह शाकाहारी है, वह दिन भर चलाते ही रहता है, जो मिल जाए। क्यों? शाकाहार हलका है। पत्थर की तरह नहीं पड़ जाता है। और देह जब भी भारी होगी, तब आकाश में उड़ना कठिन होगा। देह जब भी भारी होगी, तब ध्यान की ऊंचाइयां छूना कठिन होगा--असंभव नहीं कह रहा हूं, कठिन।
तुमने देखा नहीं, जब तुम खूब भोजन कर लेते हो तो नींद आने लगती है। उससे थोड़ा सा समझो। जब बहुत भोजन कर लिया तो नींद क्यों आती है? जाग्रत रहना कठिन हो जाता है। शरीर इतना भारी हो गया कि सोना चाहता है। बहुत भोजन कर लेने के बाद ध्यान करने नहीं बैठ सकोगे। ध्यान करोगे, झपकी खाओगे, नींद आ जाएगी। इसीलिए तो लोगों ने उपवास की प्रक्रिया खोजी। हलके पेट, खाली पेट जैसा ध्यान लग सकता है, वैसा भरे पेट नहीं लग सकता। तुमने भी देखा है, तुमने सोचा नहीं है जीवन के बाबत, जिस दिन बिना भोजन किए रात सोओ, तुम्हें पता चल जाएगा, नींद नहीं आती, नींद मुश्किल हो जाती है। नींद के लिए भोजन जरूरी है। ध्यान तो नींद से विपरीत दशा है। ध्यान जागरण की दशा है।
तो मैं तुमसे यह नहीं कहता कि तुम भूखे रहो, क्योंकि ज्यादा दिन भूखे रहोगे तो घातक हो जाएगा। मैं तुमसे यह भी नहीं कहता कि तुम बहुत भारी भोजन करो। मैं तुमसे यही कहता हूं--सम्यक आहार। इतना करो, जिससे शरीर आनंद से चले, नाचता हुआ चले; न ज्यादा, न कम।
और ध्यान रखो, क्योंकि तुम जो भी कर रहे हो उसके परिणाम हैं। एक आदमी किसी पशु की हत्या करके भोजन कर रहा है। यह भोजन बहुत महंगा हो गया। पशु की हत्या करने में इसे कठोर तो हो ही जाना पड़ेगा। फिर चाहे कोई और इसके लिए करे, इसे पता तो है कि मेरे लिए की जा रही है। एक प्राण नष्ट किया जा रहा है, एक देह खंडित की जा रही है। तुम कर पा रहे हो--सिर्फ भोजन के लिए, और भोजन जब कि और ढंग से भी हो सकता था, अपरिहार्य नहीं थी यह हत्या, यह बचाई जा सकती थी--तो तुम कठोर हो रहे हो। अब इस कठोर हृदय में करुणा कैसे पैदा होगी? यह ऐसा ही हो गया कि झरने के मार्ग में एक चट्टान रख दी। हां, कभी-कभी झरना चट्टान को तोड़ कर भी बह आता है--ऐसा ही मोहम्मद में हुआ होगा, झरना चट्टान को तोड़ कर बह आया। लेकिन सदा ऐसा नहीं होगा। मोहम्मद का झरना बड़ा रहा होगा। छोटी-मोटी चट्टान की परवाह नहीं की। अब कौन जाने तुम्हारा झरना कितना बड़ा है? हो सकता है छोटा-मोटा झरना हो, पत्थर रोक ही दे सदा को। झरना बंद ही रह जाए, बहे न, सागर तक पहुंचे न, तुम्हारा जीवन व्यर्थ हो जाए।
सदा अपने भीतर जांचो, परखो। शुभ क्या है, जिससे तुम्हारा जीवन-छंद सधे, जीवन-वीणा से स्वर उठें, जितने संगीतपूर्ण हो सकें, तुम्हारी श्वास-प्रश्वास जितनी संगीत से भर सके, उतना शुभ। शास्त्रों से मत तौलना, अपने भीतर के संगीत से परखना। और एक बार तुम्हें यह कसौटी हाथ लग जाए, तो जल्दी ही तुम अनुभव करने लगोगे कि जीवन में क्रांति होनी शुरू हो गई। क्योंकि जान कर कौन अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारता है? जान कर कोई नहीं मारता। अनजाने चोट लग जाए, एक बात।
तुमने पूछा: ‘और अशुभ क्या है?’
अशुभ, शुभ से जो विपरीत है, जिससे तुम्हारा छंद भंग होता है, जिससे तुम्हारे भीतर का रस छिन्न-भिन्न होता है, जिससे तुम्हारे भीतर की वीणा के तार टूट जाते हैं, वही अशुभ है।
तुम देखो, किसी से झूठ बोले, झूठ बोलते ही तुम्हारे भीतर के तार संगीत पैदा नहीं करते। झूठ बोलो और तुम देखो, झूठ बोलते ही तुम सिकुड़ जाते हो; भयभीत हो जाते हो; डर जाते हो--पकड़े तो नहीं जाओगे? आज नहीं कल झूठ किसी की पकड़ में तो न आ जाएगा? फिर एक झूठ बोलो तो उस झूठ को बचाने के लिए हजार झूठ बोलने पड़ते हैं। फिर पकड़े जाने की संभावना भी बढ़ती जाती है। जितनी पकड़े जाने की संभावना बढ़ती है, उतना भय बढ़ता है। जितना भय बढ़ता है, उतना झूठ बढ़ता है। जितना झूठ बढ़ता है, और पकड़े जाने की संभावना बढ़ती है। तुम फंस गए एक जाल में। अपने ही हाथ से जाल बुना, मकड़ी खुद ही फंस गई अपने जाल में। फिर निकलने का रास्ता नहीं सूझता। क्योंकि इतने झूठ बोल चुके हो, अब अगर सच बोले तो सारा जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा। एक और सही, एक और सही। एक झूठ बोलो, फिर झूठ की बड़ी संतानें हैं--झूठ संतति-नियमन में नहीं मानता।
सत्य की संतान नहीं होती। सत्य ब्रह्मचारी है। एक सत्य बोलो, पूरा हो गया--अपने में पूरा होता है, अब किसी और सहारे की जरूरत नहीं होती। और सत्य बोल कर निश्चिंत सो सकते हो, चिंता नहीं पकड़ती। सत्य की सुरक्षा नहीं करनी पड़ती। सत्य के लिए आयोजन नहीं करना पड़ता बचाने का। सत्य अपना प्रमाण है। सत्य के साथ हृदय निर्भार होता है। सत्य के साथ मन मौज में होता है। सत्य के साथ अभय होता है। और जहां अभय है, और जहां मन मुक्त है, वहां संगीत है, वहां छंद है। उसी छंद में शुभ है। अशुभ का अर्थ हुआ, ऐसा कुछ मत करो जिससे तुम सिकुड़ते हो। ऐसा कुछ मत करो जिससे तुम्हें अपने को छिपाना पड़ता है। ऐसा कुछ मत करो जिसके कारण तुम नग्न नहीं हो सकते। ऐसा कुछ मत करो जिसके कारण तुम्हें अवरोध खड़े करने पड़ें। बस इतना ही ध्यान रहे।
मैं तुम्हें मूल कुंजी की बात कर रहा हूं, विस्तार की बात नहीं कर रहा हूं। मैं तुम्हें कोई गिना नहीं रहा हूं कि ये-ये बातें शुभ हैं और ये-ये बातें अशुभ हैं। क्योंकि गिनती हो नहीं सकती, जीवन विराट है, बहुत बड़ा है जीवन। दस आज्ञाएं हैं यहूदियों की। मगर ऐसा मौका आ जाता है, ग्यारहवीं की जरूरत पड़ती है। तब क्या करोगे? फिर तो तुम्हीं निर्णय करोगे! दस आज्ञाओं में कहीं दुनिया समाप्त होती है? यहां रोज प्रतिपल नई आज्ञा की जरूरत पड़ती है। इसलिए बजाय इसके कि मैं तुम्हें फेहरिस्त दूं कि यह करना शुभ है और यह करना शुभ है और यह करना शुभ नहीं है, मैं तुम्हें सिर्फ रोशनी दे रहा हूं कि यह दीया सम्हालो। इस दीये में तुम्हें जो मार्ग दिखाई पड़े वह शुभ है, और जहां दीवाल दिखाई पड़े वहां से मत जाना--जाओगे ही क्यों? वहां सिर टूटेगा।
सदगुरुओं ने सिद्धांत नहीं दिए हैं, सदगुरुओं ने दृष्टि दी है। सिद्धांत थोड़ी दूर काम पड़ सकते हैं। ऐसा समझो, एक अंधा आदमी तुमसे पूछता है कि मुझे स्टेशन जाना है, कैसे जाऊं? तुम उसे सब समझा देते हो कि पहले बाएं रास्ते से चलना मील भर, फिर दाएं मुड़ जाना, फिर मील भर चलना, फिर बाएं मुड़ जाना; तुम उसे सब समझा देते हो। फिर भी पक्का नहीं है कि अंधा पहुंच पाएगा--अंधा आखिर अंधा है। कब मील पूरा हुआ, कैसे जानेगा? आधा मील पर ही मुड़ जाए, कि डेढ़ मील तक चलता चला जाए! सदगुरु अंधे को सूचनाएं नहीं देते। सदगुरु कहते हैं: यह अंजन लो, आंख पर आंज लो, इससे तुम्हें दिखाई पड़ेगा। फिर तुम खुद ही जानोगे, राह के किनारे पत्थर लगे हैं वे इशारा बताते हैं कि स्टेशन कितनी दूर, तुम खुद ही पहुंच जाओगे। दृष्टि चाहिए!
मैं तुमसे दृष्टि की बात कर रहा हूं। तुम इस तरह से अपने जीवन की परीक्षा में लग जाओ--जो भी करते हो, इतनी ही बात सोच कर करो कि इससे मेरा संगीत गहन होगा? बस। अगर संगीत गहन होता है, फिकर छोड़ो दुनिया के शास्त्रों की और फिकर छोड़ो दुनिया के सिद्धांतों की, उनका कोई मूल्य नहीं है। वे तुम्हारे लिए बनाए भी नहीं गए। जिनके लिए बनाए गए थे वे लोग अब हैं भी नहीं।
अब कोई वेद में जाकर अपना सिद्धांत खोजता है। वेद पांच हजार साल पहले लिखे गए--और अगर लोकमान्य तिलक की मानें तो पंचानबे हजार साल पहले लिखे गए। अगर लोकमान्य तिलक सही हैं, तो वेद उतने ही व्यर्थ हो गए, ज्यादा व्यर्थ हो गए, क्योंकि पंचानबे हजार साल पहले जिस आदमी से कहे गए थे वह आदमी अब नहीं है। पांच हजार साल भी काफी समय हो गया, जिंदगी बहुत बदल गई है। जिंदगी ने नये रूप ले लिए हैं, नये मोड़ ले लिए हैं। जिन मोड़ों का कोई पता नहीं था वेद लिखने वालों को--हो भी नहीं सकता था--इन नये मोड़ों पर नई घटनाएं घट गई हैं।
अब जैसे समझो, जैन मुनि वाहन में नहीं चलता। यह बात महावीर के समय में समझ में आती थी। क्योंकि वाहन का मतलब था--घोड़े जुते होंगे, बैल जुते होंगे--बैलगाड़ी होगी, कि घोड़ागाड़ी होगी, और तो कोई वाहन था नहीं। बैलों पर कोड़े पड़ेंगे। महावीर ने कहा: यह हिंसा है। अपने पैर से जितना बन सके, चल लो। यह ज्यादती है। यह बैल पर सवार होना, यह घोड़े पर सवार होना ज्यादती है। यह तुम इन निरीह पशुओं के साथ अन्याय कर रहे हो।
यह बात समझ में आती है। इससे भीतर का छंद टूटेगा। जब भी तुम किसी को गुलाम बनाओगे--वह चाहे पशु हो, चाहे पक्षी हो, चाहे मनुष्य हो--जब भी तुम किसी को गुलाम बनाओगे, तुमने अपनी ही गुलामी का जाल रचा। तुमने जब किसी के लिए गड्ढा खोदा, गड्ढा तुम्हारे लिए खुदा। आखिर बैल का भी तो प्राण है, आत्मा है, संवेदना है! तुम मजे से बैठे हो, तुमको बैल ढो रहा है--जैसे बैल सिर्फ तुम्हें ढोने के लिए पैदा हुआ है! अगर बैलों की दुनिया होती तो तुम बैलों को ढोते, तुम जुते होते। यह तो बात ठीक थी।
लेकिन अब जैन मुनि कार में भी नहीं बैठ सकता, क्योंकि वाहन का इनकार है। अब महावीर को कार का कुछ पता नहीं था कि एक दिन ऐसी घड़ी आ जाएगी कि न घोड़ा जुतेगा, न बैल जुतेगा--हॉर्स तो चला जाएगा, हॉर्स पावर आएगा--इसका कुछ पता नहीं था। अब यह जैन मुनि अभी भी पैदल चल रहा है। अब यह बात जरा मूढ़ता की हो गई। अब कार में चलने में कोई अड़चन नहीं, कोई हिंसा नहीं। लेकिन घबड़ाहट लगती है उसे, उसके शास्त्र में लिखा है। शास्त्र के विपरीत कैसे जाए?
शास्त्र सदा पैर की जंजीर हो जाते हैं। समय बीता कि पैर की जंजीर हुए। फिर उनमें तुम देखोगे तो उलझोगे। और दो ही उपाय बचते हैं फिर। एक उपाय तो बचता है: उनकी मान कर चलो और मूढ़ रहो। और दूसरा उपाय यह बचता है कि उनको ऊपर-ऊपर मानते रहो और भीतर-भीतर मत मानो, तब पाखंडी हो जाते हो। दोनों हालत में हानि होती है।
अब तो आकाश में उड़ता हवाई जहाज है। पैदल चल कर जितनी हिंसा होती है उतनी हिंसा भी नहीं होती। पैदल भी चलोगे तो पैर तो जमीन पर पड़ता है न, कीड़े-मकोड़े, छोटे-मोटे जीव-जंतु तो दबते ही हैं! महावीर ने उसकी भी चिंता की है--सूखी जमीन में चलना, गीली जमीन में मत चलना; वर्षा में मत चलना; इसलिए वर्षा में जैन मुनि नहीं चलता। लेकिन हवाई जहाज में उड़ो। जमीन से कोई संबंध ही न रहा। हेलिकॉप्टर में जाओ। न पैर पड़ेगा जमीन पर, न कोई कीड़ा मरेगा। फिर वर्षा हो कि गर्मी, कोई अंतर नहीं पड़ता। लेकिन जैन मुनि अटका है, क्योंकि वाहन! वह शब्द जान ले रहा है--यह भी वाहन है, और वाहन का विरोध है! मैंने सिर्फ उदाहरण के लिए तुमसे कहा।
शास्त्र सदा रुकावट का कारण हो जाते हैं। और निर्बुद्धि के लिए तो बहुत ज्यादा रुकावट के कारण हो जाते हैं। गले की फांसी लग जाती है, जीना असंभव हो जाता है।
महावीर ने कहा: रात भोजन मत करना। ठीक कहा, बिजली का उन्हें कुछ पता नहीं था। रात अभी भी तुम जाओ इस देश के गांवों में--ठेठ देहातों में जहां बिजली नहीं है, जहां केरोसिन का तेल भी मिलना मुश्किल है; इतनी सामर्थ्य भी नहीं है कि केरोसिन का तेल खरीदें--लोग अंधेरे में भोजन करते हैं। महावीर ने जब कहा तो सारे लोग अंधेरे में भोजन कर रहे होंगे। अंधेरे में भोजन करना जरूर खतरनाक है। खुद के लिए भी, कीड़े-मकोड़ों के लिए भी; पतिंगों के लिए भी, मच्छरों के लिए भी; और हिंसा हो जाएगी। हिंसा भी होगी और विषाक्त भी हो सकता है भोजन।
लेकिन आज तो दिन की रोशनी रात में भी उपलब्ध है। दिन से भी ज्यादा रोशनी चाहो तो उतनी उपलब्ध हो सकती है। अब यह बात व्यर्थ हो गई। मगर रात्रि भोजन का निषेध है, इसलिए रात्रि भोजन नहीं किया जा सकता।
तुम अपने छंद से परखो। आंख खोल कर देखो, अपने जीवन की जांच करते रहो। जहां तुम्हें लगे कि यह बात मेरे आनंद से जुड़ती है और इससे मेरा आनंद विकासमान होगा, वही शुभ। और जिससे तुम्हारा आनंद खंडित होता हो, वही अशुभ।
साधु और संत की परिभाषा में यही भेद है। असाधु वह, जो अशुभ करता है। साधु वह, जो शुभ करता है। संत वह, जिससे शुभ होता है, अशुभ नहीं होता--करने के पार चले गए। करने में तो सोचना पड़ता है--ऐसा करूं या न करूं? निर्णय लेना पड़ता है, विकल्प होता है। विकल्प में कभी भूल भी हो सकती है। विकल्प में कभी चूक भी हो सकती है। आखिर विचार से ही किया जा रहा है, विचार में भ्रांतियां हैं। संत की दशा का अर्थ होता है: अब न शुभ की चिंता है, न अशुभ की चिंता है। छंद ऐसा बंधा है कि अब टूट ही नहीं सकता। तुम संत को नरक में भी फेंक दो तो भी वह स्वर्ग में होगा। छंद ऐसा बंधा है कि अब नरक भी उसे तोड़ नहीं सकता। तुम संत को बाजार में बिठा दो तो भी उसके ध्यान में भंग नहीं है, छंद ऐसा बंधा है। अब हिमालय की गुफा पर ही बैठने की कोई जरूरत नहीं है। अब डर ही नहीं रहा। अब छंद से भेद नहीं रहा कि मैं अलग और छंद अलग, सम्हाले रहूं। अब संगीतज्ञ अलग नहीं है, अब संगीतज्ञ अपना संगीत हो गया है।
वह आखिरी दशा है। उसी को परमहंस कहा है। उसी को शांडिल्य ने भक्ति कहा है, परम भक्ति, जहां भक्त और भगवान एक हो जाते हैं--पराभक्ति, जहां भक्त और भगवान एक हो गए, फिर कौन सी चिंता कि ऐसा करूं कि वैसा करूं। करने वाला रहा ही नहीं, अब भगवान करता है। अब तुम तो मिट ही गए। अब तो भूल हो ही नहीं सकती, क्योंकि बुनियादी भूल मिट गई--मैं होने की भूल ही मिट गई। उस मैं से और-और भूलें पैदा होती थीं। अब चिंता की कोई जरूरत नहीं, अब निश्चिंत होकर जी सकते हो। इसलिए उस परमदशा में संत बालवत हो जाता है, छोटे बच्चे जैसा हो जाता है--न कुछ शुभ है, न कुछ अशुभ है। उसे पता ही नहीं कि क्या शुभ है, क्या अशुभ है।
ओशो, जीवन दुख है, फिर भी आदमी जागता नहीं। जीवन के नरक के बावजूद भी आदमी जीए किस तरह चला जाता है?
लेकिन तुम्हारी आंखें कहती हैं कि बुद्ध ठीक नहीं कह रहे हैं। तुम्हारे प्राण कहते हैं कि बुद्ध ठीक नहीं कह रहे हैं। तुम्हें अभी जीवन में आशा है। तुम सोचते हो कि हां, माना कि अब तक जीवन में दुख पाए, लेकिन कल भी पाऊंगा, ऐसी क्या अनिवार्यता है? कल चीजें बदल भी सकती हैं। आज तक हारा, कल जीत भी सकता हूं। आज तक नहीं मिला, कल मिल भी सकता है। नहीं मिला, इसका कारण यही होगा कि मैंने ठीक से प्रयास नहीं किया। नहीं मिला, इसका कारण यही होगा कि मैंने अपने सारे जीवन को दांव पर नहीं लगाया। नहीं मिला तो इसीलिए कि दूसरे ज्यादा चालबाज थे, पा गए; मैं सीधा-सादा आदमी था, खड़ा रह गया। कल जुगत बिठाऊंगा, यत्न करूंगा, कल सब दांव पर लगाऊंगा। कल की आशा चलाए जाती है। और कल कभी आता नहीं। और आशा मिटती नहीं। दुख तो है, सभी के अनुभव में है। लेकिन अनुभव पर आशा की विजय होती है। अनुभव तो अतीत का है, आशा भविष्य की है, यह खूबी है। अनुभव अतीत का है, अतीत तो हो गया, ठीक; यह कैसे मानें कि हमारा भविष्य हमारे अतीत की ही पुनरुक्ति होगा? मन मानने को नहीं होता कि हमारा भविष्य हमारे अतीत की ही पुनरुक्ति होगा। और हम ऐसी कहानियां भी सुनते हैं; और ऐसी कहानियां हम बच्चों को कहते भी हैं।
गजनी का मोहम्मद भारत आया। वह सत्रह बार हार गया। सत्रहवीं बार हार कर जब वह भाग गया था और एक गुफा में छिपा बैठा था, तो उसने देखा--एक मकड़ी जाला बुन रही है। बैठा था, कुछ और काम भी न था, तो देखता रहा। संयोग की बात कि सत्रह बार धागा टूट गया और मकड़ी गिर गई और अठारहवीं बार चढ़ी और धागा सम्हल गया और जाला बन गया। बैठे-बैठे गजनी को लगा कि मैं भी सत्रह बार हारा, कौन जाने अठारहवीं बार जीत जाऊं? मकड़ी नहीं हारी, मैं क्यों हार गया हूं? उठ आया, बाहर निकल आया, फिर जूझ पड़ा।
हम बच्चों को समझाते हैं कि अठारहवीं बार गजनी जीता; तो घबड़ाओ मत, उत्साह मत खोओ, लड़े जाओ। लेकिन हम कभी यह नहीं पूछते कि गजनी जीत कर भी क्या जीता? जो हार कर हालत थी, क्या जीत कर बदली? क्या गजनी सुखी हुआ? क्या गजनी ने आनंद जाना? क्या गजनी ने आत्मा पहचानी? क्या गजनी को समाधि का सुख मिला? मिला क्या? हार कर जैसा मरता और धूल में गिरता, वैसा ही जीत कर भी मरा और धूल में गिरा; तो जीत जीत थी कहां? जीत में जीत कहां है?
हम उदाहरण देते हैं लोगों को, क्योंकि हम सभी को महत्वाकांक्षा में चलाए रखना चाहते हैं। स्कूल में शिक्षक समझाते हैं--हारो मत! आज हार गए, कल जीतोगे! मगर कोई यह नहीं पूछता कि जीत जो जाते हैं, उनमें जीतता क्या है? हारों में और जीतों में भेद क्या है? दोनों एक से उदास और रिक्त और खाली। दोनों के भीतर की वीणा खंडित। दोनों के प्राण सूने। दोनों के प्राण में गंदगी। और अक्सर ऐसा हो जाता है कि जीते आदमी की हार हारे आदमी से ज्यादा होती है। इसे थोड़ा समझना। क्योंकि हारे आदमी को अभी लगता है कि शायद जीत जाऊंगा, जीते आदमी को तो पक्का पता चल जाता है कि जीत कर भी जीत होती नहीं। इसीलिए तो बुद्ध और महावीर, राजपुत्र, महलों को छोड़ कर, साम्राज्यों को छोड़ कर चले गए। क्योंकि देखा कि महलों में भी महल नहीं है, और धन में भी धन नहीं है, और यश में भी कुछ मिलता नहीं, सब कोरी बातचीत है, सब अफवाहें हैं।
कितने लोग तुम्हें जानते हैं, इससे क्या होगा? दस लोग जानते हैं, दस हजार लोग जानते हैं, कि दस लाख, कि दस करोड़, इससे क्या होगा? तुम्हारे जीवन में इससे क्या रूपांतरण होगा? तुम कैसे बदल जाओगे इस बात से कि बहुत लोग तुम्हें जानते हैं? यश से भी क्या होता है? भीतर तो आदमी दरिद्र का दरिद्र! धन मिले तो दरिद्र, यश मिले तो दरिद्र, पद मिले तो दरिद्र। तुम जरा पद वालों की आंख में झांक कर तो देखो! तुम जरा धनी की आत्मा को टटोल कर तो देखो! तुम जिनको विजेता कहते हो जरा उनकी हार को तो देखो कि किस बुरी तरह हार गए हैं! लेकिन आशा है।
एक दो नहीं, छब्बीस दीये
एक-एक करके जलाए मैंने
इक दीया नाम का आजादी के
उसने जलते हुए ओंठों से कहा
चाहे जिस मुल्क से गेहूं मांगो
हाथ फैलाने की आजादी है
इक दीया नाम का खुशहाली के
उसके जलते ही यह मालूम हुआ
कितनी बदहाली है
पेट खाली है मेरा, जेब मेरी खाली है
इक दीया नाम का यकजदी के
रोशनी उसकी जहां तक पहुंची
कौम को लड़ते-झगड़ते देखा
मां के आंचल में हैं जितने पैबंद
सबको इक साथ उघड़ते देखा
दूर से बीबी ने झल्ला कर कहा
तेल महंगा भी है, मिलता भी नहीं
क्यों दीये इतने जला रखे हैं
अपने घर में न झरोखा न मुंडेर
ताक सपनों के सजा रखे हैं
आया गुस्से का एक ऐसा झोंका
बुझ गए सारे दीये
हां मगर इक दीया नाम है जिसका उम्मीद
झिलमिलाता ही चला जाता है!
उम्मीद, आशा, कल्पना--आने वाला कल बीते कल से भिन्न होगा; जो आज तक नहीं हुआ, कल होगा--ऐसी आशा को संजोए आदमी चलता जाता है। इसलिए दुख भी हैं और फिर भी आदमी जागता नहीं। एक दीया नाम जिसका उम्मीद। जितने जल्दी यह दीया बुझ जाए, उतना अच्छा। जितने जल्दी तुम आशा के पार हो जाओ, उतना अच्छा।
मुझसे लोग संन्यास की परिभाषा पूछते हैं। उनसे मैं कहता हूं: आशा के जो पार हो गया।
तुम थोड़ा चौंकोगे, अष्टावक्र ने भी यही परिभाषा की है। कहा है: ज्ञानी वही, जो निराशा से भर गया। निराशा! हम तो इस शब्द से ही डरते हैं। यह शब्द ही हमें घबड़ाता है--निराशा!
यह शब्द बड़ा बहुमूल्य है। निर-आशा--जिसकी अब कोई आशा नहीं। जिसने सब देख लिया, सब पहचान लिया, आशा का दीया जिसका बुझ गया। जिसकी आंख खुल गईं और जिसने देखा कि यहां रेत ही रेत है, इस रेत से तेल निकाला न जा सकेगा। यहां रेगिस्तान ही रेगिस्तान है, यहां कोई मरूद्यान नहीं। और जो दिखते थे मरूद्यान, वे भी मेरी कल्पनाएं थे। जो ऐसा आशा के पार हो गया।
तुम जिसको निराशा कहते हो, वही मेरी निराशा नहीं है, वही अष्टावक्र की निराशा नहीं है। फर्क समझ लेना। तुम्हारा भाषाकोश और अष्टावक्र का भाषाकोश निश्चित ही अलग होने वाला है। तुम निराशा कब कहते हो? जब तुम्हारी कोई आशा टूटती है तब निराशा कहते हो। अष्टावक्र कहते हैं: जब सब आशाओं से मुक्ति हो गई, तब निराशा। एक आशा टूटी, तुम दूसरी बना लेते हो। इस स्त्री से नहीं मिल सका सुख, तुम तत्क्षण दूसरी स्त्री की तलाश में लग गए। इस धंधे से नहीं मिला लाभ, तुम दूसरा धंधा खोजने लगे। इस गांव में नहीं मिला सुख, तुम दूसरे गांव की तरफ चले। आशा एक तरफ टूटती है, तुम तत्क्षण दूसरी तरफ सजा लेते हो। दीया बुझ नहीं पाता कि तुम दूसरा दीया जला लेते हो--एक दीया जिसका नाम उम्मीद! अष्टावक्र कहते हैं उस स्थिति को निराशा, जब तुम्हें यह दिखाई पड़ गया कि आशा मात्र व्यर्थ है, आशा मात्र। यह आशा, वह आशा नहीं, आशा मात्र दुराशा है, दुष्पूर है। कभी घटती नहीं, सिर्फ भरमाती है।
उस क्षण में क्रांति हो जाती है। उस क्षण में तुम्हारे जीवन में एक नई किरण उतरती है। वही संन्यास है। संसार के पार से कुछ आया। संसार यानी आशा का फैलाव। संन्यास यानी संसार के आशा के फैलाव में कुछ उतरा पार से, तुम्हें दिखाई पड़ने लगा, तुम्हें चीजें जैसी हैं वैसी समझ में आने लगीं।
और यह मत समझ लेना कि जिसको अष्टावक्र निराशा कहते हैं, वैसा आदमी निराश होकर बैठ जाता है। जिसकी आशा ही नहीं रही, उसकी निराशा भी क्या रहेगी? वह दोनों से मुक्त हो गया। उदास नहीं हो जाता, अब उदासी का कोई कारण ही नहीं रहा। यहां कोई चीज फलती ही नहीं, फूलती ही नहीं, उदास क्या होना है? यहां अपेक्षा करनी ही व्यर्थ है, तो अपेक्षा के टूटने का कारण भी समाप्त हो गया। ऐसा आदमी न दुखी होता, न सुखी। ऐसा आदमी शांत हो जाता है। ऐसे आदमी के जीवन में शांति का रस बहता है। उस शांति के रस का ही नाम आनंद है। तुम आनंद से अक्सर सुख समझ लेते हो, वह तुम्हारी भूल है। तुम आनंद में अक्सर सुख आरोपित कर लेते हो, वह भी तुम्हारी आशा है। एक दीया जिसका नाम उम्मीद। आनंद का अर्थ होता है: शांति, परम शांति। न दुख रहा, न सुख रहा, सब तरंगें सुख-दुख की समाप्त हो गईं, निस्तरंग हो गई चेतना।
पूछा तुमने: ‘जीवन दुख है...’
तुम्हें नहीं दिखाई पड़ा है ऐसा अभी। ऐसा तुमने सुना बुद्धों को कहते कि जीवन दुख है। यह तुम्हारी अपनी प्रतीति नहीं, अपना साक्षात्कार नहीं। यह काम नहीं आएगा। यह उधार वचन तुम्हारी छाती में कांटा सा चुभेगा, फूल नहीं बनेगा। उधार वचन कांटे बन जाते हैं, छाती में चुभते हैं, चुभाते हैं, घाव बनाते हैं, लेकिन उनसे जीवन में आनंद की वर्षा नहीं होती। तुमने जाना जीवन दुख है? कि तुमने सुना बुद्धों को कहते? कि तुमने मान लिया कि बुद्ध कहते तो ठीक ही कहते होंगे? क्यों कहेंगे गलत? जान कर कहा है तो ठीक ही कहते होंगे। यह ऐसे ही है जैसे किसी ने मान लिया कि आग जलाती है, क्योंकि और लोग कहते हैं कि आग जलाती है।
दूसरों का कहा हुआ कि आग जलाती है और अपना जाना हुआ कि आग जलाती है, इसमें तुम्हें भेद दिखता है या नहीं? अपना जाना हुआ क्रांति कर देता है। तब आदमी, कहते हैं, दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीने लगता है। खुद जला हो। तुमने जाना कि जीवन दुख है? यह तुम्हारी पहचान? यह तुम्हारी प्रत्यभिज्ञा? यह तुम्हारी अनुभव-संपदा? अगर तुमने जाना, तो आशा गई। फिर तुम यह न पूछोगे कि आदमी फिर क्यों चला जाता है?
और आदमी की क्या पूछते हो, आदमी यानी कौन? अपनी पूछो। किस आदमी की पूछ रहे हो, दूसरों की? यह भ्रांति भी छोड़ो। दूसरों के लिए प्रश्न मत पूछो। दूसरों की दूसरे जानें। तुम्हारी चिंता इतनी ही बहुत कि तुम अपने प्रश्न हल कर लो, अपनी समस्याएं हल कर लो। दूसरों की कहां हल करने बैठोगे! तुम रुको, आदमी को चलने दो।
यह आदमी कौन? इसका न तो नाम, न पता, न ठिकाना, यह तो सिर्फ एक शब्द है--आदमी। तुम्हें आदमी कभी मिला? नहीं, आदमी तुम्हें कभी नहीं मिला। आदमी मिलते हैं, आदमी कभी नहीं मिलता। राम मिलते हैं, कृष्ण मिलते हैं, बुद्ध मिलते हैं, हजार तरह के आदमी मिलते हैं, मगर आदमी कभी नहीं मिलता। आदमी तो केवल एक शब्द है, संज्ञामात्र। यह आदमी तो चलता रहेगा, जिसकी तुम बात कर रहे हो। जो जाग जाएंगे, वे चुपचाप इस व्यर्थ के पागलपन से हट जाएंगे। जो जाग गए, वे किनारे उतर गए, उन्होंने पगडंडियां पकड़ लीं और प्रभु तक पहुंच गए। जो सोए हैं, वे इस राजपथ पर--अंधेरे राजपथ पर--भीड़ के साथ भेड़ों की भांति चलते रहेंगे। तुम इनकी चिंता मत करो। और तुम चाहो भी तो भी इन्हें इनके मार्ग से हटा नहीं सकते। और तुम्हें हक भी नहीं है। अगर इन्होंने यही तय किया है कि यही इनका जीवन है, तो ये हकदार हैं कि ये इसी को जीवन मानें और इसी भांति चलें।
तुम हट जाओ। शायद तुम्हें हटते देख कर किसी सोए की नींद टूटे। शायद तुम्हें हटते देख कर, तुम्हारे जीवन में खिलते फूल देख कर, किसी के नासापुटों में सुगंध भर जाए, और कोई खिंचा चला आए, वह बात दूसरी है। मगर तुम दूसरे को हटाने की चेष्टा मत करना। अक्सर ऐसी शुभ चेष्टाओं का ही बड़ा दुष्परिणाम हुआ है। तुम जबर्दस्ती लोगों को खींच लेते हो धर्म की तरफ। वे भागते संसार की तरफ, तुम खींचते धर्म की तरफ। इससे संसार के प्रति उनका विराग पैदा नहीं होता, सिर्फ तुम्हारे धर्म के प्रति खीझ पैदा होती है। बाप जबर्दस्ती बेटे को मंदिर ले जा रहा है। अभी बेटा बाजार भी नहीं पहुंचा, बाजार का दुख भी नहीं झेला और तुम मंदिर ले चले! अभी बेटा बीमार भी नहीं हुआ और तुम चिकित्सक के घर तक ले चले! दवा इसको जंचेगी? रुचेगी? तुमने उपचार शुरू कर दिया!
धर्म तो उपचार है। जब संसार व्यर्थ दिखाई पड़ता है, तब धर्म में सार्थकता दिखाई पड़ती है। अब छोटा सा बच्चा घर में पैदा हुआ, तुम चले मंदिर, मस्जिद, गिरजा लेकर--बपतिस्मा करवा लाएं, कि जनेऊ पहना दें, कि क्या न करवा दें, कि राम-नाम इसके कान में डलवा दें, कि कान फुंकवा दें--हजार तरह की मूढ़ताएं। तुम सिर्फ इस बच्चे को सदा के लिए धर्म से तोड़े दे रहे हो।
मेरे पास न मालूम कितने लोगों ने आकर यह कहा है--ईसाइयों ने मुझसे आकर कहा है--कि चर्च ने हमारे मन में ईसा के प्रति नफरत भर दी। क्यूं? क्योंकि बचपन से जबर्दस्ती थोपा गया, आग्रहपूर्वक थोपा गया।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने बेटे से बोला कि तू जा, यह मटकी ले जा और कुएं से पानी भर ला। और इसके पहले कि जाए, जरा मेरे पास आ। और जब वह उसके पास आया तो उसने एक जोर का तमाचा उस लड़के को मारा। एक मेहमान घर में बैठे थे, वे तो कुछ समझे ही नहीं यह राज! उन्होंने कहा, भई, यह हद हो गई! अभी बेटे ने कोई कसूर भी नहीं किया, मैं घंटे भर से यहां बैठा हूं, यह चांटा किस बात का? मुल्ला ने कहा, यह चांटा इस बात का कि घड़ा मत फोड़ना। मगर उसने कहा, अभी घड़ा इसने फोड़ा नहीं! मुल्ला ने कहा, अगर फोड़ ही दे फिर फायदा क्या?
मगर अगर बेटे में थोड़े भी प्राण होंगे, तो जरूर फोड़ कर आएगा। फोड़ना ही पड़ेगा। अगर बेटा बिलकुल गोबरगणेश हो तो बात अलग। नहीं तो बेटा निश्चित जाकर इस घड़े को फोड़ देगा कुएं पर। यह तो हद हो गई, अभी घड़ा फोड़ा नहीं और सजा मिल गई! अभी बीमारी न थी और दवा मिल गई।
तुम्हारे मंदिर-मस्जिद तुम्हारे मन में धर्म के प्रति आदर पैदा नहीं कर पाते, अनादर पैदा करवाते हैं। मंदिर और मस्जिद तो किसी को खोजते हुए जाना पड़ता है--बड़ी लालसा से, बड़ी अभीप्सा से। मंदिर और मस्जिद को तो टटोलना पड़ता है, सरक-सरक कर। जीवन के अनेक-अनेक कष्ट और कांटों को झेल कर मंदिर का फूल दिखाई पड़ता है, नहीं तो नहीं दिखाई पड़ता। जीवन के अंधेरे में खूब भोग कर भुक्तभोगी को ही मंदिर का दीया जलता हुआ दिखाई पड़ता है। जिसने जीवन का अंधकार नहीं देखा, उसको तुम मंदिर के दीये की तरफ ले चले? जिसने अंधकार नहीं जाना, उसे प्रकाश का अनुभव कैसे होगा?
तो मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि तुम्हें अगर जीवन में दुख दिखाई पड़ गया है, तो तुम फिक्र छोड़ो औरों की, तुम उतरो, तुम डुबकी लो, तुम आशा का जाल तोड़ो, तुम जागो। बस वही एक दीया तुम्हें बुझाना होगा। और उस एक दीये के बुझाते ही सूरज निकल आएगा। एक दीया नाम जिसका उम्मीद! उस एक दीये को तुम बुझा दो और अचानक तुम पाओगे सुबह हो गई। इधर आशा का दीया बुझा, उधर आत्मा का सूरज निकला।
ओशो, जिसे चाहो वह ठुकराता क्यों है?
तुम्हारा प्रेम है क्या? बस वैसा ही है जैसा मछलीमार मछली पकड़ने के लिए कांटे पर आटा लगाता है। मछली फंस जाती है आटे के कारण। मछलीमार का प्रयोजन मछली को आटा खिलाना नहीं है; मछलीमार का प्रयोजन--आटा खाने में कांटा फंस जाए उसके मुंह में, बस। आटा तो तरकीब है।
तुम पूछते हो: ‘जिसे चाहो वह ठुकराता क्यों है?’
तुम्हारे चाहने में कांटा है। तुम सोचते हो--आटा ही आटा है। लेकिन तुम जरा गौर से विचारो, तुमने जिसको चाहा उसका जीवन दुखमय बना दिया या नहीं? जिसने तुम्हें चाहा, उसने तुम्हारा जीवन दुखमय बना दिया या नहीं? इस प्रेम के नाम पर जो चलता है, इसमें फूल तो कभी-कभार खिलते हैं, कांटे ही कांटे पलते हैं। कभी सौ में एकाध मौके पर कभी फूल की झलक मिली हो तो मिली हो, निन्यानबे मौकों पर तो कांटा चुभा और बुरी तरह चुभा और नासूर बना गया, और घाव छोड़ गया। तुम्हारी चाहत शुद्ध नहीं है, इसलिए लोग बचना चाहते हैं।
तुम यह मत समझो कि लोग कुछ गलत हैं। प्रश्न पूछने वाले की मर्जी यही है कि लोग कुछ गलत हैं, कि मैं तो इतना प्रेम का थाल सजा कर आता हूं और लोग चले, एकदम भागे--पुलिस को बुलाने लगते हैं--और मैं तो सिर्फ प्रेम का थाल सजा कर आया था। मैं तो कहता था, आरती उतारूंगा आपकी। आप चले क्यों?
तुम्हारे प्रेम के थाल में जहर है। हर वासना में जहर है। तुम अपनी वासना को प्रार्थना बनाओ, फिर कोई नहीं भागेगा। फिर लोग तुम्हें खोजते आएंगे; तुम्हारे पास बैठ कर शांति पाएंगे; तुम्हारी छाया में विश्राम पाएंगे; तुम्हारी आंख उन पर पड़ जाएगी, वे धन्यभागी हो जाएंगे। तुम अपनी वासना को प्रार्थना बनाओ। क्या मतलब है मेरा वासना को प्रार्थना बनाने से? वासना में जो ईर्ष्या है, उसे जाने दो; वासना में जो द्वेष है, उसे जाने दो; वासना में दूसरे का शोषण करने की जो आकांक्षा है, उसे जाने दो; वासना में दूसरे का मालिक बनने की जो वृत्ति है, उसे जाने दो; और तब तुम्हारी वासना शुद्ध होकर प्रार्थना बन जाएगी। तब तुम दोगे और उत्तर में कुछ भी न मांगोगे। तब तुम प्रेम दोगे, उत्तर में कुछ भी न मांगोगे। तब तुम्हारे प्रेम में सिर्फ आटा होगा, कांटा नहीं होगा।
ये कुछ छोटी-छोटी घटनाएं समझें।
मुल्ला नसरुद्दीन से उसके मित्र चंदूलाल ने पूछा, मुल्ला, अगर तुम शादी ही करना चाहते हो तो उसी लड़की से क्यों नहीं कर लेते जिसके साथ रोज शाम को सागर की सैर करने जाते हो?
मुल्ला ने कहा, अगर मैं उसी से शादी कर लूंगा, तब मेरी शामें कैसे कटेंगी?
जिससे शादी की, उससे झंझट हो जाती है; उससे सब प्रेम का नाता टूट जाता है। यह बड़े मजे की बात है। प्रेम का नाता जिससे बनाया--विवाह किया, शादी की, वह प्रेम का नाता है--मगर जिससे विवाह किया, उससे प्रेम का नाता टूट जाता है। यह बड़ी अजीब दुनिया है। यह बड़ी चमत्कार से भरी दुनिया है। प्रेम का नाता बनाते ही प्रेम टूट जाता है। क्योंकि प्रेम के नाम पर जो सब सांप-बिच्छू छिपे बैठे थे अभी तक पिटारे में, सब निकलना शुरू हो जाते हैं। इधर विवाह की बांसुरी बजी कि उधर निकले सब सांप-बिच्छू। वे सब जो छिपे पड़े थे, कहते थे--बच्चू जरा रुको, जरा ठहरो, ठीक समय आने दो, एक बार गठबंधन हो जाने दो, एक बार छूटना मुश्किल हो जाए, फिर असलियत प्रकट होती है। तुम्हारा भी सब रोग बाहर आता है, जिससे तुमने प्रेम किया उसका भी सब रोग बाहर आता है, धीरे-धीरे पति-पत्नी के बीच सिवाय रोग के आदान-प्रदान के और कुछ भी नहीं होता।
मुल्ला नसरुद्दीन से किसी ने पूछा, प्रेम के विषय में आपका क्या अनुभव है?
मुल्ला ने कहा, यही, दो बार निराशा। पहली बार इसलिए कि एक स्त्री ने न कहा, और दूसरी बार इसलिए कि दूसरी स्त्री ने हां कहा।
हर हालत में निराशा है। स्त्री मिल जाए तो निराशा, स्त्री न मिले तो निराशा। पुरुष मिल जाए तो निराशा, न मिले तो निराशा।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उससे कह रही थी--मैं अपने नये पड़ोसियों से तंग आ चुकी हूं, हमेशा आपस में लड़ाई-झगड़ा करते रहते हैं। मुल्ला ने कहा, एक समय ऐसा भी था जब ये दोनों एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे। पत्नी ने पूछा, फिर क्या हुआ? मुल्ला ने कहा, फिर, फिर दोनों की शादी हो गई ।
और मुल्ला से किसी ने पूछा, तुमने कैसे उस औरत से विवाह करने का निश्चय कर लिया है? वह सुंदर हो सही, मगर तुम्हें पता है नसरुद्दीन, उसके पिछले पांचों पति पागलखाने में हैं!
मुल्ला ने कहा, छोड़ो, मुझे डरवाने से रहे, शायद तुम्हें भी पता नहीं है कि बंदा पागलखाने से लौट चुका है। अब मुझे कोई पागलखाना भेज नहीं सकता।
अब तुम पूछते हो: ‘जिसे चाहो वह ठुकराता क्यों है?’
पागलखाने न जाना चाहता होगा। अनुभव जीवन का आदमी को डरा देता है। बुद्धिमान होगा, जो तुम्हें ठुकरा देता है। तुम अपने प्रेम को परखो, फिर से देखो। तुम्हारे प्रेम में कुछ गलत छिपा है। तुम्हारे प्रेम के वस्त्रों में जंजीरें हैं। प्रेम का आवरण है, भीतर कुछ और है। तुम किसी के मालिक होना चाहते हो? तुम किसी पर कब्जा करना चाहते हो? तुम किसी को वस्तु की तरह उपयोग करना चाहते हो? कोई नहीं चाहता कि उसका उपयोग किया जाए; क्योंकि जब भी किसी का उपयोग किया जाता है, उसका अपमान होता है। कोई नहीं चाहता कि कोई उसका मालिक हो; क्योंकि जब भी कोई किसी का मालिक हो बैठता है, तब उस व्यक्ति को अपनी आत्मा को खोना पड़ता है। कोई नहीं चाहता कि परतंत्र हो। प्रेम तो लोग चाहते हैं, लेकिन परतंत्रता नहीं चाहते हैं। और तुम्हारे सब प्रेम में परतंत्रता छिपी हुई है। वह अनिवार्य शर्त है। वह ऐसी शर्त है कि लोग डरने लगे हैं, लोग भयभीत होने लगे हैं, लोग घबड़ाने लगे हैं।
तुम अपने प्रेम को शुद्ध करो। तुम उसे प्रार्थना बनाओ। तुम दो और मांगने की इच्छा मत करो। और तुम जिसे दो, उस पर कब्जा न करो। और तुम जिसे दो, उससे अपेक्षा धन्यवाद की भी मत करो। उतनी अपेक्षा भी सौदा है। और तुम दो, क्योंकि तुम्हारे पास है। और मैं तुमसे कहता हूं कि तुम अगर दोगे, तो हजार गुना तुम्हारे पास आएगा--मगर मांगो मत। भिखमंगों के पास नहीं आता है, सम्राटों के पास आता है। जो मांगते हैं उनके पास नहीं आता। तुम मांगो ही मत। एक बार यह भी तो प्रयोग करके देखो कि तुम चाहो और दो, मगर मांगो मत। नेकी कर और कुएं में डाल। पीछे लौट कर ही मत देखो, धन्यवाद की भी प्रतीक्षा मत करो। और तुम पाओगे, कितने लोग तुम्हारे निकट आते हैं! और कितने लोग तुम्हारे प्रेम के लिए आतुर हैं! और कितने लोग तुम्हारे पास बैठना चाहते हैं! कितने लोग तुम्हारी मौजूदगी से अनुगृहीत हैं!
मगर अभी तुम्हारी मौजूदगी बड़ी जहर भरी है। अभी जब भी तुम हाथ फैलाते हो, दूसरे डरने लगते हैं, क्योंकि तुम्हारे हाथ में उन्हें फांसी का फंदा दिखाई पड़ता है।
ओशो, ज्ञान, ध्यान और योग के मुकाबले में भक्ति अधिक परंपराग्रस्त और रूढ़िवादी क्यों हो जाती है?
पुरुष में थोड़ी परुषता होती है, थोड़ी कठोरता होती है, थोड़ा पाषाण होता है। पुरुष में थोड़ी आक्रामक वृत्ति होती है। पुरुष में थोड़ा अहंकार होता है। पुरुष बहिर्गामी होता है। स्त्री ग्राहक होती है, ग्रहणशील होती है--क्योंकि स्त्री यानी गर्भ--आक्रामक नहीं होती। स्त्री अतिथि का सत्कार करने को द्वार खोल कर खड़ी होती है।
भक्त भी ऐसा ही होता है, परमात्मा के लिए द्वार खोल कर खड़ा हो जाता है। भक्त भी ऐसा ही होता है, परमात्मा के लिए गर्भ बन जाता है। परमात्मा को पुकारता है भक्त, खोजता नहीं। ज्ञानी, ध्यानी, योगी परमात्मा को खोजता है, वह पुरुष की वृत्तियां हैं--खोज। वह जाता पहाड़ों में, पर्वतों में, वह बड़ी यात्राएं करता है, वह परमात्मा को खोजने निकलता है। भक्त शांत बैठ जाता है, आनंदमग्न हो डोलता है और कहता है--जब तुम्हारी मर्जी हो, जब पाओ कि मैं पात्र हूं, आ जाना, मेरे द्वार खुले हैं। मैं तुम्हें कहां खोजूं? खोजना भी चाहूं तो कैसे खोजूं? तुम्हारा घर कहां? तुम्हारा पता कहां? तुम्हारा नाम क्या? मेरी तो कोई पहचान नहीं तुमसे, पहले तो मिलना हुआ नहीं। तुम मिल भी जाओगे तो मैं पहचान न पाऊंगा कि तुम ही मिल गए। तुम्हीं आओ, मैं अवश हूं, मैं असहाय हूं, मैं रो सकता हूं। भक्त रोता है, ज्ञानी खोजता है। भक्त विह्वल होता है, ज्ञानी उपाय करता है।
ज्ञानी मानता है: मेरे किए कुछ हो जाएगा। वही मान्यता पुरुष की मान्यता है। भक्त कहता है: मेरे किए क्या होगा? मेरे किए ही तो सब अनकिया हुआ है। मैं ही तो बाधा हूं। तो भक्त अपने मैं को गिरा देता है, समर्पित हो जाता है, प्रतीक्षा करता है। भक्ति यानी प्रतीक्षा। भक्ति यानी प्रार्थना। बस प्रतीक्षा और प्रार्थना। भक्त के पास और कोई उपाय नहीं, आंसू। रोता, अपने हृदय को उघाड़ता, पुकारता--गहन प्यास से भर कर--और प्रतीक्षा करता।
भक्त के पास परमात्मा आता है। आना ही पड़ता है। जब पुकार पूरी हो जाती है और जब प्यास गहन हो जाती है, तो आना ही पड़ता है। यह अस्तित्व तुम्हारे प्रति उपेक्षा से भरा हुआ नहीं है। इस अस्तित्व से तुम जन्मे हो, यह तुम्हारी मां है। और जब बच्चा पुकारेगा तो मां आएगी। पुकार सच्ची हो, पुकार झूठी न हो, पुकार में वंचना न हो, पुकार किसी क्षुद्र बात के लिए न हो। व्यर्थ बातों के लिए मत पुकारना। क्योंकि तुम्हारी व्यर्थ बातें ही तुम्हारी पुकार को खराब कर देती हैं।
अब तुम बैठे हो और तुम्हें सिगरेट पीनी है, अब परमात्मा को मत पुकारना--कि जरा आ जाओ, वह पॉकेट पड़ा है उधर, उठा कर दे दो! मगर तुम्हारी सब प्रार्थनाएं ऐसी ही हैं--कि पत्नी बीमार है, इसे ठीक करो। कि नौकरी नहीं लगती, मुझे नौकरी लगाओ। कि धंधा नहीं चलता, मेरा धंधा चलाओ। यह सब ऐसे ही है जैसे सिगरेट का बॉक्स पड़ा है उधर, और मैं तो भक्त हूं, उठूं कैसे? तुम्हीं आ जाओ और उठा कर दे दो। और अगर न आए, तो याद रखना, फिर कभी प्रार्थना न करूंगा। फिर मेरा भरोसा ही टूट जाएगा। फिर मेरी श्रद्धा ही खंडित हो जाएगी। एक अवसर देता हूं, अपने को सिद्ध कर लो!
यह भक्ति नहीं है। भक्ति कुछ नहीं मांगती। भक्ति कहती है--तुम्हारी मौजूदगी, तुम्हारी कृपा की एक किरण, बस काफी है, अनंत-अनंत काल के लिए तृप्त कर जाएगी। तुम्हारा एक झरोखा खुल जाए, तुम्हारा एक झोंका आ जाए, एक बूंद मेरे कंठ में गिर जाए तुम्हारी, बस सदा के लिए मैं तृप्त हो जाऊंगा, कुछ और नहीं चाहिए।
तो यह पहले समझो कि भक्ति है स्त्रैणभाव। इसलिए भक्ति परंपरागत और रूढ़िगत दिखाई पड़ती है। क्योंकि स्त्रियां बड़ी सहज हैं, प्राकृतिक हैं। इसलिए शास्त्रों ने स्त्री को प्रकृति कहा है, पुरुष के विपरीत। प्रकृति तुम देखते हो कितनी परंपराग्रस्त है? प्रकृति में तुमने कभी देखा कुछ बदलते? सब वही है। सब वैसा ही है। प्रकृति का वर्तुल एक गति से घूमता रहता है। वर्षा आई, फिर सर्दी आएगी, फिर गर्मी आएगी, फिर वर्षा आ जाएगी--एक वर्तुल है। ऐसा ही सदा हुआ, ऐसा ही सदा होता रहा, ऐसा ही सदा होता रहेगा। वसंत आया और फूल खिल गए। और पतझड़ में पत्ते गिर गए। ऐसा ही सदा होता रहा, ऐसा ही सदा होता है, ऐसा ही सदा होगा। इसको ही लाओत्सु ने ताओ कहा है, और वेदों ने ऋत। इसको ही बुद्ध ने धम्म कहा है।
भक्त तो प्राकृतिक है। जैसे सुबह होती है, सूरज निकलता है, प्रकाश फैलता है, तारे खो जाते हैं; सांझ होती है, सूरज डूबता है, प्रकाश खो जाता है, तारे उग आते हैं। ऐसा सदा से होता रहा है। ऐसी ही भक्ति है--शाश्वत, सनातन। अगर दुनिया में कोई सनातन धर्म है, तो भक्ति। हिंदू से सनातन धर्म का कुछ लेना-देना नहीं है। सनातन धर्म तो एक है--भक्ति। ध्यान विद्रोही है, भक्ति सनातन है। ध्यान नई-नई विधियां खोजता है, क्योंकि ध्यान में विधियां होती हैं; जहां विधियां होती हैं, वहां नई खोजी जा सकती हैं। भक्ति में कोई विधि नहीं है। भक्ति तो निर्विधि है। जहां विधि नहीं है, वहां नई विधि कहां से लाओगे? भक्ति तो भाव है, विधि नहीं है।
तुमने कभी सोचा कि प्रेम कितना परंपरागत है? ज्ञान परंपरागत नहीं होता। ज्ञान बढ़ता है, फैलता है। बहुत सी बातें थीं जो बुद्ध को पता नहीं थीं, वे आइंस्टीन को पता हैं। और बहुत सी बातें हैं जो महावीर को पता नहीं थीं, वे एडिंगटन को पता हैं। आदमी ज्ञान में रोज-रोज नई राशि बढ़ाता जाता है। लेकिन क्या तुम सोचते हो कि प्रेम में ऐसी कुछ बातें थीं जो मीरा को पता नहीं थीं और आइंस्टीन को पता हैं? गलत। प्रेम के संबंध में पहले प्रेमी को जो पता था, वही अंतिम प्रेमी को भी पता होगा। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। प्रेम सनातन है। ज्ञान बदलता है। इसलिए ज्ञान सामयिक होता है। जो आज ज्ञान है, कल अज्ञान हो जाएगा। ज्ञान का कोई भरोसा नहीं है, ज्ञान तो पानी पर खींची लकीर है। प्रेम पत्थर पर खींची लकीर है, मिटती नहीं। प्रेम ही लकीर है जो शाश्वत है। ज्ञान तो तुम देखते हो, कितनी जल्दी बदलता है! अब तो हालत ऐसी हो गई है, इतनी तेजी से ज्ञान बदलता है कि जब तक विश्वविद्यालय की किताब में ज्ञान पहुंचता है, तब तक वह तिथि-बाह्य हो जाता है, आउट ऑफ डेट हो जाता है।
तुम जान कर यह हैरान होओगे कि पश्चिम में अब विज्ञान की बड़ी-बड़ी किताबें नहीं लिखी जातीं--लिखी नहीं जा सकतीं। क्योंकि जब तक तुम बड़ी किताब लिखो--बड़ी किताब लिखने में समय लगता है--तब तक तुम जो लिख रहे हो, वह कुटा-पिटा हो जाएगा। विज्ञान के तो छोटे-छोटे लेख लिखे जाते हैं, विज्ञान के पीरियाडिकल्स होते हैं, क्योंकि विज्ञान खुद ही पीरियाडिकल है। उसकी तो पत्रिकाएं होती हैं--जल्दी छापो। वैज्ञानिक पेपर पढ़ता है, किताब नहीं--कुछ पन्ने। क्योंकि इसके पहले कि पुराना पड़ जाए, कह दो। तुम्हारे कहते-कहते भी पुराना पड़ सकता है।
ज्ञान तो रोज बदलता है। इसलिए ज्ञान पर कोई भरोसा करना मत। क्योंकि जो अभी ठीक है, वह कल सही नहीं रह जाएगा। नई दवा आ गई और डाक्टर कितने भरोसे से तुम्हें दवा देता है, और कहता है कि बस, यह दवा काम करेगी! और छह महीने बाद जाओ, वही डाक्टर दूसरी दवा दे रहा है। उससे पूछो--भई, छह महीने पहले का क्या हुआ? वह दवा जो बहुत काम करती थी, क्या हुई? वह कहता है--वह पुरानी पड़ गई, अब वह काम नहीं करती।
जो अब काम नहीं करती, वह छह महीने पहले कैसे काम करती थी? और जो अब काम कर रही है, छह महीने बाद की कहानी क्या होगी? ज्ञान का कोई भरोसा नहीं है, ज्ञान पानी पर बना हुआ बबूला है। रोज बनता है, रोज मिटता है। प्रेम शाश्वत है।
इसलिए भक्ति में तुम्हें लगेगा ऐसा स्वभावतः कि भक्ति में क्यों परंपरागत मालूम होता है? मीरा कहे भी तो क्या कहे! जो प्रेमियों ने सदा कहा है, वही कहेगी। हां, ज्ञानी आविष्कार कर सकते हैं। ज्ञानी नई-नई ईजादें कर सकते हैं। मगर ईजाद आदमी की है, पिट जाएगी। और प्रेम परमात्मा का है। कितना ही पुराना हो, फिर भी पुराना नहीं होता।
तुम इसे ऐसा समझो कि ज्ञान जल्दी ही पुराना पड़ जाता है, क्योंकि नया होता है। भक्ति पुरानी नहीं पड़ती, सदा नई रहती है, क्योंकि नये-पुराने का कोई संबंध ही भक्ति से नहीं जुड़ता।
कुछ चीजें जीवन के आधार हैं। उन आधारों को रोज-रोज नहीं बदला जा सकता, नहीं तो जीवन गिर जाए। भक्ति वैसा ही आधार है।
इसलिए तुम्हें यह प्रतीति हो सकती है कि भक्ति में रूढ़ि मालूम पड़ती है। रूढ़ि नहीं है वह, रूढ़ि शब्द ज्ञानियों का है--शाश्वतता है, सनातनता है। उसके विपरीत तुम हो तो रूढ़ि कहोगे। अगर उसको समझोगे और उसके आशय में पड़ोगे, तो तुम उसे कहोगे--सनातनता।
सनातन का अर्थ समझ लेना। सनातन का अर्थ होता है: जो न तो कभी नया था और न कभी पुराना होगा, जो सदा है। जो नया है वह पुराना होगा, जो पुराना है वह कभी नया था। नया पुराना होता रहता है, पुराना नया होता रहता है। तुम देखते नहीं, रोज ऐसी बातें होती रहती हैं। एक चीज कुछ दिन फैशन में रहती है, फिर पुरानी पड़ जाती है, फिर खो जाती है, दस-बीस साल बाद फिर लौट आती है। आखिर करोगे क्या? फिर नई हो जाती है। फिर कुछ दिन, फिर पुरानी हो जाती है।
तुम गौर से देखो, फैशन में क्या होता है? एक ढंग के कपड़े आज फैशन में हैं, कल पुराने पड़ गए। फेंक मत देना, सम्हाल कर रख लेना। दस साल बाद तुम पाओगे फिर फैशन में आ गए। सौ साल बाद किसी ओबेराय में विंटेज कपड़ों की प्रतियोगिता होगी, तब तुम लेकर अपना कोट पहुंच जाना कि यह सौ साल पुराना है! देखते नहीं कि कोई अपनी फोर्ड--टी मॉडल, उन्नीस सौ चौबीस की लिए खड़ा है। विंटेज कार! अब उसकी बड़ी कीमत है। बड़ी पुरानी गाड़ी है! अब वह बड़ी नई मालूम पड़ती है कि अब उन्नीस सौ चौबीस की गाड़ियां कहीं दिखाई तो पड़तीं नहीं, वे तो सब खो गईं, अब किसी एकाध के पास बची है, किसी के कबाड़खाने में पड़ी है, वह किसी तरह ठोंक-पीट कर उसे ले आता है; बड़ी नई मालूम पड़ती है! लोग देखने जाते हैं।
पश्चिम में कीमत बढ़ती जा रही है पुरानी गाड़ियों की। जितनी पुरानी गाड़ी, उतना पैसा लाती है। आदमी करे क्या! बैठा-ठाला आदमी करे क्या! फैशन बदल लेता, कपड़े बदल लेता, मकान के ढंग बदल लेता, फिर चीजें बदल कर फिर वही की वही हो जाती हैं। जो नया है वह पुराना होता रहता है, जो पुराना है वह नया होता रहता है--जल में उठी तरंगें हैं।
भक्ति तो जल है, तरंग नहीं। ज्ञान तरंग है। तरंगें उठती रहती हैं सागर में, सागर तो वही है।
ओशो, आपने कहा--अपने प्रेमी, अपनी प्रेयसी में भी परमात्मा ही देखो। यह मेरी समझ में नहीं आया। प्रेम मैंने भी किया है, लेकिन अपनी प्रेयसी में परमात्मा देखना असंभव मालूम होता है। शरीर के नाते-रिश्ते में कहां परमात्मा? वासना के संबंधों में कहां परमात्मा?
और यही तो प्रेमियों का अनुभव है। इसीलिए तो प्रेमी पागल मालूम होते हैं। क्योंकि किसी दूसरे को तो दिखाई नहीं पड़ता। कोई आदमी किसी स्त्री के प्रेम में पड़ गया, फिर उसको लोग पागल समझते हैं, क्योंकि वह ऐसी बातें करता है उस स्त्री के संबंध में कि लोग इधर-उधर मुंह करके हंसते हैं। वे कहते हैं, इसका दिमाग खराब हो गया है। साधारण स्त्री और यह ऐसी बातें कर रहा है बढ़ा-चढ़ा कर, होश में नहीं है।
मजनू पागल था लैला के लिए। उसके गांव के राजा ने उसे बुलाया, क्योंकि उसकी हालत बिगड़ती गई, बिगड़ती गई। गांव भर उसकी चर्चा करता, पागल भी लोग उसे कहते, दीवाना भी कहते और दया भी खाते। आखिर राजा ने उसे बुलाया और कहा, तू इस लैला के पीछे पड़ा है! मैं तेरी लैला को जानता हूं। सच तो यह है कि तेरा इतना लगाव देख कर मैं भी उत्सुक हो गया था कि देखूं यह लैला है कौन? मगर पाया कि एक साधारण सी स्त्री; तू व्यर्थ परेशान हो रहा है। तुझ पर मुझे दया आती है। तू महल के सामने से रोता निकलता है, जब देखो तेरे आंसू गिरते रहते हैं, हर गली तूने भर दी है गांव की--लैला! लैला! मुझे तुझ पर इतनी दया आती है कि तू मेरे राजमहल से कोई भी स्त्री चुन ले।
उसने बारह युवतियां खड़ी करवा दीं। सुंदरतम स्त्रियां थीं राजमहल में, देश की सुंदरतम स्त्रियां थीं। मजनू से कहा, चुन ले। मजनू उनके पास गया, एक-एक को इनकार करता गया, फिर आखिर में बोला: लेकिन इनमें लैला तो कोई भी नहीं। राजा हंसा, उसने कहा, तू पागल है! तू निश्चित पागल है! लोग ठीक ही कहते हैं। लैला इनके सामने कुछ भी नहीं। और मैंने तेरी लैला को देखा है, और मैं ज्यादा अनुभवी हूं, जिंदगी में मैंने बहुत सुंदर स्त्रियां जानी हैं। तूने अभी जाना क्या, जवान छोकरा है! मजनू ने कहा, आप कहते हैं, ठीक ही कहते होंगे। लेकिन लैला को देखने के लिए मजनू की नजर चाहिए, उसके बिना कोई लैला को देख ही नहीं सकता। आपके पास मेरी आंख कहां? आपने अपनी आंख से देखा होगा। मेरी आंख से देखें, तब लैला दिखाई पड़ेगी।
इसलिए प्रेमी पागल मालूम होता है, क्योंकि किसी और को तो दिखाई नहीं पड़ता, प्रेमी को न मालूम क्या-क्या दिखाई पड़ता है। तुमने प्रेमियों की कविताएं देखी हैं? सुनो एक-दो गीत। एक--
दोस्त मैं दामन बचाता किस तरह
मुझसे शाने-जल्वाफर्माई न पूछ
किस तरह वह सामने आई न पूछ
उसका हुस्न और उसकी रानाई न पूछ
वह हिजाब-आलूदा अंगड़ाई न पूछ
दिल न कदमों पर लुटाता किस तरह
वह तबस्सुम, वह तरन्नुम, वह शबाब
वे निगाहें, वे अदाएं, वह हिजाब
उसके आरिज में लहकता है गुलाब
उसकी आंखों में बरसती है शराब
पीके बेखुद हो न जाता किस तरह
दोस्त मैं दामन बचाता किस तरह
उसके ओंठों पर जब आती है हंसी
फैल जाती है फजा में चांदनी
वह है चलती-फिरती जूही की कली
वह है हंसती-मुस्कुराती बांसुरी
गीत उल्फत के न गाता किस तरह
दोस्त मैं दामन बचाता किस तरह
ढूंढ़ता था हुस्न उसका तख्तो-ताज
मांगती थी उसकी रानाई खिराज
सोहनी का नाज, राधा का मिजाज
चाहती थी कर ले मेरे दिल पे राज
मैं भला आंखें चुराता किस तरह
दोस्त मैं दामन बचाता किस तरह
दिल पे हंस कर तीर खाना ही पड़ा
उसके आगे सर झुकाना ही पड़ा
होश मजबूरन गंवाना ही पड़ा
जब्त का खिरमन जलाना ही पड़ा
और जलाता तो बुझाता किस तरह
दोस्त मैं दामन बचाता किस तरह
प्रेम जहां होगा, वहां अपूर्व दिखाई पड़ने लगेगा। वहां साधारण विलीन हो जाता है, वहां हर चीज असाधारण हो जाती है। वहां साधारण सी आंखें कमल के फूल हो जाती हैं। साधारण सी देह में दीप्ति विराजमान हो जाती है। प्रेम तुम्हें आंख देता है। उस आंख के कारण गहराई आती है। गहराई के कारण हर एक के भीतर छिपा परमात्मा दिखाई पड़ता है। जिससे तुम्हारा प्रेम है, उसमें तुम्हें परमात्मा दिखाई पड़ने लगता है। प्रेमी पागल नहीं है, प्रेमी के पास नई तरह की आंख है जो गहरे में देख पाती है।
भक्त ऐसा प्रेमी है, जो एक के प्रेम में नहीं, सबके प्रेम में पड़ गया, जो समग्र के प्रेम में पड़ गया। इसलिए वृक्षों में भी उसे वही दिखाई पड़ता है, पत्थरों में उसे वही दिखाई पड़ता है, लोगों में भी वही दिखाई पड़ता है, उसके अतिरिक्त और कोई दिखाई ही नहीं पड़ता। अपने भीतर भी वही, अपने बाहर भी वही।
नहीं, तुमने प्रेम किया ही नहीं होगा। तुमने कुछ और किया, तुम उसे प्रेम समझ बैठे। तुमने अपने अहंकार को सजाया होगा, अहंकार को गंवाया न होगा। अगर तुमने प्रेम से अहंकार को सजाया, तो चूक जाओगे; अगर प्रेम में अहंकार को गंवाया, तो तुम्हें ध्यान की पहली झलक मिलेगी। तुम पर निर्भर है सब। तुम जानते ही नहीं कि प्रेम का अर्थ होता है अपने को गंवाना। और जहां अपने को गंवाया, वहीं से तो प्रार्थना की शुरुआत है।
इस दूसरे गीत को सुनो--
फिर तुम्हें लिख दूं धरा के भाल पर
फिर तुम्हें रच दूं गगन के गाल पर
हो गए मुझको बहुत से दिन तुम्हारी छवि संवारे
झर गए कितने धरा के फूल, नभ के नील तारे
भूल बैठे रात-दिन आलोक की पगडंडियों को
भूल बैठी है नदी सौंदर्य से जकड़े किनारे
फिर तरंगों को तुम्हारी बांह दूं
फिर कमल-वन को तुम्हारी छांह दूं
है समय छिछला, बहुत ओछा, नशे के ज्वार जैसा
स्वप्न मेरा गुरु-गहन है जागरण के सार जैसा
मुक्त, चिर निर्बंध में मेरे उदय की भव्यता हो
इन घृणा के कंटकों में तुम दया की दिव्यता हो
रागबंधों का तुम्हें सत्कार दूं
पूर्ण अर्पण का अकंपित प्यार दूं
शुक्लवर्णी ऋतु तुम्हीं में आंक दूं
छोर सुषमा के तुम्हीं में टांक दूं
मैं तुम्हें बांधूं गिरा के प्राण से
रूप-श्री लालित्य के दिनमान से
फिर तुम्हें लिख दूं धरा के भाल पर
फिर तुम्हें रच दूं गगन के गाल पर
जब तुम किसी के प्रेम में पड़ोगे, तो वहां से तुम्हें पहली भनक मिलेगी अस्तित्व के रहस्य की; वहां से तुम्हें पहली खबर मिलेगी कि यह जीवन ऊपर-ऊपर नहीं है; जो ऊपर से दिखाई देता है, उस पर समाप्त नहीं है। जीवन की और-और गहराइयां हैं। जीवन के और-और तल हैं। दृश्य पर समाप्त नहीं है जीवन, अदृश्य है। प्रेमी को अदृश्य की भनक पड़नी शुरू होती है। उसे शून्य के स्वर सुनाई पड़ने लगते हैं। उसे दूसरे के हृदय की ऊष्मा अनुभव होने लगती है। दो प्रेमी दो देहों का मिलन नहीं हैं। जहां दो देहें ही मिलती हैं, वहां तो केवल काम है, प्रेम नहीं। जहां दो मन मिलते हैं, वहां प्रेम की शुरुआत है। और जहां दो आत्माएं मिल जाती हैं, वहां प्रेम की पूर्णता है, वहां भक्ति है।
तुम पूछते: ‘आपने कहा--अपने प्रेमी, अपनी प्रेयसी में भी परमात्मा ही देखो।’
अगर प्रेमी और प्रेयसी में न देख सकोगे, तो फिर कहां देखोगे? फिर तो जगत खाली है। फिर तो जगत कोरा है। वहीं खोजो, वहीं मंदिर है, उन्हीं सीढ़ियों पर सिर झुकाओ। प्रेम में डूबो, वहीं से कुरान की आयतें उठेंगी और वेद के स्वर। वहीं मीरा जगेगी। वहीं शांडिल्य के सूत्र सत्य होंगे।
तुम कहते: ‘यह मेरी समझ में नहीं आया। प्रेम मैंने भी किया है, लेकिन अपनी प्रेयसी में परमात्मा देखना असंभव मालूम होता है।’
फिर कहां संभव होगा? फिर कैसे संभव होगा? फिर तुम्हारे लिए नास्तिक होने के अतिरिक्त और कोई उपाय न रह जाएगा। जो प्रेम में हार गया, वही नास्तिक है। जो प्रेम में पराजित हुआ, वही नास्तिक है। जब प्रेम में भी नहीं मिला, तो स्वभावतः तुम कहोगे कि है ही नहीं। प्रेम सबसे ऊंची उड़ान है। उतनी ऊंची उड़ान की और फिर भी उसकी कोई झलक न मिली, तो फिर कहां मिलेगा?
‘शरीर के नाते-रिश्ते में कहां परमात्मा?’
परमात्मा शरीर में बसा है। नहीं तो शरीर ही नहीं होगा। नहीं तो लाश में और जीवित आदमी में फर्क क्या है? यही फर्क है कि एक में अभी परमात्मा चलता, बोलता, उठता, सोचता; एक में परमात्मा विदा हो गया। एक में घर खाली है, एक में घर मालिक से भरा है। एक दीया जलता है, रोशनी है, और एक दीया बुझा है। जहां तक दीयों का संबंध है, दोनों एक जैसे हैं, लेकिन रोशनी के संबंध में भेद पड़ गया है। हर जीवित व्यक्ति में जीवन है। जीवन यानी परमात्मा। जीवन यानी ज्योति। जहां वृक्ष जी रहा है, वहां परमात्मा है। जहां गति है, वहां परमात्मा है।
तुम कहते: ‘शरीर के नाते-रिश्ते में कहां परमात्मा?’
परमात्मा का ही नाता-रिश्ता है। सबसे छोटा है, पहली सीढ़ी है उस बड़ी यात्रा की, लेकिन है तो उसी बड़ी यात्रा की पहली सीढ़ी। पहला सोपान भी है तो सोपान ही। उस पर रुक मत जाना, मगर उसकी निंदा भी मत करना। उस पर चढ़ना और पार जाना।
‘वासना के संबंधों में कहां परमात्मा?’
वासना कीचड़ भरी है, सच, मगर कीचड़ से कमल पैदा होते हैं। और वासना से ही प्रार्थना के फूल खिलते हैं।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Is eating meat auspicious or inauspicious?
According to Osho, auspiciousness isn’t about fixed dietary rules but about what supports your inner silence. The only touchstone is your own meditative clarity: if eating meat deepens your awareness and quietens the mind, it is auspicious; if it agitates you or hinders meditation, it is inauspicious. Let direct experience—not ideology—guide your choice.
In simple terms: Eat what helps you be calm and aware; if meat makes meditation easier it’s fine, if it disturbs you, don’t eat it.
How does man keep going despite the suffering of life?
According to Osho, man keeps going because hope outwits experience: despite suffering, the mind projects a saving tomorrow, fueled by stories, ambition, and society’s praise of victory. This future-fix postpones awakening, leaving both defeat and triumph hollow. Seeing the futility of “tomorrow” and dropping ambition turns one inward, where real freedom and joy can arise now.
In simple terms: We keep going because we believe tomorrow will fix today, so we chase wins that don’t fill us instead of waking up now.
What lies beyond good and bad?
According to Osho, beyond good and bad is the state where your being becomes an unbreakable rhythm with existence (non-doership, para-bhakti), so the doer dissolves and only the divine acts. In this sant or paramhansa state, choice and doubt vanish; action flows effortlessly, innocent and steady, unaffected by heaven or hell, because the fundamental 'I am' has disappeared.
In simple terms: When you become one with life’s music, there’s no separate ‘me’ choosing—right action happens by itself, so good and bad no longer apply.
What does it mean to see the Divine in a beloved?
According to Osho, to see the Divine in a beloved is the hallmark of real love: love turns the ordinary into the sacred, making the beloved a living doorway through which the Divine shimmers. It is your loving vision (Majnu's eyes), not the other's features, that reveals it. If this glimmer does not arise, the relationship is driven by desire or lust, not love.
In simple terms: True love makes you see a sparkle of God in the one you love, as if they are a window to something holy.
Why do those I desire reject me?
According to Osho, people reject the one who desires them because they intuit the hidden hook in wanting—jealousy, ownership, exploitation, and bondage masquerading as love. Desire threatens their freedom, so they protect themselves. Purify desire into prayer: drop possessiveness and demands, give without expecting return. When love is only giving—no hook, only dough—others relax, feel blessed, and naturally come close.
In simple terms: People run from your “love” when it feels like a trap; make it free and giving, and they’ll want to stay.
Why does devotion seem more traditional and orthodox than knowledge, meditation, and yoga?
According to Osho, devotion (bhakti) appears more traditional and orthodox because it is the feminine, receptive mood: it drops methods and the ego’s “doing,” waits in prayer, and aligns with nature’s timeless, cyclical rhythm. By contrast, knowledge, meditation, and yoga are masculine searches—active, devising techniques, outward-bound. Bhakti’s simplicity and surrender feel conservative, yet they open a womb-like space for grace.
In simple terms: It seems old-fashioned because it’s about quietly waiting with an open heart, like nature’s steady seasons, instead of rushing around using methods to “find” God.
What is auspicious and what is inauspicious, and what lies beyond them?
According to Osho, auspicious isn’t social morality—it’s whatever supports your inner rhythm, deepens your inner music, and moves you toward samadhi, communion with the divine. Inauspicious is whatever obstructs or fragments that inner harmony. The true touchstone is within, not in codes. Beyond both is samadhi itself—the timeless good where dualities like moral/immoral or auspicious/inauspicious dissolve.
In simple terms: Auspicious is what makes your inner music calmer and clearer; inauspicious is what disturbs it; beyond both is a silent clarity (samadhi) beyond right and wrong.
What obstacle does meat-eating create for the spirit?
According to Osho, meat-eating burdens the spirit with tamas—dullness, heaviness, and insensitivity—because it involves violence against highly sensitive life. Choosing taste over life coarsens awareness, blinds compassion, and makes one unfit for finer spiritual perception. Even carcass meat is 'stale' and tamasic, further clouding consciousness. Therefore deep religious sensitivity naturally moves toward vegetarianism.
In simple terms: Eating animals for taste makes your heart and mind dull and less kind, so it’s harder to grow spiritually.
