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Questions in this Discourse
ओशो, सिवाय ध्यान के आपकी हर बात को मैंने सहजता से स्वीकार नहीं किया--संन्यास भी, कपड़े भी और माला भी। हर बात पर मैंने विरोध किया, विद्रोह किया और अवज्ञा भी। बार-बार भागने को चाहा, और हर बार और ज्यादा खिंचता चला आया। फिर भी मुझ अपात्र को आपने स्वीकार किया। आज आपके प्रेम में डूबा जा रहा हूं। भीतर न कोई विरोध है, न विद्रोह; सब शांत और मौन है। फिर भी एक अपराध-भाव सताता है। प्रभु, आप जीते, मैं हारा। मुझे माफ कर दें। आपकी असीम अनुकंपा के लिए अनुगृहीत हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें!
संदेह तुम्हें सजग रखता है, ताकि श्रद्धा गलत जगह न हो जाए। संदेह तुम्हें चेताए रखता है। संदेह सेवक है, रक्षक है। नहीं तो श्रद्धा तो शायद ही हो, अंधश्रद्धा होगी। संदेह तुम्हारी श्रद्धा को अंधा नहीं होने देता। संदेह तुम्हारी श्रद्धा की आंखों को काजल देता रहता है, उनकी धूल पोंछता रहता है।
इसलिए मेरे हिसाब में, संदेह से कोई दुश्मनी नहीं है। संदेह के कारण भूल कर भी कोई अपने को अपराधी न समझे। यद्यपि तुम्हारे धर्मगुरु तुम्हें यही समझाते हैं कि संदेह किया तो भटक जाओगे। मैं तुमसे कहता हूं: जी भर कर संदेह करो। जब तक संदेह कर सकते हो, जरूर करो। जब संदेह अपने से गिर जाए और श्रद्धा आविर्भूत हो, तो वह आंख वाली श्रद्धा है।
अंधी श्रद्धा परमात्मा तक नहीं ले जा सकती। अंधा क्या खाक परमात्मा तक जाएगा! अंधा जमीन पर नहीं चल सकता, आकाश में क्या उड़ेगा! अंधे को तो हर क्षण पूछना होता है किसी और से। और इसलिए पंडित-पुरोहित चाहते हैं कि तुम अंधे रहो। यही तो उनके व्यवसाय का राज है। तुम अंधे रहो तो पुरोहित का मूल्य है। तुम्हारे पास आंख हो तो पुरोहित की क्या आवश्यकता है? तुम्हारी आंख ही पर्याप्त होगी। पूछने की जरूरत न होगी। तुम अपना रास्ता खुद खोज लोगे। तुम अपने दीये स्वयं बन जाओगे।
पंडित समझाता है, पुरोहित समझाता है, धर्म के ठेकेदार समझाते हैं। फिर वे हिंदू हों या मुसलमान, या जैन, या बौद्ध, इससे फर्क नहीं पड़ता। दुकानों के नाम अलग हैं, सामान एक ही बिकता है। लेबल अलग होंगे, मार्के अलग होंगे, डिब्बे अलग होंगे; मगर भीतर जो वस्तु तुम्हें मिलती है, वह एक ही है। कहीं से खरीद लो, वही जहर है। अलग-अलग फैक्टरियों में बना होगा, अलग हाथों से बना होगा, रंग अलग होंगे, मगर ढंग अलग नहीं हैं।
सच्ची श्रद्धा संदेह से भयभीत नहीं होती, संदेह को अंगीकार करती है। संदेह के कारण श्रद्धा की तलवार पर धार लगती है। श्रद्धा संदेह का भी उपयोग करने में समर्थ है--इतनी बलवान है, इतनी आत्मवान है! संदेह से भयभीत नहीं है। संदेह को आत्मसात कर लेती है।
संदेह ऐसे है, जैसे बीज को चारों तरफ घेर कर खोल होती है। खोल बीज की दुश्मन नहीं है, उसकी रक्षक है। जब तक ठीक भूमि न मिल जाएगी, खोल उसे बचाएगी। जब ठीक भूमि मिल जाएगी तो खोल गल जाएगी और बीज में से अंकुर का जन्म हो जाएगा। उस अंकुर को धन्यवाद देना चाहिए खोल के लिए। न होती खोल तो यह अंकुर न मालूम कहां कंकड़ों-पत्थरों में कहां निकल आता और मर जाता! ऐसा ही संदेह है। वह शरीर-रक्षक है श्रद्धा का।
मैं तुम्हें यह बार-बार स्मरण दिला देना चाहता हूं कि मेरे पास जो लोग आए हैं, मैं उन्हें अंधश्रद्धालु की तरह नहीं निर्मित हुआ देखना चाहता हूं। अंधे श्रद्धालुओं से तो पृथ्वी भरी है; उन्हीं से तो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे भरे हैं। वे ही तो गिरजों में हैं, सिनागॉग में हैं, चैत्यालयों में हैं। उन्हीं अंधों की तो भीड़ है। और फिर अंधों को अंधे चलाने वाले मिल जाते हैं। अंधे पहचानें भी कैसे कि जो हमें मार्गदर्शन दे रहा है वह भी अंधा है!
नानक ने कहा है: अंधा अंधा ठेलिया! अंधे अंधों को ठेल रहे हैं। और कबीर ने कहा है: दोई कूप पड़ंत। गिरेंगे ही कुएं में, आज नहीं कल।
संदेह को सजग रखो! क्योंकि मेरा भरोसा इस बात में है कि अगर कहीं सत्य है तो संदेह कितनी देर टिकेगा? सत्य के समक्ष टिक नहीं सकता। अगर आग सच्ची है तो संदेह जलेगा, राख हो जाएगा। आग ही झूठी हो तो संदेह को नहीं जला पाएगी। तो संदेह ही आग को बुझा देगा। जो संदेह श्रद्धा को मिटा दे, वह दो कौड़ी की है, नपुंसक है। संदेह सशक्त चाहिए, बलवान चाहिए। लड़े आखिर तक, जूझे आखिर तक। हां, और जब पाए कि सत्य के सामने हारना ही होगा, तो हारे।
जब तक तुम नहीं कह सको, जरूर नहीं कहे जाओ। तुम्हारे नहीं कहने से ही एक दिन हां का आविर्भाव होगा। जो कभी नास्तिक नहीं रहा, उसकी आस्तिकता का मुझे बहुत भरोसा नहीं है। जिसने कभी ईश्वर को इनकार नहीं किया, जिसने कभी धर्मशास्त्रों को दुत्कारा नहीं, जिसने कभी मंदिरों की तरफ पीठ नहीं की, उस आदमी का मंदिर की तरफ मुख करना भी बहुत मूल्य नहीं रखता है। वह गोबर-गणेश है। उसे जहां बिठाल दिया, वहीं बैठ गया। मां-बाप ने जहां पहुंचा दिया, वहीं पहुंच गया। परिवार ने, परंपरा ने जहां धक्का दे दिया, वहीं चला गया। उसकी न कोई अपनी बुद्धि है, न अपना कोई विचार है, न अपना कोई विवेक है।
ऐसे गोबर-गणेशों के कारण ही तो पृथ्वी पर धर्म का आविर्भाव नहीं हो पाया। कितने धार्मिक लोग हैं, मगर धर्म कहां? धर्म की जलती हुई ज्वालाएं कहां? अगर धर्म हो तो पृथ्वी पर आनंद हो, धर्म हो तो पृथ्वी स्वर्ग बने।
पृथ्वी नरक बन गई है। और इतने धार्मिक लोग हैं और इन्हीं सबकी कृपा से नरक बन गई है। ये धार्मिक लोग लचर-पचर हैं। इनकी धार्मिकता में कोई बल नहीं है। ये मुर्दे हैं। इन्होंने कभी नास्तिक होने की हिम्मत नहीं जुटाई। इनकी आस्तिकता कैसी आस्तिकता! इनके ऊपर-ऊपर आस्तिकता है, लिपी-पुती, और भीतर अभी भी संदेह है। दबा दिया है, खूब गहरा दबा दिया है। दूसरों से ही नहीं छिपाया, अपने से भी छिपा लिया है।
मगर तुम कभी जरा अपने भीतर तलाशना--सच में तुम ईश्वर पर भरोसा करते हो? सच में? डरना मत। खोजबीन करना, तलाशना, थोड़ा कुरेदना। और तुम पाओगे: यद्यपि तुम पूजा भी करते हो, पाठ भी करते हो, मंदिर भी जाते हो, मगर कहीं भीतर संदेह अभी भी जी रहा है; कहीं भीतर कोई कह रहा है कि पता नहीं, ईश्वर हो भी कि न हो! पता नहीं परलोक है भी या नहीं! कोई लौट कर तो आता नहीं। कौन जाने यह सिर्फ पंडित-पुरोहितों की ईजाद हो! यह चालबाजों की चालबाजी हो! यह आदमी के शोषण की व्यवस्था हो! कौन जाने, यह भी राजनीति का एक खेल हो धर्म की आड़ में! तुम भी अपने भीतर संदेह को जागा हुआ पाओगे, चाहे तुम्हारी आस्तिकता कितनी ही हो।
इसलिए मैं तो चाहता हूं कि आनंद किरण, जो तुम्हारे जीवन में हुआ है, वह जैसा होना चाहिए वैसा ही हुआ है। मेरे प्रत्येक संन्यासी को ऐसे ही विकसित होना है। लड़ो! इनकार करो! बगावत करो! विद्रोह करो! मैं तुम पर कुछ भी थोपना नहीं चाहता। मुझसे जूझो! अगर अपने गुरु से न जूझोगे तो किससे जूझोगे? अगर अपने गुरु से भी विवाद न कर सके तो किससे विवाद करोगे?
लेकिन तुम कमजोर गुरुओं के साथ जीए हो। वे कहते हैं: विवाद नहीं करना। हम जो कहें, वह मानो। जैसा कहें, वैसा मानो। संदेह किया तो नरक में सड़ोगे। वे तुम्हें डरवाते हैं: अगर संदेह किया तो भटक जाओगे! वे खुद डरे हुए हैं कि तुम्हारा संदेह कहीं उनके भीतर संदेह पैदा न करवा दे! क्योंकि उनके भीतर भी संदेह है, प्रज्वलित है, दबा पड़ा है, राह देख रहा है, प्रतीक्षा कर रहा है। कोई मौका आ जाए, कोई चुनौती मिल जाए तो उनके भीतर भी संदेह है। वे तुमसे नहीं डर रहे हैं, अपने संदेह से डर रहे हैं। वे सुनना नहीं चाहते संदेह की बात। वे भागते हैं संदेह से। वे कहते हैं: संदेह दुश्मन है।
मैं तुमसे कहना चाहता हूं: संदेह परम मित्र है। परमात्मा ने संदेह बनाया ही न होता, अगर वह दुश्मन होता। परमात्मा तुम्हारा दुश्मन बनाएगा? और इतना गहरा बिठाएगा? असंभव! परमात्मा ने तुम्हें संदेह दिया है, प्रत्येक बच्चे को संदेह दिया है। यह जरा मजे की बात है, सोचना। हर बच्चा संदेह लेकर पैदा होता है। बच्चे कितने प्रश्न पूछते हैं! कितने प्रश्न उठाते हैं! बड़े-बूढ़े उनको दबाते हैं कि नहीं, प्रश्न मत पूछो। हम जो कहते हैं, मानो। बड़े होओगे, तब तुम भी जान लोगे। और मैं तुमसे कहता हूं कि बड़े होकर तुम भी यही अपने बच्चों से कहने लगते हो। न तुम्हारे बाप-दादों ने जाना, न तुम जानते हो।
मेरे गांव में मेरे पिता के एक मित्र थे--ब्राह्मण थे, पंडित थे, वैद्य थे। और गांव के सत्संगियों का अड्डा उनके घर पर था। शायद ही कोई महात्मा हो भारत का जो उनके घर आकर मेहमान न हुआ हो। चूंकि वे मेरे पिता के मित्र थे, मैं उन्हें दादा कहता था। उनके घर जाता था। वैसे वे मुझे कभी नहीं रोकते थे, लेकिन जब उनके घर कोई महात्मा आता, वे खबर भिजवा देते कि अभी दो-चार दिन मेरी तरफ मत आना। आना ही मत! इस गैल ही मत निकलना!
मैं कोई ऐसे रुकने वाला नहीं था। उनकी खबर मिलते ही पहुंच जाता कि ऐसे कैसे हो सकता है? महात्मा आएं और मैं सत्संग में न आऊं! वे अपना सिर ठोंक लेते। वे कहते: तुमको लाख दफे समझा दिया कि जब घर में महात्मा हों, तब कभी मत आना। क्योंकि तुम ऐसी बातें उठा देते हो कि बेचैनी हो जाती है, झगड़ा-झांसा खड़ा करवा देते हो।
उनके घर पर ही सबसे पहले मेरी करपात्री महाराज से टक्कर हुई। उनके घर पर ही पुरी के शंकराचार्य से मेरी टक्कर हुई। उनके घर पर ही न मालूम कितने महात्माओं से! मगर जब उनके घर कोई महात्मा होता तो मैं भी अड्डा वहीं जमा देता। मैं भी कहता कि नहीं दादा, सत्संग होगा। वे मेरे हाथ जोड़ते। वे मुझे समझाते कि भैया तू घर जा, और कहीं सत्संग कर, अभी नहीं। जब महात्मा चले जाएं, फिर तू मुझसे जितना चाहे सत्संग कर लेना।
और वे मुझसे बार-बार कहते, जैसे उनके महात्मा कहते कि जब बड़े होओगे, तब समझोगे। मैंने उनसे पूछा कि बड़ा मैं कब होऊंगा, यह आप बता दो, ठीक-ठीक तारीख-तिथि। क्योंकि इसका कोई हिसाब नहीं। मैं जब पूछता हूं तभी आप कहते हो। पांच साल हो गए मुझे कहते, पांच साल में कुछ बड़ा हुआ कि नहीं? अभी तक कुछ समझ में मेरे आया नहीं। कब बड़ा हो जाऊंगा?
मैं उनसे पूछता ही रहा, पूछता ही रहा। जब वे मरणशय्या पर पड़े थे, मैं विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो गया था। खबर मिली तो मैं भागा गांव गया। मैंने मरणशय्या पर उनको जाकर हिलाया। बिलकुल मर रहे थे, आखिरी समय था। आंखें खोलीं। मैंने कहा कि अब तक मैं बड़ा हुआ कि नहीं, यह तो बता जाओ! क्योंकि मैंने जो-जो प्रश्न पूछे हैं, उनका कोई उत्तर अभी तक नहीं मिला।
मरते वक्त आदमी में एक ईमानदारी आ जाती है, जिंदगी भर के धोखे टूट जाते हैं। जिंदगी ही टूट गई तो जिंदगी भर के धोखे टूट जाते हैं। उनकी आंख में दो आंसू टपक गए। उन्होंने कहा कि आज झूठ न बोल सकूंगा। वह सब झूठ था जो मैं तुमसे कहता था कि बड़े होओगे, समझ जाओगे। बड़े होकर मैं भी नहीं समझा। तुम भी नहीं समझोगे। बड़े होने से कोई समझ का सवाल नहीं है। वह तो सिर्फ तुम्हें हम टालते थे। तुम प्रश्न ऐसे उलटे-सीधे उठाते थे कि आखिर हमें भी तो आत्मरक्षा का अधिकार है! हम अपनी आत्मरक्षा के लिए टालते थे।
और मैंने कहा: तुम्हारे महात्मा भी यही कहते थे कि बड़े हो जाओगे, तब समझ लोगे।
वे मुस्कुराए। उन्होंने कहा कि न उनको पता है। सबने विश्वास कर लिया है।
हम विश्वास से जी रहे हैं। हमें कोई पता नहीं है। हमने अपने बाप-दादों से मान लिया था। उन्होंने अपने बाप-दादों से मान लिया था। ऐसे हम माने चले जा रहे हैं। हमने सोचा नहीं, खोजा नहीं। हमने खोज के लायक हिम्मत ही नहीं की।
खोज के लिए साहस चाहिए, आनंद किरण। अच्छा हुआ कि तुम मेरी बातों को सहजता से नहीं मान सके। मान लेते तो चूक होती। मान लेते तो अपराध होता। तुमने नहीं माना, अच्छा किया। अगर बात में कोई बल है तो आज नहीं कल मानोगे, स्वीकारोगे। और तब वह संदेह का दमन नहीं होगी, श्रद्धा का जन्म होगी। और इन दोनों में जमीन-आसमान का भेद है। संदेह के दमन से तुम जैसे हो वैसे के ही वैसे होते हो। श्रद्धा के जन्म से तुम्हारे जीवन में क्रांति हो जाती है। श्रद्धा तुम्हारी भीतर की आंख है--हृदय की आंख!
तुम कहते हो: ‘सिवाय ध्यान के आपकी हर बात को मैंने सहजता से स्वीकार नहीं किया।’
ध्यान को भी तुमने इसीलिए स्वीकार कर लिया होगा कि वह शब्द पुराना है। हालांकि ध्यान के नाम से जो मैं करवा रहा हूं, वह ध्यान के नाम से कभी करवाया नहीं गया।
अब तुमने बात ही उठा दी तो सच्ची बात बता दूं। नाम ही पुराना है। नहीं तो ध्यान के नाम से एकाग्रता करवाई जाती रही है। तुम्हारी किताबों में ध्यान का अर्थ लिखा होता है: एकाग्रता। मेरी दृष्टि में, ध्यान और एकाग्रता बड़ी भिन्न बातें हैं; भिन्न ही नहीं, विपरीत। एकाग्रता होती है मन की और ध्यान है मन से मुक्ति। एकाग्रता तो एक तरह का विचार ही है--एक विचार, उस पर ही टिक कर बैठ गए। और ध्यान है निर्विचार। न एक, न दो, न अनेक। विचार ही नहीं। एकाग्रता में चेष्टा है, श्रम है, तनाव है। इसलिए एकाग्रचित्त होकर बैठने की कोशिश करोगे, जल्दी थक जाओगे।
ध्यान विश्राम है, विराम है। अपने भीतर मौज में डूबना है, मस्ती में डोलना है। कोई जबरदस्ती एकाग्रता नहीं थोपनी है। एकाग्रता में कोई विषय होता है। साधारणतः मन चंचल है। एक विषय से दूसरे विषय पर छलांग लगाता रहता है। एकाग्रता में एक ही विषय पर छलांग लगाता है, उसी पर कूदता है। जैसे कोई एक ही जमीन पर खड़ा हुआ वहीं-वहीं कूदे। कोई दौड़े, यह मन। और कोई एक ही जगह खड़े होकर उछल-कूद करता रहे, यह एकाग्रता। और कोई न दौड़े और न उछले-कूदे, लेट ही जाए आराम से, उसे मैं ध्यान कहता हूं। उछल-कूद ही गई।
मेरे ध्यान की बड़ी अपनी अनुभूति है, अपनी प्रतीति है। लेकिन शब्द पुराना है। मुझसे लोग आकर पूछते हैं कि ध्यान किस पर करना? स्वभावतः, क्योंकि उनके लिए ध्यान का अर्थ होता है एकाग्रता। वे पूछते हैं: एकाग्रता किस पर करनी है? राम पर करें? कृष्ण पर करें? महावीर पर करें? बुद्ध पर करें? जपुजी पर करें? गायत्री मंत्र पढ़ें? क्या करें? ओंकार का जाप करें? नमोकार मंत्र? एकाग्रता किस पर? ध्यान किसका?
मैं उनसे कहता हूं: जब तक किसका रहे तो जानना कि ध्यान नहीं। जब गायत्री भी गई, जपुजी भी गया। इसीलिए तो नानक ने कहा है: अजपा। अजपा का मतलब होता है, वहां जपुजी कैसे बचेगा, जरा सोचो! अजपा में जपुजी कैसे बचेगा? अजपा का मतलब ही हुआ कि जपने को ही कुछ न बचा। जप ही गया। जपुजी भी गए! वह जपुजी भी मन की ही बात है। वह भी मन का ही खेल है। कोई आदमी गालियां दे रहा है, कोई आदमी गीत गा रहा है, कोई भजन कर रहा है--ये सब मन के ही खेल हैं। एक गालियां दे रहा है, एक गीत गा रहा है, एक भजन कर रहा है--ये शब्द भी एक ही हैं। इनसे गालियां भी बन जाती हैं, गीत भी बन जाते हैं, भजन भी बन जाते हैं। मगर यह सब मन का ही जाल है। मन के जाल के बाहर हो जाना--अमनी दशा--उसका नाम ध्यान है।
तुम कहते हो: ‘ध्यान के सिवाय आपकी और किसी बात को मैंने सहजता से स्वीकार नहीं किया।’
अच्छा किया। ध्यान को भी सहजता से स्वीकार न करते तो अच्छा ही था। सहजता से कुछ भी स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें सिखाता ही नहीं कि तुम अंध-भक्त बनो। अगर भक्त बनना है तो अंध-भक्त बनने से बचना। अगर धार्मिक बनना है तो अंधविश्वासी बनने से बचना।
ध्यान रहे, अधर्म धर्म के विपरीत नहीं है। अंधविश्वासी धर्म धर्म के विपरीत है। अधर्म धर्म का बाल बांका नहीं कर सकता। क्या करेगा? अधर्म की औकात क्या? लेकिन अंधविश्वासी धर्म धर्म को बर्बाद कर देता है, घुन की तरह लग जाता है। नकली सिक्का असली सिक्के को डुबो देता है। लेकिन जो सिक्का ही नहीं है, वह कहीं असली सिक्के को डुबो सकता है? नकली सिक्के से सावधान रहना, क्योंकि नकली सिक्का असली खतरा है असली सिक्के को।
अर्थशास्त्री कहते हैं: नकली सिक्के की एक खूबी है, वह असली सिक्के को चलन के बाहर कर देता है। और तुम्हारा भी अनुभव होगा। ये अर्थशास्त्री तुम्हारे ही अनुभव के आधार पर यह सिद्धांत खोजे हैं। यह सिद्धांत बड़ा सच्चा है। यह जीवन के हर पहलू पर लागू होता है। नकली सिक्के असली सिक्कों को चलन के बाहर कर देते हैं। तुम्हारी जेब में दो नोट हैं--एक दस का असली नोट, एक दस का नकली नोट। पहले तुम कौन सा चलाओगे? पहले तुम नकली चलाओगे, क्योंकि नकली से जितनी जल्दी छुटकारा हो जाए अच्छा। सिगरेट खरीद लोगे, पान खरीद लोगे, सब्जी खरीद लोगे। ठहराओगे भी नहीं, दाम भी नहीं करोगे, मोल-भाव भी नहीं। जान भी रहे होओगे कि रुपये के सवा रुपये मांग रहा है, मांगने दो, जल्दी से निपटाओ; देर-दार की और कहीं वह नकली दस का नोट पहचान न ले!
मुल्ला नसरुद्दीन गया घुड़दौड़ की टिकट खरीदने। जीत भी गया उसका घोड़ा। जब वे रुपये उसे मिले तो वह एक-एक नोट को बड़े गौर से देख कर, उलट-पलट कर और गिनती करने लगा। नोट देने वाले ने कहा कि इतने क्या गौर से देख रहे हो? क्या तुम सोचते हो हम तुम्हें नकली रुपये देंगे?
उसने कहा कि नहीं-नहीं, कभी नहीं! मैं यह देख रहा हूं कि मैंने जो दिए थे, कहीं वही तो वापस नहीं मिल रहे हैं! तुम्हारे रुपयों पर मुझे शक नहीं है, अपने रुपयों का मुझे पता है।
तुम जिसको नकली दे आए, जैसे ही उसको पता चलेगा...पान वाले को दे आए, एक आने का पान चार आने में ले लिया, तभी उसको शक तो पैदा हो जाएगा, मगर चार आने के लोभ में जल्दी से वह भी निपटा देगा। फिर गौर से देखेगा, पहचानेगा, देखेगा कि मामला नकली है। अब वह भी पहला काम यह करेगा कि जिसको भी पकड़ा दे। अखबार ही खरीद लेगा, नहीं भी पढ़ना तो भी! मराठी समझ में न भी आती हो तो भी चलेगा, अखबार ही खरीद लेगा। वह दस रुपये का नोट जितने जल्दी निकल जाए...। जिसके हाथ में पड़ेगा, वही चलाएगा। और अगर समाज में बहुत नकली रुपये चल रहे हों तो असली रुपये तिजोड़ियों में बंद हो जाते हैं और नकली चलते रहते हैं। नकली का चलन होता है, असली चलन के बाहर हो जाते हैं।
यही हुआ है धर्म के जगत में। नकली धर्म ने धर्म को मारा है, अधर्म ने नहीं। अधर्म क्या मारेगा! अंधेरा नहीं मार सकता है रोशनी को, खयाल रखना। तुमने कभी देखा, कि ले आए पोटली भर कर अंधेरा और डाल दिया दीये पर और दीया बुझ गया? जरा करके तो देखो! अंधेरे को ला सकते हो पोटली में बांध कर कि टोकरी में भर कर? अंधेरे को ला ही नहीं सकते पोटली में बांध कर। चले जाओ खूब अंधेरी रात में, दूर से दूर घने जंगल में और जहां अंधेरा बिलकुल सघन हो, बांध लो पोटली में। घर आओगे, खाली पोटली पाओगे। अंधेरा पोटली में नहीं बंधता। और दीये पर डालोगे, दीया भी खिलखिला कर हंसेगा कि यह क्या कर रहे हो? कुछ होश है? दीये को कहीं बुझाया जा सकता है--नकली, थोथे, अस्तित्वहीन अंधेरे से?
दीये को अगर तुम्हें झंझट में डालना है तो अंधेरे से नहीं मिटा सकते। हां, दीये की एक तस्वीर ले आओ और घर में टांग लो और बच्चों को कहो कि यह है असली दीया! सुंदर तस्वीर! रंगीन तस्वीर! ज्योति भी है, किरणें भी फूट रही हैं। दीये से भी ऐसी किरणें फूटती साफ-साफ नहीं दिखाई पड़तीं जैसी कि तस्वीर में दिखाई पड़ रही हैं। हां, तस्वीर टांग लो और बच्चों को कहो कि यह है दीया! यह कोई साधारण दीया नहीं है। जब बड़े हो जाओगे, तब तुम पहचानोगे। बड़े होकर वे भी अपने बच्चों को यही कहेंगे, क्योंकि बच्चों के सामने कोई बूढ़ा यह स्वीकार नहीं करना चाहता कि मैं जिंदगी भर अज्ञान में रहा। इससे अहंकार को चोट लगती है।
काश दुनिया के बूढ़े ईमानदारी से स्वीकार कर लें कि हम अज्ञान में जीए, तो इस दुनिया से अज्ञान का डेरा उठ जाए! मगर बूढ़ों का अहंकार बड़ा होता चला जाता है। वे जो भी करते रहे, उसी का पोषण करते हैं। उससे उन्हें कुछ भी न मिला हो, मगर उसी का पोषण करते हैं। कारण? अहंकार। इतनी जिंदगी, कोई हम बुद्धू हैं? हम कोई पागल हैं? हमने जिंदगी ऐसे ही गंवाई? अब कैसे स्वीकार करें कि हम पत्थर की मूर्ति के सामने सिर पटकते रहे, वहां कुछ भी न था, पत्थर था! सिर जरूर काला पड़ गया, और कुछ भी न हुआ! कि हम घोंटते रहे किताबें, जिनमें शब्द थे, और कुछ भी न था!
किताबों में कहीं सत्य होते हैं? सत्य खोजने होते हैं चैतन्य में। और खोज का पहला चरण है: जी भर कर संदेह करो, अथक संदेह करो। और मैं तुमसे कहता हूं इतने बलपूर्वक, क्योंकि मैं जानता हूं कि सत्य के सामने संदेह नहीं टिक सकता। सत्य होना चाहिए बस। सत्य ही न हो तो संदेह टिक सकता है। सत्य हो तो आज नहीं कल लड़खड़ाएगा संदेह और गिरेगा। वही हुआ।
तुम कहते हो: ‘न मैंने संन्यास को स्वीकार किया सहजता से, न कपड़े, न माला।’
स्वाभाविक है। किसी के भी मन में सवाल उठता है कि यह कपड़े बदलने से क्या होगा? किसके मन में सवाल नहीं उठता कि कपड़े बदलने से क्या होगा! लेकिन जीवन के अनुभव को जरा गौर से देखो और तुम हैरान होओगे, छोटी सी बदलाहट बड़ी बदलाहटों का सिलसिला हो जाती है।
जरीन है, एक प्रतिष्ठित पारसी परिवार की महिला। एक डाक्टर की पत्नी। उसके पति ही उसे यहां ले आए थे। डाक्टर मेरी किताबों में उत्सुक थे। भूल हो गई उनसे कि पत्नी को यहां ले आए। क्योंकि वे तो किताबों में ही उत्सुक थे, बौद्धिक उनकी खुजलाहट थी। लेकिन स्त्रियां जब उत्सुक होती हैं तो वह बात खोपड़ी की नहीं रहती, हृदय की हो जाती है। उनकी पत्नी हार्दिक रूप से उत्सुक हो गई। कुछ कर भी न सके वे, क्योंकि वे मेरे पक्ष में थे बौद्धिक रूप से, इसलिए सहते गए, सहते गए। बात बहुत आगे बढ़ गई। बात इतनी आगे बढ़ गई कि पत्नी ने संन्यास लेना चाहा। सुशिक्षित व्यक्ति हैं, स्त्री स्वातंत्र्य के अधिकार को मानते हैं, तो इनकार भी न कर सके। बेमन से स्वीकार किया कि ठीक है, तू स्वतंत्र है, अगर तू संन्यास लेना चाहती है तो ले ले। तो जरीन संन्यासी हो गई।
घर के लोगों ने समझाया, पास-पड़ोस के लोगों ने समझाया। पारसियों में हंगामा मच गया, उन्होंने समझाया--कि कपड़े बदलने से क्या होगा? पर उसने कहा कि कम से कम कपड़े तो बदलने दो, ताकि और बदलाहट के लिए हिम्मत जुटा सकूं। मैं भी जानती हूं कि कपड़े बदलने से क्या होगा, तुम भी जानते हो; इसमें विवाद कहां है? मगर कम से कम कपड़े तो बदलने दो! अगर कपड़े बदलने से कुछ नहीं होता तो तुम सब मुझे समझाने क्यों आए हो? कुछ होता ही होगा। तुम इतने परेशान क्यों हो? कपड़े मैं बदल रही हूं, तुम तक को कुछ हो रहा है! तो मुझे भी जरूर कुछ होगा। तुम्हें देख कर लगता है कि मुझे भी कुछ होगा। जब दूसरों तक को होने लगा, मैंने अभी कपड़े बदले भी नहीं।
फिर उसने कपड़े बदल लिए, फिर तो बहुत तहलका मचा, कि तू पारसी होकर अपने धर्म का त्याग कर रही है!
उसने कहा: मेरे जीवन में धर्म का पहली दफा प्रवेश हो रहा है। पारसी होकर मेरा धर्म से कोई नाता ही नहीं था। एक औपचारिकता थी।
लोग समझाने लगे: छोड़ यह माला! माला में क्या रखा है? अरे हृदय की बात है, तो हृदय में रख!
उसने कहा कि अगर हृदय की ही बात है तो फिर तुम क्यों पारसी मंदिर में जाते हो? हृदय में ही चले गए! फिर क्यों जरथुस्त्र के चित्र को घर में लगाया हुआ है? तो हृदय में ही लटका लो।
घर के लोगों ने भी सोचा कि कपड़े ही बदलती है, क्या होगा, बदल लेने दो! कपड़े बदले, फिर बदलाहट का सिलसिला शुरू हुआ।
पहले तो यह तर्क किसी को भी उठता है कि कपड़े बदलने से क्या होगा? मगर मैं जब तुम्हारी अंगुली पकड़ लूंगा, तो पहुंचा भी पकड़ लूंगा। और पहुंचा पकड़ में आ गया, तो तुम कितने दूर हो? और आहिस्ता ही आहिस्ता पकड़ना होता है। एकदम से किसी की गर्दन पकड़ो तो वह भाग ही खड़ा हो। तो कप़
डे से शुरू करता हूं। और तुम देखते हो, कपड़े से भी रूपांतरण होता है! क्योंकि तुम छोटी-छोटी चीजों से मिल कर ही तो बने हो। डाक्टर जरा सी दवा देता है और बड़ी सी बीमारी दूर हो जाती है। तुम यह नहीं कहते कि क्या होगा! होम्योपैथी की गोलियां देखीं? तुम यह नहीं कहते कि शक्कर की चार गोलियां, इनसे क्या होगा! शक्कर की चार गोलियां कभी-कभी चमत्कार कर देती हैं। कभी-कभी तो यह भी हो जाता है कि दवा हो या न हो उनमें, मगर तुम पर परिणाम हो जाता है। तुम्हें यह भरोसा भी हो कि यह दवा है, तो वह भरोसा भी काम कर जाता है। तुम्हारे चित्त पर यह खयाल आ जाए कि दवा काम कर रही है, तो तुम्हारे चित्त का बड़ा बल है।
आखिर हम सैनिक को कपड़े पहनाते हैं, सिपाही को कपड़े पहनाते हैं। तुमने कभी खयाल किया? वही आदमी जब सिपाही के कपड़े में तुम्हारे कंधे पर हाथ रखता है तो फुरफुरी छूट जाती है, एकदम रोमांच हो जाता है, एकदम कुंडलिनी जगने लगती है कि फंसे! पता नहीं किसलिए कंधे पर हाथ रखा है! अब क्या करेगा यह और! और वह अगर कहता है कि चलो अदालत की तरफ, तो तुम एकदम पीछे हो लेते हो, ना-नुच नहीं करते। भूल जाते हो सब अकड़। और यही आदमी अगर साधारण कपड़ों में, पहने पाजामा-कुरता मिल जाए, कंधे पर हाथ रखे, तो कहोगे: नीचे करो हाथ! होश से चलो! किसके कंधे पर हाथ रख रहे हो!
तुमने देखा, इस देश में एक चमत्कार होते देखा? सिक्खों का इतिहास पुराना नहीं है, केवल पांच सौ साल पुराना है। लेकिन एक चमत्कार होते देखा? सिक्ख कोई अलग कौम नहीं है। जैसे और पंजाबी हैं, वैसे ही सिक्ख हैं। लेकिन क्या फर्क हो गया? सिक्ख एक नई ही जाति की तरह पैदा हो गए--एक सैनिक जाति की तरह पैदा हो गए! बदला क्या था? साफा बांध लिया तो क्या होगा? कड़ा पहन लिया तो क्या होगा? दाढ़ी-मूंछ रख लीं तो क्या होगा? बाल बांध लिए तो क्या होगा? बात तो ठीक ही है, ऐसे कहीं कुछ होता है! मगर कुछ हो जाता है।
मैं मनाली जा रहा था एक शिविर लेने। बड़ी गाड़ी, मनाली का रास्ता संकरा, इंपाला गाड़ी, ड्राइवर बीच में डरने लगा। और एक जगह वर्षा हो गई थी, कीचड़ मची हुई थी, रास्ता संकरा था और गाड़ी बड़ी थी। हालांकि ड्राइवर सरदार था, मगर उसकी भी हिम्मत टूटने लगी। उसने तो एक जगह जाकर गाड़ी खड़ी ही कर दी बीच में पहाड़ पर कि अब मैं आगे नहीं जा सकता। यहां तो जीवन को खतरा है।
मैंने कहा: तेरे ही जीवन को खतरा है? मैं भी बैठा हूं। तू फिकर न कर, बढ़!
मगर वह कहे कि मैं एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। या तो आप उतर जाएं यहां या मैं आपको वापस दिल्ली छोड़ सकता हूं।
पीछे से मेरे एक मित्र, जो कि पुलिस के आई.जी. थे पंजाब के, वे भी शिविर में भाग लेने आ रहे थे, वे अपनी जीप में आए। उनको मैंने कहा कि कुछ करिए, यह आदमी तो अटक कर ही खड़ा हुआ है। वे आए और उन्होंने कहा कि अरे, सरदार होकर, शर्म नहीं आती?
बस उनका इतना कहना कि सरदार होकर, शर्म नहीं आती, उसने पगड़ी-वगड़ी ठीक की और वह तो चल पड़ा! मैंने उससे पूछा: क्यों भाई? उसने कहा: मैं तो भूल ही गया था! उन्होंने याद दिला दी। अरे खालसा का आदमी होकर...। तो उसने बस वाह गुरुजी का खालसा, वाह गुरुजी की फतह--और चल पड़ा! उसने कहा, अब जो होगा होगा। सरदार होकर पीछे कैसे लौट सकता है!
जरा सी बात, मगर जान खतरे में डाल दी उसने।
वैसे बिलकुल नट गया था। सब कोशिश करके हार चुके थे। वह जाने को, कदम बढ़ाने को राजी ही नहीं था। इतने तक मैं राजी हो गया था कि तू पीछे बैठ, मैं ड्राइव करता हूं। उसने कहा कि मारा मैं और भी जाऊंगा। फिर तो मौत पक्की है। मैं अनुभवी हूं इस रास्ते का, पहाड़ी पर चलाने का, आप कैसे चलाएंगे? जब मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही आगे जाने की, तो मैं गाड़ी के व्हील पर आपको हाथ नहीं रखने दूंगा।
मैंने उससे कहा: तू उतर जा, हम गाड़ी ले जाते हैं।
उसने कहा: लौट कर मालिक को क्या कहूंगा?
सब उपाय करके हार गए थे। मगर एक याददाश्त--कि तू खालसा का सदस्य है और यूं कमजोरी दिखा रहा है! बस जोश वापस आ गया, बल आ गया वापस।
सिक्खों ने एक क्रांति कर दी भारत में, एक नई कौम खड़ी कर दी। और मजा यह है कि कोई सिक्ख संन्यासी हो जाता है तो सिक्ख ही उसको समझाते हैं कि गैरिक वस्त्र पहनने से क्या होगा? यह तर्क स्वाभाविक है। इसमें कुछ आश्चर्यजनक नहीं। लेकिन गैरिक वस्त्र पहनने से कुछ होता है, यह अनुभव की बात है।
एक शराबी ने संन्यास लिया। उसने कहा कि आप मुझे गैरिक वस्त्र पहना रहे हैं। मैं शराबी हूं और मैं कहे देता हूं कि शराब मुझसे ऐसी आसानी से छूटने वाली नहीं है। जिंदगी हो गई, छोड़ने के बहुत उपाय कर चुका हूं, बिलकुल हार गया हूं। अब तो उपाय भी नहीं करता।
मैंने कहा: तू फिक्र छोड़। मुझे कुछ एतराज नहीं। तू इस तरह मत सोचना कि संन्यासी होकर शराब पी रहा है। तू इस तरह सोचना कि धन्यभाग मेरे कि शराबी हूं, फिर भी कम से कम संन्यासी तो हूं! उसको मैंने एक कहानी सुनाई। दो यहूदी युवक अपने गुरु के आश्रम में थे। दोनों को एक घंटे बगीचे में घूमने का मौका मिलता था। दोनों को सिगरेट पीने की आदत थी। और वही एक घंटा था जब वे पी सकते थे। लेकिन वह घंटा भी मिलता था ध्यान के लिए कि घूम कर ध्यान करें। तो सवाल था कि ध्यान करते समय सिगरेट पीना कि नहीं? तो दोनों ने तय किया कि गुरु से पूछ लेना उचित है। तो पहले ने जाकर पूछा। गुरु ने कहा: नहीं, बिलकुल नहीं! यह बात पूछने की है? शर्म नहीं आती? नालायक कहीं के! जाओ ध्यान करो!
वह तो बड़ा दुखी वापस लौट आया। एक बेंच पर आकर बैठ गया बड़ा उदास होकर। दूसरा आया, वह तो सिगरेट पीता चला आ रहा था। पहले ने पूछा कि मामला क्या है? मुझ पर तो बहुत नाराज हुए गुरु! क्या तुझे सिगरेट पीने की आज्ञा दी?
उसने कहा: हां। मैंने पूछा तो उन्होंने कहा--हां, मजे से।
उसने कहा: यह तो हद अन्याय हो रहा है! यह कैसा पक्षपात!
तो दूसरे ने कहा: मैं तुझसे पूछता हूं तूने पूछा क्या था?
उसने कहा: मैंने पूछा था कि मैं ध्यान के समय, ध्यान करते समय सिगरेट पी सकता हूं? वे एकदम नाराज हो गए, आगबबूला हो गए कि नहीं, बिलकुल नहीं।
दूसरा हंसने लगा। उसने कहा: वहीं भूल हो गई। मैंने गुरु से पूछा कि क्या मैं सिगरेट पीते समय ध्यान कर सकता हूं? उन्होंने कहा--हां, बिलकुल कर सकते हो! अरे कम से कम ध्यान तो कर रहे हो!
तो मैंने उसको कहा कि तू यह मत सोचना कि तू शराबी है और गैरिक वस्त्र पहने हुए है। यह तो अच्छी बात नहीं है। ऐसा मत सोचना। ऐसा सोचना कि धन्यभाग तेरे, है तो शराबी, मगर फिर भी संन्यास की भावदशा जगी है, फिर भी संन्यास की तूने हिम्मत की है। इसलिए मैं तो दूसरी बात मान कर तुझे संन्यास दे रहा हूं।
पांच-सात दिन बाद वह आया, उसने कहा कि आप भी धोखेबाज मालूम होते हैं। मुझे फंसा दिया। कल मैं शराबघर के बाहर खड़ा था, दो आदमी एकदम मेरे पैरों में गिर पड़े और कहा: स्वामी जी, आप यहां कैसे? यह शराबघर है, अंदर मत जाइएगा! सो मुझे उन्हें आशीर्वाद देना पड़ा। अरे जब कोई पैर पड़ रहा है...! और गया तो शराबघर के लिए था, लौट कर घर आ गया कि अब क्या जाना! सो आज सात दिन हो गए, हिम्मत नहीं पड़ रही जाने की उस तरफ, क्योंकि कोई पैर पड़ ले, अंदर घुसो...। अच्छी मुसीबत में डाल दिया।
उसने कहा: एक दिन मैं सिनेमाघर गया कि चलो शराब नहीं पीना तो कम से कम सिनेमा देख आऊं। वहां क्यू में खड़ा था कि एक आदमी ने पीछे से हुद्दा मारा मुझे और कहा कि महाराज, आप यहां कैसे खड़े हैं? सो मैं उससे झूठ बोला कि मैंने समझा कि यहां गीता का प्रवचन हो रहा है। उसने कहा: अरे नहीं महाराज, यहां हुड़दंगी फिल्म चल रही है, आप घर जाइए। यहां कहां गीता का प्रवचन! सो मुझे घर लौट कर आना पड़ा। अच्छा फंसाया!
और उसने कहा कि एक मजे की बात देखो। मेरी पत्नी ही मुझसे ऐसा व्यवहार करती है, जैसे मैं अछूत। कहती है--दूर रहना महाराज, छूना मत! संन्यासी होकर क्या स्त्री को छुओगे? मारे गए, बिलकुल मारे गए!
उसने कहा: क्या, हम तो सोचते थे कि गैरिक वस्त्र पहनने से क्या होगा! अरे अपनी स्त्री कहीं साथ ले जाने को तैयार नहीं--कि नहीं-नहीं, तुम साथ न आओ, या तो तुम आगे जाओ या पीछे आना। लोग रास्ते में पूछते हैं कि वह कौन से स्वामीजी के साथ जा रही थीं?
और तुम सोचोगे कि गैरिक वस्त्र पहनने से क्या होगा? प्रश्न बिलकुल स्वाभाविक है, मगर अनुभव के अतिरिक्त पता नहीं चलेगा। सारे संदेह ठीक थे। माला से भी क्या होगा? लेकिन जिन्होंने माला पहनी है, अब तो तुम भी जानते हो--क्या होगा। एक दिन उतार कर रखना भी मुश्किल हो जाती है।
अभी कल जर्मनी से एक अखबार आया। जर्मनी के एक बहुत प्रसिद्ध अभिनेता ने संन्यास लिया है। संन्यास लेकर यहां से गया, उसके डायरेक्टर ने वक्तव्य दिया है कि हम बड़ी मुसीबत में पड़ गए हैं, क्योंकि यह आदमी कपड़े तो पहले बदलने को तैयार नहीं था, वह कहे कि मैं गैरिक वस्त्र में ही अभिनय करूंगा यह। सारी कहानी खराब किए दे रहा है। अब इसको गैरिक वस्त्र में और जर्मन कहानी में कैसे इसको जमाओ! और इसके बिना कहानी आगे चल नहीं सकती, आधी कहानी हो चुकी है। फिल्म की आधी शूटिंग हो चुकी है। बामुश्किल हाथ-पैर जोड़ कर इसको समझाया कि भैया, तू इस फिल्म को पूरी करवा दे, कपड़े कम से कम बदल ले। तो वह राजी हुआ, मगर माला तो कोई हालत में निकाले ही नहीं। चलो, उस डायरेक्टर ने कहा कि हम बर्दाश्त कर लेंगे, जो कुछ होगा होगा, पहने रहने दो माला। मगर एक दृश्य आता है जिसमें वह नग्न दिखाया जाता है। जर्मन फिल्म है। तो नंगा तो खड़ा है, मगर माला नहीं उतारता।
तो डायरेक्टर ने कहा कि कपड़ों में तो ठीक-ठीक, माला चल जाएगी, कोई समझेगा कि होगा कुछ, झक्की है या कुछ है; मगर नंगे खड़े हो और माला पहने हो! यह तो ऐसा ही जैसे कि कोई नंगा खड़ा है, टाई बांधे हुए है! तू माला उतार दे! बामुश्किल उसने माला उतारी, मगर बिलकुल अपने पास में रखी। और ध्यान उसका माला पर। बातें कर रहा है अभिनेत्री से और आंखें लगाए है माला पर! तो उसने कहा कि यह कैसे फिल्म बनेगी? लोग क्या कहेंगे! कोई माला तेरी ले जाएगा?
मगर उसने कहा कि मेरे प्राण निकले जा रहे हैं, उसके बिना अब मैं क्षण भर नहीं रह सकता। तुम मुझसे एक जघन्य अपराध करवा रहे हो। मैं तो नजर माला पर रखूंगा। उतारनी हो फिल्म तो उतार लो, न उतारनी हो तो तुम जाओ भाड़ में और जाए तुम्हारी फिल्म भाड़ में!
मगर मजबूरी थी, फिल्म पूरी करनी पड़ी! सो वह देखे माला की तरफ और बातें करे। देखे माला की तरफ और कह रहा है प्रेयसी से कि अहा, तेरा मुख चांद का टुकड़ा है!
जब माला के साथ जीओगे कुछ दिन तो वह तुम्हारे प्राण का अंग हो जाएगी। बाहर दिखाई पड़ेगी, लेकिन भीतर प्रविष्ट हो जाएगी। लेकिन वे सब नाते प्रेम के, हृदय के हैं। वे तो अनुभव के नाते हैं। ऊपर से तो तर्क संदेह उठाएगा। इसलिए मैं संदेहों का विरोध नहीं करता।
तुम कहते हो: ‘मैंने बार-बार भागना चाहा और ज्यादा खिंचता चला आया।’
तुम भाग भी कैसे सकते हो? मैंने तुम्हें बांधा नहीं है। किसी को बांधो तो वह भाग सकता है। जंजीरें हों तो तोड़ सकता है। मैंने तुम्हें पूरी स्वतंत्रता दी है। तुम भागना चाहो तो तुम मालिक हो अपने। मैं तुम्हें तुम्हारी मालकियत दे रहा हूं। सारा स्वर यही है मेरा कि तुम्हारी परम स्वतंत्रता है। इसलिए तुम भाग कैसे सकते हो? स्वतंत्रता से कोई कैसे भाग सकता है? परतंत्रता से भाग सकता
है। इसलिए तुम और खिंचते आओगे।
और तुम कहते हो: ‘मुझ अपात्र को आपने स्वीकार किया!’
कोई भी अपात्र नहीं, आनंद किरण। सबके भीतर परमात्मा बैठा है। अपात्र कौन? कैसा पात्र, कैसा अपात्र? एक ही तो विराजमान है। ढंग-ढंग के पात्र हैं, अपात्र कोई भी नहीं। मैंने तो अब तक कोई अपात्र नहीं देखा। लाखों लोग मेरे संपर्क में आए, मैंने कोई अपात्र नहीं देखा। अपात्र कोई है ही नहीं। हां, लेकिन तुम्हें समझाया गया है, क्योंकि तुम्हारे धर्मों के जो ठेकेदार हैं, वे इसी पर जीते हैं कि तुम्हें अपात्र सिद्ध करें, तुम्हें पापी सिद्ध करें, तुम्हें अपराधी सिद्ध करें, तुम्हें हीन-भाव से भर दें, तो ही तुम्हारा शोषण किया जा सकता है।
मैं तो तुम्हें सिर्फ एक ही बात का स्मरण दिलाना चाहता हूं: तत्वमसि! कि तुम परमात्मा हो! उसकी ही अभिव्यक्ति हो! कैसा पाप? कुछ छोटे-मोटे काम भी कर लेते हो, भूल-चूकें हो सकती हैं, पाप इत्यादि कुछ भी नहीं। और भूल-चूकें इसलिए हो जाती हैं, क्योंकि तुम सो रहे हो, मूर्च्छित हो, निद्रा में हो। जाग आओगे ध्यान में, तो वे अपने आप विदा हो जाएंगी। सपने में कोई जैसे चोरी कर ले तो क्या चोर हो जाता है? और सपने में कोई साधु हो जाए तो क्या साधु हो जाता है? सुबह जाग कर दोनों पाएंगे कि सपना था--चोर भी और साधु भी। सुबह दोनों पाएंगे--न कोई चोर है, न कोई साधु है। ऐसे ही जिस दिन तुम जागोगे ध्यान में, उस दिन पाओगे--न कोई पाप है, न कोई पुण्य है; न कोई अच्छा है, न कोई बुरा है; न कोई असाधु है, न कोई साधु है--एक ही परमात्मा है! एक ओंकार सतनाम! वही सबमें विराजमान है।
इसलिए मेरी दृष्टि में तो कोई अपात्र नहीं है। तुम्हारी दृष्टि में अपात्र तुम हो सकते हो, क्योंकि तुम अब भी जाने-अनजाने सदियों-सदियों में जो कचरा तुम पर थोपा गया है, उसको ढो रहे हो। छोड़ो यह खयाल। छोड़ते ही तुम्हारे भीतर एक नवोन्मेष होगा, एक नई ऊर्जा जन्मेगी, एक नया जीवन प्रारंभ होगा।
तुम कहते हो: ‘लेकिन आज आपके प्रेम में डूबा जा रहा हूं।’
जानता था, यह होगा। इसलिए भागने भी दिया, इसलिए संदेह भी करने दिया, क्योंकि मैं तुम्हारी परम संभावना से परिचित हूं। मैं प्रत्येक व्यक्ति के भीतर परम संभावना जो है उससे परिचित हूं। प्रत्येक व्यक्ति को जानना ही है परमात्मा को देर-अबेर। क्या फर्क पड़ता है आज जाना कि कल जाना! इस अनंत काल में आज और कल में क्या भेद है? बुद्ध ने पच्चीस सौ साल पहले जाना, मैंने आज जाना; तुम सोचते हो इस अनंत काल में पच्चीस सौ साल से कोई फर्क पड़ता है? जैसे समुद्र में बूंद का क्या मूल्य है? नानक ने पांच सौ साल पहले जाना, तुम आज जानोगे, तो तुम सोचते हो कोई फर्क पड़ गया बहुत? अरे कोई रात दो बजे उठा, कोई दो बज कर पांच मिनट पर उठा, कोई दो बज कर सात मिनट पर उठा--बस ऐसी बात है। मिनट की भी बात कहनी ठीक नहीं, सेकेंडों का फर्क है।
एक आदमी बड़ा दानवीर था। उसने करोड़ों रुपये दान किए। तो अकड़ से स्वर्ग के दरवाजे पर जाकर दस्तक दी। द्वारपाल ने द्वार खोला। पूछा कि आप इतने अकड़ से दरवाजा खटखटा रहे हैं, अकड़ का कारण?
उसने कहा: करोड़ों रुपये दान किए हैं!
द्वारपाल ने कहा कि यहां पृथ्वी के करोड़ों रुपये की कीमत कौड़ी से ज्यादा नहीं है।
धक्का लगा धनपति को स्वभावतः। यहां बड़े-बड़े महात्मा, बड़े-बड़े शंकराचार्य कहते थे--अहा, दानी हो तो आप जैसा! दाता हो तो आप जैसा! अरे बहुत दाता देखे, मगर आप जैसा कोई दाता नहीं! और यह इज्जत हो रही है मेरी स्वर्ग के दरवाजे पर! वह तो सोच कर गया था कि बैंड-बाजे लिए खुद परमात्मा खड़े होंगे, फूलमालाएं सजाई होंगी, घंटा वगैरह बजा रहे होंगे खड़े होकर, लाउडस्पीकर लगा होगा--आइए, स्वागत है! बंदनवार बंधे होंगे, द्वार बने होंगे। यहां तो कुछ भी नहीं, सन्नाटा है। और यह दुष्ट द्वारपाल, यह क्या कह रहा है कि वहां के करोड़ों रुपये यहां कौड़ियों के बराबर हैं! थोड़ा सम्हला धक्के से तो उसने कहा: अच्छा ऐसा है! तो क्या आप मुझे दो कौड़ी उधार दे सकते हैं?
द्वारपाल ने कहा: निश्चित। लेकिन दो मिनट ठहरना पड़ेगा।
धनपति तब नहीं समझा। द्वारपाल जो गया भीतर सो गया ही। लाखों साल बीत गए, धनपति सिर पीट रहा है अभी भी। हां, लोग आते-जाते हैं, वे कहते हैं: भई, दो मिनट पूरे होंगे तब न। तुम्हें तभी समझ जाना था। जब यहां करोड़ों रुपये पृथ्वी के दो कौड़ी के बराबर होते हैं, तो यहां के दो मिनट पृथ्वी के करोड़ों वर्षों के बराबर होते हैं।
अनंत काल की तुलना में क्या फर्क पड़ता है?
तुम सोचते हो सूरज से कलकत्ता की दूरी और न्यूयार्क की दूरी में कोई फर्क है? सूरज से कोई फर्क नहीं है। हालांकि कलकत्ता और न्यूयार्क की दूरी में फर्क है, मगर सूरज पर खड़े हो जाओ तो कोई फर्क नहीं है। और सूरज बहुत दूर नहीं है। और किसी तारे पर खड़े हो जाओ तो और भी फर्क नहीं है। और दूर से दूर तारे हैं। जितने दूर हटते जाओगे, उतना ही फर्क खतम होता जाता है।
कोई अंतर नहीं पड़ता, देर-अबेर कब जागे। इसलिए मैं, कोई भी आता है, उसे संन्यास देने को राजी हूं। किसी को इनकार नहीं है। क्योंकि मैं जानता हूं: आज नहीं कल, तुम जागोगे। जागना तुम्हारी क्षमता है। तुम्हारे भीतर छिपा हुआ बीज है, फूटेगा।
और इसलिए आज तुम प्रेम में डूबे जा रहे हो। तुम कहते हो: ‘अब न भीतर विरोध है, न विद्रोह।’
उठ कर गया तो अच्छा। दबा लेते तो बुरा हो जाता। दबा लेते तो कभी न कभी उठता। जो दबा लेते हैं उनका कभी न कभी उठेगा। इसलिए अच्छा है निपट ही लेना, उठा लेना, छूट जाना। भीतर सम्हाल कर नहीं रखना। स्वभावतः, मन अब मौन होगा, शांत होगा।
अब आनंद किरण, इस अपराध-भाव को भी छोड़ दो। यह तुम व्यर्थ ढो रहे हो। यह भी छाया है पंडित-पुरोहितों के शिक्षण की। क्योंकि उन्होंने सिखाया है: संदेह करने में पाप है। गुरु पर संदेह न करना। अरे तो और किस पर करोगे? तुम्हें समझाया गया है: दूसरों के शास्त्रों पर संदेह करना, अपने शास्त्र पर नहीं। और मैं तुमसे कहता हूं: अपने पर पहले करना। दूसरों के शास्त्र से तुम्हें क्या लेना-देना? क्यों अपना समय खराब करना? हिंदू कुरान पर संदेह करता है, गीता पर नहीं; जब कि करना उसको गीता पर चाहिए। मुसलमान गीता पर संदेह करता है, कुरान पर नहीं; जब कि करना उसको कुरान पर चाहिए। गीता से उसका क्या लेना-देना? लेकिन तुम्हें यही समझाया गया है: दूसरों के शास्त्र पर संदेह करो। दूसरों के शास्त्र कुशास्त्र। दूसरों के गुरु कुगुरु। दूसरों के धर्म मिथ्या धर्म। अपने पर संदेह मत करना। अपने से तो अपना अहंकार जोड़ना। और यही हम सब किए बैठे हैं। परिणाम क्या हुआ है? थोथे रह गए हैं, प्राण नहीं है, आत्मा नहीं है।
नहीं, मैं तो अपने प्रत्येक संन्यासी से कहता हूं: संदेह करना हो तो मुझ पर करना। किसी और पर क्या करना? जीसस पर करने से क्या फायदा होगा? बुद्ध पर करने से क्या फायदा होगा? नानक पर करने से क्या? मोहम्मद पर करने से क्या? संदेह करना हो, मुझ पर करना। इधर मैं सामने मौजूद हूं। मुझ पर संदेह करोगे तो गलेगा, मुझ पर संदेह करोगे तो संदेह मरेगा। और मुझसे तुम्हारा नाता है, और किसी पर क्यों संदेह करोगे? जो भी द्वंद्व हो, संघर्ष हो, मुझसे हो। और मुझे भरोसा है, इसलिए इतनी निश्चिंतता से कह रहा हूं। तुम्हारे पंडित-पुरोहित नहीं कह सकते, उन्हें भरोसा नहीं है; वे जानते हैं कि तुमने टक्कर ली कि उनके पैर के नीचे से जमीन खिसक जाएगी। उनको खुद ही भरोसा नहीं है अपने पर। वे तुमसे कैसे कह सकते हैं कि आओ, संदेह को तुम्हारे चुनौती देते हैं!
मैं तुमसे कहता हूं: जितनी नहीं कहना हो, मुझसे कहना। अगर मैं तुम्हारी नहीं को हां में बदलने में असमर्थ होता तो ऐसा तुम्हें निमंत्रण न देता। लाओ कांटे! उन्हीं कांटों को हम फूल बना लेंगे। छोड़ दो अपराध-भाव, व्यर्थ बोझ मत ढोओ। तुमने कुछ पाप नहीं किया, कोई गुनाह नहीं किया। जो उचित था वही किया। अनजाने किया, इसलिए तुम्हें अपराध-भाव पैदा हो रहा है।
अब तुम कहते हो: ‘प्रभु, आप जीते, मैं हारा।’
मगर तुम्हें पता है, प्रेम में हार जाना जीतना है! हार कर तुम जीत गए। जीतते तो हारते। प्रेम का अपना ही गणित है, अलग ही गणित है--अनूठा गणित है। तुम हार गए तो जीत गए।
कहते हो, माफ कर दूं!
मैं कभी तुम पर नाराज नहीं हुआ तो माफ कैसे कर दूं? माफ तो वह करे जो नाराज हुआ हो। न कभी नाराज हुआ, न तुम्हें माफ करने की मुझे कोई जरूरत है। मैं तुमसे सदा प्रसन्न रहा हूं। तुम मुझसे राजी हो कि नाराजी, यह तुम्हारा मामला है। मेरी तरफ से मैं सदा एकरस हूं। तुम मेरी तरफ पीठ किए खड़े हो, तो भी मैं वैसा हूं; तुम मेरी तरफ मुंह कर लो, तो भी मैं वैसा हूं। मैं जैसे का तैसा हूं। जस का तस! भूल कर मुझसे माफी मत मांगना, क्योंकि मैं देने में असमर्थ हूं। ऐसा मत सोचना कि मैं माफ नहीं कर सकता। नहीं, इसलिए असमर्थ हूं, क्योंकि माफ तो तब करूं जब पहले तुम पर नाराज हो जाऊं।
एक महावीर-जयंती पर मैं बंबई में बोल रहा था। मुझसे पहले एक जैन मुनि, चित्रभानु बोले। उन्होंने कहा कि महावीर महाक्षमावान थे। जिन्होंने उन्हें सताया, उन्हें भी उन्होंने क्षमा कर दिया। जिन्होंने उनके कान में खीले ठोंके, उनको भी उन्होंने क्षमा कर दिया।
तालियां पिट गईं। जैनियों की ही भीड़ थी। मैं बहुत चौंका। मैं उनके बाद बोलने खड़ा हुआ तो मैंने कहा कि मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं। ये जो जैन मुनि अभी बोल रहे थे, इनको महावीर का कुछ भी पता नहीं है। ये कैसे मुनि हैं! इन्हें कोई अनुभूति नहीं है। क्योंकि महावीर को क्षमावान कहने का अर्थ यह है कि पहले वे नाराज हुए थे। जो नाराज हो, वही क्षमा करे। मैं महावीर को क्षमावान नहीं कह सकता। उन्होंने कभी किसी को क्षमा नहीं किया, क्योंकि वे कभी किसी पर नाराज नहीं हुए। तुम अपनी धारणाएं उन पर थोप रहे हो।
मुनि तो आगबबूला हो गए। उनकी प्रतिष्ठा थी। वे तो एकदम मुझसे माइक छीन लिए। मैंने कहा कि ये सज्जन हैं, जो शायद क्षमा करें, शायद क्षमा न भी करें। यह क्रोधित व्यक्ति नाराज होगा तो क्षमा करेगा। ये अपने को ही महावीर पर आरोपित कर रहे हैं। इनको महावीर का कुछ भी पता नहीं है। महावीर ने न तो कभी नाराजगी की, न कभी क्षमा किया। इसलिए मैं महावीर को क्षमावान नहीं कह सकता। मैं महावीर को करुणावान भी नहीं कह सकता, क्योंकि जो क्रूर ही नहीं है वह करुणावान कैसे होगा? हमारे कोई शब्द महावीर जैसे व्यक्तियों के काम के नहीं हैं। हमारे सब शब्दों में द्वंद्व है--और महावीर निर्द्वंद्व हैं। हमारे सब शब्दों में द्वैत है, दुई है--और महावीर द्वैत के पार हैं, अद्वैत में हैं। उन पर हमारे कोई शब्द लागू नहीं होते। हमारे सब शब्द छोटे पड़ जाते हैं, ओछे पड़ जाते हैं। हमें सम्हाल कर बात बोलनी चाहिए।
मगर जैन मुनि जो मुझ पर नाराज हुए, वह नाराजगी अब भी चलती है। वर्षों हो गए इस बात को हुए। यह पहले वर्ष हमारा साथ हुआ। दूसरे वर्ष कुछ युवक मुझमें उत्सुक हो गए। उन्होंने कहा: बात जमी। उन्होंने फिर मुझे निमंत्रण दे दिया। मुनि मुझसे पहले बोले थे पहली बार, उन्होंने शर्त रखी कि इस बार वे मेरे से पीछे बोलेंगे, क्योंकि मैं खंडन करता हूं। मैंने कहा कि मुझे क्या फर्क पड़ता है कि आप कब बोलते हैं! मैं पहले बोलूंगा। पहले बोला तो हालत और खराब हो गई, क्योंकि पहले जो मैं बोला, उससे वे एकदम किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। उन्हें फिर कुछ सूझा ही नहीं कि अब क्या करें! क्योंकि मैंने जो बातें कहीं, वे उनकी समझ के बिलकुल पार थीं। सो वे जो बोले, लोग ताली पीटने लगे, लोग हंसने लगे। जैन! जिनसे कि वे आशा नहीं करते थे कि ऐसा व्
यवहार करेंगे। क्योंकि मैंने एक बात कही। मैंने कहा कि जब वर्धमान की मृत्यु हो गई तो महावीर का जन्म हुआ।
वर्धमान--महावीर का पुराना नाम, मां-बाप का दिया हुआ नाम। महावीर उनका नाम नहीं था, वर्धमान नाम था। वर्धमान नाम दिया गया था उनको, क्योंकि जब वे पैदा हुए, उनके घर में सब चीजों में वृद्धि हुई। धन बढ़ा, यश बढ़ा, साम्राज्य बढ़ा। तो मां-बाप ने उनको नाम दिया--वर्धमान। होना भी चाहिए। यह कहानी प्रीतिकर है। महावीर जैसा व्यक्ति घर में जन्मे तो क्यों न हर चीज बढ़े! फूल ज्यादा खिले होंगे उस वर्ष। बगिया में गंध ज्यादा उड़ी होगी उस वर्ष। वसंत जल्दी आ गया होगा और देर तक ठहरा होगा। यह बिलकुल स्वाभाविक है। ऐसा होना ही चाहिए; हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन होना जरूर चाहिए। यह कहानी प्रीतिकर है कि सब चीजें बढ़ीं, खूब बढ़ीं। तो उनको वर्धमान नाम दिया।
लेकिन मैंने जब कहा कि वर्धमान की मृत्यु पर महावीर की शुरुआत है। तो वे फिर बौखला गए। उनसे न रहा गया। वे बीच में ही खड़े हो गए कि आपको कुछ जैन धर्म का पता नहीं है। महावीर और वर्धमान एक ही व्यक्ति के नाम हैं! तो जनता भी हंसी। मैंने कहा कि अब मैं क्या कहूं, लोग ही आपको जवाब दे रहे हैं! यह तो मैंने भी नहीं कहा कि ये दो व्यक्तियों के नाम हैं। और आप इतनी कुंठित बुद्धि के होंगे, यह मैं समझा नहीं।
मगर वे तो क्रोध से भनभना रहे थे, तो क्रोध में तो आदमी की बुद्धि कुंठित हो जाती है। वे तो कंप रहे थे एकदम। वे तो समझे कि मैं यह कह रहा हूं कि ये दो व्यक्ति हैं। मैं तो सिर्फ एक प्रतीक कह रहा था। मैं तो यह कह रहा था कि वर्धमान नाम का जो व्यक्तित्व था, वह जब समाप्त हो गया, तो एक नये व्यक्ति का जन्म हुआ--जो बिलकुल अनूठा है, अद्वितीय है, जो पुरानी श्र्ृंखला से मुक्त है। न किसी का बेटा है, न किसी का भाई है, न किसी का पति है, न किसी का पिता है। वर्धमान तो किसी का बेटा था, किसी का भाई था, किसी का पति था, किसी का पिता था। यह तो महावीर, अब किसी का कोई नहीं है! वर्धमान तो शरीर को अपना मानता था, मन को अपना मानता था; यह महावीर न तो जानता है कि शरीर हूं मैं, न मन हूं मैं; यह तो पहचानता है कि मैं सिर्फ साक्षी-भाव हूं। यह तो और ही बात हो गई। इतनी सी बात कहने के लिए मैंने कहा था कि वर्धमान तो मर गया, कब का मर गया, तब महावीर का जन्म हुआ।
मगर वे तो भन्ना गए। तीसरे साल तो उन्होंने कह दिया कि या तो मैं बोलूं या वे बोलें, दोनों साथ नहीं बोल सकते। आगे भी बोल कर देख लिया, पीछे भी बोल कर देख लिया। मैं पूना था और महावीर-जयंती पर बोलने मुझे बंबई जाना था। जैसे ही मैं यहां से कार से निकल रहा था, खबर आई कि मुझे कार से अकेला न भेजा जाए, क्योंकि वे मुनि इतने ज्यादा क्रुद्ध हैं कि हो सकता है वे रास्ते में कोई बाधा खड़ी करें, सिर्फ इसलिए ताकि मैं समय पर बंबई न पहुंच सकूं, या मेरे शरीर को कोई नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाए।
अब ये जैन मुनि! ये अहिंसा के भक्त हैं! ये अहिंसा के प्रचारक हैं! ये महावीर का संदेश सारी दुनिया को देने जा रहे हैं! इस तरह के लोगों ने गलत-सलत बातें समझा रखी हैं।
न तुम्हें अपराध-भाव रखने की जरूरत है, न मुझे तुम्हें माफ करने की जरूरत है। कहीं कुछ भूल-चूक हुई ही नहीं। सब ठीक-ठीक ही हुआ है। तीर जहां लगना था वहीं लगा है। क्यों तुम अपराधी? क्यों मैं तुम्हें माफ करूं?
तुम कहते: मैं हारा, आप जीते! और मैं कहता: तुम हारे, इसमें तुम्हारी जीत हो गई।
ओशो, मैं संन्यास लेने के पहले आश्वस्त होना चाहता हूं कि मुझे निर्वाण पाने में सफलता मिलेगी या नहीं?
एक उपन्यासकार ने मुल्ला नसरुद्दीन से कहा कि जरा मेरा यह नया-नया उपन्यास है, इसे पढ़ें और कुछ आपकी आलोचना हो या सुझाव हों तो मुझे दें।
मुल्ला नसरुद्दीन ने उपन्यास पढ़ा और कहा कि उपन्यास तो आपने जैसा लिखा है सो ठीक है, मगर उपन्यास को जो नाम दिया है वह ठीक नहीं है।
उपन्यास लेखक ने कहा: लेकिन मैं तो समझता था कि नाम काफी जोरदार है।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा: यही तो मेरा भी खयाल है। लेकिन कथानक ने सारी मिट्टी पलीद कर दी।
नाम तुम्हारा इतना जोरदार है और कथानक बिलकुल मिट्टी पलीद किए दे रहा है।
रामकृष्ण! क्या पूछ रहे हो कि मैं संन्यास लेने के पहले आश्वस्त होना चाहता हूं! कोई गारंटी? संन्यास का अर्थ क्या होता है? असुरक्षा में उतरना। वे जो आश्वस्त होना चाहते हैं, वही तो गृहस्थ हैं। वे जो सब तरह की सुरक्षा चाहते हैं, वही तो गृहस्थ हैं। संन्यस्त का अर्थ इतना होता है कि परमात्मा मेरी सुरक्षा है। रखेगा जैसे, रहूंगा। जिलाएगा जैसे, जीऊंगा। कराएगा जो, करूंगा। जिंदगी, तो उसकी है; और मौत, तो उसके हाथों। अब उसका हूं। अब हिसाब-किताब अपना क्या रखना!
तुम दुकानदारी समझते हो संन्यास को? पहले आश्वस्त होना चाहते हो? यह जुआरियों का काम है। अभी मैंने तुम्हें जरीन की बात कही न! अब बात इतनी बढ़ गई है कि उसके घर के लोग कहते हैं कि अब तू चुन ले--या तो संन्यास और या फिर तू जान।
मैंने तो उसे कहलवा दिया है कि तू फिकर न कर, अगर यही बात हो तो यह आश्रम तेरा घर है। क्षण भर विचार मत करना। यह आश्रम ही किसलिए है! अगर तुझे संन्यास छोड़ना हो तो तू मजे से छोड़ दे। मैं कहता नहीं कि रख। तू खुश, तेरा घर खुश। लेकिन तू अगर न छोड़ना चाहे तो यह मत सोचना कि तेरा कोई घर नहीं है। छोटा घर छूटेगा, यह बड़ा घर है। छोटा परिवार छूटेगा, यह बड़ा परिवार है।
अभी तीन हजार संन्यासी हैं यहां। और तुम कहां पाओगे इससे बड़ा परिवार? और कितने प्रेम से यह परिवार चल रहा है, इसकी तुम कल्पना कर सकते हो? और बिना किसी व्यवस्था के! घर में तीन आदमी हों तो भी तीन-पांच मची रहती है। पांच होते ही नहीं, मगर तीन ही तीन-पांच मचा देते हैं। यहां तीन हजार हैं, मगर तीन-पांच का कोई सवाल ही नहीं है। और एक मैं हूं कि मैं कभी अपने कमरे के बाहर आता नहीं। सब अपने से चल रहा है जैसे, कोई चलाने वाला नहीं! मुझे तो पता ही नहीं कि कैसे चल रहा है। मैं पता रखना भी नहीं चाहता। मैं तो सब उस पर पहले ही छोड़ चुका हूं। यह आश्रम भी उस पर ही छूटा हुआ है। उसकी जैसी मर्जी! लेकिन सब चल रहा है--एक अपूर्व सौंदर्य से! एक अपूर्व प्रसाद से चल रहा है!
तो जरीन को मैंने खबर भेज दी है कि यह तेरा घर है, तू एक क्षण भी सोचना मत। हां, तुझे संन्यास छोड़ना हो तो तेरी मौज। और तुझे लगे कि संन्यास न छोडूं, तो जाऊं कहां! तो यह तेरा घर है।
रामकृष्ण, पहले से आश्वस्त होने की इतनी क्या चिंता कर रहे हो? संन्यास लेना है कि कोई सौदा करना है? थोड़ा जुआरी होना भी सीखो। थोड़ा दांव लगाना भी सीखो।
लेकिन हमारी व्यवसायी बुद्धि है।
दो युवक बहुत वर्षों के बाद मिले। एक की हालत तो खस्ता थी। दफ्तर-दफ्तर घूमता था, बेकार था; यद्यपि विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडल लेकर निकला था। दूसरा विद्यार्थी तो कभी कालेज तक पहुंचा ही नहीं। टेंथ में ही दस बार फेल हुए, उसके आगे बढ़े नहीं। टेंथ का ही अभ्यास दस बार किया। फिर आशा भी छोड़ दी। मगर अब वे लखपति हो गए थे। व्यवसायी का बेटा था, हो सकता है मारवाड़ी रहा हो। पहले की तो हालत बड़ी खस्ता थी, जूते फटे थे, कपड़े गंदे थे। और उसने कहा: यह माजरा क्या है? और यह आलीशान मकान! खस की टट्टियां! दूसरा तो इसकी गद्दियों पर बैठने में भी शर्माए कि कहीं गद्दियां गंदी न हो जाएं--इतनी झकाझक, इतनी सफेद! वह तो सिकुड़ कर बैठा। उसने पूछा कि अपना राज तो कहो! मैं तो भूखा मर रहा हूं, गोल्ड मेडल मैंने पाया विश्वविद्यालय से। और तुम तो टेंथ क्लास से कभी आगे बढ़े नहीं।
उसने कहा: अरे टेंथ से इसका क्या लेना-देना! एक रुपये में चीज खरीदते हैं, दो रुपये में बेच देते हैं! एक परसेंट के लाभ से बस सब चल रहा है।
एक परसेंट लाभ! एक रुपये में खरीदते हैं, दो रुपये में बेच देते हैं। हुए होंगे टेंथ में दस दफे फेल, जरूर हुए होंगे। मगर एक रुपये पर एक रुपये के लाभ को एक परसेंट का लाभ समझते हैं, तो हो गए लखपति।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दफा जीत गया लाटरी--दस लाख रुपये। सब चकित थे कि मुल्ला तूने इस टिकट के नंबर का पता कैसे लगाया?
मुल्ला ने कहा कि क्या कहूं! रात मैंने देखा कि सात का नंबर तीन बार दिखाई पड़ा। सो मैंने सोचा, सात तिया अठारह। सो अठारह नंबर की टिकट मैंने खरीद ली। और यह लाटरी जीत गया।
दूसरे ने कहा: हद्द हो गई, सात तिया अठारह! अरे सात तिया इक्कीस होते हैं, अठारह नहीं।
तो मुल्ला ने कहा: गणित तुम करो, लाटरी मुझे मिली है। तू जा भाड़ में और तेरा गणित जाए भाड़ में! सवाल लाटरी का है। लाटरी किसको मिली?
तुम गणित जमाने बैठे हो! तुम पूछते हो: ’मैं संन्यास लेने के पहले आश्वस्त होना चाहता हूं कि मुझे निर्वाण पाने में सफलता मिलेगी या नहीं?’
और निर्वाण और सफलता, इनका कोई तालमेल है? सफलता की आकांक्षा संसार है। सफलता से ही मुक्त हो जाने का नाम निर्वाण है। और तुम सफलता को वहां भी घुसेड़े जा रहे हो! निर्वाण में भी! अच्छा हुआ, तुमने यह नहीं पूछा कि निर्वाण पाऊंगा तो भारत-रत्न की उपाधि मिलेगी कि नहीं? कि निर्वाण पाने पर नोबल प्राइज मिलेगी कि नहीं? तुकबंदी तो ठीक है--निर्वाण और नोबल प्राइज! मगर मैं नहीं सोचता कि अगर बुद्ध आज होते तो उनको कोई नोबल प्राइज मिलती।
यह जरा मजा तो देखो, जीसस को सूली मिली और कलकत्ता की टेरेसा को नोबल प्राइज! यह जीसस की अनुयायी। जीसस को नोबल प्राइज मिलती? अभी भी होते तो सूली मिलती। नोबल प्राइज तो मिलती है--कूड़ा-कर्कट को, कचरों को। समाज की पिटी-पिटाई लकीरों को जो पीटते रहते हैं--चमचों को। समाज की रूढ़ियों का जो परिपोषण करते हैं, उनको मिलती है। समाज के न्यस्त स्वार्थों की जो सेवा करते हैं, उनको मिलती है। भारत-रत्न भी उनको ही मिलेगा। बिलकुल रत्न जैसा जिनमें कुछ भी नहीं होगा! भारत-रतन कहो--पहुंचे हुए रतन! तो उनको मिलेगी।
सफलता? सफलता का भाव ही अहंकार का भाव है। और निर्वाण तो अहंकार का विसर्जन है। वहां कोई महत्वाकांक्षा, कोई वासना लेकर जाओगे तो निर्वाण भर नहीं मिलेगा, और कुछ भी मिल जाए।
संन्यास अहोभाव से लो, आश्वासन से नहीं; किसी सफलता की आकांक्षा से नहीं, मौज से! जीवन की व्यर्थता को पहचान कर। जीवन की शैली को बदलना है यह। एक ढंग से जीवन जीकर देख लिया--सफलता पाने का, दिल्ली जाने का, पद पाने का, धन पाने का--एक जीवन जीकर देख लिया और पाया कि नहीं है वहां कुछ; हाथ कुछ भी नहीं लगता। जान तो निकल जाती है, बिलकुल जान निकल जाती है--भाई ही भाई रह जाते हैं। भाईजान में से जान चली जाती है, भाई ही भाई! जैसे मोरारजी भाई! बस भाई ही भाई! फुफ्फस! अब कुछ नहीं भीतर। भीतर बिलकुल भूसा भरा हुआ। भाई ही भाई! गुजराती भाई! जान वगैरह कहां! जान तो निकल गई।
जो समझ लेता है यह कि यहां जिंदगी में तो सिर्फ गंवाना है--प्राण गंवाना, आत्मा गंवानी--संन्यास उसके लिए है। संन्यास उस बोध में फलित होता है। संन्यास कुछ पाने के लिए नहीं है। संसार में कुछ पाने योग्य नहीं है, इस बोध में संन्यास का फूल खिलता है। संन्यास किसी और चीज का साधन नहीं है, स्वयं साध्य है। स्वांतः सुखाय!
चल तू अपनी राह पथिक, चल, तुझको विजय-पराजय से क्या?
भंवर उठ रहे हैं सागर में,
मेघ घुमड़ते हैं अंबर में,
आंधी औ‘ तूफान डगर में,
तुझको तो केवल चलना है, चलना ही है, फिर हो भय क्या?
चल तू अपनी राह पथिक, चल, तुझको विजय-पराजय से क्या?
इस दुनिया में कहीं न सुख है,
इस दुनिया में कहीं न दुख है,
जीवन एक हवा का रुख है,
होने दे होता है जो कुछ, इस होने का हो निर्णय क्या?
चल तू अपनी राह पथिक, चल, तुझको विजय-पराजय से क्या?
अरे, थक गया! फिर बढ़ता चल,
उठ, संघर्षों से अड़ता चल,
जीवन विषम पंथ चलता चल,
अड़ा हिमालय हो यदि आगे, ‘चढूं कि लौटूं’ यह संशय क्या?
चल तू अपनी राह पथिक, चल, तुझको विजय-पराजय से क्या?
कोई रो-रो कर सब खोता,
कोई खोकर सुख में सोता,
दुनिया में ऐसा ही होता,
जीवन का क्रय मरण यहां पर, निश्चित ध्येय यदि, फिर क्षय क्या?
चल तू अपनी राह पथिक, चल, तुझको विजय-पराजय से क्या?
ओशो, कल आपने एक कालेज के युवकों द्वारा आयोजित नाटक में बताया कि सीता मैया सिगरेट पी रही थीं। क्या आपको सीता मैया को सिगरेट पीते देख कर धक्का नहीं लगा?
धक्का लगने का कारण था। पहला तो यह कि सीता मैया पनामा सिगरेट पी रही थीं। यह बिलकुल ठीक नहीं। पनामा भी कोई सिगरेट है? न गधा, न घोड़ा--खच्चर समझो। अरे इससे तो बीड़ी भी पीतीं तो कम से कम स्वदेशी! कम से कम गांधी बाबा का सिद्धांत पूरा होता! अब पनामा सिगरेट, न तो बीड़ी, न कोई सिगरेट। कुछ आदमी पीते हैं। आदमी क्या, जिनको पजामा समझो! पनामा सिगरेट! कम से कम सीता मैया को भी पिलानी थी तो पांच सौ पचपन! अमरीकी सिगरेट होती कोई, इंपोर्टेड होती। पांच सौ पचपन सिगरेट का टाइम में विज्ञापन निकलता है--दि टेस्ट ऑफ सक्सेस! सफलता का स्वाद! और सीता मैया से ज्यादा सफल और कौन? अरे रामजी पा गईं, अब और क्या पाने को बचा!
तो जब मुझे पता चला कि पनामा सिगरेट पी रही थीं तो बहुत दुख हुआ। और जिस गाड़ी में से उतरीं, वह भी एंबेसेडर गाड़ी! शर्म भी खाओ! संकोच भी खाओ! सीता मैया को एंबेसेडर गाड़ी में बिठाओगे? चलो धोबियों का बहुत डर भी रहा हो, न बिठालते रॉल्स रॉयस में, क्योंकि धोबी बड़े दुष्ट! कोई धोबी एतराज उठा दे। धोबियों को तो दिखाई ही पड़ते हैं धब्बे! लोगों की चादरें वगैरह धोते-धोते उनको धब्बे ही धब्बे दिखाई पड़ते हैं। चांद-सूरज में भी जब जिसने पहली दफे धब्बे देखे होंगे, वह धोबी रहा होगा। सीता मैया तक में उनको धब्बे दिखाई पड़े! तो कोई धोबी हो सकता है एतराज उठाता। उठाने दो, धोबियों से क्या बनता-बिगड़ता है!
मगर जब रामजी डर गए थे तो बेचारे कालेज के छोकरे, वे भी डरे होंगे। नहीं तो कम से कम इंपाला तो ले आते। सीता मैया को एंबेसेडर गाड़ी में बिठाया। एंबेसेडर गाड़ी में अगर गर्भवती स्त्री को बिठा लो तो जच्चा-अस्पताल के पहले ही बच्चा हो जाता है। और सीता मैया को दो-दो बच्चे पेट में थे, कुछ तो सोचो! दुख हुआ, बहुत दुख हुआ। छाती में छुरी लग गई!
खयालीराम, तुमने ठीक प्रश्न पूछा। कालेज के नालायक छोकरे ही ऐसा कर सकते हैं--जिनको न भारत के गौरव की कोई समझ है, न धर्म की कोई प्रतिष्ठा जिनके मन में है। नहीं तो ऐसा कहीं करते हैं!
लेकिन खयालीराम, भारत को थोड़ी क्षमता चाहिए व्यंग्य को समझने की, थोड़ा हंसने की क्षमता चाहिए। भारत भूल ही गया हंसने की कला। यहां बिलकुल चेहरे मातमी हो गए हैं।
तो मैं इस लिहाज से कुछ खुश हुआ कि चलो कुछ बात तो हंसने की हुई। मगर लोग ऐसे मूढ़ हैं कि चढ़ गए मंच पर, फिर उन्होंने न यह देखा कि सीता मैया हैं कि रामचंद्र जी, पिटाई-कुटाई कर दी। रामचंद्रजी और सीता मैया की पिटाई-कुटाई! अब यह तो हद्द हो गई! इससे मुझे और भी दुख पहुंचा। पनामा सिगरेट भी ठीक है, चलो एंबेसेडर गाड़ी भी ठीक है। जो हुआ सो हुआ। छोटी-मोटी भूलें थीं। मगर लोगों ने पिटाई कर दी। यह भी न देखा कि अब सीता मैया, कुछ भी हो, हैं तो सीता मैया! रामचंद्रजी माना कि टाई बांधे हुए थे और सूट पहने हुए थे, यह बात जंचती नहीं; मगर आधुनिक समय में इसमें क्या एतराज हो सकता है? और नाटक का नाम ही था: आधुनिक रामलीला!
मगर गांव के मूढ़, उन्होंने आग लगा दी, मंच जला दिया, परदे फाड़ डाले, पिटाई-कुटाई कर दी। इस बात से भी हमें थोड़ा समझना चाहिए कि इस देश में हंसने की क्षमता चली गई है। हमारा बोध ही चला गया है। हम बस गंभीर ही होना जानते हैं। और गंभीर होना कोई अच्छा लक्षण नहीं है--बीमारी का लक्षण है।
मैंने सुना है, पिकासो ने एक भारतीय की तसवीर बनाई, पोटर्रेट बनाया और एक मित्र को दिखाया। मित्र था डाक्टर। आधा घंटे तक देखता रहा। इधर से देखे, उधर से देखे। देखे ही नहीं, तसवीर को दबाए भी। पीछे भी गया तसवीर के।
पिकासो ने कहा: हद्द हो गई! बहुत देखने वाले देखे। तस्वीर के पीछे क्या कर रहे हो? और तस्वीर देखते हो कि दबाते हो?
उसने कहा कि इस आदमी को अपैंडिक्स की बीमारी है। इसके चेहरे से साफ जाहिर हो रहा है। यह बड़े दर्द में है।
पिकासो ने कहा: महाराज, दर्द वगैरह में नहीं है, यह भारतीय है।
यह तो भारतीयों का बिलकुल राष्ट्रीय लक्षण है कि ऐसे गंभीर रहे आते हैं कि जैसे अपैंडिक्स में दर्द हो, कि प्राण निकले जा रहे हैं। हंसते भी हैं तो इतनी कंजूसी, जिसका हिसाब नहीं।
और आखिरी सवाल:
क्या मारवाड़ी सच ही ऐसे गजब के लोग हैं?
रंजन! इस कहानी पर ध्यान करना--
अकबर और बीरबल के बीच विवाद खड़ा हुआ। अकबर का कहना था कि मुल्ला ही सबसे आदिम और चतुर लोग हैं। पंडित, पुजारी। जब कि बीरबल का कहना था कि मारवाड़ी को चतुराई में कोई मात नहीं कर सकता। अकबर ने सबूत जानना चाहा। बीरबल ने मुल्ला नसरुद्दीन को बुलाया और कहा कि बादशाह को आपकी दाढ़ी-मूंछ चाहिए। उसके बदले में जो कीमत हो, वे चुका देंगे। मुल्ला से कहा गया कि वह यदि दाढ़ी-मूंछ कटवाने से इनकार करेगा तो उसकी गर्दन उड़ा दी जाएगी।
मुल्ला ने पहले तो बड़ी दलीलें दीं और गिड़गिड़ाए कि दाढ़ी-मूंछ न काटी जाए, महाराज। मैं मुल्ला हूं, धर्मगुरु हूं, दाढ़ी-मूंछ कट गई तो मेरे धंधे को बड़ा नुकसान पहुंचेगा। अरे दाढ़ी-मूंछ कट गई तो कौन मुझे मुल्ला समझेगा? इस पर ही तो मेरा सारा व्यवसाय टिका है।
मगर बीरबल ने कहा कि फिर समझ ले, तैयार हो जा। अगर दाढ़ी-मूंछ बचानी है तो गर्दन कटेगी।
मुल्ला ने भी सोचा कि दाढ़ी-मूंछ की बजाय गर्दन कटवाना तो महंगा सौदा है। इससे तो दाढ़ी-मूंछ ही कटवा लो, फिर उग आएगी। गर्दन थोड़े ही दुबारा उगेगी। अरे दाढ़ी-मूंछ तो दो-चार-छह महीने की बात है, भग जाएंगे कहीं, छिप जाएंगे कहीं हिमालय की गुफा में, चार-छह महीने में फिर उग आएगी।
सो धमकाने की वजह से वह राजी हो गया। घबड़ाहट के मारे उसने कोई कीमत भी मांगना उचित नहीं समझा, कि जान बची लाखों पाए। जल्दी से दाढ़ी कटवाई और भाग गया जंगल की तरफ।
बीरबल ने फिर धन्नालाल मारवाड़ी को बुलवाया। दाढ़ी-मूंछ कटवाने की बात सुन कर पहले तो वह कांप उठा, परंतु फिर सम्हल कर उसने कहा: हुजूर, हम मारवाड़ी नमकहराम नहीं होते। आपके लिए दाढ़ी-मूंछ तो क्या, गर्दन कटवा सकते हैं।
अकबर ने बीरबल की ओर मुस्कुरा कर देखा। बीरबल ने भी आंखों से ही कहा कि जरा आगे देखिए क्या होता है! बीरबल ने पूछा: क्या कीमत लोगे? मारवाड़ी ने कहा: एक लाख अशर्फियां। सुनते ही अकबर तो मारे गुस्से के उबल पड़ा। एक दाढ़ी-मूंछ की इतनी कीमत? मारवाड़ी ने कहा: हुजूर, पिता की मृत्यु पर पिंड दान और सारे गांव को भोजन करवाना पड़ा--दाढ़ी के इन दो बालों की खातिर। मां के मरने पर काफी दान-पुण्य करना पड़ा--दाढ़ी के इन दो बालों की खातिर। अरे दाढ़ी की इज्जत के लिए क्या नहीं किया! हुजूर, शादी करनी पड़ी--दाढ़ी के इन दो बालों की खातिर। नहीं तो लोग कहते थे कि अरे, क्या नामर्द हो? सो मर्द सिद्ध करने के लिए शादी तक करनी पड़ी। हुजूर, कैसे-कैसे कष्टों में पड़ा, आपको क्या पता, क्या-क्या गिनाऊं! बच्चे पैदा करने पड़े--दाढ़ी के इन दो बालों की खातिर। आज दर्जनों बच्चों की कतार लगी है, उनका खाना-पीना, भोजन-खर्चा, हर तरह का उपद्रव सह रहा हूं--दाढ़ी के इन दो बालों की खातिर। फिर बच्चों की शादी, पोते-पोती, इन पर खर्च करना पड़ा--दाढ़ी के इन दो बालों की खातिर। और अभी परसों पत्नी की जिद्द के कारण हमारी शादी की पचासवीं सालगिरह पर खर्च हुआ--सो दाढ़ी के इन दो बालों की खातिर।
अकबर कुछ कर न पाया और कीमत चुका दी। दूसरे दिन अकबर ने नाई को मारवाड़ी के घर दाढ़ी-मूंछ कटवाने के लिए भेजा, तो मारवाड़ी ने उसे मना कर दिया और कहा: खबरदार अगर बादशाह सलामत की दाढ़ी को हाथ लगाया! बादशाह अकबर की दाढ़ी में हाथ डालते हुए शर्म नहीं आती? नाई को उसने खूब धमकाया और घर से बाहर निकाल दिया। नाई ने आकर अकबर से शिकायत की तो अकबर का गुस्सा आसमान छूने लगा। वह बीरबल पर भी बड़ा नाराज हुआ। तुरंत मारवाड़ी को बुलाया गया। बीरबल ने पूछा कि जब दाढ़ी बिक चुकी है तो अब उसे कटवाने क्यों नहीं देता? मारवाड़ी ने कहा: हुजूर, अब यह दाढ़ी-मूंछ मेरी कहां है? यह तो बादशाह सलामत की धरोहर है! इसको अब कोई नाई छूने की मजाल नहीं कर सकता। अरे करे कोई मजाल, गर्दन उड़ा दूंगा। यह मेरी इज्जत का सवाल नहीं, बादशाह की इज्जत का सवाल है। इसे मुंडवाना तो खुद बादशाह की दाढ़ी-मूंछ मुंडवाने के बराबर होगा। यह मैं जीते-जी नहीं होने दूंगा। आप चाहे मेरी गर्दन कटवा दें, पर इस कीमती धरोहर की रक्षा करना अब मेरा और मेरे परिवार का फर्ज है।
अकबर हक्का-बक्का रह गया और बीरबल मुस्कुराता रहा। महीने भर बाद अकबर के नाम मारवाड़ी का पत्र आया, जिसमें उसने दरखास्त की थी कि दाढ़ी-मूंछ की रक्षा करने तथा इसकी साफ-सफाई रखने पर महीने में सौ अशर्फियां मिलती रहें।
रंजन, तू पूछती है कि क्या मारवाड़ी सच ही ऐसे गजब के लोग हैं?
लगता है तेरा मारवाड़ियों से पाला नहीं पड़ा। भगवान करे कभी पड़े भी नहीं!
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Did it shock you to see Sita Maiyya smoking a cigarette?
According to Osho, yes—he, too, felt a shock, though playfully at the bad taste of the Panama cigarette and the Ambassador car. But the deeper point is our humorless religiosity: we’ve forgotten satire, become grim, and react with violence. Spiritual maturity means retaining reverence without fanaticism, allowing modern portrayals, and meeting life with laughter and awareness rather than solemn, sick seriousness.
In simple terms: He was surprised, but the real problem is people stopped laughing and took a joke as an insult—so stay respectful yet light-hearted and don’t turn faith into anger.
Will I succeed in attaining nirvana after taking sannyas?
According to Osho, sannyas is a fearless leap into insecurity and trust, not a business deal with guaranteed nirvana. One surrenders bookkeeping and rests in God as the only security: as He keeps, so you will be. Demand for assurance is the householder’s mind; the sannyasin stakes everything without bargaining. From such total trust and commitment, transformation may flower—but no promises.
In simple terms: No one can promise nirvana; taking sannyas means bravely trusting life and letting go of guarantees.
