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Questions in this Discourse
आपने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम धार्मिक नहीं थे क्योंकि उनके जीवन में कहीं विद्रोह की चिनगारी नहीं दिखाई पड़ती। फिर क्या कारण है कि उनका नाम हजारों वर्षों से जीवित है और भगवान का पर्याय बना हुआ है?
राम का जीवन आज्ञाकारिता का जीवन है। और यही न्यस्त स्वार्थ चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति आज्ञाकारी हो। आज्ञाकारी हो तो बगावत मर जाती है। आज्ञाकारी हो तो अंधा होकर चलता रहता है--जहां चलाओ, जैसा चलाओ, जो करवाना हो करवाओ। न उसके पास अपनी कोई विवेक की क्षमता होती है, न सोच-विचार की कोई पात्रता होती है, न बल होता है ‘नहीं’ कह देने का।
आज्ञाकारी व्यक्ति अत्यंत निर्बल होता है। उसके भीतर की आत्मा ही जैसे मार डाली गई हो। और यही सारे स्वार्थ चाहते हैं। राज्य भी यही चाहता है, चर्च भी यही चाहता है, मंदिर भी यही चाहते हैं! जिनके हाथ में धन है, पद है, प्रतिष्ठा है, वे भी यही चाहते हैं कि लोगों को आज्ञाकारिता का जहर इस तरह पिलाया जाए कि उनके जीवन में कभी विद्रोह की कोई संभावना ही न रहे। वे ‘नहीं’ कहना भी चाहें तो कह न सकें। जब भी उनसे निकले ‘हां’ निकले।
राम का व्यक्तित्व बहुत अनुकूल पड़ा। ऐसा अनुकूल व्यक्तित्व क्राइस्ट का नहीं है, कृष्ण का नहीं है, बुद्ध का नहीं है, लाओत्सु का नहीं है। कृष्ण, क्राइस्ट, बुद्ध, लाओत्सु, इनको तो मर जाने के बाद पंडित-पुरोहितों को बहुत लीपा-पोती करनी पड़ी है--अपने सांचे के अनुकूल बनाने के लिए। फिर भी वे बना नहीं पाए। बगावत की चिनगारी राख में दबा भी दो तो भी प्रज्ज्वलित होती है। लाख राख जम जाए, जरा सा हवा का झोंका और चिनगारी फिर दमकने लगती है।
जीसस पर कितनी पर्तें चढ़ाई गईं! लेकिन कितनी ही पर्तें चढ़ाओ, जिस आदमी को सूली लगी है, वह आदमी आज्ञाकारी तो नहीं हो सकता। नहीं तो सूली कैसे लगती? जिस आदमी को सूली लगी, उस आदमी के जीवन में कुछ तो था, जो स्थापित स्वार्थों के विपरीत खड़ा हो गया था। और जरूर ऐसी प्रज्ज्वलित उस व्यक्ति के पास विद्रोह की आत्मा होगी कि सारे स्वार्थों को मिल कर उसे समाप्त कर देना पड़ा। मार तो डाला उसे, फिर दो हजार साल में निरंतर इस तरह की व्याख्याएं थोपी गईं कि जिनसे लगे कि जीसस भी आज्ञाकारी हैं। लेकिन कितनी ही व्याख्या करो, कहीं न कहीं से बात उभर कर दिखाई पड़ती है। छोटी-छोटी घटनाओं में। ईसाई पादरी उन घटनाओं का उल्लेख नहीं करते, उनको टाल जाते हैं। मगर वे घटनाएं बाइबिल में हैं, उनको इनकारा भी नहीं जा सकता। उनको सब तरह से सुधारने की, तरमीम करने की, उनके ऊपर नये-नये अर्थ जमाने की चेष्टा की गई है। लेकिन फिर भी जीसस की आग ऐसी है कि बुझाई नहीं जा सकती, उभर कर निकल आती है।
तुम बाइबिल पढ़ो, तो तुम चकित हो जाओगे। जीसस की मां जीसस को मिलने आई है। जीसस एक भीड़ से घिरे खड़े हैं। और कोई जीसस से कहता है कि तुम्हारी मां मिलने आई है। तो जीसस कहते हैं: मेरे तो वे ही संबंधी हैं, जिन्होंने मेरी आत्मा से संबंध जोड़ा है। और न मेरी कोई मां है और न कोई मेरा पिता है।
इसे कितना ही लीपो-पीतो, इसे कैसे छिपाओगे?
राम का जीवन बिलकुल उलटा है। बूढ़े पिता ने, सठिया गए पिता ने एक व्यर्थ की बात कही है। वह भी अपनी सबसे कम उम्र की पत्नी के आग्रह में कही है, कि चौदह वर्ष का वनवास दे दो राम को। इसमें कोई तुक नहीं है बात में। यह सीधी अन्यायपूर्ण है। पिता राजी हो गए। दशरथ ने अपने को दो कौड़ी का सिद्ध कर दिया। अपनी पत्नी के विपरीत भी कुछ कहने की सामर्थ्य नहीं है। गलत बात के खिलाफ भी खड़े होने की सामर्थ्य नहीं है। ऐसे गुलाम हो गए हैं। लेकिन राम ने इसे स्वीकार कर लिया। पंडितों को खूब जंची बात। माता-पिताओं को खूब जंची बात। पुरोहितों को खूब जंची बात। जिनके हाथ में भी सत्ता है, उनको खूब जंची बात, कि आज्ञाकारिता ऐसी होनी चाहिए।
इसलिए राम की सदियों तक चर्चा चलती रही। इसलिए राम को घोट-घोट कर लोगों के गले में पिलाया गया है। कृष्ण को तो लोग छांटते हैं। पूरे कृष्ण को कोई स्वीकार करने को राजी नहीं है। लेकिन राम कोबिना छांटे गटक जाते हैं। राम में कुछ छोड़ने जैसी बात नहीं है। कृष्ण में तो हजार कारण मिलते हैं, जिनको कि स्वीकार करने के लिए बड़ी छाती चाहिए।
सूरदास कृष्ण के बचपन के गीत गाते हैं, जैसे कृष्ण कभी जवान हुए ही नहीं! छोटा बच्चा मटकी फोड़ दे, चल जाएगा। छोटा बच्चा स्त्रियों के कपड़े लेकर झाड़ पर चढ़ जाए, तो भी चल जाएगा। क्षम्य हो जाएगा। बच्चा ही है आखिर। लेकिन जवान कृष्ण अगर यह करते हों तो, तो सूरदास को भी अड़चन होती है। उनकी भक्ति भी डांवाडोल होने लगती है, कि ऐसे आदमी को कैसे स्वीकारें। तो सूरदास ने बचपन के तो गीत गाए कृष्ण के, लेकिन जवानी को बिलकुल काट कर अलग कर दिया।
अधिकतर लोग कृष्ण की बात करते हैं सिर्फ गीता के आधार पर। लेकिन महाभारत ही कृष्ण का एकमात्र जीवन-स्रोत नहीं है। श्रीमद्भागवत--और तब बड़ी अड़चन शुरू होती है। क्योंकि कृष्ण के जीवन में ऐसा बहुत कुछ है, बहुत ज्यादा है जिसको पचाना मुश्किल पड़ जाएगा। पांच हजार साल बीत गए, अब भी आदमी इतना प्रौढ़ नही हो पाया कि पचा ले। तो फिर व्याख्याएं करनी पड़ती हैं हमें। सोलह हजार पत्नियां थीं कृष्ण की, उनमें सब पत्नियां नहीं थीं उनकी। दूसरों की पत्नियां भी ले आए थे। इसको कैसे पचाओगे? इसको किस आधार पर पचाओगे? तुम्हारी नीति सब जर्जरित हो जाएगी।
इसलिए कृष्ण को तो कोई कहे मर्यादा पुरुषोत्तम! इससे ज्यादा अमर्याद व्यक्तित्व नहीं है। इससे ज्यादा स्वच्छंद व्यक्तित्व नहीं है। तो फिर कृष्ण को समझाने के लिए कुछ उपाय करने पड़ेंगे। तो लोग समझाते हैं कि ये सोलह हजार नारियां नहीं थीं, ये सोलह हजार नाड़ियां हैं! क्या-क्या तरकीबें लोग निकालते हैं! क्या-क्या होशियारियां लोग निकालते हैं! सत्य को भी झुठलाने के लिए कैसे-कैसे आयोजन किए जाते हैं!
कृष्ण में एक खूबी है। कुछ है जो अलौकिक है। लेकिन जब भी कुछ अलौकिक होगा तो वह नीति के बहुत पार होता है। नीति तो बड़ी साधारण बात है, लोक-व्यवहार है, व्यवस्था का अंग है। इसलिए जो व्यवस्था के पोषक हैं, वे राम के पक्षपाती रहेंगे। कृष्ण की पूजा भी कर लेंगे, तो भी उन्हें न मालूम क्या-क्या व्याख्याएं खोजनी पड़ेंगी।
महात्मा गांधी कहते थे कि गीता मेरी मां है। लेकिन उनको भी अड़चन थी। कृष्ण के साथ किसको अड़चन नहीं होगी! अड़चन यह थी कि अहिंसा का क्या होगा? सच पूछो तो अर्जुन गांधीवादी मालूम पड़ता है, क्योंकि वह कहता है: युद्ध छोड़ कर मैं जाना चाहता हूं। यु़द्ध में क्या सार है? क्या फायदा मारने से? हत्याओं से क्या मिल जाएगा? और अपनों को मार कर मैं जीत भी गया तो उस जीत का क्या मूल्य है? इतने खून, इतने अस्थि-पंजरों के ढेर पर मेरा सिंहासन भी बन गया, तो पश्चात्ताप की ग्लानि में जलूंगा? नहीं, यह मुझे नहीं करना है। मैं यह सब छोड़ कर चला जाना चाहता हूं। मुझे नहीं चाहिए यह राज्य।
और कृष्ण समझाते हैं कि तू जूझ, तू युद्ध कर। क्षत्रिय का यही कर्तव्य है। यही क्षत्रिय का धर्म है कि वह जूझे, कि वह लड़े। गांधी को बड़ी मुश्किल है। तो उन्होंने शुरू में ही व्याख्या कर ली कि यह कोई असली युद्ध नहीं है; यह तो अच्छाई और बुराई के बीच युद्ध की परिकल्पना है। यह तो शुभ और अशुभ के बीच युद्ध का प्रतीक मात्र है। कौरव अशुभ के प्रतीक हैं, पांडव शुभ के प्रतीक हैं। यह लड़ाई भीतरी है, अंतरात्मा में चल रही है। यह लड़ाई बाहर नहीं हो रही है।
बस, इतनी सी व्याख्या कर ली, फिर सारी गीता को स्वीकार करनें में कोई अड़चन न रही।
बुद्ध के साथ यही हुआ। बुद्ध को पूरा अंगीकार करना बहुत कठिन है। कृष्ण को भी अंगीकार किया जा सकता है, कुछ हेर-फेर किए जा सकते हैं। लेकिन बुद्ध ने तो सीधा-सीधा विरोध किया वेद का। यह बर्दाश्त के बाहर था कि जो व्यक्ति वेद का विरोध करे, जो कहे कि वेद कचरा हैं, इसको कैसे भगवान स्वीकार करें? लेकिन यह आदमी तो कीमती था ही, इसमें कोई शक-शुबहा नहीं था। जो इसके पास आए, इससे प्रभावित हुए। तो फिर कुछ रास्ता खोजना पड़ेगा। यह एक द्वंद्व खड़ा हो गया कि कैसे हम बुद्ध को पचाएं। तो एक कहानी गढ़ी पुराणों ने कि भगवान ने स्वर्ग और नरक बनाए। और हजारों साल बीत गए, नरक कोई गया ही नहीं, क्योंकि लोग पाप ही नहीं करते थे। तो शैतान ने जाकर भगवान को कहा कि नरक बनाया किसलिए है? मैं नाहक बैठा हूं। मेरे सारे कारिंदे खाली बैठे हैं। दफ्तर खोल कर बैठा हूं, कोई ग्राहक तो आता ही नहीं। तो यह दुकान किसलिए? या तो ग्राहक भेजें, हम बैठे-बैठे थक गए। हम अभ्यास सताने का कर-कर के थक गए। किसको सताएं? और या फिर यह बंद ही कर दें काम। हमको छुटकारा दें। किसी और काम में लगा दें।
तो भगवान को शैतान पर दया आई। उन्होंने कहा: तू घबड़ा मत। तूने याद दिलाई सो ठीक किया। जल्दी ही मैं बुद्ध के नाम से अवतार लूंगा और लोगों को भ्रष्ट करूंगा। और फिर इतने लोग नरक आएंगे कि तुझे कोई चिंता न रह जाएगी। ऐसे भगवान ने बुद्ध का अवतार लिया और फिर लोगों को भ्रष्ट किया। तब से नरक में ऐसी भीड़-भाड़ है कि जाओगे तो एकदम जगह मिलने वाली नहीं है। कई दिन तो कतार में ही खड़ा रहना पड़ेगा।
देखते हो होशियारी पंडित की! उसने दोहरे काम कर लिए। उसने बुद्ध को भगवान भी मान लिया कि हैं तो भगवान के ही अवतार, लेकिन आए हैं जिस कारण से, वह खतरनाक काम है। इसलिए सावधान भी रहना। इनकी बात में मत पड़ना, नहीं तो नरक जाओगे।
राम में कोई अड़चन नहीं है। राम बिलकुल जैसे चाहिए पंडित के लिए, पुरोहित के लिए, न्यस्त स्वार्थों के लिए, ठीक वैसे ही हैं। इसलिए राम को अंगीकार कर लिया है। इसलिए रामायण घर-घर में पहुंच गई है। इसलिए मस्तिष्क-मस्तिष्क में हमने उसे गुंजा दिया। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में हमने उसे बिठा दिया। इसलिए रामलीला चलने लगी; चल रही है सदियों से। हम बच्चों को दूध के साथ राम की कथा घोट-घोट कर पिला देते हैं। यह उपाय है कि तुम कभी बगावत न करना, आज्ञाकारी रहना, अनुशासनबद्ध रहना, कभी स्वच्छंद न होना। हमेशा जो तुमसे बड़े हैं, वे सही हों कि गलत हों, यह सवाल नहीं उठता; वे बड़े हैं, इसलिए आदर योग्य हैं। वे जो कहें वही मानना। यह तुम्हारा काम ही नहीं है सोचना कि क्या सही है और क्या गलत है।
मां-बाप को भी यह बात रुचती है, क्योंकि कौन मां-बाप नहीं चाहता कि बेटे आज्ञाकारी हों! बेटा बिलकुल गोबर-गणेश हो तो भी चलेगा, मगर आज्ञाकारी होना चाहिए। और बेटा कितना ही प्रतिभाशाली हो, अगर आज्ञाकारी न हो तो मां-बाप को अड़चन होने लगती है।
और जितनी प्रतिभा होगी, उतनी ही आज्ञाकारिता मुश्किल होती है। यह खयाल रखना। ये दोनों बातें साथ-साथ नहीं होतीं। प्रतिभा होगी तो स्वभावतः व्यक्ति सोचेगा। राजी होगा उन बातों में जिन बातों में राजी होना चाहिए। राजी होगा अपने बोध से, अपनी अंतःप्रज्ञा से, राजी होगा अपने कारण; इसलिए नहीं कि पिता कहते हैं कि मां कहती है। और इनकार करेगा तो अपने कारण। इनकार और स्वीकार उसके भीतर से आएंगे।
मां-बाप को भी जमी यह बात कि राम की बात पीटो। राम की बात समझाओ। राम को जितना ऊंचा उठा सको उठाओ। इससे बच्चों को भी नियोजित रखने में सुविधा होगी। धनपतियों को भी समझ में आई। राज्याधिकारियों को भी समझ में आई। राजाओं को भी समझ में आई। राजनीतिज्ञों को भी समझ में आई। पंडित-पुरोहित, सबको बात जंची। जिनके हाथ में सत्ता है, उन सबको बात जंची कि राम की अगर हम प्रतिष्ठा कर रखें तो बगावत कट जाएगी।
भारत अकेला देश है, जहां कोई क्रांति नहीं हुई। और अगर भारत में कभी क्रांति के नाम से कुछ होता है तो ऐसा कचरा होता है कि उसको क्रांति कहने में भी शर्म आती है। अभी-अभी तुमने देखा, कुछ दिन पहले जयप्रकाश नारायण ने क्रांति कर दी थी। और देश भर के जितने मुर्दे थे और जितने गधे थे, उन सबके हाथ में सत्ता पहुंच गई थी। यह क्रांति थी! यह प्रतिक्रांति है। इसको दूसरी क्रांति कहा जाता था। वह तीन ही साल में टांय-टांय फिस्स हो गई। यह महाक्रांति इतने जल्दी खत्म हो गई! आज उसका कुछ पता ही नहीं कि वह क्रांति कहां गई। खूब क्रांतियां हम करते हैं! चली-चलाई कारतूसे हैं। इनका कोई मूल्य नहीं।
भारत में क्रांति न होने का बड़े से बड़ा कारण एक है कि हमने जो मूल्य भारत को दिए हैं, वे क्रांति-विरोधी मूल्य हैं।
मेरी दृष्टि में धर्म सबसे बड़ी क्रांति है, महत्तम क्रांति है। क्योंकि उसी क्रांति के द्वारा तुम मूर्च्छा से जागते हो, निद्रा से उठते हो। तुम्हारे भीतर जो सोई हुई आत्मा है, वह पहली दफा करवट लेती है और आंख खोलती है। तुम पहली दफा परमात्मा का स्मरण करते हो और पहली बार तुम्हें पता चलता है कि यह जो समाज की व्यवस्था है, यह तो कामचलाऊ है। एक और बड़ी व्यवस्था है अस्तित्व की, उस अस्तित्व की व्यवस्था के साथ अपना संबंध जोड़ना है। समाज की व्यवस्थाएं तो बदलती रहती हैं। कल जो सही था, आज गलत हो गया है। आज जो सही है, कल गलत हो जाएगा।
राम ने एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था--इसलिए कि शूद्र को वेद-वचन नहीं सुनने चाहिए। राम को तुम धार्मिक व्यक्ति कहोगे? तो फिर जो लोग शूद्रों को जला रहे हैं, ये सब धार्मिक हैं। ये कुछ बुरा नहीं कर रहे हैं। ये तो बेचारे राम के ही पीछे चल रहे हैं। ये तो ठीक ही कर रहे हैं। ये शूद्रों को रास्ते पर लगा रहे हैं। ये शूद्र ज्यादा बगावती हुए जा रहे हैं! शूद्र सिर उठा रहे हैं। एक शूद्र ने सिर्फ सुन लिया था वेद-वचन, पाप हो गया, महापाप हो गया! और राम जैसे व्यक्ति को उसके कानों में सीसा पिघलवा कर भर देना पड़ा। फिर भी हम राम को धार्मिक कहे चले जाएंगे। मगर उस दिन यह बात चलती थी। उस दिन यह बात ठीक थी। उस दिन कोई अड़चन न थी। शूद्र की गिनती आदमी में थी ही नहीं। शूद्र तो पशुओं जैसा था। उसका हक क्या था? स्त्री का कोई हक नहीं था।
इसलिए वाल्मीकि रामायण में जब राम जीत जाते हैं, लंका-विजय हो जाती है और सीता को लेकर लौटते हैं, तो जो पहला मिलन होता है सीता से, उसमें राम कहते हैं कि ऐ स्त्री, तू ध्यान रखना कि मैंने तेरे कारण युद्ध नहीं किया है। यह युद्ध तो कुल-मर्यादा के लिए किया है। यह तो वंश-मर्यादा के लिए किया है। तू इस भ्रांति में मत पड़ जाना कि तेरे लिए युद्ध किया है। कुल-मर्यादा! यह अहंकार! यह कुल-मर्यादा क्या है? यह अहंकार का ही दूसरा नाम है।
सीता का कोई आदर नहीं है, कोई सम्मान नहीं है। सीता के लिए युद्ध ही नहीं किया गया। और तभी तो बड़ी आसानी से सीता को फिर ऐसे निकाल कर फेंक दिया, जैसे कोई दूध में पड़ी हुई मक्खी को निकाल कर फेंक देता है। सीता का कोई मूल्य नहीं है, कोई प्रतिष्ठा नहीं है, कोई सम्मान नहीं है।
इन राम को मैं धार्मिक स्वीकार नहीं करता हूं--नहीं कर सकता हूं! यह उस दिन की सामाजिक व्यवस्था से तो इनका तालमेल बैठता था। जो प्रचलित मूल्य थे, ये उनके अनुकूल पड़ते थे, बिलकुल अनुकूल पड़ते थे। लेकिन जीवन के सत्य से इस बात का कोई तालमेल नहीं है। स्त्री के प्रति सम्मान न हो, ऐसी अपमान की धारणा, इतना अभद्र वचन! कुछ कहने की जरूरत भी न थी। कोई सीता पूछ भी नहीं रही थी कि तुमने किसलिए युद्ध किया। मगर कह देना जरूरी था, ताकि सीता को जाहिर हो जाए, यह भ्रंाति कहीं मन में न रह जाए कि राम जैसे व्यक्ति स्त्रियों के लिए नहीं लड़ते। स्त्रियों में रखा ही क्या है! अरे हड्डी-मांस-मज्जा!...जैसे पुरुषों में कुछ सोना भरा है!
और यही राम जंगल में स्वर्ण-मृग को देख कर उसके पीछे भाग चले थे। तुमने भी स्वर्ण-मृग देखा होता तो तुम भी दस दफा सोचते कि स्वर्ण के कहीं मृग होते हैं! बुद्धू से बुद्धू आदमी भी एक दफा ठिठकता कि यह मैं क्या कर रहा हूं, कहीं सोने के मृग होते हैं! लेकिन चल पड़े। सोने के मृग के पीछे चल पड़े! भूल गए कि सारा जगत मृग-मरीचिका है! मृग तक ने धोखा दे दिया--जगत को मृग-मरीचिका मानना तो दूर।
लक्ष्मण ने एक स्त्री की नाक काट ली, कोई एतराज नहीं। अभद्र व्यवहार था। एकदम अभद्र व्यवहार था। लेकिन कोई विरोध नहीं। ये जिन ऋषि-मुनियों ने राम को खबर दी कि हमें बहुत सताया जा रहा है, ये राक्षस हमें सता रहे हैं, ये हमें परेशान करते हैं, ये हमारे यज्ञ-हवन में बाधा डालते हैं--ये ऋषि-मुनि कोई और नहीं थे, ये सिर्फ एजेंट थे। जैसे ईसाई मिशनरी होते हैं, वे सी. आई. ए. के एजेंट होते हैं। बस, ईसाई मिशनरी यानी ऋषि-मुनि ईसाइयों के। पहले ऋषि-मुनि चले आते हैं। पहले वे जाल फैला देते हैं। पहले बाइबिल आती है, फिर पीछे से बंदूक आती है। ये सब राजनैतिक जालसाजियां थीं।
राम के व्यक्तित्व में मुझे कोई न तो बुद्ध की प्रखरता दिखाई पड़ती है, न कृष्ण का अदभुत समग्र रूप दिखाई पड़ता है, न जीसस की क्रांति दिखाई पड़ती है, न लाओत्सु के वचन--एक-एक वचन कि एक-एक हीरा--ऐसे कोई वचन दिखाई पड़ते हैं।
मगर आनंद मैत्रेय, तुम ठीक कहते हो कि क्यों हजारों वर्षों से राम का नाम जीवित है? जीवित रहेगा। जब तक न्यस्त स्वार्थ जीवित रहेंगे, जब तक बेईमान शोषण जारी रखना चाहते हैं, तब तक वे राम को जीवित रखेंगे। उनकी आड़ में शोषण बड़ी आसानी से चल रहा है, बड़ी सुविधा से चल रहा है। राम-कथा चल रही है और पीछे कुछ और ही कथा चल रही है।
मैं जब यह कहता हूं तो कठिनाई होनी स्वाभाविक है। क्योंकि तुम्हारी इतनी प्राचीन मान्यता को चोट लगे तो तुम तिलमिला जाओ, इसमें कुछ आश्चर्य नहीं। लेकिन मेरी भी मजबूरी है, मैं वही कह सकता हूं, जो मुझे दिखाई पड़ता है, जैसा मुझे दिखाई पड़ता है। उसमें मैं रंचमात्र फर्क नहीं कर सकता। तुम्हें अच्छा लगे तो, तुम्हें बुरा लगे तो--वह तुम्हारी मौज। लेकिन राम में मुझे कुछ धर्म जैसी बात दिखाई नहीं पड़ती। अच्छे आदमी थे, भले आदमी थे। आज्ञाकारी थे। अपने समय की मान्यताएं और मूल्यों के अनुकूल थे। जिसको सज्जन कहें, सच्चरित्र कहें। मगर संत नहीं।
ये तीन शब्द ठीक से समझ लेना। एक तो दुर्जन होता है, जो समाज के मूल्यों के विपरीत चलता है। एक सज्जन होता है, जो समाज के मूल्यों के अनुकूल चलता है। और एक संत होता है, जो न तो प्रतिकूल चलता है, न अनुकूल चलता है; जो अपनी अंतःप्रेरणा से जीता है। फिर कभी प्रतिकूल पड़ जाती है उसकी अंतःप्रेरणा, कभी अनुकूल पड़ जाती है। वह गौण बात है। प्रतिकूल पड़े तो ठीक, अनुकूल पड़े तो ठीक।
लेकिन राम तो बिलकुल लकीर के फकीर हैं। वे तो लीक-लीक चलते हैं। वे तो एक-एक कदम सम्हाल कर चलते हैं। वे तो फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं। एक धुब्बड़ ने कह दिया...अब धोबियों की भी बात का कोई मतलब होता है...कि बस सीता को निकाल फेंका! जैसे बहाना ही खोज रहे हों! जैसे रास्ते में ही बैठे हों! ऐसा लगता है जैसे धुब्बड़ से खुद ही कहलवा दिया हो। एक आदमी अगर कह दे तो इतनी घबड़ाहट क्या? अग्नि-परीक्षा भी ले ली थी सीता की। अग्नि-परीक्षा भी बेकार हो गई फिर!
और कभी तुमने यह सोचा कि सीता की अग्नि-परीक्षा ली, खुद भी तो अग्नि-परीक्षा देनी चाहिए थी। यह कैसा न्याय हुआ? सीता समझो कि इतने दिन तक रावण के वहां रही, पता नहीं क्या हुआ उसके चरित्र का। लेकिन राम भी तो इतने दिन सीता के बिना रहे थे, पता नहीं क्या हुआ इनके चरित्र का! ऐसे इतिहासज्ञ हैं, जिनकी मान्यता है कि राम का शबरी से प्रेम था। इसमें कुछ सचाई मालूम पड़ती है, क्योंकि सिर्फ प्रेमी ही एक-दूसरे के जूठे बेर खा सकते हैं, दूसरा तो कभी नहीं खा सकता। और मुझे शक है कि राम सीता के जूठे बेर खाते। एक धुब्बड़ के कहने पर जिसको भेज दिया जंगल, गर्भवती स्त्री, उसके जूठे बेर ये खाते, यह शक की बात है।
लेकिन रामलीला में तुमने देखा होगा कि शबरी को बूढ़ी बताया जाता है। लेकिन जिन्होंने शोध की है इस पर काफी, उनका कहना है कि शबरी युवा थी और सुंदर थी। और जंगल का सौंदर्य था। अल्हड़ सौंदर्य था। तो राम को अगर सीता की परीक्षा लेनी थी तो इतना तो न्याययुक्त होना ही चाहिए कि खुद भी गुजर गए होते आग से, डर क्या था? दोनों साथ-साथ गुजर गए होते हाथ में हाथ लेकर। यह ज्यादा उचित मालूम होता। लेकिन राम तो नहीं गुजरे अग्नि-परीक्षा से। पुरुष पुरुष है! कहते हैं न मर्द बच्चा मर्द बच्चा! पुरुष को कोई परीक्षा देनी पड़ती है! कोई सवाल नहीं! वह तो कुछ गड़बड़ भी करे तो चलेगा। वह तो गड़बड़ नहीं करेगा, यह हो कैसे हो सकता है?
मगर स्त्री को पवित्र होना चाहिए। क्यों? ये दोहरे मापदंड क्यों? धार्मिक व्यक्ति के दोहरे मापदंड नहीं होते। उसका मापदंड एक ही होगा। जो दूसरे के लिए होगा, वही अपने लिए होगा। जो अपने लिए होगा, वही दूसरे के लिए होगा। उसके लिए स्त्री-पुरुष का कोई फासला नहीं होगा।
लेकिन स्त्री की कोई कीमत ही नहीं थी। स्त्री को तो कहते ही रहे--स्त्री-संपदा। उसका कोई मूल्य नहीं है। जैसे कुर्सी है, फर्नीचर है, पलंग है, बिस्तर है--ऐसी ही स्त्री--पैर की जूती! तो उसकी जांच कर लेनी जरूरी है कि इस जूती को किसी और ने तो नहीं पहना! अपने पैर की थोड़े ही जांच करवानी पड़ेगी कि हम तो कोई दूसरी जूती नहीं पहने रहे!
अग्नि-परीक्षा लेने के बाद भी, फिर जरा सा आदमी ने एक संदेह उठा दिया और सीता को छोड़ दिया। जैसे बहाना चाहिए था। अगर ऐसा ही था कि एक आदमी की बात भी इतनी चोट करती थी, जैसा लोग कहते हैं कि एक आदमी की भी निंदा राम सह नहीं सके, ऐसा उनका उज्ज्वल व्यक्तित्व था, तो खुद भी सीता के साथ चले जाते। यूं भी चौदह साल रह गए थे बाप के कहने से और थोड़े-बहुत वर्ष रह लेते जंगल में। लेकिन खुद भी चले जाते। तो मेरे मन में कीमत होती। तो मैं कहता, यह बात समझ में आती है। लेकिन खुद तो राजा बने बैठे रहे, सीता को निकाल बाहर कर दिया। राज्य की ज्यादा कीमत है! पद की ज्यादा कीमत है! एक जीवंत स्त्री का कोई मूल्य नहीं है!
और उससे भी झूठ बोला। उसे भी बताया नहीं, कहां भेजा जा रहा है। उसे भी धोखा दिया। और फिर भी मर्यादा-पुरुषोत्तम हैं! अपनी ही पत्नी को धोखा दिया। कम से कम कहना तो था। कम से कम साफ तो कर देनी थी बात। और मुझे लगता है कि सीता इतनी बलवती स्त्री थी, निश्चित ही मेरे मन में राम से कहीं सीता का मूल्य ज्यादा है--कि अगर सीता को कहा होता तो सीता ने कहा होता कि ठीक है, मैं स्वयं जाती हूं। यह धोखा देने की कोई जरूरत न थी, कोई आवश्यकता न थी।
रवींद्रनाथ ने बुद्ध के संबंध में एक कविता लिखी है। जब बुद्ध लौटे हैं बारह वर्षों के बाद राजमहल बुद्ध होकर, तो यशोधरा ने उनसे एक ही प्रश्न पूछा--उनकी पत्नी ने--कि मुझे सिर्फ एक बात आप बता दें, जो मेरे मन को काटती रही: आप अगर मुझसे कह कर गए होते तो क्या आप सोचते हैं कि मैं आपको रोकती? इतना भर मुझे कह दें! क्या मेरे क्षत्रिय होने पर आपको इतना भी भरोसा न था? क्या मैं क्षत्राणी नहीं हूं? क्या क्षत्राणियों ने अपने पतियों को तिलक करके युद्ध के मैदान पर नहीं भेज दिया है? फिर आप तो सत्य की खोज में जा रहे थे। आप तो समाधि की खोज में जा रहे थे, बुद्धत्व की खोज में जा रहे थे। मैं आपके चरण पखारती, आपके चरणों पर फूल चढ़ाती, आपको विदा दे देती। इतना सौभाग्य मुझे दिया होता। क्या आपको शक था कि मैं रोती, चिल्लाती, चीखत
ी, रोकती आपको? इतना भर मुझे कह दें। अगर मुझे कोई चीज कचोटती रही है बारह वर्षों में तो सिर्फ एक कि मुझे कहा क्यों नहीं! क्या मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं था?
और रवींद्रनाथ ने ठीक किया है कि बुद्ध सिर झुकाए खड़े रहे गए हैं। कविता में बुद्ध से उत्तर नहीं बना देते। क्या उत्तर देंगे? बात तो गलत थी ही। बुद्ध गए थे द्वार तक, देखा था आंख भर कर पत्नी को, बेटे को और फिर चुपचाप लौट आए थे; आवाज भी न हो, कि कहीं पत्नी रोके न!
पुरुषों को स्त्रियों पर कभी भरोसा ही नहीं रहा। स्त्रियों को उन्होंने कभी आत्मवान नहीं माना। स्त्रियों की गिनती उन्होंने हमेशा नंबर दो की मनुष्य-जाति में की है--दोयम। आदमी प्रथम है, पुरुष प्रथम है। स्त्री तो ठीक है, नाममात्र को।
राम ठीक जमे स्वार्थी लोगों को। इसलिए उनके मंदिर बने, पूजा चली, रामलीलाएं चलीं। और कोई कारण नहीं है। और राम के इस समादर ने ही भारत से क्रांति को विलुप्त कर दिया। फिर जो भी हमारे ऊपर सत्ताधिकारी रहा, हम उसी के लिए जी-हजूरी करते रहे। दो हजार साल तक हम गुलाम रहे बड़ी मौज से, क्योंकि जो सत्ता में हो हम तो उसके ही जी-हुजूर! छोटा सा देश इंग्लैंड हम पर कब्जा किए बैठा रहा, हमसे कुछ करते न बना। करने का सवाल ही न था। हम तो आज्ञाकारी! तो हमने चुपचाप आज्ञा मान ली। और राजा तो भगवान का प्रतिनिधि होता है। वह तो पृथ्वी पर भगवान का प्रतीक है। इसलिए जो भी राजा है, हम उसके सामने ही झुकने को, नाक रगड़ने को तैयार रहे।
गुलाम होना हमारी प्रवृत्ति हो गई। हमारी गुलामी की प्रवृत्ति में, हमारी दासता की प्रवृत्ति में, हमारी राम के प्रति जो धारणा है, उसने बहुत हाथ बंटाया है।
इसलिए मैं राम को कोई धार्मिक व्यक्ति नहीं मानता। सज्जन मानता हूं, संत नहीं मानता। सज्जन होना हो तो राम के पीछे चलना। संत होना हो तो फिर जरा और ज्योतिर्मय व्यक्ति को पकड़ना होगा। फिर किसी बुद्ध को, किसी जीसस को, किसी लाओत्सु को--किसी ऐसे व्यक्ति को जिसके भीतर आग जलती हो, जिसके भीतर क्रांति, जिसके भीतर अकेले जाने का साहस हो। सारे मूल्यों के विपरीत भी अगर उसकी आत्मा कहे तो जाए। चाहे कोई भी कुर्बानी देनी पड़े, चाहे दुनिया कुछ भी कहे, फांसी पर लटका दे, तो भी कोई फिकर नहीं। वह फांसी चुनना पसंद करेगा, मगर झुकेगा नहीं। टूट जाना पसंद करेगा, मगर झुकेगा नहीं। समझौता उसकी वृत्ति नहीं होगी। संघर्ष उसका जीवन होगा। साहस उसका गुण होगा।
मैं जब घर से चला था तो बहुत अच्छे-अच्छे विचार थे--वेदांत और निर्वाण की बातें थीं; मगर यहां आकर मन में सारे दिन लड़कियों के विचार ही चलते रहते हैं। बहुत कोशिश करता हूं, हटते ही नहीं। यहां तक की ध्यान में भी यही विचार चलते रहते हैं। मैं शादीशुदा हूं और अपनी पत्नी के बिना कभी किसी स्त्री के पास नहीं गया। क्या करूं, कोई रास्ता बताएं!
लेकिन यहां यह चर्चा काम नहीं आएगी। यह चर्चा तोड़ देना ही यहां के अनिवार्य प्रयोगों में से एक है। यहां तो मैं चाहता हूं कि तुम जीवन के असली प्रश्नों से परिचित होओ, तुम्हारी असली समस्याएं प्रकट होनी चाहिए।
तुम्हारे तथाकथित धार्मिक लोग, जरा उनको गौर से तो देखो! बातें धर्म की, मगर उनके जीवन में ठीक उससे उलटा पाओगे। जाएंगे मंदिर में भगवान की पूजा को, और अगर कोई स्त्री मिल गई तो धक्का मारे बिना नहीं रहेंगे। हालांकि धक्का भी धार्मिक ढंग से मारेंगे। ऐसा मारेंगे कि किसी को यह भी शक न हो कि धक्का मारा है। राम-राम, राम-राम करते हुए धक्का मारेंगे। माला फेरते रहेंगे और धक्का मारेंगे। पूजा का थाल घुमाते रहेंगे, लेकिन नजर भगवान पर नहीं होगी, नजर चारों तरफ घूमती रहेगी।
जिस मंदिर में जितनी ज्यादा स्त्रियां जाएंगी, उस मंदिर में उतने ज्यादा पुरुष जाएंगे। जिस मंदिर में स्त्रियां न जाएं, उस मंदिर में पुरुष जाना बंद हो जाते हैं। या तो पुरुष जाते हैं अपनी पत्नी के पीछे कि कोई और धक्का न मार दे, या जाते हैं दूसरी पत्नियों के पीछे कि अपन धक्का मार लें। बाकी और किसी काम से मंदिर जाते हैं, दिखाई नहीं पड़ता। और चंदन-मंदन लगाए हुए हैं। जनेऊ वगैरह पहने हुए हैं। राम-नाम की चदरिया ओढ़ी हुई है। ऐसा भक्ति-भाव दिखलाते हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता कि ये और कुछ उपद्रव करेंगे!
ठीक ही हुआ ईश्वरानंद, जो यहां आकर तुम्हें अपनी असलियत दिखाई पड़ी। यहां असलियत दिखाई पड़ेगी ही, क्योंकि यह कोई मुर्दा आश्रम नहीं है। और किसी आश्रम में गए होते, जहां मरे-मराए लोग बैठे हुए हैं, तो उन्हें देख कर तुम्हें और भी ज्यादा ब्रह्मचर्चा आती। उन्हें देख कर और घबड़ाहट लगती कि अब मौत करीब ही है समझो, कि यही दशा अपनी हो जाने वाली है अब। उदासीनता पैदा होती है।
यह तो एक जीवंत स्थल है। यह कोई मंदिर नहीं है, मधुशाला है। युवा हैं। सुंदर युवतियां हैं, सुंदर युवक हैं। अगर यहां ध्यान कर सके तो ही समझना कि ध्यान किया। उधर ऋषिकेश वगैरह में जाकर शिवानंद के आश्रम में बैठ कर ध्यान करने में कोई अड़चन नहीं। करोगे क्या और?...कि पहाड़ देखो, कि गंगा मैया देखो, कि ध्यान करो! यहां तुम्हें अड़चन हो रही होगी। मैं समझा। तुम्हारा वेदांत एकदम बह गया। निर्वाण वगैरह की चर्चा खो गई। मन ने कहा होगा: अरे भई ठहरो, वेदांत और निर्वाण सब पीछे देख लेंगे। चार दिन की जिंदगी है। और वेदांत की बात तो तभी करना चाहिए, जब दांत गिर जाएं। इसलिए तो उसको ‘वेदांत’ कहते हैं। और निर्वाण का तो मतलब ही होता है: मिटना। जब मरने ही लगो, तब सोच लेना निर्वाण की बात। अभी तो जीना है। अभी तो चार दिन गुलछर्रे कर लो!
यहां तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। यहां तुम ध्यान करने बैठोगे, आंख बंद करोगे, आंख खुल-खुल जाएगी। तुम लाख उपाय करो आंख बंद करने के...। तुम अपने घर में बैठोगे, तुम कहते हो कि मैं शादीशुदा हूं और अपनी पत्नी के बिना कभी किसी स्त्री के पास नहीं गया।...घर में बैठोगे, पत्नी को देख कर वैसे ही आंख बंद होती है। आदमी को एकदम विपस्सना सूझती है। पत्नी को देखा कि एकदम ऊंची बातें उठती हैं, ऊंचे विचार आते हैं--त्याग, तपश्चर्या! जरूर आती होगी।
उसी भ्रांति में तुम यहां आ गए। पत्नी को साथ ले आना था कि वह बगल में ही बैठी रहती तो तुम्हें आंखें न खोलने देती। डर के मारे न खोल सकते थे आंखें। ऐसी डराए रखती हैं पत्नियां भी!
चंदूलाल के बेटे ने उनको पत्र लिखा युनिवर्सिटी से कि मैं एक लड़की के प्रेम में पड़ गया हूं। बड़ी सुंदर है। फोटो भेज रहा हूं। विवाह का तय कर लिया है। आपके आशीर्वाद की अपेक्षा है।
चंदूलाल की पत्नी तो बहुत खुश हो गई। उसने कहा कि लिखो इसी वक्त बेटे को पत्र! सुंदर चित्र है और पैसे वाले की लड़की है। जाहिर नाम है। कुलीन परिवार है। ऐसा मौका कब मिलेगा? चूकना ही नहीं चाहिए। तो चंदूलाल ने पत्र लिखा कि बेटा भगवान की तुम पर कृपा है। शीघ्रता करो! यह अवसर हाथ से न जाने दो। विवाह तो जीवन का सबसे मधुर संबंध है! यही तो जीवन का आनंद है!
ऐसी-ऐसी अच्छी-अच्छी बातें लिखीं जैसी लिखनी चाहिए। और जब चिट्ठी पूरी हो गई तो जल्दी से पुनश्च करके लिखा कि अरे मूरख, तेरी मां अभी-अभी बाहर गई है। मुझे देख, मेरी गति देख! और भूल कर इस झझंट में न पड़ना। और ज्यादा मैं लिख नहीं सकता, वह वापस आ रही है। सो मैं चिट्ठी बंद कर रहा हूं। थोड़ा लिखा ज्यादा समझना। उल्लू के पट्ठे, तुझे इसलिए भेजा है विश्वविद्यालय में? बच सके तो बच जा!
पत्नी के सामने तो लिखना पड़ा...आशीर्वाद ही आशीर्वाद बरसाए। लेकिन पुनश्च में असली बात लिख दी। यही चंदूलाल का बेटा, छोटा जब था तो एक दिन पूछ रहा था चंदूलाल से कि पापा, दूल्हों को घोड़ों पर क्यों बिठाते हैं, गधों पर क्यों नहीं बिठाते? तो चंदूलाल ने कहा कि बेटा, ताकि वधु को जानने में अड़चन न हो कि कौन दूल्हा है। दो गधे देख कर उसको मुश्किल पड़ेगी कि किसको वरमाला पहनाऊं। सो घोड़े पर बिठाते हैं बेटा, ताकि साफ दिखाई पड़ता रहे कि गधा कौन है और घोड़ा कौन है।
ईश्वरानंद, अगली बार आओ तो पत्नी को साथ ले आना। वह पास ही बैठी रहेगी। खुद तो विपस्सना करेगी नहीं, मगर तुमको करवाएगी।
पत्नियों में एक गुण होता है, पतियों को धार्मिक बना देती हैं, एकदम सच्चरित्र बना देती हैं। बनना ही पड़ता है मजबूरी में। अगर पत्नियां न हों तो संसार एकदम भ्रष्ट हो जाए। सभी पुरुष चाहते हैं अविवाहित रहें।
जॉर्ज बर्नार्ड शॉ कहा करता था कि दुनिया में आनंद ही आनंद हो जाए, अगर सभी पुरुष अविवाहित रहें और सभी स्त्रियां विवाहित। मगर यह हो कैसे? ये दोनों बातें एक साथ बन सकती नहीं।
और यहां तुम्हारा जन्म भर का बंधा हुआ बांध टूट जाएगा। तुम ध्यान करने बैठे हो और कोई सुंदर युवती नाचती हुई निकल जाएगी, कोई जोड़ा हाथ में हाथ लिए निकल जाएगा। कई दफा तुम्हें शक हो जाएगा कि तुम कहीं स्वर्ग तो नहीं पहुंच गए, अप्सराएं वगैरह तो नहीं आ गईं! आंख मल कर तुम वापस देखोगे कि मामला क्या है, जिंदा हूं? ये मेनकाएं, उर्वशियां!
मगर यह अच्छा हुआ। इससे तुम्हें अपनी सचाई का पता चला। जो तुम्हारे भीतर दबा पड़ा है, वही सत्य है। जो ऊपर-ऊपर है, वह झूठ है। वह तो सत्य को छिपाने का आयोजन है। वह तो मलहम-पट्टी है। वह तो घाव को फूल से ढांक लिया है। इसे स्वीकार करो अपने सत्य को। इसे तुम इनकार मत करना। इनकार जिंदगी भर किया है, इसीलिए यह अभी तक तुम्हारे पीछे पड़ा है। स्वीकार करो। इसमें कुछ बुरा नहीं है।
यह बड़ी हैरानी की बात है। एक सुंदर गुलाब के फूल को देख कर तुम्हें कोई ग्लानि नहीं होती और कोई अपराध-भाव पैदा नहीं होता। सुबह सूरज ऊगता है, सुंदर प्रभात, तुम्हें कोई अड़चन नहीं होती। पक्षी गीत गाते हैं, तुम्हें कोई एतराज नहीं होता। एक सुंदर स्त्री को देख कर तुम्हें क्यों एतराज होता है? और तुम्हारे भीतर अगर सौंदर्य की प्रशंसा उठती है तो इसमें बुराई कहां है, पाप कहां है? गुलाब का फूल जिसने बनाया, उसी ने यह सुंदर स्त्री भी बनाई, उसी ने ये सुंदर पुरुष भी बनाए। जिसने सुबह सूरज उगाया, जो सांझ को सूर्यास्त देगा, जो रात आकाश को तारों से भर देता है, उसी की तूलिका के ये सारे खेल हैं।
मैं तुमसे यह नहीं कहूंगा कि सुंदर स्त्री को देख कर आंख बंद कर लो। मैं तुमसे कहूंगा: सुंदर स्त्री में भी परमात्मा की ही तूलिका को देखना शुरू करो। सुंदर स्त्री में भी उसकी ही कलाकृति है। सुंदर स्त्री के कंठ में भी वही गा रहा है, जो पक्षियों के कंठ से गा रहा है। वह जो कोयल की कूक है, वही सुंदर स्त्री का सौंदर्य है। क्यों यह भेद करते हो? लेकिन तुम्हें सदियों से यह सिखाया गया है कि यह पाप है।
‘यह पाप है’--यह धारणा गलत है। कुछ भी पाप नहीं है। स्वाभाविक है। अस्वाभाविक होगा कि एक सुंदर स्त्री निकल जाए और तुम्हारे मन में कोई खयाल ही न उठे। तुम पत्थर हो कि आदमी हो? भाव तो उठना ही चाहिए। काव्य जगना चाहिए। तुम्हारी हृदय-तंत्री की वीणा बज जानी चाहिए। कोई तार छिड़ जाने चाहिए। मगर जो फर्क होगा धार्मिक-अधार्मिक में, वह यही होगा कि हर सौंदर्य धार्मिक व्यक्ति को ईश्वर का स्मरण दिलाएगा और अधार्मिक को ईश्वर का विस्मरण करा देगा।
अब तुम अधार्मिक व्यक्ति हो। नाम तुम्हारा ईश्वरानंद है, मगर अधार्मिक व्यक्ति हो। सुंदर स्त्रियों को देख कर तुम कहते हो: अच्छे-अच्छे विचार थे, वेदांत और निर्वाण की बातें थीं, सब खो गईं। सुंदर स्त्री को देख कर तुम्हें परमात्मा के प्रति अनुग्रह का भाव पैदा होना चाहिए। उसने यह इतना सुंदर जगत रचा, उसकी बड़ी कृपा है, उसकी बड़ी अनुकंपा है! तुम्हें आंखें दीं देखने को, कि रंग देखो, सौंदर्य देखो! तुम्हें कान दिए सुनने को, कि ध्वनि सुनो, संगीत सुनो! तुम्हें हाथ दिए, कि तुम स्पर्श कर सको। तुम क्यों इतने घबड़ाए हुए हो? परमात्मा नहीं डरा तुम्हें यह सब देने से, तुम परमात्मा से भी ज्यादा अपने को ऊपर उठाने की कोशिश में लगे हो! परमात्मा जिससे नहीं डरा, तुम्हारे महात्मा उससे तुम्हें डरवा रहे हैं! तुम्हारे महात्मा सब परमात्मा के खिलाफ हैं।
मैं परमात्मा के खिलाफ नहीं हूं, तुम्हारे महात्माओं के खिलाफ हूं। क्या अड़चन है? सुंदर स्त्री आए तो उसे ध्यानपूर्वक देखो न? उस वक्त आंख बंद करने की क्या जरूरत? जबर्दस्ती आंख बंद करोगे, भींच भी लोगे आंख तो भी क्या होगा? भीतर तो वही सुदंर स्त्री गूंजती रहेगी--और भी ज्यादा सुदंर हो जाएगी, और भी ज्यादा तुम रुग्ण हो जाओगे। और वह झूठी आंख बंद है तुम्हारी। उसका कोई मूल्य नहीं है।
लेकिन हम इस तरह की कहानियां सुनते हैं कि सूरदास ने अपनी आंखें फोड़ लीं सुंदर स्त्री को देख कर। यह भी कोई बात हुई! अगर सूरदास ने यह किया हो तो मैं सूरदास को कभी क्षमा नहीं कर सकूंगा। सुंदर स्त्री को देख कर आंखें फोड़ लीं! लेकिन आंखें फोड़ लेने से क्या हो जाएगा? क्या तुम सोचते हो अंधे आदमी ब्रह्मचर्य को उपलब्ध हो जाते हैं? तो धन्य हैं जो अंधे पैदा हुए! फिर अंधों पर दया न करो, फिर तो दया खुद पर करो। परमात्मा की बड़ी कृपा है कि उसने अंधे पैदा किए, क्योंकि वे ब्रह्मचर्य को पहले ही से उपलब्ध हैं। अंधा आदमी ब्रह्मचारी नहीं हो जाता और जिस आदमी ने आंखें फोड़ ली हैं, यह सिर्फ इस बात की खबर दे रहा है कि इसके भीतर बड़ी प्रज्वलित वासना होगी। और यह घबड़ाया हुआ है, डरा हुआ है, भयभीत है। और वासना भीतर है, आंखें फोड़ने से क्या होगा? आंख बिलकुल बंद कर लो, पट्टी बांध लो, तो भी क्या होगा? भीतर सपने उठते रहेंगे। और भीतर वासना और भी विकृत होकर प्रगाढ़ हो जाएगी, क्योंकि उसके निकास का भी कोई उपाय न रह जाएगा।
मैं तुम्हारी वासना के दमन के पक्ष में नहीं हूं। मैं तुम्हारी वासना के रूपांतरण के पक्ष में हूं। मैं चाहता हूं तुम्हारा सहज जीवन, सामान्य जीवन, स्वाभाविक जीवन स्वीकृत हो। कहीं कुछ निषेध न हो। और इसी सहज जीवन में धीरे-धीरे प्रार्थना प्रविष्ट हो, परमात्मा का अनुग्रह प्रविष्ट हो, ध्यान प्रविष्ट हो।
क्या अड़चन है? आंख बंद करके ही ध्यान किया जाता है क्या? एक सुंदर स्त्री को देख कर भी ध्यान हो सकता है। उसे देखते-देखते भी ध्यान हो सकता है। उसे देखते-देखते तुम ध्यानमग्न हो सकते हो। सुंदर स्त्री प्रतिमा का काम कर सकती है। ऐसा ही सुंदर पुरुष प्रतिमा का काम कर सकता है।
मैं जीवन के रूपांतरण का पक्षपाती हूं। लेकिन तुम अब तक दमन करते रहे होओगे। इसलिए तुम्हें यहां अड़चन आ रही है। जो भी दमन करते हुए यहां आ जाते हैं, उनको अड़चन आती है। और फिर उनकी अड़चन का बदला वे मुझसे लेते हैं। फिर वे समझते हैं कि मैं यहां लोगों को बिगाड़ रहा हूं। क्योंकि उनको लगता है, उनको मैंने बिगाड़ दिया। अब जैसे तुम्हारा वेदांत खिसक गया, निर्वाण खिसक गया, तुम गुस्से में जा सकते हो कि यह आदमी किस तरह का! यह आश्रम कैसा? मेरा वेदांत, मेरा निर्वाण सब खिसक गया! तुम गुस्सा मुझ पर निकालोगे। तुम गालियां मुझे दोगे। तुम जाकर लोगों को कहोगे कि वह जगह ठीक नहीं है।
सच्चाई यह है कि तुमने जिंदगी भर गलत किया, उसका तुम्हें साक्षात्कार हो गया। धन्यवाद मानो, आभार मानो। अभी भी समय है। अभी भी रूपांतरण हो सकता है।
लेकिन कोई तुम्हें चौकाने वाला नहीं है। जिनके पास तुम जाते हो, तुम्हारे साधु-संत, वे तुमसे गए-बीते हैं। उन्होंने तुमसे ज्यादा दमन किया है।
मुल्ला नसरुद्दीन अपनी पत्नी के साथ एक बगीचे में बैठा हुआ था। सांझ हो गई, सूरज ढल गया, तारे निकलने लगे। पास की ही एक झाड़ी के पीछे एक युवक और एक युवती बड़ा प्रेमालाप कर रहे हैं। खूब छन रही हैं बातें, गहरी बातें छन रही हैं! दोनों चुपचाप बैठे सुन रहे हैं। आखिर युवक ने कहा कि मैं तुम्हारे बिना न रह सकूंगा, मैं मर जाऊंगा। तुम्हीं मेरा जीवन हो, तुम्हीं मेरे प्राण हो! तुम्हीं मेरा काव्य हो, तुम्हीं मेरी आत्मा हो! तुम मुझे मिलीं तो सब मिल गया और तुम मुझे नहीं मिल सकीं तो सब खो जाएगा। मैं विवाह का निवेदन करता हूं, मुझे अंगीकार करो। मैं ना-कुछ हूं, अपात्र हूं; मगर मेरे प्रेम को देखो, मेरी आत्मा को पहचानो!
मुल्ला की पत्नी ने मुल्ला को हुद्दा मारा और कहा कि जरा खांसो-खखारो, सचेत कर दो। यह लड़का फंसा जा रहा है।
मुल्ला ने कहा: भाड़ में जाए लड़का! मुझे किसने चेताया था? मैं क्यों किसी को चेताऊं? जब मैं यही नालायकी की बातें तुझसे कर रहा था तो किसी हरामजादे ने न खांसा, न खखारा। हम भी क्यों खांसें-खखारें? अरे, अपनी भोगेगा, खुद भोगेगा। भोगने दो। जो जैसी करेगा वैसी भरेगा। जो जैसा बीज बोएगा वैसी फसल काटेगा। अब बो रहा है बेटा फसल, हम भी चुपचाप सुन रहे हैं कि अच्छा, काटोगे फसल।
तुम जिनके पास जाते हो, उनको किसी ने नहीं चौंकाया, वे तुम्हें क्यों चौंकाएं? वे सड़ रहे हैं, वे गल रहे हैं। वे तुम्हें देख कर प्रसन्न हो जाते हैं कि तुम भी सड़ो बेटा, तुम भी गलो बेटा। हे ईश्वरानंद, तुम भी जाओ नरक में, जहां हम पड़े हैं! तुम यहां-वहां क्यों जा रहे हो? वे भी तुमको पाठ सिखाएंगे कि जब भी कभी ऐसे विचार उठें, फौरन दबा दो, वहीं के वहीं दबा दो। शुरू में ही दबा देना चाहिए। जरा सा भी विचार उठे, फौरन राम-राम का जाप करने लगो, माला फेरने लगो। जोर-जोर से मंत्र पढ़ने लगो गायत्री, नमोकार। ऐसी धुन मचा दो भीतर कि जो बात उठ रही थी वह दबी की दबी रह जाए। और एकदम भीतर अच्छी-अच्छी बातें गुंजा दो। एकदम जूझ पड़ो। देर मत करना, क्योंकि जरा भी देर की तो कहीं बुरा विचार हावी न हो जाए। एकदम टूट पड़ो उस पर--वाहे गुरुजी की फतह, वाहे गुरुजी का खालसा! एकदम टूट पड़ो। उसको वहीं धर दबोचो। सत सिरी अकाल! छोड़ना ही मत उसको, क्योंकि जरा भी मौका दिया तो वह पकड़ न ले! और पकड़ ले तो फिर छोड़ेगा नहीं। इसलिए शुरू में ही निपट लेना ठीक है।
तुम जिनके पास जाओगे वे तुम्हें यही समझाएंगे। मैं तुमसे कहूंगा कि नहीं, जो भी विचार भीतर उठ रहे हैं...तुम्हारा वेदांत झूठा था, तुम्हारा निर्वाण झूठा था...जो तुम्हारे भीतर विचार उठ रहे हैं, यही सच्चे हैं। इन्हें उठने दो। इनका निरीक्षण करो। ईश्वरानंद, बैठ कर साक्षीभाव से इनको देखो। निंदा बंद करो। निंदा करोगे तो साक्षी नहीं हो सकोगे। निंदा में कैसे साक्षी बनोगे? जिसकी पहले से ही बुराई कर ली, जिसका पहले से ही हमने निर्णय कर लिया कि गलत है, उसके हम कैसे साक्षी बनेंगे? साक्षी होने के लिए निष्पक्ष होना जरूरी है। निष्पक्ष भाव से देखो कि ये विचार उठ रहे हैं, ठीक है। परमात्मा ने दिए हैं तो जरूर कोई प्रयोजन होगा।
और प्रयोजन है, और महत प्रयोजन है! प्रयोजन यही है कि तुम इन विचारों को देखो, जागो, द्रष्टा बनो। दमन नहीं करना है, द्रष्टा बनना है। और जैसे-जैसे तुम्हारे भीतर साक्षीभाव सघन होगा, तुम चमत्कृत हो जाओगे। इधर साक्षी घना होता है, उधर ये विचार विसर्जित होने लगते हैं--बिना दबाए। और जब बिना दबाए कोई चीज बदलती है तो मजा और, सौंदर्य और, प्रसाद और, सुरभि और, सुगंध और! सिर्फ देखते-देखते तुम धीरे-धीरे पाओगे मन शांत हो गया, सब विचार गए--धन के, काम के, लोभ के, क्रोध के, सब गए। तुम जाग गए। ये नींद में ही चलते हैं। और ये जब चले जाते हैं सब, तब तुम समझोगे इनका प्रयोजन। इनका प्रयोजन यही था कि ये तुम्हें जगा दें। इनके बिना तुम कभी जागते ही नहीं।
यह ऐसा ही समझो कि तुम्हें पांच बजे सुबह उठना है, गाड़ी पकड़नी है, अलार्म भर देते हो। हालांकि तुमने ही अलार्म भरा है, लेकिन पांच बजे जब अलार्म बजता है तो बुरा लगता है, अच्छा नहीं लगता। मैं ऐसे लोगों को जानता हूं, जिन्होंने घड़ियां तोड़ दी हैं और जल्दी से अलार्म बंद करके करवट लेकर फिर सो जाते हैं। फिर आठ बजे पछताएंगे उठ कर कि गाड़ी चूक गए। मगर उस वक्त गुस्सा आ जाता है कि यह दुष्ट अलार्म! अब जैसे अलार्म का कोई कसूर हो! तुम्हीं भर कर सोए। लेकिन तुम्हें गुस्सा आ जाता है।
ये सारे विचार जो तुम्हारे भीतर चल रहे हैं ईश्वरानंद, अलार्म की तरह हैं। इनके कारण ही तुम जागोगे, नहीं तो तुम्हारे जागने का कोई उपाय नहीं है। इनकी पीड़ा ही तुम्हें जगाएगी। इनका दंश ही तुम्हें जगाएगा। इनके कारण ही तुम साक्षी बनोगे, नहीं तो क्यों साक्षी बनते, क्यों द्रष्टा बनते?
समस्या ही न होती तो समाधान की कोई जरूरत न थी, समाधि की कोई जरूरत न थी। ये समस्याएं परमात्मा ने दी हैं, ये चुनौतियां हैं। इनको साहस से स्वीकार करो। भागो मत। भगोड़ापन ठीक नहीं। दबाओ मत, छिपाओ मत। आमने-सामने आने दो। और अगर तुम यहां आ गए हो हिम्मत करके, तो यह स्थल एकमात्र स्थल है जहां कुछ भी दबाने का कोई कारण नहीं है। मैं तुम्हें अंगीकार करता हूं तुम जैसे हो। तुम्हारा सत्कार करता हूं, तुम्हारा स्वागत करता हूं, तुम्हारा सम्मान करता हूं--तुम जैसे हो। बेशर्त। मैं कोई शर्त नहीं लगाता कि तुम ऐसे होओगे तो तुम्हारा सम्मान। तुम जैसे हो वैसे में तुम्हारा सम्मान। तुम भी अपना सम्मान सीखो। परमात्मा ने तुम्हें ऐसा बनाया है तो जरूर कुछ राज होगा। आज पता न होगा तो कल पता चलेगा।
अपने भीतर की इन सारी प्रक्रियाओं को शांत होकर देखते रहो। कभी-कभी भूल जाओगे साक्षीभाव, कभी-कभी डूब जाओगे किसी विचार के साथ, लीन हो जाओगे। कभी-कभी तादात्म्य हो जाएगा। जब स्मरण आ जाए, फिर खड़े होकर देखने लगना। जब खो जाए, खो जाने देना। पछताना मत। अपराध-भाव से मत भरना।
अपराध-भाव दुनिया में बड़ी अधार्मिक बात है, क्योंकि जिस व्यक्ति के भीतर अपराध-भाव हो जाता है, उस व्यक्ति के भीतर आत्म-ग्लानि के कारण आत्म-अपमान शुरू हो जाता है। वह अपने को दीन-हीन समझने लगता है। वह क्या खाक समझेगा--अहं ब्रह्मास्मि! वह कैसे समझेगा वेदांत? वह कैसे समझेगा निर्वाण? वह कैसे समझेगा कि मेरे भीतर बुद्ध विराजमान हैं, कि मेरे भीतर बुद्धत्व की क्षमता है। नहीं, यह असंभव है उसके लिए।
पहला काम है: पुरोहितों ने तुम्हें जो अपराध-भाव दे दिया है, उसे छोड़ दो। कुछ बुरा नहीं है। सब सुंदर है। जैसा है, सर्वांग सुंदर है। इस स्वीकृति को ही मैं आस्तिकता कहता हूं।
मैंने सुना है, एक गांव में एक गधा था, वह बड़ा आस्तिक था। गधे अक्सर आस्तिक होते हैं। उसकी खूबी यह थी कि उसका मालिक उसको लेकर घूमता था। और तुम उससे कुछ भी पूछो--ईश्वर है? वह सिर हिला कर कहता कि हां। आत्मा है? वह सिर हिला कर कहता कि हां। परलोक है?--हां। पुनर्जन्म होता है?--हां। लोग उसको पैसा देते मालिक को कि भई वाह! आदमियों तक को पता नहीं इतना ज्ञान, ऐसा वेदांत--और यह गधे को इतना वेदांत आता है! और उसने उसको कुल इतना सिखा रखा था कि सिर हिलाना। उसको कुछ भी पूछो...वही पूछता था और गधे को पता था कि वह कुछ भी पूछे। वह पूछता ही ऐसी बात था जिसमें हां कहने से आस्तिकता पता चले।
एक भीड़ लगी थी। लोग वेदांत की यह चर्चा सुन रहे थे। गधा गजब कर रहा था, पैसे पर पैसे पड़ रहे थे। लोग कह रहे थे: गधा नहीं है, कोई योग-भ्रष्ट महात्मा है। कोई महायोगी रहा पिछले जन्म में।
नसरुद्दीन भी खड़ा था। नसरुद्दीन ने कहा कि एक काम मैं भी करके देखना चाहता हूं। मैं इसके कान में कुछ कहना चाहता हूं, फिर यह हां भरे तब मैं देखूं!
उसके मालिक ने कहा: अच्छा! क्योंकि मालिक को तो पता ही था, कुछ भी कहो, वह हां भरेगा। उसको क्या पता कि नसरुद्दीन क्या कहेगा। नसरुद्दीन ने उसके कान में कुछ कहा, गधा एकदम इनकार करने लगा कि नहीं, बिलकुल नहीं! सारी भीड़ चौंकी। मालिक भी चौंका। मालिक ने पूछा: भाई बताओ भी तुमने क्या पूछा था?
उसने कहाः मैंने पूछा कि विवाह करोगे?
...नहीं करेंगे!
इतनी अकल गधे में भी है! हालांकि आस्तिक था, फिर भी इतनी अक्ल थी। एक आस्तिकता होती है गधेपन की कि तुम से बस हां कहने की आदत पड़वा ली है। और एक आस्तिकता आती है खोज से, आविष्कार से। एक आस्तिकता सीखी हुई होती है, कि बस सिर हिलाना सिखा दिया। वह तो कोई गधा भी कर सकता है। और एक आस्तिकता होती है आत्म-अनुभव से!
मैं अनुभव पर जोर देता हूं, आस्था पर नहीं। मैं नहीं कहता कि मैं जो कहता हूं उस पर भरोसा करो। मैं कहता हूं : मैं जो कहता हूं उस पर प्रयोग करो। प्रयोग अगर तुम्हें अनुभव करा दे, तो ही मानना। अपने अनुभव को मानना, मेरी बात को नहीं। मेरी बात का क्या मूल्य है? पता नहीं मैं धोखा दे रहा होऊं। पता नहीं मैं झूठ बोल रहा होऊं। पता नहीं मेरे अपने कोई प्रयोजन हों। मुझ पर भरोसा करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं कहूं भी क्यों कि मुझ पर भरोसा करो? क्योंकि मैं तुमसे जो कह रहा हूं वह अनुभव-सिद्ध है, इसलिए मैं तुमसे कहता हूं: अनुभव तुम भी कर सकते हो। और जब मैं कर सका, तो तुम कर सकते हो। मैं तुम जैसा ही व्यक्ति हूं। तुम मुझ जैसे ही व्यक्ति हो।
ईश्वरानंद, जो तकलीफें तुम्हें हैं वही मुझे थीं। जो आनंद मेरा है वही तुम्हारा हो सकता है। जरा भी भेद नहीं है। हम सब समान क्षमताएं लेकर पैदा होते हैं। परमात्मा बहुत प्राचीन समय से साम्यवादी है, सदा से साम्यवादी है। वह सबको समान गुणधर्म देता है। कुछ हैं जो उनका अनुभव कर लेते हैं; कुछ हैं जो उनको छूते ही नहीं, उनको पड़ा रहने देते हैं, वे सड़ जाते हैं पड़े-पड़े, उन पर जंग लग जाती है।
तुम आस्था मत करो। वेदांत आएगा--अनुभव से। निर्वाण भी आएगा--अनुभव से। मगर पहले तो इस दल-दल से गुजरना होगा। कमल खिलेंगे, मगर पहले इस कीचड़ से गुजरना होगा। तुम कीचड़ से बचना चाहो और कमल पाना चाहो, यह नहीं हो सकता। कीचड़ से गुजर कर मूल्य चुकाना पड़ता है तो कमल खिलते हैं। कीचड़ में ही कमल खिलते हैं।
तुम पूछते हो: ‘कोई रास्ता बताएं।’
साक्षी एकमात्र रास्ता है।
मैंने 11/5/80 को संन्यास लिया। मैं इसको आपकी ही कृपा समझता हूं क्योंकि कई साल लग गए। उस दिन ही चरण-स्पर्श का भी शुभ दिन आ गया। मैंने भी चरण छुए और आपने भी मुझे स्पर्श किया। मैं तो भर गया, मैं तो मस्त हो गया। फिर ऊर्जा-दर्शन का कार्यक्रम शुरू हुआ। मैंने भी उसमें भाग लिया। लेकिन इसमें एक क्षण ऐसा आया कि मुझे लगा कि कहीं मैं सम्मोहित तो नहीं हो रहा हूं। फिर मैं अपने आप रुक गया। फिर थोड़ी देर बाद दूसरा क्षण आया जब मुझे लगा, अरे यह तो ऊर्जा-दर्शन है! फिर तो मैं ऐसा डूबा कि डूब ही गया और बाहर मस्त होकर निकला। ओशो, मैंने तो अपनी नैया तेरे हाथ में लगा दी, अब जो चाहो सो करो। फिर ऐसा क्यों हुआ? जो हुआ उसके लिए मुझे बहुत पीड़ा है। माफ करना। मुझे लगता है कि इसके पहले दो-तीन दिन तक कोई ध्यान भी नहीं जमा। कृपा करो!
इसलिए यह भूल कर मत सोचना कि तुमने कोई गलती की। मत कहो यह कि आप मुझे माफ करना। तुमसे कुछ भूल ही नहीं हुई, माफ क्यों करूं? आशीष देता हूं। तुम से जो हुआ ठीक हुआ। विवेक का लक्षण यह है कि हर किसी बात को मान नहीं लेगा।
और ध्यान रखना, प्रशांत, जो बात हम बिना किसी विचार के मान लेते हैं, उसका कोई मूल्य नहीं है। वह निर्वीर्य होती है, नपुंसक होती है। जिस बात को हम संदेह कर-कर के मानते हैं, मानना पड़ता है संदेह करने के बावजूद भी, उस बात में बल होता है। उसमें प्राण होते हैं। उसमें ऊर्जा होती है।
ठीक हुआ। एक क्षण को तुम्हें लगा कि कहीं यह सम्मोहन तो नहीं है! विचारशील व्यक्ति हो, लगना ही चाहिए। और दूसरे ही क्षण तुम्हें खयाल आ गया कि इसमें सम्मोहन का तो कोई सवाल ही नहीं है। कोई किसी को सम्मोहित नहीं कर रहा है। लोग अपनी मस्ती में डोल रहे हैं। अगर तुम्हें पहली बात समझ में न आती, अगर तुम्हारे मन में यह पहला संदेह न उठा होता, तो शायद जो दूसरी घटना घटी मस्ती की वह नहीं घटती, वह चूक जाती।
यह मैं निरंतर अनुभव करता हूं। यहां भारतीय मित्र हैं, गैर-भारतीय मित्र हैं। भारतीय मित्रों की आस्था औपचारिक है। वह तो जन्म के साथ सीख ली है उन्होंने। मेरे पास आते हैं तो चाहे उनकी श्रद्धा हो या न हो, वे झुकेंगे, पैर छुएंगे। पैर छूना ऐसे ही है जैसे कि नमस्कार करना, या जैसे फोन पर लोग कहते हैं--हलो। कोई उसका मतलब नहीं है। कुछ प्रयोजन नहीं है। आदत बन गई है।
मैं छोटा था, मेरे पिता मुझे जहां ले जाते, कोई भी बड़ा बुजुर्ग होता, वे मुझसे कहते: पैर छुओ।
मैं उनसे कहता: आप कहते हैं तो छू लेता हूं। वैसे तबीयत मेरी होती है कि इनको एक लगा दूं। इस आदमी को मैं भलीभांति जानता हूं। आप कह रहे हो तो ठीक है। यह निपट बेईमान है।
वे कहते: चुप रहो! यह बात सबके सामने कहने की नहीं है। घर चल कर कह देना।
तो मैंने कहा कि मुझसे आप मत कहना इस तरह कि पैर छुओ इसके-उसके, हर किसी के पैर छुओ! क्यों छुऊं पैर? मुझे आदमी लगे पैर छूने योग्य तो जरूर छुऊं मगर मैं इसको जानता हूं भलीभांति, इसके पैर मैं नहीं छुऊंगा। आप कहते हो तो छू लूंगा, मगर ध्यान रखना कि सिर्फ आपके कहने के कारण छू रहा हूं। मैं नहीं छू रहा हूं। मेरा इसमें कुछ लेना-देना नहीं।
वे मुझे मंदिर ले जाते कि झुको, नमस्कार करो! मैं कहता: सिर्फ किताब रखी है...क्योंकि जिस परिवार में मैं पैदा हुआ वहां मंदिर में मूर्ति नहीं होती, सिर्फ ग्रंथ होता है। मैं कहता: इस किताब को काहे के लिए नमस्कार करें! कागज ही हैं, थोड़ी स्याही है, थोड़ा कागज है, जिल्द बंधी है, ठीक है। सो अपने घर काफी किताबें हैं, झुकना ही हो तो वहीं झुक लेंगे। इतने दूर मंदिर आने की क्या जरूरत?
मगर वे मुझसे कहते कि बड़े होकर समझोगे। मैंने कहा: थोड़ा-बहुत अभी समझूं, थोड़ा ही सही, तो फिर थोड़ा-थोड़ा करके बड़ा होकर समझूंगा। लेकिन अभी अगर बिलकुल ही नहीं समझूं तो कब शुरू होगी समझ?
वे एक बार मुझे एक जैन मुनि के पास ले गए, वे तो झुके ही; मैं खड़ा रहा। जैन मुनि ने भी मुझे बहुत क्रोध से देखा और मेरे पिताजी ने कहा कि झुको, नमस्कार करो।
मैंने कहा कि मैं झुक लेता, लेकिन इस आदमी ने जिस ढंग से देखा है, अब आप भी कहो, सारी दुनिया कहे, मेरे झुकने की तो बात अलग, अगर यह आदमी मेरे पैर छूए तो मैं नहीं छूने दूंगा। इससे मेरी मुलाकात हो गई! जब आप इसके पैर छू रहे थे, जिस ढंग से इसने मुझे देखा है, इसकी आंखों का ढंग वही जो लुच्चों का होता है!
‘लुच्चा’ शब्द का मतलब समझते हो? लुच्चा शब्द उसी से बनता है, उसी धातु से, जिससे आलोचक बनता है--लोचन से। जो घूर-घूर कर देखे, उसको लुच्चा कहते हैं।
मैंने कहा: आप नाराज नहीं होना। और ये मुनि महाराज से कह दो कि नाराज न हों। लुच्चे का मतलब होता है, जो घूर-घूर कर देखे। इसलिए तो लुच्चा कहते हैं। जब कोई आदमी किसी स्त्री को घूर-घूर कर देखता है तो कहते हैं--यह लुच्चा है! लुच्चे का मतलब--आलोचक। लोचन गढ़ा कर देख रहा है--लुच्चा।
मैंने कहा: यह बिलकुल आदमी लुच्चा है! और चश्मा भी लगाए हुए है--दोहरे लोचन और इस ढंग से इसने देखा है।
फिर वे मुझे कभी किसी जैन मुनि के पास नहीं ले गए। उन्होंने कहा: तुम ले जाने योग्य हो ही नहीं कहीं, क्योंकि मेरी तक फजीहत हो जाती है।
वे जल्दी से मुझे लेकर वहां से भागे कि चलो घर। बस यह आखिरी है, अब तुमको कहीं नहीं ले जाना।
मेरे पास लोगों को लोग ले आते हैं। स्त्रियां आ जाती हैं। उनके बच्चों को पैर छूना नहीं हैं, वे उनकी गर्दन पकड़ कर दबाती हैं। मैं कहता हूं: कर क्या रही हो...कि छुओ-छुओ, पैर छुओ! वह बच्चा अकड़ रहा है और मां उसकी दबा रही है। अब इस तरह दबाते-दबाते एक दिन बेचारा छूने लगेगा, अभ्यास हो जाएगा। इसका कोई मूल्य नहीं है।
भारतीय लोग आते हैं, वे पैर छू लेते हैं; वह औपचारिक है। पश्चिम से लोग आते हैं, वहां पैर छूने की आदत नहीं है, न पैर छूने का कोई रिवाज है। उन्हें पैर छूना बड़ा कठिन पड़ता है, बहुत कठिन पड़ता है, बहुत मुश्किल पड़ता है। लेकिन जब पश्चिम का कोई व्यक्ति पैर छूता है तो उसका भाव देखने योग्य होता है। क्योंकि वह छूता ही तब है जब उसके प्राणों में छूने की बात उठती है; जब उसके प्राण राजी हो जाते हैं; किसी औपचारिकता से नहीं। एक अंतर्तम अभीप्सा से। एक आनंद से। एक अहोभाव से।
प्रशांत, सोच-विचारशील युवक हो तुम। यह स्वाभाविक था कि तुम्हारे मन में एक क्षण को लगा कि कहीं मैं सम्मोहित तो नहीं हो रहा हूं। न तो इसमें तुम्हें अपराध-भाव अनुभव करने की जरूरत है।
मेरे पास अपराध-भाव कभी अनुभव करना ही नहीं, किसी कारण मत करना। संदेह उठे, कोई चिंता नहीं। मैं संदेह कर-कर के सत्य को पाया हूं। इसलिए मैं तुम्हारे संदेह को कभी बुरा नहीं कह सकता। मैंने विश्वास करके सत्य को नहीं पाया है। मैंने आस्था करके सत्य को नहीं पाया है। मैंने सब भांति संदेह करके, आत्यंतिक रूप से संदेह करके सत्य को पाया है। इसलिए तुम्हारे सब संदेह मुझे स्वीकार हैं, अंगीकार हैं।
माफी मत मांगना। अच्छा हुआ। और फिर उसके बाद तुम्हें खुद ही बोध आया, इसलिए एक मस्ती छा गई। तुम अगर भारतीय ढंग से डोलते रहते...भारतीय नकलपट्टी सीख गए हैं। अगर चार आदमी डोल रहे हैं तो वे भी डोलने लगते हैं। मैं देखता हूं रोज एक भारतीय एक काम करेगा तो दूसरा भी वही करता है। एक भारतीय अगर आएगा और दस रुपये का नोट निकाल कर पैर पर चढ़ा देगा तो दूसरा जो उसके पीछे आ रहा है दर्शन करने, वह भी जल्दी से रुपये निकालने लगेगा। क्योंकि शायद यह नियम है, किया जाना चाहिए। जो किया जाना चाहिए वह करना ही होगा।
तुम्हारे तथाकथित साधु-महात्मा यह इंतजाम कर रखते हैं, दो-चार एजेंट छोड़ रखते हैं। वह निकाल कर सौ रुपये का नोट चढ़ा दिया। दो-चार एजेंट भीड़-भाड़ में नोट चढ़ाते रहते हैं और बाकी लोग उनकी नकल करते रहते हैं। क्योंकि जब इतने नोट चढ़ाए जा रहे हैं तो चढ़ाना ही चाहिए; नहीं तो आस्था में शक होगा, आस्तिकता में शक होगा।
मेरे पास आस्तिक होने में और नास्तिक होने में विरोध नहीं है। इस बात को गांठ बांध लो। नास्तिक होना आस्तिक होने की सीढ़ी है। आस्तिक के मंदिर की सीढ़ियों का नाम नास्तिकता है। जो नास्तिकता की सीढ़ियों से आस्तिकता के मंदिर तक पहुंचता है, उसकी आस्तिकता की प्रखरता और, उसकी आस्तिकता की ज्योतिर्मयता और। उसकी आस्तिकता में एक चैतन्य होता है, एक चिन्मयता होती है।
अच्छा हुआ प्रशांत योगी, न तो क्षमा मांगो, न कहीं मन में यह भाव लेना कि यह क्या हुआ। मैंने सब समर्पण कर दिया था, फिर यह संदेह क्यों उठा?
तुम कितना ही समर्पण करो, संदेह जाते-जाते ही जाएगा। तुम समर्पण ही क्यों करते हो? इसलिए करते हो न कि संदेह चला जाए। संदेह है, इसलिए तो समर्पण की जरूरत है। तुम्हारे समर्पण करने से ही नहीं चला जाएगा। समर्पण तो सिर्फ तुम्हारी तरफ से सूचना है कि मैं अब संदेह छोड़ने की तैयारी कर रहा हूं। मगर छूटते-छूटते छूटेगा, बात बनते-बनते बनेगी। मगर ठीक राह पर चल पड़े हो। इस मस्ती को बढ़ाओ।
अपराध-भाव को मत लेना, नहीं तो मस्ती खंडित हो जाएगी।
आनंद मेरा सूत्र है, अपराध नहीं। ऐसे ही चलते रहे तो एक दिन मिट जाओगे, समर्पण पूरा हो जाएगा। शुरू में तो सिर्फ समर्पण का भाव होता है, फिर धीरे-धीरे पूर्णता आती है। धीरे-धीरे अहंकार जाएगा, मन जाएगा।
प्रशांत योगी, गोरख के प्रसिद्ध शब्द हैं, याद रखना--
मरौ हे जोगी मरौ, मरौ मरण है मीठा।
तिस मरणी मरौ, जिस मरणी मर गोरख दीठा।।
मरो--गोरख कहते हैं! किस मरण की बात कर रहे हैं? अहंकार मरे। संदेह मरे। मगर पहले जीएगा, तो ही तो मरेगा न। जीआ ही न हो कभी, तो मरेगा क्या खाक!
पहले संदेह सीखना पड़ता है। पहले संदेह को धार रखनी पड़ती है। जैसे तलवार पर कोई धार रखे। पहले अहंकार को बलिष्ठ करना होता है। पुष्ट करना होता है। और तभी एक दिन समझ में आती है यह बात कि अब घड़ी आ गई कि इसे छोड़ दूं; अब घड़ी आ गई कि यह बोझ हो गया, अब घड़ी आ गई कि यह तो मेरे प्राणों को ही धार काटने लगी, यह तलवार मुझे ही काटने लगी। उस घड़ी में सब गिर जाता है। तुम्हें छोड़ना भी नहीं पड़ता, छूट जाता है।
मन की मृत्यु ध्यान है। मन की मृत्यु संन्यास है।
आज तो तुमने जो संन्यास लिया है प्रशांत योगी, वह तो केवल संकल्प है यात्रा का। अभी तो नाव छोड़ी इस किनारे से। अभी तो मझधार तय करनी होगी। दूर है किनारा, जो अभी दिखाई भी नहीं पड़ता। अभी तुम उस किनारे पर नहीं पहुंच गए। अभी तो इस किनारे से ही लगे हो। अभी रस्सियां खोल रहे हो, एक-एक करके खोलनी पड़ेंगी। फिर पतवार उठानी पड़ेगी। फिर तूफानों और झंझावातों का सामना करना पड़ेगा। मगर जिसने हिम्मत की, उसने जरूर पाया है।
इस जगत में अन्याय नहीं है। परमात्मा, जो जितना श्रम करता है, उसको उसकी पात्रता के अनुसार निश्चित ही देता है। जीसस ने कहा है: मांगो और मिलेगा! द्वार खटखटाओ और द्वार खुलेंगे!
मैं नौ साल से प्रेमिका ढ़ूंढ रहा हूं कि कोई ऐसी प्रेमिका मिले, जो संसार और ध्यान एक बना दे। नहीं मिली। आशीर्वाद दें कि मैं सही प्रेमिका मिलने तक रुकूं और जबर्दस्ती न करूं!
एक पागलखाने में एक मनोवैज्ञानिक पागलों को देखने गया था। पागलखाने के प्रधान ने एक कटघरे के सामने खड़े होकर उसे बताया कि इस पागल को देख रहे हैं! वह पागल अंदर एक तस्वीर लिए हुए था, छाती से लगा रहा था। आंसू झर-झर गिर रहे थे। वर्षा की झड़ी लगी थी। रो रहा था, पुकार रहा था, कि हे प्रिय, तुम कहां हो? कब मिलोगी? बहुत देर हो गई? कब तक पुकारूं, कब तक खोजूं?
पागलखाने के प्रधान ने बताया कि यह आदमी न खाता न पीता, सूख कर हड्डी हो गया है; बस यह फोटो लिए है। मनोवैज्ञानिक ने पूछा: यह फोटो किसकी है?
उसने कहा: यह इसकी प्रेमिका की फोटो है और वह इसे मिली नहीं। उसी दुख में यह पागल हो गया। फिर दूसरे कटघरे के सामने रुके। वहां एक आदमी अपने बाल लोंच रहा था और दीवाल से सिर मार रहा था। उसने पूछा: इसे क्या हो गया?
प्रधान ने कहा कि यह वही जो प्रेमिका उसको नहीं मिली, इसको मिल गई। वही स्त्री! इसका विवाह हो गया उससे। तब से यह पागल हो गया है। इसकी हालत और बदतर है।
तुम कह रहे हो: ‘मैं नौ साल से प्रेमिका ढूंढ रहा हूं। कोई ऐसी प्रेमिका मिले जो संसार और ध्यान एक बना दे!’
ऐसा कभी हुआ है पहले? या ऐसा कभी होगा? असंभव को संभव करने चले हो? ऐसा होता ही नहीं?
एक व्यक्ति खोज रहा था कि परिपूर्ण कोई स्त्री मिले, पूर्ण स्त्री कोई मिले। जीवन भर खोजा। जब मर रहा था तो किसी ने पूछा कि मिली वह स्त्री कि नहीं जिसकी तुमने जिंदगी भर खोज की? उसने कहा: मिली क्यों नहीं, दो-तीन बार ऐसे मौके आए।
तो उस व्यक्ति ने पूछा: फिर तुम अविवाहित के अविवाहित क्यों रहे?
उसने कहा कि मैं क्या करूं, वह पूर्ण पुरुष खोज रही थी!
तुम तो खोज रहे हो ऐसी प्रेमिका, लेकिन वह भी प्रेमी खोज रही होगी पूर्ण। वह तुमसे राजी होगी? असंभव! तुम पूर्ण ही होओ तो प्रेमिका क्यों खोजो! और वही पूर्ण हो तो तुमको किसलिए खोजे? पूर्ण का अर्थ ही यह होता है कि अब कोई खोज न रही, अब कुछ पाने को न रहा।
सौभाग्यशाली हो कि नहीं मिली। नहीं तो अक्सर मिल जाती है।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने शिकार के अनुभव बता रहा था खूब बढ़ा-चढ़ा कर। बातों ही बातों में उसने यह भी कहा कि मैं अलग-अलग जानवरों को बुलाने के लिए विभिन्न प्रकार की आवाजें निकालना जानता हूं। इससे शिकार करना आसान हो जाता है। जैसे हिरण को बुलाना हो तो एक विशेष प्रकार की आवाज करने से, आस-पास जो भी हिरण हो वह भागा चला आता है।
एक मित्र ने पूछा: अच्छा यदि किसी शेरनी को बुलाना हो तो कैसी आवाज करोगे?
मुल्ला ने झट चिंघाड़ते हुए एक खास किस्म की आवाज निकाली, फौरन बैठकखाने का दरवाजा खुला और मुल्ला की बीवी गुलजान ने बाहर आकर कहा: कहिए, क्या बात है? आज आप बहुत शोरगुल कर रहे हैं, बर्दाश्त के बाहर हुई जा रही है बात! अब यदि जरा सा भी हल्ला-गुल्ला किया तो कहे देती हूं, कच्चा निगल जाऊंगी!
तुम कह रहे हो प्रेम चैतन्य कि नौ साल से खोज रहा हूं। काफी तपश्चर्या कर ली। नौ साल में तो नौ ही लोक पार कर जाते। नौ साल में तो नौ ही चक्र खुल जाते। नौ साल में तो सहस्रदल-कमल खुल जाता। और तुम प्रेमिका की तलाश कर रहे हो! और ऐसी प्रेमिका, जो संसार और ध्यान एक बना दे! मटियामेट कर देगी।
बड़ी कृपा है भगवान की तुम पर कि तुम तो खोज रहे हो, मगर नहीं मिल रही। पिछले जन्मों का पुण्य-कर्म होगा।
अब तुम कह रहे हो: ‘आशीर्वाद दें कि मैं ऐसी प्रेमिका पा सकूं और जब तक ऐसी प्रेमिका न मिले तब तक जबर्दस्ती न करूं!’
तुम क्या जबर्दस्ती खाक करोगे! कोई प्रेमिका न जबर्दस्ती कर बैठे, वही डर है। अक्सर लोग सोचते हैं कि वे जबर्दस्ती कर रहे हैं; वे गलती में होते हैं। वे भ्रांति में होते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन और उसकी पत्नी सुबह ही सुबह नाश्ते पर बात कर रहे थे, झगड़ा हो गया बातचीत में। पति-पत्नी में और होता है क्या है सिवाय झगड़े के! मुल्ला की पत्नी ने कहा: एक बात खयाल रखो हमेशा, तुम ही मेरे पीछे पड़े थे, मैं तुम्हारे पीछे नहीं पड़ी थी।
नसरुद्दीन ने कहा: वह बात सच है, क्योंकि चूहादानी किसी चूहे के पीछे नहीं दौड़ती। चूहा खुद ही मूरख फंस जाता है।
तुम क्या जबर्दस्ती करोगे? तुम्हें जबर्दस्ती करने की जरूरत नहीं आएगी। वह तो किसी स्त्री की नजर तुम पर पड़ गई...तुम कैसे बच रहे हो नौ साल से, यह भी हैरानी की बात है। कुछ गुण होंगे तुममें। कुछ सदगुण होंगे कि स्त्रियां तुमसे बच कर निकल जाती हैं। नहीं तो तुम कभी के किसी के चक्कर में आ जाते, कोई न कोई तुम्हारी गर्दन पकड़ लेती। अब इतने दिन बच गए हो, धन्यवाद दो परमात्मा को!
और अब ध्यान की ही फिकर करो, अब क्या प्रेमिका की फिकर कर रहे हो! इतने दिन में तो क्या से क्या नहीं हो जाता! क्या छोटी-मोटी बातें खोजनीं! और ध्यान के बाद अगर प्रेमिका मिल भी जाए तो खतरा नहीं है। ध्यान के पहले प्रेमिका मिल जाए तो बहुत खतरा है, क्योंकि ध्यान के पहले प्रेमिका मिल जाए तो फिर ध्यान न लगने देगी, खयाल रखना। तुम ध्यान करने बैठोगे तो वह हिलाएगी। अखबार नहीं पढ़ने देती, ध्यान क्या करने देगी! ऐसी चीजों में पड़ने ही नहीं देती।
लोग घर से भागे रहते हैं, यहां-वहां भटकते फिरते हैं। देर-देर तक दफ्तर में बैठे रहते हैं। नहीं काम होता तो भी फाइलें उलटते रहते हैं। न मालूम क्या-क्या बहाने खोजते रहते हैं। किसी तरह घर से बच जाएं!
तुम्हें ध्यान न करने देगी प्रेमिका। प्रेमिका तो किसी भी चीज से स्पर्धा ले लेती है। तुम अगर वीणा बजाओगे, वीणा तोड़ देगी। क्योंकि उससे प्रतियोगिता हो जाती है उसकी कि मेरे रहते और तुम्हारी यह कुव्वत कि तुम वीणा बजा रहे हो! मेरे रहते और तुम विपस्सना में बैठे हुए हो आंख बंद किए! मेरे रहते और तुम अखबार पढ़ रहे हो! मैं अभी जिंदा हूं, मर नहीं गई! ध्यान मेरी तरफ दो, और कहीं ध्यान न ले जाना।
तुम प्रेम चैतन्य, पहले ध्यान कर लो, फिर अगर कोई प्रेमिका मिल जाएगी तो ठीक होगा। पर ध्यान पहले सम्हाल लो, फिर प्रेमिका कुछ बिगाड़ न सकेगी। और ध्यान के बाद प्रेमिका मिलेगी भी तो ध्यानी को मिलेगी। और जो प्रेमिका किसी ध्यानी को पसंद करेगी, उससे शायद तालमेल भी बैठ जाए।
मेरे हिसाब में तो प्रत्येक व्यक्ति को पहला काम ध्यान, फिर शेष अन्य बातें। जिसका ध्यान सध गया उसके जीवन में शेष सब अपने आप सध जाता है।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What is the reason for the enduring legacy of Maryada Purushottam Ram despite his lack of rebellion?
According to Osho, Ram endures precisely because his life exemplifies total obedience, a quality cherished by vested interests - state, priesthood, merchants, and family power. With no spark of revolt, he is safe, pliable, and easily idealized; his story requires no pruning or defense. Unlike Krishna, Buddha, or Jesus, whose rebellious fire resists whitewashing, Ram's compliant model is promoted endlessly, securing a lasting, institution-approved legacy.
In simple terms: He stayed famous because powerful people like obedient heroes, and Ram’s always-say-yes life was easy to promote and control.
What happens when my mind is preoccupied with thoughts of desire during meditation?
According to Osho, when desire fills your mind in meditation, it simply exposes your real inner state—the ‘snakes and scorpions’ you usually hide behind spiritual talk. In a living, provocative setting, the eyes pop open and the mind chases objects; this is not failure but the moment practice begins: drop pretenses, face the fact, and watch the turmoil consciously instead of repressing it.
In simple terms: If desires show up while you meditate, it’s just your inside showing—notice it honestly instead of pretending it’s not there.
What is the significance of Ram in spiritual teachings?
According to Osho, ‘Ram’ as the bow-bearing hero or temple idol has no inherent spiritual power; it’s a concept imposed by the mind. The true significance is to drop all beliefs and images—Ram included—and dissolve the mind’s grasping. As an iconoclast, he strips concepts so awareness flowers; clinging to idols breeds superstition, while letting go reveals the living presence beyond names and forms.
In simple terms: Ram isn’t a magic statue or story hero to cling to; let go of ideas so you can feel what’s real inside.
