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Questions in this Discourse
जीवन को समझने में, क्या बीज है और क्या फूल है, अक्सर भूल हो जाती है। अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, अपरिग्रह समाधि के पौधे में लगे फूल हैं। और अगर किसी ने सीधा फूलों को चाहा, तो सिर्फ बाजार से नकली फूल खरीद सकता है, और कुछ भी नहीं कर सकता।
पौधे के बिना फूल नहीं होंगे। कागज के मिल सकते हैं, प्लास्टिक के मिल सकते हैं।
गांधी जी जिसे अहिंसा कहते हैं वह मेरी दृष्टि में अहिंसा नहीं है, अत्यंत कागज की अहिंसा है। समाधि के पौधे पर वह नहीं लगी है। समझ लेना बहुत उपयोगी है, क्योंकि हमारे मन में इस तरह की बहुत भ्रांतियां हैं। इसीलिए गांधी जी की अहिंसा में हिंसा का तत्व निरंतर मौजूद है। गांधी जी अपनी अहिंसा से भी वही काम ले रहे हैं जो हिंसा से कोई लेता है।
हिंसा का मतलब है: कोएर्सन। हिंसा का मतलब है: दूसरे को दबाना। अगर मैं एक छुरा लेकर आपकी छाती पर खड़ा हो जाऊं और कहूं कि मेरी बात मानो अन्यथा तुम्हें छुरा मार दूंगा, तो यह हिंसा है। और अगर मैं छुरे की धार अपनी छाती की तरफ कर लूं और कहूं कि मेरी बात मानो अन्यथा मैं छुरा मार लूंगा, तो यह अहिंसा कैसे है?
गांधी जी के सब अनशन हिंसात्मक हैं। इसलिए गांधी जी की अहिंसा की निरंतर बातचीत के बाद भी इस मुल्क में हिंसा ही फलित हुई, अहिंसा फलित नहीं हो सकी। हिंदुस्तान भी बंटा, लाखों लोग भी मरे, और गांधी का अंत भी हिंसा में ही हुआ। अहिंसा नहीं है। लेकिन गांधी भी भ्रम में हैं और उनके भक्त भी भ्रम में हैं। अहिंसा का फूल लगता ही समाधि में है। इन दोनों बातों में बुनियादी फर्क हैं। अगर हम बाजार से अहिंसा खरीद लाएं, उसमें, कागज के फूल में और असली फूल में कुछ बुनियादी फर्क हैं।
पहला फर्क तो यह है कि जब अहिंसा समाधि से निकलती है तो हिंसा से लड़ कर नहीं निकलती। जब समाधि आती है तो हिंसा विसर्जित हो जाती है, जो शेष रह जाता है वह अहिंसा है। अहिंसा हिंसा के विपरीत नहीं है कि आप हिंसा से लड़ कर और अहिंसक हो जाएंगे। अहिंसा का मतलब है: हिंसा का अभाव। जब समाधि में आपको दिखाई पड़ता है कि मैं और तू में कोई फर्क ही नहीं है, जब समाधि में यह बोध होता है कि मैं ही हूं या तू ही है, एक ही है, तो फिर हिंसा का मार्ग नहीं रह जाता, उपाय नहीं रह जाता। किसे मारें? किसे सताएं? अपने को तो कोई सताना चाहता नहीं। मैं ही हूं, अगर यह बोध हो जाए, तो एक अहिंसा फलित होगी जो बहुत भिन्न प्रकार की होगी। उसमें हिंसा का कोई लेश भी नहीं है।
एक और तरह की अहिंसा है--झूठी, मिथ्या। वह अहिंसा ऐसी है कि हिंसा से लड़ कर उपलब्ध होती है। हिंसा है, उससे लड़ कर दबाओ और अहिंसक बनो। हिंसा को मिटाओ और अहिंसक बनो। हिंसा को दबाओ और अहिंसक बनो।
अब यह प्रक्रिया समझने जैसी है कि अगर कोई हिंसक चित्त हिंसा को दबाने की कोशिश करके अहिंसक बन जाए, तो ऊपर से अहिंसक होगा, भीतर दबी हुई हिंसा सदा शेष रह जाएगी। वह हिंसा नये-नये रूपों में निकलना शुरू होगी। उस हिंसा के बहुत नये-नये रूप होंगे। पहचानना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इसलिए ठीक सच्ची हिंसा भी बेहतर है झूठी अहिंसा की बजाय। क्योंकि धोखा बहुत है, पहचान में नहीं आता।
यह जो मेरे भीतर हिंसा है, अगर मैं इस हिंसा से लडूं, तो लड़ेगा कौन? मैं ही लडूंगा। हिंसा को दबाएगा कौन? मैं ही दबाऊंगा। मैं जो कि हिंसक हूं। मेरे दबाने में भी हिंसा होगी। मेरे हिंसा से लड़ने में भी हिंसा होगी। और मेरी वह जो हिंसा की वृत्ति है, वह जो दूसरों से लड़ती थी, अपनी ही हिंसा से लड़ कर तृप्त होने लगेगी। अपने से ही मैं लडूंगा। दूसरे से जब कोई लड़ता है तो हमें दिखाई पड़ जाता है, लेकिन जब कोई अपने से ही लड़ता है तो हमें दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन अपने से लड़ना भी उतनी ही हिंसा है जितना दूसरे से लड़ना। असल में, लड़ने में हिंसा है।
तो जो व्यक्ति नैतिक रूप से अहिंसक बनने की कोशिश करेगा, वह लड़ेगा। जो व्यक्ति चेष्टा करेगा ब्रह्मचर्य धारण करने की, वह करेगा क्या? वह सेक्स से लड़ेगा। वह दबाएगा। वह काम की वासना को भीतर दबाएगा। वह भीतर दब कर और अनकांशस, और अचेतन में बैठ जाएगी। दिन भर वह ब्रह्मचर्य से रहेगा, रात सपनों में अब्रह्मचर्य आ जाएगा।
गांधी जी कहते थे कि जागते में तो मैंने काम पर विजय पा ली है, लेकिन नींद में नहीं। नींद में सपनों में ब्रह्मचर्य खलित हो जाता है, टूट जाता है। सपने आ जाते हैं जो अब्रह्मचर्य के हैं।
आएंगे ही। उसमें गांधी का कसूर नहीं, गांधी की प्रक्रिया का कसूर है। दिन भर दबा सकते हैं आप, रात कौन दबाएगा? आप सो गए हैं, दबाने वाला सो गया है, पहरेदार सो गया है। जिसे दबाया है वह रात में बाहर निकलेगा।
इसलिए साधु-संन्यासी सोने से भी डरने लगते हैं, नींद से भी घबड़ाने लगते हैं। अब नींद जैसी निर्दोष चीज भी डराने लगती है। क्योंकि दिन भर जिसे दबाया है वह नींद में लौट आता है। वह कहीं जाता नहीं है, वह भीतर छिप जाता है। वह कहता है, अभी नहीं, मौका मिलेगा तब निकल आऊंगा। और फिर जो भीतर छिप जाता है, उसकी प्रक्रिया बड़ी छिपी हो जाती है। वह नये-नये रास्तों से दूसरों को सताने और दबाने का मार्ग खोजने लगता है।
लेकिन अच्छे रास्ते भी हैं सताने के। जिनको हम अच्छे लोग कहते हैं वे अच्छे रास्ते से सताते हैं, वे ढंग से सताते हैं। और उनका सताना इतना धार्मिक ढंग का होता है कि पकड़ना भी मुश्किल हो जाता है कि वे सता रहे हैं। अपने को भी सताते हैं, दूसरे को भी सताते हैं।
एक आदमी को भूखा मारने में हम कहेंगे हिंसा है। और खुद आदमी उपवास करके भूखा मरे तो हम कहेंगे तपश्चर्या है। आत्महिंसा तपश्चर्या हो जाती है। अपने पर हिंसा करना तपश्चर्या हो जाती है। अपने को सताना और टार्चर करना तपश्चर्या हो जाती है।
दो तरह के हिंसक लोग हैं, अंग्रेजी में दो शब्द हैं: सैडिस्ट और मैसोचिस्ट। सैडिस्ट उसे कहते हैं जो दूसरे को सताए और मैसोचिस्ट उसे कहते हैं जो अपने को सताए। आत्मपीड़क और परपीड़क, दो तरह की हिंसाएं हैं। लेकिन हम आत्मपीड़क हिंसा को अहिंसा समझ कर बैठे हुए हैं। पहचान मुश्किल हो जाती है--कि यह आत्मपीड़क हिंसा भी हिंसा ही है, और खतरनाक भी है।
अंबेदकर के खिलाफ गांधी जी ने अनशन किया था। वे कहते थे कि मेरे अनशन से दूसरे का हृदय-परिवर्तन होगा। कभी हुआ नहीं। पूरे उनके जीवन में किसी का हृदय-परिवर्तन हुआ दिखाई नहीं पड़ा। अनशन उन्होंने बहुत बार किए, हृदय-परिवर्तन किसी का भी नहीं हुआ। अंबेदकर के खिलाफ किया हुआ था। और अंबेदकर, गांधी जी मर न जाएं, इसलिए झुक कर राजी हो गया। लेकिन अंबेदकर ने पीछे कहा कि मेरा कोई हृदय-परिवर्तन नहीं हो गया है, और न मैं इस बात से राजी हो गया हूं कि गांधी जो कहते हैं वह ठीक है, मैं तो सिर्फ इस बात से झुक गया हूं कि नाहक मेरे ऊपर गांधी की हत्या का बोझ न पड़े।
गांधी आत्महत्या करने की तैयारी दिखा देते हैं जल्दी से। उसको सत्याग्रह कहेंगे। असल में कोई भी आग्रह सत्य का कभी होता ही नहीं। सब आग्रह असत्य के होते हैं। आग्रह में ही असत्य छिपा हुआ है। जब मैं कहता हूं आग्रहपूर्वक कि ऐसा तुम्हें भी करना पड़ेगा, तभी हिंसा शुरू हो जाती है। जब मैं दूसरे को कहता हूं कि ऐसा करना पड़ेगा, तभी हिंसा भीतर से आकर खड़ी हो जाती है। दूसरे को दबाने की चेष्टा ही हिंसा है।
लेकिन कोई अपने को भी दबा सकता है।
नहीं, समाधि के पहले कोई अहिंसक हो ही नहीं सकता। समाधि के पहले बस दो ही तरह के हिंसक हम हो सकते हैं--प्रकट हिंसक, अप्रकट हिंसक। लेकिन समाधि कहीं और ही ले जाती है। समाधि वहां ले जाती है जहां मैं और तू ही मिट जाता है। समाधि वहां ले जाती है जहां मन ही शून्य हो जाता है। जहां से हिंसा उठती थी वह आधार ही गिर जाता है।
ऐसा नहीं है कि हिंसा के विपरीत अहिंसा पैदा हो जाती है। नहीं, हिंसा के न रह जाने पर अहिंसा शेष रह जाती है। इसलिए अहिंसा नकारात्मक शब्द है। अहिंसा का मतलब है: जहां हिंसा नहीं है। निगेटिव है। उसका कुल इतना मतलब है कि जहां हिंसा खो गई है, वहां जो शेष रह गया है वह अहिंसा है। लेकिन हमारी प्रक्रिया उलटी है। क्रोधी आदमी अक्रोधी होने की कोशिश कर रहा है, हिंसक अहिंसक होने की कोशिश कर रहा है, चोर अचोर होने की कोशिश कर रहा है, बेईमान ईमानदार होने की कोशिश कर रहा है।
अब बेईमान ईमानदार होने की कोशिश में भी बेईमानी कर जाएगा। वह बेईमान है! हिंसक अहिंसक होने की कोशिश में ही हिंसा दिखा देगा। क्रोधी अक्रोधी होने की चेष्टा में ही क्रोध को पूरा का पूरा प्रकट कर लेगा। लेकिन पहचान मुश्किल होती है। पहचान मुश्किल होती है, क्योंकि हम इतना दबा सकते हैं अपने भीतर कि हमें खुद भी पता न रह जाए कि हमने कहां दबा दिया है। लेकिन वह मौके-बेमौके निकल सकता है।
गांधी जी निरंतर कहते थे, मेरा कोई वाद नहीं है, मेरा कोई सिद्धांत नहीं है, मैं तो... गांधीवाद जैसी कोई चीज ही नहीं है। बड़ी विनम्र बात थी, बहुत ह्युमिलिटी की बात थी। और हमें लगता था कि विनम्रता से यह बात कही जा रही है।
कराची में एक कांफ्रेंस चलती थी और गांधी जी वहां बोलते थे। वहां कम्युनिस्टों ने काले झंडे दिखाए और गांधीवाद मुर्दाबाद के नारे लगाए। तो गांधी माइक पर बैठे थे। निरंतर तो जब भी कोई कहता था गांधीवाद, तो वे कहते थे, गांधीवाद जैसी कोई चीज ही नहीं है। लेकिन उस दिन जब गांधीवाद मुर्दाबाद के लोगों ने नारे लगाए और काले झंडे दिखाए, तो उनके मुंह से एकदम निकल गया: गांधी मर सकता है, लेकिन गांधीवाद अमर है!
वह अचेतन में जो छिपा था वह प्रकट हो गया। वह कहीं भीतर कोने में दबा था, उसका पता चलना मुश्किल है। और खुद भी पता नहीं चलता हमारे मन के कोनों का कि कहां कौन सी बात छिपी होती है। वह किसी मौके पर निकल सकती है, अनगार्डेड, किसी क्षण में अगर पहरा न हो, अचानक वह निकल सकती है।
गांधी की जिंदगी को बहुत ठीक से समझ लेना जरूरी है। गांधी की जिंदगी एक बड़ा असफल प्रयोग है--महान असफल प्रयोग। प्रयोग बहुत बड़ा है। उतनी ही बड़ी असफलता भी है। और समझ लेना इसलिए जरूरी है ताकि अहिंसा के संबंध में हमारी जो भ्रांत धारणा है वह मिट जाए।
अहिंसा आप साध नहीं सकते हैं। साधेगा कौन? हिंसक अहिंसा कैसे साधेगा? हिंसक कुछ भी करेगा, उसमें हिंसा मौजूद रहेगी। हिंसक मिट जाए, विलीन हो जाए, तो शायद जो शेष रहे वह अहिंसा हो सकती है।
मैंने सुना है, एक गांव में एक आदमी था बहुत क्रोधी, और इतना क्रोधी कि उसने अपनी पत्नी को धक्का देकर कुएं में मार डाला। फिर पछताया।
क्रोधी भी पछताते हैं। सच तो यह है कि क्रोधी ही पछताते हैं। जिसने क्रोध नहीं किया वह क्यों पछताएगा? और पछतावा जो है वह क्रोध के विपरीत नहीं है। पछतावा जो है वह क्रोध पर, जहां हम शुरू किए थे क्रोध, वहीं वापस लौट जाना है, उसी स्थान पर, ताकि फिर क्रोध किया जा सके। पछतावा तरकीब है क्रोध के वापस लौटने की। अगर मैंने आपको गाली दी है तो माफी मांग आया हूं, तो अब आप सम्हल जाना, अब मैं फिर तैयारी कर रहा हूं कि पुराने संबंधों पर लौट आओ, ताकि मैं फिर गाली दे सकूं। न मुझे पता है, न आपको पता है। लेकिन हम वापस लौट रहे हैं उसी स्थिति में जहां गाली देने के पहले थे, ताकि फिर से गाली दे सकें। वहीं मैं ही लौट जाऊंगा वापस।
कोई बुद्धिमान आदमी कभी नहीं पछताता, सिवाय निर्बुद्धियों के। क्योंकि पछताने से कुछ मिटता ही नहीं है। पछताने से सिर्फ हम पुरानी स्थिति में लौट जाते हैं। फिर वही करते हैं, फिर पछताते हैं। फिर वही करते हैं, फिर पछताते हैं। जिंदगी भर वह रोग की तरह चक्कर खाता रहता है। पछताना भी क्रोध का हिस्सा है।
वह आदमी बहुत पछताया। पत्नी मर गई थी। इतना उसने सोचा भी न था। धक्का दिया था तब यह न सोचा था कि मार ही डालना है। अक्सर हम नहीं सोचते हैं कि क्या परिणाम होंगे। परिणाम हो जाते हैं तभी पता चलता है। बहुत दुखी हुआ। गांव में एक मुनि आए थे, उनके चरणों को जाकर पकड़ लिया। और उसने कहा कि मुझे बचाएं! मेरे जीवन का क्या होगा? मैं तो नरक का रास्ता तय कर रहा हूं। पत्नी को धक्का देकर मैंने मार डाला है। मैं कैसे क्रोध से मुक्त हो जाऊं?
तो साधु-संन्यासियों के पास और कोई रास्ता नहीं है, उनके पास एक ही रास्ता है। उन्होंने कहा, संसार छोड़ दो।
जैसे कि संसार छोड़ने से कोई क्रोध से मुक्त हो जाता हो। अब तक ऐसा हुआ नहीं है। संसार छोड़ने वाले लोग, अगर कभी जांच-पड़ताल की जाए, तो संसार में रहने वाले लोगों से अक्सर ज्यादा क्रोधी सिद्ध होंगे। क्योंकि यहां तो रोज-रोज क्रोध के निकल जाने के भी उपाय रहते हैं तो क्रोध इकट्ठा नहीं हो पाता, वहां मौके न होने की वजह से क्रोध इकट्ठा होता जाता है। इसलिए ऋषि-मुनियों की जो हम कथाएं पढ़ते हैं महाक्रोध की--दुर्वासा की, अभिशाप की--वे बड़ी ठीक हैं। ऋषि-मुनियों के लक्षण यही हैं। क्रोध को रोकेंगे, इकट्ठा हो जाएगा।
कहा मुनि ने कि तू त्यागी हो जा! छोड़ दे सब, संन्यासी हो जा! संसार में क्रोध से मुक्त कैसे होगा?
वह आदमी तो क्रोधी था। क्रोधी का मतलब यह है कि जो क्षण में भावाविष्ट होकर कुछ भी कर लेता है। अपनी पत्नी को धक्का दे सकता है। अपने को भी धक्का दे सकता है। उस आदमी ने वहीं कपड़े फेंक कर वह नंगा खड़ा हो गया। और उसने कहा कि मैंने छोड़ा संसार!
उस मुनि ने कहा कि तेरे जैसा संकल्पवान आदमी मैंने नहीं देखा। बहुत लोगों को मैंने समझाया कि छोड़ो। वे कहते हैं, कल छोड़ेंगे, परसों छोड़ेंगे। तू बड़ी महान आत्मा मालूम होता है!
मुनि भी न समझे कि महान आत्मा नहीं है। मुनि भी न समझे कि जो एक क्षण में पत्नी को कुएं में धक्का दे आया, वह एक क्षण में अपने को भी संन्यास में धक्का दे सकता है। क्रोध का ही रूप है वह भी। लेकिन इस क्रोध के रूप को पहचानना मुश्किल है, क्योंकि इसने बड़े सुंदर वस्त्र पहन लिए हैं।
वह आदमी संन्यासी हो गया। और मुनि के बहुत शिष्य थे, लेकिन उसके मुकाबले कोई भी न रहा। क्योंकि शिष्य अगर छाया में बैठते, तो वह सदा धूप में खड़ा होता। और शिष्य अगर दो बार भोजन करते, तो वह एक बार भोजन करता। और शिष्य अगर छह घंटे सोते, तो वह दो घंटे सोता। और शिष्य अगर बंधे हुए रास्ते पर चलते, तो वह नीचे कांटों के रास्ते पर चलता। उसकी ख्याति फैलने लगी। गुरु फीका पड़ने लगा। और उसकी तपश्चर्या की ख्याति फैलने लगी।
असल में जिसको हम तप कहते हैं, वह क्रोधी ही कर सकता है। कोई शांत चित्त आदमी उस तरह की नासमझियां नहीं कर सकता है। करने का कोई कारण नहीं है। वह आदमी था क्रोधी, लेकिन महातपस्वी हो गया। दूर-दूर तक उसकी ख्याति पहुंच गई। लोग दूर-दूर से उसके चरणों को नमस्कार करने आने लगे। और जितना आदर मिलने लगा, उतना ही उसका तप बढ़ने लगा।
तप के लिए आदर पक्का भोजन है। बिना आदर के तप नहीं बढ़ता। बढ़ ही नहीं सकता। क्योंकि तप बढ़ाने के लिए अहंकार चाहिए। और आदर अहंकार को मजबूत करता है, भरता है। कहता है, तुम हो महान। और एक आदमी को यह खयाल पैदा करा दो कि तुम हो महान, फिर उससे कोई भी मूढ़ता करवाई जा सकती है। ऐसी कोई मूढ़ता ही नहीं है जो उससे न करवाई जा सके। अहंकार फिर कुछ भी करने को राजी हो जाता है। वह सिर के बल शीर्षासन कर सकता है। वह कुछ भी कर सकता है।
वह आदमी कुछ भी करने लगा। उसकी देह सूख कर कांटा हो गई। लेकिन अब वह किसी पर क्रोध न करता था। क्योंकि क्रोध की जो ऊर्जा थी, जो शक्ति थी, वह अपने पर ही निकली जा रही थी। अपने को ही इतना सता रहा था कि अब और किसी को सताने का कोई कारण न रह गया था। सताने की जो वृत्ति है, उसकी तृप्ति हो रही थी, अपने को ही सता कर हो रही थी। सब तरह के दुख अपने को दे रहा था।
फिर वह देश की राजधानी में पहुंचा। बचपन का उसका एक मित्र उस राजधानी में रहता था। उस मित्र ने सुना कि वह महाक्रोधी मेरा साथी महातपस्वी हो गया! वह भी हैरान हुआ। उसे बड़ा विरोध दिखाई पड़ा, कि इन दोनों बातों में बड़ा विरोध है। विरोध है नहीं। जो मन के सत्य को जानते हैं वे जानते हैं कि इसमें विरोध है नहीं। महाक्रोधी ही महातपस्वी हो सकता है। लेकिन उस मित्र को बड़ा चमत्कार मालूम पड़ा कि यह कैसे हुआ है!
वह दर्शन करने गया। तपस्वी का मंच धीरे-धीरे ऊंचा होता गया था, ऊंचा होता गया था। जैसे-जैसे तप बढ़ा, वैसे-वैसे मंच के पैर बड़े होते चले गए थे। तपस्वी बड़े मंच पर बैठा था। मित्र पहुंचा, तपस्वी ने पहचान तो लिया, बचपन का साथी था, लेकिन जब क्रोध मंच पर आसीन हो जाए तो मंच के नीचे के लोगों को कभी नहीं पहचानता है। कैसे पहचाने! उस पहचानने में बड़ी हीनता है। उसमें यह खबर है कि कभी हम भी तुम्हारे जैसे ही नीचे थे, साथी थे, मित्र थे। देख तो लिया मित्र को, लेकिन पहचाना नहीं। मित्र भी समझ गया कि देख तो लिया है, पहचान भी लिया है, लेकिन पहचान नहीं रहा है। मित्र पास जाकर बैठ गया और उस मित्र ने कहा, महाराज, मैं आपका नाम जानना चाहता हूं।
मुनि ने क्रोधी होने की वजह से, और क्रोध के विपरीत दीक्षा ली थी, उसको शांतिनाथ का नाम दे दिया था। मुनि शांतिनाथ उनको नाम मिल गया था। मुनि ने नीचे आग जलती हुई आंखों से देखा और कहा, अखबार नहीं पढ़ते हो? रेडियो नहीं सुनते हो? मेरा और नाम! नाम मेरा पता नहीं है! मेरा नाम है मुनि शांतिनाथ।
लेकिन उनके कहने में ही पूरी अशांति मौजूद थी। उस मित्र ने कहा, कोई फर्क तो मालूम नहीं पड़ता, लेकिन फिर भी जगत में सब चमत्कार हो जाते हैं। मित्र थोड़ी देर चुप रहा। फिर आत्मज्ञान वगैरह की बातें चलती रहीं, जैसी कि मुनियों के पास चलती रहती हैं। फिर थोड़ी देर बाद, दो-चार मिनट बाद ही मित्र ने कहा, माफ करिए, मैं भूल गया, आपने क्या नाम बताया?
तब तो क्रोध की सीमा न रही। एक तो जानता है मुनि भलीभांति कि परिचित है, बचपन का साथी है। मुनि ने कहा, क्या कहा, सुना नहीं? बहरे हो? मेरा नाम है मुनि शांतिनाथ, ठीक से सुन लो!
फिर आत्मज्ञान की बात चलने लगी। फिर उस मित्र ने थोड़ी देर बाद कहा, माफ करिए, नाम तो मैं भूल ही गया!
तो फिर मुनि ने डंडा उठा लिया! और मुनि ने कहा, तुम ऐसे न मानोगे।
तो उसने कहा, अब पहचान गया, अब कोई कठिनाई नहीं है। मैं बड़ी दुविधा में पड़ गया था कि तुम और कैसे हो गए! अब मेरी शंका दूर हुई, समाधान हो गया। अब मैं जाता हूं। तुम वही हो, कुछ फर्क नहीं हुआ।
क्रोध क्रोध को मिटाने की कोशिश से सिर्फ दब सकता है, मिट नहीं सकता। हिंसा हिंसा को मिटाने की कोशिश में सिर्फ आत्ममुख हो सकती है, मिट नहीं सकती। ब्रह्मचर्य काम को, सेक्स को दबाने की कोशिश से सिर्फ मानसिक व्यभिचार बन सकता है, और कुछ भी नहीं हो सकता। फिर क्या रास्ता है?
रास्ता है। रास्ता यह है कि हम आमूल रूपांतरित हों, एक-एक हिस्से को बदलने की कोशिश न करें। और आमूल-रूपांतरण है समाधि। हम सिर्फ उसको जानने में लग जाएं जो हमारे भीतर गहरे से गहरे में छिपा है। हम इसकी अभी बहुत फिकर न करें कि हम कैसे कपड़े पहनते हैं, कैसा क्रोध करते हैं, कैसा भोजन करते हैं, क्या आचरण करते हैं। हम इस परिधि पर न भटकें। हम तो उसे खोजने में लग जाएं, वह जो भीतर छिपा है गहरे से गहरे में। क्रोधी के भी गहरे में जो बैठा है, हिंसक के भी गहरे में जो बैठा है, लोभी के भी गहरे में जो बैठा है, हम उसकी खोज करें। लोभी के भीतर भी परमात्मा उतना ही मौजूद है जितना निर्लोभी के भीतर; और क्रोधी के भीतर भी परमात्मा उतना ही मौजूद है जितना अक्रोधी के भीतर। परमात्मा की मौजूदगी में फर्क नहीं है। हम कैसे भी आदमी हों, हमारे भीतर वह परम ज्योति भीतर मौजूद है। हम उसकी झलक की चिंता करें, उसे हम पहचानने की चिंता करें।
समाधि उसे पहचानने का मार्ग है। और जिस दिन हम उस ज्योति को पहचान लेते हैं उसी दिन सब बदल जाता है। क्योंकि उस दिन के बाद हम वही आदमी नहीं हो सकते जो हम उसके पहले थे। क्यों? क्योंकि बड़े बुनियादी फर्क पड़ जाते हैं। एक आदमी छोटी-छोटी बात में क्रोधित होता है। क्यों? उसने कभी शांति नहीं जानी है। अगर वह एक बार शांति जान ले, तो क्रोध असंभव हो जाए।
बुद्ध एक घर में ठहरे हुए हैं, और एक आदमी ने उनके ऊपर आकर थूक दिया है। उन्होंने थूक साफ कर लिया और उस आदमी से कहा, और कुछ कहना है?
उस आदमी ने कहा, मैंने आपके ऊपर थूका है, आप क्रोधित न होंगे?
बुद्ध ने कहा, दस साल पहले आना था, तब मैं क्रोधित हुआ करता था। तुम बड़ी देर करके आए हो।
उसने कहा, अभी क्या बिगड़ा है! मैंने आपके ऊपर थूका, आप क्रोधित हो जाएं।
बुद्ध ने कहा, तुम्हारे थूक को तो मैंने चादर से पोंछ कर ही अलग कर दिया। मेरे भीतर जो अखंड शांति विराजमान हुई है, वह तुम्हारे थूकने से नहीं टूट सकती है। तुम्हारा थूकना वहां तक पहुंचता ही नहीं। तुम कुछ भी करो, तुम वहां तक नहीं पहुंचते। हां, जब मैं खुद ही वहां नहीं था और मैं भी घर के बाहर ही घूमता था, तब तुम्हारा थूक मेरे तक पहुंच जाता था। क्योंकि मैं भी घर के बाहर, तुम्हारा थूक भी घर के बाहर। अब जब से मैं भीतर गया हूं, तब से तुम्हारा थूक मुझे मीलों फासले पर पड़ा हुआ दिखाई पड़ता है, जिससे मेरा कोई लेना-देना नहीं। तुमने थूक कर नाहक मेहनत की। तुम गलत आदमी के पास आ गए। कोई ठीक आदमी खोजो।
वह आदमी बड़ी मुश्किल में पड़ गया होगा। लौट गया, रात भर सो न सका होगा। दूसरे दिन क्षमा मांगने आया। बुद्ध के पैर पर सिर रख कर रोने लगा और कहा, मुझे क्षमा कर दें।
बुद्ध ने कहा, क्षमा करूं तो मतलब होगा कि मैंने क्रोध भी किया था। क्रोध मैंने किया ही नहीं। सिर्फ दया खाई थी कि कैसे पागल हो! किसलिए थूक रहे हो! क्रोध तो किया नहीं, क्योंकि क्रोध करने का कोई कारण नहीं है, अब मैं समझ गया हूं कि दूसरे की भूल के लिए अपने को दंड देना पागलपन है। तुम थूको, मैं क्रोधित होकर आग में जलूं? मैं पागल नहीं हूं। मैं जिंदगी के गणित को समझ गया हूं। तुमने की है भूल, तुम जानो। मैं क्यों क्रोधित होऊं?
तो बुद्ध बाद में कहते थे, क्रोध करना दूसरे की भूल के लिए अपने को दंड देना है।
लेकिन यह कब दिखाई पड़े? यह तब दिखाई पड़े जब भीतर की शांति का आकाश मिल जाए। तब फिर ऐसा नहीं है कि क्रोध छोड़ना पड़े। नहीं, क्रोध छूट जाता है। ऐसे ही जैसे किसी आदमी के हाथ में रंगीन कंकड़-पत्थरों का बोझ हो, मुट्ठी बांध कर पकड़ा हो उसने, और फिर हीरों की खदान मिल जाए, और उसे पता भी न चले कि मुट्ठी कब खाली हो गई, पत्थर नीचे गिर गए और हीरे उसने भर लिए। तो क्या हम कहेंगे कि तुम बड़े त्यागी हो, तुमने पत्थर छोड़ दिए! नहीं, त्यागी तो वह तब होता जब पत्थर पक
ड़े ही रहता और हीरों की फिकर न करता। जब हीरों की खदान मिल जाए तो पत्थर छूट जाते हैं, छोड़ने नहीं पड़ते।
जब भीतर की शांति का अनुभव हो जाए तो बाहर की अशांति के उपाय छूट जाते हैं, छोड़ने नहीं पड़ते। और जब भीतर एक आनंद की किरण फूट जाए तो सेक्स से, काम से मिलने वाला सुख दुख जैसा हो जाता है, उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसलिए कोई काम के सुख को तब तक नहीं छोड़ सकता, जब तक समाधि के सुख को न पा ले। और कोई हिंसा को तब तक नहीं छोड़ सकता, जब तक कि भीतर के अद्वैत को न पा ले। और बाहर की संपत्ति के मोह को कोई तब तक नहीं छोड़ सकता, जब तक भीतर की संपदा उपलब्ध न हो जाए।
तो मैं यह कह रहा हूं कि प्रक्रिया बिलकुल उलटी है, जैसा हम सोचते हैं वैसी नहीं है। प्रक्रिया यह है कि पहले परमात्मा मिले, तो संसार छूटता है। संसार छोड़ कर कोई परमात्मा को नहीं पा सकता। संसार छोड़ कर सिर्फ मुसीबत में पड़ जाता है। परमात्मा मिलता नहीं और संसार भी छूट जाता है। उसकी हालत त्रिशंकु की हो जाती है, वह बीच में लटक जाता है। उसकी हालत बड़ी कठिनाई की हो जाती है। क्योंकि कंकड़-पत्थर भी छोड़ दिए उसने और हीरों की खदान का कोई पता नहीं है। हाथ खाली हो गए हैं। इसलिए वह भरे हाथों पर नाराज होता रहता है। जिनके हाथ भरे हैं, कंकड़-पत्थर से ही सही, वह उनको गाली देता रहता है--कि नरक जाओगे! नरक का इंतजाम कर रहे हो! करो तुम भी हाथ खाली!
वह असल में यह कह रहा है कि कहीं हमीं तो परेशानी में नहीं पड़े हैं? और लोग भी पड़ जाएं तो कम से कम आश्वासन आ जाए कि हम कुछ गलती नहीं कर रहे हैं।
कितने संन्यासियों ने मुझे एकांत में नहीं कहा है कि कई दफे ऐसा होता है कि कहीं हमने भूल तो नहीं कर ली! कई बार ऐसा मन में सवाल उठता है कि जो हम छोड़ आए हैं वह छूट भी गया, लेकिन मिला तो कुछ भी नहीं!
संन्यासी जो क्रोध दिखला रहा है संसार के ऊपर और निंदा कर रहा है, उसका मनोवैज्ञानिक कारण है। उसका कारण यह है कि यह निंदा करके वह एक सुख ले रहा है कि कोई फिकर नहीं, अगर हाथ खाली हैं तो कोई हर्ज नहीं, स्वर्ग में हमारे हाथ भरे होंगे और तुम नरक जाओगे! तो वह संसारियों को गाली दे रहा है सुबह से सांझ तक। वह उनको निंदा कर रहा है। उनको कह रहा है कि तुम पापी हो। यह पापी और निंदा करने का जो रस है उसे, वह रस इसलिए है कि यही उसके पास रस है, अब और कोई रस उसके पास नहीं है।
जिस व्यक्ति को उस आनंद की छलक मिल गई हो, वह संसारी को पापी नहीं कहेगा। जिसको उस आनंद की झलक मिल गई हो, वह संसारी के प्रति निंदा से नहीं, अत्यंत करुणा से भर जाएगा। और सोचेगा: कैसे पागल हो कि हीरे की खदान पास है और तुम कंकड़-पत्थर पकड़े बैठे हो! लेकिन वह यह भी नहीं कहेगा कि कंकड़-पत्थर छोड़ दो। वह यह कहेगा, आओ हीरे की खदान पर आ जाओ! कंकड़-पत्थर तो छूट जाएंगे। कंकड़-पत्थर किसको पकड़ सकते हैं? असली धन न मिले तो नकली धन पकड़ना पड़ता है।
लेकिन अब तक हमें अनेक बार ऐसी भ्रांति होती है कि पहले यह छोड़ना पड़ेगा। उस भ्रांति का भी मौलिक कारण है। वह भी समझ लेना चाहिए। अगर महावीर को या बुद्ध को या कृष्ण को एक आत्मिक आनंद मिला है, अगर भीतर समाधि मिली है, अगर भीतर परमात्मा का मिलन हुआ है, तो उनका भीतर तो हमें दिखाई नहीं पड़ता, उनका अंतस्तल तो हमारी आंखों की पकड़ में नहीं आता, उनको भीतर क्या हुआ है, हमें पता नहीं। उनके बाहर क्या हुआ है, वही हमें दिखाई पड़ता है। उनकी घटना घटती है पहले भीतर, फिर बाहर; और हमें दिखाई पड़ता है बाहर पहले और फिर हम भीतर का अनुमान करते हैं।
उदाहरण के लिए, महावीर ने वस्त्र छोड़ दिए, वे नग्न हो गए। उन्होंने संपत्ति छोड़ दी, घर छोड़ दिया, वे अपरिग्रही हो गए। हमें पता नहीं कि उनके भीतर क्या हुआ है। हम देखें भी कैसे? जो अपने भीतर भी नहीं देख पाते, वे महावीर के भीतर कैसे देख पाएंगे? और जो अपने ही भीतर देख लेंगे, वे महावीर की पंचायत में क्यों पड़ेंगे कि उनके भीतर देखने जाएं? हम अपने ही भीतर नहीं झांक पाते, तो महावीर के भीतर झांकना तो असंभव है। फिर हमें महावीर का बाहर दिखाई पड़ता है। दिखाई पड़ता है: महावीर नग्न खड़े हैं। दिखाई पड़ता है: महावीर घर छोड़ दिए हैं। दिखाई पड़ता है: महावीर धन छोड़ दिए हैं। दिखाई पड़ता है: महावीर हिंसा नहीं करते हैं। दिखाई पड़ता है: महावीर क्रोध नहीं करते हैं। यह सब हमें दिखाई पड़ता है। और फिर महावीर की आंखें दिखाई पड़ती हैं, और महावीर का चेहरा दिखाई पड़ता है, और उनकी अपरिसीम शांति मालूम होती है, और वे किसी अनूठे आनंद में नाचते और जीते हुए मालूम पड़ते हैं। यह सब दिखाई पड़ता है। तो हम सोचते हैं शायद हम भी कपड़ा छोड़ दें, घर छोड़ दें, धन छोड़ दें, ऐसी ही शांति हमें भी मिल जाए।
उलटी हो गई बात। वैसी शांति मिली, इसलिए वे घर छोड़ सके। हम घर छोड़ेंगे, सोचते हैं वैसी शांति मिल जाए। उलटा हो गया। एकदम उलटा हो गया। यह ऐसा हो गया जैसे गेहूं को बोएं हम तो भूसा पैदा हो जाता है, लेकिन कोई आदमी भूसे को बो दे तो फिर गेहूं पैदा नहीं हो जाता। गेहूं के साथ भूसा अपने आप पैदा होता है, लेकिन भूसे के साथ गेहूं पैदा नहीं होता। अगर आप भूसे को बो दें खेत में तो भूसा ही खराब हो जाएगा बोया हुआ, गेहूं नहीं आएगा। भूसा भी नहीं आएगा। कुछ भी नहीं आएगा।
तो महावीर का भूसा दिखाई पड़ता है, गेहूं दिखाई नहीं पड़ता। बाहर जो लिपटा हुआ है वह दिखाई पड़ता है। हम भी भूसा बोने में लग जाते हैं। ये जो हमारे तपस्वी, साधक जिनको हम कहते हैं, इनमें सौ में से निन्यानबे आदमी भूसा बोते रहते हैं। फिर बड़ी मुश्किल में पड़ जाते हैं। न गेहूं पैदा होता, न भूसा पैदा होता। जो पास में था वह भी चला जाता है। तब वे सारी दुनिया पर क्रोध करने लगते हैं। और तब फिर अपने मन को समझाने के लिए वे कई उपाय खोज लेते हैं। कोई खोज लेता है कि शायद हमारी पात्रता नहीं है। अब भूसा बोएंगे, तो कौन सी पात्रता से गेहूं पैदा होगा? कौन है पात्र जो भूसा बो कर और गेहूं पैदा कर ले? लेकिन वे कहेंगे, हमारी पात्रता नहीं है, अधिकार नहीं है। वे कहेंगे, शायद पिछले जन्मों के कर्म बाधा डाल रहे हैं। यह तो जन्मों-जन्मों के कर्मों का मामला है। या वे और तरह के लोग होंगे तो कहेंगे, जब भगवान की कृपा होगी, उसकी बिना कृपा के कुछ भी नहीं होता।
भगवान की कृपा से भी अभी तक भूसे से गेहूं पैदा नहीं हुआ। और आगे भी आशा नहीं है कि भगवान कुछ ऐसी कृपा करे। और जिस दिन ऐसी कृपा करेगा, तो दिमाग उसका खराब हो गया, समझ लेना पड़े।
नहीं, भूसे से गेहूं पैदा होता ही नहीं। वह नियम ही नहीं है। लेकिन भूसा दिखाई पड़ता है पहले, और इससे सारी भ्रांति हो जाती है। हम सभी, जो लोग सत्य की किरण को उपलब्ध होते हैं, उनके बाहर घूम आते हैं, चारों तरफ देख आते हैं।
अभी मैं एक गांव में मेहमान था। उस गांव का कलेक्टर आया, उसने कहा, एकांत में बात करनी है। कलेक्टर, पढ़ा-लिखा आदमी! अंदर आया, दरवाजा अटका दिया, मुझसे बोला कि आपसे दो-चार-पांच सवाल पूछने हैं। पहला तो यह कि अगर मैं भी आप जैसी चादर ओढ़ने लगूं तो कुछ शांति मिलेगी?
अब एक पढ़ा-लिखा आदमी! एक गांव का ग्रामीण पूछे तो क्षमा योग्य। एक कलेक्टर पूछे कि ऐसे कपड़े मैं पहन लूं तो शांति मिलेगी?
मैंने कहा, थोड़ी-बहुत शांति होगी तो वह भी खो जाएगी। क्योंकि इन कपड़ों में तुम मुसीबत में पड़ जाओगे। पर इन कपड़ों से कोई संबंध ही नहीं है।
तो उसने कहा, अपनी दिनचर्या बताइए। कब आप उठते हैं? तो मैं भी वैसी दिनचर्या बना लूं।
अब कब उठने से क्या संबंध है! जो नौ बजे सुबह उठेगा उसको ब्रह्मज्ञान नहीं होगा? जो पांच बजे सुबह उठेगा उसी को ब्रह्मज्ञान होगा? बचकानी बातें हैं। नौ बजे उठने से अगर ब्रह्मज्ञान में बाधा पड़ती हो, तो ब्रह्मज्ञान बहुत कमजोर चीज है। और बहुत सस्ती चीज है, क्योंकि जो पांच बजे उठता है उसे मिल जाता है, जो नौ बजे उठता है उसे नहीं मिलता।
नहीं, उन्होंने कहा कि आप मजाक मत करिए।
मैंने कहा, मैं मजाक नहीं कर रहा हूं।
आप क्या भोजन में लेते हैं, मुझे सब नोट करवा दीजिए।
अब भोजन से क्या संबंध है! क्या खाते हैं, क्या पीते हैं, क्या पहनते हैं, कैसे उठते हैं, इसी को हम देख पाते हैं। इसी को देख कर हम पकड़ लेते हैं। और फिर उस ढांचे को अपने ऊपर बिठालते हैं। उस ढांचे को हम कहते हैं यम, नियम, व्रत, और न मालूम क्या-क्या हम कहते हैं। उस ढांचे को हम बिठाल लेते हैं अपने ऊपर। और फिर उस ढांचे में हम फंस जाते हैं। क्योंकि जिनसे हमने ढांचा सीखा उनके लिए वह कैद न थी, उनके भीतर से कुछ आया था और बाहर फैल गया था। और हमारे भीतर से कुछ भी नहीं आया है, बाहर से हम ले आए हैं और एक ढांचा बना लिया है। अब हम फंस गए उस ढांचे में।
इसलिए आमतौर से व्रत-उपवास करने वाला व्यक्ति एकदम गुलाम वृत्ति का मालूम पड़ेगा। एकदम स्लेव मेंटलिटी का होगा, दिमागी रूप से बिलकुल गुलाम होगा। उसके पास बुद्धि जैसी चीज भी नहीं होगी। उसके पास कोई चमक भी न होगी प्रतिभा की। वह एकदम थर्ड रेट होगा। हो ही जाएगा। क्योंकि वह जो काम कर रहा है वह उसे तृतीय श्रेणी में डाल देता है। वह ढांचा बना रहा है। और वह ढांचे से सोच रहा है सब हो जाएगा।
इसी तरह दुनिया के सारे व्रत, सारे रिचुअल, सारे क्रियाकांड पैदा हुए हैं।
मैंने सुना है, एक घर में ऐसा हुआ। रात एक पति घर वापस लौटा, थका था, बहुत दूर से यात्रा करके आया था। बिस्तर पर लेट गया, उसने अपनी पत्नी से कहा, बहुत प्यास लगी है, पानी ले आ। वह पत्नी पानी लेने गई, लेकर लौटी, तब तक पति की नींद लग गई थी। तो उस पत्नी ने सोचा कि पता नहीं, प्यास तो बहुत लगी थी, थके भी हैं, न मालूम कब नींद खुले, और मेरी नींद लगी हो तो शायद फिर वे मुझे कष्ट न दें। तो वह वहीं खड़ी रही, कि जब नींद खुले, मैं पानी पिला कर सो जाऊं। नींद सुबह तक न खुली। वह रात भर खड़ी रही। सुबह जब पति ने आंख खोली, तो उसने देखा। उसने कहा, पागल, तू यह क्या कर रही है? तू यहां किसलिए खड़ी है? वह तो भूल भी गया था।
उसने कहा, आप भूल गए। याद किया था पानी के लिए, मैं लेने गई तब तक आप सो गए। फिर मैंने सोचा, पता नहीं कब नींद खुले, कब पानी की जरूरत पड़ जाए। तो मैं खड़ी रही। जब जरूरत हो, पानी देकर, फिर सो जाऊं। फिर नींद नहीं खुली, तो मैं रुकी रही।
पति ने कहा, तू कैसी पागल है!
लेकिन यह बात गांव भर में फैल गई। राजा के कानों तक पहुंच गई। राजा सांझ को मिलने आया। और उसने कहा, उस स्त्री के मैं दर्शन करना चाहता हूं। वह जो रात भर खड़ी रही। क्योंकि ऐसी स्त्रियां तो हैं जो पति को रात भर खड़ा रखें, लेकिन ऐसी स्त्रियां कहां हैं जो रात भर खड़ी रहें! यह स्त्री कौन है, मैं दर्शन करने आया हूं। और जब राजा दर्शन करने आया तो पूरा गांव आ गया। किसी ने फूल चढ़ाए, किसी ने भेंट दी, राजा एक बहुमूल्य हीरों का हार दे गया। और उसने कहा कि अगर ऐसा भी प्रेम अभी है, तो कुछ आशा बंधती है।
पड़ोस की स्त्रियों को आग लग गई। पड़ोस की स्त्रियों को काम ही कुछ नहीं है सिवाय आग लग जाने के। पड़ोस की स्त्रियों ने कहा, इसमें बात ही क्या बड़ी है! पड़ोस की एक स्त्री ने अपने पति से कहा, इसमें है ही क्या, अरे एक रात क्या, हम दस रात खड़े रहें! और आज ध्यान रखो, सांझ जब आओ तो जरा देर से आना, थके-मांदे आना। आते ही से बिस्तर पर लेट जाना और एकदम से कहना, बहुत प्यास लगी है। मैं जब पानी लेकर आऊं तो ध्यान रखें, आंख बंद करके सो जाना। फिर मैं रात भर खड़ी रहूंगी। फिर सुबह अफवाह फैला देंगे। और जब इतनी सी बात पर इतना बहुमूल्य हार मिल गया, तो हम क्यों चूकें!
पति जैसे साधारणतः आज्ञाकारी होते हैं, वह भी पति आज्ञाकारी था। उसने आज्ञा मानी। सांझ को थका-मांदा लौटा। थका-मांदा तो नहीं था, लेकिन थका-मांदा प्रकट किया। बाहर से ऐसा आचरण किया, एकदम घर आकर सांस लेने लगा जोर से, बिस्तर पर लेट गया। कहा, बड़े जोर की प्यास लगी है। प्यास का कोई पता ही न था। पत्नी ने कहा, रुको, मैं अभी पानी ले आती हूं। पत्नी भीतर गई, पानी भर कर लाई। अभी कोई नींद पति को आ नहीं रही थी, लेकिन आंख बंद करके सो जाना पड़ा। रिचुअल, क्रियाकांड जिसको कहते हैं। आंख बंद करके पति सो गया। पत्नी थोड़ी देर खड़ी रही, फिर उसने कहा कि रात भर देखने वाला भी कौन है! सुबह-सुबह फिर खड़ी हो जाऊंगी। अफवाह ही तो उड़ानी है। और ठीक ही सोचा। रिचुअल का दिमाग जो है, वह तो चूंकि चालाकी कर रहा है, धोखा दे रहा है, वह यह सोचेगा, यह बिलकुल ही उसी तर्कसरणी का हिस्सा है। ठीक ही है, जब इतना धोखा दिया जा रहा है कि प्यास न लगी हो तो प्यास लग आए; थका न हो आदमी, थका हो जाए; नींद न आई हो, नींद लग जाए; तो उस पत्नी ने सोचा, जब इतना ही सब चल रहा है, तो मैं काहे के लिए रात भर खड़ी रहूं! गिलास रख कर वह भी सो गई। सुबह, उसने कहा, जल्दी उठ कर वापस खड़े हो जाएंगे। मोहल्ले में खबर कर देंगे।
अब पति, सुबह हो गई है, पति बार-बार आंख खोल कर देखता है, पत्नी वहां नहीं है, वह बेचारा वापस आंख बंद कर लेता है। क्योंकि नियम, यम-नियम का वह पालन कर रहा है। फिर आखिर बड़ी देर होने लगी, धूप उठने लगी ऊपर, मोहल्ले के सारे लोग उठ गए। उसने चिल्ला कर कहा, क्या कर रही है, जल्दी आकर खड़ी हो, नहीं तो अफवाह कैसे उड़ेगी!
अफवाह भी उन्होंने उड़ा दी। लेकिन सम्राट नहीं आया। गांव से कोई नहीं आया। तब तो वह स्त्री बहुत क्रोध से भर गई। सांझ वह सम्राट के द्वार पर पहुंच गई। और उसने कहा, यह अन्याय हो रहा है। जब एक का ऐसा सम्मान हो, और वही काम हम भी करें, हमारा सम्मान न हो! आप कैसे सम्राट हैं?
तो उस सम्राट ने कहा, पागल, उसने सम्मान के लिए नहीं किया था। हो गया था। तूने सम्मान के लिए ही किया है। इसलिए सब झूठा हो गया है। और वह मेरे द्वार नहीं आई थी, मैं उसके द्वार पर गया था। तू मेरे ही द्वार आ गई है!
महावीर को, बुद्ध को, कृष्ण को, किसी को, क्राइस्ट को, हुआ है, वे समाधि में डूबे हैं, अहिंसा हुई है, प्रेम हुआ है, करुणा हुई है। यह उनका प्रयास नहीं है। और हम? हम साध रहे हैं। अहिंसा साध रहे हैं। बैठे हैं सुबह से चरखा कात रहे हैं, अहिंसा साध रहे हैं। अब सधी हुई अहिंसा बड़ी खतरनाक है। क्योंकि सधी हुई अहिंसा का मतलब--झूठी अहिंसा। कल्टीवेट नहीं किया जा सकता कुछ भी। जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है वह हैपनिंग की तरह होता है, उसे आप साध नहीं सकते।
तो यह जो मैंने कहा, मैं नहीं कहता हूं कि आप पहले अहिंसक हों, फिर समाधि में जा सकते हैं। मैं नहीं कहता कि पहले ब्रह्मचर्य साधें, फिर समाधि सधेगी। हां, इतना मैं जरूर कहता हूं कि समाधि में डूबें। और समाधि कोई साधने की बात नहीं है। अपने भीतर निरंतर जो मौजूद है, उसकी तरफ आंख ही उठानी है। उसकी तरफ आंख भर उठ जाए, वह मौजूद ही है। वह हमारी संपदा ही है। उसकी तरफ आंख उठ जाए तो आप पाएंगे कि जीवन अहिंसक हो गया है; आप पाएंगे कि ब्रह्मचर्य फलित हुआ है; आप पाएंगे कि अपरिग्रह आ गया है। इनको लाना नहीं पड़ेगा।
और जब ब्रह्मचर्य आता है तब सेक्स से बिलकुल अनकंटेमिनेटेड होता है। और जब लाया जाता है तब सेक्स उसमें पूरी तरह रग-रग में भरा होता है। जब ब्रह्मचर्य आता है तो उस ब्रह्मचर्य को सेक्स का पता ही नहीं रह जाता कि सेक्स भी कुछ है। क्योंकि उससे कोई लेना-देना ही नहीं है। और जब अहिंसा आती है तो उसमें हिंसा का कोई रत्ती हिस्सा भी नहीं रह जाता। और जब प्रेम आता है तो उसमें घृणा की कोई रूपरेखा नहीं रह जाती। तभी तो वह निर्दोष फलित होता है। समाधि उसका बीज है, आधार है। फूल खिलेंगे।
इसलिए मैं व्रत, नियम के पक्ष में नहीं हूं। ठीक-ठीक विपक्ष में हूं, विरोध में हूं। भूल कर व्रत मत साधना, अन्यथा जीवन में जो सहज आ सकता है वह कभी नहीं आएगा। भूल कर क्रियाकांड को ऊपर से मत थोप लेना, अन्यथा भीतर का जो आविर्भाव है वह सदा के लिए प्रतीक्षा करता रह जाएगा। अहिंसक मत होना, अगर अहिंसक होना हो। और ब्रह्मचारी मत बनना, अगर ब्रह्मचर्य को आने देना हो। अपनी चेष्टा से मत थोपना। हां, एक ही बात जो मुझे लगती है कि करने जैसी है, और वह है कि मैं कौन हूं, इसे मैं जान लूं। और इसे करने के लिए कुछ कहीं से लाना नहीं है। यह मैं हूं ही।
एक आदमी पिछले महायुद्ध में गिर पड़ा, चोट खा गया। चोट खाने से उसकी स्मृति खो गई और उसे याद न रहा कि मैं कौन हूं। लेकिन उसका नंबर तो था। नंबर मिल जाता अगर तो रजिस्टर से पता चल जाता कि यह आदमी कौन है। लेकिन नंबर भी कहीं युद्ध के मैदान पर गिर गया। और तब बड़ी मुश्किल हो गई कि यह है कौन? और वह तो बताने में असमर्थ हो गया। उससे जब कोई पूछता, तुम कौन हो? तो वह खुद ही पूछता कि यही तो मैं पूछना चाहता हूं कि मैं कौन हूं?
युद्ध खतम हो गया, उस सैनिक को रिटायरमेंट मिल गया, क्योंकि उसकी स्मृति नहीं लौटी। लेकिन उसने कहा, मैं जाऊं कहां? आप मुझे मुक्त कर रहे हैं सेवा से, बड़ी कृपा, लेकिन मैं जाऊं कहां? मैं हूं कौन? मेरी पत्नी कहां? मेरे बेटे कहां? मेरे पिता कहां? मेरा गांव कहां है? मेरा घर कहां है? तो सारे अधिकारी इंग्लैंड के मुश्किल में पड़ गए कि इसे भेजें कहां? यह बात तो ठीक ही है। यह आदमी जाए कहां? इसको रखना भी संभव नहीं रहा, क्योंकि इसको रख कर भी क्या करें। इसकी सारी स्मृति खो गई है। फिर किसी ने सलाह दी कि इसे, कोई बड़ा मुल्क तो है नहीं इंग्लैंड, इसे ट्रेन में घुमाया जाए, हर स्टेशन पर इसको उतारा जाए, शायद कोई स्टेशन इसकी अपनी हो और खयाल में आ जाए।
उसे ले गए। उसे जगह-जगह उतार कर खड़ा कर देते। वह देखता, उसको कुछ याद न आता। लेकिन एक गांव के, छोटे से गांव पर, ट्रेन रुकी भी नहीं, और उसने तख्ती देखी एक गांव की, और उसने कहा कि अरे, यह नाम पहचाना हुआ मालूम पड़ता है! चेन खींच कर उसे उतारा। वह तो दौड़ना शुरू कर दिया। वह तो अंदर प्लेटफार्म के भीतर गया। वेटिंग रूम में गया। और उसने कहा, मेरा गांव! और वह तो भागा। और जो उसको लाए थे साथ, वे पीछे भागे। उससे कहा भी कि रुको भी तो! पर वह रुकने वाला नहीं था। वह तो भागा, वह गली-कूचों में चक्कर लगाते हुए--वह उसका गांव था जहां वह पैदा हुआ था, स्मृति वापस लौट आई थी--वह अपने घर के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसने तख्ती पढ़ी और उसने कहा, अरे, यह तो मेरा नाम है! वह भीतर चला गया। वह अपनी मां के पैरों लग गया। वह अपनी पत्नी को गले लगा लिया। उसके मित्र जो पीछे उसके आए थे, वे कहने लगे, यही है न? उसने कहा, अब पूछो ही मत, अब बात ही मत करो। अब आप जाओ, यह बात खतम हो गई।
क्या हुआ क्या था इस आदमी को? इस आदमी की स्मृति खो गई थी। स्मृति इसकी लौट आई। जिसे मैं समाधि कह रहा हूं, वह आपको बहुत से स्टेशनों पर घुमाना है--अंधेरे में, अकेले में, मरने में--ये स्टेशंस हैं जहां आपको घुमाने के लिए कह रहा हूं। यहां घूमें, शायद कहीं वह तख्ती दिखाई पड़ जाए--यह रहा मेरा घर! और आप भीतर चले जाएं और उससे मिलना हो जाए जो निरंतर वहां प्रतीक्षा कर रहा है। एक बार यह हो जाए तो आप दूसरे आदमी वापस लौटेंगे।
समाधिस्थ व्यक्ति का लक्षण है अहिंसा, पहचान है।
समाधिस्थ व्यक्ति का लक्षण है ब्रह्मचर्य, पहचान है। साधना नहीं है।
समाधिस्थ व्यक्ति का लक्षण है अपरिग्रह। साधना नहीं है।
बुद्ध को हुआ ज्ञान, लोगों ने पूछा, क्या मिला? तो बुद्ध ने कहा, मिला कुछ भी नहीं, जो मिला ही हुआ था उसका पता चल गया है। मिला ही हुआ था, जिसे कभी खोया ही नहीं था, वही मिल गया है।
तो जो लाभ के हिसाब में है उसे तो वह मिलना चाहिए जो कभी न मिला हो। तो समाधि इस अर्थ में प्रॉफिटेबल नहीं है, लाभदायक नहीं है। वहां वही मिलेगा जो मिला ही हुआ है।
लक्ष्य क्या है? कुछ, जीवन में जो महत्वपूर्ण है, वह सदा लक्ष्यहीन होता है, परपजलेस होता है। जब किसी को प्रेम किया है, तो पूछा था: प्रेम का लक्ष्य क्या है? नहीं, तब आप कहेंगे, प्रेम अपना ही लक्ष्य है। जब आप आनंदित हो उठते हैं, तब पूछा है: आनंद का लक्ष्य क्या है? किसलिए आनंदित होऊं? नहीं, तब आप बस आनंदित हो जाते हैं और कभी नहीं पूछते कि आनंद का लक्ष्य क्या है। कभी नहीं पूछते कि मैं पहले पता लगा लूं कि आनंदित होने से लाभ क्या होगा, तब मैं आनंदित होऊंगा। बस आनंदित होने के लिए सदा तैयार हैं। और आनंद का लक्ष्य क्या है? आनंद लक्ष्यहीन है। प्रेम भी लक्ष्यहीन है। और परमात्मा तो बिलकुल ही लक्ष्यशून्य है। जिसे कहीं नहीं जाना है वही परमात्मा है। जिसे कहीं नहीं पहुंचना है वही परमात्मा है। जो वहां सदा पहुंचा ही हुआ है जहां पहुंचने की आकांक्षा हो, वही परमात्मा है। समाधि उसका द्वार है।
तो अगर अभी लक्ष्य की दौड़ हो, तो थोड़े दिन लक्ष्य में ही दौड़ लेना, समाधि की फिकर मत करना। क्यों? क्योंकि लक्ष्य में दौड़ कर पता चलता है कि सब लक्ष्य व्यर्थ हैं। अगर अभी लाभ की इच्छा हो तो लाभ ही कर लेना, जल्दी कोई भी नहीं है। और परमात्मा अंतहीन प्रतीक्षा करता है कि कोई जल्दी नहीं है। और थोड़ा खेलो, और थोड़ा खेलो, और इस जन्म खेलो, जितनी देर खेलना हो खेलते रहो, कोई जल्दी नहीं है। वहां कोई जल्दी नहीं है, क्योंकि समय की वहां कोई कमी नहीं है। कोई लिमिटेड टाइम हो, तो परमात्मा कहे कि पांच बज गए, अब सांझ हुई जाती है, अब आ जाओ। वहां न सांझ होती है, न पांच बजते हैं। अंतहीन इटरनिटी जहां है, समय शून्य है जहां, वहां कैसी जल्दी? वहां कैसी हड़बड़? वह प्रतीक्षा करता है, वह प्रतीक्षा करता है।
सुनी है मैंने एक कहानी। एक ऋषि बहुत खोज करता है ईश्वर की। और खोज इसलिए करता है कि ईश्वर से मिल कर उसे पूछना है कि यह क्या है राज इस सारे संसार का? फिर एक दिन गरीब परमात्मा उसे मिल जाता है। बड़ी मुश्किल से मिलता है।
गरीब इसलिए कह रहा हूं कि वह बचता रहता है ऐसे आदमी से। क्योंकि आदमी मिल जाए तो झंझट खड़ी करता है। फौरन शंका-समाधान शुरू कर देता है कि यह शंका है, यह शंका है। वह इसी शंकाओं से बच कर तो छिपा हुआ है सब तरफ। कि जब तुम्हारी सब शंकाएं खतम हो जाएं तब तुम आना कृपा करके, उसके पहले मत आना। लक्ष्य क्या है जीवन का? क्यों बनाया जीवन? जब तुम्हारा कोई लक्ष्य न रह जाए तब आ जाना, तब झंझट न होगी, चुपचाप बैठ सकेंगे, बातचीत न होगी।
वह आदमी, ऋषि पहुंच गया है। उसने जाकर परमात्मा को पकड़ लिया और उसने कहा कि इस संसार का क्या रहस्य है? यह क्या चल रहा है? यह क्या खेल हो रहा है? यह मेरी कुछ समझ में नहीं आता।
उस परमात्मा ने कहा, मुझे बड़े जोर की प्यास लगी है। देखते नहीं दुपहरी है और धूप तेज पड़ रही है! एक गिलास पानी कहीं से ले आओ, फिर पीछे मैं तुम्हें बताऊं।
वह ऋषि पानी लेने गया। वह एक झोपड़े पर पहुंचा है, ब्राह्मण का घर है, पिता बाहर गया है, लड़की है जवान, वह पानी लेकर बाहर आई है, ऋषि मोहित हो गए। अब ऋषि सदा से ही मोहित होते रहे हैं। क्योंकि ऋषि जिससे लड़ते हैं उसका भीतर राग बना रहता है। अब स्त्री से ही लड़ते-लड़ते वे ऋषि हुए होंगे। अब जब एक स्त्री आ गई है तो वह लड़ाई क्षण भर में खो गई है, और उन्होंने तो निवेदन कर दिया है कि मैं विवाह करना चाहता हूं। पिता आया है, पिता ने देखा कि ऐसा योग्य, स्वस्थ, सुंदर, साधुपुरुष मिल गया है, इससे अच्छा क्या है! विवाह हो गया। लेकिन वह गरीब परमात्मा उधर प्यासा बैठा है, वह वे ऋषि भूल गए। विवाह हो गया; उनके बच्चे हो गए हैं, और बूढ़े हो गए हैं, और बच्चों की शादियां हो रही हैं, और बच्चों के बच्चे हो गए हैं, और बहुत समय व्यतीत हो गया। और उधर वह गरीब परमात्मा राह देख रहा है कि वे पानी लेकर आते होंगे।
फिर जब बूढ़े हो गए हैं, तो बहुत जोर की बाढ़ आई है, वर्षा है और घनघोर पानी गिरा है। बाढ़ आ गई है, सारा गांव डूब रहा है। तो ऋषि अपनी पत्नी, अपने बच्चों और उनके बच्चों को सम्हाल कर बाढ़ से बचने की कोशिश करते हैं। एक को बचाते हैं, दूसरा बह जाता है; एक बच्चे को बचाते हैं, बच्ची छूट जाती है; बच्ची को बचाने जाते हैं, पत्नी छूट जाती है। उस बाढ़ में सभी बह जाते हैं, ऋषि भर किसी तरह तट पर थके-मांदे गिर पड़ते हैं, बेहोश हो जाते हैं। आंख खुलती है तो परमात्मा खड़ा है। वह कह रहा है, पानी नहीं लाए? बड़ी देर लगा दी। पानी कहां है? मैं प्यासा बैठा हुआ हूं।
तो वे ऋषि बहुत घबड़ा जाते हैं। वे कहते हैं, पानी कहां है! अभी तो बाढ़ ही बाढ़ थी, पानी ही पानी था! मेरी पत्नी भी खो गई, मेरे बच्चे भी खो गए।
पर वे देखते हैं कि सूरज वहीं खड़ा है जहां छोड़ गए थे, जब पानी लेने गए थे। धूप उतनी ही तेज है, वही जगह है। तो वे कहते हैं, बड़ी मुश्किल में पड़ गया। लेकिन इतनी देर तो बहुत कुछ हो गया। इतनी देर तो मेरे बच्चे हो गए थे, बच्चों के बच्चे हो गए थे, उनकी शादी-विवाह का इंतजाम करना था। और बाढ़ आ गई थी, और सब गड़बड़ हो गया। और आप अभी यहीं बैठे हैं! और आप कह रहे हैं पानी? अभी तक आप पानी नहीं खोज पाए?
परमात्मा ने कहा, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा ही कर रहा हूं। मैं सदा प्रतीक्षा करता रहता हूं।
वह ऋषि कहता है, लेकिन इतना हो गया सब!
तो वे परमात्मा उससे कहते हैं कि वह सब समय के भीतर हो जाता है। लेकिन समय के बाहर कुछ पता नहीं चलता। समय के बाहर कुछ पत्ता भी नहीं हिलता है। वहां अनंत प्रतीक्षा है।
तो जल्दी क्या है? अभी आप जाएं पानी खोजने, जाएं किसी की कुटी पर, करें विवाह, बच्चे आने दें, शादी-विवाह करें, सब होने दें। जब बाढ़ आ जाए...और बाढ़ आती है, जब सब डूब जाता है। बाढ़ जरूर आती है। जब जिंदगी में जो हमने कमाया, वह सब डूबता लगता है। जिंदगी में जो चाहा, खोता लगता है। जिंदगी में जो बचाया, वह जाता लगता है। बाढ़ आ जाती है। और जब बाढ़ आती है और जब सब बह जाता है, और आखिर में आप ही बचते हैं, और सब बह जाता है, सब! और जब तट पर खड़े रह जाते हैं और आंख खोलते हैं, तो वह निकट है सदा, वह प्रतीक्षा कर रहा है। वह कहेगा, ले आए पानी?
मैं नहीं कहता हूं कि आप समाधि के लिए कोई लोभ से जाएं। लोभ से कोई समाधि में नहीं जा सकता। लाभ की दृष्टि से कोई नहीं जा सकता। समाधि को लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता। समाधि में जाने की आतुरता उनमें पैदा होती है जिन्हें सब लक्ष्य व्यर्थ दिखाई पड़ने लगते हैं। जिन्हें सब लाभ और हानियां बराबर होने लगती हैं, जिन्हें जिंदगी में हार और जीत समान दिखाई पड़ने लगती हैं, जिन्हें सुख और दुख में कोई फर्क नहीं रह जाता, जिन्हें जन्म और मृत्यु एक सी दिखाई पड़ने लगती है।
तो जाएं जिंदगी में, जल्दी नहीं है कोई। खोजें, खोजें, और परेशान हो जाएं और थक जाएं। और जिस दिन थकेंगे, बाढ़ आ जाएगी, लौट आएंगे उस किनारे पर। लेकिन जो आ गए हों उस किनारे पर, वे समाधि की खोज में लग जाएं। समाधि का कोई लक्ष्य नहीं है। समाधि से कुछ मिलता नहीं, खो बहुत कुछ जाता है। खुद ही खो जाते हैं।
लेकिन तब हमारा मन कहेगा: फिर, फिर हम किसलिए खोजें?
मत खोजें! खोजें जहां ठीक लगता है वहां! लेकिन कहीं भी खोजें, सब खोज व्यर्थ हो जाएगी! अंततः एक ही खोज सार्थक हो सकती है, और वह खोज अपनी खोज है। लेकिन वह लाभ-हानि के बाहर है। किसी चीज को तो बाजार के बाहर रहने दें। किसी चीज को तो कम से कम बाजार के मूल्यों के बाहर रखें। किसी चीज को तो कम से कम कमोडिटी न बनाएं, जो बाजार में बिकती हो, हानि होता हो और लाभ होता हो। कम से कम अपने को तो बाजार में सामान की तरह खड़ा न करें। एक चीज को तो छोड़ दें बाजार के बाहर। जब बाजार से थक जाएं, तब आ जाना। और थकने का उपाय यह है कि बाजार में जरा जोर से दौड़ लें; जितनी तेजी हो सके, ताकत से दौड़ लें, थक जाएं।
संसार से जो थक जाते हैं, संसार की व्यर्थता जिन्हें दिखाई पड़ जाती है, संसार जिनके लिए कोई अर्थ नहीं रख पाता, वे फिर भीतर की यात्रा पर लौटते हैं। वे ही केवल भीतर की यात्रा पर लौटते हैं। लेकिन तब सवाल नहीं उठता कि लाभ क्या है? क्योंकि सब लाभ वे देख चुके। कोई लाभ लाभ सिद्ध न हुआ। तब वे यह नहीं पूछते हैं कि लक्ष्य क्या है? तब सब लक्ष्य खोज चुके और कोई लक्ष्य मिला नहीं। मिला भी, तो मिल कर भी पाया कि उसमें कुछ है नहीं। तब वे यह नहीं पूछते कि फायदा क्या है? पाएंगे क्या? वे कुछ पूछते ही नहीं। वे कहते हैं, अब तो हम उस जगह होना चाहते हैं जहां कोई लक्ष्य न हो, लाभ न हो, हानि न हो, सुख न हो, दुख न हो, पाना न हो, खोना न हो, आना न हो, जाना न हो, अब हम उस जगह होना चाहते हैं जहां कुछ भी न हो।
और आश्चर्य तो यह है कि जहां कुछ भी नहीं है वहीं सब कुछ का वास है। लेकिन वह तो पहुंच कर पता चलेगा। वह किसी के कहने से नहीं। क्योंकि किसी के कहने से अगर पता चला, तो आप उसको भी एक लक्ष्य बना लेंगे: अच्छा तो फिर ठीक है, सब कुछ को पाने के लिए चलते हैं।
आप खाली हो जाएं, इतना आपका काम। भरेगा वह, वह उसका काम। हमारा काम इतना है कि हम घर का द्वार खोल दें। सूरज को गठरी बांध कर भीतर थोड़े ही लाया जा सकता है। द्वार खोल दें, फिर सूरज निकलेगा, आ जाएगा, घर में उसकी किरणें भर जाएंगी। सिर्फ द्वार खुला हो। ऐसा न हो कि सूरज आए और द्वार बंद हो, तो भी सूरज भीतर न आएगा। बड़े शिष्ट हैं--सूरज, प्रकाश, परमात्मा--बड़ा शिष्टाचार निभाते हैं। अगर जरा ही दरवाजा अटका है, तो वे बाहर ही खड़े रहेंगे। वे खटखटाएंगे तक न। वे न कहेंगे कि खोलो। वे कहेंगे, जब खोलोगे तब आ जाएंगे। अभी खड़े हैं, प्रतीक्षा करते रहेंगे।
जिस दिन हम अपने को शून्य कर लेते हैं उस दिन हम पूर्ण को उतारने का स्थान बना लेते हैं। वर्षा होती है पहाड़ों पर भी, झीलों पर भी। पहाड़ खाली रह जाते हैं, क्योंकि पहले से ही भरे हैं। झीलें भर जाती हैं, क्योंकि खाली हैं। झील यानी गड्ढा। जो खाली है वह भर जाता है। पहाड़ यानी भरे हुए, पहले से ही भरे हुए। वर्षा तो होती है, लेकिन सब नीचे उतर जाती है, पहाड़ पर टिकती नहीं। क्योंकि जो पहले से भरा है, वहां जगह नहीं है, वहां टिकेगी कैसे?
अगर हम शून्य हो पाएं, तो हम पूर्ण को पाने के अधिकारी हो जाते हैं। हमारी तरफ से सिर्फ शून्य हो जाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करना है। धर्म शून्यता है और परिणाम पूर्णता है। शून्य द्वार है, पूर्ण उपलब्धि है। लेकिन इसे लाभ-हानि की भाषा में सोचना ही मत। परमात्मा को पाने की भाषा में भी मत सोचना। अन्यथा परमात्मा इस भाषा से भी रुक जाएगा। पाने की भाषा वहां काम नहीं करती, वहां खोने की भाषा काम करती है।
मैंने सुना है, एक समुद्रतट पर बड़ी भीड़ है, बड़ा मेला लगा है, और कुछ लोग सोचने लगे तट पर बैठ कर कि गहराई कितनी है समुद्र की? तट पर बैठ कर सोचने लगे! बुद्धिमान जिनको हम कहते हैं, वे तट पर बैठ कर सोचते हैं: गहराई कितनी है समुद्र की?
अब तट पर बैठ कर कैसे पता चलेगा कि गहराई कितनी है समुद्र की? विवाद चल पड़ा! किसी ने वेद खोल लिया। किसी ने कुरान खोल ली। किसी ने कहा, बाइबिल में लिखा है, इतनी फीट है। और किसी ने कहा, वेद कहते हैं कि इतनी मील है, और वेद कभी गलत नहीं हो सकते। और किसी ने कहा, क्या रखा है वेद में और बाइबिल में! कुरान बिलकुल सच्चा है, वह कहता है, इतनी गहराई है। और बड़ा विवाद, बड़ा शोरगुल मच गया। बड़े लड़ाई-झगड़े शुरू हो गए। सब किताबों वाले अंततः लड़ाई-झगड़े पर उतर जाते हैं। जिसने किताब पकड़ी, उसने लड़ने की तैयारी शुरू की। जिसने कहा कि यह ठीक है, उसने किसी को कहा कि वह गलत है। उपद्रव शुरू हुआ। वह बहुत उपद्रव होने लगा। तट पर बड़ी मुश्किल हो गई।
दो नमक के पुतले भी भूल से पहुंच गए थे उस मेले में। उन्होंने कहा, बड़ी मुश्किल है। लेकिन ये लोग तट पर बैठ कर ही लड़ाई-झगड़ा करते हैं। कोई उतर क्यों नहीं जाता? कोई कूद क्यों नहीं जाता? एक नमक के पुतले ने कहा, ठहरो! थोड़ा विवाद बंद करो, मैं अभी कूद कर पता लगा आता हूं। वह नमक का पुतला था, हिम्मत जुटा सका, क्योंकि समुद्र का बेटा था, कूदने में डर न लगा उसे। कूद गया। भीतर जाने लगा, खुश होने लगा, गहराई का पता चलने लगा। लेकिन जैसे-जैसे गहरा गया, वैसे-वैसे पिघला और खोया। फिर पहुंच गया, लेकिन जब पहुंच कर उसने देखा, कि मिल गई गहराई, अपने को खोजा तो खुद नहीं था। गहराई तो मिल गई थी, लेकिन पुतला पिघल गया था। अब बड़ी मुश्किल में पड़ गया। अब उसने कहा, खबर कैसे दें? वे तट पर बैठे लोग फिर विवाद करने लगे होंगे, वे फिर लड़ रहे होंगे कि कुरान सही, कि वेद सही, कि उपनिषद सही! कि कौन सही, कि कौन गलत! और मुझे पता चल गया, लेकिन अब मैं नहीं हूं, जाऊं कैसे?
थोड़ी देर तो किताबों वालों ने देखा। उन्होंने कहा, देख लिए बहुत से समुद्र में जाने वाले, कोई कभी नहीं लौटता। हम तो अपनी किताब के सहारे ही जीएंगे। वह फिर उन्होंने किताबों में झगड़े शुरू कर दिए। उसके दूसरे पुतले ने कहा, ठहरो, मैं जरा अपने मित्र को खोज लाऊं। कहां खो गया मेरा मित्र! वह दूसरा पुतला भी कूद गया। वह पहुंचने लगा मित्र के करीब। लेकिन मित्र बड़ी नई शक्ल में था। मित्र समुद्र ही हो गया था। जगह-जगह मित्र की आवाज सुनाई पड़ने लगी, जगह-जगह मित्र की सुगंध आने लगी, लेकिन दिखाई नहीं पड़ता है। मित्र कहां है? वह तो सागर ही हो गया है।
लेकिन जैसे-जैसे-जैसे-जैसे मित्र का पता चलने लगा, मित्र का पता चलने लगा, आखिर पता चल गया, चल गया पता कि मित्र सागर हो गया, लेकिन तब तक वह खुद ही सागर हो गया था। तब वे बड़ी मुश्किल में पड़ गए। अब वे लौट कर कैसे खबर दें!
फिर मेला उजड़ गया। लोग अपनी किताबें लेकर घर वापस चले गए। कुछ अदल-बदल भी हो गई। कोई दूसरे की किताब ले गया, किसी ने इसकी किताब बदल ली। लड़ाई-झगड़े में हो ही गया कुछ। कोई किसी से राजी हो गया, कोई किसी से नाराज हो गया। लेकिन किताबें लेकर लोग वापस चले गए। कोई बाइबिल लेकर आया था, गीता लेकर चला गया। कोई गीता लेकर आया था, कुरान लेकर चला गया। अदल-बदल वहां हुई, लेकिन किताबें हाथ में थीं सो हाथ में रहीं, हाथ खाली लेकर कोई न गया।
हर साल वहां मेला फिर भर जाता है। और हर साल लोग पूछते हैं कि वे पुतले तो नहीं लौटे! अब वे पुतले सागर की गहराई में भी हैं, सागर की लहरों पर भी हैं। वे भी सुनते हैं कि वे किताबों वाले कह रहे हैं कि पुतले तो नहीं लौटे! लेकिन बड़ी मुश्किल है। वे लोग सिर्फ किताबों की भाषा समझते हैं। पुतले चिल्लाते भी हैं सागर की लहरों से, लेकिन सागर की लहरों की भाषा वे नहीं समझते। जो सागर की गहराई में न गया हो, वह सागर की भाषा कैसे समझे? वे बहुत चिल्लाते हैं कि सुनो हमारी तरफ, यह रहा सागर, आओ, कूद जाओ, मिल जाओ, एक हो जाओ, जान लो। लेकिन वे अपनी किताबों में उलझे रहते हैं। बल्कि कोई-कोई तो कहता है: सागर बड़ा शोरगुल मचाता है, किताबों के पढ़ने में बड़ी बाधा पड़ती है। यह दुष्ट सागर शोरगुल ही मचाए चला जाता है। हम इतनी ऊंची बातें कर रहे हैं, और यह सागर नाहक ही चिल्लाए चला जाता है। और वे पुतले बड़े हैरान हैं। वे कहते हैं कि हमें भेजा था, हम खो भी गए, हमने जान भी लिया, अब हम चिल्ला रहे हैं। लेकिन हमारी और उनकी भाषा में फर्क पड़ गया। हम सागर की गहराई की भाषा बोलते हैं, वे तट के किनारे की भाषा बोलते हैं। तट की भाषा और सागर की भाषा में कहां संबंध है?
समाधि है सागर की गहराई में जाना। इसलिए बहुत कठिनाई भी है। क्योंकि वहां जो भाषा चलती है, वह आपके तट पर नहीं चलती है। और वहां से जब चिल्लाओ तो आपकी समझ में कम आता है, नासमझी ज्यादा हो जाती है। न चिल्लाओ तो भी नहीं बनता, क्योंकि तट पर बैठे हुए लोग दिखाई पड़ते हैं कि वे विवाद कर रहे हैं। वे कह रहे हैं, सागर की गहराई कितनी है?
जानना होगा गहराई को, तो गहराई होकर ही जाना जा सकता है। इसलिए मुझसे मत पूछें कि क्या मिलेगा। जब संसार में कुछ मिलता हुआ दिखाई न पड़े और मन घर की तरफ लौटने लगे, और बाजार व्यर्थ हो जाए और अंतर्यात्रा शुरू हो जाए, तो पहुंच जाना और जान लेना, वह सदा प्रतीक्षा कर रहा है। जब भी आप जाएंगे तो वह यह न कहेगा कि बड़ी देर लगा दी। वह कहेगा, आओ, आ जाओ। जो जब भी आ जाए तभी वहां स्वीकृत है।
कुछ और प्रश्न रह गए, कल सुबह उनकी बात कर लेंगे। लेकिन जिन्हें गहराई में जाना है, वे सांझ, रात के प्रयोग में आ जाएं। तट पर कब तक खड़े रहेंगे? सागर बहुत दिन से बुलाता है!
मेरी बातों को इतनी शांति और प्रेम से सुना, उससे अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What is the significance of vows like ahimsa, satya, asteya, brahmacharya, and aparigraha?
According to Osho, vows like ahimsa, satya, asteya, brahmacharya, and aparigraha are not seeds but flowers—the effortless fragrances that bloom from samadhi. Practiced as moral willpower, they become counterfeit, repressive, even subtly violent. When awareness awakens and the sense of separation dissolves, coercion drops by itself: truth, nonviolence, chastity, non-stealing, and non-possessiveness arise naturally. Therefore, cultivate samadhi; virtues will follow organically.
In simple terms: Grow the root of meditation (samadhi) and the fruits—kindness, honesty, restraint, and simplicity—appear on their own; forcing them first only makes fake plastic fruits.
What is the relationship between emptiness and samadhi?
According to Osho, samadhi is not achieved by effort but happens when you become utterly empty—a zero. Emptiness is the open space in which the Whole descends; fullness is the natural outcome. Your task is only to open the door by dropping ego, desires, and the language of gaining. When nothing of you occupies the inner house, consciousness floods in and samadhi flowers.
In simple terms: Empty your inside completely, and then true peace (samadhi) arrives on its own.
What are the benefits of practicing samadhi?
According to Osho, samadhi offers no “profit” or new acquisition; it reveals what has always been yours. It is goalless, like love and joy, and serves as the door to the divine where time is null. Its fruit is freedom from profit-seeking and goal-chasing, a settledness in the ever-present, already-attained truth.
In simple terms: Samadhi doesn’t give you something new; it helps you realize you’re already complete and rest quietly instead of chasing goals.

Osho's Commentary
मेरे प्रिय आत्मन्!