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Questions in this Discourse
ओशो, अनेक संतों और सिद्धों के संबंध में कथाएं प्रचलित हैं कि वे जिन पर प्रसन्न होते थे उन पर गालियों की वर्षा करते थे। परमहंस रामकृष्ण के मुंह से ऐसे ही बहुत गालियां निकलती थीं, बात-बात में गालियां। यही बात प्रख्यात संगीत गुरु अलाउद्दीन खां के जीवन में भी उल्लेखनीय है। क्या इस पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करेंगे?
इस कारण रामकृष्ण कभी पीठ भी ठोंकते थे, कभी गालियां भी देते थे। और ऐसा रामकृष्ण के संबंध में ही नहीं, अनेक सिद्धों के संबंध में है। शिरडी के साईंबाबा गालियां देते, पत्थर मारते, डंडा लेकर पीछे दौड़ते। लोग सोचते थे, विक्षिप्त हो गए हैं। विक्षिप्त नहीं थे। जैसे-जैसे उनकी मृत्यु करीब आने लगी उतनी ज्यादा गालियां देते थे, ज्यादा पत्थर फेंकते थे, ज्यादा मारने दौड़ते थे। लोग सोचते थे कि अब पागलपन पराकाष्ठा पर पहुंच गया। ऐसी बात नहीं थी। मौत करीब आ रही थी, इसलिए जल्दी में थे। मौत द्वार पर खड़ी होने के निकट हो गई थी, इसलिए जिनके भी जीवन में थोड़ी संभावना थी, जिनके जीवन में भी चोट से कोई क्रांति हो सकती थी, उनको चोट करने के लिए कोई भी अवसर छोड़ना नहीं चाहते थे। दुनिया कहे पागल तो चलेगा।
सिद्धों को इससे अंतर नहीं पड़ता कि दुनिया क्या कहती है। सिद्धों को तो सिर्फ एक ही लक्ष्य है, जो उन्हें मिला है उसे बांट दें। लेकिन उसे केवल वे ही लोग ले सकते हैं जिनके भीतर से अहंकार विदा हो गया हो। जिनके पात्र अहंकार से भरे हैं उनके पात्रों में परमात्मा नहीं ढाला जा सकता। जिनके पात्र अहंकार से खाली हैं उनके पात्र ही केवल परमात्मा को स्वीकार कर सकेंगे। तुम अपने से खाली हो जाओ तो परमात्मा दौड़े और तुम्हें भर दे।
इसलिए जो जानते थे, जो पहचानते थे, वे तो कहेंगे कि सदगुरु की कृपा हो तो ही वह गाली देता है। नहीं तो गाली देने की तकलीफ उठाएगा? उसकी महाकृपा हो तो ही वह डंडा लेकर तुम्हारे पीछे दौड़ेगा। उसका डंडा लेकर तुम्हारे पीछे दौड़ना या तुम्हें गाली देना, इस बात का सबूत है कि तुम काम के आदमी हो; कि तुम में कुछ होने की संभावना है; कि बीज अंकुरित हो सकता है; कि दीया जल सकता है; कि तुम इस योग्य हो कि सदगुरु जो भी चेष्टा कर सकता हो करे; शायद तुम बिलकुल करीब हो। जैसे निन्यानबे डिग्री पर पानी गर्म हो और सौ डिग्री पर भाप बन जाए, शायद तुम निन्यानबे डिग्री पर हो। जरा सा धक्का! कौन जाने एक गाली ही धक्का दे दे, एक चोट धक्का दे दे!
झेन फकीर गालियां ही नहीं देते थे, झेन फकीर तो मारते-पीटते। एक झेन फकीर ने तो अपने शिष्य को खिड़की से उठा कर बाहर फेंक दिया। तीन मंजिल मकान! वह जब नीचे गिरा शिष्य, तब सदगुरु ऊपर खिड़की से झांका और पूछा, कहो, कैसी रही! उस क्षण में सदगुरु का खिड़की से झांकना और देखना और पूछना, कहो कैसी रही! और वे प्रज्वलित आंखें और वह आनंदमग्न भाव--शिष्य तो भूल ही गया कि फेंका गया है तीन मंजिल से, कि हड्डियां टूट गई हैं! उस एक क्षण में उसे याद ही न रही देह की। उस एक क्षण में सब विस्मृत हो गया। उस एक क्षण में क्रांति घट गई। जो वर्षों अध्ययन-मनन और ध्यान से नहीं हो सका था, वह उस एक क्षण में हो गया। हड्डियां तो टूट गईं, मगर आत्मा मिल गई। और हड्डियां तो ऐसे ही टूट जाएंगी; उन्हें तो मिट्टी में मिल ही जाना है; मिट्टी से बनी हैं और मिट्टी में गिर जाना है।
अपात्र को गाली नहीं देता सदगुरु। अपात्र की तो इतनी योग्यता नहीं कि सदगुरु इतना श्रम ले। लेकिन बड़ा कठिन है, आज की दुनिया में और कठिन हो गया है। जैसे-जैसे मनुष्य सभ्य हुआ है, शिष्टाचारी हुआ है, सुसंस्कृत हुआ है, वैसे-वैसे उसकी समझ से कुछ बड़ी बहुमूल्य बातें खो गई हैं। अगर आज रामकृष्ण तुम्हें गाली दें तो तुम दुबारा उस द्वार पर ही न जाओगे। अगर रामकृष्ण गाली दें तो सिर्फ यही सिद्ध होगा तुम्हारी आंखों में कि इस आदमी को अभी कुछ भी नहीं हुआ--गाली बकता है! संत और गाली बके! अगर कोई सदगुरु तुम्हारे पीछे डंडा लेकर पड़ जाए तो तुम उसे विक्षिप्त ही समझोगे। संत तो दूर, सज्जन भी न समझोगे।
यह मनुष्य की बहुत दीन दशा है, हीन दशा है। मनुष्य की समझ जीवन-रूपांतरण के संबंध में बहुत कम हो गई है। हमारी अवस्था वैसी ही हो गई है जैसे कि चिकित्सक, शल्य चिकित्सक, तुम्हारे शरीर में इकट्ठी मवाद को निकालने के लिए दबाए और तुम्हें पीड़ा हो, और तुम समझो कि वह दुश्मन है; कि शल्य चिकित्सक तुम्हारे हाथ-पैर काटे, कि उनमें भरे जहर को बाहर निकाले, और तुम समझो कि वह दुश्मन है। सदगुरुओं की ये गालियां शल्य-चिकित्सा हैं।
ओशो, आप कल की भांति हमेशा ही मेरी झोली खुशियों से भर देते हैं। मेरे प्रभु, कैसे आपको धन्यवाद दूं! देखो न यह धन्यवाद शब्द ही कितना छोटा है, कितना असमर्थ! आपने जो दिया है वह विराट! कैसे कहूं दिल की बात! पर कहे बिना रहा भी नहीं जाता। आंखें आपके प्रेम में आंसुओं से भर गई हैं, हृदय आनंद से और रोम-रोम अनुग्रह से। मेरे प्यारे प्रभु, इसी तरह मुझमें समाए रहना! मैं तो बार-बार आपको भूल-भूल जाती हूं, पर आप इसी भांति याद बन कर मेरी सांस-सांस में समाए रहना!
मैं तो सब की झोली भर दूं। क्योंकि जिस आनंद से मैं तुम्हारी झोली भर रहा हूं वह आनंद कुछ ऐसा नहीं है कि एक की भर दी तो मेरे पास कम हुआ। बात ठीक इससे उलटी है: जितनी झोलियां भर जाएंगी उतना वह मेरे पास ज्यादा होगा। उपनिषद कहते हैं न--पूर्ण से पूर्ण को भी निकाल लो तो भी पीछे पूर्ण ही शेष रह जाता है! मैं सब लुटा दूं तो भी पीछे पूर्ण ही शेष रहेगा। मैं लुटाता रहूं, लुटाता रहूं, लुटा न पाऊंगा। मैं कितना ही उलीचूं, उलीच न पाऊंगा। जैसे ही अहंकार शून्य हुआ कि तुम्हारे भीतर से पूर्ण बहना शुरू होता है। फिर बांटो, जी भर कर बांटो!
मगर लोग लेने तक में संकोची हो गए हैं--कैसे लें! कैसे झोली फैलाएं! कैसे झुकें! नदी सामने बह रही है और लोग प्यासे खड़े हैं, तड़फ रहे हैं। लेकिन अहंकार कहता है, झुकना मत!
अब नदी तुम्हारे कंठ तक आने से रही। झुकना होगा! हाथ की अंजुली बनानी होगी! तो नदी जरूर तुम्हें तृप्त कर दे।
नीलम, तू जब आती है मेरे पास तो झोली फैलाने की पूरी क्षमता लेकर आती है। तू जो आती है तो एक फैली झोली की तरह ही आती है। तुझे आंचल फैलाने में जरा भी दुविधा नहीं है। तुझे झुकने में जरा अड़चन नहीं है। इसलिए सहज ही तेरी झोली भर जाए, इसमें मेरा कुछ गुण नहीं है, तेरा ही गुण है।
सूरज तो निकला है, जो आंख खोलेगा उसकी आंख रोशनी से भर जाएगी। इसमें सूरज का क्या गुण है? सूरज तो निकला ही है। और जो आंख बंद रखेगा उसकी आंख अंधेरे से भरी रहेगी।
आंख खोलो, सूरज उगा है। हृदय खोलो, परमात्मा बरस रहा है।
मगर लोग हृदय बंद किए, आंख बंद किए, अपने को चारों तरफ से पत्थर की तरह सख्त किए बैठे हैं। और फिर पूछते हैं, ईश्वर कहां है? फिर पूछते हैं रोशनी दिखाई नहीं पड़ती! फिर पूछते हैं, कहीं कोई संगीत सुनाई नहीं पड़ता!
कैसे संगीत सुनाई पड़े? कैसे रोशनी उतरे? कैसे अमृत तुम पर बरसे? परमात्मा एक क्षण को भी अनुपस्थित नहीं है। जो अनुपस्थित हो जाए वह परमात्मा नहीं। यह सारा अस्तित्व उसी से भरा है, लबालब भरा है। बस अगर कहीं कोई कमी हो रही है तो हमारी तरफ से होती है कमी। हम लेने को राजी नहीं होते। पाहुन द्वार पर खड़ा होता है और हम द्वार नहीं खोलते! हम से इतना भी नहीं होता कि कह सकें स्वागतम्।
नीलम, तेरी झोली और-और खुशियों से भरती जाएगी--ऐसी खुशियों से जो कोई छीन न सकेगा। ऐसा आनंद तेरी संपत्ति बनेगा जो शाश्वत है। तेरे समर्पण में सुनिश्चित हुई जा रही है यह बात। तेरे अर्पित भाव में तेरे आनंद की सुरक्षा है। सत्य तुझे मिलेगा, क्योंकि तू मिटने को राजी है।
और एक बात और समझ लेनी चाहिए। तू कहती है: ‘आप कल की भांति हमेशा ही मेरी झोली खुशियों से भर देते हैं।’
अगर ठीक-ठीक कहें, तो मैं तेरी झोली खुशियों से भर देता हूं, यह कहना भी ठीक नहीं। झोली तो तेरी खुशियों से भरी ही है; तू फैलाती है तो तुझे दिखाई पड़ जाता है। लोग झोली बंद किए बैठे हैं; उनकी झोली में क्या पड़ा है, वह भी उन्हें दिखाई नहीं पड़ता। मैं तुझे वही दे सकता हूं जो तेरे पास है ही और मैं तुझ से वही छीन सकता हूं जो तेरे पास नहीं है।
यह आध्यात्मिक जीवन का आधारभूत सूत्र है। सदगुरु वही देता है जो तुम्हारे पास है ही, सदा से है, शाश्वत से है, सनातन से है; कुछ नया नहीं देता। इस सूरज के तले कुछ भी नया नहीं। और सदगुरु तुमसे वही छीन लेता है जो तुम्हारे पास है ही नहीं; प्रथम से ही नहीं है।
बात थोड़ी उलटी लगेगी। वही देना जो है और वह छीन लेना जो नहीं है--उलटबांसी लगेगी। लेकिन अगर थोड़ा गहरे में सोचोगे, उतरोगे, ध्यान करोगे, तो उलटबांसी नहीं लगेगी; सब सीधा साफ-सुथरा हो जाएगा। दो और दो चार की तरह स्पष्ट हो जाएगी बात।
आनंद तुम्हारा स्वभाव है। तुम्हें विस्मरण हो गया है। सदगुरु झकझोर कर याद दिला देता है। जैसे कोई आदमी सोया हो, जागना उसका स्वभाव है। और तुम उसे झकझोर कर जगा दो तो वह आदमी क्या तुमसे कहेगा कि तुमने मुझे जागरण दिया? हां, औपचारिक रूप से कह सकता है कि धन्यवाद कि आपने मुझे जगाया। लेकिन जागने की उसकी क्षमता थी ही। अगर जागने की क्षमता न होती तो सो भी न सकता। सो वही सकता है जिसकी जागने की क्षमता है। दुखी वही हो सकता है जिसकी आनंद की क्षमता है। मृत्यु उसी की हो सकती है जिसकी अमृत की क्षमता है। सो गया था, क्योंकि जाग सकता है। तुमने झकझोर दिया। झकझोरने से जागना पैदा नहीं होता; झकझोरने से, जागना तो भीतर पड़ा ही था, उभर कर ऊपर आ जाता है। और तुमने छीन क्या लिया? तुमने नींद छीन ली।
नींद स्वभाव नहीं है, नहीं तो छीना न जा सकता। स्वभाव को छीना नहीं जा सकता। नींद कृत्रिम है, ऊपर से है, आवरण है; इसलिए छीनी जा सकती है। अहंकार छीना जा सकता है, क्योंकि अहंकार झूठ है। आत्मा दी नहीं जा सकती, क्योंकि आत्मा सत्य है।
तेरी झोली खुशियों से भर जाती है--नहीं कि मैं उसे खुशियों से भर देता हूं; बस इतना ही कि मेरे निकट तेरे श्रद्धा का भाव इतना है, तेरी आस्था इतनी है, तेरा समर्पण इतना है कि तू निष्कपट भाव से अपने हृदय को खोल कर रख देती है। उस निष्कपट भाव से खोले गए हृदय में तुझे तेरे ही हीरे दिखाई पड़ जाते हैं, तुझे तेरी ही संपदा का अनुभव हो जाता है। मुझे कुछ देना नहीं पड़ता।
और यह सूत्र समझ में आ जाए तो फिर मेरे बिना भी जहां भी तू सरलता से हृदय को खोल कर रख देगी--किसी नदी-तट पर एकांत में, कि किसी पर्वत-शिखर पर, कि किसी वृक्ष के पास, कि एकांत में अपने घर में, कि किसी मंदिर में, कि मस्जिद में--जहां भी हृदय को खोल कर रख सकेगी, वहीं तत्क्षण आनंद का उन्मेष हो जाएगा, रोआं-रोआं पुलकित हो जाएगा।
खयाल रहे, तुम्हारा आनंद किसी भी तरह मुझसे बंध न जाए। ऐसा न हो कि मेरे बिना तुम्हें आनंद न मिले। ऐसा न हो कि तुम्हारा आनंद मुझ पर निर्भर हो जाए। अन्यथा बड़ी भूल हो जाएगी।
मैं तुम्हें मुक्ति देना चाहता हूं। मैं तुम्हें स्वतंत्रता देना चाहता हूं। मैं तुम्हें देना चाहता हूं तुम्हारे भीतर छिपा हुआ छंद। तुम्हारा गीत तुम्हें मिल जाए। तुम्हारी जीत तुम्हें मिल जाए। तुम्हारा राज्य तुम्हें मिल जाए। तुम्हारा ही है! सम्राट सो गया है और भिखारी होने का सपना देख रहा है। मैं झकझोर दूंगा और जगा दूंगा। राज्य उसका है--उसका ही था! जब सोया था तब भी उसका था। जब भूल गया था तब भी उसका था।
और मैं छीन क्या लूंगा? छीन लूंगा उसका भिखमंगापन, जो कि वह था ही नहीं, केवल सपना देखता था।
दुख तुम्हारा स्वप्न है, आनंद तुम्हारा स्वभाव है।
जो घटना शुरू हुआ है, नीलम, उसे घटाए जाना। मेरे पास तो शुरुआत होगी, लेकिन धीरे-धीरे मुझसे दूर भी उसे घटाना। धीरे-धीरे मेरे बिना भी उसे घटाना। मैं निमित्त मात्र बनूं, मैं कारण न बन जाऊं। मैं कारण हूं भी नहीं। कोई सदगुरु शिष्य के जागरण का कारण नहीं होता, मात्र निमित्त होता है। मैं सिर्फ एक अवसर हूं। इस अवसर का उपयोग कर लो। और एक दफा होश आ जाए तो फिर उस होश का उपयोग जगह-जगह करना, अलग-अलग स्थितियों में, अलग-अलग परिस्थितियों में।
और इसीलिए मैं अपने संन्यासी को नहीं कहता कि संसार छोड़ कर भाग जाओ, क्योंकि मैं चाहूंगा जो तुम्हें ध्यान में, प्रेम में, नृत्य में, गीत में, मेरे पास अनुभव हो रहा है, वही तुम्हें बीच बाजार में भी अनुभव होना चाहिए, तो ही सच्चा है, तो ही खोटा नहीं है, तो ही खरा है। बीच बाजार के शोरगुल में भी अगर तुम्हारे भीतर वही शांति घनी रहे जो यहां मेरे पास घनी है, सघन होती है; घर की चिंताओं, उपद्रवों, संकटों के बीच में भी तुम्हारे भीतर वही अहर्निश नाद बजता रहे जो यहां मेरे पास बजता है, तो ही जानना कि जो मिला वह मिला। अगर बाजार में खो जाए, अगर भीड़ में हाथ से छिटक जाए, अगर काम-धाम की दुनिया में, आपा-धापी में भूल जाए, तो समझना कि मिला ही न था। तो इतना ही समझना कि मेरे पास बैठ कर मेरी शांति की तरंग को तुमने अपनी शांति समझ ली थी; दूर गए, खो गई। मेरी तरंग तुम्हारी तरंग नहीं बननी चाहिए। मेरी तरंग केवल तुम्हारी तरंग को जगाने का निमित्त बननी चाहिए।
और नीलम, मैं खुश हूं, तुझ से बहुत खुश हूं। वैसा हो रहा है। तुझ से ही नहीं, और बहुतों से भी वैसा हो रहा है। मैं अपने संन्यासियों से अति आनंदित हूं। इस अर्थ में मैं सौभाग्यशाली हूं कि जितना बुद्धिमान वर्ग संन्यासियों का मुझे उपलब्ध हुआ है उतना बहुत मुश्किल से कभी किसी को उपलब्ध होता है। मनुष्य रोज-रोज ज्यादा विचारशील होता गया है। आज मनुष्य के पास जैसी प्रतिभा है, अगर उसे धार्मिक मोड़ मिल सके तो इस दुनिया में धर्म का विस्फोट हो जाए। अगर नहीं मिला मोड़ तो अधर्म का विस्फोट होगा। वही प्रतिभा अधर्म बनेगी, वही प्रतिभा धर्म बन सकती है।
आज ऊर्जा हमारे हाथ में है। अगर जरा समझ का दीया जला तो यही ऊर्जा इस पृथ्वी को स्वर्ग बना लेगी, अन्यथा मरघट होने में ज्यादा देर न लगेगी। यह पृथ्वी किसी भी दिन मरघट हो सकती है। यह पृथ्वी सारी की सारी हिरोशिमा और नागासाकी हो सकती है।
इतनी महत्वपूर्ण घड़ियां आदमी के हाथ में कभी भी नहीं थीं। तुम सौभाग्यशाली हो, तुम मनुष्य-जाति के इतिहास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षणों में जी रहे हो। ये आने वाले बीस वर्ष, इस सदी का अंतिम चरण, मनुष्य के इतिहास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्ष सिद्ध होने वाले हैं; या तो आदमी की प्रतिभा आत्मघात बन जाएगी या आत्मरूपांतरण।
प्रतिभा दुधारी तलवार है। अगर गलत रास्ते पर प्रतिभा चली जाए तो खतरनाक हो जाता है जीवन। अगर वही प्रतिभा ठीक रास्ते पर मुड़ जाए तो जीवन फूलों से भर जाता है।
मेरे पास जो वर्ग इकट्ठा हो रहा है वह सामान्य मध्यवर्गीय प्रतिभा का नहीं है। मेरे पास जो लोग इकट्ठे हो रहे हैं, प्रथम कोटि के प्रतिभा के लोग हैं। मेरी बात ही उनकी समझ में पड़ रही है जो प्रथम कोटि की प्रतिभा रखते हैं।
तृतीय श्रेणी की प्रतिभा के लोग तो न मालूम क्या-क्या सोच रहे हैं, न मालूम क्या-क्या विचार रहे हैं! उन्हें मेरी बात समझ में भी नहीं आ सकती। तृतीय श्रेणी के लोग तो सदा अतीत से बंधे रहते हैं--कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई ईसाई है, कोई कुछ है, कोई कुछ है। तृतीय श्रेणी की प्रतिभा के लोग तो हजारों साल पीछे होते हैं समय के।
प्रथम श्रेणी के लोग समय के पहले बात को समझ पाते हैं। और जो समय के पहले बात को समझ ले वही समझदार है। समय बीत जाने पर तो सभी समझदार हो जाते हैं। ठीक समय के रहते जो समझ ले वह समझदार। और समय के पहले जो समझ ले उसका तो कहना क्या! और मैं खुश हूं कि मेरे पास जो लोग इकट्ठे हुए हैं वे हीरे हैं; उन पर जरा धार रखने की जरूरत है।
नीलम, तू नीलम ही है, थोड़ी सी धार रखने की जरूरत है। और धार रखी जा रही है और निखार आना शुरू हो गया है। और मैं वैसे ही प्रसन्न हूं जैसे किसी माली के बगीचे में फूल खिलने शुरू हो जाएं और माली प्रसन्न होता है।
ओशो, हम कैसे जीएं कि जीवन में कोई भूल न हो?
भूल में कुछ बुराई नहीं है। हां, एक ही भूल दुबारा नहीं होनी चाहिए। भूल से ही तो आदमी सीखता है, संवरता है। भूल ही तो धार रखती है। भूल ही तो तेजस्विता देती है। भूल तो चुनौती है।
नयी-नयी भूलें करो। रोज-रोज भूलें करो। हां, वही-वही भूलें मत करना। वही-वही भूल जो करे वह जड़बुद्धि है; वह सीख नहीं रहा है। एक बार तो क्षम्य है, क्योंकि बिना भूल किए तुम जानोगे ही कैसे कि वह भूल है? और बिना भटके कोई पहुंचा है? और बिना भटके जो पहुंच जाएगा उसमें रीढ़ नहीं होगी, उसमें प्राण नहीं होंगे, उसमें आत्मा नहीं होगी।
मैंने सुना है, बड़ी पुरानी कहानी है मिश्र की, कि एक किसान ने बहुत परेशान होकर एक दिन ईश्वर से कहा--पुरानी कहानियों में ईश्वर इतने दूर नहीं था जितना अब है; सुन लेता था, ऐसे ही घर के छप्पर के पास ही रहता होगा--जोर से चिल्ला कर कहा कि हद हो गई, ऐसा लगता है कि तुझे किसानी करनी आती ही नहीं। अगर एक साल मौका मुझे दे तो मैं तुझे दिखलाऊं कि किसानी कैसे की जाती है। सब उलटा-सीधा चल रहा है। जब पानी की जरूरत है पानी नहीं गिरता; बढ़ते पौधे सूख जाते हैं। जब पानी की जरूरत नहीं तब पानी गिरता है; बढ़े-बढ़ाए पौधे बाढ़ में बह जाते हैं। और फिर कितने कीड़े, कितने मकोड़े और कितने टिड्डी दल और कितना कुहासा! तुझे कुछ होश है? तुझे खेती-बाड़ी का कुछ पता है?
ईश्वर ने कहा, तो ठीक, इस साल तू सम्हाल। इस साल तू जैसा चाहेगा वैसा ही होगा।
किसान ने सारी योजना बनाई। जीवन भर का अनुभवी किसान था। पाले देखे थे, ओले देखे थे, तूफान देखे थे, आंधियां देखी थीं, अंधड़ देखे थे, बाढ़ देखी थी, सूखा देखा था, सब देख चुका था। उसने बड़ी व्यवस्थित योजना बनाई। और उसकी खुशी का कोई ठिकाना न था! जब उसके गेहूं के वृक्ष, गेहूं के पौधे आदमी के सिर के ऊपर जाने लगे तो उसने कहा अब पता चलेगा परमात्मा को कि खेती कैसे की जाती है! और बड़ी-बड़ी बालें आईं, पौधे भी बड़े थे और बड़े हरे थे। जब पानी की जरूरत थी, जितनी जरूरत थी, उतना पानी उसने मांगा, उतना पानी गिरा। जब धूप की जरूरत थी, सूरज की जरूरत थी, जितनी जरूरत थी, उतना उसने मांगा, उतना सूरज चमका। न टिड्डी दल आए, न पाला पड़ा, न ओले गिरे, न कीड़े-मकोड़े लगे। उसने सारी व्यवस्था कर रखी थी। फिर फसल काटने के दिन आए, उसके आनंद का अंत नहीं था। उसने सारे गांव को इकट्ठा किया और कहा, फसल काटो। अब परमात्मा को दिखाएंगे कि फसल कैसे की जाती है!
फसल काटना क्या था, उसके प्राण पर जैसे छुरी चल गई। वे बालें तो बहुत बड़ी-बड़ी थीं, लेकिन उनमें गेहूं नहीं थे। उसने परमात्मा से कहा, यह क्या हुआ! यह क्या मजाक हुआ! इतनी बड़ी बालें, इतने बड़े पौधे, इतनी व्यवस्था, सब चीजें समय पर मिलीं, गेहूं क्यों पैदा नहीं हुए?
आकाश से खिलखिलाहट की हंसी आई और उसने कहा, तू पागल है! गेहूं पैदा होने के लिए संकट चाहिए, असुविधाएं चाहिए। तेरी बालें पोच रह गईं, क्योंकि न तूफान आए, न आंधियां आईं, न जम कर वर्षा हुई, न सूरज से आग बरसी। तूने सारी सुविधा कर दी। तूने सारी व्यवस्था कर दी। तो बालें पोच रह गईं।
संकट में ही, संघर्ष में ही, चुनौती में ही आत्मा पैदा होती है। भूलों से मत डरो, हरिदास। जी भर कर भूलें करो। बस एक ही भूल दुबारा मत करना। अगर इतना ही स्मरण रहे तो हर भूल तुम्हें पाठ दे जाएगी, हर भूल तुम्हें आगे बढ़ा जाएगी।
मगर तुम्हें यह बात सिखाई गई है सदियों-सदियों से। हर समाज, हर संस्कृति में यही आग्रह है--भूल मत करना। और इसी कारण लोग मुर्दा हो गए हैं। भूल मत करना। जरा रास्ते से हट कर मत चलना। लीक पर चलो। जरा भी लकीर से यहां-वहां मत होना।
तो लोग चल रहे हैं--लकीर के फकीर! उनमें कोई आत्मा नहीं है। उनकी बालों में कोई गेहूं नहीं पकते। उनके भीतर कोई प्राण सघन नहीं होते। उनके भीतर एक तरह की नपुंसकता रह जाती है। उनके भीतर बल नहीं पैदा हो पाता, पौरुष नहीं जगता, सुरक्षित, सब भांति सुरक्षित--कैसे पौरुष जगे? उनके भीतर प्रतिभा में भी जंग लगी रहती है। उनकी प्रतिभा में भी निखार नहीं आता। उनका दीया भी जलता है तो धुआं-धुआं, रोशनी कम। भूल ही नहीं की जीवन में!
तुम्हें मुझसे शिकायत है
कि मैं बदल गया हूं
और मुझे भी तुमसे शिकायत है
कि तुम क्यों नहीं बदले;
तुम्हें शिकायत है
कि मुझे बदलने पर अफसोस नहीं है,
और मुझे शिकायत है
कि तुम्हें न बदलने पर पश्चात्ताप नहीं है;
तुम्हारा कहना है
कि बदलने से मेरा ह्रास हुआ है;
और मेरा कहना है
कि ह्रास भी हुआ है तो मेरा विकास हुआ है;
लेकिन तुम जड़ हो,
इसका मुझे विश्वास हुआ है।
चैतन्य कैसे पैदा होता है? ऐसे ही पैदा नहीं हो जाता। चुनौतियां चाहिए। नहीं तो तुम जड़ रह जाओगे। इस बात को तुम खूब गांठ बांध कर रख लो: भूलों से बचना मत। अपने को सम्हाल-सम्हाल कर मत चलते रहना। राजपथों पर ही मत चलते रहना। कभी-कभी पगडंडियों पर भी जाओ, बीहड़ वनों में भी उतरो। जहां खो जाने का डर हो वहां भी तलाशो। जहां से लौटने की संभावना न हो वहां भी पंख मारो। अगर जल भी गए तो भी तुम्हारे भीतर आत्मा पैदा होगी। अगर भटक भी गए तो भी तुम्हारे भीतर बल पैदा होगा। अगर मुसीबतें भी आईं तो मुसीबतें तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचाएंगी।
थामस अल्वा एडिसन बिजली की खोज में लगा हुआ था। तीन साल बीत गए थे प्रयोग करते-करते, उसके सारे सहयोगी थक चुके थे; लेकिन वह रोज सुबह आता बूढ़ा और उसी उमंग, उसी उत्साह से फिर काम में लग जाता। तीन साल में कम से कम सात सौ प्रयोग असफल हो गए थे। उसके सहयोगियों का तो खयाल था कि बिजली पैदा हो नहीं सकती। और एडिसन जिद्द में पड़ा है। सात सौ बार असफल हो गए, अब और कितने बार असफल होना है? सात सौ बार भूल हो चुकी, जाहिर है; अब बच जाना चाहिए, अब जिंदगी इसी में खराब करने की कोई जरूरत नहीं है।
एक दिन वे सब इकट्ठे हुए और उन्होंने एडिसन को कहा कि अब बहुत हो गया, तीन साल खराब हो गए, सात सौ बार हमारे प्रयोग असफल हो गए, अब कब तक हम यही करते रहेंगे? और आपको हम देखते हैं तो हमारी छाती और बैठ जाती है। आप रोज सुबह उसी उमंग, उसी उत्साह से चले आते हैं--न उदासी, न हताशा, न निराशा! आपको पता है कि सात सौ बार प्रयोग असफल हो चुका है!
एडिसन ने कहा, मुझे पता है। इसीलिए तो मेरी उमंग रोज-रोज बढ़ती जाती है कि अगर समझ लो एक हजार गलतियां हो सकती हैं, तो सात सौ तो हम कर चुके, अब तीन सौ ही बचीं। सात सौ दरवाजे हम टटोल चुके, दरवाजा नहीं मिला; रोज दरवाजे कम होते जा रहे हैं, ठीक दरवाजा करीब आता जा रहा है। घबड़ाओ मत।
और यही हुआ। छह महीने के प्रयोग के बाद बिजली का आविष्कार हो सका, जो कि मनुष्य-जाति के इतिहास में बड़े से बड़े आविष्कारों में से एक है। लेकिन अगर एडिसन भूलें करने से डरता तो यह आविष्कार नहीं हो सकता था।
तुम जरा वैज्ञानिकों का जीवन उठा कर देखो--कितनी भूलें करते हैं! रोज भूलें करते हैं! लेकिन भूलों का कोई हिसाब नहीं रखता। जब वे जीत जाते हैं, और ठीक हो जाता है, बस ठीक का इतिहास लिखा जाता है। इससे बड़ी भ्रांति पैदा होती है।
महावीर ने बारह वर्ष ध्यान किया। बस तुम्हारे पुराणों में उल्लेख है सफलता का। बारह वर्ष क्या कर रहे थे? बारहवें वर्ष सफल हुए, लेकिन बारह वर्ष तो जरूर हजारों भूलें की होंगी। उनका कोई उल्लेख नहीं करता। जब जीत हो जाती है तो लोग फिकर ही छोड़ देते हैं इस बात की कि कितनी बार हार हुई जीत होने के पहले! हर जीत के पीछे कितनी हारें छिपी हैं! और हर ठीक अनुभव के पीछे कितने भटकाव छिपे हैं! बुद्ध छह वर्ष तक चेष्टा करते रहे, और हारते रहे, हारते रहे, हारते रहे--तब एक दिन जीते। बस हम तो जीत को गिन लेते हैं, और उन हारों को छोड़ देते हैं, और उन भूलों को छोड़ देते हैं। इससे हमारे सामने एक बहुत ही गलत धारणा निर्मित होती है।
हम बच्चों को सिखाते हैं, भूल मत करो। हम बच्चों से कहते हैं, जो ठीक है वही करो। ठीक करने की चेष्टा में बच्चे क्या करें? अनुकरण करें। कार्बन कापी हो जाएं। कार्बन कापी हमेशा ठीक होती है। भूल तो हो ही नहीं सकती, क्योंकि मूल की सिर्फ प्रतिलिपि है, भूल कैसे हो सकती है? लेकिन अगर तुम अपने जीवन की कुछ शोध करने में लगोगे, अगर तुम फिर से ध्यान की तलाश में चलोगे, तो हो सकता है बारह वर्ष तुम भी भटको। और उस बात का मजा और है।
महावीर की छाया बन कर चलना एक बात है; महावीर होना बात और है। मोहम्मद ने जो कहा उसको दोहराते रहना तोतों की तरह एक बात है; और मोहम्मद ने जैसे जाना उन सारी भूलों को करके गुजरना--उन सारे कंटकाकीर्ण मार्गों को पार करना, वे सारी फिसलनें रास्तों की, वे गिर जाने के डर, वह बहुत बार गिर जाना, घुटनों का टूट जाना, लहूलुहान हो जाना, वह बहुत बार अंधेरी रातों में भटक जाना, बहुत बार निराश हो जाना, बहुत बार सुबह का धागा हाथ से छूट-छूट जाना--वह सब जब तक न गुजरे, जब तक तुम फिर उससे न गुजरो, तुम्हारे जीवन में मोहम्मद का बल नहीं होगा, महावीर की क्षमता नहीं होगी, बुद्ध की प्रगाढ़ता नहीं होगी।
नहीं हरिदास, ऐसा मत पूछो कि हम कैसे जीएं कि जीवन में कोई भूल न हो। मैं तो कहूंगा, ऐसे जीओ कि जीवन में जितनी भूलें हो सकें हों; सिर्फ एक भूल दुबारा न हो, बस। खूब जीओ! फिकर छोड़ो भटकने की, डरने की। डरने वाले कायर अटके ही रह जाते हैं, उठते ही नहीं।
जरा सोचो, अगर छोटे बच्चे यह सोचें कि हम चलेंगे तभी जब गिरने का कोई डर न रह जाएगा, तो इस दुनिया में सारे लोग घुटनों के बल ही सरकते रहें, फिर कोई चलना नहीं हो सकता। वह तो छोटे बच्चे बड़े हिम्मतवर हैं। हरिदास, तुम जैसे सवाल नहीं पूछता छोटा बच्चा कि मुझे कुछ ऐसा रास्ता बताओ चलने का कि मैं कभी गिरूं न। बच्चा तो उठता है और गिरता है, घुटने तोड़ लेता है। फिर उठता है, फिर गिरता है। उठता ही रहता है, गिरता ही रहता है, उठता ही रहता है, गिरता ही रहता है। एक दिन खड़ा हो जाता है दो पैरों के बल पर।
चमत्कार है दो पैरों के बल पर खड़ा होना! क्योंकि सारे पशु चार हाथ-पैरों पर चल रहे हैं। और वैज्ञानिक कहते हैं आदमी भी बंदर था और चार हाथ-पैरों पर चलता रहा। जरा उन प्राथमिक बंदरों की कल्पना करो, जो पहली बार दो पैरों पर खड़े हुए होंगे। बाकी सब बंदर हंसे होंगे, कि यह देखो, अब ये गिरेंगे सज्जन, अब ये बुरी तरह गिरेंगे! सारे बंदर हंसे होंगे। और बंदरों के पंडित-पुरोहित, और बंदरों की परंपरा, और उनकी पुरानी धारणाएं! उन्होंने कहा होगा, हमने न तो कभी देखा न सुना किसी बंदर को दो पैर से चलते। ये मूढ़ देखो!
हम कहते हैं कि विकास हुआ। बंदरों ने तो कहा होगा कि पतन हुआ। क्योंकि बंदर रहते हैं वृक्षों पर, और आदमी को रहना पड़ा फिर जमीन पर। पतन ही कहना चाहिए, ऊपर से नीचे उतरे। इसको विकास कैसे कहोगे?
लेकिन जो पहले बंदर दो पैरों पर चले, बहुत बार गिरे होंगे, बहुत बार गिरे होंगे; जैसे छोटा बच्चा गिरता है। उनके घुटने टूट गए होंगे, लहूलुहान हो गए होंगे। लेकिन फिर भी वे कोशिश करते रहे। उनकी कोशिश एक दिन सफल हुई। उनकी सफलता से ही मनुष्यता का जन्म हुआ। क्योंकि जिस दिन दो हाथ चलने के काम से मुक्त हो गए, उस दिन दो हाथ और दूसरे काम के लिए मुक्त हो गए। फिर हम बहुत कुछ काम कर सके। अगर चारों हाथ-पैर चलने में ही लगे रहें तो कुछ और नहीं किया जा सकता। आदमी ने दो पैरों पर चलना छोड़ दिया, दो हाथ बिलकुल स्वतंत्र हो गए। अब इन स्वतंत्र हाथों से आग जलाओ, अस्त्र बनाओ, शस्त्र बनाओ, मकान बनाओ, बैलगाड़ियां बनाओ कि हवाई जहाज बनाओ, अब तुम जो भी चाहो करो, ये दो हाथ मुक्त हो गए। इन दो मुक्त हाथों में सारे मनुष्य का विकास छिपा है।
बंदर अब भी सुरक्षित है अपने वृक्ष पर। उसने भूल न करने का रास्ता पकड़ा।
नहीं; तुम ऐसा पूछो ही मत। मैं तो तुम्हें चुनौतियों को अंगीकार करना सिखाता हूं, तभी तुम्हारे जीवन में सुबह होगी। और जितनी अंधेरी रात होगी उतनी ही प्यारी सुबह होगी। और जितने दूर तुम परमात्मा से निकल जाओगे भटक कर, उतने ही पास आने का मजा होगा। जितनी कंठ में प्यास होगी, उतनी ही तो तृप्ति होगी न!
तमाम उम्र गुजारी है अंधेरों के तले,
आपके दर पे ही जाना कि सवेरा क्या है।
मौजे तूफान की साहिल से मुलाकात न थी,
आपसे मिल के ही जाना कि किनारा क्या है।
सुलगती बालू में छाया है बस बबूलों की,
आपकी छांह मिले फिर से सहारा क्या है।
हंसे तो ऐसे, खिजाओं का हाथ थाम लिया,
हम ने जाना कि फिजाओं का नजारा क्या है।
पतझड़ों में वसंत छिपे हैं; जरा पतझड़ों में तलाशो। और भूलों में, भटकावों में सत्यों के मंदिर छिपे हैं; जरा भूलों में, भटकावों में खोदो, गहरे खोदो!
जो व्यक्ति भूल करने से बचना चाहता है उसका साहस समाप्त हो जाता है, वह कायर हो जाता है। और कायरों के लिए इस जगत में कुछ भी नहीं है। एक साहस चाहिए, कि ठीक है, भटकेंगे तो भटकेंगे।
जीसस की प्रसिद्ध कहानी। एक बाप के दो बेटे। छोटा बेटा--जुआरी, शराबी, वेश्यागामी। बड़ा बेटा--मंदिर जाए, पूजा करे, पाठ करे, दुकान में मन लगाए, खेती-बाड़ी में डूबे। आखिर बड़े भाई ने कहा कि छोटे भाई के साथ रहना मेरा नहीं चल सकता, मैं कमाऊं और यह गंवाए! हमें अलग कर दें। तो बाप ने दोनों को आधी-आधी संपत्ति बांट दी और अलग कर दिया।
छोटा बेटा तो आधी संपत्ति लेकर तत्काल शहर चला गया। छोटे गांव में क्या करेगा; वहां ज्यादा भूल करने की सुविधाएं भी नहीं थीं। बड़ा बेटा गांव में ही रुका। अब उसने दिल खोल कर धंधा किया, पूरे प्राणों से खेती-बाड़ी की, खूब कमाया। और छोटे बेटे ने शहर में खूब गंवाया। दो-चार साल में ही छोटा बेटा भिखमंगा हो गया। होना ही था।
बाप को खबर लगी कि छोटा लड़का भीख मांग रहा है, सब बर्बाद हो गया। उसने खबर भेजी कि तू वापस लौट आ। इतने नौकर हैं घर में, तू अगर एक बिना कुछ किए भी पड़ा रहेगा तो भी चलेगा, तू वापस लौट आ। बाप का संदेश मिला तो बेटा वापस लौटा। और जब बेटा वापस लौटा, तो जीसस यह कहानी बार-बार कहते हैं, कि बाप ने घर में दीये जलवाए, दीपावली मनवाई, बंदनवार सजवाए, फूल लटकवाए। जिस रास्ते से बेटे को लाना था उस रास्ते पर स्वागत का इंतजाम किया, द्वार बनाए। श्रेष्ठतम भोजन तैयार करवाया। वर्षों के बाद बेटा वापस लौटता था।
बड़ा बेटा खेत पर काम कर रहा था--भरी दुपहरी, धूप में! किसी ने उसको खबर दी कि अन्याय की भी एक सीमा होती है! तू तो बाप की सेवा करते-करते मरा जा रहा है, अभी भी दुपहरी में छाया में नहीं बैठा है, खून-पसीना कर रहा है। और तेरे स्वागत में कभी बंदनवार न बंधे, कभी दीपावली न मनाई गई, कभी सुगंधें न छिड़की गईं, कभी बैंड-बाजे न बजे! और तुझे पता है, तेरा छोटा भाई बर्बाद होकर, भिखमंगा होकर लौट रहा है! शहनाई यह जो बज रही है उसी के लिए बज रही है।
स्वभावतः, बड़े भाई को बहुत आघात हुआ, यह तो अन्याय है! वह घर लौटा। उसने अपने पिता को कहा कि यह अन्याय है। मेरा कभी स्वागत नहीं हुआ। मैं सदा आपके चरणों में सेवा में रहा। मैंने कभी कोई जीवन में भूल नहीं की। सदा आपने जो कहा वही किया। और छोटे ने, जो आपने कहा उससे उलटा किया। और उसका स्वागत किया जा रहा है!
बाप ने कहा, तुझे पता होगा, तुझे भलीभांति पता होगा, क्योंकि तू खेतों पर रहता है। अपने पास भी भेड़ें हैं, तू कभी भेड़ों को भी लेकर पहाड़ों पर जाता है। तुझे भलीभांति पता होगा कि अगर कभी कोई भेड़ जंगल में भटक जाए तो गड़रिया अपनी हजार भेड़ों को असुरक्षित छोड़ कर उस एक भेड़ की तलाश में आधी रात जंगल में जाता है। और जब भटकी भेड़ उसे मिल जाती है तो उस भटकी भेड़ को कंधे पर लेकर लौटता है। और जो भेड़ें कभी नहीं भटकीं उनको कभी कंधे पर लेकर नहीं लौटता। लौटने का सवाल ही नहीं उठता। तू मेरे पास है। तेरे स्वागत का कोई सवाल नहीं है। लेकिन जो दूर चला गया था और बहुत भटक गया था और वापस लौट रहा है, उसका स्वागत जरूरी है।
जीसस कहते थे, यह कहानी सिर्फ किसी पिता और उसके बेटों की कहानी नहीं है; यह कहानी अस्तित्व की कहानी है। यह परमात्मा की कहानी है। यहां जो दूर जितने भटक जाता है, परमात्मा उसके स्वागत के लिए उतना ही तैयार है। क्योंकि दूर भटका हुआ आदमी कुछ कमा लेता है--कुछ, जो बड़ा अदृश्य है!
तुमने भी खयाल किया होगा, जिन लोगों ने जीवन में कभी भूल-चूक नहीं की, उनको अगर तुम देखोगे तो तुम उन्हें गोबर-गणेश पाओगे। बिठा दो एक कोने में सजा कर तो अच्छे लगते हैं; और किसी काम का न पाओगे। भीतर बिलकुल पोच; गेहूं है ही नहीं। और जिन लोगों ने जीवन में बहुत भूलें की हैं, बहुत भटके हैं, बहुत ठोकरें खाई हैं, दर-दर दरवाजे-दरवाजे--उनमें तुम एक तरह का बल पाओगे, एक तरह की गरिमा पाओगे, एक तरह का गौरव पाओगे! उनमें तुम पाओगे कुछ, जिसको आत्मा कहा जा सकता है।
इसलिए मैं नहीं कहता, हरिदास, कि भूलें न करो। मैं तो कहता हूं, भूलें करो--होशपूर्वक करो! मेरी शिक्षा बिलकुल भिन्न है। भूलें करो, जरूर करो--होशपूर्वक करो! हर भूल से सीखो और हर भूल को निचोड़ लो और उसको अपना अनुभव बना लो।
तमाम उम्र गुजारी है अंधेरों के तले,
आपके दर पे ही जाना कि सवेरा क्या है।
तब आएगा वह दरवाजा सुबह का, जब जिंदगी भर न मालूम कितनी अमावसों के नीचे गुजारोगे।
मौजे तूफान की साहिल से मुलाकात न थी,
आपसे मिल के ही जाना कि किनारा क्या है।
तभी मिलेगा किनारा, तभी होगा मिलन सत्य से, जब तुम बहुत-बहुत तूफानों में अपनी नैया को छोड़ोगे और बहुत-बहुत तूफानों को पार करके आओगे। बहुत-बहुत खतरे डूबने के उठाओगे तो ही किनारा है। जो किनारे पर ही रहे और तूफान न जाने, उनके लिए क्या खाक किनारा है! जो तूफानों को पार करके आए उनके लिए ही किनारा किनारा है। जिन्होंने मझधारों को किनारा बना लिया उनके लिए ही किनारा किनारा है।
जीवन सस्ता नहीं है। और जीवन के प्रत्येक अनुभव के लिए चुकाना पड़ता है--कुछ चुकाना पड़ता है, कोई कीमत चुकानी पड़ती है। भूलें, और उन भूलों के कारण हुए दुख और पश्चात्ताप और पीड़ाएं मूल्य हैं, जो आत्मवान व्यक्ति को चुकाना ही होगा। चुकाओ! और तुम जितना चुका सकोगे उतना ही पाओगे। न ज्यादा, न कम। इस जगत में अन्याय नहीं है। प्रत्येक को उतना ही मिलता है जितनी क्षमता वह अर्जित कर लेता है।
मगर क्षमता कैसे अर्जित होती है? घर के एक कोने में छिप कर बैठ जाने से क्षमता अर्जित नहीं होती। और वही तुम्हें सिखाया गया है। खासकर इस देश में तो यही सिखाया गया है सदियों से कि कुछ भूल भर न करना। परिणाम यह हुआ है कि पूरा देश गोबर-गणेश हो गया है। एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक मुर्दों की कतारें हैं, जिनमें जीवन नाम-मात्र को भी नहीं है।
नहीं तो यह कहीं हो सकता था कि हजारों साल तक यह देश गुलाम रहे? छोटी-छोटी कौमें आईं, जरा-जरा से लोग, जिनकी कोई ताकत न थी, क्षमता न थी--वे भी जीत गए। हूण आए, बर्बर आए, तातार आए, मुगल आए, अंग्रेज आए, पुर्चगीज आए, फ्रेंच आए--जो भी आया, इस विराट देश को क्षण भर में मुट्ठी में कर लिया! क्या कारण रहा होगा?
और यह देश बातें करता है आत्मा की, परमात्मा की! और यह देश बातें करता है अमृत जीवन की, शाश्वत जीवन की! लेकिन असलियत कुछ और है। देश बहुत कायर हो गया है। और कायर हो जाने के पीछे कारण क्या है? कारण है यह मौलिक शिक्षा: भूल न करना, सम्हल-सम्हल कर चलना, गिरना मत। अगर गिरने का डर हो तो चलना ही मत, बैठे ही रहना। बैठे रहना बेहतर है गिरने की बजाय। न चलना बेहतर है, मगर भटकना मत।
लेकिन पहुंचना हो अगर कहीं तो भटकने की जोखम उठानी ही पड़ेगी। जोखम जीवन है।
ओशो, नहीं आती किसी को मौत, दुनियाए मुहब्बत में चरागे जिंदगी की लौ, यहां मद्धम नहीं होती उम्मीदें टूट जाती हैं, सहारे छूट जाते हैं मगर ओशो, तेरी मुहब्बत की तमन्ना कम नहीं होती!
जैसे समझो कि तुम परमात्मा के प्रति तो प्रेम से नहीं भरे हो, मगर स्वर्ग की आकांक्षा है। इस कारण मंदिर भी जाते हो, मस्जिद भी जाते हो, पूजा भी करते हो, पाठ भी करते हो। परमात्मा से कुछ लेना-देना नहीं है। परमात्मा का तो सिर्फ उपयोग करना है साधन की तरह। और इससे बड़ा पाप दुनिया में दूसरा नहीं है। परमात्मा का साधन की तरह उपयोग करना सबसे बड़ा पाप है।
पश्चिम के बहुत बड़े विचारक इमेनुअल कांट ने कहा है कि मैं एक ही चीज को अनीति मानता हूं: किसी मनुष्य का साधन की तरह उपयोग करना अनीति है।
प्रत्येक मनुष्य साध्य है। किसी मनुष्य का साधन की तरह उपयोग करने का अर्थ हुआ, तुमने उसको वस्तु बना दिया, उसकी आत्मा छीन ली। जैसे पति पत्नी का साधन की तरह उपयोग करे--कामवासना की तृप्ति के लिए, या घर की व्यवस्था के लिए, या बाल-बच्चों की देखभाल के लिए--तो यह पाप है। पत्नी अपने आप में साध्य है, उसका साधन की तरह उपयोग नहीं हो सकता। न पति का साधन की तरह उपयोग हो सकता है।
पत्नियां भी पतियों का उपयोग साधन की तरह कर रही हैं। क्योंकि वही है रोटी-रोजी कमाने वाला, इसलिए उस पर निर्भर है। उसको छोड़ कर नहीं जा सकतीं, क्योंकि उसके ऊपर ही सारी अर्थवत्ता, सारी आर्थिकता, सारा आर्थिक बोझ परिवार का है।
मगर यह साधन की तरह उपयोग हो गया। इमेनुअल कांट कहता है मनुष्य का भी साधन की तरह उपयोग करना पाप है, तो परमात्मा का साधन की तरह उपयोग करना तो महापाप हो जाएगा। मगर लोग परमात्मा का साधन की तरह ही उपयोग करते हैं।
एक आदमी मेरे पास आया। और उसने कहा, मेरे हृदय में बड़ी श्रद्धा पैदा हुई है। आपके प्रति बहुत श्रद्धा पैदा हो गई है।
उसे देख कर ही मुझे शक हुआ कि जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है, क्योंकि उसकी आंख में मुझे श्रद्धा नहीं दिखाई पड़ती, लोभ दिखाई पड़ता है। मैंने पूछा कि हुआ क्या, तू पूरी बात कह। पूरी बात तो समझूं मैं!
उसने कहा, हुआ यह कि आज तीन साल से मेरे लड़के की नौकरी नहीं लग रही थी। पंद्रह दिन पहले मैंने कहा कि अगर आप नौकरी लगवा दो--आपकी तस्वीर के सामने--अगर पंद्रह दिन में नौकरी लग गई तो भगवान मानूंगा, सदा पूजूंगा। और नौकरी लग गई। धन्यवाद देने आया हूं।
मैंने उससे कहा कि इसके पहले कि कुछ निर्णय कर, कम से कम एक-दो परीक्षाएं और ले ले। उसने कहा, आपका मतलब? मैंने कहा, मतलब यह कि जैसे पत्नी बीमार हो तो पंद्रह दिन का वक्त फिर देना कि पंद्रह दिन में अगर ठीक नहीं हुई तो फिर मुझसे बुरा कोई भी नहीं। एकाध घटना से निर्णय नहीं लेना चाहिए, मैंने उससे कहा, क्योंकि एकाध घटना सांयोगिक हो सकती है, संयोग की बात हो।
वह बोला, हां, यह भी हो सकता है। तो मैंने कहा, तू दो-चार प्रयोग करके देख। जब दो-चार प्रयोग में बार-बार ऐसा हो, फिर तू आना।
वह दूसरे प्रयोग में ही नहीं हुआ। पत्नी बीमार थी, उसने पंद्रह दिन का समय दिया, और पत्नी ठीक नहीं हुई। वह मेरे पास आया। उसने कहा, सब श्रद्धा खंडित हो गई। यह आपने क्या किया?
मैंने कहा, मैं कुछ न तो पहली दफे किया, न इस दफे किया। तू दो-चार और प्रयोग कर ले, नाराज न हो। यह भी संयोग होगा। लेकिन एक बात मैं तुझ से कह देता हूं कि तुझे न श्रद्धा से कोई लेना है, न परमात्मा से कुछ लेना है; तुझे तो नौकरी चाहिए लड़के को, पत्नी की बीमारी ठीक हो जाए। तुझे तो उपयोग करना है साधन की तरह। मैं तेरा गुलाम नहीं हूं। और जब मैं ही तेरा गुलाम नहीं हूं तो यह सारा अस्तित्व तेरा गुलाम होगा? यह तेरी धारणा ही अधार्मिक है।
लेकिन लोग इस तरह की धारणाओं को धार्मिक समझते हैं। क्या-क्या मजा चलता है! लोग चले जाते हैं मंदिर में कि एक नारियल चढ़ा देंगे, अगर हमारी आकांक्षा पूरी हो गई! यह नारियल की वजह से इस देश में रिश्वत को नहीं मिटाया जा सकता, क्योंकि रिश्वत इस देश में धार्मिक परंपरा है। इस देश में रिश्वत को मिटाना असंभव है, क्योंकि रिश्वत हम कब से देते रहे, आदिकाल से हम यह काम करते रहे!
और क्या-क्या रिश्वत! एक नारियल चढ़ा देंगे--सड़ा नारियल, क्योंकि चढ़ाने के लिए नारियल बाजार में अलग ही मिलते हैं, सस्ते, सड़े-सड़ाए। तीर्थ स्थानों में तो मंदिर के सामने ही नारियल की दुकान होती है। तुम मंदिर में चढ़ाते हो नारियल, दूसरे दिन वे ही नारियल दुकान पर बिकने लगते हैं, क्योंकि पुजारी उनको बेच देता है। वे सड़ गए हैं, सदियों से चढ़ाए जा रहे हैं। उनमें अब कुछ नारियल जैसा भीतर बचा नहीं है। मगर वे सस्ते मिलते हैं।
एक पांच आने का नारियल लेकर चढ़ा दिया और निश्चिंत घर चले आए कि अब देखें क्या होता है! परमात्मा की इज्जत दांव पर लगा दी पांच आने के नारियल में, कि अब सम्हालो अपनी, नहीं तो चूके नारियल से! और एक भक्त खो जाएगा, एक संख्या कम हो जाएगी, एक वोट कम मिलेगा! बचाना हो अपनी इज्जत, रखनी हो अपनी लाज, तो जो कहा है वह करके दिखा दो!
यह तो परमात्मा का भी उपयोग हो गया। यह तो लोभ है, प्रेम नहीं।
तुम जान कर चकित होओगे कि अंग्रेजी में जो शब्द है प्रेम के लिए लव, वह संस्कृत के लोभ शब्द से बना है। जरूर लोभ में कुछ मामला है कि लोभ प्रेम होने का धोखा दे सकता है। लोभी आदमी अभिनय कर सकता है प्रेम का। चाहिए स्वर्ग, चाहिए स्वर्ग की अप्सराएं, चाहिए स्वर्ग में शराब के चश्मे, चाहिए गिल्मे और हूरें, चाहिए कल्पवृक्ष, और उनके नीचे लेटे हैं आराम से, और फिर मौज ही मौज कर रहे हैं। यहां इच्छा पैदा हुई वहां इच्छा पूरी हुई, क्षण भर का अंतराल नहीं। और परमात्मा से प्रेम की बातें उठाते हैं लोग, कि परमात्मा से प्रेम है इसलिए तपश्चर्या कर रहे हैं।
सौ व्यक्तियों में शायद कभी एकाध कोई परमात्मा के प्रेम से आतुर होता है, आनंद मोहम्मद! और जब भी कोई परमात्मा के प्रेम से आंदोलित होता है तो प्रेम घटता नहीं, बढ़ता जाता है। प्रेम घटना जानता ही नहीं; यह वह आकाश है जो फैलना ही जानता है, विस्तीर्ण होना ही जानता है।
तुम कहते हो--
नहीं आती किसी को मौत, दुनियाए मुहब्बत में
चरागे जिंदगी की लौ, यहां मद्धम नहीं होती
उम्मीदें टूट जाती हैं, सहारे छूट जाते हैं
नहीं आती किसी को मौत, दुनियाए मुहब्बत में!
प्रेमी मरता ही नहीं। प्रेमी कभी मरा ही नहीं। प्रेमी कभी मर सकता ही नहीं। क्यों? क्योंकि प्रेम में अहंकार-शून्यता अपने आप फलित होती है। और जहां अहंकार नहीं है वहां मृत्यु नहीं है। मरता तो सिर्फ अहंकार है। तुम तो कभी नहीं मरते। तुम तो शाश्वत हो, अमृत हो। अमृतस्य पुत्रः! हे अमृत पुत्रो! नहीं तुम्हारी कोई मृत्यु है।
मगर तुमने अहंकार जो बना लिया है, मैं-भाव जो बना लिया है, वह मरेगा। वह कल्पित है। वह तुमने जबरदस्ती खड़ा कर लिया है। वह झूठा है। वह ऐसा ही है जैसे कि खेत में हम आदमी खड़ा कर देते हैं नकली। देखते तुम खेत में खड़े आदमी--एक हंडिया चढ़ा दी डंडे पर, गांधी टोपी लगा दी, अचकन पहना दी, शेरवानी चढ़ा दी, मुखौटा लगा दिया--बस खड़ा हो गया खेत का धोखे का आदमी। इससे पशु-पक्षी डर जाएं भला, और क्या होगा?
मगर इस धोखे के आदमी को भी अकड़ पैदा हो सकती है--मैं भी कुछ हूं। क्योंकि देखते नहीं कि मुझसे पशु-पक्षी डरते हैं! देखते नहीं कि मुझसे दूर से ही बड़े-बड़े जानवर, खूंखार जानवर देख कर नजर नदारद हो जाते हैं! इसको भी अकड़ पैदा हो सकती है।
खलील जिब्रान की एक छोटी सी कहानी है कि मैंने खेत में खड़े एक झूठे आदमी को देखा। रोज वहां से गुजरता था। उस झूठे आदमी को देख कर बड़ी दया आई कि बेचारा खड़ा रहता है--धूप हो, धाप हो, सर्दी हो, गर्मी हो, वर्षा हो, न दिन की फिकर है न रात, न सोने की सुविधा, बस खड़ा ही रहता है। थक भी जाता होगा। तो मैंने पूछा उससे कि भाई मेरे, थक नहीं जाते? वर्षा, गर्मी, सर्दी, रात-दिन सतत अहर्निश खड़े ही रहते हो, थक नहीं जाते?
वह झूठा आदमी खिलखिला कर हंसा और उसने कहा, थकना क्या, जानवरों को भगाने का मजा ऐसा है! दूसरों को डराने का मजा ऐसा है कि कौन थकता है!
इसलिए तुम देखते हो, राजनेता कभी नहीं थकते दिखाई पड़ते। दूसरों को डराने का मजा! दूसरों को घबड़ाने का मजा! राजनेता थकते ही नहीं, भागते ही रहते, चलते ही रहते आपाधापी में। न हो नींद चलेगा, थकान नहीं आती उन्हें। ये खेत के धोखे के आदमी हैं। खलील जिब्रान ठीक कह रहा है। दूसरों को डराने का मजा!
तुम्हारा अहंकार क्या है? दूसरों को डराने का मजा, और क्या? तुम्हारा अहंकार क्या है? दूसरों को दबाने का मजा। मैं दूसरों से बड़ा, यही भाव अहंकार।
यह भाव झूठा है। इसको तुम कितनी ही शेरवानी पहनाओ, और कितनी ही गांधी टोपी लगाओ, और कितनी ही खादी की अचकनें पहनाओ, यह झूठा है, झूठा ही रहेगा। इस झूठ को तुम कितना ही सजाओ, कितना ही संवारो, यह आज नहीं कल गिरेगा, गिरेगा ही! इसका गिरना सुनिश्चित है। यह कृत्रिम है। हम अस्तित्व से अलग हैं, यह बात ही झूठ है। बस इसी झूठ में से मौत आती है।
हम अलग नहीं हैं। मौत आकर हमारी इस भ्रांति को तोड़ देती है कि हम अलग हैं। मौत आकर हमें फिर अस्तित्व के साथ जोड़ देती है। मौत दुश्मन नहीं है, मित्र है। दुश्मन है तो अहंकार है, क्योंकि अहंकार तोड़ता है, मौत जोड़ती है। लेकिन जो प्रेम से जुड़ गया उसके लिए तो मौत का कोई कारण ही न रहा, मौत का कोई काम ही न रहा। क्योंकि प्रेम तो पहले ही जोड़ दिया, अब मौत क्या करेगी? अब मौत का कोई उपयोग नहीं, अर्थ नहीं।
प्रेमी की, आनंद मोहम्मद, कोई मृत्यु नहीं है। जिसने प्रेम जाना उसने शाश्वतता जानी, उसने कालातीत अविनश्वर अस्तित्व जाना।
नहीं आती किसी को मौत, दुनियाए मुहब्बत में
आती ही नहीं, कभी आई नहीं, आ भी नहीं सकती।
चरागे जिंदगी की लौ, यहां मद्धम नहीं होती
प्रेम का दीया ऐसा दीया है जिसको फकीरों ने कहा है: बिन बाती बिन तेल! न तो उसमें बाती है जो जल जाए और न तेल है जो चुक जाए। वह रोशनी किन्हीं कारणों पर निर्भर नहीं है। इसलिए उस रोशनी को बुझाया नहीं जा सकता।
नहीं आती किसी को मौत, दुनियाए मुहब्बत में
चरागे जिंदगी की लौ, यहां मद्धम नहीं होती
उम्मीदें टूट जाती हैं, सहारे छूट जाते हैं
हां, माना बहुत बार उम्मीदें टूटेंगी, और बहुत बार सहारे छूटेंगे, और बहुत बार लगेगा कि मंजिल और दूर हो गई पास होने के बजाय, और बहुत बार लगेगा कि यह रात शायद टूटेगी नहीं, शायद सुबह होगी नहीं। मगर अगर प्रेम जगा है...
आनंद मोहम्मद, तुम्हारी आंख में झांक कर तुमसे कहना चाहता था, कहा नहीं। लेकिन तुमने जब संन्यास लेने का निर्णय लिया तो लक्ष्मी को मैंने जरूर कहा था कि मोहम्मद को पहले पूछ लो। मुसलमान परंपरा से आते हैं, संन्यास लेने के बाद कहीं अड़चन न हो, कहीं लोग परेशान न करें। क्योंकि और भी जिन मुसलमान मित्रों ने संन्यास लिया है उनको हजार तरह की परेशानियां हैं। हालांकि वे सब परेशानियां लाभ ही पहुंचाती हैं अंततः। लेकिन अंततः लाभ पहुंचाती हैं, शुरू में तो बड़ी अड़चनें हो जाती हैं।
तो लक्ष्मी से मैंने कहा था कि पहले पूछ लो। नहीं तो गुपचुप ही रहने दो, दिल की बात दिल में ही रहने दो, मत जाहिर करो ऊपर से, कहीं मुसीबत न आए! आनंद मोहम्मद सूरत से हैं। तो मैंने कहा, सूरत में कहीं उन्हें अड़चन न आए, कोई कठिनाई खड़ी न हो। वे पहले मुसलमान होंगे वहां संन्यासी।
लेकिन आनंद मोहम्मद ने कहा, नहीं, अब कोई अड़चन नहीं आ सकती और अब कोई बात रोक नहीं सकती। अब सब जोखम उठाने की तैयारी है। अब बिना संन्यासी के जीना व्यर्थ, संन्यासी होकर मर जाना सार्थक।
तो जरूर प्रेम जन्मा है। प्रेम ही ऐसी भाषा बोल सकता है और प्रेम ही इतना दुस्साहस कर सकता है। आएंगी कठिनाइयां, झेलना मजे से--मुस्कुराते हुए, नाचते हुए, गीत गाते हुए। संन्यासी होकर तुम सच्चे अर्थों में मुसलमान हुए हो। इसलिए झूठे अर्थों में जो मुसलमान हैं वे अड़चन डालेंगे। संन्यासी होकर कोई सच्चे अर्थों में हिंदू होता है, जैन होता है, ईसाई होता है, मुसलमान होता है, पारसी होता है, सिक्ख होता है। लेकिन जो झूठे अर्थों में हिंदू हैं, मुसलमान हैं, सिक्ख, ईसाई, पारसी हैं, वे तो अड़चन डालेंगे। उनकी अड़चनों को तुम परमात्मा की तरफ से भेजी गई भेंट समझना। क्योंकि उन सारी अड़चनों में से ही गुजर कर तुम पकोगे, परिपक्व होओगे, तुम्हारे भीतर का कमल एक दिन खिलेगा, निश्चित खिलेगा। बस प्रेम को बढ़ाए चलना; प्रेम को सम्हाले चलना; प्रेम की पुकार दिए चलना।
कितनी ही अंधेरी रात हो, अगर तुम प्रेम का गीत गाते ही रहे तो सुबह को होना ही पड़ेगा। परमात्मा कब तक अनसुना कर सकता है!
ओशो, जगाए-जगाए भी लोग जागते क्यों नहीं हैं?
हां, मैं तुमसे यह भी नहीं कहता कि तुम जगाना बंद कर दो। तुम पुकारे जाओ। होने दो होड़। उसे सोने दो। उसकी मौज, वह सोए। घोड़े बेच कर सोए। और कंबल खींच ले ऊपर। तुम भी चढ़ जाओ घर की मुंडेरों पर, तुम भी आवाज दो। होने दो टक्कर। लेकिन शिकायत मत करना कि वह नहीं जागा। हम कौन हैं किसी को जबरदस्ती जगाने वाले? हमारी मौज थी जगाना तो हमने जगाने की कोशिश की; उसकी मौज थी सोना वह सोया।
कोई किसी दूसरे के लिए निर्णायक नहीं है। और कोई किसी दूसरे के लिए निर्णायक होना भी नहीं चाहिए। व्यक्ति की परम स्वतंत्रता पर जरा भी बाधा नहीं पड़नी चाहिए। इसलिए जो सच में जगाने वाले लोग हैं, वे बड़े आहिस्ता, बहुत धीमे-धीमे, फुसलाते हैं, जगाते नहीं। पैर भी रखते हैं तो ऐसे जैसे आवाज न हो। किसी की नींद अकारण न टूट जाए, जबरदस्ती न टूट जाए। उसमें तो हिंसा हो जाएगी। उसमें तो आग्रह हो जाएगा। और सब आग्रह हिंसक होते हैं।
मैं जाग गया। मैं तुम्हें जगाना चाहूं। इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ हुआ कि जैसा मैं हूं वैसा ही तुम्हें बनाने की इच्छा है। लेकिन क्यों? तुम्हारी मौज। मैं जागा हूं, मैंने जाग कर आनंद पाया है, इसलिए तुम तक खबर जरूर पहुंचा देनी है कि जाग कर एक आनंद मिला है। और तुम तक यह भी खबर पहुंचा देनी है कि कभी मैं भी सोया था। मैं दोनों स्थितियां जानता हूं--सोने की भी और जागने की भी। और तुम एक ही स्थिति जानते हो--सोने की। इसलिए मैं चाहता हूं कि अगर तुम जाग जाओ तो तुम्हारे जीवन में भी आनंद का आकाश उपलब्ध हो जाए।
मगर जबरदस्ती तो नहीं। जबरदस्ती में तो भूल हो जाने वाली है। और तुम जितना जबरदस्ती करोगे जगाने की, उससे सिर्फ दो बातें पता चलेंगी। पहली तो यह कि रामकृष्ण, तुम भी अभी जागे नहीं, नहीं तो जबरदस्ती नहीं कर सकते।
मैं तो सत्याग्रह शब्द को भी गलत कहता हूं, क्योंकि आग्रह मात्र असत्य के होते हैं, सत्य का कोई आग्रह नहीं होता। सत्य अनाग्रही होता है।
महावीर ने ऐसा ही कहा: अनाग्रह सत्य है। आग्रह नहीं, निवेदन। इसलिए महावीर ने यह भी कहा कि मैं आदेश नहीं देता, सिर्फ उपदेश देता हूं।
भेद समझ लेना। आदेश का मतलब होता है: करना ही पड़ेगा। उपदेश का अर्थ होता है: निवेदन। मुझे ऐसा हुआ है, इसका निवेदन कर देता हूं। तुम्हारी मर्जी। चुनो तो ठीक, न चुनो तो ठीक। चुनोगे तो तुम्हें लाभ होगा, नहीं चुनोगे तो भी तुम्हारी स्वतंत्रता बरकरार है। फिर कभी चुनोगे, फिर किसी और क्षण में, किसी और सुबह जाओगे।
तुम पूछते हो: ‘भगवान, जगाए-जगाए भी लोग जागते क्यों नहीं हैं?’
नहीं जागना चाहते इसलिए नहीं जागते हैं, बात सीधी-साफ है। और तुम्हारे जगाने की चेष्टा, उनकी नींद में कैसी उन्हें प्रतीत होती है, इसका तुम्हें खयाल नहीं। उनकी नींद तो इतना ही समझती होगी कि कोई उपद्रवी आ गया, शोरगुल मचा रहा है।
मेरे एक प्रोफेसर थे, जब मैं विश्वविद्यालय में विद्यार्थी था। मैं सुबह रोज पांच बजे उठ कर घूमने निकलता था उनके मकान के सामने से। उनको भी बड़ी इच्छा थी, मगर उठ नहीं पाते थे सुबह जल्दी। तो मुझसे कहा, इतनी कृपा करो, यहां से तो निकलते ही हो, जरा मुझे भी जगा दिए। मैंने कहा, आप पहले पक्का कर लो, क्योंकि जब मैं कोई काम करता हूं तो फिर करता ही हूं। उन्होंने कहा, मतलब? मैंने कहा, मतलब ऐसा कि मैं सिर्फ खटखटा कर ही नहीं चला जाऊंगा, कि एकाध आवाज दे दी और चला गया। फिर मैं हूं और आप हैं। उन्होंने कहा, इसका मतलब क्या हुआ? मैंने कहा, मतलब इसका यह हुआ कि जब तक नहीं जगाऊंगा तब तक नहीं जाऊंगा। आप सोच लो।
उन्होंने कहा, नहीं-नहीं, मैंने सोच लिया है।
मगर ऐसा होता है, शाम को तुम सोचते हो एक बात, सुबह तक कहां टिकती है! इतना चित्त थिर भी कहां है! सांझ सोचते हो: सुबह पांच बजे उठना है। पांच बजे तुम ही सोचते हो: अरे, आज एक दिन और न उठे तो चलेगा।
सांझ मुझसे ही कह कर सोए थे कि सुबह उठाना और मैंने पहले ही कह दिया था कि शर्त समझ लेना कि मैं बिना उठाए नहीं जाऊंगा। अब मैं उन्हें उठाऊं और वे उठें न। तो मैंने उनका कंबल छीन कर फेंक दिया, तो वे बड़े नाराज होने लगे। उनकी पत्नी भी उठ आई। उनकी पत्नी भी बोली, आप यह क्या कर रहे हैं? कोई ऐसे किसी को उठाया जाता है?
मैंने कहा, बीच में मत बोलो। यह मेरा और उनका मामला है।
जब मैं उन्हें खींचने लगा बिस्तर से तो उनकी पत्नी बोली, आप कर क्या रहे हैं? और वे बिस्तर में दुबकने लगे। सर्दी की सुबह, और मैं समझ सकता हूं। लेकिन मैंने उनसे कहा, आप समझ ही लो, जितनी देर करोगे उतनी ही हुज्जत होगी। उठ ही आओ।
तो बेचारे उठ आए। कहा कि भाई, माफी मांगता हूं। आज उठा दिया ठीक, अब कभी मत उठाना। मैंने जो प्रार्थना की थी वह मैं वापस लेता हूं। मैं तो सोचता था कि दस्तक देकर चले जाओगे, उठना होगा तो उठ आएंगे।
लेकिन मैंने कहा कि जब आपने ही कहा उठना है, तो यह फिर कौन है जो सुबह सोना चाहता है?
हमारे भीतर एक ही मन नहीं है, यह अड़चन है। बहुत मन हैं। एक मन कहता है जागो, एक मन कहता है सोए रहो। एक मन कहता है कि ऐसा कर लो, एक मन कहता है वैसा कर लो। हम सोचते हैं एक मन है हमारे पास। नहीं; महावीर ने ठीक कहा है, मनुष्य के पास एक मन नहीं है, मनुष्य बहुचित्तवान है। महावीर ने पहली दफा मनुष्य के इतिहास में इस शब्द का उपयोग किया--बहुचित्तवान। ढाई हजार साल बाद अब पश्चिम में मनोविज्ञान ने इसको स्वीकार किया है कि मनुष्य के पास एक मन नहीं है, मल्टीसाइकिक! वही बहुचित्तवान।
तो एक मन कुछ कहता, दूसरा मन कुछ कहता, तीसरा मन कुछ कहता। सब मन अलग-अलग धाराओं में खींचते हैं। और फिर तुम जब किसी सोए आदमी से कुछ कहते हो, तो तुम जो कहते हो वही उस तक नहीं पहुंचता, पहुंच ही नहीं सकता। नींद की पर्तों को पार करते-करते अर्थांतर हो जाता है।
तुमने कभी सोचा, कभी देखा? रात तुम अलार्म भर कर सो गए हो कि सुबह पांच बजे उठना है। और जब अलार्म की घंटी बजती है तो तुम एक सपना देखते हो कि मंदिर है और मंदिर में घंटियां बज रही हैं और पुजारी पूजा कर रहे हैं। यह क्या हो रहा है? बाहर अलार्म की घंटी बज रही है और भीतर तुम सपना देख रहे हो कि काशी के विश्वनाथ के मंदिर में मौजूद हो, घंटियां बज रही हैं। यह तरकीब है नींद की, अलार्म को झुठलाने की, ताकि अलार्म तुम्हें जगा न पाए।
पहले लोग सोचते थे कि सपना नींद में बाधा डालता है, अब हालत बिलकुल दूसरी है। जो लोग सपने के ऊपर गहरा शोधकार्य कर रहे हैं...। और पश्चिम में बहुत काम चल रहा है। सिर्फ अमरीका में कम से कम दस विश्वविद्यालयों में सपने के ऊपर बड़ा काम चल रहा है। स्वप्न-विज्ञान खड़ा हो रहा है। उस स्वप्न-विज्ञान की नवीनतम शोधों में एक शोध यह है कि सपना नींद में बाधा नहीं है, सपना नींद की सुरक्षा है। सपना नींद का सिपाही है।
तुम अक्सर लोगों को कहते सुनते हो कि रात बहुत सपने आए, इसलिए सो नहीं सका। उनका कहना बिलकुल गलत है। अगर सपने न आते तो वे बिलकुल ही नहीं सो सकते थे। सपने आए तो वे कुछ-कुछ सो सके।
नींद है, और तुम्हें भूख लगी। अगर सपना न आए तो भूख तुम्हारी नींद को तोड़ देगी। लेकिन तुम एक सपना देखते हो कि राष्ट्रपति-भवन में भोज हो रहा है, तुम्हें भी निमंत्रित किया गया है। और तुम्हारे नासापुट सुगंधित खाद्य-पदार्थों का अनुभव कर रहे हैं, और तुम्हारी आंखें सजे हुए थाल देख रही हैं, और तुम भोजन करने बैठ गए, और तुम भोजन कर रहे हो, और तुम डट कर भोजन कर रहे हो। यह सपना क्या है? यह सपना सिर्फ नींद को बचाने का उपाय है; नहीं तो नींद टूट जाएगी, भूख लगी है जोर से! इस तरह झूठा भोजन करके नींद बच गई। तुम्हें भ्रांति दे दी गई, तुम सो गए।
जैसे छोटे बच्चों को मां को दूध नहीं पिलाना होता है तो रबर की चूसनी मुंह में पकड़ा देती है। वे रबर की चूसनी पीते-पीते ही सो जाते हैं। वे सोचते हैं कि मां का स्तन मुंह में है। सपना रबर की चूसनी है। उससे धोखा पैदा हो जाता है।
तुम जब सोए हुए आदमी को जगाते हो तो वह क्या अर्थ लेगा भीतर अपनी नींद में, कहना कठिन है।
मुल्ला नसरुद्दीन से कोई पूछ रहा था कि बताओ शादी के वक्त दूल्हा बजाय घोड़ी के गधे पर बैठ कर क्यों नहीं जाता?
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, इसलिए कि दुल्हन दो गधों को एक साथ देख कर डर न जाए।
एक नदी में एक आदमी डूब रहा है। एक सिपाही आकर किनारे पर खड़ा हो गया है और उस डूबते आदमी से--क्योंकि सिपाही तो समझता है वह तैर रहा है--पूछता है, तुम्हें यह बोर्ड नहीं दिखाई पड़ता? यहां पर तैरना मना है! सिपाही ने तख्ती की ओर इशारा करते हुए पानी में डुबकियां खाते व्यक्ति से कहा। डुबकियां खाते हुए आदमी ने कहा, लेकिन सिपाही जी, मैं तो डूब रहा हूं। उस व्यक्ति ने हाथ-पांव मारते चिल्ला कर कहा। अच्छा, तब कोई बात नहीं, सिपाही दूसरी ओर जाते हुए बोला। अगर डूब रहे हो तो फिर कोई बात नहीं, नियम का उल्लंघन नहीं हो रहा है।
नींद की व्याख्या होगी, अपनी व्याख्या होगी। एक बुढ़िया सड़क पार करते हुए ठोकर खाकर गिर गई तो एक व्यक्ति ने उसे जल्दी से उठा लिया। बुढ़िया उसके प्रति आभार प्रकट करते हुए बोली, खुदा तुझे लंबी उमर दे! और जैसे तूने मुझे उठाया वैसे ही खुदा भी तुझे जल्दी उठाए।
रामकृष्ण, तुम तो जगा रहे हो, मगर वह सोता आदमी क्या सोच रहा है, इसके संबंध में तुम कुछ भी नहीं जान सकते।
नया कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं,
सब कुछ पुराना है;
मगर वह रंग नूतन है
नया जिससे जमाना है।
कि गा लेता हूं कांटों में भी थोड़ा मुस्कुरा कर मैं,
सुना देता हूं रह कर मौन रे इस प्राण का स्वर मैं,
मगर सुनता यहां पर कौन? सुनने का बहाना है।
हजारों बार स्वर जो जो उठे दुहरा चुका हूं मैं,
हजारों बार खाली हाथ जाकर आ चुका हूं मैं,
मगर फरियाद का वह काफिला रुक कर रवाना है।
सुबह के पहले ही देखा कि घर घर शाम आती है,
जगा कर फिर सुलाने का नया पैगाम लाती है,
मगर किस्मत में सोना है, कहां जगता जमाना है।
मगर सुनता यहां पर कौन? सुनने का बहाना है।
लोग सुनते कहां हैं! बस सुन लेते हैं, कान सुन लेता है, हृदय तक बात नहीं पहुंचती। बात बुद्धि की समझ में आ जाती है, प्राण अछूते रह जाते हैं।
लेकिन रामकृष्ण, इससे परेशान होने की जरूरत नहीं है, यह बिलकुल स्वाभाविक है। तुम्हारे मन में ऐसा लगता हो कि सोया आदमी जागे, तो पहला तो काम यह करो कि खुद जागो। अभी तो वह घटना नहीं घटी। और तुम दूसरे सोए हुए लोगों को जगाने की चिंता में मत पड़ जाना।
इसी तरह मिशनरी पैदा होते हैं। ये जितने मिशनरी दिखाई पड़ते हैं दुनिया में, ये सोए हुए लोग हैं जो दूसरे सोए हुए लोगों को जगाने की चेष्टा में लगे हैं। ये बीमार हैं जो दूसरे बीमारों को ठीक करने के उपाय खोज रहे हैं। इनको खुद ईश्वर का कोई पता नहीं और ये दूसरों को ईश्वर समझा रहे हैं। इनको प्रार्थना का कुछ पता नहीं और ये प्रार्थना सिखा रहे हैं। इनका जीवन वैसे ही मूर्च्छा से भरा है जैसे औरों का, मगर ये उपदेश दे रहे हैं जागरूकता का।
मैंने सुना है, एक बहुत सुंदर युवती एक कैथलिक पादरी के पास अपने पाप की स्वीकारोक्ति, कन्फेसन करने आई। परदे की ओट में पादरी बैठा--एक तरफ पादरी, दूसरी तरफ युवती। लेकिन पादरी युवती को जानता है, अति सुंदर है! युवती कहती है कि मुझसे कुछ भूल हो गई है, उसके लिए स्वीकार करने आई हूं। क्षमा करने की कृपा करें। कल एक युवक आया, उसने मेरे पैर पर हाथ रखा।
पादरी उत्सुक हुआ! पादरी ने कहा, फिर? लेकिन उसके पूछने में कि फिर, बड़ी आतुरता थी! युवती ने कहा, फिर वह मेरी साड़ी खींचने लगा। पादरी की धड़कन बढ़ी और उसने पूछा, फिर? युवती ने कहा, फिर मुझे भी अच्छा लग रहा था तो मैंने साड़ी खींच लेने दी। पादरी ने पूछा, फिर? तो उसने कहा, फिर, फिर मेरी मां भीतर आ गई। पादरी ने कहा, धत तेरे की!
ये मिशनरी हैं, ये सारे जगत को जगाने घूम रहे हैं। ये सारे जगत को धार्मिक बनाने की चेष्टा में संलग्न हैं। ये सारे जगत को जगाना चाहते हैं, परमात्मा की तरफ आतुर करना चाहते हैं।
रामकृष्ण, भूल कर कभी मिशनरी मत बन जाना। मिशनरी सब से गई बीती दशा है।
जागो पहले। अभी तुम यह क्यों चिंता करते हो कि जगाए-जगाए भी लोग जागते क्यों नहीं? अरे महाराज, तुम भी नहीं जाग रहे हो! तुम किनकी बातें कर रहे हो? तुम इस तरह बात कर रहे हो जैसे कोई और है जो जगाए-जगाए नहीं जग रहा है। तुम अपने को बाद दे रहे हो। तुम अपने को गिनती में ले ही नहीं रहे। और असली सवाल तुम्हारे जागने का है। तुम जागो। इससे क्या करना है? दूसरों की तुम्हें क्या पड़ी? अपनी आप निबेर! तुम तो जागो कम से कम!
फिर जब तुम जाग जाओगे तो तुम जानोगे कि दूसरों को भी कैसे जगाएं--कैसे प्रेमपूर्ण ढंग से! कैसे आहिस्ता-आहिस्ता! कैसे धीरे-धीरे फुसलाएं कि वे अपने सपनों से सरक कर बाहर आ जाएं। यह तुम तभी कर सकते हो जब तुम स्वयं जाग गए होओ, क्योंकि तब तुम्हें पता होगा नींद से और जागने का पूरा रास्ता क्या है।
लेकिन अक्सर ऐसा हो जाता है कि लोग आकर पूछते हैं, मुझसे निरंतर लोग आकर पूछते हैं कि बड़ी अनीति फैल रही है, नीति कैसे फैलाई जाए? अपने को बाद दे रहे हैं! कि दुनिया बड़ी अधार्मिक होती जा रही है, धर्म को कैसे फैलाया जाए? एक बात उन्होंने मान ली है कि वे इसमें सम्मिलित नहीं हैं, वे बाहर हैं।
सच्चा धार्मिक व्यक्ति पूछता है कि मैं सोया हूं, मैं कैसे जागूं? झूठा धार्मिक व्यक्ति पूछता है, लोग नहीं जाग रहे हैं, लोग कैसे जागें?
रामकृष्ण, पहले तुम जागो। तुम जागे तो दुनिया जागी। तुम्हारे जागने में ही औरों के जागने का भी द्वार खुलेगा।
मैं यहां लोगों को जगाने वाले लोग तैयार नहीं कर रहा हूं; मैं यहां जागने वाले लोग तैयार कर रहा हूं। मेरा संन्यासी मिशनरी नहीं है। मेरा संन्यासी सेवक नहीं है, उसे किसी की सेवा नहीं करनी है। अपनी ही सेवा कर ले तो बहुत। खुद ही प्रज्वलित अग्नि बन जाए तो बहुत। खुद ही निर्धूम शिखा हो जाए तो बहुत। फिर उस निर्धूम शिखा के आस-पास अपने आप और दीये सरक कर आने लगेंगे। और जो अपने आप आएगा उसको जगाने में मजा है।
जिसको प्यास है वह कुएं पर आ जाता है। कुएं को प्यासे के पास जाने की कोई जरूरत नहीं।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
How can we live so that there are no mistakes in life?
According to Osho, a life without mistakes is lifeless; only the dead never err. Live courageously, welcome challenges and uncertainty, and make fresh mistakes—just don’t repeat them. Each error, faced consciously, matures you and ripens your soul, as adversity is the true teacher. Learn, adjust, and move forward; safety and control breed emptiness.
In simple terms: You can’t avoid mistakes and still live; try things, learn from what goes wrong, and don’t make the same mistake twice.
Why don’t people wake up even after being woken again and again?
According to Osho, people don’t wake up because they don’t want to; each soul has supreme freedom to sleep or awaken. Forcing is violence and betrays your own unreadiness. The awakened only invite—gently, without insistence—offering news of joy, not commands. Call if you must, but accept their timing; counsel, don’t coerce. Respect their choice and continue refining your own wakefulness.
In simple terms: People stay asleep because they choose to; you can knock kindly and share the good news, but you can’t drag anyone out of bed.
What is the significance of saints and siddhas using abuses as a form of blessing?
According to Osho, when saints or siddhas hurl abuses, it is not hostility but a compassionate device to shatter your ego. Neither abuse nor praise has value in itself; the Master uses whatever cuts the knot. If he scolds or strikes you, it signals grace and your readiness—like a surgeon’s painful cut—to empty you so the Divine can enter; a single shock can catalyze awakening.
In simple terms: A saint’s harsh words are like a quick pinch that pops your ego so truth and love can get in.
