Questions in this Discourse
उस सभा में मैंने देखा कि लोग यह बात सुन कर बहुत खुश हुए। मुझे बड़ी हैरानी हुई! मुझे हैरानी यह हुई कि वे जो लोग खुश हो रहे थे, उनमें से कोई भी अपने घर को जलाने को कभी भी तैयार नहीं था। लेकिन उन्हें प्रसन्न देख कर मैंने समझा कि बेचारा कबीर आज होता तो कितना खुश न होता! जब तीन सौ साल पहले वह था और किसी बाजार में उसने चिल्ला कर कहा होगा, तो एक भी आदमी खुश नहीं हुआ होगा। आदमी की जात बड़ी अदभुत है। जो मर जाते हैं, उनकी बातें सुन कर लोग खुश होते हैं। और जो जिंदा होते हैं, उन्हें मार डालने की धमकी देते हैं।
मैंने सोचा, आज कबीर होते इस बंबई के बड़े बाजार में, तो कितने खुश होते कि लोग कितने प्रसन्न हो रहे हैं! कबीर जी क्या कहते हैं, इसको सुन कर लोग प्रसन्न हो रहे हैं। कबीर जी को सुन कर वे कभी भी प्रसन्न नहीं हुए थे।
लेकिन लोगों को प्रसन्न देख कर मुझे ऐसा लगा कि जो लोग अपने घर को जलाने के लिए भी हिम्मत रखते हैं और खुश होते हैं, उनसे आज कुछ दिल की बातें कही जाएं। तो मैं भी उसी धोखे में आ गया, जिसमें कबीर और क्राइस्ट और सारे लोग हमेशा आते रहे हैं। तो मैंने लोगों से सत्य की कुछ बात कहनी चाही। और सत्य के संबंध में कोई बात कहनी हो तो उन असत्यों को सबसे पहले तोड़ देना जरूरी है जो आदमी ने सत्य समझ रखे हैं। जिन्हें हम सत्य समझते हैं और जो सत्य नहीं हैं, जब तक उन्हें न तोड़ दिया जाए, तब तक सत्य क्या है, उसे जानने की तरफ कोई कदम नहीं उठाया जा सकता है।
मुझे कहा गया था उस सभा में कि मैं प्रेम के संबंध में कुछ कहूं। और मुझे लगा कि प्रेम के संबंध में तब तक बात समझ में नहीं आ सकती, जब तक कि हम काम और सेक्स के संबंध में कुछ गलत धारणाएं लिए हुए बैठे हैं। अगर गलत धारणाएं हैं सेक्स के संबंध में, तो प्रेम के संबंध में हम जो भी बातचीत करेंगे, वह अधूरी होगी, वह झूठी होगी, वह सत्य नहीं हो सकती।
इसलिए उस सभा में मैंने काम और सेक्स के संबंध में कुछ कहा। और यह कहा कि काम की ऊर्जा ही रूपांतरित होकर प्रेम की अभिव्यक्ति बनती है।
एक आदमी खाद खरीद लाता है, गंदी और बदबू से भरी हुई। और अगर अपने घर के पास ढेर लगा ले तो सड़क पर से निकलना मुश्किल हो जाएगा, इतनी दुर्गंध वहां फैलेगी। लेकिन एक दूसरा आदमी उसी खाद को बगीचे में डालता है और फूलों के बीज डालता है। फिर वे बीज बड़े होते हैं, पौधे बनते हैं, और फूल आते हैं। और फूलों की सुगंध पास-पड़ोस के घरों में निमंत्रण बन कर पहुंच जाती है। राह से निकलते हुए लोगों को भी वह सुगंध छूती है, वह पौधों का लहराता हुआ संगीत अनुभव होता है। लेकिन शायद ही कभी आपने सोचा हो कि फूलों से जो सुगंध बन कर प्रकट हो रहा है, वह वही दुर्गंध है जो खाद से प्रकट होती थी। खाद की दुर्गंध बीजों से गुजर कर फूलों की सुगंध बन जाती है।
दुर्गंध सुगंध बन सकती है। काम प्रेम बन सकता है।
लेकिन जो काम के विरोध में हो जाएगा, वह उसे प्रेम कैसे बनाएगा? जो काम का शत्रु हो जाएगा, वह उसे कैसे रूपांतरित करेगा? इसलिए काम को, सेक्स को समझना जरूरी है--यह मैंने वहां कहा--और उसे रूपांतरित करना जरूरी है।
मैंने सोचा था, जो लोग सिर हिलाते थे घर जल जाने पर, वे लोग मेरी बातें सुन कर बड़े खुश होंगे। लेकिन मुझसे गलती हो गई। जब मैं मंच से उतरा, तो उस मंच पर जितने नेता थे, जितने संयोजक थे, वे सब भाग चुके थे। वे मुझे उतरते वक्त मंच पर कोई भी नहीं मिले। वे शायद अपने घर चले गए होंगे, कहीं घर में आग न लग जाए, उसे बुझाने का इंतजाम करने भाग गए थे। मुझे धन्यवाद देने को भी संयोजक वहां नहीं थे। जितनी भी सफेद टोपियां थीं, जितने भी खादी वाले लोग थे, वे मंच पर कोई भी नहीं थे, वे जा चुके थे। नेता बड़ा कमजोर होता है, वह अनुयायियों के पहले भाग जाता है।
लेकिन कुछ हिम्मतवर लोग जरूर ऊपर आए। कुछ बच्चे आए, कुछ बच्चियां आईं; कुछ बूढ़े, कुछ जवान। और उन्होंने मुझसे कहा कि आपने वह बात हमें कही है, जो हमें किसी ने भी कभी नहीं कही। और हमारी आंखें खोल दी हैं। हमें बहुत ही प्रकाश अनुभव हुआ है।
तो फिर मैंने सोचा कि उचित होगा कि इस बात को और ठीक से पूरी तरह कहा जाए, इसलिए यह विषय मैंने आज यहां चुना। इन चार दिनों में वह कहानी जो वहां अधूरी रह गई थी, उसे पूरा करने का कारण यह था कि लोगों ने मुझे कहा। और वह उन लोगों ने कहा जिनकी जीवन को समझने की हार्दिक चेष्टा है। और उन्होंने चाहा कि मैं पूरी बात कहूं। एक तो कारण यह था।
और दूसरा कारण यह था कि वे जो लोग भाग गए थे मंच से, उन्होंने जगह-जगह जाकर कहना शुरू कर दिया कि मैंने तो ऐसी बातें कही हैं जिनसे धर्म का विनाश हो जाएगा! मैंने तो ऐसी बातें कही हैं जिनसे कि लोग अधार्मिक हो जाएंगे!
तो मुझे लगा कि उनका भी कहना पूरा स्पष्ट हो सके, उनको भी पता चल सके कि लोग सेक्स के संबंध में समझ कर अधार्मिक होने वाले नहीं हैं। नहीं समझा है उन्होंने आज तक, इसलिए अधार्मिक हो गए हैं। अज्ञान अधार्मिक बना सकता है; ज्ञान कभी भी अधार्मिक नहीं बना सकता। और अगर ज्ञान अधार्मिक बनाता हो, तो मैं कहता हूं कि ऐसा ज्ञान उचित है जो अधार्मिक बना दे, उस अज्ञान की बजाय जो कि धार्मिक बनाता हो। क्योंकि जो अज्ञान धार्मिक बनाता हो, तो वह धर्म भी दो कौड़ी का है जो अज्ञान की बुनियाद पर खड़ा होता हो। धर्म तो वही सत्य है जो ज्ञान के आधार पर खड़ा होता है।
और मुझे नहीं दिखाई पड़ता कि ज्ञान मनुष्य को कभी भी कोई हानि पहुंचा सकता है। हानि हमेशा अंधकार से पहुंचती है और अज्ञान से।
इसलिए अगर मनुष्य-जाति भ्रष्ट हो गई, यौन के संबंध में विकृत और विक्षिप्त हो गई, सेक्स के संबंध में पागल हो गई, तो उसका जिम्मा उन लोगों पर नहीं है जिन्होंने सेक्स के संबंध में ज्ञान की खोज की है। उसका जिम्मा उन नैतिक, धार्मिक और थोथे साधु-संतों पर है जिन्होंने मनुष्य को हजारों वर्षों से अज्ञान में रखने की चेष्टा की है। यह मनुष्य-जाति कभी की सेक्स से मुक्त हो गई होती। लेकिन नहीं यह हो सका। नहीं हो सका उनकी वजह से जो अंधकार कायम रखने की चेष्टा कर रहे हैं।
तो मैंने समझा कि अगर थोड़ी सी किरण से इतनी बेचैनी हुई है तो फिर पूरे प्रकाश की चर्चा कर लेनी उचित है। ताकि साफ हो सके कि ज्ञान मनुष्य को धार्मिक बनाता है या अधार्मिक बनाता है। यह कारण था इसलिए यह विषय चुना। और अगर यह कारण न होता तो शायद मुझे अचानक खयाल न आता इसे चुनने का। शायद इस पर मैं कोई बात न करता। इस लिहाज से वे लोग धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने अवसर पैदा कर दिया और यह विषय मुझे चुनना पड़ा। और अगर आपको धन्यवाद देना हो तो मुझे मत देना। वह भारतीय विद्याभवन में जिन्होंने सभा आयोजित की थी, उनको धन्यवाद देना। उन्होंने ही यह विषय चुनवा दिया है। मेरा इसमें कोई हाथ नहीं है।
इसे थोड़ा समझ लेना उपयोगी होगा।
अगर मेरी बात आपने ध्यान से सुनी है, तो मैंने कहा कि सेक्स के अनुभव की बड़ी गहराइयां हैं जिन तक आदमी पहुंच भी नहीं पाता है। तीन तल हैं सेक्स के अनुभव के, वह मैं आपसे कहूं।
एक तल तो शरीर का तल है--बिलकुल फिजियोलाजिकल। एक आदमी वेश्या के पास जाता है। उसे जो सेक्स का अनुभव होता है, वह शरीर से गहरा नहीं हो सकता। वेश्या शरीर बेच सकती है, मन नहीं बेचा जा सकता। और आत्मा के बेचने का तो कोई उपाय नहीं है। शरीर मिल सकता है। एक आदमी बलात्कार करता है, तो बलात्कार में किसी का मन भी नहीं मिल सकता और किसी की आत्मा भी नहीं। शरीर पर बलात्कार किया जा सकता है, आत्मा पर बलात्कार करने का न कोई उपाय खोजा जा सका है, न खोजा जा सकता है। तो बलात्कार में भी जो अनुभव होगा, वह शरीर का होगा।
सेक्स का प्राथमिक अनुभव शरीर से ज्यादा गहरा नहीं होता। लेकिन शरीर के अनुभव पर ही जो रुक जाते हैं, वे सेक्स के पूरे अनुभव को उपलब्ध नहीं होते। उन्हें, मैंने जो गहराइयों की बातें कही हैं, उसका उन्हें कोई भी पता नहीं चल सकता। और अधिक लोग शरीर के तल पर ही रुक गए हैं।
इस संबंध में यह भी जान लेना जरूरी है कि जिन देशों में भी प्रेम के बिना विवाह होता है, उस देश में सेक्स शरीर के तल पर ही रुक जाता है, उससे गहरा नहीं जा सकता। विवाह दो शरीरों का हो सकता है, विवाह दो आत्माओं का नहीं। दो आत्माओं का प्रेम हो सकता है। तो अगर प्रेम से विवाह निकलता हो, तब तो विवाह एक गहरा अर्थ ले लेता है। और अगर विवाह दो पंडितों के और दो ज्योतिषियों के हिसाब-किताब से निकलता हो, और जाति के विचार से निकलता हो, और धन के विचार से निकलता हो, तो वैसा विवाह कभी भी शरीर से ज्यादा गहरा नहीं जा सकता।
लेकिन ऐसे विवाह का एक फायदा है। शरीर मन की बजाय ज्यादा स्थिर चीज है। इसलिए शरीर जिन समाजों में विवाह का आधार है, उन समाजों में विवाह सुस्थिर होगा, जीवन भर चल जाएगा। शरीर अस्थिर चीज नहीं है। शरीर बहुत स्थिर चीज है। उसमें परिवर्तन बहुत धीरे-धीरे आता है और पता भी नहीं चलता। शरीर जड़ता का तल है। इसलिए जिन समाजों ने यह समझा कि विवाह को स्थिर बनाना जरूरी है--एक ही विवाह पर्याप्त हो, बदलाहट की जरूरत न पड़े, उनको प्रेम अलग कर देना पड़ा। क्योंकि प्रेम होता है मन से और मन चंचल है।
जो समाज प्रेम के आधार पर विवाह को निर्मित करेंगे, उन समाजों में तलाक अनिवार्य होगा। उन समाजों में विवाह परिवर्तित होगा; विवाह स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकती। क्योंकि प्रेम तरल है।
मन चंचल है। शरीर स्थिर और जड़ है।
आपके घर में एक पत्थर पड़ा हुआ है। सुबह पत्थर पड़ा था, सांझ भी पत्थर वहीं पड़ा रहेगा। सुबह एक फूल खिला था, सांझ तक मुर्झा जाएगा और गिर जाएगा। फूल जिंदा है, जन्मेगा, जीएगा, मरेगा। पत्थर मुर्दा है, वैसे का वैसा सुबह था, वैसा ही शाम पड़ा रहेगा। पत्थर बहुत स्थिर है।
विवाह पत्थर की तरह है। शरीर के तल पर जो विवाह है, वह स्थिरता लाता है, समाज के हित में है। लेकिन एक-एक व्यक्ति के अहित में है। क्योंकि वह स्थिरता शरीर के तल पर लाई गई है और प्रेम से बचा गया है। इसलिए शरीर के तल से ज्यादा पति और पत्नी का संभोग और सेक्स नहीं पहुंच पाता गहरे में। एक यांत्रिक, एक मैकेनिकल रूटीन हो जाती है। एक यंत्र की भांति जीवन हो जाता है सेक्स का। उस अनुभव को रिपीट करते रहते हैं और जड़ होते चले जाते हैं। लेकिन उससे ज्यादा गहराई कभी भी नहीं मिलती।
जहां प्रेम के बिना विवाह होता है उस विवाह में और वेश्या के पास जाने में बुनियादी भेद नहीं है, थोड़ा सा भेद है। बुनियादी नहीं है वह। वेश्या को आप एक दिन के लिए खरीदते हैं और पत्नी को आप पूरे जीवन के लिए खरीदते हैं। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। जहां प्रेम नहीं है, वहां खरीदना ही है, चाहे एक दिन के लिए खरीदो, चाहे पूरी जिंदगी के लिए खरीदो। हालांकि साथ रहने से रोज-रोज एक तरह का संबंध पैदा हो जाता है एसोसिएशन से। लोग उसी को प्रेम समझ लेते हैं। वह प्रेम नहीं है। प्रेम और ही बात है। शरीर के तल पर विवाह है इसलिए शरीर के तल से गहरा संबंध कभी भी नहीं उत्पन्न हो पाता। यह एक तल है।
दूसरा तल है सेक्स का--मन का तल, साइकोलाजिकल। वात्स्यायन से लेकर पंडित कोक तक जिन लोगों ने भी इस तरह के शास्त्र लिखे हैं सेक्स के बाबत, वे शरीर के तल से गहरे नहीं जाते। दूसरा तल है मानसिक। जो लोग प्रेम करते हैं और फिर विवाह में बंधते हैं, उनका सेक्स शरीर के तल से थोड़ा गहरा जाता है। वह मन तक जाता है। उसकी गहराई साइकोलाजिकल है। लेकिन वह भी रोज-रोज पुनरुक्त होने से थोड़े दिनों में शरीर के तल पर आ जाता है और यांत्रिक हो जाता है।
पश्चिम ने जो व्यवस्था विकसित की है दो सौ वर्षों में प्रेम-विवाह की, वह मानसिक तल तक सेक्स को ले जाती है। और इसीलिए पश्चिम में समाज अस्तव्यस्त हो गया है; क्योंकि मन का कोई भरोसा नहीं है। वह आज कहता है कुछ, कल कुछ कहने लगता है। सुबह कुछ कहता है, सांझ कुछ कहने लगता है। घड़ी भर पहले कुछ कहता है, घड़ी भर बाद कुछ कहने लगता है।
शायद आपने सुना होगा कि बायरन ने जब शादी की, तो कहते हैं कि तब तक वह कोई साठ-सत्तर स्त्रियों से संबंधित रह चुका था। एक स्त्री ने उसे मजबूर ही कर दिया विवाह के लिए। तो उसने विवाह किया। और जब वह चर्च से उतर रहा था विवाह करके अपनी पत्नी का हाथ हाथ में लेकर--घंटियां बज रही हैं चर्च की; मोमबत्तियां अभी जो जलाई गई हैं, जल रही हैं; अभी जो मित्र स्वागत करने आए थे, वे विदा हो रहे हैं; और वह अपनी पत्नी का हाथ पकड़ कर सामने खड़ी घोड़ागाड़ी में बैठने के लिए चर्च की सीढ़ियां उतर रहा है--तभी उसे चर्च के सामने ही एक और स्त्री जाती हुई दिखाई पड़ी। एक क्षण को वह भूल गया अपनी पत्नी को, उसके हाथ को, अपने विवाह को। सारा प्राण उस स्त्री का पीछा करने लगा।
जाकर वह गाड़ी में बैठा। बहुत ईमानदार आदमी रहा होगा। उसने अपनी पत्नी से कहा कि तूने कुछ ध्यान दिया? एक अजीब घटना घट गई। कल तक तुझसे मेरा विवाह नहीं हुआ था तो मैं विचार करता था कि तू मुझे मिल पाएगी या नहीं? तेरे सिवाय मुझे कोई भी नहीं दिखाई पड़ता था। और आज जब कि विवाह हो गया है, मैं तेरा हाथ पकड़ कर नीचे उतर रहा हूं, मुझे एक स्त्री दिखाई पड़ी गाड़ी के उस तरफ जाती हुई--और तू मुझे भूल गई और मेरा मन उस स्त्री का पीछा करने लगा। और एक क्षण को मुझे लगा कि काश, यह स्त्री मुझे मिल जाए!
मन इतना चंचल है। तो जिन लोगों को समाज को व्यवस्थित रखना था, उन्होंने मन के तल पर सेक्स को नहीं जाने दिया, उन्होंने शरीर के तल पर रोक लिया। विवाह करो, प्रेम नहीं। फिर विवाह से प्रेम आता हो तो आए, न आता हो न आए। शरीर के तल पर स्थिरता हो सकती है। मन के तल पर स्थिरता बहुत मुश्किल है।
लेकिन मन के तल पर सेक्स का अनुभव शरीर से ज्यादा गहरा होता है। पूरब की बजाय पश्चिम का सेक्स का अनुभव ज्यादा गहरा है। तो पश्चिम के जो मनोवैज्ञानिक हैं फ्रायड से जुंग तक, उन सारे लोगों ने जो भी लिखा है, वह सेक्स की दूसरी गहराई है, वह मन की गहराई है।
लेकिन मैं जिस सेक्स की बात कर रहा हूं, वह तीसरा तल है। वह न आज तक पूरब में पैदा हुआ है, न पश्चिम में। वह तीसरा तल है--स्प्रिचुअल। वह तीसरा तल है--आध्यात्मिक।
शरीर के तल पर भी एक स्थिरता है, क्योंकि शरीर जड़ है। और आत्मा के तल पर भी एक स्थिरता है, क्योंकि आत्मा के तल पर कोई परिवर्तन कभी होता ही नहीं। वहां सब शांत है, वहां सब सनातन है। बीच में एक तल है मन का, जहां तरलता है, पारे की तरह तरल है मन, जरा में बदल जाता है।
पश्चिम मन के साथ प्रयोग कर रहा है, इसलिए विवाह टूट रहा है, परिवार नष्ट हो रहा है। मन के साथ विवाह और परिवार खड़े नहीं रह सकते। अभी दो वर्ष में तलाक है, कल दो घंटे में तलाक हो सकता है। मन तो घंटे भर में बदल जाता है। तो पश्चिम का सारा समाज अस्तव्यस्त हो गया है। पूरब का समाज व्यवस्थित था। लेकिन सेक्स की जो गहरी अनुभूति थी, वह पूरब को उपलब्ध नहीं हो सकी।
एक और स्थिरता है, एक और घड़ी है--अध्यात्म की। उस तल पर जो पति-पत्नी एक बार मिल जाते हैं या दो व्यक्ति एक बार मिल जाते हैं, उन्हें तो ऐसा लगता है कि वे अनंत जन्मों के लिए एक हो गए। वहां फिर कोई परिवर्तन नहीं है। उस तल पर चाहिए स्थिरता। उस तल पर चाहिए अनुभव।
तो मैं जिस अनुभव की बात कर रहा हूं, जिस सेक्स की बात कर रहा हूं, वह स्प्रिचुअल सेक्स है। आध्यात्मिक अर्थ नियोजन करना चाहता हूं काम की वासना में। और अगर मेरी यह बात समझेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि मां का बेटे के प्रति जो प्रेम है, वह आध्यात्मिक काम है, वह स्प्रिचुअल सेक्स का हिस्सा है।
आप कहेंगे, यह तो बहुत उलटी बात है! मां का बेटे के प्रति काम का क्या संबंध?
लेकिन जैसा मैंने कहा कि पुरुष और स्त्री, पति और पत्नी एक क्षण के लिए मिलते हैं, एक क्षण के लिए दोनों की आत्माएं एक हो जाती हैं। और उस घड़ी में जो उन्हें आनंद का अनुभव होता है, वही उनको बांधने वाला हो जाता है। कभी आपने सोचा कि मां के पेट में बेटा नौ महीने तक रहता है और मां के अस्तित्व से मिला रहता है। पति एक क्षण को मिलता है। बेटा नौ महीने के लिए एक होता है, इकट्ठा होता है। इसीलिए मां का बेटे से जो गहरा संबंध है, वह पति से भी कभी नहीं होता। हो भी नहीं सकता। पति एक क्षण के लिए मिलता है अस्तित्व के तल पर, जहां एक्झिस्टेंस है, जहां बीइंग है, वहां एक क्षण को मिलता है, फिर बिछुड़ जाता है। एक क्षण को करीब आते हैं और फिर कोसों का फासला शुरू हो जाता है। लेकिन बेटा नौ महीने तक मां की सांस से सांस लेता है, मां के हृदय से धड़कता है, मां के खून से खून, मां के प्राण से प्राण। उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता, वह मां का एक हिस्सा होता है।
इसीलिए स्त्री मां बने बिना कभी भी पूरी तरह तृप्त नहीं हो पाती। कोई पति स्त्री को कभी तृप्त नहीं कर सकता, जो उसका बेटा उसको कर देता है। कोई पति कभी उतना गहरा कंटेंटमेंट उसे नहीं दे पाता, जितना उसका बेटा उसको दे पाता है। स्त्री मां बने बिना पूरी नहीं हो पाती। उसके व्यक्तित्व का पूरा निखार और पूरा सौंदर्य उसके मां बनने पर प्रकट होता है। उससे उसके बेटे के आत्मिक संबंध बहुत गहरे हैं।
और इसीलिए आप यह भी समझ लो कि जैसे ही स्त्री मां बन जाती है, उसकी सेक्स में रुचि कम हो जाती है। यह कभी आपने खयाल किया? जैसे ही स्त्री मां बन जाती है, सेक्स के प्रति उसकी रुचि कम हो जाती है। फिर सेक्स में उसे उतना रस नहीं मालूम पड़ता। उसने एक और गहरा रस ले लिया है--मातृत्व का। वह एक प्राण के साथ और नौ महीने तक इकट्ठी जी ली है, अब उसे सेक्स में रस नहीं रह जाता।
अक्सर पति हैरान होते हैं। क्योंकि पति के पिता बनने से पुरुषों में कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मां बनने से स्त्री में बुनियादी फर्क पड़ जाता है। पिता बनने से पति में कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि पिता कोई बहुत गहरा संबंध नहीं है। जो नया व्यक्ति पैदा होता है उससे पिता का कोई गहरा संबंध नहीं है। पिता बिलकुल सामाजिक व्यवस्था है, सोशल इंस्टीट्यूशन है। पिता के बिना भी दुनिया चल सकती है। इसीलिए पिता से कोई गहरा संबंध नहीं है बेटे का।
मां से उसके बहुत गहरे संबंध हैं। और मां तृप्त हो जाती है उसके बाद, और उसमें एक और ही तरह की आध्यात्मिक गरिमा प्रकट होती है। जो मां नहीं बनी है स्त्री, उसको देखें; और जो मां बन गई है, उसे देखें। और उन दोनों की चमक और उनकी ऊर्जा और उनका व्यक्तित्व अलग मालूम प़डेगा। मां में एक दीप्ति दिखाई पड़ेगी--शांत। जैसे नदी जब मैदान में आ जाती है तब शांत हो जाती है। जो अभी मां नहीं बनी है, उस स्त्री में एक दौड़ दिखेगी। जैसे पहाड़ पर नदी दौड़ती है, झरने की तरह टूटती है, चिल्लाती है, गड़गड़ाहट है, आवाज है, दौड़ है। मां बन कर वह एकदम शांत हो जाती है।
इसीलिए मैं आपसे इस संदर्भ में यह भी कहना चाहता हूं कि जिन स्त्रियों को सेक्स का पागलपन सवार हो गया है--जैसे पश्चिम में--वे इसीलिए मां नहीं बनना चाहतीं, क्योंकि मां बनने के बाद सेक्स का रस कम हो जाता है। पश्चिम की स्त्री मां बनने से इनकार करती है, क्योंकि मां बनी कि सेक्स का रस गया। सेक्स का रस तभी तक रह सकता है, जब तक वह मां न बने।
तो पश्चिम की अनेक हुकूमतें घबरा गई हैं इस बात से कि यह रोग अगर बढ़ता चला गया तो उनकी संख्या का क्या होगा! हम यहां घबरा रहे हैं कि हमारी संख्या न बढ़ जाए। पश्चिम में मुल्क घबरा रहे हैं कि उनकी संख्या कहीं कम न हो जाए! क्योंकि स्त्रियों को अगर इतने तीव्र रूप से यह भाव पैदा हो जाए की मां बनने से सेक्स का रस कम हो जाता है और वे मां न बनना चाहें तो क्या किया जा सकता है! कोई कानूनी जबरदस्ती की जा सकती है? किसी को संतति-नियमन के लिए तो कानूनी जबरदस्ती भी की जा सकती है कि हम जबरदस्ती बच्चे नहीं होने देंगे। लेकिन किसी स्त्री को मजबूर नहीं किया जा सकता कि बच्चे पैदा करने ही पड़ेंगे।
पश्चिम के सामने हमसे बड़ा सवाल है। हमारा सवाल उतना बड़ा नहीं है। हम संख्या को रोक सकते हैं जबरदस्ती, कानूनन। लेकिन संख्या को कानूनन बढ़ाने का कोई भी रास्ता नहीं है। किसी व्यक्ति को जबरदस्ती नहीं की जा सकती कि तुम बच्चे पैदा करो। और आज से दो सौ साल के भीतर पश्चिम के सामने यह प्रश्न बहुत भारी हो जाएगा। क्योंकि पूरब की संख्या बढ़ती चली जाएगी, वह सारी दुनिया पर छा सकती है। और पश्चिम की संख्या क्षीण होती जा सकती है। स्त्री को मां बनने के लिए उन्हें फिर से राजी करना पड़ेगा।
और उनके कुछ मनोवैज्ञानिकों ने यह सलाह देनी शुरू की है कि बाल-विवाह शुरू कर दो, अन्यथा खतरा है। क्योंकि स्त्री होश में आ जाती है तो वह मां नहीं बनना चाहती, उसे सेक्स का रस लेने में ज्यादा ठीक मालूम पड़ता है। इसलिए बचपन में शादी कर दो, उसे पता ही न चले वह कब मां बन गई।
पूरब में जो बाल-विवाह चलता था, उसके एक कारणों में यह भी था। स्त्री जितनी युवा हो जाएगी और जितनी समझदार हो जाएगी और सेक्स का जैसे रस लेने लगेगी, वैसे वह मां नहीं बनना चाहेगी। हालांकि उसे कुछ पता नहीं कि मां बनने से क्या मिलेगा। यह तो मां बनने से ही पता चल सकता है। उसके पहले कोई उपाय नहीं है।
स्त्री तृप्त होने लगती है मां बन कर--क्यों? उसने एक आध्यात्मिक तल पर सेक्स का अनुभव कर लिया बच्चे के साथ। और इसीलिए मां और बेटे के पास एक आत्मीयता है। मां अपने प्राण दे सकती है बेटे के लिए। मां बेटे के प्राण लेने की कल्पना भी नहीं कर सकती है। पत्नी पति के प्राण ले सकती है। लिए हैं अनेक बार। और अगर नहीं भी लेती तो पूरी जिंदगी में प्राण लेने की हालत पैदा कर देती है। लेकिन बेटे के लिए कल्पना भी नहीं कर सकती। वह संबंध बहुत गहरा है।
और मैं आपसे यह भी कह दूं, जब उसका अपने पति से संबंध भी इतना गहरा हो जाता है, तो पति भी उसे बेटे की तरह दिखाई पड़ने लगता है, पति की तरह नहीं। यहां इतनी स्त्रियां बैठी हैं और इतने पुरुष बैठे हैं। मैं उनसे यह पूछता हूं कि जब उन्होंने अपनी पत्नी को बहुत प्रेम किया है तो क्या उन्होंने इस तरह व्यवहार नहीं किया है जैसे छोटा बच्चा अपनी मां के साथ करता है? क्या आपको इस बात का खयाल है कि पुरुष के हाथ स्त्री के स्तन की तरफ क्यों पहुंच जाते हैं?
वे छोटे बच्चे के हाथ हैं, जो अपनी मां के स्तन की तरफ जा रहे हैं। जैसे ही पुरुष स्त्री के प्रति गहरे प्रेम से भरता है, उसके हाथ उसके स्तन की तरफ बढ़ते हैं--क्यों? स्तन से क्या संबंध है सेक्स का? स्तन से कोई संबंध नहीं है। स्तन से मां और बेटे का संबंध है। बचपन से वह जानता रहा है। बेटे का संबंध स्तन से है। और जैसे ही पुरुष गहरे प्रेम से भरता है, वह बेटा हो जाता है।
और स्त्री का हाथ कहां पहुंच जाता है?
वह पुरुष के सिर पर पहुंच जाता है। उसके बालों में अंगुलियां चली जाती हैं। वह पुराने बेटे की याद है। वह पुराने बेटे का सिर है, जिसे उसने सहलाया है। इसलिए अगर ठीक से प्रेम आध्यात्मिक तल तक विकसित हो जाए तो पति आखिर में बेटा हो जाता है। और बेटा हो जाना चाहिए, तो आप समझिए कि हमने तीसरे तल पर सेक्स का अनुभव किया--अध्यात्म के तल पर, स्प्रिचुएलिटी के तल पर। इस तल पर एक संबंध है जिसका हमें कोई पता ही नहीं! पति-पत्नी का संबंध उसकी तैयारी है, उसका अंत नहीं है। वह यात्रा की शुरुआत है, पूर्णता नहीं है।
इसीलिए पति-पत्नी सदा कष्ट में रहते हैं, क्योंकि वह यात्रा है, यात्रा सदा कष्ट में होती है। मंजिल पर शांति मिलती है। पति-पत्नी कभी शांत नहीं हो सकते। वह बीच की यात्रा है। और अधिक लोग यात्रा में ही खत्म हो जाते हैं, मुकाम पर कभी पहुंच ही नहीं पाते।
इसलिए पति-पत्नी के बीच एक इनर कांफ्लिक्ट चौबीस घंटे चलती है। चौबीस घंटे एक कलह चलती है। जिसे हम प्रेम करते हैं, उसी के साथ चौबीस घंटे कलह चलती है! लेकिन न पति समझता, न पत्नी समझती कि कलह का कारण क्या है? पति सोचता है कि शायद दूसरी स्त्री होती तो सब ठीक हो जाता। पत्नी सोचती है कि शायद दूसरा पुरुष होता तो सब ठीक हो जाता। यह जोड़ा गलत हो गया।
लेकिन मैं आपसे कहता हूं कि दुनिया भर के जोड़ों का यही अनुभव है। और आपको अगर बदलने का मौका दे दिया जाए तो इतना ही फर्क पड़ेगा जैसे कि कुछ लोग अरथी को लेकर मरघट जाते हैं--कंधे पर रख कर अरथी को--एक कंधा दुखने लगता है तो उठा कर दूसरे कंधे पर रख लेते हैं। थोड़ी देर राहत मिलती है, कंधा बदल गया। थोड़ी देर के बाद पता चलता है कि बोझ उतना का उतना ही फिर शुरू हो गया है।
पश्चिम में इतने तलाक हो रहे हैं। उनका अनुभव यह है कि दूसरी स्त्री दस-पांच दिन के बाद पहली स्त्री फिर साबित हो जाती है। दूसरा पुरुष पंद्रह दिन के बाद पहला पुरुष फिर साबित हो जाता है। इसके कारण गहरे हैं। इसके कारण इस स्त्री और इस पुरुष से संबंधित नहीं हैं। इसके कारण इस बात से संबंधित हैं कि स्त्री और पुरुष का, पति और पत्नी का संबंध बीच की यात्रा का संबंध है, वह मुकाम नहीं है, वह अंत नहीं है। अंत तो वहीं होगा जहां स्त्री मां बन जाएगी और पुरुष फिर बेटा हो जाएगा।
तो मैं आपसे कह रहा हूं कि मां और बेटे का संबंध आध्यात्मिक काम का संबंध है। और जिस दिन स्त्री और पुरुष में, पति और पत्नी में भी आध्यात्मिक काम का संबंध उत्पन्न होगा, उस दिन फिर मां-बेटे का संबंध स्थापित हो जाएगा। और वह स्थापित हो जाए तो एक तृप्ति, जिसको मैंने कहा कंटेंटमेंट, अनुभव होगा। और उस अनुभव से ब्रह्मचर्य फलित होता है।
तो यह मत सोचें कि मां और बेटे के संबंध में कोई काम नहीं है। आध्यात्मिक काम है। अगर हम ठीक से कहें तो आध्यात्मिक काम को ही प्रेम कह सकते हैं, वह प्रेम है। स्प्रिचुअल जैसे ही सेक्स हो जाता है, वह प्रेम हो जाता है।
लेकिन उनके पूछने का कारण है। अब तक काम को और राम को दुश्मन की तरह देखा जाता रहा है। सेक्स को और परमात्मा को दुश्मन की तरह देखा जाता रहा है। अब तक ऐसा समझा जाता रहा है कि जो राम की खोज करते हैं, उनको काम से कोई संबंध नहीं है। और जो लोग काम की यात्रा करते हैं, उनको अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है।
ये दोनों बातें बेवकूफी की हैं। आदमी काम की यात्रा भी राम की खोज के लिए ही करता है। वह काम का इतना तीव्र आकर्षण, राम की ही खोज है। और इसीलिए काम में कभी तृप्ति नहीं मिलती; कभी ऐसा नहीं लगता कि बस पूरा हो गया सब। वह जब तक राम न मिल जाए तब तक लग भी नहीं सकता है। और जो लोग काम के शत्रु होकर राम को खोजते हैं, राम की खोज नहीं है वह, वह सिर्फ राम के नाम में काम से एस्केप है, पलायन है; काम से बचना है। इधर प्राण घबराते हैं, डर लगता है, तो राम की चदरिया ओढ़ कर उसमें छुप जाना है और राम-राम, राम-राम, राम-राम जपते रहना है कि वह काम की याद न आए। जब भी कोई आदमी राम-राम, राम-राम जपते मिले, तो जरा गौर करना। उसके भीतर राम-राम के जप के पीछे काम का जप चल रहा होगा, सेक्स का जप चल रहा होगा। स्त्री को देखेगा और माला फेरने लगेगा, कहेगा: राम-राम, राम-राम, राम-राम। वह स्त्री दिखी कि वह ज्यादा जोर से माला फेरता है, ज्यादा जोर से राम राम कहता है। क्यों?
वह भीतर जो काम बैठा है, वह धक्के मार रहा है। राम का नाम ले-ले कर उसे भुलाने की कोशिश करता है। लेकिन इतनी आसान तरकीबों से अगर जीवन बदलते होते तो दुनिया कभी की बदल गई होती। उतना आसान रास्ता नहीं है।
तो मैं आपसे कहना चाहता हूं कि काम को समझना जरूरी है अगर आप अपने राम की और परमात्मा की खोज को भी समझना चाहते हैं। क्यों? यह इसलिए मैं कहता हूं कि एक आदमी बंबई से कलकत्ता की यात्रा करना चाहे, वह कलकत्ते के संबंध में पता लगाए कि कलकत्ता कहां है, किस दिशा में है। लेकिन उसे यही पता न हो कि बंबई कहां है और किस दिशा में है और कलकत्ते की वह यात्रा करना चाहे, तो क्या वह कभी सफल हो सकेगा?
कलकत्ता जाने के लिए सबसे पहले यह पता लगाना जरूरी है कि बंबई कहां है जहां मैं हूं। वह किस दिशा में है? फिर कलकत्ते की तरफ दिशा-विचार की जा सकती है। लेकिन मुझे यही पता नहीं कि बंबई कहां है, तो कलकत्ते के बाबत सारी जानकारी फिजूल है। क्योंकि यात्रा मुझे बंबई से शुरू करनी पड़ेगी। यात्रा का प्रारंभ बंबई से करना है। और प्रारंभ पहले है, अंत बाद में है।
आप कहां खड़े हैं? राम की यात्रा करना चाहते हैं, वह ठीक। भगवान तक पहुंचना चाहते हैं, वह ठीक। लेकिन खड़े कहां हैं आप? खड़े तो काम में हैं, खड़े तो वासना में हैं, खड़े तो सेक्स में हैं। वह आपका निवासगृह है, जहां से आपको कदम उठाने हैं और यात्रा करनी है। तो पहले तो उस जगह को समझ लेना जरूरी है जहां हम हैं। जो एक्चुअलिटी है उसे पहले, जो वास्तविक है उसे पहले समझ लेना जरूरी है, तब हम उसे भी समझ सकते हैं जो संभावना है। जो पासिबिलिटी है, जो हम हो सकते हैं, उसे जानने के लिए, जो हम हैं उसे पहले जान लेना जरूरी है। अंतिम कदम को समझने के पहले पहला कदम समझ लेना जरूरी है, क्योंकि पहला कदम ही अंतिम कदम तक पहुंचाने का रास्ता बनेगा। और अगर पहला कदम ही गलत हो गया तो अंतिम कदम कभी भी सही नहीं होने वाला है।
राम से भी ज्यादा महत्वपूर्ण काम को समझना है, परमात्मा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण सेक्स को समझना है। क्यों इतना महत्वपूर्ण है? इसलिए महत्वपूर्ण है कि अगर परमात्मा तक पहुंचना है तो सेक्स को बिना समझे आप नहीं पहुंच सकते हैं।
इसलिए यह मत पूछें। रह गई अथारिटी की बात कि मैं अथारिटी हूं या नहीं--यह कैसे निर्णय होगा? अगर मैं ही इस संबंध में कुछ कहूंगा तो वह निर्णायक नहीं रहेगा, क्योंकि मेरे संबंध में ही निर्णय होना है। अगर मैं ही कहूं कि मैं अथारिटी हूं, तो उसका कोई मतलब नहीं है; अगर मैं कहूं कि मैं अथारिटी नहीं हूं, तो उसका भी कोई मतलब नहीं है; क्योंकि मेरे दोनों वक्तव्यों के संबंध में विचारणीय है कि अथारिटेटिव आदमी कह रहा है कि गैर-अथारिटेटिव। मैं जो भी कहूंगा इस संबंध में, वह फिजूल है। मैं अथारिटी हूं या नहीं, यह तो आप थोड़े सेक्स की दुनिया में प्रयोग करके देखें। और जब अनुभव आएगा तो पता चलेगा कि जो मैंने कहा था, वह अथारिटी थी या नहीं। उसके बिना कोई रास्ता नहीं है।
मैं आपसे कहता हूं कि तैरने का यह रास्ता है। आप कहें कि लेकिन हम कैसे मानें कि आप तैरने के संबंध में प्रामाणिक बात कह रहे हैं? तो मैं कहता हूं कि चलिए, आपको साथ लेकर नदी में उतरा जा सकता है, आपको नदी में उतारे देता हूं। मैंने जो कहा है आपको, अगर वह कारगर हो जाए पार होने में और हाथ-पैर चलाने में और तैरने में, तो आप समझना कि जो मैंने कहा है वह कुछ जान कर कहा है।
उन्होंने यह भी कहा है कि फ्रायड अथारिटी हो सकते हैं।
लेकिन मैं आपसे कहता हूं, जो मैं कह रहा हूं, उस पर फ्रायड दो कौड़ी भी नहीं जानते। फ्रायड मानसिक तल से कभी भी ऊपर नहीं उठ पाया। उसको कल्पना भी नहीं है आध्यात्मिक सेक्स की। फ्रायड की सारी जानकारी रुग्ण सेक्स की है--हिस्टेरिक, होमोसेक्सुअलिटी, मैस्टरबेशन--इस सबकी खोजबीन है। रुग्ण सेक्स, विकृत सेक्स के बाबत खोजबीन है। पैथॉलाजिकल है, बीमार की चिकित्सा की वह खोज है। फ्रायड एक डाक्टर है। फिर पश्चिम में जिन लोगों का उसने अध्ययन किया, वे मन के तल के सेक्स के लोग हैं। उसके पास एक भी अध्ययन नहीं, एक भी केस हिस्ट्री नहीं, जिसको स्प्रिचुअल सेक्स कहा जा सके।
तो अगर खोज करनी है कि जो मैं कह रहा हूं वह कहां तक सच है, तो सिर्फ एक दिशा में खोज हो सकती है, वह दिशा है तंत्र। और तंत्र के बाबत हमने हजारों साल से सोचना बंद कर दिया है। तंत्र ने सेक्स को स्प्रिचुअल बनाने का दुनिया में सबसे पहला प्रयास किया था। खजुराहो में खड़े मंदिर, पुरी और कोणार्क के मंदिर सबूत हैं।
कभी आप खजुराहो गए हैं? कभी आपने जाकर खजुराहो की मूर्तियां देखी हैं?
तो आपको दो बातें अदभुत अनुभव होंगी। पहली तो बात यह कि नग्न मैथुन की प्रतिमाओं को देख कर भी आपको ऐसा नहीं लगेगा कि उनमें जरा भी कुछ गंदा है, जरा भी कुछ अग्ली है। नग्न मैथुन की प्रतिमाओं को देख कर कहीं भी ऐसा नहीं लगेगा कि कुछ कुरूप है, कुछ बुरा है। बल्कि मैथुन की प्रतिमाओं को देख कर एक शांति, एक पवित्रता का अनुभव होगा, जो बड़ी हैरानी की बात है! वे प्रतिमाएं, आध्यात्मिक सेक्स को जिन लोगों ने अनुभव किया था, उन शिल्पियों से निर्मित करवाई गई हैं। उन प्रतिमाओं के चेहरों पर...
आप एक सेक्स से भरे हुए आदमी को देखें, उसकी आंखें देखें, उसका चेहरा देखें। वह घिनौना, घबराने वाला, कुरूप प्रतीत होगा। उसकी आंखों से एक झलक मिलती हुई मालूम होगी, जो घबराने वाली और डराने वाली होगी। प्यारे से प्यारे आदमी को, अपने निकटतम प्यारे से प्यारे व्यक्ति को भी स्त्री जब सेक्स से भरा हुआ पास आते हुए देखती है तो उसे दुश्मन दिखाई पड़ता है, मित्र नहीं दिखाई पड़ता। प्यारी से प्यारी स्त्री को अगर कोई पुरुष अपने निकट सेक्स से भरा हुआ आता हुआ दिखाई देगा तो उसे उसके भीतर नरक दिखाई पड़ेगा, स्वर्ग नहीं दिखाई पड़ सकता।
लेकिन खजुराहो की प्रतिमाओं को देखें, तो उनके चेहरों को देख कर ऐसा लगता है, जैसे बुद्ध का चेहरा हो, महावीर का चेहरा हो। मैथुन की प्रतिमाएं और मैथुनरत जोड़े के चेहरे पर जो भाव हैं, वे समाधि के हैं। और सारी प्रतिमाओं को देख लें और पीछे एक हलकी सी शांति की झलक छूट जाएगी, और कुछ भी नहीं। और एक आश्चर्य आपको अनुभव होगा। आप सोचते होंगे कि नंगी तस्वीरें और मूर्तियां देख कर आपके भीतर कामुकता पैदा होगी। तो मैं आपसे कहता हूं, फिर आप देर न करें और सीधे खजुराहो चले जाएं। खजुराहो पृथ्वी पर इस समय अनूठी चीज है।
लेकिन हमारे कई नीतिशास्त्री, पुरुषोत्तमदास टंडन और उनके कुछ साथी इस सुझाव के थे कि खजुराहो के मंदिर पर मिट्टी छाप कर दीवालें बंद कर देनी चाहिए, क्योंकि उनको देखने से वासना पैदा हो सकती है। मैं तो हैरान हो गया!
खजुराहो के मंदिर जिन्होंने बनाए थे, उनका खयाल यह था कि इन प्रतिमाओं को अगर कोई बैठ कर घंटे भर देखे तो वासना से शून्य हो जाएगा। वे प्रतिमाएं आब्जेक्ट्स फॉर मेडिटेशन रहीं हजारों वर्ष तक। वे प्रतिमाएं ध्यान के लिए आब्जेक्ट का काम करती रही हैं। जो लोग अति कामुक थे, उन्हें खजुराहो के मंदिर के पास भेज कर उन पर ध्यान करवाने के लिए कहा जाता था कि तुम ध्यान करो--इन प्रतिमाओं को देखो और इनमें लीन हो जाओ।
और यह आश्चर्य की बात है...हालांकि हमारे अनुभव में है, लेकिन हमें खयाल नहीं। आपको पता है, रास्ते पर दो आदमी लड़ रहे हों और आप रास्ते से चले जा रहे हों, तो आपका मन होता है कि खड़े होकर वह लड़ाई देख लें। लेकिन क्यों? आपने कभी खयाल किया? लड़ाई देखने से आपको क्या फायदा है? हजार जरूरी काम छोड़ कर आप आधे घंटे तक दो आदमियों की मुक्केबाजी देख सकते हैं खड़े होकर--फायदा क्या है? शायद आपको पता नहीं, फायदा एक है। दो आदमियों को लड़ते देख कर आपके भीतर जो लड़ने की प्रवृत्ति है वह विसर्जित होती है, उसका निकास होता है, वह एवोपरेट हो जाती है।
अगर मैथुन की प्रतिमा को कोई घंटे भर तक शांत बैठ कर ध्यानमग्न होकर देखे, तो उसके भीतर जो मैथुन करने का पागल भाव है, वह विलीन हो जाता है।
एक मनोवैज्ञानिक के पास एक आदमी को लाया गया था। वह एक दफ्तर में काम करता है। और अपने मालिक से, अपने बॉस से बहुत रुष्ट है। मालिक उससे कुछ भी कहता है तो उसे बहुत अपमान मालूम होता है और उसके मन में होता है कि निकालूं जूता और इसे मार दूं। लेकिन मालिक को जूता कैसे मारा जा सकता है? हालांकि ऐसे नौकर कम ही होंगे जिनके मन में यह खयाल न आता हो कि निकालूं जूता और मार दूं। ऐसा नौकर खोजना मुश्किल है। अगर आप मालिक हैं तो भी आपको पता होगा और आप अगर नौकर हैं तो भी आपको पता होगा--कि नौकर के मन में नौकर होने की भारी पीड़ा है और मन होता है कि इसका बदला ले लूं। लेकिन नौकर अगर बदला ले सकता तो नौकर होता क्यों?
तो वह बेचारा मजबूर है और दबाए चला जाता है, दबाए चला जाता है। फिर तो हालत उसकी ऐसी रुग्ण हो गई कि उसे यह डर पैदा हो गया कि किसी दिन आवेश में मैं जूता मार ही न दूं। तो वह जूता घर ही छोड़ जाता है। लेकिन दफ्तर में उसे जूते की दिन भर याद आती है और जब भी मालिक दिखाई पड़ता है वह पैर टटोल कर देखता है कि जूता? लेकिन जूता तो वह घर छोड़ आया है, और खुश होता है कि अच्छा हुआ मैं छोड़ आया, किसी दिन आवेश के क्षण में निकल आए जूता तो मुश्किल हो गई।
लेकिन घर जूता छोड़ आने से जूते से मुक्ति नहीं होती। जूता उसका पीछा करने लगा। वह कागज पर कुछ भी बनाता है तो जूता बन जाता है। वह रजिस्टर पर कुछ ऐसे ही लिख रहा है और पाता है कि जूते ने आकार लेना शुरू कर दिया। उसके प्राणों में जूता घिरने लगा है। वह बहुत घबरा गया है और उसे ऐसा डर लगने लगा है धीरे-धीरे कि मैं किसी भी दिन हमला कर सकता हूं।
तो उसने अपने घर आकर कहा कि अब मुझे नौकरी पर जाना ठीक नहीं, मैं छुट्टी लेना चाहता हूं; क्योंकि अब हालत ऐसी हो गई है कि मैं दूसरे का जूता निकाल कर भी मार सकता हूं। अब अपने जूते की जरूरत नहीं रह गई है। मेरे हाथ दूसरे लोगों के पैरों की तरफ भी बढ़ने की कोशिश करते हैं।
तो घर के लोगों ने समझा कि वह पागल हो गया है, उसे एक मनोवैज्ञानिक के पास ले गए। उस मनोवैज्ञानिक ने कहा कि इसकी बीमारी बड़ी नहीं, छोटी सी है। इसके मालिक की एक तस्वीर घर में लगा लो और इससे कहो कि रोज सुबह पांच जूते धार्मिक भाव से मारा करे। पांच जूते मारे, तब दफ्तर जाए--बिलकुल रिलीजसली। ऐसा नहीं कि किसी दिन चूक जाए। जैसे लोग ध्यान, जप करते हैं। बिलकुल वक्त पर पांच जूते मारे। दफ्तर से लौट कर पांच जूते मारे।
वह आदमी पहले तो बोला कि यह क्या पागलपन की बात है! लेकिन भीतर उसे खुशी मालूम हुई। वह हैरान हुआ, उसने कहा, लेकिन मुझे भीतर खुशी मालूम हो रही है।
तस्वीर टांग ली गई और वह रोज पांच जूते मार कर दफ्तर गया। पहले दिन ही जब वह पांच जूते मार कर दफ्तर गया तो उसे एक बड़ा अदभुत अनुभव हुआ--मालिक के प्रति उसने दफ्तर में उतना क्रोध अनुभव नहीं किया। और पंद्रह दिन के भीतर तो वह मालिक के प्रति अत्यंत विनयशील हो गया। मालिक को भी हैरानी हुई। उसे तो कुछ पता नहीं कि भीतर क्या चल रहा है। उसने उसको पूछा कि तुम आजकल बहुत आज्ञाकारी, बहुत विनम्र, बहुत हंबल हो गए हो। बात क्या है? उसने कहा, वह मत पूछिए, नहीं तो सब गड़बड़ हो जाएगा।
क्या हुआ? तस्वीर को जूते मारने से कुछ हो सकता है? लेकिन तस्वीर को जूते मारने से, वह जो जूते मारने का भाव है, वह तिरोहित हुआ, वह एवोपरेट हुआ, वह वाष्पीभूत हुआ।
खजुराहो के मंदिर या कोणार्क और पुरी के मंदिर जैसे मंदिर सारे देश के गांव-गांव में होने चाहिए। बाकी मंदिरों की कोई जरूरत नहीं है, वे बेवकूफी के सबूत हैं, उनमें कुछ नहीं है। उनमें न कोई वैज्ञानिकता है, न कोई अर्थ है, न कोई प्रयोजन है। वे निपट गंवारी के सबूत हैं। लेकिन खजुराहो के मंदिर जरूर अर्थपूर्ण हैं। जिस आदमी का भी मन सेक्स से बहुत भरा हो, वह जाकर उन पर ध्यान करे; और वह हलका लौटेगा, शांत लौटेगा।
तंत्र ने जरूर सेक्स को आध्यात्मिक बनाने की कोशिश की थी। लेकिन इस मुल्क के नीतिशास्त्री और जो मॉरल प्रीचर्स हैं, उन दुष्टों ने उनकी बात को समाज तक नहीं पहुंचने दिया। वे मेरी बात भी नहीं पहुंचने देना चाहते हैं।
यहां से मैं भारतीय विद्याभवन से बोल कर जबलपुर वापस लौटा और तीसरे दिन मुझे एक पत्र मिला कि अगर आप इस तरह की बातें कहना बंद नहीं कर देते हैं तो आपको गोली क्यों न मार दी जाए?
मैं उन्हें उत्तर देना चाहता था, लेकिन वे गोली मारने वाले सज्जन बहुत कायर मालूम पड़े, न उन्होंने नाम लिखा था, न पता लिखा था। शायद वे डरे होंगे कि मैं पुलिस को न दे दूं। लेकिन अगर वे यहां कहीं हों--अगर होंगे तो किसी झाड़ के पीछे या कहीं दीवाल के पीछे छिपे होंगे--अगर वे यहां कहीं हों तो मैं उनको कहना चाहता हूं कि पुलिस को देने की कोई भी जरूरत नहीं है। वे अपना नाम और पता मुझे भेज दें, ताकि मैं उनको उत्तर दे सकूं। लेकिन अगर उनकी हिम्मत न हो तो मैं उत्तर यहीं दिए देता हूं, ताकि वे सुन लें।
पहली तो बात यह है कि इतनी जल्दी गोली मारने की मत करना। क्योंकि गोली मारते ही, जो बात मैं कह रहा हूं वह परम सत्य हो जाएगी, इसका उनको पता होना चाहिए।
जीसस क्राइस्ट को दुनिया कभी की भूल गई होती, अगर उसको सूली पर न लटकाया गया होता। जीसस क्राइस्ट को दुनिया कभी की भूल गई होती, अगर उसको सूली न मिली होती। सूली देने वाले ने बड़ी कृपा की।
और मैंने तो यहां तक सुना है कुछ इनर सर्किल्स में--जो जीवन की गहराइयों की खोज करते हैं, उनसे मुझे यह भी ज्ञात हुआ है--कि जीसस ने खुद अपनी सूली लगवाने के लिए योजना और षड्यंत्र किया था। जीसस ने चाहा था कि मुझे सूली लगा दी जाए। क्योंकि सूली लगते ही, जो जीसस ने कहा है, वह करोड़ों-करोड़ों वर्ष के लिए अमर हो जाएगा और हजारों लोगों के, लाखों लोगों के काम आ सकेगा।
इस बात की बहुत संभावना है। क्योंकि जुदास, जिसने ईसा को बेचा तीस रुपयों में, वह ईसा के प्यारे से प्यारे शिष्यों में से एक था। और यह संभव नहीं है कि जो वर्षों से ईसा के पास रहा हो, वह सिर्फ तीस रुपये में ईसा को बेच दे, सिवाय इसके कि ईसा ने उसको कहा हो कि तू कोशिश कर, दुश्मन से मिल जा, और किसी तरह मुझे उलझा दे और सूली लगवा दे! ताकि मैं जो कह रहा हूं, वह अमृत का स्थान ले ले और करोड़ों लोगों का उद्धार बन जाए।
महावीर को अगर सूली लगी होती तो दुनिया में केवल तीस लाख जैन नहीं होते, तीस करोड़ हो सकते थे। लेकिन महावीर शांति से मर गए, सूली का उन्हें पता भी नहीं था। न किसी ने लगाई, न उन्होंने लगवाने की व्यवस्था की। आज आधी दुनिया ईसाई है। उसका सिवाय इसके कोई कारण नहीं कि ईसा अकेला सूली पर लटका हुआ है--न बुद्ध, न मोहम्मद, न महावीर, न कृष्ण, न राम। सारी दुनिया भी ईसाई हो सकती है। वह सूली पर लटकने से यह फायदा हो गया।
तो मैं उनसे कहता हूं कि जल्दी मत करना, नहीं तो नुकसान में पड़ जाओगे।
दूसरी बात यह कहना चाहता हूं कि घबराएं न वे। मेरे इरादे खाट पर मरने के हैं भी नहीं। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि कोई न कोई गोली मार ही दे! तो मैं खुद ही कोशिश करूंगा, जल्दी उनको करने की आवश्यकता नहीं है। समय आने पर मैं चाहूंगा कि कोई गोली मार ही दे! जिंदगी भी काम आती है और गोली लग जाए तो मौत भी काम आती है और जिंदगी से ज्यादा काम आ जाती है। जिंदगी जो नहीं कर पाती है, वह गोली लगी हुई मौत कर देती है।
अब तक हमेशा यह भूल की है दुश्मनों ने, नासमझी की है। सुकरात को जिन्होंने सूली पर लटका दिया, जिन्होंने जहर पिला दिया; मंसूर को जिन्होंने सूली पर लटका दिया; और अभी गोडसे ने गांधी को गोली मार दी। गोडसे को पता नहीं कि गांधी के भक्त और गांधी के अनुयायी गांधी को इतने दूर तक स्मरण कराने में कभी भी सफल नहीं हो सकते थे, जितना अकेले गोडसे ने कर दिया है। और अगर गांधी ने मरते वक्त, जब उन्हें गोली लगी और हाथ जोड़ कर गोडसे को नमस्कार किया होगा, तो बड़ा अर्थपूर्ण था वह नमस्कार। वह अर्थपूर्ण था कि मेरा अंतिम शिष्य सामने आ गया। अब जो मुझे आखिरी और हमेशा के लिए अमर किए दे रहा है। भगवान ने आदमी भेज दिया जिसकी जरूरत थी।
जिंदगी का ड्रामा, वह जो जिंदगी की कहानी है, वह बहुत उलझी हुई है। वह इतनी आसान नहीं है। खाट पर मरने वाले हमेशा के लिए मर जाते हैं, गोली खाकर मरने वालों का मरना बहुत मुश्किल हो जाता है।
सुकरात से किसी ने पूछा--उसके मित्रों ने--कि अब तुम्हें जहर दे दिया जाएगा और तुम मर जाओगे, तो हम तुम्हारे गाड़ने की कैसी व्यवस्था करें? जलाएं, कब्र बनाएं, क्या करें?
सुकरात ने कहा, पागलो, तुम्हें पता नहीं है कि तुम मुझे नहीं गाड़ सकोगे। तुम जब सब मिट जाओगे, तब भी मैं जिंदा रहूंगा। मैंने मरने की तरकीब जो चुनी है, वह हमेशा जिंदा रहने वाली है।
तो वे मित्र अगर कहीं हों तो उनको पता होना चाहिए, जल्दी न करें। जल्दी में नुकसान हो जाएगा उनका। मेरा कुछ होने वाला नहीं है। क्योंकि जिसको गोली लग सकती है, वह मैं नहीं हूं; और जो गोली लगने के बाद भी पीछे बच जाता है, वही हूं। तो वे जल्दी न करें। और दूसरी बात यह कि वे घबराएं भी न। मैं हर तरह की कोशिश करूंगा कि खाट पर न मर सकूं। वह मरना बड़ा गड़बड़ है। वह बेकार ही मर जाना है। वह निरर्थक मर जाना है। मर जाने की भी सार्थकता चाहिए। और तीसरी बात यह कि वे दस्तखत करने से न घबराएं, न पता लिखने से घबराएं। क्योंकि अगर मुझे लगे कि कोई आदमी मारने को तैयार हो गया है, तो वह जहां मुझे बुलाएगा, मैं चुपचाप बिना किसी को खबर किए वहां आने को हमेशा तैयार हूं, ताकि उस पर पीछे कोई मुसीबत न आए।
लेकिन ये पागलपन सूझते हैं। इस तरह के धार्मिक...और जिस बेचारे ने लिखा है, उसने यही सोच कर लिखा है कि वह धर्म की रक्षा कर रहा है। उसने यही सोच कर लिखा है कि मैं धर्म को मिटाने की कोशिश कर रहा हूं, वह धर्म की रक्षा कर रहा है। उसकी नीयत में कहीं कोई खराबी नहीं है। उसके भाव बड़े अच्छे और बड़े धार्मिक हैं। ऐसे ही धार्मिक लोग तो दुनिया को दिक्कत में डालते रहे हैं। उनकी नीयत बड़ी अच्छी है, लेकिन बुद्धि मूढ़ता की है।
तो हजारों साल से तथाकथित नैतिक लोगों ने जीवन के सत्यों को पूरा-पूरा प्रकट होने में बाधा डाली है, उसे प्रकट नहीं होने दिया। नहीं प्रकट होने के कारण एक अज्ञान व्यापक हो गया। और उस अज्ञान की अंधेरी रात में हम टटोल रहे हैं, भटक रहे हैं, गिर रहे हैं। और वे मॉरल टीचर्स, वे नीतिशास्त्र के उपदेशक, हमारे इस अंधकार के बीच में मंच बना कर उपदेश देने का काम करते रहते हैं!
यह भी सच है कि जिस दिन हम अच्छे लोग हो जाएंगे, जिस दिन हमारे जीवन में सत्य की किरण आएगी, समाधि की कोई झलक आएगी, जिस दिन हमारा सामान्य जीवन भी परमात्म-जीवन में रूपांतरित होने लगेगा, उस दिन उपदेशक व्यर्थ हो जाएंगे, उनकी कोई जगह नहीं रह जाने वाली है। उपदेशक तभी तक सार्थक है, जब तक लोग अंधेरे में भटकते हैं।
गांव में चिकित्सक की तभी तक जरूरत है, जब तक लोग बीमार पड़ते हैं। जिस दिन आदमी बीमार पड़ना बंद कर देगा, उस दिन चिकित्सक को विदा कर देना पड़ेगा। तो हालांकि चिकित्सक ऊपर से बीमार का इलाज करता हुआ मालूम पड़ता है, लेकिन भीतर से उसके प्राणों की आकांक्षा यही होती है कि लोग बीमार पड़ते रहें। यह बड़ी उलटी बात है! क्योंकि चिकित्सक जीता है लोगों के बीमार पड़ने पर। उसका प्रोफेशन बड़ा कंट्राडिक्टरी है, उसका धंधा बड़ा विरोधी है। कोशिश तो उसकी यह है कि लोग बीमार पड़ते रहें। और जब मलेरिया फैलता है और फ्लू की हवाएं आती हैं, तो वह भगवान को एकांत में धन्यवाद देता है। क्योंकि यह धंधे का वक्त आया--सीजन!
मैंने सुना है, एक रात एक मधुशाला में बड़ी देर तक कुछ मित्र आकर खाना-पीना करते रहे, शराब पीते रहे। उन्होंने खूब मौज की। और जब वे चलने लगे आधी रात को तो शराबखाने के मालिक ने अपनी पत्नी को कहा कि भगवान को धन्यवाद, बड़े भले लोग आए। ऐसे लोग रोज आते रहें तो कुछ ही दिनों में हम मालामाल हो जाएं। विदा होते मेहमानों को सुनाई पड़ गया और जिसने पैसे चुकाए थे उसने कहा कि दोस्त, भगवान से प्रार्थना करो कि हमारा भी धंधा रोज चलता रहे, तो हम तो रोज आएं।
चलते-चलते उस शराबघर के मालिक ने पूछा कि भाई, तुम्हारा धंधा क्या है?
उसने कहा, मेरा धंधा पूछते हो, मैं मरघट पर लकड़ियां बेचता हूं मुर्दों के लिए। जब आदमी ज्यादा मरते हैं, तब मेरा धंधा चलता है, तब हम थोड़े खुश होते हैं। हमारा धंधा रोज चलता रहे, हम रोज यहां आते रहें।
चिकित्सक का धंधा है कि लोगों को ठीक करे। लेकिन फायदा, लाभ और शोषण इसमें है कि लोग बीमार पड़ते रहें। तो एक हाथ से चिकित्सक ठीक करता है और उसके प्राणों के प्राणों की प्रार्थना होती है कि मरीज जल्दी ठीक न हो जाए।
इसीलिए पैसे वाले मरीज को ठीक होने में बड़ी देर लगती है। गरीब मरीज जल्दी ठीक हो जाता है; क्योंकि गरीब मरीज को ज्यादा देर बीमार रहने से कोई फायदा नहीं है, चिकित्सक को कोई फायदा नहीं है। चिकित्सक को फायदा है अमीर मरीज से! तो अमीर मरीज लंबा बीमार रहता है। सच तो यह है कि अमीर अक्सर ही बीमार रहते हैं। वह चिकित्सक की प्रार्थनाएं काम कर रही हैं। उसकी आंतरिक इच्छा भी उसके हाथ को रोकती है कि मरीज एकदम ठीक ही न हो जाए।
उपदेशक की स्थिति भी ऐसी ही है। समाज जितना नीतिभ्रष्ट हो, जितना व्यभिचार फैले, जितना अनाचार फैले, उतना ही उपदेशक का मंच ऊपर उठने लगता है। क्योंकि जरूरत आ जाती है कि वह लोगों को कहे: अहिंसा का पालन करो, सत्य का पालन करो, ईमानदारी स्वीकार करो; यह व्रत पालन करो, वह व्रत पालन करो। अगर लोग व्रती हों, अगर लोग संयमी हों, अगर लोग शांत हों, ईमानदार हों, तो उपदेशक मर गया। उसकी कोई जगह न रही।
और हिंदुस्तान में सारी दुनिया से ज्यादा उपदेशक क्यों हैं? ये गांव-गांव गुरु और घर-घर स्वामी और संन्यासी क्यों हैं? यह महात्माओं की इतनी भीड़ और यह कतार क्यों है?
यह इसलिए नहीं है कि आप बड़े धार्मिक देश हैं जहां कि संत-महात्मा पैदा होते हैं। यह इसलिए है कि आप इस समय पृथ्वी पर सबसे ज्यादा अधार्मिक और अनैतिक देश हैं, इसलिए इतने उपदेशकों को पालने का ठेका और धंधा मिल जाता है। हमारा तो जातीय रोग हो गया।
मैंने सुना है कि अमेरिका में किसी ने एक लेख लिखा हुआ था। किसी मित्र ने वह लेख मेरे पास भेज दिया। उसमें एक कमी थी, उन्होंने मेरी सलाह चाही। किसी ने लेख लिखा था वहां--मजाक का कोई लेख था--उसने लिखा था कि हर आदमी और हर जाति का लक्षण शराब पिला कर पता लगाया जा सकता है कि बेसिक कैरेक्टर क्या है? तो उसने लिखा था कि अगर डच आदमी को शराब पिला दी जाए तो वह एकदम से खाने पर टूट पड़ता है, फिर वह किचेन के बाहर ही नहीं निकलता, फिर वह एकदम खाने की मेज से उठता ही नहीं। बस शराब पी कि वह दो-दो, तीन-तीन घंटे खाने में लग जाता है। अगर फ्रेंच को शराब पिला दी जाए तो शराब पीने के बाद वह एकदम नाच-गाने के लिए तत्पर हो जाता है। और अगर अंग्रेज को शराब पिला दी जाए तो वह एकदम चुप होकर एक कोने में मौन हो जाता है। वह वैसे ही चुप बैठा रहता है। और शराब पी ली, तो उसका कैरेक्टर है, वह और चुप हो जाता है। ऐसे दुनिया के सारे लोगों के लक्षण थे। लेकिन भूल से या अज्ञान के वश भारत के बाबत कुछ भी नहीं लिखा था। तो किसी मित्र ने मुझे लेख भेजा और कहा कि आप भारत के कैरेक्टर के बाबत क्या कहते हैं? अगर भारतीय को शराब पिलाई जाए तो क्या होगा?
तो मैंने कहा कि वह तो जग-जाहिर बात है। भारतीय शराब पीएगा और तत्काल उपदेश देना शुरू कर देगा। यह उसकी कैरेक्टरस्टिक है। वह उनका जातीय गुण है।
यह जो उपदेशकों का समाज और साधु-संतों और महात्माओं की ये लंबी कतार हैं, ये रोग के लक्षण हैं, ये अनीति के लक्षण हैं। और मजा यह है कि इनमें से कोई भी भीतरी हृदय से कभी नहीं चाहता कि अनीति मिट जाए, रोग मिट जाए; क्योंकि उसके मिटने के साथ वे भी मिट जाते हैं। प्राणों की पुकार यही होती है कि रोग बना रहे और बढ़ता चला जाए।
और उस रोग को बढ़ाने के लिए जो सबसे सुगम उपाय है, वह यह है कि जीवन के संबंध में सर्वांगीण ज्ञान उत्पन्न न हो सके। और जीवन के जो सबसे ज्यादा गहरे केंद्र हैं, जिनके अज्ञान के कारण अनीति और व्यभिचार और भ्रष्टाचार फैलता है, उन केंद्रों को आदमी कभी भी न जान सके। क्योंकि उन केंद्रों को जान लेने के बाद मनुष्य के जीवन से अनीति तत्काल विदा हो सकती है।
और मैं आपसे कहना चाहता हूं कि सेक्स मनुष्य की अनीति का सर्वाधिक केंद्र है। मनुष्य के व्यभिचार का, मनुष्य की विकृति का सबसे मौलिक, सबसे आधारभूत केंद्र वहां है। और इसीलिए धर्मगुरु उसकी बिलकुल बात नहीं करना चाहते!
एक मित्र ने मुझे खबर भिजवाई है कि कोई संत-महात्मा सेक्स की बात नहीं करता। और आपने सेक्स की बात की तो हमारे मन में आपका आदर बहुत कम हो गया है।
मैंने उनसे कहा, इसमें कुछ गलती न हुई। पहले आदर था, उसमें गलती थी। इसमें क्या गलती हुई? मेरे प्रति आदर होने की जरूरत क्या है? मुझे आदर देने का प्रयोजन क्या है? मैंने कब मांगा है कि मुझे आदर दें? देते थे तो आपकी गलती थी; नहीं देते हैं, आपकी कृपा है। मैं महात्मा नहीं रहा। मैंने कभी चाहा होता कि मैं महात्मा होऊं तो मुझे बड़ी पीड़ा होती। और मैं कहता, क्षमा करना, भूल से ये बातें मैंने कह दीं।
मैं महात्मा था नहीं, मैं महात्मा हूं नहीं, मैं महात्मा होना चाहता नहीं। जहां इतने बड़े जगत में इतने लोग दीन-हीन हैं, वहां एक आदमी महात्मा होना चाहे, उससे ज्यादा निम्न प्रवृत्ति और स्वार्थ से भरा हुआ आदमी नहीं है। जहां इतने दीन-हीन जन हैं, जहां इतनी हीन आत्माओं का विस्तार है, वहां महात्मा होने की कल्पना और विचार ही पाप है।
महान मनुष्यता मैं चाहता हूं। महान मनुष्य मैं चाहता हूं। महात्मा होने की मेरे मन में कोई भी इच्छा और आकांक्षा नहीं है। महात्माओं के दिन विदा हो जाने चाहिए। महात्माओं की कोई जरूरत नहीं। महान मनुष्य की जरूरत है। महान मनुष्यता की जरूरत है। ग्रेटमैन नहीं, ग्रेट ह्युमैनिटी! बड़े आदमी बहुत हो चुके। उनसे क्या फायदा हुआ? अब बड़े आदमियों की जरूरत नहीं, बड़ी आदमियत की जरूरत है।
तो मुझे बहुत अच्छा लगा कि कम से कम एक आदमी का इल्यूजन तो टूटा। एक आदमी तो डिसइल्यूजंड हुआ। एक आदमी को तो यह पता चल गया कि यह आदमी महात्मा नहीं है। एक आदमी का भ्रम टूट गया, यह भी बड़ी बात है।
वे शायद सोचे होंगे कि इस भांति कह कर वे शायद मुझे प्रलोभन दे रहे हैं कि मुझे महात्मा और महर्षि बनाया जा सकता है, अगर मैं इस तरह की बातें न करूं।
आज तक महर्षियों और महात्माओं को इसी तरह बनाया गया है। और इसीलिए उन कमजोर लोगों ने इस तरह की बातें नहीं कीं जिनसे महात्मापन छिन सकता था। अपने महात्मापन के बचा रखने के लिए--उस प्रलोभन में--जीवन का कितना अहित हो सकता है, इसका उन्होंने कोई भी खयाल नहीं किया है।
मुझे चिंता नहीं है, मुझे विचार भी नहीं है, मुझे खयाल भी नहीं है! और मुझे घबराहट ही होती है, जब कोई मुझे महात्मा मानना चाहे। और आज की दुनिया में महात्मा बन जाना और महर्षि बन जाना इतना आसान है, जिसका कोई हिसाब नहीं। हमेशा आसान रहा है। हमेशा आसान रहा है। वह सवाल नहीं है। सवाल यह है कि महान मनुष्य कैसे पैदा हो--उसके लिए हम क्या कर सकते हैं? क्या सोच सकते हैं? क्या खोज कर सकते हैं? और मुझे लगता है कि मैंने बुनियादी सवाल पर जो बातें आपसे कही हैं, वे आपके जीवन में एक दिशा तोड़ने में सहयोगी हो सकती हैं। उनसे एक मार्ग प्रकट हो सकता है। और क्रमशः आपकी वासना का रूपांतरण आत्मा की दिशा में हो सकता है। अभी हम वासना हैं, आत्मा नहीं। कल हम आत्मा भी हो सकते हैं। लेकिन वह होंगे कैसे? इसी वासना के सर्वांग रूपांतरण से! इसी शक्ति को निरंतर ऊपर से ऊपर ले जाने से!
जैसा मैंने कल आपको कहा, उस संबंध में भी बहुत से प्रश्न हैं, उसके संबंध में एक बात कहूंगा।
मैंने आपको कहा कि संभोग में समाधि की झलक का स्मरण रखें, रिमेंबरिंग रखें और उस बिंदु को पकड़ने की कोशिश करें--उस बिंदु को जो विद्युत की तरह संभोग के बीच में चमकता है समाधि का। एक क्षण को जो चमक आती है और विदा हो जाती है, उस बिंदु को पकड़ने की कोशिश करें कि वह क्या है? उसे जानने की कोशिश करें। उसको पकड़ लें पूरी तरह से कि वह क्या है?
और एक दफा उसे आपने पकड़ लिया, तो उस पकड़ में आपको दिखाई पड़ेगा कि उस क्षण में आप शरीर नहीं रह जाते हैं--बॉडीलेसनेस। उस क्षण में आप शरीर नहीं हैं। उस क्षण में एक झलक की तरह आप कुछ और हो गए हैं, आप आत्मा हो गए हैं।
और वह झलक आपको दिखाई पड़ जाए तो फिर उस झलक के लिए ध्यान के मार्ग से श्रम किया जा सकता है। उस झलक को फिर ध्यान की तरफ से पकड़ा जा सकता है। उस झलक को फिर ध्यान के रास्ते से जाकर परिपूर्ण रूप से, पूरे रूप से जाना और जीया जा सकता है। और वह अगर हमारे ज्ञान, जानने और जीवन का हिस्सा बन जाए तो आपके जीवन में सेक्स की कोई जगह नहीं रह जाएगी।
वे मित्र ठीक पूछते हैं कि अगर इतना ब्रह्मचर्य उपलब्ध होगा तो बच्चे कैसे पैदा होंगे?
उनसे भी मैं एक और बात कहना चाहता हूं, वह भी अर्थ की है और आपके खयाल में आ जानी चाहिए। ब्रह्मचर्य से भी बच्चे पैदा हो सकते हैं, लेकिन ब्रह्मचर्य से बच्चों के पैदा करने का सारा प्रयोजन और अर्थ बदल जाता है। काम से बच्चे पैदा होते हैं, सेक्स से बच्चे पैदा होते हैं।
सेक्स से बच्चे पैदा होना--बच्चे पैदा करने के लिए कोई सेक्स में नहीं जाता है। बच्चे पैदा होना आकस्मिक है, एक्सीडेंटल है। सेक्स में आप जाते हैं किसी और कारण से, बीच में बच्चे आ जाते हैं। बच्चों के लिए आप कभी सेक्स में नहीं जाते हैं। बिना बुलाए मेहमान हैं बच्चे। और इसीलिए बच्चों के प्रति आपके मन में वह प्रेम नहीं हो सकता। जो बिना बुलाए मेहमानों के प्रति कब होता है? घर में कोई आ जाए अतिथि बिना बुलाए तो जो हालत घर में हो जाती है--बिस्तर भी लगाते हैं उसको सुलाने के लिए, खाना भी खिलाते हैं उसको खिलाने के लिए, आवभगत भी करते हैं, हाथ भी जोड़ते हैं--लेकिन पता होगा आपको कि बिना बुलाए मेहमान के साथ क्या घर की हालत हो जाती है! यह सब ऊपर-ऊपर होता है, भीतर कुछ भी नहीं। और पूरे वक्त यही इच्छा होती है कि कब आप विदा हों, कब आप जाएं।
बिना बुलाए बच्चों के साथ भी दुर्व्यवहार होगा, सदव्यवहार नहीं हो सकता। क्योंकि उन्हें हमने कभी चाहा न था, कभी हमारे प्राणों की वे आकांक्षा न थे। हम तो किसी और ही तरफ गए थे, वे बाइ-प्रॉडक्ट हैं, प्रॉडक्ट नहीं। आज के बच्चे प्रॉडक्ट नहीं हैं, बाइ-प्रॉडक्ट हैं। वे उत्पत्ति नहीं हैं। वह उत्पत्ति के साथ, जैसे गेहूं के साथ भूसा पैदा हो जाता है, वैसी हालत है। आपका विचार, आपकी कामना दूसरी थी, बच्चे बिलकुल आकस्मिक हैं।
और इसीलिए सारी दुनिया में हमेशा से यह कोशिश चली है--वात्स्यायन से लेकर आज तक यह कोशिश चली है--कि सेक्स को बच्चों से किसी तरह मुक्त कर लिया जाए। उसी से बर्थ-कंट्रोल विकसित हुआ, संतति-नियमन विकसित हुआ, कृत्रिम साधन विकसित हुए कि हम बच्चों से भी बच जाएं और सेक्स को भी भोग लें। बच्चों से बचने की चेष्टा हजारों साल से चल रही है। आयुर्वेद के ग्रंथों में दवाइयों का उल्लेख है, जिनको लेने से बच्चे नहीं होंगे, गर्भधारण नहीं होगा। आयुर्वेद के तीन-चार-पांच हजार साल पुराने ग्रंथ इसका विचार करते हैं। और अभी आज का आधुनिकतम स्वास्थ्य का मिनिस्टर भी इसी की बात करता है। क्यों? आदमी ने यह ईजाद करने की चेष्टा क्यों की?
बच्चे बड़े उपद्रव का कारण हो गए। वे बीच में आते हैं, जिम्मेवारियां ले आते हैं। और भी एक खतरा--बच्चों के आते से ही स्त्री परिवर्तित हो जाती है। पुरुष भी बच्चे नहीं चाहता।
नहीं होते हैं तो चाहता है, इस कारण नहीं कि बच्चों से प्रेम है, बल्कि अपनी संपत्ति से प्रेम है--कल मालिक कौन होगा? बच्चों से प्रेम नहीं है। बाप जब चाहता है कि बच्चा हो जाए एक घर में, लड़का नहीं है, तो आप यह मत सोचना कि लड़के के लिए बड़े उनके प्राण आतुर हो रहे हैं। नहीं, आतुरता यह हो रही है कि मैं रुपये कमा-कमा कर मरा जा रहा हूं, न मालूम कौन कब्जा कर लेगा! एक हकदार मेरे खून का उसको बचाने के लिए होना चाहिए।
बच्चों के लिए कोई कभी नहीं चाहता कि बच्चे आ जाएं। बच्चों से हम बचने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन बच्चे पैदा होते चले गए। हमने संभोग किया और बच्चे बीच में आ गए। वह उसके साथ जुड़ा हुआ संबंध था। यह कामजन्य संतति है। यह बाइ-प्रॉडक्ट है सेक्सुअलिटी की। और इसीलिए मनुष्य इतना रुग्ण, इतना दीन-हीन, इतना उदास, इतना चिंतित है।
ब्रह्मचर्य से भी बच्चे आएंगे। लेकिन वे बच्चे सेक्स के बाइ-प्रॉडक्ट नहीं होंगे। उन बच्चों के लिए सेक्स एक वीहिकल होगा। उन बच्चों को लाने के लिए सेक्स एक माध्यम होगा। सेक्स से कोई संबंध नहीं होगा। जैसे एक आदमी बैलगाड़ी में बैठ कर कहीं गया। उसे बैलगाड़ी से कोई मतलब है? वह हवाई जहाज में बैठ कर गया। उसे हवाई जहाज से कोई मतलब है? आप यहां से बैठ कर दिल्ली गए हवाई जहाज में। हवाई जहाज से आपको कोई भी मतलब है? कोई भी संबंध है? कोई भी नाता है? कोई नाता नहीं है। नाता है दिल्ली जाने से। हवाई जहाज सिर्फ वीहिकल है, सिर्फ माध्यम है।
ब्रह्मचर्य को जब लोग उपलब्ध हों और संभोग की यात्रा समाधि तक हो जाए, तब भी वे बच्चे चाह सकते हैं। लेकिन उन बच्चों का जन्म उत्पत्ति होगी, वे प्रॉडक्ट होंगे, वे क्रिएशन होंगे, वे सृजन होंगे। सेक्स सिर्फ माध्यम होगा। और जिस भांति अब तक यह कोशिश की गई है--इसे बहुत गौर से सुन लेना--जिस भांति अब तक यह कोशिश की गई है कि बच्चों से बच कर सेक्स को भोगा जा सके, वह नई मनुष्यता यह कोशिश कर सकती है कि सेक्स से बच कर बच्चे पैदा किए जा सकें।
मेरी आप बात समझे?
ब्रह्मचर्य अगर जगत में व्यापक हो जाए तो हम एक नई खोज करेंगे, जैसे हमने पुरानी खोज की है कि बच्चों से बचा जा सके और सेक्स का अनुभव पूरा हो जाए। इससे उलटा प्रयोग आने वाले जगत में हो सकता है, जब ब्रह्मचर्य व्यापक होगा, कि सेक्स से बचा जा सके और बच्चे हो जाएं। और यह हो सकता है, इसमें कोई भी कठिनाई नहीं है। इसमें जरा भी कठिनाई नहीं है, यह हो सकता है।
ब्रह्मचर्य से जगत के अंत होने का कोई संबंध नहीं है। जगत के अंत होने का संबंध सेक्सुअलिटी से पैदा हो गया है। तुम करते जाओ बच्चे पैदा और जगत अंत हो जाएगा। न एटम बम की जरूरत है, न हाइड्रोजन बम की जरूरत है। यह बच्चों की इतनी बड़ी तादाद, यह कतार, यह काम से उत्पन्न हुए कीड़े-मकोड़ों जैसी मनुष्यता, यह अपने आप नष्ट हो जाएगी।
ब्रह्मचर्य से तो एक और ही तरह का आदमी पैदा होगा। उसकी उम्र बहुत लंबी हो सकती है। उसकी उम्र इतनी लंबी हो सकती है, जिसकी हम कोई कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। उसका स्वास्थ्य अदभुत हो सकता है कि उसमें बीमारी पैदा न हो। उसका मस्तिष्क वैसा होगा, जैसी कभी-कभी कोई प्रतिभा दिखाई पड़ती है। उसके व्यक्तित्व में सुगंध ही और होगी, बल ही और होगा, सत्य ही और होगा, धर्म ही और होगा। वह धर्म को साथ लेकर पैदा होगा।
हम अधर्म को साथ लेकर पैदा होते हैं और अधर्म में जीते हैं और अधर्म में मरते हैं, और इसलिए दिन-रात जिंदगी भर धर्म की चर्चा करते हैं। शायद उस मनुष्यता में धर्म की कोई चर्चा नहीं होगी, क्योंकि धर्म लोगों का जीवन होगा। हम चर्चा उसी की करते हैं जो हमारा जीवन नहीं होता; जो जीवन होता है उसकी हम चर्चा नहीं करते। हम सेक्स की चर्चा नहीं करते, क्योंकि वह हमारा जीवन है। हम ईश्वर की चर्चा करते हैं, क्योंकि वह हमारा जीवन नहीं है। असल में, जिस चीज को हम जिंदगी में उपलब्ध नहीं कर पाते, बातचीत करके उसको पूरा कर लेते हैं।
आपने खयाल किया होगा, स्त्रियां पुरुषों से ज्यादा लड़ती हैं। स्त्रियां लड़ती ही रहती हैं, कुछ न कुछ खटपट पास-पड़ोस, सब तरफ चलती रहती है। कहते हैं कि दो स्त्रियां साथ-साथ बहुत देर तक शांति से बैठी रहें, यह बहुत कठिन है।
मैंने तो सुना है कि चीन में एक बार एक बड़ी प्रतियोगिता हुई और उस प्रतियोगिता में चीन के सबसे बड़े झूठ बोलने वाले लोग इकट्ठे हुए। झूठ बोलने की प्रतियोगिता थी कि कौन सबसे बड़ा झूठ बोलता है, उसको पहला पुरस्कार मिल जाएगा।
एक आदमी को पहला पुरस्कार मिल गया। और उसने यह बात बोली थी सिर्फ कि मैं एक बगीचे में गया। दो औरतें एक ही बेंच पर पांच मिनट तक चुप बैठी रहीं। और लोगों ने कहा कि इससे बड़ा झूठ कुछ भी नहीं हो सकता! यह तो अल्टीमेट अनट्रुथ हो गया। और भी बड़ी-बड़ी झूठ लोगों ने बोली थी। उन्होंने कहा, वह सब बेकार, पुरस्कार इसको दे दो। यह आदमी बाजी मार ले गया।
लेकिन कभी आपने सोचा कि स्त्रियां इतनी बातें क्यों करती हैं? पुरुष काम करते हैं, स्त्रियों के हाथ में कोई काम नहीं है। और जब काम नहीं होता तो बात होती है।
भारत इतनी बातचीत क्यों करता है? वही स्त्रियों वाला दुर्गुण है। काम कुछ भी नहीं है, बातचीत-बातचीत है।
ब्रह्मचर्य से एक नये मनुष्य का जन्म होगा, जो बातचीत करने वाला नहीं, जीने वाला होगा। वह धर्म की बात नहीं करेगा, धर्म को जीएगा। लोग भूल ही जाएंगे कि धर्म कुछ है, वह इतना स्वभाव हो सकता है। उस मनुष्य के बाबत विचार करना भी अदभुत है। वैसे कुछ मनुष्य पैदा होते रहे हैं। आकस्मिक था उनका पैदा होना।
कभी एक महावीर पैदा हो जाता है। ऐसा सुंदर आदमी पैदा हो जाता है कि अगर वह वस्त्र पहने तो उतना सुंदर न मालूम पड़े। नग्न खड़ा हो जाता है। उसके सौंदर्य की सुगंध फैल जाती है सब तरफ। लोग महावीर को देखने चले आते हैं। वह ऐसा मालूम होता है, संगमरमर की प्रतिमा हो। उसमें इतना वीर्य प्रकट होता है कि--उसका नाम तो वर्धमान था--लोग उसको महावीर कहने लगते हैं। उसके ब्रह्मचर्य का तेज इतना प्रकट होता है कि लोग अभिभूत हो जाते हैं कि वह आदमी ही और है।
कभी एक बुद्ध पैदा होता है, कभी एक क्राइस्ट पैदा होता है, कभी एक कनफ्यूशियस पैदा होता है। पूरी मनुष्य-जाति के इतिहास में दस-पच्चीस नाम हम गिन सकते हैं जो पैदा हुए हैं।
जिस दिन दुनिया में ब्रह्मचर्य से बच्चे आएंगे--और यह शब्द ही सुनना आपको अजीब लगेगा कि ब्रह्मचर्य से बच्चे! मैं एक नये ही कंसेप्ट की बात कर रहा हूं। ब्रह्मचर्य से जिस दिन बच्चे आएंगे, उस दिन सारे जगत के लोग ऐसे होंगे--ऐसे सुंदर, ऐसे शक्तिशाली, ऐसे मेधावी, ऐसे विचारशील। फिर कितनी देर होगी उन लोगों को कि वे परमात्मा को न जानें? वे परमात्मा को इसी भांति जानेंगे, जिस तरह हम रात को सोते हैं।
लेकिन जिस आदमी को नींद नहीं आती, उससे अगर कोई कहे कि मैं सिर्फ तकिए पर सिर रखता हूं और सो जाता हूं, तो वह आदमी कहेगा, यह बिलकुल गलत, झूठ बात है। मैं तो बहुत करवट बदलता हूं, उठता हूं, बैठता हूं, माला फेरता हूं, गाय-भैंस गिनता हूं; लेकिन कुछ नहीं! नींद आती नहीं। आप झूठ कहते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि तकिए पर सिर रखा और नींद आ जाए। तकिए पर सिर रखा और नींद आ जाती है? आप सरासर झूठ बोलते हैं! क्योंकि मैंने तो बहुत प्रयोग करके देख लिया; नींद तो कभी नहीं आती, रात-रात गुजर जाती है।
अमेरिका में न्यूयार्क जैसे नगरों में तीस से लेकर चालीस प्रतिशत लोग नींद की दवाएं लेकर सो रहे हैं। और अमेरिकी मनोवैज्ञानिक कहता है कि सौ वर्ष के भीतर न्यूयार्क जैसे नगर में एक भी आदमी सहज रूप से नहीं सो सकेगा, दवा लेनी ही पड़ेगी। तो यह हो सकता है कि न्यूयार्क में सौ साल बाद होगा, दो सौ साल बाद हिंदुस्तान में होगा; क्योंकि हिंदुस्तान के नेता इस बात के पीछे पड़े हैं कि हम उनका मुकाबला करके रहेंगे! हम उनसे पीछे नहीं रह सकते। वे कहते हैं कि हम उनसे पीछे नहीं रह सकते, उनकी सब बीमारियों में हम मुकाबला करके रहेंगे!
तो यह हो सकता है कि पांच सौ साल बाद सारी दुनिया के लोग नींद की दवा लेकर ही सोएं! और बच्चा जब पहली दफा पैदा हो मां के पेट से, तो वह दूध न मांगे, वह कहे--ट्रैंक्वेलाइजर! नौ महीने सो नहीं पाया तुम्हारे पेट में, ट्रैंक्वेलाइजर कहां है? तो पांच सौ साल बाद उन लोगों को यह विश्वास दिलाना कठिन होगा कि आज से पांच सौ साल पहले सारी मनुष्यता आंख बंद करती थी और सो जाती थी। वे कहेंगे, इंपासिबल! असंभव है यह बात। यह नहीं हो सकता। कैसे हो सकती है यह बात!
मैं आपसे कहता हूं, उस ब्रह्मचर्य से जो जीवन उपजेगा, उसको यह विश्वास करना कठिन हो जाएगा कि लोग चोर थे, लोग बेईमान थे, लोग हत्यारे थे, लोग आत्महत्याएं कर लेते थे, लोग जहर खाते थे, लोग शराब पीते थे, लोग छुरे भोंकते थे, लोग युद्ध करते थे। यह उनको विश्वास करना मुश्किल होगा कि यह कैसे हो सकता है?
काम से अब तक उत्पत्ति हुई है। और वह भी उस काम से जो फिजियोलाजिकल से ज्यादा नहीं है। एक आध्यात्मिक काम का जन्म हो सकता है और एक नये जीवन का प्रारंभ हो सकता है। उस नये जीवन के प्रारंभ के लिए ये थोड़ी सी बातें इन चार दिनों में मैंने आपसे कही हैं।
मेरी बातों को इतने प्रेम और इतनी शांति से--और ऐसी बातों को, जिन्हें प्रेम और शांति से सुनना बहुत मुश्किल गया होगा, बड़ी कठिनाई मालूम पड़ी होगी।
एक मित्र तो मेरे पास आए और कहने लगे कि मैं डर रहा था कि कहीं दस-बीस आदमी खड़े होकर यह न कहने लगें कि बंद करिए, यह बात नहीं होनी चाहिए!
मैंने कहा, इतने हिम्मतवर आदमी भी होते तो भी ठीक था। इतने हिम्मतवर आदमी भी कहां हैं कि किसी को कह दें कि बंद करिए यह बात! अगर इतने ही हिम्मतवर आदमी इस मुल्क में होते तो बेवकूफों की कतार, जो कुछ भी कह रही है मुल्क में, वह कभी की बंद हो गई होती। लेकिन वह बंद नहीं हो पा रही। मैंने कहा, मैं तो प्रतीक्षा करता हूं कि कभी कोई बहादुर आदमी खड़े होकर कहेगा कि बंद कर दो यह बात, उससे कुछ बात करने का मजा होगा।
तो ऐसी बातों को, जिनसे कि मित्र डरे हुए थे कि कहीं कोई खड़े होकर न कह दे, आप इतने प्रेम से सुनते रहे, आप बड़े भले आदमी हैं और जितना आपका ऋण मानूं उतना कम है। अंत में यही कामना करता हूं परमात्मा से कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर जो काम है, वह राम के मंदिर तक पहुंचाने की सीढ़ी बन सके। बहुत-बहुत धन्यवाद! और अंत में सबके भीतर बैठे हुए परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What will happen to progeny if everyone experiences samadhi and becomes established in brahmacharya?
According to Osho, even if samadhi and brahmacharya prevail, children will still be born—but not as accidental by-products of lust. Procreation becomes a conscious, purposeful act: sex is only a vehicle, guided by awareness and love. Such invited children are fewer, better cared for, and born into responsibility, easing overpopulation and transforming the quality of human life.
In simple terms: People in deep awareness would still have kids, but only on purpose and with love, not by accident.
Is a mother's love for her son considered sex or kama?
According to Osho, sex (kama) is the bodily level of relating; love moves to deeper layers—mind and, at its peak, soul. A mother’s love, if untainted by bodily desire or possessive transaction, is not sex; it is love. Only when relating is confined to the body does it become kama; otherwise it flowers beyond sex.
In simple terms: Motherly love isn’t sex unless it’s mixed with bodily desire; real love comes from deeper than the body.

Osho's Commentary
मेरे प्रिय आत्मन्!